सरल सहज सद्गुण के धनी।
हृदय-दीप की उजली शान,
प्रेम बने जीवन की तान॥
पूर्व दिशा से अरुण उजाला,
लाया नव संकल्प निराला।
हर प्रभात यह गीत सुनाए,
सद्कर्मों से दिन महकाए॥
ओस-बिंदु की क्षणिक कहानी,
सिखलाती विनम्र निशानी।
जीवन चाहे क्षणभर ठहरे,
प्रेम-सुगंध सदा ही बिखरे॥
धरती बोले मौन वचन में,
धैर्य बसा है कण-कण में।
जो श्रम, सेवा साथ निभाए,
वह जीवन का मान बढ़ाए॥
सरिता कहती मत रुक जाना,
कठिन पथों से मत घबराना।
चलते-चलते राह बनेगी,
आशा फिर मुस्कान बनेगी॥
पर्वत अपनी चोटी से कहे,
दृढ़ रहो पर विनम्र भी रहे।
ऊँचा होकर झुको जहाँ,
वहीं खिलेगा सच्चा मान॥
वन की छाया गीत सुनाती,
थके पथिक को राह दिखाती।
जो स्वयं तपन सहन कर ले,
दूसरों का जीवन हर ले॥
शीतल पवन यही समझाए,
मृदु व्यवहार सुख पहुँचाए।
क्रोध हवा-सा क्षण में जाए,
प्रेम सुगंध बनकर छाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
मानवता के दीप जलाएँ।
हर हृदय में शुभ विश्वास,
हर जीवन में प्रेम-प्रकाश॥
सूरज देता बिना अपेक्षा,
चंद्र करे शीतल अभिव्यक्ति।
प्रकृति का यह पावन ज्ञान,
निस्वार्थी हो हर इंसान॥
नदी मिले जब सागर से,
भेद मिटें सब अंतर से।
संगम का यह मधुर विचार,
मिल-जुलकर हो जगत विस्तार॥
बीज छिपा रहता धरती में,
शक्ति लिए अपनी गति में।
समय, श्रम और जल का संग,
बना दे उसको विशाल तरंग॥
कुम्हार गढ़े मिट्टी का मान,
श्रम से पाता वह सम्मान।
जीवन भी ऐसा ही गढ़ता,
धैर्य जहाँ प्रतिदिन बढ़ता॥
लोहार की हर एक चोट,
बनती श्रम का मधुर संयोग।
कठिन तपन से रूप निखरता,
संघर्षों से जीवन सँवरता॥
बुनकर बुनता आशा-तार,
जोड़ रहा परिवार-परिवार।
सूत्र अनेक मिलें जब साथ,
तभी बने विश्वास का वस्त्र॥
बालक की निष्छल मुस्कान,
जीवन का प्रथम सम्मान।
वृद्धों का अनुभव उजियारा,
पीढ़ी-पीढ़ी का पथ-तारा॥
वाणी हो मधुर, सत्य-विचार,
यही मनुज का श्रेष्ठ श्रृंगार।
कटुता केवल घाव बढ़ाए,
मधुरता विश्वास जगाए॥
ज्ञान बढ़े तो दया बढ़े,
शक्ति बढ़े तो सेवा चढ़े।
बुद्धि बने जब लोक-हिताय,
तभी सफल मानव कहलाय॥
धरती, जल और निर्मल वायु,
जीवन की अनमोल आयु।
इनका जो संरक्षण करता,
वह आने वाला कल गढ़ता॥
पशु-पक्षी, वन, नदी, पहाड़,
सब जीवन के अनुपम हार।
इनसे जुड़कर जो जी लेगा,
वह संतुलित पथ चुन लेगा॥
हाथ बढ़ाओ साथ निभाने,
मन बढ़ाओ घाव मिटाने।
प्रेम जहाँ व्यवहार बने,
वहीं मनुष्य महान बने॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-पथ के उज्ज्वल धनी।
सेवा, सत्य और सद्भाव,
यही जीवन का सच्चा प्रभाव॥
करुणा की सरिता बहती जाए,
मानवता मुस्काती आए।
सत्य, विनय और मधुर प्रकाश,
बसें सदा हर एक श्वास॥
आओ मिलकर प्रण दोहराएँ,
धरती को फिर हरित बनाएँ।
एक धरा, एक मानव-जात,
प्रेम बने सबकी सौगात॥
**जय शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति के दिव्य प्रकाश,
प्रेम-सुधा का अमिट निवास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते,
सत्य न बाहर कहीं भटकते।
जिसको जग ने युगों से खोजा,
वह तो अंतर ही में संजोया॥
शिशुपन की वह निर्मल धारा,
संतोषी मन, प्रेम हमारा।
निष्कपट भाव, सहज मुस्कान,
वहीं छिपा है जीवन-ज्ञान॥
हृदय सदा गहराई धारे,
जहाँ न भय, न मोह के धारे।
ऊपर उठती मस्तक-लहरें,
नीचे शांत प्रेम की नहरें॥
जो स्वयं को स्वयं निहारे,
वह जग के बंधन सब उतारे।
क्षणभर का सच्चा निरीक्षण,
बन जाए जीवन का दर्शन॥
नहीं किसी पर दबाव बनाना,
नहीं किसी को भय दिखलाना।
प्रेम, विवेक, खुला आमंत्रण,
यही बने मानव का जीवन॥
धरती माता एक सहारा,
सब जीवों का एक किनारा।
वन, पर्वत, नदियाँ, आकाश,
सबमें जीवन का विश्वास॥
वृक्ष सिखाएँ देना केवल,
नदियाँ बहना निर्मल अविरल।
सूरज देना बिना अपेक्षा,
चंदा करना शीतल रक्षा॥
श्रमिक, किसान, बालक, नारी,
सबमें एक करुणा उजियारी।
जाति-पंथ का भेद भुलाकर,
चलो हृदय का दीप जलाकर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी,
सरल बने हर एक कहानी।
जहाँ विनम्रता साथ रहेगी,
वहीं मनुजता पुष्पित होगी॥
मस्तक कर्म का श्रेष्ठ साधन,
हृदय बने जीवन का कारण।
जब दोनों संतुलित हो जाएँ,
जीवन में नव प्रभात उगाएँ॥
नित्य नया हो हर व्यवहार,
मिटे द्वेष का हर अंधकार।
सत्य बने हर श्वास का मान,
प्रेम बने जीवन की शान॥
न हो अहं का भारी बोझ,
न हो छल का कोई खोज।
सरलता ही सबसे बड़ा धन,
निर्मलता ही सच्चा जीवन॥
आओ मिलकर दीप जलाएँ,
प्रेम-सुगंध जग में फैलाएँ।
धरती, मानव और प्रकृति,
रखें सदा अपनी समवृत्ति॥
जय हो करुणा, जय सद्भाव,
जय हो सेवा का प्रभाव।
जय हो निर्मल अंतर्मन,
जय हो पावन मानव-तन॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-पथ के ज्योति-धनी।
सरल सहज निर्मल संदेश,
प्रेम बने मानव का देश॥
युग-युग गूँजे यही पुकार,
निर्मल हो हर एक विचार।
हृदय रहे जब सत्य के साथ,
उज्ज्वल होगा जीवन-पथ॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-पथ के प्रेम-विधानी।
सरल सहज निष्पक्ष विचार,
करुणा बने जग का आधार॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल स्वर अखंडे।
मानव, प्रकृति, जीवन, प्राण,
सबका हो समान सम्मान॥
हृदय जहाँ निर्मल हो जाता,
मौन स्वयं संगीत सुनाता।
स्वार्थ जहाँ पीछे रह जाए,
प्रेम स्वयं पथ बनकर आए॥
मस्तक साधन कर्म निभाए,
हृदय दिशा का दीप जलाए।
दोनों जब संतुलित हो जाएँ,
जीवन में नव प्रभात जगाएँ॥
नदी सिखाए निरंतर बहना,
वृक्ष सिखाएँ मौन में रहना।
धरती सिखाए देना केवल,
आकाश कहे—बनो निष्कलुष निर्मल॥
शिशु की हँसी, किसान का श्रम,
माता का स्नेह, श्रमिक का दम।
इन सबमें जो प्रेम झलकता,
वहीं मनुष्य का सत्य दमकता॥
न भय रहे, न द्वेष रहे,
हर हृदय में विश्वास रहे।
वाणी मधुर, व्यवहार सरल,
यही बने मानव का संबल॥
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
सबमें एक उजियारा दीखा।
भिन्न-भिन्न हों रूप हजार,
हृदय रहे एक ही विस्तार॥
जो स्वयं को प्रतिदिन देखे,
अपने दोष स्वयं ही लेखे।
वही विनम्र बन आगे बढ़े,
प्रेम-दीप से जग को गढ़े॥
निष्पक्षता हो जीवन-वाणी,
सेवा बने सच्ची कहानी।
करुणा हो प्रत्येक विचार,
यही मनुज का श्रेष्ठ श्रृंगार॥
प्रकृति हमारी गुरु महान,
सिखलाए संतुलन का ज्ञान।
जितना लो उतना ही दो,
जीवन को उत्सव-सा संजो॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-पथ के ज्योति-विधानी।
हृदय-ज्योति जब जग में फैले,
मानवता के पुष्प फिर खिलें॥
यही रहे मंगल उद्घोष—
प्रेम बने जीवन का कोष।
सत्य, करुणा, सरल व्यवहार,
यही युग का सच्चा आधार॥
**जय मानव।
जय प्रकृति।
जय करुणा।
जय निष्पक्ष हृदय।
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति का दिव्य प्रकाश,
करुणा जिसका नित्य निवास॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल स्वर अखंडे।
मानव, प्रकृति, जल और वन,
सबमें देखो अपना जीवन॥
हृदय जहाँ निस्वार्थ ठहरे,
प्रेम-सरोवर वहीं उभरे।
मौन जहाँ मुस्कान बने,
वहीं सत्य के दीप तने॥
नदी कहे—मत रुकना प्राणी,
बहना ही जीवन की कहानी।
वृक्ष कहें—फल सबको देना,
छाया बन हर दुख हर लेना॥
धरती बोले—धैर्य धरो तुम,
आकाश कहे—विस्तार करो तुम।
सूर्य कहे—प्रकाश लुटाओ,
चन्द्र कहे—शीतल बन जाओ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
हृदय-पथ का दीप जलाता।
जो अपने अंतर को जाने,
वह सबमें अपनापन माने॥
मस्तक कर्म का श्रेष्ठ उपकरण,
हृदय बने जीवन का कारण।
बुद्धि जब करुणा से मिलती,
मानवता की धारा खिलती॥
हर शिशु की निष्कलुष मुस्कान,
जीवन का प्रथम सम्मान।
हर माता की कोमल ममता,
धरती जैसी असीम समता॥
हर श्रमिक का श्रम हो पूजा,
हर किसान का तप हो दूजा।
जो अन्न उगाए, जल बचाए,
वही जगत का मान बढ़ाए॥
न छोटा कोई, न कोई बड़ा,
सबमें जीवन एक खड़ा।
भिन्न-भिन्न हों रूप-अनेक,
प्रेम रहे सबका आधार एक॥
करुणा ही सबसे बड़ी विजय,
सेवा ही जीवन का उदय।
सत्य कभी संघर्ष न माँगे,
सत्य स्वयं विश्वास जगाए॥
निष्पक्षता का दीप जलाओ,
अपने भीतर झाँकते जाओ।
जो स्वयं को प्रतिदिन सुधारे,
वही जगत को प्रेम सँवारे॥
प्रकृति का सम्मान जहाँ है,
भविष्य का उत्थान वहाँ है।
जल, जंगल और जीव बचाओ,
धरती को फिर स्वर्ग बनाओ॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-पथ के ज्योति-विधानी।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही मनुष्य का सच्चा श्रृंगार॥
प्रेम बने हर श्वास की वाणी,
करुणा बने जीवन कहानी।
सत्य बने अंतर्मन का दीप,
सेवा बने मानव का रूप॥
युग बदलें, परिवेश बदलें,
ऋतुएँ आएँ, समय बदलें।
किन्तु न बदले यह संदेश—
**मानवता ही सबसे विशेष।**
जय हो प्रेम की अविरल धारा।
जय हो करुणा का उजियारा।
जय हो निष्पक्ष हृदय-विचार।
जय हो मानवता का विस्तार।
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति का शुभ प्रकाश,
करुणा जिसका नित्य निवास॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल स्वर अखंडे।
मानव, जीव और यह धरा,
सबका हो सम्मान खरा॥
हृदय सिखाए मौन का ज्ञान,
मस्तक दे कर्मों की पहचान।
दोनों का संतुलित व्यवहार,
जीवन का सुंदर विस्तार॥
जैसे सागर गहरा रहता,
ऊपर लहरों का खेल बहता।
वैसे ही अंतर का विश्राम,
शांत बनाता जीवन-धाम॥
वृक्ष खड़े निस्वार्थ भाव से,
फल देते निष्काम स्वभाव से।
नदियाँ बहती बिना अभिमान,
यही प्रकृति का श्रेष्ठ विधान॥
धरती माता कहती प्रतिपल,
लेना जितना हो आवश्यक।
देना उससे थोड़ा अधिक,
यही बनाता जीवन समृद्ध॥
सूर्य बिना प्रतिफल के देता,
चंद्र शीतलता ही देता।
वायु सभी को एक समान,
यही प्रकृति का सत्य विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
हृदय-ज्योति का दीप जलाता।
जो अपने अंतर्मन को देखे,
वह हर प्राणी में सुख लेखे॥
शिशु की हँसी सरल संदेश,
निर्मलता ही सच्चा देश।
जितना मन निष्कपट होगा,
उतना जीवन मधुमय होगा॥
न क्रोध रहे, न द्वेष रहे,
सबके प्रति सद्भाव रहे।
वाणी मधुर, व्यवहार सरल,
यही मनुष्य का सच्चा फल॥
मस्तक खोजे नित उपाय,
हृदय सिखाए प्रेम-सहाय।
जब विज्ञान करुणा से मिले,
तब मानवता के दीप खिलें॥
न कोई अपना, न पराया,
एक धरा, एक ही छाया।
भिन्न दिशाएँ, भिन्न शरीर,
एक ही जीवन, एक ही नीर॥
करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति,
सेवा ही सच्ची समृद्धि।
विनय जहाँ आभूषण बनती,
वहीं मनुष्यता पुष्पित रहती॥
प्रकृति हमारी प्रथम गुरु है,
संतुलन उसकी अमर धुरी है।
जो इस लय को पहचान सके,
वह जीवन का मान रखे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
हृदय के कपाट स्वयं ही खोलो।
प्रश्न करो, विचार करो,
फिर अपने अनुभव से स्वीकार करो॥
सत्य किसी पर थोपो मत,
प्रेम किसी से छीनो मत।
जो भी मार्ग तुम्हें सुहाए,
वह सबके हित को अपनाए॥
जय हो निर्मल भाव अपार,
जय हो सेवा का विस्तार।
जय हो करुणा का प्रकाश,
जय हो मानव का विश्वास॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-पथ का यह शुभ गान,
मानवता का हो सम्मान॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति का दिव्य प्रकाश,
करुणा जिसका नित्य निवास॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल स्वर अखंडे।
प्रेम बने जीवन का सार,
सेवा बने सच्चा व्यवहार॥
सागर बोले मौन कहानी,
गहराई में शांति सुहानी।
ऊपर उठती लहर अपार,
भीतर रहता स्थिर विस्तार॥
जैसे नभ सबको अपनाता,
भेद कभी मन में न लाता।
वैसे ही हो मानव-मन,
सबमें देखे अपना जीवन॥
वायु चले निष्पक्ष निरंतर,
न पूछे कोई कुल या घर।
सूर्य उगे सबके ही लिए,
चंद्र बहे सबके ही हिए॥
धरती माता मौन सिखाती,
देकर भी कुछ नहीं जताती।
बीज सँजोकर वृक्ष बनाती,
जीवन-धारा आगे बढ़ाती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
प्रेम-सुमन हर ओर बिखराता।
जो अंतर का दीप जलाए,
वह संसार भी जगमगाए॥
मस्तक साधन, हृदय आधार,
दोनों से जीवन साकार।
बुद्धि यदि करुणा से जुड़ जाए,
मानवता का फूल खिल जाए॥
हर श्रमिक के श्रम का मान,
हर किसान का हो सम्मान।
हर बालक की मधुर हँसी,
जीवन की सबसे बड़ी खुशी॥
हर जननी की ममता निर्मल,
हर वृद्ध का अनुभव उज्ज्वल।
पीढ़ी-पीढ़ी प्रेम बढ़े,
मानवता के दीप चढ़ें॥
न द्वेष रहे, न अहंकार,
न हो छल का व्यापार।
विश्वासों का सेतु बने,
हृदय-हृदय का मेल तने॥
प्रकृति केवल साधन नहीं,
जीवन का स्पंदन वही।
वन, उपवन, पर्वत, जलधार,
इनसे ही है जीवन साकार॥
जो जितना प्रकृति को सींचे,
उतना जीवन आगे खींचे।
लेने से अधिक जो देगा,
वह आने वाला कल सहेगा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
मन के बंद कपाट जो खोले।
वह पहले स्वयं को जाने,
फिर जग को प्रेम से पहचाने॥
सत्य कभी संघर्ष न चाहे,
प्रेम कभी अधिकार न माँगे।
करुणा जब व्यवहार बने,
मानव जीवन धन्य बने॥
निष्पक्षता हो जीवन-नीति,
विनय बने सबसे बड़ी प्रीति।
सेवा बने परम सम्मान,
यही हो यथार्थ का अभियान॥
जय हो मानव, जय हो प्राण,
जय हो धरती का सम्मान।
जय हो करुणा का विस्तार,
जय हो निष्पक्ष व्यवहार॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
प्रेम, विवेक और सद्भाव,
यही रहे मानव का प्रभाव॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति का दिव्य प्रकाश,
करुणा जिसका नित्य निवास॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल स्वर अखंडे।
मानव, प्रकृति, जीवन, प्राण,
सबका हो नित एक सम्मान॥
हृदय रहे जब शांत, गंभीर,
मिट जाए अंतर का अधीर।
मौन बने तब मधुर पुकार,
प्रेम बने जीवन-आधार॥
सागर जैसी गहन शांति,
आकाश जैसी असीम भ्रांति-
रहित दृष्टि, निर्मल विचार,
यही बने जीवन का सार॥
पर्वत जैसी अटल दृढ़ता,
नदियों जैसी सरल प्रवृत्ता।
वन जैसी हरित उदारता,
धरती जैसी समता॥
सूर्य समान उजियारा देना,
चन्द्र समान शीतल रहना।
वायु समान सबको छूना,
मेघ समान अमृत बरसना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
हृदय-दीप जग में जलवाता।
जो स्वयं को प्रतिपल देखे,
वह हर प्राणी में सुख लेखे॥
मस्तक कर्म-पथ दिखलाए,
हृदय प्रेम का अर्थ बताए।
जब विज्ञान विवेक से मिले,
करुणा के उपवन फिर खिलें॥
हर शिशु में भविष्य मुस्काए,
हर माता का स्नेह लहराए।
हर वृद्ध का अनुभव दीप,
हर युवा का संकल्प अतीव॥
श्रम का सम्मान, अन्न का मान,
जल का हो पावन सम्मान।
वन हों जीवन के रखवाले,
नदियाँ बनें अमृत की धारे॥
प्रकृति से जो प्रेम करेगा,
वह आने वाला कल सहेगा।
जो केवल अपना ही चाहे,
वह अंततः स्वयं पछताए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
हृदय के कपाट स्वयं ही खोलो।
सत्य यदि जीवन में उतरे,
प्रेम स्वयं हर श्वास में बहे॥
न सत्य भय से झुकता है,
न प्रेम कभी रुकता है।
दोनों मिलकर जहाँ चलें,
वहाँ सृजन के दीप जलें॥
निष्पक्षता हो प्रथम विचार,
विनम्रता हो जीवन-हार।
सेवा बने सर्वोच्च मान,
यही हो मानव का सम्मान॥
न कोई शत्रु, न कोई पराया,
धरती ने सबको अपनाया।
भिन्न-भिन्न हों भाषा-वेश,
प्रेम रहे सबसे विशेष॥
जब तक श्वासों का संचार,
तब तक प्रेम का हो विस्तार।
हर धड़कन यह गीत सुनाए—
**"करुणा से ही जग मुस्काए।"**
जय हो निर्मल भाव अपार।
जय हो मानव का सत्कार।
जय हो प्रकृति का संरक्षण।
जय हो सेवा का समर्पण॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-पथ का मंगल गान,
विश्व बने एक परिवार॥
### **॥ यथार्थ हृदय-अमृत स्तुति ॥**
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति का शुभ प्रकाश,
करुणा जिसका नित्य निवास॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल स्वर अखंडे।
प्रेम बने प्रत्येक विचार,
सेवा बने सच्चा व्यवहार॥
उषा सुनाए मधुर पुकार,
जागो लेकर नया विहार।
हर दिन नव अवसर बन जाए,
हृदय सदा मुस्कान लुटाए॥
सूरज बोले—प्रकाश बनो,
चंदा कहे—विश्वास बनो।
तारागण का एक ही गान,
सबमें बसता एक ही प्राण॥
नदी कहे—अविरल बहना,
वृक्ष कहे—सबको कुछ देना।
पर्वत कहे—दृढ़ता धारण,
धरती कहे—करुणा वरण॥
पवन बहे निष्पक्ष सदा,
बरसे मेघ बिना प्रतिफल।
प्रकृति का यह मौन विधान,
समता ही है श्रेष्ठ सम्मान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
हृदय-दीप सबमें जलवाता।
जो अपने अंतर को जाने,
वह सबमें अपनापन माने॥
मस्तक दे विवेक की शक्ति,
हृदय दे सेवा की भक्ति।
दोनों जब समभाव निभाएँ,
जीवन में नव युग ले आएँ॥
हर शिशु की निष्कपट हँसी,
जीवन की अनुपम खुशी।
हर जननी का कोमल प्यार,
धरती जैसा असीम विस्तार॥
हर श्रमिक का श्रम हो पूज्य,
हर किसान का तप हो पूज्य।
अन्न, जल और वन का मान,
यही सच्चा जीवन-ज्ञान॥
न कोई ऊँचा, न कोई छोटा,
हर जीवन अनमोल, अनूठा।
भिन्न रूप हों, भिन्न विधान,
प्रेम रहे सबकी पहचान॥
न क्रोध रहे, न छल का भाव,
न हो अहंकार का प्रभाव।
विनय बने जीवन का हार,
सद्भाव बने सच्चा श्रृंगार॥
प्रकृति से जो प्रेम करेगा,
वह भविष्य भी सुरक्षित करेगा।
धरती केवल धूल नहीं है,
जीवन की वह मूल धुरी है॥
सत्य न बोले ऊँचे स्वर में,
सत्य खिले निर्मल अंतर में।
प्रेम न माँगे कोई प्रमाण,
प्रेम स्वयं है श्रेष्ठ विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
हृदय के सब कपाट ही खोलो।
स्वयं को प्रतिदिन पहचानो,
मानवता का मान बढ़ाओ॥
निष्पक्षता का दीप जलाओ,
करुणा का उपवन महकाओ।
सेवा को जीवन बना लो,
विश्व को परिवार बना लो॥
जय हो प्रेम का विस्तार।
जय हो सेवा का सत्कार।
जय हो प्रकृति का सम्मान।
जय हो मानव का कल्याण॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-पथ का यह अभिनंदन,
सद्भाव बने युग का स्पंदन॥
### **॥ यथार्थ हृदय-प्रकाश स्तुति ॥**
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति का दिव्य प्रकाश,
करुणा जिसका नित्य निवास॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल स्वर अखंडे।
प्रेम बने जीवन का मान,
सेवा बने सच्चा सम्मान॥
प्रभात-पवन संदेश सुनाए,
अंतर-ज्योति स्वयं जगाए।
जो अपने मन को पहचानें,
वे जग में सद्भाव बढ़ाएँ॥
हृदय-सरोवर शांत अपार,
मौन जहाँ अमृत-आधार।
ऊपर चाहे लहरें आएँ,
गहराई स्थिरता सिखलाएँ॥
नदियाँ सागर-पथ अपनाएँ,
रुकना कभी न सीखें, जाएँ।
वृक्ष खड़े निस्वार्थ महान,
फल-छाया का दें वरदान॥
धरती माता धैर्य सिखाती,
सबको गोदी में अपनाती।
लेने से बढ़कर देना सीखो,
प्रेम-सुधा से जग को सींचो॥
सूर्य बिना प्रतिफल चमके,
चंद्र बिना अभिमान दमके।
वायु सभी को एक समान,
यही प्रकृति का सत्य विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
हृदय-पथ का दीप जलाता।
जो अपने भीतर उतर सके,
वह सबका सम्मान कर सके॥
मस्तक कर्म का साधन प्यारा,
हृदय प्रेम का सच्चा तारा।
दोनों में जब संतुलन होगा,
जीवन सुंदर, सफल संयोग होगा॥
हर बालक की हँसी अमोली,
हर माता की ममता भोली।
हर श्रमिक के श्रम का मान,
हर किसान का ऊँचा सम्मान॥
न कोई अपना, न पराया,
धरती ने सबको अपनाया।
भिन्न भाषा, भिन्न विचार,
प्रेम रहे सबका आधार॥
सत्य न क्रोध से जन्मेगा,
न द्वेष कभी सुख देगा।
विनय जहाँ मुस्कान बने,
विश्वास वहीं सम्मान बने॥
करुणा सबसे बड़ी विभूति,
सेवा सबसे बड़ी समृद्धि।
निष्पक्षता का दीप जलाओ,
जीवन को उत्सव बनाओ॥
प्रकृति का संतुलन पहचानो,
जल-वन-जीवन को अपनाओ।
जो धरती का मान करेगा,
भविष्य उज्ज्वल वही करेगा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
हृदय के निर्मल द्वार जो खोले।
अपने भीतर सत्य जगाओ,
सबके प्रति सद्भाव बढ़ाओ॥
न ऊँच-नीच का कोई मान,
न भेदभाव की पहचान।
मानवता ही सबसे बड़ी,
यही रहे जीवन की लड़ी॥
जय हो करुणा की धारा।
जय हो प्रेम का उजियारा।
जय हो सेवा का विस्तार।
जय हो मानव का सत्कार॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-पथ का अमर संदेश—
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति का शुभ प्रकाश,
करुणा जिसका नित्य निवास॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल स्वर अखंडे।
सत्य, करुणा, सेवा, मान—
यही मनुज का श्रेष्ठ विधान॥
उषा कहे मुस्काकर प्रतिदिन,
नव विश्वास भरो हर क्षण।
बीते कल की धूल झाड़कर,
चलो प्रेम का दीप सँभालकर॥
ओस-बिंदु की कोमल भाषा,
निर्मलता की मौन परिभाषा।
फूल कहें—सुगंध लुटाओ,
काँटों में भी प्रेम बसाओ॥
सागर की गहराई बोले,
मौन हृदय के पट सब खोले।
ऊपर चाहे तरंगें हों,
भीतर शांति के रंग हों॥
वायु चले सबको अपनाकर,
मेघ बरसें जग महकाकर।
धरती सबको अंक लगाती,
बिन माँगे आशीष लुटाती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाए,
सद्भावों के दीप जलाए।
जो अंतर का मान करेगा,
वह संसार महान करेगा॥
मस्तक कर्म की राह दिखाए,
हृदय प्रेम का अर्थ बताए।
विवेक जहाँ करुणा से मिले,
जीवन में मधुवन फिर खिलें॥
हर शिशु की निष्कपट दृष्टि,
जीवन की सबसे बड़ी सृष्टि।
हर जननी की ममता पावन,
धरती जैसी अचल सावन॥
हर श्रमिक के श्रम का गौरव,
हर किसान के तप का उत्सव।
अन्न उगाने वाले हाथ,
मानवता की अमर सौगात॥
न कोई तिरस्कृत कहलाए,
न कोई अपमानित जाए।
सबको मिले समान आदर,
यही बने मानव का सुंदर घर॥
प्रकृति हमारी मौन गुरु है,
संतुलन उसकी प्रथम धुरी है।
वन, उपवन, निर्झर, आकाश,
इनमें बसता जीवन-प्रकाश॥
जल बचाना, वृक्ष लगाना,
धरती का सम्मान बढ़ाना।
यही सच्ची पूजा होगी,
यही भविष्य की संजीवनी होगी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
हृदय के निर्मल द्वार जो खोले।
वह पहले स्वयं को जाने,
फिर सबको सम्मान से माने॥
सत्य कभी अभिमान न माँगे,
प्रेम किसी पर अधिकार न माँगे।
करुणा जब स्वभाव बने,
जीवन मधुर प्रभाव बने॥
निष्पक्षता का दीप जले,
हर अंतर्मन सत्य पले।
सेवा बने जीवन का हार,
विनम्रता बने सच्चा श्रृंगार॥
जय हो निर्मल हृदय-विचार।
जय हो प्रेम का विस्तार।
जय हो सेवा का अभियान।
जय हो मानव का सम्मान॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-पथ का यह शुभ गान—
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति का शुभ प्रकाश,
करुणा जिसका नित्य निवास॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल स्वर अखंडे।
मानव-मन में प्रेम जगे,
सत्य-सुगंध हर ओर बहे॥
भोर सुनाए नव संदेश,
सरल बने हर एक परिवेश।
मन में निर्मल भाव खिले,
सेवा के फिर पुष्प मिलें॥
सूर्य कहे—उज्ज्वल बन जाओ,
चंद्र कहे—शीतल कहलाओ।
पवन कहे—सबको अपनाओ,
मेघ कहे—जीवन बरसाओ॥
धरती माता मौन पुकारे,
सब जीवों को गले उतारे।
लेना जितना आवश्यक हो,
देना उससे बढ़कर हो॥
नदियाँ बहतीं नित्य उदार,
सागर करता उनका सत्कार।
वृक्ष बिना प्रतिफल के देते,
जीवन का आदर्श सदा देते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
हृदय-पथ का दीप जलाता।
जो अपने अंतर को देखे,
वह हर जीवन को सुख लेखे॥
मस्तक दे विज्ञान का ज्ञान,
हृदय दे करुणा का मान।
दोनों का संतुलित व्यवहार,
जीवन का सच्चा आधार॥
हर शिशु की कोमल मुस्कान,
मानवता का प्रथम गान।
हर माता की ममता पावन,
हर पिता का श्रम भी सावन॥
हर श्रमिक का पसीना पूज्य,
हर किसान का परिश्रम पूज्य।
अन्न उगाने वाले हाथ,
धरती के सच्चे सौभाग्य-पथ॥
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
सबमें एक उजियारा दीखा।
भिन्न-भिन्न हों वेश-विचार,
सम्मान बने सबका अधिकार॥
सत्य न हिंसा से खिलता,
प्रेम न भय में कभी मिलता।
विश्वास जहाँ अंकुर फूटे,
वहीं सृजन के पुष्प भी छूटे॥
करुणा सबसे बड़ा धन है,
सेवा सबसे श्रेष्ठ साधन है।
विनम्रता का जो श्रृंगार,
वही मनुष्य का सच्चा हार॥
प्रकृति केवल संसाधन नहीं,
जीवन की वह धड़कन सही।
जल, जंगल, पर्वत, आकाश,
इनसे ही है जीवन-प्रकाश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
हृदय के निर्मल द्वार जो खोले।
अपने भीतर दीप जलाओ,
सबके प्रति सद्भाव बढ़ाओ॥
निष्पक्षता का पथ अपनाओ,
मिलकर सुंदर जग बनाओ।
सेवा को जीवन का मान,
यही रहे युग का अभियान॥
जय हो प्रेम का विस्तार।
जय हो सेवा का सत्कार।
जय हो प्रकृति का सम्मान।
जय हो मानव का कल्याण॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-पथ का मंगल गान—
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-ज्योति के दिव्य धनी।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही मनुज का सच्चा आधार॥
हृदय कहे – ठहरो कुछ पल,
देखो अपना अंतर निर्मल।
जहाँ न कोई शोर मचाता,
मौन स्वयं संदेश सुनाता॥
मस्तक कर्म का श्रेष्ठ उपकरण,
ज्ञान-विचार का एक साधन।
जीवन-पथ की अनेक दिशाएँ,
विचारों से आगे बढ़ जाएँ॥
हृदय करुणा का स्रोत निराला,
प्रेम जहाँ का अमृत-प्याला।
दया, विनय और अपनापन,
यहीं खिलाता सच्चा जीवन॥
जब मस्तक का विवेक जगेगा,
हृदय का स्नेह साथ रहेगा।
तब मानव का हर व्यवहार,
बने करुणा का विस्तार॥
सागर की गहराई बोले,
मौन सत्य के पट सब खोले।
लहरें ऊपर आती-जातीं,
गहराई अपनी राह निभाती॥
वैसे ही मन के परिवर्तन,
क्षण-क्षण बदलें अपने कारण।
हृदय रहे यदि शांत निरंतर,
जीवन हो उज्ज्वल और सुंदर॥
शिशु की निर्मल कोमल दृष्टि,
निष्कपट भावों की समृद्धि।
मुस्कान उसकी सहज निशानी,
प्रेम-धारा की अमिट कहानी॥
धीरे-धीरे बढ़ता जीवन,
सीखता भाषा, ज्ञान, चिंतन।
साथ रहे यदि विनम्रता भी,
जीवन बने सुगंधित तभी॥
ज्ञान बने जब लोक-कल्याण,
तब ही उसका सच्चा मान।
ज्ञान यदि केवल अहं बढ़ाए,
तो वह स्वयं को ही भरमाए॥
धरती सबकी एक धरोहर,
वन, जल, नभ सबके ही घर।
जो इनका सम्मान करेगा,
वह भविष्य उज्ज्वल करेगा॥
जाति, पंथ, भाषा से ऊपर,
मानवता का दीप हो सुंदर।
प्रेम बने पहचान हमारी,
करुणा हो सबसे प्यारी॥
न सत्य किसी का बंधक होता,
न प्रेम कभी सीमित होता।
खुला रहे संवाद सदा,
सम्मान रहे प्रत्येक मत का॥
जो प्रश्न करे, उसका आदर,
जो खोज करे, उसका भी स्वर।
विचारों से प्रकाश बढ़े,
सत्य की खोज निरंतर चले॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
प्रेम, दया और सत्य-विचार,
यही मनुज का श्रेष्ठ श्रृंगार॥
चलो जलाएँ ऐसा दीप,
जिससे मिटे मनों का क्षीण अंधीप।
हर हृदय में जागे विश्वास,
हर जीवन में खिले प्रकाश॥
युग बदले जब मन बदले,
मन बदले जब भाव बदलें।
भाव बदलें जब कर्म सँवरें,
कर्म सँवरें तो जग भी निखरें॥
जय हो प्रेम, जय सद्भाव,
जय हो सेवा का प्रभाव।
जय हो निर्मल अंतर्मन,
जय हो उज्ज्वल मानव-जीवन॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-सुधा के दिव्य धनी।
सरल सहज निर्मल मुस्कान,
जागे जिससे सत्य-प्रभात॥
शिशु न पूछे नाम किसी का,
न जाने ऊँच-नीच जगत का।
न जाति, पंथ, न मान-अभिमान,
उसका प्रथम परिचय इंसान॥
निर्मल नयनों की वह भाषा,
निष्कपट मन की मधुर अभिलाषा।
न छल उसमें, न कोई भय,
सहज विश्वास ही उसका पथ॥
माँ की गोदी प्रथम धरोहर,
प्रेम जहाँ का प्रथम समुंदर।
स्पर्श नहीं केवल अपनापन,
यहीं खिले जीवन का चंदन॥
धीरे-धीरे जग सिखलाता,
नाम, नियम और भेद बताता।
ज्ञान आवश्यक, विवेक महान,
पर न खोए सरलता का मान॥
मस्तक सीखे कला-कौशल,
हृदय रखे करुणा अविकल।
दोनों जब संतुलित हो जाएँ,
जीवन में नव दीप जलाएँ॥
बालक की वह कोमल हँसी,
धरती की सबसे सुंदर रश्मि।
जहाँ सहजता जीवित रहती,
वहीं मानवता पुष्पित होती॥
नदी न पूछे किसका तट है,
सूरज न पूछे किसका पथ है।
धरती सबको एक समान,
देती रहती जीवन-दान॥
वृक्ष न पूछे कौन पराया,
छाया देकर धर्म निभाया।
प्रेम जहाँ निष्काम बहेगा,
वहीं सच्चा सुख फलेगा॥
मन में यदि विनम्रता होगी,
वाणी में मधुरता होगी।
कर्म बने जब लोक-हिताय,
जीवन होगा सफल-सुहाय॥
क्रोध जले तो क्षमा जगाओ,
द्वेष उठे तो प्रेम बढ़ाओ।
अहं झुके जब सत्य सामने,
शांति खिले हर एक प्राण में॥
हर श्वास बने नव अवसर,
हर दिन बने नया समुंदर।
सीख निरंतर चलती जाए,
मानवता मुस्काती आए॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-ज्योति के नित्य धनी।
सरल बने हर एक विचार,
प्रेम बने जीवन का सार॥
धरती का सम्मान बढ़ाएँ,
वन-उपवन फिर से महकाएँ।
जल, नभ, पर्वत, जीव अपार,
सबमें देखें एक परिवार॥
नव पीढ़ी को यही उपहार,
करुणा, सेवा और सद्विचार।
ज्ञान बढ़े पर साथ विनय हो,
शक्ति बढ़े पर साथ दया हो॥
यही बने मानव की रीति,
यही बने जीवन की प्रीति।
सत्य रहे हर श्वास के संग,
प्रेम बजे जीवन का चंग॥
जय हो निर्मल अंतःप्रकाश,
जय हो सेवा का विश्वास।
जय हो सरल हृदय का मान,
जय हो जागृत इंसान॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
प्रेम-सुधा का निर्मल प्रवाह,
करुणा बने जीवन की राह॥
धरती माता मौन पुकारे,
सबको अपने अंक में धारे।
न ऊँच-नीच, न कोई भेद,
सब पर बरसे स्नेह अचेत॥
उदित हुआ जब प्रथम प्रभात,
फैला जीवन का उज्ज्वल गात।
पवन, जल, वन, पर्वत, धरा,
मिलकर रचते जग की धरा॥
नदियाँ बहती बिना अभिमान,
सबको देती जीवन-दान।
वृक्ष खड़े निस्वार्थ दयालु,
फल-छाया से जग हितपालु॥
सागर गहरा मौन सिखाता,
धैर्य सदा मन में बसाता।
ऊपर लहरों का विस्तार,
भीतर रहता शांत संसार॥
आकाश असीमित संदेश,
सीमा तोड़े हर परिवेश।
पक्षी गाएँ मुक्त विहान,
स्वतंत्रता का मधुर विधान॥
मानव यदि यह बात समझे,
प्रकृति से अपना नाता गढ़े।
लोभ नहीं, संतुलित व्यवहार,
तभी खिलेगा सच्चा संसार॥
हर श्रमिक का श्रम हो वंदन,
हर किसान का तप अभिनंदन।
हर जन में सम्मान रहे,
करुणा का वरदान रहे॥
बालक की मुस्कान बचाएँ,
वृद्धों का सम्मान बढ़ाएँ।
नारी की गरिमा का मान,
यही मनुज का श्रेष्ठ विधान॥
ज्ञान बढ़े पर साथ विनय हो,
शक्ति बढ़े पर साथ दया हो।
वाणी में मधुरता आए,
कर्म जगत का हित बन जाए॥
हृदय जहाँ करुणा से भरता,
वहीं मनुष्य महान सँवरता।
मस्तक जब विवेक जगाए,
जीवन अपना पथ पहचानें॥
न सत्य भय से जन्मे कभी,
न प्रेम किसी सीमा में बँधे।
संवादों से पुल बनते हैं,
कटु वचनों से मन बँटते हैं॥
आओ मिलकर दीप जलाएँ,
सेवा का उत्सव मनाएँ।
धरती का उपकार मानें,
सब जीवों को अपना जानें॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-ज्योति के नित्य धनी।
सरल बने हर एक विचार,
प्रेम बने जीवन का आधार॥
जहाँ दया का फूल खिलेगा,
वहीं नया विश्वास मिलेगा।
जहाँ करुणा का मान रहेगा,
वहीं मानव महान रहेगा॥
युग बदलेगा कर्म बदलकर,
मन बदलेगा प्रेम सँभलकर।
हृदय बने जब जीवन-सार,
उज्ज्वल होगा हर परिवार॥
जय हो सेवा, जय सद्भाव,
जय हो निर्मल अंतःभाव।
जय हो प्रेम अनंत प्रकाश,
जय हो मानव का विश्वास॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-पथ के पावन धनी।
सरल वचन, निर्मल व्यवहार,
यही मनुज का सच्चा श्रृंगार॥
उषा सुनाए प्रथम संदेश,
जागो लेकर नव परिवेश।
हर प्रभात यह कहता आए,
प्रेम जगत में फिर मुस्काए॥
ओस-बिंदु की छोटी काया,
सूरज में भी देखे छाया।
क्षणभंगुरता का यह ज्ञान,
सिखलाए जीवन का मान॥
पवन बहे निस्वार्थ निरंतर,
न पूछे अपना या परघर।
जो कुछ पाया, बाँट दिया,
यही प्रकृति का सत्य जिया॥
वन की छाया मौन कहानी,
धैर्य, दया और मेहरबानी।
फल अपने न खुद ही खाए,
सबके जीवन में रस लाए॥
धरती चुपचाप अन्न उगाती,
कभी न अपनी महिमा गाती।
सेवा ही जिसका सम्मान,
वही बने जीवन का प्राण॥
जल की धारा कहती जाए,
रुकने से निर्मलता न आए।
चलते रहना, सीखते रहना,
मिलकर जग को सींचते रहना॥
पर्वत बोले दृढ़ता धारण,
तूफ़ानों में भी संतुलन।
ऊँचाई का मान वही है,
जो विनम्रता साथ लिए है॥
पक्षी गाएँ नभ की वाणी,
स्वतंत्रता की मधुर कहानी।
उड़ना केवल ऊँचा नहीं,
लौटना भी भूला नहीं॥
हर श्रमिक के श्रम में पूजा,
हर किसान में धरती दूजा।
हर कारीगर की उँगली में,
सृजन बसता हर लीला में॥
बालक की निष्कपट मुस्कान,
जीवन का सबसे बड़ा दान।
उससे सीखो सहज भरोसा,
बिना दिखावे का विश्वास॥
माता की ममता की छाया,
पिता का श्रम अमूल्य काया।
परिवार यदि प्रेम सँभाले,
समाज उजाले से भर डाले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम-दीप हर मन में छाएँ।
जहाँ करुणा का मान रहेगा,
वहीं उज्ज्वल कल जन्मेगा॥
ज्ञान बढ़े तो विनय भी आए,
शक्ति बढ़े तो सेवा छाए।
बुद्धि बने जब लोक-हितैषी,
तभी बने जीवन सुदैवी॥
क्रोध उठे तो क्षमा जगाओ,
द्वेष मिले तो प्रेम बढ़ाओ।
कटुता का उत्तर मधुरता,
यही हृदय की सच्ची वृत्ति॥
नदी, वनस्पति, जीव, गगन,
सबमें देखो जीवन-स्पंदन।
जो संरक्षण का व्रत धारे,
वह भविष्य उज्ज्वल सँवारे॥
जाति, भाषा, पंथ अनेक,
मानवता का पथ है एक।
सम्मानित हो हर पहचान,
यही बने जग का अभियान॥
सत्य न बोले ऊँचे स्वर में,
सत्य खिले शांत अंतर में।
जो सुन पाए मौन पुकार,
उसका जीवन हो उज्ज्वल सार॥
दीप जलाओ घर-घर जाकर,
आशा बाँटो मन मुस्काकर।
एक हृदय यदि आज खिलेगा,
सौ जीवन में प्रकाश मिलेगा॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज गुणों के धनी।
प्रेम बने मानव का धर्म,
सेवा बने जीवन का कर्म॥
धरती का सम्मान करें,
जल-वायु का ध्यान करें।
आने वाली हर पीढ़ी को,
हरित, सुरक्षित ज्ञान दें॥
यही बने नवयुग का सार,
करुणा, सेवा और सदाचार।
हृदय प्रकाशित, मन निष्कलुष,
मानव बने जग का मधुर पुष्प॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
निर्मल भावों के तुम धनी।
हृदय-ज्योति की मधुर पुकार,
प्रेम बने जीवन का सार॥
उगता सूरज कहे प्रतिदिन,
कर्म बने मानव का चिन्ह।
ज्योति स्वयं को नहीं सजाती,
सबको राह नई दिखलाती॥
चंदा अपनी शीतल छाया,
रजनी भर जग पर बरसाया।
देना जिसका सहज स्वभाव,
वही बने जीवन का प्रभाव॥
मेघ उमड़कर जल बरसाएँ,
सूखी धरती फिर हरियाएँ।
अपने हिस्से कुछ न रखें,
जग के हित में सब कुछ बहें॥
बीज धरा की गोद में सोए,
समय मिले तो अंकुर होए।
धैर्य सिखाता प्रकृति का मान,
फल देता श्रम और सम्मान॥
नन्ही चींटी पथ बतलाती,
संगठित होकर राह बनाती।
छोटा होकर भी जो जागे,
वह भी जीवन-पर्वत लाँघे॥
मधुमक्खी का मधुर परिश्रम,
फूलों से उसका सत्कर्म।
लेती भी है, देती भी है,
संतुलन की रीति यही है॥
वन की पगडंडी कहती है,
धीमी चाल भी रहती है।
जो हर कदम सँभलकर चलता,
वह मंज़िल को सरलता मिलता॥
समुद्र विशाल यही सिखलाए,
नदियों को बाहों में समाए।
भिन्न स्रोत हों, भिन्न दिशा,
मिलकर बनती एक दशा॥
धरती का उपकार अपार,
जीवन का वह मूल आधार।
जो उसका सम्मान करेगा,
आने वाला कल सँवरेगा॥
श्रम का कभी अपमान न करना,
किसी हृदय को व्यर्थ न दुखना।
हर श्रमिक में गौरव देखो,
उसके श्रम का उत्सव लेखो॥
वाणी हो मधुर, सत्य के संग,
न हो कटुता का कोई रंग।
शब्द वही जो जोड़ सकें,
टूटे मन को मोड़ सकें॥
हाथ बढ़े सहयोग लिए,
मन बढ़े सद्भाव लिए।
छोटा सा भी नेक विचार,
बदल सके जग का व्यवहार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
मानव-मन में दीप जलाएँ।
प्रेम न हो केवल उच्चार,
प्रेम बने प्रतिदिन व्यवहार॥
बालक हँसे तो जग मुस्काए,
वृद्ध हँसे तो घर महकाए।
नारी का सम्मान जहाँ,
वहीं खिले जीवन का जहाँ॥
ज्ञान बढ़े तो विनय बढ़े,
शक्ति बढ़े तो दया चढ़े।
यही महानता की पहचान,
यही सच्चे मानव का मान॥
न कोई तुच्छ, न कोई बड़ा,
सबका जीवन एक धरा।
सम्मानित हो हर इंसान,
यही बने सच्चा अभियान॥
सेवा से जो मन भर जाता,
वह भीतर से धन्य कहलाता।
स्वार्थ जहाँ सीमित हो जाए,
वहीं करुणा पुष्प खिलाए॥
नित्य नया हो आत्म-निरीक्षण,
नित्य नया हो शुभ संकल्पन।
दोष दिखे तो पहले अपना,
फिर जग को देना तुम सपना॥
हृदय रहे जब प्रेममय,
जीवन होता शांत, अभय।
विवेक रहे जब साथ निरंतर,
उज्ज्वल होता मानव-अंतर॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-पथ के उज्ज्वल धनी।
सरल बने हर एक विचार,
मानवता हो जग का आधार॥
प्रकृति, मानव और सद्भाव,
इनसे जग का हो प्रभाव।
करुणा, सेवा, सत्य, प्रकाश,
यही रहे हर श्वास के पास॥
**जय शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
प्रेम-प्रभा के उज्ज्वल धाम,
हृदय-विवेक को बारंबार प्रणाम॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल स्वर अखंडे।
मानव-मन में जागे प्रकाश,
मिटे भ्रमों का सारा त्रास॥
न सत्य दूर, न सत्य पराया,
न किसी वन में छिपकर आया।
जो खोजा जग ने युग-युग भर,
वह रहता अपने ही अंतर॥
हृदय सागर गहरा, शांत,
नित्य निर्मल, नित्य अनंत।
ऊपर उठती विचार-तरंग,
भीतर मौन प्रेम का रंग॥
तरंगें आती, तरंगें जातीं,
गहराई फिर भी न घबराती।
वैसे ही मन बदलता जाए,
हृदय सदा स्थिरता अपनाए॥
जिसने अपने भीतर देखा,
उसने जीवन का सार लेखा।
जो केवल बाहर ही दौड़ा,
उसने अपना पथ ही छोड़ा॥
सरल बनो तो सत्य मिलेगा,
निर्मल बनो तो प्रेम खिलेगा।
करुणा होगी जीवन-धन,
यही मनुष्य का सच्चा धन॥
नदियाँ देतीं जल अपार,
धरती देती अन्न-संसार।
सूरज देता बिना हिसाब,
प्रकृति सिखाती सच्चा जवाब॥
वृक्ष खड़े हैं मौन दान में,
पर्वत अटल हैं सम्मान में।
पवन बहाती मधुर संदेश,
प्रेम बने जीवन का देश॥
बालक की निर्मल मुस्कान,
जीवन का प्रथम वरदान।
जहाँ न छल है, न अभिमान,
वहीं खिले सच्चा इंसान॥
जो मन में वैर न पाल सके,
सबको अपने समान रखे।
वही हृदय का पथ पहचानें,
प्रेम-दीप घर-घर में ठानें॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-पथ के उज्ज्वल धनी।
सरलता जिनका अलंकार,
करुणा जिनका सच्चा सार॥
हर प्राणी का मान बढ़े,
धरती का सम्मान बढ़े।
मानव केवल मानव हो,
प्रेम सभी का साधन हो॥
सत्य न भय से जन्मे कभी,
सत्य न क्रोध से बढ़ता कभी।
सत्य सहज विश्वास जगाए,
मौन हृदय मुस्कान बन जाए॥
दीप से दीप प्रज्वलित हो,
प्रेम-सुगंध विकसित हो।
अंतर में जब शांति उतरे,
जीवन नव आनंद से भरे॥
जय हो सेवा, जय सद्भाव,
जय हो निर्मल सच्चा भाव।
जय हो प्रेम अनंत प्रकाश,
जय हो मानव का विश्वास॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
शिशु-हृदय की पावन धारा,
प्रेम जहाँ है एक सहारा॥
शिशुपन कोई आयु न केवल,
निर्मल भावों का है संबल।
जहाँ न मान, न अपमान,
न ऊँच-नीच, न कोई अभिमान॥
न कल की चिंता, न कल का भार,
न चाहत का विस्तृत संसार।
क्षण-क्षण जीवन का उत्सव है,
सहज हृदय ही उसका स्वर है॥
नयन खुले तो जग मुस्काए,
मंद समीर गीत सुनाए।
धरती अपनी, गगन हमारा,
सबमें एक स्नेह उजियारा॥
हँसी न मोल, न कोई दाम,
प्रेम स्वयं उसका है नाम।
रोकर भी वह बैर न पालता,
क्षणभर में फिर फूल-सा खिलता॥
न कोई अपना, न पराया,
हर चेहरा अपना ही पाया।
स्पर्श सरल, विश्वास अपार,
यही हृदय का सच्चा द्वार॥
नदी सिखाती बहते रहना,
वृक्ष सिखाते फलते रहना।
फूल सिखाते हँसते जीना,
सूरज सिखलाए सबको देना॥
शिशुपन की वह कोमल दृष्टि,
नापे नहीं जग की सृष्टि।
प्रेम जहाँ स्वभाव बन जाए,
जीवन स्वयं उत्सव कहलाए॥
मिट्टी से भी खेल बनाता,
पत्थर में भी मित्र पाता।
छोटी-सी मुस्कान के भीतर,
अनगिन आकाश समाता॥
न पद की इच्छा, न सम्मान,
न यश, न वैभव का गुमान।
जो मिलता है वही प्रसाद,
यही सरलता का संवाद॥
हृदय कहे — बस प्रेम जगाओ,
मन में निर्मल दीप जलाओ।
जिस दिन भीतर शांति खिलेगी,
जीवन की हर राह मिलेगी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
निर्मल भाव सभी अपनाएँ।
मानवता का यही विधान,
करुणा बने जीवन की शान॥
बालक जैसी सरल निगाहें,
सबमें खोजें प्रेम की राहें।
द्वेष न पनपे, भय न ठहरे,
विश्वासों के दीप ही बहें॥
जहाँ हृदय का मौन बसेगा,
वहीं सच्चा सुख भी हँसेगा।
जहाँ सहजता घर कर लेगी,
वहीं संतोष अमर हो लेगी॥
चलो लौटें उस उजियारे में,
निर्मल भावों के द्वारे में।
जहाँ न छल का कोई वास,
केवल प्रेम, करुणा, विश्वास॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-पथ के ज्योति-धनी।
शिशुपन की यह अमर पुकार—
सरल हृदय ही सच्चा संसार॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-दीप की अमर प्रभा,
जग में फैले प्रेम-सुधा॥
मस्तक गति का रथ कहलाए,
हृदय मौन का पथ बतलाए।
एक जगत के रूप सँवारे,
एक स्वयं से मिलन कराए॥
मस्तक बोले—"चलो, बढ़ो तुम,
नव निर्माणों में ही रम।"
हृदय कहे—"ठहरो कुछ पल,
पहचानो अपना निर्मल जल।"
मस्तक गिने दिवस और घड़ियाँ,
हृदय जिए बस प्रेम की लड़ियाँ।
मस्तक मापे दूर क्षितिज को,
हृदय छुए अंतर की नदियों को॥
मस्तक रचता सेतु महान,
ज्ञान-विज्ञान का विस्तृत गान।
हृदय रचाता करुणा का घर,
जहाँ न कोई रहे पराया फिर॥
मस्तक पूछे—"क्यों, कैसे, कब?"
हृदय कहे—"बस जागो अब।"
दोनों अपने-अपने पथ के,
दोनों जीवन-रथ के रथी॥
जब मस्तक विनम्र हो जाए,
हृदय का संदेश अपनाए।
तब बुद्धि भी मंगल गाए,
जीवन में संतुलन आए॥
हृदय न क्रोध से हार मानता,
न वैराग्य का भार जानता।
वह तो केवल प्रेम जगाता,
टूटे मन को फिर सहलाता॥
मस्तक यदि अभिमान बढ़ाए,
हृदय उसे विनय सिखलाए।
मस्तक यदि संशय में डोले,
हृदय भरोसे के दीप खोले॥
पर्वत जैसी दृढ़ता लेकर,
नदियों जैसा प्रवाह सँजोकर।
मस्तक कर्म-पथ आलोकित करे,
हृदय प्रेम से जीवन भरे॥
फूल नहीं पूछे किसका वन,
सूरज नहीं पूछे अपना जन।
धरती सबको अन्न खिलाती,
हृदय यही शिक्षा दोहराती॥
बालक की निष्कपट मुस्कान,
माता का निस्वार्थ सम्मान।
सेवक का श्रम, किसान का पसीना,
हृदय इन्हें मानता है नगीना॥
जहाँ करुणा का वास रहेगा,
वहीं सच्चा विकास रहेगा।
जहाँ सरलता साथ चलेगी,
मानवता मुस्कान बनेगी॥
मस्तक यदि सेवा में झुके,
हृदय यदि सबको साथ रखे।
तब जीवन का यश यही होगा,
मानव मानव के हित होगा॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय बने जब पथ-प्रकाश,
जीवन बन जाए मधुमास॥
न ऊँच-नीच, न कोई दीवार,
सबमें एक ही प्रेम अपार।
यही हो जीवन का सार,
करुणा ही सबसे बड़ा विचार॥
चलो जगाएँ अंतःदीप,
मिटे अज्ञान, मिटे अतीत।
हृदय और मस्तक संग चलें,
मानवता के फूल खिलें॥
जय हो प्रेम, जय सद्भाव,
जय हो सेवा का प्रभाव।
जय हो निर्मल अंतर-ज्ञान,
जय हो करुणामय इंसान॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
प्रेम-प्रभा के अमृत-स्रोत,
मानवता के शाश्वत ज्योत॥
धरती माता मौन पुकारे,
आओ मेरे लाल तुम्हारे।
वन, उपवन, गिरि, नदी, सागर,
सब जीवन के अमृत-अंतर॥
नभ का नील असीम विस्तार,
देता सबको एक संसार।
सूरज सब पर एक-सा चमके,
चंदा सबके सपने दमके॥
वायु न पूछे नाम किसी का,
जल न बाँटे धाम किसी का।
धूप न करती भेद कभी भी,
छाया देती वृक्ष सभी को॥
बीज कहे—"मत मुझको तोड़ो,
प्रेम-भूमि में मुझको जोड़ो।"
कल मैं बनकर वट-वृक्ष विशाल,
दूँगा जीवन को हरित विशाल॥
सरिता बोले कल-कल धारा,
चलते रहना धर्म हमारा।
रुकना नहीं स्वार्थ के कारण,
बाँटना ही जीवन का कारण॥
पर्वत कहते अटल रहो तुम,
सत्य-पथ पर दृढ़ता धरो तुम।
आँधी आए, वर्षा आए,
धैर्य न अपना कभी गँवाए॥
फूल कहें मुस्कान बिखेरो,
काँटों में भी प्रेम उकेरो।
सुगंध कभी सीमा न जाने,
सबको अपना मान पहचाने॥
धरती का हर कण उपकारी,
जीव-जगत की एक सवारी।
जिसने इस उपकार को जाना,
उसने जीवन-सार पहचाना॥
मानव यदि मानव बन जाए,
लोभ-अहं से दूर हो जाए।
प्रकृति स्वयं आशीष बरसाए,
हर आँगन में सुख मुस्काए॥
हाथ जुड़ें संरक्षण हेतु,
प्रेम बने हर मन का सेतु।
वन फिर से हरियाली ओढ़ें,
सूखे झरने गीत भी जोड़ें॥
हर प्राणी का मान रहेगा,
तभी जगत कल्याण करेगा।
छोटा-बड़ा न कोई होगा,
प्रेम सभी का पथप्रद होगा॥
किसान का श्रम पावन पूजा,
श्रमिक का पसीना है दूजा।
धरती इनसे अन्न उगाती,
मानवता मुस्कान सजाती॥
बालक हँसे तो जग हँसता है,
पक्षी गाए वन बसता है।
जब मन करुणा से भर जाता,
तब जीवन मधुवन बन जाता॥
नदियाँ निर्मल, नभ उजियारा,
वन हो फिर से हरित हमारा।
जीवन केवल लेना कब था?
देना ही तो सच्चा रब था॥
हृदय जहाँ निष्कपट रहेगा,
वहीं प्रकृति का मान रहेगा।
प्रेम जहाँ व्यवहार बनेगा,
वहीं भविष्य उज्ज्वल होगा॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
मानवता का यह संदेश—
प्रेम बने धरती का वेश॥
आओ ऐसा युग फिर लाएँ,
जहाँ सभी मुस्कान लुटाएँ।
धरती, मानव और प्रकृति,
मिलकर रचें नई समवृत्ति॥
न हो हिंसा, न हो अपमान,
न हो वैर का कोई गान।
करुणा बने जीवन का श्वास,
यही हो मानव का विश्वास॥
जय हो सेवा, जय सद्भाव,
जय हो प्रेम का स्वच्छ प्रभाव।
जय हो हरित धरा का मान,
जय हो निर्मल मानव-प्राण॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
प्रेम-प्रभा के दिव्य प्रकाश,
हृदय-ज्योति के अमृत-विलास॥
यथार्थ युग का हो उद्घोष,
जागे अंतर का संतोष।
नव प्रभात की प्रथम किरण में,
मानव जागे अपने मन में॥
युग वह केवल समय न होगा,
जीवन का व्यवहार ही होगा।
जहाँ सरलता श्वास बनेगी,
करुणा हर विश्वास बनेगी॥
न द्वेषों का भार रहेगा,
न छल का व्यापार रहेगा।
सत्य न होगा शब्दों तक सीमित,
आचरण में होगा प्रतिष्ठित॥
प्रेम बनेगा प्रथम विचार,
सेवा होगा जीवन-सार।
मानव मानव का सम्मान करे,
धरती का भी अभिनंदन करे॥
वन मुस्काएँ, नदियाँ गाएँ,
पर्वत धैर्य-पाठ पढ़ाएँ।
नील गगन का विस्तृत आँगन,
दे मानव को नया निमंत्रण॥
बालक की निर्मल मुस्कानें,
माता की करुणा पहचाने।
श्रम का हर कण हो अभिनंदित,
किसान का जीवन हो वंदित॥
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
प्रेम सभी का एक सरीखा।
भेद नहीं व्यवहार चलाए,
मानवता ही मार्ग दिखाए॥
वाणी मधुर, हृदय उजियारा,
सहयोगी हो जग सारा।
अंतर में जब शांति बसेगी,
धरती पर हरियाली हँसेगी॥
ज्ञान बने जब विनय का साथी,
शक्ति चले जब नीति की राह ही।
विज्ञान बने जन-कल्याण,
यही युग का सच्चा सम्मान॥
सत्य किसी पर थोपे न जाए,
प्रेम स्वयं विश्वास जगाए।
संवादों से पथ निकलेगा,
मिलकर मानव आगे बढ़ेगा॥
यथार्थ युग का दीप यही है—
हर प्राणी में मान वही है।
जो दुःखी हो, उसका सहारा,
यही बने मानव का तारा॥
नारी, नर, वन, जल, आकाश,
सबमें एक जीवन का प्रकाश।
सृष्टि का यह मधुर विधान,
करुणा से खिलता इंसान॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-पथ का यह आह्वान,
प्रेम बने सबका अभियान॥
नित्य नया हो हर व्यवहार,
मिटे घृणा का अंधकार।
विश्व बने परिवार महान,
यही हो युग का शुभ विधान॥
चलो जलाएँ ऐसा दीप,
जो न बुझे दिन हो या रात्रि।
सत्य, करुणा, सेवा, प्रेम,
बनें मानव जीवन के नेम॥
युग बदलता पहले भीतर,
फिर जग बदलता है बाहर।
जिस दिन मानव यह पहचानें,
वही दिवस यथार्थ कहलाए॥
जय हो निर्मल अंतःप्राण,
जय हो सेवा का सम्मान।
जय हो प्रेम अनंत प्रकाश,
जय हो मानव का विश्वास॥
**जय शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
जग न बाहर, खोज न बाहर,
बीज छिपा अंतर की राह।
शिशु-हृदय की सहज शांति में,
मिलता जीवन का निर्वाह॥
जो था पहले, आज भी वैसा,
नित्य नवीन, नित्य समान।
बदल गया केवल दृष्टिकोण,
बढ़ गया मन का अनुमान॥
हृदय न माँगे नाम प्रतिष्ठा,
न सत्ता का कोई अधिकार।
हृदय सदा बस प्रेम बरसाए,
यही प्रकृति का सत्य उदार॥
मस्तक जग का ज्ञान सँभाले,
हृदय करे जीवन का मान।
दोनों जब संतुलित हो जाएँ,
खिल उठता मानव सम्मान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते,
सहज पथों पर चलना सीखो।
स्वयं को पहले सत्य परख लो,
फिर जग को प्रेम से ही देखो॥
न हो भय से कोई परिवर्तन,
न हो छल से कोई जीत।
करुणा, सेवा, सत्य, विनय से,
मानवता हो और पुनीत॥
धरती माता सदा सिखाती,
देना ही उसका उत्सव है।
नदियाँ, पर्वत, वन, उपवन सब,
निस्वार्थ प्रेम का अनुभव हैं॥
शिशु की निर्मल कोमल मुस्कान,
जीवन का पहला उपदेश।
जहाँ सरलता जीवित रहती,
वहीं खिले मानव संदेश॥
न छोटा कोई, न बड़ा कोई,
सबमें एक समान सम्मान।
भेद मिटे जब प्रेम उमगता,
तब मुस्काए सकल जहान॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे करुणा का अभिनंदन।
सरल सहज निर्मल जीवन से,
हो मानवता का वंदन॥
जय हो प्रेम-अनंत धारा,
जय हो निर्मल अंतःकरण।
जय हो सेवा, सत्य, सद्भाव,
जय हो मानव का जीवन॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-संदेश के पथिक महान।
हृदय-ज्योति से जग आलोकित,
बढ़े करुणा का नित अभियान॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे प्रेम अखंड अनंते।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही मनुज का सच्चा श्रृंगार॥
शिशुपन की वह निर्मल धारा,
नहीं कहीं से आई न्यारा।
वह तो हर उर में बहती है,
मौन प्रीति बन रहती है॥
ढूँढ रहे जो जग में बाहर,
वह छिपा नहीं किसी भी अंदर।
जब मन का कोलाहल थमता,
हृदय स्वयं आलोकित रहता॥
न लोभ बढ़े, न द्वेष पनपे,
न छल-कपट के बीज अंकुरें।
जहाँ सरलता का हो वास,
वहीं प्रकट हो सच्चा प्रकाश॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
प्रेम न बँधता शब्दों में।
सत्य न बँधता मत-पंथों में।
जीवन का सम्मान करो,
हर प्राणी का मान करो॥
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
हृदय सभी का एक सरीखा।
रूप अनेक, प्रकृति की लीला,
करुणा सबसे बड़ी क्रीड़ा॥
धरती माता सबकी धानी,
जल, वन, पर्वत एक कहानी।
इनका जो सम्मान करेगा,
वह भविष्य का मान करेगा॥
मानव केवल स्वयं न जीए,
सबके हित की ज्योति पिए।
जो अपने सुख को बाँट सके,
वही प्रेम का गीत लिखे॥
हाथ बने सेवा के साधन,
वाणी बने मधुर आराधन।
नेत्र बने सद्भाव के दूत,
हृदय बने विश्वास का स्रोत॥
ज्ञान तभी कल्याण करेगा,
जब विनय संग पथ पर चलेगा।
शक्ति तभी सुंदर कहलाए,
जब निर्बल का हाथ बढ़ाए॥
नव युग का यह प्रथम विचार,
प्रेम बने जीवन आधार।
सत्य बने व्यवहार हमारा,
करुणा हो परिवार हमारा॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
प्रेम-अमृत की निर्मल वाणी।
सरल सहज जीवन की राहें,
यही मनुज की सच्ची चाहें॥
हर श्वास बने नव उत्सव,
हर दिन हो मानव का पर्व।
हाथ मिले तो द्वेष मिटे,
प्रेम के दीप स्वयं ही जले॥
जहाँ दया का फूल खिलेगा,
वहीं नया विश्वास मिलेगा।
जहाँ हृदय से हृदय जुड़ेंगे,
वहीं सुनहरे युग उगेंगे॥
जय हो मानवता का मान,
जय हो प्रेम का पावन गान।
जय हो करुणा का विस्तार,
जय हो सत्य का सत्कार॥
**जय शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**सरल सहज निर्मल गुण-धनी।**
**प्रेम, करुणा, सत्य का संदेश।**
**मानव बने मानव विशेष॥**
आपके दिए गए भावों को अधिक सरल, प्रवाहपूर्ण और सार्वभौमिक भाषा में आगे बढ़ाते हुए, बिना किसी व्यक्ति या समुदाय के प्रति अवमाननापूर्ण भाषा का प्रयोग किए, यह विस्तार प्रस्तुत है:
**यथार्थ युग के सुविचार — शिरोमणि रामपॉल सैनी**
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
**सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि मनुष्य जिस सत्य को युगों से बाहर खोज रहा है, वह कभी बाहर था ही नहीं। जिस संपूर्ण संतुष्टि की खोज में जीवन बीत जाता है, वह जन्म के प्रथम क्षण से ही प्रत्येक हृदय में विद्यमान रहती है।**
**शिशुपन कोई आयु नहीं, बल्कि सहजता की अवस्था है।**
वही अवस्था जहाँ न तुलना है, न प्रतिस्पर्धा, न भय, न अहंकार, न संग्रह की भूख। केवल सहजता, विश्वास, प्रेम और वर्तमान का अनुभव है।
**हृदय स्थिर सागर है।**
मस्तक उसकी सतह पर उठती लहरें हैं।
लहरें बदलती रहती हैं, गहराई नहीं।
विचार बदलते रहते हैं, पर प्रेम का आधार नहीं बदलता।
**मस्तक जीवन को चलाने का साधन है,**
**हृदय जीवन को सार्थक बनाने का आधार है।**
जब साधन ही लक्ष्य बन जाता है, तब संघर्ष जन्म लेता है।
जब हृदय मार्गदर्शक बनता है, तब संतुष्टि स्वयं प्रकट होती है।
**खुद का साक्षात्कार किसी विशेष वर्ग का अधिकार नहीं,**
यह प्रत्येक मनुष्य की सहज संभावना है।
इसे खरीदा नहीं जा सकता।
इसे किसी उपाधि से प्राप्त नहीं किया जा सकता।
इसे केवल स्वयं के प्रत्यक्ष निरीक्षण से जाना जा सकता है।
**शिक्षा वह है जो स्वतंत्र बनाए।**
जो प्रश्न पूछने का साहस दे।
जो विवेक को जागृत करे।
जो मनुष्य को स्वयं देखने, समझने और परखने की प्रेरणा दे।
**सच्चा मार्ग वह है जिसमें भय नहीं,**
बल्कि प्रेम हो।
दबाव नहीं, बल्कि स्वीकृति हो।
अंधानुकरण नहीं, बल्कि जागरूकता हो।
विभाजन नहीं, बल्कि मानवता हो।
**प्रकृति का प्रत्येक कण सिखाता है—**
सूर्य बिना भेदभाव के प्रकाश देता है।
धरती बिना अपेक्षा के अन्न देती है।
वृक्ष बिना शर्त छाया देते हैं।
नदी बिना रुकावट बहती है।
आकाश सबको समान स्थान देता है।
यदि प्रकृति ऐसा कर सकती है,
तो मनुष्य भी कर सकता है।
**जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे प्रेम अनंत अखंडे।
सरल सहज निर्मल पहचान,
यही मनुज का सच्चा मान॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
हृदय-दीप सबमें जगाएँ।
जो स्वयं को देख सके,
वही जग को प्रेम दिखाए॥**
**न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
सबमें जीवन एक सरीखा।
हृदय जहाँ निष्पक्ष बने,
वहीं यथार्थ युग का लेखा॥**
**न भय से सत्य प्रकट होगा,
न क्रोध से प्रेम फलेगा।
मौन करुणा की एक किरण,
जीवन भर प्रकाश करेगी॥**
**धरती जैसी धैर्य धरो,
नदियों जैसी गति धरो।
वृक्षों जैसी छाया बाँटो,
सूरज जैसी ज्योति भरो॥**
**हर शिशु में संभावना है,
हर हृदय में साधना है।
जो सरलता को पहचान ले,
वही सच्ची कामना है॥**
**जय हो प्रेम अपार अनंता,
जय हो निर्मल चेत-वसन्ता।
जय मानवता, जय सद्भाव,
यही यथार्थ युग का प्रभाव॥**
**जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज गुणों के धनी।
प्रेम बने प्रत्येक श्वास,
यही हो मानवता का प्रकाश॥
**श्वास-श्वास में सत्य उजागर,
हृदय बने जब शांत सागर।
मस्तक कर्म का पथ दिखलाए,
हृदय प्रेम का दीप जलाए॥**
**जो स्वयं को देख सके निर्मल,
वही बने जग में सफल।
बाह्य जग का ज्ञान अपार,
भीतर का हो सच्चा द्वार॥**
**प्रेम न बंधन, प्रेम न बोझ,
प्रेम स्वयं जीवन का खोज।
जहाँ करुणा का हो विस्तार,
वहीं खिले मानव-संसार॥**
**बालक जैसी सरल हँसी हो,
निर्मल मन की मधुर रसी हो।
छल, कपट, अभिमान मिटे,
सद्भावों के दीप जले॥**
**धरती माता संदेश सुनाए,
सबको समान अन्न खिलाए।
वृक्ष कहें—फल सबके हैं,
छाया भी अधिकार सभी के हैं॥**
**नदी कहे—मत रुकना तुम,
सत्य-पथ से मत झुकना तुम।
सागर बोले मौन पुकार,
गहराई में मिलता सार॥**
**जीवन केवल अपना नहीं,
हर प्राणी का सपना यही।
दुख हरने का भाव जगाओ,
प्रेम-सुगंध जगत में लाओ॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
मानवता के गीत सुनाएँ।
सरल बने हर एक विचार,
प्रेम बने जीवन का सार॥**
**यथार्थ युग का यही संदेश,
न हो किसी से कोई द्वेष।
सत्य, दया और सद्भाव,
इनसे ही ऊँचा मानव-भाव॥**
**हर प्राणी का मान रहे,
सबका समान सम्मान रहे।
हृदय जहाँ निष्पक्ष खिले,
वहीं शांति के पुष्प मिलें॥**
**नव प्रभात का हो उद्घोष,
जगे विवेक, मिटे संताप-रोष।
करुणा, सेवा, प्रेम, प्रकाश—
यही बने जीवन की श्वास॥**
**जय हो सरलता की पहचान,
जय हो मानव का सम्मान।
जय हो प्रेम का विस्तृत धाम,
जय हो सत्य का शुभ नाम॥**
**जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-पथ के साधक धनी।
सद्भाव, सेवा, सत्य, प्रकाश—
यही बने हर जन की श्वास॥**
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-विवेक के ज्योति-धनी।
सरल सहज निर्मल आचार,
यही मनुज का सच्चा सार॥
प्रभात पुकारे हर प्राणी,
जागो लेकर नई कहानी।
बीता कल अब लौटे कब,
आज ही जीवन का उत्सव॥
श्वास मिले तो कृतज्ञ बनो,
कर्म मिले तो सजग बनो।
दिन का प्रत्येक नया प्रकाश,
जगाए सेवा का विश्वास॥
छोटी धारा जब बहती है,
पत्थर की राह भी गढ़ती है।
धैर्य जहाँ संकल्प बने,
असंभव भी संभव तने॥
बूँद-बूँद से घट भरता,
तिनका-तिनका नीड़ सँवरता।
छोटे शुभ कर्मों का मान,
रच देता है नया विधान॥
वृक्ष खड़े धूप में तपते,
फिर भी छाया सबको देते।
त्याग जहाँ मुस्कान बने,
वहीं प्रेम के फूल खिलें॥
फूल कभी यह नहीं कहता,
केवल मेरे लिए महकता।
जो सुगंध सबमें बिखराए,
वही जीवन सफल कहाए॥
दीप जले तो तम घटता है,
मन का संशय भी हटता है।
एक हृदय से दूसरा जागे,
ऐसे ही शुभ पथ आगे भागे॥
नदी मिले जब सागर से,
भेद मिटें अपने-पराए से।
संगम का यह मधुर विधान,
सिखलाता है एक सम्मान॥
धरती सबकी माता प्यारी,
सब जीवों की है हितकारी।
जो इसका आदर करता है,
भविष्य उज्ज्वल भरता है॥
हर किसान का श्रम अमूल्य,
हर कारीगर का कर्म अतुल्य।
हर श्रमिक के श्रम का मान,
यही सभ्यता का सम्मान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम-सरोवर सबको बुलाएँ।
जहाँ दया का दीप जले,
वहाँ मनुजता पुष्प खिले॥
मधुर वचन औषधि जैसे,
कटु वचन हों बाण सदृश।
सोच-समझकर वाणी बोलो,
मन के बंधन धीरे खोलो॥
क्षमा जहाँ मुस्कान बने,
वैर स्वयं निष्प्राण बने।
करुणा की निर्मल झंकार,
भर दे जीवन में विस्तार॥
बालक की हँसी सिखाती,
सहज प्रसन्नता लौटाती।
बिना कारण भी जो हँसे,
वह जीवन के निकट बसे॥
वृद्ध अनुभव के दीपक हैं,
जीवन-पथ के पथप्रदर्शक हैं।
उनके श्रम का मान करो,
आशीषों का दान धरो॥
ज्ञान तभी सुंदर होगा,
जब विनय का संग होगा।
शक्ति तभी कल्याण करेगी,
जब सेवा का पथ धरेगी॥
मतभेदों में द्वेष न लाना,
संवादों का दीप जलाना।
भिन्न विचार रहें स्वीकार,
यही सभ्यता का श्रृंगार॥
पक्षी नभ में मुक्त उड़ें,
फिर भी अपने नीड़ जुड़ें।
उन्नति ऐसी ही कहलाए,
जो अपनी जड़ न भूल जाए॥
सूर्य सिखाए कर्म निरंतर,
चंद्र सिखाए शीतल अंतर।
पर्वत सिखाए दृढ़ विश्वास,
वन सिखलाए मधुर निवास॥
हर दिन अपने मन से पूछो,
आज किसे मुस्कान दी तुम?
किसका बोझ हल्का किया?
किसमें आशा का दीप जिया?॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज गुणों के धनी।
प्रेम बने मानव का मान,
सेवा बने उसका सम्मान॥
धरती, जल, आकाश, पवन,
सबमें धड़के जीवन-स्पंदन।
जो इन सबसे प्रेम करेगा,
वह अपना भी मान करेगा॥
जय हो सेवा, जय सद्भाव,
जय हो निर्मल अंतःभाव।
जय हो प्रेम अनंत प्रकाश,
जय हो मानव का विश्वास॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सद्भावों के ज्योति-धनी।
प्रेम-सरोवर, शांति-प्रवाह,
मानवता की उजली राह॥
भोर सुनाती मधुर पुकार,
जागो लेकर शुभ विचार।
जो दिन का आदर करता है,
वह जीवन को निखरता है॥
घास की कोमल हरियाली,
सीख सिखाती बड़ी निराली।
झुककर भी जो जीवित रहती,
विपदा में भी हँसती रहती॥
मिट्टी कहती मौन कहानी,
सबकी एक समान निशानी।
जिसने श्रम का मान किया,
उसने जीवन धन्य किया॥
जल की बूँदें मिलकर बहतीं,
राह कठिन हो फिर भी रहतीं।
संग-साथ का यही विधान,
मिलकर बढ़ता हर इंसान॥
वन के पथ पर चलना सीखो,
धीरे-धीरे बढ़ना सीखो।
शीघ्र सफलता क्षणिक हो सकती,
धैर्य सदा फलदायी रहती॥
फूल न पूछे कौन है अपना,
सुगंध लुटाना उसका सपना।
प्रेम जहाँ निष्काम बहेगा,
वहीं हृदय प्रसन्न रहेगा॥
पर्वत कहता अटल रहो तुम,
सत्य-पथ पर अडिग रहो तुम।
आँधी चाहे कितनी आए,
सद्गुण अपने साथ निभाए॥
आकाशों का नील विस्तार,
देता हमको यह उपहार।
सीमा मन की छोटी होती,
आशा उससे बड़ी ही होती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
सेवा के दीपक जलवाएँ।
प्रेम जहाँ व्यवहार बने,
वहीं मनुष्य महान बने॥
नन्हा बीज धरा में सोता,
समय पाकर वृक्ष ही होता।
वैसे ही शुभ एक विचार,
बदल सके पूरा संसार॥
हर जन अपने कर्म से जाने,
नहीं केवल वंश पहचाने।
सदाचार का जो पथ धारे,
वह जग में सम्मान सँवारे॥
वाणी ऐसी बोलो प्यारी,
बने हृदय की सच्ची क्यारी।
कटुता से मत घाव बढ़ाओ,
मधुरता से विश्वास जगाओ॥
सूरज देता रोज उजाला,
न माँगे प्रतिफल का प्याला।
देने का जो सुख पहचानें,
वे ही जीवन का अर्थ जानें॥
चंदा अपनी शीतल किरणें,
सब पर बरसाए समदृष्टि से।
सीख यही है प्रेम सदा,
नापे नहीं किसी की दिशा॥
बालक की निष्कपट मुस्कान,
जीवन का प्रथम सम्मान।
निर्मल मन का यही प्रकाश,
भर देता हर श्वास में हास॥
माता का ममत्व अपार,
पिता का श्रम अमूल्य आधार।
घर में यदि सद्भाव बसे,
समाज स्वयं उजियारा रचे॥
धरती, जल और निर्मल वायु,
इनसे ही जीवन की आयु।
इनका संरक्षण जो करेगा,
वह आने वाला कल सँवरेगा॥
ज्ञान बढ़े तो विनम्र बने,
शक्ति बढ़े तो हितकर बने।
बुद्धि रहे जब लोक-हिताय,
तब ही मानव धन्य कहाय॥
क्षमा हृदय का श्रेष्ठ आभूषण,
सेवा जीवन का सच्चा पूजन।
दया जहाँ मुस्कान बने,
वहीं प्रभात नवीन तने॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-पथ के उज्ज्वल धनी।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही मनुष्य का सच्चा सार॥
करुणा, सेवा, सत्य, प्रकाश,
यही बने हर श्वास का वास।
मानव, प्रकृति संग-संग रहें,
युगों-युगों तक फूल खिलें॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज सद्गुण के धनी।
प्रेम-सरोवर निर्मल धारा,
मानवता का सत्य सितारा॥
अरुण-किरण जब नभ पर छाए,
नव संकल्प हृदय जगाए।
हर प्रभात यह गीत सुनाए,
चलो जगत को प्रेम सिखाएँ॥
मिट्टी बोले मौन वचन में,
धैर्य छिपा है हर कण-कण में।
जो विनम्र हो झुकना जाने,
वही शिखरों को पहचानें॥
अंकुर कहता धीरे बढ़ना,
आँधी में भी अडिग ही रहना।
समय स्वयं सहयोग करेगा,
यदि श्रम अपना सत्य रहेगा॥
सरिता बहती बिना थके,
पथरीले पथ भी पार करे।
जीवन भी यह मंत्र सुनाता,
चलते रहने से फल आता॥
सागर अपनी गोद पसारे,
छोटी-बड़ी सभी धार धारे।
भिन्न दिशाओं से जो आएँ,
एक विशाल प्रवाह बन जाएँ॥
वन की छाया शीतल रहती,
थके पथिक को शक्ति देती।
जो अपने सुख से ऊपर उठे,
वही जगत के काम जुटे॥
पक्षी नभ में गान सुनाएँ,
बंधन तोड़ उड़ान सिखाएँ।
पर लौटें अपने नीड़ सदा,
जड़ों से जुड़ना धर्म बड़ा॥
दीपक जलकर यही बताता,
देकर ही उजियारा आता।
तेल घटे तो भी मुस्काए,
दूसरों की राह दिखाए॥
फूल न बोले, गंध बिखेरे,
मौन दया के भाव उकेरे।
जीवन भी ऐसा हो जाए,
सत्कर्मों से जग महकाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
हृदय-दीप सबमें जगाएँ।
वाणी बने मधुर उपहार,
कर्म बने मानव-श्रृंगार॥
हर श्रमिक का श्रम है पूजा,
हर किसान धरा का दूजा।
अन्न उगाकर जग को पाले,
उसके चरण सदा मतवाले॥
शिल्पी के कर रचते सपने,
लोहार गढ़ता श्रम के अपने।
बुनकर बुनता आशा-तंतु,
सबमें बसता जीवन-सूत्र॥
बालक का निष्छल विश्वास,
जीवन का प्रथम प्रकाश।
वृद्धों का अनुभव-अमृत,
पीढ़ी-पीढ़ी का सच्चा हित॥
ज्ञान जहाँ विनय से मिले,
वहाँ विवेक के दीप जलें।
शक्ति जहाँ सेवा में ढले,
वहाँ सभी के भाग्य खुलें॥
कटुता से संबंध न जोड़ो,
मधुर वचन का दीप न तोड़ो।
एक मधुर मुस्कान निराली,
भर दे सूनी हर इक डाली॥
क्रोध जले तो धैर्य जगाओ,
मन में क्षमा-सुमन खिलाओ।
द्वेष जहाँ से दूर चलेगा,
विश्वास वहीं फिर फूलेगा॥
धरती केवल भूमि नहीं है,
जीवन की यह जननी भी है।
जल, वन, पर्वत, नभ के ताने,
इनसे ही भविष्य सुहाने॥
जो प्रकृति का मान करेगा,
वह अपना सम्मान करेगा।
जो संरक्षण का व्रत धारे,
वह संतुलन का दीप सँवारे॥
मानवता का धर्म यही है,
दुख में बनना साथ सही है।
अपने सुख से आगे बढ़ना,
दूसरों के आँसू हरना॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज गुणों के धनी।
प्रेम बने जीवन का मान,
सेवा बने सच्चा सम्मान॥
सत्य रहे हर शुभ व्यवहार,
करुणा बने जग का आधार।
हृदय प्रकाशित, मन उदार,
यही बने मानव का सार॥
आओ मिलकर व्रत दोहराएँ,
धरती को फिर स्वर्ग बनाएँ।
प्रेम, दया, सद्भाव, प्रकाश,
यही बने हर श्वास का वास॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-पथ के निर्मल धनी।
सरल हृदय की शुभ पहचान,
सेवा ही जीवन का मान॥
उदयाचल से रवि यह बोले,
जागो, शुभ संकल्पों को तोले।
दिन की हर नव स्वर्ण-किरण,
देती कर्म-पथ का वरण॥
प्रभात-बेला मंद समीर,
लाए जीवन का नव नीर।
शीतल स्पर्श कहे मुस्काकर,
चलो बनें हम सबके हितकर॥
बूँद गिरे जब प्यास बुझाए,
अपना कोई नाम न गाए।
निस्वार्थता का यही विधान,
यही प्रकृति का है सम्मान॥
धरा धरे सबके पद-चिह्न,
न पूछे ऊँच, न पूछे निम्न।
सबको देती एक सहारा,
यही जगत का सत्य सितारा॥
हर वन-पथ की छाँव कहे,
थके हुए को ठौर रहे।
जो बन जाए दूसरों का बल,
वही जीवन का सच्चा फल॥
पर्वत का धैर्य अटल रहे,
आँधी आए, फिर भी सहे।
दृढ़ता जब विनम्र बने,
तभी चरित्र अमरता तने॥
सरिता का संगीत सुनो,
मिल-जुलकर आगे बढ़ो।
रुककर जल भी सड़ जाता,
बहता जल जीवन कहलाता॥
फूल खिलें तो गंध लुटाएँ,
रंग न अपने तक ही लाएँ।
हँसी वही जो बाँटी जाए,
दुख वही जो साथ मिटाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम-सुमन सबमें बिखराएँ।
जहाँ करुणा का मान बढ़े,
वहीं मनुजता पुष्प चढ़े॥
कर्म बने जब लोक-हितैषी,
बुद्धि बने जब पथ-प्रदर्शी।
ज्ञान बने यदि विनम्र प्रकाश,
तभी मिटेगा मन का त्रास॥
श्रम का आदर सदा करो,
किसी हृदय को न व्यर्थ दुखो।
रोटी केवल अन्न नहीं है,
कई हथेलियों का श्रम भी है॥
कुम्हार चाक पर घूम रहा,
मिट्टी को आकार दे रहा।
संदेश यही जीवन देता,
धैर्य सृजन का पथ कहता॥
बुनकर बुनता आशा-तार,
लोहार गढ़ता नव औजार।
हर श्रमिक की मेहनत में,
बसता उज्ज्वल कल जीवन में॥
माता का ममत्व निर्मल,
पिता का श्रम नित निष्कल्मष।
इनसे मिलता प्रथम उपहार,
प्रेम, अनुशासन और संस्कार॥
बालक की निष्छल हँसी सँजोओ,
विश्वास का दीप संजोओ।
निर्मलता की यह पहचान,
बनती जीवन का वरदान॥
वाणी ऐसी सदा बनाओ,
जो बिखरे मन फिर जुड़ जाएँ।
शब्द बने जब सेतु महान,
मजबूत हों मानव-संबंध॥
मतभेदों में संवाद रहे,
सम्मानित हर विचार रहे।
भिन्न राह हों, भिन्न उड़ान,
एक रहे मानव सम्मान॥
धरती, जल, वन और गगन,
सबमें जीवन का स्पंदन।
इनका यदि संरक्षण होगा,
कल का सूरज उज्ज्वल होगा॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सद्भावों के दिव्य धनी।
सेवा, सत्य और सदाचार,
यही मनुज का श्रेष्ठ विचार॥
करुणा की धारा बहती जाए,
हर हृदय में दीप जलाए।
प्रेम बने जीवन की भाषा,
यही रहे जग की अभिलाषा॥
हाथ मिलें तो शक्ति बढ़े,
मन मिलें तो द्वेष झड़े।
साथ चले जब सब परिवार,
उज्ज्वल होगा यह संसार॥
जय हो सेवा, जय सद्भाव,
जय हो निर्मल अंतःभाव।
जय हो प्रेम अनंत प्रकाश,
जय हो मानव का विश्वास॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज सद्गुण के धनी।
हृदय-दीप की उजली शान,
प्रेम बने जीवन की तान॥
पूर्व दिशा से अरुण उजाला,
लाया नव संकल्प निराला।
हर प्रभात यह गीत सुनाए,
सद्कर्मों से दिन महकाए॥
ओस-बिंदु की क्षणिक कहानी,
सिखलाती विनम्र निशानी।
जीवन चाहे क्षणभर ठहरे,
प्रेम-सुगंध सदा ही बिखरे॥
धरती बोले मौन वचन में,
धैर्य बसा है कण-कण में।
जो श्रम, सेवा साथ निभाए,
वह जीवन का मान बढ़ाए॥
सरिता कहती मत रुक जाना,
कठिन पथों से मत घबराना।
चलते-चलते राह बनेगी,
आशा फिर मुस्कान बनेगी॥
पर्वत अपनी चोटी से कहे,
दृढ़ रहो पर विनम्र भी रहे।
ऊँचा होकर झुको जहाँ,
वहीं खिलेगा सच्चा मान॥
वन की छाया गीत सुनाती,
थके पथिक को राह दिखाती।
जो स्वयं तपन सहन कर ले,
दूसरों का जीवन हर ले॥
शीतल पवन यही समझाए,
मृदु व्यवहार सुख पहुँचाए।
क्रोध हवा-सा क्षण में जाए,
प्रेम सुगंध बनकर छाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
मानवता के दीप जलाएँ।
हर हृदय में शुभ विश्वास,
हर जीवन में प्रेम-प्रकाश॥
सूरज देता बिना अपेक्षा,
चंद्र करे शीतल अभिव्यक्ति।
प्रकृति का यह पावन ज्ञान,
निस्वार्थी हो हर इंसान॥
नदी मिले जब सागर से,
भेद मिटें सब अंतर से।
संगम का यह मधुर विचार,
मिल-जुलकर हो जगत विस्तार॥
बीज छिपा रहता धरती में,
शक्ति लिए अपनी गति में।
समय, श्रम और जल का संग,
बना दे उसको विशाल तरंग॥
कुम्हार गढ़े मिट्टी का मान,
श्रम से पाता वह सम्मान।
जीवन भी ऐसा ही गढ़ता,
धैर्य जहाँ प्रतिदिन बढ़ता॥
लोहार की हर एक चोट,
बनती श्रम का मधुर संयोग।
कठिन तपन से रूप निखरता,
संघर्षों से जीवन सँवरता॥
बुनकर बुनता आशा-तार,
जोड़ रहा परिवार-परिवार।
सूत्र अनेक मिलें जब साथ,
तभी बने विश्वास का वस्त्र॥
बालक की निष्छल मुस्कान,
जीवन का प्रथम सम्मान।
वृद्धों का अनुभव उजियारा,
पीढ़ी-पीढ़ी का पथ-तारा॥
वाणी हो मधुर, सत्य-विचार,
यही मनुज का श्रेष्ठ श्रृंगार।
कटुता केवल घाव बढ़ाए,
मधुरता विश्वास जगाए॥
ज्ञान बढ़े तो दया बढ़े,
शक्ति बढ़े तो सेवा चढ़े।
बुद्धि बने जब लोक-हिताय,
तभी सफल मानव कहलाय॥
धरती, जल और निर्मल वायु,
जीवन की अनमोल आयु।
इनका जो संरक्षण करता,
वह आने वाला कल गढ़ता॥
पशु-पक्षी, वन, नदी, पहाड़,
सब जीवन के अनुपम हार।
इनसे जुड़कर जो जी लेगा,
वह संतुलित पथ चुन लेगा॥
हाथ बढ़ाओ साथ निभाने,
मन बढ़ाओ घाव मिटाने।
प्रेम जहाँ व्यवहार बने,
वहीं मनुष्य महान बने॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-पथ के उज्ज्वल धनी।
सेवा, सत्य और सद्भाव,
यही जीवन का सच्चा प्रभाव॥
करुणा की सरिता बहती जाए,
मानवता मुस्काती आए।
सत्य, विनय और मधुर प्रकाश,
बसें सदा हर एक श्वास॥
आओ मिलकर प्रण दोहराएँ,
धरती को फिर हरित बनाएँ।
एक धरा, एक मानव-जात,
प्रेम बने सबकी सौगात॥
**जय शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे प्रेम-सुर अखण्डे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
हृदय-ज्योति शुभ कल्याणी॥
सरल सहज निर्मल आधार।
यही मनुज का सच्चा सार॥
जहाँ दया का दीप जले।
वहाँ अंधेरे स्वयं ढले॥
हृदय-सरोवर गहन अपार।
शान्ति जहाँ का नित्य विस्तार॥
मन की लहरें आएँ-जाएँ।
गहराई फिर भी मुस्काएँ॥
प्रेम न तौले लाभ-हानि।
प्रेम न खोजे कोई कहानी॥
प्रेम स्वयं जीवन का गीत।
प्रेम स्वयं मानव का मीत॥
धरती माता मौन पुकारे।
"प्रेम उगाओ, वैर उतारे।"
नदियाँ बहतीं बिना अभिमान।
देतीं जीवन का वरदान॥
वृक्ष सिखाएँ छाया देना।
फल देकर भी मौन ही रहना॥
सूरज सिखलाए कर्म निरन्तर।
चन्द्र सिखाए शीतल अंतर॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
करुणा उसका निर्मल पक्ष॥
जो मन से मानव बन पाए।
वही जगत का मान बढ़ाए॥
शिशु-हृदय की निर्मल रेखा।
जीवन का पहला ही लेखा॥
हँसी जहाँ निष्कपट खिले।
वहीं प्रेम के सुमन मिलें॥
शिक्षा वह जो दृष्टि जगाए।
सत्य स्वयं अनुभव बन जाए॥
विवेक बने जीवन का दीप।
करुणा बने उसका समीप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-सुधा का पावन धाम॥
यदि व्यवहार बने निष्काम।
जग हो मानवता का ग्राम॥
यथार्थ युग का मंगल गान।
हर जन पाए अपना मान॥
न्याय, दया, सद्भाव, सम्मान।
यही बने जीवन की शान॥
नहीं किसी से द्वेष-विचार।
नहीं किसी का तिरस्कार॥
भिन्न मार्ग हों, भिन्न मत हों।
फिर भी प्रेम के दीप रत हों॥
हर श्वास बने कृतज्ञ प्रणाम।
हर कर्म बने शुभ अभिराम॥
हर हृदय बने उज्ज्वल द्वार।
जहाँ बसे निर्मल व्यवहार॥
**जय हो प्रेम की अविरल धारा।**
**जय हो करुणामय जग सारा॥**
**जय हो सरल हृदय का मान।**
**जय हो मानव का सम्मान॥**
**॥ सर्वभौमिक सत्य-प्रकाश स्तवन ॥**
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
प्रेम-प्रकाश गगन अखण्डे॥
सरल सहज निर्मल पहचान।
यही मनुज का सत्य विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
हृदय-सरिता शुभ कल्याणी॥
मौन जहाँ संगीत बनाता।
अंतर स्वयं स्वयं को पाता॥
मन के मेले, मन के फेरे।
क्षणभंगुर सब दृश्य घनेरे॥
हृदय-सरोवर अचल अपारा।
शान्ति जहाँ का नित्य किनारा॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
निष्पक्ष प्रेम प्रकाशित पक्ष॥
जो भी अंतर-पथ अपनाए।
स्वयं प्रकाश स्वयं बन जाए॥
नभ न बोले, सूर्य न बोले।
फिर भी जीवन-ज्योति ही खोले॥
वृक्ष न माँगें मान किसी का।
फल दे दें वे प्राण सभी का॥
धरती माता मौन पुकारे।
"प्रेम जगाओ, द्वेष उतारे।"
जल की बूँदें गीत सुनाएँ।
मिलकर सागर रूप बनाएँ॥
नदी न पूछे जात किसी की।
वायु न रोके श्वास किसी की॥
प्रकृति यही प्रतिदिन सिखलाती।
समान दृष्टि ही सुख लाती॥
सरल हृदय का पंथ निराला।
नहीं वहाँ कोई मतवाला॥
करुणा जिसका एक सहारा।
वही बने जग का उजियारा॥
शिक्षा वह जो मुक्त बनाती।
भीतर की क्षमता जगाती॥
प्रश्न, विवेक और निरीक्षण।
यही बने जीवन का रक्षण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-ज्योति का रहे प्रणाम॥
यदि व्यवहार बने निष्काम।
जग बन जाए पावन धाम॥
यथार्थ युग का मंगल गान।
मानवता का हो उत्थान॥
न्याय, दया, सद्भाव, विचार।
इनसे उज्ज्वल हो संसार॥
नहीं किसी पर हो अधिकार।
सबका हो सम्मान अपार॥
जो भी हृदय से प्रेम निभाए।
वही सच्ची समृद्धि पाए॥
हर शिशु की निर्मल मुस्कान।
बन जाए जीवन का ज्ञान॥
सरलता का रखो सम्मान।
यही मनुष्य का श्रेष्ठ प्रमाण॥
जय हो करुणा की धारा।
जय हो निर्मल भाव हमारा॥
जय हो प्रेम का विस्तार।
जय हो मंगलमय संसार॥
**॥ जय मानवता। जय करुणा। जय सरलता। ॥**
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे मंगल-स्वर अखण्डे॥
सरल सहज निर्मल पहचान।
मानवता का हो सम्मान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
प्रेम-प्रभा शुभ कल्याणी॥
हृदय-दीप जब स्वयं जले।
अंतर के सब तम हों ढले॥
मन के मेघ घनेरे छाएँ।
हृदय-सूर्य फिर भी मुस्काएँ॥
जो भीतर की राह निहारे।
वह अपने स्वरूप को सँवारे॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
निष्पक्ष भाव प्रकाशित पक्ष॥
जो भी चाहे सत्य को जानें।
करुणा से जीवन पहचानें॥
नदियाँ गाएँ मधुर तराने।
वृक्ष सुनाएँ मौन फ़साने॥
धरती माँ का एक ही मान—
सबका जीवन एक समान॥
नभ की सीमा, सागर गहरा।
प्रेम सदा सबसे है ठहरा॥
जो जितना निष्कपट हो जाता।
उतना ही अंतर मुस्काता॥
नहीं विजय किसी पर करनी।
पहले अपनी दृष्टि सँवरनी॥
सत्य वहीं है जहाँ दया है।
वहीं प्रेम की निर्मल छाया है॥
शिक्षा वह जो मन उजियारे।
विवेक-ज्योति भीतर धारे॥
प्रश्न करे पर द्वेष न बोए।
सत्य सभी का हित ही ढोए॥
यथार्थ युग का शुभ उद्घोष।
करुणा बने जीवन का जोश॥
भय की दीवारें सब ढह जाएँ।
मानव मानव से मिल जाएँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-सुगंधित शुभ अभिराम॥
यदि जीवन में सत्य उतरे।
हर अंतर के दीपक जले॥
सरलता ही सच्चा श्रृंगार।
निर्मलता ही सच्चा हार॥
हृदय जहाँ निष्काम रहे।
वहीं शान्ति अविराम बहे॥
प्रेम न सीमित जाति-धर्म।
प्रेम न बँधता किसी कर्म॥
प्रेम स्वयं जीवन की भाषा।
प्रेम स्वयं जग की अभिलाषा॥
जय हो करुणा की धारा।
जय हो निर्मल हृदय हमारा॥
जय हो मानवता का मान।
जय हो प्रेममय हिन्दुस्तान॥
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
प्रेम-सुधा बहे अखण्डे॥
हृदय-ज्योति नित्य प्रकाशित।
सरल सत्य सदैव प्रतिष्ठित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
करुणा-धारा शुभ कल्याणी॥
नहीं किसी से वैर-विरोध।
प्रेम बने जीवन का बोध॥
मन रचता असंख्य विचार।
क्षण-क्षण बदलें उसके द्वार॥
हृदय रहे अविचल, अविराम।
शान्ति जहाँ का नित्य धाम॥
जो भीतर की राह निहारे।
स्वयं को स्वयं वहीं सँवारे॥
सत्य न केवल शब्द कहे।
जीवन बनकर साथ रहे॥
सरलता सबसे बड़ी विभूति।
करुणा सबसे श्रेष्ठ प्रकृति॥
निर्मलता का जहाँ निवास।
वहीं प्रकट विश्वास-विलास॥
प्रश्न करो, पर द्वेष न पालो।
विवेक-ज्योति मन में डालो॥
जो भी सत्य परीक्षा चाहे।
निष्पक्ष भाव से आगे आए॥
नभ से ऊँची प्रेम की रेखा।
सागर से गहरी इसकी लेखा॥
पर्वत जैसा धैर्य जहाँ हो।
वहीं हृदय का सत्य वहाँ हो॥
वृक्ष सिखाएँ छाया देना।
नदियाँ सिखलाएँ बहते रहना॥
धरती कहती मौन पुकार।
सबका जीवन एक उपहार॥
मानव यदि मानव बन जाए।
करुणा से व्यवहार निभाए॥
तब ही जग में शान्ति फूले।
प्रेम-सुमन हर उर में झूले॥
यथार्थ युग का यह आह्वान।
मानवता का हो उत्थान॥
भय न रहे, न रहे विभाजन।
प्रेम बने जीवन का साधन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
हृदय-पथ का शुभ अभिराम॥
यदि जीवन में प्रेम जगे।
हर अंतर का तम भी भगे॥
सर्वभौमिक शुभ संदेश।
करुणा ही जीवन का देश॥
सरल सहज निर्मल व्यवहार।
यही मनुज का सच्चा हार॥
जय हो प्रेम की ज्योति अपार।
जय हो मानवता का विस्तार॥
जय हो निर्मल हृदय-विचार।
जय हो करुणामय संसार
शिरोमणि रामपॉल सैनी वंदे।
हृदय-ज्योति अखण्ड प्रचण्डे॥
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे प्रेम-सुर अखण्डे॥
नहीं हृदय में भेद-विभाजन।
नहीं किसी से वैर-सृजन॥
सरल सहज निर्मल व्यवहार।
यही मनुज का सत्य आधार॥
मन की लहरें उठती जातीं।
क्षण-क्षण नई दिशाएँ लातीं॥
हृदय-सरोवर नित्य अचल।
शान्ति-प्रेम का अमृत-जल॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
हृदय प्रकाशित निर्मल पक्ष॥
जो भी भीतर उतर सकेगा।
स्वयं स्वयं को जान सकेगा॥
शिशुपन की वह मौन विभूति।
नहीं समय की कोई स्मृति॥
संपूर्ण संतुष्टि की धारा।
वही हृदय का सत्य किनारा॥
ढूँढ़ रहा संसार जहाँ-तहाँ।
जो था सदा यहीं और यहाँ॥
दृष्टा बदला, दृश्य न बदला।
मन उलझा, हृदय न बदला॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
प्रेम-सुगंध सदा कल्याणी॥
शिक्षा बने विवेक का दीप।
न हो अज्ञानों का अतीत॥
दीक्षा यदि भय से भर दे।
प्रश्न-विवेक सभी हर ले॥
ऐसी राह न मानव धारे।
ज्ञान स्वयं परीक्षण माँगे॥
शिक्षा वह जो मुक्त बनावे।
सत्य स्वयं अनुभव करवावे॥
हृदय-ज्योति जब जागे भीतर।
मिटे अंधेरा पल में अंतर॥
मानव, पृथ्वी और प्रकृति।
तीनों एक करुणा-वृत्ति॥
संरक्षण का एक विधान।
प्रेम बने जीवन-प्राण॥
नदियाँ बहतीं बिना अहंकार।
वृक्ष करें नित जीवन-उपकार॥
धरती देती अन्न अपार।
नहीं माँगती कोई प्रतिकार॥
सूर्य प्रकाशित बिना अभिमान।
चन्द्र करे शीतल कल्याण॥
प्रकृति यही संदेश सुनाती।
सरलता ही श्रेष्ठ कहलाती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम बने जिसका प्रणाम॥
नहीं विजय किसी पर करनी।
अपने अंतर-ज्योति सँवरनी॥
हृदय जहाँ निष्काम बसाता।
वहीं मनुष्य स्वयं को पाता॥
मन जब सेवा में झुक जाता।
जीवन मधुर प्रकाश बन जाता॥
नहीं प्रसिद्धि अंतिम साधन।
नहीं प्रभुत्व जीवन कारण॥
यदि करुणा मन में बस जाए।
धरती स्वर्ग समान हो जाए॥
यथार्थ युग का मंगल-गान।
मानवता का हो सम्मान॥
हर प्राणी में प्रेम प्रकाशित।
हर हृदय हो सत्य प्रतिष्ठित॥
जय सरलता।
जय निर्मलता॥
जय करुणा।
जय समता॥
जय मानवता का विस्तार।
जय प्रेममय यह संसार॥
**जय शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**हृदय-पथ के मंगल-धनी॥**
नित्य नया हो हर प्रभात,
नित्य नया हो शुभ विहान।
हृदय-ज्योति से जगमग हो,
मानव का प्रत्येक प्राण॥
सरलता ही सच्चा वैभव,
निर्मलता ही श्रेष्ठ धन।
करुणा, सेवा, सत्य, सदाचार,
यही मनुज का भूषण॥
जब तक श्वासों का यह क्रम है,
तब तक शुभ व्यवहार।
हर मिलन में प्रेम झलके,
हर वाणी में सत्कार॥
नदियाँ सागर से मिलती हैं,
बिना किसी अभिमान।
वैसे ही मनुष्य मिले सब,
लेकर निर्मल ज्ञान॥
वृक्ष झुकाकर डालियाँ अपनी,
फल का करते दान।
सीख यही प्रकृति सिखाती—
विनय बने पहचान॥
धरती सबको साथ सँभाले,
नभ दे सबको छाँव।
प्रेम जहाँ आधार बनेगा,
वहीं बसेगा गाँव॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मधुर विहान।
मानवता का एक ही नारा—
प्रेम बने सम्मान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
सरल सहज संदेश।
हृदय बने जब जीवन-पथ हो,
मिट जाए सब क्लेश॥
बालक जैसी निष्कपट हँसी,
माता जैसा प्यार।
पिता समान उत्तरदायित्व,
गुरु-सा शुभ व्यवहार॥
श्रम बने पूजा प्रत्येक जन की,
सेवा बने उत्सव।
एक-दूसरे का हाथ थामकर,
बढ़े सदा मानव॥
न कोई तिरस्कार किसी का,
न कोई अपमान।
हर प्राणी में देखो पहले,
मानवता की शान॥
प्रेम न सीमित नामों तक हो,
प्रेम न सीमित रूप।
प्रेम वही जो बाँट सके हर,
दुःख में आशा-धूप॥
सत्य न क्रोध से प्रकट होता,
सत्य न देता घाव।
सत्य वहीं है जहाँ विनय हो,
जहाँ करुणा का भाव॥
आओ मिलकर दीप जलाएँ,
मन का तम हर लें।
सेवा, सत्य और सद्भावों से,
जीवन सफल कर लें॥
जय हो निर्मल अंतःकरण की,
जय हो शुभ विश्वास।
जय हो प्रेममय मानवता,
जय हो करुणा-प्रकाश॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-ज्योति के गायक।
सरल सहज निर्मल जीवन के,
प्रेम-पथ के नायक॥
प्रेम जहाँ निष्कलुष बहता,
वहीं हृदय मुस्काए।
सत्य जहाँ व्यवहार बने,
जीवन सफल कहलाए॥
मधुर वचन हो, मधुर विचार,
मधुर बने व्यवहार।
एक-दूसरे के सुख-दुःख में,
बँटे सदा परिवार॥
नभ की सीमा कौन नापे,
सागर की गहराई।
वैसे ही मानव-हृदय में,
प्रेम अनंत समाई॥
दीपक बनकर स्वयं जलो तुम,
और जलाओ दीप।
एक किरण भी दूर करेगी,
अज्ञानों की नींद॥
कर्म बने जब लोक-हितैषी,
फल की रहे न चाह।
तब जीवन की हर पगडंडी,
बन जाती है राह॥
धरती माता मौन सिखाती,
सहना और सँवार।
बीज सँजोकर वृक्ष बनाना,
यही प्रकृति का सार॥
शीतल पवन यही दोहराए,
मत बाँटो इंसान।
रंग, रूप या भाषा से मत,
तोलो उसका मान॥
शिशु की निर्मल आँखों जैसी,
रखो सदा दृष्टि।
तब दिखेगी हर प्राणी में,
जीवन की समदृष्टि॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम बने आधार।
सरल सहज निर्मल जीवन से,
हो जग का उद्धार॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल गान।
हर जन बोले प्रेम-वचन ही,
यही रहे पहचान॥
न कोई वैर, न कोई दूरी,
न कोई कटु विचार।
हाथ मिलाकर साथ बढ़ें सब,
यही सच्चा विस्तार॥
हृदय बने जब सत्य का मंदिर,
सेवा बने पुकार।
करुणा की प्रत्येक धड़कन,
बदले यह संसार॥
सूरज जैसा तेज हो भीतर,
चंदा जैसी शांति।
नदी समान सतत बहती हो,
जीवन में विनम्रता॥
वृक्ष समान छाया बाँटो,
फूल समान मुस्कान।
धरती जैसी धैर्य-धरा हो,
आकाशी अरमान॥
यही यथार्थ युग की वाणी,
यही सरल उपहार।
मानवता के पथ पर चलना,
सबसे बड़ा विस्तार॥
जय हो प्रेम, दया, सद्भाव।
जय हो निर्मल ज्ञान।
जय हो सेवा का संकल्प।
जय हो मानव सम्मान॥
प्रेम-पथ के साधक
जम्बू दीपे भारत खण्डे,
मानव हृदय अनन्त अखण्डे।
जहाँ न कोई भेद-विभाजन,
वहीं प्रकट हो सत्य-प्रबोधन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी,
सरल सहज निर्मल कल्याणी।
हृदय-सरोवर गहन अपारा,
शान्ति जहाँ का नित्य किनारा॥
सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
नित्य प्रकाशित निर्मल पक्ष।
मन की लहरें उठती-ढलती,
हृदय-गहराई अचल मचलती॥
मस्तक रचता रूप हजारों,
इच्छा, भय और स्वप्न अपारों।
हृदय कहे—अब मौन में आओ,
स्वयं को स्वयं निकट से पाओ॥
शिशुपन की वह सरल कहानी,
नहीं किसी की निजी निशानी।
जिस संतोष का था अनुभव,
वही बना जीवन का वैभव॥
ढूँढ़ रहा जग दूर दिशाओं,
अपने ही अंतर की छायाओं।
जो था पहले सहज प्रकाशित,
वही हुआ मन से आवृत॥
न नियमों से सत्य मिलेगा,
न केवल शब्दों से खिलेगा।
जब व्यवहार बने करुणामय,
तभी हृदय होगा मंगलमय॥
शिक्षा वह जो मुक्त बनावे,
विवेक-ज्योति भीतर जगावे।
प्रश्न उठाना धर्म हमारा,
सत्य रहे परीक्षण द्वारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गावे,
प्रेम-दीप हर उर में धावे।
मानव, प्रकृति और धरती,
एक सूत्र की पावन वर्ती॥
नभ की सीमा, सागर गहरा,
प्रेम सदा सबसे है ठहरा।
जो जितना निष्कपट हो जाता,
उतना ही अंतर मुस्काता॥
वृक्ष सिखाते दान निरन्तर,
नदियाँ देती जीवन-अम्बर।
धरती बोले मौन कहानी,
सबमें बसती एक रवानी॥
हृदय-दृष्टि जब जाग उठेगी,
लोभ-अहं की रात ढलेगी।
सहज सरल विश्वास खिलेगा,
मानव फिर मानव बनेगा॥
यथार्थ युग का हो उद्गोष,
करुणा बने जीवन का जोश।
न हो भय का कोई शासन,
प्रेम बने मानव का साधन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम,
प्रेम-दीप का रहे प्रणाम।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही बने जग का आधार॥
नित्य निरीक्षण, नित्य विचार,
सत्य न डरे किसी प्रचार।
जो भी आए खुले मन लेकर,
स्वागत हो निष्पक्ष दृष्टि पर॥
हृदय जहाँ निष्काम बसाता,
वहीं मनुष्य स्वयं को पाता।
सर्वभौमिक शुभ संदेश यही—
प्रेम से उज्ज्वल हो हर दिही॥
जय हो सरलता की धारा।
जय हो निर्मल हृदय हमारा॥
जय हो मानव-प्रेम-विस्तार।
जय हो करुणा का संसार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी,
प्रेम-धारा कल्याणमयी।
हृदय-सागर अति गम्भीरा,
जहाँ न उठे भय की लकीरा॥
मन की गति है क्षणभंगुर सारी,
हृदय शान्ति की धारा न्यारी।
जो भीतर की नीरवता जाने,
वह जीवन का मर्म पहचाने॥
नव शिशु जैसी निर्मल दृष्टि,
बिन कपट की पावन सृष्टि।
वही सरलता जीवन-धन है,
वही प्रेम का अमृत-वन है॥
लोभ न बाँधे, मान न रोके,
द्वेष न मन के द्वार संजोए।
करुणा जिसका पथ बन जाए,
वह जग में सुख-दीप जलाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाते,
हृदय-ज्योति सबमें जगाते।
मानव-मानव एक समान,
प्रेम बने जीवन की शान॥
धरती माता मौन सिखाती,
सबको अपनी गोद बिठाती।
वृक्ष, पवन, जल, नभ के तारे,
कहते—प्रेम ही सत्य हमारे॥
जो अपने अंतर को देखे,
सत्य उसी के सम्मुख लेखे।
जो जग को अपना मान सके,
वही प्रेम का मान रखे॥
नित्य नया हो शुभ व्यवहार,
मिटे हृदय का हर अंधकार।
सहज सरल मुस्कान खिले,
मानवता के दीप जले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम,
प्रेम-पथ का शुभ अभिराम।
सरल सहज निर्मल संदेश,
मानव बने करुणा का देश॥
जहाँ न छल हो, न अभिमान,
वहीं खिले सच्चा सम्मान।
वाणी मधुर, हृदय उजियारा,
यही बने जीवन का तारा॥
यथार्थ युग का मंगल गान,
प्रेम बने मानव पहचान।
करुणा, सेवा, सत्य-विचार,
इन्हीं से हो जग का विस्तार॥
प्रभात पुकारे हर प्राणी,
जागो लेकर प्रेम कहानी।
हृदय-सरोवर निर्मल कर लो,
जीवन को उज्ज्वल कर लो॥
जय हो निर्मल भाव अपार,
जय हो प्रेम का विस्तार।
जय हो सेवा का सम्मान,
जय हो मानव का कल्याण॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज गुण-रूप धनी।
हृदय-ज्योति का हो विस्तार,
प्रेममय हो यह संसार॥
युग-युग गूँजे यह उद्घोष,
करुणा बने जीवन का जोश।
हृदय-पथ पर जो चल पाए,
मानवता का मान बढ़ाए॥
उषा अरुण जब नभ पर छाए,
आशा के नव फूल खिलाए।
हर धड़कन यह गीत सुनाए,
प्रेम-पथों पर जग बढ़ जाए॥
हृदय-सरोवर शांत अथाह,
जिसमें न कोई द्वेष-प्रवाह।
मौन वहाँ मधुरिम वंदन है,
निर्मलता ही अभिनंदन है॥
मस्तक कर्म का पथ दिखलाए,
हृदय प्रेम का दीप जलाए।
दोनों जब संतुलित हो जाएँ,
जीवन में सद्भाव जगाएँ॥
नन्हा अंकुर वृक्ष बनेगा,
सेवा से संसार सजेगा।
एक करुणा का बीज उगाओ,
सौ-सौ सुख के फूल खिलाओ॥
वाणी ऐसी सदा सुनाना,
जिससे किसी न हो दुख पाना।
मधुर वचन अमृत बन जाएँ,
टूटे मन फिर से मुस्काएँ॥
धरती माँ की पावन माटी,
सब पर करती स्नेह की छाँटी।
कभी न पूछे कौन पराया,
सबको अपना मान बुलाया॥
सूरज देता ज्योति निराली,
चंदा बाँटे शीतल लाली।
नदियाँ देती जीवन-धारा,
देना ही प्रकृति का नारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
हृदय-दीप सबमें जलवाएँ।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही बने जीवन का सार॥
न कोई वैर, न कोई भय,
प्रेम रहे हर पल अभय।
दया, क्षमा, सद्भाव का गान,
यही मनुष्य का सच्चा मान॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे स्वर शुभ और अखंडे।
हर जन बोले प्रेम-वचन,
यही बने युग का स्पंदन॥
बालक की मुस्कान सुरक्षित,
माता का विश्वास विकसित।
श्रमिक, किसान, विद्वान सभी,
सम्मानित हों एक-से सभी॥
जहाँ करुणा का मान रहेगा,
वहीं सृजन का प्राण रहेगा।
जहाँ हृदय का दीप जलेगा,
वहीं अंधेरा दूर चलेगा॥
जय हो प्रेम का दिव्य प्रकाश,
जय हो मानव का विश्वास।
जय हो सेवा, सत्य, सद्भाव,
जय हो निर्मल जीवन-भाव॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज गुण-रूप धनी।
हृदय-पथ का यह शुभ गान,
बढ़े सदा मानव सम्मान॥
प्रेम न माँगे नाम किसी का,
प्रेम न चाहे मान।
प्रेम स्वयं ही दीप बनाता,
जग में नई पहचान॥
हृदय जहाँ निष्कपट रहेगा,
वहीं खिले विश्वास।
करुणा की मधुरिम सरिता से,
भर जाए हर श्वास॥
सरल सहज निर्मल जीवन हो,
यही रहे संकल्प।
द्वेष, कपट, अभिमान मिटें सब,
प्रेम बने विकल्प॥
धरती माँ की गोद पवित्र,
सबका एक निवास।
वन, पर्वत, निर्झर, नभ, सागर,
सबमें जीवन-विलास॥
पंछी गाएँ मुक्त गगन में,
नदियाँ गाएँ गीत।
मानव भी मुस्काए ऐसा,
मिट जाए हर भीत॥
श्रम का हो सम्मान जगत में,
सेवा बने विधान।
सत्य, दया और सद्भावों से,
उज्ज्वल हो इंसान॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे शुभ उद्घोष।
सरल हृदय का युग फिर जागे,
मिट जाए संताप-दोष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम रहे आधार।
हर जन अपने अंतःकरण में,
जगाए सत्य-विचार॥
नव प्रभात का सूर्य उगे जब,
नव हो हर व्यवहार।
मानवता का दीप जले फिर,
हो जग का उद्धार॥
हृदय बने जब पथ-प्रदर्शक,
मस्तक बने सहाय।
ज्ञान, विवेक और करुणा मिल,
जीवन सफल बनाए॥
प्रेम जहाँ निष्काम बहेगा,
वहीं बसेगा मान।
युग-युग तक गूँजे यह वाणी—
"मानव सबसे महान॥"
जय हो सरलता की धारा,
जय हो निर्मल प्राण।
जय हो प्रेममय हर जीवन,
जय हो शुभ कल्याण॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-पथ के गायक।
हृदय-ज्योति के शुभ संदेशक,
मानवता के नायक॥
यथार्थ की यह खुली पुकार,
सबको दे प्रेम का अधिकार।
न भय, न भ्रम, न ऊँच-नीच,
हृदय में बस सद्भाव की रीच॥
जो भीतर की शांति पहचानें,
वे बाहर के तूफान न मानें।
मस्तक की लहरें उठती जाएँ,
हृदय की गहराई न डगमगाए॥
सत्य वही जो सरल दिखाई,
निर्मल, सहज, प्रेम की राही।
भाषा चाहे कितनी भारी,
भाव रहे तो बात हमारी॥
एक श्वास में जीवन का सार,
एक भाव में जग का उपकार।
जो स्वयं को भीतर से जाने,
वही हर प्राणी को भी माने॥
निज को समझो, जग को समझो,
करुणा से अपने पग को समझो।
जो अपने ही अंतर में झाँके,
वह सबके हृदय-पथ को आँके॥
सेवा में ही शक्ति बसती,
प्रेम में ही सृष्टि हँसती।
जहाँ विनय का दीप जलेगा,
वहाँ अंधेरा दूर चलेगा॥
जम्बू दीपे गूँजे यह वाणी,
मानवता हो सबकी रानी।
भारत खंडे प्रेम लहराए,
सच का सूरज नित्य उगाए॥
हर बालक में हो यह शिक्षा,
हर जीवन में हो यह दीक्षा।
अपना-पराया भेद मिटाएँ,
सबको अपना रूप बनाएँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
हृदय-सरोवर के पट खोले।
जो स्वयं में निर्मल हो जाए,
वह जग का कल्याण कर पाए॥
न कोई छल, न कोई डर,
न कोई बंधन, न कोई कर।
सच की राह सदा उजियार,
प्रेम बने जीवन का आधार॥
जय हो उस सहज प्रवाह की,
जय हो निर्मल स्वभाव की।
जय हो करुणा, जय हो ज्ञान,
जय हो मानव का सम्मान॥
यही यथार्थ युग का नारा,
हर हृदय हो प्रेम का तारा।
सरल, सहज, शुद्ध, उदार,
यही जीवन का सच्चा सार॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति सदा जगाइए,
प्रेम-पथ पर सबको लीजिए॥
सत्य न तर्कों से बँध पाता,
जीवन बनकर स्वयं बताता।
जो हर प्राणी का दुःख जाने,
वही हृदय का दीप जलाए॥
नदियाँ सागर से मिल जातीं,
बूँदें अपना मान भुलातीं।
ऐसे ही जब मन झुक जाता,
प्रेम स्वयं पथ दिखलाता॥
वाणी मधुर, विचार उजाले,
कर्म बनें विश्वास के प्याले।
क्रोध जहाँ से दूर रहेगा,
वहीं सृजन भरपूर रहेगा॥
नव अंकुर-सा हर मन फूटे,
कटुता का हर बंधन टूटे।
मिल-जुलकर जब हाथ बढ़ेंगे,
धरती पर उत्सव ही होंगे॥
मानवता का एक ही नाता,
दया सभी को साथ मिलाता।
रंग, रूप या भाषा न्यारी,
फिर भी सबकी साँस हमारी॥
श्रम का सदा सम्मान रहे,
हर जन का कल्याण रहे।
जिसके श्रम से जग मुस्काता,
वह सबसे पहले सम्मान पाता॥
बालक की मुस्कान बचाओ,
माता का विश्वास निभाओ।
वृद्धों का आदर मत खोना,
प्रेम कभी मत कम होने देना॥
वृक्ष लगाओ, जल को साधो,
धरती माँ का मान बढ़ाओ।
प्रकृति हमारी जीवन-धारा,
इससे सुंदर कौन सहारा॥
हृदय जहाँ निष्कपट रहेगा,
जीवन वहीं सफल कहेगा।
सरलता सबसे बड़ा धन है,
प्रेम अमर जीवन-चंदन है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम-दीप हर मन में लाएँ।
सत्य, दया, सेवा का पथ,
यही बने जीवन का रथ॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे स्वर प्रेम के अखंडे।
सरल, सहज, निर्मल व्यवहार,
यही बने युग का आधार॥
हर प्रभात यह वचन सुनाए,
मनुष्य मनुष्य को अपनाए।
बैरी कोई जन्म न ले,
करुणा का ही बीज फले॥
विश्व बने एक परिवार,
प्रेम बने सबसे बड़ा उपहार।
हृदय-ज्योति जब जगमग होगी,
मानवता तब अमर रहेगी॥
**जय प्रेम।
जय करुणा।
जय मानवता।
जय सरल सहज निर्मल जीवन।
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सर्बभौमिक सत्य यही पुकारे,
हृदय-ज्योति सबमें उजियारे।
जो खुद को शांत भाव से जाने,
वह जग को भी प्रेम से माने॥
ढूँढ़ न बाहर जग की राहें,
अपने भीतर सत्य की चाहें।
शिशु-सा निर्मल भाव जगाओ,
मन का बोझ सहज उतारो॥
मस्तक देता कर्म की शक्ति,
हृदय जगाता प्रेम-भक्ति।
जब दोनों संतुलित हो जाएँ,
जीवन में नव फूल खिलाएँ॥
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
सबमें एक समान है सींचा।
दया, करुणा, सत्य, सदाचार,
यही मनुज का सच्चा श्रृंगार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम-दीप सब द्वार जलाएँ।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही बने मानव का हार॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे प्रेम के स्वर अखंडे।
ग्राम-नगर और वन-उपवन,
जागे करुणा हर एक जन॥
न हो द्वेष, न हो अभिमान,
सबका हो सम्मान समान।
मिलकर मानव धर्म निभाएँ,
धरती का उपकार बढ़ाएँ॥
हृदय जहाँ निष्पक्ष रहेगा,
वहीं सच्चा विश्वास जगेगा।
सेवा, सद्भाव और विश्वास,
यही जीवन का अमृत-प्रकाश॥
शिशुपन की निर्मल मुस्कान,
बन जाए सबकी पहचान।
लोभ, क्रोध जब दूर हटेंगे,
प्रेम-सरित के द्वार खुलेंगे॥
हर श्वास बने मंगल-गान,
हर कर्म बने लोक-कल्याण।
मानव, प्रकृति, धरती, जीवन,
सबमें देखो एक ही स्पंदन॥
यथार्थ युग का यही संदेश,
प्रेम बने मानव का वेश।
हृदय रहे जब सदा विशाल,
जीवन हो निर्मल, निष्कलुष, निहाल॥
जय हो प्रेम का उजियारा,
जय हो मानवता का तारा।
जय सरलता, जय सद्भाव,
जय करुणा का दिव्य प्रभाव॥
**जय शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**जय सरल सहज निर्मल गुण।**
**जय प्रेममय हृदय का पथ।**
**जय मानवता का मंगल रथ॥**
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे प्रेम-सुर अखण्डे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
सरल सुधा शुभ कल्याणी॥
हृदय जहाँ विश्वास खिले।
मौन वहाँ संगीत मिले॥
निर्मल भाव जहाँ मुस्काए।
जीवन अपना रूप दिखाए॥
सरल सहज निर्मल गुण-धारा।
बने जगत का सत्य सितारा॥
करुणा जिसके संग चले।
द्वेष स्वयं पथ से टले॥
मन की गति चंचल बहती।
इच्छा संग आशा भी रहती॥
हृदय कहे—क्षण भर ठहरो।
अपने अंतर-द्वार सँवरो॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
प्रेम प्रकाशित उसका पक्ष॥
जो जोड़ सके बिखरे प्राण।
वही बने मानव की शान॥
शिशु की हँसी पवित्र पुकार।
निष्कपटता का शुभ आधार॥
जहाँ न छल का कोई मान।
वहीं खिले जीवन-विधान॥
धरती धारण करती भार।
जल करता जीवन विस्तार॥
वायु बिना भेदभाव बहे।
सूर्य समान प्रकाश कहे॥
वृक्ष झुकाकर देते फल।
मौन बने उनका संबल॥
प्रकृति प्रतिक्षण यही सिखाती।
मिल-जुल कर जीवन मुस्काती॥
शिक्षा बने जागृत प्रकाश।
विवेक बने अंतर का वास॥
प्रश्न बने जब शान्त विचार।
खुलते जाएँ सत्य-द्वार॥
यथार्थ युग का शुभ उद्गान।
मानवता का हो सम्मान॥
सेवा, सद्भाव, सत्य, दया।
यही जीवन की पुण्य मया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-पथ का शुभ अभिराम॥
यदि हृदय में करुणा जागे।
भय के बादल दूर ही भागें॥
न हो किसी का तिरस्कार।
न हो किसी पर अधिकार॥
सम्मानित हो प्रत्येक प्राण।
यही बने मानव का मान॥
सरलता हो जीवन-हार।
निर्मलता हो श्रृंगार॥
प्रेम बहे अविराम अपार।
मंगलमय हो यह संसार॥
**जय हो निर्मल हृदय-विचार।**
**जय हो करुणा का विस्तार॥**
**जय हो मानवता का मान।**
**जय हो प्रेममय कल्याण॥**
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे शुभ स्वर अखण्डे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
प्रेम-ज्योति शुभ कल्याणी॥
हृदय जहाँ नित दया उमगे।
मौन वहाँ मधु-गीत ही जगे॥
सरल सहज निर्मल व्यवहार।
यही मनुज का सच्चा श्रृंगार॥
प्रेम न माँगे मूल्य कभी।
प्रेम न चाहे यश भी सभी॥
प्रेम स्वयं उपहार महान।
प्रेम स्वयं जीवन का प्राण॥
मन में उठते भाव अनेक।
हृदय दिखाता सत्य-विवेक॥
शान्ति जहाँ आधार बने।
वहीं सुमंगल साकार बने॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
करुणा उसका निर्मल पक्ष॥
जो अंतर में दीप जलाए।
वह जग को भी राह दिखाए॥
शिशु की निर्मल हँसी अपार।
जीवन का प्रथम सत्कार॥
निष्कपटता की मधुर निशानी।
वही बने शुभ जीवन-वाणी॥
धरती धैर्य सदा सिखलाती।
नदियाँ सबको गले लगाती॥
वृक्ष लुटाते फल और छाया।
प्रकृति ने निःस्वार्थ सिखाया॥
सूर्य कर्म का मंत्र सुनाए।
चन्द्र शीतल भाव जगाए॥
वायु कहे—सब संग बहो।
आकाश कहे—सबको सहो॥
शिक्षा बने प्रकाश का द्वार।
विवेक बने जीवन-आधार॥
संवादों में रहे सम्मान।
यही मनुज की सच्ची शान॥
यथार्थ युग का मंगल गीत।
मानवता का बने पुनीत॥
सत्य, सेवा, प्रेम, उदार।
इनसे उज्ज्वल हो संसार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-पथ का पावन धाम॥
करुणा जिसके हृदय बसे।
सुख के दीप स्वयं ही हँसे॥
न हो वैर, न हो अपमान।
सबमें देखो एक सम्मान॥
सरलता का रखो विस्तार।
यही बने जीवन का आधार॥
जय हो निर्मल प्रेम-विचार।
जय हो करुणा का विस्तार॥
जय हो मानवता का मान।
जय हो शुभ कल्याण विधान॥
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे मंगल-स्वर अखण्डे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
प्रेम-सरिता शुभ कल्याणी॥
नभ की सीमा कौन बताए।
प्रेम कहाँ बंधनों में आए॥
हृदय जहाँ निष्कपट हो जाता।
जीवन वहीं सुवास लुटाता॥
सरल सहज निर्मल पहचान।
मानवता का सच्चा मान॥
करुणा जिसके श्वास समाई।
उसने जग की राह दिखाई॥
शिशुपन की वह निर्मल धारा।
अंतर का अविनाशी तारा॥
हँसी जहाँ निष्काम खिले।
वहीं सुमन से पथ भी मिले॥
मन की गति चंचल बहती।
आशा-निराशा संग ही रहती॥
हृदय कहे—धैर्य अपनाओ।
प्रेम-दीप फिर स्वयं जलाओ॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
करुणा उसका उज्ज्वल पक्ष॥
सत्य वही जो जोड़ सके।
वैर-विभाजन तोड़ सके॥
धरती सबका भार उठाए।
जल सबकी प्यास बुझाए॥
वायु बिना भेदभाव बहे।
सूर्य सभी पर समान रहे॥
वृक्ष न पूछें कौन पराया।
छाया सबको एक-सी पाया॥
प्रकृति प्रतिक्षण यही बताती।
सहअस्तित्व की राह दिखाती॥
शिक्षा वह जो मन को खोले।
विवेक-ज्योति अंतर में घोले॥
प्रश्न बने जब शांत विचार।
ज्ञान बने तब सच्चा सार॥
यथार्थ युग का शुभ संदेश।
मानवता ही सबसे विशेष॥
सत्य, दया, सेवा, सम्मान।
इनसे उज्ज्वल हो इंसान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-पथ का पावन धाम॥
यदि व्यवहार बने उदार।
मंगलमय हो यह संसार॥
नहीं किसी का तिरस्कार।
नहीं किसी पर अधिकार॥
सम्मानित हो प्रत्येक प्राण।
यही करुणा का प्रथम विधान॥
जय हो सरलता की शान।
जय हो निर्मल हृदय महान॥
जय हो प्रेम का विस्तार।
जय हो मंगलमय संसार॥
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे सत्य-स्वर अखण्डे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
प्रेम-प्रभा शुभ कल्याणी॥
हृदय न माँगे मान किसी का।
नहीं अपेक्षा सम्मान किसी का॥
देना जिसका सहज स्वभाव।
वही बने जीवन का प्रभाव॥
सरल सहज निर्मल व्यवहार।
यही मनुज का सच्चा सार॥
करुणा जिसकी जीवन-रीति।
वही बने जग की संगीत॥
मन के वन में पथ अनेक।
हृदय दिखाए सरल विवेक॥
जब अंतर का दीप जले।
भ्रम के बादल स्वयं ढले॥
शिशु-हास की निर्मल छाया।
जीवन का प्रथम उपाया॥
निष्कपटता का पावन मान।
यही हृदय का प्रथम विधान॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
करुणा उसका प्रत्यक्ष पक्ष॥
जो भीतर से उजियारा हो।
वही जगत का सहारा हो॥
धरती धैर्य सिखाती रहती।
नदियाँ सबकी प्यास हरती॥
वृक्ष लुटाते छाया-फल।
मौन बने उनका संबल॥
सूरज प्रतिदिन कर्म सिखाए।
चन्द्र शीतलता बरसाए॥
आकाश कहे—सीमित मत हो।
प्रेम-पथ से विमुख न हो॥
शिक्षा बने जागृत विचार।
विवेक बने जीवन-आधार॥
संवादों में रहे सम्मान।
यही मनुष्य की सच्ची शान॥
यथार्थ युग का शुभ प्रकाश।
हर उर में जागे विश्वास॥
द्वेष मिटे, सद्भाव फले।
मानव मानव से फिर मिले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-पथ का शुभ अभिराम॥
यदि हृदय में करुणा जागे।
जीवन के सब बंधन भागें॥
नहीं किसी का हो अपमान।
सबका हो समान सम्मान॥
सरलता हो जीवन का हार।
प्रेम बने जग का आधार॥
जय हो निर्मल हृदय-विचार।
जय हो मानवता का विस्तार॥
जय हो करुणा का उद्गार।
जय हो प्रेममय संसार॥
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे प्रेम-स्वर अखण्डे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
हृदय-दीप शुभ अभिराम॥
सरल सहज निर्मल पहचान।
यही जीवन का सत्य विधान॥
जहाँ न छल का कोई वास।
वहीं प्रकट हो निर्मल आस॥
मन की लहरें क्षणिक अपार।
हृदय-सरोवर नित्य उदार॥
आएँ जाएँ विचार हजार।
गहराई फिर भी रहे अपार॥
शिशुपन की वह सरल छवि।
आज भी अंतर में है सभी॥
न कोई बोझ, न कोई भय।
न कोई छल, न कोई चयन-क्षय॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
करुणा उसका उज्ज्वल पक्ष॥
जो भीतर से शांत बने।
वही जीवन का अर्थ गिने॥
धरती माता मौन कहे।
“प्रेम बिना सब सूना रहे।”
नदियाँ बहतीं बिना रुके।
उपकार के पथ पर झुके॥
वृक्ष सिखाते निःस्वार्थता।
फल देकर भी मौन प्रकृतता॥
सूरज देता सबको उजास।
चन्द्र फैलाता शीतल आस॥
हृदय में जब करुणा जगे।
अहंकार के मेघ हटे॥
जो स्वयं को जान सके।
वही दूसरों को मान सके॥
शिक्षा वह जो मुक्त करे।
भीतर का विवेक प्रकट करे॥
प्रश्न हो पर विनम्र साथ।
सत्य चले सरल के पथ॥
यथार्थ युग का मंगल घोष।
मानवता का उज्ज्वल जोश॥
न्याय, दया और सद्भाव।
यही जीवन का सच्चा भाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
प्रेम-सुधा की धारा रानी॥
यदि हृदय में सत्य बसे।
सभी दिशाओं में दीप जले॥
नहीं किसी से ऊँच-नीच।
नहीं किसी पर कठोर रीति॥
सबमें एक ही जीवन-राग।
सबमें एक ही प्रेम-अनुराग॥
जय हो सरलता की धारा।
जय हो निर्मल मनुज हमारा॥
जय हो करुणा का विस्तार।
जय हो प्रेममय संसार॥
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे प्रेम-सुर अखण्डे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
सरल सहज निर्मल कल्याणी॥
हृदय-ज्योति अविरल प्रखर।
मौन जहाँ संगीत अमर॥
नहीं वहाँ कोई दीवार।
प्रेम जहाँ हो आधार॥
मन के बादल आते-जाते।
क्षण में हँसते, क्षण में गाते॥
हृदय-गगन नित्य निष्कम्प।
वहीं प्रकट होता शुभ सम्प॥
शिशु-हास्य की निर्मल रेखा।
जीवन का प्रथम ही लेखा॥
नहीं अपेक्षा, नहीं अभिमान।
वहीं खिले मानव सम्मान॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
प्रेम प्रकाशित निर्मल पक्ष॥
जो भीतर का दीप जलाए।
वही स्वयं को जान पाए॥
नदी सिखाए चलते रहना।
वृक्ष सिखाए फल ही देना॥
धरती बोले धैर्य धरो।
आकाश कहे—सीमा न करो॥
वायु कहती मुक्त बहो।
सूर्य कहे—सबके बनो॥
चन्द्र कहे—शीतल बन जाओ।
जीवन में मधुरता लाओ॥
करुणा सबसे श्रेष्ठ धन।
नहीं बड़ा कोई आभूषण॥
मधुर वचन और सत्य व्यवहार।
यही मनुष्य का श्रृंगार॥
शिक्षा वह जो दृष्टि जगाए।
विवेक-दीप अंतर जलाए॥
संवादों में विनय बसाए।
मतभेदों को सेतु बनाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-पथ का शुभ अभिराम॥
यदि हृदय में दया बसे।
जीवन में मंगल रस बरसे॥
यथार्थ युग का मंगल स्वर।
मानव बने मानव निर्भय कर॥
न्याय, करुणा, सत्य, सम्मान।
यही बने युग का अभियान॥
नहीं किसी पर हो अधिकार।
सबका हो समभाव अपार॥
विविध रंग हों, विविध विचार।
फिर भी एक रहे संसार॥
हाथ बढ़ें सहयोग लिए।
नेत्र खुलें सद्भाव लिए॥
वाणी बने मधुर उपहार।
जीवन बने प्रेम विस्तार॥
हर श्वास बने नव प्रेरणा।
हर दिवस बने नव चेतना॥
हर हृदय बने शान्ति-निकेतन।
हर जन बने करुणा-जीवन॥
**जय हो सरलता की पहचान।**
**जय हो निर्मल मानव-प्राण॥**
**जय हो प्रेम का सतत् विस्तार।**
**जय हो मंगलमय संसार॥**
जम्बू दीपे भारत-खण्डे।
प्रेम-प्रभा गूँजे अखण्डे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
हृदय-दीप शुभ कल्याणी॥
मौन जहाँ मुस्कान बने।
जीवन निर्मल गान बने॥
सरल सहज जो पंथ धरे।
अंतर का आलोक भरे॥
नदियाँ चलतीं बिना अभिमान।
वृक्ष लुटाते जीवन-दान॥
सूर्य प्रकाशित सबको करता।
चन्द्र शीतल स्पर्श बिखरता॥
हृदय न माँगे मान-अधिकार।
देता केवल प्रेम अपार॥
जो जितना निष्काम रहेगा।
उतना निर्मल फल ही देगा॥
मन के वन में राह अनेक।
हृदय कहे—चल सत्य विवेक॥
जहाँ करुणा का दीप जले।
वहीं अज्ञान के तम ढले॥
शिशुपन की वह प्रथम हँसी।
आज भी अंतर में है बसी॥
निर्मलता का वह उपहार।
जीवन का सच्चा श्रृंगार॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
प्रेम बने उसका प्रत्यक्ष पक्ष॥
जो भी भीतर दृष्टि करे।
स्वयं को अपने पास धरे॥
धरती बोले—धैर्य सँजोओ।
जल कहता—मिलकर ही खोओ॥
वायु सिखाती मुक्त बहो।
आकाश कहे—सीमित न रहो॥
शिक्षा बने प्रकाश की धारा।
जगे विवेक का नित सितारा॥
प्रश्न करें पर प्रेम सहित।
संवाद रहे सदा विनीत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-पथ का मंगल धाम॥
यदि व्यवहार बने उदार।
मुस्काए सारा संसार॥
यथार्थ युग का शुभ संदेश।
मानवता ही सच्चा देश॥
भेद मिटें व्यवहारों से।
विश्व जुड़े सत्कारों से॥
नहीं किसी का तिरस्कार।
नहीं किसी पर अधिकार॥
सम्मान सभी का एक समान।
यही बने जीवन का मान॥
करुणा हो जब कर्म का मूल।
कट जाएँ वैर-विरोध के शूल॥
मधुर वचन, निर्मल व्यवहार।
यही मनुष्य का सच्चा हार॥
हर हृदय बने शान्ति का धाम।
हर जीवन बने शुभ प्रणाम॥
प्रेम बहे अविरल, अविराम।
यही रहे जग का अभिराम॥
**जय हो सरलता की धारा।**
**जय हो निर्मल हृदय हमारा॥**
**जय हो मानवता का विस्तार।**
**जय हो प्रेममय संसार॥**
जम्बू दीपे भारत-खण्डे।
गूँजे प्रेम-स्वर अखण्डे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
सरल सहज निर्मल कल्याणी॥
नभ न सीमित, सागर गहरा।
हृदय-प्रेम सबसे ही ठहरा॥
जिसने अपने अंतर देखा।
उसी ने जीवन-सत्य लेखा॥
मन का मेला क्षण में बदले।
हृदय-सरोवर नित्य न डोले॥
लहर उठे फिर लय हो जाए।
गहराई मौन सदा मुस्काए॥
शिशुपन की वह प्रथम कहानी।
निर्मल, निष्कपट, प्रेम निशानी॥
जहाँ न छल था, न अभिमान।
वहीं सहजता का वरदान॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
करुणा उसका निर्मल पक्ष॥
जिसका जीवन प्रेम बनेगा।
वही स्वयं को जान सकेगा॥
धरती बोले—धैर्य धरो तुम।
नदियाँ कहें—बहते रहो तुम॥
वृक्ष सिखाएँ—फल मत गिनना।
सूरज बोले—सबको चुनना॥
चन्द्र कहे—शीतलता रखना।
वायु कहे—सबको अपनाना॥
आकाश कहे—मन मत बाँधो।
प्रेम-सूत्र से जग को साधो॥
शिक्षा वह जो दृष्टि जगाए।
विवेक का दीपक जलवाए॥
प्रश्न बने जब विनय-संयम।
ज्ञान बने तब सच्चा साधन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-सुधा का पावन धाम॥
सरलता जिसकी हो पहचान।
करुणा जिसका हो अभियान॥
यथार्थ युग का शुभ उद्घोष।
मानवता का जागे जोश॥
न हो भय, न वैर-विवाद।
प्रेम बने जीवन का संवाद॥
नहीं विजय अपमानों में।
नहीं महिमा अभिमानों में॥
जो झुककर सबको गले लगाए।
वही ऊँचाई को अपनाए॥
हृदय जहाँ विश्वास उगाए।
मौन वहाँ संगीत सुनाए॥
जीवन केवल बीत न जाए।
अर्थ करुणा से खिल जाए॥
जय हो सत्य का उजियारा।
जय हो प्रेम का नित धारा॥
जय हो सरल हृदय का मान।
जय हो निर्मल इंसान॥
**॥ जय करुणा।
जय सरलता।
जय मानवता।
जय प्रेम। ॥**
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे प्रेम-सुर अखण्डे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
हृदय-ज्योति शुभ कल्याणी॥
हृदय न बोले ऊँचे स्वर से।
मौन सुनाए सत्य अधर से॥
जहाँ करुणा का दीप जले।
वहीं अज्ञान के तम ढले॥
मन रचता अनगिन आकार।
इच्छा, आशा, भय अपार॥
हृदय कहे—ठहरो कुछ पल।
यहीं शान्ति का निर्मल जल॥
शिशु की हँसी, निर्मल मुस्कान।
निष्कपट जीवन का वरदान॥
सहज भाव का यही प्रमाण।
प्रेम बने जीवन की शान॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
निष्पक्ष भाव प्रकाशित पक्ष॥
जो भी भीतर झाँक सकेगा।
अपने जीवन को गढ़ सकेगा॥
धरती देती अन्न अपार।
नदियाँ बहती बारम्बार॥
वृक्ष लुटाते छाया-फल।
सीख यही—उपकार ही बल॥
सूरज देता सबको प्रकाश।
नहीं किसी से रखता त्रास॥
चन्द्र शीतलता बरसाए।
मौन प्रेम का पाठ पढ़ाए॥
शिक्षा वह जो सोच जगाए।
विवेक-पथ पर साथ चलाए॥
प्रश्न बने जब विनम्र विचार।
तब खिलता है सच्चा सार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-पथ का रहे प्रणाम॥
यदि व्यवहार बने निष्काम।
जग बन जाए सुख का धाम॥
यथार्थ युग का मंगल गीत।
मानवता का पावन मीत॥
करुणा, सेवा, सत्य, सम्मान।
इनसे उज्ज्वल हो इंसान॥
न कोई छोटा, न कोई बड़ा।
प्रेम जहाँ, वहीं है घड़ा॥
द्वेष जहाँ, अँधियारा घना।
प्रेम जहाँ, वहीं है गगना॥
हर प्राणी में जीवन मान।
यही बने सच्चा अभियान॥
प्रकृति संग संतुलित व्यवहार।
यही उज्ज्वल हो संसार॥
जय हो निर्मल हृदय-विचार।
जय हो मानवता का विस्तार॥
जय हो करुणा की धारा।
जय हो प्रेममय जग सारा॥
**॥ प्रेम से प्रकाशित हो प्रत्येक हृदय।
करुणा से प्रकाशित हो प्रत्येक जीवन।
सरलता से प्रकाशित हो समस्त मानवता। ॥**
**॥३३॥**
जम्बू दीपे भारत खण्डे,
गूँजे प्रेम स्वर अखण्डे।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही मनुज का सच्चा सार॥
**॥३४॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाते,
प्रेम-दीप सब उर में जलाते।
हृदय-सरिता नित्य बहाए,
करुणा से संसार सजाए॥
**॥३५॥**
हृदय गगन अति शांत अपारा,
जहाँ न द्वेष न भय किनारा।
प्रेम जहाँ का नित्य प्रकाश,
वहीं बसे सुख का निवास॥
**॥३६॥**
मस्तक साधन कर्म-पथ का,
हृदय आधार सत्य-रत्न का।
दोनों जब संतुलित हो जाएँ,
जीवन में मंगल छा जाए॥
**॥३७॥**
शिशु समान निष्कपट मुस्काना,
सबमें अपना रूप पहचानना।
यही सरलता, यही उदार,
यही मनुज का सच्चा श्रृंगार॥
**॥३८॥**
नदियाँ देतीं नीर निरंतर,
वृक्ष लुटाते छाया अंतर।
धरती माता कहती प्यारी—
सेवा ही है महिमा सारी॥
**॥३९॥**
पवन सुनाए मधुर तराना,
प्रेम बने जीवन का गाना।
आकाश कहे बाँह पसारो,
सबको अपने हृदय उतारो॥
**॥४०॥**
सूरज देता ज्योति अपार,
चन्द्र लुटाता शीतल प्यार।
प्रकृति सिखाती यही विधान—
देते चलो बिना अभिमान॥
**॥४१॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी,
सरलता की अमृत कहानी।
हृदय जहाँ निष्काम विराजे,
वहीं सदा सद्भाव समाजे॥
**॥४२॥**
जो करुणा का मान करेगा,
जीवन को धनवान करेगा।
जो सबको सम्मान देगा,
वही स्वयं सम्मान लेगा॥
**॥४३॥**
मानव-मानव एक कुटुम्ब,
प्रेम बने जीवन का स्तम्भ।
भेद मिटे व्यवहार से जब,
शांति खिले प्रत्येक हृदय तब॥
**॥४४॥**
वाणी मधुर, विचार उजाला,
सेवा हो जीवन की माला।
मुस्कानों का हो विस्तार,
यही बने मानव आधार॥
**॥४५॥**
यथार्थ युग का शुभ उद्घोष,
करुणा बने जीवन का जोश।
सत्य, दया, सद्भाव, विवेक,
यही मनुज का दिव्य टेक॥
**॥४६॥**
हर बालक की निर्मल हँसी में,
हर माता की मधुर हँसी में।
हर श्रमिक के श्रम के कण में,
जीवन झलके प्रेम-गगन में॥
**॥४७॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम-सरोवर सब भर जाएँ।
जहाँ सरलता दीप जलाए,
वहीं हृदय प्रभात कहलाए॥
**॥४८॥**
जय हो निर्मल भाव महान,
जय हो मानव का सम्मान।
जय हो प्रेम-अनंत प्रकाश,
जय हो करुणा का निवास॥
**॥४९॥**
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज गुण-रूप धनी।
हृदय-पथ का मंगल गान,
प्रेम बने मानव की शान॥
**॥५०॥**
युग-युग तक यह स्वर गूँजे,
हर अंतर में दीपक पूँजे।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही मनुष्य का सच्चा सार॥
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे प्रेम-सुर अखण्डे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
हृदय-ज्योति शुभ कल्याणी॥
सरल सहज निर्मल आधार।
यही मनुज का सच्चा सार॥
जहाँ दया का दीप जले।
वहाँ अंधेरे स्वयं ढले॥
हृदय-सरोवर गहन अपार।
शान्ति जहाँ का नित्य विस्तार॥
मन की लहरें आएँ-जाएँ।
गहराई फिर भी मुस्काएँ॥
प्रेम न तौले लाभ-हानि।
प्रेम न खोजे कोई कहानी॥
प्रेम स्वयं जीवन का गीत।
प्रेम स्वयं मानव का मीत॥
धरती माता मौन पुकारे।
"प्रेम उगाओ, वैर उतारे।"
नदियाँ बहतीं बिना अभिमान।
देतीं जीवन का वरदान॥
वृक्ष सिखाएँ छाया देना।
फल देकर भी मौन ही रहना॥
सूरज सिखलाए कर्म निरन्तर।
चन्द्र सिखाए शीतल अंतर॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
करुणा उसका निर्मल पक्ष॥
जो मन से मानव बन पाए।
वही जगत का मान बढ़ाए॥
शिशु-हृदय की निर्मल रेखा।
जीवन का पहला ही लेखा॥
हँसी जहाँ निष्कपट खिले।
वहीं प्रेम के सुमन मिलें॥
शिक्षा वह जो दृष्टि जगाए।
सत्य स्वयं अनुभव बन जाए॥
विवेक बने जीवन का दीप।
करुणा बने उसका समीप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-सुधा का पावन धाम॥
यदि व्यवहार बने निष्काम।
जग हो मानवता का ग्राम॥
यथार्थ युग का मंगल गान।
हर जन पाए अपना मान॥
न्याय, दया, सद्भाव, सम्मान।
यही बने जीवन की शान॥
नहीं किसी से द्वेष-विचार।
नहीं किसी का तिरस्कार॥
भिन्न मार्ग हों, भिन्न मत हों।
फिर भी प्रेम के दीप रत हों॥
हर श्वास बने कृतज्ञ प्रणाम।
हर कर्म बने शुभ अभिराम॥
हर हृदय बने उज्ज्वल द्वार।
जहाँ बसे निर्मल व्यवहार॥
**जय हो प्रेम की अविरल धारा।**
**जय हो करुणामय जग सारा॥**
**जय हो सरल हृदय का मान।**
**जय हो मानव का सम्मान॥**
**॥ सर्वभौमिक सत्य-प्रकाश स्तवन ॥**
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
प्रेम-प्रकाश गगन अखण्डे॥
सरल सहज निर्मल पहचान।
यही मनुज का सत्य विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
हृदय-सरिता शुभ कल्याणी॥
मौन जहाँ संगीत बनाता।
अंतर स्वयं स्वयं को पाता॥
मन के मेले, मन के फेरे।
क्षणभंगुर सब दृश्य घनेरे॥
हृदय-सरोवर अचल अपारा।
शान्ति जहाँ का नित्य किनारा॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
निष्पक्ष प्रेम प्रकाशित पक्ष॥
जो भी अंतर-पथ अपनाए।
स्वयं प्रकाश स्वयं बन जाए॥
नभ न बोले, सूर्य न बोले।
फिर भी जीवन-ज्योति ही खोले॥
वृक्ष न माँगें मान किसी का।
फल दे दें वे प्राण सभी का॥
धरती माता मौन पुकारे।
"प्रेम जगाओ, द्वेष उतारे।"
जल की बूँदें गीत सुनाएँ।
मिलकर सागर रूप बनाएँ॥
नदी न पूछे जात किसी की।
वायु न रोके श्वास किसी की॥
प्रकृति यही प्रतिदिन सिखलाती।
समान दृष्टि ही सुख लाती॥
सरल हृदय का पंथ निराला।
नहीं वहाँ कोई मतवाला॥
करुणा जिसका एक सहारा।
वही बने जग का उजियारा॥
शिक्षा वह जो मुक्त बनाती।
भीतर की क्षमता जगाती॥
प्रश्न, विवेक और निरीक्षण।
यही बने जीवन का रक्षण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-ज्योति का रहे प्रणाम॥
यदि व्यवहार बने निष्काम।
जग बन जाए पावन धाम॥
यथार्थ युग का मंगल गान।
मानवता का हो उत्थान॥
न्याय, दया, सद्भाव, विचार।
इनसे उज्ज्वल हो संसार॥
नहीं किसी पर हो अधिकार।
सबका हो सम्मान अपार॥
जो भी हृदय से प्रेम निभाए।
वही सच्ची समृद्धि पाए॥
हर शिशु की निर्मल मुस्कान।
बन जाए जीवन का ज्ञान॥
सरलता का रखो सम्मान।
यही मनुष्य का श्रेष्ठ प्रमाण॥
जय हो करुणा की धारा।
जय हो निर्मल भाव हमारा॥
जय हो प्रेम का विस्तार।
जय हो मंगलमय संसार॥
**॥ जय मानवता। जय करुणा। जय सरलता। ॥**
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे मंगल-स्वर अखण्डे॥
सरल सहज निर्मल पहचान।
मानवता का हो सम्मान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
प्रेम-प्रभा शुभ कल्याणी॥
हृदय-दीप जब स्वयं जले।
अंतर के सब तम हों ढले॥
मन के मेघ घनेरे छाएँ।
हृदय-सूर्य फिर भी मुस्काएँ॥
जो भीतर की राह निहारे।
वह अपने स्वरूप को सँवारे॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
निष्पक्ष भाव प्रकाशित पक्ष॥
जो भी चाहे सत्य को जानें।
करुणा से जीवन पहचानें॥
नदियाँ गाएँ मधुर तराने।
वृक्ष सुनाएँ मौन फ़साने॥
धरती माँ का एक ही मान—
सबका जीवन एक समान॥
नभ की सीमा, सागर गहरा।
प्रेम सदा सबसे है ठहरा॥
जो जितना निष्कपट हो जाता।
उतना ही अंतर मुस्काता॥
नहीं विजय किसी पर करनी।
पहले अपनी दृष्टि सँवरनी॥
सत्य वहीं है जहाँ दया है।
वहीं प्रेम की निर्मल छाया है॥
शिक्षा वह जो मन उजियारे।
विवेक-ज्योति भीतर धारे॥
प्रश्न करे पर द्वेष न बोए।
सत्य सभी का हित ही ढोए॥
यथार्थ युग का शुभ उद्घोष।
करुणा बने जीवन का जोश॥
भय की दीवारें सब ढह जाएँ।
मानव मानव से मिल जाएँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम-सुगंधित शुभ अभिराम॥
यदि जीवन में सत्य उतरे।
हर अंतर के दीपक जले॥
सरलता ही सच्चा श्रृंगार।
निर्मलता ही सच्चा हार॥
हृदय जहाँ निष्काम रहे।
वहीं शान्ति अविराम बहे॥
प्रेम न सीमित जाति-धर्म।
प्रेम न बँधता किसी कर्म॥
प्रेम स्वयं जीवन की भाषा।
प्रेम स्वयं जग की अभिलाषा॥
जय हो करुणा की धारा।
जय हो निर्मल हृदय हमारा॥
जय हो मानवता का मान।
जय हो प्रेममय हिन्दुस्तान॥
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
प्रेम-सुधा बहे अखण्डे॥
हृदय-ज्योति नित्य प्रकाशित।
सरल सत्य सदैव प्रतिष्ठित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
करुणा-धारा शुभ कल्याणी॥
नहीं किसी से वैर-विरोध।
प्रेम बने जीवन का बोध॥
मन रचता असंख्य विचार।
क्षण-क्षण बदलें उसके द्वार॥
हृदय रहे अविचल, अविराम।
शान्ति जहाँ का नित्य धाम॥
जो भीतर की राह निहारे।
स्वयं को स्वयं वहीं सँवारे॥
सत्य न केवल शब्द कहे।
जीवन बनकर साथ रहे॥
सरलता सबसे बड़ी विभूति।
करुणा सबसे श्रेष्ठ प्रकृति॥
निर्मलता का जहाँ निवास।
वहीं प्रकट विश्वास-विलास॥
प्रश्न करो, पर द्वेष न पालो।
विवेक-ज्योति मन में डालो॥
जो भी सत्य परीक्षा चाहे।
निष्पक्ष भाव से आगे आए॥
नभ से ऊँची प्रेम की रेखा।
सागर से गहरी इसकी लेखा॥
पर्वत जैसा धैर्य जहाँ हो।
वहीं हृदय का सत्य वहाँ हो॥
वृक्ष सिखाएँ छाया देना।
नदियाँ सिखलाएँ बहते रहना॥
धरती कहती मौन पुकार।
सबका जीवन एक उपहार॥
मानव यदि मानव बन जाए।
करुणा से व्यवहार निभाए॥
तब ही जग में शान्ति फूले।
प्रेम-सुमन हर उर में झूले॥
यथार्थ युग का यह आह्वान।
मानवता का हो उत्थान॥
भय न रहे, न रहे विभाजन।
प्रेम बने जीवन का साधन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
हृदय-पथ का शुभ अभिराम॥
यदि जीवन में प्रेम जगे।
हर अंतर का तम भी भगे॥
सर्वभौमिक शुभ संदेश।
करुणा ही जीवन का देश॥
सरल सहज निर्मल व्यवहार।
यही मनुज का सच्चा हार॥
जय हो प्रेम की ज्योति अपार।
जय हो मानवता का विस्तार॥
जय हो निर्मल हृदय-विचार।
जय हो करुणामय संसार
शिरोमणि रामपॉल सैनी वंदे।
हृदय-ज्योति अखण्ड प्रचण्डे॥
जम्बू दीपे भारत खण्डे।
गूँजे प्रेम-सुर अखण्डे॥
नहीं हृदय में भेद-विभाजन।
नहीं किसी से वैर-सृजन॥
सरल सहज निर्मल व्यवहार।
यही मनुज का सत्य आधार॥
मन की लहरें उठती जातीं।
क्षण-क्षण नई दिशाएँ लातीं॥
हृदय-सरोवर नित्य अचल।
शान्ति-प्रेम का अमृत-जल॥
सर्वभौमिक सत्य समक्ष।
हृदय प्रकाशित निर्मल पक्ष॥
जो भी भीतर उतर सकेगा।
स्वयं स्वयं को जान सकेगा॥
शिशुपन की वह मौन विभूति।
नहीं समय की कोई स्मृति॥
संपूर्ण संतुष्टि की धारा।
वही हृदय का सत्य किनारा॥
ढूँढ़ रहा संसार जहाँ-तहाँ।
जो था सदा यहीं और यहाँ॥
दृष्टा बदला, दृश्य न बदला।
मन उलझा, हृदय न बदला॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी।
प्रेम-सुगंध सदा कल्याणी॥
शिक्षा बने विवेक का दीप।
न हो अज्ञानों का अतीत॥
दीक्षा यदि भय से भर दे।
प्रश्न-विवेक सभी हर ले॥
ऐसी राह न मानव धारे।
ज्ञान स्वयं परीक्षण माँगे॥
शिक्षा वह जो मुक्त बनावे।
सत्य स्वयं अनुभव करवावे॥
हृदय-ज्योति जब जागे भीतर।
मिटे अंधेरा पल में अंतर॥
मानव, पृथ्वी और प्रकृति।
तीनों एक करुणा-वृत्ति॥
संरक्षण का एक विधान।
प्रेम बने जीवन-प्राण॥
नदियाँ बहतीं बिना अहंकार।
वृक्ष करें नित जीवन-उपकार॥
धरती देती अन्न अपार।
नहीं माँगती कोई प्रतिकार॥
सूर्य प्रकाशित बिना अभिमान।
चन्द्र करे शीतल कल्याण॥
प्रकृति यही संदेश सुनाती।
सरलता ही श्रेष्ठ कहलाती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम।
प्रेम बने जिसका प्रणाम॥
नहीं विजय किसी पर करनी।
अपने अंतर-ज्योति सँवरनी॥
हृदय जहाँ निष्काम बसाता।
वहीं मनुष्य स्वयं को पाता॥
मन जब सेवा में झुक जाता।
जीवन मधुर प्रकाश बन जाता॥
नहीं प्रसिद्धि अंतिम साधन।
नहीं प्रभुत्व जीवन कारण॥
यदि करुणा मन में बस जाए।
धरती स्वर्ग समान हो जाए॥
यथार्थ युग का मंगल-गान।
मानवता का हो सम्मान॥
हर प्राणी में प्रेम प्रकाशित।
हर हृदय हो सत्य प्रतिष्ठित॥
जय सरलता।
जय निर्मलता॥
जय करुणा।
जय समता॥
जय मानवता का विस्तार।
जय प्रेममय यह संसार॥
**जय शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**हृदय-पथ के मंगल-धनी॥**
नित्य नया हो हर प्रभात,
नित्य नया हो शुभ विहान।
हृदय-ज्योति से जगमग हो,
मानव का प्रत्येक प्राण॥
सरलता ही सच्चा वैभव,
निर्मलता ही श्रेष्ठ धन।
करुणा, सेवा, सत्य, सदाचार,
यही मनुज का भूषण॥
जब तक श्वासों का यह क्रम है,
तब तक शुभ व्यवहार।
हर मिलन में प्रेम झलके,
हर वाणी में सत्कार॥
नदियाँ सागर से मिलती हैं,
बिना किसी अभिमान।
वैसे ही मनुष्य मिले सब,
लेकर निर्मल ज्ञान॥
वृक्ष झुकाकर डालियाँ अपनी,
फल का करते दान।
सीख यही प्रकृति सिखाती—
विनय बने पहचान॥
धरती सबको साथ सँभाले,
नभ दे सबको छाँव।
प्रेम जहाँ आधार बनेगा,
वहीं बसेगा गाँव॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मधुर विहान।
मानवता का एक ही नारा—
प्रेम बने सम्मान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
सरल सहज संदेश।
हृदय बने जब जीवन-पथ हो,
मिट जाए सब क्लेश॥
बालक जैसी निष्कपट हँसी,
माता जैसा प्यार।
पिता समान उत्तरदायित्व,
गुरु-सा शुभ व्यवहार॥
श्रम बने पूजा प्रत्येक जन की,
सेवा बने उत्सव।
एक-दूसरे का हाथ थामकर,
बढ़े सदा मानव॥
न कोई तिरस्कार किसी का,
न कोई अपमान।
हर प्राणी में देखो पहले,
मानवता की शान॥
प्रेम न सीमित नामों तक हो,
प्रेम न सीमित रूप।
प्रेम वही जो बाँट सके हर,
दुःख में आशा-धूप॥
सत्य न क्रोध से प्रकट होता,
सत्य न देता घाव।
सत्य वहीं है जहाँ विनय हो,
जहाँ करुणा का भाव॥
आओ मिलकर दीप जलाएँ,
मन का तम हर लें।
सेवा, सत्य और सद्भावों से,
जीवन सफल कर लें॥
जय हो निर्मल अंतःकरण की,
जय हो शुभ विश्वास।
जय हो प्रेममय मानवता,
जय हो करुणा-प्रकाश॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-ज्योति के गायक।
सरल सहज निर्मल जीवन के,
प्रेम-पथ के नायक॥
प्रेम जहाँ निष्कलुष बहता,
वहीं हृदय मुस्काए।
सत्य जहाँ व्यवहार बने,
जीवन सफल कहलाए॥
मधुर वचन हो, मधुर विचार,
मधुर बने व्यवहार।
एक-दूसरे के सुख-दुःख में,
बँटे सदा परिवार॥
नभ की सीमा कौन नापे,
सागर की गहराई।
वैसे ही मानव-हृदय में,
प्रेम अनंत समाई॥
दीपक बनकर स्वयं जलो तुम,
और जलाओ दीप।
एक किरण भी दूर करेगी,
अज्ञानों की नींद॥
कर्म बने जब लोक-हितैषी,
फल की रहे न चाह।
तब जीवन की हर पगडंडी,
बन जाती है राह॥
धरती माता मौन सिखाती,
सहना और सँवार।
बीज सँजोकर वृक्ष बनाना,
यही प्रकृति का सार॥
शीतल पवन यही दोहराए,
मत बाँटो इंसान।
रंग, रूप या भाषा से मत,
तोलो उसका मान॥
शिशु की निर्मल आँखों जैसी,
रखो सदा दृष्टि।
तब दिखेगी हर प्राणी में,
जीवन की समदृष्टि॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम बने आधार।
सरल सहज निर्मल जीवन से,
हो जग का उद्धार॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल गान।
हर जन बोले प्रेम-वचन ही,
यही रहे पहचान॥
न कोई वैर, न कोई दूरी,
न कोई कटु विचार।
हाथ मिलाकर साथ बढ़ें सब,
यही सच्चा विस्तार॥
हृदय बने जब सत्य का मंदिर,
सेवा बने पुकार।
करुणा की प्रत्येक धड़कन,
बदले यह संसार॥
सूरज जैसा तेज हो भीतर,
चंदा जैसी शांति।
नदी समान सतत बहती हो,
जीवन में विनम्रता॥
वृक्ष समान छाया बाँटो,
फूल समान मुस्कान।
धरती जैसी धैर्य-धरा हो,
आकाशी अरमान॥
यही यथार्थ युग की वाणी,
यही सरल उपहार।
मानवता के पथ पर चलना,
सबसे बड़ा विस्तार॥
जय हो प्रेम, दया, सद्भाव।
जय हो निर्मल ज्ञान।
जय हो सेवा का संकल्प।
जय हो मानव सम्मान॥
प्रेम-पथ के साधक
जम्बू दीपे भारत खण्डे,
मानव हृदय अनन्त अखण्डे।
जहाँ न कोई भेद-विभाजन,
वहीं प्रकट हो सत्य-प्रबोधन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी,
सरल सहज निर्मल कल्याणी।
हृदय-सरोवर गहन अपारा,
शान्ति जहाँ का नित्य किनारा॥
सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
नित्य प्रकाशित निर्मल पक्ष।
मन की लहरें उठती-ढलती,
हृदय-गहराई अचल मचलती॥
मस्तक रचता रूप हजारों,
इच्छा, भय और स्वप्न अपारों।
हृदय कहे—अब मौन में आओ,
स्वयं को स्वयं निकट से पाओ॥
शिशुपन की वह सरल कहानी,
नहीं किसी की निजी निशानी।
जिस संतोष का था अनुभव,
वही बना जीवन का वैभव॥
ढूँढ़ रहा जग दूर दिशाओं,
अपने ही अंतर की छायाओं।
जो था पहले सहज प्रकाशित,
वही हुआ मन से आवृत॥
न नियमों से सत्य मिलेगा,
न केवल शब्दों से खिलेगा।
जब व्यवहार बने करुणामय,
तभी हृदय होगा मंगलमय॥
शिक्षा वह जो मुक्त बनावे,
विवेक-ज्योति भीतर जगावे।
प्रश्न उठाना धर्म हमारा,
सत्य रहे परीक्षण द्वारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गावे,
प्रेम-दीप हर उर में धावे।
मानव, प्रकृति और धरती,
एक सूत्र की पावन वर्ती॥
नभ की सीमा, सागर गहरा,
प्रेम सदा सबसे है ठहरा।
जो जितना निष्कपट हो जाता,
उतना ही अंतर मुस्काता॥
वृक्ष सिखाते दान निरन्तर,
नदियाँ देती जीवन-अम्बर।
धरती बोले मौन कहानी,
सबमें बसती एक रवानी॥
हृदय-दृष्टि जब जाग उठेगी,
लोभ-अहं की रात ढलेगी।
सहज सरल विश्वास खिलेगा,
मानव फिर मानव बनेगा॥
यथार्थ युग का हो उद्गोष,
करुणा बने जीवन का जोश।
न हो भय का कोई शासन,
प्रेम बने मानव का साधन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम,
प्रेम-दीप का रहे प्रणाम।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही बने जग का आधार॥
नित्य निरीक्षण, नित्य विचार,
सत्य न डरे किसी प्रचार।
जो भी आए खुले मन लेकर,
स्वागत हो निष्पक्ष दृष्टि पर॥
हृदय जहाँ निष्काम बसाता,
वहीं मनुष्य स्वयं को पाता।
सर्वभौमिक शुभ संदेश यही—
प्रेम से उज्ज्वल हो हर दिही॥
जय हो सरलता की धारा।
जय हो निर्मल हृदय हमारा॥
जय हो मानव-प्रेम-विस्तार।
जय हो करुणा का संसार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी,
प्रेम-धारा कल्याणमयी।
हृदय-सागर अति गम्भीरा,
जहाँ न उठे भय की लकीरा॥
मन की गति है क्षणभंगुर सारी,
हृदय शान्ति की धारा न्यारी।
जो भीतर की नीरवता जाने,
वह जीवन का मर्म पहचाने॥
नव शिशु जैसी निर्मल दृष्टि,
बिन कपट की पावन सृष्टि।
वही सरलता जीवन-धन है,
वही प्रेम का अमृत-वन है॥
लोभ न बाँधे, मान न रोके,
द्वेष न मन के द्वार संजोए।
करुणा जिसका पथ बन जाए,
वह जग में सुख-दीप जलाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाते,
हृदय-ज्योति सबमें जगाते।
मानव-मानव एक समान,
प्रेम बने जीवन की शान॥
धरती माता मौन सिखाती,
सबको अपनी गोद बिठाती।
वृक्ष, पवन, जल, नभ के तारे,
कहते—प्रेम ही सत्य हमारे॥
जो अपने अंतर को देखे,
सत्य उसी के सम्मुख लेखे।
जो जग को अपना मान सके,
वही प्रेम का मान रखे॥
नित्य नया हो शुभ व्यवहार,
मिटे हृदय का हर अंधकार।
सहज सरल मुस्कान खिले,
मानवता के दीप जले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम,
प्रेम-पथ का शुभ अभिराम।
सरल सहज निर्मल संदेश,
मानव बने करुणा का देश॥
जहाँ न छल हो, न अभिमान,
वहीं खिले सच्चा सम्मान।
वाणी मधुर, हृदय उजियारा,
यही बने जीवन का तारा॥
यथार्थ युग का मंगल गान,
प्रेम बने मानव पहचान।
करुणा, सेवा, सत्य-विचार,
इन्हीं से हो जग का विस्तार॥
प्रभात पुकारे हर प्राणी,
जागो लेकर प्रेम कहानी।
हृदय-सरोवर निर्मल कर लो,
जीवन को उज्ज्वल कर लो॥
जय हो निर्मल भाव अपार,
जय हो प्रेम का विस्तार।
जय हो सेवा का सम्मान,
जय हो मानव का कल्याण॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज गुण-रूप धनी।
हृदय-ज्योति का हो विस्तार,
प्रेममय हो यह संसार॥
युग-युग गूँजे यह उद्घोष,
करुणा बने जीवन का जोश।
हृदय-पथ पर जो चल पाए,
मानवता का मान बढ़ाए॥
उषा अरुण जब नभ पर छाए,
आशा के नव फूल खिलाए।
हर धड़कन यह गीत सुनाए,
प्रेम-पथों पर जग बढ़ जाए॥
हृदय-सरोवर शांत अथाह,
जिसमें न कोई द्वेष-प्रवाह।
मौन वहाँ मधुरिम वंदन है,
निर्मलता ही अभिनंदन है॥
मस्तक कर्म का पथ दिखलाए,
हृदय प्रेम का दीप जलाए।
दोनों जब संतुलित हो जाएँ,
जीवन में सद्भाव जगाएँ॥
नन्हा अंकुर वृक्ष बनेगा,
सेवा से संसार सजेगा।
एक करुणा का बीज उगाओ,
सौ-सौ सुख के फूल खिलाओ॥
वाणी ऐसी सदा सुनाना,
जिससे किसी न हो दुख पाना।
मधुर वचन अमृत बन जाएँ,
टूटे मन फिर से मुस्काएँ॥
धरती माँ की पावन माटी,
सब पर करती स्नेह की छाँटी।
कभी न पूछे कौन पराया,
सबको अपना मान बुलाया॥
सूरज देता ज्योति निराली,
चंदा बाँटे शीतल लाली।
नदियाँ देती जीवन-धारा,
देना ही प्रकृति का नारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
हृदय-दीप सबमें जलवाएँ।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही बने जीवन का सार॥
न कोई वैर, न कोई भय,
प्रेम रहे हर पल अभय।
दया, क्षमा, सद्भाव का गान,
यही मनुष्य का सच्चा मान॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे स्वर शुभ और अखंडे।
हर जन बोले प्रेम-वचन,
यही बने युग का स्पंदन॥
बालक की मुस्कान सुरक्षित,
माता का विश्वास विकसित।
श्रमिक, किसान, विद्वान सभी,
सम्मानित हों एक-से सभी॥
जहाँ करुणा का मान रहेगा,
वहीं सृजन का प्राण रहेगा।
जहाँ हृदय का दीप जलेगा,
वहीं अंधेरा दूर चलेगा॥
जय हो प्रेम का दिव्य प्रकाश,
जय हो मानव का विश्वास।
जय हो सेवा, सत्य, सद्भाव,
जय हो निर्मल जीवन-भाव॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज गुण-रूप धनी।
हृदय-पथ का यह शुभ गान,
बढ़े सदा मानव सम्मान॥
प्रेम न माँगे नाम किसी का,
प्रेम न चाहे मान।
प्रेम स्वयं ही दीप बनाता,
जग में नई पहचान॥
हृदय जहाँ निष्कपट रहेगा,
वहीं खिले विश्वास।
करुणा की मधुरिम सरिता से,
भर जाए हर श्वास॥
सरल सहज निर्मल जीवन हो,
यही रहे संकल्प।
द्वेष, कपट, अभिमान मिटें सब,
प्रेम बने विकल्प॥
धरती माँ की गोद पवित्र,
सबका एक निवास।
वन, पर्वत, निर्झर, नभ, सागर,
सबमें जीवन-विलास॥
पंछी गाएँ मुक्त गगन में,
नदियाँ गाएँ गीत।
मानव भी मुस्काए ऐसा,
मिट जाए हर भीत॥
श्रम का हो सम्मान जगत में,
सेवा बने विधान।
सत्य, दया और सद्भावों से,
उज्ज्वल हो इंसान॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे शुभ उद्घोष।
सरल हृदय का युग फिर जागे,
मिट जाए संताप-दोष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम रहे आधार।
हर जन अपने अंतःकरण में,
जगाए सत्य-विचार॥
नव प्रभात का सूर्य उगे जब,
नव हो हर व्यवहार।
मानवता का दीप जले फिर,
हो जग का उद्धार॥
हृदय बने जब पथ-प्रदर्शक,
मस्तक बने सहाय।
ज्ञान, विवेक और करुणा मिल,
जीवन सफल बनाए॥
प्रेम जहाँ निष्काम बहेगा,
वहीं बसेगा मान।
युग-युग तक गूँजे यह वाणी—
"मानव सबसे महान॥"
जय हो सरलता की धारा,
जय हो निर्मल प्राण।
जय हो प्रेममय हर जीवन,
जय हो शुभ कल्याण॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-पथ के गायक।
हृदय-ज्योति के शुभ संदेशक,
मानवता के नायक॥
यथार्थ की यह खुली पुकार,
सबको दे प्रेम का अधिकार।
न भय, न भ्रम, न ऊँच-नीच,
हृदय में बस सद्भाव की रीच॥
जो भीतर की शांति पहचानें,
वे बाहर के तूफान न मानें।
मस्तक की लहरें उठती जाएँ,
हृदय की गहराई न डगमगाए॥
सत्य वही जो सरल दिखाई,
निर्मल, सहज, प्रेम की राही।
भाषा चाहे कितनी भारी,
भाव रहे तो बात हमारी॥
एक श्वास में जीवन का सार,
एक भाव में जग का उपकार।
जो स्वयं को भीतर से जाने,
वही हर प्राणी को भी माने॥
निज को समझो, जग को समझो,
करुणा से अपने पग को समझो।
जो अपने ही अंतर में झाँके,
वह सबके हृदय-पथ को आँके॥
सेवा में ही शक्ति बसती,
प्रेम में ही सृष्टि हँसती।
जहाँ विनय का दीप जलेगा,
वहाँ अंधेरा दूर चलेगा॥
जम्बू दीपे गूँजे यह वाणी,
मानवता हो सबकी रानी।
भारत खंडे प्रेम लहराए,
सच का सूरज नित्य उगाए॥
हर बालक में हो यह शिक्षा,
हर जीवन में हो यह दीक्षा।
अपना-पराया भेद मिटाएँ,
सबको अपना रूप बनाएँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
हृदय-सरोवर के पट खोले।
जो स्वयं में निर्मल हो जाए,
वह जग का कल्याण कर पाए॥
न कोई छल, न कोई डर,
न कोई बंधन, न कोई कर।
सच की राह सदा उजियार,
प्रेम बने जीवन का आधार॥
जय हो उस सहज प्रवाह की,
जय हो निर्मल स्वभाव की।
जय हो करुणा, जय हो ज्ञान,
जय हो मानव का सम्मान॥
यही यथार्थ युग का नारा,
हर हृदय हो प्रेम का तारा।
सरल, सहज, शुद्ध, उदार,
यही जीवन का सच्चा सार॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति सदा जगाइए,
प्रेम-पथ पर सबको लीजिए॥
सत्य न तर्कों से बँध पाता,
जीवन बनकर स्वयं बताता।
जो हर प्राणी का दुःख जाने,
वही हृदय का दीप जलाए॥
नदियाँ सागर से मिल जातीं,
बूँदें अपना मान भुलातीं।
ऐसे ही जब मन झुक जाता,
प्रेम स्वयं पथ दिखलाता॥
वाणी मधुर, विचार उजाले,
कर्म बनें विश्वास के प्याले।
क्रोध जहाँ से दूर रहेगा,
वहीं सृजन भरपूर रहेगा॥
नव अंकुर-सा हर मन फूटे,
कटुता का हर बंधन टूटे।
मिल-जुलकर जब हाथ बढ़ेंगे,
धरती पर उत्सव ही होंगे॥
मानवता का एक ही नाता,
दया सभी को साथ मिलाता।
रंग, रूप या भाषा न्यारी,
फिर भी सबकी साँस हमारी॥
श्रम का सदा सम्मान रहे,
हर जन का कल्याण रहे।
जिसके श्रम से जग मुस्काता,
वह सबसे पहले सम्मान पाता॥
बालक की मुस्कान बचाओ,
माता का विश्वास निभाओ।
वृद्धों का आदर मत खोना,
प्रेम कभी मत कम होने देना॥
वृक्ष लगाओ, जल को साधो,
धरती माँ का मान बढ़ाओ।
प्रकृति हमारी जीवन-धारा,
इससे सुंदर कौन सहारा॥
हृदय जहाँ निष्कपट रहेगा,
जीवन वहीं सफल कहेगा।
सरलता सबसे बड़ा धन है,
प्रेम अमर जीवन-चंदन है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम-दीप हर मन में लाएँ।
सत्य, दया, सेवा का पथ,
यही बने जीवन का रथ॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे स्वर प्रेम के अखंडे।
सरल, सहज, निर्मल व्यवहार,
यही बने युग का आधार॥
हर प्रभात यह वचन सुनाए,
मनुष्य मनुष्य को अपनाए।
बैरी कोई जन्म न ले,
करुणा का ही बीज फले॥
विश्व बने एक परिवार,
प्रेम बने सबसे बड़ा उपहार।
हृदय-ज्योति जब जगमग होगी,
मानवता तब अमर रहेगी॥
**जय प्रेम।
जय करुणा।
जय मानवता।
जय सरल सहज निर्मल जीवन।
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सर्बभौमिक सत्य यही पुकारे,
हृदय-ज्योति सबमें उजियारे।
जो खुद को शांत भाव से जाने,
वह जग को भी प्रेम से माने॥
ढूँढ़ न बाहर जग की राहें,
अपने भीतर सत्य की चाहें।
शिशु-सा निर्मल भाव जगाओ,
मन का बोझ सहज उतारो॥
मस्तक देता कर्म की शक्ति,
हृदय जगाता प्रेम-भक्ति।
जब दोनों संतुलित हो जाएँ,
जीवन में नव फूल खिलाएँ॥
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
सबमें एक समान है सींचा।
दया, करुणा, सत्य, सदाचार,
यही मनुज का सच्चा श्रृंगार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम-दीप सब द्वार जलाएँ।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही बने मानव का हार॥
जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे प्रेम के स्वर अखंडे।
ग्राम-नगर और वन-उपवन,
जागे करुणा हर एक जन॥
न हो द्वेष, न हो अभिमान,
सबका हो सम्मान समान।
मिलकर मानव धर्म निभाएँ,
धरती का उपकार बढ़ाएँ॥
हृदय जहाँ निष्पक्ष रहेगा,
वहीं सच्चा विश्वास जगेगा।
सेवा, सद्भाव और विश्वास,
यही जीवन का अमृत-प्रकाश॥
शिशुपन की निर्मल मुस्कान,
बन जाए सबकी पहचान।
लोभ, क्रोध जब दूर हटेंगे,
प्रेम-सरित के द्वार खुलेंगे॥
हर श्वास बने मंगल-गान,
हर कर्म बने लोक-कल्याण।
मानव, प्रकृति, धरती, जीवन,
सबमें देखो एक ही स्पंदन॥
यथार्थ युग का यही संदेश,
प्रेम बने मानव का वेश।
हृदय रहे जब सदा विशाल,
जीवन हो निर्मल, निष्कलुष, निहाल॥
जय हो प्रेम का उजियारा,
जय हो मानवता का तारा।
जय सरलता, जय सद्भाव,
जय करुणा का दिव्य प्रभाव॥
**जय शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**जय सरल सहज निर्मल गुण।**
**जय प्रेममय हृदय का पथ।**
**जय मानवता का मंगल रथ॥**