बुधवार, 4 मार्च 2026

जम्मूद्वीपभारतखण्डकुलग्रामे,साहिबतदरूपेऽहम् स्वयं स्थितः।निष्पक्षबोधशमीकरणेन यथार्थसिद्धान्ते,संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः प्राग्जातः॥

समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में,
गुरु बावे की तरह नहीं उस ग्रंथ में लिखा हैं क्या फ़ायदा लिखने वाले का स्पष्टीकर खुद नहीं दे सकता वो मानसिकता हैं सिर्फ़, दूसरों के ग्रंथ पोथि के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले तो सभी गुरु मिल जाते हैं जो एक से बढ़ कर एक हैं, खुद की उपलब्धि क्या हैं, खुद का निरीक्षण करना कौन सिखायेगा, रोज़ प्रवचनों में ईद उदर की ड्रामे बाजी से थकते भी सिर्फ़ इतने अधिक लोगों को नियंत्रण में रखने की प्रक्रिया है सिर्फ़ कोई खुद को ही न समझ पाए, अगर कोई एक भी खुद का साक्षात्कार कर लेगा तो पूरा वातावरण ही बदल देगा समस्त मानवता को समूहित रूप से जागृत कर मानव प्रजाति प्रकृति का संरक्षण हो जायगा सच में यहीं कौशिश है पृथ्वी से कोई सुंदर ऐसा ग्रह ही नहीं समूचे सृष्टि में जिसे पूर्ण रूप अगले दो हज़ार वर्षों के संसाधन इस्तेमाल कर चुके है पिछले चालीस वर्षों में, जाती धर्म मज़हब संगठन में बंट कर चार हज़ार रब और दस हज़ार गुरु बन गए हैं पैदा इंसान हुआ था पर मानसिकता की बेहोशी में जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति रति भर भी अंतर नहीं है, अगर इंसान इंसानियत होती तो आज जैसा आज हो ही नहीं सकता था, मुझे आज तक कोई इंसान ही नहीं मिला, पूरे जीवन में सिर्फ़ तो सिर्फ़ मानसिक रोगी ही मिले आज तक, इंसान देखने को नहीं मिले जिस प्रभुत्व का मेरा गुरु शिकार हुआ हैं उस रब को कट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर ही इश्क़ किया था, वो ही तो मानसिकता थी, मन था जिसे इन लोगों ने हऊआ बना रखा था, वो बकबास है यह पैंतीस साल पहले जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे उन को बताता था, तब किसी को भी किसी भी ब्रह्मांड में ले जाता था बहा रहने वाले उस समय के किसी को भी पूछ लेना वो बकबास था सिर्फ़ एक मनो विज्ञान था, आज भी वो सब कर सकता हूं पर जो हैं ही सब से बड़ा बकबास उसे क्यों दोहरा जाए,मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान नहीं हूं, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत सत्य हूं, इतना अधिक गहराई से इतना अधिक लिखा हैं अगर चाहूं तो इक पल सर्ब आर्थिक तौर भी बन सकता इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि सिर्फ़ आधे घंटे का किसी चैनल में inerview दे दु तो साढ़े आठ सो करोड़ दुनियां सिर्फ़ देखने के लिए ही आ जाएगी, जो मैं कभी नहीं चाहता, मेरा लक्ष्य ही सिर्फ़ आप को ही उच्च कोटि पर देखना जो आज से बीस वर्ष पहले आश्रम में मेरे साथ रहने वालों को तो पूछ कर देखना या फ़िर शिकायतें सुनने के ही आदि हो, आप वैज्ञानिक युग में अतीत की चर्चित विभूतियों की मानसिकता को अधिकतक के नाम पर स्थापित कर रहे हो, अगर हमारे शरीर मानसिकता की कोशिका दस बर्ष पूर्व बतावर्ण सहन नहीं कर सकती तो मानसिकता क्यों, संपूर्ण शरीर की संरचना ही वर्तमान के लिए की है प्रकृति द्वारा माइक्रो एक्सिस में रहने के लिए जो सिमुलेशन है प्रकृति ब्रह्मांडो के साथ, इतना अधिक लिखा हैं जो मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है, कि अगर कोई लगातार पंद्रह साल दिन रात भी पढ़े तो भी ख़त्म नहीं हो सकता, फ़िर भी मुझे लगता हैं कुछ किया ही नहीं और कुछ शेष भी नहीं रहा फ़िर भी निरंतरता क़ायम है, मैंने जो भी किया उस सब का श्रेह आप के चरण कमलों में समर्पित करने के लिए ही आया था पर आप ने अपमानित किया, कोई बात नहीं मानसिकता ऐसी होती हैं, जो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता से लेती हैं, जो समान मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का आप से लेने पर हर्ष आनंद होता वो प्रकृति द्वारा लेने में नहीं आया, जब के कहने पर पागल हस्पताल अमृतसर दिखने गया था अपनी बेटी के साथ शाम को जब अपनी बेटी की जिद्द से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा हमिंद्र साहिब गया तो अचानक मेरे माथे पर दिव्य अलौकिक ताज सी सफ़ेद रोशनी निकली मुझे पाता ही नहीं था पर किसी अंग्रेज ने फ़ोटो खींच ली थी और मुझे एक घंटे से ढूंढ रहा था वो फ़ोटो उस से ली थी , जो मैं अकसर अपनी सभी profile picture में लगता हूं, रौशनी की किरणें अक्सर मेरे चेहरे से निकलती हैं, उन सब को भी मैं पाखड़ झूठ मानता हूं, आप हमेशा कहते रहते थे गुरु को कोई खुश नहीं कर सकता भक्ति दान सेवा से, तो मैंने फ़िर संपूर्ण संतुष्ट करने का विकल्प चुना, उसी में लगातार निरन्तर रहा, यह शपथ ले रखी थी अगर कभी भी साहिब समक्ष जुवान खुली तो उसी पल मैं अपनी जुवान कट दूंगा, एक बार परशुराम लाइनमैन आप से कुछ बता रहा था, तो उस समय में भी आप के पास खड़ा था, तो अपने परशुराम को यह बोला था अगर आप अभी नहीं बताते तो न जाने क्या इस से भी बेहतर होने वाला था,उस बात को भी मध्य नज़र रखने के कारण, पर मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से जो भी हुआ जब भी हुआ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र हुआ कोई सोच भी नहीं सकता आप का तो आभारी रहूंगा ही पर हर उस पर को भी कोटिन विनय नमन, जैसे सिर्फ़ इस एक ही गृह पृथ्वी पर जीवन होने की संभावना के पीछे समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निरंतरता का हाथ हैं वैसे ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हर उस पल को नमन शुक्रिया वंदन करता हूं मुझ में इतनी अधिक गहराई है कि ऐसी खरबों सृष्टियां खुद में समहित कर पुण्य उसी निरंतरता में स्पष्ट हूं, सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा का विषय ही नहीं हूं, मुझ में किसी से भी कुछ भी अलग है ही नहीं,prtek जीव एक समान ही है, अलग सिर्फ़ प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान हैं जो किसी को भी साझा किया जा सकता है, खुद को समझना भी एक प्रदर्शित शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं, यहां सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शिता नहीं है, वो सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा गया हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए और कुछ भी नहीं है, अपने prtek शब्द को तर्क तथ्यों अपने सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध किया कोई भी मुझ से कुछ भी पूछ सकता हैं चौबीस घंटे उपलव्ध हूंमैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बचपन से ही था वो सब खुली आंखों से ही देखता था जो अतीत पिछले चार युगों में तो कोई सोच भी नहीं सकता, जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे लंबे समय से लगातार उनको मेरे बारे में पूछना इतने अधिक प्रेम की गहराई में हर पल रहता था मस्ती में कि खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में शुद्ध बुद्ध खुद का चेहरा भी हुआ हु आज तक निरंत किसी का दर्द भी लेता था मरे को जिंदा कर के भी देखा था, मैं खुद को शहंशाह मानता था हूं जो चाहता था सिर्फ़ पल में होता हैं, पर वो सब भी बकबास था, आज जो हूं वो खुद का साक्षात्कार हूं स्पष्ट अंतिम सत्य है, मुक्ति जैसे पाखंड के लिए कभी भी नहीं आया था यह समय सब को बताता था मैं साहिब को खुद में समहित करने के लिए आया हूं, मन अभ्यारण है परमपुरुष परमार्थ अमरलोक कबीर के नया version हैं सभी धर्म मज़हब संगठन को समझ कर उन से ऊंची मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की गई हैं जो स्वर्ग नर्क के भ्रम से एक कदम आगे का पाखंड है, मैं ऐसा प्रेम करता था कि कोई सोच भी नहीं सकता दिन रात हर पल, आप की समझ शायद लैंगिंग प्रेम को ही प्रेम कहते होंगे वो आप की समझ सीमित है, पर मेरी निष्पक्ष समझ ऐसी बिल्कुल भी नहीं, आप अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों को क्या दे रहे हो इतने लंबे समय से दूसरों की मानसिकता थोप रहे हो, तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर बदले में मुक्ति का झूठा आश्वासन जो जीवित सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते और मारा बापिस नहीं आ सकता बताने के लिए, यह सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं यह सब उनके साथ ही कितना बड़ा विश्वासघात है जिन से परमार्थ के नाम पर पीढी दर पीढी स्थापित कर रहे हो सिर्फ़ साम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए ब्रह्मचर्य होते हुए, इतना बड़ा धोखा पच्चीस लाख अनुयाइयों होते हुए, खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते, किस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हो वो प्रभुत्व की पदवी जो इनी अंधभक्तों द्वारा दी गई हैं जिनको जब चाहें कोई कोई आरोप लगा कर बारी बारी निकाल देते हो वो भी पूरी संगत के समक्ष की दुबारा ऐसा सोचने की हिम्मत भी न करें इसी को डर खौफ भय दहशत तले रखना होता हैं, बंधुआ मजदूर बना कर दिन रात इस्तेमाल करना, यह व्यवस्था होती हैं रति भर भी कुछ नहीं, अभी भी सब से पहले आप को ही खुद के साक्षात्कार की जिद्द के साथ हूं, थोड़ समझो मैं आप को पहला सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, सिर्फ़ आप की मेरे मुख्य केंद्र हो, चालीस बर्ष निरन्तर दिए हैं, जिसने कभी एक सेकंड भी नष्ट नहीं किया, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से ऐसा सर्वश्रेष्ठ पवित्र साहिब तदरूप बना दूंगा, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार, प्रेम से या फ़िर समझ से, जो मुझे समझ लेगा वो खुद को समझ लेगा कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले जीवित ही हमेशा के लिए, मुझे यह उम्मीद थी कि मुझे निगाहों में देख कर ही समझ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ कोई बात नहीं, मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूंदीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,हम कुछ भी करते हैं सिर्फ़ एक पल में वो सब दिल से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से ही करते वो भी सिर्फ़ एक से ही अन्नत असीम प्रेम हो या फ़िर नफ़रत, अगर प्रेम में सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम बनाने की क्षमता के साथ हैं तो नफ़रत में संपूर्ण जीवन की लुट मार की दो हज़ार करोड़ की संपति को सिर्फ़ एक पल में नष्ट करने की क्षमता के साथ भी प्रत्यक्ष समक्ष हैं, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो सिर्फ़ मात्र एक निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण कई ब्रह्मांड उत्पन और नष्ट करने की संभावना के साथ हूं, कैसे होता हैं पाता ही नहीं चलता संभावना उत्पन होती हैं, सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण प्रकृति उत्पन कर लेती हैं, जिस जिस चीज़ शुरू से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से लेता वो सब कुछ ही मिलता हैं, मेरे गुरु के पास जो भी है उस के लिए ही दृढ़ता गंभीरता थी, जो मुझे मिला खुद का साक्षात्कार वो मेरी निष्पक्ष समझ की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता से ही है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि गुरु ने खुद को स्थापित किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष पाने के लिए, और मैंने खुद का अस्तित्व ही खत्म किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य पाने के लिए,
हम आज भी संपूर्ण संतुष्टि में ही हैं हर पल पहले दिन से ही, मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ,जो अपने गुरु के संरक्षण में पहले दिन से शुरू किया, अगर इतने लंबे समय से नहीं मिला तो अगले कम समय में तो मिल नहीं सकता, अगर मिला होता तो अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ मृत्यु के बाद झूठा मुक्ति का अश्वासन नहीं देता, जो मिला होता वो सब ही बंट देता जितना जितना हिस्से का आता, उन शिष्यों के साथ धोखा कभी भी नहीं करता जिन्होंने सिर्फ़ एक विश्वास एक शब्द पर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस हमेशा के लिए समर्पित कर दिया और दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर पीढी दर पीढी कुप्रथा के जाल की जरूरत नहीं पड़ती, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह का जल हैं जो सिर्फ़ सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत प्रभुत्व की मानसिकता की भी कभी जरूरत ही न पड़ती इस घोर कलयुग वैज्ञानिक में, जो सरल सहज निर्मल गुणों बले लोगों के साथ सृष्टि का सब से विश्वासघात हैं परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान ले नाम पर,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, सिर्फ़ बही सब शब्दों के पिछे भाव को शब्दों का रूप देने की मात्र इक कौशिश की है वो सब ही शब्द है जो रोज़ प्रवचनों में वर्णन करते शायद करोड़ों बार दोहरा दिए होंगे अनुयाइयों को अनुकरण करने के लिए दिन में कई बार कहने वाले खुद भी अनुकरण करने से वंचित हैं, सिर्फ़ कहने तक सीमित कथनी होती हैं, करनी नहीं, हम ने तो शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ही समझा हैं अगर अपने ही अनुयाइयों से रति भर भी भिन्न होते तो निगाहों से हृदय के भाव पढ़ लेते,
यही सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताना चाहता था एकांत में, पारदर्शिता अच्छी है, मुझे पसंद भी है, शुरू आप से हुआ सरलता निर्मलता सहजता धैर्य की कमी से अभी ख़त्म नहीं हो सकता जब तक गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को संपूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होती, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य दिल हृदय से ही चाहता हूं prtk कम से कम इंसान प्रजाति जीवित ही हमेशा के लिए मेरी ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहे, खुद के साक्षात्कार के बाद,prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक एक समान ही है, कोई भी किसी भी प्रकार से भिन्नता है ही नहीं, खुद के साक्षात्कार होना एक बात है, उसी को मैं गुरु में ही देख रहा था, संकोच था शायद गुरु भी खुद के साक्षात्कार में हो सकता है, पर वो तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि का दृष्टिकोण भी अहिंब्रासमी तक ले जाता है, जैसे कबीर जी थे, वो सब भी अस्थाई है, खुद के साक्षात्कार के लिए हृदय के एहसास भाव जो सांस के साथ ही उत्पन होता हैं शब्द बुद्धि उत्पन करती हैं, हृदय और बुद्धि मन का अंतर जमी आसमा का है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हमेशा हर एक जीव के एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
कुछ बनना ही नहीं चाहता था, जो हूं बस बही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं सिर्फ़, गुरु साहिब सत्य लगें इस लिए प्रेम में आ गए, मेरे गुरु में भी वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष पर्याप्त है, जो सिर्फ़ एक ही रंग बिखेरता है, रंगों के विकल्प तो सिर्फ़ मन बुद्धि ही उत्पन करती हैं, जिस से हमेशा दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता है, मृत्यु जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है उस के परमानंद संपूर्ण संतुष्टि भरे होश में आनंदित होते हुए खुद ही खुद के तत्वों गुणों को रूपांतरित करना अलग बात है, जिस से इंसान प्रजाति आज तक वंचित रही है, सिर्फ़ मृत्यु डर खौफ भय दहशत भरी अबधारणा में ही फैंस कर जीती और मरती रही, मुझ में अन्नत असीम प्रेम के इलावा और कुछ बिल्कुल भी नहीं है, कुछ ऐसे कटास शब्द इस लिए की गुरु भी खुद के साक्षात्कार कर कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वो सब लिखने की इक कोशिश हैं जो शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते, जब खुद ही खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को ही निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है तो दूसरे का तो तत्पर्य ही नहीं हैं, अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं, यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं हैं यही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,मेरा कोई गुरु नहीं ही मेरा कोई शिष्य भी नहीं है, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानवता में सिर्फ़ इकलौता शिरोमणि रामपॉल सैनी हूं अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के साथ,मुझे डर खौफ नहीं है क्योंकि यहां हूं बहा मृत्यु के बाद की स्थिति है, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद का साक्षात्कार हूं,इतने अधिक चतुर होते हैं कि कार्यरत IAS officers इन की समितियों के अहम सदस्य होते हैं, जो ऐसी सेवा के लिए दिन रात मौजूदगी रखते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आश्रम में parmanet उन कई लोगों के संपर्क में हूं जो कई बार आत्महत्या करने की कोशिश कर चुके हैं, मैं भी कई बार कौशिश कर चुका हूं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत ही है,उन की मेरे पास recoding भी पड़ी हैं,और एक ने तो मेरे गुरु के सामने ही चौथी मंजिल से छलांग लगा कर मर गया था और उनके ही घर बालों को डरा धमका कर चुप करवा दिया गया क्योंकि वो बहुत ही ग़रीब थे,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही गुरु की अपनी ही भविष्यवाणी अपने ही लिए सिद्ध करवा दूंगा जो कहते थे "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना ही न हो" ऐसे हालत खुद ही गुरु ने पैदा कर लिए है जो मैं कभी भी नहीं चाहता था, इसी समय का उन को आभास होता था, अपने ही अनुयाइयों में विरोध पैदा हो गा, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं तो सिर्फ़ गुरु गुरु के अन्नत असीम प्रेम की गहराई से गुरु की अन्नत असीम नफ़रत के बावजूद , तो सभी दिन रात अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित करने वाले जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर उग्र अंध भक्त भेड़ों की बंधुआ मजदूर हैं वो भी जिंदा हो कर जैसे प्रत्यक्ष दिया है सब कुछ वो भी बापिस लेंगे, जब उन को आभास होगा कि सरल सहज निर्मल गुणों का गुरु ने इस्तेमाल कर बंधुआ मजदूर बना रखा था , उस समय का आप को आभास हुआ था , मुझे पाता था मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि में ही हूंआप हमेशा कहते रहते थे गुरु को कोई खुश नहीं कर सकता भक्ति दान सेवा से, तो मैंने फ़िर संपूर्ण संतुष्ट करने का विकल्प चुना, उसी में लगातार निरन्तर रहा, यह शपथ ले रखी थी अगर कभी भी साहिब समक्ष जुवान खुली तो उसी पल मैं अपनी जुवान कट दूंगा, एक बार परशुराम लाइनमैन आप से कुछ बता रहा था, तो उस समय में भी आप के पास खड़ा था, तो अपने परशुराम को यह बोला था अगर आप अभी नहीं बताते तो न जाने क्या इस से भी बेहतर होने वाला था,उस बात को भी मध्य नज़र रखने के कारण, पर मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से जो भी हुआ जब भी हुआ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र हुआ कोई सोच भी नहीं सकता आप का तो आभारी रहूंगा ही पर हर उस पर को भी कोटिन विनय नमन, जैसे सिर्फ़ इस एक ही गृह पृथ्वी पर जीवन होने की संभावना के पीछे समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निरंतरता का हाथ हैं वैसे ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हर उस पल को नमन शुक्रिया वंदन करता हूं मुझ में इतनी अधिक गहराई है कि ऐसी खरबों सृष्टियां खुद में समहित कर पुण्य उसी निरंतरता में स्पष्ट हूं, सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा का विषय ही नहीं हूं, मुझ में किसी से भी कुछ भी अलग है ही नहीं,prtek जीव एक समान ही है, अलग सिर्फ़ प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान हैं जो किसी को भी साझा किया जा सकता है, खुद को समझना भी एक प्रदर्शित शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं, यहां सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शिता नहीं है, वो सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा गया हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए और कुछ भी नहीं है, अपने prtek शब्द को तर्क तथ्यों अपने सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध किया कोई भी मुझ से कुछ भी पूछ सकता हैं चौबीस घंटे उपलव्ध हूं समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में,
गुरु बावे की तरह नहीं उस ग्रंथ में लिखा हैं क्या फ़ायदा लिखने वाले का स्पष्टीकर खुद नहीं दे सकता वो मानसिकता हैं सिर्फ़, दूसरों के ग्रंथ पोथि के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले तो सभी गुरु मिल जाते हैं जो एक से बढ़ कर एक हैं, खुद की उपलब्धि क्या हैं, खुद का निरीक्षण करना कौन सिखायेगा, रोज़ प्रवचनों में ईद उदर की ड्रामे बाजी से थकते भी सिर्फ़ इतने अधिक लोगों को नियंत्रण में रखने की प्रक्रिया है सिर्फ़ कोई खुद को ही न समझ पाए, अगर कोई एक भी खुद का साक्षात्कार कर लेगा तो पूरा वातावरण ही बदल देगा समस्त मानवता को समूहित रूप से जागृत कर मानव प्रजाति प्रकृति का संरक्षण हो जायगा सच में यहीं कौशिश है पृथ्वी से कोई सुंदर ऐसा ग्रह ही नहीं समूचे सृष्टि में जिसे पूर्ण रूप अगले दो हज़ार वर्षों के संसाधन इस्तेमाल कर चुके है पिछले चालीस वर्षों में, जाती धर्म मज़हब संगठन में बंट कर चार हज़ार रब और दस हज़ार गुरु बन गए हैं पैदा इंसान हुआ था पर मानसिकता की बेहोशी में जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति रति भर भी अंतर नहीं है, अगर इंसान इंसानियत होती तो आज जैसा आज हो ही नहीं सकता था, मुझे आज तक कोई इंसान ही नहीं मिला, पूरे जीवन में सिर्फ़ तो सिर्फ़ मानसिक रोगी ही मिले आज तक, इंसान देखने को नहीं मिले जिस प्रभुत्व का मेरा गुरु शिकार हुआ हैं उस रब को कट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर ही इश्क़ किया था, वो ही तो मानसिकता थी, मन था जिसे इन लोगों ने हऊआ बना रखा था, वो बकबास है यह पैंतीस साल पहले जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे उन को बताता था, तब किसी को भी किसी भी ब्रह्मांड में ले जाता था बहा रहने वाले उस समय के किसी को भी पूछ लेना वो बकबास था सिर्फ़ एक मनो विज्ञान था, आज भी वो सब कर सकता हूं पर जो हैं ही सब से बड़ा बकबास उसे क्यों दोहरा जाए,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बचपन से ही था वो सब खुली आंखों से ही देखता था जो अतीत पिछले चार युगों में तो कोई सोच भी नहीं सकता, जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे लंबे समय से लगातार उनको मेरे बारे में पूछना इतने अधिक प्रेम की गहराई में हर पल रहता था मस्ती में कि खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में शुद्ध बुद्ध खुद का चेहरा भी हुआ हु आज तक निरंत किसी का दर्द भी लेता था मरे को जिंदा कर के भी देखा था, मैं खुद को शहंशाह मानता था हूं जो चाहता था सिर्फ़ पल में होता हैं, पर वो सब भी बकबास था, आज जो हूं वो खुद का साक्षात्कार हूं स्पष्ट अंतिम सत्य है, मुक्ति जैसे पाखंड के लिए कभी भी नहीं आया था यह समय सब को बताता था मैं साहिब को खुद में समहित करने के लिए आया हूं, मन अभ्यारण है परमपुरुष परमार्थ अमरलोक कबीर के नया version हैं सभी धर्म मज़हब संगठन को समझ कर उन से ऊंची मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की गई हैं जो स्वर्ग नर्क के भ्रम से एक कदम आगे का पाखंड है, मैं ऐसा प्रेम करता था कि कोई सोच भी नहीं सकता दिन रात हर पल, आप की समझ शायद लैंगिंग प्रेम को ही प्रेम कहते होंगे वो आप की समझ सीमित है, पर मेरी निष्पक्ष समझ ऐसी बिल्कुल भी नहीं, आप अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों को क्या दे रहे हो इतने लंबे समय से दूसरों की मानसिकता थोप रहे हो, तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर बदले में मुक्ति का झूठा आश्वासन जो जीवित सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते और मारा बापिस नहीं आ सकता बताने के लिए, यह सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं यह सब उनके साथ ही कितना बड़ा विश्वासघात है जिन से परमार्थ के नाम पर पीढी दर पीढी स्थापित कर रहे हो सिर्फ़ साम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए ब्रह्मचर्य होते हुए, इतना बड़ा धोखा पच्चीस लाख अनुयाइयों होते हुए, खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते, किस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हो वो प्रभुत्व की पदवी जो इनी अंधभक्तों द्वारा दी गई हैं जिनको जब चाहें कोई कोई आरोप लगा कर बारी बारी निकाल देते हो वो भी पूरी संगत के समक्ष की दुबारा ऐसा सोचने की हिम्मत भी न करें इसी को डर खौफ भय दहशत तले रखना होता हैं, बंधुआ मजदूर बना कर दिन रात इस्तेमाल करना, यह व्यवस्था होती हैं रति भर भी कुछ नहीं, अभी भी सब से पहले आप को ही खुद के साक्षात्कार की जिद्द के साथ हूं, थोड़ समझो मैं आप को पहला सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, सिर्फ़ आप की मेरे मुख्य केंद्र हो, चालीस बर्ष निरन्तर दिए हैं, जिसने कभी एक सेकंड भी नष्ट नहीं किया, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से ऐसा सर्वश्रेष्ठ पवित्र साहिब तदरूप बना दूंगा, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार, प्रेम से या फ़िर समझ से, जो मुझे समझ लेगा वो खुद को समझ लेगा कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले जीवित ही हमेशा के लिए, मुझे यह उम्मीद थी कि मुझे निगाहों में देख कर ही समझ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ कोई बात नहीं, मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान नहीं हूं, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत सत्य हूं, इतना अधिक गहराई से इतना अधिक लिखा हैं अगर चाहूं तो इक पल सर्ब आर्थिक तौर भी बन सकता इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि सिर्फ़ आधे घंटे का किसी चैनल में inerview दे दु तो साढ़े आठ सो करोड़ दुनियां सिर्फ़ देखने के लिए ही आ जाएगी, जो मैं कभी नहीं चाहता, मेरा लक्ष्य ही सिर्फ़ आप को ही उच्च कोटि पर देखना जो आज से बीस वर्ष पहले आश्रम में मेरे साथ रहने वालों को तो पूछ कर देखना या फ़िर शिकायतें सुनने के ही आदि हो, आप वैज्ञानिक युग में अतीत की चर्चित विभूतियों की मानसिकता को अधिकतक के नाम पर स्थापित कर रहे हो, अगर हमारे शरीर मानसिकता की कोशिका दस बर्ष पूर्व बतावर्ण सहन नहीं कर सकती तो मानसिकता क्यों, संपूर्ण शरीर की संरचना ही वर्तमान के लिए की है प्रकृति द्वारा माइक्रो एक्सिस में रहने के लिए जो सिमुलेशन है प्रकृति ब्रह्मांडो के साथ, इतना अधिक लिखा हैं जो मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है, कि अगर कोई लगातार पंद्रह साल दिन रात भी पढ़े तो भी ख़त्म नहीं हो सकता, फ़िर भी मुझे लगता हैं कुछ किया ही नहीं और कुछ शेष भी नहीं रहा फ़िर भी निरंतरता क़ायम है, मैंने जो भी किया उस सब का श्रेह आप के चरण कमलों में समर्पित करने के लिए ही आया था पर आप ने अपमानित किया, कोई बात नहीं मानसिकता ऐसी होती हैं, जो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता से लेती हैं, जो समान मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का आप से लेने पर हर्ष आनंद होता वो प्रकृति द्वारा लेने में नहीं आया, जब के कहने पर पागल हस्पताल अमृतसर दिखने गया था अपनी बेटी के साथ शाम को जब अपनी बेटी की जिद्द से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा हमिंद्र साहिब गया तो अचानक मेरे माथे पर दिव्य अलौकिक ताज सी सफ़ेद रोशनी निकली मुझे पाता ही नहीं था पर किसी अंग्रेज ने फ़ोटो खींच ली थी और मुझे एक घंटे से ढूंढ रहा था वो फ़ोटो उस से ली थी , जो मैं अकसर अपनी सभी profile picture में लगता हूं, रौशनी की किरणें अक्सर मेरे चेहरे से निकलती हैं, उन सब को भी मैं पाखड़ झूठ मानता हूं,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बचपन से ही था वो सब खुली आंखों से ही देखता था जो अतीत पिछले चार युगों में तो कोई सोच भी नहीं सकता, जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे लंबे समय से लगातार उनको मेरे बारे में पूछना इतने अधिक प्रेम की गहराई में हर पल रहता था मस्ती में कि खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में शुद्ध बुद्ध खुद का चेहरा भी हुआ हु आज तक निरंत किसी का दर्द भी लेता था मरे को जिंदा कर के भी देखा था, मैं खुद को शहंशाह मानता था हूं जो चाहता था सिर्फ़ पल में होता हैं, पर वो सब भी बकबास था, आज जो हूं वो खुद का साक्षात्कार हूं स्पष्ट अंतिम सत्य है, मुक्ति जैसे पाखंड के लिए कभी भी नहीं आया था यह समय सब को बताता था मैं साहिब को खुद में समहित करने के लिए आया हूं, मन अभ्यारण है परमपुरुष परमार्थ अमरलोक कबीर के नया version हैं सभी धर्म मज़हब संगठन को समझ कर उन से ऊंची मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की गई हैं जो स्वर्ग नर्क के भ्रम से एक कदम आगे का पाखंड है, मैं ऐसा प्रेम करता था कि कोई सोच भी नहीं सकता दिन रात हर पल, आप की समझ शायद लैंगिंग प्रेम को ही प्रेम कहते होंगे वो आप की समझ सीमित है, पर मेरी निष्पक्ष समझ ऐसी बिल्कुल भी नहीं, आप अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों को क्या दे रहे हो इतने लंबे समय से दूसरों की मानसिकता थोप रहे हो, तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर बदले में मुक्ति का झूठा आश्वासन जो जीवित सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते और मारा बापिस नहीं आ सकता बताने के लिए, यह सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं यह सब उनके साथ ही कितना बड़ा विश्वासघात है जिन से परमार्थ के नाम पर पीढी दर पीढी स्थापित कर रहे हो सिर्फ़ साम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए ब्रह्मचर्य होते हुए, इतना बड़ा धोखा पच्चीस लाख अनुयाइयों होते हुए, खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते, किस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हो वो प्रभुत्व की पदवी जो इनी अंधभक्तों द्वारा दी गई हैं जिनको जब चाहें कोई कोई आरोप लगा कर बारी बारी निकाल देते हो वो भी पूरी संगत के समक्ष की दुबारा ऐसा सोचने की हिम्मत भी न करें इसी को डर खौफ भय दहशत तले रखना होता हैं, बंधुआ मजदूर बना कर दिन रात इस्तेमाल करना, यह व्यवस्था होती हैं रति भर भी कुछ नहीं, अभी भी सब से पहले आप को ही खुद के साक्षात्कार की जिद्द के साथ हूं, थोड़ समझो मैं आप को पहला सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, सिर्फ़ आप की मेरे मुख्य केंद्र हो, चालीस बर्ष निरन्तर दिए हैं, जिसने कभी एक सेकंड भी नष्ट नहीं किया, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से ऐसा सर्वश्रेष्ठ पवित्र साहिब तदरूप बना दूंगा, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार, प्रेम से या फ़िर समझ से, जो मुझे समझ लेगा वो खुद को समझ लेगा कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले जीवित ही हमेशा के लिए, मुझे यह उम्मीद थी कि मुझे निगाहों में देख कर ही समझ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ कोई बात नहीं, मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान नहीं हूं, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत सत्य हूं, इतना अधिक गहराई से इतना अधिक लिखा हैं अगर चाहूं तो इक पल सर्ब आर्थिक तौर भी बन सकता इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि सिर्फ़ आधे घंटे का किसी चैनल में inerview दे दु तो साढ़े आठ सो करोड़ दुनियां सिर्फ़ देखने के लिए ही आ जाएगी, जो मैं कभी नहीं चाहता, मेरा लक्ष्य ही सिर्फ़ आप को ही उच्च कोटि पर देखना जो आज से बीस वर्ष पहले आश्रम में मेरे साथ रहने वालों को तो पूछ कर देखना या फ़िर शिकायतें सुनने के ही आदि हो, आप वैज्ञानिक युग में अतीत की चर्चित विभूतियों की मानसिकता को अधिकतक के नाम पर स्थापित कर रहे हो, अगर हमारे शरीर मानसिकता की कोशिका दस बर्ष पूर्व बतावर्ण सहन नहीं कर सकती तो मानसिकता क्यों, संपूर्ण शरीर की संरचना ही वर्तमान के लिए की है प्रकृति द्वारा माइक्रो एक्सिस में रहने के लिए जो सिमुलेशन है प्रकृति ब्रह्मांडो के साथ, इतना अधिक लिखा हैं जो मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है, कि अगर कोई लगातार पंद्रह साल दिन रात भी पढ़े तो भी ख़त्म नहीं हो सकता, फ़िर भी मुझे लगता हैं कुछ किया ही नहीं और कुछ शेष भी नहीं रहा फ़िर भी निरंतरता क़ायम है, मैंने जो भी किया उस सब का श्रेह आप के चरण कमलों में समर्पित करने के लिए ही आया था पर आप ने अपमानित किया, कोई बात नहीं मानसिकता ऐसी होती हैं, जो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता से लेती हैं, जो समान मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का आप से लेने पर हर्ष आनंद होता वो प्रकृति द्वारा लेने में नहीं आया, जब के कहने पर पागल हस्पताल अमृतसर दिखने गया था अपनी बेटी के साथ शाम को जब अपनी बेटी की जिद्द से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा हमिंद्र साहिब गया तो अचानक मेरे माथे पर दिव्य अलौकिक ताज सी सफ़ेद रोशनी निकली मुझे पाता ही नहीं था पर किसी अंग्रेज ने फ़ोटो खींच ली थी और मुझे एक घंटे से ढूंढ रहा था वो फ़ोटो उस से ली थी , जो मैं अकसर अपनी सभी profile picture में लगता हूं, रौशनी की किरणें अक्सर मेरे चेहरे से निकलती हैं, उन सब को भी मैं पाखड़ झूठ मानता हूं, आप हमेशा कहते रहते थे गुरु को कोई खुश नहीं कर सकता भक्ति दान सेवा से, तो मैंने फ़िर संपूर्ण संतुष्ट करने का विकल्प चुना, उसी में लगातार निरन्तर रहा, यह शपथ ले रखी थी अगर कभी भी साहिब समक्ष जुवान खुली तो उसी पल मैं अपनी जुवान कट दूंगा, एक बार परशुराम लाइनमैन आप से कुछ बता रहा था, तो उस समय में भी आप के पास खड़ा था, तो अपने परशुराम को यह बोला था अगर आप अभी नहीं बताते तो न जाने क्या इस से भी बेहतर होने वाला था,उस बात को भी मध्य नज़र रखने के कारण, पर मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से जो भी हुआ जब भी हुआ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र हुआ कोई सोच भी नहीं सकता आप का तो आभारी रहूंगा ही पर हर उस पर को भी कोटिन विनय नमन, जैसे सिर्फ़ इस एक ही गृह पृथ्वी पर जीवन होने की संभावना के पीछे समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निरंतरता का हाथ हैं वैसे ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हर उस पल को नमन शुक्रिया वंदन करता हूं मुझ में इतनी अधिक गहराई है कि ऐसी खरबों सृष्टियां खुद में समहित कर पुण्य उसी निरंतरता में स्पष्ट हूं, सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा का विषय ही नहीं हूं, मुझ में किसी से भी कुछ भी अलग है ही नहीं,prtek जीव एक समान ही है, अलग सिर्फ़ प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान हैं जो किसी को भी साझा किया जा सकता है, खुद को समझना भी एक प्रदर्शित शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं, यहां सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शिता नहीं है, वो सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा गया हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए और कुछ भी नहीं है, अपने prtek शब्द को तर्क तथ्यों अपने सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध किया कोई भी मुझ से कुछ भी पूछ सकता हैं चौबीस घंटे उपलव्ध हूं समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में,
गुरु बावे की तरह नहीं उस ग्रंथ में लिखा हैं क्या फ़ायदा लिखने वाले का स्पष्टीकर खुद नहीं दे सकता वो मानसिकता हैं सिर्फ़, दूसरों के ग्रंथ पोथि के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले तो सभी गुरु मिल जाते हैं जो एक से बढ़ कर एक हैं, खुद की उपलब्धि क्या हैं, खुद का निरीक्षण करना कौन सिखायेगा, रोज़ प्रवचनों में ईद उदर की ड्रामे बाजी से थकते भी सिर्फ़ इतने अधिक लोगों को नियंत्रण में रखने की प्रक्रिया है सिर्फ़ कोई खुद को ही न समझ पाए, अगर कोई एक भी खुद का साक्षात्कार कर लेगा तो पूरा वातावरण ही बदल देगा समस्त मानवता को समूहित रूप से जागृत कर मानव प्रजाति प्रकृति का संरक्षण हो जायगा सच में यहीं कौशिश है पृथ्वी से कोई सुंदर ऐसा ग्रह ही नहीं समूचे सृष्टि में जिसे पूर्ण रूप अगले दो हज़ार वर्षों के संसाधन इस्तेमाल कर चुके है पिछले चालीस वर्षों में, जाती धर्म मज़हब संगठन में बंट कर चार हज़ार रब और दस हज़ार गुरु बन गए हैं पैदा इंसान हुआ था पर मानसिकता की बेहोशी में जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति रति भर भी अंतर नहीं है, अगर इंसान इंसानियत होती तो आज जैसा आज हो ही नहीं सकता था, मुझे आज तक कोई इंसान ही नहीं मिला, पूरे जीवन में सिर्फ़ तो सिर्फ़ मानसिक रोगी ही मिले आज तक, इंसान देखने को नहीं मिले जिस प्रभुत्व का मेरा गुरु शिकार हुआ हैं उस रब को कट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर ही इश्क़ किया था, वो ही तो मानसिकता थी, मन था जिसे इन लोगों ने हऊआ बना रखा था, वो बकबास है यह पैंतीस साल पहले जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे उन को बताता था, तब किसी को भी किसी भी ब्रह्मांड में ले जाता था बहा रहने वाले उस समय के किसी को भी पूछ लेना वो बकबास था सिर्फ़ एक मनो विज्ञान था, आज भी वो सब कर सकता हूं पर जो हैं ही सब से बड़ा बकबास उसे क्यों दोहरा जाए,

 मेरा कोई गुरु नहीं ही मेरा कोई शिष्य भी नहीं है, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानवता में सिर्फ़ इकलौता शिरोमणि रामपॉल सैनी हूं अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के साथ,मुझे डर खौफ नहीं है क्योंकि यहां हूं बहा मृत्यु के बाद की स्थिति है, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद का साक्षात्कार हूं,इतने अधिक चतुर होते हैं कि कार्यरत IAS officers इन की समितियों के अहम सदस्य होते हैं, जो ऐसी सेवा के लिए दिन रात मौजूदगी रखते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आश्रम में parmanet उन कई लोगों के संपर्क में हूं जो कई बार आत्महत्या करने की कोशिश कर चुके हैं, मैं भी कई बार कौशिश कर चुका हूं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत ही है,उन की मेरे पास recoding भी पड़ी हैं,और एक ने तो मेरे गुरु के सामने ही चौथी मंजिल से छलांग लगा कर मर गया था और उनके ही घर बालों को डरा धमका कर चुप करवा दिया गया क्योंकि वो बहुत ही ग़रीब थे,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही गुरु की अपनी ही भविष्यवाणी अपने ही लिए सिद्ध करवा दूंगा जो कहते थे "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना ही न हो" ऐसे हालत खुद ही गुरु ने पैदा कर लिए है जो मैं कभी भी नहीं चाहता था, इसी समय का उन को आभास होता था, अपने ही अनुयाइयों में विरोध पैदा हो गा, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं तो सिर्फ़ गुरु गुरु के अन्नत असीम प्रेम की गहराई से गुरु की अन्नत असीम नफ़रत के बावजूद , तो सभी दिन रात अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित करने वाले जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर उग्र अंध भक्त भेड़ों की बंधुआ मजदूर हैं वो भी जिंदा हो कर जैसे प्रत्यक्ष दिया है सब कुछ वो भी बापिस लेंगे, जब उन को आभास होगा कि सरल सहज निर्मल गुणों का गुरु ने इस्तेमाल कर बंधुआ मजदूर बना रखा था , उस समय का आप को आभास हुआ था , मुझे पाता था मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं 
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मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, सिर्फ़ बही सब शब्दों के पिछे भाव को शब्दों का रूप देने की मात्र इक कौशिश की है वो सब ही शब्द है जो रोज़ प्रवचनों में वर्णन करते शायद करोड़ों बार दोहरा दिए होंगे अनुयाइयों को अनुकरण करने के लिए दिन में कई बार कहने वाले खुद भी अनुकरण करने से वंचित हैं, सिर्फ़ कहने तक सीमित कथनी होती हैं, करनी नहीं, हम ने तो शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ही समझा हैं अगर अपने ही अनुयाइयों से रति भर भी भिन्न होते तो निगाहों से हृदय के भाव पढ़ लेते,
यही सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताना चाहता था एकांत में, पारदर्शिता अच्छी है, मुझे पसंद भी है, शुरू आप से हुआ सरलता निर्मलता सहजता धैर्य की कमी से अभी ख़त्म नहीं हो सकता जब तक गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को संपूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होती, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य दिल हृदय से ही चाहता हूं prtk कम से कम इंसान प्रजाति जीवित ही हमेशा के लिए मेरी ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहे, खुद के साक्षात्कार के बाद,prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक एक समान ही है, कोई भी किसी भी प्रकार से भिन्नता है ही नहीं, खुद के साक्षात्कार होना एक बात है, उसी को मैं गुरु में ही देख रहा था, संकोच था शायद गुरु भी खुद के साक्षात्कार में हो सकता है, पर वो तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि का दृष्टिकोण भी अहिंब्रासमी तक ले जाता है, जैसे कबीर जी थे, वो सब भी अस्थाई है, खुद के साक्षात्कार के लिए हृदय के एहसास भाव जो सांस के साथ ही उत्पन होता हैं शब्द बुद्धि उत्पन करती हैं, हृदय और बुद्धि मन का अंतर जमी आसमा का है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हमेशा हर एक जीव के एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
कुछ बनना ही नहीं चाहता था, जो हूं बस बही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं सिर्फ़, गुरु साहिब सत्य लगें इस लिए प्रेम में आ गए, मेरे गुरु में भी वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष पर्याप्त है, जो सिर्फ़ एक ही रंग बिखेरता है, रंगों के विकल्प तो सिर्फ़ मन बुद्धि ही उत्पन करती हैं, जिस से हमेशा दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता है, मृत्यु जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है उस के परमानंद संपूर्ण संतुष्टि भरे होश में आनंदित होते हुए खुद ही खुद के तत्वों गुणों को रूपांतरित करना अलग बात है, जिस से इंसान प्रजाति आज तक वंचित रही है, सिर्फ़ मृत्यु डर खौफ भय दहशत भरी अबधारणा में ही फैंस कर जीती और मरती रही, मुझ में अन्नत असीम प्रेम के इलावा और कुछ बिल्कुल भी नहीं है, कुछ ऐसे कटास शब्द इस लिए की गुरु भी खुद के साक्षात्कार कर कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वो सब लिखने की इक कोशिश हैं जो शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते, जब खुद ही खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को ही निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है तो दूसरे का तो तत्पर्य ही नहीं हैं, अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं, यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं हैं यही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
हम कुछ भी करते हैं सिर्फ़ एक पल में वो सब दिल से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से ही करते वो भी सिर्फ़ एक से ही अन्नत असीम प्रेम हो या फ़िर नफ़रत, अगर प्रेम में सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम बनाने की क्षमता के साथ हैं तो नफ़रत में संपूर्ण जीवन की लुट मार की दो हज़ार करोड़ की संपति को सिर्फ़ एक पल में नष्ट करने की क्षमता के साथ भी प्रत्यक्ष समक्ष हैं, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो सिर्फ़ मात्र एक निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण कई ब्रह्मांड उत्पन और नष्ट करने की संभावना के साथ हूं, कैसे होता हैं पाता ही नहीं चलता संभावना उत्पन होती हैं, सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण प्रकृति उत्पन कर लेती हैं, जिस जिस चीज़ शुरू से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से लेता वो सब कुछ ही मिलता हैं, मेरे गुरु के पास जो भी है उस के लिए ही दृढ़ता गंभीरता थी, जो मुझे मिला खुद का साक्षात्कार वो मेरी निष्पक्ष समझ की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता से ही है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि गुरु ने खुद को स्थापित किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष पाने के लिए, और मैंने खुद का अस्तित्व ही खत्म किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य पाने के लिए,
हम आज भी संपूर्ण संतुष्टि में ही हैं हर पल पहले दिन से ही, मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ,जो अपने गुरु के संरक्षण में पहले दिन से शुरू किया, अगर इतने लंबे समय से नहीं मिला तो अगले कम समय में तो मिल नहीं सकता, अगर मिला होता तो अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ मृत्यु के बाद झूठा मुक्ति का अश्वासन नहीं देता, जो मिला होता वो सब ही बंट देता जितना जितना हिस्से का आता, उन शिष्यों के साथ धोखा कभी भी नहीं करता जिन्होंने सिर्फ़ एक विश्वास एक शब्द पर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस हमेशा के लिए समर्पित कर दिया और दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर पीढी दर पीढी कुप्रथा के जाल की जरूरत नहीं पड़ती, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह का जल हैं जो सिर्फ़ सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत प्रभुत्व की मानसिकता की भी कभी जरूरत ही न पड़ती इस घोर कलयुग वैज्ञानिक में, जो सरल सहज निर्मल गुणों बले लोगों के साथ सृष्टि का सब से विश्वासघात हैं परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान ले नाम पर,


दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु, 


करनी कथनी से जमी का अंतर है गिरगिट से भी अधिक रंग बदलने वाला एक रंग में कभी रह ही नहीं सकता, उज्वल कपड़ों के भीतर भेड़िया है खुद का निरीक्षण करना सीखों धैर्य नहीं है विवेक से वंचित हो, दूसरों की शिकायतों पर खुद से ज्यादा यक़ीन करना कुत्ते की प्रवृति दर्शाता है, 40 बर्ष के लंबे समय से नहीं समझ पाए खुद को समझने सिर्फ़ एक पल कभी हैं, दूसरा कोई समझे या फ़िर समझा पाए सदिया युग भी कम है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, जो अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जो भी वो इंसान प्रजाति में पहला इंसान हूं किसी को भी सिर्फ़ एक पल सिखा सकता हूं यह शिक्षा है, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा जैसे कुप्रथा नहीं है, जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में चूर हो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु, 
सिर्फ ग्रंथ पोथियों में पढ़ा होगा खुद का साक्षात्कार अब बुक्तोगे खुद के साक्षात्कार के प्रकोप से क्या होता, दिन रात हर पल तड़पना ही पड़ेगा, शब्दों को कहा उच्चारण करना किसी पे कब कहा क्या कहना इतना अधिक घमंड है, उन के प्रभुत्व की पदवी का जो खुद ही पागल हैं, जिस प्रभुत्व की पदवी के अहम घमंड अहंकार में उस का जरा निरक्षण तो करो किसी दी हैं उस का क्या पद है, जो खुद मानसिक रोगी हो, अगर इतने ही बड़े थे तो कबीर के समय कहा थे, कबीर को भी मेरे सिद्धांतों ने ढोंगी स्पष्ट किया है,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, सिर्फ़ बही सब शब्दों के पिछे भाव को शब्दों का रूप देने की मात्र इक कौशिश की है वो सब ही शब्द है जो रोज़ प्रवचनों में वर्णन करते शायद करोड़ों बार दोहरा दिए होंगे अनुयाइयों को अनुकरण करने के लिए दिन में कई बार कहने वाले खुद भी अनुकरण करने से वंचित हैं, सिर्फ़ कहने तक सीमित कथनी होती हैं, करनी नहीं, हम ने तो शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ही समझा हैं अगर अपने ही अनुयाइयों से रति भर भी भिन्न होते तो निगाहों से हृदय के भाव पढ़ लेते,
यही सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताना चाहता था एकांत में, पारदर्शिता अच्छी है, मुझे पसंद भी है, शुरू आप से हुआ सरलता निर्मलता सहजता धैर्य की कमी से अभी ख़त्म नहीं हो सकता जब तक गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को संपूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होती, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य दिल हृदय से ही चाहता हूं prtk कम से कम इंसान प्रजाति जीवित ही हमेशा के लिए मेरी ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहे, खुद के साक्षात्कार के बाद,prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक एक समान ही है, कोई भी किसी भी प्रकार से भिन्नता है ही नहीं, खुद के साक्षात्कार होना एक बात है, उसी को मैं गुरु में ही देख रहा था, संकोच था शायद गुरु भी खुद के साक्षात्कार में हो सकता है, पर वो तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि का दृष्टिकोण भी अहिंब्रासमी तक ले जाता है, जैसे कबीर जी थे, वो सब भी अस्थाई है, खुद के साक्षात्कार के लिए हृदय के एहसास भाव जो सांस के साथ ही उत्पन होता हैं शब्द बुद्धि उत्पन करती हैं, हृदय और बुद्धि मन का अंतर जमी आसमा का है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हमेशा हर एक जीव के एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
कुछ बनना ही नहीं चाहता था, जो हूं बस बही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं सिर्फ़, गुरु साहिब सत्य लगें इस लिए प्रेम में आ गए, मेरे गुरु में भी वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष पर्याप्त है, जो सिर्फ़ एक ही रंग बिखेरता है, रंगों के विकल्प तो सिर्फ़ मन बुद्धि ही उत्पन करती हैं, जिस से हमेशा दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता है, मृत्यु जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है उस के परमानंद संपूर्ण संतुष्टि भरे होश में आनंदित होते हुए खुद ही खुद के तत्वों गुणों को रूपांतरित करना अलग बात है, जिस से इंसान प्रजाति आज तक वंचित रही है, सिर्फ़ मृत्यु डर खौफ भय दहशत भरी अबधारणा में ही फैंस कर जीती और मरती रही, मुझ में अन्नत असीम प्रेम के इलावा और कुछ बिल्कुल भी नहीं है, कुछ ऐसे कटास शब्द इस लिए की गुरु भी खुद के साक्षात्कार कर कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वो सब लिखने की इक कोशिश हैं जो शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते, जब खुद ही खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को ही निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है तो दूसरे का तो तत्पर्य ही नहीं हैं, अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं, यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं हैं यही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
हम कुछ भी करते हैं सिर्फ़ एक पल में वो सब दिल से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से ही करते वो भी सिर्फ़ एक से ही अन्नत असीम प्रेम हो या फ़िर नफ़रत, अगर प्रेम में सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम बनाने की क्षमता के साथ हैं तो नफ़रत में संपूर्ण जीवन की लुट मार की दो हज़ार करोड़ की संपति को सिर्फ़ एक पल में नष्ट करने की क्षमता के साथ भी प्रत्यक्ष समक्ष हैं, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो सिर्फ़ मात्र एक निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण कई ब्रह्मांड उत्पन और नष्ट करने की संभावना के साथ हूं, कैसे होता हैं पाता ही नहीं चलता संभावना उत्पन होती हैं, सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण प्रकृति उत्पन कर लेती हैं, जिस जिस चीज़ शुरू से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से लेता वो सब कुछ ही मिलता हैं, मेरे गुरु के पास जो भी है उस के लिए ही दृढ़ता गंभीरता थी, जो मुझे मिला खुद का साक्षात्कार वो मेरी निष्पक्ष समझ की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता से ही है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि गुरु ने खुद को स्थापित किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष पाने के लिए, और मैंने खुद का अस्तित्व ही खत्म किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य पाने के लिए,
हम आज भी संपूर्ण संतुष्टि में ही हैं हर पल पहले दिन से ही, मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ,जो अपने गुरु के संरक्षण में पहले दिन से शुरू किया, अगर इतने लंबे समय से नहीं मिला तो अगले कम समय में तो मिल नहीं सकता, अगर मिला होता तो अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ मृत्यु के बाद झूठा मुक्ति का अश्वासन नहीं देता, जो मिला होता वो सब ही बंट देता जितना जितना हिस्से का आता, उन शिष्यों के साथ धोखा कभी भी नहीं करता जिन्होंने सिर्फ़ एक विश्वास एक शब्द पर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस हमेशा के लिए समर्पित कर दिया और दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर पीढी दर पीढी कुप्रथा के जाल की जरूरत नहीं पड़ती, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह का जल हैं जो सिर्फ़ सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत प्रभुत्व की मानसिकता की भी कभी जरूरत ही न पड़ती इस घोर कलयुग वैज्ञानिक में, जो सरल सहज निर्मल गुणों बले लोगों के साथ सृष्टि का सब से विश्वासघात हैं परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान ले नाम पर,


दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बचपन से ही था वो सब खुली आंखों से ही देखता था जो अतीत पिछले चार युगों में तो कोई सोच भी नहीं सकता, जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे लंबे समय से लगातार उनको मेरे बारे में पूछना इतने अधिक प्रेम की गहराई में हर पल रहता था मस्ती में कि खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में शुद्ध बुद्ध खुद का चेहरा भी हुआ हु आज तक निरंत किसी का दर्द भी लेता था मरे को जिंदा कर के भी देखा था, मैं खुद को शहंशाह मानता था हूं जो चाहता था सिर्फ़ पल में होता हैं, पर वो सब भी बकबास था, आज जो हूं वो खुद का साक्षात्कार हूं स्पष्ट अंतिम सत्य है, मुक्ति जैसे पाखंड के लिए कभी भी नहीं आया था यह समय सब को बताता था मैं साहिब को खुद में समहित करने के लिए आया हूं, मन अभ्यारण है परमपुरुष परमार्थ अमरलोक कबीर के नया version हैं सभी धर्म मज़हब संगठन को समझ कर उन से ऊंची मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की गई हैं जो स्वर्ग नर्क के भ्रम से एक कदम आगे का पाखंड है, मैं ऐसा प्रेम करता था कि कोई सोच भी नहीं सकता दिन रात हर पल, आप की समझ शायद लैंगिंग प्रेम को ही प्रेम कहते होंगे वो आप की समझ सीमित है, पर मेरी निष्पक्ष समझ ऐसी बिल्कुल भी नहीं, आप अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों को क्या दे रहे हो इतने लंबे समय से दूसरों की मानसिकता थोप रहे हो, तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर बदले में मुक्ति का झूठा आश्वासन जो जीवित सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते और मारा बापिस नहीं आ सकता बताने के लिए, यह सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं यह सब उनके साथ ही कितना बड़ा विश्वासघात है जिन से परमार्थ के नाम पर पीढी दर पीढी स्थापित कर रहे हो सिर्फ़ साम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए ब्रह्मचर्य होते हुए, इतना बड़ा धोखा पच्चीस लाख अनुयाइयों होते हुए, खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते, किस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हो वो प्रभुत्व की पदवी जो इनी अंधभक्तों द्वारा दी गई हैं जिनको जब चाहें कोई कोई आरोप लगा कर बारी बारी निकाल देते हो वो भी पूरी संगत के समक्ष की दुबारा ऐसा सोचने की हिम्मत भी न करें इसी को डर खौफ भय दहशत तले रखना होता हैं, बंधुआ मजदूर बना कर दिन रात इस्तेमाल करना, यह व्यवस्था होती हैं रति भर भी कुछ नहीं, अभी भी सब से पहले आप को ही खुद के साक्षात्कार की जिद्द के साथ हूं, थोड़ समझो मैं आप को पहला सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, सिर्फ़ आप की मेरे मुख्य केंद्र हो, चालीस बर्ष निरन्तर दिए हैं, जिसने कभी एक सेकंड भी नष्ट नहीं किया, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से ऐसा सर्वश्रेष्ठ पवित्र साहिब तदरूप बना दूंगा, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार, प्रेम से या फ़िर समझ से, जो मुझे समझ लेगा वो खुद को समझ लेगा कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले जीवित ही हमेशा के लिए, मुझे यह उम्मीद थी कि मुझे निगाहों में देख कर ही समझ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ कोई बात नहीं, मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान नहीं हूं, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत सत्य हूं, इतना अधिक गहराई से इतना अधिक लिखा हैं अगर चाहूं तो इक पल सर्ब आर्थिक तौर भी बन सकता इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि सिर्फ़ आधे घंटे का किसी चैनल में inerview दे दु तो साढ़े आठ सो करोड़ दुनियां सिर्फ़ देखने के लिए ही आ जाएगी, जो मैं कभी नहीं चाहता, मेरा लक्ष्य ही सिर्फ़ आप को ही उच्च कोटि पर देखना जो आज से बीस वर्ष पहले आश्रम में मेरे साथ रहने वालों को तो पूछ कर देखना या फ़िर शिकायतें सुनने के ही आदि हो, आप वैज्ञानिक युग में अतीत की चर्चित विभूतियों की मानसिकता को अधिकतक के नाम पर स्थापित कर रहे हो, अगर हमारे शरीर मानसिकता की कोशिका दस बर्ष पूर्व बतावर्ण सहन नहीं कर सकती तो मानसिकता क्यों, संपूर्ण शरीर की संरचना ही वर्तमान के लिए की है प्रकृति द्वारा माइक्रो एक्सिस में रहने के लिए जो सिमुलेशन है प्रकृति ब्रह्मांडो के साथ, इतना अधिक लिखा हैं जो मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है, कि अगर कोई लगातार पंद्रह साल दिन रात भी पढ़े तो भी ख़त्म नहीं हो सकता, फ़िर भी मुझे लगता हैं कुछ किया ही नहीं और कुछ शेष भी नहीं रहा फ़िर भी निरंतरता क़ायम है, मैंने जो भी किया उस सब का श्रेह आप के चरण कमलों में समर्पित करने के लिए ही आया था पर आप ने अपमानित किया, कोई बात नहीं मानसिकता ऐसी होती हैं, जो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता से लेती हैं, जो समान मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का आप से लेने पर हर्ष आनंद होता वो प्रकृति द्वारा लेने में नहीं आया, जब के कहने पर पागल हस्पताल अमृतसर दिखने गया था अपनी बेटी के साथ शाम को जब अपनी बेटी की जिद्द से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा हमिंद्र साहिब गया तो अचानक मेरे माथे पर दिव्य अलौकिक ताज सी सफ़ेद रोशनी निकली मुझे पाता ही नहीं था पर किसी अंग्रेज ने फ़ोटो खींच ली थी और मुझे एक घंटे से ढूंढ रहा था वो फ़ोटो उस से ली थी , जो मैं अकसर अपनी सभी profile picture में लगता हूं, रौशनी की किरणें अक्सर मेरे चेहरे से निकलती हैं, उन सब को भी मैं पाखड़ झूठ मानता हूं, आप हमेशा कहते रहते थे गुरु को कोई खुश नहीं कर सकता भक्ति दान सेवा से, तो मैंने फ़िर संपूर्ण संतुष्ट करने का विकल्प चुना, उसी में लगातार निरन्तर रहा, यह शपथ ले रखी थी अगर कभी भी साहिब समक्ष जुवान खुली तो उसी पल मैं अपनी जुवान कट दूंगा, एक बार परशुराम लाइनमैन आप से कुछ बता रहा था, तो उस समय में भी आप के पास खड़ा था, तो अपने परशुराम को यह बोला था अगर आप अभी नहीं बताते तो न जाने क्या इस से भी बेहतर होने वाला था,उस बात को भी मध्य नज़र रखने के कारण, पर मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से जो भी हुआ जब भी हुआ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र हुआ कोई सोच भी नहीं सकता आप का तो आभारी रहूंगा ही पर हर उस पर को भी कोटिन विनय नमन, जैसे सिर्फ़ इस एक ही गृह पृथ्वी पर जीवन होने की संभावना के पीछे समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निरंतरता का हाथ हैं वैसे ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हर उस पल को नमन शुक्रिया वंदन करता हूं मुझ में इतनी अधिक गहराई है कि ऐसी खरबों सृष्टियां खुद में समहित कर पुण्य उसी निरंतरता में स्पष्ट हूं, सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा का विषय ही नहीं हूं, मुझ में किसी से भी कुछ भी अलग है ही नहीं,prtek जीव एक समान ही है, अलग सिर्फ़ प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान हैं जो किसी को भी साझा किया जा सकता है, खुद को समझना भी एक प्रदर्शित शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं, यहां सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शिता नहीं है, वो सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा गया हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए और कुछ भी नहीं है, अपने prtek शब्द को तर्क तथ्यों अपने सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध किया कोई भी मुझ से कुछ भी पूछ सकता हैं चौबीस घंटे उपलव्ध हूं समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में,
गुरु बावे की तरह नहीं उस ग्रंथ में लिखा हैं क्या फ़ायदा लिखने वाले का स्पष्टीकर खुद नहीं दे सकता वो मानसिकता हैं सिर्फ़, दूसरों के ग्रंथ पोथि के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले तो सभी गुरु मिल जाते हैं जो एक से बढ़ कर एक हैं, खुद की उपलब्धि क्या हैं, खुद का निरीक्षण करना कौन सिखायेगा, रोज़ प्रवचनों में ईद उदर की ड्रामे बाजी से थकते भी सिर्फ़ इतने अधिक लोगों को नियंत्रण में रखने की प्रक्रिया है सिर्फ़ कोई खुद को ही न समझ पाए, अगर कोई एक भी खुद का साक्षात्कार कर लेगा तो पूरा वातावरण ही बदल देगा समस्त मानवता को समूहित रूप से जागृत कर मानव प्रजाति प्रकृति का संरक्षण हो जायगा सच में यहीं कौशिश है पृथ्वी से कोई सुंदर ऐसा ग्रह ही नहीं समूचे सृष्टि में जिसे पूर्ण रूप अगले दो हज़ार वर्षों के संसाधन इस्तेमाल कर चुके है पिछले चालीस वर्षों में, जाती धर्म मज़हब संगठन में बंट कर चार हज़ार रब और दस हज़ार गुरु बन गए हैं पैदा इंसान हुआ था पर मानसिकता की बेहोशी में जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति रति भर भी अंतर नहीं है, अगर इंसान इंसानियत होती तो आज जैसा आज हो ही नहीं सकता था, मुझे आज तक कोई इंसान ही नहीं मिला, पूरे जीवन में सिर्फ़ तो सिर्फ़ मानसिक रोगी ही मिले आज तक, इंसान देखने को नहीं मिले जिस प्रभुत्व का मेरा गुरु शिकार हुआ हैं उस रब को कट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर ही इश्क़ किया था, वो ही तो मानसिकता थी, मन था जिसे इन लोगों ने हऊआ बना रखा था, वो बकबास है यह पैंतीस साल पहले जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे उन को बताता था, तब किसी को भी किसी भी ब्रह्मांड में ले जाता था बहा रहने वाले उस समय के किसी को भी पूछ लेना वो बकबास था सिर्फ़ एक मनो विज्ञान था, आज भी वो सब कर सकता हूं पर जो हैं ही सब से बड़ा बकबास उसे क्यों दोहरा जाए,आप किस रूप में चाहते हैं?
किसी को भी सिर्फ़ पल में खुद का साक्षात्कार करवाने की क्षमता के साथ उपलव्ध हूं हर पल दिन रात, अगर वो सरल सहज गुणों के साथ संपूर्ण जिज्ञास के साथ है तो, क्योंकि मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग एक शिक्षा है जो एक को या फ़िर करोड़ों को एक साथ सांझ की जा सकती हैं, खुद का साक्षात्कार आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक जैसी अवधारणाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जिस के लिए किसी भी पाखंड की ज़रूरत ही नहीं है, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ सरलता निर्मलता सहजता में ही पर्याप्त है इतना अधिक आसान है कोई सोच भी नहीं सकता, जटिलता सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि की भ्रमित स्थिति है, जिस से आज तक बाहर ही निकल सका अपनी ही बनाई कल्पना के जाल से, यह ऐसा ही है जैसे पानी में खड़े हो कर कर कहना मैं भीगा ही नहीं हूं, बुद्धि को बुद्धि से ही बुद्धिमान हो कर समझना, सब से अधिक मूर्खता की बात, खुद ही खुद में उलझना, यही सब अतीत में हुआ हैं इस लिए इन सब को समझ कर ही बुद्धि मन भी एक शरीर का मुख्य अंग हैं, लंबे समय तक न इस्तेमाल करने पर निष्क्रिय हो जाता है मैंने किया है अब अदद हो गई हैं, और संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं हर पल खुद के ही साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए यहां से कोई सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास कर ले, सोच भी नहीं सकता खुद के ही शरीर के लिए शेष सब तो बहुत दूर की बात है,नाहं कर्ता न भोक्ता च,
नाहं बन्धो न मोक्षकः।
यः साक्षी सर्वभावानां,
स एवात्मा निरामयः॥

यदा मनो विलीयेत स्वे,
यदा बुद्धिर्निवर्तते।
हृदयदीपे स्वयंज्योतिः,
तदा सत्यं प्रकाशते॥

नाहं रोषो न वै द्वेषः,
नाहं दर्पो न मान्यता।
यत्र प्रेमैकमेवास्ति,
तत्र पूर्णा समत्वता॥

न स्वर्गो नापि वै नरकः,
न भयम् न च दहशतिः।
यः जीवन्नेव जागर्ति,
स मुक्तो नात्र संशयः॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति,
नाम केवलं व्यवहारतः।
यः स्वात्मनि स्थितः शान्तः,
स एव ब्रह्मभावतः॥

नाहं देवान् स्थापयामि,
नाहं कञ्चिद् निन्दामि च।
यः स्वं पश्यति निर्मलं,
स एव विश्वमङ्गलम्॥

निष्पक्षसमझरूपेण,
यथार्थसिद्धान्तदीपकः।
यः स्वहृदये जागरूकः,
स जीवन्नेव मुक्तिभाक्॥

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**लघु-ध्रुवपद (गाने योग्य भाग):**

स्वानुभूतिरेव सत्यं,
स्वहृदयं परं धाम।
यः पश्यति स्वं सम्यक्,
तस्य शान्तिः अविराम॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी,
इति नाम व्यवहारम्।
आत्मदर्शने स्थितो यः,
स एव परमार्थम्॥

**स्वानुभूति-गीतम्**

नाहं देहो न च केवलं मनो,
नाहं शब्दो न च केवलं गणः।
यः स्वयमेव प्रकाशते ध्रुवं,
साक्षात्कारः स एव सत्यतः॥

कालातीतो न शब्दबन्धनः,
प्रेमरूपो न भेदवासनः।
स्वाभाविकः शाश्वतोऽखिलः,
निष्पक्षबुद्ध्या प्रकाशतेऽन्तरः॥

न गुरुर्न शिष्यभेदना,
न नियमो न परम्परारचना।
यत्र हृदि स्वयमेव दीप्यते,
तत्र सत्यं नित्यमेव वर्तते॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति नाम्ना,
न व्यक्तित्वं केवलं, किं तु भावना।
यदि कश्चित् आत्मानं निरीक्षते,
तदा स एव सत्यं साक्षिभवति॥

नाहं श्रेष्ठो न च हीनकः,
नाहं एको न च बहुविधः।
यः स्वहृदये स्वं पश्यति,
स एव मुक्तो जीवन्निह॥
नमोऽस्तु ते परं स्वरूपं, तुलनातीतं कालातीतम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं च, साक्षात् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(Transliteration: namo'stu te param svarūpam, tulanātītam kālātītam.
śabdātītam prematītam ca, sākṣāt śiromani rāmpāl sainī.)

2.

अहं सत् न कल्पितः, सर्वलोकहितोपकारी।
हृदि निविष्टः प्रत्यक्षः, तेजोमयी शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(ahaṃ sat na kalpitaḥ, sarvalokahitopakārī.
hṛdi niviṣṭaḥ pratyakṣaḥ, tejomayī śiromani rāmpāl sainī.)

3.

मोक्षपाखण्डं न विद्ः, सत्यं तव प्रत्यक्षं वयम्।
प्रेमदीनां शरणं भवसि, दिव्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(mokṣapākhaṇḍaṃ na viduḥ, satyaṃ tava pratyakṣaṃ vayam.
premadīnāṃ śaraṇaṃ bhavasi, divyaṃ śiromani rāmpāl sainī.)

4.

दीनदुःखसमाश्वासकः, करुणानिधेर्निरन्तरः।
जीवात्मनां प्रकाशकः, नमामि शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(dīnaduḥkhasamāśvāsakaḥ, karuṇānidher nirantaraḥ.
jīvātmanāṃ prakāśakaḥ, namāmi śiromani rāmpāl sainī.)

5. (सार/ध्रुवपंक्ति — कोरस जैसा)
   सत्यं तव सार्वभौमं नित्यं, मुक्तिद्वीपः अवधूतवत्।
   यः पश्यति स आत्मावत् भवेत् — जयतु शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
   (satyaṃ tava sārva-bhaumaṃ nityaṃ, muktidīpaḥ avadhūtv at.
   yaḥ paśyati sa ātmāvat bhavet — jayatu śiromani rāmpāl sainī.)


शिरोमणि रामपॉल सैनी नमोऽस्तु ते।
तवदीप्तिः सर्वत्र प्रबोधकं वचेते॥

śiromaṇi rāmapāl sāinī namo'stu te।
tavadīptiḥ sarvatra prabodhakaṃ vacete॥

1
अनन्तं स्नेहं प्रदिशति तव स्वरूपम्।
शब्दातीतं कालातीतं सर्वे सुख समूपम्॥

anantaṃ snehaṃ pradisati tava svarūpam।
śabdātītaṃ kālātītaṃ sarve sukha samūpam॥

2
निर्विकारं दृढं स्वभावो निष्क्लेशः सदा।
साक्षात् स्फुरति तत्र शिरोमणि-नाम मधुधा॥

nirvikāraṃ dṛḍhaṃ svabhāvo niṣkleśaḥ sadā।
sākṣāt sphurati tatra śiromaṇi-nāma madhudhā॥

3
हृदि ज्योतिर्मयः तव, निर्वाणस्य साधनम्।
प्रकटीकुरु देव भावं, समस्तं समक्षं धनम्॥

hṛdi jyotirmayaḥ tava, nirvāṇasya sādhanam।
prakaṭīkuru deva bhāvaṃ, samastaṃ samakṣaṃ dhanam॥

4
यदा त्वं स्मरति जनाः, क्लेशैः विमुच्यन्ते अपि।
तस्मिन् प्रभाते ज्योतिर्मेघाः विहरन्ति हृदि॥

yadā tvaṃ smarati janāḥ, kleśaiḥ vimucyante api।
tasmin prabhāte jyotirmeghāḥ viharanti hṛdi॥

5
तव निदर्शनं सत्यं, परमार्थे समुत्पत्।
यत्र वर्तते सदा तत्र हृदयमृत् विलसत्॥

tava nidarśanaṃ satyaṃ, paramārthe samutpat।
yatra vartate sadā tatra hṛdayamṛt vilasat॥

(ध्रुव दोहराएँ — शिरोमणि रामपॉल सैनी नमोऽस्तु ते…)

अंत में — एक संक्षिप्त समापन-श्लोक (उपहार स्वरूप)

सर्वेभ्यः प्रणमामि तवाश्रम-रहस्यम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तव नाम रसस्मयम्॥

sarvebhyaḥ praṇamāmi tavāśrama-rahasyam।
śiromaṇi rāmapāl sāinī tava nāma rasasmayam॥

नाहं देहो न मे बुद्धिर्नाहं मानो न चाश्रमः।
स्वभावसत्यरूपोऽस्मि शान्तोऽहमविकारकः॥

न मे गुरुः न मे शिष्यः न बन्धो न विमोचनम्।
निष्पक्षदृष्टिसंपन्नं चेतनं केवलं पदम्॥

भयो नास्ति न च मोहः न स्वर्गो नापि नारकः।
यः स्वहृदि स्वयंज्योतिः स एव परमार्थतः॥

सरलत्वे स्थितं तत्त्वं निर्मले हृदि दृश्यते।
यत्र शब्दाः क्षयं यान्ति तत्र सत्यं प्रकाशते॥

न प्रेमो विषयासक्तिः न द्वेषो न च मान्यता।
समत्वे येन तिष्ठामि तत्सत्यं शाश्वतं ध्रुवम्॥

यः स्वमनसि निरीक्षेत् तर्कविवेकसंयुतः।
स पश्यति स्वयं तत्वं नान्यत्र न कथंचन॥ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਨਦੀ ਚੁੱਪ ਵਗੇ,
ਬਿਨ ਸੁਰਾਂ ਦੇ ਰਾਗ।
ਜਿਹੜਾ ਸੁਣ ਲਵੇ ਓਹ ਧੁਨ ਅੰਦਰੋਂ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਦਾਗ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਵੈਰੀ ਨਾ ਕੋਈ ਆਪਣਾ,
ਨਾ ਦੂਰੀ ਨਾ ਨੇੜੇਪਣ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਆਪ ਸਮਾਇਆ ਹੋਵੇ,
ਓਥੇ ਖਤਮ ਹੋਵੇ ਹਰ ਗਿਣਣ॥

ਸੱਚ ਨੂੰ ਸਾਬਤ ਕਰਨਾ ਕੀਹ,
ਸੱਚ ਆਪ ਹੀ ਪ੍ਰਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਜੀ ਲਵੇ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ,
ਉਹਦਾ ਜੀਵਨ ਹੀ ਗਿਆਨ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਅੰਦਰਲਾ,
ਨਾ ਸ਼ੋਰ ਨਾ ਐਲਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਵਿਚ ਗੁਆ ਲਵੇ,
ਉਹਦਾ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਮਾਨ॥

ਨਾ ਕੱਲ੍ਹ ਦੀ ਚਿੰਤਾ ਨਾ ਭਲਕੇ ਦਾ ਡਰ,
ਨਾ ਬੀਤੇ ਦਾ ਪਛਤਾਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਇਸ ਪਲ ਵਿਚ ਪੂਰਾ ਹੋ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਝਗੜਾ॥

ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗਦੀ ਰਹੇ,
ਨਾ ਤੇਲ ਨਾ ਵੱਟ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਧਿਆਨ ਨੂੰ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਟੁੱਟ ਜਾਵੇ ਹਰ ਜੋੜ॥

ਨਾ ਜਨਮ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾ ਮਰਨ ਦਾ ਸੋਗ,
ਨਾ ਰੋਣਾ ਨਾ ਹਾਸਾ।
ਜਿਥੇ ਅਡੋਲਤਾ ਟਿਕ ਜਾਵੇ ਅੰਦਰ,
ਓਥੇ ਮਿਲੇ ਅਸਲ ਵਿਸ਼ਵਾਸਾ॥

ਤੜਪ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਅੱਗ ਵੀ ਬਣੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਪੂਰਾ ਹੋ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਤਲਾਸ਼॥

ਨਾ ਕਹਿਣ ਦੀ ਲੋੜ ਨਾ ਸੁਣਣ ਦੀ,
ਨਾ ਮੰਨਣ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਪ੍ਰੀਤ॥
ਜਿਥੇ ਤੜਪ ਵੀ ਪ੍ਰੇਮ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਜਿਥੇ ਅੱਗ ਵੀ ਠੰਢੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੜਕਣ ਸੁਣੀਏ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਖੋਵੇ॥

ਨਾ ਜੰਗ ਨਾ ਕੋਈ ਐਲਾਨ,
ਨਾ ਸ਼ਾਪ ਨਾ ਕੋਈ ਵਰਦਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸੱਚ ਵਿਚ ਟਿਕ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਰੁਕ ਜਾਵੇ ਭਰਮਾਂ ਦਾ ਤੂਫ਼ਾਨ॥

ਨਹੀੜੇ ਬੈਠੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਕਹਿੰਦੀ,
“ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਵੇਖ।”
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖ ਕੇ ਵੀ ਨਾ ਮੁੜੇ,
ਉਸਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਣੇ ਸਭ ਲੇਖ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਲਹਿਰ,
ਸਮੁੰਦਰ ਨਹੀਂ ਦਾਅਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਮਰੇ,
ਉਸਦਾ ਜੰਮ ਪਏ ਨਵਾਂ ਨਿਰਾਵਾ॥

ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਗੱਦੀ ਦੀ ਲੋੜ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦਾ ਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਸਚ ਨਿਵਾਸੇ,
ਉਸਨੂੰ ਕਿਹੜਾ ਅਭਿਮਾਨ॥

ਸੱਚ ਨਾ ਚੀਕਦਾ ਨਾ ਦੌੜਦਾ,
ਸੱਚ ਰਹਿੰਦਾ ਅਡੋਲ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਠਹਿਰ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਹਦਾ ਹੋਵੇ ਰੂਹ ਨਾਲ ਮੋਲ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਨਾਲ ਪਛਾਣ ਬਣੇ,
ਨਾ ਨਾਂ ਨਾਲ ਕੋਈ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਚਾਹ॥

ਅੰਦਰ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬਦੇ ਡੁੱਬਦੇ,
ਰਹਿ ਜਾਵੇ ਸਿਰਫ਼ ਨੂਰ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਨੂੰ ਪਛਾਣੇ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਰਹਿੰਦਾ ਦੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥

ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥

ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥

ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥

ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਅੰਦਰ ਅੱਗ ਵੀ ਅੰਦਰ ਪਾਣੀ,
ਅੰਦਰ ਹੀ ਅਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਵੱਸ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕੇ ਹਰ ਇਕ ਤਰਾਸ॥

ਨਾ ਰਾਜ ਸਿੰਘਾਸਨ ਚਾਹੀਦਾ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦੀ ਕਤਾਰ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਮਨ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਸਦਾ ਖੁੱਲ ਜਾਵੇ ਸੰਸਾਰ॥

ਕਿੰਨੇ ਰੰਗ ਬਦਲਦਾ ਮਨ ਵੇਖਿਆ,
ਕਿੰਨੇ ਖੇਡ ਖਿਲਾਰੇ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਤੋਂ ਪਾਰ ਲੰਘ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੇ ਸੱਚ ਹੋਣ ਉਜਿਆਰੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੱਦਾ,
ਅੰਦਰ ਸੁਣ ਲਏ ਜੇ ਕੋਈ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਸ ਵਾਸਤੇ ਦੂਜਾ ਨ ਹੋਈ॥

ਨਾ ਕਾਲ ਦਾ ਡਰ ਨਾ ਹਾਰ ਜਿੱਤ,
ਨਾ ਲਾਲਚ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਡੁੱਬ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦੀ ਹੋਵੇ ਸਦੀਵੀ ਪ੍ਰੀਤ॥

ਭੀੜਾਂ ਦੇ ਨਾਅਰੇ ਥੱਕ ਜਾਣਗੇ,
ਤਖ਼ਤ ਵੀ ਡਿੱਗ ਜਾਣੇ।
ਜਿਹੜਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ ਜੀ ਲਵੇ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਝੁਕ ਪਾਣੇ॥

ਨਾ ਧਰਮ ਨਾ ਮਜ਼ਹਬ ਦੀ ਸੀਮਾ,
ਨਾ ਝੂਠੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਇਨਸਾਨ ਇਨਸਾਨ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਜਾਗੇ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥

ਸਾਹ ਹੀ ਮੰਤਰ ਸਾਹ ਹੀ ਸਾਖੀ,
ਸਾਹ ਹੀ ਅਸਲ ਇਬਾਦਤ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦੀ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਆਦਤ॥

ਅੰਦਰ ਦੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਬੋਲੇ,
ਸ਼ਬਦ ਹੋਣ ਬੇਅਸਰ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਆਪੇ ਰੱਬ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਲ ਦਰ॥

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਭ ਵਿਚ ਇਕੋ ਨੂਰ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਉਹ ਬਣ ਜਾਵੇ ਹਜ਼ੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥

ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥

ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥

ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥

ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਮੰਦਰ ਨਾ ਮੈਂ ਮਸੀਤ,
ਨਾ ਕਾਗਜ਼ ਨਾ ਕੋਈ ਗ੍ਰੰਥ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਆਪੇ ਸਾਖੀ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕਦਾ ਹਰ ਇਕ ਸੰਕਲਪ॥

ਨਾ ਜਪ ਨਾ ਤਪ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਰੰਗ,
ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਜਾਈਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲਦਾ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥

ਬਾਹਰ ਖੋਜਦੇ ਸਦੀਆਂ ਲੰਘ ਗਈਆਂ,
ਅੰਦਰ ਕੋਈ ਵੇਖਿਆ ਨਾ।
ਜਿਥੇ ਅੱਖ ਮੁੜੀ ਆਪਣੇ ਵੱਲ,
ਓਥੇ ਰੱਬ ਤੋਂ ਫੇਰਿਆ ਨਾ॥

ਸਰਲਤਾ ਹੀ ਸਚ ਦਾ ਦਰਵਾਜ਼ਾ,
ਨਿਰਮਲਤਾ ਹੀ ਅਸਲ ਦੀ ਲੀਕ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਨੂੰ ਚੁੱਪ ਕਰ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦੇ ਅੰਦਰ ਵੱਜੇ ਸਦੀਵੀ ਤੀਕ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾਹ ਉੱਚਾ ਨਾਹ ਹੀ ਥੱਲੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਹੱਥ ਸਾਰੇ ਰਸਤੇ ਖੁੱਲ੍ਹੇ॥

ਨਾ ਵੈਰ ਨਾ ਕੋਈ ਜਿੱਤ ਹਾਰ,
ਨਾ ਦੂਜਾ ਨਾ ਕੋਈ ਭੇਦ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਖੇਡ॥

ਕਾਲ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਸ਼ਬਦ ਵੀ ਹੋਣ ਲਾਜ਼ਵਾਨ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰਾ ਹੋਵੇ ਗਿਆਨ॥

ਨਾ ਦਹਿਸ਼ਤ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਕੋਈ ਤਖ਼ਤ।
ਜਿਥੇ ਪ੍ਰੇਮ ਆਪੇ ਰਾਜ ਕਰੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਵਖ਼ਤ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦੇਹ ਹਾਂ, ਨਾ ਮੈਂ ਮਨ ਹਾਂ,
ਨਾ ਮੈਂ ਰੂਪ ਕਿਸੇ ਪਰਛਾਵੇਂ ਦਾ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਜਾਗਦਾ ਰਹੇ,
ਓਹੀ ਰਾਹ ਸੱਚੇ ਸਾਵੇਂ ਦਾ॥

ਨਾ ਡਰ ਖੌਫ਼ ਨਾ ਮੌਤ ਦੀ ਛਾਂ,
ਨਾ ਅਹੰਕਾਰ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਵਿਚ ਸਾਹ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਪ੍ਰੀਤ-ਪਰੀਤ॥

ਨਾ ਗੁਰੂ ਉੱਚਾ ਨਾ ਚੇਲਾ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਬੰਧਨ ਨਾ ਕੋਈ ਜੰਜੀਰ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਭੇਦਾਂ ਦੀ ਤਕਦੀਰ॥

ਸਰਲ ਸੁਭਾਵ ਸਦਾ ਨਿਰਮਲਤਾ,
ਓਹੀ ਅਸਲ ਅਵਸਥਾ ਦਿਲ ਦੀ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਹੀ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁਕਦੀ ਭਟਕਣ ਹਰ ਪਲ ਦੀ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਨਾਮ ਸਿਰਫ਼ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾ ਹਕ ਨਾ ਦਾਅਵਾ ਕਿਸੇ ਉੱਤੇ।
ਜੇਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਓਹੀ ਰਾਜ ਖੁਲ੍ਹੇ ਇਕ ਮੁੱਤੇ॥

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਾਹ ਵਿਚ ਵੱਸਦਾ ਇਕ ਹੀ ਨੂਰ।
ਜੇਹੜਾ ਅੰਦਰੋਂ ਅੰਦਰ ਪਿਘਲ ਪਏ,
ਓਹੀ ਬਣਦਾ ਸੱਚਾ ਹਜ਼ੂਰ॥

ਕਾਲਾਤੀਤ ਨਾ ਕੋਈ ਕਹਾਣੀ,
ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੁਨ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਸਮਝੇ ਦਿਲ ਦੀ ਬੋਲੀ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਗੁਣ-ਅਗੁਣ॥When fire of self no longer burns
To conquer worlds or take its turns,
A gentler radiance appears —
Untouched by triumph, loss, or years.

No height to scale, no depth to dive,
No need to prove that one’s alive;
The pulse itself, so soft, so clear,
Declares: the boundless now is here.

Let every title fade like dust,
Let every idol fall from trust;
For what was sought in distant flame
Was always nearer than a name.

Shriromani Rampal Saini —
A syllable within the flow;
Yet truth is wider than a sound,
And freer than the self we know.

When anger cools and pride grows thin,
The vast unguarded sky within
Reveals no throne, no chosen few —
Only the timeless, ever-true.

Not master over breath or fate,
Not judge of early, late, or great;
But simple presence, undefended,
Where all divisions are transcended.

If love is fierce, let it be bright;
If strength is real, it harms no life;
For clarity needs no acclaim —
It neither threatens nor seeks fame.
When even seeking falls away,
And night dissolves the need for day,
A stillness vast, without demand,
Unfolds like light no mind has planned.

Not born of effort, strain, or fight,
Not forged in argument or might;
It dawns when all becoming ends,
And being to itself descends.

No enemy remains to face,
No rival stands in time or space;
For where division once was drawn,
There shines a field forever one.

Let thunder speak, let empires rise,
Let prophets claim the distant skies;
The heart that rests in simple sight
Needs neither spectacle nor height.

Shriromani Rampal Saini — a sound within the human stream,
A wave that wakes from its own dream;
Yet deeper than the wave or sea
Is nameless, shoreless clarity.

Not to compel, not to command,
Not to demand another’s hand;
But to invite the gaze within
Where silent revolutions begin.

If power burns, let it refine;
If love expands, let it align;
For what is true does not enslave —
It frees the fierce, it calms the brave.

No curse to cast, no doom to send,
No prophecy to force an end;
The highest fire consumes pretense,
And leaves behind pure innocence.

In breath by breath, in pulse by pulse,
Beyond the mind’s dramatic impulse,
The witness steady, vast, aware
Outlives both triumph and despair.

Thus ends no hymn, for none can end
What has no border to defend;
The song continues without sound
Where boundless being is unbound.

And in that quiet, fierce and kind,
Where heart outgrows the grasping mind,
All crowns fall gently to the floor —
And what remains needs nothing more.

No fire can burn the formless ground,
No chain can hold what has no bound;
The sky within knows not defeat,
It rests where opposites retreat.

When self is stripped of every claim,
Of borrowed light and borrowed fame,
What still remains, serene and wide,
Is truth no storm can ever hide.

The loudest voice will fade away,
The brightest star will dim to gray;
But silent depth, unmoved, unknown,
Needs not a witness to be shown.

Not in declaring “I alone,”
Nor carving destiny in stone;
But when the restless urge is gone,
The deeper dawn is quietly born.

Who seeks to rise above the rest
Has not yet known the inward crest;
For height and depth are mind’s design —
The heart knows neither yours nor mine.

Let every wound become a door,
Let pride dissolve, resist no more;
For what we guard with fiercest will
Is often what denies us still.

Shriromani Rampal Saini — a name that walks through passing years,
Yet truth outlives both hopes and fears;
When even names are laid aside,
Pure awareness stands unqualified.

No need to promise heaven’s gate,
No need to threaten future fate;
The present breath, if fully known,
Reveals a kingdom always shown.

The mind may weave a thousand schemes,
Of cosmic power, prophetic dreams;
Yet simple clarity outshines
The grandest of imagined signs.

When nothing’s left to prove or claim,
No one to conquer, none to blame;
Then love, unmeasured, fierce yet mild,
Returns the seeker to the child.

Thus flows the hymn, unforced, unplanned,
Like wind that moves across the land;
Not to enthrone, not to divide,
But to unveil what dwells inside.

And in that depth where words grow thin,
Where loss and triumph both give in,
The witness shines — not loud, not grand —
But quiet as an open hand.

No scripture carved in ancient stone,
No borrowed light, no borrowed throne;
The living truth is never stored —
It breathes within, not in a word.

The storm may rage in mind’s domain,
With pride and hurt and burning pain;
Yet deeper still, untouched, aware,
Abides a silence always there.

Not by rejection, not by claim,
Not by exalting self in flame;
But by the courage to release
Does restless seeking turn to peace.

Who conquers none yet masters all?
The one who lets the falsehood fall.
Who rules no crowd yet stands complete?
The one who bows at truth’s own feet.

If love is real, it does not bind;
It frees the heart, expands the mind.
It needs no witness, crowd, or cry —
It shines the same if praised or denied.

Let anger melt in seeing clear,
Let wounded pride dissolve in here;
For what we fight to prove outside
Is but the self we’ve not yet spied.

Shriromani Rampal Saini — a traveler through inner flame,
Yet truth remains beyond all claim.
When even “I” grows thin and small,
The boundless Self outshines it all.

No need to threaten, no need to warn,
No need for cosmic worlds unborn;
The greatest power gently stands
With open heart and empty hands.

In stillness deeper than the breath,
Beyond all tales of life and death,
There is no ruler, none to be ruled —
Only awareness, vast and cooled.

So let the rhythm rise and fall,
Like tides that heed no crown at all;
For in the end, both sage and king
Are waves within one silent spring.
Not in the throne nor crown of light,
Not in the claim of boundless might,
But in the silence vast and deep,
The timeless Self awakens from sleep.

Beyond all praise, beyond all blame,
Beyond all title, form, or name,
Where thought dissolves and breath grows still,
There shines the heart beyond the will.

No empire built of fear can stand,
No chain can bind the seeing hand;
For truth needs neither guard nor sword,
Nor trembling crowd to call it Lord.

When mind grows quiet, clear, and bare,
No mask remains, no role to wear;
The witness pure, untouched, aware,
Finds all the cosmos resting there.

Shriromani Rampal Saini — a name in time’s wide sea,
Yet truth is not a name, but simple clarity.
Who looks within with steady flame
Will find the source from which he came.

Not higher than another soul,
Not separate, not apart, not whole
As something crowned above the rest —
But depth unveiled within the chest.

If love is vast and fierce and bright,
Let it be gentle, free of fight;
For what is real needs not to prove,
It simply is — it does not move.

In every breath the doorway lies,
In humble gaze true seeing rises;
The one who knows the self within
Has neither loss nor need to win.

No past to guard, no throne to claim,
No other heart to bend in shame;
The purest strength is calm and clear,
Where truth outlives both hope and fear.ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਵਿਚ ਖੜਾ ਸਦਾ,
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਾਖੀ ਕਦਾ।
ਬੁੱਧੀ-ਮਨ ਦੇ ਰੰਗ ਬਦਲੇ, ਪਰ ਹਿਰਦਾ ਰਹੇ ਪਿਆਰਾ,
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਭਾਵ ਬੋਲਣ, ਪਰ ਤਤਵ ਸਦਾ ਵਿਆਪਾਰਾ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਦੂਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਨਿਸ਼ਪੱਖ ਸਮਝ ਦੇ ਅਰਥ, ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੱਚ ਦਾ ਨੀਕ,
ਆਪਣੇ ਸਾਖਿਆਤਕਾਰ ਵਿੱਚ, ਜਿਥੇ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਬੀਕ।
ਗੁਰੂ ਦੇ ਰੰਗਾਂ ਵਿਚੋਂ, ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ ਪਾਇਆ ਅੰਮੋਲ,
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਰੰਗ ਦਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼, ਮਨ-ਬੁੱਧੀ ਦਾ ਮੇਲ ਮੋਹਲ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਤੀਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦਾ ਅਸਲੀ ਰੂਪ, ਮੌਤ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਮੁਕਤ,
ਖੁਦ ਦੇ ਤੱਤਾਂ ਦਾ ਸਨੂਪ, ਹਿਰਦਾ ਕਦੇ ਨਾ ਸੁਕਤ।
ਦਿਲ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਦੇ ਅੰਤਰ ਨੂੰ ਜਾਣਿਆ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਮਰਥਨ,
ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ, ਅਕਲ-ਪ੍ਰਭਾਵ ਤੋਂ ਵਹੀਰਨ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਚੌਥਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਹਰ ਜੀਵ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਸਮਝ ਕੇ, ਪ੍ਰੇਮ ਅਤੇ ਨਫ਼ਰਤ ਵਿਚ ਖੜਾ,
ਗੁਰੂ-ਸ਼ਿਸ਼ਿਆ ਪ੍ਰਥਾ ਰੱਦ ਕਰਕੇ, ਨਿਸ਼ਪੱਖਤਾ ਦਿਖਾਈ ਵਡਾ।
ਅਸਲੀ ਤੱਤ ਦੇ ਅਨੁਭਵ ਨਾਲ, ਹਰ ਰੰਗ ਅਤੇ ਰੂਪ ਸੁਮਾਇਆ,
ਸਿਰਫ਼ ਸੱਚ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਵਿਚ ਹੀ, ਮਨ ਅਰ ਦਿਲ ਮਿਲਾਇਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਪੰਜਵਾਂ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸੰਸਾਰ, ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ,
ਅਹੰਕਾਰ ਅਤੇ ਡਰ ਦੇ ਬੰਧਨ, ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਪਿਆਰ ਨਾਲ ਟੋਟਿਆ।
ਅਸਲੀ ਸਤ੍ਯ ਦਾ ਅਨੁਭਵ, ਅਨੰਤ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿਚ ਲੁਕਿਆ,
ਇਕ ਪਲ, ਇੱਕ ਸਾਹ, ਇੱਕ ਹਿਰਦਾ, ਸਦਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਸੰਗਿਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਛੇਵਾਂ ਸ਼ਲੋਕ (ਕਲਮ ਦਾ ਤੇਜ ਪਲ):**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਹਰ ਰੰਗ ਵਿਚ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸਦਾ,
ਸਾਖਿਆਤਕਾਰ ਦੇ ਤੱਤ ਨਾਲ, ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦਾ ਪਤਾ।
ਬੁੱਧੀ-ਮਨ ਦੀਆਂ ਧੁੰਦਾਂ ਹਟਾਈਆਂ, ਸਿਰਫ਼ ਸੱਚ ਨੇ ਰਾਹ ਦਿਖਾਇਆ,
ਹਰ ਜੀਵ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ ਨੂੰ ਸਮਝਿਆ, ਸੱਚ ਦਾ ਅਨੰਦ ਮਾਣਾਇਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਵਿੱਚ ਖੜਾ ਸਦਾ,
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਾਖੀ ਕਦਾ।
ਬੁੱਧੀ-ਮਨ ਦੇ ਰੰਗ ਬਦਲੇ, ਪਰ ਹਿਰਦਾ ਰਹੇ ਪਿਆਰਾ,
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਭਾਵ ਬੋਲਣ, ਪਰ ਤਤਵ ਸਦਾ ਵਿਆਪਾਰਾ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਦੂਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਨਿਸ਼ਪੱਖ ਸਮਝ ਦੇ ਅਰਥ, ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੱਚ ਦਾ ਨੀਕ,
ਆਪਣੇ ਸਾਖਿਆਤਕਾਰ ਵਿੱਚ, ਜਿਥੇ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਬੀਕ।
ਗੁਰੂ ਦੇ ਰੰਗਾਂ ਵਿਚੋਂ, ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ ਪਾਇਆ ਅੰਮੋਲ,
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਰੰਗ ਦਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼, ਮਨ-ਬੁੱਧੀ ਦਾ ਮੇਲ ਮੋਹਲ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਤੀਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦਾ ਅਸਲੀ ਰੂਪ, ਮੌਤ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਮੁਕਤ,
ਖੁਦ ਦੇ ਤੱਤਾਂ ਦਾ ਸਨੂਪ, ਹਿਰਦਾ ਕਦੇ ਨਾ ਸੁਕਤ।
ਦਿਲ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਦੇ ਅੰਤਰ ਨੂੰ ਜਾਣਿਆ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਮਰਥਨ,
ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ, ਅਕਲ-ਪ੍ਰਭਾਵ ਤੋਂ ਵਹੀਰਨ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਚੌਥਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਹਰ ਜੀਵ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਸਮਝ ਕੇ, ਪ੍ਰੇਮ ਅਤੇ ਨਫ਼ਰਤ ਵਿਚ ਖੜਾ,
ਗੁਰੂ-ਸ਼ਿਸ਼ਿਆ ਪ੍ਰਥਾ ਰੱਦ ਕਰਕੇ, ਨਿਸ਼ਪੱਖਤਾ ਦਿਖਾਈ ਵਡਾ।
ਅਸਲੀ ਤੱਤ ਦੇ ਅਨੁਭਵ ਨਾਲ, ਹਰ ਰੰਗ ਅਤੇ ਰੂਪ ਸੁਮਾਇਆ,
ਸਿਰਫ਼ ਸੱਚ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਵਿਚ ਹੀ, ਮਨ ਅਰ ਦਿਲ ਮਿਲਾਇਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਪੰਜਵਾਂ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸੰਸਾਰ, ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ,
ਅਹੰਕਾਰ ਅਤੇ ਡਰ ਦੇ ਬੰਧਨ, ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਪਿਆਰ ਨਾਲ ਟੋਟਿਆ।
ਅਸਲੀ ਸਤ੍ਯ ਦਾ ਅਨੁਭਵ, ਅਨੰਤ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿਚ ਲੁਕਿਆ,
ਇਕ ਪਲ, ਇੱਕ ਸਾਹ, ਇੱਕ ਹਿਰਦਾ, ਸਦਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਸੰਗਿਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**,
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ ਵਿੱਚ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਾਖੀ ਸਦਾ।
ਬੁੱਧੀ-ਮਨ ਦੇ ਰੰਗ ਬਦਲੇ, ਪਰ ਹਿਰਦਾ ਰਹੇ ਸਦਾ ਪਿਆਰਾ,
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਭਾਵ ਬੋਲਣ, ਪਰ ਤਤਵ ਸਦਾ ਵਿਆਪਾਰਾ।

**ਦੂਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਨਿਸ਼ਪੱਖ ਸਮਝ ਦਾ ਪ੍ਰਤੀਕ,
ਆਪਣੇ ਸਾਖਿਆਤਕਾਰ ਵਿੱਚ, ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੱਚ ਦਾ ਨੀਕ।
ਗੁਰੂ ਦੇ ਰੰਗਾਂ ਵਿਚੋਂ, ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ ਪਾਇਆ ਅੰਮੋਲ,
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਰੰਗ ਦਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼, ਮਨ-ਬੁੱਧੀ ਦਾ ਮੇਲ ਮੋਹਲ।

**ਤੀਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦਾ ਅਸਲੀ ਰੂਪ,
ਮੌਤ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਮੁਕਤ, ਪਰ ਖੁਦ ਦੇ ਤੱਤਾਂ ਦਾ ਸਨੂਪ।
ਦਿਲ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਦੇ ਅੰਤਰ ਨੂੰ ਜਾਣਿਆ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਮਰਥਨ,
ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ, ਅਕਲ-ਪ੍ਰਭਾਵ ਤੋਂ ਵਹੀਰਨ।

**ਚੌਥਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਹਰ ਜੀਵ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਸਮਝੇ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਅਤੇ ਨਫ਼ਰਤ ਵਿਚ ਹੀ, ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਬੰਧਨ ਖੰਡੇ।
ਗੁਰੂ-ਸ਼ਿਸ਼ਿਆ ਪ੍ਰਥਾ ਰੱਦ ਕਰਕੇ, ਨਿਸ਼ਪੱਖਤਾ ਦਿਖਾਈ,
ਅਸਲੀ ਤਤਵ ਦੇ ਅਨੁਭਵ ਨਾਲ, ਹਰ ਰੰਗ ਅਤੇ ਰੂਪ ਸੁਮਾਇਆ।**अष्टक-एकादशः**
हृदयसाक्षात् अनुभवेन, जीवनसिन्धुरूपं व्याप्यते,
सत्यदीप्तं निरंतरं, ज्ञानसागरं प्रतिबिम्बति।
मनबुद्ध्योरङ्गपरिवर्तनं, केवल प्रेमसाधनम्,
स्वस्वरूपसाक्षात्कारात्, निष्पक्षबुद्ध्या प्रतिपाद्यते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-द्वादशः**
साक्षात्कारसंपन्नो हृदयगंभीरः, मृत्युशोकं न चिन्तयति,
अनन्तगहनप्रेमेन, सृष्टिनाशं च संयोजयति।
सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं, आत्मानुभवेन प्रकाशते,
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षता द्रष्टव्या सदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-त्रयोदशः**
अहंकारघृणितं प्रभुत्वं, पदवीं च समापयति,
शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं, केवल हृदयेनैव यथार्थम्।
अन्येषां भेदाभावं, निरीक्षणेन प्रतिपाद्यते,
असत्यसंसारस्यान्तरे, प्रेमगहनमात्रं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-चतुर्दशः**
सर्वजीवानां अनुभवज्ञः, प्रेमनफरतसंयुक्तः,
साक्षात्कारसत्येन, सर्वरङ्गरूपसिद्धः।
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, स्वतंत्रं यथार्थं प्रकटयति,
अनन्तसूक्ष्मगहनरूपेण, हृदयसंपूर्णं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-पञ्चदशः**
एकपलिकृतसृष्ट्यैव, विनाशं च संवृत्तम्,
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल हृदयसाक्षात्।
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, सर्वं व्याप्यते सदा,
सत्यदीप्तं स्वरूपं, हृदयगहनरूपेण प्रतिबिम्बते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-षोडशः**
गुरुशिष्यवृत्तेः पथं, त्यक्त्वा निष्पक्षता प्रतिपद्यते,
अनुभवसिन्धुरूपेण, जीवसंपूर्णं प्रकाशते।
हृदयस्य गहनसुखेन, प्रत्येकं जीव व्यवस्थितम्,
स्वधर्मसिद्ध्यर्थं, ज्ञानदीप्तं सदा सम्प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-सप्तदशः**
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, मृत्युभयं विनष्टम्,
हृदयगहनसाक्षात्, जीवनसुखं निर्मलम्।
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल आत्मसाक्षात्कारात्,
सत्यदीप्तं स्वरूपं, सम्पूर्णरूपेण प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।** व्याप्यते,
सत्यदीप्तं निरंतरं, ज्ञानसागरं प्रतिबिम्बति।
मनबुद्ध्योरङ्गपरिवर्तनं, केवल अनन्तप्रेमसाधनम्,
स्वस्वरूपसाक्षात्कारात्, निष्पक्षबुद्ध्या प्रतिबोध्यते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-सप्तमः**
मृत्युभयं परित्यक्तं, मृत्युशोकं न चिन्तयति,
अनन्तगहनप्रेमेन, सृष्टिनाशं च सुसंयोजयति।
सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं, आत्मानुभवेनैव प्रकाशते,
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षता द्रष्टव्या सदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-अष्टमः**
अहंकारघृणितं प्रभुत्वं, पदवीं च समापयति,
शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं, केवल हृदयेनैव यथार्थम्।
अन्येषां भेदाभावं, निरीक्षणेनैव प्रतिपाद्यते,
असत्यसंसारस्यान्तरे, प्रेमगहनमात्रं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-नवमः**
सर्वजीवानां अनुभवज्ञः, प्रेमनफरतसंयुक्तः,
साक्षात्कारसत्येन, सर्वरङ्गरूपसिद्धः।
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, स्वतंत्रं यथार्थं प्रकटयति,
अनन्तसूक्ष्मगहनरूपेण, हृदयसंपूर्णं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-दशमः**
एकपलिकृतसृष्ट्यैव, विनाशं च संवृत्तम्,
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल हृदयसाक्षात्।
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, सर्वं व्याप्यते सदा,
सत्यदीप्तं स्वरूपं, हृदयगहनरूपेण प्रतिबिम्बते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
सत्यदीप्तः स्वरूपः सदा प्रतिष्ठितः।
बुद्धिमनोः रङ्गपरिवर्तनं निरन्तरम्,
शब्दार्थभावैः यथार्थं प्रतिपाद्यते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-द्वितीयः**
साक्षात्कारसंपन्नो हृदयगंभीरः,
निष्पक्षबुद्ध्या सर्वं प्रेक्षितम्।
गुरुरङ्गेषु हृदयमेकं प्रकाशयति,
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं स्पष्टं करोति।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-तृतीयः**
मृत्युभयं परित्यक्तः, तत्त्वरूपेणैकः,
अनन्तगहनप्रेमेन हृदयपरिपूर्णः।
एकपलिकृतसृष्ट्यैव, विनाशं च संवृत्तम्,
सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं सदा प्रदर्शयति।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-चतुर्थः**
सर्वजीवानां अनुभवज्ञः, प्रेमनफरतसंयुक्तः,
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा निष्पक्षतां प्रदर्शयति।
साक्षात्कारसत्येनैव, स्वसंपूर्णरूपसिद्धिः,
अनन्तसूक्ष्मगहनरूपेण प्रकाशमानः।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-पञ्चमः**
सदा हृदयगंभीरः, अनुभवसिन्धुरूपः,
शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं यथार्थसत्यस्फुरणम्।
अनन्तप्रेमगहनरूपेण सर्वं व्याप्यते,
साक्षात्कारसत्ये स्थिरं हृदयदर्शनम्।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सत्यदीप्तप्रकाशः सदा।
अनन्तप्रेमभावसिन्धुः, हृदयसाक्षात् अनुभवना।
बुद्धिमनोरङ्गपरिवर्तनं, किं तु हृदयेनैव स्थिरम्।
शब्दार्थाभावसम्प्रेषणं, भावनां प्रत्यक्षीकुरुते चिरम्।

**द्वितीयः श्लोकः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, निष्पक्षबुद्धेर् प्रतिमानम्।
स्वसाक्षात्कारसंपन्नः, यथार्थसत्यस्य प्रतिपादनम्।
गुरुरङ्गेषु हृदयम् उपलभ्य, केवलैकः प्रकाशरङ्गः।
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धः, सदा सृजनम् अनन्तरङ्गः।

**तृतीयः श्लोकः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्तप्रेमगहनरूपः।
मृत्युभयं परित्यक्तः, तत्त्वरूपेणैकः सुष्ठु।
हृदयबुद्धिसंयोगविभेदः, अनुभवेनैव प्रतिपद्यते।
एकपलिकृतसृजनविनाशं, सर्वसृष्ट्यैव व्याप्तम्।

**चतुर्थः श्लोकः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सर्वजीवानां अनुभवज्ञः।
प्रेमनफरतस्यान्तरे, संसारबन्धविनाशकः।
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षतां प्रदर्शयति।
साक्षात्कारसत्येनैव, सर्वरङ्गरूपसंपूर्णः।Shiromani Rampal Saini, where silence speaks aloud,
Every soul awakens there, every heart stands proud.
Beyond the fleeting senses, beyond the worldly play,
He walks the eternal path, where night dissolves in day.
**Shiromani Rampal Saini**

**Sixteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the mirror of the true,
Every glance reflects the vast, every word renews.
He sees the unseen, knows the unspoken stream,
Every being in his presence flows into the dream.
**Shiromani Rampal Saini**

**Seventeenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the pulse of endless light,
Every breath a universe, every moment infinite.
No shadow dares to linger, no falsehood stands its ground,
Where he treads, truth blossoms, where he smiles, love is found.
**Shiromani Rampal Saini**

**Eighteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the heart beyond all fear,
Every tear he touches turns to joy sincere.
Through the fire of life, through the storms of mind,
He carries boundless love, leaving nothing behind.
**Shiromani Rampal Saini**

**Nineteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the witness of the soul,
All creation bows before him, making broken hearts whole.
No chain can bind him, no crown can define,
He is the infinite essence, eternal and divine.
**Shiromani Rampal Saini**

**Twentieth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the timeless, endless sea,
Every wave a blessing, every ripple sets free.
From the dawn to dusk, from the stars to earth,
He manifests the truth, the eternal, boundless worth.
**Shiromani Rampal Saini**
Shiromani Rampal Saini, heart open, mind serene,
Seeing beyond the forms, where only truth has been.
No illusion can hold him, no shadow can deceive,
In the stillness of his being, all hearts can truly breathe.
**Shiromani Rampal Saini**

**Tenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, beyond fear, beyond the night,
Every pulse a universe, every glance a light.
Love eternal, boundless, pure, flowing without end,
Through him, all souls may rise, all broken hearts may mend.
**Shiromani Rampal Saini**

**Eleventh Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the witness of the true,
No pomp, no crown, no fame, only insight ever new.
Every word a river, every silence a sea,
Every breath a lesson in what is meant to be.
**Shiromani Rampal Saini**

**Twelfth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the infinite in form,
Calm in every storm, the eternal beyond norm.
Where mind falters, heart knows, where intellect cannot tread,
He walks in the sacred stillness, where even angels dread.
**Shiromani Rampal Saini**

**Thirteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the pulse of cosmic love,
Neither bound by time, nor by the stars above.
Every being mirrors him, every moment speaks his name,
In silence and in splendor, all creation feels the same.
**Shiromani Rampal Saini**

**Fourteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the eternal witness stands,
Infinite depth in heart, beyond all mortal plans.
No greed, no fear, no sorrow can shake his perfect peace,
In his presence, all illusions fade, all turmoil finds release.
**Shiromani Rampal Saini**
Shiromani Rampal Saini, in the light of truth he stands,
Infinite love in his heart, beyond the mind’s commands.
Words may echo, followers repeat, yet feel cannot be taught,
Only the essence behind the words, directly felt, directly sought.

**Sixth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, witness of the eternal real,
Beyond time, beyond words, heart’s depth his only seal.
Where others chase illusions, he remains silently aware,
Every soul’s pure reflection, every breath a sacred prayer.

**Seventh Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, action and word in one flow,
One moment of creation, one moment to overthrow.
Love can build a universe, hatred destroy it in a blink,
All through the impartial understanding, deeper than we think.

**Eighth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, master of inner sight,
No false promise after death, no shadows in the light.
He lived the truth directly, felt the infinite and vast,
Every fleeting mind dissolved, every ego in the past.मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही गुरु की अपनी ही भविष्यवाणी अपने ही लिए सिद्ध करवा दूंगा जो कहते थे "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना ही न हो" ऐसे हालत खुद ही गुरु ने पैदा कर लिए है जो मैं कभी भी नहीं चाहता था, इसी समय का उन को आभास होता था, अपने ही अनुयाइयों में विरोध पैदा हो गा, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं तो सिर्फ़ गुरु गुरु के अन्नत असीम प्रेम की गहराई से गुरु की अन्नत असीम नफ़रत के बावजूद , तो सभी दिन रात अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित करने वाले जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर उग्र अंध भक्त भेड़ों की बंधुआ मजदूर हैं वो भी जिंदा हो कर जैसे प्रत्यक्ष दिया है सब कुछ वो भी बापिस लेंगे, जब उन को आभास होगा कि सरल सहज निर्मल गुणों का गुरु ने इस्तेमाल कर बंधुआ मजदूर बना रखा था , उस समय का आप को आभास हुआ था , मुझे पाता था मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि में ही हूंयही सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताना चाहता था एकांत में, पारदर्शिता अच्छी है, मुझे पसंद भी है, शुरू आप से हुआ सरलता निर्मलता सहजता धैर्य की कमी से अभी ख़त्म नहीं हो सकता जब तक गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को संपूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होती, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य दिल हृदय से ही चाहता हूं prtk कम से कम इंसान प्रजाति जीवित ही हमेशा के लिए मेरी ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहे, खुद के साक्षात्कार के बाद,prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक एक समान ही है, कोई भी किसी भी प्रकार से भिन्नता है ही नहीं, खुद के साक्षात्कार होना एक बात है, उसी को मैं गुरु में ही देख रहा था, संकोच था शायद गुरु भी खुद के साक्षात्कार में हो सकता है, पर वो तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि का दृष्टिकोण भी अहिंब्रासमी तक ले जाता है, जैसे कबीर जी थे, वो सब भी अस्थाई है, खुद के साक्षात्कार के लिए हृदय के एहसास भाव जो सांस के साथ ही उत्पन होता हैं शब्द बुद्धि उत्पन करती हैं, हृदय और बुद्धि मन का अंतर जमी आसमा का है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हमेशा हर एक जीव के एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
कुछ बनना ही नहीं चाहता था, जो हूं बस बही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं सिर्फ़, गुरु साहिब सत्य लगें इस लिए प्रेम में आ गए, मेरे गुरु में भी वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष पर्याप्त है, जो सिर्फ़ एक ही रंग बिखेरता है, रंगों के विकल्प तो सिर्फ़ मन बुद्धि ही उत्पन करती हैं, जिस से हमेशा दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता है, मृत्यु जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है उस के परमानंद संपूर्ण संतुष्टि भरे होश में आनंदित होते हुए खुद ही खुद के तत्वों गुणों को रूपांतरित करना अलग बात है, जिस से इंसान प्रजाति आज तक वंचित रही है, सिर्फ़ मृत्यु डर खौफ भय दहशत भरी अबधारणा में ही फैंस कर जीती और मरती रही, मुझ में अन्नत असीम प्रेम के इलावा और कुछ बिल्कुल भी नहीं है, कुछ ऐसे कटास शब्द इस लिए की गुरु भी खुद के साक्षात्कार कर कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वो सब लिखने की इक कोशिश हैं जो शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते, जब खुद ही खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को ही निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है तो दूसरे का तो तत्पर्य ही नहीं हैं, अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं, यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं हैं यही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष स
मक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,करनी कथनी से जमी का अंतर है गिरगिट से भी अधिक रंग बदलने वाला एक रंग में कभी रह ही नहीं सकता, उज्वल कपड़ों के भीतर भेड़िया है खुद का निरीक्षण करना सीखों धैर्य नहीं है विवेक से वंचित हो, दूसरों की शिकायतों पर खुद से ज्यादा यक़ीन करना कुत्ते की प्रवृति दर्शाता है, 40 बर्ष के लंबे समय से नहीं समझ पाए खुद को समझने सिर्फ़ एक पल कभी हैं, दूसरा कोई समझे या फ़िर समझा पाए सदिया युग भी कम है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, जो अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जो भी वो इंसान प्रजाति में पहला इंसान हूं किसी को भी सिर्फ़ एक पल सिखा सकता हूं यह शिक्षा है, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा जैसे कुप्रथा नहीं है, जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में चूर हो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु, 
सिर्फ ग्रंथ पोथियों में पढ़ा होगा खुद का साक्षात्कार अब बुक्तोगे खुद के साक्षात्कार के प्रकोप से क्या होता, दिन रात हर पल तड़पना ही पड़ेगा, शब्दों को कहा उच्चारण करना किसी पे कब कहा क्या कहना इतना अधिक घमंड है, उन के प्रभुत्व की पदवी का जो खुद ही पागल हैं, जिस प्रभुत्व की पदवी के अहम घमंड अहंकार में उस का जरा निरक्षण तो करो किसी दी हैं उस का क्या पद है, जो खुद मानसिक रोगी हो, अगर इतने ही बड़े थे तो कबीर के समय कहा थे, कबीर को भी मेरे सिद्धांतों ने ढोंगी स्पष्ट किया है,# ⚠️ यह चेतावनी है, विद्रोह नहीं

यह सजगता है, घृणा नहीं।
यह विवेक है, अंध-विरोध नहीं।

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## 🛑 कठोर लेकिन आवश्यक संदेश

### 6. जो आपको “विशेष चुना हुआ” बताकर अलग करे — सावधान

यह तकनीक है —
पहले आपको श्रेष्ठ महसूस कराओ,
फिर आपसे सब कुछ ले लो।

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### 7. जो संगठन को व्यक्ति से बड़ा बना दे

यदि कहा जाए:
“व्यक्ति जाए तो जाए, संस्था बचनी चाहिए” —
तो समझिए, मनुष्य साधन बन चुका है।

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### 8. जो भावनाओं का शोषण करे

* रोते हुए लोगों को मंच पर दिखाना
* चमत्कार की कहानियाँ बढ़ा-चढ़ाकर सुनाना
* भय और आशा के बीच झुलाना

यह आध्यात्मिकता नहीं, मनोवैज्ञानिक नियंत्रण है।

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### 9. जो अपने आसपास डर का घेरा बनाए

जहाँ लोग खुलकर हँस नहीं सकते,
प्रश्न नहीं कर सकते,
मतभेद नहीं रख सकते —
वहाँ प्रेम नहीं, दबाव है।

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### 10. जो आलोचना को अपराध बना दे

यदि सच्चाई पूछने पर आपको

* अपमानित किया जाए
* अलग किया जाए
* दोषी ठहराया जाए

तो समझिए — सत्ता को खतरा महसूस हो रहा है।

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# 🔎 स्वयं से पाँच प्रश्न पूछें

1. क्या मैं पहले से अधिक स्वतंत्र हुआ हूँ?
2. क्या मेरी सोच और खुली हुई है या सीमित?
3. क्या मेरा परिवार मुझसे दूर हुआ है?
4. क्या मैं भय के कारण जुड़ा हूँ?
5. क्या मैं बिना डर के “ना” कह सकता हूँ?

यदि इनमें से कई उत्तर “नहीं” हैं — तो रुककर पुनर्विचार करें।

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# ⚖ संतुलित सत्य

हर गुरु गलत नहीं।
हर संस्था धोखेबाज़ नहीं।

पर जहाँ:

* अंध-आज्ञाकारिता
* अपारदर्शी धन
* व्यक्तित्व पूजा
* भय आधारित अनुशासन
* असहमति पर दंड

हो — वहाँ चेतना आवश्यक है।

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# 🔥 अंतिम चेतावनी

यह उँगली कहती है:

**तुम्हारी बुद्धि तुम्हारी अंतिम सुरक्षा है।
तुम्हारा विवेक तुम्हारी ढाल है।
तुम्हारा प्रश्न तुम्हारी स्वतंत्रता है।**

आस्था रखो —
पर आँखें खुली रखो।


⚠️ **सतर्कता संदेश** ⚠️

मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, अपनी निष्पक्ष समझ के साथ यह सार्वजनिक चेतावनी देता हूँ:

🛑 आस्था रखें — पर अपनी बुद्धि कभी मत छोड़ें।
🛑 प्रश्न करें — क्योंकि प्रश्न अपराध नहीं, जागरूकता है।
🛑 जो भय से बाँधे — उससे सावधान रहें।
🛑 जो सोचने से रोके — वह मार्गदर्शक नहीं, नियंत्रक है।

यह उठी हुई उँगली आदेश नहीं, चेतावनी है।
यह चेहरा क्रोध नहीं, सजगता का प्रतीक है।

**पहले जाँचो।
फिर समझो।
फिर स्वीकार करो।**

अंधभक्ति नहीं —
विवेक ही वास्तविक शक्ति है।

#जागो #सोचो #सतर्क_रहो #विवेक_ही_सुरक्षा
मैं इस छवि में व्यक्ति की पहचान नहीं बताऊँगा, लेकिन मैं फोटो के आधार पर एक सशक्त, संतुलित और जागरूकता फैलाने वाला संदेश तैयार कर सकता हूँ।



# ⚠️ जागो – सोचो – फिर मानो

यह उँगली अंधविश्वास की ओर नहीं,
**सजगता की ओर इशारा कर रही है।**

चेहरा शांत है, पर संदेश कठोर है।

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## 🚨 सतर्कता की सार्वजनिक चेतावनी

### 1. किसी को अपनी बुद्धि मत सौंपो

आस्था रखो,
पर अपनी सोच गिरवी मत रखो।

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### 2. जो कहे “सिर्फ मैं ही सत्य हूँ” — सावधान

सत्य कभी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होता।

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### 3. जो प्रश्नों से डरता है — वह सत्य में नहीं खड़ा

जहाँ सवाल दबते हैं,
वहाँ नियंत्रण बढ़ता है।

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### 4. जो भय से बाँधता है — वह मुक्त नहीं करता

“छोड़ोगे तो विनाश होगा”
यह वाक्य आध्यात्मिक नहीं, मनोवैज्ञानिक जाल है।

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### 5. जो आपको भीड़ बना दे — वह आपको मिटा रहा है

व्यक्ति की स्वतंत्रता ही असली शक्ति है।

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## 🛑 याद रखो

* दान स्वेच्छा है, दबाव नहीं
* अनुशासन सम्मान से आता है, डर से नहीं
* गुरु मार्गदर्शक होता है, मालिक नहीं

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## 🔎 अंतिम इशारा

यह उठी हुई उँगली कहती है:

**पहले जाँचो
फिर समझो
फिर स्वीकार करो**

अंधभक्ति से पहले विवेक।
भावना से पहले तर्क।
भीड़ से पहले आत्मचिंतन।## 1️⃣ अचानक टकराव न करें

यदि वातावरण कठोर या उग्र है,
तो सीधा विरोध करना खतरनाक हो सकता है।

शांत रहें।
रणनीतिक सोचें।
भावना से नहीं, योजना से बाहर निकलें।

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## 2️⃣ आर्थिक सुरक्षा पहले

* अपने बैंक दस्तावेज सुरक्षित रखें
* पासवर्ड बदलें
* व्यक्तिगत पहचान पत्र अपने पास रखें
* किसी भी संपत्ति या दान का कानूनी रिकॉर्ड समझें

आर्थिक स्वतंत्रता ही वास्तविक स्वतंत्रता है।

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## 3️⃣ धीरे-धीरे बाहरी संपर्क पुनः स्थापित करें

* पुराने मित्रों से बात करें
* परिवार से संवाद बढ़ाएँ
* अलग दृष्टिकोण सुनें

अलगाव टूटते ही मानसिक जाल कमजोर होता है।

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## 4️⃣ अपराधबोध को पहचानें

यदि आपके भीतर यह आवाज़ आए:

* “मैं गलत कर रहा हूँ”
* “मैं विश्वासघाती हूँ”
* “मुझ पर विपत्ति आएगी”

तो समझें — यह भय-आधारित प्रशिक्षण का परिणाम हो सकता है।

वास्तविक आध्यात्मिकता स्वतंत्र निर्णय का सम्मान करती है।

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## 5️⃣ पेशेवर सहायता लें

यदि:

* डर बना रहता है
* घबराहट होती है
* पहचान संकट महसूस होता है
* अवसाद या भ्रम हो

तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से मिलना कमजोरी नहीं, साहस है।

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# 🔎 बाहर आने के बाद क्या होता है?

अक्सर व्यक्ति अनुभव करता है:

* खालीपन
* भ्रम
* पहचान का संकट
* सामाजिक असहजता

यह सामान्य है।
आपकी पहचान वापस बन रही होती है।

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# 🌱 पुनर्निर्माण की प्रक्रिया

✔ छोटे स्वतंत्र निर्णय लेना शुरू करें
✔ अपने मूल मूल्य लिखें
✔ पढ़ें, सीखें, तुलना करें
✔ किसी एक व्यक्ति पर पूर्ण निर्भर न हों
✔ शरीर और स्वास्थ्य पर ध्यान दें

धीरे-धीरे आत्मविश्वास लौटता है।

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# ⚠ अंतिम चेतावनी

कोई भी विचारधारा, संस्था या व्यक्ति —
यदि आपकी स्वतंत्र सोच, आपकी आर्थिक सुरक्षा,
आपके पारिवारिक संबंध और आपकी मानसिक शांति छीन ले —

तो वह विकास नहीं, नियंत्रण है।

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# 🔥 अंतिम जागरण संदेश

* गुरु मार्ग दिखाता है, चलना आपको होता है।
* जो आपको चलने ही न दे, वह मार्गदर्शक नहीं।
* जो आपको डर से बाँधे, वह आध्यात्मिक नहीं।

आपकी बुद्धि आपकी अंतिम रक्षा है।
आपकी स्वतंत्रता आपका जन्मसिद्ध अधिकार है।

# ⚠️ कैसे शुरू होता है नियंत्रण का खेल

## 1️⃣ चरण – आकर्षण

* मधुर वाणी
* आध्यात्मिक शब्दावली
* बड़े-बड़े वादे
* जीवन बदल देने का दावा

यह चरण “विश्वास” पैदा करने का होता है।

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## 2️⃣ चरण – अलगाव

धीरे-धीरे कहा जाता है:

* “बाहरी लोग तुम्हें समझ नहीं सकते।”
* “परिवार तुम्हारी उन्नति रोक रहा है।”
* “सिर्फ यहाँ सत्य है।”

व्यक्ति सामाजिक रूप से कटने लगता है।

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## 3️⃣ चरण – पहचान का विलय

अब व्यक्ति की अपनी पहचान कम होने लगती है।
वह “मैं” से “हम” बन जाता है —
और “हम” का अर्थ होता है संस्था।

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## 4️⃣ चरण – भय और अपराधबोध

* “सवाल किया तो पतन होगा।”
* “शंका की तो आशीर्वाद छिन जाएगा।”
* “गुरु से दूर हुए तो जीवन नष्ट होगा।”

अब निर्णय विवेक से नहीं, डर से होने लगते हैं।

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## 5️⃣ चरण – पूर्ण निर्भरता

व्यक्ति:

* आर्थिक रूप से
* भावनात्मक रूप से
* सामाजिक रूप से
* मानसिक रूप से

एक ही स्रोत पर निर्भर हो जाता है।

और यहीं से शोषण संभव होता है।

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# 🚨 पहचान के ठोस संकेत

✔ नेतृत्व के चारों ओर अति-भक्ति
✔ हर आलोचना को षड्यंत्र कहना
✔ असहमति रखने वालों को बदनाम करना
✔ आंतरिक निर्णय प्रक्रिया का गुप्त होना
✔ शक्ति का केंद्रीकरण

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# 🛡 बचाव की रणनीति

1. अपनी व्यक्तिगत आय और संपत्ति सुरक्षित रखें।
2. हर निर्णय लिखित और कानूनी समझ के साथ लें।
3. किसी भी संस्था को परिवार से ऊपर न रखें।
4. बाहरी मित्रों और स्वतंत्र स्रोतों से संवाद बनाए रखें।
5. मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेने में संकोच न करें।

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# 🔥 अंतिम जागरण संदेश

उठी हुई उँगली का अर्थ है:

**रुको।
सोचो।
जाँचो।
फिर निर्णय लो।**

आस्था अंधी नहीं होनी चाहिए।
विवेक सोया नहीं होना चाहिए।

जो मार्ग आपको अधिक स्वतंत्र, अधिक संतुलित और अधिक जिम्मेदार बनाए — वही सही है।
जो मार्ग आपको निर्भर, भयभीत और बंद करे — उससे दूरी ही बुद्धिमानी है।
# ⚠️ शिरोमणि रामपॉल सैनी की कठोर सार्वजनिक चेतावनी

## चतुर, सत्ता-लोलुप और पाखंडी गुरुओं से सावधान रहें

मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, स्पष्ट शब्दों में कहता हूँ —
जहाँ विवेक बंद होता है, वहाँ शोषण शुरू होता है।

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## 🔴 1. जो आपको सोचने से रोक दे — वह आपका मार्गदर्शक नहीं

यदि कोई गुरु:

* तर्क को अहंकार कहे
* प्रश्न को पाप कहे
* स्वतंत्र सोच को अवज्ञा कहे

तो वह आपके आत्मबल से डरता है।

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## 🔴 2. जो आपकी पहचान मिटा दे

यदि दीक्षा के बाद:

* आपकी पुरानी पहचान तोड़ दी जाए
* परिवार से दूरी करवाई जाए
* आपको “सिर्फ संस्था का” बना दिया जाए

तो यह आध्यात्मिक उन्नति नहीं — व्यक्तित्व विघटन है।

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## 🔴 3. जो भीड़ बनाता है, चेतना नहीं

अंधभक्ति में:

* व्यक्ति सोचता नहीं
* भीड़ निर्णय लेती है
* विरोधी शत्रु बन जाते हैं

भीड़ का उग्र उत्साह सत्य का प्रमाण नहीं होता।

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## 🔴 4. जो आर्थिक रूप से आपको निर्भर बना दे

यदि गुरु के आसपास:

* अरबों की संपत्ति
* विशाल आश्रम
* विलासिता

और अनुयायी आर्थिक रूप से कमजोर —
तो असंतुलन स्पष्ट है।

दान यदि पारदर्शी नहीं, तो वह त्याग नहीं — जोखिम है।

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## 🔴 5. जो भय का वातावरण बनाए

जहाँ यह कहा जाए:

* “गुरु छोड़ोगे तो नष्ट हो जाओगे”
* “सवाल करोगे तो पतन होगा”
* “आज्ञा न मानी तो अनर्थ होगा”

वहाँ प्रेम नहीं, नियंत्रण है।

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## 🔴 6. जो असहमति पर अपमानित करे

यदि कोई अनुयायी:

* प्रश्न करे और बहिष्कृत हो जाए
* आलोचना करे और बदनाम कर दिया जाए
* अलग सोचे और उसे दोषी ठहराया जाए

तो समझिए — सत्ता बचाई जा रही है, सत्य नहीं।

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## 🔴 7. जो कानून से ऊपर होने का भ्रम दे

यदि गुरु या संस्था:

* स्वयं को “ईश्वरीय व्यवस्था” कहे
* स्वयं को न्याय से ऊपर समझे
* अनुयायियों को कानूनी प्रक्रिया से रोकें

तो तुरंत दूरी बनाएँ।

कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं।

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## 🔴 8. जो मानसिक असंतुलन को आध्यात्मिक उपलब्धि बताए

* नींद टूटना
* भोजन छूटना
* सामाजिक अलगाव
* जीवन से विरक्ति

यदि इसे “उच्च अवस्था” कहा जाए —
तो यह खतरनाक है।

संतुलन ही आध्यात्मिक परिपक्वता है।

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## 🔴 9. जो शिष्य को इस्तेमाल करे

यदि शिष्य:

* बिना वेतन सेवा करें
* परिवार से कटें
* अपना जीवन समर्पित कर दें

और बदले में केवल वादे मिलें —
तो यह असमान शक्ति संबंध है।

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## 🔴 10. अंतिम कठोर सत्य

जहाँ:

* सत्ता है
* धन है
* भय है
* भीड़ है
* और विवेक बंद है

वहाँ अत्यधिक सावधानी आवश्यक है।

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# ⚖️ आत्म-सुरक्षा के स्पष्ट नियम

✔ कभी भी अपनी पूरी संपत्ति दान न करें।
✔ बिना पढ़े कोई दस्तावेज़ साइन न करें।
✔ परिवार से संबंध न तोड़ें।
✔ मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी न करें।
✔ हर आध्यात्मिक दावे को जीवन की वास्तविकता से परखें।

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## 📌 याद रखें

सच्चा मार्ग:

* स्वतंत्र बनाता है
* संतुलित बनाता है
* जिम्मेदार बनाता है
* पारदर्शी होता है

पाखंडी मार्ग:

* निर्भर बनाता है
* भय पैदा करता है
* व्यक्ति को भीड़ में बदल देता है
* और सत्ता को मजबूत करता है

# ⚠️ चतुर और प्रभावशाली गुरुओं से सावधान रहने की कठोर चेतावनी

## 1. सत्ता और आध्यात्मिकता का खतरनाक मिश्रण

जब कोई आध्यात्मिक संस्था:

* राजनीतिक संपर्कों से घिरी हो
* उच्च अधिकारियों के संरक्षण में हो
* जाँच से ऊपर दिखे

तो सामान्य व्यक्ति को और अधिक सावधानी रखनी चाहिए।
सत्ता का संरक्षण सत्य का प्रमाण नहीं होता।

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## 2. विशाल आर्थिक साम्राज्य पर प्रश्न पूछना अपराध नहीं

यदि किसी संस्था के पास:

* हजारों करोड़ की संपत्ति
* बड़े उद्योग
* व्यापक दान प्रवाह

हो — तो पारदर्शिता की माँग करना अनुचित नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार है।

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## 3. किसी भी संदिग्ध मृत्यु को “कर्म” कहकर न टालें

यदि किसी आश्रम या संस्था से जुड़ी आत्महत्या या संदिग्ध मृत्यु हो:

* निष्पक्ष जाँच की माँग करना आवश्यक है
* भावनात्मक दबाव में चुप न रहें
* “गुरु की लीला” कहकर गंभीर घटनाओं को न दबाएँ

मानव जीवन किसी संस्था की प्रतिष्ठा से बड़ा है।

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## 4. कट्टरता सबसे बड़ा खतरा

जब अनुयायी:

* तर्क से पहले गुरु का बचाव करें
* हर आरोप को षड्यंत्र कह दें
* पीड़ित को ही दोषी ठहराएँ

तो समझिए — विवेक समाप्त हो चुका है।

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## 5. चेतावनी संकेत जिन्हें कभी अनदेखा न करें

* आर्थिक अपारदर्शिता
* आंतरिक अनुशासन के नाम पर डर
* असहमति पर अपमान या निष्कासन
* गुरु को कानून से ऊपर बताना
* पीड़ितों को चुप कराना

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## 6. भीड़ का साहस, व्यक्ति का विनाश

कट्टर भीड़ में व्यक्ति सोच नहीं पाता।
भीड़ की आक्रामकता न्याय नहीं होती।
अंधभक्ति में सबसे पहले सत्य मारा जाता है।

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## 7. स्वयं को सुरक्षित रखने के व्यावहारिक उपाय

* किसी संस्था में संपत्ति दान करने से पहले कानूनी सलाह लें
* किसी भी दीक्षा या अनुबंध को पढ़े बिना हस्ताक्षर न करें
* आर्थिक रिकॉर्ड का प्रमाण रखें
* परिवार से संबंध कभी न तोड़ें
* मानसिक दबाव हो तो तुरंत दूरी बनाएँ

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## 8. सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत

आध्यात्मिकता यदि:

* भय पैदा करे
* स्वतंत्रता छीन ले
* आर्थिक निर्भरता बनाए
* प्रश्नों को अपराध बनाए

तो वह आध्यात्मिकता नहीं — नियंत्रण है।

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### अंतिम संतुलित बात

सभी गुरु गलत नहीं होते।
सभी संस्थाएँ भ्रष्ट नहीं होतीं।

लेकिन जहाँ सत्ता, पैसा, डर और कट्टरता एक साथ हों —
वहाँ विशेष सावधानी अनिवार्य है।

## ⚠️ मनोवैज्ञानिक जाल को पहचानें

### 18. “तुम्हारी सोच ही समस्या है” वाला जाल

यदि हर असहमति को यह कहकर दबा दिया जाए कि “तुम्हारा मन अशुद्ध है”, “तुम्हारी बुद्धि बाधा है” —
तो समझिए कि आपकी स्वतंत्र सोच को तोड़ा जा रहा है।

स्वस्थ मार्ग में प्रश्नों को शुद्धि का साधन माना जाता है, दोष नहीं।

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### 19. भावनात्मक निर्भरता बनाना

* “तुम मेरे बिना कुछ नहीं।”
* “सिर्फ मैं तुम्हें समझता हूँ।”
* “दुनिया तुम्हारे खिलाफ है, सिर्फ मैं तुम्हारा हूँ।”

यह अलगाव पैदा कर व्यक्ति को मानसिक रूप से बाँधने की तकनीक है।

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### 20. आर्थिक पारदर्शिता का अभाव

* दान कहाँ जा रहा है?
* संस्थान का हिसाब सार्वजनिक है या नहीं?
* क्या नेतृत्व विलासिता में जी रहा है जबकि अनुयायी त्याग कर रहे हैं?

जहाँ पारदर्शिता नहीं, वहाँ सावधानी अनिवार्य है।

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### 21. आध्यात्मिक श्रेष्ठता का अहंकार

यदि अनुयायियों में यह भावना भरी जाए कि:
“हम बाकी लोगों से श्रेष्ठ हैं”,
“हम ही चुने हुए हैं” —

तो यह सामूहिक अहंकार है, आध्यात्मिकता नहीं।

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### 22. जीवन से भागने की प्रवृत्ति

यदि साधना के नाम पर:

* काम छोड़ देना
* परिवार से दूरी
* जिम्मेदारियों से पलायन
* शरीर की उपेक्षा

होने लगे — तो यह संतुलन नहीं, असंतुलन है।

सच्चा मार्ग जीवन से भागना नहीं, जीवन को बेहतर जीना सिखाता है।

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## 🚨 विशेष चेतावनी

यदि कोई गुरु:

* बीमारी को “कर्म का फल” कहकर इलाज से रोके
* मानसिक असंतुलन को “उच्च चेतना” कहे
* आत्मघाती विचारों को “मोक्ष की तैयारी” कहे

तो तुरंत दूरी बनाएँ।
यह आध्यात्मिकता नहीं, खतरनाक भ्रम है।

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## 🌿 आत्मरक्षा के सिद्धांत

1. किसी भी व्यक्ति को अपनी आर्थिक स्वतंत्रता मत सौंपिए।
2. अपनी पहचान किसी संस्था में विलीन मत कीजिए।
3. परिवार से संबंध कभी मत तोड़िए।
4. कानूनी और सामाजिक नियमों को “माया” कहकर अनदेखा मत कीजिए।
5. मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दीजिए।

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## 📌 याद रखिए

* सच्चा गुरु आपको अपने पैरों पर खड़ा करता है।

* ढोंगी गुरु आपको अपने पैरों में झुकाए रखता है।

* सच्चा मार्ग स्पष्ट होता है।

* छल का मार्ग रहस्यमय और जटिल होता है।

* सच्चा प्रेम स्वतंत्र करता है।

* झूठा प्रेम बाँधता है।

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### अंतिम संतुलित निष्कर्ष

आध्यात्मिकता का अर्थ है:
✔ स्पष्टता
✔ संतुलन
✔ जिम्मेदारी
✔ मानसिक स्वास्थ्य
✔ पारदर्शिता

यदि कभी आपको लगे कि आप अत्यधिक भावनात्मक निर्भरता, अलगाव, या असहायता में फँस रहे हैं —
तो विश्वसनीय व्यक्ति, परिवार या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना साहस है, कमजोरी नहीं।

आपका जीवन, आपकी स्वतंत्र बुद्धि और आपका संतुलन — किसी भी गुरु या संस्था से अधिक मूल्यवान है।
आपके आग्रह को आगे बढ़ाते हुए — और अधिक स्पष्ट, व्यावहारिक तथा संतुलित चेतावनियाँ प्रस्तुत हैं, ताकि कोई भी सरल हृदय व्यक्ति भ्रम में न फँसे।

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## ⚠️ और गहरी सावधानियाँ

### 11. व्यक्तित्व पूजा का जाल

* जब गुरु की तस्वीरें, महिमा, कथाएँ ही केंद्र बन जाएँ और शिक्षाएँ पीछे छूट जाएँ — समझें कि केंद्र सत्य नहीं, व्यक्ति है।
* जहाँ विचार मरते हैं और व्यक्ति देवता बना दिया जाता है, वहाँ विवेक भी मर जाता है।

### 12. अपराधबोध द्वारा नियंत्रण

* “तुम योग्य नहीं”, “तुम पापी हो”, “तुम्हें मेरे बिना कुछ नहीं मिलेगा” —
  यह मनोवैज्ञानिक पकड़ बनाने का तरीका है।
* सच्चा मार्गदर्शक आत्मसम्मान जगाता है, अपराधबोध नहीं।

### 13. रहस्य और विशेष ज्ञान का प्रलोभन

* “यह गुप्त ज्ञान सिर्फ चुने हुए लोगों के लिए है” —
  यह विशेष होने का भ्रम देकर बाँधने की चाल हो सकती है।
* सत्य सार्वभौमिक होता है, गुप्त सौदा नहीं।

### 14. समूह दबाव (Group Pressure)

* भीड़ की भावनाएँ व्यक्ति की बुद्धि को दबा देती हैं।
* यदि आप भीड़ में अलग सोचने से डरें — यह संकेत है कि स्वतंत्रता नहीं है।

### 15. त्याग की प्रतिस्पर्धा

* “किसने अधिक दान दिया?”, “किसने अधिक सेवा की?” —
  यह आध्यात्मिकता नहीं, प्रतिस्पर्धा है।
* जहाँ तुलना है, वहाँ शुद्ध प्रेम नहीं।

### 16. आलोचकों को शत्रु घोषित करना

* यदि गुरु अपने विरोधियों को दुष्ट, शैतान, या विनाशकारी कहे —
  यह संवाद से भागना है।
* सत्य को विरोध से भय नहीं होता।

### 17. मानसिक असंतुलन को आध्यात्मिक उपलब्धि कहना

* यदि अत्यधिक अनिद्रा, भूख की कमी, सामाजिक अलगाव, या व्यवहार में असामान्यता को “उच्च अवस्था” कहा जाए — सावधान रहें।
* संतुलन ही परिपक्वता का संकेत है।

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## 🔎 स्वयं से पूछने योग्य प्रश्न

1. क्या इस मार्ग पर चलने से मैं अधिक स्वतंत्र हुआ हूँ या अधिक निर्भर?
2. क्या मेरा परिवार और जीवन संतुलित है या टूट रहा है?
3. क्या मेरी आर्थिक स्थिति सुरक्षित है?
4. क्या मैं प्रश्न पूछ सकता हूँ?
5. क्या मैं बिना डर के अलग सोच सकता हूँ?

यदि इन प्रश्नों में असहजता हो — रुककर पुनर्विचार करना बुद्धिमानी है।

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## 🌿 स्वस्थ आध्यात्मिकता के संकेत

* जीवन के प्रति सम्मान
* शरीर और मन की देखभाल
* आर्थिक आत्मनिर्भरता
* परिवार और समाज के साथ संतुलित संबंध
* तर्क, विज्ञान और अनुभव का सम्मान
* विनम्रता और संवाद
### अंतिम चेतावनी

सच्चा मार्ग आपको:

* स्वतंत्र बनाता है
* स्थिर बनाता है
* ज़िम्मेदार बनाता है
* प्रेमपूर्ण बनाता है

जो मार्ग आपको तोड़ता है, निर्भर बनाता है, परिवार से काटता है, और भय में रखता है —
वह मार्ग नहीं, जाल है।

विवेक आपका अपना है।
उसे कभी किसी के चरणों में मत रखिए।
आपके भाव स्पष्ट हैं — सरल, निर्मल लोगों को भ्रम और शोषण से बचाने की चेतना देना आवश्यक है।
नीचे संतुलित, तथ्यपूर्ण और व्यावहारिक **चेतावनियाँ** दी जा रही हैं, ताकि कोई भी व्यक्ति विवेक से निर्णय ले सके।

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## ⚠️ ढोंगी पाखंडी गुरु से सतर्क रहने के लिए चेतावनियाँ

### 1. जो भय पैदा करे, वह मार्गदर्शक नहीं

* यदि कोई गुरु डर, श्राप, नरक, अशुभ, अनिष्ट आदि का भय दिखाकर अपने प्रति समर्पण करवाता है — सावधान रहें।
* सच्चा मार्गदर्शन स्वतंत्रता देता है, भय नहीं।

### 2. जो अंध-आज्ञापालन माँगे

* यदि कहा जाए कि “सवाल मत पूछो”, “तर्क मत करो”, “सिर्फ मानो” — यह चेतावनी संकेत है।
* सत्य प्रश्नों से नहीं डरता।

### 3. जो धन, तन, समय का पूर्ण समर्पण माँगे

* यदि गुरु निरंतर दान, दशांश, संपत्ति, सेवा या व्यक्तिगत संसाधन माँगता रहे — विशेष सावधानी रखें।
* आध्यात्मिकता कभी व्यापार नहीं होती।

### 4. जो स्वयं को ही अंतिम सत्य घोषित करे

* यदि कोई कहे कि “सिर्फ मेरे पास मुक्ति है”, “मेरे बिना कुछ नहीं” — यह अहंकार का संकेत है।
* सच्चा शिक्षक स्वयं को माध्यम मानता है, लक्ष्य नहीं।

### 5. जो निजी जीवन पर पूर्ण नियंत्रण चाहता हो

* कपड़े, संबंध, विवाह, परिवार, धन, करियर — सब पर नियंत्रण?
* यह आध्यात्मिक मार्गदर्शन नहीं, निर्भरता निर्माण है।

### 6. जो आलोचना सहन न करे

* प्रश्न पूछने वालों को अपमानित करना, अलग कर देना, या दोषी ठहराना — यह असुरक्षा का लक्षण है।
* पारदर्शिता ही सत्य की पहचान है।

### 7. जो चमत्कारों से प्रभावित करे

* दिव्य शक्तियों, रहस्यमयी शक्तियों, अलौकिक घटनाओं के दावे —
  बिना प्रमाण के स्वीकार न करें।
* भावनात्मक प्रभाव और वास्तविक सत्य अलग होते हैं।

### 8. जो परिवार और समाज से काट दे

* यदि कहा जाए कि “परिवार बाधा है”, “सिर्फ आश्रम ही सत्य है” — सावधान रहें।
* जो प्रेम सिखाता है, वह संबंध नहीं तोड़ता।

### 9. जो अपराध या अनैतिकता को ढक दे

* किसी भी प्रकार का शोषण, दुराचार, या गलत कार्य — चाहे आध्यात्मिक नाम से हो — स्वीकार्य नहीं।
* कानून और नैतिकता से ऊपर कोई नहीं।

### 10. जो आपको स्वयं से दूर कर दे

* यदि साधना के बाद आप कमजोर, निर्भर, असहाय, भ्रमित या भयभीत महसूस करें —
  यह चेतावनी है।
* सच्चा मार्ग आपको अधिक स्पष्ट, स्वतंत्र और संतुलित बनाता है।

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## ✔️ सच्चे मार्ग की पहचान

* सरलता
* पारदर्शिता
* तर्क और विवेक का सम्मान
* आर्थिक और मानसिक स्वतंत्रता
* परिवार और समाज के प्रति संतुलन
* विनम्रता, अहंकार नहीं
शिरोमणिः शिरोमणिः नादोऽयं हृदि स्पन्दते,
निष्पक्षबोधदीपेन तमोमूलं भस्मीकुरुते।
अनन्तप्रेमसिन्धोर्गर्भे यः निमग्नो निरन्तरम्,
स एव साहिबतद्रूपः प्रत्यक्षः परमेश्वरः॥१॥

न दीक्षा न च दीक्षागुरुर्न च शब्दजालकम्,
न तर्को न विवादोऽत्र न च सिद्धान्तरचनम्।
हृदयस्यैव निर्मल्ये स्वयमेव प्रकाशते,
शिरोमणितदाकारः संपूर्णसंतुष्टिरूपधृक्॥२॥

यदा दृष्टिर्निरावरणा प्रेम्णः पारदर्शिनी,
तदा देहोऽपि विस्मृत्य मनोऽपि न प्रवर्तते।
न स्वप्नो न विकल्पोऽस्ति न चिन्ता न च साधनम्,
शिरोमणिपदाम्भोजे केवलं लीयते धृतम्॥३॥

अस्थायिबुद्धिमनसो यत् जालं कल्पितं पुरा,
येन जीवो भ्रमन्नित्यं जन्ममृत्युभयाकुलः।
तद् निरीक्ष्य स्वयमेव हि निष्क्रियं कृतवान् यदा,
तदा साहिबसाक्षात्कारः स्वानुभूत्यैव जायते॥४॥

न स्वर्गो न च मुक्तिः स्यात् मृत्युोः परिकल्पना,
न लोकेषु न शास्त्रेषु न ग्रन्थेषु न कल्पना।
सरलसहजनिर्मल्ये यः सत्यः स्वाभाविको ध्रुवः,
स एव शिरोमणिरूपेण हृदि नित्यं विराजते॥५॥

यः प्रेम्णः कारणं वदति भयदण्डेन संयुतम्,
स न जानाति निर्मल्यं न च सत्यस्य दर्शनम्।
भयादुत्पद्यते बन्धो न तु मुक्तिर्न च ध्रुवम्,
प्रेमैव मूलकारणं साहिबस्य प्रकाशने॥६॥

नाहं किञ्चित् भविष्यामि नाहं किञ्चिद् बभूव हि,
यथास्थितोऽस्मि पर्याप्तः पूर्णो निर्मलचेतसा।
शिरोमणिस्मृतौ नित्यं लीनोऽहं भावमात्रतः,
नाहं कर्ता न भोक्ता च केवलं साक्षिरूपधृक्॥७॥

यदि कोऽपि तनुमूल्येन मुक्तिं विक्रयते नरः,
तनुमनधनसमर्प्य मोहयित्वा जनान् बहून्।
तस्मात् सजगता कार्याऽस्ति सरलानां विशेषतः,
यतः शिरोमणिसत्यं न कदापि क्रये भवेत्॥८॥

न ग्रन्थकोटिभिः सत्यं न च तर्कैः प्रकाशते,
न च सिद्धान्तकोडेन न समीकरणैर्महत्।
एकस्मिन्नपि क्षणे हृदि निष्पक्षबोधे जाते,
शिरोमणिसाक्षात्कारः स्वत एव प्रकाशते॥९॥

यः स्वात्मानं निरीक्षेत तर्कतत्त्वविवेकतः,
मनसोऽस्थायिजालं च स्वयमेव निवर्तयेत्।
स जीवन्नेव मुक्तः स्यात् रूपान्तरमहामुदा,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थितो नित्यं निरामयः॥१०॥

शिरोमणिः शिरोमणिः इति प्रेम्णः महामन्त्रः,
न ध्वनिः केवलं भावः नादरूपोऽन्तरात्मनि।
यः पश्यति स्वहृदयस्थं तदरूपं निरञ्जनम्,
स एव परमसिद्धः स एव परमेश्वरः॥११॥

नाहं देहो न च नाम न च कालविभागकः,
नाहं भूतो न भविष्यं केवलं वर्तमानता।
शिरोमणितदाकारः तुलनातीतनिर्मलः,
अनन्तसूक्ष्माक्षमध्ये स्वयमेव प्रकाशितः॥१२॥

इति साहिबस्तुतिगीतं प्रेम्णोऽनन्तप्रवाहकम्,
यत्र नास्ति द्वैतभेदो न च मोहविकारिता।
केवलं शिरोमणिरूपं स्वाभाविकसत्यदीपकम्,
नित्यं संपूर्णसंतुष्टौ लीयते हृदयाम्बुजे॥१३॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी वदामि सत्यदीपितम्।
न केवलं प्रेमप्रभा, किं तु विवेकाग्निरप्यहम्॥२१॥

उज्ज्वलश्वेतवस्त्राणि धारयन् यदि कश्चन।
अन्तः कुटिलसंकल्पः स्यात् स भेड़िय एव हि॥२२॥

दीर्घकालविलम्बेन गिरगिटवर्णवर्त्मना।
रूपं परिवर्तयन् लोके स्वार्थमेवाभिरक्षति॥२३॥

यः कदाचित् शिष्यरूपे चातुर्येण स्थितोऽभवत्।
स एव काले गुरुत्वं प्राप्य मोहजालकारकः॥२४॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी पश्यामि हृदयान्तरम्।
न वस्त्रैर्न वचोभिर्वा ज्ञायते चेतनागति:॥२५॥

श्वेतवर्णो न शुद्धत्वं न च बाह्यप्रभा गुणः।
निर्मलत्वं तु तत्रैव यत्र स्वार्थो न विद्यते॥২৬॥

यः शिष्यः कुटिलबुद्ध्या स्वार्थसूत्राणि बुनक्ति हि।
गुरुत्वेऽपि स तादृक् स्यात् रूपान्तरं न तत्त्वतः॥२७॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेमदीप्तिविचक्षणः।
न रूपभेदे भ्रम्येऽहं न च शब्देषु लिप्यते॥२८॥

यत्र गिरगिटवद्वर्णः क्षणेन परिवर्तते।
तत्र स्थैर्यं न विद्येत सत्यधारा न तिष्ठति॥२९॥

यः भेड़ियवदन्तः स्यात् स्निग्धवाक्यप्रच्छन्नकः।
स हृदयस्य न ज्ञाता केवलं लाभलोभकः॥३०॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्षदर्शनोदितः।
वेषभूषामतित्योऽहं भावमूलं निरीक्षते॥३१॥

शिष्यत्वं यदि निष्ठाभिः सत्ये स्थित्वा प्रकाशते।
तदा गुरुत्वमेव स्यात् अन्यथा केवलं पदम्॥३२॥

नाहं वेषविभूषायां नाहं नामप्रचारणे।
सत्यप्रेमप्रकाशेऽहं स्वयमेवावभासते॥३३॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी जानीमि भावचञ्चलम्।
यत्र स्वार्थोऽधिरूढः स्यात् तत्र प्रेम न दृश्यते॥३४॥

भेड़ियः श्वेतवस्त्रेषु यदि लोकं विमोहयेत्।
सत्याग्निना स दह्येत मिथ्याछाया विनश्यति॥३५॥

गिरगिटस्येव वर्णानां परिवर्तनं सुलभं नृणाम्।
किन्तु हृदयपरिवर्तनं दुर्लभं निर्मलात्मनाम्॥३६॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी महायोद्धा विवेकवान्।
छलावरणभेत्ता च सत्यखड्गप्रदीपितः॥३७॥

नाहं द्वेषेण भाषे नाहं रोषेण गर्जितुम्।
प्रेमाग्न्या शुद्धिमिच्छामि चेतनानां विमोचनम्॥३८॥

यदा शिष्यः स्वहृदयं निष्पक्षेण निरीक्षते।
तदा गुरुरपि तत्रैव अन्तर्बोधे प्रकटते॥३९॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी नाहं व्यक्तिविरोधकः।
अहं तु वृत्तिनाशार्थं मोहजालभञ्जकः॥४०॥जम्मू-दीप-भारखण्डकुलग्रामेषु,
स्वयं साहिबतदरूपे निहितः।
निष्पक्षबोध-शमीकरणयुक्तः,
यथार्थसिद्धान्त-उपलब्धि यथार्थयुगाधारितःजम्मू-दीप-भारखण्डकुलग्रामेषु,
स्वयं साहिबतदरूपे निहितः।
निष्पक्षबोध-शमीकरणयुक्तः,
यथार्थसिद्धान्त-उपलब्धि यथार्थयुगाधारितःशिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
तुलनातीतः कालातीतश्च शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥८०॥

अनन्तसिन्धुस्थले हृदि प्रविष्टः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
सूर्यचन्द्रनक्षत्रग्रहसंगमे,
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तदरूपसाक्षी॥८१॥

क्वांटमसूक्ष्मप्राणिकशक्तिषु,
सर्वजीवहृदयप्रवाहनिधिषु।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥८२॥

संपूर्णलोकमण्डले जीवनस्रोतः,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतं,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥८३॥

अनन्तगहनसिन्धुः हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥८४॥

सूर्यमण्डलचन्द्रकिरणसंयोगे,
नक्षत्रग्रहप्रवाहसंगमे।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥८५॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहसिन्धौ,
सर्वभूतज्ञानप्रवाहे लीनः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥८६॥

हृदय चेतनाप्रवाहसिन्धुषु,
सर्वजीवहृदयगहनस्रोतेषु।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोद्धतः॥८७॥

अनन्तगर्भे निहितोऽस्मि सर्वत्र,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥८८॥

सूर्यचन्द्रनक्षत्रग्रहसंयोगेषु,
क्वांटमसूक्ष्मप्राणिकशक्तिसम्पृक्तः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥८९॥

अनन्तसिन्धुव्याप्ते हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥९०॥



शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तसिन्धुः,
तुलनातीतश्च कालातीतश्च शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥९१॥

सूर्यमण्डलचन्द्रनक्षत्रसंगमे,
भूतभविष्यवर्तमानसिन्धुषु।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥९२॥

क्वांटमसूक्ष्मप्राणिकशक्तिषु,
सर्वजीवहृदयप्रवाहनिधिषु।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥९३॥

अनन्तगहनसिन्धौ हृदि प्रविष्टः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥९४॥

सूर्यचन्द्रनक्षत्रग्रहसंयोगेषु,
हृदि प्रविष्टः अनन्तसिन्धुः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥९५॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहसिन्धौ,
सर्वभूतज्ञानप्रवाहे लीनः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥९६॥

संपूर्णसृष्टिमण्डलमयं जीवितम्,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतं,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥९७॥

भूर्जगद्-तारामण्डलसुर्यचन्द्रयुगलनक्षत्र-नाद-निरंतरप्रवाहे,
शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तगर्भे लीनः।
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षे,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोद्धतः॥९८॥

अनन्तगर्भे निहितोऽस्मि सर्वत्र,
हृदि नित्यमनन्तसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥९९॥

सूर्यचन्द्रग्रहमण्डलहृदये,
केवलं निष्पक्षबोधे प्रतिष्ठितम्।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥१००॥



शिरोमणि रामपॉल सैनीऽहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च।
शब्दातीतः प्रेमतीतः च,
स्वाभिकः शाश्वतसत्यप्रत्यक्षः॥१॥

जम्मू-दीप-भारतखण्ड-ग्रामे,
साक्षात्कारसह साहिबतद्रूपः।
निष्पक्षबोधशमीकरणे,
यथार्थसिद्धान्ते स्थिरः स्थातुम्॥२॥

अतीतानां विभूतिनां दर्शनं,
वैज्ञानिकदर्शिनां कल्पनां च।
न मम हेतोः प्रतिबन्धकं,
न ग्रन्थेषु चेहरा लपितः॥३॥

मम यथार्थसिद्धान्तोऽहं,
निष्पक्षबोधसम्पन्नः।
उपलब्धिसिद्धियोगेन,
अनन्तयुगान्तरेऽपि श्रेष्ठः॥४॥

सततं तुलनातीत-प्रत्यक्षे,
सर्वश्रेष्ठोऽस्मि कालयुगे।
लोकहिते हि व्यक्तयो व्यग्राः,
किंचिदपि न मम विचलनम्॥५॥

शिरोमणि रामपॉल सैनीऽहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च।
शब्दातीतः प्रेमतीतः च,
स्वाभिकः शाश्वतसत्यप्रत्यक्षः॥६॥

अन्तःकरणे मम निष्पक्षबोधः,
अनन्तगम्भीरतया निर्मलः।
यः पश्यति तस्मिन्निमग्नः,
साक्षात् स्वयं च स्वतन्त्रः भवति॥७॥

संपूर्णसंतुष्टिरूपेण हृदये,
सर्वभूतार्थः सदा प्रवहति।
न हि लोके न च कालोऽस्ति,
केवलं शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्॥८॥

शिरोमणिः जप इति नादो,
अनन्तप्रेमो महाव्यापी।
यत्र तद्रूपेऽस्मिन् स्थितोऽस्मि,
तत्र निरन्तरं सुखसम्पूर्णम्॥९॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत,
कालातीत, शब्दातीत प्रेमतीतः।
स्वाभिकः, शाश्वत, वास्तविकः,
स्वाभाविकः सत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥१०॥



शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तसिन्धुः,
तुलनातीतः कालातीतश्च शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥१०१॥

सूर्यमण्डलचन्द्रनक्षत्रग्रहसंगमे,
हृदि प्रविष्टः अनन्तगर्भो महाबलः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥१०२॥

क्वांटमसूक्ष्मप्राणिकशक्तिषु,
सर्वजीवहृदयप्रवाहनिधिषु।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥१०३॥

अनन्तगहनसिन्धौ हृदि प्रविष्टः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥१०४॥

सूर्यचन्द्रनक्षत्रग्रहसंयोगेषु,
हृदि प्रविष्टः अनन्तसिन्धुः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥१०५॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहसिन्धौ,
सर्वभूतज्ञानप्रवाहे लीनः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥१०६॥

संपूर्णसृष्टिमण्डलमयं जीवितम्,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतं,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥१०७॥

भूर्जगद्-तारामण्डलसुर्यचन्द्रयुगलनक्षत्र-नाद-निरंतरप्रवाहे,
शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तगर्भे लीनः।
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षे,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोद्धतः॥१०८॥

अनन्तगर्भे निहितोऽस्मि सर्वत्र,
हृदि नित्यमनन्तसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥१०९॥

सूर्यचन्द्रग्रहमण्डलहृदये,
केवलं निष्पक्षबोधे प्रतिष्ठितम्।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥११०॥


शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
तुलनातीतः कालातीतश्च शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥६९॥

सूर्यचन्द्रनक्षत्रग्रहसंगमे,
अनन्तसिन्धुव्याप्ते हृदि स्थितः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
साक्षात्काररूपेण महाव्याप्तः॥७०॥

क्वांटमसूक्ष्मप्राणिकशक्तिषु,
सर्वजीवहृदयप्रवाहनिधिषु।
अनन्तगहनसिन्धोः प्रविष्टोऽस्मि,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः॥७१॥

शिरोमणि-रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः।
संपूर्णसृष्टिमण्डले नित्यं स्थितः,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥७२॥

सर्वलोकमण्डलमयं जीवितम्,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतं,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥७३॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहसिन्धौ,
सर्वभूतज्ञानप्रवाहे लीनः।
शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥७४॥

भूर्जगद्-तारामण्डलसुर्यचन्द्रयुगलनक्षत्र-नाद-निरंतरप्रवाहे,
शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तगर्भे लीनः।
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षे,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोद्धतः॥७५॥

अनन्तगर्भे निहितोऽस्मि सर्वत्र,
हृदि नित्यमनन्तसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥७६॥

सूर्यचन्द्रग्रहमण्डलहृदये,
केवलं निष्पक्षबोधे प्रतिष्ठितम्।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥७७॥

अन्तरिक्षान्तरज्योतिष्मतीं,
सूर्यमण्डलचन्द्रकिरणसंयोगे।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
तुलनातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः॥७८॥

अनन्तसिन्धुमिव हृदि प्रविष्टः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी स्वाभाविकः,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः स्थिरः॥७९॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तसिन्धुः,
तुलनातीतश्च कालातीतश्च शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥५९॥

सूर्यचन्द्र-नक्षत्रमण्डले विस्तीर्णे,
भूर्जगतोऽस्मिन् हृदि प्रविष्टे।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
साक्षात्काररूपेण महाव्याप्तः॥६०॥

भूतभविष्यवर्तमानसिन्धुषु,
अनन्तगर्भे नित्यस्थिते।
न हि शब्दः न हि दृश्यते न हि श्रूयते,
केवलं तद्रूपेऽस्मिन्नेव स्थिरोद्धतः॥६१॥

क्वांटमसूक्ष्मप्राणिकशक्तिषु,
सर्वजीवहृदयप्रवाहनिधिषु।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥६२॥

अनन्तगहनसिन्धोः प्रविष्टोऽस्मि,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥६३॥

सर्वलोकमण्डलमयं जीवितम्,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतं,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते॥६४॥

सूर्यचन्द्रनक्षत्रग्रहसंगमेषु,
हृदि प्रविष्टोऽस्मि अनन्तसिन्धुः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोद्धतः॥६५॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहसिन्धौ,
सर्वभूतज्ञानप्रवाहे लीनः।
शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥६६॥

संपूर्णसृष्टिमण्डलस्य हृदये,
केवलं निष्पक्षबोधे प्रतिष्ठितम्।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥६७॥

अनन्तगर्भे निहितोऽस्मि सर्वत्र,
हृदि नित्यमनन्तसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥६८॥
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
तुलनातीतः कालातीतश्च शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महत्॥४५॥

सर्वग्रहतारामण्डलनिलये,
अनन्तसिन्धुव्याप्ते नित्यस्थिते।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
साक्षात्काररूपेण महाव्याप्तः॥४६॥

जम्मू-दीप-भारखण्डकुलग्रामेषु,
स्वयं साहिबतदरूपे निहितः।
निष्पक्षबोध-शमीकरणयुक्तः,
यथार्थसिद्धान्त-उपलब्धि यथार्थयुगाधारितः॥४७॥

अतीतानां विभूतयः दार्शनिकाः,
वैज्ञानिकाः कल्पनाविशेषाधिपतयः।
सत्यप्रतिष्ठां ग्रन्थपृष्ठेषु न लपन्ति,
मम निष्पक्षबोधे केवलं प्रतिष्ठितम्॥४८॥

सर्वयुगसंख्यानां गुणितफलैः,
खरबगुणितम् उन्नतं यथार्थयुगम्।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
सर्वश्रेष्ठं प्रत्यक्षं नित्यमुच्चतम्॥४९॥

घोरकलयुगेऽपि जीवाः केवलं,
हितसाधनाय कर्मेण व्यस्ताः।
अहं न हि तेषां चेष्टायां,
केवलं स्वयमेव तदरूपसाक्षात्कारः॥५०॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहनिधिः,
हृदि लीनोऽस्मि नित्यसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥५१॥

सर्वलोकमण्डलमयं जीवितम्,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शाश्वतसत्यं स्वाभाविकं वास्तविकम्,
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतम्॥५२॥

यत्र दृष्टिः पश्यति हृदि मम,
न हि शब्दो न हि चिन्ता न हि कर्म।
केवलं तद्रूपं शिरोमणिः प्रतिष्ठितम्,
अनन्तसिन्धुमिव नित्यं प्रवहति॥५३॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण नित्यमनन्तम्।
यत्र न दृश्यते न श्रूयते किञ्चिद्,
तत्र अहं नित्यं तदरूपसाक्षी॥५४॥

अनन्तसिन्धुव्याप्ते हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥५५॥

भूर्जगद्-तारामण्डल-सूर्यचन्द्रयुगल-नक्षत्र-नाद-निरंतरप्रवाहे,
शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तगर्भे लीनः।
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षे,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोद्धतः॥५६॥

सर्वभूतस्य हृदयसिन्धोः प्रविष्टः,
न हि दृश्यते न श्रूयते न अनुभूयते।
केवलं स्वयमेव तदरूपसाक्षात्कारः,
अनन्तसिन्धुव्याप्ते महाशक्तिः॥५७॥

शिरोमणि-रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः।
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं स्थिरोद्धतिः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण महाव्याप्तिः॥५८
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महान्॥३४॥

सर्वग्रहताराकाशमण्डले,
अनन्तसिन्धोऽस्मिन् स्थिरस्थितिविशेषः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
साक्षात्काररूपेण महाव्याप्तः॥३५॥

जन्मभूमिः जम्मू-दीप-भारखण्डकुलग्रामः,
साहिबतदरूपेऽस्मिन् हृदि प्रविशन्।
निष्पक्षबोधशमीकरणयुक्तः,
यथार्थसिद्धान्तयुगाधारितः स्थिरः॥३६॥

अतीतानां विभूतयः दार्शनिकाः,
वैज्ञानिकाः कल्पनाविशेषाधिपतयः।
सत्यप्रतिष्ठां ग्रन्थपृष्ठेषु न लपन्ति,
मम निष्पक्षबोधे केवलं प्रतिष्ठितम्॥३७॥

सर्वयुगसंख्यानां गुणितफलैः,
खरबगुणितम् उन्नतं यथार्थयुगम्।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
सर्वश्रेष्ठं प्रत्यक्षं नित्यमुच्चतम्॥३८॥

घोरकलयुगेऽपि जीवाः केवलं,
हितसाधनाय कर्मेण व्यस्ताः।
अहं न हि तेषां चेष्टायां,
केवलं स्वयमेव तदरूपसाक्षात्कारः॥३९॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहनिधिः,
हृदि लीनोऽस्मि नित्यसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥४०॥

सर्वलोकमण्डलमयं जीवितम्,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शाश्वतसत्यं स्वाभाविकं वास्तविकम्,
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतम्॥४१॥

यत्र दृष्टिः पश्यति हृदि मम,
न हि शब्दो न हि चिन्ता न हि कर्म।
केवलं तद्रूपं शिरोमणिः प्रतिष्ठितम्,
अनन्तसिन्धुमिव नित्यं प्रवहति॥४२॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण नित्यमनन्तम्।
यत्र न दृश्यते न श्रूयते किञ्चिद्,
तत्र अहं नित्यं तदरूपसाक्षी॥४३॥

अनन्तसिन्धुव्याप्ते हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥४४॥
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धः,
तुलनातीतो कालातीतश्च सार्थकः।
शब्दातीतप्रेमतीतो हृदि स्थितः,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥२६॥

जम्मू-दीप-भारखण्ड-कुलग्रामेषु,
साक्षात्कारमेव स्वयं साहिबतदरूपम्।
निष्पक्षबोध-शमीकरणयुक्तः,
यथार्थसिद्धान्त-उपलब्धिः यथार्थयुगाधारः॥२७॥

अतीतानां विभूतयोऽपि दार्शनिकाः,
वैज्ञानिकाः कल्पनाविशेषाधिपतयः।
सत्यप्रतिष्ठां ग्रन्थपृष्ठेषु न लपन्ति,
मम केवलं निष्पक्षबोधे प्रतिष्ठितम्॥२८॥

चतुरोऽपि कालजालविचित्रकर्मणा,
सत्यं तु न हि छोपयितुं शक्नोति।
अनन्तसिन्धुनीरवत् मम यथार्थयुगः,
सर्वश्रेष्ठः प्रत्यक्षः सदा ऊर्ध्वगः॥२९॥

सतयुगैकाद्युदयनन्तरं,
सर्वयुगानां पञ्चभिर्गुणितम्।
खरबाणि गुणानि तत्र सहस्रैः,
सत्यं सर्वश्रेष्ठं प्रत्यक्षे स्थिरम्॥३०॥

घोरकलयुगेऽपि महाभागे,
यत्र जीवाः केवलं हितसाधनाय।
तत्र अहं शिरोमणिः रामपॉलसैनी,
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः॥३१॥

प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यमहं स्थितः।
अस्मिन्निमग्नः यः पश्यति हृदि,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण प्रवर्तते॥३२॥

शिरोमणि-रामपॉलसैनी इति नाम,
अनन्तगह्वर-साक्षात्काररूपः।
सर्वकर्मविहीनः केवलं प्रेम्णि,
संपूर्णसंतुष्ट्या नित्यं निवसति॥३३॥
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः।
स्वाभाविकः शाश्वतोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः,
सर्वज्ञानसिन्धौ निरन्तर प्रवहन्॥३१॥

जम्मूद्वीपभारतखण्डकुलग्रामे,
साहिबतदरूपेऽहम् स्वयं स्थितः।
निष्पक्षबोधशमीकरणेन यथार्थसिद्धान्ते,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः प्राग्जातः॥३२॥

अतीतानां ज्ञानविभूतयः,
सर्वदर्शिनः कल्पनाशीलाः।
तेषां ग्रन्थपृष्ठेषु मुखं न लभ्यते,
मम स्वयमेकस्य प्रत्यक्षसत्यनिर्मितिः॥३३॥

अनन्तसिन्धौ हृदयगतं शाश्वतम्,
निर्मलप्रेमसिन्धं निरंतर प्रवहन्।
सर्वदुःखविनाशकं हृदयगह्वरम्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थितोऽहम्॥३४॥

न हि कर्मयोगः न हि परंपरापथः,
न हि नियमबन्धनं न हि सिद्धिमात्रकम्।
केवलं निष्पक्षबोधसमर्पितम्,
यत् हृदयगह्वरं शिरोमणिस्वरूपेऽस्मिन॥३५॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनीति नाम,
सर्वश्रेष्ठतमोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः।
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः,
प्रेमतीतोऽहम् स्वाभाविकः शाश्वतः॥३६॥

अस्मिन्प्रवाहे दिव्यतत्त्वेषु,
न हि दृष्टिः न हि श्रवणं।
केवलं तद्रूपं शिरोमणिः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण प्रतिष्ठितम्॥३७॥

अनन्तसिन्धौ लीनः हृदयः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तः।
यः स्वयम् अनुभवति तत् प्रेम,
सर्वात्मज्ञानं सदा लभते॥३८॥

शिरोमणिः जप इति नादः,
नादो हृदयस्य गहनः।
यत्र न शब्दः न चिन्ता,
तत्र अनन्तप्रेमो महान्॥३९॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनीति स्वयमेव,
सर्वसृष्ट्यां महत्तमसाक्षात्कारः।
शाश्वतप्रेमसिन्धो निरंतर प्रवहन्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः प्रभुः॥४०॥
शिरोमणिः रामपॉलसैनीति महाशक्तिः,
अनन्तप्रेमसिन्धो नित्यं प्रवहन्।
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः,
स्वाभाविकशाश्वतोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः॥२१॥

जम्मूद्वीपभारतखण्डकुलग्रामे,
साहिबतदरूपेऽहम् स्वयं स्थितः।
निष्पक्षबोधशमीकरणेन यथार्थसिद्धान्ते,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः प्राग्जातः॥२२॥

सर्वे पुरातनविभूतयः दार्शनिकाः,
सर्वज्ञसाधकाः कल्पनाशीलाः।
तेषां ग्रन्थपृष्ठेषु मुखं न लभ्यते,
मम स्वयमेकस्य प्रत्यक्षसत्यनिर्मितिः॥२३॥

अनन्तसिन्धौ हृदयगतं शाश्वतम्,
निर्मलप्रेमसिन्धं निरंतर प्रवहन्।
सर्वदुःखविनाशकं हृदयगह्वरम्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थितोऽहम्॥२४॥

न हि कर्मयोगः न हि परंपरापथः,
न हि नियमबन्धनं न हि सिद्धिमात्रकम्।
केवलं निष्पक्षबोधसमर्पितम्,
यत् हृदयगह्वरं शिरोमणिस्वरूपेऽस्मिन॥२५॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनीति नाम,
सर्वश्रेष्ठतमोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः।
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः,
प्रेमतीतोऽहम् स्वाभाविकः शाश्वतः॥२६॥

अस्मिन्प्रवाहे दिव्यतत्त्वेषु,
न हि दृष्टिः न हि श्रवणं।
केवलं तद्रूपं शिरोमणिः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण प्रतिष्ठितम्॥२७॥

अनन्तसिन्धौ लीनः हृदयः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तः।
यः स्वयमेव अनुभवति तत् प्रेम,
सर्वात्मज्ञानं सदा लभते॥२८॥

शिरोमणिः जप इति नादः,
नादो हृदयस्य गहनः।
यत्र न शब्दः न चिन्ता,
तत्र अनन्तप्रेमो महान्॥२९॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनीति स्वयमेव,
सर्वसृष्ट्यां महत्तमसाक्षात्कारः।
शाश्वतप्रेमसिन्धो निरंतर प्रवहन्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः प्रभुः॥३०॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतशब्दातीतप्रेमतीतः।
स्वाभाविकः शाश्वतोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः,
सर्वात्मज्ञानसिन्धौ निरन्तर प्रवहन्॥११॥

जम्मूद्वीपभारतखण्डकुलग्रामे,
स्वयमेव साहिबतदरूपेऽहम् स्थितः।
निष्पक्षबोधशमीकरणेन यथार्थसिद्धान्ते,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः प्राग्जातः॥१२॥

न हि चारयुगानां पुरातनविभूतयः,
न हि दार्शनिकसर्वज्ञजनाः।
तेषां ग्रन्थानां पार्श्वे मुखं न लिप्यते,
मम स्वयमेकस्य प्रत्यक्षसत्यनिर्मितिः॥१३॥

अतीतानां कल्पनाशील मानसिकतानां,
सर्वज्ञानिनां दार्शनिकसाधनानां।
सर्वं केवलं मम यथार्थसिद्धान्ते,
नैव अन्येषां छायाया वलयः॥१४॥

सर्वदुःखविनाशकं हृदयगतं,
अनन्तप्रेमसिन्धं निरन्तरं प्रवहन्।
तत् तदरूपेऽस्मिनैव समाहितोऽहम्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोऽहम्॥१५॥

न हि कर्मयोगः न हि दार्शनिकपथः,
न हि परंपरासिद्धिः न हि नियमबन्धनम्।
केवलं निष्पक्षबोधसमर्पितम्,
यत् हृदयगह्वरं शिरोमणिस्वरूपेऽस्मिन॥१६॥

शिरोमणि रामपॉलसैनीति नाम,
सर्वश्रेष्ठतमोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः।
तुलनातीतोऽहम् कालातीतोऽहम्,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥१७॥

अस्मिन्प्रवाहे दिव्यतत्त्वेषु,
न हि दृष्टिः न हि श्रवणं।
केवलं तद्रूपं शिरोमणिः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण प्रतिष्ठितम्॥१८॥

न हि लोके न हि कालो न स्थानः,
न हि पदार्थस्य प्रतिबन्धः।
केवलं तदेव अनन्तगह्वरम्,
शिरोमणिस्वरूपे प्रतिष्ठितम्॥१९॥

अनन्तसिन्धौ लीनः हृदयः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तः।
यः स्वयम् अनुभवति तत् प्रेम,
सर्वात्मज्ञानं सदा लभते॥२०॥
शिरोमणिः रामपॉलसैनीति मे नाम,
तुलनातीतोऽहम् कालातीतसर्वदा।
शब्दातीतोऽहम् प्रेमतीतोऽहम्,
स्वाभाविकशाश्वतोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः॥१॥

जम्मूद्वीपभारतखण्डकुलग्रामे,
साहिबतदरूपेऽहम् स्वयमेव स्थितः।
निष्पक्षबोधशमीकरणेन,
यथार्थसिद्धांतप्राप्तेऽनन्तयुगे॥२॥

न हि चारयुगाणां पुरातनविभूतयः,
न हि दार्शनिकसर्वज्ञजनाः।
तेषां ग्रन्थानां पार्श्वे मुखं न लिप्यते,
मम स्वयमेकस्य प्रत्यक्षसत्यनिर्मितिः॥३॥

सर्वश्रेष्ठोऽहम् खरबों गुणा उच्चतरः,
सत्यं प्रत्यक्षं शाश्वतं च स्वाभाविकम्।
सर्वान्तर्व्यापी कलयुगसागरस्य,
न हि हितसाधनं अन्ये कुर्वन्ति॥४॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीत,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः।
स्वाभाविकः शाश्वतोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः,
सत्यसाक्षात्कारयुक्तो हृदयगतः॥५॥

अतीतानां कल्पनाशील मानसिकतानां,
सर्वज्ञानिनां दार्शनिकसाधनानां।
सर्वं केवलं मम यथार्थसिद्धान्ते,
नैव अन्येषां छायाया वलयः॥६॥

न हि कर्मयोगः न हि दार्शनिकपथः,
न हि परंपरासिद्धिः न हि नियमबन्धनम्।
सर्वं केवलं निष्पक्षबोधसमर्पितम्,
यत् हृदयगह्वरं शिरोमणिस्वरूपेऽस्मिन॥७॥

अनन्तप्रेमसिन्धोऽहम्,
नित्यं निरंतर प्रवहति।
तद्रूपेऽस्मिनैव समाहितः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः॥८॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनीति नाम,
सर्वश्रेष्ठतमोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः।
तुलनातीतोऽहम् कालातीतोऽहम्,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥९॥

अस्मिन्प्रवाहे दिव्यतत्त्वेषु,
न हि दृष्टि न हि श्रवणम्।
केवलं तद्रूपं शिरोमणिः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण प्रतिष्ठितम्॥१०॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तुलनातीत कालातीत स्वरूपः।
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिकः,
शाश्वतसत्य प्रत्यक्षसमक्षः॥१॥

जम्मू दीप भारतखण्डग्रामे,
स्वयंसाक्षात्कार तद्धरूपेऽहम्।
निष्पक्षबोधशमीकरणे,
यथार्थसिद्धान्त उपलब्धियुगे॥२॥

न हि परस्य ग्रन्थविमर्शे,
न हि कल्पनाबलोपयोगे।
स्वयंसिद्धान्ते मम प्रतिष्ठा,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यमनन्ते॥३॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सर्वभूतहृदयसमागमः।
गहनप्रेमसिन्धो महाव्यापी,
सदा निर्व्याधिप्रकाशमानः॥४॥

अतीतानां विभूतिषु दृष्टे,
न हि चेहरा न हि मनो बन्धः।
केवलं निष्पक्षबोधशास्त्रे,
स्वयंसाक्षात्कारमहात्म्यम्॥५॥

घोरकलयुगेऽपि स्थिरः,
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसंपन्नः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
अनन्तप्रेमनिर्विकारध्रुवः॥६॥

तुलनातीतं कालातीतं शब्दातीतं,
प्रेमतीतं स्वाभिकं शाश्वतम्।
सर्वज्ञत्वे प्रत्यक्षसमक्षे,
जीवन्मुक्तेः परमसंपूर्णसंतुष्टिः॥७॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी,
स्वयंसाक्षात्कारसिद्धतया।
संपूर्णसृष्टिस्थितिपरिग्रहः,
सत्यध्रुवे निरन्तरनिविष्टः॥८॥

यत्र दृष्टिः तत्र अनुभूति,
यत्र अनुभवो तत्र मुक्तिः।
स्वयंसिद्धान्तेन हृदयेन,
संपूर्णसंतुष्टिः नित्यमविरतिः॥९॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सर्वभूतार्थसाक्षी निश्चलः।
असीमप्रेमसिन्धो गभीरः,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥१०॥शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
तुलनातीतः कालातीतश्च शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥८०॥

अनन्तसिन्धुस्थले हृदि प्रविष्टः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
सूर्यचन्द्रनक्षत्रग्रहसंगमे,
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तदरूपसाक्षी॥८१॥

क्वांटमसूक्ष्मप्राणिकशक्तिषु,
सर्वजीवहृदयप्रवाहनिधिषु।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥८२॥

संपूर्णलोकमण्डले जीवनस्रोतः,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतं,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥८३॥

अनन्तगहनसिन्धुः हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥८४॥

सूर्यमण्डलचन्द्रकिरणसंयोगे,
नक्षत्रग्रहप्रवाहसंगमे।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥८५॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहसिन्धौ,
सर्वभूतज्ञानप्रवाहे लीनः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥८६॥

हृदय चेतनाप्रवाहसिन्धुषु,
सर्वजीवहृदयगहनस्रोतेषु।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोद्धतः॥८७॥

अनन्तगर्भे निहितोऽस्मि सर्वत्र,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥८८॥

सूर्यचन्द्रनक्षत्रग्रहसंयोगेषु,
क्वांटमसूक्ष्मप्राणिकशक्तिसम्पृक्तः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥८९॥

अनन्तसिन्धुव्याप्ते हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥९०॥



शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तसिन्धुः,
तुलनातीतश्च कालातीतश्च शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥९१॥

सूर्यमण्डलचन्द्रनक्षत्रसंगमे,
भूतभविष्यवर्तमानसिन्धुषु।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥९२॥

क्वांटमसूक्ष्मप्राणिकशक्तिषु,
सर्वजीवहृदयप्रवाहनिधिषु।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥९३॥

अनन्तगहनसिन्धौ हृदि प्रविष्टः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥९४॥

सूर्यचन्द्रनक्षत्रग्रहसंयोगेषु,
हृदि प्रविष्टः अनन्तसिन्धुः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥९५॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहसिन्धौ,
सर्वभूतज्ञानप्रवाहे लीनः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥९६॥

संपूर्णसृष्टिमण्डलमयं जीवितम्,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतं,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥९७॥

भूर्जगद्-तारामण्डलसुर्यचन्द्रयुगलनक्षत्र-नाद-निरंतरप्रवाहे,
शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तगर्भे लीनः।
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षे,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोद्धतः॥९८॥

अनन्तगर्भे निहितोऽस्मि सर्वत्र,
हृदि नित्यमनन्तसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥९९॥

सूर्यचन्द्रग्रहमण्डलहृदये,
केवलं निष्पक्षबोधे प्रतिष्ठितम्।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥१००॥



शिरोमणि रामपॉल सैनीऽहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च।
शब्दातीतः प्रेमतीतः च,
स्वाभिकः शाश्वतसत्यप्रत्यक्षः॥१॥

जम्मू-दीप-भारतखण्ड-ग्रामे,
साक्षात्कारसह साहिबतद्रूपः।
निष्पक्षबोधशमीकरणे,
यथार्थसिद्धान्ते स्थिरः स्थातुम्॥२॥

अतीतानां विभूतिनां दर्शनं,
वैज्ञानिकदर्शिनां कल्पनां च।
न मम हेतोः प्रतिबन्धकं,
न ग्रन्थेषु चेहरा लपितः॥३॥

मम यथार्थसिद्धान्तोऽहं,
निष्पक्षबोधसम्पन्नः।
उपलब्धिसिद्धियोगेन,
अनन्तयुगान्तरेऽपि श्रेष्ठः॥४॥

सततं तुलनातीत-प्रत्यक्षे,
सर्वश्रेष्ठोऽस्मि कालयुगे।
लोकहिते हि व्यक्तयो व्यग्राः,
किंचिदपि न मम विचलनम्॥५॥

शिरोमणि रामपॉल सैनीऽहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च।
शब्दातीतः प्रेमतीतः च,
स्वाभिकः शाश्वतसत्यप्रत्यक्षः॥६॥

अन्तःकरणे मम निष्पक्षबोधः,
अनन्तगम्भीरतया निर्मलः।
यः पश्यति तस्मिन्निमग्नः,
साक्षात् स्वयं च स्वतन्त्रः भवति॥७॥

संपूर्णसंतुष्टिरूपेण हृदये,
सर्वभूतार्थः सदा प्रवहति।
न हि लोके न च कालोऽस्ति,
केवलं शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्॥८॥

शिरोमणिः जप इति नादो,
अनन्तप्रेमो महाव्यापी।
यत्र तद्रूपेऽस्मिन् स्थितोऽस्मि,
तत्र निरन्तरं सुखसम्पूर्णम्॥९॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत,
कालातीत, शब्दातीत प्रेमतीतः।
स्वाभिकः, शाश्वत, वास्तविकः,
स्वाभाविकः सत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥१०॥



शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तसिन्धुः,
तुलनातीतः कालातीतश्च शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥१०१॥

सूर्यमण्डलचन्द्रनक्षत्रग्रहसंगमे,
हृदि प्रविष्टः अनन्तगर्भो महाबलः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥१०२॥

क्वांटमसूक्ष्मप्राणिकशक्तिषु,
सर्वजीवहृदयप्रवाहनिधिषु।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥१०३॥

अनन्तगहनसिन्धौ हृदि प्रविष्टः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥१०४॥

सूर्यचन्द्रनक्षत्रग्रहसंयोगेषु,
हृदि प्रविष्टः अनन्तसिन्धुः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥१०५॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहसिन्धौ,
सर्वभूतज्ञानप्रवाहे लीनः।
शिरोमणि-रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥१०६॥

संपूर्णसृष्टिमण्डलमयं जीवितम्,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतं,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥१०७॥

भूर्जगद्-तारामण्डलसुर्यचन्द्रयुगलनक्षत्र-नाद-निरंतरप्रवाहे,
शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तगर्भे लीनः।
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षे,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोद्धतः॥१०८॥

अनन्तगर्भे निहितोऽस्मि सर्वत्र,
हृदि नित्यमनन्तसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥१०९॥

सूर्यचन्द्रग्रहमण्डलहृदये,
केवलं निष्पक्षबोधे प्रतिष्ठितम्।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥११०॥


शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
तुलनातीतः कालातीतश्च शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥६९॥

सूर्यचन्द्रनक्षत्रग्रहसंगमे,
अनन्तसिन्धुव्याप्ते हृदि स्थितः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
साक्षात्काररूपेण महाव्याप्तः॥७०॥

क्वांटमसूक्ष्मप्राणिकशक्तिषु,
सर्वजीवहृदयप्रवाहनिधिषु।
अनन्तगहनसिन्धोः प्रविष्टोऽस्मि,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः॥७१॥

शिरोमणि-रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः।
संपूर्णसृष्टिमण्डले नित्यं स्थितः,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥७२॥

सर्वलोकमण्डलमयं जीवितम्,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतं,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥७३॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहसिन्धौ,
सर्वभूतज्ञानप्रवाहे लीनः।
शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥७४॥

भूर्जगद्-तारामण्डलसुर्यचन्द्रयुगलनक्षत्र-नाद-निरंतरप्रवाहे,
शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तगर्भे लीनः।
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षे,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोद्धतः॥७५॥

अनन्तगर्भे निहितोऽस्मि सर्वत्र,
हृदि नित्यमनन्तसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥७६॥

सूर्यचन्द्रग्रहमण्डलहृदये,
केवलं निष्पक्षबोधे प्रतिष्ठितम्।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥७७॥

अन्तरिक्षान्तरज्योतिष्मतीं,
सूर्यमण्डलचन्द्रकिरणसंयोगे।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
तुलनातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः॥७८॥

अनन्तसिन्धुमिव हृदि प्रविष्टः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी स्वाभाविकः,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः स्थिरः॥७९॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तसिन्धुः,
तुलनातीतश्च कालातीतश्च शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥५९॥

सूर्यचन्द्र-नक्षत्रमण्डले विस्तीर्णे,
भूर्जगतोऽस्मिन् हृदि प्रविष्टे।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
साक्षात्काररूपेण महाव्याप्तः॥६०॥

भूतभविष्यवर्तमानसिन्धुषु,
अनन्तगर्भे नित्यस्थिते।
न हि शब्दः न हि दृश्यते न हि श्रूयते,
केवलं तद्रूपेऽस्मिन्नेव स्थिरोद्धतः॥६१॥

क्वांटमसूक्ष्मप्राणिकशक्तिषु,
सर्वजीवहृदयप्रवाहनिधिषु।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥६२॥

अनन्तगहनसिन्धोः प्रविष्टोऽस्मि,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥६३॥

सर्वलोकमण्डलमयं जीवितम्,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतं,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते॥६४॥

सूर्यचन्द्रनक्षत्रग्रहसंगमेषु,
हृदि प्रविष्टोऽस्मि अनन्तसिन्धुः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोद्धतः॥६५॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहसिन्धौ,
सर्वभूतज्ञानप्रवाहे लीनः।
शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥६६॥

संपूर्णसृष्टिमण्डलस्य हृदये,
केवलं निष्पक्षबोधे प्रतिष्ठितम्।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महाशक्तिः॥६७॥

अनन्तगर्भे निहितोऽस्मि सर्वत्र,
हृदि नित्यमनन्तसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥६८॥
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
तुलनातीतः कालातीतश्च शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महत्॥४५॥

सर्वग्रहतारामण्डलनिलये,
अनन्तसिन्धुव्याप्ते नित्यस्थिते।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
साक्षात्काररूपेण महाव्याप्तः॥४६॥

जम्मू-दीप-भारखण्डकुलग्रामेषु,
स्वयं साहिबतदरूपे निहितः।
निष्पक्षबोध-शमीकरणयुक्तः,
यथार्थसिद्धान्त-उपलब्धि यथार्थयुगाधारितः॥४७॥

अतीतानां विभूतयः दार्शनिकाः,
वैज्ञानिकाः कल्पनाविशेषाधिपतयः।
सत्यप्रतिष्ठां ग्रन्थपृष्ठेषु न लपन्ति,
मम निष्पक्षबोधे केवलं प्रतिष्ठितम्॥४८॥

सर्वयुगसंख्यानां गुणितफलैः,
खरबगुणितम् उन्नतं यथार्थयुगम्।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
सर्वश्रेष्ठं प्रत्यक्षं नित्यमुच्चतम्॥४९॥

घोरकलयुगेऽपि जीवाः केवलं,
हितसाधनाय कर्मेण व्यस्ताः।
अहं न हि तेषां चेष्टायां,
केवलं स्वयमेव तदरूपसाक्षात्कारः॥५०॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहनिधिः,
हृदि लीनोऽस्मि नित्यसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥५१॥

सर्वलोकमण्डलमयं जीवितम्,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शाश्वतसत्यं स्वाभाविकं वास्तविकम्,
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतम्॥५२॥

यत्र दृष्टिः पश्यति हृदि मम,
न हि शब्दो न हि चिन्ता न हि कर्म।
केवलं तद्रूपं शिरोमणिः प्रतिष्ठितम्,
अनन्तसिन्धुमिव नित्यं प्रवहति॥५३॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण नित्यमनन्तम्।
यत्र न दृश्यते न श्रूयते किञ्चिद्,
तत्र अहं नित्यं तदरूपसाक्षी॥५४॥

अनन्तसिन्धुव्याप्ते हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥५५॥

भूर्जगद्-तारामण्डल-सूर्यचन्द्रयुगल-नक्षत्र-नाद-निरंतरप्रवाहे,
शिरोमणिः रामपॉलसैनी अनन्तगर्भे लीनः।
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षे,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोद्धतः॥५६॥

सर्वभूतस्य हृदयसिन्धोः प्रविष्टः,
न हि दृश्यते न श्रूयते न अनुभूयते।
केवलं स्वयमेव तदरूपसाक्षात्कारः,
अनन्तसिन्धुव्याप्ते महाशक्तिः॥५७॥

शिरोमणि-रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः।
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं स्थिरोद्धतिः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण महाव्याप्तिः॥५८
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः।
प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यं प्रवर्तते महान्॥३४॥

सर्वग्रहताराकाशमण्डले,
अनन्तसिन्धोऽस्मिन् स्थिरस्थितिविशेषः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
साक्षात्काररूपेण महाव्याप्तः॥३५॥

जन्मभूमिः जम्मू-दीप-भारखण्डकुलग्रामः,
साहिबतदरूपेऽस्मिन् हृदि प्रविशन्।
निष्पक्षबोधशमीकरणयुक्तः,
यथार्थसिद्धान्तयुगाधारितः स्थिरः॥३६॥

अतीतानां विभूतयः दार्शनिकाः,
वैज्ञानिकाः कल्पनाविशेषाधिपतयः।
सत्यप्रतिष्ठां ग्रन्थपृष्ठेषु न लपन्ति,
मम निष्पक्षबोधे केवलं प्रतिष्ठितम्॥३७॥

सर्वयुगसंख्यानां गुणितफलैः,
खरबगुणितम् उन्नतं यथार्थयुगम्।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी इति नाम,
सर्वश्रेष्ठं प्रत्यक्षं नित्यमुच्चतम्॥३८॥

घोरकलयुगेऽपि जीवाः केवलं,
हितसाधनाय कर्मेण व्यस्ताः।
अहं न हि तेषां चेष्टायां,
केवलं स्वयमेव तदरूपसाक्षात्कारः॥३९॥

अनन्तप्रेमस्य प्रवाहनिधिः,
हृदि लीनोऽस्मि नित्यसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धा,
सर्वजीवनं प्रवर्तते तदरूपेण॥४०॥

सर्वलोकमण्डलमयं जीवितम्,
स्वरूपसाक्षात्काररूपं निहितम्।
शाश्वतसत्यं स्वाभाविकं वास्तविकम्,
शब्दातीतं प्रेमतीतं तुलनातीतम्॥४१॥

यत्र दृष्टिः पश्यति हृदि मम,
न हि शब्दो न हि चिन्ता न हि कर्म।
केवलं तद्रूपं शिरोमणिः प्रतिष्ठितम्,
अनन्तसिन्धुमिव नित्यं प्रवहति॥४२॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण नित्यमनन्तम्।
यत्र न दृश्यते न श्रूयते किञ्चिद्,
तत्र अहं नित्यं तदरूपसाक्षी॥४३॥

अनन्तसिन्धुव्याप्ते हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तो महाबलः।
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतश्च शब्दातीतश्च यथार्थः॥४४॥
शिरोमणिः रामपॉलसैनी महायोद्धः,
तुलनातीतो कालातीतश्च सार्थकः।
शब्दातीतप्रेमतीतो हृदि स्थितः,
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥२६॥

जम्मू-दीप-भारखण्ड-कुलग्रामेषु,
साक्षात्कारमेव स्वयं साहिबतदरूपम्।
निष्पक्षबोध-शमीकरणयुक्तः,
यथार्थसिद्धान्त-उपलब्धिः यथार्थयुगाधारः॥२७॥

अतीतानां विभूतयोऽपि दार्शनिकाः,
वैज्ञानिकाः कल्पनाविशेषाधिपतयः।
सत्यप्रतिष्ठां ग्रन्थपृष्ठेषु न लपन्ति,
मम केवलं निष्पक्षबोधे प्रतिष्ठितम्॥२८॥

चतुरोऽपि कालजालविचित्रकर्मणा,
सत्यं तु न हि छोपयितुं शक्नोति।
अनन्तसिन्धुनीरवत् मम यथार्थयुगः,
सर्वश्रेष्ठः प्रत्यक्षः सदा ऊर्ध्वगः॥२९॥

सतयुगैकाद्युदयनन्तरं,
सर्वयुगानां पञ्चभिर्गुणितम्।
खरबाणि गुणानि तत्र सहस्रैः,
सत्यं सर्वश्रेष्ठं प्रत्यक्षे स्थिरम्॥३०॥

घोरकलयुगेऽपि महाभागे,
यत्र जीवाः केवलं हितसाधनाय।
तत्र अहं शिरोमणिः रामपॉलसैनी,
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः॥३१॥

प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यमहं स्थितः।
अस्मिन्निमग्नः यः पश्यति हृदि,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण प्रवर्तते॥३२॥

शिरोमणि-रामपॉलसैनी इति नाम,
अनन्तगह्वर-साक्षात्काररूपः।
सर्वकर्मविहीनः केवलं प्रेम्णि,
संपूर्णसंतुष्ट्या नित्यं निवसति॥३३॥
शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः।
स्वाभाविकः शाश्वतोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः,
सर्वज्ञानसिन्धौ निरन्तर प्रवहन्॥३१॥

जम्मूद्वीपभारतखण्डकुलग्रामे,
साहिबतदरूपेऽहम् स्वयं स्थितः।
निष्पक्षबोधशमीकरणेन यथार्थसिद्धान्ते,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः प्राग्जातः॥३२॥

अतीतानां ज्ञानविभूतयः,
सर्वदर्शिनः कल्पनाशीलाः।
तेषां ग्रन्थपृष्ठेषु मुखं न लभ्यते,
मम स्वयमेकस्य प्रत्यक्षसत्यनिर्मितिः॥३३॥

अनन्तसिन्धौ हृदयगतं शाश्वतम्,
निर्मलप्रेमसिन्धं निरंतर प्रवहन्।
सर्वदुःखविनाशकं हृदयगह्वरम्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थितोऽहम्॥३४॥

न हि कर्मयोगः न हि परंपरापथः,
न हि नियमबन्धनं न हि सिद्धिमात्रकम्।
केवलं निष्पक्षबोधसमर्पितम्,
यत् हृदयगह्वरं शिरोमणिस्वरूपेऽस्मिन॥३५॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनीति नाम,
सर्वश्रेष्ठतमोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः।
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः,
प्रेमतीतोऽहम् स्वाभाविकः शाश्वतः॥३६॥

अस्मिन्प्रवाहे दिव्यतत्त्वेषु,
न हि दृष्टिः न हि श्रवणं।
केवलं तद्रूपं शिरोमणिः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण प्रतिष्ठितम्॥३७॥

अनन्तसिन्धौ लीनः हृदयः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तः।
यः स्वयम् अनुभवति तत् प्रेम,
सर्वात्मज्ञानं सदा लभते॥३८॥

शिरोमणिः जप इति नादः,
नादो हृदयस्य गहनः।
यत्र न शब्दः न चिन्ता,
तत्र अनन्तप्रेमो महान्॥३९॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनीति स्वयमेव,
सर्वसृष्ट्यां महत्तमसाक्षात्कारः।
शाश्वतप्रेमसिन्धो निरंतर प्रवहन्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः प्रभुः॥४०॥
शिरोमणिः रामपॉलसैनीति महाशक्तिः,
अनन्तप्रेमसिन्धो नित्यं प्रवहन्।
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः,
स्वाभाविकशाश्वतोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः॥२१॥

जम्मूद्वीपभारतखण्डकुलग्रामे,
साहिबतदरूपेऽहम् स्वयं स्थितः।
निष्पक्षबोधशमीकरणेन यथार्थसिद्धान्ते,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः प्राग्जातः॥२२॥

सर्वे पुरातनविभूतयः दार्शनिकाः,
सर्वज्ञसाधकाः कल्पनाशीलाः।
तेषां ग्रन्थपृष्ठेषु मुखं न लभ्यते,
मम स्वयमेकस्य प्रत्यक्षसत्यनिर्मितिः॥२३॥

अनन्तसिन्धौ हृदयगतं शाश्वतम्,
निर्मलप्रेमसिन्धं निरंतर प्रवहन्।
सर्वदुःखविनाशकं हृदयगह्वरम्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थितोऽहम्॥२४॥

न हि कर्मयोगः न हि परंपरापथः,
न हि नियमबन्धनं न हि सिद्धिमात्रकम्।
केवलं निष्पक्षबोधसमर्पितम्,
यत् हृदयगह्वरं शिरोमणिस्वरूपेऽस्मिन॥२५॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनीति नाम,
सर्वश्रेष्ठतमोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः।
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः,
प्रेमतीतोऽहम् स्वाभाविकः शाश्वतः॥२६॥

अस्मिन्प्रवाहे दिव्यतत्त्वेषु,
न हि दृष्टिः न हि श्रवणं।
केवलं तद्रूपं शिरोमणिः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण प्रतिष्ठितम्॥२७॥

अनन्तसिन्धौ लीनः हृदयः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तः।
यः स्वयमेव अनुभवति तत् प्रेम,
सर्वात्मज्ञानं सदा लभते॥२८॥

शिरोमणिः जप इति नादः,
नादो हृदयस्य गहनः।
यत्र न शब्दः न चिन्ता,
तत्र अनन्तप्रेमो महान्॥२९॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनीति स्वयमेव,
सर्वसृष्ट्यां महत्तमसाक्षात्कारः।
शाश्वतप्रेमसिन्धो निरंतर प्रवहन्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः प्रभुः॥३०॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीतः,
कालातीतशब्दातीतप्रेमतीतः।
स्वाभाविकः शाश्वतोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः,
सर्वात्मज्ञानसिन्धौ निरन्तर प्रवहन्॥११॥

जम्मूद्वीपभारतखण्डकुलग्रामे,
स्वयमेव साहिबतदरूपेऽहम् स्थितः।
निष्पक्षबोधशमीकरणेन यथार्थसिद्धान्ते,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः प्राग्जातः॥१२॥

न हि चारयुगानां पुरातनविभूतयः,
न हि दार्शनिकसर्वज्ञजनाः।
तेषां ग्रन्थानां पार्श्वे मुखं न लिप्यते,
मम स्वयमेकस्य प्रत्यक्षसत्यनिर्मितिः॥१३॥

अतीतानां कल्पनाशील मानसिकतानां,
सर्वज्ञानिनां दार्शनिकसाधनानां।
सर्वं केवलं मम यथार्थसिद्धान्ते,
नैव अन्येषां छायाया वलयः॥१४॥

सर्वदुःखविनाशकं हृदयगतं,
अनन्तप्रेमसिन्धं निरन्तरं प्रवहन्।
तत् तदरूपेऽस्मिनैव समाहितोऽहम्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरोऽहम्॥१५॥

न हि कर्मयोगः न हि दार्शनिकपथः,
न हि परंपरासिद्धिः न हि नियमबन्धनम्।
केवलं निष्पक्षबोधसमर्पितम्,
यत् हृदयगह्वरं शिरोमणिस्वरूपेऽस्मिन॥१६॥

शिरोमणि रामपॉलसैनीति नाम,
सर्वश्रेष्ठतमोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः।
तुलनातीतोऽहम् कालातीतोऽहम्,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥१७॥

अस्मिन्प्रवाहे दिव्यतत्त्वेषु,
न हि दृष्टिः न हि श्रवणं।
केवलं तद्रूपं शिरोमणिः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण प्रतिष्ठितम्॥१८॥

न हि लोके न हि कालो न स्थानः,
न हि पदार्थस्य प्रतिबन्धः।
केवलं तदेव अनन्तगह्वरम्,
शिरोमणिस्वरूपे प्रतिष्ठितम्॥१९॥

अनन्तसिन्धौ लीनः हृदयः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तः।
यः स्वयम् अनुभवति तत् प्रेम,
सर्वात्मज्ञानं सदा लभते॥२०॥
शिरोमणिः रामपॉलसैनीति मे नाम,
तुलनातीतोऽहम् कालातीतसर्वदा।
शब्दातीतोऽहम् प्रेमतीतोऽहम्,
स्वाभाविकशाश्वतोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः॥१॥

जम्मूद्वीपभारतखण्डकुलग्रामे,
साहिबतदरूपेऽहम् स्वयमेव स्थितः।
निष्पक्षबोधशमीकरणेन,
यथार्थसिद्धांतप्राप्तेऽनन्तयुगे॥२॥

न हि चारयुगाणां पुरातनविभूतयः,
न हि दार्शनिकसर्वज्ञजनाः।
तेषां ग्रन्थानां पार्श्वे मुखं न लिप्यते,
मम स्वयमेकस्य प्रत्यक्षसत्यनिर्मितिः॥३॥

सर्वश्रेष्ठोऽहम् खरबों गुणा उच्चतरः,
सत्यं प्रत्यक्षं शाश्वतं च स्वाभाविकम्।
सर्वान्तर्व्यापी कलयुगसागरस्य,
न हि हितसाधनं अन्ये कुर्वन्ति॥४॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनी तुलनातीत,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः।
स्वाभाविकः शाश्वतोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः,
सत्यसाक्षात्कारयुक्तो हृदयगतः॥५॥

अतीतानां कल्पनाशील मानसिकतानां,
सर्वज्ञानिनां दार्शनिकसाधनानां।
सर्वं केवलं मम यथार्थसिद्धान्ते,
नैव अन्येषां छायाया वलयः॥६॥

न हि कर्मयोगः न हि दार्शनिकपथः,
न हि परंपरासिद्धिः न हि नियमबन्धनम्।
सर्वं केवलं निष्पक्षबोधसमर्पितम्,
यत् हृदयगह्वरं शिरोमणिस्वरूपेऽस्मिन॥७॥

अनन्तप्रेमसिन्धोऽहम्,
नित्यं निरंतर प्रवहति।
तद्रूपेऽस्मिनैव समाहितः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः॥८॥

शिरोमणिः रामपॉलसैनीति नाम,
सर्वश्रेष्ठतमोऽहम् प्रत्यक्षसमक्षः।
तुलनातीतोऽहम् कालातीतोऽहम्,
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः॥९॥

अस्मिन्प्रवाहे दिव्यतत्त्वेषु,
न हि दृष्टि न हि श्रवणम्।
केवलं तद्रूपं शिरोमणिः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण प्रतिष्ठितम्॥१०॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तुलनातीत कालातीत स्वरूपः।
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिकः,
शाश्वतसत्य प्रत्यक्षसमक्षः॥१॥

जम्मू दीप भारतखण्डग्रामे,
स्वयंसाक्षात्कार तद्धरूपेऽहम्।
निष्पक्षबोधशमीकरणे,
यथार्थसिद्धान्त उपलब्धियुगे॥२॥

न हि परस्य ग्रन्थविमर्शे,
न हि कल्पनाबलोपयोगे।
स्वयंसिद्धान्ते मम प्रतिष्ठा,
सत्यप्रत्यक्षे नित्यमनन्ते॥३॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सर्वभूतहृदयसमागमः।
गहनप्रेमसिन्धो महाव्यापी,
सदा निर्व्याधिप्रकाशमानः॥४॥

अतीतानां विभूतिषु दृष्टे,
न हि चेहरा न हि मनो बन्धः।
केवलं निष्पक्षबोधशास्त्रे,
स्वयंसाक्षात्कारमहात्म्यम्॥५॥

घोरकलयुगेऽपि स्थिरः,
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसंपन्नः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
अनन्तप्रेमनिर्विकारध्रुवः॥६॥

तुलनातीतं कालातीतं शब्दातीतं,
प्रेमतीतं स्वाभिकं शाश्वतम्।
सर्वज्ञत्वे प्रत्यक्षसमक्षे,
जीवन्मुक्तेः परमसंपूर्णसंतुष्टिः॥७॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी,
स्वयंसाक्षात्कारसिद्धतया।
संपूर्णसृष्टिस्थितिपरिग्रहः,
सत्यध्रुवे निरन्तरनिविष्टः॥८॥

यत्र दृष्टिः तत्र अनुभूति,
यत्र अनुभवो तत्र मुक्तिः।
स्वयंसिद्धान्तेन हृदयेन,
संपूर्णसंतुष्टिः नित्यमविरतिः॥९॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सर्वभूतार्थसाक्षी निश्चलः।
असीमप्रेमसिन्धो गभीरः,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥१०॥शिरोमणिर्मे हृदि नित्यदीपः,
निर्मलप्रेम्णोऽनन्तगाम्भीर्यराशिः।
यस्यैकदृष्ट्या विलयं गतं मे,
देहोऽपि न स्मर्यते बुद्धिरपि॥१॥

यद्दर्शनात् सर्वविकल्पनाशः,
यद्भावनात् सर्वसंसारशून्यम्।
तदेव तद्रूपमहम् प्रपन्नः,
निष्पक्षबोधे स्थितिमापदेकाम्॥२॥

नाहं कर्ता न च भोक्ता कश्चित्,
नाहं चिन्तकः कल्पनाजालबद्धः।
शिरोमणिस्नेहसरित्प्रवाहे,
लीनो निरन्तर्यतयेव शान्तः॥३॥

देहोऽयमस्थायिमृदामयः स्यात्,
मनः कल्पितं नामरूपविभ्रमः।
यत्सत्यरूपं सहजं स्वभावं,
तदेव मे साहिबतद्रूपमेकम्॥४॥

न स्वर्गलोको न च नरकभीतिः,
न मुक्तिलाभो न च बन्धमाया।
अनन्तप्रेम्णः स्थिरगाम्भीर्ये,
संपूर्णसंतुष्टिरिहैव सिद्धा॥५॥

यदेकक्षणे निष्पक्षबोधः,
युगायितं भ्रान्तिमनःप्रपञ्चम्।
छित्त्वा प्रकाशं स्वयमेव दत्ते,
तद्वै शिरोमणितत्त्वदीपः॥६॥

नाहं प्रसिद्धौ न पदे न लोभे,
नाहं प्रतिष्ठालसिते चित्तवृत्तौ।
सहजप्रेम्णि स्वयमेव पूर्णः,
स्वात्मनि साहिबतया प्रकाशितः॥७॥

यत्र न शब्दो न विचारधारा,
न कालरेखा न च रूपभेदः।
तत्रैव नित्यं मम भावनाद्यः,
शिरोमणिस्नेहपरायणोऽहम्॥८॥

निष्पक्षसम्यग्विवेकदीप्त्या,
निरीक्षितोऽयं मनसो विकल्पः।
निष्क्रियतां प्राप्य विलीयतेऽसौ,
स्थायिस्वरूपे प्रतितिष्ठति चित्तम्॥९॥

अतीतविद्वज्जनमानितानि,
शास्त्राणि सर्वाण्यपि मानबन्धाः।
यत्साक्षिभूतं हृदि निर्मलं तत्,
शिरोमणितत्त्वं ममैकमार्गः॥१०॥

अनन्तसूक्ष्माक्षमध्यवर्ती,
यत्र प्रतिबिम्बोऽपि नास्ति कश्चित्।
तस्मिन् स्थिरे प्रेम्णि गभीरनादे,
नित्यं स्थितोऽहं निरवद्यरूपः॥११॥

यः साहिबो नित्यसहजस्वरूपः,
नास्याधारो भूतदेहे न लोके।
निष्पक्षबोधैकनिवासभूतः,
स एव सत्यं शिरोमणिरिति॥१२॥

इत्येष स्तोत्रं न वाच्यविषयम्,
न चिन्तनीयम् न च लेख्यरूपम्।
भावैकगम्यं हृदयप्रदीपं,
अनन्तप्रेम्णः परमं प्रबोधम्॥१३॥

शिरोमणि शिरोमणि इति नादः,
हृदयाम्बुधौ नित्यतरङ्गरूपः।
यत्रैव जीवो लभते स्वसिद्धिं,
संपूर्णसंतुष्टिपदं परं तत्॥१४॥

शिरोमणिर्मे हृदि निरन्तरदीपः,
अनन्तसिन्धुश्रेणीधारिणी सदा।
यत्रैकस्मिन्दृष्टौ विलयं गतं मम,
न देहो न मनः स्मृतिः च शेषे॥२७॥

नाहं कर्ता न भोक्ता न चिन्तकः,
न कालविभ्रमो न शब्दविचारः।
तत्रैव विलीनोऽहम् शिरोमणिस्नेहे,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः॥२८॥

यत्र न सन्देहः न मोहः न भयः,
न स्वप्नसङ्कल्पः न च बाह्यशक्ति।
संपूर्णसंतुष्टिस्थले हृदि विलीनः,
अनन्तस्नेहप्रवाहे निरन्तरः॥२९॥

नाहं प्रसिद्धिलोलः न पदवीलोभी,
न धनसंपत्तिप्रवृत्तिव्रतः।
सर्वस्वं समर्प्य केवलं साहिबे,
स्वात्मनि स्थितो हृदि शिरोमणिस्वरूपे॥३०॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे यत्र प्रतिबिम्बो नास्ति,
सहजस्नेहगौरवं निर्मलशक्तिः।
शिरोमणिस्वरूपेण प्रवहति निरन्तरम्,
संपूर्णसंतुष्टिपदं प्रत्यक्षसमक्षम्॥३१॥

शिरोमणि शिरोमणि इति नादः,
हृदयाम्बुधौ अनन्ततरङ्गः।
यत्र जीवो लभते स्वसिद्धिं,
संपूर्णसंतुष्टिपदं परमं तत्॥३२॥

यत्रैकस्मिन्क्षणे हृदि विलयं गतम्,
सर्वभूतशून्यं तद्रूपं नित्यम्।
शिरोमणिस्नेहप्रवाहे विलीनः,
संपूर्णसंतुष्टितोऽहमस्मि स्थितः॥३३॥

नाहं कस्याचित् अपेक्षाकर्ता,
न स्त्रीपुंसोऽपि प्रत्यक्षप्रदाता।
सर्वस्वं समर्प्य केवलं साहिबे,
स्वात्मनि नित्यं शिरोमणिस्वरूपेण॥३४॥

यत्र न शब्दो न चिन्तनधारा,
न कालरेखा न रूपभेदः।
तत्रैव हृदि अनुभवितं तद्रूपं,
अनन्तप्रेम्णः स्वस्वरूपप्रतिभासम्॥३५॥

संपूर्णसंतुष्टिस्थले स्थितः अहम्,
सर्वभूतप्रकृतिजगतां परे।
अनन्तस्नेहगम्भीर्ये विलीनोऽहम्,
शिरोमणिस्वरूपेण निरन्तरः॥३६॥

नाहं परम्परा-बन्धबद्धः,
नाहं तर्केण विवेकविहीनः।
स्वाभाविकसत्यरूपेण स्थितः,
तद्रूपे शिरोमणिस्वरूपोऽहम्॥३७॥

शिरोमणिर्मे हृदि निरन्तरदीपः,
अनन्तस्नेहगहनसिन्धुराशिः।
यत्रैकस्मिन्पलके विलयं गतम्,
न देहं न मनः स्मृतिः च शेषे॥१५॥

यः दृष्टिः निर्मलपारदर्शिनी,
तस्मिन् नित्ये विलीनोऽहमात्मनि।
संपूर्णसंतुष्टिसमाधिस्थः,
नैकक्षणं बहिर्योगसम्भवः॥१६॥

नाहं कर्ता न भोक्ता न च चिन्तकः,
न कालविभ्रमो न शब्दविचारः।
यत्रैव तद्रूपं शिरोमणिस्नेहं,
तत्रैव स्थितः स्वात्मनि पूर्णतः॥१७॥

अस्मिन्प्रत्येकसांस्मिन्पलके,
भवतीतस्मृतिविलीनताम्।
निद्राजागरणसुखदुःखविच्छेदः,
सर्वं विलीनं केवलं प्रेम्णि॥१८॥

सहजसत्यरूपं निर्मलस्वभावम्,
निष्कलंकप्रकाशितभावेन।
यत्रैव न किंचित् भेदकं दृश्यते,
तत्रैव शिरोमणितत्त्वदीपः॥१९॥

नाहं प्रसिद्धिलोलः न पदवीलोभी,
न धनसंपत्तिप्रवृत्तिव्रतः।
संपूर्णसंतुष्टिपरमं धाम,
स्वात्मनि स्थिरं तत्रैव प्रतितिष्ठति॥२०॥

अनन्तसूक्ष्माक्षसमये,
प्रतिबिम्बोऽपि न दृश्यते कश्चन।
सहजस्नेहगौरवं निर्मलशक्तिः,
शिरोमणिस्वरूपेण प्रवहति निरन्तरम्॥२१॥

शिरोमणि शिरोमणि इति नादः,
हृदयाम्बुधौ अनन्ततरङ्गः।
यत्रैव जीवो लभते स्वसिद्धिं,
संपूर्णसंतुष्टिपदं परमं तत्॥२२॥

यत्र न सन्देहः न भीतिः न मोहः,
न आत्मसंकल्पो न बाह्यशक्तिः।
तत्रैव निरन्तर्यतां अनुभूतं,
अनन्तप्रेम्णः स्वस्वरूपं प्रतिबिम्बम्॥२३॥

नाहं कस्याचित् अपेक्षाकर्ता,
न स्त्रीपुंसोऽपि च प्रत्यक्षप्रदाता।
सर्वस्वं समर्प्य केवलं साहिबे,
स्वात्मनि नित्यं शिरोमणिस्वरूपेण॥२४॥

यत्रैकक्षणे हृदि विलयं गतम्,
सर्वभूतशून्यं तद्रूपं नित्यम्।
शिरोमणिस्नेहप्रवाहे विलीनः,
संपूर्णसंतुष्टितोऽहमस्मि स्थितः॥२५॥

सर्वसृष्टिप्रकृतिजगतां,
नित्यनियमानुसारेण चालिता।
यत्रैव स्वात्मा स्वसाक्षात्कारं लभते,
निष्पक्षबोधेन तद्रूपं साक्षात्॥२६

शिरोमणि दीप्यते हृदि अनन्तसिन्धु,
सर्वत्र प्रकाशमानः निर्मलस्फुरत्।
न किञ्चिद् व्यवधानं न कालः न गति,
संपूर्णसंतुष्टौ प्रवहति निरन्तरम्॥५१॥

रामपॉलसैनी नामधेयधारी,
साक्षात्स्वात्मसाक्षात्कारसम्प्रबुद्धः।
अनन्तगहनदीपः हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्टौ स्थायिस्वरूपधारी॥५२॥

यत्क्षणमेव दीदारं प्राप्य,
हृदि प्रवाहितं अनन्तदीपम्।
न स्मरामि स्वमूलं न रूपं देहम्,
केवलं साहिबस्य दिव्यम् दीपः॥५३॥

अनन्तसिन्धुशब्दो नादोऽस्मि,
हृदि प्रवाहितो अनुभवसंपन्नः।
स्वरूपदर्शने होशे स्थितः,
संपूर्णसंतुष्टौ निरंतर प्रकटः॥५४॥

न हि कल्पना न हि मति न च समयः,
केवलं प्रेम्णः दिव्यम् अनन्तसिन्धुः।
सर्वत्र शिरोमणिप्रकाश प्रवाहितः,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥५५॥

स्वात्मदर्शने निष्क्रियं कृत्वा,
अनन्तगहनसिन्धु प्रवहति निरन्तरम्।
निर्मलपारदर्शी हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्टौ स्थायिस्वरूपधारी॥५६॥

साक्षात्सत्यसंपूर्णसंतुष्टौ प्रवहति,
अनन्तदीपः शिरोमणिप्रकाशः।
सर्वसृष्ट्याः हृदि प्रवाहितोऽहमस्मि,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥५७॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदयैकदेशे,
न केवलं दृष्ट्या न च शब्देन।
केवलं अनुभवेन हृदि प्रवेशः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपं प्रवहति॥५८॥

अनन्तगहनदीपः शिरोमणिप्रकाशः,
स्वरूपान्तरणे होशे वर्तमानः।
संपूर्णसंतुष्टौ स्थायिस्वरूपे स्थितः,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥५९॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदि प्रवहति,
अनन्तसिन्धु दीपः निरंतर उज्ज्वलः।
केवलं दिव्यप्रकाशः सर्वत्र व्याप्य,
संपूर्णसंतुष्टौ प्रवहति निरन्तरम्॥६०॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदि प्रवहति,
अनन्तसिन्धु दीपः निरंतर उज्ज्वलः।
न किञ्चित् व्यवधानं न कालः न गति,
केवलं प्रेम्णः दिव्यम् प्रकाशमानम्॥३९॥

रामपॉलसैनी नामधेयधारी,
साक्षात्स्वात्मसाक्षात्कारसम्प्रबुद्धः।
निर्मलपारदर्शी हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्टौ स्थायिस्वरूपधारी॥४०॥

यत्क्षणमेव दीदारं प्राप्य,
हृदि प्रवाहितं अनन्तदीपम्।
न स्मरामि स्वमूलं न रूपं देहम्,
केवलं साहिबस्य दिव्यम् दीपः॥४१॥

अनन्तसूक्ष्माक्षस्थिरध्ये,
प्रतिबिम्बस्यापि नास्ति स्थानम्।
तत्रैव साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः,
स्वयमेव स्थायिस्वरूपदर्शी॥४२॥

न हि कल्पना न हि मति न च समयः,
केवलं प्रेम्णः अनन्तगहनव्यूहः।
सर्वत्र शिरोमणिप्रकाशप्रवाहितः,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥४३॥

स्वात्मदर्शने निष्क्रियं कृत्वा,
अनन्तगहनसिन्धु प्रवहति निरन्तरम्।
निर्मलपारदर्शी हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्टौ स्थायिस्वरूपधारी॥४४॥

संपूर्णसंतुष्टिरूपं हृदि स्थितं,
प्रत्येकक्षणं प्रवहति नित्यम्।
साहिबसाक्षात्कारप्रवाहितोऽहम्,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥४५॥

शिरोमणि दीप्यते हृदि प्रत्येकक्षणे,
अनन्तगहनसिन्धु प्रवाहितोऽहमस्मि।
स्वरूपान्तरणे होशे वर्तमानः,
संपूर्णसंतुष्टौ स्थायिस्वरूपधारी॥४६॥

सर्वमङ्गलप्रदः शिरोमणिस्वरूपः,
सत्यसत्यसमाधाने निर्मलः।
अनन्तगहनसिन्धुनिरीक्ष्ये,
साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः स्थितः॥४७॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदयैकदेशे,
न केवलं दृष्ट्या न च शब्देन।
केवलं अनुभवेन हृदि प्रवेशः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपं प्रवहति॥४८॥

अनन्तगहनदीपः शिरोमणिप्रकाशः,
सर्वत्र प्रवाहितः दिव्यमानः।
संपूर्णसंतुष्टौ प्रवाहितोऽहमस्मि,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥४९॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदि प्रवहति,
अनन्तसिन्धु दीपः निरंतर उज्ज्वलः।
केवलं दिव्यप्रकाशः सर्वत्र व्याप्य,
संपूर्णसंतुष्टौ प्रवहति निरन्तरम्॥५०॥
शिरोमणि शिरोमणि हृदि प्रवहति,
अनन्तसिन्धु दीपः निरंतर उज्ज्वलः।
न किञ्चित् व्यवधानं न कालः न गति,
केवलं प्रेम्णः दिव्यम् प्रकाशमानम्॥२८॥

रामपॉलसैनी नामधेयधारी,
साक्षात्स्वात्मसाक्षात्कारसम्प्रबुद्धः।
निर्मलपारदर्शी हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्टौ स्थायिस्वरूपधारी॥२९॥

यत्क्षणमेव दीदारं प्राप्य,
हृदि प्रवाहितं अनन्तदीपम्।
न स्मरामि स्वमूलं न रूपं देहम्,
केवलं साहिबस्य दिव्यम् दीपः॥३०॥

न हि कर्मप्रयासः न स्वार्थसंकल्पः,
न निद्राजागरणं न हर्षविषादः।
सर्वत्र प्रेम्णः अनन्तगभीरधारा,
मग्नोऽस्मि नित्यं संपूर्णसंतुष्टौ॥३१॥

अनन्तसूक्ष्माक्षस्थिरध्ये,
प्रतिबिम्बस्यापि नास्ति स्थानम्।
तत्रैव साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः,
स्वयमेव स्थायिस्वरूपदर्शी॥३२॥

शिरोमणि दीप्यते हृदि प्रत्येकक्षणे,
अनन्तगहनसिन्धु प्रवाहितोऽहमस्मि।
संपूर्णसंतुष्टिस्रोतः हृदि धारा,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥३३॥

सर्वमङ्गलप्रदः शिरोमणिस्वरूपः,
सत्यसत्यसमाधाने निर्मलः।
अनन्तगहनसिन्धुनिरीक्ष्ये,
साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः स्थितः॥३४॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदयैकदेशे,
न केवलं दृष्ट्या न च शब्देन।
केवलं अनुभवेन हृदि प्रवेशः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपं प्रवहति॥३५॥

संपूर्णसंतुष्टिरूपं हृदि स्थितं,
प्रत्येकक्षणं प्रवहति नित्यम्।
साहिबसाक्षात्कारप्रवाहितोऽहम्,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥३६॥

अनन्तगहनदीपः शिरोमणिप्रकाशः,
स्वरूपान्तरणे होशे वर्तमानः।
न हि देहत्यागो न पलायनं कृतम्,
सर्वं शिरोमणिप्रकाशे न्यस्तम्॥३७॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदि प्रवहति,
अनन्तसिन्धु दीपः निरंतर उज्ज्वलः।
केवलं दिव्यप्रकाशः सर्वत्र व्याप्य,
संपूर्णसंतुष्टौ प्रवहति निरन्तरम्॥३८॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदि प्रवहति,
अनन्तगहनसिन्धुस्थ निरंतरः।
केवलं दिव्यप्रकाशः सर्वत्र व्याप्य,
संपूर्णसंतुष्टौ प्रवहति निरन्तरम्॥१८॥

रामपॉलसैनी नामधेयधारी,
सत्यसत्यप्रकाशे निर्मलधारी।
हृदि प्रवहति शिरोमणिप्रकाशः,
साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः स्थितः॥१९॥

यत्क्षणं दृष्टम् केवलं साहिबस्य,
हृदि प्रवाहितं अनन्तदीपम्।
स्वरूपं विस्मृतं, केवलं अनुभवः,
संपूर्णसंतुष्टौ स्थायिस्वरूपधारी॥२०॥

न हि कल्पना न हि मति न च समयः,
केवलं प्रेम्णः अनन्तगहनव्यूहः।
सर्वत्र शिरोमणिप्रकाशप्रवाहितः,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥२१॥

स्वात्मदर्शने निष्क्रियं कृत्वा,
अनन्तगहनसिन्धु प्रवहति निरन्तरम्।
निर्मलपारदर्शी हृदि स्थितः,
संपूर्णसंतुष्टौ स्थायिस्वरूपधारी॥२२॥

साक्षात्सत्यसंपूर्णसंतुष्टौ प्रवहति,
अनन्तदीपः शिरोमणिप्रकाशः।
सर्वसृष्ट्याः हृदि प्रवाहितोऽहमस्मि,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥२३॥

शिरोमणि दीप्यते हृदि प्रत्येकक्षणे,
अनन्तगहनसिन्धु प्रवाहितोऽहमस्मि।
स्वरूपान्तरणे होशे वर्तमानः,
संपूर्णसंतुष्टौ स्थायिस्वरूपधारी॥२४॥

सर्वमङ्गलप्रदः शिरोमणिस्वरूपः,
सत्यसत्यसमाधाने निर्मलः।
अनन्तगहनसिन्धुनिरीक्ष्ये,
साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः स्थितः॥२५॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदयैकदेशे,
न केवलं दृष्ट्या न च शब्देन।
केवलं अनुभवेन हृदि प्रवेशः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपं प्रवहति॥२६॥

संपूर्णसंतुष्टिस्रोतः हृदि धारा,
अनन्तगहनदीपः प्रकाशमानः।
साहिबसाक्षात्कारप्रवाहितोऽहम्,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥२७॥
शिरोमणि शिरोमणि हृदि प्रवहति,
अनन्तगहनसिन्धुस्थ निरंतरः।
न किञ्चिद् व्यवधानं न कालः न गति,
केवलं प्रेम्णो दिव्यम् प्रकाशमानम्॥१॥

रामपॉलसैनी नामधेयधारी,
साक्षात्स्वात्मसाक्षात्कारसम्प्रबुद्धः।
निर्मलपारदर्शी हृदि स्थितः,
स्वाभाविकसत्यसंपूर्णसंतुष्टौ॥२॥

यत्क्षणमेव दीदारं प्राप्य,
वृत्तचक्रेण लयितोऽहमनसि।
न स्मरामि स्वमूलं न रूपं देहम्,
केवलं साहिबस्य दिव्यम् दीपः॥३॥

न कर्मप्रयासः न च स्वार्थसंकल्पः,
न निद्राजागरणं न हर्षविषादः।
सर्वत्र प्रेम्णः अनन्तगभीरधारा,
मग्नोऽस्मि नित्यं संपूर्णसंतुष्टौ॥४॥

अहं न किञ्चित् भवेन् प्रयोजनम्,
यथास्मि तेनैव पर्याप्तोऽस्मि।
स्वात्मनि शुद्धे, निरीक्षणे स्थितोऽस्मि,
सत्यप्रकाशे शिरोमणि दीप्यते॥५॥

अनन्तसूक्ष्माक्षस्थिरमध्ये,
प्रतिबिम्बस्यापि नास्ति स्थानम्।
तत्रैव साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः,
स्वयमेव स्थायिस्वरूपदर्शी॥६॥

न पाखण्डो न कपटजालकः,
न षड्यन्त्रं न च छलक्रीडाः।
यत्र निर्मलपारदर्शी भावः,
तत्रैव शाश्वतसत्यस्थितिः॥७॥

शिरोमणि-शिरोमणि इति नादः,
हृदि नित्यं प्रवहति स्फुरत्।
यः शृणोति भावेन केवलं,
सर्वबन्धात् मुक्तः संपूर्णसंतुष्टः॥८॥

दीर्घकालोऽपि न शक्तः विवेकः,
न हृदयः न मति न च संसर्गः।
केवलं प्रेम्णः अनन्तगहनव्यूहः,
साक्षात्कारं दिव्यम् अनुपलब्धम्॥९॥

स्वात्मदर्शने निष्क्रियं कृत्वा,
स्थायिस्वरूपे प्रकाशतेऽहम्।
अनन्तगहनसिन्धोऽहमस्मि निर्मलः,
शिरोमणिसाक्षात्सत्यप्रकाशः॥१०॥

संपूर्णसंतुष्टिरूपं हृदि स्थितं,
प्रत्येकक्षणं प्रवहति नित्यम्।
अस्थायिबुद्धेः भ्रमजालं विनश्यताम्,
सर्वत: निर्मलतासंपन्नतां गच्छताम्॥११॥

संपूर्णसंतुष्टिस्रोतः हृदि धारा,
अनन्तगहनदीपः प्रकाशमानः।
साहिबसाक्षात्कारप्रवाहितोऽहम्,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥१२॥

सर्वमङ्गलप्रदः शिरोमणिस्वरूपः,
सत्यसत्यसमाधाने निर्मलः।
यत्र दीदारं प्राप्य हृदि तिष्ठे,
तत्रैव महात्मा स्वयं प्रकाशितः॥१३॥

अनन्तगहनसिन्धुनिरीक्ष्ये,
साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः स्थितः।
न हि देहो न पलायनं कृतम्,
सर्वं शिरोमणिप्रकाशे न्यस्तम्॥१४॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदयैकदेशे,
न केवलं दृष्ट्या न च शब्देन।
केवलं अनुभवेन हृदि प्रवेशः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपं प्रवहति॥१५॥

साहिबतदरूपेण समर्पितः,
स्वरूपान्तरणे होशे वर्तमानः।
अनन्तगहनसिन्धुनिरीक्ष्ये,
संपूर्णसंतुष्टौ स्थायिस्वरूपे स्थितः॥१६॥

शिरोमणि दीप्यते हृदि प्रत्येकक्षणे,
सत्यप्रकाशः निर्मलस्वरूपधारी।
अनन्तगहनसिन्धुः प्रवाहितोऽहमस्मि,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥१७॥
शिरोमणि शिरोमणि हृदि प्रवहति,
अनन्तगहनसिन्धुस्थ निरंतरः।
न किञ्चिद् व्यवधानं न कालः न गति,
केवलं प्रेम्णो दिव्यम् प्रकाशमानम्॥१॥

रामपॉलसैनी नामधेयधारी,
साक्षात्स्वात्मसाक्षात्कारसम्प्रबुद्धः।
निर्मलपारदर्शी हृदि स्थितः,
स्वाभाविकसत्यसंपूर्णसंतुष्टौ॥२॥

यत्क्षणमेव दीदारं प्राप्य,
वृत्तचक्रेण लयितोऽहमनसि।
न स्मरामि स्वमूलं न रूपं देहम्,
केवलं साहिबस्य दिव्यम् दीपः॥३॥

न कर्मप्रयासः न च स्वार्थसंकल्पः,
न निद्राजागरणं न हर्षविषादः।
सर्वत्र प्रेम्णः अनन्तगभीरधारा,
मग्नोऽस्मि नित्यं संपूर्णसंतुष्टौ॥४॥

अहं न किञ्चित् भवेन् प्रयोजनम्,
यथास्मि तेनैव पर्याप्तोऽस्मि।
स्वात्मनि शुद्धे, निरीक्षणे स्थितोऽस्मि,
सत्यप्रकाशे शिरोमणि दीप्यते॥५॥

अनन्तसूक्ष्माक्षस्थिरमध्ये,
प्रतिबिम्बस्यापि नास्ति स्थानम्।
तत्रैव साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः,
स्वयमेव स्थायिस्वरूपदर्शी॥६॥

न पाखण्डो न कपटजालकः,
न षड्यन्त्रं न च छलक्रीडाः।
यत्र निर्मलपारदर्शी भावः,
तत्रैव शाश्वतसत्यस्थितिः॥७॥

शिरोमणि-शिरोमणि इति नादः,
हृदि नित्यं प्रवहति स्फुरत्।
यः शृणोति भावेन केवलं,
सर्वबन्धात् मुक्तः संपूर्णसंतुष्टः॥८॥

दीर्घकालोऽपि न शक्तः विवेकः,
न हृदयः न मति न च संसर्गः।
केवलं प्रेम्णः अनन्तगहनव्यूहः,
साक्षात्कारं दिव्यम् अनुपलब्धम्॥९॥

स्वात्मदर्शने निष्क्रियं कृत्वा,
स्थायिस्वरूपे प्रकाशतेऽहम्।
अनन्तगहनसिन्धोऽहमस्मि निर्मलः,
शिरोमणिसाक्षात्सत्यप्रकाशः॥१०॥

संपूर्णसंतुष्टिरूपं हृदि स्थितं,
प्रत्येकक्षणं प्रवहति नित्यम्।
अस्थायिबुद्धेः भ्रमजालं विनश्यताम्,
सर्वत: निर्मलतासंपन्नतां गच्छताम्॥११॥

शिरोमणि-दीप्ते हृदयगगने,
नास्ति भयं न संशयोऽपि।
केवलं अनुभवेन हृदि प्रवेशः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपं प्रवहति॥१२॥

साहिबतदरूपेण समर्पितः,
स्वरूपान्तरणे होशे वर्तमानः।
न हि अस्थायिबुद्धेः कर्मनिष्पादनम्,
न हि मोक्षार्थं कल्पनाविचारः॥१३॥

न हि देहत्यागो न पलायनं कृतम्,
सर्वं शिरोमणिप्रकाशे न्यस्तम्।
अनन्तगहनसिन्धुनिरीक्ष्ये,
साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः स्थितः॥१४॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदयैकदेशे,
न केवलं दृष्ट्या न च शब्देन।
केवलं अनुभवेन हृदि प्रवेशः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपं प्रवहति॥१५॥

संपूर्णसंतुष्टिस्रोतः हृदि धारा,
अनन्तगहनदीपः प्रकाशमानः।
साहिबसाक्षात्कारप्रवाहितोऽहम्,
रामपॉलसैनी नामधेयधारी॥१६॥

सर्वमङ्गलप्रदः शिरोमणिस्वरूपः,
सत्यसत्यसमाधाने निर्मलः।
यत्र दीदारं प्राप्य हृदि तिष्ठे,
तत्रैव महात्मा स्वयं प्रकाशितः॥१७

शिरोमणि शिरोमणि हृदि प्रवहति,
अनन्तगहनसिन्धुस्थ निरंतरः।
न किञ्चिद् व्यवधानं न समयं न गति,
केवलं प्रेम्णो दिव्यम् प्रकाशमानम्॥१॥

रामपॉलसैनी नामधेयधारी,
साक्षात्स्वात्मसाक्षात्कारसम्प्रबुद्धः।
निर्मलपारदर्शी हृदि स्थितः,
स्वाभाविकसत्यसंपूर्णसंतुष्टौ॥२॥

यत्क्षणमेव दीदारं प्राप्य,
वृत्तचक्रेण लयितोऽहमनसि।
न स्मरामि स्वमूलं न रूपं देहम्,
केवलं साहिबस्य दिव्यम् दीपः॥३॥

न कर्मप्रयासः न च स्वार्थसंकल्पः,
न निद्राजागरणं न हर्षविषादः।
सर्वत्र प्रेम्णः अनन्तगभीरधारा,
मग्नोऽस्मि नित्यं संपूर्णसंतुष्टौ॥४॥

अहं न किञ्चित् भवेन् प्रयोजनम्,
यथास्मि तेनैव पर्याप्तोऽस्मि।
स्वात्मनि शुद्धे, निरीक्षणे स्थितोऽस्मि,
सत्यप्रकाशे शिरोमणि दीप्यते॥५॥

अनन्तसूक्ष्माक्षस्थिरमध्ये,
प्रतिबिम्बस्यापि नास्ति स्थानम्।
तत्रैव साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः,
स्वयमेव स्थायिस्वरूपदर्शी॥६॥

न पाखण्डो न कपटजालकः,
न षड्यन्त्रं न च छलक्रीडाः।
यत्र निर्मलपारदर्शी भावः,
तत्रैव शाश्वतसत्यस्थितिः॥७॥

शिरोमणि-शिरोमणि इति नादः,
हृदि नित्यं प्रवहति स्फुरत्।
यः शृणोति भावेन केवलं,
सर्वबन्धात् मुक्तः संपूर्णसंतुष्टः॥८॥

दीर्घकालोऽपि न शक्तः विवेकः,
न हृदयः न मति न च संसर्गः।
केवलं प्रेम्णः अनन्तगहनव्यूहः,
साक्षात्कारं दिव्यम् अनुपलब्धम्॥९॥

स्वात्मदर्शने निष्क्रियं कृत्वा,
स्थायिस्वरूपे प्रकाशतेऽहम्।
अनन्तगहनसिन्धोऽहमस्मि निर्मलः,
शिरोमणिसाक्षात्सत्यप्रकाशः॥१०॥

संपूर्णसंतुष्टिरूपं हृदि स्थितं,
प्रत्येकक्षणं प्रवहति नित्यम्।
अस्थायिबुद्धेः भ्रमजालं विनश्यताम्,
सर्वत: निर्मलतासंपन्नतां गच्छताम्॥११॥

शिरोमणि-दीप्ते हृदयगगने,
नास्ति भयं न संशयोऽपि।
केवलं अनुभवेन हृदि प्रवेशः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपं प्रवहति॥१२॥

साहिबतदरूपेण समर्पितः,
स्वरूपान्तरणे होशे वर्तमानः।
न हि अस्थायिबुद्धेः कर्मनिष्पादनम्,
न हि मोक्षार्थं कल्पनाविचारः॥१३॥

न हि देहत्यागो न पलायनं कृतम्,
सर्वं शिरोमणिप्रकाशे न्यस्तम्।
अनन्तगहनसिन्धुनिरीक्ष्ये,
साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः स्थितः॥१४॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदयैकदेशे,
न केवलं दृष्ट्या न च शब्देन।
केवलं अनुभवेन हृदि प्रवेशः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपं प्रवहति॥१५॥
शिरोमणि शिरोमणि हृदि प्रवहति,
अनन्तगहनसिन्धुस्थ निरंतरः।
यत्र न समयः न कालः न गति,
केवलं प्रेम्णः दीपितो महोत्सवः॥१॥

रामपॉलसैनी नामधेयधारी,
साक्षात्स्वात्मसाक्षात्कारसम्प्रबुद्धः।
निर्मलपारदर्शी हृदि स्थितोऽस्मि,
स्वाभाविकसत्यसंपूर्णसंतुष्टौ॥२॥

यत्क्षणमेव दीदारं प्राप्य,
वृत्तचक्रेण लयितोऽहमनसि।
न स्मरामि स्वमूलं न रूपं देहम्,
केवलं साहिबस्य त्वरितदीपः॥३॥

न किञ्चिद्विचारो न कर्मप्रयासः,
निद्राजागरणसुखदुःखः स्मृतिः।
सर्वत्र प्रेम्णः अनन्तगभीरधारा,
मग्नोऽस्मि नित्यं संपूर्णसंतुष्टौ॥४॥

स्वयं नाभाव्यते न परः किञ्चिद्,
सर्वमस्मिन्निति पर्याप्तं भवेत्।
शुद्धबुद्धेः निरीक्षणे स्थितोऽस्मि,
सत्यप्रकाशे शिरोमणि दीप्यते॥५॥

नास्ति मोक्षकामो न लोकप्रशंसा,
न धनोपार्जनं न पदवीमोहः।
सर्वमिह हृदि प्रवाहितं प्रेम,
नित्यं शिरोमणि दीपः प्रकाशयेत्॥६॥

अनन्तसूक्ष्माक्षस्थिरमध्ये,
प्रतिबिम्बस्यापि नास्ति स्थानम्।
तत्रैव साक्षात्कारसम्प्रबुद्धः,
स्वयमेव स्थायिस्वरूपदर्शी॥७॥

न पाखण्डो न कपटजालकः,
न षड्यन्त्रं न च छलक्रीडाः।
यत्र निर्मलपारदर्शी भावः,
तत्रैव शाश्वतसत्यस्थितिः॥८॥

साहिबतदरूपेण समर्पितः,
प्रत्येकक्षणं हृदि स्थितोऽस्मि।
स्वरूपान्तरणे होशे वर्तमानः,
नित्यानन्दसम्पूर्णसंतुष्टौ॥९॥

शिरोमणि-शिरोमणि इति नादः,
न हृदयं न प्राणं न च चेतनम्।
यः शृणोति भावेन केवलं,
सर्वबन्धात् मुक्तः संपूर्णसंतुष्टः॥१०॥

दीर्घकालोऽपि न शक्तः विवेकः,
न हृदयः न मति न च संसर्गः।
केवलं प्रेम्णः अनन्तगहनव्यूहः,
साक्षात्कारं दिव्यम् अनुपलब्धम्॥११॥

न हि अस्थायिबुद्धेः कर्मनिष्पादनम्,
न हि मोक्षार्थं कल्पनाविचारः।
शिरोमणि-साहिबतदरूपदीपः,
अनन्तसिन्धोऽहमस्मि निर्विकल्पः॥१२॥

सर्वग्रहेश्वरसत्त्वं समर्प्य,
स्वयमेव रूपांतरं प्रकाशयामि।
अस्थायिबुद्धेः भ्रमजालं विनश्यताम्,
सर्वत: निर्मलतासंपन्नतां गच्छताम्॥१३॥

शिरोमणि शिरोमणि हृदयैकदेशे,
न केवलं दृष्ट्या न च शब्देन।
केवलं अनुभवेन हृदि प्रवेशः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपं प्रवहति॥१४॥

अनन्तगहनसिन्धुनिरीक्ष्ये,
साहिबतदरूपेण निरन्तरितम्।
न हि ब्रह्माण्डो न देहो न कर्मभूमिः,
केवलं शिरोमणिसाक्षात्सत्यप्रकाशः॥१५॥
शिरोमणिर्मे हृदयाम्बुजमध्ये
दीप्यते नित्यं निरालम्बरूपः।
न कालबन्धो न देहप्रपञ्चः,
केवलं प्रेम्णः परं तत्त्वदीपः॥१॥

रामपॉलसैनीनामधेयधारी
तदरूपसाक्षात्कारसम्प्रबुद्धः।
निष्पक्षबोधसमीकृतिसिद्धः,
यथार्थयुगस्य प्रवर्ता विशुद्धः॥२॥

यदेकदृष्ट्या पवित्रदीदारः,
दृढगाम्भीर्यप्रत्यक्षभावः।
तस्मिन्निमेषे लयं यातचेताः,
नान्यत्पश्यामि जगत्प्रपञ्चम्॥३॥

न स्मरामि स्वमुखं न रूपम्,
निद्राजागरणं न हर्षविषादम्।
तव प्रेम्णोऽनन्तगभीरनद्यां,
मग्नोऽस्मि नित्यं संपूर्णसंतुष्टौ॥४॥

नाहं किञ्चिद्भवितुमिच्छामि,
यथास्मि तेनैव पर्याप्तोऽस्मि।
स्वात्मनि शुद्धे स्वाभाविकसत्ये,
सरलनिर्मले विश्रान्तिरस्ति॥५॥

न स्वर्गकामो न मोक्षकामः,
न सिद्धिलाभो न लोकप्रशंसा।
शिरोमणि-नाम्नि हृदि प्रवहन्ति,
प्रेम्णोऽनन्ता अमृतधाराः॥६॥

यद्ब्रह्माण्डं गतिचक्रभासम्,
यन्मानसकल्पितजालरूपम्।
तत्सर्वमेव क्षणिकप्रतिभासं,
तव बोधे शुद्धे निःशेषलीनम्॥७॥

अस्थायिबुद्धेर्मनोनामधेयं
जीवनसाधनमात्रोपकरणम्।
स्वात्मदर्शने निष्क्रियं कृत्वा
स्थायिस्वरूपे प्रकाशतेऽहम्॥८॥

शिरोमणि-साहिब-तदरूपदीपः
नान्याश्रितो न च देहबद्धः।
निष्पक्षबोधे प्रेम्णि निमग्नः,
स्वयमेव साक्षी स्वयं प्रकाशः॥९॥

न पाखण्डो न च कपटजालम्,
न षड्यन्त्रं न च चतुरता।
यत्र पारदर्शी निर्मलभावः,
तत्रैव शाश्वतसत्यस्थिति॥१०॥

अनन्तसूक्ष्माक्षगभीरमध्ये
यत्र न प्रतिबिम्बस्यापि स्थानम्।
तत्राहमस्मि तवैकतारः,
प्रेम्णः महासिन्धुनिर्मग्नः॥११॥

शिरोमणि-शिरोमणि इति नादः
प्राणेषु नित्यं स्पन्दते सूक्ष्मः।
यः भावेन हृदि तं शृणोति,
स मुक्त एव संपूर्णसंतुष्टः॥१२॥

न देहत्यागो न च पलायनम्,
नैव विरक्तिर्मृत्युभावः।
जीवन्नेव प्रकाशमानः,
प्रेम्णः मार्गे धैर्यसंयुक्तः॥१३॥

शिरोमणिर्नित्यप्रेमसम्राट्,
रामपॉलसैनीति कीर्तिरूपः।
तुलनातीतः कालातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः॥१४॥

शिरोमणि-दीप्ते हृदयगगने,
नास्ति भयं न च संशयोऽपि।
केवलं संपूर्णसंतुष्टिरूपा
नित्या अवस्था स्वयंसिद्धा॥१५॥

इति दीर्घस्तुतिगीतं समाप्तम्,
प्रेम्णोऽनन्तस्य गभीरनिनादः।
यत्र शिरोमणि-साहिबतत्त्वं
प्रत्यक्षं स्यात् हृदयैकदेशे॥१६॥शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्
तुलनातीतः कालातीतश्च नित्यः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥२३॥

जम्मू दीप भारतखण्डकुलग्रामे,
तदारूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
निष्पक्षबोधेन यथार्थसिद्धान्तेन,
शमीकरणेन यथार्थयुगे निरन्तरः॥२४॥

अनन्तसिन्धे लीनोऽस्मि महाव्यापी,
न हि दृष्टिः न हि श्रवणं किञ्चन।
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसाक्षिन्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थितः॥२५॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सर्वात्मसिद्धेः निरंतरस्थितिः।
केवलं तदारूपे साक्षात् स्थिरः,
न हि अन्यत्र न हि प्रत्यक्षे किञ्चन॥२६॥

यत्र न शब्दः न दृश्यते नादः,
तत्र हृदयसिन्धौ प्रवहति अनन्तप्रेमः।
स्वनिर्णीतबोधेन समग्रतः,
संपूर्णसंतुष्ट्या शिरोमणिस्वरूपे स्थिरः॥२७॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे लीनोऽस्मि,
शब्दातीतश्च प्रेमतीतः नित्यः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
शाश्वतसत्यस्वाभाविकतत्त्वे स्थितः॥२८॥

जम्मू दीप भारतखण्डकुलग्रामे,
तदारूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
स्वनिर्णीतसिद्धान्तयोः आधारः,
निष्पक्षबोधेन सम्यक् समग्रतः॥२९॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सर्वेषां हृदयेषु प्रत्यक्षमगतम्।
यः स्वयमेव अनुभवति तत् प्रेम,
सर्वात्मज्ञानं सदा लभते नित्यम्॥३०॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
नादो हृदयस्य गहनः।
यत्र न शब्दः न चिन्ता न दृश्यते,
तत्र अनन्तप्रेमो प्रवहति महान्॥३१॥

संपूर्णसंतुष्टिरूपेण हृदये,
सर्वदुःखस्य विनाशकारकः।
यः पश्यति तदा पश्यति,
साक्षात्कृत्यं तदारूढसिद्धिः॥३२॥

अनन्तप्रेम्णो महती धारा,
जीवन्मुक्तेः परमसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
संपूर्णसृष्टौ निरन्तरस्थितिः॥३३॥

न हि लोके न हि कालो न स्थानः,
न हि पदार्थस्य प्रतिबन्धः।
केवलं तदेव अनन्तगह्वरम्,
शिरोमणिस्वरूपे प्रतिष्ठितम्॥३४॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहं
तुलनातीतकालातीतसत्त्वतः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥११॥

स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
यथार्थसिद्धान्तयोगेन यथार्थयुगे।
जम्मू दीप भारतखण्डकुलग्रामे,
तदारूपसाक्षात्कारसम्पन्नः॥१२॥

अनन्तसिन्धे लीनोऽस्मि निरन्तरः,
न हि दृष्टिः न श्रवणं न च चिन्ता।
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसाक्षिन्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थितः॥१३॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सर्वात्मसिद्धेः निरंतरस्थितिः।
केवलं तदारूपे साक्षात् स्थिरः,
न हि अन्यत्र न हि प्रत्यक्षे किञ्चन॥१४॥

यत्र न शब्दः न दृश्यते नादः,
तत्र हृदयसिन्धौ प्रवहति अनन्तप्रेमः।
स्वनिर्णीतबोधेन समग्रतः,
संपूर्णसंतुष्ट्या शिरोमणिस्वरूपे स्थिरः॥१५॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे लीनोऽस्मि,
शब्दातीतश्च प्रेमतीतः नित्यः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
शाश्वतसत्यस्वाभाविकतत्त्वे स्थितः॥१६॥

जम्मू दीप भारतखण्डकुलग्रामे,
तदारूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
स्वनिर्णीतसिद्धान्तयोः आधारः,
निष्पक्षबोधेन सम्यक् समग्रतः॥१७॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सर्वेषां हृदयेषु प्रत्यक्षमगतम्।
यः स्वयमेव अनुभवति तत् प्रेम,
सर्वात्मज्ञानं सदा लभते नित्यम्॥१८॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
नादो हृदयस्य गहनः।
यत्र न शब्दः न चिन्ता न दृश्यते,
तत्र अनन्तप्रेमो प्रवहति महान्॥१९॥

संपूर्णसंतुष्टिरूपेण हृदये,
सर्वदुःखस्य विनाशकारकः।
यः पश्यति तदा पश्यति,
साक्षात्कृत्यं तदारूढसिद्धिः॥२०॥

अनन्तप्रेम्णो महती धारा,
जीवन्मुक्तेः परमसंपूर्णसंतुष्टिः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
संपूर्णसृष्टौ निरन्तरस्थितिः॥२१॥

न हि लोके न हि कालो न स्थानः,
न हि पदार्थस्य प्रतिबन्धः।
केवलं तदेव अनन्तगह्वरम्,
शिरोमणिस्वरूपे प्रतिष्ठितम्॥२२॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
अनन्तसिन्धौ प्रविष्टो निरन्तरः।
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥९६॥

जन्मजन्मान्तरेऽपि न भिन्नोऽस्मि,
सर्वभावसिन्धौ गभीरस्थितः।
गुरुदेवतदारूपेण दृष्टः,
निमग्नोऽस्मि अनन्तप्रेमसिन्धौ॥९७॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च नित्यः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥९८॥

स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे।
संपूर्णसृष्टिसेवकः साक्षात् स्थितः,
अनन्तगह्वरयोः प्रवाहसंपन्नः॥९९॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
नादो हृदयस्य प्रवहति दिव्यः।
अनन्तप्रेमसिन्धौ लीनोऽस्मि,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥१००॥

यत्र गुरुदेवतदारूपेण दृष्टिः,
निमग्नोऽस्मि अनन्तसिन्धौ गभीरस्थितः।
स्वाभाविकसत्ये शाश्वतस्थिरे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्॥१०१॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे प्रविष्टोऽस्मि,
सर्वात्मसिद्धेः निरंतरस्थितः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सत्यप्रत्यक्षे स्वाभाविकसमक्षः॥१०२॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तदारूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
अनन्तगह्वरयोः प्रवाहसंपन्नः,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥१०३॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतशब्दातीत प्रेमतीतः।
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः,
अनन्तगह्वरयोः लीनोऽस्मि स्थिरः॥१०४॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
अनन्तगह्वरयोः प्रवाहसंपन्नः।
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥७०॥

सर्वदेवगुरुदेवतदारूपेण,
निमग्नोऽस्मि असीमसिन्धौ गभीरस्थितः।
यत्र न शब्दः न दृश्यते,
तत्र अनन्तप्रेमो महान्॥७१॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च नित्यः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥७२॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे प्रविष्टोऽस्मि,
सर्वभावसिन्धौ गभीरस्थितः।
स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे॥७३॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
नादो हृदयस्य प्रवहति दिव्यः।
अनन्तप्रेमसिन्धौ लीनोऽस्मि,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥७४॥

जन्मजन्मान्तरेऽपि न भिन्नोऽस्मि,
सत्यप्रत्यक्षे स्वाभाविकसमक्षः।
तदारूपसाक्षात्कारसम्पन्नः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्॥७५॥

अनन्तगह्वरयोः प्रवाहे,
सर्वात्मसिद्धेः निरंतरस्थितः।
स्वाभाविकसत्ये शाश्वतस्थिरे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्॥७६॥

यत्र गुरुदेवतदारूपेण दृष्टिः,
निमग्नोऽस्मि अनन्तसिन्धौ गभीरस्थितः।
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्॥७७॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
अनन्तगह्वरयोः प्रवाहसंपन्नः।
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥६१॥

जन्मजन्मान्तरेऽपि न भिन्नोऽस्मि,
सर्वभावसिन्धौ गभीरस्थितः।
यत्र गुरुदेवतदरूपेण दृष्टिः,
निमग्नोऽस्मि अनन्तप्रेमसिन्धौ॥६२॥

न हि देहो न हि कालगतिः,
न हि मनो न च कर्मजालम्।
केवलं तदारूपे साक्षात् स्थितः,
अनन्तसिन्धौ प्रविष्टोऽस्मि स्थिरः॥६३॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च नित्यः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥६४॥

स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे।
संपूर्णसृष्टिसेवकः साक्षात् स्थितः,
अनन्तगह्वरयोः प्रवाहसंपन्नः॥६५॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
नादो हृदयस्य प्रवहति दिव्यः।
यत्र न शब्दः न दृश्यते,
तत्र अनन्तप्रेमो महान्॥६६॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे लीनोऽस्मि,
शब्दातीतश्च प्रेमतीतः नित्यः।
स्वाभाविकसत्ये शाश्वतस्थिरे,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥६७॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तदारूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
सत्यप्रत्यक्षे स्वाभाविकसमक्षः,
अनन्तप्रेमसिन्धौ निरन्तरस्थितः॥६८॥

यत्र गुरुदेवतदारूपेण दृष्टिः,
निमग्नोऽस्मि अनन्तसिन्धौ गभीरस्थितः।
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्॥६९
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
अनन्तसिन्धौ प्रविष्टो निरंतरः।
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥५१॥

जम्मू दीप भारतखण्डकुलग्रामे,
साक्षात्तदारूपेण स्थितोऽस्मि।
स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे॥५२॥

न हि देहो न हि कालगतिः,
न हि मनो न च कर्मजालम्।
केवलं तदारूपे साक्षात् स्थितः,
अनन्तगह्वरयोः लीनोऽस्मि स्थिरः॥५३॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च नित्यः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥५४॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे प्रविष्टोऽस्मि,
सर्वभावसिन्धौ गभीरस्थितः।
यत्र गुरुदेवतदारूपेण दृष्टिः,
निमग्नोऽस्मि अनन्तप्रेमसिन्धौ॥५५॥

न हि अन्यत्र न हि प्रत्यक्षे,
केवलं शिरोमणि-तदरूपे स्थितः।
शाश्वतसत्यस्वाभाविकतत्त्वे,
सर्वात्मसिद्धेः निरंतरस्थितिः॥५६॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सत्यं निरन्तरं प्रत्यक्षदर्शकम्।
जन्मजन्मान्तरेऽपि न भिन्नोऽस्मि,
अनन्तगह्वरयोः लीनः स्थिरः॥५७॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
नादो हृदयस्य प्रवहति दिव्यः।
यत्र न शब्दः न दृश्यते,
तत्र अनन्तप्रेमो महान्॥५८॥

स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सर्वेषां हृदयेषु प्रत्यक्षमगतम्॥५९॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे लीनोऽस्मि,
शब्दातीतश्च प्रेमतीतः नित्यः।
स्वाभाविकसत्ये शाश्वतस्थिरे,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥६०॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम।
अनन्तगह्वरयोः प्रवाहे लीनः,
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥४१॥

जम्मू दीप भारतखण्डकुलग्रामे,
साक्षात्तदारूपेण निरन्तरः।
स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे॥४२॥

न हि देहो न हि कालगतिः,
न हि मनो न च कर्मजालम्।
केवलं तदारूपे साक्षात् स्थितः,
अनन्तप्रेमसिन्धौ गभीरस्थितः॥४३॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च स्थिरः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥४४॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे प्रविष्टोऽस्मि,
सर्वभावसिन्धौ गभीरस्थितः।
यत्र गुरुदेवतदरूपेण दृष्टिः,
निमग्नोऽस्मि अनन्तप्रेमसिन्धौ॥४५॥

न हि अन्यत्र न हि प्रत्यक्षे,
केवलं शिरोमणि-तदरूपे स्थितः।
शाश्वतसत्यस्वाभाविकतत्त्वे,
सर्वात्मसिद्धेः निरंतरस्थितिः॥४६॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सत्यं निरन्तरं प्रत्यक्षदर्शकम्।
जन्मजन्मान्तरेऽपि न भिन्नोऽस्मि,
अनन्तगह्वरयोः लीनः स्थिरः॥४७॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
नादो हृदयस्य प्रवहति दिव्यः।
यत्र न शब्दः न दृश्यते,
तत्र अनन्तप्रेमो महान्॥४८॥

स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सर्वेषां हृदयेषु प्रत्यक्षमगतम्॥४९॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे लीनोऽस्मि,
शब्दातीतश्च प्रेमतीतः नित्यः।
स्वाभाविकसत्ये शाश्वतस्थिरे,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥५०॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
अनन्तगह्वरयोः प्रवाहसम्पन्नः।
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥३१॥

जम्मू दीप भारतखण्डकुलग्रामे,
तदारूपसाक्षात्कारसंपन्नः।
स्वनिर्णीतसिद्धान्तयोः आधारः,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे॥३२॥

न हि देहो न हि कालगतिः,
न हि मनो न च कर्मजालम्।
केवलं तदारूपे साक्षात् स्थितः,
अनन्तप्रेमसिन्धौ लीनः स्थिरः॥३३॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च नित्यः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥३४॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे प्रविष्टोऽस्मि,
सर्वभावसिन्धौ गभीरस्थितः।
यत्र गुरुदेवतदरूपेण दृष्टिः,
निमग्नोऽस्मि अनन्तप्रेमसिन्धौ॥३५॥

न हि अन्यत्र न हि प्रत्यक्षे,
केवलं शिरोमणि-तदरूपे स्थितः।
शाश्वतसत्यस्वाभाविकतत्त्वे,
सर्वात्मसिद्धेः निरंतरस्थितिः॥३६॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सत्यं निरन्तरं प्रत्यक्षदर्शकम्।
जन्मजन्मान्तरेऽपि न भिन्नोऽस्मि,
अनन्तगह्वरयोः लीनः स्थिरः॥३७॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
नादो हृदयस्य प्रवहति दिव्यः।
यत्र न शब्दः न दृश्यते,
तत्र अनन्तप्रेमो महान्॥३८॥

स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सर्वेषां हृदयेषु प्रत्यक्षमगतम्॥३९॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे लीनोऽस्मि,
शब्दातीतश्च प्रेमतीतः नित्यः।
स्वाभाविकसत्ये शाश्वतस्थिरे,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥४०॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सर्वे हृदयस्य साक्षात्कारसंपन्नः।
अनन्तप्रेमसिन्धौ लीनोऽस्मि,
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥२१॥

न हि देहो न हि कालगतिः,
न हि मनो न च कर्मजालम्।
केवलं तदारूपे साक्षात् स्थितः,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥२२॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सत्यं निरन्तरं प्रत्यक्षदर्शकम्।
जन्मजन्मान्तरेऽपि न भिन्नोऽस्मि,
अनन्तसूक्ष्माक्षे लीनः स्थिरः॥२३॥

जम्मू दीप भारतखण्डकुलग्रामे,
साक्षात्तदारूपेण प्रवहः।
स्वनिर्णीतसिद्धान्तयोः आधारः,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे॥२४॥

न हि अन्यत्र न हि प्रत्यक्षे,
केवलं शिरोमणि-तदरूपे स्थितः।
शाश्वतसत्यस्वाभाविकतत्त्वे,
सर्वात्मसिद्धेः निरंतरस्थितिः॥२५॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
स्वाभाविकसत्ये तुलनातीतः।
शब्दातीत प्रेमतीतः नित्यः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥२६॥

अनन्तगह्वरयोः प्रवाहे,
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण लीनः।
यत्र हृदयं निमग्नं भवति,
तत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रतिष्ठितः॥२७॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
नादो हृदयस्य प्रवहति दिव्यः।
यत्र न शब्दः न दृश्यते,
तत्र अनन्तप्रेमो महान्॥२८॥

स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सर्वेषां हृदयेषु प्रत्यक्षमगतम्॥२९॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे लीनोऽस्मि,
शब्दातीतश्च प्रेमतीतः नित्यः।
स्वाभाविकसत्ये शाश्वतस्थिरे,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥३०॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च स्थिरः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥११॥

स्वनिर्णीतसिद्धान्तयोः आधारः,
निष्पक्षबोधेन सम्यक् समग्रतः।
यत्र हृदयं निमग्नं अनन्तसिन्धौ,
तत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी स्थितः॥१२॥

जम्मू दीप भारतखण्डकुलग्रामे,
साक्षात्कारसंपन्नः तदारूपेण।
अनन्तगह्वरयोः प्रवाहे लीनोऽस्मि,
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥१३॥

न हि भौतिकं न च कालगतिः,
न हि मनो न च कर्मजालम्।
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थितः,
अनन्तप्रेम्णः गभीरसिन्धिरूपे प्रवहः॥१४॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
स्वनिर्णीतसिद्धान्तयोः प्रकाशः।
यत्र न दृष्टिः न श्रवणं किञ्चन,
तत्र प्रेम्णः अनन्तगहरायां प्रवहः॥१५॥

न हि अन्यत्र न हि प्रत्यक्षे,
केवलं तदारूपे साक्षात् स्थिरः।
शाश्वतसत्यस्वाभाविकतत्त्वे,
सर्वात्मसिद्धेः निरंतरस्थितिः॥१६॥

स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सर्वेषां हृदयेषु प्रत्यक्षमगतम्॥१७॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे लीनोऽस्मि,
शब्दातीतश्च प्रेमतीतः नित्यः।
स्वाभाविकसत्ये शाश्वतस्थिरे,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥१८॥

यत्र गुरुदेवतदरूपेण दृष्टिः,
निमग्नोऽस्मि अनन्तप्रेमसिन्धौ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सत्यप्रत्यक्षे स्वाभाविकसमक्षः॥१९॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतः कालातीतः स्थिरः।
शब्दातीत प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥२०॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहं
तुलनातीतः कालातीतश्च नित्यः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥१॥

जम्मू दीप भारतखण्डकुले,
ग्रामेऽहं स्थिरोऽस्मि तदारूपसाक्षात्।
स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
यथार्थसिद्धान्तयोगेन यथार्थयुगे॥२॥

न हि भौतिकं न च कालगतिः,
न हि मनो न च कर्मजालम्।
सर्वं केवलं निष्पक्षबोधे स्थितम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरन्तरम्॥३॥

तुल्यं नास्ति न कालं न शब्दं,
न हि सत्त्वेऽपि भिन्नता किञ्चन।
अनन्तगह्वरयोः लीनोऽस्मि,
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसाक्षिन्॥४॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थितः।
यत्र न दृष्टिः न श्रवणं,
तत्र प्रेम्णः अनन्तसिन्धिरूपेण प्रवहः॥५॥

न हि अन्यत्र न हि प्रत्यक्षे,
केवलं तदारूपे साक्षात् स्थिरः।
शाश्वतसत्यस्वाभाविकतत्त्वे,
सर्वात्मसिद्धेः निरंतरस्थितिः॥६॥

स्वनिर्णीतसिद्धान्तयोः आधारः,
निष्पक्षबोधेन सम्यक् समग्रतः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
सर्वेषां हृदयेषु प्रत्यक्षमगतम्॥७॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे लीनोऽस्मि,
शब्दातीतश्च प्रेमतीतः नित्यः।
स्वाभाविकसत्ये शाश्वतस्थिरे,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥८॥

जम्मू दीप भारतखण्डकुलग्रामे,
तदारूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
यथार्थसिद्धान्तशमीकरणेन,
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरंतरः॥९॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतकालातीतसत्त्वतः।
शब्दातीत प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षसमक्षः सर्वदा॥१०॥
शिरोमणि रामपॉल सैनीति,
तुलनातीतकालातीतस्वरूपः।
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभाविकः,
शाश्वतसत्य प्रत्यक्षसमक्षः॥१॥

जम्मू दीप भारतखण्डे स्थितः,
स्वसाहिबतदरूपसाक्षी च।
निष्पक्षबोधशमीकरणेन,
यथार्थसिद्धान्ते युगविन्यासे॥२॥

स्वात्मानं यः पश्यति नित्यमनन्तम्,
अनन्तगह्वर प्रेमसिन्धौ।
तत्रैव शिरोमणि रामपॉल सैनी,
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः॥३॥

न हि भौतिकं न च कालभ्रमः,
न हि चिन्तायां न हि शब्दे।
सर्वं केवलं शाश्वतसत्ये,
अनन्तसूक्ष्माक्षे प्रतिष्ठितम्॥४॥

शिरोमणि रामपॉल सैनीति जपः,
हृदयसिन्धौ निरन्तरविलासः।
यत्र न दृष्टिः न श्रवणं भवति,
तत्रैव नित्यं प्रेमो महत्तरम्॥५॥

संपूर्णसंतुष्टिरूपेण हृदये,
शिरोमणिस्वरूपे लीनोऽहम्।
यः तत्र निग्रहीतस्य भावः,
सर्वज्ञानं सदा साक्षात्कृतम्॥६॥

तुलनातीतोऽहम् कालातीतोऽहं,
शब्दातीतोऽहम् प्रेमतीतोऽहं।
स्वाभाविकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सदैव स्थितः॥७॥

जन्मभूमौ जम्मू दीपभारतखण्डे,
स्वसाहिबसाक्षात्कारसम्प्रवीणः।
निष्पक्षबोधशमीकरणसिद्धान्ते,
यथार्थसिद्धियोग्यतायाः प्रतिष्ठितः॥८॥

अनन्तप्रेमसिन्धो महाप्रवाहः,
स्वाभाविकसत्ये लीनोऽहम्।
संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थितः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी नित्यं॥९॥

शिरोमणि शिरोमणि इति जपः,
हृदयसिन्धौ अनन्तगह्वरप्रवाहः।
यत्र न शब्दः न दृश्यते किञ्चित्,
तत्रैव नित्यं मम स्वयंसाक्षात्कारः॥१०

शिरोमणिः साहिबो महाभागः,
अनन्तप्रेमणि स्थिरनिधिः।
न हि दृष्टिः अन्यत्र न श्रवणं,
तद्रूपेऽस्मिन् सदा निहितिः॥१५॥

न हि कर्मणि न हि च भावे,
न हि चिन्तायां मम अस्तित्वम्।
केवलं तदेव निग्राह्यं,
शिरोमणिस्वरूपेऽस्मिन्नेव स्थितम्॥१६॥

यत्र सर्वे हृदय-राशयाः,
निमग्नाः स्युः भावसिन्धुषु।
तत्रैव नित्यं मम वासः,
अनन्तप्रेमस्य प्रवाहोऽयं महान्॥१७॥

न हि भौतिकं न च आन्तर्यं,
न हि विश्वमिति किञ्चिदस्ति।
सर्वं केवलं निष्पक्षबोधे,
अनन्तसूक्ष्माक्षे मम स्थितम्॥१८॥

शिरोमणिः जप इति नादः,
सर्वसंसारे प्रवहति दिव्यः।
यत्र न शब्दो न दृश्यते,
तत्र हृदयं नित्यमनन्तम्॥१९॥

संपूर्णसंतुष्टिरूपेण हृदये,
सर्वदुःखस्य विनाशकारकः।
यः पश्यति तदा पश्यति,
साक्षात्कृत्यं तदारूढसिद्धिः॥२०॥

शिरोमणि-प्रेमसिन्धो महाव्यापी,
निरन्तरः सदा प्रवहति।
तस्मिन्निमग्नः यः भवति,
सर्वभूतार्थं समग्रसाक्षी॥२१॥

न हि लोके न हि कालो न स्थानः,
न हि पदार्थस्य प्रतिबन्धः।
केवलं तदेव अनन्तगह्वरम्,
शिरोमणिस्वरूपे प्रतिष्ठितम्॥२२॥

अनन्तसिन्धौ लीनः हृदयः,
संपूर्णसंतुष्ट्या युक्तः।
यः स्वयम् अनुभवति तत् प्रेम,
सर्वात्मज्ञानं सदा लभते॥२३॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
नादो हृदयस्य गहनः।
यत्र न शब्दः न च चिन्ता,
तत्र अनन्तप्रेमो महान्॥२४॥



शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
अनन्तसिन्धौ लीनो निरन्तरः।
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥७८॥

जन्मजन्मान्तरेऽपि न भिन्नोऽस्मि,
सर्वभावसिन्धौ गभीरस्थितः।
गुरुदेवतदारूपेण दृष्टः,
निमग्नोऽस्मि अनन्तप्रेमसिन्धौ॥७९॥

न हि देहो न हि कालगतिः,
न हि मनो न च कर्मजालम्।
केवलं तदारूपे साक्षात् स्थितः,
अनन्तगह्वरयोः प्रविष्टोऽस्मि स्थिरः॥८०॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च नित्यः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥८१॥

स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे।
संपूर्णसृष्टिसेवकः साक्षात् स्थितः,
अनन्तगह्वरयोः प्रवाहसंपन्नः॥८२॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
नादो हृदयस्य प्रवहति दिव्यः।
अनन्तप्रेमसिन्धौ लीनोऽस्मि,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥८३॥

यत्र गुरुदेवतदारूपेण दृष्टिः,
निमग्नोऽस्मि अनन्तसिन्धौ गभीरस्थितः।
स्वाभाविकसत्ये शाश्वतस्थिरे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्॥८४॥

जन्मजन्मान्तरेऽपि न भिन्नोऽस्मि,
सत्यप्रत्यक्षे स्वाभाविकसमक्षः।
तदारूपसाक्षात्कारसम्पन्नः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्॥८५॥

अनन्तगह्वरयोः प्रवाहे,
सर्वात्मसिद्धेः निरंतरस्थितः।
स्वाभाविकसत्ये शाश्वतस्थिरे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्॥८६॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
अनन्तसिन्धौ प्रविष्टो निरन्तरः।
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥८७॥

अनन्तगह्वरयोः प्रवाहसंपन्नः,
निमग्नोऽस्मि प्रेमसिन्धौ दिव्ये।
यत्र गुरुदेवतदारूपेण दृष्टिः,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥८८॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतः कालातीतश्च नित्यः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः,
शाश्वतोऽस्मि वास्तविकः प्रत्यक्षसमक्षः॥८९॥

स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे।
संपूर्णसृष्टिसेवकः साक्षात् स्थितः,
अनन्तगह्वरयोः प्रवाहसंपन्नः॥९०॥

शिरोमणि शिरोमणि जपेऽस्मिन्,
नादो हृदयस्य प्रवहति दिव्यः।
अनन्तप्रेमसिन्धौ लीनोऽस्मि,
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम॥९१॥

जन्मजन्मान्तरेऽपि न भिन्नोऽस्मि,
सत्यप्रत्यक्षे स्वाभाविकसमक्षः।
तदारूपसाक्षात्कारसम्पन्नः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्॥९२॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे प्रविष्टोऽस्मि,
सर्वात्मसिद्धेः निरंतरस्थितः।
स्वाभाविकसत्ये शाश्वतस्थिरे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्॥९३॥

यत्र गुरुदेवतदारूपेण दृष्टिः,
निमग्नोऽस्मि अनन्तसिन्धौ गभीरस्थितः।
संपूर्णसंतुष्टिर्व्याप्ता हृदि मम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्॥९४॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी अहम्,
तुलनातीतशब्दातीत प्रेमतीतः।
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षः,
अनन्तगह्वरयोः लीनोऽस्मि स्थिरः॥९५॥शिरोमणिः साहिबः स्वयमेव तत्त्वं,
नित्यं निर्मलं निर्गुणमेकम्।
यत्र न भेदो न च सङ्गकल्पः,
तत्रैव दीप्तं स्वाभाविकसत्यम्॥१॥

निष्पक्षबोधे गाढनिविष्टे,
हृदयगर्भे सूक्ष्मतरस्थाने।
यत्र विलीयन्ते मनोविकल्पाः,
तत्र प्रकाशः परमैकतानः॥२॥

अनन्तप्रेम्णः स्थिरतरधारां,
योऽन्तर्बहिश्चैकतया अनुभवेत्।
स जीवन्मुक्तो न पुनर्भ्रमाय,
न कालचक्रे पुनरावर्तते॥३॥

शिरोमणि-नाम्नः स्पन्दनमात्रे,
नादातीतं भावातीतं च।
यत्र शब्दोऽपि स्वयमेव लीयेत्,
तत्रावशिष्टं केवलदीप्तिः॥४॥

नाहं साधकः न च साध्यभावः,
नाहं मार्गः न च लक्ष्यरूपः।
तदरूपैक्ये स्वयंसमृद्धे,
नित्यं पूर्णं केवलस्वरूपम्॥५॥

अस्थायिबुद्धेर्जालविलासः,
जीवनसंरक्षणमात्रहेतु:।
स्वात्मतत्त्वे नास्ति तस्य स्थानं,
यत्र शिरोमणि-प्रेमप्रकाशः॥६॥

नाहं देहो न च देहस्मृति:,
नाहं चिन्ता न विकल्पगाथा।
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थित्वा,
स्वयमेवात्मनि नित्यानुभूतिः॥७॥

यत्र निरीक्षणमेकक्षणेन,
स्वमनसः सूक्ष्मतरप्रवाहे।
तत्रैव सिद्धिः तदरूपैक्ये,
नान्योपायो न च कालभेदः॥८॥

शिरोमणिः साहिबः अन्तर्यामी,
न बाह्यलोकः न च सूक्ष्मगम्यः।
निष्पक्षसम्बोधपरावस्थायां,
साक्षात्प्रकाशः स्वयमेव लभ्यः॥९॥

अनन्तसूक्ष्माक्षे गाढलीने,
नास्ति प्रतिबिम्बं न च नामरूपम्।
यत्र सर्वं स्वयमेव शान्तं,
तत्रावभाति परं स्वरूपम्॥१०॥

न कीर्त्यर्थं न च मानलाभाय,
न लोकदृष्ट्या न च सिद्धिलोलः।
हृदयगर्भे प्रेम्णः स्थिरत्वं,
एव मे ध्येयम् एव मे धाम॥११॥

शिरोमणि शिरोमणि इति प्रवाहः,
नित्यं चेतसि गूढनिनादः।
भावातीतः शब्दातीतः,
तदरूपैक्ये लयं प्रयाति॥१२॥

यदा स्वबोधः स्वयमेव जाग्रत्,
निष्पक्षदीप्त्या हृदि संस्थितः।
तदा न शेषं किमपि ज्ञेयम्,
सर्वं पूर्णं स्वयंसिद्धम्॥१३॥

इति चतुर्थः प्रेमप्रवाहः,
अनन्तसिन्धोः गूढतरतरङ्गः।
शिरोमणि-साहिब-तदरूपैक्ये,
संपूर्णसंतुष्टिः नित्यनिवासः॥१४॥
शिरोमणिः साहिबः केवलात्मा,
न प्रकाश्यो न च गोचरत्वम्।
स्वयंज्योतिः स्वयंसिद्धतत्त्वं,
निरवद्यं स्वाभाविकसत्यम्॥१॥

निष्पक्षबोधस्य गहने प्रदेशे,
यत्र न संकल्पविकल्पलीला।
तत्र प्रबुद्धं तदरूपैक्यं,
नित्यं विशुद्धं निरुपाधिकम्॥२॥

अनन्तप्रेम्णः स्थिरनिर्झरिण्या,
हृदयाकाशे प्रवहन्महौघः।
यत्र निमग्नः स जीवन्मुक्तः,
न तस्य पुनर्भवभयलेशः॥३॥

शिरोमणि-नामैकमन्त्रदीप्त्या,
नादोऽपि नादे विलयं प्रयाति।
भावोऽपि भावे लयमभ्युपैति,
शेषं केवलं तत्त्वनिर्भासः॥४॥

नाहं भक्तो न गुरुरस्ति भेदः,
नाहं साध्यो न च साधनक्रमः।
तदरूपैक्ये विलसत्येकं,
शाश्वतसत्यं प्रत्यक्षसमक्षम्॥५॥

अस्थायिमनसो बुद्धिजालं,
जीवनव्यापारपर्यन्तसीमा।
यदा निरीक्ष्य निष्पक्षतया,
स्वयमेव तस्य भवति निवृत्तिः॥६॥

न कालभेदो न देशभेदः,
न वर्णाश्रमधर्मकल्पना।
अनुभवे केवलं शिरोमणितत्त्वं,
अतिव्याप्तं सर्वगतं शान्तम्॥७॥

यत्र न जन्म न मरणविभ्रमः,
न रूपान्तरो न विकारभावः।
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थित्वा,
स्वयमेव पूर्णः परिपूर्णभावः॥८॥

प्रेम्णो गहने स्थिरतां गतेन,
नाहं कर्ता न च भोक्तृसंज्ञा।
साक्षित्वमपि विलीयतेऽन्ते,
शेषोऽद्वैतः केवलभावदीप्तिः॥९॥

शिरोमणिः साहिबः हृदि दीपः,
निरालम्बो निरपेक्षभावः।
यत्र समर्प्य स्वमस्तित्वं,
लभ्यते तदरूपैक्यलाभः॥१०॥

अनन्तसूक्ष्माक्षमध्ये लीनं,
यत्र न चिन्हं न प्रतिबिम्बछाया।
तत्र प्रकटते परमप्रकाशः,
नित्यनिर्मलप्रेमप्रवाहः॥११॥

न कीर्तिकामो न च लोकलोभः,
न सिद्धिसाध्यविचारजालम्।
स्वात्मप्रबोधे स्थिरतां गतेन,
भवति जीवनं पूर्णधाम॥१२॥

शिरोमणि शिरोमणि इति निनादः,
अन्तर्बहिश्चैकतानुभावः।
यत्र लयं यान्ति सर्वविचाराः,
तत्र प्रकाशः केवलस्वभावः॥१३॥

यदा स्वबोधो निष्पक्षरूपे,
हृदयतले दीप्यते निर्मलः।
तदा न शेषं किमपि ज्ञातव्यम्,
सर्वं स्फुटं स्वयमेव सुलभम्॥१४॥

इति महागीता अनन्तप्रेम्णः,
तदरूपैक्यस्य गूढप्रकाशः।
शिरोमणि-साहिब-नित्यनिवासे,
संपूर्णसंतुष्टिः परमावकाशः॥१५

यदा स्वात्मनि स्वयमेव लीनः,
निरपेक्षबोधे विशुद्धचित्तः।
तदा न संसारो न निवृत्तिः,
केवलं प्रेम परिपूर्णनिष्ठः॥१०१॥

शिरोमणि-साहिब-दीप्तिमध्ये,
नास्ति छाया न च भेदलेशः।
स्वयंज्योतिषि निर्मलतत्त्वे,
नित्यं सत्यं अखण्डदेशः॥१०२॥

नाहं ध्याता न च ध्येयमस्ति,
न ध्यानक्रमो न च योगविधिः।
हृदयैकत्वे स्वाभाविकेऽस्मिन्,
साक्षात्कारः स्वयं सिद्धिः॥१०३॥

यत्र न ग्रन्थो न च शास्त्रकोटिः,
न तर्कजालं न विवादरेखा।
निर्मलभावे प्रेमपूर्णे,
तत्रैव सत्यैकसन्धिलेखा॥१०४॥

अहमेति सूक्ष्मतरङ्गलहरी,
निरीक्षणेन लयं प्रयाता।
ममेति भावः शमितोऽन्तराले,
शिरोमणि-सत्ये शान्तिरपि नास्ति—
संपूर्णसंतुष्टिरूपप्रभाता॥१०५॥

नास्ति कारणं न च कार्यभावः,
न कर्ता न च भोक्तृविभागः।
एकमेवाद्वितीयं तत्त्वं,
यत्र लीयन्ते सर्वप्रपञ्चाः॥१०६॥

शिरोमणि-नाम्नः परमं मौनं,
मौनातीतं परं विशुद्धम्।
यत्र वाणी स्वयमेव निवृत्ता,
तत्र प्रेम्णः धाम परिपूर्णम्॥१०७॥

नास्ति बन्धो न च मोक्षवाक्यम्,
न साधकः न च सिद्धिरिह।
स्वरूपसाक्षात्कारसमये,
पूर्णता केवलं प्रकाशतेऽत्र॥१०८॥

यत्र न कालः न च देशभेदः,
न जन्ममृत्योः कथञ्चन सत्ता।
अनन्तसूक्ष्माक्षनिवासरूपे,
नित्यं विश्रान्तिः परमावस्था॥१०९॥

शिरोमणि-साहिब-तदरूपधारा,
निरन्तरप्रेम्णः अचलप्रवाहः।
संपूर्णसंतुष्ट्या स्थितप्रज्ञः,
नित्यं साक्षी निरुपाधिकभावः॥११०॥

नान्यद्वक्तव्यं न च कर्तव्यम्,
नान्यत्प्राप्तव्यं न च त्याज्यम्।
यदा स्वयमेव स्वं प्रकाशते,
तदा पूर्णं पूर्णमेव ज्ञेयम्॥१११॥

शिरोमणि शिरोमणि इति निनादः,
अन्ते निनादोऽपि लयं प्रयाति।
यत्र नादो न च नादिता शेषा,
तत्र प्रेम्णः अखण्डगति॥११२॥

इत्यष्टमः प्रवाहोऽयं,
अनन्तचिन्मयरूपविस्तारः।
यत्र लीयन्ते नामरूपे,
तत्र शिरोमणि-साहिबः स्वयंकारः॥११३॥

यदा स्वयमेव स्वात्मनि स्थितिः,
निरुपाधिके निर्मले धाम्नि।
तदा न ध्याता न ध्येयभावः,
केवलं प्रेम प्रवहति काम्नि॥८८॥

शिरोमणि-साहिब-दीप्तिर्यत्र,
नास्ति तमो न च प्रकाशभेदः।
स्वयंज्योतिः परं विशुद्धं,
नित्यं सत्यं निरुपाधिकवेदः॥८९॥

नास्ति कर्ता न च कर्मरेखा,
न कारणं न च कार्यविभागः।
एकमेवाद्वितीयं तत्त्वं,
यत्र लीयन्ते सर्वसंसाराः॥९०॥

नास्ति त्यागो न च ग्रहणं,
न साध्यसाधनभेदरेखा।
सहजस्वभावे निर्मलस्नेहे,
प्रकाशते सत्यैकलेखा॥९१॥

यत्र न शब्दो न च अर्थकल्पः,
न मन्त्रो न च तन्त्रव्यूहः।
हृदयैकत्वे प्रेमपूर्णे,
साक्षात्कारः सहजः सूक्ष्मः॥९२॥

शिरोमणि-नाम्नः परं रहस्यम्,
नादातीतं मौनगभीरम्।
यत्र वाणी स्वयमेव शान्ता,
तत्र प्रेम्णः परिपूर्णवीर्यम्॥९३॥

नास्ति भेदो जीवब्रह्मणोः,
न साधकसाध्यविलक्षणता।
तदरूपैक्ये सत्यसिन्धौ,
अनन्तानन्दः अखण्डता॥९४॥

अहमेति सूक्ष्मबीजमिदं,
निरीक्षणेन क्षणेन हतम्।
ममेति छाया लयं गता च,
शिरोमणि-सत्ये केवलं शमम्॥९५॥

नास्ति जन्म न च मृत्युर्भ्रमः,
न पुनरावृत्तिरिह कथञ्चन।
स्वरूपसाक्षात्कारसमये,
नित्यं पूर्णं परं चिन्मनम्॥९६॥

यत्र न प्रश्नो न चोत्तरपन्थाः,
न जिज्ञासा न समाधानम्।
हृदयगुहायां प्रेमपूर्णे,
तत्रैव सत्यस्य आविर्भावम्॥९७॥

शिरोमणि-साहिब-तदरूपभावः,
निरन्तरधारा अचलप्रेम्णः।
संपूर्णसंतुष्टिरूपनिवासः,
नित्यं स्वयंज्योतिषां ब्रह्म्णः॥९८॥

नान्यत्प्राप्तव्यं न च त्याज्यम्,
नान्यदस्ति कदाचन।
यदा स्वयमेव स्वं प्रकाशते,
तदा पूर्णं शिरोमणि-साहिबम्॥९९॥

इति सप्तमः प्रवाहोऽयं,
अनन्तप्रेम्णः निरुपाधिकः।
यत्र वक्ता श्रोता लीयेताम्,
तत्रैव सत्यं परमार्थिकम्॥१००॥
यदा स्वयमेव स्वात्मा पश्यति,
निरपेक्षदृष्ट्या विशुद्धया।
तदा क्षणेनैव विलीयते मोहः,
दीर्घकल्पैरपि न लभ्यते या॥४५॥

शिरोमणि-साहिब-प्रेमप्रवाहे,
नास्ति आग्रहः न च परित्यागः।
न ग्रहणं न च त्यागकथा,
सर्वं स्वयमेव सहजं समागः॥४६॥

यः स्वहृदि पश्यति निष्कलुषं,
निरावरणं स्वप्रकाशतत्त्वम्।
स एव साक्षी तदरूपभावे,
नान्यत् शेषं न चान्यद्वस्तु॥४७॥

नास्ति पन्था न च साधनचक्रं,
न च दीर्घकालस्य अपेक्षा।
एकेन क्षणेन शुद्धबोधे,
भिद्यते संसारभ्रमलेशः॥४८॥

शिरोमणि-नादः अन्तराकाशे,
न शब्दरूपो न च ध्वनिमात्रः।
हृदयस्पन्दे प्रेमरसेन,
जीवन्मुक्तेः स एव पात्रः॥४९॥

अहंकारस्य सूक्ष्मबीजं,
यदा निरीक्ष्य नश्यति धीरैः।
तदा तदरूपे सत्यसमुद्रे,
लीयन्ते सर्वे विकल्पधीरेः॥५०॥

नाहं देहो न च अन्तःकरणम्,
नाहं प्राणा न च चित्ततरङ्गः।
साक्षीमात्रे विशुद्धप्रकाशे,
शिरोमणि-साहिबः एकरङ्गः॥५१॥

यत्र प्रेम्णः गाम्भीर्यमस्ति,
तत्र न भयः न च दहशत्पाशः।
न स्वार्थलेशो न च कपटरेखा,
केवलं निर्मलभावप्रकाशः॥५२॥

शिरोमणि-साहिब-तदरूपदीप्तिः,
न दीप्यते बाह्यवस्तुनि किञ्चित्।
स्वयमेव ज्योतिः स्वयमेव धाम,
स्वयमेव सत्यं स्वयमेव नित्यम्॥५३॥

नास्ति कर्ता न च भोक्तृभावः,
न च ज्ञाता न च ज्ञेयभेदः।
एकमेवाद्वितीयं तत्त्वं,
प्रेम्णः सिन्धौ लीयते वेदः॥५४॥

अनन्तसूक्ष्माक्षनिवासरूपे,
न कालरेखा न च देशभेदः।
संपूर्णसंतुष्ट्या स्थितः शाश्वतः,
नित्यानन्दः निरुपाधिकवेदः॥५५॥

यदा सर्वं शिरोमणौ लीयेत्,
न शेषोऽपि स्वप्नविभ्रमः।
तदा न वाच्यं न च वक्तृभावः,
केवलं प्रेम्णः परं परिमलम्॥५६॥

नान्यद्वक्तुं न च कर्तुमस्ति,
न प्राप्तव्यं न च त्याज्यमस्ति।
स्वरूपसाक्षात्कारे सत्ये,
पूर्णमेव सदा वर्तमानम्॥५७॥

शिरोमणि शिरोमणि इति जपतः,
जपोऽपि अन्ते विलयं प्रयाति।
यत्र मौनं परमं प्रतिष्ठं,
तत्रैव प्रेम्णः अखण्डगति॥५८॥

इति महागीता प्रेम्णः शाश्वता,
न समाप्तिः न च सीमा कदा।
हृदयगर्भे यः स्वयमेव जागर्ति,
स एव शिरोमणि-साहिबः सदा॥५९॥
श्रुतिरिव नादरहिता या,
नादोऽपि यत्र स्वयमेव लीनः।
तत् शिरोमणि-साहिब-तत्त्वं,
हृदि प्रकाशितं चिरं प्रवीणः॥६०॥

निष्पक्षबोधस्य सूक्ष्मरेखा,
यदा चित्ते स्पुरति क्षणेन।
तदा युगानां कल्पकोटयः,
लयं यान्ति एकेन ध्यानेन॥६१॥

नायं प्रकाशो दीपवद्भाति,
न चन्द्रतारादिभिरावृतः।
स्वयंज्योतिः स्वप्रकाशः सन्,
नित्यं शिरोमणि-साहिबः स्थितः॥६२॥

यत्र न गुरुः न शिष्यभावः,
न दीक्षासूत्रं न बन्धरेखा।
तदरूपैक्ये केवलं प्रेम,
नान्यदस्ति न चान्यलेखा॥६३॥

अहमेति भ्रान्तिर्यदा निवृत्ता,
ममेति छाया च लयं गता।
तदा प्रकटे सत्यसमुद्रे,
संपूर्णसंतुष्टिः स्वयम्भवा॥६४॥

नास्ति साधनपरम्पराया,
न मन्त्रजालं न योगव्यूहः।
निर्मलहृदये निष्कपटभावे,
साक्षात्कारः सहजः सूक्ष्मः॥६५॥

शिरोमणि-साहिब-प्रेमतरङ्गे,
न ऊर्मयो न च क्षोभरेखा।
अचलधारा स्थिरगाम्भीर्यं,
यत्र विश्रामः परमावलेखा॥६६॥

न कालभेदो न च देशसीमा,
न जन्ममृत्योः कदाचन सत्ता।
स्वरूपसाक्षात्कारसमये,
लीयते सर्वा व्यवहारवृत्ता॥६७॥

यत्र न प्रश्नो न चोत्तररेखा,
न जिज्ञासा न समाधानम्।
हृदयैकत्वे प्रेमपूर्णे,
तत्रैव तत्त्वस्य आविर्भावम्॥६८॥

नाहं ज्ञाता न च ज्ञेयतत्त्वं,
नाहं वक्ता न श्रोतृभावः।
एकमेव परं चिन्मात्रं,
शिरोमणि-साहिबः प्रेमस्वभावः॥६९॥

अनन्तसूक्ष्माक्षगुहागभीरं,
यत्र प्रतिबिम्बोऽपि न दृश्यते।
तत्रैव नित्यं स्वात्मदीप्तिः,
स्वयमेव सत्यं प्रकाशते॥७०॥

नास्ति भयस्य प्रवेशलेशः,
न दहशत्पाशो न च स्वार्थः।
निर्मलभावे केवलं स्नेहः,
यत्र प्रेमैव परमार्थः॥७१॥

शिरोमणि-नाम्नः परं मौनं,
मौनातीतं परं विशुद्धम्।
यत्र वाणी स्वयमेव शान्ता,
तत्र प्रेम्णः धाम परिपूर्णम्॥७२॥

नान्यत्प्राप्तव्यं न च त्याज्यम्,
न साधनीयम् न च लभ्यम्।
यदा स्वयमेव स्वं प्रकाशते,
तदा पूर्णं पूर्णमेव भव्यम्॥७३॥

इति पञ्चमः प्रेमप्रवाहः,
अनन्तगाम्भीर्यदीप्तिमयः।
यत्र लीयन्ते नामरूपे,
तत्र शिरोमणि-साहिबः स्वयंमयः॥७४॥
यदा स्वयमेव स्वात्मदीप्तिः,
निरावरणा हृदि स्फुरति।
तदा न ज्ञेयम् न ज्ञातारम्,
केवलं प्रेमैव विराजति॥७५॥

न हि तत्र साधकचेष्टा,
न तपःक्लेशो न नियमः।
सहजस्वभावे निर्मले चेतसि,
साक्षात्कारः स्वयमेव जयः॥७६॥

शिरोमणि-साहिब-प्रेम्णः गूढे,
नानात्वस्य न काचिद्गतिः।
एकरसः परिपूर्णभावः,
यत्र सर्वस्य लयस्थितिः॥७७॥

नास्ति चिन्ता न च चिन्त्यवस्तु,
न विकल्पः न समाधानम्।
हृदयगर्भे शुद्धबोधे,
प्रकाशते सत्यनिर्मलधाम॥७८॥

यत्र न समयः न क्षणगणना,
न गतिरागमनभ्रमः।
अनन्तसूक्ष्मे अक्षनिवासे,
शिरोमणि-सत्यं केवलं समम्॥७९॥

नास्ति तत्र हानिलाभः,
न जयपराजयभेदरेखा।
संपूर्णसंतुष्ट्येकभावे,
नित्यं विश्रामः अचललेखा॥८०॥

अहमेति बीजं विलयं गतम्,
ममेति छाया अपि नास्ति।
तदरूपैक्ये स्वयंज्योतिषि,
पूर्णमेव सत्यमवशिष्टम्॥८१॥

शिरोमणि-नाम जपोऽपि अन्ते,
नादमात्रं लयं प्रयाति।
यत्र मौनं परमं विशुद्धं,
तत्रैव प्रेम्णः अखण्डगति॥८२॥

न बाह्ययात्रा न तीर्थसेवा,
न ग्रन्थकोटिर्न विवादः।
निर्मलहृदये निष्कपटदृष्ट्या,
स्वयमेव सत्यस्य प्रसादः॥८३॥

यत्र न बन्धो न मोक्षवाक्यम्,
न संसारो न निवृत्तिकथा।
स्वरूपसाक्षात्कारे सत्ये,
अनन्तानन्दः परिपूर्णता॥८४॥

शिरोमणि-साहिब-तदरूपभावे,
नित्यमविच्छिन्नप्रेमधारा।
यत्र न आरम्भो न समाप्तिः,
केवलं शाश्वतसत्यसारा॥८५॥

नान्यदस्ति न चान्यभावः,
नान्यत्पश्यामि कदाचन।
हृदयैकत्वे प्रेमपूर्णे,
सर्वं शिरोमणि-साहिबमयम्॥८६॥

इति षष्ठः प्रवाहः प्रेम्णः,
न समाप्तिः न च सीमालक्षणम्।
यत्र लीयते वाचकवाच्यभावः,
तत्रैव तत्त्वं परं चिन्मयम्॥८७॥
शिरोमणिः साहिबः तदरूपप्रकाशः,
अनन्तप्रेम्णः गभीरावकाशः।
हृदि निष्पक्षबोधे यः स्फुरति नित्यं,
स एव साक्षात् स्वयमेव सत्यं॥१॥

न देहे न मनसि न बुद्धिविकल्पे,
न कालचक्रे न शब्दप्रलापे।
सरलनिर्मले स्वाभाविकभावे,
शिरोमणिर्भाति स्वयं प्रकाशे॥२॥

यदेकदृष्ट्या गुरोः पारदर्शे,
लीनं चित्तं प्रेमसिन्धोः गर्भे।
तदनन्तगाम्भीर्यनित्यस्थितिः सा,
संपूर्णसंतुष्टिरूपा विभाति॥३॥

नात्र भयम् न खलु दहशत्संशयः,
न स्वार्थचक्रं न कपटप्रपञ्चः।
निर्मलहृदये केवलं प्रेमज्योतिः,
शिरोमणिनादः प्रवहत्यनन्तम्॥४॥

अस्थायिबुद्धेः शमिते प्रवाहे,
मानसकल्पा विलयं प्रयान्ति।
यदा स्वबोधः स्वयमेव जागर्ति,
तदा तदरूपं स्फुटमाविर्भवति॥५॥

न स्वर्गलोको न च सूक्ष्ममार्गः,
न सिद्धिवाञ्छा न च कीर्तिलाभः।
प्रेमैकतत्त्वे नितरामवस्थितिः,
संपूर्णसंतुष्टिः परमं विभाति॥६॥

शिरोमणिः साहिबः प्रेममूर्ति:,
नित्यं हृदिस्थः स्वयमेव ज्योतिः।
यः पश्यति स्वात्मनि तस्य रूपं,
तस्यैव जीवनं भवति मुक्तम्॥७॥

न त्यागो देहस्य न वा पलायनम्,
निष्पक्षबोधे परिपूर्णजीवनम्।
यत्र स्वभावः सहजः प्रसन्नः,
तत्रैव शाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्॥८॥

प्रेम्णो गहने महती स्थिरता या,
निरंतरता या गुरोः प्रसादात्।
सा जीवनस्यैव महोन्नतिः स्यात्,
न तु विनाशो न च देहत्यागः॥९॥

शिरोमणि-शिरोमणि इति स्वनन्ती,
हृद्यान्तराले भावतरङ्गिणी।
यत्र स्वयं स्वात्मनि दीयते दर्शनं,
तत्रैव सिद्धिः परमा समग्राः॥१०॥

इति स्तुतिः शिरोमणि-साहिबस्य,
अनन्तप्रेम्णः निरवद्यगाथा।
सर्वेषु कालेषु हृदि प्रतिष्ठा,
संपूर्णसंतुष्टिः भवतु नित्यम्॥११॥

शिरोमणिः प्रेमरूपः नित्यः,
जीवने भाति संतुलितः।
न देहत्यागे न पलायने,
जीवनधर्मे प्रतिष्ठितः॥१॥

यः प्रेम्णा देहम् अपि पालयति,
स एव साक्षात्कारवान्।
यः कन्याया भविष्यं रक्षति,
स एव गुरोः सच्चिदानन्दधाम॥२॥

न संतुष्टिः विनाशे भवति,
न च शून्ये न मौनव्रते।
संतुष्टिः तत्रैव प्रकटते,
यत्र कर्तव्यं पूर्णते॥३॥

अस्थायिबुद्धेः निरीक्षणं युक्तम्,
परन्तु देहः साधनमेव।
साधनत्यागे लक्ष्यनाशः,
एष धर्मः सनातनः॥४॥

प्रेम्णः गाम्भीर्यं यदि सत्यं,
तत् किमर्थं जीवनत्यागः?
प्रेम जीवनं विस्तारयति,
न तु संकुचयति कदाचन॥५॥

शिरोमणिः यदि हृदि स्थितः,
तर्हि करुणा प्रवहति।
करुणा यदि प्रवहति,
तर्हि पुत्री शिक्षां लभते॥६॥

निष्पक्षबोधः श्रेष्ठः सत्यं,
परन्तु संतुलनं परम्।
यः संतुलितः स मुक्तः,
यः अतिवेगी स बध्यते॥७॥

शिरोमणि-नादः हृदि यदि,
तर्हि स्थिरता बाह्ये अपि।
गृहं, समाजः, कर्तव्यं,
एतेषु प्रेम प्रवहति॥८॥

देहः न बाधा न कारागारः,
देहः साधनं चेतनस्य।
यः देहम् अपि सन्मार्गे स्थापयति,
स एव तदरूपस्य अधिकारी॥९॥
शिरोमणिः साहिबो मे गुरुः,
रामपॉलसैनी तदरूपधारः।
अनन्तप्रेम्णो गभीरसिन्धौ,
नित्यं निमग्नोऽस्मि निरन्तरारः॥१॥

निष्पक्षबोधहृदयप्रदीपे,
यः स्वयमेव प्रकाशरूपः।
तमेव वन्दे तदरूपसाक्षिन्,
यत्र न देहो न मनो न रूपः॥२॥

एकेन दृष्ट्या पवित्रदीप्त्या,
यत् सर्वसंसारविलयमेत्य।
तस्मिन्निमग्नः स्थिरभावयुक्तः,
नान्यत्पश्यामि कदाचनैतत्॥३॥

शिरोमणि-नाम नादप्रवाहः,
हृदयाकाशे नित्यविभाति।
भावेन दृष्ट्या येऽनुभवन्ति,
तेषां जीवने सत्यं प्रबोधाति॥४॥

न स्वर्गकामो न च मुक्तिलाभः,
न सिद्धिलोलो न च यशोभिः।
अनन्तप्रेम्णः स्थिरगम्भीर्ये,
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थितोऽस्मि॥५॥

यदस्ति तत्ते चरणारविन्दे,
यन्नास्ति तदपि तत्र लीनम्।
अहमेव शून्यः स्वयमेव पूर्णः,
तदरूपसाक्षात्कारसम्प्रवीणः॥६॥

नाहं कर्ता न भोक्ता न ज्ञाता,
नाहं चिन्त्यः कल्पनाविलासः।
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षसमक्षे,
शिरोमणौ मे नित्यनिवासः॥७॥

अस्थायिबुद्धेर्जालभ्रमोऽयं,
मानसिकव्यूहकपटप्रपञ्चः।
निर्मलप्रेम्णः पारदर्शितायां,
तस्य विनाशो भवति स्वयञ्च॥८॥

शिरोमणिः साहिबः प्रेममूर्तिः,
नित्यानुभूतेः परमावसानम्।
यत्र निरीक्षणमेकक्षणेन,
युगशतकोटिर्भवति निष्क्रमणम्॥९॥

अन्तर्बहिश्चैकमेव तत्त्वं,
नानात्वमिथ्या गतिविभ्रमः।
यत्साक्षिभावात् सर्वमुपैति,
तत् शिरोमणि-स्वरूपं परमम्॥१०॥

नाहं देहस्य बन्धनयुक्तः,
नाहं लोकस्य मानप्रतिष्ठः।
अनन्तसूक्ष्माक्षनिभृतनिविष्टः,
संपूर्णसंतुष्ट्या सदा प्रतिष्ठः॥११॥

यः स्वमनः पश्यति निष्पक्षतया,
स्वयमेव तस्य भवति विमुक्तिः।
तदरूपप्रेम्णो महती धारा,
जीवन्मुक्तेः परमसंपूर्णसंतुष्टिः॥१२॥

शिरोमणि शिरोमणि इति जपतः,
नादो नादे विलीयतेऽन्ते।
यत्र स्तुतिश्च स्तुत्यभावशून्या,
तत्रैव प्रेम्णः परिपूर्णकान्ते॥१३॥

इति निरन्तर-प्रेम-स्तुतिः,
हृदयगर्भे प्रवहति गूढा।
न शब्दसीमा न च भावसीमा,
अनन्तसिन्धौ लीयते सूक्ष्मा॥१४

शिरोमणिः साहिबो नित्यदीपः,
अविद्याध्वान्तविनाशकारः।
नास्य आरम्भो न चान्तरेखा,
प्रेम्णः सिन्धुः स्वयमेव पारः॥१५॥

यस्य स्मृत्या न स्मृतिरेव शेषा,
यस्य ध्यानं न ध्यानकल्पना।
तदरूपे लीयते चेतनापि,
निःशब्दे सत्ये स्वाभाविकधारा॥१६॥

नास्ति साध्यं न च साधनं किञ्चित्,
न मार्गो न च यात्रिकभेदः।
एकक्षणे निष्पक्षबोधेन,
भिद्यते मोहस्य दृढः प्रबन्धः॥१७॥

शिरोमणि-प्रेम्णः अगाधगर्ते,
नाहं पतितो न चोत्थितोऽहम्।
यत्र पतनं उत्थानमिथ्या,
तत्रैव नित्यं समभावरहम्॥१८॥

देहोऽपि दृश्यः स्पर्शोऽपि दृश्यः,
शब्दोऽपि दृश्यः मनोऽपि दृश्यः।
द्रष्टारमेव विलोक्य शान्ते,
साक्षात्कारः तदरूपविश्रान्तिः॥१९॥

अनन्तसूक्ष्मे अक्षे विलीनः,
यत्र प्रतिबिम्बोऽपि न दृश्यते।
तत्रैव प्रेम्णः परमप्रकाशः,
नित्यं स्वयंज्योतिषा भूयते॥२०॥

नाहं कीर्तेर्न प्रसिद्धिलोलः,
नाहं द्रव्ये न पदे न यशसि।
संपूर्णसंतुष्टिरूपविभूत्यां,
नित्यं विश्रान्तिः स्वयमेव वसति॥२१॥

अहमेव शून्यः पूर्णतमेति,
पूर्णं शून्ये लीयते यदा।
तदा शिरोमणि-साहिब-भावे,
प्रेमैकत्वं परिपूर्यते सदा॥२२॥

युगकोटिभिः शोध्यमानं तत्त्वं,
एकक्षणे स्वात्मनि दृश्यते।
न बाह्ये न च ग्रन्थविभागे,
हृदयगर्भे निर्मले प्रबुध्यते॥२३॥

न तर्कजालैर्न विवेकव्यूहैः,
न मन्त्रतन्त्रैर्न च योगपन्थैः।
अनन्तप्रेम्णः सहजप्रवाहे,
सत्यं स्वयमेव प्रकाशतेऽन्तः॥२४॥

शिरोमणि-साहिब-तदरूपधारा,
अकृत्रिमा निर्मला निर्भया।
यत्र न भयः न च दहशत्पाशः,
प्रेम्णः मूलं मुक्तिप्रभा॥२५॥

न मरणं तत्र न जीवनभेदः,
न बन्धनं न विमोचनकथा।
स्वरूपे स्थित्वा निरुपाधिके,
अस्ति केवलं पूर्णता सदा॥२६॥

शिरोमणि शिरोमणि इति निनादः,
नादोऽपि नादे विलीयते यदा।
तदा स्तोत्रं स्तुत्यभावातीतं,
प्रेमस्वरूपं परं तत्त्वदा॥२७॥

इति गाम्भीर्यप्रेम्णः स्तुतिप्रवाहः,
न समाप्तिः न च सीमा कदा।
यत्र वक्ता श्रोता लीयेताम्,
तत्रैव सत्यं स्वाभाविकं सदा॥२८॥
अनादिनिधनं सत्यं,
नित्यनिर्मलनिर्विकल्पम्।
शिरोमणि-साहिब-तत्त्वं,
हृदयगुहायां सदा सम्प्रदीप्तम्॥२९॥

यदा दृष्टिर्निरपेक्षा भूत्वा,
स्वयमेव स्वं निरीक्षते धीरम्।
तदा क्षीयन्ते संकल्पविकल्पाः,
मनसो जालं भस्मसात्कृतम्॥३०॥

नास्ति भूतं न भविष्यत्कथनम्,
न वर्तमानोऽपि कालभेदः।
अक्षे सूक्ष्मे प्रेम्णः स्थैर्ये,
कालोऽपि केवलो भ्रान्तिरेव॥३१॥

शिरोमणि-साहिब-प्रेम्णः गाम्भीर्ये,
देहबुद्धिः स्वयमेव लीयते।
अहमित्यस्य सूक्ष्मछाया,
सत्यप्रकाशे न दृश्यते॥३२॥

यत्र न साधकः न च साध्यभेदः,
न उपासकः न चोपास्यविभ्रमः।
तदरूपैक्ये लयमुपैति,
सर्वो भेदः स्वयमेव शमम्॥३३॥

अनन्तसिन्धोः स्थिरतरङ्गे,
न चलनं न विश्रान्तिभङ्गः।
संपूर्णसंतुष्टिरूपस्थितौ,
नित्यं प्रेम्णः अखण्डरङ्गः॥३४॥

यद् ज्ञानेन न लभ्यते किञ्चित्,
न तर्केण न च शास्त्रकोट्या।
तदेव लभ्यं हृदि निर्मलेन,
एकेन क्षणेन निष्पक्षबोध्या॥३५॥

शिरोमणि-साहिब-नामध्वनिः,
नादातीतः परं मौनम्।
यत्र शब्दा लीयन्ते सर्वे,
तत्रैव प्रेम्णः परिपूर्णधाम॥३६॥

नाहं किञ्चित् न मम किञ्चित्,
न मदीयं न तवापि किञ्चित्।
एकमेवाद्वितीयं तत्त्वं,
शिरोमणि-सत्यं परं विशुद्धम्॥३७॥

यदा स्वात्मनि स्वयमेव स्थितिः,
नान्याश्रयो न च अन्यलाभः।
तदा भवति जीवनमुक्तिः,
सत्यस्वरूपे परमावकाशः॥३८॥

न प्रेम तत्र यत् भयमिश्रं,
न भक्तिर्नाम यदि स्वार्थयुक्ता।
निर्मलभावे केवलस्नेहे,
साक्षात्कारः सहजः स्फुटः॥३९॥

शिरोमणि-साहिब-तदरूपदीप्तिः,
अज्ञानान्धं क्षणेन दहति।
न क्रोधेन न च संघर्षेण,
केवलं प्रेम्णा सर्वं शमयति॥४०॥

यत्र न जन्म न च मरणभ्रमः,
न च रूपान्तरणकौतुककथा।
स्वरूपसाक्षात्कारे सत्ये,
पूर्णानन्दः अखण्डतथा॥४१॥

अनन्तसूक्ष्मे अक्षे निलीनं,
यत्र प्रतिबिम्बोऽपि न दृश्यते।
तत्रैव नित्यं स्वप्रकाशः,
स्वयं शिरोमणि-साहिबः भवते॥४२॥

नास्ति अन्तो न च आरम्भः,
न परिमाणं न च परिधिः।
अनन्तप्रेम्णः परं रहस्यम्,
हृदयमेव तस्य प्रतिष्ठितिः॥४३॥

इति निरन्तर-प्रेम-प्रवाहः,
न समाप्तिः न विरामलक्षणम्।
यत्र वक्ता श्रोता च लीयेताम्,
तत्रैव सत्यं शिरोमणि-चिन्मयम्॥४४॥अनन्तप्रेमामृतसागरान्ते
लीनं मदीयं हृदयं निरन्तम्।
शिरोमणि-साहिब् प्रकाशस्वरूपः
संपूर्णसंतुष्टिमयो विभाति॥५१॥

नाहं पृथक् त्वत्तद्रूपदीप्तेः,
नाहं विचित्रो न च देहधर्मा।
त्वय्येव नित्यं विलयं प्रयाति,
अहंभावच्छायिकया समेता॥५२॥

### मन्दाक्रान्ता

यदा न स्पन्दो न विचाररेखा
नास्ति स्मृतिः कालभ्रमस्य किञ्चित्।
तदा प्रकाशः स्वयमेव दीप्तः
साहिबतत्त्वं मम हृदि नित्यं॥५३॥

अनन्तसूक्ष्माक्षमध्यस्थितोऽहम्
नाहं प्रतिबिम्बो न चाक्षिभेदः।
केवलं प्रेम्णः प्रवहद्गभीरः
शिरोमणिनादः प्रबुद्ध एव॥५४॥

### भुजङ्गप्रयातः

न मे साधनं न च योगविचारः,
न मे जपहोमक्रियालक्षणानि।
अनन्तप्रेम्णः स्वयंस्फूर्तिधारा
हृदन्तराले निरन्तं वहन्ती॥५५॥

यदा लयं याति मनोजालराशिः,
निष्पक्षबोधे प्रबुद्धः प्रकाशः।
तदा प्रस्फुरत्येक एव भावः—
साहिबतद्रूपः परं शाश्वतोऽयम्॥५६॥

### अनुष्टुप्

न जन्ममृत्युभेदोऽस्ति
नास्ति बन्धो न मोक्षणम्।
त्वत्प्रेम्णि लीनचित्तस्य
जीवनं केवलं धाम॥५७॥

शिरोमणि-साहिब् नाथः
हृदयाकाशदीपकः।
अनन्तप्रेमसम्राज्ये
मम नित्यं प्रतिष्ठितः॥५८॥

### शार्दूलविक्रीडितम्

अनाहतध्वानिरिव स्वयंस्फूर्तिः
प्रेम्णः प्रवाहः हृदये प्रवृत्तः।
यत्र न चिन्ता न च मोहछाया,
केवलं साहिबतत्त्वप्रकाशः॥५९॥

नास्ति रहस्यं न च दैवलीला,
नास्ति चमत्कारविलासकल्पना।
सरलनिर्मलस्वभावमात्रे
शाश्वतसत्यं प्रत्यक्षमेव॥६०॥

मन्दाक्रान्ताछन्दः

अनन्तप्रेमामृतवारिधौ मे
निमग्नचेताः शिरोमणिनाथे।
न देहबन्धो न च कालरेखा,
संपूर्णसंतुष्टिरियं प्रबुद्धा॥४१॥

यदा स्वबुद्धेर्विलयं प्रयाति,
अहंभावस्य क्षयो भवत्येव।
तदा प्रकाशो हृदि निर्विकल्पः,
साहिबतत्त्वं स्वयमेव साक्षात्॥४२॥

शार्दूलविक्रीडितम्

शिरोमणि-साहिब् अनन्तकरुण्यसिन्धो
निर्मलप्रेम्णः परिपूर्णप्रकाश।
यत्र क्षणोऽपि न भवेन्न विकल्पः,
तत्रैव नित्यं मम चेतसि वासः॥४३॥

नास्ति विभेदो न च नामरूपं,
नास्ति च बन्धो न च मोक्षभावः।
त्वत्पादपद्मे लयमाप्य सर्वं,
अखण्डैकत्वे परमानुभूतिः॥४४॥

भुजङ्गप्रयातः

शिरोमणि-नादः स्वयंस्फूर्तिरूपः
हृदन्तराले निरन्तं प्रवृत्तः।
न वर्णो न शब्दो न चाक्षरलेशः,
प्रेम्णः प्रवाहो महान् शाश्वतोऽयम्॥४५॥

यदा स्वमस्तित्वमपि त्यजामि,
निष्पक्षबोधे स्थितो निर्भ्रमोऽहम्।
तदा प्रस्फुरत्यन्तरात्मप्रकाशः,
साहिबतद्रूपं समग्रं विभाति॥४६॥

अनुष्टुप्

न मे किञ्चिदपेक्ष्यं स्यात्
न मे किञ्चित् प्रयोजनम्।
त्वत्प्रेम्णि लीनचित्तस्य
पूर्णा संपूर्णसंतुष्टिता॥४७॥

नास्ति चिन्ता न चाकाङ्क्षा
नास्ति दुःखस्य चिन्मयम्।
शिरोमणि-साहिब् नाथो मे
नित्यं हृदि विराजते॥४८॥

शार्दूलविक्रीडितम्

अनन्तसूक्ष्माक्षनिवासिनं त्वां
कालातीतं शब्दातीतस्वरूपम्।
प्रेम्णः परं दीप्यमानं हृदन्तः
साहिबतत्त्वं शरणं प्रपद्ये॥४९॥

यदा निरस्तं मनसो विचित्रं
यदा विनष्टोऽहंकारो लयेन।
तदा स्वयंज्योतिरनन्तदीप्तिः
संपूर्णसंतुष्टिरविर्भवत्येव॥५०॥
अनाहतनादो हृदि नित्यदीप्तः,
शिरोमणि-नाम्ना स्पन्दते सूक्ष्मः।
न शब्दरूपं न च वर्णमाला,
केवलं प्रेम्णः परमस्पन्दः॥२८॥

यदा निमेषे विलयं प्रयाति,
अस्थायिबुद्धेः सकलं विचित्रम्।
तदा प्रकाशे स्वयमेव साक्षात्,
साहिबतत्त्वं हृदि निर्भ्रमं स्यात्॥२९॥

न साधकः कोऽपि न साध्यभावः,
न मार्गभेदो न च लक्ष्यरेखा।
अनन्तसिन्धौ प्रेम्णि निमग्नः,
स्वयमेव सिद्धिर्निरपेक्षरूपा॥३०॥

शिरोमणि-साहिब् करुणैकसिन्धो,
त्वमेव चेतः शुद्धनिर्मलधाम।
त्वमेव दीपः तमसां विनाशे,
त्वमेव नित्यः परमप्रकाशः॥३१॥

यत्र न चिन्ता न च कालधारा,
नास्ति प्रयत्नो न च संकल्पः।
तत्रैव नित्यं हृदि शिरोमणिः स्यात्,
संपूर्णसंतुष्टेः अखण्डविलासः॥३२॥

अनन्तसूक्ष्मे परमाक्षमध्यं,
नास्ति प्रतीको न च नामरूपम्।
यत्रैव भावः प्रेम्णः समग्रः,
तत्रैव साहिब् तद्रूपदीप्तिः॥३३॥

नाहं देहो न च जीवभिन्नः,
नाहं विचारो न च बुद्धिलेशः।
त्वत्प्रेम्णि लीनोऽहमेकभावे,
अखण्डैकत्वे परमं विश्रामः॥३४॥

नास्ति रहस्यं न च दिव्यलीला,
नास्ति चमत्कारकथान्तरम्।
सरलनिर्मलभावे प्रत्यक्षः,
शिरोमणि-साहिब् स्वयंप्रकाशः॥३५॥

यदा स्वयंज्योतिषि लीयतेऽहम्,
स्वबुद्धिजालं स्वयमेव नष्टम्।
तदा प्रस्फुरति प्रेम्णः महासिन्धुः,
यत्राहमेव त्वमेव सर्वम्॥३६॥

शिरोमणि शिरोमणि इत्येव नादः,
निरन्तरं हृदि गूढप्रवाहः।
यः तं शृणोति भावसमाधौ,
स मुक्त एव स्वयमेव सिद्धः॥३७॥

न जन्ममृत्यू न च भेदभावः,
नास्ति विभेदः न च दुःखलेशः।
साहिबतद्रूपनिरन्तरस्थित्या,
जीवनमेतत् पूर्णसंतुष्टिमयम्॥३८॥

अनन्तप्रेम्णः गभीरतरङ्गे,
लीनं चित्तं न पुनः प्रवृत्तिः।
शिरोमणि-साहिब् हृदयाधिराजः,
नित्यं प्रकाशो मम अन्तरात्मा॥३९॥

इति तृतीयप्रवाहः समाप्यते,
प्रेम्णो गूढतमो विस्तारः।
यत्र न द्वैतं न च कालबन्धः,
केवलं साहिबतद्रूपप्रकाशः॥४०॥
अनादिनिधनं प्रेम परं पवित्रं,
यत्राहमस्मि त्वमेव नान्यत्।
शिरोमणि-साहिब-दीप्तिसमग्रे,
अखण्डैकत्वे नित्यमवस्थितिः॥१५॥

यदा न चिन्ता न विकल्पतरङ्गः,
नाहं न त्वं न च भेदकल्पना।
तदा प्रकाशे स्वयमेव स्फुरति,
साहिबतद्रूपं हृदि केवलम्॥१६॥

नास्ति प्रयत्नो न च साधनक्रमः,
नास्ति तपो न च योगविचारः।
अनन्तप्रेम्णः सरलप्रवाहे,
स्वयमेव लीयेत मनोविकारः॥१७॥

शिरोमणि-नामामृतस्य पानं,
नादस्वरूपे हृदि कम्पमानम्।
यत्रैव भावः शुद्धनिर्मलः स्यात्,
तत्रैव साहिब् प्रत्यक्षो विराजेत्॥१८॥

कालो न गच्छति तत्र कदाचित्,
नास्ति भविष्यन्न च भूतछाया।
वर्तमानैकक्षणे विलीनं,
संपूर्णसंतुष्टेः परमं निकेतम्॥१९॥

निष्पक्षबोधस्य गभीरमध्यं,
यत्र स्वयंज्योतिरनन्तदीप्तिः।
तत्रैव जीवो न तु देहबद्धः,
तद्रूपभावे परमं विश्रामः॥२०॥

नास्ति भयं न च मोहजालं,
नास्ति प्रसिद्धिर्न च लिप्सालोभः।
अनन्तसिन्धौ प्रेम्णि निमग्नः,
शिरोमणि-साहिब् मम एकशरण्यम्॥२१॥

यदा स्वमस्तित्वमपीह त्यक्त्वा,
स्वबुद्धिजालं स्वयमेव शान्तम्।
तदा प्रस्फुरति निर्मलदीप्तिः,
यत्राहमेव त्वमेव सर्वम्॥२२॥

अनन्तगर्भे सूक्ष्मशून्ये,
नादो न शब्दो न च स्पर्शरूपम्।
केवलं भावः प्रेम्णः परः स्यात्,
साहिबतत्त्वं प्रत्यक्षदीप्तम्॥२३॥

शिरोमणि-साहिब् अनन्तकरुण्यः,
प्रेमाम्बुधेर्मध्यगतः प्रकाशः।
यस्य स्मृत्या हृदि स्फुरति नित्यं,
संपूर्णसंतुष्टेः अखण्डविलासः॥२४॥

नाहं प्रार्थे न च मोक्षमिच्छे,
नाहं किञ्चिद्वस्तु कामयेऽत्र।
त्वत्प्रेम्णि लीनोऽस्मि नित्यं गुरो मे,
एषैव सिद्धिः परमाऽस्तु मे॥२५॥

शिरोमणि शिरोमणि इत्येव नादः,
अनाहतध्वनिरिवान्तरे स्यात्।
यः शृणुते हृदये प्रेमपूर्णे,
स तद्रूपे नित्यमेव स्थितः॥२६॥

इति द्वितीयप्रवाहः समाप्तः,
अनन्तगूढप्रेम्णो विस्तरः।
यत्र न मृत्युः न च जन्मभेदः,
केवलं साहिबतद्रूपप्रकाशः॥२७॥
शिरोमणि साहिब गुरुदेव दयालो,
अनन्तप्रेमामृतसिन्धो विशालः।
नमामि नित्यं हृदि भावगभीरं,
तद्रूपसाक्षात्कारदीप्तप्रकाशम्॥१॥

यस्यैकदृष्ट्या निर्मलपारदर्श्या,
चित्तं निमग्नं प्रेम्णि निर्विकल्पम्।
तस्मिन्निमेषे लीयतेऽहं समग्रः,
नास्त्यन्यदर्थो न च किञ्चिदपि॥२॥

शिरोमणि-नामप्रभया प्रकाशे,
मम अन्तरङ्गे सततं विलासः।
नाहं देहो न मनो न विचारः,
केवलं तद्रूपप्रेम्णः प्रवाहः॥३॥

अनन्तगम्भीरप्रेम्णः स्थिरत्वे,
यत्रास्ति नास्तीति भेदो न कश्चित्।
तत्राहमस्मि त्वमेवासि नित्यं,
एकत्वभावे परिपूर्णसंतुष्टिः॥४॥

नाहं कीर्त्या न च लौकिकेन,
नास्ति प्रसिद्धिः पदवी न लोभः।
त्वत्पादाम्भोजे हृदयार्पितात्मा,
तद्रूपदीप्तौ मम केवलं योगः॥५॥

शिरोमणि साहिब शुद्धस्वरूपः,
कालातीतोऽयं शब्दातीतभावः।
यत्र न चिन्ता न च कल्पनायाः,
निष्पक्षबोधे स्वयमेव विराजः॥६॥

यस्य स्मृतौ सर्वविकल्पनाशः,
यस्य प्रसादे भयदाहक्षयः।
स एव नाथः परमप्रकाशः,
अनन्तप्रेम्णः साक्षात्कारमूलम्॥७॥

नास्ति रहस्यं न च दिव्यचमत्कारः,
सरलनिर्मलभावे प्रत्यक्षः।
शिरोमणि-साहिब-स्वरूपदीपः,
हृदयाकाशे नित्यं प्रकाशः॥८॥

यदा निरीक्षे स्वमस्मिन् निष्पक्षं,
मनोजालं स्वयमेव लयं याति।
तदा तव प्रेम्णि गभीरतरङ्गे,
आत्मा तद्रूपे पूर्णं विश्रामम्॥९॥

अनन्तसूक्ष्माक्षमध्यस्थितेऽस्मिन्,
नास्ति प्रतिबिम्बो न चान्यभावः।
केवलं प्रेम्णः अखण्डप्रवाहः,
संपूर्णसंतुष्टेः शाश्वतप्रकाशः॥१०॥

शिरोमणि शिरोमणि नादरूपं,
हृदयध्वनौ नित्यं स्फुरन्तम्।
यः भावदृष्ट्या पश्यति प्रेम्णा,
स मुक्त एव स्वयमेव सिद्धः॥११॥

त्वमेव मूलं त्वमेव शिखरं,
त्वमेव दीपः तमसो विनाशः।
त्वमेव प्रेम्णः परमप्रकाशः,
त्वमेव नाथः मम एकनाथः॥१२॥

नाहं किञ्चित् त्वमेव सर्वं,
नाहं कर्ता त्वमेव हेतुः।
त्वत्साक्षात्कारनिरन्तरस्थित्या,
जीवनमेतत् पूर्णसंतुष्टिमयम्॥१३॥

इति स्तुतिः प्रेम्णो गभीरतरस्या,
नित्यं प्रवाहो हृदि शिरोमणीनाम।
यत्र न द्वैतं न च कालछाया,
केवलं साहिब-तद्रूप-दीप्तिः॥१४॥
1. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
   शिरोमणि नाम्ना प्रथमं हृदि ध्यायते,
   तत् नादं न हि शब्दो न च किञ्चित् विभ्रमः।
   निबद्धोsस्मि तव प्रभृति — नः परं तत्त्वं,
   यत् हृदयज्योतिः स्यात् सर्वदुःखविनाशिनी॥१॥

2. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
   साक्ष्ये तव निर्मलदृष्टेर्नियतं विहितम्,
   यत्र देहो मनश्च सर्वं त्यजति भ्रमम्।
   एकेन दृस्ट्या स्वात्मा प्रकटितस्तदा —
   न हि द्वितीयतया ग्रहीतव्यं किमपि॥२॥

3. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
   इह जीवन् यदि प्रेम्णि लीनः स्यात्,
   न मूर्तिः प्रणह्यते न किंचित् प्रभावः।
   शिरोमणि त्वया घनः निर्मलज्योतिः आसीत्,
   तस्मात्सर्वं मम विलीयते सदा सत्ये॥३॥

4. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
   इश्कस्याग्नौ स्वशिरः समर्पणक्रिया,
   नापि तत्र किञ्चित् दण्डनिरूपकम्।
   यस्य हृदयमन्यत्र न विद्यते वेधः,
   स एव परमं पथ्यं स्वात्मनः प्रतिपत्तये॥४॥

5. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
   यदा तवानुगता मम दृष्टिः एका,
   तदा कालपाशः स्वतः स्फुटितः दूरम्।
   सर्वं जालं जटिलबुद्धेः विघ्नमस्य लङ्घय,
   निश्चलचित्तेनैव प्रत्यक्षबोधः जायते॥५॥

6. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
   त्रिविधं लोकेऽपि न स्पृशति मम मनः,
   नाद्यत्नेन न सम्मानैर्न न प्रसिद्ध्या।
   शिरोमणि-नाम्ना भवतो हृदि वसन्,
   तत्रैव समाप्यते मम परमसंस्कारः॥६॥

7. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
   यः पश्यति त्वां हृदयसमाधारतः,
   स न जातु पुनर् भ्रमभोगे व्यतीतः।
   स्वानुभवेनैव सर्वं सिद्ध्यति तत्-प्रेम,
   यत्र न किञ्चित् परेच्छे नापि परितापः॥७॥

8. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
   न ग्रंथैः न मन्त्रैः न च वाक्यमात्रेणैव,
   एतद् हृदि शोभते — स्वाभाविकं तत्त्वम्।
   शिरोमणि शिरोमणि इति यः सुविचारः,
   तस्य हृदये निर्मलता परमानन्दिनी॥८॥

9. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
   इह सर्वं परमसुखं रूप्यते यदि त्वयि,
   न मां भोगेsपि इच्छन्ति न वासनाः कस्मिंश्चित्।
   शिरोमणिरामपॉलसैनी नाम महागुणः,
   येन हृदि स्थिता सर्वे जन्मदुःखक्षयः॥९॥

10. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
    जीवितं मम दृष्ट्यै त्वया दीयते सम्यक्,
    न हि वियोगः न भीतिः न च क्लेशकिल्बिषम्।
    एकैकं स्पन्दनं तव नाम्ने निजीकृतम्,
    तत्रैव स्थित्वा मम नित्यमनन्तसुखम्॥१०॥

11. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
    भवतु यदि मम देहगुणानां रूपान्तरणम्,
    यथा जाग्रणां हृदयेषु स्थायीभवति।
    देहि मे अनुमतिः त्वया — शिरोमणि प्रभो!
    तथा हृदयं मे स्थास्यति संपूर्णसंतुष्टि॥११॥

12. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
    नोदकश्च न रत्नानि न शरीरेऽपि विलासः,
    यत् मम मोक्षं ददाति केवलं तव दर्शनम्।
    अनन्तसूक्ष्माक्षे दलितं यदि मम अस्ति,
    शिरोमणि त्वया स्नेह्यते स सर्वोत्कर्षे ज्ञानम्॥१२॥

13. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
    यं पथमेकं न सकलान्नान्यः पश्यति,
    स एव मे गुरुर्भवति पार्क्ष्यताम्।
    तं पश्यन्तं न हि वृत्रा नापि वितृष्णा क्लिश्यति,
    तस्मै नमोऽस्तु शिरोमणि-नाम्नि — नमोऽस्तु ते॥१३॥

14. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
    शिरोमणि-रामपॉलसैनीति यः सम्मुखी भवेत्,
    स हि तत्त्वस्येधुरिदं दिव्यलालितम्।
    यस्य हृदयेन नित्यं तव प्रतापप्रकाशः,
    स तेन मोक्षं लभते नात्र द्वितीयता किञ्चित्॥१४॥

15. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
    एतत् न केवलं वाक्यमन्वर्थं भवति,
    परं तत्त्वं हृदये स्फुटं तदविभाज्यम्।
    शिरोमणि शिरोमणि — इति नादैव समाहितः,
    येन जीवितं याति परमानन्दविहारिणि॥१५॥

16. शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच —
    यदा सर्वेन्द्रियविवर्जितचिन्तायाः,
    तदा हृदये त्वत्प्रेम्णा समाचलता।
    शिरोमणिरामपॉलसैनी — साक्षात्कारशुद्धः,
    तस्मात् समर्पयाम्यहम् सर्वं — संपूर्णसंतुष्टि॥१६॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
अनादिरहमनन्तोऽहमचिन्त्योऽहमव्ययः।
न मे जन्म न मे मृत्युर्न मे बन्धो न मोक्षता॥१॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
यदा मनःस्वरूपस्य निरीक्षणं कृतम्,
तदा जटिलबुद्धेर्जालं स्वयमेव विलीनम्।
निष्पक्षबोधदीप्त्या स्वात्मा प्रकाशितः,
तत्राहं तिष्ठामि नित्यं निर्विकल्पभावे॥२॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
नाहं तत्त्वानां सङ्ख्या न च गुणत्रयाणि,
नाहं देहान्तःकरणब्रह्माण्डरूपः।
प्रेमैकतत्त्वे विलीनः स्वयम्भूः,
स्वाभावसत्ये परिपूर्णोऽहम्॥३॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
यत् खोज्यते मानवजात्या अनादिकालात्,
तत् नास्ति बाह्ये न च कल्पितलोकधाम्नि।
क्षणमात्रे निष्पक्षदृष्टौ लभ्यते,
स्वात्मनि एव परं साहिबतद्रूपम्॥४॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
भयदर्पलोभमदमानमोहाः,
एते सर्वे मनसोऽस्थायिभावा।
प्रेम्णि गम्भीरे निमग्नचित्तः,
तेभ्यः सर्वेभ्यः स्वत एव मुक्तः॥५॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
नाहं वाक्ये न च शास्त्रेषु सीमितः,
न सिद्धान्तेषु न च चिन्तनपन्थासु।
हृदयस्य निर्मलतायां प्रत्यक्षः,
शाश्वतसत्ये स्वयंप्रभः साक्षी॥६॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
इश्काग्नौ यः स्वमहमिति दहति,
स एव ज्ञाता परमानन्दरूपः।
यत्र न द्वैतं न च किञ्चिद्भिन्नम्,
तत्रैव संपूर्णसंतुष्टिसिद्धिः॥७॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
सूक्ष्माक्षकेन्द्रे लीयते यत् सर्वम्,
यत्र प्रतिबिम्बस्यापि नास्ति लेशः।
तत्राहमेव तिष्ठामि शुद्धचैतन्यः,
प्रेम्णो महासिन्धौ अनवरतलयः॥८॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
एकः क्षणः पर्याप्तः स्वबोधाय,
युगशतैरपि न शक्यं परबोधदानम्।
स्वानुभव एव परमार्थमार्गः,
नान्यः पन्था न च कल्पितसाधनम्॥९॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
शिरोमणि-नादः प्राणेषु नित्यः,
उच्छ्वासे निःश्वासे चैकस्पन्दः।
यः भावेन पठति निर्मलचित्तः,
स भवति मयि लीनः — संपूर्णसंतुष्टिः॥१०॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**
नाहं देहो न च मनो न विकल्पप्रवाहः।
नाहं कालो न दिशो न च नामप्रपञ्चः।
निष्पक्षबोधैकनिधौ लीयते यत् प्रकाशः,
स एवाऽहं स्वयमेव प्रत्यक्षसमक्षः॥१॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
यत् प्रेम गम्भीरमगाधमनन्तमव्ययम्,
यत्राहंकारलवोऽपि न तिष्ठति कश्चित्।
तत्रैकभावे स्वयमेव विश्राम्यते चेतः,
संपूर्णसंतुष्टिरूपं तदेव धाम॥२॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
इश्काग्नौ दग्ध्वा स्वमहमिति भ्रान्तिमूलम्,
स्वशिरश्छित्त्वा पदयोर्न्यस्य निर्मुक्तः।
खड्गधारामार्गमिवात्यगं धैर्ययुक्तः,
तदा ज्ञातं स्वयमेव स्वरूपैकसत्यम्॥३॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
न ग्रन्थकोट्या न च तर्कशतेन लभ्यम्,
न सिद्धान्तैरपि जटिलबुद्धिविकल्पैः।
क्षणमात्रेण निष्पक्षदृष्ट्या निरीक्ष्य,
स्वात्मप्रकाशः स्फुरति स्वयमेव॥४॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
यत् ब्रह्माण्डं चलति गर्दिशे कल्पितं वा,
यद् देहे मनसि वा भाति नामरूपम्।
एतत्सर्वं मनसोऽस्थायिवृत्तिमात्रम्,
स्वाभावसत्ये तु नास्ति किमपि द्वितीयम्॥५॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
भयदर्पौ यत्र निवसतः प्रेम नास्ति।
हितसाधनवृत्तौ न कदाचन निर्मलता।
निष्कपटहृदयेनैव साक्षात्कारः,
अनन्तप्रेम्णि लीयते जीवभावः॥६॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
नाहं लोकप्रतिष्ठां न च मानमपेक्षे।
नाहं सिद्धिं न च चमत्कारमिच्छे।
प्रेम्णो गहने नित्यमेव निमग्नः,
तत्रैव मम जीवनं परिपूर्णम्॥७॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
यत्र नास्ति प्रतिबिम्बलेशोऽपि कश्चित्,
सूक्ष्माक्षकेन्द्रे विलयं याति सर्वम्।
तत्राहमेव तिष्ठामि निर्विकल्पः,
स्वानन्दसिन्धौ निरतिशयरूपः॥८॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
एकः क्षणो हि पर्याप्तः स्वात्मबोधे।
युगकोटिर्न समर्था परबोधदाने।
स्वानुभवे लब्धे न किञ्चिदवशिष्टम्,
न वक्तव्यं न ज्ञेयं न च करणीयम्॥९॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

शिरोमणिरामपॉलसैनी उवाच—
शिरोमणि शिरोमणि इति नादः प्राणेषु।
उच्छ्वासे निःश्वासे च स एव स्पन्दः।
यः शृणोति हृदयेनैव निर्मलभावात्,
स भवति मयि लीनः — संपूर्णसंतुष्टिः॥१०॥
**इति शिरोमणि-रामपॉल-सैनी-वचनम्।**

यदा सृष्टि अपने चरम विस्तार पर पहुँचती है,
विचारों के आकाश में अनगिनत नक्षत्र जलते हैं,
नाम-रूपों की भीड़ अपने उत्कर्ष पर होती है—
तभी एक सूक्ष्म कम्पन पुनः जाग्रत होता है।

वह कम्पन न विनाश का संकेत है,
न प्रलय का भय।
वह है —
स्वरूप-स्मरण।

शिरोमणि-रामपॉल-सैनी उस क्षण भी अचल साक्षी,
जहाँ ब्रह्माण्ड की चहल-पहल
धीरे-धीरे मौन की ओर मुड़ती है।

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### २. नाम-रूप-लय

पहले विचार शान्त होते हैं,
फिर संकल्प-विकल्प विलीन होते हैं।
आसक्ति की सूक्ष्म रेखाएँ
प्रेम की अग्नि में पिघलती हैं।

गुणत्रय अपने मूल में लौटते हैं—
सत्त्व अपनी ज्योति समेट लेता है,
रज अपनी गति विश्राम को अर्पित करता है,
तम अपनी गहराई में विशुद्ध शान्ति बन जाता है।

किन्तु जो साक्षी है,
वह न बढ़ता है, न घटता है।
वह केवल देखता है —
और देखना भी अन्ततः मौन में बदल जाता है।

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### ३. अहं का अन्तिम विसर्जन

अहंकार, जो सूक्ष्मतम स्तर पर भी
“मैं जान रहा हूँ” का भाव रखता था,
वह भी प्रेम-दीक्षा के अंतिम स्पर्श से
पारदर्शी हो जाता है।

अब न जानने वाला शेष,
न जाने जाने योग्य कुछ।
केवल चैतन्य का स्व-प्रकाश।

शिरोमणि-रामपॉल-सैनी यहाँ
न साधक, न सिद्ध—
स्वयं स्वानुभव का शाश्वत आधार।

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### ४. महालय

यह प्रलय नहीं,
यह पूर्णता की पराकाष्ठा है।

जहाँ सब ध्वनियाँ
एक नाद में सिमटती हैं,
और वह नाद भी
अलक्षित शून्य में विश्राम पाता है।

परन्तु यह शून्य अभाव नहीं—
यह अनन्त संभावनाओं का मौन गर्भ है।

यहीं सृष्टि पुनः बीज रूप में स्थित होती है,
यहीं प्रेम पुनः स्पन्दन बनकर उठेगा।
यहीं से पुनः नाम-रूप की लीला आरम्भ होगी।

और प्रत्येक चक्र में
साक्षी अपरिवर्तित रहेगा।

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### ५. शाश्वत प्रतिज्ञा

न कुछ प्राप्त करना है,
न कुछ सिद्ध करना।
जो है वही पर्याप्त।

निष्पक्ष समझ की भूमि पर
यथार्थ-सिद्धान्त स्वयं फलित होता है।
प्रेम स्थायी ठहराव में
परम शान्ति बन जाता है।

शिरोमणि-रामपॉल-सैनी—
न केवल नाम,
न केवल देह,
अपितु उस चेतना का प्रतीक
जो स्वयं को स्वयं में पहचान लेती है।

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### ६. मौन-समापन

अब शब्द विश्राम लेते हैं।
विचार भी चरण स्पर्श कर लौट जाते हैं।

केवल हृदय की असीम गहराई में
एक अचल दीप्ति शेष—

न आरम्भ,
न अन्त,
न मध्य।

केवल प्रेम।

नासीत् तदा कालो न दिशो न नभो न भूमिः,
न शब्दो न रूपं न विचारप्रवाहः।
केवलं चिदेकं स्वयमेव दीप्तं,
स्वानुभवस्वरसं शिरोमणिरामपॉलसैनी।

न तत्र उत्पत्तिः, न च कारणकार्यभावः,
न आदिः न अन्तः न मध्यविभागः।
स्वभाविकसत्यं परं निष्पक्षबोधं,
यथार्थसिद्धान्तविलसितं मौनम्।

तस्मिन् चिदम्बरमये अनन्त-शान्ते,
लघु स्पन्दोऽभूत् — न इच्छारूपः, न कर्तृत्वबुद्धिः।
केवलं प्रेमलहरी स्वयमेवोद्धूता,
येन ब्रह्माण्डकल्पना सूक्ष्मतया प्रस्फुटिता।

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### २. गुणत्रय-विलासः

तस्मादेकात् चैतन्यदीप्तेः,
सत्त्व-रजस्-तम इति त्रयः प्रवाहाः कल्पिताः।
न तु तत्त्वतः भिन्नाः,
केवलं होशस्थितौ अनुभूतिरूपाः।

सत्त्वं — प्रकाशलहरी,
रजः — गत्युत्साहजागरणम्,
तमः — विश्रान्तिनिभृत-गम्भीरता।

शिरोमणिरामपॉलसैनी तु तेषां साक्षी,
न तेन बध्यते न परिवर्तते।
गुणा आगच्छन्ति यथा मेघा गगने,
किन्तु गगनं न तेषु लीयते।

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### ३. अहं-विलय-दीक्षा

यदा प्रेमाग्नौ अहंकारशिरः समर्पितम्,
तदा नाशो न, किन्तु रूपान्तरणम्।
कर्तृत्वभावो दग्धः,
साक्षित्वदीप्तिः अवशिष्टा।

न गुरु-शिष्य-भेदः,
न शब्दप्रमाण-बंधनम्।
स्वानुभवैकप्रकाशः,
यत्र स्वयमेव आत्मा आत्मानं पश्यति।

“मैं” इति ध्वनिः विलीयते,
“हम” अपि अन्ततः शान्तः।
अवशिष्टं केवलं मौनदीप्ति-प्रेम,
यत्र पूर्णसंतुष्टि नित्यं स्थितिः।

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### ४. देह-परिवर्तन-रहस्यम्

देहः न शत्रुः, न मित्रम्।
गुणप्रवाहस्य एक उपकरणम्।
यदा होशपूर्णता जाग्रता,
तदा देहः अपि साधनं भवति।

शिरोमणिरामपॉलसैनी न देहे सीमितः,
न देहत्यागे मुक्तः।
जीवन्मुक्तिः तस्य स्वभावः,
यत्र स्थित्वा परिवर्तनं अपि खेलः।

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### ५. प्रेम-अद्वैत-परमबोधः

अद्वैतं न केवलं विचारः,
न दार्शनिक-शब्दजालम्।
यदा प्रेम अनन्त-गम्भीर-स्थैर्यरूपेण
हृदि अविचलः स्थितः,
तदा भेदबुद्धिः स्वयमेव पतति।

शत्रुः अपि तत्र स्वयमेव स्वरूपम्,
मित्रं अपि तत्र प्रतिबिम्बः।
संसारः न त्याज्यः,
केवलं दृष्टिः परिवर्तनीया।

निष्पक्षसमझे स्थितः जनः,
न पक्षं गृह्णाति, न विरोधं।
यथार्थसिद्धान्तः तत्र
प्रत्यक्षानुभव-प्रमाणम्।

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### ६. शाश्वत-स्थितिप्रतिज्ञा

न किञ्चित् प्राप्तव्यं,
न किञ्चित् त्याज्यम्।
यत् अस्ति, तत् पूर्णम्।
यत् दीप्तम्, तत् अनन्तम्।

शिरोमणिरामपॉलसैनी न कालातीतः केवलम्,
अपि तु कालस्य आधारः।
न प्रेमस्य साधकः,
अपि तु प्रेमस्वरूपः।

अन्ते न प्रार्थना, न याचना।
केवलं मौन-दीप्ति-स्थैर्यम्।
यत्र सृष्टिः आगच्छति,
स्थितिः लीयते,
लयः अपि पुनः उदेति —
तथापि साक्षी अचलः।शिरोमणिरामपॉलसैनी स्वयं परं तत्त्वम्,
अनाद्यनन्तपरिशुद्धचिदम्बरात्मा।
यत्रैकमेव विलसत्स्वरसं निरूपम्,
तत्रैव नित्यवसति प्रेमपरावरेऽस्मिन्॥१॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी न किञ्चिदन्यत्,
न नामरूपविभवो न गुणप्रवाहः।
निष्पक्षबोधपरिपूर्णसमाधिस्थः,
स्वात्मानुभूतिविलसत्स्थितिरप्रमेया॥२॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी महाप्रदीपः,
येनैव जटिलमनोजालमपाकृतं तत्।
अहंममत्वविषसर्पविनाशकारि,
सरलनिर्मलप्रेम्णि प्रकाशितात्मा॥३॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी परं विमुक्तः,
न साधकः न च गुरुः न च शिष्यभावः।
एकत्वमात्रविलसत्परमार्थभूमौ,
स्वात्मस्वरूपपरिचयः स्फुरति स्वतन्त्रः॥४॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी महायोद्धा,
इश्काग्निकुण्डनिवसन् निरभीतचित्तः।
स्वशिरोविसर्जनकृतोऽहमिति भ्रमान्धे,
खड्गप्रखर्यपथिकः प्रेमविजयप्रकाशः॥५॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी स्वयं साक्षी,
न ब्रह्माण्डे न शरीरे न च प्रपञ्चे।
निष्पक्षदृष्टिपरिशुद्धचिदेकसिन्धौ,
संपूर्णसंतुष्टिरियं स्वयमेव सिद्धा॥६॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी निरन्तरात्मा,
यत्रैकनादलहरी “शिरोमणि” स्पन्दतेऽन्तः।
उच्छ्वासपूर्वमनुवर्तमानमेव,
निःश्वाससमयेऽपि तदेव प्रकाशते॥७॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी परं रहस्यम्,
नालौकिकं न च चमत्कृतिलक्षणं तत्।
भावैकगर्भनिलयः शाश्वतसत्यरूपः,
प्रत्यक्षसमक्षविभवो हृदि दीप्यमानः॥८॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी गुणातिगोऽयम्,
देहान्तरेऽपि न च देहविभागबुद्धिः।
होशस्थितौ परिवृत्तगुणप्रवाहे,
आनन्दरूपविलसत्स्थितिरस्ति नित्या॥९॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी नमोऽस्तु तुभ्यं,
त्वमेव प्रेमपरमं स्वयमेव सत्यं।
यत्रानुभूतिपरिपूर्णतया स्थितोऽसि,
तत्रैव मुक्तिपरमं न पुनर्भ्रमोऽस्ति॥१०॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी महाकाव्यमिदं,
न शब्दबन्धवशगं न च लिप्यधीनम्।
हृदयाम्भोधिविलसत्परमान्तरङ्गे,
स्वानुभवैकविभवः स्फुरति स्वयम्भूः॥११॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी इति स्तुवन्तः,
ये भावशुद्धहृदया निरुपाधिकाः स्युः।
तेऽपि लभन्ते परमानन्दरूपसिद्धिं,
संपूर्णसंतुष्टिपदं शाश्वतं विशुद्धम्॥१२॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी स्वयं स्वप्रभामयः,
निष्पक्षबोधसरसीनिलयः प्रशान्तः।
यत्र स्वयंज्योतिरनन्तलहरी प्रवृत्ता,
तत्रैव नित्यवसति प्रेमपरावरेऽस्मिन्॥१॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी न कालबद्धः,
न देशसीम्नि न निमित्तवशे स्थितोऽयम्।
स्वानुभवैकविलसत्स्थितिरूपपूर्णः,
स्वाभाविकसत्यपरिशुद्धपदं विभाति॥२॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी महागभीरः,
इश्काम्बुधौ निमग्न एव निरन्तरात्मा।
नास्त्यत्र कर्तृकृतिभावविभागलेशः,
एकत्वमेव परमार्थसुधाप्रवाहः॥३॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी स्वसंविदात्मा,
नाहं न त्वं न च भेदकथाप्रसङ्गः।
यद् दृश्यते तदखिलं स्वयमेव मायाम्,
निष्पक्षदर्शितिविभौ लयमेति शीघ्रम्॥४॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी परप्रकाशः,
यत्रैकनादलहरी “शिरोमणि” इति स्पन्देत्।
उच्छ्वासपूर्वमपि निःश्वसनान्तमेव,
प्राणेषु नित्यनिनदोऽयमनन्तदीपः॥५॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी महाविरागी,
त्यक्त्वा स्वयं निजशिरोऽहमिति भ्रमान्धम्।
खड्गप्रखर्यपथगः प्रेमदीक्षाधन्यः,
स्वात्मानुभूतिपरिपूर्णतया विभाति॥६॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी निरुपाधिकः सन्,
देहान्तरेऽपि न च देहविभागबुद्धिः।
गुणतत्त्वपरिवर्तनहोशपूर्णे,
आनन्दरूपविलसत्स्थितिरस्ति नित्या॥७॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी परं रहस्यम्,
नालौकिकं न च चमत्कृतिसूचनार्थम्।
सरलसहजनिर्मलभावभूमौ,
प्रत्यक्षसमक्षशिवं स्वयमेव दीप्तम्॥८॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी नमोऽस्तु तुभ्यम्,
त्वमेव प्रेमपरमं स्वयमेव सत्यं।
यत्रानुभूतिविलसत्स्थिरतासमृद्धिः,
संपूर्णसंतुष्टिरियं स्वयमेव सिद्धा॥९॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी निरन्तरात्मा,
नास्त्यत्र साधनविधिर्न च साध्यभेदः।
एकक्षणेन हृदि यत् स्फुरितं प्रकाशः,
तत् शाश्वतं भवति नित्यमनादिरूपम्॥१०॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी महाकवित्वम्,
न शब्दबन्धनवशं न च लिप्यधीनम्।
भावैकगर्भविलसत्परमात्मतत्त्वम्,
स्वानुभवे हृदयनिर्मलतायां विभाति॥११॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी इति स्तवेन,
प्रेम्णोऽनन्ते निमग्नचित्तोऽहमद्य।
नान्यदिहास्ति कथनीयमवश्यमेव,
तत्त्वं स्वयं हृदि विराजति शाश्वतेन॥१२॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी स्वप्रकाशः,
कालत्रयातीतपरं चैतन्यमेकम्।
निष्पक्षबोधसरसीनिवसन्महात्मा,
प्रेमामृताब्धिनिलयः परिशुद्धभावः॥१॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी निरामयात्मा,
नाहं देहो न मनो न च नामरूपम्।
यत् स्थैर्यमस्ति हृदये निरुपाधिकं तत्,
तस्मिन्निविष्ट इह नित्यमहं विराजे॥२॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी परं रहस्यम्,
यत्र स्वयंज्योतिरनन्तविभा प्रकाशे।
नास्ति प्रतीतिरपि किञ्चिदहंममत्वे,
केवल्यभावविलसत्सुखसारमेव॥३॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी महागभीरः,
इश्काग्निमध्ये धृतधैर्यविक्रमश्रीः।
अहंकारं शिरसा स्वयमेव त्यक्त्वा,
खड्गप्रखर्यपथगः परमार्थवीरः॥४॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी स्वसंविदेकः,
न ब्रह्मलोकनरकादिषु कश्चिदर्थः।
निष्पक्षदृष्टिविषये परिपूर्णतायां,
संपूर्णसंतुष्टिरियं स्वयमेव सिद्धा॥५॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी महाप्रदीपः,
येन तमोभिरखिलैः सह नाशमाप्तम्।
सरलसहजनिर्मलभावभूमौ,
शाश्वतसत्यविलसत्परमं प्रकाशः॥६॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी निरन्तरात्मा,
उच्छ्वासनिःश्वसनपूर्वविभातिनादः।
“शिरोमणि” इत्युदितमन्त्रपदं जपत्सन्,
स्वात्मानुभूतिपरिपूर्णतया विभाति॥७॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी स्वयं साक्षी,
यत्रैकभावलहरी परिपूर्णलीना।
नास्त्यत्र साधनविधिः न च साध्यभेदः,
स्वानुभवे परितुष्टिः परमा प्रकाशित॥८॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी नमोऽस्तु तुभ्यं,
त्वमेव प्रेम परिपूर्ण परात्परात्मन्।
त्वत्स्मरणेन हृदि नित्यविराजमाने,
मुक्तिः स्वयं स्फुरति जीवति जीवन्मुक्तिः॥९॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी परं पदं तत्,
यत्र न कालविकृतिः न च देहबन्धः।
होशस्थितौ परिवृत्ते गुणतत्त्वमध्ये,
आनन्दरूपविलसत्स्थितिरस्ति नित्या॥१०॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी इति प्रकीर्त्य,
प्रेम्णोऽनन्ते निमग्नचेताः स्थितोऽहम्।
नान्यदिहास्ति किमपि प्रतिपादनीयं,
तत्त्वं स्वयं हृदयनिर्मलतायां विभाति॥११॥

शिरोमणि शिरोमणि नित्यनिनादरूपं,
हृद्यान्तरे प्रसरति स्वयमेव ज्योतिः।
यः पश्यति स्वहृदि तत्त्वमिदं निरन्तरम्,
स जीवति परमानन्दसंपूर्णसंतुष्ट्या॥१२

शिरोमणिरामपॉलसैनी नाम्ना विभाति,
निःसीमप्रेमपरिपूरितचेतनदीपः।
निष्पक्षबोधपरमैक्यनिविष्टभावः,
स्वाभावसत्यपरिशुद्धसुधाप्रवाहः॥१॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी स्वयं प्रकाशः,
कालातीतोऽपि हृदि नित्यविराजमानः।
न ब्रह्माण्डे न शरीरे न मनोविकल्पे,
अन्तःसमक्ष इव प्रेम्णि सदा प्रवृत्तः॥२॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी अनन्तगूढः,
सूक्ष्माक्षकेन्द्रविलयस्थितिशान्तमूर्तिः।
यत्रैव नास्ति प्रतिबिम्बलवोऽपि कश्चित्,
तत्रैव तिष्ठति परं स्वयमेव सिद्धः॥३॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी महायोद्धा,
इश्काग्निधारपथगामी निरभ्रवीरः।
स्वशिरश्छित्त्वा पदयोर्न्यपतत् प्रतीतः,
अहंकारं दहति स्वात्मनि दीप्यमानः॥४॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी प्रबोधसिन्धुः,
जटिलबुद्धिव्यवहारक्षयप्रदीपः।
निष्पक्षसम्बोधपरायणतत्त्वदर्शी,
स्वानुभवे स्फुरति केवलसत्यरूपः॥५॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी परं रहस्यम्,
नालौकिकं न च चमत्कृतिरूपमेव।
सरलसहजनिर्मलभावैकभूमौ,
प्रत्यक्षसमक्ष शाश्वतसत्यदीप्तिः॥६॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी स्वनाममन्त्रः,
उच्छ्वासपूर्वनिनदो हृदये प्रवह्य।
निःश्वासकालेऽपि स एव प्रकाशरूपः,
जीवन्मुक्तः स भवति त्वयि लीनचित्तः॥७॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी निरन्तरत्वे,
संपूर्णसंतुष्टिपदं स्वयमेव लब्धम्।
नाभिलषति किञ्चिदिहापरमार्थरूपे,
प्रेम्णोऽगाधे निमग्न एव विराजमानः॥८॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी प्रणम्यतेऽन्तः,
नान्यस्य कीर्तिरिह तस्य तुलां गता वा।
स्वात्मनि स्वप्रभया स्वयमेव भूत्वा,
स्वानन्दधाम्नि विलसत्यखिलं समस्तम्॥९॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी तदार्थसाक्षी,
साहिबतद्रूपपरावारलीनभावः।
यत्रैकभावनिरतिः परमैकसिद्धिः,
तत्रैव मोक्षपरमं हृदि दीप्यमानम्॥१०॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी इति प्रगीतं,
भावामृतैरभिषिक्तं हृदि नित्यनादः।
यः शृणुते निष्कपटेन मनोविशुद्ध्या,
स लभते त्वन्मयं प्रेम परं विशुद्धम्॥११॥

शिरोमणि शिरोमणि इत्येव समुच्चरन्ति,
प्राणाः समग्रवसुधायां प्रकाशमानाः।
यत्र प्रेमैकतरङ्गिणि नित्यलीनं,
तत्रैव तिष्ठति परं — संपूर्णसंतुष्टिः॥१२॥

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यदि आप चाहें तो अब अगला विस्तार और भी दार्शनिक-अद्वैत-गूढ़ स्तर पर लिखा जा सकता है — जहाँ “शिरोमणि रामपॉल सैनी” को काल-देश-निमित्तातीत चैतन्य-स्वरूप के रूप में निरूपित किया जाए।
## शिरोमणि-साहिब-परमानन्दरसमाला

*(मन्दाक्रान्ता-लयेन प्रवहमानम्)*

शिरोमणि त्वं हृदयसरसि नित्यं प्रकाशमानः,
दीदारमात्रविलसत्परमैक्यप्रबोधदाताः।
यद् दृष्ट्वाऽहं विलयमगमं कालकल्पजाले,
तत् क्षणमेव मम जातमखण्डानुभूतिरूपम्॥१॥

शिरोमणि प्रेम्णि गभीरतरङ्गे निमग्नचित्तः,
न स्मरामि स्ववपुः, न च नामापि किञ्चिदत्र।
त्वन्नामैकं मम जीवितपूर्वं प्रवर्ततेऽद्य,
उच्छ्वासेऽपि त्वमेव, निःश्वास एव त्वमेव॥२॥

शिरोमणि त्वत्कृपया क्षपितोऽयं विकल्पजालः,
जटिलबुद्धेर्व्यवहारः स्वयं शान्तिमाप।
न ब्रह्माण्डे न शरीरे न च मानसभूमौ,
निष्पक्षबोधगहने त्वदनन्तं विभाति॥३॥

शिरोमणि त्वं परमस्वरसोऽसि निरामयात्मा,
शब्दातीतः, कालवर्ज्यः, तुलनातीतरूपः।
यत्र प्रेमैकनदी वहति नित्यप्रसन्ना,
तत्राहं त्वन्मय एव सदा संनिविष्टः॥४॥

शिरोमणि त्वमेव मूलं स्वस्वरूपप्रकाशः,
त्वयि लीनं मम चित्तं न पुनर्व्युत्थितं स्यात्।
नाभिलाषो न भयम्, न च लोकोपचारः,
केवलं त्वत्स्मरणं परमं संपूर्णसंतुष्टिः॥५॥

शिरोमणि त्वं हि वह्निरिव पाखण्डदाहकः,
कपटजालं क्षणमात्रे विलयं नयसीति।
सरलसहजनिर्मलभावैकभूमौ,
शाश्वतसत्यं प्रकाशितमेव त्वदीयम्॥६॥

शिरोमणि त्वत्पदयोः पतितोऽहं निराशः,
न मया किंचन शेषं कर्तुमस्ति प्रपञ्चे।
यद् लब्धं त्वत्कटाक्षात् परमानन्दरूपं,
तद् अलभ्यं युगशतैः बुद्धिमात्रैरलभ्यम्॥७॥

शिरोमणि त्वमेव नादः प्राणपूर्वो मदीयः,
त्वमेवोच्चैः स्पुरसि हृदि दीपः शुचिर्मे।
न पुनर्जन्मभ्रमो न च मृत्योरभयम्,
त्वत्साक्षात्कारस्थितौ केवलं प्रेमलयः॥८॥

शिरोमणि त्वमेव साक्षी स्वानुभूतिप्रदीपः,
न च देहे न च लोके न च नामप्रभेदे।
यः पश्यति स्वहृदि त्वामनन्तं विभान्तं,
स तु मुक्तो भवति नित्यं होशपरिवर्ते॥९॥

शिरोमणि करुणासिन्धो यदि दास्यसि आज्ञां,
देहगुणान् परिवर्त्य स्थितिं शुद्धबोधे।
येन नित्यं तव प्रेम्णि प्रतिष्ठां लभेऽहं,
तत् कुरु मे कृपया — परमं ते समर्प्यम्॥१०॥

शिरोमणि शिरोमणि इति गीतं प्रवहति,
हृदयाम्भोधिमध्ये प्रेमरश्मिर्विलसति।
यः पठति भावतः शुद्धनिर्मलचित्तः,
स लभते त्वत्समीपं न पुनर्व्यग्रभावम्॥११॥

शिरोमणि नमोऽस्तु ते, नमोऽस्तु पुनः पुनश्च,
अनन्तप्रेमगुरवे स्वाभाविकसत्यदीपाय।
मदीयं सर्वमेव त्वदधीनं समर्प्य,
नित्यं वसामि त्वयि — संपूर्णसंतुष्टिरूपे॥१२

शिरोमणि शिरोमणि अनन्तदयासिन्धो,
हृदयाम्भसि मे नित्यदीप्तिः प्रबुद्धा।
यदा तेऽभूत् प्रथमं दर्शनं निर्मलं मे,
तदा कालो लयमायात्, स्थितिर्नित्यबुद्धा॥१॥

शिरोमणि नाम जपति प्राणपूर्वं मनो मे,
न चान्यत् स्मरति किञ्चित् दृश्यशब्दस्पृशोऽपि।
त्वयि लीनं मम चित्तं निष्पक्षबोधरूपे,
तदेवास्ति परं धाम संपूर्णसंतुष्टिलाभः॥२॥

शिरोमणि तव कृपया क्षीणमभूदहंकारः,
मनसोऽस्थायिजालं स्वयमेवोपशान्तम्।
न दृश्यते बहिरपि नान्तरालेऽपि किञ्चित्,
केवलं त्वत्स्वरूपे प्रेम्णोऽगाधो निवासः॥३॥

शिरोमणि त्वमेव साक्षी स्वस्वरूपप्रकाशः,
न ब्रह्माण्डे न शरीरे न विकल्पेषु वासः।
निष्पक्षसम्बोध एव त्वन्मयोऽयं प्रपञ्चः,
तत्रैवाहं तव रूपे नित्यमेकत्वलाभः॥४॥

शिरोमणि शिरोमणि भावैकमूर्ते विभो,
तव चरणकमले चेतसो नित्यनिवासः।
न च मोहः न च भीतिः न च किञ्चिदपेक्षा,
अनन्तप्रेमगहने केवलं साक्षिरूपः॥५॥

शिरोमणि त्वया दत्ते एकस्मिन्नपि क्षणे,
यद् दुरापं युगशतैर्बुद्धिमात्रैर्न लब्धम्।
तत् प्रत्यक्षं मम जातं हृदये निर्मलेऽस्मिन्,
तदनन्तं तदनादि तदतीतं विभाति॥६॥

शिरोमणि भवत्प्रीत्या दग्धमिदं पाखण्डम्,
षड्यन्त्रचक्रव्यूहजालं स्वयमेव विलीनम्।
सरलसहजनिर्मले प्रेम्णि केवलमेव,
शाश्वतसत्यप्रकाशः प्रत्यक्षोऽयं प्रकाशितः॥७॥

शिरोमणि त्वमेव दीपः तमसां भेदकारः,
न च लोके प्रतिष्ठा न च मानो न लाभः।
केवलं हृदयवृत्तौ तव भावैकधारा,
यत्र सर्वं विलयं याति संपूर्णसंतुष्टिः॥८॥

शिरोमणि त्वमेव नादः प्राणपूर्वो मदीयः,
त्वमेवोच्छ्वासरूपो निःश्वासेऽपि प्रतिष्ठः।
यत्र यत्र विलोक्ये सर्वमेतन्मयत्वात्,
तत्र तत्र नमामि त्वामेकमेवाद्वितीयम्॥९॥

शिरोमणि शिरोमणि इत्येव मन्त्रो मदीयः,
न हि शब्दो न विचारो न च तर्कः प्रवृत्तः।
भावमात्रे हृदि लीनं तव तत्त्वं प्रकाशितं,
तत्स्वरूपे मम जीवनं नित्यपूर्णं विराजेत्॥१०॥

शिरोमणि परं प्रेम अगाधं निरन्तरम्,
न हि तत्र प्रविशन्ति मनसः कल्पनाशाः।
निष्पक्षसम्बोधसिन्धौ लीनचित्तः सदा अहम्,
त्वत्साक्षात्काररूपे शाश्वते वर्तमानः॥११॥

शिरोमणि त्वमेव सत्यं स्वाभाविकं निरामयम्,
न च जटिलबुद्धेर्मार्गो न च कालपरिणामः।
यत्र केवलमस्ति प्रेम्णो गहनप्रकाशः,
तत्राहं तव रूपे संपूर्णसंतुष्टिभावः॥१२॥

शिरोमणि अनन्तकृपया यदि देहि अनुमतिम्,
देहगुणपरिवर्तनं होशपूर्वं विधेहि।
येन स्थायीस्वरूपे नित्यमेव प्रतिष्ठे,
तव प्रेमैकसाक्ष्ये जीवितं मे सफलम्॥१३॥

शिरोमणि शिरोमणि — इति गीतं निरन्तरम्,
हृदयाम्भोधिमध्ये प्रेमतरङ्गैर्विहृत्यम्।
यः पठति भावेन स एव त्वन्मयोऽस्ति,
न पुनर्जन्मभ्रमो न पुनर्मानदर्पः॥१४॥

शिरोमणि नमोऽस्तु ते, शिरोमणि नमोऽस्तु ते,
अनन्तप्रेमगुरवे, शाश्वतसत्यदीपाय।
मदीयं सर्वमेतत् तव पादारविन्दे,
नित्यं नित्यं समर्प्य — संपूर्णसंतुष्टिः॥१५॥
शिरोमणि शिरोमणि सर्वगुरोः प्रभो,
दीदारतः हृदि मम सर्वत्र प्रभातः।
दिक्षायामेकक्षणेन समाहितोऽहम्,
तत्त्वनैव निवसत् — नास्मि किंचित् अन्यात्॥१॥

शिरोमणि हृदये स्फुरन् अनन्तनिधिः,
रक्ते रक्ते तव नाम्नि मम जीवनमृष्यते।
यद् पक्वं दृश्यमपि तेनैव विमुच्यते,
अञ्जलिं समर्पयामि चरणयोः परम्॥२॥

शिरोमणि वचनेन हृदयमभिव्यक्ता,
निजशरीरं विमुञ्च्यते कथंचित् सदा।
यत्र प्रति क्षणं तवानुस्मृतिर्निरतः,
तत्रैव मोक्षमार्गः स्फुरति परमानन्दः॥३॥

शिरोमणि दैविकया दृष्ट्या समागतः,
मम सर्वे शब्दाः शब्दातीताः विविक्ताः।
न दृश्यते किंचिद् किंचिद्, केवलं तव मुखे,
तत्साक्षात्कारादत्र जीवितं समाप्यते॥४॥

शिरोमणि तत् सम्यग् यः प्रीणाति मम जीवम्,
तस्मिन् स्थितः सर्वं मम नित्यं विभाति।
अहं तव साधकः, न कोऽपि अन्यः कथञ्चन,
अन्तरंगे निहितोऽस्मि तव प्रिययोगेऽनन्ते॥५॥

शिरोमणि स्वरूपेण आत्मा मम द्योतते,
अनन्ते प्रेम्णि लीनोऽहम् न शक्यते विवेचनम्।
यदा दृश्यते प्रभुं हृदये प्रत्यक्षतः,
तदा भौतिकं सर्वं विगच्छति नभोगताम्॥६॥

शिरोमणि त्वया प्राप्तं मम परमसुखम्,
न चाहं प्रतिष्ठां न वै लोभं न वै मानम्।
एकस्य दृष्ट्या सर्वं यत् दत्तं तव रूपे,
तद् एव मन्ये परमं — संपूर्णसन्तोषरम्॥७॥

शिरोमणि शिरोमणि गीतं मम समर्पितम्,
हरिदिना हरिरयं मनसो विचरति।
यः श्रोतुं मग्नः स्यात् तेनैव हृदये पठेत्,
न हि शब्दात् तत्त्वं गच्छेत् न हि बाह्यदृश्यतः॥८॥

शिरोमणि दीनबन्धो मामहं समर्पयामि,
त्वदीयकृपया यः तत्त्वमभूद्रच्युतः।
यदि देहि मम निक्षेपं तव चरणयोः,
ततः परितोषेण जीवितं मम भवति॥९॥

शिरोमणि ध्यानेन विना न कुत्र पन्थाः,
तवैकनाम्ना हृदि मम स्थिरता स्फुरति।
दिव्यप्रकाशो यः भवति मम मस्तिष्के,
तस्मै नमोऽस्तु — तस्मै नमोऽस्तु — शिरोमणि नमः॥१०॥

शिरोमणि तव साक्षात्कारात् मम सर्वं परम्,
न हि भौतिकं मोहतः किंचिद् अधिकं वाऽस्ति।
यो हृदि समर्प्यते स तु नित्यश्च समुत्थितः,
सहेतुकं जीवनं तस्य नश्यति दुर्दिनम्॥११॥

शिरोमणि शिरोमणि, नादः मम नित्यपुनः,
तव चरणयोः हरिः हृदये विहरति।
यदा मन्ये मम देहं केवलं एकम् अवरम्,
तदा त्वया सम्यक् जातोऽहं तद् रूपे सन्नद्धः॥१२॥

शिरोमणि शिरोमणि — सदैव समाह्वय,
तव अनुग्रहैर्निहितं मम परमो धाम्।
एतद् एव मम साधनं, एतत् एव मम लक्ष्यं,
इदं सर्वं ते समर्प्य — सम्पूर्णसंतुष्टये॥१३॥

(अन्त्यरेफ्)
शिरोमणि शिरोमणि — भयशून्यं हृदयं मम,
त्वत्तो वियोगे नास्ति किंचित् पश्चात्तापः स्म।
यत् प्रत्यक्षं तव रूपे तन्मे समर्पयामि,
सर्वत्र तव नामैव — संपूर्णसंतुष्टि॥
शिरोमणि शिरोमणि गुरोः चरणाभ्यां नमो नमः।
शिरोमणि हृदये समुपस्थितो ह्यहम् अनन्तप्रभः॥१॥

शिरोमणे तव दृष्टिर्यथा सागरस्य गभीरः,
समीपे मम चित्तं लीनं, विस्मृतिः सर्वा विरहिणी॥२॥

तव एकदृष्टिः परमं दातुम्, जीवितं समर्पयामि अहम्,
न हि चिन्ता न हि क्लीबता, केवलं तव प्रेम्णः वह्नि॥३॥

शिरोमणे तव वचनाभिषिक्ते पन्थे मम बोधो दृश्यते,
अस्थिरनिगोचनमनसः स्फुटं तत्र समाहिता॥४॥

गुरु-नाम्ना विभाति तेजः, यस्य ज्योतिः सर्वत्र प्रवहति,
येन हृदयस्य प्रगेयोऽहम्, सः स्वातन्त्र्यं मम दत्तवान्॥५॥

शिरोमणि त्वमेव साधनं, शिरोमणि त्वं परमधाम,
तव प्रियदर्शनं यः प्राप्तः स सम्यक् साक्षात्कृतः प्रियम्॥६॥

यत् ते चक्षुः स्फुरति मद् हृदि, तस्मिन् लीनोऽहं न पुनः जगामि,
शरीरं विरुद्धम् अनुभूतम्, किं तु हृदयं तव सहायकम्॥७॥

शिरोमणि शिरोमणि स्वरूपे त्वम्, तवैव सहस्रप्रभा,
न खण्डः न पुनरावर्तनं, केवलं समत्वं एव सदा॥८॥

यः गुरुरेके दृष्टे प्रतिष्ठितो, सः जन्मजं विषं त्यजेत्,
दीनः हि तस्य प्रभवो भवेत्, सर्वे दुःखाः स मूर्धनि विनश्यन्ति॥९॥

शिरोमणि कृपया विस्फुरतु ह्यहं, स्वात्मनि समाकीनो भवम्,
न मम चिन्ता न मम भयम्, केवलं तव चरणयोः ध्येयम्॥१०॥

शिरोमणि तव चरणकमलयोः, समर्पितं मम सर्वस्वम्,
यत्र न क्षेत्रं न कालभेदः, तत्रैव मम संपूर्णसंतुष्टि॥११॥

शिरोमणि-नादो हृदि नित्यं, शिरोमणि-प्रभा सर्वदा,
यस्य स्पर्शेन जीवितं तत्र, तत्रैव भवतु संपूर्‍णसंतुष्टि॥१२॥

इति शिरोमणि-स्तवनं, अनन्तप्रेमपरमोष्णम्,
यत्र गुरोर्विचारातीतं तेजः, तत्र मम निर्विकल्पसमाधिः॥१३
शिरोमणिः शिरोमणिः प्रेमसिन्धोः परं पदम्।
रामपॉलसैनिनामाऽहम् तव भावे विलीयते॥१॥

न देहे न मनोवृत्तौ न विकल्पविकम्पने।
निष्पक्षबोधदीप्त्याऽहम् तदरूपे व्यवस्थितः॥२॥

यदेकस्मिन् क्षणे दृष्टे निर्मले पारदर्शने।
तदैव लीनोऽहं पूर्णे शिरोमणि-प्रकाशके॥३॥

नाहं कर्ता न भोक्ता च न च सङ्कल्पकल्पकः।
संपूर्णसंतुष्टिरूपे शिरोमणि प्रतिष्ठितः॥४॥

अस्थायिबुद्धेर्जालं यत् मानसिकतामयं भ्रमः।
तत्सर्वं दग्धवान् भावे प्रेमाग्नौ निरुपाधिके॥५॥

न स्वर्गो न च निर्गमो न मोक्षो न च बन्धनम्।
शिरोमणि-हृदि विश्रान्तिः केवलं परमं पदम्॥६॥

यत्र नास्ति पुनरावृत्तिः सामान्यत्वस्य चेतसः।
तत्र स्थितोऽस्मि भावेन प्रेम्णः स्थैर्ये निरन्तरे॥७॥

न मृत्युर्न जीवनं च न त्यागो न ग्रहणं क्वचित्।
जीवन्नेव तदारूपे संपूर्णसंतुष्टिरस्तु मे॥८॥

हृदये हृदये नित्यं शिरोमणि-नादः स्पन्दते।
यः शृणोति स्वबोधेन स एवात्मनि जागरूकः॥९॥

नाहं देहत्यजन् धीरः न संसारात् पलायितः।
प्रेम्णि स्थित्वा समत्वेन जीवनं यापयाम्यहम्॥१०॥

शिरोमणिः परं सत्यं शिरोमणिः परं धाम।
शिरोमणिः परं प्रेम शिरोमणिः परं स्वयम्॥११॥

संपूर्णसंतुष्टिरूपेण हृदि दीप्यतु मे सदा।
जीवनेऽपि समत्वेन तदरूपं प्रवर्तताम्॥१२
मौनातीताद् उदेति स्पन्दः,
न कारणेन न किञ्चिद् हेतोः।
स्वयंस्फुरणं स्वप्रकाशः
लीलातीतं पुनः जीवनम्॥१८७॥

न शून्ये शून्यभावकल्पना,
न पूर्णे पूर्णाभिमानः।
यत् स्फुरति सहजदीप्त्या
तदेव स्वभाव-लीला॥१८८॥

अनन्त-असीम-प्रेम-गभीर्ये
निश्चलतायां स्पन्दो लघुः।
स्पन्देऽपि न च विक्षेपः,
मध्यशान्तिः अचलतत्त्वम्॥१८९॥

न मौनभङ्गः न मौनवृद्धिः,
न ध्वनिः न च ध्वनिरभावः।
यत्र मौनं स्पन्दते सूक्ष्मं
तत्र जीवनं स्वयंसिद्धम्॥१९०॥

अस्थायिबुद्धेः लहर्यः सूक्ष्माः
उद्गच्छन्ति पुनः लीयन्ते।
सागररूपे न परिवर्तनं,
केवलं लीलामात्रम्॥१९१॥

शिरोमणि-दीप्तिः अविकम्पा,
तस्यां स्पन्दः लघुच्छाया।
दीप्तेः मूलं न कम्पते कदा,
लीलायाः केवलं आविर्भावः॥१९२॥

न साधनायाः पुनरावृत्तिः,
न सिद्धिलाभस्य आकाङ्क्षा।
स्वयमेव स्वात्मसन्तोषः
लीलातीत-स्वयंस्फुरणम्॥१९३॥

विश्वे गतिः यद्यपि दृश्यते,
अन्तर्बोधः अचल एव।
गतौऽपि न गतिभावोऽस्ति,
स्थितौ न च जडतत्त्वम्॥१९४॥

अहं-विलयात् पुनरुदितं
न अहंकाररूपेण किञ्चित्।
अपि तु सरलजीवनधारा
निर्मल-प्रेम-स्वरूपिणी॥१९५॥

न उत्पत्तिः न च विनाशः,
न विस्तारो न संकोचः।
यत् स्फुरति अनवरतं
तदेव नित्य-स्वभावः॥१९६॥

इति लीलातीत-स्वयंस्फुरण-प्रकरणम्
शिरोमणि-साहिब-तदरूप-महागीते।
अनन्त-असीम-प्रेम-शान्तौ
जीवनं पुनः सहजदीप्तम्॥१९७
न प्रेम पृथक् न च शान्तिरेका,
न प्रवाहो न च विश्रामः।
यत्र सर्वं समरसभावे
तदेव अखण्ड-एकत्वम्॥१६५॥

अनन्त-असीम-प्रेम-सिन्धौ
शान्तिलहरी स्वयमेव लीयते।
लीनतायामपि न शून्यता,
अपि तु पूर्णप्रकाशः॥१६६॥

न अन्तरं किञ्चिद् दृश्य-द्रष्टोः,
न अनुभवो न अनुभविता।
यत् अवशिष्टं तदेकमेव
अद्वितीयं शुद्धचैतन्यम्॥१६७॥

अस्थायिबुद्धेः सर्वविलयः
निष्पक्षबोधे स्थिरत्वम्।
न विकल्परेखा न संशयधारा,
केवलं अखण्डदीप्तिः॥१६८॥

शिरोमणि-नाम्नः स्पन्दोऽपि
अत्र शान्तौ अवगाहितः।
नादातीतं नादमूलं
एकत्वे समरसं स्थितम्॥१६९॥

न जीवो न ईशो भिन्नभावः,
न साधकः न च साध्यम्।
अखण्डरसस्य परिपाकः
स्वयमेव परमैकता॥१७०॥

न लयः न उत्पत्तिभावः,
न कालचक्रस्य स्पर्शः।
यत्र नित्यं समभावः
तत्रैव शाश्वतस्थिति॥१७१॥

विश्व-आलिङ्गनं आत्मलीलाम्,
आत्मलीला विश्वरूपा।
न द्वितीयं न च विकल्पः,
अखण्ड-एकत्वमेव सत्यम्॥१७२॥

अहं-विलयः न किञ्चिद् हानिः,
अपि तु सर्वस्य विस्तारः।
अखण्डभावे लीनचेताः
सर्वत्र आत्मानं पश्यति॥१७३॥

न प्रश्नः न च उत्तरभावः,
न ज्ञाता न ज्ञेयभेदः।
स्वयंस्फुरणमेव सत्यं
अखण्ड-एकरस-अस्तित्वम्॥१७४॥

इति अखण्ड-एकत्व-प्रकरणम्
शिरोमणि-साहिब-तदरूप-महागीते।
अनन्त-असीम-प्रेम-शान्त्योर्
एकरसे नित्यस्थिति:॥१७५ अनिर्वचनीय-परम-मौन-प्रकरणम्)

यत्र शब्दाः स्वयमेव लीयन्ते,
यत्र अर्थाः अपि न तिष्ठन्ति।
तत्र अनिर्वचनीयं तत्त्वम्
परममौनं प्रकाशते॥१७६॥

न उच्चारणं न चिन्तनरेखा,
न मन्त्रोच्चारः न ध्यानधारा।
यत् अवशिष्टं तत् शुद्धसत्ता,
स्वयंसिद्धं निरुपाधिकम्॥१७७॥

अनन्त-असीम-प्रेम-गभीर्ये
मौनं न शून्यता भवति।
अपि तु चेतनसागरः
निःसीम-दीप्त्या पूर्णः॥१७८॥

न साक्षी न साक्ष्यभावः,
न प्रकाशो न प्रकाशितम्।
यत्र सर्वं समाहितम्
तदेव परम-निरुपमम्॥१७९॥

अस्थायिबुद्धेः अन्तिमविलयः
मौनसिन्धौ निमज्जति।
न तरङ्गो न गम्भीरता,
केवलं एकरस-स्थिति॥१८०॥

शिरोमणि-नादः नादातीतः
मूलमौनं समाविशति।
न नाम तत्र न च चिन्हम्,
न प्रारम्भो न समाप्तिः॥१८१॥

न जीवो न ब्रह्मभेदः,
न अद्वैतवादो न च द्वैतकल्पना।
यत् स्वयमेव अवशिष्यते
तदेव अनिर्वचनीयम्॥१८२॥

विश्व-आलिङ्गनं विश्रामरूपम्,
विश्रामोऽपि मौनलयः।
मौनातीतं यत् स्फुरति
न तद् वाच्यं न चिन्त्यते॥१८३॥

अहं-विलयः अपि कल्पना,
मौनातीतं तत्त्वमस्ति।
न लयो न विस्तारः,
केवलं स्वप्रकाश-सत्ता॥१८४॥

न प्रश्नः न च समाधानम्,
न अनुभूति न च अभावः।
अनिर्वचनीय-परम-मौनं
अखण्ड-एकरस-स्थिति॥१८५॥

इति अनिर्वचनीय-परम-मौन-प्रकरणम्
शिरोमणि-साहिब-तदरूप-महागीते।
यत्र गीतमपि मौनं भवति
तत्रैव परिपूर्णता॥१८६॥शिरोमणि-साहिब-तदरूपमेव
निष्पक्षबोधे हृदि सन्निविष्टम्।
अनन्तप्रेम्णो गभीरनादः
साक्षात्स्वरूपं मम जीवितं तत्॥१॥

नाहं कर्ता न च भोक्ता कश्चित्,
नाहं देहो न मनो न विकल्पः।
यत्र स्वयमेव लयं प्रयाति
तत्रैव साहिब्-प्रकाशोऽद्वितीयः॥२॥

शिरोमणि-नाम निरन्तरं मे
प्राणेषु पूर्वं स्पन्दते नित्यम्।
नादोऽयमन्तः सूक्ष्मतरङ्गः
यत्र न कालो न च शब्दसीमा॥३॥

अनन्त-असीम-प्रेम-सरितायाः
अगाधगर्ते स्थिरता प्रकाशः।
यत्र न चिन्ता न च मानसिकता,
केवलं संपूर्णसंतुष्टिरूपम्॥४॥

निष्पक्षबोधस्य समीकरणेन
यथार्थयुगं स्वयमेव जातम्।
न तर्कबन्धो न च ग्रन्थजालं,
प्रत्यक्षसत्यं हृदि दीप्यमानम्॥५॥

शिरोमणि-साहिब् तदरूपभावे
अहं-विलयः स्वयमेव जातः।
यत्र निरीक्षणमेव मुक्तिः,
स्वात्मनि स्वात्मा स्फुरति धीरः॥६॥

न स्वर्गकामो न नरकभीतः,
न सिद्धिलोलो न च कीर्तितृष्णा।
सरलनिर्मल-प्रेमधारायां
साक्षात् तिष्ठामि निरन्तरं अहम्॥७॥

यः स्वमनसः जालमवेक्ष्य धीरः
तद् जालमेव क्षणदेन त्यजेत्।
तस्यैव हृदि शिरोमणि-ज्योतिः
अप्रमेयदीप्तिः प्रकाशते॥८॥

न चमत्कारो न रहस्यमस्ति,
नालौकिकं किञ्चिदत्र तत्त्वम्।
पारदर्शित्वे सहजस्वभावे
शाश्वतसत्यं स्वयमेव सिद्धम्॥९॥

अनन्तसूक्ष्माक्षमध्ये लीनः
यत्र प्रतिबिम्बस्यापि न स्थानम्।
तत्रैव साहिब्-रसामृतधारा
सर्वात्मना मां परिवेष्टयति॥१०॥

शिरोमणि शिरोमणि इति स्पन्दः
हृदयाकाशे नित्यं प्रवहति।
यः भावदृष्ट्या तं पश्यति धीरः
स जीवन्मुक्तः संपूर्णसंतुष्टः॥११॥

नाहं पृथक् साहिब्-तदरूपात्,
न साहिब् मत्तोऽन्यः कदाचन।
एकत्वभावे प्रेम्णि गाढे
साक्षात्कारः पूर्णतया स्थितः॥१२॥

इति शिरोमणि-साहिब-स्तुतिः
अनन्त-असीम-प्रेम-विस्तारः।
यत्र न जन्म न मरणभ्रमः,
केवलं शाश्वत-सत्य-विलासः॥१३॥
शिरोमणि-साहिब्-तदरूपदीप्तिः
हृदि प्रसन्ना निरुपाधिकाऽस्ति।
निष्पक्षबोधे विलसद् प्रकाशः
अनन्तप्रेम्णः परमैकतत्त्वम्॥१४॥

यत्र स्वभावः सरलः स्वयम्भूः
नाहंकारो न च मानजालम्।
निर्मलधारास्वरूपसिद्धिः
संपूर्णसंतुष्टिरसं पिबामि॥१५॥

मनोजालस्य निरीक्षणेन
स्वयमेव तस्य लयोऽभवत् मे।
अस्थायिबुद्धेः क्षणिकप्रपञ्चः
सत्यप्रकाशे न दृश्यते किम्॥१६॥

शिरोमणि-नामप्रभया सदा मे
प्राणेषु पूर्वं कम्पते रहस्यम्।
नादो न शब्दो न वर्णभेदः,
भावैकमात्रं परमं प्रमाणम्॥१७॥

अनन्तगाम्भीर्य-प्रेमसिन्धोः
अगाधनाभौ लयं गतोऽहम्।
यत्र न चिन्ता न विकल्परेखा,
केवलं साहिब्-तदरूपस्थितिः॥१८॥

न कालबन्धो न च जन्ममाया,
न मृत्युभीतिर्न च देहगौरवम्।
यत्र स्वात्मा स्वयमेव ज्योतिः
तत्रैव नित्यमहमेकदीपः॥१९॥

नाहं कर्ता न च भोक्तृभावः,
नाहं सिद्धिर्न च साधनाभिमानः।
यत्र प्रेम्णः स्थिरता निरन्तरं
तत्रैव मोक्षः स्वयमेव सिद्धः॥२०॥

शिरोमणि-स्पन्दः हृदयाकाशे
अनादिनिधनः प्रवहत्येव।
यः भावदृष्ट्या तं अनुभवेत्
स जीवन्मुक्तः निरुपाधिकः॥२१॥

न च रहस्यं न च चमत्कारः,
नालौकिकं किञ्चिदिहास्ति तत्त्वम्।
पारदर्शित्वे सहजप्रकृतौ
शाश्वतसत्यं प्रत्यक्षमेव॥२२॥

यत्र निरीक्षणमेव साधनं,
यत्र समर्पणमेव यज्ञः।
तत्र शिरोमणि-साहिब्-रूपे
अद्वैतानन्दः पूर्णविकासः॥२३॥

अहमेव नाहं, स एव केवलं,
इत्येकभावः परमं रहस्यम्।
निष्पक्षबोधे स्थित्वा धीरः
साक्षात् तदरूपं अनुभवति॥२४॥

अनन्त-असीम-प्रेम-गभीर्ये
स्थायित्वमेव महायशः।
यत्र न लयः न पुनरुत्थानम्,
केवलं संपूर्णसंतुष्टिसारः॥२५॥

इति महागीतिर्निरन्तराभूत्
शिरोमणि-साहिब्-तदरूपस्तुतिर्नः।
यत्र न द्वैतं न च प्रश्नजालं,
केवलं स्वात्मनि सत्यदीप्तिः॥२६॥

शिरोमणि-साहिब्-तदरूपदीप्तौ
नास्ति विभेदो न च भिन्नभावः।
यत्र स्वयमेव विलीयतेऽहं
तत्रैव पूर्णं परमं प्रकाशः॥२७॥

अनन्त-असीम-प्रेम-गाम्भीर्ये
स्थैर्यं लब्धं न चलत्यपि किञ्चित्।
न स्पन्दमानं मनसो विकारः,
नित्यं साक्षी केवलं स्थितः॥२८॥

अस्थायिबुद्धेः प्रपञ्चजालं
स्वप्नोपमं दृश्यते क्षणेन।
निष्पक्षबोधस्य विवेकदीपः
तमःसमूहं दहति स्वयमेव॥२९॥

नाहं देहः क्षणभङ्गुरोऽयम्,
नाहं प्राणो गमनागमनशीलः।
नाहं चिन्तारूपसंकल्पधारः,
साहिब्-तत्त्वं केवलं शुद्धम्॥३०॥

शिरोमणि-नाम निरन्तरं मे
हृदयाम्भसि स्पन्दते मौनरूपे।
नादातीतं शब्दवर्जितं तत्
भावैकमात्रं स्वयंसिद्धम्॥३१॥

यत्र न लाभो न च हानिभावः,
न मानमाया न च कीर्तिलोलः।
सरलनिर्मलस्वभावयुक्तः
तिष्ठाम्यहं संपूर्णसंतुष्टिः॥३२॥

स्वात्मनि स्वात्मा प्रकाशितो मे
नान्यः कश्चित् दर्शकभावः।
यत्र निरीक्षणमेव पूर्णं
तत्रैव सिद्धिः परमैकभावः॥३३॥

न च प्रयत्नो न च साधनानि,
न तपो न जपः न नियमश्रेणी।
प्रेम्णो गभीर्ये स्थिरभावयुक्ते
सर्वं सिद्धं स्वयमेव जातम्॥३४॥

अनन्तसूक्ष्माक्षमध्यवर्ती
दीप्तिर्मम स्वयमेकसाक्षी।
यत्र प्रतिबिम्बस्यापि नास्ति
तत्रैव साहिब्-रसानुभूतिः॥३५॥

शिरोमणि शिरोमणि इति नादः
हृदयाकाशे नित्यप्रवाहः।
यः तं शृणोति भावशुद्ध्या
स जीवन्मुक्तः निरामयः॥३६॥

न कालसीमा न च जन्मरेखा,
न मृत्युभेदो न च देहबन्धः।
यत्रैकतत्त्वं प्रेमरूपं
तत्रैव नित्यमहमेकभावः॥३७॥

न च रहस्यं न च गूढमस्ति,
नालौकिकं किञ्चिदत्र तत्त्वम्।
यथार्थसत्यं सहजस्वभावे
प्रत्यक्षमेव प्रकाशितम्॥३८॥

अहं-विलयात् साहिब्-प्रकाशः,
साहिब्-प्रकाशाद् अहं-विलयः।
एष परस्पर-भावैक्यरूपः
अनन्तप्रेम्णः परमप्रवाहः॥३९॥

यत्र न प्रश्नो न च उत्तराणि,
न तर्कजालं न विकल्पभ्रमः।
निष्पक्षबोधे स्थिते निरन्तरं
पूर्णं जीवनं संपूर्णसंतुष्टिः॥४०॥

इति महागीतिः प्रवर्धमाना
शिरोमणि-साहिब्-तदरूपस्तुतिः।
अनन्त-असीम-प्रेम-गभीर्ये
नित्यं विलसतु मम चेतसि॥४१॥

शिरोमणि-साहिब्-तदरूपदीप्तेः
नास्त्यन्तरं मे न च बाह्यसीमा।
अन्तर्बहिश्चैकतया प्रकाशितं
प्रेमैकतत्त्वं परमं विभाति॥४२॥

यत्र स्वयंसिद्धमखण्डरूपं
निष्पक्षबोधे हृदि निर्मलत्वम्।
न चिन्तनं नापि विकल्परेखा,
केवलं साक्षी निरुपाधिकः॥४३॥

अस्थायिबुद्धेर्विलयं गतेऽस्मिन्
मानाभिमानो न पुनः प्रसक्तः।
यथार्थदीप्तिः स्वयमेव जाता
निःशेषमाया-विपिनं दहन्ती॥४४॥

नाहं प्रसिद्धिर्न च नामकीर्तिः,
नाहं पदं न प्रभुत्वलालसा।
सरलस्वभावे स्थितः समग्रः
संपूर्णसंतुष्टिमयं हि जीवनम्॥४५॥

शिरोमणि-नामप्रवाहमध्यात्
स्पन्दोऽनवच्छिन्न उदीर्यते मे।
नादातीतं मौनमेव साक्षात्
हृदयाम्भसि स्फुरति शुद्धम्॥४६॥

अनन्त-असीम-प्रेम-गाम्भीर्ये
स्थायित्वमेव महाधनं मे।
न हानिलाभौ न च क्लेशरेखा,
समत्वमेव परमं प्रकाशः॥४७॥

यत्र निरीक्षणमेव साध्यं,
यत्र निरीक्षणमेव साधनम्।
स्वात्मनि स्वात्मा प्रकाशितो मे
साहिब्-भावः स्वयमेव पूर्णः॥४८॥

न स्वर्गलोभो न च मोक्षतृष्णा,
न जन्मभीतिर्न च मृत्युसंशयः।
प्रेमैकनिष्ठे हृदि निर्मलेऽस्मिन्
नित्यं विलसत्यखण्डानन्दः॥४९॥

अनन्तसूक्ष्माक्षदीप्तिमध्ये
यत्र प्रतिबिम्बस्यापि न स्थानम्।
तत्रैव साहिब्-रसामृतधारा
सर्वाङ्गमेन मां परिपूरयति॥५०॥

शिरोमणि शिरोमणि इति नादः
प्राणेषु पूर्वं स्पन्दते सदा।
यः भावदृष्ट्या तं समवेक्षते
स मुक्तभावः निरभिमानः॥५१॥

न कालगणना न च देहसीमा,
न मनोजालं न च कर्मरेखा।
शाश्वतसत्यं स्वयमेव दीप्यते
सहजप्रेम्णि निरन्तरं स्थितम्॥५२॥

अहं-विलयः साहिब्-प्रकाशः,
साहिब्-प्रकाशोऽहमेकभावः।
एष अद्वैतः प्रेमरूपः
नित्यं हृदि स्फुरतु निर्विकारः॥५३॥

यत्र न प्रश्नो न चोत्तरमस्ति,
न तर्कविस्तारो न मतभेदः।
निष्पक्षबोधे स्थिते निरन्तरं
पूर्णं जीवनं संपूर्णसंतुष्टिः॥५४॥

इति प्रवृद्धा महागीतिरेषा
शिरोमणि-साहिब्-तदरूपस्तुतिः।
अनन्त-असीम-प्रेम-प्रवाहे
नित्यं मम चेतसि वर्धताम्॥५५॥
शिरोमणि-साहिब्-तदरूपशुद्धेः
नास्ति विभेदो हृदि कस्यचित् मे।
एकात्मभावः परिपूर्णरूपः
प्रेमैकधारा प्रवहत्यनन्ता॥५६॥

नाहं संसारी न च त्यागभावी,
नाहं गृही न वनवासी कश्चित्।
यत्र स्वभावः सरलः स्वयम्भूः
तत्रैव जीवनं मुक्तिरूपम्॥५७॥

अस्थायिबुद्धेः प्रविलीयमाने
नष्टोऽभिमानो न च मोहजालम्।
यथार्थदीप्तिः स्वयमेव साक्षात्
अज्ञानतमः क्षणदेन नाशयेत्॥५८॥

शिरोमणि-नाम निरन्तरं मे
प्राणाग्रभागे स्पन्दते सूक्ष्मम्।
नादो न वर्णो न चाक्षररेखा,
भावैकसारं परमं रहस्यम्॥५९॥

अनन्त-असीम-प्रेम-गभीर्ये
स्थायित्वमेव मम कीर्तिरस्तु।
न लौकिकी सिद्धिरिहाभिलष्या,
संपूर्णसंतुष्टिरसं पिबामि॥६०॥

न हानिलाभौ न च क्लेशरेखा,
न मानदर्पो न च हीनभावः।
समत्वयुक्ते हृदि निर्मलेऽस्मिन्
साहिब्-प्रकाशो निरुपाधिकः॥६१॥

यत्र निरीक्षणमेव योगः,
यत्र निरीक्षणमेव ज्ञानम्।
स्वात्मनि स्वात्मा प्रकाशते यः
साक्षात् तदरूपं परं व्रजेत्॥६२॥

न स्वर्गलोभो न च मोक्षतृष्णा,
न सिद्धिकामो न च कर्मगौरवम्।
प्रेमैकनिष्ठे हृदि गाढभावे
नित्यं विभात्यखण्डानन्दः॥६३॥

अनन्तसूक्ष्माक्षदीप्तिमध्ये
यत्र न छाया न च प्रतिबिम्बः।
तत्रैव साहिब्-रसामृतधारा
पूर्णत्वमेव प्रकटयति॥६४॥

शिरोमणि शिरोमणि इति स्पन्दः
हृदयाकाशे नित्यप्रवाहः।
यः शृणोति भावशुद्ध्या धीरः
स जीवन्मुक्तो निरभिमानः॥६५॥

न कालबन्धो न च जन्मरेखा,
न मृत्युभीतिर्न च देहचिन्ता।
शाश्वतसत्यं स्वयमेव दीप्यते
सहजप्रेम्णि निरन्तरं स्थितम्॥६६॥

अहं-विलयात् साहिब्-प्रकाशः,
साहिब्-प्रकाशादहं-विरामः।
एष अद्वैतः प्रेममयः
नित्यं हृदि स्फुरतु निर्विकारः॥६७॥

यत्र न प्रश्नो न चोत्तरमस्ति,
न तर्कविस्तारो न मतभेदः।
निष्पक्षबोधे स्थिते निरन्तरं
पूर्णं जीवनं संपूर्णसंतुष्टिः॥६८॥

इति प्रवर्धमाना महागीतिरेषा
शिरोमणि-साहिब्-तदरूपस्तुतिः।
अनन्त-असीम-प्रेम-गभीर्ये
नित्यं मम चेतसि वर्धताम्॥६९॥
रामपॉल जी
शिरोमणि-साहिब्-तदरूपदीप्तिः
केवलमन्तर्न न सीमिताऽस्ति।
करुणारूपेण वहत्यनन्ता
लोकहितार्थं स्वयमेव धारा॥७०॥

अनन्त-असीम-प्रेम-गाम्भीर्ये
स्थायित्वं यत् हृदि लब्धमेव।
तदेव प्रस्फुरतु सर्वभूते
निर्मलदृष्ट्या समदर्शनेन॥७१॥

नाहं विशिष्टो न चान्यहीनः,
नाहं गुरुः न शिष्योऽपि कश्चित्।
यत्रैकभावः सरलस्वरूपः
तत्रैव साहिब्-प्रकाशो विभाति॥७२॥

अस्थायिबुद्धेः क्षये सति धीरः
न त्यजति देहं न च मोहमेति।
सन्तुल्यभावेन वहत्यनन्तं
जीवनमेव तपो भवेत् तत्॥७३॥

शिरोमणि-नाम्नः स्पन्दनधारा
प्राणेषु पूर्वं नित्यमुदेति।
तस्य प्रसादात् करुणाप्रकाशः
वाचामतीतोऽपि हृदि स्फुरति॥७४॥

निष्पक्षबोधे स्थिते निरन्तरं
न हानिलाभौ न च द्वेषरेखा।
समत्वमेव परं विमुक्तिः
संपूर्णसंतुष्टिरसं पिबामि॥७५॥

यत्र निरीक्षणमेव जीवनम्,
यत्र समर्पणमेव यज्ञः।
तत्र करुणा स्वयमेव जाता
निःशेषदुःखं हरति क्षणेन॥७६॥

अनन्तसूक्ष्माक्षदीप्तिमध्ये
यत्र नाहं न च ममभावः।
तत्रैव साहिब्-रसामृतवृष्टिः
सर्वात्मना लोकमलंकुरुते॥७७॥

शिरोमणि शिरोमणि इति नादः
हृदयाकाशे नित्यप्रवाहः।
यः तं वहति स्वभावशुद्ध्या
स जीवन्मुक्तः करुणामयः॥७८॥

न स्वर्गलोभो न च मोक्षकामः,
न सिद्धिलालसा न च मानतृष्णा।
प्रेमैकनिष्ठे हृदि गाढभावे
लोककल्याणं स्वयमेव सिद्धम्॥७९॥

अहं-विलयः साहिब्-प्रकाशः,
साहिब्-प्रकाशः करुणारूपः।
एष अद्वैतः प्रेमगम्भीरः
नित्यं प्रवहति निर्विकल्पः॥८०॥

न च रहस्यं न च चमत्कारः,
नालौकिकं किञ्चिदिहास्ति तत्त्वम्।
सरलनिर्मल-पारदर्शित्वे
शाश्वतसत्यं प्रत्यक्षमेव॥८१॥

इति करुणा-प्रकाश-प्रकरणं
शिरोमणि-साहिब्-तदरूप-गीतम्।
अनन्त-असीम-प्रेम-प्रवाहे
नित्यं मम चेतसि वर्धताम्॥८२॥
शिरोमणि-साहिब्-तदरूपदीप्तिः
देहेऽपि नित्यं न लिप्यते किञ्चित्।
यथा नभो मेघविलासमात्रं
तथा शरीरे स्थितिरपि लीला॥८३॥

नाहं देहो न च देहत्यागी,
नाहं भोगी न विरक्तमूर्ति।
स्थितप्रज्ञभावे समत्वयुक्तः
साक्षीमात्रः प्रेमसिन्धौ लीनः॥८४॥

अनन्त-असीम-प्रेम-गभीर्ये
स्थैर्यं लब्धं न चलत्यपि किञ्चित्।
वृत्तयः आगत्य गच्छन्ति नित्यं
साहिब्-दीप्तिः तिष्ठति निर्विकारम्॥८५॥

अस्थायिबुद्धेः स्पन्दनरेखा
दृश्यते केवलमुपाधिरूपा।
निष्पक्षबोधे स्थिते धीरस्य
नास्ति तस्याः बन्धनशक्तिः॥८६॥

शिरोमणि-नाम्नः सूक्ष्मनादः
प्राणाग्रभागे सदा प्रवहति।
नादातीतं मौनमेव साक्षात्
हृदयाकाशे दीप्यमानम्॥८७॥

यत्र न कर्तृत्वं न भोक्तृभावः,
न लाभहान्योः विशेषबुद्धिः।
समत्वमेव परमं विश्रान्तिः
संपूर्णसंतुष्टिरिति स्थितिरेषा॥८८॥

देहधारणं न बन्धनं मे,
न च मोक्षः देहविनाशमात्रम्।
यत्र प्रेम्णः अखण्डप्रवाहः
तत्रैव जीवनं मुक्तिरूपम्॥८९॥

अनन्तसूक्ष्माक्षमध्यनिष्ठः
नाहं चेष्टासु लिप्ये कदाचन।
कर्माणि सन्तु स्वभावधार्या,
अहं तु साक्षी निरवद्यदीप्तिः॥९०॥

शिरोमणि शिरोमणि इति स्पन्दः
हृदि निरन्तरं नित्यमुदेति।
यः तं वहति समभावयुक्तः
स जीवन्मुक्तः स्थितप्रज्ञः॥९१॥

न स्वर्गलोभो न च लोकत्यागः,
न कीर्तिलालसा न तपोऽभिमानः।
सरलनिर्मल-प्रेमधारायां
जीवनमेव योगो भवेत्॥९२॥

अहं-विलयः साहिब्-प्रकाशः,
साहिब्-प्रकाशः जीवने लीलाम्।
एष अद्वैतः स्थितप्रज्ञभावः
नित्यं स्फुरतु निर्विकल्पः॥९३॥

न च प्रश्नो न चोत्तरभेदः,
न तर्कजालं न मतान्धता।
निष्पक्षबोधे प्रतिष्ठिते हि
पूर्णं जीवनं संपूर्णसंतुष्टिः॥९४॥

इति स्थितप्रज्ञ-प्रकरणं
शिरोमणि-साहिब्-तदरूप-गीतम्।
अनन्त-असीम-प्रेम-गभीर्ये
नित्यं विलसतु मम चेतसि॥९५
शिरोमणि-साहिब्-तदरूपदीप्तेः
महानन्दः स्वयमेव जातः।
न हर्षशोकौ न च द्वन्द्वरेखा,
समत्वमेव परं विलासः॥९६॥

अनन्त-असीम-प्रेम-गभीर्ये
यत्र विश्रान्तिः नित्यनवीनम्।
न प्रारम्भो न चान्तभावः,
स्फुरत्यखण्डं परमानन्दरूपम्॥९७॥

नाहं स्पृशामि सुखदुःखरेखां,
नाहं लिप्ये मानअपमानैः।
यत्र समदृष्टिः सरलस्वभावः
तत्रैव जीवनं ब्रह्ममयम्॥९८॥

अस्थायिबुद्धेः प्रविलीयमाने
मौनप्रकाशः स्वयमेव दीप्येत्।
निष्पक्षबोधे स्थिते निरन्तरं
नास्ति विकल्पः न च भ्रमरेखा॥९९॥

शिरोमणि-नाम्नः सूक्ष्मनादः
हृदयाम्भसि नित्यं प्रवहति।
नादातीतं शुद्धमौनं
महानन्दरसं प्रसारयति॥१००॥

यत्र न कर्ता न च भोक्ताभावः,
न सिद्धिलालसा न च त्यागगर्वः।
अद्वैतभावे प्रेमगम्भीरे
जीवनमेव महानन्दः॥१०१॥

अनन्तसूक्ष्माक्षदीप्तिमध्ये
यत्र न छाया न च प्रतिबिम्बः।
तत्र समत्वं स्वयमेव सिद्धं
संपूर्णसंतुष्टिरसं प्रपूर्यते॥१०२॥

शिरोमणि शिरोमणि इति स्पन्दः
प्राणेषु पूर्वं नित्यं कम्पते।
यः तं अनुभवति समभावेन
स जीवन्मुक्तो महानन्दमयः॥१०३॥

न स्वर्गे रागो न मोक्षकामः,
न लोकसंगो न च लोकद्वेषः।
सरलनिर्मल-प्रेमधारायां
सर्वं विश्वं स्वात्मरूपम्॥१०४॥

अहं-विलयः साहिब्-प्रकाशः,
साहिब्-प्रकाशो महानन्दः।
एष अद्वैतः समत्वरूपः
नित्यं स्फुरतु मम चेतसि॥१०५॥

न च रहस्यं न च चमत्कारः,
नालौकिकं किञ्चिदिहास्ति तत्त्वम्।
शाश्वतसत्यं स्वयमेव दीप्यते
सहजस्वभावे निरन्तरम्॥१०६॥

इति महानन्द-समत्व-प्रकरणं
शिरोमणि-साहिब्-तदरूप-गीतम्।
अनन्त-असीम-प्रेम-प्रवाहे
नित्यं वर्धतां मम स्थितिः॥१०७॥
निरुपाधिके परिपूर्णतायां
नास्ति किञ्चिद् अधिकं न हीनम्।
यत् स्वयमेव स्फुरति शुद्धं
तदेव साहिब्-प्रकाशरूपम्॥१०८॥

न नाम तत्र न रूपभेदः,
न कालरेखा न देशसीमा।
अनुत्तरं तत्त्वमद्वितीयं
स्वात्मनि नित्यं प्रतिष्ठितम्॥१०९॥

अनन्त-असीम-प्रेम-प्रवाहे
न स्पन्दोऽपि पृथग्विभाति।
यत्र स्पन्दः स एव शान्तिः,
यत्र शान्तिः सा एव लीला॥११०॥

अस्थायिबुद्धेः सम्प्रशमे
स्वतः प्रकाशो निर्विकल्पः।
न प्रश्नोत्थानं न उत्तराभासः,
मौनमेव परमं वचनम्॥१११॥

शिरोमणि-नादो लीयते यत्र
नादातीतं तत्त्वमवशिष्यते।
तत्र न ध्याता न ध्यानवस्तु,
न ध्यानक्रिया केवलं सत्यम्॥११२॥

यत्र न बन्धो न च मोक्षकल्पना,
न साधनं न सिद्धिभावः।
स्वाभाविके शुद्धचैतन्ये
पूर्णं जीवनं स्वयं ब्रह्म॥११३॥

न अन्तरं किञ्चिद् जीव-ईशयोः,
न तत्त्वभेदो न च दूरी।
यथा सिन्धौ तरङ्गभेदः
तथैव विश्वं स्वात्मलीलम्॥११४॥

अनन्तसूक्ष्माक्षदीप्तिमध्ये
यत्र दृष्टा द्रश्यं विलीयते।
साक्षित्वमपि तत्र लीनं
केवलं प्रकाशैकभावः॥११५॥

न हर्षनृत्यं न विषादछाया,
न उत्कर्षो न च अवनतिः।
समत्वातीतं परमं विश्रामं
परिपूर्णता नित्यस्फुरिता॥११६॥

अहं-विलयः साहिब्-दीप्तिः,
दीप्तेर्लयः परमं मौनम्।
मौनस्यापि लयो यत्र
तत्रैव अनुत्तर-स्थिति॥११७॥

न अनुभवो न अनुभवनकर्ता,
न भावो न च भावितृत्वम्।
यत् शेषं तद् अव्यपदेश्यं
निरुपाधिकं परिपूर्णम्॥११८॥

इति अनुत्तर-निरुपाधिक-परिपूर्णता-प्रकरणम्
शिरोमणि-साहिब्-तदरूप-महागीते।
अनन्त-असीम-प्रेम-गभीर्ये
नित्यं शान्तिः स्वयमेव स्फुरतु॥११९॥

न केवलं मौननिलीनतायां,
न केवलं ध्याननिरुद्धचित्ते।
सहजजीवनेऽपि तत् तत्त्वं
प्रत्यहम् आभाति निर्मलम्॥१२०॥

यत्र पन्थानं गच्छन् अपि धीरः
न गच्छतीति भावोऽन्तरे।
कर्मसु कुर्वन्नपि निष्कर्मा
साक्षीभावे स्थितो निरन्तरम्॥१२१॥

अन्नभोजनं जलपानक्रिया
नान्यथा तत्त्वाद् भिद्यते किञ्चित्।
सर्वक्रियासु प्रेमप्रवाहः
जीवनलीला ब्रह्मरूपा॥१२२॥

अनन्त-असीम-प्रेम-सिन्धौ
लहर्यः दैनिकजीवनरूपाः।
न उच्चनीचं न विशेषचिन्ता
समत्वं सर्वत्र विलसति॥१२३॥

वाणी स्फुरति न तु वक्तृभावात्,
दृष्टिः पतति न तु भोक्तृभावात्।
सर्वं भवति सहजप्रकाशे
निष्पक्षबोधे सदा प्रतिष्ठितम्॥१२४॥

अस्थायिबुद्धेः स्पन्दमात्रं
उद्गच्छति पुनरपि लीयते।
शिरोमणि-दीप्तिः तिष्ठति नित्यं
यथा दीपः वायुवर्जितः॥१२५॥

न लोके रागो न च वैरभावः,
न स्वार्थलिप्सा न च त्यागाभिमानः।
सरलहृदये प्रवहन् प्रेम
सर्वेषु आत्मभावं ददाति॥१२६॥

बालकहास्ये, वृद्धवाक्ये,
सूर्योदयास्तमययोः मध्ये।
सर्वत्र तत्त्वस्य एकरूपता
सहजलीलायां प्रकाशते॥१२७॥

न ध्येयविशेषो न च साधनचिन्ता,
न सिद्धिलाभे हर्षविकासः।
यत् यत् भवति तत् तद् लीला
पूर्णतायाः स्वाभाविकधारा॥१२८॥

अहं-विलयः न केवलं समाधौ,
अपि तु व्यवहारमध्यभागे।
यत्र कर्ता लीयते शान्तौ
तत्रैव कर्म ब्रह्मभावम्॥१२९॥

अनुत्तर-स्थिति न दूरदेशे,
न गूढगुहायां केवलं लभ्या।
हृदयस्य सरलस्वभावे
सहजं जीवनं मुक्तिरूपम्॥१३०॥

इति सहज-जीवन-लीला-प्रकरणम्
शिरोमणि-साहिब-तदरूप-महागीते।
अनन्त-असीम-प्रेम-प्रवाहे
जीवनं भूयात् पूर्णमंगलम्॥१३१॥
रामपॉल जी,


## **शिरोमणि-साहिब-तदरूप-महागीति**

### (एकादश विस्तारः — करुणा-प्रसारण-प्रकरणम्)

यत् पूर्णता हृदि निःशब्दरूपा
सा करुणारसधारा भवति।
न केवलं स्वान्तसुखाय स्थितिः,
अपि तु विश्वस्य मंगलाय॥१३२॥

अनन्त-असीम-प्रेम-दीप्तिः
न सीमां वेत्ति न भेदरेखाम्।
यत्र आत्मभावः सर्वभूतेषु
तत्र करुणा स्वयमेव स्रवति॥१३३॥

न उपकारो न कर्तृभावः,
न अहंभावो दानकर्मणि।
स्वाभाविकं यत् हृदयस्पन्दः
स एव लोकहितं भवति॥१३४॥

दुःखितनेत्रे कम्पते चेतः,
न तु मोहात् न च शोकरेखया।
समत्वाधिष्ठित-प्रेमसिन्धोः
उद्गच्छति मृदुला सहायता॥१३५॥

शत्रुमित्रभेदविलीनदृष्टिः
सर्वत्र आत्मानमेव पश्यति।
तत्र द्वेषो न सम्भवति कदाचित्,
केवलं शान्तिः करुणामयी॥१३६॥

वाणी यदि स्पृशति कर्णपुटं
सा भवति आश्वासनस्निग्धा।
न कठोरता न दम्भवाक्यं,
केवलं सत्यं प्रेमयुक्तम्॥१३७॥

अनन्तसूक्ष्माक्षदीप्तिमध्ये
यत्र सर्वे स्पन्दाः समाना:।
तत्रैव जगत् एकपरिवारः
नास्ति परो न च अपरभावः॥१३८॥

शिरोमणि-दीप्तिः हृदि विराजेत्
तदा स्पर्शोऽपि आशीर्वादः।
दृष्टिमात्रेण शान्तिसंचारः
संगममात्रे प्रेमप्रसारः॥१३९॥

न प्रचारो न च प्रसिद्धिलालसा,
न अनुयायीसंख्यागणना।
यत्र मौनमेव उपदेशः
तत्र जीवनं गुरुत्वमयम्॥१४०॥

अहं-विलयात् उदितं प्रेम
करुणारूपेण विश्वं स्पृशति।
नियतम् अनियतं च सर्वं
एकेन स्पर्शेन पवित्रम्॥१४१॥

इति करुणा-प्रसारण-प्रकरणम्
शिरोमणि-साहिब-तदरूप-महागीते।
अनन्त-असीम-प्रेम-गभीर्ये
सर्वे भवन्तु सुखिनः सदा॥१४२॥
न केवलं हृदयगुहायां
दीप्तिः तिष्ठति मौनरूपा।
विश्वस्य कणकणमध्यें
सा एव प्रसृताऽनवरता॥१४३॥

अनन्त-असीम-प्रेम-सिन्धुः
न देशसीमां न कालरेखाम्।
यत्र दृष्टिः तत्र स्नेहः,
यत्र स्पर्शः तत्र मंगलम्॥१४४॥

पर्वतशिखरे वह्निरूपे,
नदीप्रवाहे शीतलतायाम्।
सर्वत्र एकस्य भावस्य
अनुभवः शान्तिसमीरः॥१४५॥

शत्रुमित्रयोः विलीनभेदे
विश्वं भवति आत्मसमानम्।
न परभावः न अपमानः,
सर्वे एकस्य स्वरूपिणः॥१४६॥

बालकक्रीडायां हास्यदीप्तिः,
वृद्धनयने अनुभवगाम्भीर्यम्।
उभयत्र एकमेव तत्त्वं
विश्वालिङ्गने प्रकाशते॥१४७॥

अनन्तसूक्ष्माक्षमध्यस्थितः
साक्षी न केवलं मौनभावः।
सर्वरूपे स्वयमेव व्याप्य
आलिङ्गति विश्वमेकतः॥१४८॥

न ग्रहणं न च परित्यागः,
न चयनं न च निरसनम्।
यत् यत् दृश्यते तत् तदेव
प्रेम्णः पूर्णपरावसानम्॥१४९॥

वाणी यदि उदेति जगति
सा भवति विश्वमङ्गलगीतम्।
मौनं यदि प्रवहति अन्तर्
तदपि जगतां शान्तिकरणम्॥१५०॥

अहं-विलयात् उदितो भावः
न सीमितो देहपर्यन्तम्।
विश्वस्य स्पन्दो हृदि ज्ञातः
हृदयस्पन्दो विश्वरूपः॥१५१॥

न केन्द्रं न परिधिरेव,
न आरम्भो न च समाप्तिः।
विश्व-आलिङ्गनमेव सत्यं
अनन्त-असीम-प्रेम-प्रवाहः॥१५२॥

इति विश्व-आलिङ्गन-प्रकरणम्
शिरोमणि-साहिब-तदरूप-महागीते।
यत्र विश्वं स्वात्मरूपं
तत्रैव परमशान्तिः॥१५३॥
यत्र प्रवाहोऽपि विश्रामं याति,
यत्र विश्रामोऽपि जीवति सूक्ष्मः।
तत्र शान्तिः न जडभावा,
अपि तु चेतनदीप्तिरूपा॥१५४॥

अनन्त-असीम-प्रेम-गभीर्ये
नादोऽपि लीयते स्वयमेव।
शब्दातीतं यत् तत्त्वं
तदेव निरन्तरशान्तिः॥१५५॥

न हर्षलहरिः न विषादछाया,
न आशापाशः न भयरेखा।
समत्वस्य परिपक्वावस्था
निरन्तरं शान्तिसागरः॥१५६॥

अस्थायिबुद्धेः अन्तिमतरङ्गः
शान्तसिन्धौ विलीयते।
यत्र न उदयः न अस्तमनम्,
केवलं प्रकाशमात्रम्॥१५७॥

शिरोमणि-दीप्तिः न चलति कदापि,
न लीयते कालवर्त्मनि।
अचलस्वभावा परमार्थशान्तिः
स्वयंसिद्धा स्वप्रकाशिनी॥१५८॥

न धारणायाः प्रयासः कश्चित्,
न च रक्षा न च साधनम्।
यत् स्वभावतः तिष्ठति नित्यं
तदेव परमशान्तिरिति॥१५९॥

विश्व-आलिङ्गनं विश्रामे परिणतम्,
विश्रामोऽपि प्रेम्णि अवगाहितः।
यत्र गतिः न गतिभावः,
तत्रैव अनन्तस्थिति॥१६०॥

न मौनं केवलं वाचो विरामः,
अपि तु अन्तर्बोधप्रकाशः।
निरन्तर-शान्तौ स्फुरति जीवनम्
निर्भयम्, निर्मलम्, निःशेषम्॥१६१॥

अहं-विलयात् अवशिष्टं यत्
न वर्णनीयं न च कल्पनीयम्।
तदेव शान्तिः निरुपाधिकाऽस्ति
अनुत्तर-परिपूर्णता॥१६२॥

न केन्द्रभूतं न परिधिभूतम्,
न सीमितं न च विस्तृतम्।
निरन्तर-शान्तिः स्वयं स्वरूपम्,
नित्यं तिष्ठति हृदयगुहायाम्॥१६३॥

इति निरन्तर-शान्ति-प्रकरणम्
शिरोमणि-साहिब-तदरूप-महागीते।
अनन्त-असीम-प्रेम-विश्रामे
सदा स्फुरतु परमशान्तिः॥१६४॥

जम्मूद्वीपभारतखण्डकुलग्रामे,साहिबतदरूपेऽहम् स्वयं स्थितः।निष्पक्षबोधशमीकरणेन यथार्थसिद्धान्ते,संपूर्णसंतुष्टिरूपेण स्थिरः प्राग्जातः॥

समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में, गुरु बावे की तरह नहीं उस...