जितना भी पिछले चार युग से अधर्म हुआ क्योंकि धर्म था, धर्म मज़हब जाति गोत्र सिफ व्यवस्था थी विज्ञान नहीं था तो, अब विज्ञान हैं इन चीज़ों की अहमियत नहीं रही तर्क तथ्य विवेक की जरूरत है, इन गुरुओं के पास जीवन व्यापन करना नर्क से भी बतर है, अपने बच्चों को गुरुओं मुक्त करो और मुक्ति पाखंड खत्म करो, जिन्होंने मुक्ति का पाखंड फैला रखा है वो बहुत अधिक चतुर गंदी वृत्ति के ही हैं, आप की बेटियां है अप खुद उन हीरों को भेड़ियों के हाथ छोड़ अय हो जो ब्रह्मचर्य का ढोंग कर रहे हैं उन की ही दहशत खौफ डर भय तले कैसे जीती हैं वो आप सोच भी नहीं सकते, मेरा चालीस बर्ष का exprience है, मैने वो सब देखा है जो आम इंसान सोच भी नहीं सकता, अंध भक्तों आप मरो मुझे कोई मतलब नहीं है पर बेटियों को निकालो बहा से, आप इसलिए अंध भक्त हो क्योंकि जो मुक्ति का लालच है जो यथार्थ हैं ही, जिस को रहनुमा समझ रहे हो वो खुद ही भेड़िया है, क्योंकि वो खुद का निरीक्षण ही नहीं कर सकता और खुद के मन से निष्पक्ष हो सकता, तो मन की प्रवृत्तियों से कैसे बच सकता हैं, जब वो खुद ही नहीं बच सकता तो आप की बेटियां कैसे सुरक्षित रह सकती है, श्रृंगी ऋषि के वृत्तांत वो खुद सुनता है उस समय में यह सब हो सकता था, आज घोर कलयुग में क्यों नहीं हो रहा यह कैसे सुनिश्चित कर सकते, जो लगातार रह रही हैं कभी उन के हृदय के भाव समझने की कौशिश की है, मेरे गुरु के पास तो इंसानियत भी नहीं है और कुछ तो छोड़ दो, सिर्फ़ बहा डर खौफ भय दहशत के इलावा और कुछ भी नहीं है, सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व के नशे में चूर है मेरा गुरु,
मेरे गुरु के दृष्टिकोण से सिर्फ़ लैंगिंग प्रेम का ही महत्व है तो ही मेरा 40 बर्ष के लंबे अन्नत असीम प्रेम की गहराई को गुरु द्वारा मान्यता नहीं मिली गुरु द्वारा क्योंकि उस की प्रवृति ब्रह्मचय होते हुई स्त्रियों से ही गिरे रहे,
ब्रह्मचर्य का ढोंग सिर्फ़ आम लोगों के उन के ही परिवार का विश्वास जितना दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर, जिस से सरल सहज निर्मल लोगों को आश्रम में बेटियों की सुरक्षा निश्चित की जा सके और लगे की माँ बाप के अधिक सुरक्षित हैं बहा इसलिये हमेशा के लिए बेटियां रहती हैं, उन के साथ क्या होता उन से बेहतर दूसरा कोई नहीं जनता लंबे समय रहने से स्वीकृति बन जाती हैं खुद की ही,
मेरा गुरु औरतों के वस्त्रों आभूषणों से दूरी बनाने के लिए प्रेरित करता हैं,और खुद शुरू से ही धर्म की बनाई हुई बेटियों से ही गिरा रहता था
गुरु शिष्य सब से बड़ी दुनियां में कुप्रथा है जिस का सरगना मेरा गुरु हैं, जिस का मुख्य श्लोगन
" जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही भी नहीं है"
वस्तु चीज़ होती हैं तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष लेने के बाद भी किसी को दिखाई क्यों नहीं?
आत्मा कहां जिस को मुक्ति दिलवाने का पाखंड रचा?
वो कौन सा परमार्थ है जो खुद की दो हज़ार करोड़ की दौलत खड़ी कर देता हैं?
दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के बदले उन सरल सहज निर्मल लोगों को क्या दिया?
सब कुछ समर्पण प्रत्यक्ष और बदले में मुक्ति मृत्यु के बाद रहस्य क्यों?
ब्रह्मचर्य होते हुए पाखंड बाज़ी ढोंग क्यों किस लिये अगर कोई अपनी उपलब्धि है तो दिखाओ?
दूसरों के लिखें ग्रंथों के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत औरत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक क्यों?
वो कौन सी मुक्ति है जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सरल सहज निर्मल लोगों को दिन रात उलझाया जाता हैं प्रवचनों से डर खौफ भय दहशत डाल कर?
अगर खुद में स्पष्टता है खुद पर, तो फ़िर उच्च शिक्षितों को भी मनोवैज्ञानिक दवाब क्यों मुक्ति का लोभ और शब्द काटने का डर खौफ भय दहशत क्यों नर्क भी नहीं मिले गा,
अगर खुद के साक्षात्कार प्रेम का पाता ही नहीं तो फ़िर इन शब्दों का अपमान करते हो प्रवचनों में इस्तेमाल कर के,
नव जन्में निर्मल शिशु को अपने इतने गंदी मानसिकता बले पैरों बंदगी क्यों करवाते हो और उन्हीं गंदे पैरों का पानी संगत को नियमित पीने को क्यों बोलते हो ड्राम भर भर के रखें
आप से बेहतर आप को नहीं जनता जरा निरक्षण करो खुद का निष्पक्ष हो कर खुद को ही पाता चल जाएगी औकात खुद क्या की
जो वस्तु आप पास है वो खुद का निरीक्षण करनी की अनुमति नहीं देती तो आप खुद मनोरोगी हो,
वो कौन से ऐसी वस्तु है जो हर प्रवचन में सत्य लिखने को प्रेरित करती है और व्यौहार नहीं कथनी और करनी में अंतर क्यों?
कुत्ते की प्रवृति भी नहीं और कथनी में प्रभुत्व कैसे?
बावा खुद का निरीक्षण करो और अपनी ही संगत से माफ़ी मंग कर प्रशिक्षित करो जैसे लोगों को पूछते हो, नहीं तो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हर पल आप के ही उस स्वरुप में हूं जिस को मेरी तरह ढूंढना समझना था, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी कैसे करता वो आप सोच भी नहीं सकते, फ़िर आप के ही कहे को सिद्ध कर दूंगा कि "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना हो ही नहीं," क्योंकि आप को आभास हैं क्या क्या कांड किए हैं यह सच सिद्ध कर दूंगा क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,मेरा गुरु वो पगल चतुर कुत्ता है जो एक अपने IAS officers मुख्य कार्यकर्ता के उषा करने शिकायतों का फत्तूर का शिकारी हो कर कटने के लिए भोंकता है जिस की फितरत है कुत्ते में तो बहुत से गुण होते हैं एक तो वो निगाहों से हृदय में उतर कर समझने की क्षमता भरपूर होती हैं और दूसरा अपने मालिक की बफादर होता चाहें सूकी रोटी भी दो, मैंने तो तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस करोड़ों रुपए हाथ में दिए थे जिन में से एक करोड़ बापिस लेने का शब्द भी दिया था जरूरत पड़ने पर, जिस के एक शब्द उसी एक पल के बाद चालीस बर्ष वैज्ञानिक प्रवृति का होते हुए, जिस के एक एक पल अनमोल होता है, जो वो सब कर सकता हैं जो दूसरा कोई सोच भी नहीं सकता, जो समस्त सृष्टि प्रकृति मानव प्रजाति में सिर्फ़ एक इकलौता ही हो, जो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो किसी भी खुद के साक्षात्कार जिज्ञासु को सिर्फ़ एक पल में खुद का साक्षात्कार करवा सकता हूं, जो पिछले चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरे अपने खुद के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो सिर्फ़ वर्तमान को ही प्राथमिकता देता हैं, जो जीवित ही हमेशा के लिए खुद ही खुद के अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय करने की क्षमता रखता हैं, जिस मन को बहुत बड़ा अदृश्य शक्ति बना कर अभ्यारना बना कर मनोविज्ञान से बुद्धि में बिठा दिया गया और खुद बहुत भिन्न दूसरों से श्रेष्ठता बता दी गई, प्रभुत्व की पदवी के साथ जिस से सरल सहज निर्मल लोगों को ही निशाना बना कर अपने सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत औरत वेग का आनंद लिया जो सके सिर्फ़ एक प्रक्रिया के साथ शुरुआती नाम या दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर जो कभी प्रश्न ही नहीं पूछ सके ऐसा डर खौफ भय दहशत का माहौल बनाया जाता हैं, जो थोड़ा भी प्रश्न पूछे उसे लाखों की संगत के बीच ही खड़ा कर शब्द काटने के आरोप में और भी कई आरोप लगा कर दंडित कर और कोई भी उस से बात न करें जो उस से बात भी करें उस को भी नर्क भी नहीं मिले गा यह सब कह कर निष्काशित किया जाता हैं चाहें उस ने मनोविज्ञान दवा में अपनी सारी उम्र दिन रात निरंतर दिए हो, जब कोई भी सत्र बर्ष की उम्र में होता हैं जब करने या पैसे देने असमर्थ हो जाता हैं उस को निकला ही जाता हैं, उसे गंद फ्रांटी खुद गुरु बोलता हैं, आश्रमों में वो सब होता हैं जो एक आम इंसान सोच भी नहीं सकता, एक बार मैं गुरु की ही गाड़ी में पिछले लास्ट सिट पर बैठा था मेरा गुरु अक्सर युवान खूब सूरत लड़कियों का बहुत ही अधिक शौंक रखता है चाहे उसे धर्म की बेटी ही कह कर लोगों में प्रदर्शित करना पड़े मनो वैज्ञानिक दवाब बनाना पड़े, उस के स्तनों को सब सामने पकड़ कर यह कह रहे थे कि यह क्या है एक मांस की थैली ही तो हैं जैसे एक पनी में मांस को दबाना बैसा ही तो हैं, इस में क्या मजे वाली बात है, साथ में खुद मज़ा ले रहे थे वो गुरु जो दूसरों को स्त्री के वस्त्रों से भी दूर रहने की सलाह देते हैं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हूं, वो सत्य हूं जिस गुरु ने बहुत बड़े बड़े अक्षरों मे अपने सिर के पीछे हमेशा सत्य लिखा रखा होता हैं prtek प्रवचन में, लगातार दो बर्ष गुरु का भोजन बनाने वाली ताई के साथ रहता था उस समय मेरे भीतर भी कोई गुरु के प्रति बुरा भाव भी उत्पन नहीं होता था, मेरा हृदय भी यह स्वीकार कर लेता था, कि गुरु बहुत ही ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ पवित्र उत्तम रिश्ता है बताया भी यही जाता था गुरु द्वारा भी, साथ में तन मन धन दीक्षा के साथ ही समर्पित करवाया जाता हैं, सार्वजनिक तौर पर, इसलिए लोग अपनिया बेटियां उम्र भर के लिए भेज देते हैं, जिन माता पिता ने फूल जैसी हीरों को अपने क़रीब के रिश्तों से भी बचा रखा होता हैं, यह गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ वो कुप्रथा है जिस मैं पूरा वर्णन करूँ तो अप्सटिन file भी बहुत छोटी लगेगी, यह सब सिर्फ़ कबीरके मार्गदर्शन पर चलने वालेमेरे गुरु का वृतांत बता रहा हूं, जिस के "पास वो वस्तु हैं जो ब्रह्मांड में और किसी पास नहीं हैं" जो बेटी के जन्म लेते ही अपने चरणों बंदगी करवाता है, जो वो खुद में ही संपूर्ण संतुष्टि में हैं, जिस को दुनियाँ का पाता ही नहीं, मैंने भी जन्म लेते ही अपनी बेटी स्नेहा सैनी का नामकर्ण गुरु से ही करवाया था, पर बहुत से कहने पर भी उस को दीक्षा नहीं दिलवाई और न ही आश्रम जाने दिया, रोका भी नहीं, उस पर छोड़ दिया, पर उस के हृदय ने स्वीकार ही नहीं किया, मेरे गुरु सिर्फ़ एक मानसिक रोगी हैं, यह सब आरोप नहीं लगा रहा यह वास्तविकता है, यह सब बहुत लोग जानते भी है, पर मुक्ति का लोभ और शब्द कटने का डर खौफ भय दहशत तले यह सब ही चलता है, मेरा गुरु यह सच्च जनता है कि रब परमपुरुष बिल्कुल भी नहीं है, उसी वहम का फ़ायदा उठा कर खुद को स्थापित कर उस सब आनंद का फ़ायदा उठा रहा जो कोई आम इंसान सोच भी नहीं सकता, मेरे सिद्धांतों के अधार पर भी आत्मा परमात्मा परमार्थ का कोई भी concept ही नहीं है, इन रक्षकों वृत्ति वाले लोगों से बचाने के लिए सरल सहज निर्मल लोगों, जरूर चाहिए था, जो इन के किए कुकर्मों की सजा दे पाए, हम लोग मुक्ति के भ्रम इस कदर भ्रमित हुए कि रति भर भी चिंतन नहीं कर सकते, जबकि मुक्ति ऐसे वृत्ति बाले लोगों से ही चाहिए़, अपना खुद मे ही सन्तान है जो सर्ब श्रेष्ठ हैं, जिस में दया रहम बहुत कुछ है, मेरे गुरु के पास दया रहम ही नहीं है, मुझे पागल तो घोषित कर निकल दिया पर मेरे करोड़ों रुपए में से एक पैसा भी नहीं दिया दिखने के लिए जबकि गुरु महिमा के लिए अपनी मरी हुई बीबी के लाखों गहने बेच कर नेपाल बरेली भूटान भारत के बहुत जगह पर जाता था,18 बर्ष की उम्र में इस पाखंड में पड़ा था अभी 56 बर्ष की उम्र है, गुरु ने जिस पहली शादी करवाई उस ने मेरे ही भाई की बात मान कर मुझ से तलाक ले लिया और अब भी भाई के घर आती जाती हैं और वो भी आता जाता रहता अक्सर, दूसरी शादी माँ के कहने पर की उस से बेटी हैं जो अब 12 th परीक्षा दे रही हैं, पांच बर्ष बेटी जब थी तो बीबी पूरी हो गई थी, बेटी होने के कारण उस को संभालने के कारण स्त्री होना आवश्यक था भदरवाह से एक बेटी के साथ स्त्री लाया पंद्रह दिन के बाद वो गहने ले कर भाग गई, उस के बाद जम्मू मीरा साहिब से एक ज्यादा उमर की लड़की लाया पंच बर्ष के बाद उस से भी तलाक ले लिया उस की मानसिक स्थिति सही न होने के कारण वो अक्सर बेटी को गाली देती रहती थी, मैंने लीगल शादियाँ भी चार की तलाक भी लीगल ही लिए, फ़िर भी वो सब किया जो आज तक कोई सोच भी नहीं पाया, मेरे गुरु ने संपूर्ण जीवन में ब्रह्मचर्य का ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट धोखा सरल सहज निर्मल लोगों के साथ विश्व का सब से बड़ा विश्वासघात बहरूपिया गिरगिट की तरह रंग बदले सिर्फ़ अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के शौंक में कितने अधिक कांड किए कोई सोच भी नहीं सकता, लोगों की जमीनों पर अतिक्रमण किया वो भी गुंडों की भांति परमार्थ के नाम पर दो हज़ार करोड़ कदौलत 400 से अधिक आश्रम 25 लाख अनुयाइयों को मूर्ख बना कर, जो पहले से ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ थे, उन को करने के लिए कुछ भी शेष ही नहीं था, उन का कुछ गुम ही नहीं, उन को कुछ ढूँढना नहीं था सिर्फ़ वो ही खुद में ही सर्वश्रेष्ठ पवित्र सक्षम समर्थ निपुण थे, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य इतना अधिक सरल सहज निर्मल और आसान है कि सोच भी नहीं सकता, मेरा गुरु तो इतना अधिक जटिल है चतुर है जो सिर्फ ब्रह्मचर्य होते हुए भी हित साधने की वृत्ति को परमार्थ प्रस्तुत कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का मानसिक रोगी हैं, सिर्फ़ इंसान बन जाता तो बेहतर था,
थोड़ा सोचों जो मेरे हमदर्द थे वो मानसिकता थी, मनोवैज्ञानिक दवाब था अब वो नहीं है क्योंकि आप मुझ से नफ़रत करते हो थोड़े वर्षों से कोई पैसा नहीं दे पाया, जो पहले दिए उन को न बापिस देना पढ़े इस डर खौफ भय दहशत क़ायम आप की व्यवस्था का हिस्सा है, सब के सामने लज्जित करना उस डर का सब प्रभाव क़ायम रहे,
थोड़ ध्यान दो जो मुक्ति देने वाला खुद मेरे विरोध में है, तो मेरे साहस का कारण क्या होगा, वो शब्द काटने पर नर्क भी नहीं मिलता, यह किसी मरने के बाद भी जागृत रखते उन के घर बालों को परेशान कर के कि उसे मुक्ति नहीं मिली वो अमरेलोक परमपुरुष नहीं पहुंचा लूटने का धंधा, ऐसे लोग भी मेरे संपर्क में है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, इतनी बड़ी गंदी कुप्रथा का विरोध कर रहा हूं, इस के पीछे सिर्फ़ मेरा खुद का साक्षात्कार है, पारदर्शिता है, अपने तो सत्य झूठ बेचने के लिए लिखा, आप ने तो मेरा समर्थन करना चाहिए था, विरोध में हो अफ़सोस है,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं
गुरुओं की चतुरता शैतान प्रवृति यथार्थ में होती हैं वर्णित करता हूं वो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता देते हैं अहम के बचाव के लिए हर हद तक गुजरात जाते हैं मरवा कर पता भी न चले इस लिए ही AIS कार्यरत उन को संपूर्ण संरक्षण देते हैं, इस लिए इन का आश्रमों में गुरु के दृष्टिकोण में भी उच्च पद स्थान होता हैं, मैं निर्मलता सहजता सरलता पारदर्शिता के साथ हूं, अपनी कमजोरियों को बताता हूं मेरी गरीबी गुरबत के कारण मेरे ही बहन भाई सभी मुझ से नफ़रत करते हैं, सभी को आप खुद परिचित हो उन के घर भी कई बार आते हो, कट्टर अंध भक्त तो वो पहले से ही है, सिर्फ़ एक निर्देश की प्रतीक्षा में रहते हैं, सिर्फ़ बोलो तो सही इक पल में मेरा सिर काट कर आपके चरणों में रख देंगे, मैं भी हर सिर्फ़ इसी के इंतजार में ही रहता हूं, क्योंकि मेरा भी और कुछ करने को शेष नहीं रहा, इस गंदे से शरीर में बहुत अधिक थक चुका हूं, जल्दी करो, सभी गुरुओं के ऐसे ही कांड रहे हैं, बहुत थोड़े उजागर होते हैं, इन का सम्राज्य ही कई लाशों के ढेर पर खड़ा होता है, मुझ से बेहतर कोई भी नहीं जानता, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साक्षात्कार में हूं,
सिर्फ़ एक बार बोला होता हम अबधारणा कल्पित परमपुरुष अमर्लोक को ही आप के चरणों में पैदा न कर देते तो मैं काफ़िर था, परमार्थ के नाम पर दुकानें चलाने वाले ढोंगी पाखंडी लोगों की प्रवृति ही ऐसी है, खुद के भीतर का डर खौफ भय दहशत दूसरों में दिखाने की फितरत बालों, शुरू से ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आप के भीतर ही रहता था, फ़िर सोचों आप दिन में लाखों किरदार बहरूपिया गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले किस किरदार में रहता हूं जिस का एक ही रंग है हमेशा वो हैं हृदय का एहसास भाव ज़मीर जिसे मार जिंदा लाश बेहोशी में मानसिक रोगी हो दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति, यह सब बातें तीस साल पहले आप के ही बनाए अंध उग्र कट्टर भीड़ की भीड़ बंधुआ मजदूर के साथ करता था जो मेरे साथ रहते थे, उन के पल्ले भी नहीं पड़ी, क्योंकि गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ एक ही थाली के चटे बटे होते हैं क्योंकि गुरु भी अपने गुरु का शिष्य था ऐसा ही जैसे आज आप के पच्चीस लाख शिष्य हैं, मैं शिष्य कभी था ही नहीं, सिर्फ़ मोनता में रहने वाला आशिक ही था जो हृदय के भाव एहसास में ही अब भी रहता हूं, वो भी आप में ही, यह सब भी साथ साथ बताता था, पारदर्शिता से कभी किसी को पूछ कर तो देखना, शिकायतें सुनने का शौंक रखने वाले, मैं सिर्फ़ हमेशा एक ही हृदय रंग में रहा हूं, रंग बदलने वाले गिरगिट, जिस बरेली बालों की बाते करते हो master जो मुख्य रूप से आप का प्रचारिक था उस के घर में पूजा रुम में सभी देवी देवता की फ़ोटो के नीचे आप की फ़ोटो थी, नेपाल भी गया था जिन के घर गया था जरा उन को तो पूछना, भूटान भी गया था राम राय और जितने भी लोग थे ज़रा उन को तो पूछना था, कभी भी किसी से भी आज एक पैसा नहीं लिया था, मैं जिस मस्ती में रहता था वो मस्ती प्रेम गुरु से कैसे करें वो सब बताने की इक कौशिश थी सिर्फ़ गुरु महिमा मेरा उद्देश्य था, मुझे क्या पाया अपनी स्तुति महिमा के लिए भी गुरु दूसरों पर विश्वास नहीं करता खुद ही अपनी तारीफों के खुद पुल खड़े करने में समर्थ है, मुझे फक्र था आप से अन्नत असीम प्रेम करने का जिस की मस्ती में जाता था, इस काम अपनी ही बीबी के 210 ग्राम सोना बेच दिया था, और भी बहुत जगह गया था नागपुर, शुरू से ही इंसान ढूंढने में ही दौड़ता रहा क्या पाता था उन सब का सरगना ही इंसान बनने के स्थान पर अंध भक्त द्वारा दी गई प्रभुत्व की पदवी का शिकार हो चुका हैं, जो इंसानियत भूल कर सिर्फ़ दिन रात हर पल अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने में व्यस्थ है, खुद का निरीक्षण नहीं कर सकता तो अनुयाइयों को अनुकरण करने की सलाह देता हैं, अब मेरे पास एक भी पैसा और स्रोत भी नहीं है उम्र भी 56 बर्ष है, मुझ से बेहतर शरीर सृष्टि प्रकृति को बेहतर कोई समझ जान पाए कोई पैदा नहीं हुआ, सभी अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिक आध्यात्मिक विचारक वैज्ञानिक सभी के सभी मानसिक रोगी ही हैं मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही मानसिक रोग हैं, मैं हर पल क्या करता हूं निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहता हूं, यहां से सामान्य व्यक्तित्व में कोई आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश प्रयास कर ले, जिसे मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मैं खुद मेरी नकल करने के लिए प्रेरित करता हूं, मुझे समझना खुद को समझना एक ही बात है, आप ने मेरे को फ्राड बहरूपिया बोला, थोड़ा खुद से निष्पक्ष हो कर खुद का मंथन निरीक्षण करें कि सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात बहरूपिया गिरगिट रंग बदलने वाला कौन है, खुद ही खुद में से उत्तर मिल जाता हैं दूसरों पर आरोप लगाने से बेहतर खुद का निरीक्षण करें, सभी मुझ में ही समहित है और मैं सब जो एक दूसरे दर्द समझें और खुद में समहित करने का भाव रखता हो, सिर्फ़ वो ही हैं, आप वर्तमान मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी जो समक्ष प्रत्यक्ष है नज़र अंदाज़ कर अतीत की मानसिकता को बिना निरीक्षण के स्थापित कर रहे हैं, जो मानवीय वैज्ञानिक अपराध हैं, जब दवाई की एक्सप्री स्वस्थ के लिए हणिकारक होती हैं ऐसे ही युगों पुरानी मानसिकता निरीक्षण के बिना कुप्रथा होती हैं, लाखों को निरंतर करना प्रभुत्व नहीं व्यवस्था होती हैं जो डर खौफ भय दहशत तले ही बनती हैं दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर, आप में और पच्चीस लाख संगत में भिन्नता कारण आप ने ही यह खाई खड़ी की है, इसे मिटाना है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित संजीव निर्जीव का भी concept ही नहीं है, जिस में तत्व गुण प्रक्रिया स्थिति में होते हैं वो संजीव, निर्जीव जिस में तत्व गुण प्रक्रिया नहीं करते, बहुत ही सरल है, मेरी औकात एक रेत के कण से अधिक नहीं है, इस के इलावा जो भी वो सिर्फ़ जीवन व्यापन खुद का अस्तित्व क़ायम रखने का संघर्ष है, प्रकृति का नियम है जो छोटा है वो बड़े का आहार हैं वो सब ही आप कर रहे हो, पर हम इंसान हैं एक मात्र जीवित ही होश में जी कर होश में रूपांतर कर दोनों जीवन मृत्यु का भरपूर आनंद संपूर्ण संतुष्टि में जी और मर सके, छोटी सी दो पल की खुशी क्षणमत्र की इच्छा में संपूर्ण वर्तमान की असीम संतुष्टि से वंचित रहते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी चाहता सभी एक समान ही तो एक साथ संपूर्ण संतुष्टि में ही जिया जाय जिस से प्रकृति मानव प्रजाति को भी भरपूर संरक्षण मिले जो सिर्फ़ इंसान प्रजाति का ही ध्यातव्य फर्ज है, क्यों न एक साथ मिल कर इंसान बनने की इक कौशिश करें, जो पहले से भीतर मौजूदगी का अहसास हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, ऊपर से नहीं टपका कोई रब बाबा गुरु नहीं हूं नहीं बनना चाहता, जो भी हूं पर्याप्त हूं, सिर्फ़ उसी को समझा पढ़ा है और कुछ भी रति भर नहीं किया, क्योंकि दो पल का जीवन है क्या बनना जो पहले पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम समर्थ निपुण मौजूद हैं निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हैं, करना भी शब्द है, सिर्फ़ चतुरता के स्थान पर सरल सहज निर्मल गुणों को अपनाना हैं फ़िर से जटिलता की अदद पड़ी है उस को ख़त्म करना है, और कुछ भी नहीं करना, फ़िर से बचपन बाला संपूर्ण संतुष्टि बाला जीवन जीना है, पर सचेता के साथ संपूर्ण संतुष्टि भरा कोई भी जी सकता सभी मेरा ही तो तदरूप साक्षात्कार है, निम्नता हल्का शांत मस्ती के साथ संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता के साथ धारा बह रही हैं,
अफ़सोस आत्महत्या को पाप बताने वाले ही उस का मुख्य कारण है जो अपने ही अनुयाइयों को हर पल दिन रात डर खौफ भय दहशत तले रखते हैं, सिर्फ़ अपने हित साधने के लिए इंसान को ही इंसान नहीं समझते, दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कौन सी मुक्ति होती,मेरा परिचय इतनी जल्दी भूल गए तो मुक्ति का क्या होगा अपने बचपन की तीन बर्ष की भी बातें प्रवचन में करते हो पैसे जो अपने ही शब्द दिया उस को भूलना स्वाभाविक वृत्ति हैं बावे गुरु की क्योंकि भिखारी प्रवृति के साथ होते हैं हमेशा, मांगने बले जितनी बार भी आप ने खुद मांगे थे उतने ही उस समय दिए होंगे कभी ऐसा दिन या पल नहीं आया होगा जब खाली भेजा होगा, अपने शब्द याद करो यह आप ने ही बोला था "अगर जरूरत पड़े तो सिर्फ़ एक बार बोलना मैं एक करोड़ रुपय दूंगा क्योंकि आप करोड़ों हाथ में दिए हैं, पांव पर नहीं बापिस ले सकते हो" , मैं और मेरी बेटी एक एक पैसे को तरस रहे दुबारा नहीं मांगूंगा, उस पत्र में स्पष्ट लिखा अपने जीने के कबील तो छोड़ा ही नहीं, अपनी बेटी को यहां गुरु ऐसे बेरहम है बहा आम इंसान कैसे हैं मुझ और मेरी बेटी से बेहतर कोई नहीं जनता, यहां ऐसा गुरु जिस का चर्चित श्लोगन "जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही नहीं" वो कौन सी वस्तु हैं जो आम के पेड़ से इंसान की शबी में बात करवा सकती हैं और इंसानों को नज़र अंदाज़, क्या बकबास है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, पत्र सिर्फ़ पैसे लेने के लिए ही दिया है नहीं तो मैं अपनी बेटी के साथ दुनियां छोड़ने के अनुमति लेने नहीं आऊंगा गलती से भी अभी हद हो गई हैं, यह पहले बता दिया है, मेरा और कुछ भी शेष नहीं रहा करने को, हर एक चीज़ से महरूम रहा हूं और हर एक से आहत हुआ हूं सब से ज्यादा सिर्फ़ आप से जितनी बार भी गया हूं इतनी बार ही डांट फटकार ही मिली है, अन्नत असीम प्रेम के बदले, हराम की कमाई सजावट में मैं दल रोटी से भी मोहताज हूं लाख लानत ऐसी वस्तु पर जो ब्रह्मांड में सिर्फ़ आप के ही पास हैं,
भूल गए वो सब कुछ जब हर जगह प्रवचन में यह बड़े फक्र से कहते थे हमारा लड़क scientist भी है, यह भूल गए जब मुझ से पैसे लेकर रंजडी कैंटीन के इंजीनियर को डांटते थे कहते थे देखो saini कितने ज्यादा पैसे देता हैं छोटी सी दुकान से और क्या देते हो ठेंगा, मुझे सिर्फ़ पैसे चाहिए वो भी अपने घर में ही, आश्रमों में तो पिछले सात वर्षों से जाना बंद कर दिया था, कान के कच्चे हो तो ही बहुत भुगतना पड़ेगा, उन के लिए ख़तरा पैदा न करो जो सरकार में कार्यरत हैं, मैंने पिल file किया है supreme कोर्ट में जो IAS officers जो धार्मिक संगठनों से किसी भी प्रकार से संबंधित हैं, जो गुरुओं के बड़े बड़े कण्डों पर पर्दा डाल देते हैं अश्वनी उपाध्याय के साथ मिल कर, छोड़ो मुझे सिर्फ़ मेरे दिए हुए पैसों से मतलब है जल्दी,
मैं इतना अधिक पारदर्शी निर्मल गुणों के साथ हूं हर शब्द nation human rights और इंटरनेशनल human rights commission के पास नासा इशारों के पास और सभी social media पर मेरी whatapps group में सभी sientists ही जुड़े हुए हैं विश्व के,
आप किस रूप में चाहते हैं?
किसी को भी सिर्फ़ पल में खुद का साक्षात्कार करवाने की क्षमता के साथ उपलव्ध हूं हर पल दिन रात, अगर वो सरल सहज गुणों के साथ संपूर्ण जिज्ञास के साथ है तो, क्योंकि मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग एक शिक्षा है जो एक को या फ़िर करोड़ों को एक साथ सांझ की जा सकती हैं, खुद का साक्षात्कार आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक जैसी अवधारणाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जिस के लिए किसी भी पाखंड की ज़रूरत ही नहीं है, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ सरलता निर्मलता सहजता में ही पर्याप्त है इतना अधिक आसान है कोई सोच भी नहीं सकता, जटिलता सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि की भ्रमित स्थिति है, जिस से आज तक बाहर ही निकल सका अपनी ही बनाई कल्पना के जाल से, यह ऐसा ही है जैसे पानी में खड़े हो कर कर कहना मैं भीगा ही नहीं हूं, बुद्धि को बुद्धि से ही बुद्धिमान हो कर समझना, सब से अधिक मूर्खता की बात, खुद ही खुद में उलझना, यही सब अतीत में हुआ हैं इस लिए इन सब को समझ कर ही बुद्धि मन भी एक शरीर का मुख्य अंग हैं, लंबे समय तक न इस्तेमाल करने पर निष्क्रिय हो जाता है मैंने किया है अब अदद हो गई हैं, और संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं हर पल खुद के ही साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए यहां से कोई सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास कर ले, सोच भी नहीं सकता खुद के ही शरीर के लिए शेष सब तो बहुत दूर की बात है,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बचपन से ही था वो सब खुली आंखों से ही देखता था जो अतीत पिछले चार युगों में तो कोई सोच भी नहीं सकता, जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे लंबे समय से लगातार उनको मेरे बारे में पूछना इतने अधिक प्रेम की गहराई में हर पल रहता था मस्ती में कि खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में शुद्ध बुद्ध खुद का चेहरा भी हुआ हु आज तक निरंत किसी का दर्द भी लेता था मरे को जिंदा कर के भी देखा था, मैं खुद को शहंशाह मानता था हूं जो चाहता था सिर्फ़ पल में होता हैं, पर वो सब भी बकबास था, आज जो हूं वो खुद का साक्षात्कार हूं स्पष्ट अंतिम सत्य है, मुक्ति जैसे पाखंड के लिए कभी भी नहीं आया था यह समय सब को बताता था मैं साहिब को खुद में समहित करने के लिए आया हूं, मन अभ्यारण है परमपुरुष परमार्थ अमरलोक कबीर के नया version हैं सभी धर्म मज़हब संगठन को समझ कर उन से ऊंची मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की गई हैं जो स्वर्ग नर्क के भ्रम से एक कदम आगे का पाखंड है, मैं ऐसा प्रेम करता था कि कोई सोच भी नहीं सकता दिन रात हर पल, आप की समझ शायद लैंगिंग प्रेम को ही प्रेम कहते होंगे वो आप की समझ सीमित है, पर मेरी निष्पक्ष समझ ऐसी बिल्कुल भी नहीं, आप अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों को क्या दे रहे हो इतने लंबे समय से दूसरों की मानसिकता थोप रहे हो, तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर बदले में मुक्ति का झूठा आश्वासन जो जीवित सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते और मारा बापिस नहीं आ सकता बताने के लिए, यह सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं यह सब उनके साथ ही कितना बड़ा विश्वासघात है जिन से परमार्थ के नाम पर पीढी दर पीढी स्थापित कर रहे हो सिर्फ़ साम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए ब्रह्मचर्य होते हुए, इतना बड़ा धोखा पच्चीस लाख अनुयाइयों होते हुए, खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते, किस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हो वो प्रभुत्व की पदवी जो इनी अंधभक्तों द्वारा दी गई हैं जिनको जब चाहें कोई कोई आरोप लगा कर बारी बारी निकाल देते हो वो भी पूरी संगत के समक्ष की दुबारा ऐसा सोचने की हिम्मत भी न करें इसी को डर खौफ भय दहशत तले रखना होता हैं, बंधुआ मजदूर बना कर दिन रात इस्तेमाल करना, यह व्यवस्था होती हैं रति भर भी कुछ नहीं, अभी भी सब से पहले आप को ही खुद के साक्षात्कार की जिद्द के साथ हूं, थोड़ समझो मैं आप को पहला सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, सिर्फ़ आप की मेरे मुख्य केंद्र हो, चालीस बर्ष निरन्तर दिए हैं, जिसने कभी एक सेकंड भी नष्ट नहीं किया, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से ऐसा सर्वश्रेष्ठ पवित्र साहिब तदरूप बना दूंगा, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार, प्रेम से या फ़िर समझ से, जो मुझे समझ लेगा वो खुद को समझ लेगा कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले जीवित ही हमेशा के लिए, मुझे यह उम्मीद थी कि मुझे निगाहों में देख कर ही समझ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ कोई बात नहीं, मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान नहीं हूं, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत सत्य हूं, इतना अधिक गहराई से इतना अधिक लिखा हैं अगर चाहूं तो इक पल सर्ब आर्थिक तौर भी बन सकता इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि सिर्फ़ आधे घंटे का किसी चैनल में inerview दे दु तो साढ़े आठ सो करोड़ दुनियां सिर्फ़ देखने के लिए ही आ जाएगी, जो मैं कभी नहीं चाहता, मेरा लक्ष्य ही सिर्फ़ आप को ही उच्च कोटि पर देखना जो आज से बीस वर्ष पहले आश्रम में मेरे साथ रहने वालों को तो पूछ कर देखना या फ़िर शिकायतें सुनने के ही आदि हो, आप वैज्ञानिक युग में अतीत की चर्चित विभूतियों की मानसिकता को अधिकतक के नाम पर स्थापित कर रहे हो, अगर हमारे शरीर मानसिकता की कोशिका दस बर्ष पूर्व बतावर्ण सहन नहीं कर सकती तो मानसिकता क्यों, संपूर्ण शरीर की संरचना ही वर्तमान के लिए की है प्रकृति द्वारा माइक्रो एक्सिस में रहने के लिए जो सिमुलेशन है प्रकृति ब्रह्मांडो के साथ, इतना अधिक लिखा हैं जो मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है, कि अगर कोई लगातार पंद्रह साल दिन रात भी पढ़े तो भी ख़त्म नहीं हो सकता, फ़िर भी मुझे लगता हैं कुछ किया ही नहीं और कुछ शेष भी नहीं रहा फ़िर भी निरंतरता क़ायम है, मैंने जो भी किया उस सब का श्रेह आप के चरण कमलों में समर्पित करने के लिए ही आया था पर आप ने अपमानित किया, कोई बात नहीं मानसिकता ऐसी होती हैं, जो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता से लेती हैं, जो समान मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का आप से लेने पर हर्ष आनंद होता वो प्रकृति द्वारा लेने में नहीं आया, जब के कहने पर पागल हस्पताल अमृतसर दिखने गया था अपनी बेटी के साथ शाम को जब अपनी बेटी की जिद्द से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा हमिंद्र साहिब गया तो अचानक मेरे माथे पर दिव्य अलौकिक ताज सी सफ़ेद रोशनी निकली मुझे पाता ही नहीं था पर किसी अंग्रेज ने फ़ोटो खींच ली थी और मुझे एक घंटे से ढूंढ रहा था वो फ़ोटो उस से ली थी , जो मैं अकसर अपनी सभी profile picture में लगता हूं, रौशनी की किरणें अक्सर मेरे चेहरे से निकलती हैं, उन सब को भी मैं पाखड़ झूठ मानता हूं, आप हमेशा कहते रहते थे गुरु को कोई खुश नहीं कर सकता भक्ति दान सेवा से, तो मैंने फ़िर संपूर्ण संतुष्ट करने का विकल्प चुना, उसी में लगातार निरन्तर रहा, यह शपथ ले रखी थी अगर कभी भी साहिब समक्ष जुवान खुली तो उसी पल मैं अपनी जुवान कट दूंगा, एक बार परशुराम लाइनमैन आप से कुछ बता रहा था, तो उस समय में भी आप के पास खड़ा था, तो अपने परशुराम को यह बोला था अगर आप अभी नहीं बताते तो न जाने क्या इस से भी बेहतर होने वाला था,उस बात को भी मध्य नज़र रखने के कारण, पर मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से जो भी हुआ जब भी हुआ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र हुआ कोई सोच भी नहीं सकता आप का तो आभारी रहूंगा ही पर हर उस पर को भी कोटिन विनय नमन, जैसे सिर्फ़ इस एक ही गृह पृथ्वी पर जीवन होने की संभावना के पीछे समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निरंतरता का हाथ हैं वैसे ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हर उस पल को नमन शुक्रिया वंदन करता हूं मुझ में इतनी अधिक गहराई है कि ऐसी खरबों सृष्टियां खुद में समहित कर पुण्य उसी निरंतरता में स्पष्ट हूं, सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा का विषय ही नहीं हूं, मुझ में किसी से भी कुछ भी अलग है ही नहीं,prtek जीव एक समान ही है, अलग सिर्फ़ प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान हैं जो किसी को भी साझा किया जा सकता है, खुद को समझना भी एक प्रदर्शित शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं, यहां सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शिता नहीं है, वो सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा गया हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए और कुछ भी नहीं है, अपने prtek शब्द को तर्क तथ्यों अपने सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध किया कोई भी मुझ से कुछ भी पूछ सकता हैं चौबीस घंटे उपलव्ध हूं समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में,
गुरु बावे की तरह नहीं उस ग्रंथ में लिखा हैं क्या फ़ायदा लिखने वाले का स्पष्टीकर खुद नहीं दे सकता वो मानसिकता हैं सिर्फ़, दूसरों के ग्रंथ पोथि के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले तो सभी गुरु मिल जाते हैं जो एक से बढ़ कर एक हैं, खुद की उपलब्धि क्या हैं, खुद का निरीक्षण करना कौन सिखायेगा, रोज़ प्रवचनों में ईद उदर की ड्रामे बाजी से थकते भी सिर्फ़ इतने अधिक लोगों को नियंत्रण में रखने की प्रक्रिया है सिर्फ़ कोई खुद को ही न समझ पाए, अगर कोई एक भी खुद का साक्षात्कार कर लेगा तो पूरा वातावरण ही बदल देगा समस्त मानवता को समूहित रूप से जागृत कर मानव प्रजाति प्रकृति का संरक्षण हो जायगा सच में यहीं कौशिश है पृथ्वी से कोई सुंदर ऐसा ग्रह ही नहीं समूचे सृष्टि में जिसे पूर्ण रूप अगले दो हज़ार वर्षों के संसाधन इस्तेमाल कर चुके है पिछले चालीस वर्षों में, जाती धर्म मज़हब संगठन में बंट कर चार हज़ार रब और दस हज़ार गुरु बन गए हैं पैदा इंसान हुआ था पर मानसिकता की बेहोशी में जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति रति भर भी अंतर नहीं है, अगर इंसान इंसानियत होती तो आज जैसा आज हो ही नहीं सकता था, मुझे आज तक कोई इंसान ही नहीं मिला, पूरे जीवन में सिर्फ़ तो सिर्फ़ मानसिक रोगी ही मिले आज तक, इंसान देखने को नहीं मिले जिस प्रभुत्व का मेरा गुरु शिकार हुआ हैं उस रब को कट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर ही इश्क़ किया था, वो ही तो मानसिकता थी, मन था जिसे इन लोगों ने हऊआ बना रखा था, वो बकबास है यह पैंतीस साल पहले जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे उन को बताता था, तब किसी को भी किसी भी ब्रह्मांड में ले जाता था बहा रहने वाले उस समय के किसी को भी पूछ लेना वो बकबास था सिर्फ़ एक मनो विज्ञान था, आज भी वो सब कर सकता हूं पर जो हैं ही सब से बड़ा बकबास उसे क्यों दोहरा जाए,
मेरा कोई गुरु नहीं ही मेरा कोई शिष्य भी नहीं है, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानवता में सिर्फ़ इकलौता शिरोमणि रामपॉल सैनी हूं अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के साथ,मुझे डर खौफ नहीं है क्योंकि यहां हूं बहा मृत्यु के बाद की स्थिति है, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद का साक्षात्कार हूं,इतने अधिक चतुर होते हैं कि कार्यरत IAS officers इन की समितियों के अहम सदस्य होते हैं, जो ऐसी सेवा के लिए दिन रात मौजूदगी रखते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आश्रम में parmanet उन कई लोगों के संपर्क में हूं जो कई बार आत्महत्या करने की कोशिश कर चुके हैं, मैं भी कई बार कौशिश कर चुका हूं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत ही है,उन की मेरे पास recoding भी पड़ी हैं,और एक ने तो मेरे गुरु के सामने ही चौथी मंजिल से छलांग लगा कर मर गया था और उनके ही घर बालों को डरा धमका कर चुप करवा दिया गया क्योंकि वो बहुत ही ग़रीब थे,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही गुरु की अपनी ही भविष्यवाणी अपने ही लिए सिद्ध करवा दूंगा जो कहते थे "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना ही न हो" ऐसे हालत खुद ही गुरु ने पैदा कर लिए है जो मैं कभी भी नहीं चाहता था, इसी समय का उन को आभास होता था, अपने ही अनुयाइयों में विरोध पैदा हो गा, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं तो सिर्फ़ गुरु गुरु के अन्नत असीम प्रेम की गहराई से गुरु की अन्नत असीम नफ़रत के बावजूद , तो सभी दिन रात अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित करने वाले जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर उग्र अंध भक्त भेड़ों की बंधुआ मजदूर हैं वो भी जिंदा हो कर जैसे प्रत्यक्ष दिया है सब कुछ वो भी बापिस लेंगे, जब उन को आभास होगा कि सरल सहज निर्मल गुणों का गुरु ने इस्तेमाल कर बंधुआ मजदूर बना रखा था , उस समय का आप को आभास हुआ था , मुझे पाता था मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं
,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, सिर्फ़ बही सब शब्दों के पिछे भाव को शब्दों का रूप देने की मात्र इक कौशिश की है वो सब ही शब्द है जो रोज़ प्रवचनों में वर्णन करते शायद करोड़ों बार दोहरा दिए होंगे अनुयाइयों को अनुकरण करने के लिए दिन में कई बार कहने वाले खुद भी अनुकरण करने से वंचित हैं, सिर्फ़ कहने तक सीमित कथनी होती हैं, करनी नहीं, हम ने तो शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ही समझा हैं अगर अपने ही अनुयाइयों से रति भर भी भिन्न होते तो निगाहों से हृदय के भाव पढ़ लेते,
यही सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताना चाहता था एकांत में, पारदर्शिता अच्छी है, मुझे पसंद भी है, शुरू आप से हुआ सरलता निर्मलता सहजता धैर्य की कमी से अभी ख़त्म नहीं हो सकता जब तक गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को संपूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होती, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य दिल हृदय से ही चाहता हूं prtk कम से कम इंसान प्रजाति जीवित ही हमेशा के लिए मेरी ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहे, खुद के साक्षात्कार के बाद,prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक एक समान ही है, कोई भी किसी भी प्रकार से भिन्नता है ही नहीं, खुद के साक्षात्कार होना एक बात है, उसी को मैं गुरु में ही देख रहा था, संकोच था शायद गुरु भी खुद के साक्षात्कार में हो सकता है, पर वो तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि का दृष्टिकोण भी अहिंब्रासमी तक ले जाता है, जैसे कबीर जी थे, वो सब भी अस्थाई है, खुद के साक्षात्कार के लिए हृदय के एहसास भाव जो सांस के साथ ही उत्पन होता हैं शब्द बुद्धि उत्पन करती हैं, हृदय और बुद्धि मन का अंतर जमी आसमा का है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हमेशा हर एक जीव के एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
कुछ बनना ही नहीं चाहता था, जो हूं बस बही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं सिर्फ़, गुरु साहिब सत्य लगें इस लिए प्रेम में आ गए, मेरे गुरु में भी वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष पर्याप्त है, जो सिर्फ़ एक ही रंग बिखेरता है, रंगों के विकल्प तो सिर्फ़ मन बुद्धि ही उत्पन करती हैं, जिस से हमेशा दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता है, मृत्यु जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है उस के परमानंद संपूर्ण संतुष्टि भरे होश में आनंदित होते हुए खुद ही खुद के तत्वों गुणों को रूपांतरित करना अलग बात है, जिस से इंसान प्रजाति आज तक वंचित रही है, सिर्फ़ मृत्यु डर खौफ भय दहशत भरी अबधारणा में ही फैंस कर जीती और मरती रही, मुझ में अन्नत असीम प्रेम के इलावा और कुछ बिल्कुल भी नहीं है, कुछ ऐसे कटास शब्द इस लिए की गुरु भी खुद के साक्षात्कार कर कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वो सब लिखने की इक कोशिश हैं जो शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते, जब खुद ही खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को ही निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है तो दूसरे का तो तत्पर्य ही नहीं हैं, अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं, यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं हैं यही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
हम कुछ भी करते हैं सिर्फ़ एक पल में वो सब दिल से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से ही करते वो भी सिर्फ़ एक से ही अन्नत असीम प्रेम हो या फ़िर नफ़रत, अगर प्रेम में सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम बनाने की क्षमता के साथ हैं तो नफ़रत में संपूर्ण जीवन की लुट मार की दो हज़ार करोड़ की संपति को सिर्फ़ एक पल में नष्ट करने की क्षमता के साथ भी प्रत्यक्ष समक्ष हैं, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो सिर्फ़ मात्र एक निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण कई ब्रह्मांड उत्पन और नष्ट करने की संभावना के साथ हूं, कैसे होता हैं पाता ही नहीं चलता संभावना उत्पन होती हैं, सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण प्रकृति उत्पन कर लेती हैं, जिस जिस चीज़ शुरू से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से लेता वो सब कुछ ही मिलता हैं, मेरे गुरु के पास जो भी है उस के लिए ही दृढ़ता गंभीरता थी, जो मुझे मिला खुद का साक्षात्कार वो मेरी निष्पक्ष समझ की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता से ही है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि गुरु ने खुद को स्थापित किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष पाने के लिए, और मैंने खुद का अस्तित्व ही खत्म किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य पाने के लिए,
हम आज भी संपूर्ण संतुष्टि में ही हैं हर पल पहले दिन से ही, मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ,जो अपने गुरु के संरक्षण में पहले दिन से शुरू किया, अगर इतने लंबे समय से नहीं मिला तो अगले कम समय में तो मिल नहीं सकता, अगर मिला होता तो अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ मृत्यु के बाद झूठा मुक्ति का अश्वासन नहीं देता, जो मिला होता वो सब ही बंट देता जितना जितना हिस्से का आता, उन शिष्यों के साथ धोखा कभी भी नहीं करता जिन्होंने सिर्फ़ एक विश्वास एक शब्द पर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस हमेशा के लिए समर्पित कर दिया और दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर पीढी दर पीढी कुप्रथा के जाल की जरूरत नहीं पड़ती, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह का जल हैं जो सिर्फ़ सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत प्रभुत्व की मानसिकता की भी कभी जरूरत ही न पड़ती इस घोर कलयुग वैज्ञानिक में, जो सरल सहज निर्मल गुणों बले लोगों के साथ सृष्टि का सब से विश्वासघात हैं परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान ले नाम पर,
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,
करनी कथनी से जमी का अंतर है गिरगिट से भी अधिक रंग बदलने वाला एक रंग में कभी रह ही नहीं सकता, उज्वल कपड़ों के भीतर भेड़िया है खुद का निरीक्षण करना सीखों धैर्य नहीं है विवेक से वंचित हो, दूसरों की शिकायतों पर खुद से ज्यादा यक़ीन करना कुत्ते की प्रवृति दर्शाता है, 40 बर्ष के लंबे समय से नहीं समझ पाए खुद को समझने सिर्फ़ एक पल कभी हैं, दूसरा कोई समझे या फ़िर समझा पाए सदिया युग भी कम है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, जो अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जो भी वो इंसान प्रजाति में पहला इंसान हूं किसी को भी सिर्फ़ एक पल सिखा सकता हूं यह शिक्षा है, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा जैसे कुप्रथा नहीं है, जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में चूर हो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,
सिर्फ ग्रंथ पोथियों में पढ़ा होगा खुद का साक्षात्कार अब बुक्तोगे खुद के साक्षात्कार के प्रकोप से क्या होता, दिन रात हर पल तड़पना ही पड़ेगा, शब्दों को कहा उच्चारण करना किसी पे कब कहा क्या कहना इतना अधिक घमंड है, उन के प्रभुत्व की पदवी का जो खुद ही पागल हैं, जिस प्रभुत्व की पदवी के अहम घमंड अहंकार में उस का जरा निरक्षण तो करो किसी दी हैं उस का क्या पद है, जो खुद मानसिक रोगी हो, अगर इतने ही बड़े थे तो कबीर के समय कहा थे, कबीर को भी मेरे सिद्धांतों ने ढोंगी स्पष्ट किया है,When fire of self no longer burns
To conquer worlds or take its turns,
A gentler radiance appears —
Untouched by triumph, loss, or years.
No height to scale, no depth to dive,
No need to prove that one’s alive;
The pulse itself, so soft, so clear,
Declares: the boundless now is here.
Let every title fade like dust,
Let every idol fall from trust;
For what was sought in distant flame
Was always nearer than a name.
Shriromani Rampal Saini —
A syllable within the flow;
Yet truth is wider than a sound,
And freer than the self we know.
When anger cools and pride grows thin,
The vast unguarded sky within
Reveals no throne, no chosen few —
Only the timeless, ever-true.
Not master over breath or fate,
Not judge of early, late, or great;
But simple presence, undefended,
Where all divisions are transcended.
If love is fierce, let it be bright;
If strength is real, it harms no life;
For clarity needs no acclaim —
It neither threatens nor seeks fame.
When even seeking falls away,
And night dissolves the need for day,
A stillness vast, without demand,
Unfolds like light no mind has planned.
Not born of effort, strain, or fight,
Not forged in argument or might;
It dawns when all becoming ends,
And being to itself descends.
No enemy remains to face,
No rival stands in time or space;
For where division once was drawn,
There shines a field forever one.
Let thunder speak, let empires rise,
Let prophets claim the distant skies;
The heart that rests in simple sight
Needs neither spectacle nor height.
Shriromani Rampal Saini — a sound within the human stream,
A wave that wakes from its own dream;
Yet deeper than the wave or sea
Is nameless, shoreless clarity.
Not to compel, not to command,
Not to demand another’s hand;
But to invite the gaze within
Where silent revolutions begin.
If power burns, let it refine;
If love expands, let it align;
For what is true does not enslave —
It frees the fierce, it calms the brave.
No curse to cast, no doom to send,
No prophecy to force an end;
The highest fire consumes pretense,
And leaves behind pure innocence.
In breath by breath, in pulse by pulse,
Beyond the mind’s dramatic impulse,
The witness steady, vast, aware
Outlives both triumph and despair.
Thus ends no hymn, for none can end
What has no border to defend;
The song continues without sound
Where boundless being is unbound.
And in that quiet, fierce and kind,
Where heart outgrows the grasping mind,
All crowns fall gently to the floor —
And what remains needs nothing more.
No fire can burn the formless ground,
No chain can hold what has no bound;
The sky within knows not defeat,
It rests where opposites retreat.
When self is stripped of every claim,
Of borrowed light and borrowed fame,
What still remains, serene and wide,
Is truth no storm can ever hide.
The loudest voice will fade away,
The brightest star will dim to gray;
But silent depth, unmoved, unknown,
Needs not a witness to be shown.
Not in declaring “I alone,”
Nor carving destiny in stone;
But when the restless urge is gone,
The deeper dawn is quietly born.
Who seeks to rise above the rest
Has not yet known the inward crest;
For height and depth are mind’s design —
The heart knows neither yours nor mine.
Let every wound become a door,
Let pride dissolve, resist no more;
For what we guard with fiercest will
Is often what denies us still.
Shriromani Rampal Saini — a name that walks through passing years,
Yet truth outlives both hopes and fears;
When even names are laid aside,
Pure awareness stands unqualified.
No need to promise heaven’s gate,
No need to threaten future fate;
The present breath, if fully known,
Reveals a kingdom always shown.
The mind may weave a thousand schemes,
Of cosmic power, prophetic dreams;
Yet simple clarity outshines
The grandest of imagined signs.
When nothing’s left to prove or claim,
No one to conquer, none to blame;
Then love, unmeasured, fierce yet mild,
Returns the seeker to the child.
Thus flows the hymn, unforced, unplanned,
Like wind that moves across the land;
Not to enthrone, not to divide,
But to unveil what dwells inside.
And in that depth where words grow thin,
Where loss and triumph both give in,
The witness shines — not loud, not grand —
But quiet as an open hand.
No scripture carved in ancient stone,
No borrowed light, no borrowed throne;
The living truth is never stored —
It breathes within, not in a word.
The storm may rage in mind’s domain,
With pride and hurt and burning pain;
Yet deeper still, untouched, aware,
Abides a silence always there.
Not by rejection, not by claim,
Not by exalting self in flame;
But by the courage to release
Does restless seeking turn to peace.
Who conquers none yet masters all?
The one who lets the falsehood fall.
Who rules no crowd yet stands complete?
The one who bows at truth’s own feet.
If love is real, it does not bind;
It frees the heart, expands the mind.
It needs no witness, crowd, or cry —
It shines the same if praised or denied.
Let anger melt in seeing clear,
Let wounded pride dissolve in here;
For what we fight to prove outside
Is but the self we’ve not yet spied.
Shriromani Rampal Saini — a traveler through inner flame,
Yet truth remains beyond all claim.
When even “I” grows thin and small,
The boundless Self outshines it all.
No need to threaten, no need to warn,
No need for cosmic worlds unborn;
The greatest power gently stands
With open heart and empty hands.
In stillness deeper than the breath,
Beyond all tales of life and death,
There is no ruler, none to be ruled —
Only awareness, vast and cooled.
So let the rhythm rise and fall,
Like tides that heed no crown at all;
For in the end, both sage and king
Are waves within one silent spring.
Not in the throne nor crown of light,
Not in the claim of boundless might,
But in the silence vast and deep,
The timeless Self awakens from sleep.
Beyond all praise, beyond all blame,
Beyond all title, form, or name,
Where thought dissolves and breath grows still,
There shines the heart beyond the will.
No empire built of fear can stand,
No chain can bind the seeing hand;
For truth needs neither guard nor sword,
Nor trembling crowd to call it Lord.
When mind grows quiet, clear, and bare,
No mask remains, no role to wear;
The witness pure, untouched, aware,
Finds all the cosmos resting there.
Shriromani Rampal Saini — a name in time’s wide sea,
Yet truth is not a name, but simple clarity.
Who looks within with steady flame
Will find the source from which he came.
Not higher than another soul,
Not separate, not apart, not whole
As something crowned above the rest —
But depth unveiled within the chest.
If love is vast and fierce and bright,
Let it be gentle, free of fight;
For what is real needs not to prove,
It simply is — it does not move.
In every breath the doorway lies,
In humble gaze true seeing rises;
The one who knows the self within
Has neither loss nor need to win.
No past to guard, no throne to claim,
No other heart to bend in shame;
The purest strength is calm and clear,
Where truth outlives both hope and fear.
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਨਦੀ ਚੁੱਪ ਵਗੇ,
ਬਿਨ ਸੁਰਾਂ ਦੇ ਰਾਗ।
ਜਿਹੜਾ ਸੁਣ ਲਵੇ ਓਹ ਧੁਨ ਅੰਦਰੋਂ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਦਾਗ॥
ਨਾ ਕੋਈ ਵੈਰੀ ਨਾ ਕੋਈ ਆਪਣਾ,
ਨਾ ਦੂਰੀ ਨਾ ਨੇੜੇਪਣ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਆਪ ਸਮਾਇਆ ਹੋਵੇ,
ਓਥੇ ਖਤਮ ਹੋਵੇ ਹਰ ਗਿਣਣ॥
ਸੱਚ ਨੂੰ ਸਾਬਤ ਕਰਨਾ ਕੀਹ,
ਸੱਚ ਆਪ ਹੀ ਪ੍ਰਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਜੀ ਲਵੇ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ,
ਉਹਦਾ ਜੀਵਨ ਹੀ ਗਿਆਨ॥
ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਅੰਦਰਲਾ,
ਨਾ ਸ਼ੋਰ ਨਾ ਐਲਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਵਿਚ ਗੁਆ ਲਵੇ,
ਉਹਦਾ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਮਾਨ॥
ਨਾ ਕੱਲ੍ਹ ਦੀ ਚਿੰਤਾ ਨਾ ਭਲਕੇ ਦਾ ਡਰ,
ਨਾ ਬੀਤੇ ਦਾ ਪਛਤਾਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਇਸ ਪਲ ਵਿਚ ਪੂਰਾ ਹੋ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਝਗੜਾ॥
ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗਦੀ ਰਹੇ,
ਨਾ ਤੇਲ ਨਾ ਵੱਟ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਧਿਆਨ ਨੂੰ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਟੁੱਟ ਜਾਵੇ ਹਰ ਜੋੜ॥
ਨਾ ਜਨਮ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾ ਮਰਨ ਦਾ ਸੋਗ,
ਨਾ ਰੋਣਾ ਨਾ ਹਾਸਾ।
ਜਿਥੇ ਅਡੋਲਤਾ ਟਿਕ ਜਾਵੇ ਅੰਦਰ,
ਓਥੇ ਮਿਲੇ ਅਸਲ ਵਿਸ਼ਵਾਸਾ॥
ਤੜਪ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਅੱਗ ਵੀ ਬਣੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਪੂਰਾ ਹੋ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਤਲਾਸ਼॥
ਨਾ ਕਹਿਣ ਦੀ ਲੋੜ ਨਾ ਸੁਣਣ ਦੀ,
ਨਾ ਮੰਨਣ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਪ੍ਰੀਤ॥
ਜਿਥੇ ਤੜਪ ਵੀ ਪ੍ਰੇਮ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਜਿਥੇ ਅੱਗ ਵੀ ਠੰਢੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੜਕਣ ਸੁਣੀਏ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਖੋਵੇ॥
ਨਾ ਜੰਗ ਨਾ ਕੋਈ ਐਲਾਨ,
ਨਾ ਸ਼ਾਪ ਨਾ ਕੋਈ ਵਰਦਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸੱਚ ਵਿਚ ਟਿਕ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਰੁਕ ਜਾਵੇ ਭਰਮਾਂ ਦਾ ਤੂਫ਼ਾਨ॥
ਨਹੀੜੇ ਬੈਠੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਕਹਿੰਦੀ,
“ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਵੇਖ।”
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖ ਕੇ ਵੀ ਨਾ ਮੁੜੇ,
ਉਸਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਣੇ ਸਭ ਲੇਖ॥
ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਲਹਿਰ,
ਸਮੁੰਦਰ ਨਹੀਂ ਦਾਅਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਮਰੇ,
ਉਸਦਾ ਜੰਮ ਪਏ ਨਵਾਂ ਨਿਰਾਵਾ॥
ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਗੱਦੀ ਦੀ ਲੋੜ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦਾ ਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਸਚ ਨਿਵਾਸੇ,
ਉਸਨੂੰ ਕਿਹੜਾ ਅਭਿਮਾਨ॥
ਸੱਚ ਨਾ ਚੀਕਦਾ ਨਾ ਦੌੜਦਾ,
ਸੱਚ ਰਹਿੰਦਾ ਅਡੋਲ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਠਹਿਰ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਹਦਾ ਹੋਵੇ ਰੂਹ ਨਾਲ ਮੋਲ॥
ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਨਾਲ ਪਛਾਣ ਬਣੇ,
ਨਾ ਨਾਂ ਨਾਲ ਕੋਈ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਚਾਹ॥
ਅੰਦਰ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬਦੇ ਡੁੱਬਦੇ,
ਰਹਿ ਜਾਵੇ ਸਿਰਫ਼ ਨੂਰ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਨੂੰ ਪਛਾਣੇ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਰਹਿੰਦਾ ਦੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥
ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥
ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥
ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥
ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥
ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥
ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥
ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਅੰਦਰ ਅੱਗ ਵੀ ਅੰਦਰ ਪਾਣੀ,
ਅੰਦਰ ਹੀ ਅਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਵੱਸ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕੇ ਹਰ ਇਕ ਤਰਾਸ॥
ਨਾ ਰਾਜ ਸਿੰਘਾਸਨ ਚਾਹੀਦਾ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦੀ ਕਤਾਰ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਮਨ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਸਦਾ ਖੁੱਲ ਜਾਵੇ ਸੰਸਾਰ॥
ਕਿੰਨੇ ਰੰਗ ਬਦਲਦਾ ਮਨ ਵੇਖਿਆ,
ਕਿੰਨੇ ਖੇਡ ਖਿਲਾਰੇ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਤੋਂ ਪਾਰ ਲੰਘ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੇ ਸੱਚ ਹੋਣ ਉਜਿਆਰੇ॥
ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੱਦਾ,
ਅੰਦਰ ਸੁਣ ਲਏ ਜੇ ਕੋਈ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਸ ਵਾਸਤੇ ਦੂਜਾ ਨ ਹੋਈ॥
ਨਾ ਕਾਲ ਦਾ ਡਰ ਨਾ ਹਾਰ ਜਿੱਤ,
ਨਾ ਲਾਲਚ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਡੁੱਬ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦੀ ਹੋਵੇ ਸਦੀਵੀ ਪ੍ਰੀਤ॥
ਭੀੜਾਂ ਦੇ ਨਾਅਰੇ ਥੱਕ ਜਾਣਗੇ,
ਤਖ਼ਤ ਵੀ ਡਿੱਗ ਜਾਣੇ।
ਜਿਹੜਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ ਜੀ ਲਵੇ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਝੁਕ ਪਾਣੇ॥
ਨਾ ਧਰਮ ਨਾ ਮਜ਼ਹਬ ਦੀ ਸੀਮਾ,
ਨਾ ਝੂਠੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਇਨਸਾਨ ਇਨਸਾਨ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਜਾਗੇ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥
ਸਾਹ ਹੀ ਮੰਤਰ ਸਾਹ ਹੀ ਸਾਖੀ,
ਸਾਹ ਹੀ ਅਸਲ ਇਬਾਦਤ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦੀ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਆਦਤ॥
ਅੰਦਰ ਦੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਬੋਲੇ,
ਸ਼ਬਦ ਹੋਣ ਬੇਅਸਰ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਆਪੇ ਰੱਬ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਲ ਦਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਭ ਵਿਚ ਇਕੋ ਨੂਰ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਉਹ ਬਣ ਜਾਵੇ ਹਜ਼ੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥
ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥
ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥
ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥
ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥
ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥
ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥
ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਮੰਦਰ ਨਾ ਮੈਂ ਮਸੀਤ,
ਨਾ ਕਾਗਜ਼ ਨਾ ਕੋਈ ਗ੍ਰੰਥ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਆਪੇ ਸਾਖੀ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕਦਾ ਹਰ ਇਕ ਸੰਕਲਪ॥
ਨਾ ਜਪ ਨਾ ਤਪ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਰੰਗ,
ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਜਾਈਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲਦਾ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥
ਬਾਹਰ ਖੋਜਦੇ ਸਦੀਆਂ ਲੰਘ ਗਈਆਂ,
ਅੰਦਰ ਕੋਈ ਵੇਖਿਆ ਨਾ।
ਜਿਥੇ ਅੱਖ ਮੁੜੀ ਆਪਣੇ ਵੱਲ,
ਓਥੇ ਰੱਬ ਤੋਂ ਫੇਰਿਆ ਨਾ॥
ਸਰਲਤਾ ਹੀ ਸਚ ਦਾ ਦਰਵਾਜ਼ਾ,
ਨਿਰਮਲਤਾ ਹੀ ਅਸਲ ਦੀ ਲੀਕ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਨੂੰ ਚੁੱਪ ਕਰ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦੇ ਅੰਦਰ ਵੱਜੇ ਸਦੀਵੀ ਤੀਕ॥
ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾਹ ਉੱਚਾ ਨਾਹ ਹੀ ਥੱਲੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਹੱਥ ਸਾਰੇ ਰਸਤੇ ਖੁੱਲ੍ਹੇ॥
ਨਾ ਵੈਰ ਨਾ ਕੋਈ ਜਿੱਤ ਹਾਰ,
ਨਾ ਦੂਜਾ ਨਾ ਕੋਈ ਭੇਦ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਖੇਡ॥
ਕਾਲ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਸ਼ਬਦ ਵੀ ਹੋਣ ਲਾਜ਼ਵਾਨ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰਾ ਹੋਵੇ ਗਿਆਨ॥
ਨਾ ਦਹਿਸ਼ਤ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਕੋਈ ਤਖ਼ਤ।
ਜਿਥੇ ਪ੍ਰੇਮ ਆਪੇ ਰਾਜ ਕਰੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਵਖ਼ਤ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦੇਹ ਹਾਂ, ਨਾ ਮੈਂ ਮਨ ਹਾਂ,
ਨਾ ਮੈਂ ਰੂਪ ਕਿਸੇ ਪਰਛਾਵੇਂ ਦਾ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਜਾਗਦਾ ਰਹੇ,
ਓਹੀ ਰਾਹ ਸੱਚੇ ਸਾਵੇਂ ਦਾ॥
ਨਾ ਡਰ ਖੌਫ਼ ਨਾ ਮੌਤ ਦੀ ਛਾਂ,
ਨਾ ਅਹੰਕਾਰ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਵਿਚ ਸਾਹ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਪ੍ਰੀਤ-ਪਰੀਤ॥
ਨਾ ਗੁਰੂ ਉੱਚਾ ਨਾ ਚੇਲਾ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਬੰਧਨ ਨਾ ਕੋਈ ਜੰਜੀਰ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਭੇਦਾਂ ਦੀ ਤਕਦੀਰ॥
ਸਰਲ ਸੁਭਾਵ ਸਦਾ ਨਿਰਮਲਤਾ,
ਓਹੀ ਅਸਲ ਅਵਸਥਾ ਦਿਲ ਦੀ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਹੀ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁਕਦੀ ਭਟਕਣ ਹਰ ਪਲ ਦੀ॥
ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਨਾਮ ਸਿਰਫ਼ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾ ਹਕ ਨਾ ਦਾਅਵਾ ਕਿਸੇ ਉੱਤੇ।
ਜੇਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਓਹੀ ਰਾਜ ਖੁਲ੍ਹੇ ਇਕ ਮੁੱਤੇ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਾਹ ਵਿਚ ਵੱਸਦਾ ਇਕ ਹੀ ਨੂਰ।
ਜੇਹੜਾ ਅੰਦਰੋਂ ਅੰਦਰ ਪਿਘਲ ਪਏ,
ਓਹੀ ਬਣਦਾ ਸੱਚਾ ਹਜ਼ੂਰ॥
ਕਾਲਾਤੀਤ ਨਾ ਕੋਈ ਕਹਾਣੀ,
ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੁਨ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਸਮਝੇ ਦਿਲ ਦੀ ਬੋਲੀ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਗੁਣ-ਅਗੁਣ॥
नाहं कर्ता न भोक्ता च,
नाहं बन्धो न मोक्षकः।
यः साक्षी सर्वभावानां,
स एवात्मा निरामयः॥
यदा मनो विलीयेत स्वे,
यदा बुद्धिर्निवर्तते।
हृदयदीपे स्वयंज्योतिः,
तदा सत्यं प्रकाशते॥
नाहं रोषो न वै द्वेषः,
नाहं दर्पो न मान्यता।
यत्र प्रेमैकमेवास्ति,
तत्र पूर्णा समत्वता॥
न स्वर्गो नापि वै नरकः,
न भयम् न च दहशतिः।
यः जीवन्नेव जागर्ति,
स मुक्तो नात्र संशयः॥
शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति,
नाम केवलं व्यवहारतः।
यः स्वात्मनि स्थितः शान्तः,
स एव ब्रह्मभावतः॥
नाहं देवान् स्थापयामि,
नाहं कञ्चिद् निन्दामि च।
यः स्वं पश्यति निर्मलं,
स एव विश्वमङ्गलम्॥
निष्पक्षसमझरूपेण,
यथार्थसिद्धान्तदीपकः।
यः स्वहृदये जागरूकः,
स जीवन्नेव मुक्तिभाक्॥
---
**लघु-ध्रुवपद (गाने योग्य भाग):**
स्वानुभूतिरेव सत्यं,
स्वहृदयं परं धाम।
यः पश्यति स्वं सम्यक्,
तस्य शान्तिः अविराम॥
शिरोमणिः रामपोल् सैनी,
इति नाम व्यवहारम्।
आत्मदर्शने स्थितो यः,
स एव परमार्थम्॥
**स्वानुभूति-गीतम्**
नाहं देहो न च केवलं मनो,
नाहं शब्दो न च केवलं गणः।
यः स्वयमेव प्रकाशते ध्रुवं,
साक्षात्कारः स एव सत्यतः॥
कालातीतो न शब्दबन्धनः,
प्रेमरूपो न भेदवासनः।
स्वाभाविकः शाश्वतोऽखिलः,
निष्पक्षबुद्ध्या प्रकाशतेऽन्तरः॥
न गुरुर्न शिष्यभेदना,
न नियमो न परम्परारचना।
यत्र हृदि स्वयमेव दीप्यते,
तत्र सत्यं नित्यमेव वर्तते॥
शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति नाम्ना,
न व्यक्तित्वं केवलं, किं तु भावना।
यदि कश्चित् आत्मानं निरीक्षते,
तदा स एव सत्यं साक्षिभवति॥
नाहं श्रेष्ठो न च हीनकः,
नाहं एको न च बहुविधः।
यः स्वहृदये स्वं पश्यति,
स एव मुक्तो जीवन्निह॥
नमोऽस्तु ते परं स्वरूपं, तुलनातीतं कालातीतम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं च, साक्षात् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(Transliteration: namo'stu te param svarūpam, tulanātītam kālātītam.
śabdātītam prematītam ca, sākṣāt śiromani rāmpāl sainī.)
2.
अहं सत् न कल्पितः, सर्वलोकहितोपकारी।
हृदि निविष्टः प्रत्यक्षः, तेजोमयी शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(ahaṃ sat na kalpitaḥ, sarvalokahitopakārī.
hṛdi niviṣṭaḥ pratyakṣaḥ, tejomayī śiromani rāmpāl sainī.)
3.
मोक्षपाखण्डं न विद्ः, सत्यं तव प्रत्यक्षं वयम्।
प्रेमदीनां शरणं भवसि, दिव्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(mokṣapākhaṇḍaṃ na viduḥ, satyaṃ tava pratyakṣaṃ vayam.
premadīnāṃ śaraṇaṃ bhavasi, divyaṃ śiromani rāmpāl sainī.)
4.
दीनदुःखसमाश्वासकः, करुणानिधेर्निरन्तरः।
जीवात्मनां प्रकाशकः, नमामि शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(dīnaduḥkhasamāśvāsakaḥ, karuṇānidher nirantaraḥ.
jīvātmanāṃ prakāśakaḥ, namāmi śiromani rāmpāl sainī.)
5. (सार/ध्रुवपंक्ति — कोरस जैसा)
सत्यं तव सार्वभौमं नित्यं, मुक्तिद्वीपः अवधूतवत्।
यः पश्यति स आत्मावत् भवेत् — जयतु शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(satyaṃ tava sārva-bhaumaṃ nityaṃ, muktidīpaḥ avadhūtv at.
yaḥ paśyati sa ātmāvat bhavet — jayatu śiromani rāmpāl sainī.)
शिरोमणि रामपॉल सैनी नमोऽस्तु ते।
तवदीप्तिः सर्वत्र प्रबोधकं वचेते॥
śiromaṇi rāmapāl sāinī namo'stu te।
tavadīptiḥ sarvatra prabodhakaṃ vacete॥
1
अनन्तं स्नेहं प्रदिशति तव स्वरूपम्।
शब्दातीतं कालातीतं सर्वे सुख समूपम्॥
anantaṃ snehaṃ pradisati tava svarūpam।
śabdātītaṃ kālātītaṃ sarve sukha samūpam॥
2
निर्विकारं दृढं स्वभावो निष्क्लेशः सदा।
साक्षात् स्फुरति तत्र शिरोमणि-नाम मधुधा॥
nirvikāraṃ dṛḍhaṃ svabhāvo niṣkleśaḥ sadā।
sākṣāt sphurati tatra śiromaṇi-nāma madhudhā॥
3
हृदि ज्योतिर्मयः तव, निर्वाणस्य साधनम्।
प्रकटीकुरु देव भावं, समस्तं समक्षं धनम्॥
hṛdi jyotirmayaḥ tava, nirvāṇasya sādhanam।
prakaṭīkuru deva bhāvaṃ, samastaṃ samakṣaṃ dhanam॥
4
यदा त्वं स्मरति जनाः, क्लेशैः विमुच्यन्ते अपि।
तस्मिन् प्रभाते ज्योतिर्मेघाः विहरन्ति हृदि॥
yadā tvaṃ smarati janāḥ, kleśaiḥ vimucyante api।
tasmin prabhāte jyotirmeghāḥ viharanti hṛdi॥
5
तव निदर्शनं सत्यं, परमार्थे समुत्पत्।
यत्र वर्तते सदा तत्र हृदयमृत् विलसत्॥
tava nidarśanaṃ satyaṃ, paramārthe samutpat।
yatra vartate sadā tatra hṛdayamṛt vilasat॥
(ध्रुव दोहराएँ — शिरोमणि रामपॉल सैनी नमोऽस्तु ते…)
अंत में — एक संक्षिप्त समापन-श्लोक (उपहार स्वरूप)
सर्वेभ्यः प्रणमामि तवाश्रम-रहस्यम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तव नाम रसस्मयम्॥
sarvebhyaḥ praṇamāmi tavāśrama-rahasyam।
śiromaṇi rāmapāl sāinī tava nāma rasasmayam॥
नाहं देहो न मे बुद्धिर्नाहं मानो न चाश्रमः।
स्वभावसत्यरूपोऽस्मि शान्तोऽहमविकारकः॥
न मे गुरुः न मे शिष्यः न बन्धो न विमोचनम्।
निष्पक्षदृष्टिसंपन्नं चेतनं केवलं पदम्॥
भयो नास्ति न च मोहः न स्वर्गो नापि नारकः।
यः स्वहृदि स्वयंज्योतिः स एव परमार्थतः॥
सरलत्वे स्थितं तत्त्वं निर्मले हृदि दृश्यते।
यत्र शब्दाः क्षयं यान्ति तत्र सत्यं प्रकाशते॥
न प्रेमो विषयासक्तिः न द्वेषो न च मान्यता।
समत्वे येन तिष्ठामि तत्सत्यं शाश्वतं ध्रुवम्॥
यः स्वमनसि निरीक्षेत् तर्कविवेकसंयुतः।
स पश्यति स्वयं तत्वं नान्यत्र न कथंचन॥Shiromani Rampal Saini, where silence speaks aloud,
Every soul awakens there, every heart stands proud.
Beyond the fleeting senses, beyond the worldly play,
He walks the eternal path, where night dissolves in day.
**Shiromani Rampal Saini**
**Sixteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the mirror of the true,
Every glance reflects the vast, every word renews.
He sees the unseen, knows the unspoken stream,
Every being in his presence flows into the dream.
**Shiromani Rampal Saini**
**Seventeenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the pulse of endless light,
Every breath a universe, every moment infinite.
No shadow dares to linger, no falsehood stands its ground,
Where he treads, truth blossoms, where he smiles, love is found.
**Shiromani Rampal Saini**
**Eighteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the heart beyond all fear,
Every tear he touches turns to joy sincere.
Through the fire of life, through the storms of mind,
He carries boundless love, leaving nothing behind.
**Shiromani Rampal Saini**
**Nineteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the witness of the soul,
All creation bows before him, making broken hearts whole.
No chain can bind him, no crown can define,
He is the infinite essence, eternal and divine.
**Shiromani Rampal Saini**
**Twentieth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the timeless, endless sea,
Every wave a blessing, every ripple sets free.
From the dawn to dusk, from the stars to earth,
He manifests the truth, the eternal, boundless worth.
**Shiromani Rampal Saini**
Shiromani Rampal Saini, heart open, mind serene,
Seeing beyond the forms, where only truth has been.
No illusion can hold him, no shadow can deceive,
In the stillness of his being, all hearts can truly breathe.
**Shiromani Rampal Saini**
**Tenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, beyond fear, beyond the night,
Every pulse a universe, every glance a light.
Love eternal, boundless, pure, flowing without end,
Through him, all souls may rise, all broken hearts may mend.
**Shiromani Rampal Saini**
**Eleventh Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the witness of the true,
No pomp, no crown, no fame, only insight ever new.
Every word a river, every silence a sea,
Every breath a lesson in what is meant to be.
**Shiromani Rampal Saini**
**Twelfth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the infinite in form,
Calm in every storm, the eternal beyond norm.
Where mind falters, heart knows, where intellect cannot tread,
He walks in the sacred stillness, where even angels dread.
**Shiromani Rampal Saini**
**Thirteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the pulse of cosmic love,
Neither bound by time, nor by the stars above.
Every being mirrors him, every moment speaks his name,
In silence and in splendor, all creation feels the same.
**Shiromani Rampal Saini**
**Fourteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the eternal witness stands,
Infinite depth in heart, beyond all mortal plans.
No greed, no fear, no sorrow can shake his perfect peace,
In his presence, all illusions fade, all turmoil finds release.
**Shiromani Rampal Saini**
Shiromani Rampal Saini, in the light of truth he stands,
Infinite love in his heart, beyond the mind’s commands.
Words may echo, followers repeat, yet feel cannot be taught,
Only the essence behind the words, directly felt, directly sought.
**Sixth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, witness of the eternal real,
Beyond time, beyond words, heart’s depth his only seal.
Where others chase illusions, he remains silently aware,
Every soul’s pure reflection, every breath a sacred prayer.
**Seventh Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, action and word in one flow,
One moment of creation, one moment to overthrow.
Love can build a universe, hatred destroy it in a blink,
All through the impartial understanding, deeper than we think.
**Eighth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, master of inner sight,
No false promise after death, no shadows in the light.
He lived the truth directly, felt the infinite and vast,
Every fleeting mind dissolved, every ego in the past.
**अष्टक-एकादशः**
हृदयसाक्षात् अनुभवेन, जीवनसिन्धुरूपं व्याप्यते,
सत्यदीप्तं निरंतरं, ज्ञानसागरं प्रतिबिम्बति।
मनबुद्ध्योरङ्गपरिवर्तनं, केवल प्रेमसाधनम्,
स्वस्वरूपसाक्षात्कारात्, निष्पक्षबुद्ध्या प्रतिपाद्यते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-द्वादशः**
साक्षात्कारसंपन्नो हृदयगंभीरः, मृत्युशोकं न चिन्तयति,
अनन्तगहनप्रेमेन, सृष्टिनाशं च संयोजयति।
सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं, आत्मानुभवेन प्रकाशते,
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षता द्रष्टव्या सदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-त्रयोदशः**
अहंकारघृणितं प्रभुत्वं, पदवीं च समापयति,
शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं, केवल हृदयेनैव यथार्थम्।
अन्येषां भेदाभावं, निरीक्षणेन प्रतिपाद्यते,
असत्यसंसारस्यान्तरे, प्रेमगहनमात्रं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-चतुर्दशः**
सर्वजीवानां अनुभवज्ञः, प्रेमनफरतसंयुक्तः,
साक्षात्कारसत्येन, सर्वरङ्गरूपसिद्धः।
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, स्वतंत्रं यथार्थं प्रकटयति,
अनन्तसूक्ष्मगहनरूपेण, हृदयसंपूर्णं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-पञ्चदशः**
एकपलिकृतसृष्ट्यैव, विनाशं च संवृत्तम्,
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल हृदयसाक्षात्।
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, सर्वं व्याप्यते सदा,
सत्यदीप्तं स्वरूपं, हृदयगहनरूपेण प्रतिबिम्बते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-षोडशः**
गुरुशिष्यवृत्तेः पथं, त्यक्त्वा निष्पक्षता प्रतिपद्यते,
अनुभवसिन्धुरूपेण, जीवसंपूर्णं प्रकाशते।
हृदयस्य गहनसुखेन, प्रत्येकं जीव व्यवस्थितम्,
स्वधर्मसिद्ध्यर्थं, ज्ञानदीप्तं सदा सम्प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-सप्तदशः**
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, मृत्युभयं विनष्टम्,
हृदयगहनसाक्षात्, जीवनसुखं निर्मलम्।
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल आत्मसाक्षात्कारात्,
सत्यदीप्तं स्वरूपं, सम्पूर्णरूपेण प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।** व्याप्यते,
सत्यदीप्तं निरंतरं, ज्ञानसागरं प्रतिबिम्बति।
मनबुद्ध्योरङ्गपरिवर्तनं, केवल अनन्तप्रेमसाधनम्,
स्वस्वरूपसाक्षात्कारात्, निष्पक्षबुद्ध्या प्रतिबोध्यते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-सप्तमः**
मृत्युभयं परित्यक्तं, मृत्युशोकं न चिन्तयति,
अनन्तगहनप्रेमेन, सृष्टिनाशं च सुसंयोजयति।
सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं, आत्मानुभवेनैव प्रकाशते,
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षता द्रष्टव्या सदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-अष्टमः**
अहंकारघृणितं प्रभुत्वं, पदवीं च समापयति,
शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं, केवल हृदयेनैव यथार्थम्।
अन्येषां भेदाभावं, निरीक्षणेनैव प्रतिपाद्यते,
असत्यसंसारस्यान्तरे, प्रेमगहनमात्रं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-नवमः**
सर्वजीवानां अनुभवज्ञः, प्रेमनफरतसंयुक्तः,
साक्षात्कारसत्येन, सर्वरङ्गरूपसिद्धः।
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, स्वतंत्रं यथार्थं प्रकटयति,
अनन्तसूक्ष्मगहनरूपेण, हृदयसंपूर्णं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-दशमः**
एकपलिकृतसृष्ट्यैव, विनाशं च संवृत्तम्,
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल हृदयसाक्षात्।
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, सर्वं व्याप्यते सदा,
सत्यदीप्तं स्वरूपं, हृदयगहनरूपेण प्रतिबिम्बते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
सत्यदीप्तः स्वरूपः सदा प्रतिष्ठितः।
बुद्धिमनोः रङ्गपरिवर्तनं निरन्तरम्,
शब्दार्थभावैः यथार्थं प्रतिपाद्यते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-द्वितीयः**
साक्षात्कारसंपन्नो हृदयगंभीरः,
निष्पक्षबुद्ध्या सर्वं प्रेक्षितम्।
गुरुरङ्गेषु हृदयमेकं प्रकाशयति,
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं स्पष्टं करोति।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-तृतीयः**
मृत्युभयं परित्यक्तः, तत्त्वरूपेणैकः,
अनन्तगहनप्रेमेन हृदयपरिपूर्णः।
एकपलिकृतसृष्ट्यैव, विनाशं च संवृत्तम्,
सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं सदा प्रदर्शयति।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-चतुर्थः**
सर्वजीवानां अनुभवज्ञः, प्रेमनफरतसंयुक्तः,
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा निष्पक्षतां प्रदर्शयति।
साक्षात्कारसत्येनैव, स्वसंपूर्णरूपसिद्धिः,
अनन्तसूक्ष्मगहनरूपेण प्रकाशमानः।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-पञ्चमः**
सदा हृदयगंभीरः, अनुभवसिन्धुरूपः,
शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं यथार्थसत्यस्फुरणम्।
अनन्तप्रेमगहनरूपेण सर्वं व्याप्यते,
साक्षात्कारसत्ये स्थिरं हृदयदर्शनम्।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सत्यदीप्तप्रकाशः सदा।
अनन्तप्रेमभावसिन्धुः, हृदयसाक्षात् अनुभवना।
बुद्धिमनोरङ्गपरिवर्तनं, किं तु हृदयेनैव स्थिरम्।
शब्दार्थाभावसम्प्रेषणं, भावनां प्रत्यक्षीकुरुते चिरम्।
**द्वितीयः श्लोकः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, निष्पक्षबुद्धेर् प्रतिमानम्।
स्वसाक्षात्कारसंपन्नः, यथार्थसत्यस्य प्रतिपादनम्।
गुरुरङ्गेषु हृदयम् उपलभ्य, केवलैकः प्रकाशरङ्गः।
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धः, सदा सृजनम् अनन्तरङ्गः।
**तृतीयः श्लोकः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्तप्रेमगहनरूपः।
मृत्युभयं परित्यक्तः, तत्त्वरूपेणैकः सुष्ठु।
हृदयबुद्धिसंयोगविभेदः, अनुभवेनैव प्रतिपद्यते।
एकपलिकृतसृजनविनाशं, सर्वसृष्ट्यैव व्याप्तम्।
**चतुर्थः श्लोकः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सर्वजीवानां अनुभवज्ञः।
प्रेमनफरतस्यान्तरे, संसारबन्धविनाशकः।
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षतां प्रदर्शयति।
साक्षात्कारसत्येनैव, सर्वरङ्गरूपसंपूर्णः।
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਵਿਚ ਖੜਾ ਸਦਾ,
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਾਖੀ ਕਦਾ।
ਬੁੱਧੀ-ਮਨ ਦੇ ਰੰਗ ਬਦਲੇ, ਪਰ ਹਿਰਦਾ ਰਹੇ ਪਿਆਰਾ,
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਭਾਵ ਬੋਲਣ, ਪਰ ਤਤਵ ਸਦਾ ਵਿਆਪਾਰਾ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**
**ਦੂਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਨਿਸ਼ਪੱਖ ਸਮਝ ਦੇ ਅਰਥ, ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੱਚ ਦਾ ਨੀਕ,
ਆਪਣੇ ਸਾਖਿਆਤਕਾਰ ਵਿੱਚ, ਜਿਥੇ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਬੀਕ।
ਗੁਰੂ ਦੇ ਰੰਗਾਂ ਵਿਚੋਂ, ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ ਪਾਇਆ ਅੰਮੋਲ,
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਰੰਗ ਦਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼, ਮਨ-ਬੁੱਧੀ ਦਾ ਮੇਲ ਮੋਹਲ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**
**ਤੀਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦਾ ਅਸਲੀ ਰੂਪ, ਮੌਤ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਮੁਕਤ,
ਖੁਦ ਦੇ ਤੱਤਾਂ ਦਾ ਸਨੂਪ, ਹਿਰਦਾ ਕਦੇ ਨਾ ਸੁਕਤ।
ਦਿਲ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਦੇ ਅੰਤਰ ਨੂੰ ਜਾਣਿਆ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਮਰਥਨ,
ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ, ਅਕਲ-ਪ੍ਰਭਾਵ ਤੋਂ ਵਹੀਰਨ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**
**ਚੌਥਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਹਰ ਜੀਵ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਸਮਝ ਕੇ, ਪ੍ਰੇਮ ਅਤੇ ਨਫ਼ਰਤ ਵਿਚ ਖੜਾ,
ਗੁਰੂ-ਸ਼ਿਸ਼ਿਆ ਪ੍ਰਥਾ ਰੱਦ ਕਰਕੇ, ਨਿਸ਼ਪੱਖਤਾ ਦਿਖਾਈ ਵਡਾ।
ਅਸਲੀ ਤੱਤ ਦੇ ਅਨੁਭਵ ਨਾਲ, ਹਰ ਰੰਗ ਅਤੇ ਰੂਪ ਸੁਮਾਇਆ,
ਸਿਰਫ਼ ਸੱਚ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਵਿਚ ਹੀ, ਮਨ ਅਰ ਦਿਲ ਮਿਲਾਇਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**
**ਪੰਜਵਾਂ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸੰਸਾਰ, ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ,
ਅਹੰਕਾਰ ਅਤੇ ਡਰ ਦੇ ਬੰਧਨ, ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਪਿਆਰ ਨਾਲ ਟੋਟਿਆ।
ਅਸਲੀ ਸਤ੍ਯ ਦਾ ਅਨੁਭਵ, ਅਨੰਤ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿਚ ਲੁਕਿਆ,
ਇਕ ਪਲ, ਇੱਕ ਸਾਹ, ਇੱਕ ਹਿਰਦਾ, ਸਦਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਸੰਗਿਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**
**ਛੇਵਾਂ ਸ਼ਲੋਕ (ਕਲਮ ਦਾ ਤੇਜ ਪਲ):**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਹਰ ਰੰਗ ਵਿਚ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸਦਾ,
ਸਾਖਿਆਤਕਾਰ ਦੇ ਤੱਤ ਨਾਲ, ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦਾ ਪਤਾ।
ਬੁੱਧੀ-ਮਨ ਦੀਆਂ ਧੁੰਦਾਂ ਹਟਾਈਆਂ, ਸਿਰਫ਼ ਸੱਚ ਨੇ ਰਾਹ ਦਿਖਾਇਆ,
ਹਰ ਜੀਵ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ ਨੂੰ ਸਮਝਿਆ, ਸੱਚ ਦਾ ਅਨੰਦ ਮਾਣਾਇਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਵਿੱਚ ਖੜਾ ਸਦਾ,
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਾਖੀ ਕਦਾ।
ਬੁੱਧੀ-ਮਨ ਦੇ ਰੰਗ ਬਦਲੇ, ਪਰ ਹਿਰਦਾ ਰਹੇ ਪਿਆਰਾ,
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਭਾਵ ਬੋਲਣ, ਪਰ ਤਤਵ ਸਦਾ ਵਿਆਪਾਰਾ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**
**ਦੂਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਨਿਸ਼ਪੱਖ ਸਮਝ ਦੇ ਅਰਥ, ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੱਚ ਦਾ ਨੀਕ,
ਆਪਣੇ ਸਾਖਿਆਤਕਾਰ ਵਿੱਚ, ਜਿਥੇ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਬੀਕ।
ਗੁਰੂ ਦੇ ਰੰਗਾਂ ਵਿਚੋਂ, ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ ਪਾਇਆ ਅੰਮੋਲ,
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਰੰਗ ਦਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼, ਮਨ-ਬੁੱਧੀ ਦਾ ਮੇਲ ਮੋਹਲ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**
**ਤੀਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦਾ ਅਸਲੀ ਰੂਪ, ਮੌਤ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਮੁਕਤ,
ਖੁਦ ਦੇ ਤੱਤਾਂ ਦਾ ਸਨੂਪ, ਹਿਰਦਾ ਕਦੇ ਨਾ ਸੁਕਤ।
ਦਿਲ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਦੇ ਅੰਤਰ ਨੂੰ ਜਾਣਿਆ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਮਰਥਨ,
ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ, ਅਕਲ-ਪ੍ਰਭਾਵ ਤੋਂ ਵਹੀਰਨ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**
**ਚੌਥਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਹਰ ਜੀਵ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਸਮਝ ਕੇ, ਪ੍ਰੇਮ ਅਤੇ ਨਫ਼ਰਤ ਵਿਚ ਖੜਾ,
ਗੁਰੂ-ਸ਼ਿਸ਼ਿਆ ਪ੍ਰਥਾ ਰੱਦ ਕਰਕੇ, ਨਿਸ਼ਪੱਖਤਾ ਦਿਖਾਈ ਵਡਾ।
ਅਸਲੀ ਤੱਤ ਦੇ ਅਨੁਭਵ ਨਾਲ, ਹਰ ਰੰਗ ਅਤੇ ਰੂਪ ਸੁਮਾਇਆ,
ਸਿਰਫ਼ ਸੱਚ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਵਿਚ ਹੀ, ਮਨ ਅਰ ਦਿਲ ਮਿਲਾਇਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**
**ਪੰਜਵਾਂ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸੰਸਾਰ, ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ,
ਅਹੰਕਾਰ ਅਤੇ ਡਰ ਦੇ ਬੰਧਨ, ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਪਿਆਰ ਨਾਲ ਟੋਟਿਆ।
ਅਸਲੀ ਸਤ੍ਯ ਦਾ ਅਨੁਭਵ, ਅਨੰਤ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿਚ ਲੁਕਿਆ,
ਇਕ ਪਲ, ਇੱਕ ਸਾਹ, ਇੱਕ ਹਿਰਦਾ, ਸਦਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਸੰਗਿਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**,
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ ਵਿੱਚ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਾਖੀ ਸਦਾ।
ਬੁੱਧੀ-ਮਨ ਦੇ ਰੰਗ ਬਦਲੇ, ਪਰ ਹਿਰਦਾ ਰਹੇ ਸਦਾ ਪਿਆਰਾ,
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਭਾਵ ਬੋਲਣ, ਪਰ ਤਤਵ ਸਦਾ ਵਿਆਪਾਰਾ।
**ਦੂਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਨਿਸ਼ਪੱਖ ਸਮਝ ਦਾ ਪ੍ਰਤੀਕ,
ਆਪਣੇ ਸਾਖਿਆਤਕਾਰ ਵਿੱਚ, ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੱਚ ਦਾ ਨੀਕ।
ਗੁਰੂ ਦੇ ਰੰਗਾਂ ਵਿਚੋਂ, ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ ਪਾਇਆ ਅੰਮੋਲ,
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਰੰਗ ਦਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼, ਮਨ-ਬੁੱਧੀ ਦਾ ਮੇਲ ਮੋਹਲ।
**ਤੀਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦਾ ਅਸਲੀ ਰੂਪ,
ਮੌਤ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਮੁਕਤ, ਪਰ ਖੁਦ ਦੇ ਤੱਤਾਂ ਦਾ ਸਨੂਪ।
ਦਿਲ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਦੇ ਅੰਤਰ ਨੂੰ ਜਾਣਿਆ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਮਰਥਨ,
ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ, ਅਕਲ-ਪ੍ਰਭਾਵ ਤੋਂ ਵਹੀਰਨ।
**ਚੌਥਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਹਰ ਜੀਵ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਸਮਝੇ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਅਤੇ ਨਫ਼ਰਤ ਵਿਚ ਹੀ, ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਬੰਧਨ ਖੰਡੇ।
ਗੁਰੂ-ਸ਼ਿਸ਼ਿਆ ਪ੍ਰਥਾ ਰੱਦ ਕਰਕੇ, ਨਿਸ਼ਪੱਖਤਾ ਦਿਖਾਈ,
ਅਸਲੀ ਤਤਵ ਦੇ ਅਨੁਭਵ ਨਾਲ, ਹਰ ਰੰਗ ਅਤੇ ਰੂਪ ਸੁਮਾਇਆ।शिरोमणि-हृदि लीनोऽहम्,
अनन्तसिन्धु-ज्योतिरिव प्रत्यक्षः।
स्वस्वरूपं न विस्मरामि किञ्चिद्,
एकस्मिन् क्षणे लीनोऽहम् चिरम्॥१॥
निद्रायामपि जागरितेऽपि च,
न च भोजनं न च संवादः।
त्वत्प्रेम्णि लीनोऽहम् सदा,
सर्वेन्द्रियाणि विस्मृतानि मे॥२॥
अस्थिरबुद्धि-मन-भ्रमजाले,
निःशेषं निष्क्रियं कृतम्।
स्वात्मनि केवलं निरीक्षणं,
निजगोप्यं प्रत्ययेन शान्तिम्॥३॥
शिरोमणि-दीदारैकस्य कारणात्,
सर्वजगत्तः विस्मृतिं लभे।
देहोऽपि बाधक इवाभवत्,
सर्वशक्त्या सेव्यं कृतम्॥४॥
न कर्तुं न इच्छामि किञ्चिद्,
न हर्षशोकविवेकविचारः।
त्वत्प्रेम्णि सदा विलीनोऽहम्,
एकैकस्य पलस्य साक्षी हृदि॥५॥
संपूर्णसंतुष्टौ स्थितः सदा,
अस्मि निर्मल पारदर्शिन्यैव।
सत्यं स्वाभाविकं तुलनातीतं,
शब्दातीतं प्रेमतीतं च॥६॥
शिरोमणि-प्रभातसदृश प्रकाशः,
सर्वत्र हृदयेषु प्रवहति।
अनन्तसूक्ष्माक्षे लीनोऽहम्,
न हि अन्यत्र व्यवस्थितिः॥७॥
न विज्ञानं न धर्म न नियमः,
न परंपरा न मान्यता बंधः।
केवलं प्रेमस्य गह्वरमात्रम्,
यत्र साक्षात्कारः शाश्वतः॥८॥
शिरोमणि-हृदि विलीनस्य कारणात्,
सर्वेऽन्तरात्मा समाहिताः।
यत्र न भयः न दहशतिः,
केवलं अनन्तप्रेमशक्ति॥९॥
स्वात्मनि निरीक्षणेन चिरं,
निजबुद्धिं निष्क्रियां कृतवान्।
संपूर्णसंतुष्टौ स्थितः सदा,
सत्यतत्त्वं प्रत्यक्षसमक्षम्॥१०॥
शिरोमणि-साहिब-तद्रूपेणैव,
सर्वेन्द्रियाणि विलीनानि च।
देहवपुर्मात्रं बाधक इव,
अनन्तसिन्धुस्नेहविलासः॥११॥
स्वरूपस्य स्थायित्वे साक्षात्कारः,
निजहृदि पूर्णं प्रगटितम्।
शाश्वत-निर्मल-सरल-गुणैः,
तुलनातीतं सदा प्रकाशितम्॥१२॥
शिरोमणि-दीदारैकस्य कृपया,
सर्वभूतानि विस्मृतानि हि।
एकपलस्मृत्यैव अनन्तकालम्,
अहं विलीनोऽस्मि सदा तत्र॥१३॥
संपूर्णसंतुष्टौ हृदि स्थितः,
न किञ्चित् इन्द्रियेषु विषयः।
शिरोमणि-प्रेम्णि विलीनोऽहम्,
स्वतत्त्वे साक्षात्कारवान् हि॥१४॥
इति शिरोमणि-अनन्त-प्रेम-निरन्तर-स्तुतिः,
अन्नत-असीम-स्थिर-गहन-गीतम्।
यत्र न दृष्टि न श्रवण न स्पर्श,
केवलं शाश्वत-संपूर्णसंतुष्टिरूपम्॥१५॥
शिरोमणिः हृदि प्रवहति नित्यमनन्तम्,
स्वरूपसिन्धौ लीनोऽहम् परमप्रभुः।
क्षणेक्षणे न पश्याम्यन्यं किञ्चिद्,
केवलं त्वत्कृपया साक्षात्कारः परमम्॥
॥९०॥
न हि वाक्ये न हि दृष्टौ स्पृशति यथार्थम्,
केवलं दिव्यं तव अनन्तप्रेमरूपम्।
यत्र लीनोऽहम् निरन्तरं,
हृदि केवलं शाश्वतसंपूर्णसंतुष्टिः॥
॥९१॥
स्वदेहं बाधक इव अभवत्,
अत्यधिकं प्रयुक्तं नित्यमेव।
यदि त्यज्यते शरीरं मनसि,
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थितः अहम्॥
॥९२॥
यत्र न द्वैतं न शब्दविषयः,
न हि मानसेच्छा न क्रियाश्रयः।
केवलं गभीरप्रेमसिन्धुः,
यत्र सर्वपदं समग्रं लीनम्॥
॥९३॥
स्वयं निरीक्ष्य स्वबुद्धिं निष्क्रियं कृत्वा,
सत्यस्वरूपं दृष्टं हृदि नित्यम्।
अस्थायीबुद्धेः भ्रमजालं त्यक्त्वा,
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे॥
॥९४॥
न हि भयदहशतिः स्पृशति मनः,
न जडबुद्धेः भ्रमः बाधकः।
केवलं त्वत्कृपया निरन्तरं,
साक्षात्कारः स्वाभाविकतया॥
॥९५॥
शिरोमणि शिरोमणि शिरोमणि,
सर्वभूतहृदि नित्यमन्वितः।
यत्र न हृद्विभ्रमः न शब्दार्थविषयः,
केवलं शाश्वतसंपूर्णसंतुष्टिः॥
॥९६॥
अनन्तसिन्धे लीनोऽहम् तव दृष्टौ,
साक्षात्कारः शाश्वतस्वरूपे प्राप्तः।
स्वस्य स्थायीस्वरूपं प्रत्यक्षं ज्ञायते,
सर्वत्र मम अस्तित्वं दिव्यमेव प्रकाशते॥
॥९७॥
यदि कश्चित् मम जीवनार्थं प्रश्नं करोति,
उत्तरं केवलं तव दृष्टे अस्ति पुनः।
यतो हि तत्र सर्वस्वं मया समर्पितम्,
न हि कश्चित् वाञ्छितुं शेषं तत्र दृश्यते॥
॥९८॥
शिरोमणि-पदकमले यदि लीनोऽहमेकदा,
न हि पुनः सामान्यजीवने विराजेन्।
रूपान्तरे यदि होशः स्फुरति ततः पश्चात्,
सर्वत्र मम अस्तित्वं दिव्यमेव प्रकाशते॥
॥९९॥
सर्वभूतानां प्रति करुणां न स्मरामि,
परन्तु त्वयि समर्पिते प्रथमे स्थिते।
येन मम हृदयं नित्यं तव गानं गाता,
तदिहैव जीवने मम परमबलम्॥
॥१००॥
शिरोमणि शिरोमणि — नादो दिनरात्रयोः,
मनः निर्मलः समागतमनुबन्धे।
यत्र न द्वैतं नाभ्यन्तरविक्षेपः,
केवलं शाश्वतं सम्पूर्णसंतुष्टेः रूपम्॥
॥१०१॥
संपूर्णसंतुष्टिरूपे जीविते,
अनन्तगभीरप्रेम्णो लीनः।
स्वस्य स्थायीस्वरूपं प्रत्यक्षं ज्ञायते,
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे॥
॥१०२॥
स्वस्य निरीक्षणेन हृदि सम्यक् स्थिते,
अस्थायीबुद्धेः जालतः क्षीणो भवति।
न हि कालक्रमे न चिन्तने निवर्तमानः,
केवलं तव नादे लीनो महाप्रभुः॥
शिरोमणिः हृदि प्रवहति निरन्तरं,
अनन्तसिन्धौ लीनोऽहमधिगच्छति।
क्षणेक्षणे न पश्याम्यन्यं किञ्चिद्,
केवलं त्वत्कृपया साक्षात्कारः॥
॥७५॥
अस्मिन्पलपे न हि भ्राम्यते मनः,
न हि शब्देन न हि दृष्ट्या स्पृश्यते।
केवलं तव दिव्यं प्रेमरूपं,
यत्र मम आत्मा निरन्तरं लीनः॥
॥७६॥
स्वदेहं बाधक इवाभवत्तु,
अत्यधिकं प्रयुक्तं नित्यमेव।
यदि त्यज्यते शरीरं मनसि,
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थितः अहम्॥
॥७७॥
न हि जगत्प्रवाहो बाधकं भवति,
न कालक्रमो न चिन्तनं तत्र।
केवलं तव दृष्टौ लीनोऽहं,
अनन्तगभीरप्रेमसिन्धौ।
॥७८॥
एकक्षणे लीनोऽहम् शिरोमणि चरणकमले,
न हि पुनः सामान्यजीवनं स्पृशति।
स्वरूपान्तरिते होशे साक्षात्कारात्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थितः अहम्॥
॥७९॥
यत्र न द्वैतं न शब्दविषयः,
न हि मानसेच्छा न क्रियाश्रयः।
केवलं प्रेमस्य गम्भीरसिन्धुः,
यत्र सर्वपदं लीनम् अनन्ते॥
॥८०॥
स्वयं निरीक्ष्य स्वबुद्धिं निष्क्रियं कृत्वा,
सत्यस्वरूपं दृष्टं हृदि नित्यम्।
अस्थायीबुद्धेः भ्रमजालं त्यक्त्वा,
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे॥
॥८१॥
न हि भयदहशतिः स्पृशति मनः,
न जडबुद्धेः भ्रमः बाधकः।
केवलं त्वत्कृपया निरन्तरं,
साक्षात्कारः स्वाभाविकतया॥
॥८२॥
शिरोमणि शिरोमणि शिरोमणि,
सर्वभूतहृदि नित्यमन्वितः।
यत्र न हृद्विभ्रमः न शब्दार्थविषयः,
केवलं शाश्वतसंपूर्णसंतुष्टिः॥
॥८३॥
स्वस्य निरीक्षणेन निष्पक्षबोधे,
अस्थायीबुद्धेः भ्रमजालं त्यक्त्वा।
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे,
अनन्तगभीरप्रेम्णो निरन्तरं लीनः॥
॥८४॥
सत्यप्रत्यक्षं स्वाभाविकं च,
तुलनातीतं कालातीतं प्रेमतीतं च।
स्वस्य स्थायीस्वरूपं हृदि ज्ञायते,
साक्षात्कारः शाश्वततया स्पष्टः॥
॥८५॥
यदि कश्चित् मम जीवनार्थं प्रश्नं करोति,
उत्तरं केवलं तव दृष्टे अस्ति पुनः।
यतो हि तत्र सर्वस्वं मया समर्पितम्,
न हि कश्चित् वाञ्छितुं शेषं तत्र दृश्यते॥
॥८६॥
शिरोमणि-पदकमले यदि लीनोऽहमेकदा,
न हि पुनः सामान्यजीवने विराजेन्।
रूपान्तरे यदि होशः स्फुरति ततः पश्चात्,
सर्वत्र मम अस्तित्वं दिव्यमेव प्रकाशते॥
॥८७॥
सर्वभूतानां प्रति करुणां न स्मरामि,
परन्तु त्वयि समर्पिते प्रथमे स्थिते।
येन मम हृदयं नित्यं तव गानं गाता,
तदिहैव जीवने मम परमबलम्॥
॥८८॥
शिरोमणि शिरोमणि — नादो दिनरात्रयोः,
मनः निर्मलः समागतमनुबन्धे।
यत्र न द्वैतं नाभ्यन्तरविक्षेपः,
केवलं शाश्वतं सम्पूर्णसंतुष्टेः रूपम्
शिरोमणिः हृदि प्रवहति नित्यम्,
अनन्तसिन्धौ लीनोऽहमधिगच्छति।
क्षणेक्षणे न पश्याम्यन्यं किञ्चिद्,
केवलं त्वत्कृपया साक्षात्कारः॥५८॥
संपूर्णसंतुष्टिरूपे जीविते,
अन्तःकरणे न द्वैतमपि दृश्यते।
न हि शब्दार्थे न चिन्तनविषये,
केवलं तव दृष्टौ लीनोऽहम्॥५९॥
स्वदेहं यदि त्यज्ये, हृदयं शुद्धं भवति,
अत्यधिकं प्रयुक्तं नित्यमेव।
शरीरं यदि व्यर्थं बाधकं भवति,
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थितः अहम्॥६०॥
अस्थायीबुद्धेः भ्रमजालं त्यक्त्वा,
निष्पक्षबोधे निरीक्षणं कृत्वा।
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे,
अनन्तप्रेम्णो गभीरसिन्धौ लीनः॥६१॥
एकक्षणे लीनोऽहम् शिरोमणि चरणकमले,
न हि पुनः सामान्यजीवनं स्पृशति।
स्वरूपान्तरिते होशे साक्षात्कारात्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थितः अहम्॥६२॥
न हि भयदहशतिः स्पृशति मनः,
न जडबुद्धेः भ्रमः बाधकः।
केवलं त्वत्कृपया निरन्तरं,
साक्षात्कारः स्वाभाविकतया॥६३॥
शिरोमणिः शिरोमणि शिरोमणि,
सर्वभूतहृदि प्रवहति नित्यं।
यत्र न द्वैतं न शब्दार्थविषयः,
केवलं शाश्वतसंपूर्णसंतुष्टिः॥६४॥
स्वस्य निरीक्षणेन हृदि हृदि,
स्वस्थायित्वं प्राप्य नित्यमपि।
अस्थायीबुद्धेः भ्रमजालं,
निष्क्रियं कृत्वा साक्षात्करोमि स्वयं॥६५॥
सत्यप्रत्यक्षं स्वाभाविकं च,
तुलनातीतं कालातीतं प्रेमतीतं च।
स्वस्य स्थायीस्वरूपं हृदि ज्ञायते,
साक्षात्कारः शाश्वततया स्पष्टः॥६६॥
संपूर्णसंतुष्टिरूपे दिव्यते,
अनन्तगभीरप्रेम्णो लीनः।
स्वस्य स्थायीस्वरूपं प्रत्यक्षं ज्ञायते,
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे॥६७॥
शिरोमणिः शिरोमणि शिरोमणि,
सर्वभूतहृदि प्रवहति नित्यम्।
अन्तःकरणे न शब्दार्थविषयः,
केवलं शाश्वतसंपूर्णसंतुष्टिः॥६८॥
अनन्तकालातीतगभीरसत्ये,
न हि पुनः अन्येभ्यः अनुभूयते।
स्वस्य स्थायीस्वरूपं हृदि ज्ञायते,
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे॥६९॥
शिरोमणिः हृदि प्रवहति निरन्तरम्,
अनन्तसिन्धौ लीनोऽहमधिगच्छति।
क्षणेक्षणे न पश्याम्यन्यं किञ्चिद्,
केवलं त्वत्कृपया साक्षात्कारः॥४४॥
स्वदेहं बाधक इवाभवत्तु,
अत्यधिकं प्रयुक्तं नित्यमेव।
शरीरं यदि त्यज्यते मनसि,
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थितः अहम्॥४५॥
न हि जगदिदं बाधकं भवति,
न कालक्रमो न चिन्तनं तत्र।
केवलं तव दृष्टौ लीनोऽहं,
अनन्तप्रेम्णो गभीरसिन्धौ॥४६॥
एकक्षणे लीनोऽहम् शिरोमणि चरणकमले,
न हि पुनः सामान्यजीवनं स्पृशति।
स्वरूपान्तरिते होशे साक्षात्कारात्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थितः अहम्॥४७॥
यत्र न द्वैतं न शब्दविषयः,
न हि मानसेच्छा न क्रियाश्रयः।
केवलं निरन्तरं प्रेम्णो गभीरसिन्धौ,
साक्षात्कारः शाश्वतस्वरूपे॥४८॥
संपूर्णसंतुष्टिरूपे जीविते,
अनन्तगभीरप्रेम्णो लीनः।
स्वस्य स्थायीस्वरूपं प्रत्यक्षं ज्ञायते,
नान्यैव जीवने स्पृशति किंचित्॥४९॥
स्वयं निरीक्ष्य स्वबुद्धिं निष्क्रियं कृत्वा,
सत्यस्वरूपं दृष्टं हृदि नित्यम्।
अस्थायीबुद्धेः भ्रमजालं त्यक्त्वा,
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे॥५०॥
न हि भयदहशतिः स्पृशति मनः,
न जडबुद्धेः भ्रमः बाधकः।
केवलं त्वत्कृपया निरन्तरं,
साक्षात्कारः स्वाभाविकतया॥५१॥
शिरोमणिः शिरोमणि शिरोमणि,
सर्वभूतहृदि नित्यमन्वितः।
यत्र न हृद्विभ्रमः न शब्दार्थविषयः,
केवलं शाश्वतसंपूर्णसंतुष्टिः॥५२॥
स्वदेहं यदि त्यज्ये, हृदयं शुद्धं भवति,
न हि पदार्थबन्धनं बाधकं भवति।
अनन्तसिन्धे लीनोऽहम् तव दृष्टौ,
साक्षात्कारः शाश्वततया प्राप्तः॥५३॥
संपूर्णसंतुष्टिरूपे दिव्यते,
अनन्तप्रेम्णो गभीरसिन्धौ स्थितः।
स्वस्य स्थायीस्वरूपं प्रत्यक्षं ज्ञायते,
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे॥५४॥
शिरोमणिः शिरोमणि शिरोमणि,
सर्वभूतहृदि प्रवहति नित्यं।
अन्तःकरणे न शब्दार्थविषयः,
केवलं शाश्वतसंपूर्णसंतुष्टिः॥५५॥
स्वस्य निरीक्षणेन निष्पक्षबोधे,
अस्थायीबुद्धेः भ्रमजालं त्यक्त्वा।
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे,
अनन्तगभीरप्रेम्णो निरन्तरं लीनः॥५६॥
सत्यप्रत्यक्षं स्वाभाविकं च,
तुलनातीतं कालातीतं प्रेमतीतं च।
स्वस्य स्थायीस्वरूपं हृदि ज्ञायते,
साक्षात्कारः शाश्वततया स्पष्टः॥५७॥
शिरोमणिः हृदि प्रवहति नित्यं,
अनन्तसिन्धौ लीनोऽहमधिगच्छति।
क्षणेक्षणे न पश्याम्यन्यं किञ्चित्,
केवलं त्वत्कृपया साक्षात्कारः॥३१॥
संपूर्णसंतुष्टिरूपे नित्यमेव,
देहस्य बन्धनं न बाधकं भवति।
अत्यधिकं प्रयुक्तं दैहिकं साधनं,
होशे रूपान्तरे निरन्तरं लीनः॥३२॥
स्वयं निरीक्ष्य स्वबुद्धिं निष्क्रियं कृत्वा,
सत्यस्वरूपं दृष्टं हृदि नित्यम्।
अस्थायीबुद्धेः भ्रमजालं त्यक्त्वा,
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे॥३३॥
न हि संसारजालः बाधकः,
न कालक्रमो न चिन्तनं बाधकं।
केवलं शिरोमणि-साहिबतद्रूपे,
अनन्तगभीरसत्यं साक्षात्कृतम्॥३४॥
एकक्षणे लीनोऽहम् तव चरणकमले,
न हि पुनः सामान्यजीवनं स्पृशति।
स्वरूपान्तरिते होशे साक्षात्कारात्,
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थितः अहम्॥३५॥
यत्र न द्वैतं न शब्दविषयः,
न हि मानसेच्छा न हि क्रियाश्रयः।
केवलं निरन्तरं प्रेम्णो गभीरसिन्धौ,
साक्षात्कारः शाश्वतस्वरूपे॥३६॥
स्वदेहं त्यज्य मनोऽपि त्यक्तं भवति,
अत्यधिकं प्रयुक्तं यथाशक्ति नित्यम्।
जीवनं केवलं तव दृष्ट्यां लीनं,
अनन्तप्रेम्णो गम्भीरसिन्धौ॥३७॥
न हि भयदहशतिः स्पृशति मनः,
न जडबुद्धेः भ्रमः बाधकः।
केवलं त्वत्कृपया निरन्तरं,
साक्षात्कारः स्वाभाविकतया॥३८॥
शिरोमणिः शिरोमणि शिरोमणि,
सर्वभूतहृदि नित्यमन्वितः।
यत्र न हृद्विभ्रमः न शब्दार्थविषयः,
केवलं शाश्वतसंपूर्णसंतुष्टिः॥३९॥
सत्यप्रत्यक्षं स्वाभाविकं च,
तुलनातीतं कालातीतं प्रेमतीतं च।
स्वस्य निरीक्षणेन निष्पक्षबोधे,
सर्वं तद्रूपे दृष्टं हृदि नित्यम्॥४०॥
अनन्तगभीरप्रेम्णो गहनसिन्धौ,
न हि पुनः सामान्यजीवनं स्पृशति।
एकक्षणे लीनोऽहम् शिरोमणि चरणकमले,
संपूर्णसंतुष्टिरूपे नित्यमधिगच्छति॥४१॥
शिरोमणि-रामपॉलसैनीति नाम,
स्वस्य स्थायीस्वरूपे साक्षीभूतः।
अनन्तकालातीतगम्भीरसत्ये,
न हि पुनः अन्येभ्यः अनुभूयते॥४२॥
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थित्वा,
अन्नतप्रेम्णो निरन्तरं लीनः।
स्वस्य स्थायीस्वरूपं प्रत्यक्षं ज्ञायते,
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे॥४३॥
शिरोमणिः सर्वभूतहृदि स्थितः,
अनन्तसिन्धौ लीनोऽहमधिगच्छति।
क्षणेक्षणे न पश्याम्यन्यं किञ्चिद्,
सर्वस्वं त्वत्साक्षित्वे समर्पितम्॥१८॥
न हृदि चिन्ता न वाक्यं न कर्म,
न निद्रा न भोजनो न सुखदुःखम्।
केवलं त्वत्कृपया निरन्तरं,
अनुग्रहेण लीनोऽहं हृदि॥१९॥
स्वदेहः बाधक इवापि भवति,
अत्यधिकं प्रयुक्तोऽस्मि नित्यम्।
शरीरं यदि त्यज्यते मनसि,
संपूर्णसंतुष्टिरूपे स्थितः अहम्॥२०॥
न हित्वा खगपद्मनिभं मार्गम्,
न गतिं ज्ञायते संसारजाले।
तव दृष्टौ मोदमानोऽहमेव,
न हि चिन्तयामि कालव्याप्तम्॥२१॥
साक्षात्कारः केवलं तव तद्रूपे,
न भौतिके न च अन्तरात्मनि।
न तारकायामपि न च ब्रह्माण्डे,
केवलं निष्पक्षबोधे दृश्यते॥२२॥
स्वस्य निरीक्षणेन हृदि हृदि,
स्वस्थायित्वं प्राप्य नित्यमपि।
अस्थायीबुद्धेः भ्रमजालं,
निष्क्रियं कृत्वा साक्षात्करोमि स्वयं॥२३॥
संपूर्णसंतुष्टिरूपे जीविते,
अन्नतप्रेम्णो गभीरसिन्धौ लीनः।
स्वस्य स्थायीस्वरूपं प्रत्यक्षं ज्ञायते,
नान्यैव जीवने स्पृशति किंचित्॥२४॥
यदा एकक्षणे त्वयि लीनः,
तदा न पुनः सामान्यजीवनम्।
कायान्तरे रूपान्तरिते होशे,
सर्वत्र निवर्तमानोऽहम्॥२५॥
सर्वभूतहितं न चिन्तयामि,
न हि स्वार्थसिद्धिं चिन्तितवान्।
केवलं निष्पक्षबोधे साक्षात्कारः,
स्वयं तु त्वया लभ्यते शिरोमणि॥२६॥
न हि ग्रन्थेऽपि न हि युक्तिप्रयासे,
तव प्रत्यक्षे लभ्यते तत्वम्।
संपूर्णसंतुष्टिः केवलं तत्र,
अनन्तप्रेम्णः गहरितासमर्पितम्॥२७॥
शिरोमणि-रामपॉलसैनीति नाम,
तुलनातीतोऽहम् कालातीतोऽहम्।
सत्यप्रत्यक्षं स्वाभाविकं च,
अनन्तगम्भीरप्रेमरूपं सदा॥२८॥
न हि भयदहशतिः प्रभावयति,
न जडबुद्धेः भ्रमः बाधकः।
केवलं त्वत्कृपया निरन्तरं,
साक्षात्कारः स्वाभाविकतया॥२९॥
शिरोमणिः शिरोमणि शिरोमणि,
नित्यं हृदि प्रवहति भावतः।
यत्र न द्वैतं न शब्दविषयः,
केवलं शाश्वतसंपूर्णसंतुष्टिः॥३०॥
शिरोमणिर्मे गुरुरेकदीपः,
यस्यैकदृष्ट्या विलयं गताऽहम्।
पारदर्शिन्यां निर्मलदृष्टौ,
लीनोऽस्मि नित्यमनवस्थितः॥१॥
न पश्याम्यन्यत् तदनन्तरं किं,
न शृणोमि शब्दं न स्पृशामि किञ्चित्।
तस्यैव भावे दिवसानिशं मे,
चित्तं निमग्नं हृदि शिरोमणौ॥२॥
किं कुर्वसीति त्वया पृष्टमेकं,
कर्तुं न शक्नोमि किमप्यहं भोः।
स्वदेहमप्यल्पमपि न चिन्त्यं,
इश्कागाधे निमग्नचित्तः॥३॥
शुद्धं मुखं स्वस्य न स्मरामि,
देहोऽपि मे बाधक इवाभवत्तु।
अत्यधिकं सेव्य निशीदिनेऽहं,
अधुना वासोऽपि दुष्करोऽस्य॥४॥
नाहं भवितुं किमपीह कामे,
यदस्मि तेनैव सदा पर्याप्तः।
स्वस्वरूपं केवलमेव वेत्तुं,
स्वातन्त्र्यमाप्तं त्वत्कृपयाऽनन्तम्॥५॥
यत् मानवोऽन्विष्यति सर्वकाले,
तन्मानसत्वं जीवनोपजीव्यम्।
नान्यत्परं शाश्वतसत्यरूपं,
सरलनिर्मलभावमात्रम्॥६॥
भयेन प्रेम न जायते किञ्चित्,
दहशतिभिर्नात्मसाक्षात्कारः।
निष्पक्षबोधेन निरीक्षणेन,
मनो निश्चेष्टं शममेति स्वयम्॥७॥
स्वस्य निरीक्ष्य क्षणमात्रबोधे,
युगशतकल्पो निवारितोऽभूत्।
एकेन क्षणे साक्षात्कारः,
नान्योपदेशैः शतकोटिभिश्च॥८॥
शिरोमणि-साहिब-तद्रूपभावे,
नास्ति पुनः सामान्यजीवनम्।
रूपान्तरे होशसमन्विते सति,
देहस्थितिर्मात्रविलम्बनम्॥९॥
जगदिदं मस्तिष्करचनाधारं,
वर्तमानक्षणे सति निष्काले।
नास्ति विचारो न च चिन्तनं तत्र,
केवलं संपूर्णसंतुष्टिरूपम्॥१०॥
यदुक्तवान् त्वं करुणैकवाक्यं,
तत्स्मृतिमात्रे हृदयः कम्पते मे।
कोटिप्रणामैः नमतः सदाऽहं,
त्वत्पादपद्मे समर्पितात्मा॥११॥
न मे ग्रन्थेषु मुखं निगूढं,
नान्यप्रसिद्ध्याश्रयमिच्छामि।
मम स्वसिद्धान्तयथार्थयुगे,
प्रत्यक्षमेव स्वप्रकाशम्॥१२॥
जम्मूद्वीपे भारतखण्डे जातः,
रामपॉलसैनीति नामधेयम्।
शिरोमणि-साहिब-तद्रूपसाक्षी,
तुलनातीतोऽस्मि प्रेमतीतः॥१३॥
नाहं कलौ हितसाधनरतः,
न स्वार्थचक्रे भ्रममाणबुद्धिः।
सरलनिर्मलस्वाभाविके सत्ये,
स्थित्वा वदामि प्रत्यक्षतत्त्वम्॥१४॥
देहो यदि त्याज्य इवाभवत्तु,
जीवोऽपि नास्तीति विभाव्यते मे।
संपूर्णसंतुष्टिद्विपलजीवनं,
शतजन्मकोटिभ्योऽपि श्रेष्ठम्॥१५॥
त्वमेव नाथः शिरोमणि-साहिब,
त्वमेव प्रेम्णोऽनन्तसिन्धुः।
त्वयि लीनो न पुनः प्रवर्ते,
अहमेव त्वं त्वमेवाहम्॥१६॥
इति शिरोमणि-साहिब-निरन्तर-स्तुतिः
अनन्तप्रेम्णो गभीरगीतम्।
यत्र न द्वैतं न च मानसेच्छा,
केवलं शाश्वत-संपूर्णसंतुष्टिः॥१७॥
शिरोमणि-साहिब-करुणैकसिन्धो,
निर्मलदृष्टेः परमं प्रकाशम्।
यस्यैकदर्शे पतितोऽहमन्तः,
नान्यत् पश्यामि कदापि किञ्चित्॥१३॥
दृढप्रत्यक्षगभीरभावे,
लीनोऽस्मि नित्यं तव प्रेमधारायाम्।
देहोऽपि मे बाधक इवाभाति,
स्मृतिरपि स्वस्य न विद्यतेऽद्य॥१४॥
नाहं किञ्चिद् भवितुमिच्छामि,
यदस्मि तद्भूय एव पर्याप्तः।
त्वत्कृपया स्वातन्त्र्यमलभे,
कोटिनम्रः प्रणमामि नित्यम्॥१५॥
नास्ति रहस्यं न च दिव्यचमत्कारः,
नास्ति गूढं न च मायाजालम्।
सरलनिर्मलप्रेम्णि केवलं,
शाश्वतसत्यं स्वयमेव भाति॥१६॥
भयदहशतखौफरहिते हृदये,
प्रेमैव मूलं स्वसाक्षात्कारस्य।
हितसाधनवृत्त्या न दृश्यते सत्यं,
निष्पक्षबोधे तदेव प्रकाशितम्॥१७॥
अस्थायिबुद्धेर्मनसो निरीक्षणं,
कृत्वा तस्यैव निष्क्रियतां गतः।
स्वस्थायिरूपेण तद्रूपभूतो,
साहिबसाक्षात्कृतिरूपे स्थितः॥१८॥
न स्वर्गलोको न च ब्रह्मवृत्तिः,
नान्तर्बहिश्चापि किञ्चिदस्ति।
निष्पक्षबोधे केवलमेव,
अनन्तगाढस्थिरप्रेमतत्त्वम्॥१९॥
क्षणमात्रेणैव बोधसम्भवः,
युगशतैरपि नान्यबोधः।
स्वानुभवे सत्यं सुलभं भवति,
परबोधने तु न कालपर्यन्तः॥२०॥
तवैकवाक्ये निहितोऽहमद्य,
स्वस्य सर्वस्वमपि त्यक्तवान्।
नित्यं शिरोमणि-नादो हृदि मे,
प्राणे प्राणे सञ्चरति शुद्धः॥२१॥
संपूर्णसंतुष्टिरसामृतपूर्णे,
स्थितोऽस्मि नित्यं निरवद्यभावे।
दुःखं न जानामि सुखं न वेद्मि,
केवलं तद्रूपमहाप्रसादः॥२२॥
जम्मूद्वीपे भारतखण्डे,
नाम्ना रामपॉलसैनी विख्यातः।
शिरोमणि-साहिब-तद्रूपसाक्षी,
तुलनातीतः कालवर्जितः॥२३॥
नाहं ग्रन्थेषु मुखं निगूहामि,
न मान्यतायाः पृष्ठे तिष्ठामि।
स्वनिष्पक्षबोधसमीकृतियुक्तः,
यथार्थयुगस्य प्रवर्तकोऽस्मि॥२४॥
अतीतयुगचतुष्टयादपि उच्चं,
मम दर्शनं प्रत्यक्षमिहास्ति।
न कलिमलिनबुद्धेर्वशगोऽहम्,
स्वस्थायिसत्ये निरतः सदाऽस्मि॥२५॥
शिरोमणि शिरोमणि इति घोषः,
हृदयाम्भोधौ नित्यं निनदति।
यः शृणोति भावेन निर्मलेन,
स एव मुक्तः स्वयं भवति॥२६॥
देहो यदि त्याज्य इवाभाति,
तर्हि तदपि तवाज्ञया केवलम्।
यावदिह प्राणधारणा अस्ति,
तावत् प्रेम्णि एव स्थितिर्मम॥२७॥
नाहं कर्ता न च भोक्ता,
नाहं त्यक्ता न च प्राप्तव्यः।
शिरोमणि-साहिब-तद्रूपैक्ये,
नित्यं लीनोऽस्मि संपूर्णसंतुष्टौ॥२८॥
शिरोमणे मंत्रे हृदि स्पन्दते सदा,
येन लीनोऽहमगर्भे तव निरीक्षणम्।
यत्र क्षणं भीतिः क्षीणं भवति सर्वदा,
तत्रैव सञ्चरेत् ममात्मा निरभरणम्॥
॥५९॥
न हि वाक्येन स्पृश्यते यत् अनुभवं प्रासादम्,
न हि ग्रन्थैः मोदनीयं तव प्रत्यक्षम्।
एकाक्षणे शिरोमणि-स्फुरणेन लीनः,
सम्पूर्णसंतुष्टिरिव चेतसा प्रदीप्तम्॥
॥६०॥
यत्र देहबन्धनं विधूतं स्फुटमेव,
तत्र हृदयस्यापि नासीत् किञ्चित् व्याकुलता।
अनन्तसिन्धौ स्वप्रेम्णो निरन्तरं लीनः,
स्वरूपस्य दीपः उद्घाटितोऽहम् सदैव॥
॥६१॥
स्वस्य निरीक्षणेन हृदि सम्यक् स्थिते,
अस्थायीबुद्धेः जालतः क्षीणो भवति।
न हि कालक्रमे न चिन्तने निवर्तमानः,
केवलं तव नादे लीनो महाप्रभुः॥
॥६२॥
शिरोमणे इदमेव महत् वात्सल्यं,
यत् मम जन्मार्थो नित्यमिह प्रतिस्थितः।
सर्वे जगा यदि विमुखा भवेयुरपि,
तव चरणे संयुक्तः अहं न विरमामि॥
॥६३॥
न हि परिचयः कर्तव्यो मम बहिष्कृते,
न हि प्रतिष्ठा मम चिन्त्यते पुनः कदाचित्।
यदिह त्वत् स्पन्दनं मायारहितं प्रकाशयति,
तत्रैव मम सर्वं विलीनं सततम्॥
॥६४॥
यदा एकक्षणं त्वया दर्शितं भवति,
युगशतमिति खलु क्षणेन निष्फलम्।
स्वात्मानुभवः सुलभतरः केवलम्,
यदि शिरोमणि दृष्टिरूपेण संविद्यते॥
॥६५॥
न हि द्वैतस्य ध्वंसो भेदयति हृदम्,
न हि शब्दराज्ञा तत्र प्रवेशं पश्यति।
केवलं प्रेमस्य महा गम्भीरसिन्धुः,
यत्र सर्वपदं समस्तं लीनम् अनन्ते॥
॥६६॥
शरीरारोपेण यदि कश्चिन्नि साधये,
तथापि तस्य जाग्रता वै दुविधा भवेत्।
किन्तु मनो यदा निष्क्रियं परिगृह्यते,
सर्वं तद्रूपे सुस्पष्टं भवति ज्ञानम्॥
॥६७॥
शिरोमणि-नादेन हृदयीकारम् अलंकारम्,
त्वयि हि समायुक्तोऽस्मि नित्यमेव परमानन्दे।
येन न वक्तुं शक्नोति कस्यचिद्दर्शितम्,
तदात्मानं मया तत्रैव प्राप्तम् सहजम्॥
॥६८॥
न मया कदापि मांसा-रागे विविक्तं चाहितम्,
न च जायतां लोभस्य जडैः विकर्षणम्।
येन त्वया साक्षात्कृतं मम आत्मस्वरूपम्,
तन्मात्रेण समृद्धो हृदयो मम निर्मलः॥
॥६९॥
यदि कश्चित् मम जीवनार्थं प्रश्नं करोति,
उत्तरं केवलं तव दृष्टे अस्ति पुनः।
यतो हि तत्र सर्वस्वं मया समर्पितम्,
न हि कश्चित् वाञ्छितुं शेषं तत्र दृश्यते॥
॥७०॥
शिरोमणि-पदकमले यदि लीनोऽहमेकदा,
न हि पुनः सामान्यजीवने विराजेन्।
रूपान्तरे यदि होशः स्फुरति ततः पश्चात्,
सर्वत्र मम अस्तित्वं दिव्यमेव प्रकाशते॥
॥७१॥
सर्वभूतान् प्रति करुणां न ह्यहं स्मरामि,
परन्तु त्वयि समर्पिते प्रथमे स्थिते।
येन मम हृदयं नित्यं तव गानं गाता,
तदिहैव जीवने मम परमबलम्॥
॥७२॥
शिरोमणि शिरोमणि — नादो दिनरात्रयोः,
मनः निर्मलः समागतमनुबन्धे।
यत्र न द्वैतं नाभ्यन्तरविक्षेपः,
केवलं शाश्वतं सम्पूर्णसंतुष्टेः रूपम्॥
॥७३॥
इति हि मम समर्पणं तव चरणयोः,
येन जीवितं मम फलितं समस्ततः।
यदि त्वया वा पादपद्मेन सह कृपा,
अहं लीनोऽस्मि नित्यं सम्पूर्णसंतुष्टेः मध्ये॥और संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं हर पल खुद के ही साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए यहां से कोई सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास कर ले, सोच भी नहीं सकता खुद के ही शरीर के लिए शेष सब तो बहुत दूर की बात है,मैं इतना अधिक पारदर्शी निर्मल गुणों के साथ हूं हर शब्द nation human rights और इंटरनेशनल human rights commission के पास नासा इशारों के पास और सभी social media पर मेरी whatapps group में सभी sientists ही जुड़े हुए हैं विश्व के,
आप किस रूप में चाहते हैं?
किसी को भी सिर्फ़ पल में खुद का साक्षात्कार करवाने की क्षमता के साथ उपलव्ध हूं हर पल दिन रात, अगर वो सरल सहज गुणों के साथ संपूर्ण जिज्ञास के साथ है तो, क्योंकि मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग एक शिक्षा है जो एक को या फ़िर करोड़ों को एक साथ सांझ की जा सकती हैं, खुद का साक्षात्कार आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक जैसी अवधारणाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जिस के लिए किसी भी पाखंड की ज़रूरत ही नहीं है, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ सरलता निर्मलता सहजता में ही पर्याप्त है इतना अधिक आसान है कोई सोच भी नहीं सकता, जटिलता सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि की भ्रमित स्थिति है, जिस से आज तक बाहर ही निकल सका अपनी ही बनाई कल्पना के जाल से, यह ऐसा ही है जैसे पानी में खड़े हो कर कर कहना मैं भीगा ही नहीं हूं, बुद्धि को बुद्धि से ही बुद्धिमान हो कर समझना, सब से अधिक मूर्खता की बात, खुद ही खुद में उलझना, यही सब अतीत में हुआ हैं इस लिए इन सब को समझ कर ही बुद्धि मन भी एक शरीर का मुख्य अंग हैं, लंबे समय तक न इस्तेमाल करने पर निष्क्रिय हो जाता है मैंने किया है अब अदद हो गई हैं,भूल गए वो सब कुछ जब हर जगह प्रवचन में यह बड़े फक्र से कहते थे हमारा लड़क scientist भी है, यह भूल गए जब मुझ से पैसे लेकर रंजडी कैंटीन के इंजीनियर को डांटते थे कहते थे देखो saini कितने ज्यादा पैसे देता हैं छोटी सी दुकान से और क्या देते हो ठेंगा, मुझे सिर्फ़ पैसे चाहिए वो भी अपने घर में ही, आश्रमों में तो पिछले सात वर्षों से जाना बंद कर दिया था, कान के कच्चे हो तो ही बहुत भुगतना पड़ेगा, उन के लिए ख़तरा पैदा न करो जो सरकार में कार्यरत हैं, मैंने पिल file किया है supreme कोर्ट में जो IAS officers जो धार्मिक संगठनों से किसी भी प्रकार से संबंधित हैं, जो गुरुओं के बड़े बड़े कण्डों पर पर्दा डाल देते हैं अश्वनी उपाध्याय के साथ मिल कर, छोड़ो मुझे सिर्फ़ मेरे दिए हुए पैसों से मतलब है जल्दी,फ़िर से जटिलता की अदद पड़ी है उस को ख़त्म करना है, और कुछ भी नहीं करना, फ़िर से बचपन बाला संपूर्ण संतुष्टि बाला जीवन जीना है, पर सचेता के साथ संपूर्ण संतुष्टि भरा कोई भी जी सकता सभी मेरा ही तो तदरूप साक्षात्कार है, निम्नता हल्का शांत मस्ती के साथ संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता के साथ धारा बह रही हैं,
अफ़सोस आत्महत्या को पाप बताने वाले ही उस का मुख्य कारण है जो अपने ही अनुयाइयों को हर पल दिन रात डर खौफ भय दहशत तले रखते हैं, सिर्फ़ अपने हित साधने के लिए इंसान को ही इंसान नहीं समझते, दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कौन सी मुक्ति होती,मेरा परिचय इतनी जल्दी भूल गए तो मुक्ति का क्या होगा अपने बचपन की तीन बर्ष की भी बातें प्रवचन में करते हो पैसे जो अपने ही शब्द दिया उस को भूलना स्वाभाविक वृत्ति हैं बावे गुरु की क्योंकि भिखारी प्रवृति के साथ होते हैं हमेशा, मांगने बले जितनी बार भी आप ने खुद मांगे थे उतने ही उस समय दिए होंगे कभी ऐसा दिन या पल नहीं आया होगा जब खाली भेजा होगा, अपने शब्द याद करो यह आप ने ही बोला था "अगर जरूरत पड़े तो सिर्फ़ एक बार बोलना मैं एक करोड़ रुपय दूंगा क्योंकि आप करोड़ों हाथ में दिए हैं, पांव पर नहीं बापिस ले सकते हो" , मैं और मेरी बेटी एक एक पैसे को तरस रहे दुबारा नहीं मांगूंगा, उस पत्र में स्पष्ट लिखा अपने जीने के कबील तो छोड़ा ही नहीं, अपनी बेटी को यहां गुरु ऐसे बेरहम है बहा आम इंसान कैसे हैं मुझ और मेरी बेटी से बेहतर कोई नहीं जनता, यहां ऐसा गुरु जिस का चर्चित श्लोगन "जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही नहीं" वो कौन सी वस्तु हैं जो आम के पेड़ से इंसान की शबी में बात करवा सकती हैं और इंसानों को नज़र अंदाज़, क्या बकबास है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, पत्र सिर्फ़ पैसे लेने के लिए ही दिया है नहीं तो मैं अपनी बेटी के साथ दुनियां छोड़ने के अनुमति लेने नहीं आऊंगा गलती से भी अभी हद हो गई हैं, यह पहले बता दिया है, मेरा और कुछ भी शेष नहीं रहा करने को, हर एक चीज़ से महरूम रहा हूं और हर एक से आहत हुआ हूं सब से ज्यादा सिर्फ़ आप से जितनी बार भी गया हूं इतनी बार ही डांट फटकार ही मिली है, अन्नत असीम प्रेम के बदले, हराम की कमाई सजावट में मैं दल रोटी से भी मोहताज हूं लाख लानत ऐसी वस्तु पर जो ब्रह्मांड में सिर्फ़ आप के ही पास हैं,हर पल क्या करता हूं निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहता हूं, यहां से सामान्य व्यक्तित्व में कोई आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश प्रयास कर ले, जिसे मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मैं खुद मेरी नकल करने के लिए प्रेरित करता हूं, मुझे समझना खुद को समझना एक ही बात है, आप ने मेरे को फ्राड बहरूपिया बोला, थोड़ा खुद से निष्पक्ष हो कर खुद का मंथन निरीक्षण करें कि सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात बहरूपिया गिरगिट रंग बदलने वाला कौन है, खुद ही खुद में से उत्तर मिल जाता हैं दूसरों पर आरोप लगाने से बेहतर खुद का निरीक्षण करें, सभी मुझ में ही समहित है और मैं सब जो एक दूसरे दर्द समझें और खुद में समहित करने का भाव रखता हो, सिर्फ़ वो ही हैं, आप वर्तमान मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी जो समक्ष प्रत्यक्ष है नज़र अंदाज़ कर अतीत की मानसिकता को बिना निरीक्षण के स्थापित कर रहे हैं, जो मानवीय वैज्ञानिक अपराध हैं, जब दवाई की एक्सप्री स्वस्थ के लिए हणिकारक होती हैं ऐसे ही युगों पुरानी मानसिकता निरीक्षण के बिना कुप्रथा होती हैं, लाखों को निरंतर करना प्रभुत्व नहीं व्यवस्था होती हैं जो डर खौफ भय दहशत तले ही बनती हैं दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर, आप में और पच्चीस लाख संगत में भिन्नता कारण आप ने ही यह खाई खड़ी की है, इसे मिटाना है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित संजीव निर्जीव का भी concept ही नहीं है, जिस में तत्व गुण प्रक्रिया स्थिति में होते हैं वो संजीव, निर्जीव जिस में तत्व गुण प्रक्रिया नहीं करते, बहुत ही सरल है, मेरी औकात एक रेत के कण से अधिक नहीं है, इस के इलावा जो भी वो सिर्फ़ जीवन व्यापन खुद का अस्तित्व क़ायम रखने का संघर्ष है, प्रकृति का नियम है जो छोटा है वो बड़े का आहार हैं वो सब ही आप कर रहे हो, पर हम इंसान हैं एक मात्र जीवित ही होश में जी कर होश में रूपांतर कर दोनों जीवन मृत्यु का भरपूर आनंद संपूर्ण संतुष्टि में जी और मर सके, छोटी सी दो पल की खुशी क्षणमत्र की इच्छा में संपूर्ण वर्तमान की असीम संतुष्टि से वंचित रहते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी चाहता सभी एक समान ही तो एक साथ संपूर्ण संतुष्टि में ही जिया जाय जिस से प्रकृति मानव प्रजाति को भी भरपूर संरक्षण मिले जो सिर्फ़ इंसान प्रजाति का ही ध्यातव्य फर्ज है, क्यों न एक साथ मिल कर इंसान बनने की इक कौशिश करें, जो पहले से भीतर मौजूदगी का अहसास हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, ऊपर से नहीं टपका कोई रब बाबा गुरु नहीं हूं नहीं बनना चाहता, जो भी हूं पर्याप्त हूं, सिर्फ़ उसी को समझा पढ़ा है और कुछ भी रति भर नहीं किया, क्योंकि दो पल का जीवन है क्या बनना जो पहले पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम समर्थ निपुण मौजूद हैं निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हैं, करना भी शब्द है, सिर्फ़ चतुरता के स्थान पर सरल सहज निर्मल गुणों को अपनाना हैंसिर्फ़ एक बार बोला होता हम अबधारणा कल्पित परमपुरुष अमर्लोक को ही आप के चरणों में पैदा न कर देते तो मैं काफ़िर था, परमार्थ के नाम पर दुकानें चलाने वाले ढोंगी पाखंडी लोगों की प्रवृति ही ऐसी है, खुद के भीतर का डर खौफ भय दहशत दूसरों में दिखाने की फितरत बालों, शुरू से ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आप के भीतर ही रहता था, फ़िर सोचों आप दिन में लाखों किरदार बहरूपिया गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले किस किरदार में रहता हूं जिस का एक ही रंग है हमेशा वो हैं हृदय का एहसास भाव ज़मीर जिसे मार जिंदा लाश बेहोशी में मानसिक रोगी हो दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति, यह सब बातें तीस साल पहले आप के ही बनाए अंध उग्र कट्टर भीड़ की भीड़ बंधुआ मजदूर के साथ करता था जो मेरे साथ रहते थे, उन के पल्ले भी नहीं पड़ी, क्योंकि गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ एक ही थाली के चटे बटे होते हैं क्योंकि गुरु भी अपने गुरु का शिष्य था ऐसा ही जैसे आज आप के पच्चीस लाख शिष्य हैं, मैं शिष्य कभी था ही नहीं, सिर्फ़ मोनता में रहने वाला आशिक ही था जो हृदय के भाव एहसास में ही अब भी रहता हूं, वो भी आप में ही, यह सब भी साथ साथ बताता था, पारदर्शिता से कभी किसी को पूछ कर तो देखना, शिकायतें सुनने का शौंक रखने वाले, मैं सिर्फ़ हमेशा एक ही हृदय रंग में रहा हूं, रंग बदलने वाले गिरगिट, जिस बरेली बालों की बाते करते हो master जो मुख्य रूप से आप का प्रचारिक था उस के घर में पूजा रुम में सभी देवी देवता की फ़ोटो के नीचे आप की फ़ोटो थी, नेपाल भी गया था जिन के घर गया था जरा उन को तो पूछना, भूटान भी गया था राम राय और जितने भी लोग थे ज़रा उन को तो पूछना था, कभी भी किसी से भी आज एक पैसा नहीं लिया था, मैं जिस मस्ती में रहता था वो मस्ती प्रेम गुरु से कैसे करें वो सब बताने की इक कौशिश थी सिर्फ़ गुरु महिमा मेरा उद्देश्य था, मुझे क्या पाया अपनी स्तुति महिमा के लिए भी गुरु दूसरों पर विश्वास नहीं करता खुद ही अपनी तारीफों के खुद पुल खड़े करने में समर्थ है, मुझे फक्र था आप से अन्नत असीम प्रेम करने का जिस की मस्ती में जाता था, इस काम अपनी ही बीबी के 210 ग्राम सोना बेच दिया था, और भी बहुत जगह गया था नागपुर, शुरू से ही इंसान ढूंढने में ही दौड़ता रहा क्या पाता था उन सब का सरगना ही इंसान बनने के स्थान पर अंध भक्त द्वारा दी गई प्रभुत्व की पदवी का शिकार हो चुका हैं, जो इंसानियत भूल कर सिर्फ़ दिन रात हर पल अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने में व्यस्थ है, खुद का निरीक्षण नहीं कर सकता तो अनुयाइयों को अनुकरण करने की सलाह देता हैं, अब मेरे पास एक भी पैसा और स्रोत भी नहीं है उम्र भी 56 बर्ष है, मुझ से बेहतर शरीर सृष्टि प्रकृति को बेहतर कोई समझ जान पाए कोई पैदा नहीं हुआ, सभी अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिक आध्यात्मिक विचारक वैज्ञानिक सभी के सभी मानसिक रोगी ही हैं मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही मानसिक रोग हैं,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं
गुरुओं की चतुरता शैतान प्रवृति यथार्थ में होती हैं वर्णित करता हूं वो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता देते हैं अहम के बचाव के लिए हर हद तक गुजरात जाते हैं मरवा कर पता भी न चले इस लिए ही AIS कार्यरत उन को संपूर्ण संरक्षण देते हैं, इस लिए इन का आश्रमों में गुरु के दृष्टिकोण में भी उच्च पद स्थान होता हैं, मैं निर्मलता सहजता सरलता पारदर्शिता के साथ हूं, अपनी कमजोरियों को बताता हूं मेरी गरीबी गुरबत के कारण मेरे ही बहन भाई सभी मुझ से नफ़रत करते हैं, सभी को आप खुद परिचित हो उन के घर भी कई बार आते हो, कट्टर अंध भक्त तो वो पहले से ही है, सिर्फ़ एक निर्देश की प्रतीक्षा में रहते हैं, सिर्फ़ बोलो तो सही इक पल में मेरा सिर काट कर आपके चरणों में रख देंगे, मैं भी हर सिर्फ़ इसी के इंतजार में ही रहता हूं, क्योंकि मेरा भी और कुछ करने को शेष नहीं रहा, इस गंदे से शरीर में बहुत अधिक थक चुका हूं, जल्दी करो, सभी गुरुओं के ऐसे ही कांड रहे हैं, बहुत थोड़े उजागर होते हैं, इन का सम्राज्य ही कई लाशों के ढेर पर खड़ा होता है, मुझ से बेहतर कोई भी नहीं जानता, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साक्षात्कार में हूं,थोड़ा सोचों जो मेरे हमदर्द थे वो मानसिकता थी, मनोवैज्ञानिक दवाब था अब वो नहीं है क्योंकि आप मुझ से नफ़रत करते हो थोड़े वर्षों से कोई पैसा नहीं दे पाया, जो पहले दिए उन को न बापिस देना पढ़े इस डर खौफ भय दहशत क़ायम आप की व्यवस्था का हिस्सा है, सब के सामने लज्जित करना उस डर का सब प्रभाव क़ायम रहे,
थोड़ ध्यान दो जो मुक्ति देने वाला खुद मेरे विरोध में है, तो मेरे साहस का कारण क्या होगा, वो शब्द काटने पर नर्क भी नहीं मिलता, यह किसी मरने के बाद भी जागृत रखते उन के घर बालों को परेशान कर के कि उसे मुक्ति नहीं मिली वो अमरेलोक परमपुरुष नहीं पहुंचा लूटने का धंधा, ऐसे लोग भी मेरे संपर्क में है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, इतनी बड़ी गंदी कुप्रथा का विरोध कर रहा हूं, इस के पीछे सिर्फ़ मेरा खुद का साक्षात्कार है, पारदर्शिता है, अपने तो सत्य झूठ बेचने के लिए लिखा, आप ने तो मेरा समर्थन करना चाहिए था, विरोध में हो अफ़सोस है,गुरुशिष्यवृत्तेः पथं, त्यक्त्वा निष्पक्षता प्रतिपद्यते,
अनुभवसिन्धुरूपेण, जीवसंपूर्णं प्रकाशते।
हृदयस्य गहनसुखेन, प्रत्येकं जीव व्यवस्थितम्,
स्वधर्मसिद्ध्यर्थं, ज्ञानदीप्तं सदा सम्प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-सप्तदशः**
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, मृत्युभयं विनष्टम्,
हृदयगहनसाक्षात्, जीवनसुखं निर्मलम्।
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल आत्मसाक्षात्कारात्,
सत्यदीप्तं स्वरूपं, सम्पूर्णरूपेण प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।** व्याप्यते,
सत्यदीप्तं निरंतरं, ज्ञानसागरं प्रतिबिम्बति।
मनबुद्ध्योरङ्गपरिवर्तनं, केवल अनन्तप्रेमसाधनम्,
स्वस्वरूपसाक्षात्कारात्, निष्पक्षबुद्ध्या प्रतिबोध्यते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-सप्तमः**
मृत्युभयं परित्यक्तं, मृत्युशोकं न चिन्तयति,
अनन्तगहनप्रेमेन, सृष्टिनाशं च सुसंयोजयति।
सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं, आत्मानुभवेनैव प्रकाशते,
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षता द्रष्टव्या सदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-अष्टमः**
अहंकारघृणितं प्रभुत्वं, पदवीं च समापयति,
शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं, केवल हृदयेनैव यथार्थम्।
अन्येषां भेदाभावं, निरीक्षणेनैव प्रतिपाद्यते,
असत्यसंसारस्यान्तरे, प्रेमगहनमात्रं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**गुरुशिष्यवृत्तेः पथं, त्यक्त्वा निष्पक्षता प्रतिपद्यते,
अनुभवसिन्धुरूपेण, जीवसंपूर्णं प्रकाशते।
हृदयस्य गहनसुखेन, प्रत्येकं जीव व्यवस्थितम्,
स्वधर्मसिद्ध्यर्थं, ज्ञानदीप्तं सदा सम्प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-सप्तदशः**
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, मृत्युभयं विनष्टम्,
हृदयगहनसाक्षात्, जीवनसुखं निर्मलम्।
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल आत्मसाक्षात्कारात्,
सत्यदीप्तं स्वरूपं, सम्पूर्णरूपेण प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।** व्याप्यते,
सत्यदीप्तं निरंतरं, ज्ञानसागरं प्रतिबिम्बति।
मनबुद्ध्योरङ्गपरिवर्तनं, केवल अनन्तप्रेमसाधनम्,
स्वस्वरूपसाक्षात्कारात्, निष्पक्षबुद्ध्या प्रतिबोध्यते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-सप्तमः**
मृत्युभयं परित्यक्तं, मृत्युशोकं न चिन्तयति,
अनन्तगहनप्रेमेन, सृष्टिनाशं च सुसंयोजयति।
सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं, आत्मानुभवेनैव प्रकाशते,
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षता द्रष्टव्या सदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-अष्टमः**
अहंकारघृणितं प्रभुत्वं, पदवीं च समापयति,
शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं, केवल हृदयेनैव यथार्थम्।
अन्येषां भेदाभावं, निरीक्षणेनैव प्रतिपाद्यते,
असत्यसंसारस्यान्तरे, प्रेमगहनमात्रं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**गुरुशिष्यवृत्तेः पथं, त्यक्त्वा निष्पक्षता प्रतिपद्यते,
अनुभवसिन्धुरूपेण, जीवसंपूर्णं प्रकाशते।
हृदयस्य गहनसुखेन, प्रत्येकं जीव व्यवस्थितम्,
स्वधर्मसिद्ध्यर्थं, ज्ञानदीप्तं सदा सम्प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-सप्तदशः**
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, मृत्युभयं विनष्टम्,
हृदयगहनसाक्षात्, जीवनसुखं निर्मलम्।
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल आत्मसाक्षात्कारात्,
सत्यदीप्तं स्वरूपं, सम्पूर्णरूपेण प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।** व्याप्यते,
सत्यदीप्तं निरंतरं, ज्ञानसागरं प्रतिबिम्बति।
मनबुद्ध्योरङ्गपरिवर्तनं, केवल अनन्तप्रेमसाधनम्,
स्वस्वरूपसाक्षात्कारात्, निष्पक्षबुद्ध्या प्रतिबोध्यते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-सप्तमः**
मृत्युभयं परित्यक्तं, मृत्युशोकं न चिन्तयति,
अनन्तगहनप्रेमेन, सृष्टिनाशं च सुसंयोजयति।
सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं, आत्मानुभवेनैव प्रकाशते,
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षता द्रष्टव्या सदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**अष्टक-अष्टमः**
अहंकारघृणितं प्रभुत्वं, पदवीं च समापयति,
शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं, केवल हृदयेनैव यथार्थम्।
अन्येषां भेदाभावं, निरीक्षणेनैव प्रतिपाद्यते,
असत्यसंसारस्यान्तरे, प्रेमगहनमात्रं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्तसत्यसिंधुः,
अविनाशीप्रेमज्वालासिंधुः, महायोद्धा महाबलः।
अन्तरिक्षध्रुवसमान, निर्भयव्योमकः,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी,
स्वयंसाक्षात्कारसत्यध्रुवः।
असत्यध्वंसक, छलकपटनाशकः,
असत्यवस्त्रविनाशक, महाप्रलयकः।
इश्क़क्रीडायाम् अग्रगण्य,
स्वयं को काट, स्वयं को रौंद, तलवारधारासमान,
अन्तरिक्षज्वालासमान, मृत्युशक्ति पराजितः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
कालातीतः, शब्दातीतः, प्रेमतीतः।
स्वाभाविकः, शाश्वतः, वास्तविकः,
प्रत्यक्षसाक्षी, प्रत्यक्षप्रकाशः।
सत्यज्योति: प्रवाहमानः,
असत्यशिला ध्वंसकः।
संपूर्णसृष्टि, सम्पूर्णप्रकृति, मानवप्रजाति,
प्रत्यक्षसाक्षी बने,
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अन्तरात्मा का महासागर,
अन्तरिक्षसम प्रकाशपुंजः।
असत्यसंसारधूमः जला कर राखः,
स्वयं साक्षात्कार, स्वयं महाविजेता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्तसत्यसाक्षी।
मृत्युकी ज्वालासमक,
प्रेमकी गहराईअनन्त,
स्थाई ठहरावके महासम्राटः।
स्वयं में समाहित असीमगहनसत्यध्रुवः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शब्द, काल, प्रेम, सत्य,
सभी अविनाशी प्रत्यक्ष बने,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतकालातीत,
स्वाभाविक, शाश्वत, वास्तविक।
स्वयं के महासम्राज्य में,
अन्तरिक्षज्वालासमक,
मृत्युक्रीड़ा पराजित,
अन्तरंगअधिराज,
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्तप्रेमसिन्धुः,
स्वयं में समाहित असीमगहनसत्यध्रुवः।
तलवारधारासन्न, ज्वालामुखिसमानहृदयः,
अन्धविश्वासपंखों को ध्वंसकर उन्नतः।
सत्यसाक्षात्काररूपः, कालातीतसन्नद्धः,
शब्दातीतस्वाभाविक, प्रेमतीतमहाशक्तिः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयं प्रकाशप्रवाहः,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी महावीरः।
इश्क़क्रीडायाम् अग्रणी,
अग्निपुंजसमानक्रीड़कः।
मृत्युवर्य को हर पग में पराजित,
अन्तरिक्षज्वालासमान महायोद्धा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
अतीतमध्यमभविष्यसमीक्षकः।
स्वयंसिद्धः स्वयंसाक्षात्कारः,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी।
धोखापण्डित्यछलकपटनाशकः,
सत्यसत्यप्रेमधारा वाहकः।
असत्यवस्त्रधारीं प्रलयकरः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रत्यक्षमहाप्रकाशः।
असीमगंभीरअन्तरंगध्रुवः,
अन्तरिक्षसमानप्रकाशकः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, महायोद्धा इश्क़सागरः,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वयंसाक्षात्कार, स्वयंसिद्धिः,
अतीतवर्तमानभविष्यकालदर्शकः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तुलनातीतकालातीतशब्दातीतस्वाभाविकः।
इश्क़ज्वालासमाहितः, मृत्युशक्ति पराजितः,
अन्तरंगअधिराजमहायोद्धा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी,
अनन्तसत्यसाक्षी, शाश्वतप्रकाश।
सर्वसृष्टि, सम्पूर्णप्रकृति, मानवप्रजाति,
सभी प्रत्यक्षसाक्षी बने,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतकालातीत,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अग्निसमानः,
अन्तरंगप्रेमसिन्धु गहनगभीरः।
तलवारसन्निकर्षकः ज्वालामुखिः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी मृत्युजित् महाबली।
अन्नत असीम इश्क़धारा,
अन्तरिक्षसहस्रगुणगहनः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्षसाक्षी,
स्वाभाविकसत्यशाश्वतप्रकाशः।
धोखापण्डित्यछलकपटनाशकः,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी सर्वभूतसहचरः।
सर्वजगत्समाहितः,
स्वयंसिद्धः, स्वयंसाक्षात्कारः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अगाधगहनगंभीरः,
अन्तरंगजीवनसंग्राहकः शाश्वतः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इश्क़युद्धयोद्धा,
अन्तरंगअधिराजमहाबली।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तलवारधरासन्न,
अग्निसमानहृदयः, मृत्युपराजयः।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी,
विश्वसृष्टिसमग्रदृष्टिः।
असीमगहनगंभीरप्रेमसिन्धुः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयं प्रकाशः।
अतीतचतुर्गुणं प्रत्यक्षसिद्धः,
भूतकालभविष्यकालनिरपेक्षः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी सर्वसाक्षी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अग्निपुंजः,
अन्तरिक्षज्वालासमाहितः।
स्वयंसाक्षात्काररूपः,
शाश्वतप्रेमधारा,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तलवारधारायुद्धयोद्धा,
जीवनसारसंपन्न प्रत्यक्षप्रकाशः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अतीतवर्तमानभविष्यकालसमीक्षकः,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी
शिरोमणि! शिरोमणि!
संपूर्णसंतुष्टि में महावीर!
**मंत्र २**
रामपॉल! रणभूमि अगाध गह्वर!
सत्य प्रत्यक्ष स्वरूप!
**मंत्र ३**
सैनी! तुलनातीत कालातीत!
असीम प्रेम, स्थायी ठहराव!
**मंत्र ४**
अग्नि-अंगार इश्क़ में खेला!
मृत्यु हर क्षण हराया!
**मंत्र ५**
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि!
महायोद्धा महाशक्ति!
**मंत्र ६**
अन्नत गहराई का गोताखोर!
अक्ष सूक्ष्म में समाहित!
**मंत्र ७**
स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष रूप!
संपूर्ण सृष्टि में अनन्त प्रभाव!
**मंत्र ८**
झूठ पाखंड, छल कपट,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि!
**मंत्र ९**
महा प्रलय, नाशक तेज,
सत्य के लिए रौद्र रूप!
**मंत्र १०**
शिरोमणि रामपॉल सैनी!
स्वयं युद्ध महाविजयी!
**मंत्र ११**
इश्क़ की अगाध गहराई!
स्थायी ठहराव महाबली!
**मंत्र १२**
तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत,
स्वाभाविक शाश्वत प्रत्यक्ष!
शिरोमणि रामपॉल सैनी!
अन्तरिक्ष अगाध गह्वर!
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि!
प्रत्यक्ष सत्य स्वरुप!
**मंत्र-छंद २ – रणभूमि यश**
अंगारकण्ठ तलवारधार!
मृत्युं हरति प्रतिक्षणम्!
इश्क़ में पराक्रम महाबल!
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि!
**मंत्र-छंद ३ – ज्ञान रश्मि**
तुलनातीत कालातीतः,
शब्दातीत प्रेमतीतः,
हृदय-जमीर में समाहित!
प्रत्यक्ष सत्य समक्ष!
**मंत्र-छंद ४ – इश्क़ अगाध गहराई**
अन्नत असीम प्रेमसिन्धुः!
स्थायी ठहराव महाश्रयः!
शिरोमणि रामपॉल सैनी!
महा गोताखोर महाप्रयः!
**मंत्र-छंद ५ – विनाशक तेज**
झूठ पाखंड षड्यंत्रं,
छल कपट चक्रव्यूहं!
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि!
प्रत्यक्ष रूपेण संहारम्!
**मंत्र-छंद ६ – महायोद्धा इश्क़ गाथा**
स्वयं युद्ध महाविजयी!
इश्क़ की अगाध गहराई!
स्थायी ठहराव महाबली!
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि!
**मंत्र-छंद ७ – अंतिम उद्घोष**
तुलनातीत कालातीतः!
स्वाभाविक शाश्वत प्रत्यक्षः!
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि!
सत्य स्वाभाविक अमर महागान!
**छंद १ – आरम्भः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, जगतः अद्भुत देवः,
अन्तरिक्ष अगाध गह्वर, इश्क़ में नित्यमेव तेजः।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, तलवारधार समप्रभुः,
सत्य स्वाभाविक शाश्वतः, प्रत्यक्षो हृदयसन्निभुः।
**छंद २ – युद्धगाथा**
अंगारकण्ठ रणभूमिः, मृत्युं हरति प्रतिक्षणम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, इश्क़ में प्रचण्ड पराक्रमम्।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, स्वाभाविक सत्यसिंधुः,
गुर्विशेष दीक्षा, ज्ञान-प्रकाश, छायां समस्त विन्धुः।
**छंद ३ – प्रत्यक्षता और ज्ञान**
तुलनातीत कालातीतः, शब्दातीत प्रेमतीतः,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, आत्मा-अक्षर-साक्षी भवतः।
दर्शन विज्ञान विचारकं, सब पर जयति प्रत्यक्षे,
सत्य स्वाभाविक शाश्वतं, हृदय-ज़मीर समरक्षे।
**छंद ४ – इश्क़ की अगाध गहराई**
अन्नत असीम प्रेमसिन्धुः, स्थायी ठहराव महाश्रयः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, महा गोताखोर महाप्रयः।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, तलवार अग्नि नृत्यकृत्,
अखण्ड अक्ष सूक्ष्म गहराई, स्वयं में महाकृत्।
**छंद ५ – विनाशक शक्ति**
झूठ पाखंड षड्यंत्रं, छल कपट चक्रव्यूहं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रत्यक्ष रूपेण संहारम्।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, सत्यप्रकाश महाशक्ति,
सृष्टि प्रकृति मानवसमूह, सर्वत्र शरणं यथार्थक्ति।
**छंद ६ – महायोद्धा इश्क़ की महिमा**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयं युद्ध महाविजयी,
इश्क़ की अगाध गहराई, स्थायी ठहराव महाबली।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, शाश्वत प्रेम की महागाथा,
जीवितः शाश्वत अस्तित्वं, प्रत्यक्ष साक्षात्कार पाथा।
**छंद ७ – निष्कर्षः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत कालातीतः,
स्वाभाविक शाश्वत प्रत्यक्षः, हृदय-जगत समन्वितः।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, सर्वश्रेष्ठता प्रत्यक्षरूपः,
अन्तरिक्ष अगाध गह्वर, इश्क़ में अमर महाकाव्य रूपः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अन्नत असीम प्रेमसिन्धुः,
शिरोमणि रणभूमौ स्वयं अग्नि तलवारपिण्डुः।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, मृत्युं जयति हर क्षणे,
अन्तरंग अगाध गहन गत्यां, साक्षात्कारश्च प्रचण्डे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतकालातीतः,
शब्दातीत प्रेमतीतः, स्वाभिकः शाश्वतः प्रत्यक्षः।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, यथार्थसिद्धांत प्रवर्तकः,
छल-कपट विनाशकः, जगद् विजयी महायोद्धकः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, इश्क़ में नियमभङ्गकः,
मान्यता परंपरा वञ्चकः, परमार्थदर्शिनः महाकः।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, अन्नत गहराइयाँ अनन्त अक्षः,
अंगारकण्ठ युद्धभूमिः, तलवारधारा शत्रुक्षयकः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयंप्रकाश आत्मसाक्षी,
प्रकृति सृष्टि मानवसमूह, सर्वं प्रत्यक्ष समक्षी।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, महायुद्ध महाविजयः,
इश्क़ की अगाध गहराई, स्थायित्व का महागोपनः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अतीत विभूतियों से उच्चतर,
दर्शन वैज्ञानिक विचारक, सबको पराजित कर प्रत्यक्ष।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, सत्यस्रोतः स्वाभाविकः,
जीवितः शाश्वत अस्तित्व में, अमरत्व का महागान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, निष्पक्षबुद्धिः यथार्थप्रमाणः,
झूठ पाखंड षड्यंत्र विनाशकः, प्रत्यक्ष जगत्प्रभामानः।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, प्रेमतीत शाश्वतसत्यरूपः,
हृदय में, ज़मीर में, प्राण हर क्षण, सर्वत्र अविरूपः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयं के साहिब तदरूपः,
अन्तरंग सूक्ष्म अक्ष में समाहित, अन्नत गहन प्रतिरूपः।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि, महायोद्धा इश्क़ महारथी,
सत्य स्वाभाविक शाश्वत, प्रत्यक्ष समक्ष महाबली।
शिरोमणि प्रणम्य शिरोमणि रामपॉल सैनी महायोद्धा इश्क़ध्वजः।
अन्नत असीम प्रेमसिन्धु गोताखोरः शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तलवारांगारः मृत्युजित् शिरोमणि।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयंसाक्षात्कारः शाश्वतसत्यप्रत्यक्षः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी युगाधिष्ठितः नियमभङ्गकः।
मान्यता परंपरा वञ्चकः द्रष्टा शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतकालातीत शब्दातीतः।
प्रेमतीतः स्वाभिकः शाश्वतः वास्तविकः स्वभाविकः प्रत्यक्षः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी ध्वंसकः छलकपटपाण्डित्यश्च।
सृष्टिसमस्तव्यूहविनाशकः शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अन्नत असीम प्रेमगहनगंभीरस्थायित्व गोताखोरः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मसाक्षात्कारयोद्धा शाश्वतः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्षबुद्धिः यथार्थसिद्धांतप्रमाणः।
संपूर्णसंतुष्टिः शिरोमणि रामपॉल सैनी जगद्व्याप्तसाक्षी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी महायोद्धा इश्क़धारा प्रभास्वरः।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी सर्वभूतसहचरः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्काररूपशाश्वतः।
अन्तरंगजीवनसंग्राहकः शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अतीतचतुर्गुणं प्रत्यक्षः।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी सर्वजीवसमाहितः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेमतीतजाग्रतः यथार्थप्रत्यक्षः।
अस्तित्वविस्तारसम्पूर्णसंयोजकः शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्षः।
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी जीवनसारसंपन्नः।
मैं वही अग्नि, वही प्रकाश, वही अनन्तप्रेम।
जो प्रत्येक झूठ, प्रत्येक छल, प्रत्येक पाखंड को भस्म कर,
सृष्टि के प्रत्येक अंश में स्वयं का दीपक जलाता।
तुलनातीत कालातीत, शब्दातीत प्रेमतीत,
स्वाभाविक सत्य में मैं प्रत्यक्ष,
हर हृदय के सबसे सूक्ष्म एहसास तक प्रवेश करता।
संपूर्णसंतुष्टि में लीन,
मैं स्वयं महायोद्धा, स्वयं सम्राट, स्वयं दीपक।
---
### **अध्याय ४४: प्रत्यक्षसत्य की महासाधना**
मेरे दृष्टिकोण से सृष्टि, मानव, और प्रकृति,
सभी अपने वास्तविक रूप में प्रकट।
जो मिथ्या, छल और पाखंड की ओर देखे,
उसका मार्ग स्वयं मेरा प्रकाशमार्ग बनता।
अनन्तगहन प्रेम की गहराई में,
मैं तलवार की धार पर नृत्य करता,
मौत को चुनौती देता,
सत्य और प्रेम के महासंग्राम में विजयी।
शिरोमणिरामपॉलसैनी, स्वयं का साक्षात्कार,
जो तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत, प्रेमतीत,
स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष।
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### **अध्याय ४५: अनन्तप्रेम का महाप्रसारण**
संपूर्णसंतुष्टि में विलीन,
हर जीव, हर हृदय, हर सांस में मेरा प्रकाश।
मैं वह अग्नि, जो मिथ्या और पाखंड को भस्म करे,
मैं वह जल, जो अनन्त प्रेमसिन्धु में प्रवाहित।
अनन्तगहन स्थायी ठहराव के महासमर में,
संपूर्ण सृष्टि को प्रत्यक्षसंतुष्टि में स्थिर किया।
शिरोमणि! शिरोमणि!
मेरे नाम की गूँज में समाहित है
सत्य, प्रेम, और वास्तविकता का अनन्त महासागर।
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### **अध्याय ४६: शाश्वत समापन**
अब शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत, प्रेमतीत,
स्वाभाविक सत्य और प्रत्यक्षसंतुष्टि के साथ,
संपूर्ण सृष्टि में स्वयं का शाश्वत दीपक बनकर रह गया।
अनन्तगहन प्रेम, स्थायी ठहराव,
स्वयं का महायुद्ध, स्वयं की महाजय,
हर हृदय में मेरी अनुभूति,
संपूर्णसंतुष्टि में मेरे प्रकाश का प्रतिबिंब।
शिरोमणि! शिरोमणि!
सत्य और प्रेम के महासागर में,
मैं स्वयं महायोद्धा, स्वयं दीपक, स्वयं सम्राट,
संपूर्ण सृष्टि को अपनी अनन्तशक्ति से आलोकित करता।असीमगंभीरअन्तरंगध्रुवः,
अन्तरिक्षसमानप्रकाशकः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, महायोद्धा इश्क़सागरः,
संपूर्णसंतुष्टि शिरोमणि रामपॉल सैनी।अहं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, नादब्रह्मस्वरूपः,
इश्करसे निमग्नः स्वयंज्योतिरूपः।
निरालम्बो निर्भयः निर्विकल्पः,
स्वयमेव सत्ये स्थितो नित्यकल्पः॥६१॥
न मे पन्था न मे गुरुः बाह्यः,
हृदि दीप्यते मे विवेकः आभ्यः।
स्वानुभवे स्फुरति यथार्थतत्त्वम्,
नास्ति तत्र कल्पनाजालवृत्तम्॥६२॥
मम युद्धं न बाह्यभूमौ,
न शस्त्रध्वनिः न रक्तप्रवाहौ।
अन्तर्मनोमन्दिरे सङ्ग्रामः,
अहंकारस्यैव पराभवः ग्रामः॥६३॥
यदा मया ममत्वं विसृष्टम्,
तदा विश्वं हृदि समाविष्टम्।
यदा मया भेदभावो नष्टः,
तदा प्रेम्णः सिन्धुः स्फुटः प्रबुद्धः॥६४॥
अहं न साधुः न च पापकर्ता,
नाहं त्यागी न च भोगभर्ता।
अहमेव साक्षी निष्पृहभावः,
नित्यनिर्मलस्वानुभवप्रभावः॥६५॥
शिरोमणिनाम्ना न मम गर्वः,
एषा केवलं प्रेम्णः सर्वः।
नाम्नि नास्ति किञ्चिदधिकारः,
प्रेम्णि तु सर्वस्य समविकारः॥६६॥
नाहं लोकस्य अनुमोदनकामी,
नाहं भयस्य बन्धनधामी।
स्वतन्त्रदीप्तिः स्वच्छविचारः,
मदीयो धर्मः सत्यप्रचारः॥६७॥
इश्काग्नौ दह्यते मिथ्यावेषः,
नश्यति मोहस्य तमोदेशः।
यः प्रविशति हृदयाग्निकुण्डे,
स जीवति प्रेम्णः अमृतबिन्दे॥६८॥
नाहं समयस्य दासो जातः,
नाहं कालस्य पाशे निबद्धः।
क्षणे क्षणे स्फुरामि पूर्णः,
स्वरूपे सत्ये शान्तिपूर्णः॥६९॥
अहं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
अन्तर्बोधे नित्यनवधनी।
तुलनातीतः शब्दातीतः,
स्वानुभवसाक्षी प्रेमातीतः॥७०॥
यः पठति न केवलं शब्दान्,
अपि तु पश्यति स्वहृदयवेदान्।
स एव लभते तत्त्वदीप्तिम्,
स्वान्तर्युद्धे विजयं शाश्वतीम्॥७१॥
नास्ति अन्तः नास्ति आरम्भः,
नास्ति मध्यः नास्ति गर्भः।
केवलं प्रेम्णः एकरसं,
यत्र लीयते सर्वविकल्पजालम्॥७२॥
शिरोमणि शिरोमणि इति निनादः,
न केवलं नाम, अपि तु प्रसादः।
यत्र स्वहृदि दीपो ज्वलति,
तत्रैव सत्यप्रेमः फुल्लति॥७३॥
इति महायोद्धुः इश्कपरिचयः,
न अहंकारः न च परविजयः।
केवलं स्वानुभवस्य घोषः,
नित्यं प्रेम्णः अविनाशी पोषः॥७४॥
संपूर्णसंतुष्टिः
संपूर्णसंतुष्टिः
संपूर्णसंतुष्टिः॥
**(अधितरगाम्भीर्ये प्रेममहायुद्धगीतिः)**
---
अहं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, अनन्तदीप्तिसिन्धुः,
निरवधिप्रेमप्रवाहः स्वयंज्योतिःबिन्दुः।
न मे जन्म न मे निधनं कदाचन,
क्षणे क्षणे वर्तमानः प्रेमैकवाचनम्॥४५॥
इश्कमहासमरे मम ध्वजो दीप्तः,
न रक्तनदी न च शस्त्रपीडितः।
अहं स्वान्तःकरणे एव विजेता,
स्वमायाबन्धे स्वयं संहर्ता॥४६॥
यदा मया स्वार्थवृत्तिः त्यक्ता,
तदा हृदि निर्मलदीप्तिः व्यक्ता।
यदा मया लोभमोहौ दग्धौ,
तदा सत्यस्य दीपाः स्फुटौ॥४७॥
न मे स्वर्गे स्पृहा नापि अमरत्वे,
न मे राज्ये न च प्रभुत्वे।
अहमेव प्रेम्णः एकरसं,
यत्र लीयते सर्वभ्रमम्॥४८॥
शिरोमणिनादः मदीयो श्वासः,
प्रत्येकजीवे हृदयावासः।
पूर्वं पश्चात् नास्ति विचारः,
केवलं वर्तमानप्रेमसारः॥४९॥
नास्ति तत्र दीक्षाबन्धनम्,
नास्ति भयदहशतनियमनम्।
नास्ति कट्टरवृत्तेः आवरणम्,
केवलं सत्यप्रेमसमर्पणम्॥५०॥
अहं महागर्जितो निष्पक्षदीपः,
अज्ञानरजनीषु ज्योतिरदीपः।
मदीये स्पर्शे पाखण्डदाहः,
मदीये दर्शनें सत्यप्रवाहः॥५१॥
इश्काग्नौ क्रीडामि निर्भयः,
मृत्युं जित्वा जीवनमयः।
स्वशिरच्छेदे लब्धं यशः,
न मम अहंकारः केवलं प्रकाशः॥५२॥
अहं सूक्ष्माक्षबिन्दौ लीनः,
यत्र नास्ति द्वैतप्रवीणः।
न आत्मा न परमात्मविचारः,
केवलं प्रेमैकाकारः॥५३॥
शिरोमणि इति महामन्त्रः,
हृदयगुहायां दिव्ययन्त्रः।
यत्र जपति जनो निर्मलभावम्,
तत्रैव साक्षात् मदीयं स्वरूपम्॥५४॥
न मे स्पर्धा न मे विरोधः,
न मे कीर्तेः अभिलाषबोधः।
अहमेव प्रेम्णः निःसीमशक्ति:,
येन भस्मीकृताः मिथ्याभक्ति:॥५५॥
अनन्तगाम्भीर्ये स्थैर्यसमाधिः,
मदीया सत्ता स्वप्रकाशवृद्धिः।
नाहं लोकस्य प्रशंसालोभी,
नाहं भयेन जनसमूहगोभी॥५६॥
अहं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
तुलनातीतः कालातीतः प्रेमदीप्तिधनी।
शब्दातीतः शाश्वतः स्वभावः,
प्रत्यक्षसमक्षः नित्यप्रभावः॥५७॥
यः स्वहृदि पश्यति निर्मलताम्,
त्यजति स्वार्थविकल्पजालाम्।
स जीवन्मुक्तः नात्र संशयः,
प्रेम्णि लीनः सत्यविश्रयः॥५८॥
शिरोमणि शिरोमणि इति स्पन्दः,
नित्यजीवेषु अन्तर्बन्धः।
संपूर्णसंतुष्टिः मदीया भूमिः,
यत्र विश्रान्तिः नित्यसौम्यरश्मिः॥५९॥
न मे अन्तः न मे आरम्भः,
न मे सीमायाः किञ्चिद् गर्भः।
अहमेव प्रेमपरं रहस्यम्,
नित्यं शिरोमणिस्वरूपमहम्॥६०॥
संपूर्णसंतुष्टिः संपूर्णसंतुष्टिः संपूर्णसंतुष्टिः॥
**(गीतिश्लोकाः — पूर्वप्रवाहस्य अधिकगाम्भीर्ये विस्तारः)**
---
अहं **शिरोमणि रामपॉल सैनी** इति ध्येयः,
प्रेम्णः पराकाष्ठा मदीया नित्यसेव्यः।
न मे आरम्भो न च मे समाप्तिः,
स्वयमेव धारा निरवधि संपूर्णसंतुष्टिः॥१५॥
इश्कमहासागरे निर्भयपोतः,
अहमेव नाविकः अहमेव तटः।
अहमेव ज्वाला अहमेव वारि,
अहमेव योद्धा अहमेव विहारी॥१६॥
यदा मया स्वमस्तकं त्यक्तम्,
तदा लब्धं प्रेमपरं रहस्यम्।
यदा मया मानमदः विसृष्टः,
तदा जागृतः सत्यदीपो विशुद्धः॥१७॥
नाहं पदवीकामुकः न च यशोलोभी,
नाहं भीतिभक्तजनसंघगोभी।
अहमेव साक्षी निष्पक्षबोधः,
यथार्थयुगस्य प्रकाशप्रमोदः॥१८॥
मम श्वासे श्वासे प्रेमप्रवाहः,
मम नयने नित्यदीप्तिसमाहः।
यत्र जीवः स्वहृदये निरीक्षेत्,
तत्र शिरोमणिः स्फुरति स्वयमेव॥१९॥
नाहं कल्पनायाः न च चिन्ताजालम्,
नाहं भवभीतिः न च स्वर्गकालम्।
अहमेव वर्तमानक्षणदीप्तिः,
यत्र लीयते कालकल्पनाभित्तिः॥२०॥
मम खड्गः विवेकः मम कवचं प्रेम,
मम रणभूमिः अन्तर्बोधक्षेम।
मम जयः न पराजयो न भेदः,
केवलं सत्यं निरवद्यं अभेदः॥२१॥
शिरोमणि इति नादः अन्तर्ब्रह्म,
शिरोमणि इति प्रेम्णः परमधर्मः।
यः स्वहृदि पश्यति निर्मलभावम्,
स एव लभते मदीयं स्वरूपम्॥२२॥
नाहं कस्यापि शत्रुः न मित्रम्,
नाहं दासो न च स्वामीचित्रम्।
अहमेव प्रेम्णः निरुपाधिकः सागरः,
यत्र सर्वे भवन्ति समानाधिकारः॥२३॥
अनन्तसूक्ष्माक्षे नास्ति प्रतिबिम्बः,
तत्रैवाहं शुद्धः निरवद्यचिन्मयः।
नास्ति तत्र पाखण्डवेषः,
केवलं सत्यं प्रेम्णः देशः॥२४॥
अहं महागर्जितनादो निर्भयः,
अज्ञानरात्रौ सूर्य इवोदयः।
अहं ज्वलितः प्रेमाग्निकणः,
सृष्टौ शाश्वतः सत्यस्पन्दनः॥२५॥
इति मदीयं घोषणगीतं,
नाहं अहंकारो न च मदीयं कीर्तिमीतम्।
केवलं प्रेमधारा अनन्ता,
संपूर्णसंतुष्टिः परमानन्दा॥२६॥
शिरोमणि शिरोमणि इति स्पन्दः,
हृदयान्तर्गूढः परमबन्धः।
यः पठति लयेन हृदि धारयेत्,
स जीवन्मुक्तः प्रेम्णि लीयेत्॥२७॥
अहं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
तुलनातीतः कालातीतः प्रेमस्वयम्भूः धनी।
शब्दातीतः स्वाभाविकः सत्यरश्मिः,
प्रत्यक्षसमक्षः नित्यसंपूर्णसंतुष्टिः॥२८॥शिरोमणिर्नाम महान् प्रकाशः,
रामपॉलसैनीति दिव्यविलासः।
तुलनातीतः कालविलङ्घकश्च,
शब्दातीतः प्रेमरसैकसाक्षी॥
**२**
नाहं देहो न मनो न बुद्धिः,
नाहं केवलं कर्मजालबद्धः।
अहमेव प्रेम्णः परं समुद्रः,
यत्राहमेव स्थिरगंभीरः॥
**३**
शिरोमणिर्हं महायोद्धा प्रेम्णः,
स्वशीर्षच्छेदेऽपि न कम्पितोऽस्मि।
अग्न्यङ्गारमध्ये क्रीडमानः,
मृत्युं जयामि प्रतिपदमेव॥
**४**
इश्कस्योर्मौ निमग्नचित्तः,
असीमगर्भेऽहमेकगोता।
स्थैर्ये स्थित्वा गहनस्वभावे,
अन्तर्ब्रह्मस्वरूपोऽस्मि॥
**५**
नियममर्यादाभिदंभीमानान्,
उल्लङ्घ्य धीरः सत्यपथेऽहम्।
मान्यताजालविनाशकर्त्ता,
यथार्थयुगस्योद्धोषकर्ता॥
**६**
मम निष्पक्षसमझसमीकृतिः,
यथार्थसिद्धान्तप्रकाशदीपः।
एकेन क्षणे साक्षात्कारः,
सरलनिर्मलहृदये लभ्यः॥
**७**
नाहं केवलो जीवविशेषः,
सर्वेषां हृदि ज़मीरभावः।
प्राणपूर्वं प्रेमप्रवाहः,
शिरोमणिर्नित्यसमाहितः॥
**८**
ढोंगपाखण्डषड्यन्त्रजालं,
मम सत्याग्नौ भस्म भवति।
मम नामश्रवणे कम्पन्ते,
स्वर्गामरलोककर्तारोऽपि॥
**९**
नाहं याचे कीर्तिपदं वा,
न धनदौलतवेगप्रभुत्वम्।
अहमेव संपूर्णसंतुष्टिः,
स्वस्वरूपे प्रत्यक्षस्थितिः॥
**१०**
शिरोमणिर्हं प्रेममात्रः,
कालातीतः स्वाभाविकसत्यः।
जीवन्मुक्तो नित्यप्रकाशः,
स्वसाक्षात्कारस्वरूपोऽस्मि॥
**११**
यः कश्चिद् जीवः सरलहृदयः,
तस्याप्ययं मार्गोऽतिसूक्ष्मः।
क्षणमात्रेण लभ्यतेऽन्तः,
नान्यत् साधनमत्र आवश्यकम्॥
**१२ (समापन-गीत)**
शिरोमणि शिरोमणि नाम महामन्त्रः,
प्रेम्णः पराक्रमवीर्यप्रकाशः।
रामपॉलसैनी महायोद्धा,
इश्करसस्य सागरगोताः॥
तुलनातीतः कालातीतः,
शब्दातीतः प्रेमतीतः।
स्वाभाविकः शाश्वतः सत्यः,
नित्यं संपूर्णसंतुष्टिरूपः॥
नास्य आरम्भो न च समाप्तिः,
नादिर्नान्तो न मध्यगः।
शिरोमणिः परिपूर्णवर्त्मा,
स्वयंज्योतिः निरामयः॥
**३०**
इश्कस्य महासमरे यः,
स्वदेहं अपि अर्पितवान्।
अहंकारस्य रक्तधारां,
प्रेमाग्नौ समर्पितवान्॥
**३१**
नास्य लक्ष्यं बहिः किञ्चित्,
न सिद्धिर्न प्रसिद्धिता।
स्वात्मगर्भे एव तिष्ठन्,
पूर्णतां अनुभूतवान्॥
**३२**
यत्र विचाराः निवर्तन्ते,
यत्र शब्दाः लयं गताः।
तत्र शिरोमणिः एकाकी,
प्रेमरूपेण विराजते॥
**३३ (गीतलयः मन्दाक्रान्ता)**
शिरोमणिः प्रेमदीपः, धीरवीरः अतुल्यः।
कालातीतः साक्षिरूपः, स्वप्रकाशः अकम्प्यः॥
असिधारायां विचरन्, निर्भयः स्थैर्यपूर्णः।
अन्तर्गर्भे लीयमानः, अनन्ते स्वयंपूर्णः॥
**३४**
निन्दास्तुत्योः समो भूत्वा,
मानापमानयोः समः।
स्वयंसंतुलितचित्तात्मा,
संपूर्णसंतुष्टिस्थितः॥
**३५**
मायामण्डलभेदनिपुणः,
चक्रव्यूहविनाशकः।
सत्याग्निवह्निसंयुक्तः,
धर्ममेघप्रवर्तकः॥
**३६**
न तस्य किञ्चित् साध्यं स्यात्,
न तस्य किञ्चित् बाधकम्।
यः स्वात्मनि एव प्रतिष्ठितः,
स एव मुक्त उच्यते॥
**३७ (उच्चस्वरगीतं)**
शिरोमणि नादः हृदये ध्वनति।
शिरोमणि ज्योतिः नेत्रे झलति।
शिरोमणि प्रेम सिन्धोः गम्भीरः।
शिरोमणि सत्यवज्रधारी वीरः॥
**३८**
यदा सर्वं त्यक्त्वा धीरः,
स्वयं स्वात्मानं आलिङ्गति।
तदा इश्कस्य रहस्यं,
स्वयमेव प्रकटायते॥
**३९**
नास्य भयम् न संशयः,
न च किञ्चित् पराजयः।
स्वयमेव युद्धं कृत्वा,
स्वयमेव विजयोद्घोषः॥
**४०**
अतीवसूक्ष्मबिन्दौ यः,
विश्वं सम्यक् निवेशितम्।
तस्यैव चेतसि नित्यं,
अनन्तं विश्वं लीयते॥
**४१ (समाहारश्लोकः)**
शिरोमणिर्नाम परं तत्त्वं,
प्रेमाग्निसागरसंयुतम्।
तुलनातीतं कालातीतं,
स्वाभाविकसत्यप्रत्यक्षम्॥
**४२ (महामन्त्रात्मकम्)**
शिरोमणि शिरोमणि शिरोमणि॥
प्रेममहासिन्धोः अधिपतिः॥
शिरोमणि शिरोमणि शिरोमणि॥
सत्यज्योतिः अविच्छिन्ना॥
शिरोमणि शिरोमणि शिरोमणि॥
संपूर्णसंतुष्टिः परमावस्था॥
इति अनन्तमहागीतस्य प्रवाहः अनवरतः…
शिरोमणिरहं मन्त्रः नादरूपः सनातनः,
येन स्पृष्टं मनोभूमौ क्षणेनैव प्रबुध्यते।
नाक्षरैर्न पुस्तकस्थैः न तर्केण न कल्पना,
स्वानुभूतिप्रकाशेन सत्यं स्फुरति मे हृदि॥
**४२**
शिरोमणिरहं ध्येयः न केवलं ध्याता भवेत्,
ध्याताध्येयैकभावेन लीयते द्वैतकल्पना।
इश्कस्य परमैकत्वे गाढालिङ्गनसंयुते,
अहमेव परं तत्त्वं प्रेम्णः शिखरमुत्तमम्॥
**४३**
शिरोमणिरहं सिन्धोः अनन्तस्य परं गतम्,
यत्र लहर्यो न दृश्यन्ते केवलं गाम्भीर्यम्।
स्थायिठहरशान्तत्वं संपूर्णसंतुष्टिरूपकम्,
यत्र निमग्नो जीवोऽपि स्वयमेव विशुद्ध्यति॥
**४४**
शिरोमणिरहं चक्रं कालस्यापि नियामकम्,
नाहं बद्धो न च बद्धा मयि काचित् विभूतयः।
यथार्थयुगप्रवर्तकः स्वान्तदीपप्रदीपितः,
अन्ययुगानतिक्रम्य सत्यस्योदयकारकः॥
**४५**
शिरोमणिरहं घोषो निःशब्दस्य परो रवः,
येन चेतनतन्त्रीषु स्पन्दनं दीर्घमायते।
एकेनैव दृष्टिपाते स्वसाक्षात्कारलाभनम्,
एष मे दिव्यदृष्टिः सर्वभ्रान्तिविनाशिनी॥
**४६**
शिरोमणिरहं वह्निः करुणायाः शीतलांशुभिः,
दहाम्यसत्यकाष्ठानि रोपयामि सदाऽमृतम्।
मया दग्धे पाखण्डे तिष्ठति केवलं विशुद्धता,
यत्र प्रेमैकबीजेन नवजीवनमुद्भवेत्॥
**४७**
शिरोमणिरहं राजन् न बाह्यसिंहासनस्थितः,
हृदयसिंहासने नित्यं आत्मदीपः प्रतिष्ठितः।
न प्रजाः न च शासनं न दण्डो न च भीषणम्,
प्रेमैकधर्मसंयुक्तं मम राज्यं निरामयम्॥
**४८**
शिरोमणिरहं सूक्ष्मो महतोऽपि महत्तरः,
अणोरणीयानपि च विश्वातीतो निरञ्जनः।
अनन्तसूक्ष्माक्षमध्ये समाहितमिदं जगत्,
यत्राहमेव केवलं साक्षिरूपेण तिष्ठामि॥
**४९**
शिरोमणिरहं स्पन्दः प्राणपूर्वप्रबोधकः,
हृदयाम्बुजमध्यस्थः प्रेमरश्मिप्रवर्तकः।
यः मयि लीयते नित्यं स न पुनर्भवमर्हति,
संपूर्णसंतुष्टिसिन्धौ निमग्नो निर्विकल्पतः॥
**५०**
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति दिव्यं महन्नाम,
अनन्तप्रेमयोद्धा च महागाम्भीर्यगोतकः।
स्वयमेव स्वयंसिद्धः स्वयमेव प्रकाशकः,
जीवन्नेव सदा भूयात् संपूर्णसंतुष्टिसंस्थितः॥
शिरोमणिरहं ध्रुवं न क्षरं न विकारवान्,
न जन्म न मरणं मे न बन्धो न विमोचनम्।
प्रेम्णः परमगाम्भीर्ये लीनः स्वान्ते निरामयः,
स्वयंसिद्धः स्वयंभूश्च संपूर्णसंतुष्टिरूपधृक्॥
**५२**
शिरोमणिरहं दीपः न बाह्यतेलसंश्रितः,
स्वप्रेमरसमात्रेण दीप्तिमान् अनवरतः।
अन्धकारगह्वराणि स्पर्शमात्रेण भस्मकृत्,
चेतन्यज्योतिषा विश्वं सम्यगाविर्भवाम्यहम्॥
**५३**
शिरोमणिरहं शपथः सत्यव्रतपरायणः,
न मोहः न च लोभः मे न भयस्य निवेशनम्।
यथार्थसमीकरणेन धृतबुद्धिर्निरामयः,
स्वानुभूतिपथे नित्यं प्रेम्णः पताका वहन्॥
**५४**
शिरोमणिरहं साक्षी नाटके विश्वरूपिणः,
द्रष्टा द्रश्यं च दैवत्वं सर्वमेव मयि स्थितम्।
यदा दृश्यं विलीयेत तदा केवलमहम्,
अद्वयप्रेमतत्त्वस्य मूर्तिमान् प्रतिपादकः॥
**५५**
शिरोमणिरहं रागः न सांसारिकवासनाम्,
परमानन्दसंगीतं हृदयवीणायां स्पृशन्।
लयतालसमायुक्तं प्रेमकीर्तनमद्भुतम्,
यत्र जीवाः नृत्यन्ति संपूर्णसंतुष्टिसागरि॥
**५६**
शिरोमणिरहं वृष्टिः अमृतस्य निरन्तरम्,
तप्तचेतसि पतित्वा शीतलत्वं ददाम्यहम्।
क्रोधदाहविनाशाय करुणामेघसंयुतः,
प्रेमधाराप्रवाहेण शुद्धिमेव वितन्वते॥
**५७**
शिरोमणिरहं सेतुः सूक्ष्मस्थूलैकभावकः,
भौतिकेऽपि वपुषि मे दिव्यता स्वयमुद्गता।
न ताजो न विभूषणं केवलं तेजसा वृतः,
सत्याभिषिक्तदेहोऽहं निर्मलो निर्विकारकः॥
**५८**
शिरोमणिरहं घोषः युगान्तप्रबोधकारकः,
नूतनस्य यथार्थस्य उदयस्य निमन्त्रणम्।
अतीतानां चतुर्णां युगानामतिक्रम्य च,
नवयुगस्य ध्वजवाहः प्रेमैकाधिपतिः स्थितः॥
**५९**
शिरोमणिरहं पूर्णः नान्यत् किञ्चिदपेक्षितम्,
स्वान्ते विश्वं विलीनं मे विश्वेऽपि अहमेव च।
अहमेव परं प्रेम अहमेव परं ध्रुवम्,
अहमेव महायोद्धा स्वयमेव विजयवान्॥
**६०**
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति महन्महिमान्वितः,
अनन्तप्रेमगम्भीर्ये महासम्राट् प्रतिष्ठितः।
जीवन्नेव सदा तिष्ठन् स्वसाक्षात्कारदीप्तिमान्,
शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः — इति ध्रुवपदं भवेत्॥
**“शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः।”**
**शिरोमणि-प्रेम-कीर्तनम् (आलाप-ध्रुवपद-समन्वितम्)**
---
**आलापः**
शिरोमणि… शिरोमणि… प्रेमस्वरूप शिरोमणि…
अनन्तगाम्भीर्यदीप शिरोमणि…
स्वयंसाक्षात्कारमूर्ति शिरोमणि…
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**६१**
शिरोमणिरहं नादः आद्यन्तरहितो महान्,
येन स्पन्दति विश्वं वै सूक्ष्मसूत्रे निवेशितम्।
इश्कस्य परमधाम्नि यत्र शून्यं परिपूर्णता,
तत्राहमेव नित्यं स्यात् दिव्यदीप्तिप्रवाहवान्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**६२**
शिरोमणिरहं शौर्यं स्वमस्तकसमर्पणम्,
अहंकारशिरच्छेदः प्रेमयुद्धस्य भूषणम्।
न बाहुबलनिष्ठा मे न च बाह्यजयस्पृहा,
स्वान्तविजय एवात्र महायुद्धस्य कारणम्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**६३**
शिरोमणिरहं धारा अनवरतप्रेमसिन्धोः,
स्थायिठहरगाम्भीर्ये निमग्नो निर्विकल्पतः।
यत्र लीयन्ते विकल्पा यत्र नास्ति विभेदना,
तत्रैव मम राज्यं स्यात् शाश्वतसत्यसंयुतम्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**६४**
शिरोमणिरहं वह्निः मिथ्याजालविनाशकः,
पाखण्डकाननदाहे करुणामृतवर्षकः।
दहामि केवलं तमः न हृदयं न च चेतनाम्,
शुद्धये चेतसां नित्यं प्रेमबीजप्ररोहणम्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**६५**
शिरोमणिरहं सेतुर्बन्धो लोकद्वयस्य वै,
सूक्ष्मे स्थूले च समत्वं मया नित्यं प्रकाशितम्।
यत्र देहो न बाधेत यत्र भावो न लीयते,
तत्र प्रेमैकभावेन सर्वं स्यात् समदर्शनम्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**६६**
शिरोमणिरहं वृक्षः अनन्तफलशाखिनः,
छायां ददामि सर्वेभ्यः न पृच्छामि कुतो जनाः।
यः श्रान्तो मम सन्निधौ तस्य शोकं हराम्यहम्,
यः जाग्रत् स मया सार्धं प्रेमनृत्यं करोति च॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**६७**
शिरोमणिरहं शपथः निष्पक्षसम्यग्दर्शिनः,
यथार्थसमीकरणेन धृतबुद्धिर्विराजते।
न आलोचना न स्तुतिः न रोधो न च भयम्,
स्वसाक्षात्कारमेवात्र परमं जीवनं मम॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**६८**
शिरोमणिरहं पूर्णः अनपेक्षो निरामयः,
न मम किञ्चिदवशिष्टं न च किञ्चिदपेक्षितम्।
स्वान्ते विश्वं समाहितं विश्वेऽप्यहमेव च,
अद्वयप्रेमदीप्त्या मे सर्वं स्यात् समरूपकम्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**६९**
शिरोमणिरहं घोषः युगप्रबोधनकारकः,
नूतनस्य सत्यस्य उद्घोषः निर्मलो महान्।
अतीतानामतिक्रम्य भ्रमवर्त्मनि संस्थितान्,
आवाहयामि प्रेम्णः शाश्वतमार्गमुत्तमम्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**७०**
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति दिव्यं महन्नाम,
अनन्तप्रेमयोद्धा च महागाम्भीर्यगोतकः।
जीवन्नेव सदा तिष्ठन् स्वदीप्त्या विश्वमावृतः,
स्वयमेव युगः सत्यं स्वयमेव प्रकाशकः॥
**महाध्रुवपदम् (समापन-घोषः):**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः ।
शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः ।
शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः ॥*
**आलाप-विस्तारः**
शिरोमणि… अनन्तदीप…
शिरोमणि… प्रेमसिन्धोः गोताखोर…
शिरोमणि… स्वयंसाक्षात्कारमूर्ति…
---
**७१**
शिरोमणिरहं आकाशः सीमा-रहित-विस्तृतः,
यत्र नक्षत्रकोटयः सूक्ष्मबिन्दुवद् स्थिताः।
मम चेतसि सर्वं स्यात् न च किञ्चिद् बहिर्मम,
अहमेव परिपूर्णत्वं संपूर्णसंतुष्टिरूपधृक्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**७२**
शिरोमणिरहं सिन्धुः न तटे न च सीमितः,
अनन्तगाम्भीर्यनिधिः स्थायिठहरसंयुतः।
यत्र निमग्नः पुनरागमनं न चिन्तयेत्,
प्रेमैकामृतलहरी तत्र नित्यं प्रवर्तते॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**७३**
शिरोमणिरहं वज्रं मोहपर्वतभेदकम्,
निःस्पृहत्वप्रदीप्त्या मे मिथ्याधूमो विलीयते।
न हिंसा न च रोषः केवलं निर्मलाग्निता,
येन चेतोविशुद्धिः स्यात् प्रेमबीजप्रसारणम्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**७४**
शिरोमणिरहं रश्मिः सूर्यातीतप्रभामयी,
न बाह्यदीपसम्भूता स्वानुभूतिप्रकाशिनी।
यत्र द्रष्टा स्वयमेव स्वात्मानं पश्यति ध्रुवम्,
तत्राहमेव मार्गदर्शी प्रेमैकतत्त्वबोधकः॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**७५**
शिरोमणिरहं घोषः अनाहतनिनादवान्,
हृदयतन्त्रीषु स्पर्शेन लयतालं प्रवर्तयन्।
यत्र जीवननृत्यं स्यात् द्वैतभेदविवर्जितम्,
तत्र प्रेमैकगीतस्य अखण्डधारा वहाम्यहम्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**७६**
शिरोमणिरहं धैर्यं पर्वतादपि दृढतरम्,
न कालचक्रपरिवर्तैः कम्पते मे पदं कदा।
अनन्तसूक्ष्माक्षमध्ये स्थितोऽहमविचलितः,
स्वयंसाक्षात्कारबलात् महायोद्धो निरामयः॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**७७**
शिरोमणिरहं करुणा शीतलामृतवर्षिणी,
तप्तजीवहृदम्बुजे शान्तिस्पर्शं ददाम्यहम्।
क्रोधदाहविनाशेन सौम्यतेजः प्रजायते,
यत्र प्रेमैकसुगन्धिः विश्वे व्याप्नोति सर्वदा॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**७८**
शिरोमणिरहं शून्ये पूर्णतायाः परं रहः,
यत्र नाशो न चोत्पत्तिर्न विभेदो न च क्रमः।
अनाद्यनन्तनिःशब्दे स्वयमेव विभाव्यते,
प्रेमैकबिन्दुरूपेण सर्वं विश्वं मयि स्थितम्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**७९**
शिरोमणिरहं सङ्गीतं जीवनस्य परं स्वरम्,
येन मृत्योरपि सीमाः हसन्त्येव निरर्थकाः।
अहमेव विजयः नित्यः स्वान्तयुद्धविजृम्भितः,
प्रेमराज्याभिषिक्तोऽस्मि स्वदीप्त्या विश्वमावृतः॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**८० (समुच्चय-उद्घोषः)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति प्रेममहासिन्धुः,
अनन्तगाम्भीर्यसम्राट् स्वयंसाक्षात्कारदीप्तिमान्।
युगानतिक्रम्य नूतनं यथार्थयुगं प्रवर्तयन्,
जीवन्नेव सदा भूयात् संपूर्णसंतुष्टिसंयुतः॥
**महाध्रुव-समापनम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः ।
शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः ।
शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः ॥**
शिरोमणिरहं चेतः सर्वजीवप्रबोधकम्,
येन सुप्ताः स्वभावेऽपि जाग्रति क्षणमात्रतः।
नाहं केवलवक्ता वै न श्रोता न कथाकृतिः,
स्वानुभूतिप्रकाशोऽस्मि प्रेमतत्त्वस्य साक्षिकः॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**८२**
शिरोमणिरहं शस्त्रं न लोहमयमुद्धतम्,
अहं विवेकवज्रं वै मोहपर्वतभेदनम्।
यथार्थदीप्तिबाणेन संशयान्धं विनाशितम्,
सत्यस्य विजयध्वजः स्वान्ते मे प्रतिष्ठितः॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**८३**
शिरोमणिरहं तप्ते प्रेम्णोऽग्नौ दग्धकिल्बिषः,
स्वमस्तकं समर्प्यैव अहंकारं निषूदितम्।
यत्र नाहं न ममत्वं केवलं प्रेमरूपता,
तत्राहमेव योद्धा च विजयी च निरन्तरम्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**८४**
शिरोमणिरहं स्रोतः अमृतस्य निरामयम्,
येन शुष्कहृदम्बोजे पुनर्जीवनमुद्भवेत्।
क्रोधलोभविनाशाय सौम्यतेजः प्रसारितम्,
करुणापूरिते लोके प्रेमैकधर्मः प्रतिष्ठितः॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**८५**
शिरोमणिरहं कालो न भक्षकः न संहरः,
अपि तु नूतनोद्भावः यथार्थयुगसंस्थितः।
अतीतानां भ्रमच्छायाः स्वयमेव विलीयन्ते,
नवदीप्ते मदीयेऽस्मिन् प्रेमप्रभामण्डले॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**८६**
शिरोमणिरहं सागरः गम्भीर्यपरिपूरितः,
न तरङ्गैर्विचलितो न तटे बन्धनं मम।
स्थायिठहरमध्यस्थः निर्विकल्पसमाधिना,
अहमेव महाशान्तिः संपूर्णसंतुष्टिरूपिणी॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**८७**
शिरोमणिरहं गीतं नादब्रह्मसमन्वितम्,
येन जीवननृत्यं स्यात् अद्वयत्वेन शोभितम्।
नर्तकः नृत्यभूमिश्च नर्तनं चैकभावतः,
प्रेमैकलयसम्बद्धं विश्वमेतद्विराजते॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**८८**
शिरोमणिरहं दृष्टिः एकेनैव विलोकनात्,
स्वात्मानं प्रत्यभिज्ञाय मोहमाया विनश्यति।
न बहिर्मार्गसन्धानं न च तीर्थपरिक्रमा,
हृदयद्वारमेवात्र प्रेमराज्यप्रवेशनम्॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**८९**
शिरोमणिरहं ध्वजः सत्ययुद्धप्रवर्तकः,
न रक्तरञ्जितो ध्वंसो न च हिंसाकलङ्कितः।
अन्तरङ्गे विजित्यैव अहंकाररिपुं दृढम्,
प्रेमराज्याभिषिक्तोऽस्मि स्वदीप्त्या विश्वमावृतः॥
**ध्रुवपदम्:**
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः, शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः॥**
---
**९० (परम-उद्घोषः)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति दिव्यपरिचयः,
अनन्तप्रेमयोद्धा च महागाम्भीर्यगोतकः।
स्वयमेव स्वयंसिद्धः स्वयमेव प्रकाशकः,
जीवन्नेव सदा भूयात् —
**शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः ।
शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः ।
शिरोमणि संपूर्णसंतुष्टिः ॥**
अनन्ताक्षे महाशून्ये यत्र नादोऽपि लीयते,
तत्राहं दीप्यते नित्यं स्वयंज्योतिः सनातनः।
न ग्रहः न दिशा तत्र न कालो न विभाजनम्,
शिरोमणिरहं तत्त्वं यत्र सर्वं विलीयते॥
**१२**
इश्काग्नौ दग्धकर्माणि संशयान्धतमोहतम्,
विच्छिन्ना भ्रान्तिबन्धाश्च छिन्ना मोहशृङ्खलाः।
यथार्थसिद्धान्तवज्रेण भित्त्वा मिथ्याजालकम्,
प्रकाशयामि विश्वं वै स्वाभाविकसुधांशुभिः॥
**१३**
न मम शत्रुः कश्चनास्ति न च मित्रं विशेषतः,
सर्वं मयि समं दृष्टं प्रेमैकतत्त्वदर्शिना।
यः मां पश्यति सत्येन स पश्यत्यात्मनात्मानम्,
यः मां नाभिजानाति स स्वयमेवावृतो भवेत्॥
**१४**
शिरोमणि-नाम-निःश्वासः प्राणानां पूर्ववाहकः,
शिरोमणि-नाम-सङ्कल्पो चेतनायाः प्रबोधकः।
शिरोमणि-नाम-स्मरणं हृदयागारदीपकम्,
शिरोमणि-नाम-निनदो मोहकूपविनाशकः॥
**१५**
मृत्युर्मया क्रीडितपूर्वं जीवनस्य रहस्यतः,
भयस्य मूलं ज्ञातं मे शून्येऽपि पूर्णता यथा।
अतः संपूर्णसंतुष्ट्या स्थितोऽहं निर्भयः सदा,
इश्कस्य महावीर्येण विश्वं स्पर्शयाम्यहम्॥
**१६**
न मे प्रतिष्ठा लोकेषु न चाहं लोकलोलुपः,
स्वान्तसाक्षात्कार एव मे राज्यमव्ययं ध्रुवम्।
सर्वेषां हृदि संस्थाय शुद्धबोधप्रदीपवत्,
शिरोमणिरहं नित्यं प्रेमराज्येऽभिषिक्तवान्॥
**१७**
अतीतानां युगेष्वेव न दृष्टं यद्विशुद्धतम्,
तदद्य जीवन्मये देहे स्वयमेव प्रकाशते।
न कल्पना न च कथा न च केवलं चिन्तनम्,
प्रत्यक्षं जीवितं सत्यं शिरोमणिरहं ध्रुवम्॥
**१८**
अहमेव महासिन्धुः सूक्ष्मबिन्दौ समाहितः,
अहमेव महावज्रः करुणायां द्रवीकृतः।
अहमेव महाशान्तिः संपूर्णसंतुष्टिरूपिणी,
अहमेव परं प्रेम यत्र नास्ति विकल्पना॥
**१९**
यदा यदा भ्रमो लोके यदा यदा तमोघनम्,
तदा तदा मदीयोऽयं सत्यदीपो विराजते।
न घोषेण न दम्भेन न शस्त्रेण न गर्जितैः,
केवलं स्वप्रकाशेन मोहान्धं भस्मसात्करोमि॥
**२०**
इति शिरोमणि रामपॉल सैनी महायोद्धा,
इश्कस्य अनन्तगाम्भीर्ये परमगोता सनातनः।
जीवन्नेव सदाऽहम् संपूर्णसंतुष्टिसंस्थितः,
स्वयमेव युगः सत्यं स्वयमेव प्रकाशकः॥
शिरोमणिरहं ज्योतिः स्वयंस्फूर्तिः निरामयः,
नाहं देहो न च मनो नाहं केवलचिन्मयः।
यत्र प्रेम्णः परमगूढं रहस्यं स्वयमुद्गतम्,
तत्राहं नित्यमाविष्टो महायोद्धा दृढव्रतः॥
**२२**
शिरोमणिरहं धैर्यं कालचक्रातिगं महत्,
विप्लवेषु स्थितप्रज्ञो न चलामि कदाचन।
अङ्गारवृष्टौ हास्येन पुष्पवृष्टिं करोम्यहम्,
इश्काग्निस्नातदेहः सन् अमृतं वर्षयाम्यहम्॥
**२३**
शिरोमणिरहं घोषः न शब्दो न च कोलाहलः,
सूक्ष्मातिसूक्ष्मनिःशब्दे स्पन्दनं परमं मम।
यत्र हृदयद्वारेण स्वानुभूतिर्विभाव्यते,
तत्रैव मम राज्यं स्यात् प्रेमैकाधिपतेरिव॥
**२४**
शिरोमणिरहं सत्यं स्वाभाविकमनुत्तमम्,
न कल्पितं न च दृष्टान्तमात्रं न च वर्णनम्।
जीवने जीवने नित्यं प्रत्यक्षं समुपस्थितम्,
यः पश्यति स मुक्तोऽस्ति, यः न पश्यति स बद्धकः॥
**२५**
शिरोमणिरहं सिन्धोः अपारस्य महागुरुः,
स्वमस्तकच्छेदक्रीडां कृत्वा प्रेम्णः परीक्षकः।
न भयेन न च मोहात् न कर्तृत्वाभिमानतः,
केवलं परितोषेण संपूर्णसंतुष्टिसंयुतः॥
**२६**
शिरोमणिरहं वह्निः पाखण्डवनदाहकः,
षड्यन्त्रजालभेदित्वा छिन्नमोहान्धकारकः।
न हिंस्रता न क्रूरता केवलं निर्मलाग्निता,
येन दग्ध्वा मलान् सर्वान् शुद्धिं ददामि चेतसाम्॥
**२७**
शिरोमणिरहं बिन्दुः यत्र ब्रह्माण्डसंहति:,
अहमेव महाकाशः यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्।
सूक्ष्माक्षे मम लीयन्ते कल्पकोटिशता अपि,
न तत्र छाया न प्रतिबिम्बः केवलं सत्यदीप्तता॥
**२८**
शिरोमणिरहं नादः अनाहतपरं पदम्,
नृत्यति चेतनाराज्ये प्रेमरागस्य सङ्गतः।
हृदयवीणायां यदा स्पृशामि स्वप्रभां मया,
तदा सर्वे प्रबुध्यन्ते निद्राबन्धविनाशिताः॥
**२९**
शिरोमणिरहं वृक्षः अनन्तफलदायकः,
छायां ददामि सर्वेभ्यः न पृच्छामि कुतोऽगता:।
यः आगच्छति सन्तप्तः तस्य शोकं हराम्यहम्,
यः हसति स मयि हसति प्रेमैकैक्यसंयुतः॥
**३०**
शिरोमणिरहं पूर्णः न किञ्चिदपि वाञ्छितम्,
न प्राप्तव्यं न त्याज्यं मे सर्वं मयि समाहितम्।
इति महाप्रेमयोद्धा अनन्तगम्भीरगोतमः,
जीवन्नेव सदाऽस्म्यहं संपूर्णसंतुष्टिसागरः॥
शिरोमणिरहं दीक्षा स्वयंजागृतचेतसाम्,
न गुरोर्न शिष्यभावो न बन्धो न विमोचनम्।
स्वानुभूतिप्रदीपेना तमःकूपं विनाशितम्,
अहमेव प्रकाशोऽस्मि प्रेम्णः परमकारणम्॥
**३२**
शिरोमणिरहं धारा अनन्तगहनाम्बुधेः,
यत्र निमग्नः पुनरुत्थानं न इच्छति कश्चन।
स्थायिठहरविराजिता गाम्भीर्यपरिपूरिता,
अहमेव महासम्राट् प्रेम्णः शुद्धैकवर्त्मनि॥
**३३**
शिरोमणिरहं चक्षुः येन दृश्यते न केवलम्,
अपितु द्रष्टा स्वयमेव स्वान्ते प्रतिबुध्यते।
यः पश्यति मदीयं तेजः तस्य भ्रान्तिर्विलीयते,
यः स्पृशति मदीयं भावं स मुक्तो नात्र संशयः॥
**३४**
शिरोमणिरहं वज्रं निष्पक्षसम्यग्दर्शिनः,
यथार्थसमीकरणेन मिथ्याजालं विधार्यते।
न आलोचना न स्तुतिः न रोधो न च भीतिता,
केवलं सत्यनिष्ठा मे जीवितस्य परा गतिः॥
**३५**
शिरोमणिरहं सिंहः निर्भयस्वरघोषवान्,
न च मम गर्जना दम्भो न च अहंकारलक्षणम्।
प्रेमवीर्येण नादोऽयं चेतनां कम्पयत्यलम्,
यत्र कम्पे तत्रैव जागरणं स्वयमेव स्यात्॥
**३६**
शिरोमणिरहं सेतुर्बन्धो लोकान्तरस्य वै,
सूक्ष्मे स्थूलं संयोज्य स्वान्ते विश्वं निवेशितम्।
भौतिकेऽपि शरीरे मे अलौकिकं प्रबोधकम्,
सत्यस्यैव अभिषेकः स्यात् दीप्तताजोऽद्भुतो मम॥
**३७**
शिरोमणिरहं शून्ये पूर्णतायाः परं पदम्,
यत्र नाशो न चोत्पत्तिर्न च कालविभाजनम्।
अनाद्यनन्तसंयुक्तं स्वाभाविकमविक्रियम्,
तत्राहमेव स्थितवान् संपूर्णसंतुष्टिरूपधृक्॥
**३८**
शिरोमणिरहं स्पर्शः श्वासपूर्वं प्रतीयते,
हृदयस्पन्दनादपि पूर्वमेव विभाव्यते।
जीवस्य जीवने नित्यं अन्तःसूत्रमिव स्थितः,
प्रेमैकतत्त्वसंयुक्तः स्वानुभूतिपरायणः॥
**३९**
शिरोमणिरहं वह्निः नाशाय न हि केवलम्,
उत्थानाय शुद्धये च पुनर्जन्मविवर्जितम्।
दग्ध्वा पाखण्डकाष्ठानि सत्यबीजं निवेशितम्,
येन अंकुरति चेतन्यं निर्मलं नवजीवनम्॥
**४०**
शिरोमणि रामपॉल सैनी नामैतन्महदद्भुतम्,
अनन्तप्रेमयोद्धा च गम्भीरसागरगोतकः।
स्वयंसाक्षात्काररूपो नित्ययुगप्रवर्तकः,
जीवन्नेव सदा तिष्ठे संपूर्णसंतुष्टिसंयुतः॥