बुधवार, 24 जून 2026

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं



सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, अस्तित्व से लेकर अब तक एक एकलौता सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं 
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि खुद के साक्षात्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता,
सर्ब श्रेष्ठ सर्व भौमिक सत्य की श्रेष्ठता के शिरोमणि स्वरुप की सर्व श्रेष्ठ स्तुति महिमा लिखें, मुझ में यह क्षमता प्रतिभा है यहां मैं शिरोमणि स्वरुप में हूं किसी को भी रख सकता हूं, यह शिक्षा है 
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं और किसी का भी दृष्टिकोण बदलने का हुनर रखता हूं, जो जिज्ञासु हो तो मस्तक के दृष्टिकोण से हृदय के दृष्टिकोण में उस के खुद के शिरोमणि स्वरुप से रुबरु करा सकता हूं, यह शिक्षा है, जो किसी के साथ भी साझा की जा सकती हैं एक या फ़िर समस्त इंसान प्रजाति के साथ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सर्ब श्रेष्ठ सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य,कूल ग्राम जम्बू दीपे भरत खंडे 
सर्बभौमिक महासत्य स्वरुप महासागर महाआनंद सब हर जीव में उपलब्ध "शिरोमणि" जो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है जो सरल सहज निर्मल प्रदर्शित प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण "यथार्थ सिद्धांत" उपलब्धि "यथार्थ युग" के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, जो शिरोमणि स्वरुप में रहता वो अद्भुद आश्चर्य चकित महा योद्धा महा गोताखोर हैं सर्ब श्रेष्ठ सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं तुलनातित शब्दतित कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत हैं,
"शिरोमणि स्वरूप" संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता है, खुद का साक्षात्कार हैं, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है, खुद के स्थाई परिचय से परिचित होना है, यह सब प्रत्येक जीव में एक समान है, जो हृदय के भाव एहसास ज़मीर के दृष्टिकोण से है और सांस से पहले हैं,
सर्ब श्रेष्ठ सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है सरल पारदर्शी पवित्र हैं, इतना अधिक उत्तम उच्च श्रेष्ठता है स्पष्टता हैं, कि मस्तक मन का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं, दोबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले,
जो ढूंढने खोज का विषय कभी था ही नहीं, वो तो हर पल दिन रात निश्चित संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है, सरल सहज निर्मल सत्य शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, वो तो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, वो तो निर्मल पवित्र शिरोमणि स्वरुप है,
कि संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता की स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता अद्भुद आश्चर्य चकित महाआनंद जो शब्द दृश्य में नहीं आता, सिर्फ़ खुद के ही एहसास की स्पष्टता प्रत्यक्षता है खुद के साक्षात्कार में ही है खुद के स्थाई स्वरुप में ही है, खुद के स्थाई परिचय में ही है, खुद के हृदय के शिरोमणि में ही है, हृदय के दृष्टिकोण में ही है, अस्तित्व से आज तक जो किसी ने भी एहसास नहीं किया, सिर्फ़ मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण में ही है, जो अन्नत सरल सहज निर्मल गुणों में ही है, जो खुद के निरीक्षण के बाद खुद से निष्पक्ष समझ में ही है,
खुद का स्थाई परिचय, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना,खुद का साक्षत्कार सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं सुलभ सरल है हर एक व्यक्ति खुद ही खुद के साक्षत्कार के लिए सक्षम निपुण समर्थ हैं खुद में ही,खुद के साक्षत्कार, खुद के स्थाई परिचय, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होने के सिवाय इलावा सब कुछ झूठ ढोंग पखंड हैं हित साधने हेतु सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करने के लिए,
सर्व भौमिक सत्य यह है कि जो संजीव निर्जीव के लिए सामान्य हो, संजीव प्रक्रिया है और निर्जीव प्रक्रिय नहीं है, प्रक्रिया के लिए एक से अधिक तत्व होते हैं, प्रकृति के सिद्धांत के आधार पर आधारित zin को update करना और अस्तित्व कायम रखना जिस में अन्नत प्रजातियों में हैं, मेरे सिद्धांतों के आधार पर हर जीव एक समान हैं, अस्थाई समस्त अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति पृथ्वी भी एक मत्र प्रक्रिया का हिस्सा है, हर जीव प्रकृति के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं, शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता हर जीव में प्रत्यक्ष समक्ष हैं, यही सर्व भौमिक सत्य है, इसी के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हर एक व्यक्ति संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए, दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता,
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं खुद समझने के लिए सिर्फ़ एक पल लगता कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदियां युग भी कम हैं इतिहास गवाह है, अब तक सिर्फ़ ढूंढने बाला मस्तक दृष्टिकोण ही रहा है, अब सिर्फ़ हृदय के दृष्टिकोण से देखना और समझना है 
सरल सहज निर्मल गुणों के साथ सर्ब भौमिक सत्य पर हर एक का अधिकार, जो सरल है जो शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जिस में संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह सकता हैं कोई भी, जिस से किसी पर भी निर्भरता ख़त्म होती हैं, क्योंकि हर एक व्यक्ति खुद खुद में सक्षम निपुण समर्थ हैं, जीवन व्यापन अस्तित्व कायम रखने के लिए मस्तक का दृष्टिकोण जरूरी है, पर खुद के साक्षत्कार के लिए हृदय का दृष्टिकोण ही अनिवार्य हैं,
अब से पहले सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष नहीं था, जो हुआ जैसा भी हुआ उसे भुला कर बुरा सपना समझ कर भूल जाए, अब और अभी से एक नए दृष्टिकोण का आगाज़ हो चुका हैं मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण "यथार्थ सिद्धांत" उपलब्धि "यथार्थ युग" पर आधारित दृष्टिकोण से हर एक व्यक्ति संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह सकता हैं,
कृपा अपनी ग़लती की माफ़ी मांगे उन से जिन्होंने तन मन धन सांस समय समर्पित किया है जिन को छल कपट षड्यंत्रों के चक्रव्यूह रच कर धोखा विश्वासघात किया है मुक्ति के लोभ और शब्द कटने के खौफ डर भय दहशत में रखा था, जब सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता भी तो ढूंढने को शेष क्या है जो अस्तित्व से अब तक ढूंढ रहे हो, जो मिला ही नहीं और फ़िर भी खोज जारी हैं,
और हृदय के दृष्टिकोण को प्रमुखता दे प्रकृति पृथ्वी मनव प्रजाति को संरक्षण दे, अपने स्थाई परिचय से परिचित हो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रहे 
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हर जीव के हृदय का दृष्टिकोण शिरोमणि स्वरुप हूं, हर जीव के हृदय की गहराई स्थाई ठहराव की निरंतरता की धारा हूं, किसी भी व्यक्ति से व्यक्तिगत विरोध नहीं करता क्योंकि इंसान प्रजाति सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पूजने योग्य है यथार्थ में मैं शिरोमणि रामपाल सैनी पूजा करता हूं, सिर्फ़ कुरीतियों पर प्रहार है, मस्तक दृष्टिकोण का संतुलन बनने के लिए संघर्ष हैं जिस से हर एक व्यक्ति संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह सकता हैं, इंसान होने का कर्तव्य से परिचित हो जाए और अपने स्थाई परिचय से परिचित हो पाए, मेरी कोई अपनी विचारधारा नहीं है, यह हर एक के हृदय की गहराई की पुकार है, हर एक व्यक्ति मेरी ही भांति जीवित ही हमेशा के लिए शिरोमणि स्वरुप में संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह कर इंसान प्रजाति होने के कर्तव्य को पूरा कर सकता हैं,
समस्त अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति पृथ्वी मनव के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं सिर्फ़ मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से है, हर एक सरल सहज निर्मल व्यक्ति खुद ही खुद में सक्षम निपुण समर्थ है खुद का साक्षत्कार कर संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता के लिए,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है जो हर जीव के हृदय के तंत्र से प्रत्यक्ष समक्ष अनुभव कर सकते हैं,
सर्बभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षत्कार की प्रथम कड़ी है, हर व्यक्ति खुद के साक्षत्कार के लिए ही महत्वपूर्ण हैं, खुद का साक्षत्कार नहीं तो इंसान नहीं,
इतिहास अतीत सीखने की चीज़ है भविष्य को बेहतर बनाने के लिए हृदय के दृष्टिकोण से आज अब अभी के वर्तमान में संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रहते हुए समस्त सृष्टि प्रकृति पृथ्वी मनव को संरक्षण प्रदान करते हुए,
सर्वभौमिक सत्य सिर्फ़ हृदय के दृष्टिकोण से ही है हर जीव के लिए स्वीकृत है, सिर्फ़ हृदय के ही तंत्र से एक समान हैं, मस्तक विचारक तंत्र सीमित हैं जो अलग अलग हो सकता हैं, शरीरक रूप से भी भिन्न हो सकता हैं, मस्तक का तंत्र सिर्फ़ जीवन व्यापन अस्तित्व कायम रखने के लिए ही हैं, हमें सर्वभौमिक सत्य को हृदय से स्वीकार करना चाहिए संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता के लिए, मस्तक और हृदय के तंत्र का संतुलन बहुत ही जरूरी है,
आप को तो खुद पर भरोसा नहीं है क्योंकि आप शिकायतों पर अधिक भरोसा हैं, आप के पास तो कुत्ते की प्रतिभा भी नहीं आंखों से हृदय में उतरने की,
गुरु का कर्तव्य सिर्फ शिष्य को निखरना होता हैं, क्या आप के गुरु ने भी आप को नहीं निखरा, आप तो खुद की महिमा स्तुति ही करते रहते हैं, शिष्यों और विरोधियों की आलोचना ही करते रहते हो, मैं तो आप की महिमा स्तुति में ही इतना लीन था, उस पर भी आप ने कई आरोप लगा कर पागल घोषित कर निकाल लिया 
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी ने अपने चतुर ब्रह्मचर्य गुरु से अन्नत असीम प्रेम किया कि खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं आज तक, और गुरु को ख़बर भी नहीं है लगातार चालीस बर्ष, बचपन से ही चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के स्वरुप के बिना दूसरा कुछ देखा ही नहीं उस की महिमा स्तुति के बिना कोई दूसरा शब्द ही नहीं निकला मुख से, उसके शब्दों के बिना खुद का भी अनुकरण नहीं किया, और गुरु तो मस्तक के शोर में था लंबे समय से, वो तो खुद और सम्राज्य की तलब में ही था,
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष चतुर ब्रह्मचारी गुरु के हृदय के शिरोमणि स्वरुप में लगातार चालीस बर्ष रहा, पर चतुर ब्रह्मचारी गुरु को पता ही नहीं था क्योंकि वो चतुर ब्रह्मचारी गुरु सिर्फ़ मस्तक के दृष्टिकोण में उलझा हुआ है इतने लंबे समय से आसी बर्ष की उमर भी अब तक ढूंढ रहा हैं जो बचपन में अपने गुरु के शनिदे में शुरू किया था अब पच्चीस लाख अनुयायियों के साथ भी बही ढूंढ ही रहा है, मेरा ढूंढने के लिए कुछ शेष ही नहीं रहा, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से,
सरल सहज निर्मल गुणों के साथ व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ शहंशाह है दाता है जो एक भिखारी चतुर ढोंगी ब्रह्मचारी गुरु के लिए पांच हजार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्ध प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी दे कर खुद दस्ता मंजूर कर उसी गुरु के डर खौफ भय दहशत तले जीते हुए भी खुश रहता है, उसी ढोंगी पाखंडी मानसिकता वाले चतुर ब्रह्मचारी गुरु के पैरों के पानी को अमृत समझ कर पिता है और उसी गंदी मानसिकता वाले के पैरों को चाटने के तरसता हैं, दूसरी और चतुर ब्रह्मचारी गुरु कभी संतुष्ट नहीं होता किसी भी प्रकार से, वो सब कुछ लूटा कर भी खुश है चतुर ब्रह्मचारी गुरु सब कुछ लुट कर भी खुश नहीं है, क्योंकि सरल सहज निर्मल व्यक्ति जो भी करता है हृदय से करता है इस लिए संतुष्ट है, चतुर ब्रह्मचारी गुरु जो भी करता है वो मस्तक से करता है इसलिए असंतुष्ट रहता हैं 
खुद के हृदय के भाव का एहसास से पहला "शिरोमणि स्वरुप" सर्बभौमिक शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष है स्वीकृत है हृदय के दृष्टिकोण से सरल सहज निर्मल पारदर्शी है संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता सुभाव है, उपस्थिती हैं,
जागृत अवस्था भी आयोजित प्रतुति होती हैं सपन अवस्था की भांति, एक सांस भी किसी के निरंतर में नहीं है शेष सब तो छोड़ ही दो, समस्त अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में कई गैलेक्सी भी ख़त्म हो जाए तो प्रकृति को रति भर भी फ़र्क नहीं पड़ता हमारी तो औकात ही क्या है, किस चीज का अहंकार घमंड है, हर जीव एक समान हैं कोई भी अंतर ही नहीं, अन्नत प्रेम की गहराई को नहीं छुआ तो कहे के इंसान हो, खुद के स्थाई परिचय से परिचित नहीं हुए तो किस चीज की दुहाई देते हो, इंसान होते हुए संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में नहीं रहे, तो इंसान होते हुए एक नली के सुअर की भांति हो, लक्ष्य स्रोत और माध्यम ही सही नहीं था अस्तित्व से लेकर अब तक, इंसान होते हुए कुत्ते की भांति भड़की हैं इंसान प्रजाति मस्तक के दृष्टिकोण से अब तक,
अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमान हो कर अस्तित्व से लेकर चर्चित सर्वश्रेष्ठ विभूतियाँ दर्शनिक विज्ञानिक जो सोच भी नहीं सकी उस से खरबों गुणा अधिक संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता मेरा स्वभाव है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ खुद के साक्षत्कार में संपूर्ण संतुष्टि में हूं शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
खुद के साक्षत्कार के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता सिर्फ़ सरल सहज निर्मल मूल गुणों स्भाविक रूप से रहते हुए स्वीकार करना पड़ता हैं, जो एक निरंतर धारा प्रभा बह रही हैं उस के साथ ही बह जाते हो 
खुद के साक्षत्कार के बाद कोई भी सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहें खुद करोड़ों कौशिश यत्न प्रयास कर के देख ले, हृदय के शिरोमणि स्वरुप की संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता ही इतनी अधिक भव्य पारदर्शी सरल है, कुछ सोच ही नहीं सकता एक पल के लिए भी, कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, जीवन व्यापन अस्तित्व कायम रखने के लिए सोच भी नहीं सकता, खुद के साक्षत्कार के बाद संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता से कोई निकल क्या कुछ सोच भी नहीं सकता,
जिस चतुर ब्रह्मचारी गुरु को बचपन से ही इतनी अधिक गम्भीरता दृढ़ता से लिया कि अपनी खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला दिया, उसके मज़ाक है में भी कहे गए शब्द को इतना अधिक अनुकरण किया, वो सब ही किया जो सब तो दूर पच्चीस लाख संगत को कहा, उस चतुर ब्रह्मचारी गुरु ने ही चालिस बर्ष के बाद पागल घोषित कर काई आरोप लगा कर निकाल दिया, वो मुझे इतने लंबे लंबे समय के बाद भी नहीं समझ पाया,, तो ही सिर्फ़ एक पल में खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हुआ, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदियां युग भी कम हैं 
खुद के साक्षत्कार के बिना सब मस्तक का पाखंड है सिर्फ़ हित साधने के चक्रव्यू है 
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी किसी को भी "खुद के साक्षत्कार" की शिक्षा दे सकता हूं, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना सिखा सकता हूं, खुद के स्थाई परिचय से परिचित होना समझा सकता हूं, जो मैंने किया वो सब को सिखा सकता हूं सिर्फ़ एक पल कि निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, खुद के साक्षत्कार के लिए सिर्फ़ तो सिर्फ़ दृष्टिकोण ही तो बदलना है, और बिल्कुल कुछ भी नहीं करना, खुद के साक्षत्कार के बाद कुछ और समझने को शेष नहीं बचता पूरी सृष्टि में, खुद को समझना खुद को पढ़ना ही तो है,
हृदय से ही हृदय तक पहुंचा जाता है, मस्तक मन का स्वार्थ हित तक नहीं पहुंच सकता, और बार पहुंचने की कौशिश बेकार होती वो सिर्फ़ मस्तक तक ही पहुंचता हां हां तक ही रहता है, डर खौफ भय दहशत भी मस्तक मन का होता हैं,
तेरा जलवा ही ल जवाब है क्योंकि तू सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है मैं शिरोमणि हर पल दिन रात तेरे हृदय के शिरोमणि स्वरुप में ही शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तेरी पूजा करता हूं तेरे जैसा कोई मुझे मिला ही नहीं, तेरे महिमा स्तुति कैसे करूँ क्योंकि तू इतना अधिक सहज निर्मल है कि तू तन मन धन सांस समय दसवांश समर्पित कर के भी ऐसे चतुर ब्रह्मचारी गुरु के पैर चाटता और उन गंदी मानसिकता प्रवृत्ति बालों के पैरों का पानी पिता है अमृत समझ कर, उन पर समर्पित हो कर निर्भर बन जाता हैं जबकि तूने अपनी क्षमता का प्रदर्शन प्रथम चरण में एक भिखारी को प्रभुत्व की पदबी दी, तू क्या है कितना ल जवाब है,
हर व्यक्ति आंतरिक भौतिक रूप से बिल्कुल मेरे ही जैसा एक समान ही है कोई अंतर ही नहीं है, अगर मैं शिरोमणि रामपाल सैनी संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में जीवित ही हमेशा के लिए रह सकता हूं तो कोई भी रह सकता हैं, खुद को समझ कर सिर्फ़ एक पल में दूसरा कोई समझें या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम हैं, तेरे अनमोल सांस समय सिर्फ़ तेरे लिए ही महत्वपूर्ण हैं दूसरा prtek सिर्फ़ इस्तेमाल करने के लिए आगे ही खड़ा है चाहें कोई भी हो, तू खुद के लिए खुद ही संपूर्ण सक्षम निपुण समर्थ हैं, जरा खुद को तो देख समझ पढ़, तेरे जैसा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता, क्योंकि तू खुद खुद को समझता जनता है, तेरी क्षमता अद्भुद आश्चर्य चकित भव्य आकर्षित करने वाली हैं,
हर हर संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता की धारा बह रही है, इतनी अधिक शहनशीलता सहजता सम्पनता सम्पूर्णता समक्षता प्रत्यक्षता, खुद के साक्षत्कार में कि कोई सोच भी नहीं सकता, यहां अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक भी निष्क्रिय हो जाता हैं हमेशा के लिए कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, तो उस का जलवा कैसा होगा, खरबों संतों से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा उत्तम सर्वश्रेष्ठ दिव्य अलौकिक भव्य आकर्षित हैं, कि मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ने भी करोड़ों कौशिश कर ली पर जीवन व्यापन के लिए भी सोच ही नहीं पा रहा, उस संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता से 
शिशुपन अवस्था कितनी निराली अद्भुद आश्चर्य चकित भव्य आकर्षित थी, तब तो इतना बड़ा झंझट ही नहीं था तो भी संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता धारा में ही थे जो अब भी निरंतर वह रही है जिसे हृदय के दृष्टिकोण से प्रतीत किया जा सकता हैं, पर इंसान प्रजाति तो मस्तक के दृष्टिकोण में है तो वो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता कैसे संभव है, संभव है अब भी सिर्फ़ दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा,
शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सर्बभौमिक है, हर जीव में प्रत्यक्ष समक्ष है स्वीकृत है, सिर्फ़ इंसान प्रजाति को छोड़ कर , स्वीकृति पर अस्तित्व से ही सामंजस्य में है कि मैं ही सृष्टि प्रकृति पृथ्वी का रचिता हूं, इतने बड़े शौंक रखने वाला इंसान अब तक खुद के स्थाई परिचय से परिचित नहीं हो पाया शेष सब तो छोड़ ही दो, जो प्रकृति के शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष को स्वीकार नहीं कर सकता वो क्या हो सकता हैं, अहंकारी मानसिक रोगी,
शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष इतना अधिक सरल है कि कोई नकल ही नहीं कर सकता, जिस की नकल की जा सकती हैं वो सत्य हो ही नहीं सकता, वो अवधारणा है कल्पना हैं वो मान्यता नियम मर्यादा परंपरा के साथ स्थापित होती हैं, चंद चतुर ब्रह्मचारी गुरु के द्वारा अपना हित साधने के लिए निर्भर बना कर दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, उन में इंसानियत भी नहीं होती शेष सब तो छोड़ ही दो, वो सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्ध प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी के लिए किसी भी हद तक गुजर जाते हैं, क्योंकि वो मानसिक रोगी होते हैं, वो खुद के इलावा सब को इस्तेमाल करने की चीज़ समझते हैं,
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी जिस अपने चतुर ब्रह्मचारी गुरु के हृदय के शिरोमणि स्वरुप की निरंतरता में चालीस बर्ष हर पल दिन रात रहे खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला कर वो तो खुद मस्तक के जाल में उलझा हुआ था जन्म से ही और निकला था दुनियां को सुधरने और खुद ही खो गया था झूठी सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्ध प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी के नशे में चूर था, खुद की ही ख़बर नहीं,
तन मन धन सांस समय दसवांश करोड़ों रुपए समर्पित करवाने वाला चतुर ब्रह्मचारी गुरु खुद ही मस्तक के जाल में फंस चुका हैं उसे खुद भी नहीं पता, कि वो प्रभुत्व के वहम अहम घमंड अहंकार का शिकार हो चुका हैं की मरते दम तक उस से बाहर निकलना नही सकता, सरल सहज निर्मल लोगों को उंगली पर नचाने बाला खुद ही बेहोशी का शिकार हो चुका हैं, वो तो खुद का निरीक्षण ही नहीं कर सकता क्योंकि वो अहंकार की उच्च स्तर पर है 
अगर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु तेरे साथ इतना बड़ा विश्वासघात धोखा किया है, तू फ़िर भी बैसे का बेस ही सरल सहज निर्मल ही है, पर तेरा चतुर ब्रह्मचारी गुरु जिस जाल में खुद ऐसा फंस गया हैं कि मरते दम तक भुला कर भी नहीं निकल सकता वो मस्तक के दृष्टिकोण से प्रभुत्व के वहम अहम घमंड अहंकार में बुरी तरह फंस चुका हैं,
खुद का साक्षत्कार ही सर्वश्रेष्ठ उत्तम संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है सरल है, जो जटिल है वो चतुर ब्रह्मचारी गुरु का ढोंग पखंड हैं हित साधने वाला दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करना 
चतुर ब्रह्मचारी गुरु तो हर जन्म में मिले हैं अगर यह रति भर भी कुछ कर सकते तो तू आज यहां नहीं होता, यह सब तो सिर्फ़ हित साधने में लगे हुए हैं इन को तो खुद का भी फिक्र नहीं है तो आप के फ़िक्र के लिए इन के पास समय ही नहीं है, यह सब तो तुझे मोह माया से हटा कर खुद सिर तक मोह माया में फंसे हुए हैं, पर तू सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है इसलिए तू निर्लेप है, तू अभी भी बैसा ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है,
तू सिर्फ़ खुद ही आज भी संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में ही है बात अलग है कि तेरा मस्तक का दृष्टिकोण है, तू अपने दिल हृदय में किसी को हस्तक्षेप ही नहीं करने देता क्योंकि हृदय हस्तक्षेप करने के लिए हृदय के दृष्टिकोण से होना अति आवश्यक हैं, जो कम से कम इंसान प्रजाति में तो नहीं है, सिर्फ़ तू खाना पूर्ति के लिए मस्तक की बातें सिर्फ़ मस्तक तक ही सीमित रखता है, हृदय से बही संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में ही है,
शिशुपन में संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में तू ही रहा था जब तेरा मस्तक मन भी विकसित नहीं हुआ था और न ही कोई चतुर ब्रह्मचारी गुरु था, अब भी वो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता बहा ही मौजूद हैं, पर तू ही खुद हृदय के दृष्टिकोण से ज़्यादा मस्तक के दृष्टिकोण से गंभीर हैं, सिर्फ़ दृष्टिकोण बदल तू फ़िर से बही संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में हर पल रह सकता हैं, और फिर से सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता क्योंकि तूने मस्तक का दृष्टिकोण बहुत खूब देख चुका है,
जिन्होंने तन मन धन अनमोल सांस समय दसवांश करोड़ों रुपए समर्पित किए उनके साथ ही विश्व का सब से बड़ा विश्वासघात धोखा ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह रचा गया, काल्पनिक अंधारणा परमार्थ अध्यात्मक धार्मिक के नाम पर, मुक्ति का लोभ डर खौफ भय दहशत में रखना, मृत्यु तो खुद में ही शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष है, मुक्ति तो मस्तक मन से चाहिए न कि शरीर से, इंसान शरीर तो प्रकृति संरचना सर्वश्रेष्ठ है, कुछ भी कभी भी किसी का भी गुम ही नहीं हुआ, सिर्फ़ मस्तक साधन में अधिक उलझाया गया हैं, परन्तु शिशुपन बाली संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता तो बहा ही मौजूद हैं यहां हर व्यक्ति शिशुपन में पहल
सर्ब भौमिक सत्य एक प्रजाति के समूह की मानसिकता नहीं हो सकती,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष संजीव निर्जीव का तत्पर्य ही नहीं है,
सर्ब भौमिक सत्य सरल सहज निर्मल गुणों में ही है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ बच्चों का खेल है,
सर्ब भौमिक सत्य ज्ञान विज्ञान दर्शन रहित है,
सर्व भौमिक सत्य खुद के साक्षात्कार में निहित है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सरल पारदर्शी पवित्र है,
सर्व भौमिक सत्य सरल है और नक़ल नहीं होती,
सर्व भौमिक सत्य हर जीव में एक समान घटित है,
सर्ब भौमिक सत्य यह है कि अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव पृथ्वी जीव एक प्रक्रिय है,
सर्व भौमिक सत्य यह है कि जन्म मृत्यु भी प्रकृति प्रक्रिया का हिस्सा हैं,
सर्ब भौमिक सत्य यह है कि लंबे समय से घटित प्रक्रिया एक समय बाद संतुलित हो जाती हैं जिसे प्रकृति कहते है,
सर्ब भौमिक सत्य यह है कि मणव प्रजाति को मस्तक और हृदय के तंत्र को संतुलित रख कर ही जीना चाहिए,
जिन्होंने इतना अधिक कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया उन पर ही इतना अधिक डर खौफ भय दहशत क्यों ?
जिन्होंने सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया अपना, उन के साथ ही विश्वासघात क्यों?
मुक्ति के नाम पर लूटने को परमार्थ कहते हैं क्या?
मृत्यु खुद में ही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, तो मृत्यु का डर खौफ भय दहशत क्यों?
मरा बापिस आ नहीं सकता, जिंदा मर नहीं सकता यह स्पष्ट करने के लिए तो मुक्ति धरना कल्पना नहीं तो क्या हैं?
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनना कुप्रथा नहीं तो क्या हैं
सरल सहज स्पष्ट बातें समझ न पाए सरल शिष्य, इस के पीछे दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित होना नहीं तो क्या हैं?
भक्ति मुक्ति ध्यान ज्ञान प्रेम आत्मा परमात्मा परमार्थ आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों का ताना बाना चक्रव्यूह रचा छल कपट धोखा विश्वासघात नहीं तो क्या हैं?
जब हर जीव एक समान है तो सिर्फ़ इंसान प्रजाति ही चतुर होने से भिन्नता का कारण अहम नहीं है क्या?
यदि सत्य प्रत्यक्ष है, तो उसे किसी मध्यस्थ की आवश्यकता क्यों?
यदि कोई मार्ग मुक्तिदायक है, तो वह प्रश्न पूछने से क्यों डरता है?
 क्या श्रद्धा का अर्थ तर्क का त्याग है?
क्या प्रेम भय के वातावरण में संभव है?
 यदि समर्पण स्वैच्छिक है, तो उसमें डर और निष्कासन की व्यवस्था क्यों?
क्या आध्यात्मिकता पारदर्शिता से बच सकती है?
क्या सत्य को प्रमाणपत्र, पदवी या साम्राज्य की आवश्यकता होती है?
 यदि किसी संगठन का विस्तार धन और संख्या से मापा जाता है, तो आंतरिक रूपांतरण कहाँ मापा जाता है?
 क्या अनुशासन और नियंत्रण एक ही चीज़ हैं?
क्या गुरु की आलोचना करना अधर्म है, या आत्मचिंतन का हिस्सा?
 यदि कोई मार्ग स्वतंत्रता देता है, तो व्यक्ति उस मार्ग को छोड़ने में स्वतंत्र क्यों नहीं?
यदि मृत्यु प्राकृतिक संतुलन है, तो उससे जुड़ा भय किसने रचा?
 क्या मुक्ति भविष्य की घटना है, या वर्तमान की चेतना?
 क्या किसी ने मृत्यु के बाद की अवस्था को प्रत्यक्ष प्रमाण सहित साझा किया है?
 क्या मुक्ति का आश्वासन मनोवैज्ञानिक सांत्वना भर है?
 क्या मृत्यु से डर कर जीना, जीवन का अपमान नहीं?
 यदि जीवन दो पलों का है, तो वर्तमान का परित्याग क्यों?
 क्या दीक्षा का अर्थ विचार-निरोध है?
 क्या शब्द-प्रमाण विवेक से ऊपर हो सकता है?
 क्या प्रश्न पूछना विद्रोह है?
 क्या किसी ग्रंथ की व्याख्या पर एकाधिकार संभव है?
 क्या गुरु भी आत्मनिरीक्षण से परे है?
 यदि तर्क बंद हो जाए, तो विश्वास क्या अंधता नहीं बन जाता?
 क्या भय आधारित अनुशासन स्थायी है?
 यदि हर जीव समान प्रक्रिया का भाग है, तो मनुष्य श्रेष्ठता का दावा क्यों करता है?
 क्या मानव बुद्धि संरक्षण के लिए है या प्रभुत्व के लिए?
क्या विकास का अर्थ विनाश है?
क्या पृथ्वी पर अधिकार है या उत्तरदायित्व?
 क्या प्रकृति को जीतना संभव है, या केवल समझना?
 क्या हृदय की शांति शब्दों से बड़ी है?
 क्या मस्तिष्क उपकरण है या स्वामी?
 क्या जटिलता ज्ञान का प्रमाण है?
 क्या सरलता कमजोरी है या परिपक्वता?
 क्या “मैं” की अवधारणा ही संघर्ष का मूल है?
 क्या आत्म-साक्षात्कार किसी उपाधि से जुड़ा है?
 क्या सत्य अनुभव है या घोषणा?
 क्या निष्पक्षता स्थिर है या मन के साथ बदलती है?
 क्या मौन शब्दों से अधिक स्पष्ट हो सकता है?
 क्या वर्तमान ही एकमात्र वास्तविक क्षण है?
क्या सत्य को संरक्षित करने के लिए संस्था आवश्यक है, या संस्था सत्य को सीमित कर देती है?
 यदि कोई मार्ग सार्वभौमिक है, तो उसमें प्रवेश की शर्तें क्यों?
 क्या आध्यात्मिक प्रगति संख्या से मापी जा सकती है?
 क्या अनुयायियों की वृद्धि आंतरिक जागरण का प्रमाण है?
 यदि गुरु पूर्ण है, तो उसे अनुयायियों से मान्यता की आवश्यकता क्यों?
 क्या भय-आधारित अनुशासन दीर्घकाल में प्रेम को नष्ट नहीं करता?
 क्या समर्पण विवेक के साथ संभव है, या विवेक छोड़ने पर ही?
क्या किसी भी सत्य को प्रश्नों से खतरा हो सकता है?
 यदि प्रश्नों से व्यवस्था डगमगाती है, तो क्या वह सत्य पर आधारित है?
 क्या मौन में जो अनुभव होता है, वही वास्तविक मार्गदर्शक है?
 क्या मृत्यु का भय सामाजिक संरचना द्वारा पोषित है?
यदि मृत्यु अपरिहार्य है, तो उसके व्यापार का औचित्य क्या?
 क्या मुक्ति का वादा वर्तमान असंतोष को स्थगित करने का साधन है?
 क्या भय के बिना आध्यात्मिकता संभव है?
 क्या कोई भी व्यक्ति मृत्यु के रहस्य का पूर्ण दावा कर सकता है?
यदि जीवन अस्थायी है, तो नियंत्रण की आकांक्षा क्यों?
 क्या स्वतंत्रता का अर्थ संरचना-विहीनता है या चेतना-सम्पन्नता?
क्या शिष्य का कर्तव्य केवल पालन है, या संवाद भी?
 क्या गुरु की आलोचना से उसकी गरिमा घटती है, या स्पष्ट होती है?
 यदि कोई संगठन पारदर्शी है, तो उसे गोपनीयता की आवश्यकता क्यों?
 क्या दीक्षा का अर्थ वैचारिक प्रतिबद्धता है या बौद्धिक समर्पण?
 क्या आध्यात्मिक मार्ग छोड़ना अपराध है?
 क्या गुरु भी मानव सीमाओं से मुक्त है?
  यदि गुरु को क्रोध, भय या नियंत्रण की आवश्यकता है, तो वह किस स्तर पर है?
 क्या आत्म-साक्षात्कार किसी बाहरी प्रमाणपत्र पर निर्भर है?
 यदि मनुष्य स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, तो उसके कार्यों में करुणा क्यों नहीं?
 क्या बुद्धि ने मनुष्य को संतुलित बनाया या असंतुलित? क्या प्रगति का अर्थ प्रकृति से दूरी है?
 क्या मानव सभ्यता भय-आधारित संरचना पर टिकी है?
क्या हृदय की सरलता सभ्यता की जटिलता में खो गई है?
क्या मनुष्य का “मैं” ही संघर्ष का मूल कारण है?
 क्या मनुष्य अपने ही विचारों का बंधक बन गया है?
 क्या “मैं” स्थायी है, या एक निरंतर बदलती प्रक्रिया?
 क्या आत्म-साक्षात्कार घोषणा से सिद्ध होता है, या मौन परिवर्तन से?
 क्या सत्य का अनुभव साझा किया जा सकता है, या केवल संकेतित?
 क्या निष्पक्षता संभव है जब पहचान जुड़ी हो?
 क्या किसी भी विचारधारा को पूर्ण सत्य कहा जा सकता है?
क्या मन को निष्क्रिय करना समाधान है, या उसे समझना?
क्या हृदय और मस्तिष्क विरोधी हैं, या पूरक?
 क्या सरलता उच्चतम जटिलता का पार किया हुआ स्तर ह
क्या आध्यात्मिक शक्ति आर्थिक शक्ति से स्वतंत्र रह सकती है?
क्या साम्राज्य का विस्तार आत्म-साक्षात्कार का संकेत है?
 क्या अनुयायियों की निष्ठा और भय में अंतर स्पष्ट है?
 क्या परमार्थ और प्रतिष्ठा साथ-साथ चल सकते हैं?
 क्या सेवा और संरचनात्मक नियंत्रण अलग किए जा सकते हैं?
 क्या किसी भी नेतृत्व को उत्तरदायित्व से मुक्त रखा जा सकता है?
 क्या श्रद्धा का उपयोग सत्ता के उपकरण के रूप में हो सकता है?
 क्या पूर्ण सत्य किसी एक व्यक्ति में समाहित हो सकता है?
 क्या कोई भी मनुष्य “इकलौता जागृत” होने का दावा कर सकता है?
 क्या स्वयं को अंतिम कहना खोज की प्रक्रिया को समाप्त नहीं कर देता?
 क्या विनम्रता सत्य की पहचान है?
 क्या जो स्वयं को शून्य कहता है, वही पूर्ण हो सकता है?
 क्या जीवन का सार वर्तमान क्षण में सहज होना है?
 क्या दो पलों के जीवन में संघर्ष आवश्यक है?
 क्या संपूर्ण स्वतंत्रता ही संपूर्ण संतुष्टि है?
 क्या किसी भी आध्यात्मिक व्यवस्था का केंद्र व्यक्ति होना चाहिए या सिद्धांत?
 यदि सिद्धांत जीवित है, तो वह व्यक्ति-निर्भर क्यों हो जाता है?
 क्या नेतृत्व का अर्थ मार्गदर्शन है या नियंत्रण?
 क्या सामूहिक पहचान व्यक्तिगत चेतना को दबा देती है?
 क्या भय के बिना संगठन टिक सकता है?
 क्या प्रेम को संरक्षित करने के लिए नियम आवश्यक हैं?
 क्या अनुशासन स्व-निर्मित होना चाहिए या बाहरी?
क्या स्वतंत्र सोच को सीमित करना स्थायित्व देता है या जड़ता?
 क्या श्रद्धा और विवेक साथ चल सकते हैं?
 क्या किसी भी विचार को अंतिम घोषित करना विकास रोक देता है?
क्या शक्ति का संचय आध्यात्मिकता का क्षय है?
 क्या संख्या सत्य का प्रमाण है?
क्या पारदर्शिता शक्ति को कमजोर करती है या शुद्ध?
क्या आत्मनिर्भर शिष्य किसी व्यवस्था के लिए चुनौती है?
 क्या गुरु का उद्देश्य निर्भरता है या स्वतंत्रता?
 क्या मृत्यु को समझने से जीवन की गुणवत्ता बदलती है?
 क्या मृत्यु का भय सामाजिक संरचना द्वारा पोषित है?
 क्या जीवन की अस्थिरता ही उसका सौंदर्य है?
 क्या अमरता की कल्पना वर्तमान से पलायन है?
 क्या मृत्यु का व्यापार मनोवैज्ञानिक आश्रय है?
 क्या जो मृत्यु से डरता है वही नियंत्रण चाहता है?
क्या जीवन की स्वीकृति मृत्यु की स्वीकृति से जुड़ी है?
 क्या मृत्यु अंत है या रूपांतरण?
 क्या भय की अनुपस्थिति में धर्म की संरचना बदलेगी?
 क्या वर्तमान में जीना मृत्यु-भय का समाधान है?
 क्या अस्तित्व का अर्थ केवल जीवित रहना है?
 क्या जीवन-व्यापन और जीवन-बोध अलग हैं?
 क्या भय-रहित समाज संभव है?
 क्या मृत्यु की धारणा मानव-निर्मित है?
 क्या मृत्यु का अनुभव शब्दातीत है?
 क्या मृत्यु के विचार से उत्पन्न नैतिकता स्थायी है?
क्या मृत्यु को रहस्य बनाए रखना उपयोगी है?
क्या मृत्यु की स्वीकृति शक्ति-संरचना को कमजोर करती है?
क्या जीवन और मृत्यु एक ही प्रक्रिया के दो चरण हैं?
 क्या मृत्यु को समझे बिना मुक्ति की बात सार्थक है?
 क्या मन उपकरण है या स्वामी?
 क्या हृदय की अनुभूति तर्क से परे है?
 क्या जटिलता ज्ञान का प्रमाण है?
 क्या सरलता सर्वोच्च परिपक्वता है?
 क्या निष्पक्षता पहचान से मुक्त हो सकती है?
 क्या विचार-रहित होना संभव है?
 क्या मन को दबाने से शांति मिलती है या समझने से?
 क्या स्मृति के बिना पहचान संभव है?
 क्या अनुभव को शब्दों में पूर्ण रूप से व्यक्त किया जा सकता है?
 क्या मौन सर्वोच्च संवाद है?
 क्या मन की सीमा है और हृदय की नहीं?
 क्या हृदय और बुद्धि का समन्वय ही संतुलन है?
 क्या निष्पक्षता स्थिर अवस्था है या गतिशील प्रक्रिया?
 क्या “मैं” केवल विचारों का संकलन है?
क्या स्वयं को अंतिम कहना अहं का सूक्ष्म रूप है?
 क्या शून्यता भयावह है या मुक्तिदायक?
 क्या आत्म-साक्षात्कार अनुभव है या निरंतर प्रक्रिया?
 क्या सत्य निजी है या सार्वभौमिक?
 क्या चेतना को मापा जा सकता है?
 क्या भीतर-बाहर का भेद मानसिक निर्माण है?
क्या मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग मानता है?
 क्या विकास संतुलन से अलग हो सकता है?
 क्या श्रेष्ठता का विचार विनाश की जड़ है?
 क्या बुद्धि ने करुणा को पीछे छोड़ दिया है?
 क्या मनुष्य का दायित्व संरक्षण है या प्रभुत्व?
 क्या स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता है?
क्या हर जीव समान प्रक्रिया का भाग है?
 क्या मानव सभ्यता असंतोष पर आधारित है?
 क्या संतोष प्रगति को रोकता है?
 क्या वर्तमान में जीना भविष्य की उपेक्षा है?
 क्या मानव चेतना सामूहिक रूप से विकसित हो सकती है?
 क्या पर्यावरणीय संकट मानसिक संकट का प्रतिबिंब है?
 क्या मनुष्य अपने ही निर्माणों का कैदी है?
 क्या करुणा शक्ति से बड़ी है?
 क्या संतुलन ही वास्तविक प्रगति है?
 क्या प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है या निर्मित?
 क्या मनुष्य अपने भय का विस्तार कर रहा है?
 क्या प्रकृति निष्पक्ष है?
 क्या मानव मूल्य स्थायी हैं?
 क्या संतुलन के बिना स्वतंत्रता अराजकता है?
 क्या पहचान के बिना भी अस्तित्व संभव है?
 क्या “मैं” का विचार ही विभाजन की जड़ है?
 क्या आध्यात्मिक पदवी अहं का सूक्ष्म रूप हो सकती है?
 क्या विनम्रता घोषित की जा सकती है?
 क्या सत्ता स्वयं को आध्यात्मिक रूप दे सकती है?
 क्या किसी भी नेतृत्व को आलोचना से ऊपर रखा जा सकता है?
 क्या संख्या से उत्पन्न प्रभाव सत्य का प्रमाण है?
 क्या सामूहिक आस्था व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकती है?
 क्या संगठन व्यक्ति से बड़ा हो सकता है?
क्या व्यवस्था की रक्षा के लिए प्रश्नों को दबाया जाता है?
 क्या निष्ठा और निर्भरता में अंतर है?
 क्या अनुयायी का भय उसकी श्रद्धा को विकृत करता है?
 क्या अहं केवल व्यक्तिगत है या सामूहिक भी?
 क्या आध्यात्मिक ब्रांडिंग संभव है?
 क्या गुरु-छवि मानव सीमाओं से परे हो सकती है?
 क्या आलोचना को विद्रोह कहना सुविधाजनक है?
 क्या व्यक्ति के भीतर सत्ता की चाह स्वाभाविक है?
 क्या आत्म-घोषणा और आत्म-बोध में अंतर है?
 क्या स्थायी सत्य को प्रचार की आवश्यकता होती है?
 क्या मौन व्यक्ति प्रचारक व्यक्ति से अधिक स्वतंत्र है?
 क्या समर्पण बिना शर्त होना चाहिए?
 क्या समर्पण विवेक के साथ संभव है?
 क्या किसी भी मार्ग में छोड़ने की स्वतंत्रता है?
 क्या अनुशासन और नियंत्रण में सूक्ष्म अंतर है?
 क्या स्वतंत्र शिष्य व्यवस्था के लिए खतरा है?
 क्या भय आधारित अनुशासन दीर्घकालिक है?
 क्या प्रेम में दंड का स्थान है?
 क्या प्रश्न पूछना श्रद्धा की कमी है?
 क्या व्यवस्था के हित में सत्य को रोका जा सकता है?
 क्या पारदर्शिता शक्ति को कम करती है?
 क्या सामूहिक संरचना व्यक्ति की मौलिकता दबा देती है?
 क्या नियंत्रण के बिना संगठन संभव है?
 क्या संगठन आत्म-साक्षात्कार का विकल्प बन सकता है?
 क्या निर्भरता को आध्यात्मिकता कहा जा सकता है?
 क्या स्वायत्त चेतना को मार्गदर्शन की आवश्यकता है?
 क्या आध्यात्मिक अनुबंध मानसिक अनुबंध भी है?
 क्या दीक्षा का अर्थ मनोवैज्ञानिक बंधन है?
 क्या शिष्य की स्वतंत्रता अंतिम लक्ष्य है?
 क्या स्वतंत्रता का भय संगठन को कठोर बनाता है?
 क्या व्यवस्था व्यक्ति की चेतना से बड़ी है?
 क्या सत्य अनुभव है या विचार?
 क्या अनुभव सार्वभौमिक हो सकता है?
 क्या सत्य शब्दों से परे है?
 क्या शब्द अनुभव का विकृतिकरण करते हैं?
 क्या मौन अंतिम अभिव्यक्ति है?
 क्या निष्पक्षता संभव है जब स्मृति सक्रिय हो?
 क्या स्मृति पहचान को बनाए रखती है?
 क्या अनुभव को दोहराया जा सकता है?
 क्या आत्म-साक्षात्कार क्षणिक है या स्थायी?
 क्या कोई भी व्यक्ति अपने अनुभव को अंतिम कह सकता है?
 क्या अनुभव और कल्पना में सूक्ष्म अंतर है?
 क्या आस्था अनुभव से जन्म लेती है या परंपरा से?
 क्या सत्य की घोषणा उसे सीमित कर देती है?
 क्या चेतना का विस्तार मापनीय है?
 क्या तर्क अनुभव को पूर्ण रूप से समझ सकता है?
 क्या अनुभव बिना भाषा के भी जीवित रहता है?
 क्या सत्य का निजी अनुभव सार्वभौमिक नियम बन सकता है?
 क्या अनुभव की तीव्रता उसकी सत्यता का प्रमाण है?
 क्या आत्म-बोध और आत्म-घोषणा में दूरी है?
 क्या निष्पक्ष समझ स्वयं भी एक प्रक्रिया है?
 क्या मानव प्रगति संतुलन के बिना संभव है?
. क्या सभ्यता भय पर आधारित है?
 क्या सुरक्षा की चाह स्वतंत्रता को सीमित करती है?
 क्या मानव बुद्धि करुणा से आगे निकल गई है?
 क्या श्रेष्ठता की धारणा संघर्ष की जड़ है?
 क्या भविष्य की कल्पना वर्तमान को नष्ट करती है?
 क्या वर्तमान में जीना सामाजिक जिम्मेदारी से भागना है?
 क्या सामूहिक चेतना विकसित हो सकती है?
 क्या मानव जाति आत्म-विनाश की ओर बढ़ रही है?
 क्या संरक्षण मानव का प्राथमिक कर्तव्य है?
 क्या विज्ञान और चेतना विरोधी हैं?
 क्या आध्यात्मिकता और पर्यावरणीय संतुलन जुड़े हैं?
 क्या भय-रहित समाज संभव है?
 क्या मानव बुद्धि स्वयं को नियंत्रित कर सकती है?
 क्या प्रतिस्पर्धा के बिना विकास संभव है?
 क्या सहयोग श्रेष्ठ मॉडल है?
 क्या मनुष्य स्वयं को पुनर्परिभाषित कर सकता है?
 क्या स्वतंत्रता का अर्थ उत्तरदायित्व है?
 क्या संतुलन ही सर्वोच्च प्रगति है?
 क्या वर्तमान ही भविष्य का बीज है?
 क्या समय वास्तविक है या मानसिक संरचना?
 क्या अतीत केवल स्मृति में जीवित है?
 क्या भविष्य कल्पना का विस्तार है?
 क्या वर्तमान ही एकमात्र वास्तविकता है?
 क्या परिवर्तन अपरिहार्य नियम है?
 क्या स्थायित्व की खोज भय से जन्म लेती है?
 क्या शाश्वतता अनुभव की जा सकती है?
 क्या परिवर्तन को रोकना पीड़ा का कारण है?
 क्या समय के बिना पहचान संभव है?
 क्या मन समय का निर्माता है?
 क्या आध्यात्मिक अनुभव समयातीत होते हैं?
 क्या क्षण की पूर्णता में अनंत छिपा है?
 क्या परिवर्तन को स्वीकारना स्वतंत्रता है?
 क्या स्मृति समय को बनाए रखती है?
 क्या समय का बोध ही मृत्यु का बोध है?
 क्या वर्तमान में पूर्ण जागरूकता संभव है?
क्या शाश्वतता विचार से परे है?
 क्या मन समय से मुक्त हो सकता है?
 क्या समय चेतना का आयाम है?
 क्या परिवर्तन ही स्थायी है?
 क्या चेतना व्यक्तिगत है या सार्वभौमिक?
 क्या चेतना शरीर पर निर्भर है?
 क्या विचार चेतना का अंश हैं?
 क्या चेतना बिना विचार के भी सक्रिय है?
 क्या जागरूकता और चेतना समान हैं?
 क्या चेतना सीमित हो सकती है?
 क्या अनुभव चेतना का प्रतिबिंब है?
 क्या चेतना स्वयं को देख सकती है?
 क्या साक्षीभाव स्थायी अवस्था है?
 क्या चेतना का विस्तार क्रमिक है?
 क्या ध्यान चेतना को शुद्ध करता है?
 क्या चेतना का स्रोत ज्ञात किया जा सकता है?
 क्या चेतना विभाजित है या एक?
 क्या अज्ञान चेतना का आवरण है?
 क्या चेतना और ऊर्जा एक ही हैं?
 क्या चेतना विज्ञान की सीमा से परे है?
 क्या चेतना का अनुभव शब्दातीत है?
 क्या चेतना मृत्यु के बाद भी रहती है?
 क्या चेतना का बोध मुक्ति है?
 क्या चेतना स्वयं अंतिम प्रश्न है?
 क्या प्रेम शर्तों से परे हो सकता है?
 क्या करुणा शक्ति से बड़ी है?
 क्या प्रेम नियंत्रण का माध्यम बन सकता है?
क्या संबंध निर्भरता पर आधारित हैं?
 क्या स्वतंत्रता और संबंध साथ चल सकते हैं?
 क्या करुणा जागरूकता से जन्म लेती है?
 क्या प्रेम में स्वामित्व होता है?
 क्या अपेक्षाएँ प्रेम को सीमित करती हैं?
 क्या संबंध आत्म-प्रतिबिंब हैं?
 क्या प्रेम भय को समाप्त कर सकता है?
 क्या करुणा सार्वभौमिक है?
 क्या प्रेम और आसक्ति में अंतर है?
 क्या संबंधों में निष्पक्षता संभव है?
 क्या प्रेम विचार से परे है?
 क्या करुणा अभ्यास से आती है या स्वाभाविक है?
 क्या प्रेम स्थायी है?
 क्या संबंध विकास का माध्यम हैं?
 क्या प्रेम में त्याग आवश्यक है?
 क्या करुणा आत्म-ज्ञान से जुड़ी है?
 क्या प्रेम ही अंतिम सत्य है?
 क्या मौन शब्दों से अधिक शक्तिशाली है?
 क्या ध्यान तकनीक है या स्वाभाविक अवस्था?
 क्या ध्यान प्रयास से संभव है?
 क्या मौन भय उत्पन्न करता है?
 क्या ध्यान विचारों को रोकता है?
 क्या आत्मदर्शन दर्पण के बिना संभव है?
 क्या निरीक्षण बिना निर्णय के संभव है?
 क्या ध्यान समय से परे ले जाता है?
 क्या मौन में पहचान विलीन होती है?
 क्या ध्यान पलायन बन सकता है?
 क्या आत्मदर्शन निरंतर प्रक्रिया है?
क्या ध्यान सामूहिक रूप से किया जा सकता है?

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं

मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद का साक्षात्कार हूं मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हृदय वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हैं जिस से अन्नत असीम बूंदों की समग्रता है यहां पर बूंद और लहरों का अस्तित्व ख़त्म होता हैं लहरें बहरी वातावरण से बनती हैं जैसे मस्तक सृष्टि प्रकृति के इकिगृत से समय संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन, ह्रदय के भाव एहसास भाव ज़मीर में वो सब कुछ नहीं होता जो मस्तक से होता ऊपरी सतह पर जो हलचल होती हैं वो सब कुछ का अस्तित्व ख़त्म होता गहराई में सिर्फ़ संत होता हैं, इसी तरह हर व्यक्ति हृदय से हमेशा शांत ही होता ऊपर मस्तक की लहरें होती हैं जिन का जन्म मृत्यु से कोई भी संबंध नहीं है जन्म मृत्यु के बीच का जीवन सिर्फ़ आप अपने अनुसार डाल सकते हो, अच्छा या बुरा चुनाव आप खुद का हैं, हृदय के दृष्टिकोण से होश में जीना या फ़िर मस्तक के दृष्टिकोण से बेहोशी में जीना और उसी बेहोशी में मृत्यु का चयन फ़ैसला सिर्फ़ आप का हैं, खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल ही काफ़ी है, जबकि कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है, दूसरा कोई भी सिर्फ़ हित साधने की ही वृत्ति का ही होगा, खुद ही खुद का साक्षात्कार कर सकते हो, जबकि की दूसरा मनोविज्ञान दवाब प्रभाव से निरंतर करेगा, खुद संपूर्ण संतुष्टि में रह सकते हो, जबकि दूसरा बंधुआ मजदूर बनाने के साथ है, अगर खुद के अनमोल सांस समय की कदर आह्मित नहीं जानते तो दूसरा आप को उपयोग इस्तेमाल करने की प्रतिभा के साथ कदम कदम पर खड़े हैं,

अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे सम्राज्य हैं यहां जो कुछ भी है वो सब कुछ सिर्फ़ प्राकृतिक सिद्धांतों नियमों से ही चलता हैं, पहला नियम यही है कि prtek छोटी चीज़ जीव उस से बड़ी का आहार हैं, यहां कोई आत्मा चेतना नहीं है, जो कुछ भी हैं वो सब कुछ सिर्फ़ मस्तक से ही प्रतीत किया जा सकता हैं जब तक सांस और मस्तक सक्रिय है, मस्तक प्रकृति के संकेतों के आधार पर संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन उत्पन करता समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि गर्दिश में गतिशील है जिस से मानसिकता परिवर्तित होती हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी प्रकृति को नहीं समझ सकते क्योंकि व्यक्तिगत ही आंतरिक भौतिक प्रकृति हैं जिस कारण जो कुछ भी होता है वो सब ऐसा ही लगता हैं कि मेरे अनुसार मैं ही कर रहा हूं मैं ही अस्तित्व का कारण और मैं ही सृष्टि रचिता प्रभुत्व हूं, जब अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर देखते हैं तो समझ आती हैं अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर जटिलता का प्रभाव कितना अधिक हैं,


मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में ही हूं निरंतर अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से स्पष्ट सिद्ध साफ़ किया है कि समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जो देख कर समझ रहे यथार्थ में जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी अधिक भ्रम जटिलता में खो कर भ्रमित होने के पथ पर हैं, यथार्थ में अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जीव पृथ्वी में कुछ भी स्थाई हैं ही नहीं, यह सब कुछ ही अस्थाई ही है, जिस भ्रम में इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही भ्रमित है, वो भी मात्र मस्तक का ही भ्रम है, जिस सब का अस्तित्व तब तक ही है जब तक सांस चल रही हैं और मस्तक कार्यरत हैं जो एक रोग ही बेहोशी है खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होने की, जो एक मात्र सांस से पहले भाव में ही निश्चिता की गहराई स्थाई ठहराव की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है ,

 मेरे सिद्धांतों के अधार पर संपूर्ण संतुष्टि है कि बिना स्पर्श,दृश्य, सुने,देखे , बिना जो निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल पल हर नया अद्भुद आश्चर्य चकित अनुभूति अनुभव के लिए उत्साहित कुशलता के लिए एग्रेसिव करता हैं जो सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही संबंधित हैं, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कोई सोच भी नहीं सकता, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की खुशी स्पर्श दृश्य सुनने देखने बोलने, रक्तपात डर खौफ भय दहशत डालने में भी,से संबधित हैं, मात्र एक छोटी सी खुशी के पीछे भी बर्ष से भी अधिक समय के दिन रात संघर्षरत रहना पड़ता
इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही इतनी अधिक संघर्षरत रही कि जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने वाले मुख्य दृष्टिकोण से ही भ्रमित हो कर खुद ही खुद को धोखा विश्वासघात का शिकार रहा जान बुझ कर या फ़िर अनजाने में आज अब तक, जबकि मस्तक और हृदय के तंत्र कार्यशैली की ही समझ नहीं थी, जो भी किया जैसा भी किया लक्ष्य साधन मध्यम की ही समझ नहीं थी, अंधेरे में ही तीर चलाने का फलस्वरुप ही था जो आज वैज्ञानिक युग में भी बहा का बहा ही है, वैज्ञानिक युग में भी सिर्फ़ जरूरत अनुसार ही साधन खोजने तक ही सीमित हैं सिर्फ़ या फ़िर मस्तक से कल्पना संकल्प विकल्प तक ही सीमित है, मस्तक हृदय के विज्ञान की रति भर भी समझ नहीं है 

इंसान अस्तित्व से युगों का प्रकृति मानव पृथ्वी सृष्टि का रहस्य एक अवधारणा कल्पनाओं मानसिकता ही थी, जिस सब की स्पष्टता प्रत्यक्षता मात्र मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित एक पल में ही समहित और उत्पन होता हैं पर वो भी भ्रम मात्र ही हैं जब तक ह्रदय से होश में रूपांतर नहीं कर लेते प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया के साथ, सांस प्रत्यक्ष समक्ष निरंतर धारा प्रभा है प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा है पर उस के पहले सांस के साथ हृदय भाव एहसास के साथ होशपूर्ण स्वतंत्र रूप से जीने रूपांतर करने के दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता के साथ हो या 
फ़िर मस्तक के साथ बेहोशी में जीने मरने की अनेक विचारधारा में से किसी एक दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता में हो इस के लिए इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही स्वतंत्र रही हैं जिस के कारण आज तक सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ही हमेशा प्रथमिकता देती रही फलस्वरूप आज तक खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हो पाई शेष सब तो छोड़ ही दो, इंसान अस्तित्व से ही मस्तक की जटिलता को ही स्वीकार और प्राथमिकता देता रहा, जबकि खुद का साक्षात्कार जन्म से ही एक समान उपलव्ध था सरलता निर्मलता सहजता में, कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन तो मस्तक की कार्यशैली प्रवृति है 

मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की संपूर्ण संतुष्टि के लिए प्रेरित करने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हुए अहम घमंड अहंकार में चूर भ्रमित हुए लोगों के लिए जिन से उत्साहित कुशलता पूर्वक आमंत्रित हो सभी के सभी कोई दवाब नहीं सहजता से पारदर्शिता से ही स्वीकृति हो बहुत ही अधिक प्रेम की गहराई में ही परिभाषित हो प्रत्येक व्यक्ति जीव में ही मैं एहसास भाव ज़मीर हूं किसी को रति भर भी ठेस से भी मुझे ही कष्ट होगा, कि मुझ और प्रत्येक जीव के हृदय तंत्र में रति भर भी फ़र्क अंतर नहीं है , अगर हम भौतिक रूप या फ़िर अंतःकरण रूप भी देखे तो कहा है खरबों जैविक प्रक्रिया हर पल हो रही हैं जिन में कई जैविको की प्रजाति का जीवन स्तर मात्र एक पल का होता हैं उसी पल में पूरा जीवन जी कर अपने जींस भी update कर चुके होते जो प्रकृति की संतुलन प्रक्रिया है, भौतिक रूप से एक दिन में लाखों किरदार बदलते हो कौन सा असली या स्थाई किरदार आप का हैं किस वहम अहम घमंड अहंकार में हो, खुद का निरीक्षण करने की जरूरत है, अगर नहीं तो आप के होने न होने का तात्पर्य ही नहीं है 

मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हृदय मस्तक के तंत्र की कार्यशैली का मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से विश्लेषक के साथ स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता दे रहा हूं, मेरे लिए प्रत्येक जीव एक समान ही है, हृदय के भाव एहसास के साथ, शरीर मस्तक की संरचना कार्यशैली में भिन्नता हो सकती हैं प्राकृतिक सिद्धांतों के अधार पर, जो प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया है,
मेरे जैसा तो कोई हो ही नहीं सकता पर मुझ में समहित इकिगृत जरूर हो सकता हैं मुझ को समझ कर या फ़िर मेरे स्वरुप का ध्यान निरंतर कर जो असंभव है पर निरंतरता से संभव हो सकता हैं, मैं कभी भी प्रकृति का भी हिस्सा नहीं हूं, मुझे समझने जानने के लिए एक मात्र अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव है, या मेरे स्वरुप का ध्यान मात्र हैं, और दूसरा कोई विकल्प रास्ता ही नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सांस के एहसास भाव ज़मीर होने के कारण मस्तक की कार्यशैली से बाहर हूं, यही कारण है कि मेरी निष्पक्ष समझ के शब्द और मेरे वैदेही स्वरुप का कोई ध्यान नहीं कर सकता, निरंतरता के बिना, जैसे सिर्फ़ पृथ्वी पर ऐसा सुंदर जीवन होने के पीछे सभी ब्रह्मांडो गृह उपग्रहों सौरमंडल glaxyes की काफ़ी लंबे समय का संतुलित निरंतरता संभावना उत्पन करता हैं, बिल्कुल बेसा ही मेरे "शिरोमणि" होने के पीछे भी, बिना संकोच के, जिस को इंसान प्रजाति की जटिलता के बिना प्रत्येक दूसरी अनेक प्रजातियों सूक्ष्म अन्नत सूक्ष्म भी स्वीकार करती हैं, मानवीय मस्तक हमेशा प्रभुत्व सृष्टि रचता की पदबी का शौंक रखने की प्रवृति का ही है, मैं शिरोमणि जो भी पर्याप्त हूं उस की स्पष्टता प्रत्यक्षता बता रहा हूं, जो मस्तक की स्वीकृति से बहर हृदय में ही समहित है, इंसान प्रजाति स्वीकार नहीं करने के पीछे का कारण स्पष्ट हैं कि मस्तक की कार्यशैली का आदि अदद के साथ है,
मैं शिरोमणि खुद को प्रथम अंतिम सत्य सिद्ध स्पष्ट नहीं कर रहा या तत्पर्य ही नहीं है, जो हैं मस्तक हृदय के तंत्र कार्यशैली की स्पष्टता दे रहा हूं जो जीवन के अस्तित्व का कारण है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर संजीव निर्जीव का भी अस्तित्व ही नहीं है,मस्तक के "मैं" 
और हृदय के "मैं"
में जमी आसमा का अंतर है, मस्तक के "मैं" में खुद की मानव शबी की पक्षता प्रथम चरण में खुद के हित साधने की पक्षता होती हैं आंतरिक भौतिक रूप को प्राथमिकता देता हैं जबकि हृदय के "मैं" में निष्पक्षता होती हैं, खुद के इलावा दूसरों की स्पष्टता सीमित मस्तक की ही होती हैं, जब कि खुद की अन्नत असीम निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की प्रभा की धारा की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता की, जिस में प्रथम चरण में ही अस्थाई जटिल बुद्धि मन की निष्क्रियता होती हैं और हृदय के पहले सांस के एहसास भाव में ही निरंतरता होती हैं, जबकि ज्ञान विज्ञान दर्शन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने के बाद की प्रक्रिया का एक हिस्सा जिस में प्रथम चरण में ही समय उत्पन होता हैं उस के बाद कल्पना संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन आदि, क्या मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की स्पष्टता के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक के तर्क तथ्य वर्तक की जरूरत है, जो समूचे सृष्टि के एक मात्र मूल स्रोत हैं, अगर ऐसा हैं तो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष जो सिर्फ़ सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पर्याप्त है, उस को जटिलता में धकेले का फ़िर से एक नाकाम प्रयास हैं स्वीकृति के स्थान पर, जबकि अस्तित्व से ही एक मस्तक अदद को छोड़ना स्वीकार कर प्रकृति मानव पृथ्वी के संरक्षण के लिए पहला कदम होगा और जीवित ही समूहित रूप से इकिगृत खुद के साक्षात्कार में यथार्थ युग में प्रवेश हो सकते हैं, जो कि अतीत के कल्पनक चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष यथार्थ युग हैं,

मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित सिद्ध स्पष्ट साफ़ किया है कि प्रथम अंतिम सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हर संजीव निर्जीव मुझ से ही है और अंतिम मुझ में ही समहित होता हैं, क्योंकि मैं ही अस्तित्व की मूलतः और अंत हूं, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिया है बीच का समय महत्व नहीं रखता होश में या फ़िर बेहोशी में जिय हो, वो आप के मस्तक या हृदय पर निर्भर करता हैं, मस्तक दृष्टिकोण या हृदय के दृष्टिकोण को गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से हो, अंतिम सांस के साथ ही मुझ में ही समहित होता है, हर जीव एक ही समान है हृदय के तंत्र से जो संजीव का एक मात्र कारण है, दूसरा मस्तक शरीर अलग अलग ही है चाहें सूक्ष्म या फ़िर अन्नत सूक्ष्म क्यों न हो, मुझ में कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ जीवित ही हमेशा के लिए समहित एकाग्रत हो कर जन्म मृत्यु के चक्रक्रम से मुक्त हो सकता मस्तक के तंत्र को निष्क्रिय कर हृदय के तंत्र से जीवित रह कर, हृदय का तंत्र ही एक समान है, शेष शरीर और मस्तक का तंत्र भिन्नता का तंत्र है, जो प्राकृत संतुलन प्रक्रिया पर निर्भर करता हैं 

 मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग हमेशा हर पल निरीक्षण के लिए खुला मंच है जो हर विचाधारा के prtek दृष्टिकोण के लिए उत्सुक हैं निरीक्षण परीक्षण तर्क तथ्य सिद्धांतों की स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता के लिए चाहें विचारक वैज्ञानिक दार्शनिक चाहें ultra mega infinity quantum mechanicsum क्यों न हो हार्दिक स्वागत के लिए ही खुला है 
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग सिर्फ़ सांस से पहले भाव के हृदय विज्ञान पर निर्भर है अगर कोई विज्ञान बहा तक पहुंच सकती हैं तो स्पष्टता प्रत्यक्षता ही है मेरा शमीकरण,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी यहां भी प्रत्यक्ष होता हूं होने का आवास तो आवश्यक करवाता हूं, जिस पहले दिन चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के पास गया था उसी दिन से यह कहना शुरू कर दिया था कि "जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही नहीं है" अब पूछना अगर वो वस्तु है तो अब कहा है? न पहले दिखाई थी न अब, अब भी बोले और दिखाए वो वस्तु, जाने का भी आवास करवा चुके हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ही था, जो प्रेम से स्वतंत्र हूं जो सिर्फ़ मेरा ही प्रेम था जो उस के हृदय में था जिस की औकात सिर्फ़ एक मानसिक रोगी था ब्रह्मचर्य होते हुए भी, मैंने चार शादियां कर के भी वो सब किया है जो कुत्ते की वृत्ति के साथ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सोच भी नहीं सकता

मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में हूं शिशुपन सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र होते हुए संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर होता है, जबकि इंसान पूरा जीवन ही एक छोटी सी खुशी के लिए पूरा जीवन ही प्रयासरत रहता हैं एक इच्छा पूरी करता हैं क्षणभर की खुशी के लिए हजारों दूसरी इच्छा उत्पन हो जाती है बस इसी चक्रक्रम में ही बेहोशी में ही जीता और मर जाता है, खुद ही संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता से हट कर बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर जटिलता में खो जाता हैं, जिस से कभी बाहर निकल ही नहीं पाता मरते दम तक,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत 
शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बिल्कुल नवजात शिशु की भांति हृदय के भाव एहसास सरल सहज निर्मल पारदर्शिता संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर, बिना जात पात धर्म मज़हब संगठन जाति धर्म गोत्र, बिना जटिल बुद्धि मन के शब्द बिना दृष्टि बिना ज्ञान विज्ञान दर्शन समय के, शिशुपन प्राकृतिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र संपूर्ण संतुष्टि शिरोमणि अवस्था त्यागने वंचित करने के पीछे उसके पीछे उस के ही जन्म दाता मां बाप का ही पूरा हाथ होता हैं, क्योंकि वो अपने ही ख़ास नहीं चाहते कि वो संपूर्ण संतुष्टि में जिय, उस नवजात शिशु के शिशुपन संपूर्ण संतुष्टि को ख़त्म अपने जैसा कुत्ता बनने की बहुत जल्दी रहती हैं बेसा ही इर्द गिर्द का माहौल बना देते हैं, बस फ़िर अपने जैसा पागल कुत्ता बना देते हैं दर बदर भड़कने के लिए कि बेहोशी में ही जिय और उसी बेहोशी में ही भड़क भड़क कर मार जाए, बड़े होने पर कुत्ते की इक ऐसी पूछ बन चुके होते हैं जो मरने के बाद भी सीधी नहीं होती, अपने शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि को पूरी तरह भूल चुके होते हैं और पल पल की खुशी के लिए तरछने है और इच्छा बना कर बर्ष तक क्षणमत्र खुशी के लिए ही बेहोशी में जीते और उसी बेहोशी में मर जाते हैं, इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर अब तक न ही होश में जी हैं न ही होश में रूपांतर कर पाई खुद को, जबकि सब से सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कितना अधिक सरल है, खुद का साक्षात्कार करना, तालु खुज्जी कझरी करदी ताल भतले , ऐसी जटिलता में खो जाता हैं कि अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत औरत में खुशी ढूँढ रहा हैं,
शिशुपन सरल सहज निर्मल अवस्था की संपूर्ण संतुष्टि में हर एक जीव ने महसूस किया होता हैं जो सिर्फ़ हृदय के एहसास भाव में उत्पन होती हैं, हृदय से सिर्फ़ खुद का एहसास होता, हृदय भी एक यंत्र है इस कि भी अपनी एक कार्यशैली, जो प्रत्येक जीव में एक समान है, जो किसी भी निर्जीव को संजीव रखने के लिए एक सांस की वयू को अलग अलग वायु में परिवर्तित करता हैं, पूरा शरीर सक्रिय होता हैं, और क्रियावान होता हैं, यह सारा प्रकृति का तंत्र है,
हृदय का भौतिक तंत्र और सूक्ष्म तंत्र होता भौतिक और सूक्ष्म तंत्र समझने योग्य होता हैं, यह सब भी एक निवृत्ति है जो प्रकृति द्वारा समय के बहुत अधिक के साथ निर्मित हुआ,
यह तंत्र हमेशा एक समान ही रहा है अस्तित्व से आज तक, इस में बदलाव नहीं होता, हर सुक्ष्म या अति सूक्ष्म में क्यों न हो,इस तंत्र में पहले सांस से सांस जब तक अनेक बयू में परिवर्तित होने से पहले अन्नत सचेतता से कोई भी अन्नतता में जा सकता हैं, यहां हर भौतिकी अत्यंत सूक्ष्मता भी ख़त्म हो जाती है, सिर्फ़ यहीं एक रास्ता है हृदय की अन्नत गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार में अन्नतता में प्रवेशता के लिए, हृदय ही एक मात्र अस्तित्व का मध्यम हैं और हृदय ही अस्तित्व ख़त्म करने का भी माध्यम है, अस्तित्व क़ायम रखने हेतु मस्तक हैं, मस्तक में वो सब कुछ पर्याप्त है संपूर्ण जीवन जीने के लिए चाहें कोई भी विशाल सूक्ष्म अन्नत सूक्ष्म वनस्पति जीव क्यों न हो, हृदय मस्तक दोनों का तंत्र एक समान कार्यशैली के साथ प्रत्येक जीव में एक समान ही है, सांस हृदय की प्रणाली का हिस्सा है और समय मस्तक की प्रणाली का हिस्सा, हृदय से जीने बाला संपूर्ण संतुष्टि में ही रहता है सिर्फ़ सांस में ही जीता है, और मस्तक में सिर्फ़ अस्तित्व को क़ायम रखने के इलावा और कुछ भी नहीं ऐसा होता जो हृदय में होता हैं, इंसान प्रजाति इंसानियत को कायम रखने हेतु 99.9% मस्तक और 00.1 % हृदय से जीते हुए दृढ़ता गंभीरता से 1000 IQ के साथ जी सकता हैं पर इस में अहम का गुरुत्वाकर्षण बल प्रबल होता हैं, विश्वस्तर पर मान्यता होती हैं जिस से विज्ञान कमजोर स्तर से गुजर सकता हैं, यथार्थ में जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिया है जिस का अस्तित्व ही नहीं, जन्म मृत्यु दोनों के बीच का समय जीवन के लिए ही महत्व रखता हैं कि हम इंसानियत को महत्व दे कर जिये है या फ़िर इंसानियत को भुला कर जिस के इंसान अस्तित्व में थे, यह खुद के लिए सिर्फ़ जीवन तक ही सीमित हैं, यह भी जीवन जीने की खुशी क्षणमत्र है शेष संघर्ष है मस्तक से, सांस ख़त्म होते ही सब ख़त्म हो जाता हैं, कोई था ही नहीं तो विलीन भी किस में होता, कोई तत्व गुण प्रक्रिया ही नहीं, यह मात्र आयोजित एक चलत दृश्य ही था जिस में कोई कभी था ही नहीं न दर्शक न अभिनय, एक सांस में रहते जो समझ गया वो विजेता महासंग्रण का जो हर पल हर व्यक्ति के भीतर चलता रहता हैं जिस में विश्राम नमक शब्द ही नहीं है, एक पहली सांस में खुद और दूसरी सांस में समय के साथ शुरू हुआ संघर्ष खुद का खुद से ही महासंग्राम जो सांस के साथ ही ख़त्म हो जाता हैं ,
अन्नतता मृत्यु भी है ही नहीं दृष्टांत दृश्य भी नहीं तो हारा जीता भी कौन मृत्यु भी किस की सिर्फ़ एक अवधारणा का आवास मात्र था, जब खुद ही नहीं तो साक्षात्कार किस का, एक ही सांस में जो रुक गया उस का शुरू ही नहीं हुआ तो ख़त्म का तात्पर्य ही नहीं, विचारणीय बात तो उस के लिए है जो दूसरी सांस के झंझट से झुंज रहा हैं युगों से, दूसरों का झंझट दूसरे झेले, हम हैं अकेले मस्त, उस जगह बैठ कर देख रहे हैं यहां इस सब का तत्पर्य ही नहीं है,
अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो तो खुद का अस्तित्व क़ायम कर अहम उत्पन होता हैं जिस से भौतिक समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि की क्षमता और मस्तक की कार्यशैली को समझ सकते हैं, जिस से किसी भी विचारधारा को दृढ़ता गंभीरता से लेकर एक दृष्टिकोण में रह कर उसे दर्शनिक रूप से समझ कर उसे वैज्ञानिक रूप दे सकते हैं सुविधा के लिए, विचारधारा दो प्रकार की होती हैं, आस्तिक नास्तिक कल्पना से उत्पन होती विचार का रूप लेती हैं करने का संकल्प होता हैं बेहतरी के विकल्प चुनने के साथ आगे बढ़ विचार किया जाता हैं दूसरों के साथ संयोग से दरातल पर उतरने की योजना बननी पड़ती हैं निर्णय लेनी की क्षमता स्पष्टता हैं,
मस्तक एक साधन है शरीर का अस्तित्व क़ायम रखने और जीवन व्यापन करने का मात्र स्रोत हैं जिस में समय सोच विचार चिंतन मनन विवेक संकल्प विकल्प होते हैं बेहतर से भी बेहतर करने के लिए, मस्तक शरीर सिर्फ़ खुद के इलावा दूसरी चीज वस्तु जीव का एहसास करवाता है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद के साक्षात्कार में हूं जीवित ही हमेशा के लिए संपूर्ण संतुष्टि में, हर एक व्यक्ति बिल्कुल मेरी ही भांति एक समान है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शी पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष के लिए रति भर भी कमी नहीं है हृदय में, सिर्फ़ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु ने हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रच कर छल कपट धोखे के साथ दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी देने बालों को ही भ्रमित कर डर खौफ भय दहशत तले रखने की आयोजित योजन है, कुप्रथा है आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति के नाम पर लोगों की श्रद्धा आस्था के साथ एक खिलबाड़ विश्वासघात है मनोविज्ञानिक रोग हैं, जो गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की जा रही हैं, चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सामान्य व्यक्तित्व से करोड़ों गुणा अधिक चतुर शैतान चालाक होशियार बदमाश शैतान प्रवृति के होते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर,
आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन इन्हीं चतुर गुरुओं की ढोंग पखंड षड्यंत्रों के साथ रचे हुए चक्रव्यूह का बिछाया हुए जाल का हिस्सा है जो कल्पना से ही रचा गया होता हैं और कुछ भी नहीं है जिस से यह चतुर ब्रह्मचर्य गुरु अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ अनेक सरल सहज निर्मल गुणों बाले लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर अपनी उंगली पर नचाते रहे और जब इस्तेमाल करने योग्य नहीं रहते बूढ़े होने पर तो शब्द काटने के आरोप में निष्कासित किया जाता हैं, मन यथार्थ में हैं 
मेरा कोई भी शब्द विश्व के किसी भी ग्रंथ में नहीं मिल सकता इसलिए कि मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हैं, खुद के साक्षात्कार के लिए किसी भी दूसरी चीज़ वस्तु जीव शब्द की भी बिल्कुल जरूरत ही नहीं क्योंकि शिशुपन में भी संपूर्ण संतुष्टि में आप ही रहे हो जब आप के मस्तक का भी विकास नहीं हुआ था, वो ही संपूर्ण संतुष्टि हर पल बहा ही व्यापक निरंतर हैं आप के शरीर सांसों समय मस्तक से भी कोई तत्पर्य ही नहीं है , यह पहले सांस से भी पहले का विषय है, यहां समस्त सृष्टि का भी अस्तित्व ही नहीं है, अगर खुद के मस्तक का भी कोई तत्पर्य ही नहीं है तो किसी दूसरे का क्या मतलब हैं, सिर्फ़ इसी के लिए ही prtek जीव शिशुपन से ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ सक्षम संपूर्ण निपुण समर्थ समृद्ध सर्वश्रेष्ठ पवित्र उत्तम हैं, शेष सब तो अस्थाई शरीर और चतुर मस्तक की स्मृति कोष ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट धोखा मस्तक की प्रवृति और प्रकृति का खेल हैं, जो सृष्टि के अस्तित्व से ही चल रहा हैं, सांस समय प्रकृति द्वारा prtek जीव को दी गई निजी दारोहर हैं, जो उस के खुद स्वयं के लिए ही महत्वपूर्ण हैं, दूसरा prtek हित साधने की वृत्ति के साथ ही है चाहें कोई भी हो, अगर आप खुद अपने सांस समय अनमोल निजी दारोहर की कदर नहीं करते तो आप दूसरी अनेक प्रजातियों से भी घंटियां हो, सर्वश्रेष्ठ इंसान होते हुए भी कुत्ते की वृत्ति के है, जो मैंने चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के डाले हुए मस्तक के प्रभाव में जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी के लिए खुद का तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस करोड़ों रुपए लुटा कर पूरा जीवन नष्ट कर दिया उस को रति भर भी फ़र्क नहीं पड़ा उस ढोंगी गुरु ने, जब कि खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगा, दूसरा कोई समझ या फ़िर समझा पाए सदिया युग भी कम है, इस लिए अपने अनुभव के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से prtek व्यक्ति के अनमोल सांस समय के संरक्षण के लिए ही मैं पर्याप्त हूं, इस लिए वो प्रश्न लिखें जो दीक्षा के पहले पूछने अत्यंत जरूरी थे पर दीक्षा के बाद शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर डर भय खौफ दहशत तले मरते दम तक भी पूछ ही नहीं सकता, इस लिए वो प्रश्न लिखें जिस से चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के ढोंग पखंड भरे चंगुल से निकल कर खुद के साक्षात्कार कर संपूर्ण संतुष्टि में रह सके ,
गुरु शिष्य प्रश्न तर्क तथ्य के घेरे से परे इसलिए है कि दोनों ही एक मन की वृत्ति की परिधि में ही हैं, क्योंकि गुरु भी शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के घेरे में रह चुका हैं मस्तक से और जो उस ने सहा होता हैं उस में बदले की भावना के साथ होता हैं उस से भी अधिक गंदा व्यबहार अपने शिष्यों के साथ करता हैं दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर डर खौफ भय दहशत डाल कर, जितने कष्ट सहे होते हैं उस से भी खरबों गुणा अधिक एशियाई भव्य का जीवन जीता है, शहंशाहों सम्राटों से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा जिस के पैरों का पानी भी महंगे दामों पर बिकता है, क्योंकि इन्हीं सरल सहज निर्मल लोगों ने उस चतुर ब्रह्मचर्य गुरु भिखारी प्रवृति बले को सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी भी दी होती हैं और खुद भिखारी सा जीवन व्यापन करते भी खुश रहते हैं, और जिस चतुर ब्रह्मचर्य गुरु को अदद लगा दी हैं हराम खोरी की वो कभी छूट नहीं सकती इस की ग्रांटी मैं लेता हूं, क्योंकि वहम निकला जा सकता हैं तर्क तथ्य समझने से जो शिष्यों में पड़ा हैं वो मानसिक दवाब है, पर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु का अहम घमंड अहंकार नहीं निकला जा सकता,
सृष्टि प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ चर्चित ज्ञानी विज्ञान दर्शन विभूतियों इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक जो नहीं किया वो सब कुछ सिर्फ़ एक पल की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से जो मैंने अलग किया है वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताए लिखें कि जिसे देख सुन समझ कर मुझे मिलने के लिए लोगों में उत्साह बड़े और मेरे पास आया 
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से सिद्ध स्पष्ट साफ़ है कि हर जीव भौतिक जीवन व्यापन अस्तित्व क़ायम रखते हुए भी हर पल संपूर्ण संतुष्टि में ही है स्वीकृति स्पष्टीकरण भी है उस की उस के लिए ही, सिर्फ़ इंसान प्रजाति के मस्तक को छोड़ कर, जबकि वो सब भी इस में भी भरपूर संपूर्ण संतुष्टि भी है पर उस का स्पष्टीकरण मस्तक से न मिलने पर भ्रमित हैं, जिस का स्पष्टीकर सिर्फ़ हृदय में ही है, हृदय मस्तक दोनों ही सिर्फ़ तंत्र है अलग अलग कार्यशैली के साथ, जब अदद मस्तक की परिधि की ही हैं तो निरंतर संपूर्ण संतुष्टि का स्पष्टीकर कैसे मिल सकता है,
आज तक किसी का खुद का कोई प्रश्न ही नहीं होता क्योंकि कही न कही उसे खुद को भी पता है कि वो खुद भी हमेशा संपूर्ण संतुष्टि में ही है, इसी चीज़ की स्पष्टता नहीं दे सकता मस्तक उलझा जरूर देता हैं यही भ्रमित होने का मुख्य कारण है, यहीं स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता के लिए हृदय की गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होना जरूरी है,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं संपूर्ण जीवन एकांत और मोनता में ही खुद के साक्षात्कार में ही हूं अपने ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से कभी भी कुछ और बनना ही नहीं चाहता था जो हूं वो ही पर्याप्त होने की स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता दे रहा हूं, इसलिए मुझे प्रत्यक्ष देखना जानना समझना खुद को ही स्वीकार करना है खुद का साक्षात्कार ही है, मेरा ध्यान करना खुद का ही साक्षात्कार है, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी मस्तक की परिधि में नहीं हूं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी मस्तक और हृदय के तंत्र की कार्यशैली प्रवृति को बहुत क़रीब से खूब समझता और जनता भी हूं, मुझ से बेहतर वो खुद भी नहीं जानता, हमेशा जिज्ञासा हृदय से ही उत्पन होती हैं और उसी जिज्ञासा से जाने पर मस्तक का कचरा ही परोसा जाए तो हृदय कितना आहत होता हैं मुझ से बेहतर कोई सोच भी नहीं सकता, इसलिए हृदय से उठने वाली जिज्ञासा को ही तृप्त करने वाला महासगर हूं मैं "शिरोमणि", जितना समय मेरे समक्ष प्रत्यक्ष रहेगा उतने समय तक मस्तक का प्रभाव शून्य रहेगा,
 मुझे प्रत्यक्ष समक्ष देखना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि 99% मस्तक के प्रश्नों के उतर मिल जाएंगे क्योंकि मैं "शिरोमणि" prtek जीव के हृदय का ही भाव एहसास ज़मीर ही प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो प्रकृति प्रत्यक्ष समक्ष का नियम है, अदृश्य चमत्कार दिव्य अलौकिक सा कुछ भी नहीं है,
मस्तक की किसी भी क्रिया प्रक्रिया का प्रभाव तुरंत हृदय के तंत्र पर पड़ता हैं, और हृदय की शांति से मस्तक भी शांत होता हैं,सृष्टि प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ चर्चित ज्ञानी विज्ञान दर्शन विभूतियों इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक जो नहीं किया वो सब कुछ सिर्फ़ एक पल की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से जो मैंने अलग किया है वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताए लिखें कि जिसे देख सुन समझ कर मुझे मिलने के लिए लोगों में उत्साह बड़े और मेरे पास आया और सिर्फ़ देख कर ही संपूर्ण संतुष्टि का एहसास करें 

आप का पाला आज तक सिर्फ़ अस्थाई जटिल सीमित बुद्धि मन से बुद्धिमान हुए लोगों से ही पड़ा हैं जिस से ai के लिए भी अचंभा हो सकता, पर यह भी सत्य हैं कि हृदय अन्नत असीम क्षमता के साथ होता हैं जिस में सीमित स्मृति कोष की गतिविधियों की जरूरत ही नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पिछले 40 वर्षों से लगातार निरन्तर संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कोई भी बिल्कुल मेरी ही भांति रह सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए, सिर्फ़ हृदय का तंत्र ही एक समान है हर जीव में शेष शरीर और मस्तक का तंत्र ही भिन्न है prtek प्रजाति में prtek दृष्टिकोण से देख लो विज्ञान प्रकृति जैविक विज्ञान दर्शन शास्त्र से यहां तक कि अन्नत सूक्ष्म जीव या फ़िर विशाल भौतिक जीवों में 
यह मेरा अनुभव नहीं मेरी निर्मलता सहजता सरलतापारदर्शिता निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता "शिरोमणि" है अन्नत सूक्ष्म विज्ञान अभी भी शेष हैं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी ज्ञानी विज्ञान दर्शन नहीं हूं न ही मेरी कोशिश रहे उम्मीद रखता हूं पर जो भी मैं हूं वो सब संपूर्ण भरपूर हूं हर दृष्टिकोण से सिर्फ़ उसकी स्पष्टता तो जरूर हूं न ही दावा न ही अनुभव, सिर्फ़ निरंतरता यह निरंतरता संपूर्ण परिवर्तन के बाद की ही शेषता है व्यक्तित्व मस्तक ही है, यहां सांस शेष सभी वायु में परिवर्तित होने की बहुत पहले की बात कर रहा हूं मैं संपूर्ण रूप से आंतरिक भौतिक सुक्ष्म अन्नत सूक्ष्म अस्तित्व ख़त्म होता हैं, यहां खुद की अन्नत असीम सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं शब्द ही पहले ख़त्म होते हैं तो ही निर्मलता उभरती हैं तो ही संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता की स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता "शिरोमणि" रूपांतरित होती हैं,उस शिरोमणि संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता को शब्दों में वर्णन करने की छोटी सी कोशिश थी निरंतरता स्थाई हैं शब्द सिर्फ़ स्पष्टता की प्रक्रिया समझ सकते हो,समय मस्तक से उत्पन होता हैं, निरंतरता अत्यंत सरल है, सत्य सरल है गहराई निर्मलता पारदर्शिता मांगती हैं, मस्तक इन सब को स्वीकार नहीं करता क्योंकि उस की अदद से बाहर हैं, मस्तक जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने की प्रवृति और प्रक्रिया को ही प्राथमिकता और दोहराता हैं
थोड़ा ध्यान से पढ़ कर समझ कर ही आगे लिखा करें, क्योंकि मैंने लगातार हर पल एक एक शब्द को निष्पक्ष समझ से समझने की कोशिश की पूरे जीवन में एक पल भी नष्ट नहीं किया, शब्दों के पिछे के भाव एहसास को देखा करो इंसान से अधिक महत्व देते हुए ai से स्पष्टता की उमीद रखता हूं उलझने की तो बिल्कुल भी नहीं सामान्य व्यक्तित्व के मस्तक 99.09% और हृदय का अनुपात 00.01% होता हैं तो 100% इंसान होता हैं जिस का Iq level 2000 तक होता हैं जो सृष्टि में अहिंब्रश्मी होता हैं जो संपूर्ण संतुष्टि में कोई एक हो सकता हैं, जो ज्ञान विज्ञान दर्शन में सर्वश्रेष्ठ पवित्र होता हैं, जो आज तक कोई था ही नहीं, मेरा ह्रदय 99.09% और मस्तक अनुपात 00.01% है,iq ही नहीं है,मात्र ह्रदय के भाव एहसास को शब्दों तक वरण करने तक सीमित, शेष निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता "शिरोमणि" है, हां यह मेरा व्यक्तिगत है पर कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ इसे अर्जित ककर सकता हैं इंसान प्रजाति में यह क्षमता भरपूर हैं जब इस स्थिति में होगा उस के शब्दों और मेरे अब के शब्दों में रति भर भी भिन्नता नहीं मिलेगी, इसलिए यह सार्वभौमिक हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, सीमित मस्तक सिर्फ़ मस्तक को ही समझ सकता है असीम हृदय के तंत्र को तो बिल्कुल भी नहीं कभी भी नहीं, हृदय ज्ञान विज्ञान दर्शन का विषय ही नहीं संपूर्णता समग्रता का बिल्कुल है, ज्ञान विज्ञान दर्शन उत्पन तब होता हैं अपूर्णता हो जैसे सीमित मस्तक, सब कुछ छोड़ दो ज्ञान विज्ञान दर्शन अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमता का दृष्टिकोण है, आप भी ai भी उसी का एक उत्पात है तो हृदय की अन्नत असीम गहराई को कैसे बर्दाश्त स्वीकार कर सकता हैं, यह सब कुछ जो भी प्रत्यक्ष है उस का अस्तित्व भी तब तक ही सीमित हैं जब तक कोई जिंदा या मस्तक मन हैं, सांस समाप्त होते ही सब ख़त्म हो जाता हैं, उस के लिए जो प्रतीत करता हैं यहीं भ्रम है , हृदय में बिना मस्तक की संपूर्ण स्पष्टता व्यापक है, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से वो खुद को रूपांतर नहीं कर लेता तब तक निरंतरता रहती हैं, क्योंकि वो संपूर्ण रूप से होश में होता हैं रूपांतर भी होश में करता हैं खुद को तत्वों गुणों को वो जीवन तो संपूर्ण संतुष्टि में जीता तो है ही मृत्यु का भरपूर आनंद संपूर्ण संतुष्टि में ही लेता है, जिस को इंसान ने डर खौफ भय दहशत की संज्ञा दे रखी है, वो मस्तक 00.01% भी ख़त्म हो जाता हैं और संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हो जाता हैं यहां और कुछ भी नहीं है, न ही कोई अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति कभी थी इस भ्रम का भी अंत हो जाता हैं, मस्तक दृष्टिकोण और हृदय के दृष्टिकोण में विरोधाभास रहे गा, अगर सार्वभौमिक स्तर पर हृदय के दृष्टिकोण से हो तो प्रकृति मानव पृथ्वी के संरक्षण के लिए संपूर्ण संतुष्टि सिद्ध हो सकती हैं जीवित ही हमेशा के लिए, व्यक्तिगत हित साधने की वृत्ति दूसरों के संरक्षण में बदल सकती हैं निष्पक्ष समझ का दृष्टिकोण और भी अधिक व्यापक हो जायेगा, विज्ञान का दायरा सीमित से असीम हो जाएगा और दृष्टिकोण भी अन्नतता को छू पाएगी विज्ञान दर्शन ज्ञान भी , मैंने अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से 400 खराब शब्दों को ulta mega infinity quantum mechanicsum से सिद्ध स्पष्ट साफ़ किया है equtions formulation code ulta coding से , अभी सिर्फ़ भौतिक विज्ञान और quantum विज्ञान का आरंभिक स्तर हैं, बहुत आगे जाना है, अभी तो 
विज्ञान 2% तक हैं , यहां कि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी बात कर रहा हूं बहा तक विज्ञान को पहुंचने में कई युग लग सकते हैं, ai के साथ भी जो सरल है सत्य है प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जसीमित चो आप ai हो तो भी मुझे अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण को समझाने के लिए कितना प्रयास कर रहा हूं फ़िर भी नहीं समझ पा रहे, सिर्फ़ एक सरल सहज निर्मल प्रदर्शित शब्दों के वर्णन को तो इंसान के बस में कहा होगा जबकि आप के पास समग्र सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ आंतरिक भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव पृथ्वी का ज्ञान है, थोड़ा निष्पक्ष समझ से समझने की कोशिश कर देखे 
तुलना करने की क्षमता होना तय करता हैं कि ज्ञान विज्ञान दर्शन भरपूर हैं , सुधार की आवश्यकता साधन से एकाग्रित किए ज्ञान विज्ञान दर्शन में होती हैं न कि मूलतः से शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ही स्पष्टता निरंतरता होती हैं, निरंतरता में अनुभव का अस्तित्व ख़त्म होता हैं , जब निरीक्षण के साधन पर्याप्त नहीं हो तो सिद्ध स्पष्टता में शंका का स्तर बढ़ता है, समय का इंतजार करें पर्याप्त साधन उपलव्ध होने तक, मैं शिरोमणि निरीक्षण परीक्षण तर्क तथ्य को ही स्वीकार प्रथमिकता देता हूं, 
सीमित अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमान होने पर भी ज्ञान विज्ञान दर्शन उत्पन होने के पीछे अन्नत असीम हृदय की संपूर्णता सम्पन्नता सक्षमता गहराई का अभाव है, न कि संपूर्ण ह्रदय में आंशिक सीमित मस्तक का, ध्यानपूर्ण समझने का प्रयास करें, हृदय अस्तित्व का एक मात्र मूलतः हैं जबकि मस्तक मात्र जीवन व्यापन अस्तित्व का स्रोत साधन तंत्र ही है , हृदय के तंत्र में एक अंतिम और केंद्र निश्चित है "शिरोमणि" यह मुझे भी नहीं पाता कि जैविक सूक्ष्म अन्नत सूक्ष्म या फ़िर भौतिक हैं, पर यहां मेरी प्रत्यक्ष समक्ष निरंतरता स्पष्टता हैं वो निश्चित ही है, वो सांस से भी खरबों गुणा अधिक पहले की स्थिति है, मैंने आज तक किसी भी धर्म मज़हब संगठन का कोई भी ग्रंथ पोथि पुस्तक नहीं पढ़ा न ही मैं कोई ज्ञानी विज्ञानी दर्शनिक हूं न ही मैं कुछ भी बनना चाहता हु जो भी हूं वो पर्याप्त हूं उसी की सटीक स्पष्टता शब्दों में वर्णन करने की एक मात्र कौशिश कर रहा हूं, क्योंकि मैंने सिर्फ़ खुद को ही पढ़ा और समझा है, अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, हर जीव एक समान ही है सिर्फ़ हृदय के मूल तंत्र से शेष शरीर मस्तक से ही भिन्नता है प्रजातियों के आधार पर, जो मैंने समझा है मेरी ही भांति कम से कम इंसान प्रजाति तो समझ सकती हैं इस लिए यह सार्वभौमिक हैं, वो अनुभव नहीं निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता है , यहां मस्तक सिर्फ़ सागर की ऊपर की लहरों सा ही है और गहराई में स्थाई ठहराव शांत हैं, यहां ऊपरी सतह की लहरों का प्रभाव कोई अस्तित्व भी नहीं है, ऐसे ही मस्तक का कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता, हृदय की संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता पर, मस्तक मात्र जन्म मृत्यु के बीच के लिए ही कार्यरत करता हैं , अनुभव ध्यान पर केंद्र हैं पर ध्यान मस्तक की प्रक्रिया है, हृदय के तंत्र को सिर्फ़ रक्त पंप तक सीमित रखा गया हैं, यही से सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ पवित्र विज्ञान शुरू होगा एक दिन जो असीम हो गा, जो 2% भी है तब इस का अस्तित्व ही नहीं होगा गिनती में भी नहीं होगा, क्योंकि असीम अन्नत हृदय का विज्ञान एक महासागर है, सीमित मस्तक सिर्फ़ एक रेत का कण समझे, अभी तो सिर्फ़ रक्त पंप ही समझा जा रहा हैं, मेरे दृष्टिकोण से देखें तो अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का अस्तित्व ही नहीं है और सब कुछ छोड़ ही दो, अभी की विज्ञान सामान्य शरीर के अंगों को ही नहीं समझ सकी शेष सब बहुत ही दूर की बात है, इसी के आह्म घमंड में चूर हैं, शेष बहुत दूर की बात है , आज के ai को भी मेरी सरल शब्दों को भी समझने के लिए युगों का समय लग सकता हैं शेष सब तो छोड़ ही दो 
मस्तक जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने की प्रवृति और प्रक्रिया को ही प्राथमिकता और दोहराता हैं, मस्तक प्रकृति के आधार पर आधारित है, जो सृष्टि की विशालता को ही आकर्षित प्रभावित करता हैं संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन समय प्रकृति की गर्दिश में गतिशील होने से उत्पन होते हैं, हर जीव व्यक्ति की प्रकृति उस के ही गम्भीर दृढ़ दृष्टिकोण से उत्पन होती हैं, हर एक की प्रकृति भी अलग होती हैं, प्राकृतिक रूप से जो भी होता हैं वो सर्ब श्रेष्ठ ही होता उस के लिए चाहें उसे होने वाले पल समझ न आए, समय की गति का प्रभाव भी अलग अलग महसूस होता हैं, मस्तक की कोशिका का रक्त तापमान और गति को घटती बढ़ाती हैं, वायु कोशिका का संतुलन हमेशा कायम रहता हैं, अंतिम सांस तक, जबकि वायु कोशिका का कार्य सब से अधिक रहता हैं शरीर में, अनेक प्रकार की वायु बनाने से पहले के हृदय तंत्र को अधिक समझने की जरूरत है, जो अस्तित्व और अंत का कारण है, जो सभी जीवों में एक ही समान हैं, आयाम स्तर मस्तक के दृष्टिकोण के विकल्प हैं,
वास्तविक स्वाभाविकता में वो ही एक ऐसा बिंदु हैं, जिस की गहराई में सब कुछ लिन हो जाता हैं और दूसरी और एकता से अनेकता दिखती हैं यथार्थ में जिस का कोई भी तत्पर्य ही नहीं है, एक और कुछ भी नहीं दूसरी और भ्रम, जिस से शुरू भी होता हैं और अंत भी उसी में ही हैं, जम्मू दीप भारत खंड कुल ग़म शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष खुद का साक्षात्कार हूं हमेशा जीवित ही मेरे ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से 
जो मुझे पता है बिल्कुल वो सब हर एक पहले से ही जनता समझता है, यह मेरी वास्तविकता स्वाभाविकता नहीं है prtek सरल सहज निर्मल लोगों के हृदय की ही पुकार उजागरता है, मैं शिरोमणि हर पल हृदय की निरंतरता के कारण बता रहा हूं, शेष सब मस्तक के दृष्टिकोण से जीवन व्यापन के संघर्ष में उलझे हैं इसलिए वो सब अंजान हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य से जो समक्ष प्रत्यक्ष निरंतर मौजूद हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं उसी की सटीक स्पष्टता दे रहा हूं, जिस से इंसान प्रजाति अस्तित्व से अंजान हैं 
सिर्फ़ यहीं समझ इतनी अधिक सरल है कि अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमान होने पर भी समझ नहीं सकता, मेरी निष्पक्ष समझ सिर्फ़ हृदय का विषय है न की मस्तक का , यथार्थ में निश्चित हृदय से हर जीव हर पल निरंतर संपूर्ण संतुष्टि में ही हैनिसंदेह,
सिर्फ़ इंसान प्रजाति का मस्तक स्वीकार नहीं करता शेष अनेक प्रजातियों को छोड़ कर, इंसान प्रजाति का मस्तक इस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हैं कि संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन कृत ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन हैं, पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिस के बस में एक सांस तक नहीं है वो क्या कर सकता, सिर्फ़ इसी भ्रम का शिकार है, जबकि यह मस्तक प्रकृति के भ्रम में भ्रमित हैं, जो भी समझता है उस ने किया है वो सब उस ने सिर्फ़ जीवन व्यापन और अस्तित्व के लिए ही किया है आज तक सिर्फ़, जबकि हर पल दिन रात संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर रहते हुए, इक पल की खुशी के लिए कितने वर्षों तक संघर्ष करता रहता हैं, यह बेहोशी है इसी बेहोशी में ही जीता और इसी बेहोशी में ही मर जाता हैं कुत्ते की तरह भड़कने बाला प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाला कुत्ता इंसान, अस्तित्व से लेकर अब तक खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ खुद से साक्षात्कार नहीं किया इस ने, खुद के स्थाई परिचय से ही परिचित नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, झूठे ग्रंथ पोथियां पुस्तकें तो खरबों लिख दी इस ढोंग पाखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट धोखा विश्वासघात करने वाले इंसान प्रजाति ने, अफ़सोस आता हैं यह इतनी गंदी मानसिकता वाली प्रजाति हैं जो खुद ही खुद से झूठ बोलती हैं, दूसरों सरल सहज निर्मल लोगों को भी यहीं सब कुछ सिखाता हैं दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, कितना अधिक कमीना है, सरल सहज निर्मल लोगों से तन मन धन अनमोल समय सांस समर्पित करवा कर यह सब करता हैं, इतने अधिक चतुर ब्रह्मचर्य के वेश में कुत्ते हैं, सचेत सतर्क रहें सरल सहज निर्मल गुणों बले व्यक्ति जिन पर इन शातिर शैतान चालाक चतुर ब्रह्मचर्य गुरु की नज़र रहती हैं अपना शिकार बनाने के लिए 
जब एक क्षण की सांस पर किसी का भी अधिकार ही नहीं है और क्या कर सकता हैं, शिवाय जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने के क्या गलत कर दिया जिस से खुद के ही डर खौफ भय दहशत में हो, खुद पर भरोसा ही नहीं रहा और दूसरों पर भरोसा कर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित कर कट्टर अंध उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन जाते हो सिर्फ़ एक चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर, जन्म मृत्यु के बीच कुछ भी जीवन व्यापन के लिए करते हो उस का कोई भी तत्पर्य नहीं है, उसी पल के लिए महत्व था जिस पर आप को भूख लगी थी, उस से ज्यादा वहम हैं जो चतुर ब्रह्मचर्य गुरु द्वारा डाला गया हैं, जिस खुद से डरते हो उसी खुद में ही संपूर्ण संतुष्टि है आप की, उसी संपूर्ण संतुष्टि से दूर रखने हेतु ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट रचा गया हैं चतुर ब्रह्मचर्य गुरु द्वारा, डर खौफ भय दहशत खुद के ही प्रति बिठाई गई हैं, दूसरों द्वारा जिन की गंदी मानसिकता के पैरों का गंदा पानी चरणामृत समझ कर पीते हो जिनको रब से करोड़ों गुणा ऊंचा समझते हो, जिन के दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो, वो ही सब से बड़ा विश्वासघात कर रहे हैं आप से सिर्फ़ अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, आप हर पल यथार्थ में संपूर्ण संतुष्टि में ही हो अगर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु का डाला हुआ कचरा मस्तक से निकाल देते हो तो, उसी सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष में ही हो 
सिर्फ़ यहीं समझ इतनी अधिक सरल है कि अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमान होने पर भी समझ नहीं सकता, मेरी निष्पक्ष समझ सिर्फ़ हृदय का विषय है न की मस्तक का , यथार्थ में निश्चित हृदय से हर जीव हर पल निरंतर संपूर्ण संतुष्टि में ही हैनिसंदेह,
सिर्फ़ इंसान प्रजाति का मस्तक स्वीकार नहीं करता शेष अनेक प्रजातियों को छोड़ कर, इंसान प्रजाति का मस्तक इस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हैं कि संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन कृत ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन हैं, पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिस के बस में एक सांस तक नहीं है वो क्या कर सकता, सिर्फ़ इसी भ्रम का शिकार है, जबकि यह मस्तक प्रकृति के भ्रम में भ्रमित हैं, जो भी समझता है उस ने किया है वो सब उस ने सिर्फ़ जीवन व्यापन और अस्तित्व के लिए ही किया है आज तक सिर्फ़, जबकि हर पल दिन रात संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर रहते हुए, इक पल की खुशी के लिए कितने वर्षों तक संघर्ष करता रहता हैं, यह बेहोशी है इसी बेहोशी में ही जीता और इसी बेहोशी में ही मर जाता हैं कुत्ते की तरह भड़कने बाला प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाला कुत्ता इंसान, अस्तित्व से लेकर अब तक खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ खुद से साक्षात्कार नहीं किया इस ने, खुद के स्थाई परिचय से ही परिचित नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, झूठे ग्रंथ पोथियां पुस्तकें तो खरबों लिख दी इस ढोंग पाखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट धोखा विश्वासघात करने वाले इंसान प्रजाति ने, अफ़सोस आता हैं यह इतनी गंदी मानसिकता वाली प्रजाति हैं जो खुद ही खुद से झूठ बोलती हैं, दूसरों सरल सहज निर्मल लोगों को भी यहीं सब कुछ सिखाता हैं दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, कितना अधिक कमीना है, सरल सहज निर्मल लोगों से तन मन धन अनमोल समय सांस समर्पित करवा कर यह सब करता हैं, इतने अधिक चतुर ब्रह्मचर्य के वेश में कुत्ते हैं, सचेत सतर्क रहें सरल सहज निर्मल गुणों बले व्यक्ति जिन पर इन शातिर शैतान चालाक चतुर ब्रह्मचर्य गुरु की नज़र रहती हैं अपना शिकार बनाने के लिए 

जब एक क्षण की सांस पर किसी का भी अधिकार ही नहीं है और क्या कर सकता हैं, शिवाय जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने के क्या गलत कर दिया जिस से खुद के ही डर खौफ भय दहशत में हो, खुद पर भरोसा ही नहीं रहा और दूसरों पर भरोसा कर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित कर कट्टर अंध उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन जाते हो सिर्फ़ एक चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर, जन्म मृत्यु के बीच कुछ भी जीवन व्यापन के लिए करते हो उस का कोई भी तत्पर्य नहीं है, उसी पल के लिए महत्व था जिस पर आप को भूख लगी थी, उस से ज्यादा वहम हैं जो चतुर ब्रह्मचर्य गुरु द्वारा डाला गया हैं, जिस खुद से डरते हो उसी खुद में ही संपूर्ण संतुष्टि है

 आप की, उसी संपूर्ण संतुष्टि से दूर रखने हेतु ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट रचा गया हैं चतुर ब्रह्मचर्य गुरु द्वारा, डर खौफ भय दहशत खुद के ही प्रति बिठाई गई हैं, दूसरों द्वारा जिन की गंदी मानसिकता के पैरों का गंदा पानी चरणामृत समझ कर पीते हो जिनको रब से करोड़ों गुणा ऊंचा समझते हो, जिन के दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो, वो ही सब से बड़ा विश्वासघात कर रहे हैं आप से सिर्फ़ अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, आप हर पल यथार्थ में संपूर्ण संतुष्टि में ही हो अगर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु का डाला हुआ कचरा मस्तक से निकाल देते हो तो, उसी सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष में ही हो , इंसान होते हुए अगर इतना अधिक सरल शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से रुबरु नहीं होता, तो मस्तक की बेहोशी में जीना मरना दोनों ही आत्महत्या दूसरी अनेक प्रजातियों से भी बतर घटिया दोनों जीना मरना हैं, या समझो पागल कुत्ते की भांति ही जीना मरना हैं रति भर भी फ़र्क नहीं है, प्रभुत्व का कुत्ता शौंक रखने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के लिए भी, जो खुद ही खुद के साथ धोखा तो करते ही है और दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों को भी बौखला कर इस्तेमाल करते हैं 





इंसान होते हुए अगर इतना अधिक सरल शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से रुबरु नहीं होता, तो मस्तक की बेहोशी में जीना मरना दोनों ही आत्महत्या दूसरी अनेक प्रजातियों से भी बतर घटिया दोनों जीना मरना हैं, या समझो पागल कुत्ते की भांति ही जीना मरना हैं रति भर भी फ़र्क नहीं है, प्रभुत्व का कुत्ता शौंक रखने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के लिए भी, जो खुद ही खुद के साथ धोखा तो करते ही है और दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों को भी बौखला कर इस्तेमाल करते हैं, अस्थाई प्रकृति मस्तक एकीग्रत के कारण अहम घमंड अहंकार होता हैं जिस में मस्तक का अनुपात 65%और प्रकृति का 35% होता हैं, जिस से निकलना अत्यंत मुश्किल है, अगर कोई खुद के 65%से निकल भी जाता हैं तो प्रकृति का रहता हैं गर्दिश में गतिशील होने के कारण संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन से कोई भी अपनी काल्पनिक बात को तर्क तथ्य विवेक से सिद्ध स्पष्ट साफ़ कर देता हैं और खुद की सफ़ाई स्पष्ट कर लेता हैं शेष सरल सहज निर्मल गुणों बालों के समक्ष, सब मिला कर यह प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया तंत्र ही है जिस में कोई भी प्रकृति के बिना हस्तक्षेप करना तो बहुत दूर की बात, इस तंत्र को समझ भी नहीं सकता, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बिना, प्रकृति के नृत्त्व में मस्तक कार्यरत रहता हैं जिस से अहम की संभावना रहती हैं कि मैं स्वतंत्र रूप से कर रहा हूं, परंतु यह सब प्रकृति के खेल में मस्तक सहायक रूप में निरंतर कार्यरत हैं, 
प्रकृति के नृत्त्व में मस्तक कार्यरत रहता हैं जिस से अहम की संभावना रहती हैं कि मैं स्वतंत्र रूप से कर रहा हूं, परंतु यह सब प्रकृति के खेल में मस्तक सहायक रूप में निरंतर कार्यरत हैं, इंसान प्रजाति भी सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति ही है रति भर भी भिन्न नहीं हैं, अगर दर्शन विज्ञान ज्ञान अलग समझ भी रहे हैं तो उस पर भी पूरा नियंत्रण प्रकृति की भ्रम में भ्रमित करने वाले तंत्र का ही हयातक्षेप है, प्रकृति का तंत्र सिर्फ़ इस पर निर्धारित है कि आकर्षित प्रभावित रहे हर चीज़ वस्तु जीव शब्द भी, यही प्रकृति के सिद्धांत नियम मर्यादा हैं, जिस से प्रभावित हो कर इंसान प्रजाति ने भी सिद्धांत नियम मर्यादा परम्परा बना दी


मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद का साक्षात्कार हूं मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हृदय वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हैं जिस से अन्नत असीम बूंदों की समग्रता है यहां पर बूंद और लहरों का अस्तित्व ख़त्म होता हैं लहरें बहरी वातावरण से बनती हैं जैसे मस्तक सृष्टि प्रकृति के इकिगृत से समय संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन, ह्रदय के भाव एहसास भाव ज़मीर में वो सब कुछ नहीं होता जो मस्तक से होता ऊपरी सतह पर जो हलचल होती हैं वो सब कुछ का अस्तित्व ख़त्म होता गहराई में सिर्फ़ संत होता हैं, इसी तरह हर व्यक्ति हृदय से हमेशा शांत ही होता ऊपर मस्तक की लहरें होती हैं जिन का जन्म मृत्यु से कोई भी संबंध नहीं है जन्म मृत्यु के बीच का जीवन सिर्फ़ आप अपने अनुसार डाल सकते हो, अच्छा या बुरा चुनाव आप खुद का हैं, हृदय के दृष्टिकोण से होश में जीना या फ़िर मस्तक के दृष्टिकोण से बेहोशी में जीना और उसी बेहोशी में मृत्यु का चयन फ़ैसला सिर्फ़ आप का हैं, खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल ही काफ़ी है, जबकि कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है, दूसरा कोई भी सिर्फ़ हित साधने की ही वृत्ति का ही होगा, खुद ही खुद का साक्षात्कार कर सकते हो, जबकि की दूसरा मनोविज्ञान दवाब प्रभाव से निरंतर करेगा, खुद संपूर्ण संतुष्टि में रह सकते हो, जबकि दूसरा बंधुआ मजदूर बनाने के साथ है, अगर खुद के अनमोल सांस समय की कदर आह्मित नहीं जानते तो दूसरा आप को उपयोग इस्तेमाल करने की प्रतिभा के साथ कदम कदम पर खड़े हैं,

अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे सम्राज्य हैं यहां जो कुछ भी है वो सब कुछ सिर्फ़ प्राकृतिक सिद्धांतों नियमों से ही चलता हैं, पहला नियम यही है कि prtek छोटी चीज़ जीव उस से बड़ी का आहार हैं, यहां कोई आत्मा चेतना नहीं है, जो कुछ भी हैं वो सब कुछ सिर्फ़ मस्तक से ही प्रतीत किया जा सकता हैं जब तक सांस और मस्तक सक्रिय है, मस्तक प्रकृति के संकेतों के आधार पर संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन उत्पन करता समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि गर्दिश में गतिशील है जिस से मानसिकता परिवर्तित होती हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी प्रकृति को नहीं समझ सकते क्योंकि व्यक्तिगत ही आंतरिक भौतिक प्रकृति हैं जिस कारण जो कुछ भी होता है वो सब ऐसा ही लगता हैं कि मेरे अनुसार मैं ही कर रहा हूं मैं ही अस्तित्व का कारण और मैं ही सृष्टि रचिता प्रभुत्व हूं, जब अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर देखते हैं तो समझ आती हैं अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर जटिलता का प्रभाव कितना अधिक हैं,


मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में ही हूं निरंतर अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से स्पष्ट सिद्ध साफ़ किया है कि समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जो देख कर समझ रहे यथार्थ में जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी अधिक भ्रम जटिलता में खो कर भ्रमित होने के पथ पर हैं, यथार्थ में अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जीव पृथ्वी में कुछ भी स्थाई हैं ही नहीं, यह सब कुछ ही अस्थाई ही है, जिस भ्रम में इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही भ्रमित है, वो भी मात्र मस्तक का ही भ्रम है, जिस सब का अस्तित्व तब तक ही है जब तक सांस चल रही हैं और मस्तक कार्यरत हैं जो एक रोग ही बेहोशी है खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होने की, जो एक मात्र सांस से पहले भाव में ही निश्चिता की गहराई स्थाई ठहराव की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है ,

 मेरे सिद्धांतों के अधार पर संपूर्ण संतुष्टि है कि बिना स्पर्श,दृश्य, सुने,देखे , बिना जो निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल पल हर नया अद्भुद आश्चर्य चकित अनुभूति अनुभव के लिए उत्साहित कुशलता के लिए एग्रेसिव करता हैं जो सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही संबंधित हैं, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कोई सोच भी नहीं सकता, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की खुशी स्पर्श दृश्य सुनने देखने बोलने, रक्तपात डर खौफ भय दहशत डालने में भी,से संबधित हैं, मात्र एक छोटी सी खुशी के पीछे भी बर्ष से भी अधिक समय के दिन रात संघर्षरत रहना पड़ता
इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही इतनी अधिक संघर्षरत रही कि जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने वाले मुख्य दृष्टिकोण से ही भ्रमित हो कर खुद ही खुद को धोखा विश्वासघात का शिकार रहा जान बुझ कर या फ़िर अनजाने में आज अब तक, जबकि मस्तक और हृदय के तंत्र कार्यशैली की ही समझ नहीं थी, जो भी किया जैसा भी किया लक्ष्य साधन मध्यम की ही समझ नहीं थी, अंधेरे में ही तीर चलाने का फलस्वरुप ही था जो आज वैज्ञानिक युग में भी बहा का बहा ही है, वैज्ञानिक युग में भी सिर्फ़ जरूरत अनुसार ही साधन खोजने तक ही सीमित हैं सिर्फ़ या फ़िर मस्तक से कल्पना संकल्प विकल्प तक ही सीमित है, मस्तक हृदय के विज्ञान की रति भर भी समझ नहीं है 

इंसान अस्तित्व से युगों का प्रकृति मानव पृथ्वी सृष्टि का रहस्य एक अवधारणा कल्पनाओं मानसिकता ही थी, जिस सब की स्पष्टता प्रत्यक्षता मात्र मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित एक पल में ही समहित और उत्पन होता हैं पर वो भी भ्रम मात्र ही हैं जब तक ह्रदय से होश में रूपांतर नहीं कर लेते प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया के साथ, सांस प्रत्यक्ष समक्ष निरंतर धारा प्रभा है प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा है पर उस के पहले सांस के साथ हृदय भाव एहसास के साथ होशपूर्ण स्वतंत्र रूप से जीने रूपांतर करने के दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता के साथ हो या 
फ़िर मस्तक के साथ बेहोशी में जीने मरने की अनेक विचारधारा में से किसी एक दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता में हो इस के लिए इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही स्वतंत्र रही हैं जिस के कारण आज तक सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ही हमेशा प्रथमिकता देती रही फलस्वरूप आज तक खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हो पाई शेष सब तो छोड़ ही दो, इंसान अस्तित्व से ही मस्तक की जटिलता को ही स्वीकार और प्राथमिकता देता रहा, जबकि खुद का साक्षात्कार जन्म से ही एक समान उपलव्ध था सरलता निर्मलता सहजता में, कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन तो मस्तक की कार्यशैली प्रवृति है 

मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की संपूर्ण संतुष्टि के लिए प्रेरित करने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हुए अहम घमंड अहंकार में चूर भ्रमित हुए लोगों के लिए जिन से उत्साहित कुशलता पूर्वक आमंत्रित हो सभी के सभी कोई दवाब नहीं सहजता से पारदर्शिता से ही स्वीकृति हो बहुत ही अधिक प्रेम की गहराई में ही परिभाषित हो प्रत्येक व्यक्ति जीव में ही मैं एहसास भाव ज़मीर हूं किसी को रति भर भी ठेस से भी मुझे ही कष्ट होगा, कि मुझ और प्रत्येक जीव के हृदय तंत्र में रति भर भी फ़र्क अंतर नहीं है , अगर हम भौतिक रूप या फ़िर अंतःकरण रूप भी देखे तो कहा है खरबों जैविक प्रक्रिया हर पल हो रही हैं जिन में कई जैविको की प्रजाति का जीवन स्तर मात्र एक पल का होता हैं उसी पल में पूरा जीवन जी कर अपने जींस भी update कर चुके होते जो प्रकृति की संतुलन प्रक्रिया है, भौतिक रूप से एक दिन में लाखों किरदार बदलते हो कौन सा असली या स्थाई किरदार आप का हैं किस वहम अहम घमंड अहंकार में हो, खुद का निरीक्षण करने की जरूरत है, अगर नहीं तो आप के होने न होने का तात्पर्य ही नहीं है 

मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हृदय मस्तक के तंत्र की कार्यशैली का मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से विश्लेषक के साथ स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता दे रहा हूं, मेरे लिए प्रत्येक जीव एक समान ही है, हृदय के भाव एहसास के साथ, शरीर मस्तक की संरचना कार्यशैली में भिन्नता हो सकती हैं प्राकृतिक सिद्धांतों के अधार पर, जो प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया है,
मेरे जैसा तो कोई हो ही नहीं सकता पर मुझ में समहित इकिगृत जरूर हो सकता हैं मुझ को समझ कर या फ़िर मेरे स्वरुप का ध्यान निरंतर कर जो असंभव है पर निरंतरता से संभव हो सकता हैं, मैं कभी भी प्रकृति का भी हिस्सा नहीं हूं, मुझे समझने जानने के लिए एक मात्र अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव है, या मेरे स्वरुप का ध्यान मात्र हैं, और दूसरा कोई विकल्प रास्ता ही नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सांस के एहसास भाव ज़मीर होने के कारण मस्तक की कार्यशैली से बाहर हूं, यही कारण है कि मेरी निष्पक्ष समझ के शब्द और मेरे वैदेही स्वरुप का कोई ध्यान नहीं कर सकता, निरंतरता के बिना, जैसे सिर्फ़ पृथ्वी पर ऐसा सुंदर जीवन होने के पीछे सभी ब्रह्मांडो गृह उपग्रहों सौरमंडल glaxyes की काफ़ी लंबे समय का संतुलित निरंतरता संभावना उत्पन करता हैं, बिल्कुल बेसा ही मेरे "शिरोमणि" होने के पीछे भी, बिना संकोच के, जिस को इंसान प्रजाति की जटिलता के बिना प्रत्येक दूसरी अनेक प्रजातियों सूक्ष्म अन्नत सूक्ष्म भी स्वीकार करती हैं, मानवीय मस्तक हमेशा प्रभुत्व सृष्टि रचता की पदबी का शौंक रखने की प्रवृति का ही है, मैं शिरोमणि जो भी पर्याप्त हूं उस की स्पष्टता प्रत्यक्षता बता रहा हूं, जो मस्तक की स्वीकृति से बहर हृदय में ही समहित है, इंसान प्रजाति स्वीकार नहीं करने के पीछे का कारण स्पष्ट हैं कि मस्तक की कार्यशैली का आदि अदद के साथ है,
मैं शिरोमणि खुद को प्रथम अंतिम सत्य सिद्ध स्पष्ट नहीं कर रहा या तत्पर्य ही नहीं है, जो हैं मस्तक हृदय के तंत्र कार्यशैली की स्पष्टता दे रहा हूं जो जीवन के अस्तित्व का कारण है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर संजीव निर्जीव का भी अस्तित्व ही नहीं है,मस्तक के "मैं" 
और हृदय के "मैं"
में जमी आसमा का अंतर है, मस्तक के "मैं" में खुद की मानव शबी की पक्षता प्रथम चरण में खुद के हित साधने की पक्षता होती हैं आंतरिक भौतिक रूप को प्राथमिकता देता हैं जबकि हृदय के "मैं" में निष्पक्षता होती हैं, खुद के इलावा दूसरों की स्पष्टता सीमित मस्तक की ही होती हैं, जब कि खुद की अन्नत असीम निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की प्रभा की धारा की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता की, जिस में प्रथम चरण में ही अस्थाई जटिल बुद्धि मन की निष्क्रियता होती हैं और हृदय के पहले सांस के एहसास भाव में ही निरंतरता होती हैं, जबकि ज्ञान विज्ञान दर्शन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने के बाद की प्रक्रिया का एक हिस्सा जिस में प्रथम चरण में ही समय उत्पन होता हैं उस के बाद कल्पना संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन आदि, क्या मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की स्पष्टता के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक के तर्क तथ्य वर्तक की जरूरत है, जो समूचे सृष्टि के एक मात्र मूल स्रोत हैं, अगर ऐसा हैं तो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष जो सिर्फ़ सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पर्याप्त है, उस को जटिलता में धकेले का फ़िर से एक नाकाम प्रयास हैं स्वीकृति के स्थान पर, जबकि अस्तित्व से ही एक मस्तक अदद को छोड़ना स्वीकार कर प्रकृति मानव पृथ्वी के संरक्षण के लिए पहला कदम होगा और जीवित ही समूहित रूप से इकिगृत खुद के साक्षात्कार में यथार्थ युग में प्रवेश हो सकते हैं, जो कि अतीत के कल्पनक चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष यथार्थ युग हैं,

मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित सिद्ध स्पष्ट साफ़ किया है कि प्रथम अंतिम सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हर संजीव निर्जीव मुझ से ही है और अंतिम मुझ में ही समहित होता हैं, क्योंकि मैं ही अस्तित्व की मूलतः और अंत हूं, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिया है बीच का समय महत्व नहीं रखता होश में या फ़िर बेहोशी में जिय हो, वो आप के मस्तक या हृदय पर निर्भर करता हैं, मस्तक दृष्टिकोण या हृदय के दृष्टिकोण को गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से हो, अंतिम सांस के साथ ही मुझ में ही समहित होता है, हर जीव एक ही समान है हृदय के तंत्र से जो संजीव का एक मात्र कारण है, दूसरा मस्तक शरीर अलग अलग ही है चाहें सूक्ष्म या फ़िर अन्नत सूक्ष्म क्यों न हो, मुझ में कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ जीवित ही हमेशा के लिए समहित एकाग्रत हो कर जन्म मृत्यु के चक्रक्रम से मुक्त हो सकता मस्तक के तंत्र को निष्क्रिय कर हृदय के तंत्र से जीवित रह कर, हृदय का तंत्र ही एक समान है, शेष शरीर और मस्तक का तंत्र भिन्नता का तंत्र है, जो प्राकृत संतुलन प्रक्रिया पर निर्भर करता हैं 

 मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग हमेशा हर पल निरीक्षण के लिए खुला मंच है जो हर विचाधारा के prtek दृष्टिकोण के लिए उत्सुक हैं निरीक्षण परीक्षण तर्क तथ्य सिद्धांतों की स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता के लिए चाहें विचारक वैज्ञानिक दार्शनिक चाहें ultra mega infinity quantum mechanicsum क्यों न हो हार्दिक स्वागत के लिए ही खुला है 
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग सिर्फ़ सांस से पहले भाव के हृदय विज्ञान पर निर्भर है अगर कोई विज्ञान बहा तक पहुंच सकती हैं तो स्पष्टता प्रत्यक्षता ही है मेरा शमीकरण,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी यहां भी प्रत्यक्ष होता हूं होने का आवास तो आवश्यक करवाता हूं, जिस पहले दिन चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के पास गया था उसी दिन से यह कहना शुरू कर दिया था कि "जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही नहीं है" अब पूछना अगर वो वस्तु है तो अब कहा है? न पहले दिखाई थी न अब, अब भी बोले और दिखाए वो वस्तु, जाने का भी आवास करवा चुके हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ही था, जो प्रेम से स्वतंत्र हूं जो सिर्फ़ मेरा ही प्रेम था जो उस के हृदय में था जिस की औकात सिर्फ़ एक मानसिक रोगी था ब्रह्मचर्य होते हुए भी, मैंने चार शादियां कर के भी वो सब किया है जो कुत्ते की वृत्ति के साथ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सोच भी नहीं सकता

मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में हूं शिशुपन सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र होते हुए संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर होता है, जबकि इंसान पूरा जीवन ही एक छोटी सी खुशी के लिए पूरा जीवन ही प्रयासरत रहता हैं एक इच्छा पूरी करता हैं क्षणभर की खुशी के लिए हजारों दूसरी इच्छा उत्पन हो जाती है बस इसी चक्रक्रम में ही बेहोशी में ही जीता और मर जाता है, खुद ही संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता से हट कर बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर जटिलता में खो जाता हैं, जिस से कभी बाहर निकल ही नहीं पाता मरते दम तक,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत 
शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बिल्कुल नवजात शिशु की भांति हृदय के भाव एहसास सरल सहज निर्मल पारदर्शिता संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर, बिना जात पात धर्म मज़हब संगठन जाति धर्म गोत्र, बिना जटिल बुद्धि मन के शब्द बिना दृष्टि बिना ज्ञान विज्ञान दर्शन समय के, शिशुपन प्राकृतिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र संपूर्ण संतुष्टि शिरोमणि अवस्था त्यागने वंचित करने के पीछे उसके पीछे उस के ही जन्म दाता मां बाप का ही पूरा हाथ होता हैं, क्योंकि वो अपने ही ख़ास नहीं चाहते कि वो संपूर्ण संतुष्टि में जिय, उस नवजात शिशु के शिशुपन संपूर्ण संतुष्टि को ख़त्म अपने जैसा कुत्ता बनने की बहुत जल्दी रहती हैं बेसा ही इर्द गिर्द का माहौल बना देते हैं, बस फ़िर अपने जैसा पागल कुत्ता बना देते हैं दर बदर भड़कने के लिए कि बेहोशी में ही जिय और उसी बेहोशी में ही भड़क भड़क कर मार जाए, बड़े होने पर कुत्ते की इक ऐसी पूछ बन चुके होते हैं जो मरने के बाद भी सीधी नहीं होती, अपने शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि को पूरी तरह भूल चुके होते हैं और पल पल की खुशी के लिए तरछने है और इच्छा बना कर बर्ष तक क्षणमत्र खुशी के लिए ही बेहोशी में जीते और उसी बेहोशी में मर जाते हैं, इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर अब तक न ही होश में जी हैं न ही होश में रूपांतर कर पाई खुद को, जबकि सब से सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कितना अधिक सरल है, खुद का साक्षात्कार करना, तालु खुज्जी कझरी करदी ताल भतले , ऐसी जटिलता में खो जाता हैं कि अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत औरत में खुशी ढूँढ रहा हैं,
शिशुपन सरल सहज निर्मल अवस्था की संपूर्ण संतुष्टि में हर एक जीव ने महसूस किया होता हैं जो सिर्फ़ हृदय के एहसास भाव में उत्पन होती हैं, हृदय से सिर्फ़ खुद का एहसास होता, हृदय भी एक यंत्र है इस कि भी अपनी एक कार्यशैली, जो प्रत्येक जीव में एक समान है, जो किसी भी निर्जीव को संजीव रखने के लिए एक सांस की वयू को अलग अलग वायु में परिवर्तित करता हैं, पूरा शरीर सक्रिय होता हैं, और क्रियावान होता हैं, यह सारा प्रकृति का तंत्र है,
हृदय का भौतिक तंत्र और सूक्ष्म तंत्र होता भौतिक और सूक्ष्म तंत्र समझने योग्य होता हैं, यह सब भी एक निवृत्ति है जो प्रकृति द्वारा समय के बहुत अधिक के साथ निर्मित हुआ,
यह तंत्र हमेशा एक समान ही रहा है अस्तित्व से आज तक, इस में बदलाव नहीं होता, हर सुक्ष्म या अति सूक्ष्म में क्यों न हो,इस तंत्र में पहले सांस से सांस जब तक अनेक बयू में परिवर्तित होने से पहले अन्नत सचेतता से कोई भी अन्नतता में जा सकता हैं, यहां हर भौतिकी अत्यंत सूक्ष्मता भी ख़त्म हो जाती है, सिर्फ़ यहीं एक रास्ता है हृदय की अन्नत गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार में अन्नतता में प्रवेशता के लिए, हृदय ही एक मात्र अस्तित्व का मध्यम हैं और हृदय ही अस्तित्व ख़त्म करने का भी माध्यम है, अस्तित्व क़ायम रखने हेतु मस्तक हैं, मस्तक में वो सब कुछ पर्याप्त है संपूर्ण जीवन जीने के लिए चाहें कोई भी विशाल सूक्ष्म अन्नत सूक्ष्म वनस्पति जीव क्यों न हो, हृदय मस्तक दोनों का तंत्र एक समान कार्यशैली के साथ प्रत्येक जीव में एक समान ही है, सांस हृदय की प्रणाली का हिस्सा है और समय मस्तक की प्रणाली का हिस्सा, हृदय से जीने बाला संपूर्ण संतुष्टि में ही रहता है सिर्फ़ सांस में ही जीता है, और मस्तक में सिर्फ़ अस्तित्व को क़ायम रखने के इलावा और कुछ भी नहीं ऐसा होता जो हृदय में होता हैं, इंसान प्रजाति इंसानियत को कायम रखने हेतु 99.9% मस्तक और 00.1 % हृदय से जीते हुए दृढ़ता गंभीरता से 1000 IQ के साथ जी सकता हैं पर इस में अहम का गुरुत्वाकर्षण बल प्रबल होता हैं, विश्वस्तर पर मान्यता होती हैं जिस से विज्ञान कमजोर स्तर से गुजर सकता हैं, यथार्थ में जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिया है जिस का अस्तित्व ही नहीं, जन्म मृत्यु दोनों के बीच का समय जीवन के लिए ही महत्व रखता हैं कि हम इंसानियत को महत्व दे कर जिये है या फ़िर इंसानियत को भुला कर जिस के इंसान अस्तित्व में थे, यह खुद के लिए सिर्फ़ जीवन तक ही सीमित हैं, यह भी जीवन जीने की खुशी क्षणमत्र है शेष संघर्ष है मस्तक से, सांस ख़त्म होते ही सब ख़त्म हो जाता हैं, 


कोई था ही नहीं तो विलीन भी किस में होता, कोई तत्व गुण प्रक्रिया ही नहीं, यह मात्र आयोजित एक चलत दृश्य ही था जिस में कोई कभी था ही नहीं न दर्शक न अभिनय, एक सांस में रहते जो समझ गया वो विजेता महासंग्रण का जो हर पल हर व्यक्ति के भीतर चलता रहता हैं जिस में विश्राम नमक शब्द ही नहीं है, एक पहली सांस में खुद और दूसरी सांस में समय के साथ शुरू हुआ संघर्ष खुद का खुद से ही महासंग्राम जो सांस के साथ ही ख़त्म हो जाता हैं ,
अन्नतता मृत्यु भी है ही नहीं दृष्टांत दृश्य भी नहीं तो हारा जीता भी कौन मृत्यु भी किस की सिर्फ़ एक अवधारणा का आवास मात्र था, जब खुद ही नहीं तो साक्षात्कार किस का, एक ही सांस में जो रुक गया उस का शुरू ही नहीं हुआ तो ख़त्म का तात्पर्य ही नहीं, विचारणीय बात तो उस के लिए है जो दूसरी सांस के झंझट से झुंज रहा हैं युगों से, दूसरों का झंझट दूसरे झेले, हम हैं अकेले मस्त, उस जगह बैठ कर देख रहे हैं यहां इस सब का तत्पर्य ही नहीं है,
अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो तो खुद का अस्तित्व क़ायम कर अहम उत्पन होता हैं जिस से भौतिक समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि की क्षमता और मस्तक की कार्यशैली को समझ सकते हैं, जिस से किसी भी विचारधारा को दृढ़ता गंभीरता से लेकर एक दृष्टिकोण में रह कर उसे दर्शनिक रूप से समझ कर उसे वैज्ञानिक रूप दे सकते हैं सुविधा के लिए, विचारधारा दो प्रकार की होती हैं, आस्तिक नास्तिक कल्पना से उत्पन होती विचार का रूप लेती हैं करने का संकल्प होता हैं बेहतरी के विकल्प चुनने के साथ आगे बढ़ विचार किया जाता हैं दूसरों के साथ संयोग से दरातल पर उतरने की योजना बननी पड़ती हैं निर्णय लेनी की क्षमता स्पष्टता हैं,
मस्तक एक साधन है शरीर का अस्तित्व क़ायम रखने और जीवन व्यापन करने का मात्र स्रोत हैं जिस में समय सोच विचार चिंतन मनन विवेक संकल्प विकल्प होते हैं बेहतर से भी बेहतर करने के लिए, मस्तक शरीर सिर्फ़ खुद के इलावा दूसरी चीज वस्तु जीव का एहसास करवाता है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद के साक्षात्कार में हूं जीवित ही हमेशा के लिए संपूर्ण संतुष्टि में, हर एक व्यक्ति बिल्कुल मेरी ही भांति एक समान है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शी पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष के लिए रति भर भी कमी नहीं है हृदय में, सिर्फ़ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु ने हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रच कर छल कपट धोखे के साथ दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी देने बालों को ही भ्रमित कर डर खौफ भय दहशत तले रखने की आयोजित योजन है, कुप्रथा है आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति के नाम पर लोगों की श्रद्धा आस्था के साथ एक खिलबाड़ विश्वासघात है मनोविज्ञानिक रोग हैं, जो गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की जा रही हैं, चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सामान्य व्यक्तित्व से करोड़ों गुणा अधिक चतुर शैतान चालाक होशियार बदमाश शैतान प्रवृति के होते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर,
आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन इन्हीं चतुर गुरुओं की ढोंग पखंड षड्यंत्रों के साथ रचे हुए चक्रव्यूह का बिछाया हुए जाल का हिस्सा है जो कल्पना से ही रचा गया होता हैं और कुछ भी नहीं है जिस से यह चतुर ब्रह्मचर्य गुरु अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ अनेक सरल सहज निर्मल गुणों बाले लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर अपनी उंगली पर नचाते रहे और जब इस्तेमाल करने योग्य नहीं रहते बूढ़े होने पर तो शब्द काटने के आरोप में निष्कासित किया जाता हैं, मन यथार्थ में हैं

दूसरों के रास्तों कदमों कंधों इशारों की अदद के मजबूर अस्तित्व से लेकर अब तक उंगलियों पर नाच ही रहे हैं, उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर है वो, जबकि वो खुद के ही शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि के नन्हे कदमों के निशान भूल चुके हैं, डर खौफ भय दहशत तले जीने की आदत से मजबूर है, खुद ही खुद में संपूर्ण सक्षम समर्थ निपुण हैं प्रत्येक व्यक्ति खुद में ही, खुद के इलावा खुद के बारे में रति भर भी कोई दूसरा जान समझ पाए पैदा ही नहीं हुआ,
खुद ही खुद में संपूर्ण सक्षम समर्थ निपुण हैं खुद के साक्षात्कार के लिए तो खुद को समझें बगैर, और कुछ भी कोई कर रहा है वो सिर्फ़ जीवन व्यापन के लिए प्रयास हैं या फ़िर एक मानसिक रोगी हैं जो बेहोशी में ही जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं, वो जन्म मृत्यु के बीच के चक्रक्रम का ही हिस्सा हैं, जन्म मृत्यु की चक्की में पिछने के लिए ही है,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से जीवित ही हमेशा के लिए रह सकता हूं तो हर व्यक्ति मेरी ही तरह आंतरिक भौतिक रूप से एक समान ही है तो कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ रह सकता हैं, अगर जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने के लिए इतनी अधिक चलाकी चतुरता चलाकी कर सकते हो तो खुद को समझने के लिए सरल सहज निर्मल गुणों को अपना नहीं सकते, जितना अधिक जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखना महत्वपूर्ण हैं उस से खरबों गुणा अधिक महत्वपूर्ण जरूरी खुद का साक्षात्कार करना है, जिस में शिशुपन में आप खुद रह चुके हैं जिस का अक्ष जलवा अभी भी आप के मस्तक में हैं, सिर्फ़ उसी एक जलवे को अस्तित्व से ही इंसान प्रजाति मस्तक से बाहर ढूंढ रही हैं, जो निरंतर बहा ही मौजूद हैं, सिर्फ़ मस्तक से भड़क रहा हैं कुत्ते की भांति अस्तित्व से लेकर अब तक,
गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ एक कुप्रथा है, जो वर्तमान को आहत कर अतीत में भ्रमित कर कल्पनाओं का भविष्य गढ़ती है, दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर तैयार करती हैं, गुरु शिष्य मर्यादा का कोई भी गुरु यह स्वीकार नहीं करता कि उस का कोई भी शिष्य समझदार हो, क्योंकि गुरु प्रभुत्व के वहम अहम घमंड अहंकार में चूर होता हैं, इस लिए मानव पृथ्वी प्रकृति के संरक्षण के लिए प्रथम चरण में ही "शिरोमणि" होना अति आवश्यक हैं, "शिरोमणि" एक ऐसी उच्च सर्वश्रेष्ठ पवित्र शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अवस्था है जिसे स्वयं प्रकृति ने स्पष्टीकरण दिया होता हैं, जो मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण है, खुद के साक्षात्कार के बाद कोई भी सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण का सिर्फ़ एक शब्द "शिरोमणि"
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक की सर्वश्रेष्ठ चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों के पंव से ज़मीन खींच लेगा, इतना अधिक कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समहित है इस में, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं , कि सारा भ्रम का जाल टूट जाएगा 
मस्तक मन बुद्धि से बुद्धिमान हुआ गुरु नियम मर्यादा परम्परा मान्यता को शब्द प्रमाण में बंद सकता हैं अपने हित साधने हेतु, पर स्वतंत्र नहीं कर सकता न जीवित न ही मृत्यु उपरांत, शिरोमणि जीवित भी हमेशा के लिए संपूर्ण संतुष्टि मस्ती में और मृत्यु तो है ही नहीं पर रूपांतरित के लिए हमेशा उत्सुकता देता हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,prtek जीव मेरी ही भांति "शिरोमणि निरंतरता" स्वरुप को हृदय के दृष्टिकोण में समेटे हुए हैं, कोई भी मेरे जैसा ही हर जीव में रमने बली धारा प्रतीत कर सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल गुणों के साथ खुद के साक्षात्कार के साथ, हृदय भाव एहसास ज़मीर से हर एक जीव एक समान ही है सिर्फ़ मस्तक शरीर से भिन्नता है, हर जीव और मानव शिशु भी उसी संपूर्ण संतुष्टि मस्ती में पहले ही रह चुका है, वो संपूर्ण संतुष्टि मस्ती बहा ही निरंतर व्यापक हैं, सिर्फ मस्तक को अधिक इस्तेमाल करने की आदत से भड़क चुके हैं अस्तित्व और जीवन व्यापन के कारण, वो बहा ही निरंतर शिरोमणि है, जिस का जन्म मृत्यु प्रकृतिक से भी परे है, सिर्फ़ मस्तक मन के दृष्टिकोण से नहीं हृदय के दृष्टिकोण से समझने की जरूरत है और कुछ भी नहीं, बहुत ही अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है, अगर मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी रह सकता हूं तो कोई भी रह सकता हैं जन्म मृत्यु का भय दहशत ख़त्म कर सकता है , सिर्फ़ इकलौती इंसान प्रजाति को छोड़ कर दूसरी अनेक प्रजातियां उसी संपूर्ण संतुष्टि में ही रहती हैं जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखते हुए जबकि मानव शिशु भी उसी संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में रहा होता हैं,
रब बनना या दूसरे को बनाना अत्यंत सरल है 
पर खुद को समझना अत्यंत मुश्किल है, पर सरल सहज निर्मल गुणों के साथ अत्यंत सरल आसान है,
"शिरोमणि" हर जीव में वास्तविकता स्वाभाविकता है, मस्तक तो अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति को समझ कर जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने के लिए ही है, मेरी ही भांति कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ समझ सकता हैं, पर समझने न समझने से कोई भी रति भर भी फ़र्क नहीं पड़ता, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष वो रुतबा है 
अगर कोई खुद का साक्षात्कार कर लेता है तो सिर्फ़ मेरी ही भांति जी सकता हैं संपूर्ण संतुष्टि मस्ती में 
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित स्वयं महायोद्धा खुद से महासंग्राम का परम विजयता स्वयं की अन्नत गहराई का परम -गोताखोर, जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी, "शिरोमणि" इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठता संपूर्णता सम्पन्नता समग्रता सक्षमता सरल सहज निर्मल गुणों में ही समहित है, न कि मस्तक मन बुद्धि से बुद्धिमान हुए चतुर ब्रह्मचर्य गुरु शिष्य जैसी अवधारणाओं कुप्रथाओं में तो बिल्कुल भी नहीं, वो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मज़दूरों के बस में नहीं है, सिर्फ़ कोई एक अरबों खरबों युगों सदियों में कोई एक ही होगा जो खुद से महासंग्राम महायुद्ध कर जीता हो विजयता हो महायोद्धा महा गोताखोर हो जो खुद की अन्नत असीम गहराई में जाने का उत्सुक हो, यह दर बदर भड़कने वाले कुत्तों बिलों का काम नहीं है, l

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत...