## **जहाँ भीतर की शांति बाहर के व्यवहार की परीक्षा बनती है**
### **सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष**
यदि भीतर शांति है
तो उसकी पहली परीक्षा
मौन में नहीं—
**व्यवहार में है।**
जिससे कोई लाभ नहीं मिलेगा,
उसके साथ कैसा व्यवहार है?
जो तुम्हारी प्रशंसा नहीं करता,
उसके प्रति तुम्हारा मन कैसा है?
जो तुमसे असहमत है,
उसके अस्तित्व के लिए
तुम्हारे भीतर कितना स्थान है?
जो तुमसे कमजोर है,
उसकी कमजोरी तुम्हारे लिए
अवसर बनती है या जिम्मेदारी?
और जो तुम्हारे सामने
तुम्हारी ही भूल दिखा दे—
क्या तुम उसे
शत्रु बना देते हो?
यहीं—
**साक्षात्कार की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।**
---
# **हृदय की गहराई और व्यवहार की ऊँचाई**
हृदय की गहराई में उतरना
सिर्फ़ भीतर सुख अनुभव करना नहीं।
यदि भीतर की अनुभूति
बाहर करुणा नहीं बनती,
तो उसे फिर देखना आवश्यक है।
यदि प्रेम
अधिकार बन जाए—
वह प्रेम नहीं,
स्वामित्व हो सकता है।
यदि ज्ञान
दूसरे को छोटा बना दे—
वह ज्ञान नहीं,
अहंकार का उपकरण हो सकता है।
यदि धर्म
भय पैदा करे—
वह आस्था से अधिक
नियंत्रण का माध्यम बन सकता है।
यदि गुरु
स्वतंत्र प्रश्न से डर जाए—
तो शिष्य की स्वतंत्रता
पहले ही कमजोर हो चुकी है।
इसलिए—
> **भीतर की अवस्था को
> बाहर के आचरण से परखो।**
---
# **शिरोमणि सूत्र**
**जो प्रेम करता है—
वह दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करेगा।**
**जो करुणावान है—
वह दूसरे की कमजोरी का व्यापार नहीं करेगा।**
**जो ज्ञानी है—
वह प्रश्न से भयभीत नहीं होगा।**
**जो निष्पक्ष है—
वह अपने पक्ष की भी जाँच करेगा।**
**जो स्वतंत्र है—
वह दूसरों को भी स्वतंत्र रहने देगा।**
**जो साक्षात्कार में है—
वह अपने बारे में बने भ्रमों को भी देखने का साहस रखेगा।**
---
# **संपूर्ण संतुष्टि का नया अर्थ**
संपूर्ण संतुष्टि
यह नहीं कि—
मुझे संसार से कुछ चाहिए ही नहीं।
बल्कि यह समझ भी हो सकती है कि—
**मेरी हर इच्छा पूरी होना
मेरी स्वतंत्रता का प्रमाण नहीं।**
कभी इच्छा पूरी होकर भी
नई इच्छा पैदा होती है।
कभी उपलब्धि के बाद
अगली उपलब्धि की भूख बढ़ती है।
कभी प्रशंसा के बाद
और अधिक प्रशंसा चाहिए।
कभी धन के बाद
और अधिक सुरक्षा चाहिए।
कभी प्रसिद्धि के बाद
प्रसिद्धि खोने का भय पैदा होता है।
इसलिए—
**इच्छा पूरी होने और संतुष्टि होने में
अंतर है।**
यही अंतर
मस्तक की अंतहीन दौड़ और
जीवन की वास्तविक तृप्ति के बीच
समझना आवश्यक है।
---
# **खुशी और संतोष**
खुशी
किसी घटना से उत्पन्न हो सकती है।
संतोष
किसी घटना की अनुपस्थिति में भी
जीवित रह सकता है।
खुशी—
प्रशंसा से।
उपलब्धि से।
धन से।
संबंध से।
इंद्रिय-अनुभव से।
मनोरंजन से।
पर संतोष का प्रश्न अलग है—
**जब कोई मुझे कुछ नहीं दे रहा,
तब मैं अपने भीतर कैसा हूँ?**
यही प्रश्न
मनुष्य को बाहरी निर्भरता से
भीतर की जिम्मेदारी की ओर ले जाता है।
---
# **प्रेम का सबसे कठिन रूप**
प्रेम का सबसे कठिन रूप
किसी प्रिय व्यक्ति को पकड़कर रखना नहीं।
कभी-कभी—
**उसे उसकी स्वतंत्रता में स्वीकार करना है।**
उसकी अपनी पसंद है।
उसकी अपनी सीमाएँ हैं।
उसकी अपनी यात्रा है।
उसकी अपनी भूलें हैं।
उसका अपना निर्णय है।
यदि प्रेम के नाम पर
उसकी स्वतंत्रता छीन ली—
तो प्रेम की भाषा में
स्वामित्व प्रवेश कर गया।
इसलिए—
> **प्रेम का हाथ पकड़ सकता है,
> पर गला नहीं।**
> **प्रेम साथ चल सकता है,
> पर रास्ता जबरन नहीं चुन सकता।**
---
# **मानव सभ्यता की सबसे पुरानी भूल**
मनुष्य ने
दूसरे मनुष्य को बदलने का
अत्यधिक प्रयास किया।
कभी भय से।
कभी दंड से।
कभी पुरस्कार से।
कभी प्रतिष्ठा से।
कभी धर्म से।
कभी विचारधारा से।
कभी समूह की स्वीकृति से।
कभी सामाजिक बहिष्कार से।
पर एक अधिक गहरा उपाय है—
**मनुष्य को समझने की स्वतंत्रता देना।**
जिसे स्वयं देखने दिया जाता है
वह स्वयं बदल सकता है।
जिसे केवल आदेश दिया जाता है
वह या तो डरता है
या विद्रोह करता है।
इसलिए—
**यथार्थ शिक्षा
आदेश से अधिक निरीक्षण सिखाती है।**
---
# **शिक्षक का वास्तविक धर्म**
श्रेष्ठ शिक्षक वह नहीं
जिसके हजारों अनुयायी हों।
श्रेष्ठ शिक्षक वह है
जिसके पास से निकलकर
विद्यार्थी अपने पैरों पर खड़ा हो सके।
श्रेष्ठ शिक्षक कहे—
“मुझे भी जाँचो।”
“मेरी बात का प्रमाण देखो।”
“जहाँ मैं गलत हूँ,
मुझे बताओ।”
“तुम्हारी स्वतंत्र समझ
मेरी प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण है।”
यहीं शिक्षा
व्यक्ति-पूजा से बचती है।
---
# **यथार्थ युग का गुरु-शिष्य सूत्र**
गुरु—
**दिशा दे।**
शिष्य—
**देखे।**
गुरु—
**प्रश्न स्वीकार करे।**
शिष्य—
**जाँच करे।**
गुरु—
**निर्भरता न बनाए।**
शिष्य—
**स्वतंत्र बने।**
और जब शिष्य
स्वतंत्र होकर खड़ा हो जाए—
तो शिक्षा सफल है।
---
# **मस्तक को हराना नहीं, समझना है**
मस्तक में
कल्पना है।
योजना है।
भाषा है।
गणना है।
स्मृति है।
विश्लेषण है।
भविष्य की तैयारी है।
समस्या-समाधान है।
इसलिए मस्तक को
शत्रु घोषित करना
स्वयं की एक महत्वपूर्ण क्षमता को
नकारना भी हो सकता है।
प्रश्न यह नहीं—
**मस्तक रहे या न रहे?**
प्रश्न है—
**मस्तक किसका साधन बने?**
लोभ का?
भय का?
प्रभुत्व का?
या—
जीवन, विवेक, करुणा और संरक्षण का?
यहीं से
मस्तक और हृदय के बीच
संघर्ष के स्थान पर
सहयोग की संभावना पैदा होती है।
---
# **हृदय और मस्तक का समन्वय**
हृदय कहे—
“दूसरे को चोट मत पहुँचाओ।”
मस्तक पूछे—
“इसे व्यवहार में कैसे लागू करें?”
हृदय कहे—
“प्रकृति का सम्मान करो।”
मस्तक पूछे—
“जल, ऊर्जा और संसाधनों का उपयोग कैसे बदलें?”
हृदय कहे—
“कमजोर का शोषण मत करो।”
मस्तक पूछे—
“ऐसी व्यवस्था कैसे बने जिसमें शोषण की संभावना घटे?”
यही—
**भावना से नीति तक का मार्ग है।**
और यही मार्ग
किसी भी युग-परिवर्तन को
व्यावहारिक बना सकता है।
---
# **यथार्थ युग केवल अनुभूति नहीं**
यदि यथार्थ युग
केवल शब्दों में है—
तो वह विचार है।
यदि केवल अनुभूति में है—
तो वह व्यक्तिगत अनुभव है।
यदि वह व्यवहार में उतरता है—
तो संस्कृति बनता है।
यदि संस्थाओं में उतरता है—
तो व्यवस्था बनता है।
यदि शिक्षा में उतरता है—
तो पीढ़ियाँ बदल सकता है।
यदि प्रकृति-संरक्षण में उतरता है—
तो भविष्य सुरक्षित कर सकता है।
इसलिए—
> **युग बदलने का पहला प्रमाण
> भाषा नहीं, व्यवहार है।**
---
# **सर्वभौमिकता की अग्निपरीक्षा**
यदि कोई सिद्धांत
सर्वभौमिक है,
तो वह केवल
अपने समर्थकों के लिए अच्छा नहीं होना चाहिए।
उसका मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए—
कमजोर व्यक्ति के लिए क्या?
असहमत व्यक्ति के लिए क्या?
अल्पसंख्यक विचार वाले व्यक्ति के लिए क्या?
बच्चे के लिए क्या?
बुजुर्ग के लिए क्या?
प्रकृति के लिए क्या?
भविष्य की पीढ़ी के लिए क्या?
और—
**उस व्यक्ति के लिए क्या
जो उस सिद्धांत को स्वीकार ही नहीं करता?**
यदि उसके लिए भी
गरिमा और स्वतंत्रता बची रहती है—
तो सिद्धांत की नैतिक शक्ति
और गहरी होती है।
---
# **शिरोमणि रामपॉल सैनी — निष्पक्षता का महाश्लोक**
निज पक्ष देखो, पर पक्षपात मत पालो,
अपना दोष देखो, केवल परदोष न टालो।
जो सत्य तुम्हें प्रिय, उसे भी परखना,
जो सत्य अप्रिय, उससे भी न डरना॥
निंदा में सीखो, प्रशंसा में संभलो,
विजय में विनम्र, पराजय में निखरो।
जिसने तुम्हें रोका, उससे भी पूछो—
मेरे भीतर क्या था, जिसे तुमने देखा?
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** नाम रहे,
पर नाम से पहले कर्म कहे।
वाणी से पहले आचरण बोले,
मानवता के दीप निरंतर डोले॥
---
# **प्रकृति का महाश्लोक**
वृक्ष न पूछे कौन यहाँ आया,
नदी न पूछे किसने जल पाया।
वायु न बाँटे जाति और भाषा,
धरती न रखे किसी से आशा॥
प्रकृति देती अपने नियमों से,
चलती अपनी प्रक्रियाओं से।
मनुष्य यदि संतुलन भूल गया,
तो अपना ही आधार छूट गया॥
जल बचाओ, मिट्टी सँवारो,
वन और जीवों को मत मारो।
भविष्य कोई दूर कहानी नहीं,
आज की जिम्मेदारी यहीं॥
---
# **शिशुपन से परिपक्वता तक**
शिशुपन में—
जिज्ञासा।
युवावस्था में—
आकांक्षा।
परिपक्वता में—
विवेक।
और गहराई में—
**जिज्ञासा + विवेक + करुणा + जिम्मेदारी।**
इसलिए वापस शिशु बनना
शरीर की अवस्था में लौटना नहीं।
बल्कि—
**शिशु की जिज्ञासा को
वयस्क की समझ के साथ
फिर से जीवित करना है।**
---
# **एक अत्यंत सूक्ष्म भ्रम**
मनुष्य सोचता है—
“मैं अपनी कहानी हूँ।”
पर कहानी बदलती रहती है।
आज मैं सफल हूँ।
कल असफल।
आज प्रिय हूँ।
कल अकेला।
आज शक्तिशाली।
कल निर्भर।
आज युवा।
कल वृद्ध।
तो—
**कहानी को देखना और
कहानी बन जाना—
दो अलग अवस्थाएँ हैं।**
जो अपनी कहानी को देख सकता है
वह कहानी को संशोधित भी कर सकता है।
यही परिवर्तन की संभावना है।
---
# **अंतिम महागान — स्वयं से समाज तक**
जम्बू दीपे भारत खण्डे,
हृदय रहें निर्मल अखण्डे।
मस्तक बने विवेक का दीप,
मानवता हो जीवन-सीप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी पुकारे—
निज भीतर के भ्रम को निहारे।
दूसरियों पर दोष न डाले,
पहले अपने मन को संभाले॥
न सत्ता सत्य का रूप बने,
न भीड़ विवेक को चुप कराए।
न गुरु प्रश्नों से भय खाए,
न शिष्य स्वतंत्रता से घबराए॥
प्रेम रहे पर अधिकार न हो,
ज्ञान रहे पर अहंकार न हो।
धर्म रहे तो करुणा बने,
विज्ञान रहे तो विनम्रता बने॥
शिक्षा ऐसी ज्योति जलाए,
जो हर मनुष्य को स्वयं चलाए।
किसी की छाया में जीवन नहीं,
स्वतंत्र विवेक ही सच्ची धनी॥
धरती अपनी, जल भी अपना,
वन भी अपना, जीव भी अपना।
सृष्टि को केवल साधन मत मानो,
जीवन का साझा आधार जानो॥
---
# **महासूत्र**
**स्वयं को जानना—
अपने बारे में बनी हर कहानी को
सत्य मान लेना नहीं।**
**स्वयं को जानना—
कहानी को कहानी की तरह
देखने की क्षमता विकसित करना है।**
**प्रेम करना—
दूसरे को अपना बनाना नहीं।**
**प्रेम करना—
दूसरे को उसके अस्तित्व सहित
स्वीकार करना है।**
**स्वतंत्र होना—
जो मन करे वह करना नहीं।**
**स्वतंत्र होना—
अपने चुनाव की जिम्मेदारी उठाना है।**
**निष्पक्ष होना—
किसी पक्ष में न होना नहीं।**
**निष्पक्ष होना—
अपने पक्ष को भी जाँचने योग्य रखना है।**
**यथार्थ युग—
किसी घोषणा से नहीं आता।**
**यथार्थ युग—
छोटे-छोटे व्यवहारों में
प्रतिदिन निर्मित होता है।**
---
## **अंतिम श्लोक**
निज हृदय में दीप जलाओ,
मस्तक को भी सत्य सिखाओ।
भाव बने करुणा की धारा,
विवेक बने जीवन का तारा॥
शब्द नहीं बस कर्म प्रमाण,
प्रेम नहीं बस मधुर विधान।
स्वतंत्रता का मान रखो,
हर जीवित प्राणी का सम्मान रखो॥
जो समझे वह स्वयं परखे,
जो न समझे वह प्रश्न रखे।
सत्य यदि सत्य है वास्तव में,
परीक्षण से क्यों भय रखे?
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** नाम,
बने न किसी बंधन का धाम।
नाम रहे तो प्रेम जगाए,
विचार रहे तो स्वतंत्र बनाए॥
यही हो अंतिम आग्रह—
**किसी मनुष्य को
अपनी मानसिकता का कैदी मत बनाओ।**
न प्रेम के नाम पर।
न ज्ञान के नाम पर।
न धर्म के नाम पर।
न गुरु के नाम पर।
न परंपरा के नाम पर।
न अपनी श्रेष्ठता के नाम पर।
और सबसे अधिक—
**अपने ही मन के बनाए
अदृश्य कारागार में
स्वयं को बंद मत रखो।**
दरवाज़ा बाहर भी है।
दरवाज़ा भीतर भी है।
चाबी—
**निष्पक्ष निरीक्षण।**
दिशा—
**विवेक।**
ऊष्मा—
**करुणा।**
गति—
**स्वतंत्रता।**
और आधार—
**मानवता।**
यहीं से—
**साक्षात्कार
व्यक्ति से समाज तक पहुँचता है।**
और जब समाज में
स्वतंत्र मनुष्य,
करुणामय हृदय,
विवेकपूर्ण मस्तक
और उत्तरदायी व्यवहार
एक साथ दिखाई देने लगें—
तभी किसी नए युग का
सबसे विश्वसनीय आरंभ
कहा जा सकता है।
# **शिरोमणि रामपॉल सैनी — स्वयं के सामने स्वयं की अंतिम पारदर्शिता**
## **सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष**
मनुष्य ने संसार को जीतने के लिए
पहाड़ काटे,
समुद्र पार किए,
आकाश नापा,
अंतरिक्ष में पहुँचा,
सूक्ष्मतम कणों को खोजा—
पर एक प्रश्न अब भी उतना ही सरल है—
**जो यह सब देख रहा है,
वह अपने भीतर क्या देख रहा है?**
बाहर की दूरी
यंत्रों से मापी जा सकती है।
भीतर की दूरी
ईमानदारी से।
बाहर की जटिलता
विज्ञान समझ सकता है।
भीतर की जटिलता
स्व-निरीक्षण से खुलती है।
और इसी बिंदु पर—
**मस्तक की सारी बुद्धिमत्ता
हृदय की एक सरल ईमानदारी के सामने
अपनी सीमा पहचान सकती है।**
---
# **खुद का साक्षात्कार — कोई उपाधि नहीं**
खुद का साक्षात्कार
यह घोषणा नहीं—
“मैं सबसे ऊपर हूँ।”
खुद का साक्षात्कार
यह देखना है—
**मैं अपने बारे में जो मानता हूँ,
उसमें कितना प्रत्यक्ष है
और कितना मेरे मन का बनाया हुआ है?**
मैं श्रेष्ठ हूँ—
क्यों?
मैं तुच्छ हूँ—
क्यों?
मैं सही हूँ—
किस प्रमाण पर?
वह गलत है—
किस आधार पर?
मैं दुखी हूँ—
दुख की घटना क्या है
और दुख की मेरी कहानी क्या है?
मैं प्रसन्न हूँ—
क्या प्रसन्नता परिस्थिति पर निर्भर है
या मेरी प्रतिक्रिया पर?
यही प्रश्न
मस्तक की परतों को
एक-एक करके पारदर्शी बनाते हैं।
---
# **“मेरा सत्य” और “सत्य”**
यह अंतर अत्यंत सूक्ष्म है।
मैं कह सकता हूँ—
**“मेरे अनुभव में यह सत्य है।”**
यह ईमानदार कथन है।
पर यदि मैं कह दूँ—
**“इसलिए यह पूरे अस्तित्व का अंतिम सत्य है,”**
तो मेरा व्यक्तिगत अनुभव
एक सार्वभौमिक दावा बन गया।
यहीं से
निष्पक्षता की अगली परीक्षा शुरू होती है।
इसलिए—
> **अनुभव का सम्मान करो,
> पर अनुभव को प्रमाण से बड़ा मत बनाओ।**
> **अपनी अनुभूति को नकारो मत,
> पर उसे दूसरों पर थोपो भी मत।**
> **अपने निष्कर्ष को जियो,
> और उसके परिणामों को भी देखो।**
यही जीवित यथार्थ है।
---
# **शिरोमणि रामपॉल सैनी का निष्पक्ष सूत्र**
**जो मैं अनुभव करता हूँ—
वह मेरे लिए महत्वपूर्ण है।**
**जो दूसरा अनुभव करता है—
वह उसके लिए महत्वपूर्ण है।**
**दोनों अनुभवों के बीच सत्य क्या है—
यह जानने के लिए संवाद चाहिए।**
और जहाँ संवाद समाप्त—
वहाँ अक्सर
मान्यता शासन करने लगती है।
इसलिए—
**सत्य को बचाने के लिए
सत्य पर अधिकार मत करो।**
---
# **हृदय की गहराई में एक और उतरना**
हृदय को केवल
शांति का स्थान मान लेना भी पर्याप्त नहीं।
कभी हृदय में प्रेम है।
कभी पीड़ा।
कभी करुणा।
कभी भय।
कभी लगाव।
कभी टूटन।
मानव अनुभव एक ही रंग का नहीं।
इसलिए हृदय की गहराई का अर्थ
केवल सुखद अनुभव नहीं।
बल्कि—
**जो अनुभव उपस्थित है,
उसे बिना झूठ बोले देखना।**
रोना आए—
रोना भी अनुभव है।
दुख आए—
दुख भी अनुभव है।
प्रेम आए—
प्रेम भी अनुभव है।
भय आए—
भय भी अनुभव है।
फिर प्रश्न—
**मैं इस अनुभव के साथ क्या कर रहा हूँ?**
यहीं से
परिपक्वता जन्म लेती है।
---
# **भावना को सत्य का प्रमाण मत बनाओ**
क्रोध बहुत तीव्र हो सकता है।
पर तीव्रता
सत्य का प्रमाण नहीं।
भय बहुत वास्तविक लग सकता है।
पर भय
भविष्य का प्रमाण नहीं।
आकर्षण बहुत शक्तिशाली हो सकता है।
पर आकर्षण
संबंध की गुणवत्ता का प्रमाण नहीं।
प्रेम अत्यंत गहरा महसूस हो सकता है।
पर प्रेम का दावा
व्यवहार से भी परखा जाना चाहिए।
इसलिए—
> **भावना को सम्मान दो,
> पर भावना से निर्णय को अलग देखो।**
यही हृदय और मस्तक का स्वस्थ संवाद है।
---
# **मस्तक का नया उपयोग**
मस्तक को दबाना नहीं।
मस्तक को प्रशिक्षित करना।
विचार आए—
जाँचो।
तर्क आए—
उसका आधार देखो।
मान्यता आए—
उसका इतिहास देखो।
भय आए—
उसका वास्तविक खतरा देखो।
इच्छा आए—
उसकी कीमत देखो।
निर्णय आए—
उसके परिणाम देखो।
और यदि गलती हो—
**संशोधन करो।**
यही बुद्धि का परिष्कार है।
---
# **यथार्थ युग का मनुष्य**
यथार्थ युग का मनुष्य
वह नहीं जो हर प्रश्न का उत्तर जानता है।
वह है—
जो सही प्रश्न पूछ सकता है।
वह नहीं जो कभी गलती नहीं करता।
वह है—
जो गलती पहचानकर
उसे दोहराने से बच सकता है।
वह नहीं जो हर किसी को बदल देता है।
वह है—
जो स्वयं को बदलने की
आवश्यकता होने पर
पीछे नहीं हटता।
वह नहीं जो हर विवाद जीतता है।
वह है—
जो सत्य के लिए
अपना अहंकार भी हार सकता है।
---
# **अहंकार की सबसे सूक्ष्म चाल**
अहंकार केवल यह नहीं कहता—
“मैं सबसे बड़ा हूँ।”
कभी वह यह भी कहता है—
“मैं सबसे विनम्र हूँ।”
कभी—
“मैं ही सबसे निष्पक्ष हूँ।”
कभी—
“मुझे कोई भ्रम नहीं।”
कभी—
“मैं ही सत्य को समझ पाया हूँ।”
इसलिए—
**अहंकार की पहचान
उसके शब्दों से नहीं,
उसकी कठोरता से होती है।**
क्या मैं अपनी बात बदल सकता हूँ?
क्या मैं आलोचना सुन सकता हूँ?
क्या मैं किसी दूसरे की श्रेष्ठता स्वीकार सकता हूँ?
क्या मैं अपनी भूल पर
बिना बहाने के क्षमा माँग सकता हूँ?
यदि हाँ—
तो “मैं” अधिक पारदर्शी हो रहा है।
---
# **सर्वश्रेष्ठता की नई परिभाषा**
सर्वश्रेष्ठ वह नहीं
जिसके सामने सब झुकें।
सर्वश्रेष्ठता का अधिक स्वस्थ अर्थ हो सकता है—
**जिसकी शक्ति
दूसरों की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखे।**
जिसका ज्ञान
दूसरों को दबाए नहीं।
जिसकी संपत्ति
दूसरों की गरिमा न खरीदे।
जिसका प्रेम
दूसरे को कैद न करे।
जिसकी प्रसिद्धि
सत्य की जगह न ले।
जिसकी आध्यात्मिकता
डर पैदा न करे।
जिसकी बुद्धिमत्ता
दूसरों को मूर्ख घोषित करने में न लगे।
यही—
**मानवीय श्रेष्ठता की परीक्षा है।**
---
# **चतुराई और बुद्धिमत्ता**
चतुर व्यक्ति
दूसरे को मात दे सकता है।
बुद्धिमान व्यक्ति
देख सकता है कि
मात देने से दीर्घकाल में क्या होगा।
चतुर व्यक्ति
लाभ उठा सकता है।
बुद्धिमान व्यक्ति
लाभ के साथ परिणाम भी देखता है।
चतुर व्यक्ति
भीड़ को प्रभावित कर सकता है।
बुद्धिमान व्यक्ति
भीड़ को स्वतंत्र सोचने देता है।
चतुर व्यक्ति
अपने लिए अनुयायी बनाता है।
बुद्धिमान शिक्षक
स्वतंत्र मनुष्य बनाता है।
इसलिए—
> **चतुराई का लक्ष्य जीत हो सकता है;
> बुद्धिमत्ता का लक्ष्य समझ।**
---
# **मान्यता का साम्राज्य**
एक विचार जन्म लेता है।
फिर कुछ लोग उसे स्वीकार करते हैं।
फिर नियम बनते हैं।
फिर परंपरा बनती है।
फिर पहचान बनती है।
फिर पहचान की रक्षा शुरू होती है।
फिर आलोचक शत्रु कहलाता है।
फिर प्रश्न अपराध बनता है।
फिर व्यक्ति विचार का सेवक बन जाता है।
और अंततः—
**जिस विचार को मनुष्य ने बनाया था,
वही विचार मनुष्य को चलाने लगता है।**
इसलिए प्रत्येक परंपरा के सामने
एक जीवित प्रश्न रहना चाहिए—
**क्या यह आज भी मनुष्य के जीवन को बेहतर बना रही है?**
यदि हाँ—
समझो।
यदि नहीं—
संशोधित करो।
यदि हानिकारक है—
छोड़ो।
यही जीवित संस्कृति है।
---
# **शिशुपन की वापसी का वास्तविक अर्थ**
शिशु बनना
बुद्धि खो देना नहीं।
शिशुपन की श्रेष्ठता
जिज्ञासा में है।
वह हर वस्तु को
पहली बार देख सकता है।
वयस्क मन कहता है—
“यह तो मैं जानता हूँ।”
शिशु पूछता है—
“यह क्या है?”
यही प्रश्न
ज्ञान को फिर से जीवित करता है।
इसलिए—
**शिशुपन को अज्ञान नहीं,
जिज्ञासा के प्रतीक के रूप में समझो।**
---
# **संपूर्ण संतुष्टि**
संपूर्ण संतुष्टि का अर्थ
यह नहीं कि जीवन में
कभी कोई कठिनाई न हो।
बल्कि—
कठिनाई के बीच भी
मनुष्य अपनी गरिमा न खोए।
असफलता के बीच
सीखने की क्षमता न खोए।
वियोग के बीच
मानवता न खोए।
विरोध के बीच
विवेक न खोए।
सफलता के बीच
विनम्रता न खोए।
और मृत्यु की अनिश्चितता के बीच
जीवन को व्यर्थ न करे।
यही संतुष्टि
जीवन की गुणवत्ता बन सकती है।
---
# **एक सांस का महान आमंत्रण**
अभी सांस है।
इसलिए—
अभी देखने का अवसर है।
अभी पूछने का अवसर है।
अभी क्षमा माँगने का अवसर है।
अभी क्षमा करने का अवसर है।
अभी गलत दिशा बदलने का अवसर है।
अभी किसी का हाथ थामने का अवसर है।
अभी किसी पेड़ को बचाने का अवसर है।
अभी किसी बच्चे को
भय के बजाय जिज्ञासा देने का अवसर है।
अभी किसी बुजुर्ग को
सम्मान देने का अवसर है।
अभी किसी शोषित व्यक्ति के पक्ष में
खड़े होने का अवसर है।
इसलिए—
**जीवन को केवल किसी अंतिम अवस्था की प्रतीक्षा मत बनाओ।**
जीवन
इसी क्षण
अपने व्यवहार में प्रकट हो रहा है।
---
# **यथार्थ युग का जीवित मंत्र**
न अंध-स्वीकृति।
न अंध-नकार।
न अंध-भक्ति।
न अंध-विरोध।
न अंध-अनुकरण।
न अंध-विद्रोह।
बल्कि—
**देखो।**
**समझो।**
**पूछो।**
**परखो।**
**जियो।**
**परिणाम देखो।**
**गलती हो तो बदलो।**
यही—
**निष्पक्ष समझ का शमीकरण।**
---
# **महाश्लोक — मानवता का यथार्थ पथ**
जम्बू दीपे भारत खण्डे,
गूँजे स्वर मानवता अखण्डे।
नहीं प्रभुत्व, नहीं दासता,
मानव-गरिमा हो सर्वोच्चता॥
मस्तक दे विवेक महान,
हृदय दे हर जीव को मान।
ज्ञान बने सेवा का दीप,
करुणा बने जीवन का सीप॥
न कोई प्रश्न बने अपराध,
न असहमति बने विवाद।
सत्य जहाँ परीक्षण में रहे,
वहीं विवेक स्वतंत्र बहे॥
शिशु की जिज्ञासा जीवित रखना,
प्रौढ़ विवेक से पथ को देखना।
सरल रहो पर भोले मत बनो,
प्रेम करो पर स्वयं को मत खोओ॥
क्षमा करो पर अन्याय न पालो,
सीमा रखो पर घृणा न पालो।
स्वतंत्र रहो पर उत्तरदायी,
यही मनुष्य की सच्ची भलाई॥
धरती केवल संपत्ति नहीं,
जल केवल वस्तु नहीं।
वन केवल लकड़ी नहीं,
जीव केवल उपयोग नहीं॥
प्रकृति के प्रत्येक संतुलन में
हमारा जीवन जुड़ा हुआ है।
जो इसे समझकर चलता है,
वही भविष्य का प्रहरी है॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** वाणी—
सरल सहज निर्मल कल्याणी।
नाम से ऊपर कर्म हमारा,
मानवता हो धर्म हमारा॥
---
# **अंतिम त्रिसूत्र**
### **पहला सूत्र — स्वयं को देखो**
अपने विचारों को देखो।
अपने भय को देखो।
अपनी इच्छाओं को देखो।
अपनी मान्यताओं को देखो।
अपने अहंकार को देखो।
### **दूसरा सूत्र — दूसरे को मनुष्य देखो**
उसकी असहमति के भीतर भी
उसकी गरिमा देखो।
उसकी कमजोरी का
उपयोग मत करो।
उसकी स्वतंत्रता का
सम्मान करो।
### **तीसरा सूत्र — प्रकृति को आधार देखो**
वायु।
जल।
मिट्टी।
वन।
जीव।
समुद्र।
जलवायु।
इन सबके बिना
मनुष्य की कोई महानता
जीवित नहीं रह सकती।
---
# **महाअंत नहीं — खुला द्वार**
और अब—
सत्य को किसी अंतिम वाक्य में
बंद मत करो।
क्योंकि जैसे ही
तुम उसे पूरी तरह बंद करोगे,
वह जीवित निरीक्षण से
मान्यता बन सकता है।
इसलिए—
**यथार्थ का द्वार खुला रखो।**
अपनी समझ के लिए।
दूसरे की समझ के लिए।
विज्ञान के लिए।
दर्शन के लिए।
अनुभव के लिए।
प्रकृति के लिए।
और सबसे अधिक—
**अपनी भूल की संभावना के लिए।**
क्योंकि—
> **जो अपनी भूल की संभावना को
> जीवित रखता है,
> वही अपनी समझ को
> जीवित रखता है।**
और—
> **जो अपनी समझ को
> जीवित रखता है,
> वह सत्य को
> अपने से बड़ा रहने देता है।**
यही वह बिंदु है
जहाँ “मैं जानता हूँ”
धीरे-धीरे बदलकर
“मैं देख रहा हूँ” बनता है।
और—
**“मैं देख रहा हूँ”**
से भी आगे—
**“मैं जो देख रहा हूँ,
उसे भी निष्पक्षता से जाँच रहा हूँ।”**
यहीं—
मस्तक शत्रु नहीं रहता।
हृदय कल्पना नहीं रहता।
प्रेम स्वामित्व नहीं रहता।
ज्ञान अहंकार नहीं रहता।
शिक्षा बंधन नहीं रहती।
स्वतंत्रता स्वार्थ नहीं रहती।
और—
**यथार्थ युग कोई दूर का भविष्य नहीं,
बल्कि प्रत्येक क्षण के
सही आचरण की संभावना बन जाता है।**
जम्बू दीपे भारत खण्डे,
हृदय रहें निर्मल अखण्डे।
सत्य रहे सदैव परीक्षण में,
मानव रहे मानवता में॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
**सरलता से देखो।
निष्पक्षता से परखो।
करुणा से जियो।
विवेक से चुनो।
और जो गलत मिले—
# **शिरोमणि रामपॉल सैनी — यथार्थ का अंतरतम महाश्लोक**
## **जहाँ विचार समाप्त नहीं होते, पर उनका स्वामित्व समाप्त होने लगता है**
सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
मनुष्य की सबसे गहरी भूल
शायद विचारों का होना नहीं,
विचारों को स्वयं समझ लेना है।
विचार उठता है—
“मैंने सोचा।”
भाव उठता है—
“मैंने महसूस किया।”
इच्छा उठती है—
“मैं चाहता हूँ।”
भय उठता है—
“मैं डरता हूँ।”
क्रोध उठता है—
“मैं क्रोधित हूँ।”
पर थोड़ा ठहरकर देखो—
विचार आया कहाँ से?
इच्छा बनी कैसे?
भय किस अनुभव से जुड़ा?
क्रोध किस अपेक्षा से उठा?
और क्या हर उठने वाली चीज़
वास्तव में तुम्हारी अंतिम पहचान है?
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** का सूत्र—
> **जो भीतर उठता है,
> उसे पहले देखो;
> फिर उसके साथ अपनी पहचान जोड़ो।**
यही सूक्ष्म अंतर
मनुष्य को प्रतिक्रिया से
उत्तरदायित्व की ओर ले जाता है।
---
## **विचार और विचारक**
मस्तक विचार उत्पन्न करता है।
विचार तुलना करता है।
तुलना मूल्य बनाती है।
मूल्य पसंद बनाता है।
पसंद से इच्छा।
इच्छा से प्रयास।
प्रयास से परिणाम।
परिणाम से सुख या दुःख।
सुख से पुनरावृत्ति की चाह।
दुःख से बचने की चाह।
और फिर—
एक नया विचार।
एक नया लक्ष्य।
एक नया संघर्ष।
एक नई उपलब्धि।
एक नई कमी।
यही चक्र चलता रहता है।
मनुष्य सोचता है—
**“जब यह मिल जाएगा, तब मैं पूर्ण हो जाऊँगा।”**
वह मिलता है।
कुछ समय सुख आता है।
फिर मस्तक पूछता है—
**“अब आगे क्या?”**
और फिर एक नई दौड़।
इसलिए समस्या
इच्छा का होना मात्र नहीं।
समस्या तब है
जब व्यक्ति अपनी संपूर्णता को
भविष्य की किसी उपलब्धि के साथ
बंधक बना देता है।
**मैं अभी अधूरा हूँ।
मैं तब पूरा होऊँगा।**
यह वाक्य
अनंत संघर्ष का बीज बन सकता है।
---
# **संपूर्ण संतुष्टि का सूक्ष्म अर्थ**
संपूर्ण संतुष्टि का अर्थ
यह नहीं कि जीवन में
कोई कठिनाई कभी आए ही नहीं।
न इसका अर्थ
यह कि हर इच्छा पूरी हो जाए।
न इसका अर्थ
यह कि मनुष्य संसार छोड़ दे।
बल्कि—
**जो है उसे स्पष्ट देखना,
जो बदल सकता है उसके लिए प्रयास करना,
और जो अभी नहीं बदला जा सकता
उसके प्रति अनावश्यक आंतरिक युद्ध न करना।**
यह संतुलन है।
यह निष्क्रियता नहीं।
यह पलायन नहीं।
यह जीवन से दूरी नहीं।
यह जीवन के साथ
अनावश्यक मानसिक संघर्ष को पहचानना है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**—
> **संतुष्टि का अर्थ प्रयास छोड़ना नहीं;
> प्रयास को अपनी सम्पूर्ण पहचान न बना देना है।**
---
# **शिशुपन का सबसे गहरा रहस्य**
शिशु संसार को
पूरी दार्शनिक भाषा में नहीं समझता।
पर वह अनुभव करता है।
वह आश्चर्य करता है।
वह रोता है।
हँसता है।
देखता है।
छूता है।
सुनता है।
सीखता है।
उसका संसार
धीरे-धीरे नामों और अवधारणाओं से भरता जाता है।
नाम उपयोगी हैं।
भाषा उपयोगी है।
ज्ञान आवश्यक है।
पर ज्ञान के बढ़ने के साथ
यदि विस्मय मर जाए,
तो बुद्धि भारी हो सकती है।
इसलिए—
**शिशुपन में लौटना नहीं,
शिशुपन की जिज्ञासा को
वयस्क विवेक के साथ बचाए रखना है।**
प्रश्न करो—
पर हर उत्तर को तुरंत
अपना अंतिम सत्य मत बनाओ।
देखो—
पर हर दृश्य को
पूर्ण वास्तविकता मत मानो।
सीखो—
पर सीखने के बाद
सीखने वाले अहंकार को मत पालो।
---
# **मस्तक की जटिलता और हृदय की सरलता**
मस्तक को नष्ट करना
समाधान नहीं।
मस्तक को समझना
अधिक उपयोगी है।
मस्तक कहता है—
“मुझे तुलना करनी है।”
हृदय पूछता है—
“क्या तुलना आवश्यक है?”
मस्तक कहता है—
“मुझे जीतना है।”
हृदय पूछता है—
“क्या हर संबंध प्रतियोगिता है?”
मस्तक कहता है—
“मुझे प्रसिद्ध होना है।”
हृदय पूछता है—
“क्या प्रसिद्धि के बिना जीवन का मूल्य समाप्त हो जाता है?”
मस्तक कहता है—
“मुझे दूसरों से आगे जाना है।”
हृदय पूछता है—
“क्या अपने भीतर स्पष्ट होना अधिक आवश्यक नहीं?”
यहीं दोनों की भूमिका अलग होती है।
मस्तक—
**साधन।**
विवेक—
**दिशा।**
हृदय—
**मानवीय संवेदना।**
आचरण—
**परीक्षण।**
इन चारों का संतुलन
मनुष्य को अधिक पूर्ण बना सकता है।
---
# **“मैं” का हल्का होना**
अहंकार का अर्थ
केवल घमंड नहीं।
कभी-कभी अहंकार का सूक्ष्म रूप है—
**हर बात को अपने बारे में बना लेना।**
किसी ने कुछ कहा—
“मेरे विरुद्ध कहा।”
किसी ने प्रशंसा की—
“मेरी महानता सिद्ध।”
किसी ने अस्वीकार किया—
“मेरी कीमत कम।”
किसी ने सफलता पाई—
“मैं पीछे रह गया।”
इस प्रकार
दुनिया की असंख्य घटनाएँ
एक छोटे से “मैं” के चारों ओर
घूमने लगती हैं।
पर यदि “मैं” थोड़ा हल्का हो जाए—
प्रशंसा आए—
देखो।
आलोचना आए—
देखो।
सफलता आए—
देखो।
असफलता आए—
देखो।
किसी और की सफलता आए—
देखो।
और पूछो—
**“क्या यह घटना मेरे पूरे अस्तित्व का निर्णय है?”**
नहीं।
एक घटना
पूरे मनुष्य का सम्पूर्ण मूल्य नहीं होती।
---
# **प्रेम में भी “मैं” हल्का हो**
प्रेम में सबसे बड़ा संकट
कभी-कभी प्रेम की कमी नहीं—
**“मैं” की अधिकता है।**
“तुमने मुझे क्यों नहीं चुना?”
“तुमने मेरी बात क्यों नहीं मानी?”
“तुम मेरे साथ क्यों नहीं रहे?”
“तुमने मुझे प्राथमिकता क्यों नहीं दी?”
इन प्रश्नों में पीड़ा वास्तविक हो सकती है।
पर इनके भीतर
स्वामित्व की छाया भी हो सकती है।
प्रेम को इसलिए
एक और प्रश्न चाहिए—
**“क्या सामने वाला भी
मेरी तरह स्वतंत्र इच्छा वाला मनुष्य है?”**
यदि हाँ—
तो उसका निर्णय भी वास्तविक है।
उसकी असहमति भी वास्तविक है।
उसकी सीमा भी वास्तविक है।
उसका “नहीं” भी वास्तविक है।
और उसका अलग रास्ता चुनना भी
उसका अधिकार है।
यही स्वीकार करना
प्रेम को स्वार्थ से अलग करता है।
---
# **आकर्षण का पर्दा**
आकर्षण तेज होता है।
प्रेम गहरा हो सकता है।
आकर्षण में
कल्पना बहुत जल्दी
वास्तविकता से आगे निकल जाती है।
एक चेहरा—
और मस्तक पूरी कहानी लिख देता है।
एक मुस्कान—
और मन भविष्य बना देता है।
कुछ शब्द—
और व्यक्ति दूसरे के बारे में
सैकड़ों निष्कर्ष निकाल लेता है।
फिर जब वास्तविक मनुष्य
कल्पना से अलग निकलता है,
तो निराशा जन्म लेती है।
इसलिए—
**व्यक्ति को व्यक्ति की तरह देखो,
अपनी कल्पना के पात्र की तरह नहीं।**
यही प्रेम की
एक बड़ी परीक्षा है।
---
# **गुरु और अनुयायी के पार**
यदि कोई व्यक्ति
तुम्हें स्वयं देखने में सहायता करता है,
तो उसकी बात सुनो।
यदि कोई तुम्हें
अपना विवेक छोड़ने को कहता है,
तो सावधान हो जाओ।
यदि कोई कहता है—
“मैं ही अंतिम हूँ,”
तो प्रश्न करो।
यदि कोई कहता है—
“तुम स्वयं देख सकते हो,”
तो फिर स्वयं देखो।
किसी व्यक्ति को
अंतिम सत्य का स्वामी बना देना
मनुष्य की स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है।
और किसी व्यक्ति को
बिना सुने ही असत्य घोषित कर देना भी
निष्पक्षता नहीं।
इसलिए—
**न पूजा।
न घृणा।
न अंध-स्वीकृति।
न अंध-अस्वीकृति।
केवल परीक्षण।**
यही खुला मंच है।
---
# **यथार्थ सिद्धांत का परीक्षण**
यदि कोई सिद्धांत
वास्तव में मानवता के लिए उपयोगी है,
तो उसका परीक्षण
केवल शब्दों में नहीं होना चाहिए।
देखो—
क्या उससे भय कम होता है?
क्या उससे हिंसा कम होती है?
क्या उससे शोषण कम होता है?
क्या उससे व्यक्ति का विवेक बढ़ता है?
क्या उससे प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व बढ़ता है?
क्या उससे संबंध अधिक सम्मानपूर्ण होते हैं?
क्या उससे प्रश्न करने की स्वतंत्रता बढ़ती है?
क्या उससे व्यक्ति
दूसरों को कम और स्वयं को अधिक
ईमानदारी से देखने लगता है?
यदि हाँ—
तो सिद्धांत का व्यवहारिक मूल्य है।
यदि नहीं—
तो केवल ऊँचे शब्द
पर्याप्त नहीं।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** का सूत्र—
> **सिद्धांत की ऊँचाई
> उसके शब्दों से नहीं,
> उसके परिणामों से भी परखी जाए।**
---
# **यथार्थ युग का वास्तविक घोष**
यथार्थ युग का घोष
किसी दूसरे को पराजित करने का घोष नहीं।
यह स्वयं के भीतर
अंधेरे को पहचानने का घोष है।
नारा नहीं—
निरीक्षण।
घोषणा नहीं—
आचरण।
प्रभुत्व नहीं—
उत्तरदायित्व।
भीड़ नहीं—
स्वतंत्र व्यक्ति।
अंधविश्वास नहीं—
जिज्ञासा।
कट्टरता नहीं—
विवेक।
घृणा नहीं—
करुणा।
शोषण नहीं—
सम्मान।
प्रकृति पर प्रभुत्व नहीं—
प्रकृति के साथ संतुलन।
यही यथार्थ की दिशा है।
---
# **सांस का अंतिम पाठ**
सांस को पकड़कर रखना
मनुष्य के हाथ में नहीं।
फिर भी सांस रहते हुए
मनुष्य के पास एक अद्भुत संभावना है—
**वह अपने अगले व्यवहार को देख सकता है।**
अगला शब्द।
अगला निर्णय।
अगली प्रतिक्रिया।
अगला संबंध।
अगला कर्म।
यही वर्तमान की वास्तविक संपत्ति है।
इसलिए—
समय की कीमत
घड़ी से नहीं,
**जीवन में उसके उपयोग से समझो।**
किसी को चोट पहुँचाने में
एक क्षण लगता है।
किसी विश्वास को बनाने में
वर्ष लग सकते हैं।
एक झूठ
एक संबंध तोड़ सकता है।
एक सच्ची क्षमा
वर्षों का बोझ हल्का कर सकती है।
एक विचार
हिंसा बढ़ा सकता है।
एक करुणामय निर्णय
पूरी दिशा बदल सकता है।
इसलिए एक क्षण
छोटा नहीं।
**क्षण में दिशा छिपी हो सकती है।**
---
# **शिरोमणि का महा-सूत्र**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**—
> न स्वयं को देव बनाओ,
> न स्वयं को तुच्छ समझो।
> न दूसरों को अपना साधन बनाओ,
> न स्वयं किसी के साधन बनो।
> न विचारों से भागो,
> न विचारों के दास बनो।
> न प्रेम से भागो,
> न प्रेम को अधिकार बनाओ।
> न विज्ञान को अस्वीकार करो,
> न विज्ञान को अहंकार का उपकरण बनाओ।
> न परंपरा को केवल पुराना होने से सत्य मानो,
> न नया होने से सत्य मानो।
> न किसी गुरु को अंधा होकर मानो,
> न किसी गुरु को अंधा होकर नकारो।
> देखो।
> परखो।
> समझो।
> फिर निर्णय लो।
और सबसे महत्वपूर्ण—
> **अपने विवेक को किसी के हाथ मत सौंपो।**
---
# **अंतिम श्लोक**
जम्बू दीपे भारत खण्डे,
मानवता के दीप अखण्डे।
हृदय निर्मल, बुद्धि प्रकाश,
जीवन बने करुणा का वास॥
न भय रहे, न दासता भारी,
न हो मानव मानव से हारी।
प्रश्न जगे हर निर्मल मन में,
सत्य परखा जाए जीवन में॥
मस्तक साधन, हृदय दिशा,
विवेक बने दोनों की भाषा।
ज्ञान बने मानव का सेवक,
अहं न बने उसका अधिपति॥
प्रेम रहे पर स्वामित्व न हो,
संबंध रहे पर बंधन न हो।
ज्ञान रहे पर गर्व न हो,
शक्ति रहे पर शोषण न हो॥
धरती माता नहीं केवल शब्द,
उसका संरक्षण हो जीवित कर्तव्य।
जल, वायु, वन, जीव-जगत,
सबमें जीवन का साझा स्पंदन॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** नाम,
मानवता का बने पैगाम।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही बने जीवन का आधार॥
खुद को देखो, खुद को जानो,
पर अपने निष्कर्षों को भी परखो।
जो आज स्पष्ट प्रतीत हुआ,
कल उसे फिर सत्य की कसौटी पर रखो॥
यही खुलापन है।
यही निष्पक्षता है।
यही जीवित विवेक है।
और यही वह मार्ग है
जहाँ मनुष्य किसी दूसरे की
मानसिक प्रतिलिपि बनने के बजाय
**अपने अनुभव, अपने विवेक और अपने आचरण की
जिम्मेदारी स्वयं लेना सीखता है।**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —
खोज बाहर से भीतर नहीं,
बल्कि भ्रम से स्पष्टता की ओर।**
एक पल।
एक सांस।
एक निरीक्षण।
एक ईमानदार प्रश्न।
और फिर—
**जीवन को वैसा ही देखना
जैसा वह वास्तव में सामने घट रहा है।**
# **शिरोमणि रामपॉल सैनी — अस्तित्व से उत्तरदायित्व तक**
## **जहाँ खुद का साक्षात्कार किसी निष्कर्ष पर रुकता नहीं, बल्कि जीवन को देखने का ढंग बदल देता है**
### **सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष**
जो मनुष्य स्वयं को देखना प्रारम्भ करता है,
उसके सामने सबसे पहले
दूसरों की गलतियाँ नहीं—
**अपनी प्रतिक्रियाएँ दिखाई देती हैं।**
किस बात पर क्रोध आता है?
किस बात पर भय आता है?
किस बात पर अहंकार फूलता है?
किस बात पर प्रशंसा की भूख जागती है?
किस बात पर अपमान असहनीय हो जाता है?
किस बात पर मनुष्य
दूसरे को अपने से छोटा समझने लगता है?
यहीं से—
**साक्षात्कार की भूमि
कल्पना से प्रत्यक्ष निरीक्षण में बदलती है।**
---
## **“मैं” का सबसे सूक्ष्म निर्माण**
मैं शरीर हूँ—
यह एक अनुभव है।
मैं नाम हूँ—
यह सामाजिक पहचान है।
मैं परिवार हूँ—
यह संबंध है।
मैं पद हूँ—
यह भूमिका है।
मैं विचार हूँ—
यह मानसिक प्रक्रिया है।
मैं सफलता हूँ—
यह मूल्यांकन है।
मैं असफलता हूँ—
यह भी मूल्यांकन है।
इन सबको जोड़कर
मनुष्य एक कथा बनाता है—
**“यही मैं हूँ।”**
पर कथा बदल सकती है।
भूमिका बदल सकती है।
विचार बदल सकता है।
शरीर बदल सकता है।
संबंध बदल सकते हैं।
इसलिए—
> **जो बदलता रहता है,
> उसे स्थायी पहचान मानने से पहले
> उसका निरीक्षण आवश्यक है।**
---
# **शिरोमणि सूत्र**
**नाम उपयोगी है,
पर नाम सम्पूर्ण मनुष्य नहीं।**
**शरीर आवश्यक है,
पर शरीर सम्पूर्ण अनुभव नहीं।**
**मस्तक आवश्यक है,
पर मस्तक की हर धारणा सत्य नहीं।**
**भावना महत्वपूर्ण है,
पर हर भावना तथ्य नहीं।**
**अनुभव वास्तविक है,
पर अनुभव की व्याख्या गलत भी हो सकती है।**
यही सूक्ष्म अंतर—
**अनुभव और निष्कर्ष के बीच
की दूरी है।**
---
# **हृदय की गहराई को भी देखना**
यदि कोई कहता है—
“मैं हृदय में हूँ,”
तो अगला प्रश्न होना चाहिए—
**उसका व्यवहार कैसा है?**
क्या वह असहमति सह सकता है?
क्या वह आलोचना सुन सकता है?
क्या वह अपनी भूल स्वीकार सकता है?
क्या वह किसी कमजोर व्यक्ति का सम्मान करता है?
क्या वह अपने लाभ के लिए
दूसरे की स्वतंत्रता नहीं छीनता?
क्या वह प्रकृति के प्रति
जिम्मेदार है?
क्योंकि—
**किसी आंतरिक अवस्था का सबसे विश्वसनीय सामाजिक प्रमाण
उससे उत्पन्न आचरण है।**
---
# **संपूर्ण संतुष्टि और निष्क्रियता**
संतुष्टि का अर्थ
निष्क्रिय बैठ जाना नहीं।
यदि अन्याय सामने है
और हम कहते हैं—
“मैं भीतर से संतुष्ट हूँ,”
तो यह संतुष्टि नहीं,
कभी-कभी उदासीनता हो सकती है।
यदि प्रकृति नष्ट हो रही है
और हम कहते हैं—
“सब प्रकृति का नियम है,”
तो यह समझ नहीं,
जिम्मेदारी से बचना भी हो सकता है।
यदि कोई शोषित है
और हम कहते हैं—
“मैं प्रेम में हूँ,”
तो प्रेम की परीक्षा
अभी बाकी है।
इसलिए—
> **सच्ची आंतरिक शांति
> बाहरी अन्याय के प्रति
> संवेदनहीनता नहीं बननी चाहिए।**
---
# **हृदय का प्रेम और हाथ का कर्म**
हृदय कहता है—
**दर्द समझो।**
हाथ कहता है—
**जहाँ संभव हो, सहायता करो।**
हृदय कहता है—
**प्रकृति का सम्मान करो।**
कर्म कहता है—
**अपना उपभोग देखो।**
हृदय कहता है—
**बच्चे को स्वतंत्र सोच दो।**
शिक्षा कहती है—
**उसे प्रश्न पूछने दो।**
हृदय कहता है—
**दूसरे की गरिमा पहचानो।**
व्यवहार कहता है—
**उसके साथ वैसा ही व्यवहार करो।**
यहीं—
**भावना जीवन में उतरती है।**
---
# **प्रेम की अग्निपरीक्षा**
किसी को पाना प्रेम नहीं।
किसी को खोने के बाद भी
उसकी मानव गरिमा का सम्मान करना
प्रेम की अधिक कठिन परीक्षा हो सकती है।
किसी को अपनी बात मनवा लेना
प्रेम नहीं।
असहमति के बावजूद
संवाद बचाए रखना
प्रेम की परिपक्वता हो सकती है।
किसी को अपने जैसा बना देना
प्रेम नहीं।
उसकी भिन्नता को
समझने का प्रयास करना
प्रेम का अधिक गहरा रूप हो सकता है।
इसलिए—
**प्रेम जितना गहरा होगा,
स्वामित्व उतना कम होना चाहिए।**
---
# **आकर्षण और प्रेम में अंतर**
आकर्षण कह सकता है—
“मुझे तुम्हारी आवश्यकता है।”
प्रेम कह सकता है—
“तुम्हारा अस्तित्व मेरे लिए महत्वपूर्ण है।”
आकर्षण कभी-कभी
दूसरे को पाने की जल्दी करता है।
प्रेम
दूसरे की स्वतंत्रता को भी देखता है।
आकर्षण
क्षण में प्रबल हो सकता है।
प्रेम
समय में परखा जाता है।
आकर्षण
शरीर, रूप, आवाज़, व्यवहार से प्रभावित हो सकता है।
प्रेम
व्यक्ति की गरिमा, विश्वास और जिम्मेदारी में गहराता है।
इसलिए—
> **क्षणिक आकर्षण को
> शाश्वत प्रेम घोषित करने से पहले
> समय को अपना प्रमाण बनने दो।**
---
# **शरीर के प्रति निष्पक्षता**
शरीर को सजाना गलत नहीं।
सुंदर दिखना गलत नहीं।
धन कमाना गलत नहीं।
प्रसिद्ध होना भी अपने-आप में गलत नहीं।
समस्या तब शुरू होती है
जब साधन ही पहचान बन जाए।
जब शरीर—
**“मैं” बन जाए।**
जब धन—
**“मैं” बन जाए।**
जब प्रसिद्धि—
**“मैं” बन जाए।**
जब पद—
**“मैं” बन जाए।**
तब उनके खोने का भय
मनुष्य को भीतर से हिला सकता है।
इसलिए—
**साधनों का उपयोग करो,
साधनों को स्वयं का स्वामी मत बनने दो।**
---
# **मस्तक की जटिलता का दूसरा पक्ष**
मस्तक भ्रम पैदा कर सकता है—
पर वही मस्तक
भ्रम की पहचान भी कर सकता है।
मस्तक इच्छा पैदा कर सकता है—
पर वही मस्तक
इच्छा के परिणाम भी देख सकता है।
मस्तक भय पैदा कर सकता है—
पर वही मस्तक
जोखिम का वास्तविक मूल्यांकन भी कर सकता है।
मस्तक अहंकार बना सकता है—
पर वही मस्तक
अहंकार की कार्यप्रणाली का अध्ययन भी कर सकता है।
इसलिए—
**मस्तक को शत्रु मानना
मस्तक की आत्म-संशोधन क्षमता को भी
नज़रअंदाज़ करना है।**
---
# **हृदय और मस्तक का युग्म**
हृदय बिना विवेक—
अंधी करुणा बन सकता है।
विवेक बिना करुणा—
निर्दयी दक्षता बन सकता है।
इसलिए—
**हृदय दिशा दे,
मस्तक साधन खोजे।**
**हृदय मूल्य दे,
मस्तक प्रक्रिया बनाए।**
**हृदय मनुष्य को देखे,
मस्तक समस्या का समाधान खोजे।**
यही दोनों के बीच
एक स्वस्थ सेतु है।
---
# **यथार्थ युग का नया सूत्र**
न—
**हृदय बनाम मस्तक।**
बल्कि—
**हृदय + विवेक।**
न—
**भावना बनाम विज्ञान।**
बल्कि—
**मानवीय मूल्य + वैज्ञानिक परीक्षण।**
न—
**व्यक्ति बनाम समाज।**
बल्कि—
**व्यक्ति की स्वतंत्रता + सामाजिक उत्तरदायित्व।**
न—
**मानव बनाम प्रकृति।**
बल्कि—
**मानव और प्रकृति का सह-अस्तित्व।**
यहीं से
विरोध की भाषा
सहयोग की भाषा में बदलती है।
---
# **“मैं ही अंतिम हूँ” की परीक्षा**
यदि कोई मनुष्य कहता है—
**“मैं ही अंतिम सत्य हूँ,”**
तो उससे पहले
एक अत्यंत सरल प्रश्न पूछा जा सकता है—
**क्या तुम्हारा कथन स्वतंत्र रूप से जाँचा जा सकता है?**
यदि हाँ—
तो निरीक्षण करो।
यदि नहीं—
तो उसे व्यक्तिगत अनुभूति की श्रेणी में रखो।
यदि कोई अनुभव
केवल स्वयं को ही प्रत्यक्ष है—
तो वह व्यक्ति के लिए
अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है।
पर उसे सार्वभौमिक तथ्य बनाने के लिए
अलग स्तर के प्रमाण आवश्यक होंगे।
यही—
**अनुभूति और सार्वभौमिक तथ्य के बीच
निष्पक्ष अंतर है।**
---
# **शिरोमणि रामपॉल सैनी — खुला मंच**
यदि मेरी बात सत्य है—
तो उसे प्रश्नों से डरना नहीं चाहिए।
यदि मेरी समझ में कमी है—
तो प्रश्न उसे स्पष्ट कर सकते हैं।
यदि मेरे सिद्धांत में भूल है—
तो परीक्षण उसे दिखा सकता है।
यदि उसमें सत्य का कोई अंश है—
तो स्वतंत्र निरीक्षण उसे पहचान सकता है।
इसलिए—
**खुले मंच का अर्थ
केवल प्रशंसा स्वीकार करना नहीं।**
खुले मंच का अर्थ—
**असहमति को भी स्थान देना।**
यही निष्पक्षता की वास्तविक कठिनाई है।
---
# **सत्य और व्यक्ति**
सत्य किसी व्यक्ति की संपत्ति नहीं।
किसी नाम की जागीर नहीं।
किसी संस्था का निजी अधिकार नहीं।
किसी गुरु की बपौती नहीं।
किसी पुस्तक की सीमा नहीं।
किसी समुदाय का विशेषाधिकार नहीं।
मनुष्य सत्य को खोज सकता है—
पर सत्य पर स्वामित्व
घोषित नहीं कर सकता।
इसलिए—
> **“मैंने सत्य देखा”
> और
> “सत्य केवल मेरे पास है”
> इन दोनों वाक्यों के बीच
> बहुत बड़ा अंतर है।**
---
# **शिरोमणि महाश्लोक — सत्य के प्रति विनम्रता**
सत्य बड़ा है नाम से,
सत्य बड़ा है दाम से।
सत्य न बिके प्रचार में,
न बंद रहे अधिकार में॥
जो देखा है वह कह देना,
पर जाँच का द्वार खुला रखना।
अपनी समझ को दीप बनाना,
सूरज होने का दावा न करना॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** वाणी,
निष्पक्षता की रहे निशानी।
जो भी कहो, परीक्षण सहो,
सत्य मिले तो सत्य ही कहो॥
---
# **मानवता का मूल परीक्षण**
किसी विचारधारा को
उसके सबसे शक्तिशाली समर्थक से नहीं—
**उसके सबसे कमजोर व्यक्ति पर प्रभाव से परखो।**
क्या बच्चा सुरक्षित है?
क्या महिला स्वतंत्र है?
क्या वृद्ध सम्मानित है?
क्या असहमत व्यक्ति सुरक्षित है?
क्या गरीब की गरिमा बचती है?
क्या प्रकृति संरक्षित है?
क्या प्रश्न पूछने वाला
बिना भय बोल सकता है?
यदि हाँ—
तो विचारधारा का मानवीय मूल्य
अधिक गहरा है।
यदि नहीं—
तो उसकी पुनः जाँच आवश्यक है।
---
# **यथार्थ युग का घर**
यथार्थ युग
किसी विशाल भवन से शुरू नहीं होगा।
वह घर में शुरू होगा।
बच्चा प्रश्न पूछे—
माता-पिता सुनें।
पति-पत्नी असहमत हों—
अपमान के बिना बात करें।
वृद्ध गलती करे—
उसे मनुष्य ही रहने दें।
युवा असफल हो—
उसे तिरस्कार के बजाय अवसर दें।
परिवार में निर्णय हों—
भय के बजाय संवाद हो।
यहीं से—
**युग की पहली ईंट रखी जाती है।**
---
# **यथार्थ युग का विद्यालय**
विद्यालय में
बच्चे को केवल यह न सिखाया जाए—
“उत्तर याद करो।”
उसे सिखाया जाए—
**प्रश्न कैसे बनाते हैं।**
“किसने कहा?”
से आगे—
**“क्यों कहा?”**
“सब मानते हैं।”
से आगे—
**“प्रमाण क्या है?”**
“हमेशा ऐसा होता है।”
से आगे—
**“क्या हमेशा होना आवश्यक है?”**
“तुम गलत हो।”
से आगे—
**“आओ, जाँचते हैं।”**
यही—
**जीवित शिक्षा।**
---
# **यथार्थ युग का समाज**
जहाँ प्रतिष्ठा
चरित्र से आए।
धन
जिम्मेदारी के साथ आए।
ज्ञान
सेवा से जुड़े।
शक्ति
उत्तरदायित्व के साथ हो।
स्वतंत्रता
मर्यादित नहीं, बल्कि
जिम्मेदार हो।
असहमति
दुश्मनी न बने।
और—
**मानव मूल्य
किसी व्यक्ति की उपयोगिता से बड़े हों।**
---
# **महागान — यथार्थ युग का उदय**
जम्बू दीपे भारत खण्डे,
मानव दीप रहें अखण्डे।
निज हित से ऊपर हित मानव,
निज लोभ से ऊपर जीवन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी पुकारे,
अपने भीतर के भ्रम निहारे।
मस्तक जागे विवेक सहित,
हृदय बहे करुणा सहित॥
न कोई दास, न कोई स्वामी,
न भय की भाषा, न मनमानी।
शिक्षा दे स्वतंत्र विचार,
प्रेम बने सम्मान का आधार॥
न प्रश्नों पर पहरा हो,
न सत्य पर कोई चेहरा हो।
जो कहो उसे जाँचने दो,
जो गलत हो उसे बदलने दो॥
धरती की धड़कन सुनना सीखो,
जल की कीमत समझना सीखो।
वृक्षों में भविष्य देखो,
जीवों में जीवन लेखो॥
---
# **सर्वोच्च सूत्र**
**खुद का साक्षात्कार
दूसरों को समझाने से पहले
स्वयं को देखने की क्षमता है।**
**निष्पक्षता
अपने प्रिय निष्कर्ष पर भी
प्रश्न उठाने की क्षमता है।**
**प्रेम
दूसरे की स्वतंत्रता को
अपने प्रेम से छोटा न मानना है।**
**शिक्षा
निर्भरता बढ़ाना नहीं,
स्वतंत्रता बढ़ाना है।**
**विज्ञान
सिर्फ़ साधन खोजना नहीं,
अपने निष्कर्षों की परीक्षा भी है।**
**यथार्थ
सिर्फ़ कथन नहीं,
कथन और जीवन के बीच
संगति है।**
**यथार्थ युग
सिर्फ़ नया नाम नहीं,
नई जीवन-पद्धति की जिम्मेदारी है।**
---
# **अंतिम उद्घोष**
मैं—
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
यदि अपने अनुभव को
यथार्थ की दिशा में रखना चाहता हूँ,
तो मेरी पहली जिम्मेदारी
दूसरों से स्वीकृति माँगना नहीं—
**अपने ही कथनों को
निष्पक्ष निरीक्षण के लिए खोलना है।**
यदि मैं कहूँ—
“प्रेम है,”
तो मेरे व्यवहार में प्रेम दिखे।
यदि कहूँ—
“निष्पक्षता है,”
तो अपने पक्ष की भी जाँच करूँ।
यदि कहूँ—
“स्वतंत्रता है,”
तो दूसरे की स्वतंत्रता भी स्वीकार करूँ।
यदि कहूँ—
“संपूर्ण संतुष्टि है,”
तो लालच, भय और प्रभुत्व की
अपनी प्रवृत्तियों को भी पहचानूँ।
यदि कहूँ—
“मानवता सर्वोपरि है,”
तो असहमत मनुष्य में भी
मानवता देखूँ।
यदि कहूँ—
“प्रकृति का संरक्षण चाहिए,”
तो अपने जीवन में
उसकी कीमत चुकाने को भी तैयार रहूँ।
तभी—
**विचार शब्द से जीवन बनेगा।**
तभी—
**अनुभूति व्यवहार बनेगी।**
तभी—
**साक्षात्कार उत्तरदायित्व बनेगा।**
और तभी—
**यथार्थ युग
घोषणा से आगे बढ़कर
जीवित संस्कृति बनने की दिशा पाएगा।**
---
## **अंतिम दोहा**
अपने भीतर झाँककर, अपना भ्रम पहचान।
दूजे में भी जीव देख, यही हृदय का ज्ञान॥
सत्य न अपना बंधुआ, सत्य न किसी का दास।
निष्पक्षता के दीप से, मिटे भ्रमों का त्रास॥
प्रेम न बाँधे जीव को, प्रेम करे सम्मान।
विवेक करे पथ स्पष्टतम, करुणा दे पहचान॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** नाम तभी उजियार—
जब हर जीव की गरिमा हो, और मानवता आधार॥
**सरल रहो।
निर्मल रहो।
जिज्ञासु रहो।
निष्पक्ष रहो।
करुणामय रहो।
और जहाँ अपनी भूल दिखाई दे—
वहीं से अपनी अगली यात्रा आरम्भ करो।**
# **शिरोमणि रामपॉल सैनी — “मैं” के जन्म का निरीक्षण**
## **जहाँ पहचान बनने से पहले का मौन, पहचान बनने के बाद की पूरी कहानी को देखता है**
### **सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष**
मनुष्य कहता है—
**मैं सोचता हूँ।**
पर थोड़ा ठहरकर देखो—
विचार आने से पहले
क्या तुमने विचार को बुलाया था?
क्रोध आने से पहले
क्या तुमने क्रोध का आदेश दिया था?
भय उठने से पहले
क्या तुमने भय को नियुक्त किया था?
अचानक कोई स्मृति आती है—
क्या तुमने उसे पहले से
दरवाज़े पर खड़ा किया था?
किसी चेहरे को देखकर
आकर्षण या अरुचि पैदा होती है—
क्या उस पहली प्रतिक्रिया का
हर अंश तुम्हारे सचेत चुनाव से बना था?
यहीं से एक अत्यंत गहरा निरीक्षण शुरू होता है—
**अनुभव घटित होता है,
फिर मन उसका अर्थ बनाता है,
फिर अर्थ से पहचान बनती है,
फिर पहचान से कथा बनती है,
और फिर कथा कहती है—
“मैं ऐसा ही हूँ।”**
---
# **पहली भूल — प्रतिक्रिया को पहचान मान लेना**
क्रोध आया—
“मैं क्रोधी हूँ।”
भय आया—
“मैं कमजोर हूँ।”
प्रशंसा मिली—
“मैं श्रेष्ठ हूँ।”
असफलता मिली—
“मैं असफल हूँ।”
एक गलती हुई—
“मैं खराब इंसान हूँ।”
लेकिन—
**घटना और पहचान एक नहीं।**
क्रोध एक अवस्था हो सकता है।
भय एक प्रतिक्रिया हो सकता है।
असफलता एक घटना हो सकती है।
गलती एक व्यवहार हो सकता है।
इन सबको जोड़कर
स्थायी “मैं” बना देना—
**मन की व्याख्या है।**
---
# **शिरोमणि सूत्र**
**भावना को महसूस करो,
पर उसे अपनी पूरी पहचान मत बनाओ।**
**विचार को सुनो,
पर उसे अंतिम आदेश मत बनाओ।**
**अनुभव को स्वीकारो,
पर उसकी व्याख्या की भी जाँच करो।**
**अपनी कहानी जानो,
पर यह मत भूलो कि कहानी बदल सकती है।**
---
# **दूसरी भूल — विचार को सत्य समझ लेना**
मस्तक की सबसे बड़ी शक्ति
सिर्फ़ विचार पैदा करना नहीं।
उसकी एक और अद्भुत क्षमता है—
**विचार को वास्तविकता जैसा महसूस कराना।**
“वे मेरे विरुद्ध हैं।”
विचार।
“मैं सुरक्षित नहीं हूँ।”
विचार।
“मुझे हर हाल में जीतना है।”
विचार।
“अगर मैं असफल हुआ तो सब खत्म।”
विचार।
पर मनुष्य जब इन विचारों को
बिना जाँच स्वीकार करता है—
तो विचार
भावना बन जाता है।
भावना
व्यवहार बन जाती है।
व्यवहार
आदत बन जाता है।
आदत
चरित्र जैसा दिखाई देने लगती है।
और चरित्र जैसी दिखाई देने वाली
वही आदत फिर कहती है—
**“यही मैं हूँ।”**
---
# **विचार से व्यक्तित्व तक**
एक विचार—
↓
एक प्रतिक्रिया—
↓
एक दोहराव—
↓
एक आदत—
↓
एक व्यवहार-पद्धति—
↓
एक सामाजिक पहचान—
↓
एक “मैं” की कहानी।
यही वह स्थान है
जहाँ मनुष्य अपने ही बनाए
मानसिक ढाँचे में रहने लगता है।
---
# **इसलिए साक्षात्कार का अर्थ**
साक्षात्कार केवल
आँखें बंद करके भीतर देखना नहीं।
साक्षात्कार यह देखना भी है—
**मेरी आदतें कैसे बनीं?**
**मेरी प्रतिक्रियाएँ कहाँ से आईं?**
**मेरी मान्यताएँ किससे बनीं?**
**मेरे भय किस अनुभव से जुड़े हैं?**
**मेरी इच्छाएँ किन प्रभावों से बढ़ती हैं?**
**मेरे निर्णयों में कितना भय है?**
**कितना सामाजिक दबाव है?**
**कितना स्वार्थ है?**
**कितना प्रेम है?**
**कितना विवेक है?**
यही प्रश्न
मनुष्य को स्वयं की
मानसिक संरचना का निरीक्षक बनाते हैं।
---
# **शिरोमणि रामपॉल सैनी — निरीक्षण सूत्र**
मैं अपने विचार नहीं—
**विचारों को देखने वाला अनुभव भी हूँ।**
मैं अपनी भावना नहीं—
**भावनाओं को पहचानने की क्षमता भी रखता हूँ।**
मैं अपनी भूमिका नहीं—
**भूमिका बदलने की क्षमता रखने वाला मनुष्य हूँ।**
मैं अपनी गलती नहीं—
**गलती से सीखने की क्षमता भी हूँ।**
और यही समझ
मनुष्य को अपने अतीत की कैद से
कुछ हद तक बाहर आने की संभावना देती है।
---
# **हृदय की गहराई का व्यावहारिक अर्थ**
हृदय को यदि
केवल एक रहस्यमय शब्द बना दिया जाए—
तो वह फिर एक नई मान्यता बन सकता है।
इसलिए हृदय की गहराई को
जीवन में पहचानो।
जब किसी की पीड़ा देखकर
तुम्हारे भीतर कठोरता के बजाय
मानवीय संवेदना जागती है—
वहाँ हृदय है।
जब तुम्हें अपनी गलती स्वीकारने में
अपमान नहीं, सत्य दिखाई देता है—
वहाँ हृदय है।
जब तुम्हें किसी कमजोर व्यक्ति को
दबाने की शक्ति मिलती है
पर तुम उसे नहीं दबाते—
वहाँ हृदय है।
जब तुम्हारे पास बदला लेने का अवसर है
पर तुम न्याय और करुणा का रास्ता चुनते हो—
वहाँ हृदय की परिपक्वता है।
---
# **हृदय का अर्थ केवल भावना नहीं**
हृदय—
**संवेदना।**
मस्तक—
**विवेक।**
हाथ—
**कर्म।**
यदि संवेदना है
पर विवेक नहीं—
तो गलत सहायता भी हो सकती है।
यदि विवेक है
पर संवेदना नहीं—
तो ठंडी दक्षता पैदा हो सकती है।
यदि दोनों हैं
पर कर्म नहीं—
तो केवल सुंदर विचार बचता है।
इसलिए—
**संवेदना + विवेक + कर्म = जीवित मानवता।**
---
# **सर्वभौमिकता का वास्तविक परीक्षण**
किसी सिद्धांत को
“सर्वभौमिक” कहना सरल है।
पर उसकी परीक्षा कठिन है।
क्या वह अलग संस्कृति के मनुष्य पर भी लागू होता है?
क्या वह असहमत व्यक्ति को भी सम्मान देता है?
क्या वह कमजोर व्यक्ति की गरिमा बचाता है?
क्या वह प्रश्न करने वाले को
दुश्मन नहीं बनाता?
क्या वह स्वयं की आलोचना सह सकता है?
क्या वह अपने अनुयायियों को
स्वतंत्र बनाता है?
यदि हाँ—
तो उसमें सार्वभौमिक मानवीय मूल्य
हो सकते हैं।
यदि नहीं—
तो “सर्वभौमिक” शब्द पर
पुनर्विचार आवश्यक है।
---
# **गुरु और शिष्य की नई परिभाषा**
गुरु वह नहीं
जो कहे—
**“मुझ पर विश्वास करो।”**
गुरु वह हो सकता है
जो कहे—
**“मेरी बात को भी जाँचो।”**
शिक्षक वह नहीं
जो विद्यार्थी को
अपने उत्तरों पर निर्भर कर दे।
श्रेष्ठ शिक्षक वह है
जो विद्यार्थी को
एक दिन इतना सक्षम बना दे
कि वह स्वयं प्रश्न पूछ सके,
स्वयं जाँच सके,
और आवश्यकता पड़े तो
शिक्षक की बात भी अस्वीकार कर सके।
इसलिए—
> **सच्ची शिक्षा निर्भरता नहीं,
> विवेक की स्वतंत्रता पैदा करती है।**
---
# **दीक्षा और शिक्षा**
यदि किसी व्यवस्था में
प्रश्न पूछना निषिद्ध हो—
तो वहाँ शिक्षा की जगह
आज्ञाकारिता बढ़ सकती है।
यदि किसी व्यवस्था में
“शब्द प्रमाण” के नाम पर
व्यक्ति को सोचने से रोका जाए—
तो व्यक्ति अपनी विवेक-क्षमता
धीरे-धीरे दूसरों को सौंप सकता है।
इसलिए—
**शिक्षा का उद्देश्य
मनुष्य को किसी व्यक्ति का अनुयायी बनाना नहीं,
बल्कि उसे अपने निर्णय का उत्तरदायी बनाना होना चाहिए।**
---
# **डर से बनी व्यवस्था**
जहाँ कहा जाए—
“प्रश्न करोगे तो दंड मिलेगा।”
वहाँ भय है।
जहाँ कहा जाए—
“असहमति करोगे तो बाहर कर दिए जाओगे।”
वहाँ दबाव है।
जहाँ कहा जाए—
“हमारे बिना तुम कुछ नहीं।”
वहाँ निर्भरता है।
जहाँ कहा जाए—
“केवल हमारे पास सत्य है।”
वहाँ सत्य की जगह
अधिकार का दावा खड़ा हो सकता है।
इसलिए—
**जो व्यवस्था स्वतंत्र प्रश्न से डरती है,
उसकी जाँच और भी आवश्यक है।**
---
# **प्रेम का दूसरा चेहरा**
प्रेम केवल आलिंगन नहीं।
प्रेम कभी-कभी
एक कठिन सत्य कहने का साहस भी है।
प्रेम यह भी कह सकता है—
**“तुम गलत हो।”**
पर अंतर यह है—
वह यह बात
अपमानित करने के लिए नहीं,
सुधार की संभावना के लिए कहता है।
इसीलिए—
**कटु सत्य और क्रूरता एक नहीं।**
और—
**मीठा झूठ और प्रेम एक नहीं।**
---
# **आकर्षण का बाजार**
मनुष्य के भीतर
आकर्षित होने की क्षमता स्वाभाविक है।
रूप आकर्षित करता है।
शब्द आकर्षित करते हैं।
धन आकर्षित करता है।
शक्ति आकर्षित करती है।
प्रसिद्धि आकर्षित करती है।
यौन आकर्षण भी
मानवीय जैविक अनुभव का हिस्सा है।
पर—
**आकर्षण को सहमति समझ लेना भूल है।**
**आकर्षण को अधिकार समझ लेना शोषण है।**
**आकर्षण को प्रेम समझ लेना अपरिपक्वता हो सकती है।**
और—
**किसी की इच्छा का सम्मान करना
प्रेम की न्यूनतम नैतिक सीमा है।**
---
# **शरीर का सम्मान**
मनुष्य शरीर है।
शरीर की अपनी जैविक आवश्यकताएँ हैं।
भूख है।
नींद है।
यौनिकता है।
थकान है।
बीमारी है।
ऊर्जा है।
उम्र है।
इन सबको नकारकर
“शुद्ध” बनने का दावा
कभी-कभी शरीर के विरुद्ध
एक नया संघर्ष बना सकता है।
इसलिए—
**शरीर को समझो,
उसका दास मत बनो।**
**शरीर का सम्मान करो,
पर उसे अपनी सम्पूर्ण पहचान मत बनाओ।**
---
# **सांस का प्रत्यक्ष रहस्य**
सांस आती है।
सांस जाती है।
हम उसका पूरा नियंत्रण
नहीं करते।
फिर भी हम उसे
कुछ सीमा तक प्रभावित कर सकते हैं।
यहीं प्रकृति और चेतन प्रयास के बीच
एक अद्भुत संबंध दिखाई देता है।
हम पूर्ण स्वामी नहीं।
हम पूर्ण असहाय भी नहीं।
हमारा जीवन
जैविक प्रक्रियाओं, पर्यावरण, व्यवहार, संबंधों और निर्णयों की
जटिल परस्परता में चलता है।
इसलिए—
**“मैं ही सब कुछ करता हूँ”
भी अतिशयोक्ति है।**
और—
**“मैं कुछ भी नहीं कर सकता”
भी अतिशयोक्ति है।**
वास्तविक स्वतंत्रता
इन दोनों के बीच
अपनी प्रभाव-सीमा पहचानने में है।
---
# **प्रकृति और मनुष्य**
मनुष्य प्रकृति से बाहर खड़ा हुआ
कोई अलग साम्राज्य नहीं।
हमारी सांस—
वायु पर निर्भर।
हमारा शरीर—
जल और भोजन पर निर्भर।
भोजन—
मिट्टी, सूर्य, जल और जीव-जगत की
दीर्घ प्रक्रियाओं पर निर्भर।
हमारा जीवन—
अनगिनत परस्पर संबंधों पर निर्भर।
इसलिए—
**प्रकृति का संरक्षण
अपने ही आधार का संरक्षण है।**
---
# **यथार्थ युग का पृथ्वी-सूत्र**
धरती जीतेगी
तो मनुष्य जीवित रहेगा।
जल बचेगा
तो सभ्यता बचेगी।
मिट्टी बचेगी
तो भोजन बचेगा।
जैव-विविधता बचेगी
तो पारिस्थितिक संतुलन की संभावना बचेगी।
इसलिए—
**मानवता की रक्षा
प्रकृति की रक्षा से अलग नहीं।**
---
# **शिरोमणि महागान**
जम्बू दीपे भारत खण्डे,
सत्य खोजे मन अखण्डे।
निज भ्रम से पहले लड़ना,
दूजे से पहले खुद को पढ़ना॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** नाम,
बने न अहंकार का धाम।
बने प्रश्न का खुला उजाला,
बने करुणा का निर्मल प्याला॥
मस्तक बोले—
“देखो, सोचो।”
हृदय बोले—
“दर्द को समझो।”
विवेक बोले—
“प्रमाण परखो।”
कर्म बोले—
“अब कुछ कर लो।”
चारों मिलकर
जीवन गढ़ें—
मानवता के दीपक धरें॥
---
# **महाश्लोक — अपने विरुद्ध भी सत्य**
जो सत्य केवल पर को टोके,
वह अधूरा सत्य है।
जो अपने भ्रम को भी झाँके,
वही गहरा सत्य है॥
जो दोष सदा संसार में देखे,
अपने भीतर झाँके नहीं।
वह ज्ञान की बात तो करता,
पर ज्ञान को जाने नहीं॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहें—
पहला निरीक्षण निज का हो।
फिर संसार सुधारने निकलो,
पहले भीतर व्यवहार शुद्ध हो॥
---
# **अंतिम गहराई — “मैं” से “हम” तक**
जब “मैं” स्वयं को
सबसे बड़ा मानता है—
तो संघर्ष जन्म लेता है।
जब “मैं” स्वयं को
सबसे छोटा मानता है—
तो हीनता जन्म लेती है।
जब “मैं” स्वयं को
एक मनुष्य के रूप में समझता है—
तो समानता की संभावना जन्म लेती है।
और जब—
**“मैं भी सीमित हूँ,
दूसरा भी सीमित है,
दोनों में गरिमा है,
दोनों सीख सकते हैं,”**
तब संवाद जन्म लेता है।
यही—
**अहंकार से मानवता की ओर
एक वास्तविक कदम है।**
---
# **अंतिम सूत्रावली**
**स्वयं को पूजने से पहले
स्वयं को जाँचो।**
**दूसरे को बदलने से पहले
उसकी स्वतंत्रता समझो।**
**सत्य घोषित करने से पहले
उसकी परीक्षा स्वीकारो।**
**प्रेम माँगने से पहले
सम्मान देना सीखो।**
**ज्ञान बाँटने से पहले
सीखते रहना मत छोड़ो।**
**प्रकृति पर अधिकार जताने से पहले
उस पर अपनी निर्भरता पहचानो।**
**और जीवन को समझने से पहले
यह मत भूलो कि
जीवन तुम्हारे सिद्धांत से बड़ा है।**
---
## **अंतिम श्लोक**
नाहं केवल नाममात्रं,
नाहं केवल रूपधारम्।
नाहं केवल विचारोऽस्मि,
नाहं केवल अहंकारम्॥
अनुभवस्य निरीक्षणं,
विचारस्य परीक्षणम्।
करुणायाः व्यवहारश्च,
यथार्थस्य जीवनम्॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
नाम बने यदि प्रेम-वाणी।
तो हर जीव में मानवीयता,
हर कर्म में हो जिम्मेदारी॥
न कोई अंध स्वीकार यहाँ,
न कोई अंध विरोध।
प्रश्न, प्रमाण, करुणा, विवेक—
यही बने जीवन-बोध॥
सांस रहे तब तक सीख रहे,
गलती हो तो बदल रहे।
सत्य मिले तो झुककर कहें—
**“मैंने इसे समझा है,
पर इसे फिर भी परखा जा सकता है।”**
यही विनम्रता
ज्ञान की रक्षा है।
यही खुलापन
सत्य की रक्षा है।
यही करुणा
मानवता की रक्षा है।
और यही—
**शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से कही जाने वाली
निष्पक्ष समझ की सबसे कठिन,
पर सबसे सुंदर परीक्षा है।**
# **शिरोमणि रामपॉल सैनी — साक्षात्कार के पार का निरीक्षण**
## **जहाँ मनुष्य अपने बनाए हुए “मैं” को भी एक घटना की तरह देखना आरम्भ करता है**
### **सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष**
मनुष्य ने संसार को समझने के लिए
असंख्य नाम बनाए—
देह, मन, बुद्धि, आत्मा, परमात्मा,
धर्म, दर्शन, विज्ञान, विचार,
पाप, पुण्य, मुक्ति, बंधन,
जीवन, मृत्यु, स्वर्ग, नरक।
नाम उपयोगी हो सकते हैं।
पर नाम और वास्तविकता
एक ही वस्तु नहीं होते।
**नाम मानचित्र है।
वास्तविकता भू-दृश्य है।**
मानचित्र देखकर
पर्वत की ऊँचाई का अनुमान लगाया जा सकता है—
पर पर्वत पर चलना
अलग अनुभव है।
इसी प्रकार—
किसी अवस्था का वर्णन
उस अवस्था को जी लेना नहीं।
किसी सत्य का नाम
उस सत्य का स्वामित्व नहीं।
किसी अनुभव की घोषणा
उस अनुभव को सार्वभौमिक तथ्य नहीं बना देती।
यहीं से—
**साक्षात्कार और घोषणा के बीच
का अंतर दिखाई देता है।**
---
# **शिरोमणि सूत्र — घोषणा से अधिक निरीक्षण**
जो मैंने देखा—
उसे कहूँ।
जो मैंने अनुभव किया—
उसे अनुभव कहूँ।
जो मैंने समझा—
उसे समझ कहूँ।
जो प्रमाणित है—
उसे प्रमाणित कहूँ।
और जहाँ मैं निश्चित नहीं—
वहाँ कह सकूँ—
**“मैं नहीं जानता।”**
यही चार शब्द
कभी-कभी हजारों शब्दों से
अधिक निर्मल होते हैं।
---
# **“मैं जानता हूँ” की अंतिम परीक्षा**
जब मनुष्य कहता है—
**“मैं जानता हूँ।”**
तो अगला प्रश्न होना चाहिए—
**“तुम कैसे जानते हो?”**
प्रत्यक्ष अनुभव?
स्मृति?
अनुमान?
दूसरे का कथन?
परंपरा?
प्रयोग?
तर्क?
सामाजिक विश्वास?
भावनात्मक प्रभाव?
या केवल बार-बार सुनी हुई बात?
एक ही निष्कर्ष
इन सभी रास्तों से आ सकता है—
पर उनकी विश्वसनीयता
समान नहीं होती।
इसलिए—
> **ज्ञान का पहला शत्रु अज्ञान नहीं,
> अज्ञान को ज्ञान समझ लेना है।**
---
# **मन की अदृश्य संपादन-प्रक्रिया**
हम सोचते हैं
हम संसार को जैसा है वैसा देखते हैं।
पर हमारा अनुभव
इंद्रियों, स्मृति, ध्यान, अपेक्षा, भाषा और पूर्व-अनुभवों से प्रभावित होता है।
एक ही घटना—
दो मनुष्यों के लिए
दो अलग अनुभव बन सकती है।
एक शब्द—
किसी के लिए प्रेम।
दूसरे के लिए अपमान।
एक चेहरा—
किसी के लिए सुरक्षा।
दूसरे के लिए भय।
एक स्थान—
किसी के लिए घर।
दूसरे के लिए निर्वासन।
इसलिए—
**अनुभव वास्तविक हो सकता है,
पर अनुभव की व्याख्या अलग हो सकती है।**
---
# **यहीं “मस्तक” की दूसरी परत खुलती है**
मस्तक केवल विचार नहीं करता।
वह—
छाँटता है।
तुलना करता है।
याद रखता है।
भूलता है।
पूर्वानुमान लगाता है।
जोखिम पहचानता है।
अर्थ बनाता है।
और कभी-कभी—
अपने ही बनाए अर्थ को
वास्तविकता समझ लेता है।
यही कारण है कि
मनुष्य अपने मानसिक संसार में
पूरा ब्रह्मांड बना सकता है।
और फिर—
उसी ब्रह्मांड का कैदी भी बन सकता है।
---
# **मान्यता की दीवार**
एक व्यक्ति कहता है—
“मेरे लोग सही हैं।”
दूसरा कहता है—
“मेरे लोग सही हैं।”
दोनों अपने-अपने प्रमाण चुनते हैं।
दोनों अपनी-अपनी स्मृतियाँ रखते हैं।
दोनों अपनी-अपनी पीड़ा बताते हैं।
और दोनों भूल सकते हैं—
कि दूसरे के भीतर भी
एक मनुष्य बैठा है।
यहीं—
**विचारधारा मनुष्य से बड़ी होने लगती है।**
और जब कोई विचारधारा
मनुष्य से बड़ी हो जाए—
तो सावधान होना चाहिए।
---
# **सर्वभौमिकता का कठोर सूत्र**
कोई भी सिद्धांत
यदि वास्तव में सार्वभौमिक होना चाहता है—
तो उसे यह अनुमति देनी होगी कि—
**एक बच्चा प्रश्न पूछ सके।**
**एक वैज्ञानिक परीक्षण कर सके।**
**एक दार्शनिक आपत्ति उठा सके।**
**एक सामान्य व्यक्ति असहमति व्यक्त कर सके।**
**और स्वयं सिद्धांत का समर्थक
कभी अपनी समझ बदल सके।**
जहाँ यह संभव नहीं—
वहाँ सत्य की तुलना में
सत्ता का तत्व अधिक हो सकता है।
---
# **शिरोमणि रामपॉल सैनी — खुला निरीक्षण**
यदि मेरे नाम से कोई सिद्धांत कहा जाता है—
तो उसकी सबसे बड़ी शक्ति
उसके अनुयायियों की संख्या नहीं।
उसकी सबसे बड़ी शक्ति—
**उसकी जाँच सहने की क्षमता है।**
यदि एक व्यक्ति पूछता है—
“क्यों?”
तो उसे रोकना नहीं।
यदि दूसरा पूछता है—
“प्रमाण क्या है?”
तो उसे शत्रु नहीं समझना।
यदि तीसरा कहता है—
“मेरा अनुभव अलग है।”
तो उसके अनुभव को
अपमानित नहीं करना।
क्योंकि—
**सत्य को बचाने के लिए
असहमति को मारना नहीं पड़ता।**
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# **गुरु से आगे—स्वतंत्र मनुष्य**
एक स्वस्थ शिक्षक
अपने विद्यार्थी को
अपने ऊपर निर्भर नहीं रखता।
वह धीरे-धीरे
उसे अपने पैरों पर खड़ा करता है।
वह कहता है—
**देखो।**
**सोचो।**
**प्रश्न करो।**
**जाँचो।**
**स्वयं निर्णय लो।**
और यदि आवश्यक हो—
**मुझसे असहमत हो जाओ।**
यही शिक्षा की परिपक्वता है।
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# **शिष्य की भी परीक्षा**
शिष्य होना केवल
किसी की बात सुनना नहीं।
शिष्य का अर्थ है—
**सीखने की क्षमता जीवित रखना।**
जो व्यक्ति हर बात पर
तुरंत विश्वास कर ले—
वह जितना असुरक्षित है,
उतना ही वह व्यक्ति भी
जो हर बात को केवल इसलिए नकार देता है
क्योंकि वह उसकी पुरानी मान्यता से मेल नहीं खाती।
इसलिए—
**अंधविश्वास और अंध-विरोध
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# **हृदय की निर्मलता की अग्निपरीक्षा**
निर्मल होना
अपने आपको श्रेष्ठ समझना नहीं।
सरल होना
दूसरों को सरल समझ लेना नहीं।
पवित्रता
दूसरों की अपवित्रता घोषित करना नहीं।
प्रेम
अपने नाम की पूजा करवाना नहीं।
और शांति—
दूसरों की पीड़ा से आँखें बंद करना नहीं।
यदि कोई अवस्था
इन सबके बाद भी
मानव गरिमा बढ़ाती है—
तो वह जीवन में फलित हो रही है।
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# **अहंकार की सबसे सूक्ष्म चाल**
अहंकार हमेशा यह नहीं कहता—
**“मैं सबसे बड़ा हूँ।”**
कभी वह कहता है—
**“मैं सबसे विनम्र हूँ।”**
कभी—
**“मैं सबसे शुद्ध हूँ।”**
कभी—
**“मैं ही सच्चा हूँ।”**
कभी—
**“बाकी सब सोए हुए हैं।”**
कभी—
**“सिर्फ़ मुझे सत्य दिखाई देता है।”**
यही कारण है कि—
> **अहंकार को पहचानना कठिन है,
> क्योंकि वह कभी-कभी आध्यात्मिक या नैतिक भाषा भी बोल सकता है।**
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# **शिरोमणि सूत्र — स्वयं पर भी प्रकाश**
यदि मैं कहूँ—
**“मैं निष्पक्ष हूँ,”**
तो मुझे अपने पक्षपात खोजने चाहिए।
यदि मैं कहूँ—
**“मैं प्रेम हूँ,”**
तो मुझे अपनी कठोरता देखनी चाहिए।
यदि मैं कहूँ—
**“मैं स्वतंत्र हूँ,”**
तो मुझे अपने भय देखने चाहिए।
यदि मैं कहूँ—
**“मैं संतुष्ट हूँ,”**
तो मुझे अपनी लालसाएँ देखनी चाहिए।
यदि मैं कहूँ—
**“मैं जागृत हूँ,”**
तो मुझे यह भी देखना चाहिए
कि कहाँ-कहाँ मैं अभी भी
आदतों से संचालित हूँ।
यही—
**जीवित आत्म-परीक्षण है।**
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# **इच्छा का महासागर**
मनुष्य एक इच्छा पूरी करता है।
क्षणिक संतोष आता है।
फिर दूसरी इच्छा।
फिर तीसरी।
फिर तुलना।
फिर प्रतियोगिता।
फिर प्रतिष्ठा।
फिर सुरक्षा।
फिर अमर होने की कल्पना।
फिर नाम बचाने की इच्छा।
और अंततः—
मनुष्य अपने शरीर से अधिक
अपने नाम को बचाने में लग सकता है।
पर नाम भी
दूसरों की स्मृति पर निर्भर है।
स्मृति बदलती है।
पीढ़ियाँ बदलती हैं।
सभ्यताएँ बदलती हैं।
इसलिए—
**जिसे हम स्थायी समझकर पकड़ते हैं,
वह भी समय की धारा में बदल सकता है।**
---
# **मृत्यु का निष्पक्ष निरीक्षण**
मृत्यु को लेकर
मनुष्य ने अनेक कथाएँ बनाई हैं।
किसी ने अमरता की कल्पना की।
किसी ने पुनर्जन्म की।
किसी ने स्वर्ग की।
किसी ने शून्यता की।
किसी ने मुक्ति की।
पर एक निष्पक्ष व्यक्ति
यह भी कह सकता है—
**“जहाँ मेरा प्रत्यक्ष ज्ञान समाप्त होता है,
वहाँ मेरी निश्चितता भी समाप्त होनी चाहिए।”**
यही विनम्रता
मृत्यु के प्रश्न को
ईमानदार बनाए रखती है।
---
# **जीवन का अर्थ कहाँ है?**
यदि भविष्य अनिश्चित है—
तो वर्तमान महत्वहीन नहीं हो जाता।
बल्कि वर्तमान और भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
क्योंकि—
यही क्षण है
जहाँ व्यवहार संभव है।
यही क्षण है
जहाँ प्रेम संभव है।
यही क्षण है
जहाँ क्षमा संभव है।
यही क्षण है
जहाँ सीखना संभव है।
यही क्षण है
जहाँ प्रकृति की रक्षा संभव है।
यही क्षण है
जहाँ अन्याय रोकने का प्रयास संभव है।
इसलिए—
**जीवन का मूल्य
केवल उसके अंतिम परिणाम में नहीं,
उसकी जीती हुई प्रक्रिया में भी है।**
---
# **एक सांस का नया अर्थ**
एक सांस को
केवल आध्यात्मिक प्रतीक मत बनाओ।
उसे प्रत्यक्ष जीवन का स्मरण बनाओ—
**मैं अभी जीवित हूँ।**
इसलिए—
क्या मैं सच बोल सकता हूँ?
क्या मैं किसी को अनावश्यक चोट से बचा सकता हूँ?
क्या मैं किसी भय को समझ सकता हूँ?
क्या मैं अपनी कोई गलती स्वीकार सकता हूँ?
क्या मैं प्रकृति के लिए आज कुछ बदल सकता हूँ?
क्या मैं किसी निर्बल व्यक्ति के साथ
सम्मान से व्यवहार कर सकता हूँ?
यदि हाँ—
तो सांस केवल जैविक प्रक्रिया नहीं,
**व्यवहार का अवसर भी है।**
---
# **यथार्थ युग का गहरा परिवर्तन**
युग केवल कैलेंडर से नहीं बदलता।
मानव व्यवहार बदलता है
तो युग का चरित्र बदलता है।
यदि मनुष्य—
भय से संवाद की ओर जाए,
प्रभुत्व से सहयोग की ओर जाए,
शोषण से सम्मान की ओर जाए,
अंध-स्वीकृति से परीक्षण की ओर जाए,
अत्यधिक उपभोग से संतुलन की ओर जाए,
और स्वयं की श्रेष्ठता से
साझी मानवता की ओर जाए—
तो—
**युग का वास्तविक परिवर्तन
मनुष्य के व्यवहार में दिखाई देगा।**
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# **महाश्लोक — भीतर का युद्ध**
बाहर रण कितना भी हो,
भीतर देखो कौन खड़ा।
एक ओर भय, एक ओर लोभ,
बीच विवेक अकेला खड़ा॥
एक ओर मेरा-मेरा स्वर,
एक ओर सबका जीवन।
एक ओर क्षणिक विजय की चाह,
एक ओर दीर्घ कल्याण॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहें—
पहले भीतर युद्ध पहचान।
जिस दिन लोभ स्वयं दिखेगा,
उस दिन बदलेगा इंसान॥
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# **महाश्लोक — प्रेम की परिपक्वता**
प्रेम न केवल पास बुलाए,
प्रेम कभी दूरी भी दे।
प्रेम न केवल अधिकार माँगे,
प्रेम स्वतंत्रता भी दे॥
प्रेम न केवल मधुर वचन हो,
प्रेम कठिन सत्य भी कहे।
प्रेम न केवल अपना सुख देखे,
प्रेम परपीड़ा भी सहे॥
जो प्रेम में दूसरे को जीने दे,
वही प्रेम को गहराई दे।
जो प्रेम में दूसरे को बाँधे,
वह प्रेम को कैद बनाए॥
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# **महाश्लोक — ज्ञान की विनम्रता**
ज्ञान बढ़े तो सिर न बढ़े,
प्रश्न बढ़ें तो दृष्टि बढ़े।
जितना गहरा ज्ञान हो भीतर,
उतना “नहीं जानता” भी बढ़े॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** वाणी—
ज्ञान न बने कोई दीवार।
ज्ञान बने वह खुला द्वार,
जिससे दिखे संसार अपार॥
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# **यथार्थ युग का पंचसूत्र**
**पहला — स्वयं को देखो।**
अपनी प्रतिक्रिया, इच्छा, भय और अहंकार को।
**दूसरा — दूसरे को मनुष्य देखो।**
उसकी असहमति सहित।
**तीसरा — प्रकृति को आधार देखो।**
केवल संसाधन नहीं।
**चौथा — सत्य को अपने पक्ष से बड़ा रखो।**
अपनी मान्यता बदलने का साहस रखो।
**पाँचवाँ — स्वतंत्रता को उत्तरदायित्व से जोड़ो।**
अपनी स्वतंत्रता में
दूसरे की गरिमा न कुचलो।
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# **अंतिम महागान**
जम्बू दीपे भारत खण्डे,
मानव स्वर हों आज अखण्डे।
निज भीतर की गाँठें खोलो,
सत्य के आगे सिर को डोलो॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** नाम,
बने न सत्ता, बने प्रणाम।
नाम यदि प्रेम की धारा हो,
तो हर हृदय में उजियारा हो॥
न कोई अंधी श्रद्धा हो,
न कोई अंधा तर्क।
प्रश्न, प्रमाण और करुणा से,
जीवन पाए नया अर्थ॥
मस्तक सोचे निर्मल होकर,
हृदय धड़के कोमल होकर।
हाथ उठें निर्माण हेतु,
वाणी बोले सत्य हेतु॥
धरती माँगे संतुलन,
जल माँगे संरक्षण।
वन माँगे सम्मान,
जीव माँगे जीवन॥
मानव यदि मानव रह जाए,
युग स्वयं बदलता जाए।
नया युग किसी घोषणा से नहीं—
**नए व्यवहार से आए।**
---
# **अंतिम साक्षात्कार-सूत्र**
मैं जो सोचता हूँ—
उसे देख सकता हूँ।
मैं जो महसूस करता हूँ—
उसे पहचान सकता हूँ।
मैं जो मानता हूँ—
उसे जाँच सकता हूँ।
मैं जो करता हूँ—
उसकी जिम्मेदारी ले सकता हूँ।
मैं जहाँ गलत हूँ—
वहाँ बदल सकता हूँ।
और जहाँ सत्य अभी अज्ञात है—
**वहाँ ईमानदारी से
“मैं नहीं जानता” कह सकता हूँ।**
यही—
**मानसिक स्वतंत्रता की शुरुआत है।**
यही—
**निष्पक्षता की निर्मलता है।**
यही—
**साक्षात्कार की जीवित प्रक्रिया है।**
और यही वह बिंदु है
जहाँ मनुष्य स्वयं को
किसी अंतिम उपाधि में बंद करने के बजाय
हर क्षण सत्य के प्रति खुला रखता है।
## **अंतिम दोहा**
जो अपने को देख सके, वह जग को देखे साफ।
अपने भ्रम पहचान ले, तभी खुले हर माफ॥
सत्य बड़ा है “मैं” से, सत्य बड़ा अभिमान।
जो सत्य के आगे झुक सके, वही सच्चा इंसान॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** नाम रहे यदि प्रेम-स्मरण—
तो हर जीव की गरिमा बने जीवन का आचरण॥
उसे बदलने का साहस रखो।**
**यही जीवित साक्षात्कार है।**
मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव ने गुरु शिष्य का रिश्ता ही ख़त्म कर दिया, जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण का बंदन था , मैंने गुरु के प्रथम दीदार और उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम के भाव को हृदय की अन्नत गहराई से लिया, उस के बाद और किसी को भी उस पवित्र निगह से आज तक कुछ और देखा ही नहीं, उसी पवित्र अन्नत असीम प्रेम को हर पल दिन रात संजोने में ही लगा रहा निरंतर, अन्नत असीम प्रेम शब्द दृश्य स्पर्ष नियम मर्यादा जाति प्रजाति का विषय कभी भी नहीं होता, सिर्फ़ इन की मूलतः का भाव एहसास स्वयं स्पष्टता प्रत्यक्षता है, जो सिर्फ़ एक ही सत्य जो प्रतेक प्रजाति में ही एक समान है, और सब कुछ कम अधिक हो सकता हैं आंतरिक भौतिक रूप से, परन्तु सांसों समय के साथ हृदय से अहसास भाव के साथ उत्पन होने वाला शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रेम सिर्फ़ एक ही एक समान है
मैंने अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम किया है सच मुच अपनी सुध बुध अपना चेहरा तक भुला हुआ हूं, काफ़ी पिछले चार दशकों से संपूर्ण मोनता में ही हूं कभी गुरु से बात नहीं की पर गुरु हमेशा मुझे डांटते ही रहते थे जब भी मैं चार पंच बर्ष के बाद में दर्शन करने जाता था, फ़िर भी मैं उन में ही निरंतरता से उन के ही प्रेम में रमता हूं आज भी, अब मैं चाहता हूं कि उन से मिलु एक तो उन के आश्रम कार्य के संयोग के लिए करोड़ों रुपए दिए थे जिन में से एक करोड़ गुरु ने जरूरत पड़ने पर वापिस देने का खुद शब्द दिया था, क्योंकि प्रेम की निरंतरता और खुद के साक्षात्कार के कारण और कुछ भी सोच ही नहीं सकता खुद के लिए ही, कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, दूसरा वो सब कुछ जो कुछ इतने लंबे समय के अंतराल में किया है, दुनियां में कभी भी इक पल के लिए भी नहीं रहा, गुरु के अन्नत असीम प्रेम में ही निरंतर हूँ बहा के इक इक पल के बारे में बता सकता हूं, जो मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बारे में, इस सब का श्रेह उन के ही चरण कमलों में समर्पित करते हुए, मेरे लिए तो वो ही सर्ब श्रेष्ठ हैं जो भी हुआ वो सब तो उनकी शरणागत के बाद ही हुआ, जो अन्य किसी भी अनुराई के साथ नहीं हुआ, सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ स्नेह और सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ समर्पित भाव भरा जिस में गिले शिकवों का भी स्थान नहीं था सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम हो एक सरल सहज निर्मल भाव है,मैं आप के जिस शिरोमणि स्वरुप से रुबरु हुआ हूं प्रथम दिन से ही जो प्रेमतित शब्दातीत कालातीत तुलनातीत है, उस सब को ही शब्दों में वर्णन करने की इक छोटी सी कोशिश में ही इतना लंबा सड़े तीन दशक का समय लगा, मैं शब्द रहित हर पल दिन रात मौनता में सचेत, न ही कभी सोया न जागृत अवस्था में था, सर्ब प्रथम अपने ही दो पल जीवन महत्व को समझा, शेष सब दूसरा था,
मेरी निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल दिन रात आप के अन्नत असीम प्रेम की गहराई में ही थीं अब मैं अपने नाम के आगे उसी शिरोमणि स्वरुप साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, इस लिए अब मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, इसी अंतराल में जो भी हुआ जैसा भी हुआ अच्छा या बुरा किसी के भी द्वारा बही होना तय ही था तो ही हुआ तो ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, हमेशा मैंने सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोने में भौतिक सब कुछ नष्ट कर दिया, साहिब तदरूप साक्षात्कार की यहीं एक सर्वश्रेष्ठ खूबसूरती हैं कि खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले जीवित ही हमेशा के लिए खुद ही खुद को होश में रूपांतर करने तक, आप सा कोई हो ही नहीं सकता
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, और सड़े तीन दशक के अंतराल की स्पष्टता दिखे और गिले शिकवों का स्थान ही न रहे क्योंकि इतने लंबे समय से गुरु से कोई बात ही नहीं की, गुरु के प्रेम की निरंतरता के
कारण, अब मेरे पास यह स्पष्टता है कि गुरु के अन्नत असीम प्रेम के बिना कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए, इतने लंबे समय से सिर्फ़ मैं उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम को शब्दों में वर्णन करने का इक प्रयास मात्र कर रहा था जो थोड़ा सा लिख पाया कि कोई एक बार ही पढ़े तो कम से कम दस बर्ष लगेगे पूरा पढ़ पाने में, जिसमें कोई भी शब्द किसी भी विश्व के ग्रंथ पोथि में नहीं, मिल सकता, एक एक शब्द को तर्क तथ्य विवेक अपने ही सिद्धांतों से स्पष्ट साफ़ सिद्ध किया है किसी के भी अनुभव अनुभूति के लिए,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने गुरु को समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ गुरु जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जिनको मैंने तर्क तथ्य विवेक अपने सिद्धांतों सूत्रों code ulta mega infinity quantum mechanicsim के formulation से सिद्ध किया है,मैं जो भी था वो ही संपूर्ण पर्याप्त था और कुछ भी रति भर भी बनने की कोशिश नहीं की, हां यह सच है कि जीवन के प्रतेक पल को सार्थक सकारात्मक रूप से निष्पक्ष समझ से समझने की कोशिश ज़रूर की, अब संपूर्ण संतुष्टि में हूं अस्थाई शरीर के कारण अभाव है संपूर्णता का, इसलिए मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण रूप से खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार में संपूर्णता में शरीर के अस्थाई पंच तत्वों गुणों को रूपांतर कर समहित होना चाहता हूं कृपा आज्ञा प्रधान करें, अब कुछ भी शेष नहीं है रहा करने को, जिस कारण अनमोल समय सांस मिले थे,
चार दशक के लंबे समय के अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, शेष 25 लाख गुरु सहित एक ही मान्यता परंपरा नियम मर्यादा दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित है जो सिर्फ़ चतुर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर ही है, मेरी साहिब स्तुति सिर्फ़ मेरे ही साहिब तदरूप साक्षात्कार की हैं,जो निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की हैं
पर ॐ अस्थाई है समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति को अंकित करता हैं,
शिरोमणि अन्नत गहरी स्थाई ठहराव है जो ॐ से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जप तप ध्यान ज्ञान विज्ञान योग अभ्यास साधना कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन का अस्तित्व ख़त्म हो जाता हैं तो क्या तत्पर्य है इन शब्दों का भी, यह पारदर्शिता नहीं है, गलत शब्द इस्तेमाल करना दूसरों को भ्रमित करना होता हैं, सरल सहज निर्मल हैं सिर्फ़ प्रेम शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं तो जटिलता क्यों? मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं सिर्फ़ शब्दों के पिछे के भाव एहसास की स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं , खुद के साक्षात्कार के लिए तो शब्दों का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं, अगर दूसरों के लिए शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं तो पारदर्शिता स्पष्टता अति आवश्यक हैं, स्पष्टता पारदर्शिता नहीं तो तो स्वार्थ हित साधने का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह छल कपट के साथ होगा और कुछ भी नहीं है ,
हृदय के भाव एहसास का तंत्र मस्तिक के जटिल तंत्र से कई गुणा अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कई गुणा अधिक तीव्र कार्य करता हैं, यह विज्ञान के संज्ञान में अभी तक बिल्कुल भी नहीं है,
कि खुद के साक्षात्कार के लिए सरल सहज निर्मल होते हुए संपूर्ण संतुष्टि गहराई स्थाई ठहराव का रास्ता तो हृदय से ही स्पष्टता के साथ जाता हैं, अन्यथा जटिल बुद्धि मन से जटिलता में ही उलझा रहा अस्तित्व से लेकर अब तक, दूसरों की गलतियों पर खुश होने वाले मूर्ख होते हैं, खुद की गलतियों पर खुश हो कर स्वीकार करने वाले सर्व श्रेष्ठ होते हैं, सामान्य व्यक्तित्व के लिए मन बुद्धि से बुद्धिमान हो कर ही अपने अस्तित्व जीवन व्यापन के लिए फ़ैसले ले सकता हैं, जबकि खुद के साक्षात्कार के बाद मन बुद्धि से संपूर्ण रूप से हट जाता हैं, क्योंकि खुद का साक्षात्कार ही संपूर्ण रूप से पर्याप्त है, किसी भी अस्थाई तत्वों चीज़ों वस्तुओं गुणों तत्वों पर आश्चित नहीं है, यही खूबसूरती हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष की
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का ऐसा शिरोमणि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष जो अस्थाईपन का संपूर्ण रूप से अस्तित्व ही ख़त्म कर, अपने समान सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में रख कर खुद का साक्षात्कार करा देता हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, अपने ही साहिब से अमृत यथार्थ युग का शुभ आरंभ करवाने जा रहा हूं, समूचे मनव प्रजाति समूहित रूप से रह सकती हैं प्रकृति मानव प्रजाति को संपूर्ण रूप से संरक्षण योगदान देते हुए, जो इंसान जीवन का मुख्य उद्देश्य हैं, अतीत के चार काल मूर्खता के ही थे, मानसिक वृत्ति से चलने के ही थे,उन सब को न दोहराते हुए सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोते हुय, विश्व गुरु नहीं, यथार्थ युग की अमृत धारा की प्रभा को मेरा ही साहिब उज्वल करें गा, अन्नत असीम प्रेम की गहराई से साहिब तदरूप में संपूर्ण रूप से समाहित होने की अनुमति लेते हुए, अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को उन में ही रूपांतर करने की अनुमति के लिए विनय अतंत प्रेम में विनय संपूर्ण संतुष्टि में, हर संस का के उपकार के लिए धन्यवाद करते हुए स्तुति महिमा भरे भावुक पर संतुषी भरे शब्दों में वर्णन करें , मैं मूर्ख हूं इस सृष्टि के भी काबिल भी नहीं था, पर अपने हर पल को भी ऐसा ही दिया जो सिर्फ़ मेरे लिए ही पर्याप्त थे, हर पल पल मुझ मूर्ख को बहुत क़रीब से संभाला,तुलनातीत हो, इतना अधिक हिरदे का प्रेम दिया कि मैं खुद ही खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं अब तक, बिना शब्दों संपूर्ण शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाया शब्दातीत हो, समय सोच विचार चिंतन मनन से परे किया कालातीत हो, अन्नत असीम प्रेम में समहित किया प्रेमितित हो, संपूर्ण रूप से ऐसे ही अनमोल समय सांस दिए जो खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए ही जरूरी थे, एसी ही कृपा की जिस से संपूर्ण संतुष्टि में हूं, ऐसा कोई आज तक न कोई गुरु अस्तित्व से लेकर आया, न ही कोई हो सकता हैं, किसी ने भी कम से कम शब्दों में वर्णन किया होगा, पर आप तो शब्दातीत हैं, आप के शिवाय आज तक एक सांस भी नहीं ली, कोटिन नमन
गहराई गहनता गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार संपूर्ण संतुष्टि समर्पिता कि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, वो योद्धा हूँ जो खुद से ही युद्ध कर के संपूर्ण रूप विजय हो कर साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, जो मृत्यु के प्रति भी डर खौफ भय दहशत का दृष्टिकोण नहीं बल्कि अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को रूपांतर करने की क्षमता के साथ हूं, होश में ही जिया हूँ होश में ही खुद को प्रतेक तत्व गुणों को रूपांतर करने के ही भाव में हूं , कोटिन नमन है अन्नत असीम बार, जो आप ने सिर्फ़ एक पल में ही कर दिया जिसे मुझ जैसे मूर्ख को शब्दों में समझने के लिए चार दशक लगें मेरी इस मूर्खता को क्षमा कर देना, अज्ञानी मूर्ख समझ कर,
खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बिना शेष सब अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ खुद के अस्तित्व के लिए प्रयास यत्न प्रयत्न या संसाधन जुटाना ही है, दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी अंतर फ़र्क भिन्नता नहीं है,
समस्त शब्दों के भाव ऐसे व्यक्त हो कि हृदय को छू कर व्याकुल घायल कर दे आकर्षण बल हमेशा के लिए बना रहे, उसी लह में की दुनियां छूट जाए पर हृदय का आकर्षण न छुटे , दीक्षा के साथ ही गुरु ने दो विकल्प दिए थे एक जीवित ही अन्नत असीम प्रेम से साहिब तदरूप साक्षात्कार और दूसरा भक्ति सेवा दान मृत्यु के बाद का जो शेष पचीस लाख अनुयाइयों के लिए निरंतर हैं, मैने पहले बाला विकल्प को चुना और चार दशकों से संपूर्ण निरंतरता में ही हूं, खुद के साक्षात्कार के साथ , पिछले चार दशकों से भौतिक हर चीज़ के आवाव में ही रहा हूं, हँसना खुशी मनोरंजन क्या होता हैं पाता ही नहीं फ़िर भी सिर्फ़ एक ही रंग में संपूर्ण संतुष्टि में हूं, बाहर कोई था ही नहीं तो डर किस से, मेरे भीतर ही मेरा ही इक किरदार बहरूपिया गिरगिट था जिस से युगों से हारा था, अब एक पल की निष्पक्ष समझ से,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो योद्धा हूं जो अन्नत काल से चल रहे खुद से युद्ध को जीता हूँ,अब महायुद्ध के रूप में उभरा हूँ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी लेंवे समय चार दशकों से लगातार भौतिक रूप से काफ़ी गंदा हूं नाहया धोया नहीं सफ़ाई नहीं की, क्योंकि निरंतरता टूट जाती, अगर वो सब करता रहता तो निरंतरता टूटती, दो पल के जीवन में यह सब करना अत्यंत जरूरी था
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जिस संपूर्ण संतुष्टि में निरंतर पिछले चार दशकों से हूँ उस को ही निरंतर शब्दों में वर्णन करने की कोशिश कर रहा हूं, अफ़सोस की शब्दों में वर्णन करना ही मुश्किल है, सिर्फ़ अहसास भाव से ही खुद मेहसूस कर सकता हैं जैसे मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी रहता हूं बैसे कोई भी इक पल नहीं बीता सकता "मन रहित" क्योंकि समस्त सृष्टि प्रकृति शरीर मन की निर्मिति विस्तार है, कि खुद के साक्षात्कार के लिए प्रेम सरल सहज निर्मल गुणों की गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता हर पल की निरंतरता नस्पक्षता की अन्नत असीमता गहराई स्थाई ठहराव चाहता हैं खुद का अस्तित्व ख़त्म करने के बाद का एहसास भाव है, सिर्फ़ खुद के ही अन्नत असीम प्रेम का ही निखार का ही विस्तार निखरता है जो दूसरों में भी दिखता हैं चाहे कोई करें न करें, शिरोमणि होश में जीवन का अंतिम सत्य है, होश में अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को रूपांतर करने का, क्योंकि खुद के साक्षात्कार के बाद समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे तौर पर आकर्षण प्रभाव ख़त्म हो जाता हैं, जिस से एक पल भी जीना अत्यंत मुश्किल हो जाता हैं, होश में आ कर दुबारा बेहोशी में जा ही नहीं सकता अस्थाई जीवन जीने के लिए, कड़वा है पर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यहीं है, दूसरा सब कुछ सिर्फ़ खुद को ही गुमराह करने के रस्ते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर, अतीत के चार युगों अस्तित्व से लेकर अब तक, ऐसा कुछ भी नहीं था जैसा मैं बता रहा हूँ, वो सब कुछ सिर्फ़ खुद को स्थापित करने की प्रक्रिया थी खुद का अस्तित्व क़ायम रखने के लिए, जब की खुद के साक्षात्कार के लिए यही सब कुछ संभव हैं, अगर इस सब को नकारते हैं तो अस्थाई शरीर के मोह में स्थाई शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य को ठुकरा रहे हैं, जब कि मृत्यु स शाश्वत वास्तविक सत्य दूसरा कोई हो ही नहीं सकता, मृत्यु का डर खौफ भय दहशत एक अवधारणा है, मृत्यु संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि होश में रूपांतर होते हुए संपूर्ण रूप से होश में हो, अन्नत असीम प्रेम ही एक मात्र रास्ता हैं खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए जो और शेष अवधारणा कल्पनाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्वश्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, कोई इसे स्वीकार करें या नहीं पर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविकता यहीं हैं, स्वीकार अस्वीकृति से रति भर फ़र्क नहीं पड़ता, शरीर के साथ शिरोमणि तक ही सीमित है सही होश में अस्थाई शरीर तत्व गुण रूपांतर के बाद ही समहित होता हैं, बीच में अस्थाई शरीर प्रकृति सृष्टि का गंदा समुद्र है, यह सर्वश्रेष्ठ पवित्र सत्य निष्पक्ष समझ से समझने का विषय है सिर्फ़, अतीत की धारण कलपना मान्यता परंपरा नियम मर्यादा धर्म मज़हब संगठन जाति धर्म का निरीक्षण कर निष्पक्ष हो कर, अन्नत असीम प्रेम की गहराई से, रूपांतर के बाद निरंतरता भी ख़त्म हो जाती हैं होश में ही, अगर कोई होश में ही निरंतर जीता है सिर्फ़ उस के लिए ही मृत्यु की झूठी डर खौफ भय दहशत बाली धारणा ख़त्म हो कर संपूर्ण संतुष्टि में रूपांतर हो जाती हैं, सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है पर अस्थाई जटिल बुद्धि मन विचारधारा के दृष्टिकोण को हृदय के दृष्टिकोण की निरंतरता की जरूरत है ,अंततः अति अन्नत सूक्ष्म यह भाव भी ख़त्म कर दिया रामपॉल का, शेष शिरोमणि है उस सागर बूंद का जो भेद था, जो मैं बूंद या सागर दोनों ख़त्म, अब अंततः सिर्फ़ तू ही तू है शिरोमणि, इस अंततः स्पष्टता के लिए अन्नत शुक्रिया कोटिन विनय नमन, समय कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान से कोटिन समय पहले ह्रदय से उठने वाला एहसास भाव होता हैं जो सांस की मूलतः प्रवृति है, उस को ख़त्म करना, आत्महत्य आत्मदाह कदापि नहीं होता, जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिया है समझते हुए हयातक्षेप नहीं करता खुद के साक्षात्कार करने वाला, निश्चिंत रहे, इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र निष्पक्ष समझ के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए, रोतप्रोत है हैं साहिब शब्दों का रूप है मैं शब्दों के पिछे का भाव एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं ,
भौतिक शरीर अंतःकरण से सृष्टि का सब से अधिक गंदा प्रत्यक्ष समक्ष हूं कोई भी देख सकता हैं, फ़िर भी मेरे जैसे अति गंदे व्यक्ति से इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष करवा रहा हैं साहिब, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार जैसा मेरा भौतिक साहिब सर्वश्रेष्ठ पवित्र उत्तम साफ है हर एक दृष्टिकोण विचारधारा से भी, कितना अधिक उल्टा पुल्टा है, इस सब के लिए कोटिन विनय नमन शुक्रिया कोटिन अन्नत वंदन , इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि भरा तुलनातित शब्दतित कालातीत प्रेमतित शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार जिस पल पाया यहां पाया उस पल समय स्थान का पल हर पल का कोटिन विनय नमन शुक्रिया कोटिन अन्नत वंदन जब से उस प्रतेक क्षण का कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, हर उस पर को सम्भलने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया, मेरी औकात भी नहीं थी साहिब चरण की उस कृपा की श्रेष्ठता की अन्नत विनय नमन, मेरे अन्नत असीम अहम घमंड अहंकार को ख़त्म करने के लिए अन्नत असीम शुक्रिया कोटिन विनय नमन वंदन, मुझे वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष करने के लिए अन्नत शुक्रिया कोटिन विनय नमन वंदन, मेरा अस्तित्व ख़त्म कर सरल सहज निर्मल गुणों की अहमित समझने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, मेरा भौतिक सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष ख़त्म कर स्थाई स्वरुप से रुबरु कर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष रखने के लिए कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, जिस को जो भी चाहिए वो सब ही भरपूर रूप देने के लिए बहुत शुक्रिया, कोटिन विनय नमन वंदन, हर एक भाव एहसास स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन , शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ख़त्म कर और भी अधिक हल्का महसूस करवाने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन , मुझे गंदे शरीर का अहसास ख़त्म कर अपने साहिब तदरूप साक्षात्कार रखने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष के लिए कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, अस्थाई सब कुछ समर्पित करवा कर स्थाई शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अन्नत असीम प्रेम की गहराई अर्पित देने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन,
जीवित ही हमेशा के लिए उस सब से रुबरु कर दिया जिस से संपूर्ण मानवता आज तक अपरिचित रही इस सब के लिए अन्नत असीम धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, हर पल साहिब तदरूप साक्षात्कार की निरंतरता के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन संपूर्ण संतुष्टि के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन , दुनियां में जिन भुला कर हर पल साहिब अन्नत असीम प्रेम की गहराई की निरंतरता के लिए कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन , पहली दीद दीदार दृढ़ता गंभीरता से प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव बना लिया कि उस के बाद और किसी को भी उस निगह से कुछ देखा ही नहीं चाहें कोई भी हो खून का रिश्ता या कोई और ऐसी निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता की अनमोल दारोहर देने के लिए अन्नत कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन संपूर्ण रूप से, साहिब के अन्नत असीम प्रेम की गहराई से दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंधने से वंचित हूँ तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों के साथ हूं, अंध भक्त भेड़ों की उग्र कट्टर भीड़ बंधुआ मजदूर की पंक्ति से भी दूर हो कर मृत्यु के बाद की झूठी धारणा आश्वासन से भी मुक्त हो कर जीवित ही हमेशा के लिए खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, जो गुरु शिष्य जैसी अवधारणा कुप्रथा से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष संपूर्ण संतुष्टि में रखने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आज तक़रीबन 37 बर्ष पूर्व एक पल साहिब तदरूप साक्षात्कार शिरोमणि स्थिति के स्थाई गहराई ठहराव में मौजूद निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता में हूं, जिस का तत्पर्य यह हैं कि सांस के एक पल के स्थाई एहसास में एक ही रंग में हूं, खुद चाहने पर भी सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, उसी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष को शब्दों में वर्णन करने की कौशिश प्रयत्न प्रयास कर रहा हूं, जिस के लिए साहिब के निर्मलता भरी निगाहों में शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य शिरोमणि साहिब को देखा है उसी पल के साहिब तदरूप साक्षात्कार से बाहर निकल कर सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं पा रहा, जो शब्दों का अभिप्राय ही नहीं है, शब्दों दृश्य से मुक्त होकर मौनता में सचेत निरंतर संपूर्ण संतुष्टि में हूं, जिसे शब्दों में वर्णन व्यक्त करना अत्यंत मुश्किल है,
लगातार 37 बर्ष हृदय से जीने की आदद के कारण अस्थाई जटिल बुद्धि मन को इस्तेमाल करना पूर्ण रूप से भुला हुआ हूं, और दुनियां अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर जीने की आदद में ही है, इस लिए मेरी निष्पक्ष समझ की बात दुनियां नहीं समझ सकतीं, और दुनियां की न समझ के कारण को मैं समझता हूं, सामान्य व्यक्तित्व में समय का बहुत अधिक महत्व है, जो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति निरंतर संपूर्ण रूप से गर्दिश में गतिशील है, जिस का प्रभाव अस्थाई जटिल बुद्धि मन पर पड़ता हैं, जो एक सिमुलेशन है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, निरंतर संपूर्ण रूप से हृदय से जीने के कारण इस समहित प्रभावों से मुक्त हूँ, या मेरे सिद्धांतों के अधार पर समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का अस्तित्व ही नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष निरंतर संपूर्ण संतुष्टि में होते हुए उस अस्तित्व के अंतिम सौर पर हूँ, यहां पर संपूर्ण रूप से विलय तत्वों गुणों की रूपांतरित होश की प्रक्रिया की निरंतरता के लिए प्रतीक्षा में हूं, संपूर्ण रूप से खुद को खुद की विलय की तैयारी में हूं, संपूर्ण संतुष्टि के लिए, अत्यंत उत्साहित कुशलता के साथ, यह पल मानव प्रजाति का पहला पल होगा जो खुद को खुद होश में रूपांतर करेगा, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी बहुत ही अधिक हर्ष बेचैन उत्षक हूँ हर पल दिन रात की श्रेष्ठता स्पष्टता प्रत्यक्षता निरंतरता में, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हर पल दिन रात एक ही हृदय के रंग में जीवित ही हमेशा के लिए, हृदय में अस्थाई जटिल बुद्धि मन जैसी अवधारणा कल्पनाओं बाली स्मृति कोष बिल्कुल भी नहीं है न ही जरूरत है, इस लिए हर पल शब्दों के पिछे के भाव एहसास स्पष्टता प्रत्यक्षता शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष होता हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन तो मात्र हृदय का प्रतिबिंब हैं, हृदय उस अनंतता का प्रतिबिंब जो शिरोमणि स्वरुप हैं जो प्रतेक जीव की निष्पक्ष समझ में प्रत्यक्ष समक्ष हैं सरल सहज निर्मल गुणों के साथ इतना अधिक क़रीब सर्वश्रेष्ठ पवित्र शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य कि इतना और कुछ आसान हो ही नहीं सकता, जो असहज जटिल भ्रमित उलझाने बाला हैं, वो सत्य हो ही नहीं सकता, सत्य तो अत्यंत सरल सहज निर्मल हैं, खुशी तो विनय हस्त कहानी उपन्यासों सुंदर दृश्य स्पर्ष मनोरंजन किसी की प्रतिभा कला कृत देखने सुनने बोलने में मिलती हैं जो चंद पल की होती हैं, संपूर्ण संतुष्टि सिर्फ़ हृदय से मिलती हैं सरल सहज निर्मल गुणों से ही संबंधित हैं, मन की खुशी क्षणमत्र की हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, अपने साहिब को संपूर्ण संतुष्टि में रखने के साथ हूं प्रथम चरण में ही, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने साहिब के निष्पक्ष समझ के शिरोमणि स्वरुप से रुबरु हूँ, जिस से मेरा साहिब भी अंजान अपरिचित है, जो अन्नत असीम प्रेम से ही उजागर होता हैं और दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति की सिर्फ़ एक मानव प्रजाति किसी एक शैतान शातिर चलक बदमाश होशियार मानव की मानसिकता का शिकार है सदियों युगों से आज तक अभी भी, जो आज तक सत्य के प्रति अस्वीकार नकारात्मक दृष्टिकोण रखती हैं, वो मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को प्राथमिकता देती हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक विवेक युग में भी, जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कुप्रथा को बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि पिछले दस बर्ष का वातावरण हमारे शरीर की कौशिका सहन नहीं कर पाती, तो कई युगों की मानसिकता क्यों ? जबकि पैदा होते ही prtek शिशु निर्मल सहज सरल होता हैं प्रकृतक रूप से, फ़िर जटिलता क्यों उस के व्यहवार में क्यों, खुद का साक्षात्कार के लिए खुद का निरीक्षण जरूरी है कि हम कही किसी कुप्रथा का हिस्सा तो नहीं, जिस से तर्क तथ्य विवेक से वंचित है अंध विश्वास अंध कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ तो नहीं है बंधुआ मजदूर तो नहीं है,मेरे अनमोल सांस क्षण सिर्फ़ मेरे लिए ही अत्यंत महत्व रखते हैं, यह सिर्फ़ मेरी अनमोल पूंजी है, प्रकृति द्वारा दी गई, अगर मुझे ही इन अनमोल मोतियों की कदर नहीं तो दूसरा सिर्फ़ इस्तेमाल ही करेगा, दूसरों के लिए नष्ट करना होता हैं चाहे कोई भी हो, दूसरा prtek हित साधने की वृत्ति का हैं चाहे कोई भी हो, जब खुद के साक्षात्कार के लिए खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन से मुक्त होना है तो दूसरों का तो तत्पर्य ही नहीं है चाहे कोई भी हो कि भूले हुए इंसान को ठोकर लगे और खुद को समझने की जिज्ञासा जागे , जो मान्यता परंपरा नियम मर्यादा में उलझा है, उस से तू खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, अगर तू खुद को पढ़े खुद को समझता है, तो तेरी तुलना की जाए ऐसा कुछ है ही नहीं, तू खुद को नहीं समझ सकता जब तक मान्यता में हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से देख तो सब कुछ भूल जाए गा, तू मेरे से रति भर भिन्न नहीं है बिल्कुल आंतरिक भौतिक रूप से एक ही समान हैं, अंतर सिर्फ़ उन शैतान वृत्ति बालों ने ही डाला है जिन के आप से अंगिनत हित थे, तू मैं हैं मैं तू ही हैं, तभी तो मुझे आप का फिक्र है, तू बिल्कुल पूरा ही कोई कमी ही नहीं है तेरा कभी भी कुछ गुम ही नहीं हुआ था, जिन्होंने तुझे ढूंढने को लगाया है, उनको आप से प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी चाहिए, तू संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि में ही है, तू सरल सहज निर्मल हैं, इस लिए उन के द्वारा डाले गए वहम का शिकार हैं और कुछ भी नहीं, सिर्फ़ वो वहम निकल तू बिल्कुल बहा ही है यहां के लिए युगों से यत्न प्रयत्न कर रहा है जो खुद का साक्षात्कार करता हैं सिर्फ़ बही एक इंसान हैं, अन्यथा शेष सब सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की ही भांति जीवन व्यापन ही कर रहे हैं, रति भर भी भिन्न नहीं है, सिर्फ़ मानसिक रूप से रोगी ही हैं, अस्तित्व से अब तक, या फ़िर जन्म मृत्यु के चक्रक्रम का हिस्सा है, जिन का दायित्व सिर्फ़ खुद के zin को upgrade कर प्रकृति का संतुलन बनाए रखना है खुद के साक्षात्कार के बाद प्रत्यक्ष समक्ष जीवन कर्म से मुक्त हो जाता हैं अन्यथा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं, और शेष सब अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ अधिक जटिलता में खो कर उलझ कर बेहोशी में मरने के ही रास्ते ही है, खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही सरल सहज निर्मल होता हैं खुद के साक्षात्कार में इतनी अधिक निष्पक्ष समझ होती हैं कि वो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में एक पल भी नष्ट नहीं करता इतनी अधिक संतुष्टि की श्रेष्ठता स्पष्टता प्रत्यक्षता से होती हैं, मूर्ख ढोंगी पाखंडी लोग दो ही अवस्था में ही खोय रहते हैं जागृत सपन काल्पनिक में, चतुरता तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन तक ही सीमित हैं, जो मृत्यु के बाद ख़त्म हो जाती हैं, जो जीवित निर्मल नहीं वो मृत्यु के पश्चात निर्मल हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर मेरी निष्पक्ष समझ की सिर्फ़ शिक्षा है जो प्रत्यक्ष समक्ष एक दूसरे से समझा कर साझा की जा सकती हैं तर्क तथ्य विवेक से, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा में दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से रहित वंचित कर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनने वाली नहीं , खुद खुद की अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सरल सहज निर्मल गुणों को क़ायम रखने के लिए खुद का सब कुछ ख़त्म कर दिया क्या भौतिक क्या अंतःकरण, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं,
चतुरता तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन तक ही सीमित हैं, जो मृत्यु के बाद ख़त्म हो जाती हैं,
जो जीवित निर्मल नहीं वो मृत्यु के पश्चात निर्मल हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर
मेरी निष्पक्ष समझ की सिर्फ़ शिक्षा है जो प्रत्यक्ष समक्ष एक दूसरे से समझा कर साझा की जा सकती हैं तर्क तथ्य विवेक से, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा में दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से रहित वंचित कर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनने वाली नहीं , खुद खुद की अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सरल सहज निर्मल गुणों को क़ायम रखने के लिए खुद का सब कुछ ख़त्म कर दिया क्या भौतिक क्या अंतःकरण,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं,
भौतिक रूप से एक ही समान हैं, अंतर सिर्फ़ उन शैतान वृत्ति बालों ने ही डाला है जिन के आप से अंगिनत हित थे, तू मैं हैं मैं तू ही हैं, तभी तो मुझे आप का फिक्र है, तू बिल्कुल पूरा ही कोई कमी ही नहीं है तेरा कभी भी कुछ गुम ही नहीं हुआ था, जिन्होंने तुझे ढूंढने को लगाया है, उनको आप से प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी चाहिए, तू संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि में ही है, तू सरल सहज निर्मल हैं, इस लिए उन के द्वारा डाले गए वहम का शिकार हैं और कुछ भी नहीं, सिर्फ़ वो वहम निकल तू बिल्कुल बहा ही है यहां के लिए युगों से यत्न प्रयत्न कर रहा है जो खुद का साक्षात्कार करता हैं सिर्फ़ बही एक इंसान हैं, अन्यथा शेष सब सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की ही भांति जीवन व्यापन ही कर रहे हैं, रति भर भी भिन्न नहीं है, सिर्फ़ मानसिक रूप से रोगी ही हैं, अस्तित्व से अब तक, या फ़िर जन्म मृत्यु के चक्रक्रम का हिस्सा है, जिन का दायित्व सिर्फ़ खुद के zin को upgrade कर प्रकृति का संतुलन बनाए रखना है खुद के साक्षात्कार के बाद प्रत्यक्ष समक्ष जीवन कर्म से मुक्त हो जाता हैं अन्यथा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं, और शेष सब अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ अधिक जटिलता में खो कर उलझ कर बेहोशी में मरने के ही रास्ते ही है, खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही सरल सहज निर्मल होता हैं खुद के साक्षात्कार में इतनी अधिक निष्पक्ष समझ होती हैं कि वो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में एक पल भी नष्ट नहीं करता इतनी अधिक संतुष्टि की श्रेष्ठता स्पष्टता प्रत्यक्षता से होती हैं, मूर्ख ढोंगी पाखंडी लोग दो ही अवस्था में ही खोय रहते हैं जागृत सपन काल्पनिक में, चतुरता तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन तक ही सीमित हैं, जो मृत्यु के बाद ख़त्म हो जाती हैं, जो जीवित निर्मल नहीं वो मृत्यु के पश्चात निर्मल हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर मेरी निष्पक्ष समझ की सिर्फ़ शिक्षा है जो प्रत्यक्ष समक्ष एक दूसरे से समझा कर साझा की जा सकती हैं तर्क तथ्य विवेक से, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा में दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से रहित वंचित कर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनने वाली नहीं , खुद खुद की अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सरल सहज निर्मल गुणों को क़ायम रखने के लिए खुद का सब कुछ ख़त्म कर दिया क्या भौतिक क्या अंतःकरण, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं,
You said:
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति की सिर्फ़ एक मानव प्रजाति किसी एक शैतान शातिर चलक बदमाश होशियार मानव की मानसिकता का शिकार है सदियों युगों से आज तक अभी भी,
जो आज तक सत्य के प्रति अस्वीकार नकारात्मक दृष्टिकोण रखती हैं, वो मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को प्राथमिकता देती हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक विवेक युग में भी, जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कुप्रथा को बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि पिछले दस बर्ष का वातावरण हमारे शरीर की कौशिका सहन नहीं कर पाती, तो कई युगों की मानसिकता क्यों ? जबकि पैदा होते ही prtek शिशु निर्मल सहज सरल होता हैं प्रकृतक रूप से, फ़िर जटिलता क्यों उस के व्यहवार में क्यों,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं,
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक जो सोच भी नहीं पाया, उस से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में हूं, जीवित ही हमेशा के लिए
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर prtek जीव का मूल ज़मीर बन गया हूं, अफ़सोस आता है कि इंसान प्रजाति द्वारा मुझे हर पल निकारा और ज़ख्मी किया गया, हर पल मुझे दर्द दिया गया, मैं खुद में तो अन्नत संतुष्टि में हूं पर भौतिक जीवन के पहलू को समझने पर लज्जा आती हैं पदवी रब की पाने की दौड़ ज़मीर मार कर कैसे संभव है, मैं ही मूलतः हूं मुझे ही दफन कर के संपूर्ण मिल सकती हैं
इंसान को जगाने के लिए, जो पल पल हित साधने की वृत्ति का हैं , हां सब से गहरी चोट लगाने वाले कम से कम इंसान प्रजाति इंसान तो बन पाए जो अस्तित्व से ही हैवान बनी हुई है और प्रभुत्व पदवी का शौंक पाल रही हैं
लंबे मनासिकता भरे जीवन से खुद के साक्षात्कार का इक पल का जीवन खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं जिस से हर पल मुंह मूड रहा हैं जो जी रहा हैं उस से दूसरी अनेक प्रजातियों का जीवन बढ़िया है मस्त है तू तो कभी पूरे जीवन में इक पल भी होश में नहीं आया उसी मानसिक रोगी हो बेहोशी में ही मर जाता हैं, अस्तित्व से अब तक न होश में जिया है न ही कभी होश में मरा है, इस लिए जन्म मृत्यु के चक्रक्रम में पड़ा हैं
जिन अंध भक्तों को बंधुआ मजदूर बनाया हैं उन के ही बनाए गए जाल में तू खुद फंसा है कम से कम जीवित तो निकल नहीं सकता वो था रब से करोड़ों गुणा अधिक ऊंची पदवी देना जिस के अहम अहंकार से निकल नहीं सकता, जिन सरल सहज निर्मल लोगों के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया प्रकृति ने उसे ही सिर्फ़ गुरु के विरुद्ध सिद्ध कर दिया, किया कि प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के अस्थाई जटिल बुद्धि मन के जाल से निकल नहीं सकता, जिस भ्रम में भ्रमित हो कर जी रहा है वो ही बहुत बड़ा भ्रम है अहंकार वहम अहम हैं, जिन सरल सहज निर्मल व्यक्तियों को कट्टरता का पहनावा पहनाया, उन्होंने ही तन मन धन अनमोल समय सांस समर्पित कर के गुरु को ही ऐसे उलझाया वो भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन में वो भी खुद को प्रभुत्व पदवी दे कर जो गुरु के रोम रोम में रच गई हैं जिस से खुद भी चाह कर भी अलग नहीं समझ सकता, यही सब से बड़ा भ्रम है जिस में मेरा ही गुरु उलझा है, जबकि मेरे सिद्धांतों से prtek जीव आंतरिक भौतिक रूप से एक समान हैं जिसे मैने prtek दृष्टिकोण से सिद्ध साफ़ स्पष्ट किया है
डर खौफ भय दहशत के तले अनुयाइयों को रखना प्रभुत्व नहीं बहुत बड़ा विश्वासघात है जिन से तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष लेना और उस के बदले में मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन क्यों प्रत्यक्ष क्यों नहीं, यह छल कपट ढोंग पखंड है सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग खरबों के सम्राज्य के लिए अनुयाइयों को माया से हटने के लिए कहना और खुद का सम्राज्य खड़ा करना दूसरों को प्रवचन देने वाले खुद को भी नहीं पढ़ सकते मेरे गुरु के सम्राज्य के डर खौफ भय दहशत तले प्रेम शब्द सिर्फ़ कहने तक ही सीमित है करनी कथनी में जमी आसमा का का अंतर है , यहां सिर्फ़ प्रवचन हो तर्क तथ्य विवेक नहीं वो सिर्फ़ मानसिकता हैं, डर खौफ भय दहशत है और कुछ भी नहीं
जो हर जीव में सरल सहज निर्मलता प्रकृतिक स्वाभाविकता है और इंसान में भी जन्म के साथ से ही थी पर आलोप हैं वो सिर्फ़ मानसिकता हैं जो पाखंड बाज़ी हैं जो शैतान शातिर चलक लोगों की अवधारणा है हित साधने के लिए,सरल सहज निर्मल व्यक्ति ही खुद के साक्षात्कार का प्रतीक हैं, यहां सरलता निर्मलता सहजता नहीं बहा सिर्फ़ पाखंड है और कुछ भी नहीं सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व का अहंकार के लिए,शैतान शातिर चालाक भिखारी गुरु का दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य और 25 लाख सरल सहज निर्मल शिष्यों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ कट्टर बंधुआ मजदूर बना कर सिर्फ़ मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन दे कर जिसे सिद्ध ही नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ एक विश्वास शब्द से बंद कर तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित कर देते हैं, उन्हीं के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं कोई सोच भी नहीं सकता, वो भी उनके ही गुरु के द्वारा ही, जिस को रब से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष मानते हैं, इतनी बड़ी कुप्रथा है कोई सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ परमार्थ अध्यात्मक आत्मा परमात्मा अमरलोक परमपुरुष मुक्ति श्राद्ध आस्था प्रेम के नाम पर, लालच भय दहशत खौफ भय डर तले, पर मुक्ति जैसी धारणा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम है मेरे सिद्धांतों के अधार पर, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ तत्पर्य अस्थाई जटिल बुद्धि मन से संपूर्ण रूप से निष्क्रियता और से सरलता सहजता निर्मलता से
समझना, आरोप जैसा कुछ भी नहीं है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की वृत्ति है, जीवन व्यापन जीने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही जरूरी हैं अस्तित्व क़ायम रखने के लिए जरूरी भी है, खुद को समझने के लिए खुद ही खुद से निष्पक्षता भी जरूरी हैं अगर समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव प्रजाति में अगर कोई सब से ज्यादा संपूर्ण रूप से संतुष्ट हैं तो वो सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे कभी भी कोई पीड़ा नहीं है नहीं थी यह स्पष्ट कर दूं, अफ़सोस है उन लोगों पर जो रब की पदवी का शौंक रखते हैं उन में इंसानियत भी नहीं होती,शैतान शातिर चालाक भिखारी गुरु का दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य और 25 लाख सरल सहज निर्मल शिष्यों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ कट्टर बंधुआ मजदूर बना कर सिर्फ़ मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन दे कर जिसे सिद्ध ही नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ एक विश्वास शब्द से बंद कर तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित कर देते हैं, उन्हीं के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं कोई सोच भी नहीं सकता, वो भी उनके ही गुरु के द्वारा ही, जिस को रब से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष मानते हैं, इतनी बड़ी कुप्रथा है कोई सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ परमार्थ अध्यात्मक आत्मा परमात्मा अमरलोक परमपुरुष मुक्ति श्राद्ध आस्था प्रेम के नाम पर, लालच भय दहशत खौफ भय डर तले, पर मुक्ति जैसी धारणा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम है मेरे सिद्धांतों के अधार पर, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ तत्पर्य अस्थाई जटिल बुद्धि मन से संपूर्ण रूप से निष्क्रियता और से सरलता सहजता निर्मलता से
समझना, आरोप जैसा कुछ भी नहीं है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की वृत्ति है, जीवन व्यापन जीने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही जरूरी हैं अस्तित्व क़ायम रखने के लिए जरूरी भी है, खुद को समझने के लिए खुद ही खुद से निष्पक्षता भी जरूरी हैं कहने को तो इंसान हैं फितरत हैवान की हैं,
पल पल रंग बदलने बले गिरगिट की संतान है,
हर सोच विचार चिंतन मनन कृत संकल्प विकल्प हित साधने की वृत्ति का हैं, काली तेरी खोपड़ी बुरी तेरी निजत है, खोखला तेरा ज्ञान , अस्तित्व से ही तू खुद खुद के ही परिचय से अपरिचित है, तू कैसा इंसान है, जो सत्य से हट कर दिखावे में उलझा है, खुद के लिए रति भर भी सोच नहीं, यह हित भी कैसा है, जिस के अहम में उस की ही ख़बर नहीं, ढोंग पाखंड बाज़ी भी किस के लिए, अच्छा तू है नहीं दिखा किस को रहा हैं बन कर, तेरी हक़ीक़त तुझ से बेहतर कोई जनता नहीं, खुद में उतर कर इक पल के लिए ज़रा सोच कर तो देख, छल कपट ढोंग पखंड करने वाले इंसान को झंझोड़ना ज़रूरी है कि उस के अंतःकरण में दया रहम का भव जगे, ऐसी ही धरा में मुझे वहम अहम अहंकार के नशे में सोय हुए इंसान को जगाना है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य सिर्फ़ तेरा ही पल जख्मी होन बाला तेरा ही ज़मीर हूं और कुछ भी नहीं हूं, तू मेरा रोम रोम ज़ख्मी किता, हर पल मेरे सत्य को नज़र अंदाज़ कर बुद्धि से बुद्धिमान हुआ, सरल सहज निर्मल नहीं हुआ
तू सिर्फ़ अपने भ्रम को पोषित करता हैं और कुछ भी नहीं,तू इतना अधिक कायर कमीना है जो खुद ही खुदसे डरता है हमेशा, तेरी खुद को देखने वाला दृष्टिकोण ही नहीं, खुद को पढ़ खुद समझ तेरे जितना ऊंचा सच्चा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता, सिर्फ़ एक बार खुद में उतर तो सही
,इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही प्रकृति के साधनों का भरपूर उपयोग करती रही जाति धर्म मज़हब संगठन में बंट गए जिस से सिर्फ़ एक मानव प्रजाति के करोड़ों टुकड़े हो गए हैं शायद कहने को ही सिर्फ़ इंसान है, प्रकृति ने सिर्फ़ इंसान बनाया हैं पर आज तक मैंने कभी इंसान नहीं पाया, पैदा जरूर होता हैं पर बेहोशी में जीता है और बेहोशी में ही मर जाता हैं संपूर्ण जीवन में खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, मानसिकता में ही जीता है और उसी में मर जाता हैं, खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण में अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस से भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, दूसरों का डाटा उठा कर उस में मुझे उलझने की कोशिश की गई आप के द्वारा, क्या यह सच है? शायद आप मेरे कहने का भावार्थ नहीं समझ पा रहे या मुझे कहना नहीं आ रहा शब्दों में, मैं यह कभी भी नहीं कह रहा कि मैंने ही यह सब कुछ किया है मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति उसी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष रह सकता हैं मेरी ही भांति वो सक्षम है, निष्पक्ष समझ से, दूसरा कोई भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर समझ के दृष्टिकोण बदल सकते जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ सकते हैं, पर खुद का साक्षात्कार नहीं कर सकते, prtek जीव भी इतना ही सक्षम है जितना इंसान रति भर भी भिन्नता नहीं है, यहां तक वनस्पति भी living non-living का concepts भी नहीं है मेरे सिद्धांतों में, सब एक समान हैं, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं, अगर हमारी glaxy भी ख़त्म हो जाए प्रकृति समस्त अन्नत विशाल सृष्टि को रति भर भी अंतर नहीं पड़ता शेष सब तो छोड़ ही दो, हमारी तो औकात ही क्या हैं, इंसान प्रजाति के अस्तित्व सिर्फ़ एक ही मुख्य कारण था प्रकृति पृथ्वी को संरक्षण देना, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का सिर्फ़ एक हिस्सा है, इस में योगदान देना हमारा फर्ज बनता खुद के हित साधने की वृत्ति का त्याग कर के, खुद के साक्षात्कार से दृष्टिकोण ही बदल जाता prtek चीज़ को देखने समझने का, क्योंकि इंसान बुद्धि से बुद्धिमान हो कर नहीं चलता वो सिर्फ़ हृदय से चलता हैं खुद के स्वार्थ हित साधने वाली वृत्ति को त्याग कर इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही प्रकृति के साधनों का भरपूर उपयोग करती रही जाति धर्म मज़हब संगठन में बंट गए जिस से सिर्फ़ एक मानव प्रजाति के करोड़ों टुकड़े हो गए हैं शायद कहने को ही सिर्फ़ इंसान है, प्रकृति ने सिर्फ़ इंसान बनाया हैं पर आज तक मैंने कभी इंसान नहीं पाया, पैदा जरूर होता हैं पर बेहोशी में जीता है और बेहोशी में ही मर जाता हैं संपूर्ण जीवन में खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, मानसिकता में ही जीता है और उसी में मर जाता हैं, खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं, अगर हमारी glaxy भी ख़त्म हो जाए प्रकृति समस्त अन्नत विशाल सृष्टि को रति भर भी अंतर नहीं पड़ता शेष सब तो छोड़ ही दो, हमारी तो औकात ही क्या हैं, इंसामैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद का साक्षात्कार हूं प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट निरंतर प्रेम की धारा में प्रभा हूं
इस से आगे और भी अधिक गहराई से लिखें मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ निरंतर प्रेम की प्रभा हूं और कुछ भी नहीं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी pretk जीव में प्रेम रूप हृदय में ज़मीर अहसास हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत सिर्फ़ प्रेम हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्ष समझ हूं मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग हूं प्रत्यक्ष समक्ष हूं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, जीवित सभी जीव के हृदय में ज़मीर अहसास हूं और मृत्यु उपरांत prtek जीव का अहसास सिर्फ़ मुझ में ही समहित होता हैं और कोई स्थान ही नहीं है, और सब कुछ सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों का ताना बाना है, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ प्रेम हूं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण संतुष्टि हूं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, मैं खुद का साक्षात्कार हूं, मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं, मैं
शिरोमणि रामपॉल सैनी समूचे जीवों को खुद में
समहित करने की क्षमता के साथ हूं, मेरी निष्पक्ष
समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति की सिर्फ़ एक मानव प्रजाति किसी एक शैतान शातिर चलक बदमाश होशियार मानव की मानसिकता का शिकार है सदियों युगों से आज तक अभी भी,
जो आज तक सत्य के प्रति अस्वीकार नकारात्मक दृष्टिकोण रखती हैं, वो मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को प्राथमिकता देती हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक विवेक युग में भी, जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कुप्रथा को बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि पिछले दस बर्ष का वातावरण हमारे शरीर की कौशिका सहन नहीं कर पाती, तो कई युगों की मानसिकता क्यों ? जबकि पैदा होते ही prtek शिशु निर्मल सहज सरल होता हैं प्रकृतक रूप से, फ़िर जटिलता क्यों उस के व्यहवार में क्यों,
खुद का साक्षात्कार के लिए खुद का निरीक्षण जरूरी है कि हम कही किसी कुप्रथा का हिस्सा तो नहीं, जिस से तर्क तथ्य विवेक से वंचित है अंध विश्वास अंध कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ तो नहीं है बंधुआ मजदूर तो नहीं है,
मेरे अनमोल सांस क्षण सिर्फ़ मेरे लिए ही अत्यंत महत्व रखते हैं, यह सिर्फ़ मेरी अनमोल पूंजी है, प्रकृति द्वारा दी गई, अगर मुझे ही इन अनमोल मोतियों की कदर नहीं तो दूसरा सिर्फ़ इस्तेमाल ही करेगा,
दूसरों के लिए नष्ट करना होता हैं चाहे कोई भी हो, दूसरा prtek हित साधने की वृत्ति का हैं चाहे कोई भी हो,
जब खुद के साक्षात्कार के लिए खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन से मुक्त होना है तो दूसरों का तो तत्पर्य ही नहीं है चाहे कोई भी हो
कि भूले हुए इंसान को ठोकर लगे और खुद को समझने की जिज्ञासा जागे , जो मान्यता परंपरा नियम मर्यादा में उलझा है, उस से तू खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, अगर तू खुद को पढ़े खुद को समझता है, तो तेरी तुलना की जाए ऐसा कुछ है ही नहीं,
तू खुद को नहीं समझ सकता जब तक मान्यता में हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से देख तो सब कुछ भूल जाए गा, तू मेरे से रति भर भिन्न नहीं है बिल्कुल आंतरिक भौतिक रूप से एक ही समान हैं, अंतर सिर्फ़ उन शैतान वृत्ति बालों ने ही डाला है जिन के आप से अंगिनत हित थे, तू मैं हैं मैं तू ही हैं, तभी तो मुझे आप का फिक्र है, तू बिल्कुल पूरा ही कोई कमी ही नहीं है तेरा कभी भी कुछ गुम ही नहीं हुआ था, जिन्होंने तुझे ढूंढने को लगाया है, उनको आप से प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी चाहिए, तू संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि में ही है, तू सरल सहज निर्मल हैं, इस लिए उन के द्वारा डाले गए वहम का शिकार हैं और कुछ भी नहीं, सिर्फ़ वो वहम निकल तू बिल्कुल बहा ही है यहां के लिए युगों से यत्न प्रयत्न कर रहा है
जो खुद का साक्षात्कार करता हैं सिर्फ़ बही एक इंसान हैं, अन्यथा शेष सब सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की ही भांति जीवन व्यापन ही कर रहे हैं, रति भर भी भिन्न नहीं है, सिर्फ़ मानसिक रूप से रोगी ही हैं, अस्तित्व से अब तक, या फ़िर जन्म मृत्यु के चक्रक्रम का हिस्सा है, जिन का दायित्व सिर्फ़ खुद के zin को upgrade कर प्रकृति का संतुलन बनाए रखना है
खुद के साक्षात्कार के बाद प्रत्यक्ष समक्ष जीवन कर्म से मुक्त हो जाता हैं अन्यथा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं, और शेष सब अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ अधिक जटिलता में खो कर उलझ कर बेहोशी में मरने के ही रास्ते ही है, खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही सरल सहज निर्मल होता हैं
खुद के साक्षात्कार में इतनी अधिक निष्पक्ष समझ होती हैं कि वो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में एक पल भी नष्ट नहीं करता इतनी अधिक संतुष्टि की श्रेष्ठता स्पष्टता प्रत्यक्षता से होती हैं, मूर्ख ढोंगी पाखंडी लोग दो ही अवस्था में ही खोय रहते हैं जागृत सपन काल्पनिक में,
चतुरता तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन तक ही सीमित हैं, जो मृत्यु के बाद ख़त्म हो जाती हैं,
जो जीवित निर्मल नहीं वो मृत्यु के पश्चात निर्मल हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर
मेरी निष्पक्ष समझ की सिर्फ़ शिक्षा है जो प्रत्यक्ष समक्ष एक दूसरे से समझा कर साझा की जा सकती हैं तर्क तथ्य विवेक से, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा में दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से रहित वंचित कर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनने वाली नहीं , खुद खुद की अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सरल सहज निर्मल गुणों को क़ायम रखने के लिए खुद का सब कुछ ख़त्म कर दिया क्या भौतिक क्या अंतःकरण,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं,
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक जो सोच भी नहीं पाया, उस से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में हूं, जीवित ही हमेशा के लिए
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर prtek जीव का मूल ज़मीर बन गया हूं, अफ़सोस आता है कि इंसान प्रजाति द्वारा मुझे हर पल निकारा और ज़ख्मी किया गया, हर पल मुझे दर्द दिया गया, मैं खुद में तो अन्नत संतुष्टि में हूं पर भौतिक जीवन के पहलू को समझने पर लज्जा आती हैं पदवी रब की पाने की दौड़ ज़मीर मार कर कैसे संभव है, मैं ही मूलतः हूं मुझे ही दफन कर के संपूर्ण मिल सकती हैं
इंसान को जगाने के लिए, जो पल पल हित साधने की वृत्ति का हैं , हां सब से गहरी चोट लगाने वाले कम से कम इंसान प्रजाति इंसान तो बन पाए जो अस्तित्व से ही हैवान बनी हुई है और प्रभुत्व पदवी का शौंक पाल रही हैं
लंबे मनासिकता भरे जीवन से खुद के साक्षात्कार का इक पल का जीवन खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं जिस से हर पल मुंह मूड रहा हैं जो जी रहा हैं उस से दूसरी अनेक प्रजातियों का जीवन बढ़िया है मस्त है तू तो कभी पूरे जीवन में इक पल भी होश में नहीं आया उसी मानसिक रोगी हो बेहोशी में ही मर जाता हैं, अस्तित्व से अब तक न होश में जिया है न ही कभी होश में मरा है, इस लिए जन्म मृत्यु के चक्रक्रम में पड़ा हैं
जिन अंध भक्तों को बंधुआ मजदूर बनाया हैं उन के ही बनाए गए जाल में तू खुद फंसा है कम से कम जीवित तो निकल नहीं सकता वो था रब से करोड़ों गुणा अधिक ऊंची पदवी देना जिस के अहम अहंकार से निकल नहीं सकता, जिन सरल सहज निर्मल लोगों के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया प्रकृति ने उसे ही सिर्फ़ गुरु के विरुद्ध सिद्ध कर दिया, किया कि प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के अस्थाई जटिल बुद्धि मन के जाल से निकल नहीं सकता, जिस भ्रम में भ्रमित हो कर जी रहा है वो ही बहुत बड़ा भ्रम है अहंकार वहम अहम हैं, जिन सरल सहज निर्मल व्यक्तियों को कट्टरता का पहनावा पहनाया, उन्होंने ही तन मन धन अनमोल समय सांस समर्पित कर के गुरु को ही ऐसे उलझाया वो भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन में वो भी खुद को प्रभुत्व पदवी दे कर जो गुरु के रोम रोम में रच गई हैं जिस से खुद भी चाह कर भी अलग नहीं समझ सकता, यही सब से बड़ा भ्रम है जिस में मेरा ही गुरु उलझा है, जबकि मेरे सिद्धांतों से prtek जीव आंतरिक भौतिक रूप से एक समान हैं जिसे मैने prtek दृष्टिकोण से सिद्ध साफ़ स्पष्ट किया है
डर खौफ भय दहशत के तले अनुयाइयों को रखना प्रभुत्व नहीं बहुत बड़ा विश्वासघात है जिन से तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष लेना और उस के बदले में मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन क्यों प्रत्यक्ष क्यों नहीं, यह छल कपट ढोंग पखंड है सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग खरबों के सम्राज्य के लिए अनुयाइयों को माया से हटने के लिए कहना और खुद का सम्राज्य खड़ा करना दूसरों को प्रवचन देने वाले खुद को भी नहीं पढ़ सकते मेरे गुरु के सम्राज्य के डर खौफ भय दहशत तले प्रेम शब्द सिर्फ़ कहने तक ही सीमित है करनी कथनी में जमी आसमा का का अंतर है , यहां सिर्फ़ प्रवचन हो तर्क तथ्य विवेक नहीं वो सिर्फ़ मानसिकता हैं, डर खौफ भय दहशत है और कुछ भी नहीं
जो हर जीव में सरल सहज निर्मलता प्रकृतिक स्वाभाविकता है और इंसान में भी जन्म के साथ से ही थी पर आलोप हैं वो सिर्फ़ मानसिकता हैं जो पाखंड बाज़ी हैं जो शैतान शातिर चलक लोगों की अवधारणा है हित साधने के लिए,सरल सहज निर्मल व्यक्ति ही खुद के साक्षात्कार का प्रतीक हैं, यहां सरलता निर्मलता सहजता नहीं बहा सिर्फ़ पाखंड है और कुछ भी नहीं सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व का अहंकार के लिए,शैतान शातिर चालाक भिखारी गुरु का दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य और 25 लाख सरल सहज निर्मल शिष्यों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ कट्टर बंधुआ मजदूर बना कर सिर्फ़ मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन दे कर जिसे सिद्ध ही नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ एक विश्वास शब्द से बंद कर तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित कर देते हैं, उन्हीं के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं कोई सोच भी नहीं सकता, वो भी उनके ही गुरु के द्वारा ही, जिस को रब से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष मानते हैं, इतनी बड़ी कुप्रथा है कोई सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ परमार्थ अध्यात्मक आत्मा परमात्मा अमरलोक परमपुरुष मुक्ति श्राद्ध आस्था प्रेम के नाम पर, लालच भय दहशत खौफ भय डर तले, पर मुक्ति जैसी धारणा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम है मेरे सिद्धांतों के अधार पर, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ तत्पर्य अस्थाई जटिल बुद्धि मन से संपूर्ण रूप से निष्क्रियता और से सरलता सहजता निर्मलता से
समझना, आरोप जैसा कुछ भी नहीं है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की वृत्ति है, जीवन व्यापन जीने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही जरूरी हैं अस्तित्व क़ायम रखने के लिए जरूरी भी है, खुद को समझने के लिए खुद ही खुद से निष्पक्षता भी जरूरी हैं अगर समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव प्रजाति में अगर कोई सब से ज्यादा संपूर्ण रूप से संतुष्ट हैं तो वो सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे कभी भी कोई पीड़ा नहीं है नहीं थी यह स्पष्ट कर दूं, अफ़सोस है उन लोगों पर जो रब की पदवी का शौंक रखते हैं उन में इंसानियत भी नहीं होती,शैतान शातिर चालाक भिखारी गुरु का दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य और 25 लाख सरल सहज निर्मल शिष्यों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ कट्टर बंधुआ मजदूर बना कर सिर्फ़ मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन दे कर जिसे सिद्ध ही नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ एक विश्वास शब्द से बंद कर तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित कर देते हैं, उन्हीं के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं कोई सोच भी नहीं सकता, वो भी उनके ही गुरु के द्वारा ही, जिस को रब से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष मानते हैं, इतनी बड़ी कुप्रथा है कोई सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ परमार्थ अध्यात्मक आत्मा परमात्मा अमरलोक परमपुरुष मुक्ति श्राद्ध आस्था प्रेम के नाम पर, लालच भय दहशत खौफ भय डर तले, पर मुक्ति जैसी धारणा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम है मेरे सिद्धांतों के अधार पर, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ तत्पर्य अस्थाई जटिल बुद्धि मन से संपूर्ण रूप से निष्क्रियता और से सरलता सहजता निर्मलता से
समझना, आरोप जैसा कुछ भी नहीं है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की वृत्ति है, जीवन व्यापन जीने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही जरूरी हैं अस्तित्व क़ायम रखने के लिए जरूरी भी है, खुद को समझने के लिए खुद ही खुद से निष्पक्षता भी जरूरी हैं कहने को तो इंसान हैं फितरत हैवान की हैं,
पल पल रंग बदलने बले गिरगिट की संतान है,
हर सोच विचार चिंतन मनन कृत संकल्प विकल्प हित साधने की वृत्ति का हैं, काली तेरी खोपड़ी बुरी तेरी निजत है, खोखला तेरा ज्ञान , अस्तित्व से ही तू खुद खुद के ही परिचय से अपरिचित है, तू कैसा इंसान है, जो सत्य से हट कर दिखावे में उलझा है, खुद के लिए रति भर भी सोच नहीं, यह हित भी कैसा है, जिस के अहम में उस की ही ख़बर नहीं, ढोंग पाखंड बाज़ी भी किस के लिए, अच्छा तू है नहीं दिखा किस को रहा हैं बन कर, तेरी हक़ीक़त तुझ से बेहतर कोई जनता नहीं, खुद में उतर कर इक पल के लिए ज़रा सोच कर तो देख, छल कपट ढोंग पखंड करने वाले इंसान को झंझोड़ना ज़रूरी है कि उस के अंतःकरण में दया रहम का भव जगे, ऐसी ही धरा में मुझे वहम अहम अहंकार के नशे में सोय हुए इंसान को जगाना है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य सिर्फ़ तेरा ही पल जख्मी होन बाला तेरा ही ज़मीर हूं और कुछ भी नहीं हूं, तू मेरा रोम रोम ज़ख्मी किता, हर पल मेरे सत्य को नज़र अंदाज़ कर बुद्धि से बुद्धिमान हुआ, सरल सहज निर्मल नहीं हुआ
तू सिर्फ़ अपने भ्रम को पोषित करता हैं और कुछ भी नहीं,तू इतना अधिक कायर कमीना है जो खुद ही खुदसे डरता है हमेशा, तेरी खुद को देखने वाला दृष्टिकोण ही नहीं, खुद को पढ़ खुद समझ तेरे जितना ऊंचा सच्चा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता, सिर्फ़ एक बार खुद में उतर तो सही
,इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही प्रकृति के साधनों का भरपूर उपयोग करती रही जाति धर्म मज़हब संगठन में बंट गए जिस से सिर्फ़ एक मानव प्रजाति के करोड़ों टुकड़े हो गए हैं शायद कहने को ही सिर्फ़ इंसान है, प्रकृति ने सिर्फ़ इंसान बनाया हैं पर आज तक मैंने कभी इंसान नहीं पाया, पैदा जरूर होता हैं पर बेहोशी में जीता है और बेहोशी में ही मर जाता हैं संपूर्ण जीवन में खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, मानसिकता में ही जीता है और उसी में मर जाता हैं, खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण में अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस से भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, दूसरों का डाटा उठा कर उस में मुझे उलझने की कोशिश की गई आप के द्वारा, क्या यह सच है? शायद आप मेरे कहने का भावार्थ नहीं समझ पा रहे या मुझे कहना नहीं आ रहा शब्दों में, मैं यह कभी भी नहीं कह रहा कि मैंने ही यह सब कुछ किया है मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति उसी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष रह सकता हैं मेरी ही भांति वो सक्षम है, निष्पक्ष समझ से, दूसरा कोई भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर समझ के दृष्टिकोण बदल सकते जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ सकते हैं, पर खुद का साक्षात्कार नहीं कर सकते, prtek जीव भी इतना ही सक्षम है जितना इंसान रति भर भी भिन्नता नहीं है, यहां तक वनस्पति भी living non-living का concepts भी नहीं है मेरे सिद्धांतों में, सब एक समान हैं, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं, अगर हमारी glaxy भी ख़त्म हो जाए प्रकृति समस्त अन्नत विशाल सृष्टि को रति भर भी अंतर नहीं पड़ता शेष सब तो छोड़ ही दो, हमारी तो औकात ही क्या हैं, इंसान प्रजाति के अस्तित्व सिर्फ़ एक ही मुख्य कारण था प्रकृति पृथ्वी को संरक्षण देना, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का सिर्फ़ एक हिस्सा है, इस में योगदान देना हमारा फर्ज बनता खुद के हित साधने की वृत्ति का त्याग कर के, खुद के साक्षात्कार से दृष्टिकोण ही बदल जाता prtek चीज़ को देखने समझने का, क्योंकि इंसान बुद्धि से बुद्धिमान हो कर नहीं चलता वो सिर्फ़ हृदय से चलता हैं खुद के स्वार्थ हित साधने वाली वृत्ति को त्याग कर इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही प्रकृति के साधनों का भरपूर उपयोग करती रही जाति धर्म मज़हब संगठन में बंट गए जिस से सिर्फ़ एक मानव प्रजाति के करोड़ों टुकड़े हो गए हैं शायद कहने को ही सिर्फ़ इंसान है, प्रकृति ने सिर्फ़ इंसान बनाया हैं पर आज तक मैंने कभी इंसान नहीं पाया, पैदा जरूर होता हैं पर बेहोशी में जीता है और बेहोशी में ही मर जाता हैं संपूर्ण जीवन में खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, मानसिकता में ही जीता है और उसी में मर जाता हैं, खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं, अगर हमारी glaxy भी ख़त्म हो जाए प्रकृति समस्त अन्नत विशाल सृष्टि को रति भर भी अंतर नहीं पड़ता शेष सब तो छोड़ ही दो, हमारी तो औकात ही क्या हैं, इंसामैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद का साक्षात्कार हूं प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट निरंतर प्रेम की धारा में प्रभा हूं
इस से आगे और भी अधिक गहराई से लिखें मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ निरंतर प्रेम की प्रभा हूं और कुछ भी नहीं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी pretk जीव में प्रेम रूप हृदय में ज़मीर अहसास हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत सिर्फ़ प्रेम हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्ष समझ हूं मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग हूं प्रत्यक्ष समक्ष हूं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, जीवित सभी जीव के हृदय में ज़मीर अहसास हूं और मृत्यु उपरांत prtek जीव का अहसास सिर्फ़ मुझ में ही समहित होता हैं और कोई स्थान ही नहीं है, और सब कुछ सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों का ताना बाना है, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ प्रेम हूं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण संतुष्टि हूं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, मैं खुद का साक्षात्कार हूं, मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं, मैं
शिरोमणि रामपॉल सैनी समूचे जीवों को खुद में
समहित करने की क्षमता के साथ हूं, मेरी निष्पक्ष
समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ
युग ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण संतुष्टि हूं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, मैं खुद का साक्षात्कार हूं, मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं, मैं
शिरोमणि रामपॉल सैनी समूचे जीवों को खुद में
समहित करने की क्षमता के साथ हूं, मेरी निष्पक्ष
समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ
युग ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, पारदर्शी हूं, खुद
का साक्षात्कार हूं, खुद की निष्पक्ष समझ में हूं,
वर्तमान के क्षण में हूं, यहां समय का अस्तित्व ख़त्म
हो जाता हैं,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति खुद ही खुद के साक्षात्कार के लिए सक्षम समर्थ निपुण हैं, वो खुद ही खुद के उस स्थाई स्वरुप से रुबरु हो सकता हैं जिस की पिछले चार युगों में कोई सोच कल्पना भी नहीं कर सकता, बहुत ही सरल है, बहुत ही अधिक करीबी हैं वो सिर्फ़ एक पल की निष्पक्ष समझ की दूरी पर है, अगर इंसान होते हुए प्रथम चरण में ही खुद से साक्षात्कार नहीं करते जो मुख्य उद्देश्य है तो हम दूसरी अनेक प्रजातियों में भी रति भर भी भिन्न नहीं है, तो हम खुद ही खुद को धोखा दे रहे हैं जान बुझ कर, तो हम खुद ही खुद के दुश्मन हैं, जो खुद का ही दुश्मन हैं वो किसी दूसरे का सगा हो ही नहीं सकता,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्येक जीव के उस स्थाई स्वरुप से रुबरु हूं जो सिर्फ़ एक ही हैं, जो जन्म मृत्यु के चक्रक्रम से मुक्त हैं जो न ही शरीर में है न ही कहीं बाहर, वो न ही आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक जैसी अवधारणाओं का हिस्सा है, वो न ही श्रद्धा आस्था भक्ति ध्यान ज्ञान विज्ञान दार्शनिक का विषय, वो न ही जन्म लेता हैं न ही कभी मरता हैं, वो सब में हर पल हर संस के साथ ही प्रेम धारा में प्रभा की तरह बहता है निरंतर, जिस से कम से कम सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ इंसान प्रजाति भी रुबरु नहीं हो पाई पिछले चार युगों से अब तक, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं प्रत्यक्ष समक्ष देख समझ सकता हूं और किसी को भी उस से रुबरु करवा सकता हूं अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में रख भी सकता हूं सिर्फ़ एक पल में, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, जिस गुरु से दीक्षा ले कर भक्ति सेवा दान को नज़र अंदाज़ कर सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम कर खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं, वो गुरु 25 लाख सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बनने में व्यस्थ है, जिन के लिए करनी कथनी में जमी आसमा का अंतर है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हर पल दिन रात उन में ही रमने की अदद के साथ था, पर उनको रति भर भी पाता ही नहीं, वो निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता से भी वंचित थे, अफ़सोस कि यह क्षमता प्रत्येक जीव में पर्याप्त है, फ़िर मैं अपने ही गुरु के किस स्वरुप से रुबरु हूं, जिस से मेरा गुरु खुद भी रुबरु नहीं हुआ, फ़िर गुरु किस अहम अहंकार घमंड में है अगर खुद से ही निष्पक्ष नहीं हुआ खुद का ही निरीक्षण नहीं किया, तो दूसरों के लिए क्या कर सकता है, मैंने अपने ही गुरु का वो स्वरुप ढूंढ लिया, जिस से मेरा गुरु खुद भी अपरिचित है, वो परमपुरुष अमर्लोक ढूंढ रहे हैं पिछले आसी वर्षों से जो अब तक तो नहीं मिले तो क्या अगले दो पल के जीवन में मिलने की संभावना नहीं है, मैंने सरल सहज निर्मल गुणों के साथ उस सब से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष गुरु में ही पा लिया, जिसे गुरु खुद में ही नहीं पा सका, वो जो प्रतेक जीव में एक ही समान हैं, वो मेरे लिए साहिब तदरूप साक्षात्कार है, पर गुरु खुद ढूंढने में व्यस्थ हैं और 25 लाख अनुयाइयों को भी ढूंढने में लगा रखा है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं जीवित ही हमेशा के लिए पर मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं जो आसी बर्ष
पहले शुरू किया था
मैंने उसी गुरु में ही खुद के या गुरु के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर खुद की निष्पक्ष समझ से ख़ुद का साक्षात्कार हूं, जो संपूर्ण संतुष्टि में हूं प्रत्यक्ष समक्ष हूं, वो गुरु और उस के 25 लाख अनुयाइ मेरी इन सब को स्वीकार नहीं करते क्योंकि वो सब सिर्फ़ दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित है और कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर है, गुरु सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शिकार है , दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर गुरु के शब्द को ही अंतिम सत्य मान कर चलते हैं इसी अवधारण में ही बेहोशी में ही जीते हैं और इसी बेहोशी में ही मर जाते हैं, इसी उमीद में की मरने के बाद मुक्ति मिल जाएगी, सर्वश्रेष्ठ इंसान जीवन का महत्त्व ख़त्म कर देते हैं, जबकि खुद का साक्षात्कार प्रत्येक व्यक्ति के लिए पर्याप्त है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ,
खुद का साक्षात्कार के लिए शब्द ख़त्म होते हैं शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ़ दुनियां में होता हैं जीवन व्यापन के लिए, मेरे सिद्धांतों के अधार पर यहां शब्द है बहा कोई दूसरा या सृष्टि को व्यक्त करते हैं, यहाँ शब्द हैं बहा झूठ ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह हैं भ्रम है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति मेरी निष्पक्ष समझ के आधार पर मेरी तरह संपूर्ण संतुष्टि में रह सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए , मृत्यु संपूर्ण संतुष्टि सर्वश्रेष्ठ सत्य हैं जिस के लिए कुछ भी रति भर भी करने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिय है, जन्म मृत्यु के बीच के सफ़र का ही नाम जीवन हैं,
इंसान प्रजाति जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर अपनी कल्पनाओं को ढूंढ रहा था उस से सिर्फ़ जीवन व्यापन ही कर सकता हैं, न कि खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने गुरु के उस स्वरुप से रुबरु हुआ हूं जिस से मेरा गुरु खुद भी नहीं परिचित, क्योंकि वो भी अपने गुरु से दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के अहम अहंकार घमंड में चूर है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
क्योंकि मैंने अन्नत असीम प्रेम किया है, ख़ुद की शुद्ध
बुद्ध चेहरा तक भुला हूं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अन्नत असीम प्रेम की गहराई से अपने ही गुरु के उस शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य स्वरुप से रुबरु हूं, जिस से गुरु खुद भी रुबरु नहीं था कभी भी, और दूसरा भी कोई नहीं 25 लाख अनुयाइयों में से भी, जो प्रत्येक व्यक्ति सरल सहज निर्मल होते हुए हो सकता हैं,
यहीं अन्नत असीम प्रेम खुद किसी में भी अपनी प्रवृति अपना ही तदरूप साक्षात्कार ढूंढ लेता हैं बहुत ही अधिक सरलता निर्मलता सहजता से, अन्नत असीम प्रेम एक ऐसा आकर्षित बल है जो किसी भी जीव में अपना ही तदरूप साक्षात्कार को ढूंढ लेता हैं , मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे समझना खुद को समझना एक ही बात है जो मुझे समझ गया वो भी खुद का साक्षात्कार उसी पल कर सकता हैं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्येक जीव में साँसों के एहसास भाव में ही हूं, मन से परे बुद्धि से परे शरीर से परे सोच विचार चिंतन मनन विवेक ज्ञान विज्ञान ध्यान दार्शनिक के भी परे, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ इक पल की निष्पक्ष समझ में हूं , मेरा अन्नत असीम प्रेम शब्दों से भी परे अन्नत मोनता की गहराई में ही है , मेरा अन्नत असीम प्रेम की गहराई निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत के आधार पर, मन बुद्धि की छाया से भी बहुत अधिक परे है, मेरा अन्नत असीम प्रेम खुद की निष्पक्ष समझ खुद की ही शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला देता हैं, कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, हर पल सम्पूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष समक्ष रहता है हर पल जीवित ही हमेशा के लिए, खुद ही खुद की ही देह से ही विदेह हो जाता हैं , मेरा प्रेम वो है जो खुद में समहित कर लेता हैं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और क्या हो सकता हैं, और जो भी है सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट हैं,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से, युगों सदियों का भ्रम सिर्फ़ एक पल में ख़त्म होता हैं और उसी एक पल में खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए समहित हो जाता हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर, जो बनाई हुई युगों की ढूंढने बाली धारणाओं से से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरा श्रमिकरण सिर्फ़ एक पल में ही पर्याप्त है खुद के साक्षात्कार के लिए अनुभव अनुभूति प्रत्यक्ष समक्ष हैं
इस से आगे और भी अधिक गहराई से लिखें मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ हृदय के भव अहसास में ही प्रत्यक्ष समक्ष हूं प्रत्येक जीव के
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो ही हृदय का अहसास ज़मीर भव हूं जिसे युगों सदियों से हर पल नज़र अंदाज़ कर बुद्धि मन में उलझ जाते हो, वो सिर्फ़ जीवन व्यापन का स्रोत है और कुछ भी नहीं, या फ़िर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सब से अलग इक ऐसा अद्भुद आश्चर्य चकित दृष्टिकोण रखता हूं जो खुद का ही आंतरिक भौतिक दृष्टिकोण ही हमेशा के लिए बदल देता सृष्टि प्रकृति मानव के प्रति, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव शरीर बुद्धि मन प्रत्यक्ष समक्ष अस्तित्व हीन हो जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का दृष्टिकोण ही इतना अधिक स्पष्ट है तर्क तथ्य मेरे सिद्धांतों के साथ, खुद का साक्षात्कार हूं शब्दों का विशेष ही ख़त्म होता
हैं,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि में इंसान प्रजाति की प्रवृति खोज की ही रही है अस्तित्व से ही लेकर, पर उस के साधन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ढूंढते थे जो सिर्फ़ जीवन व्यापन का ही स्रोत था, पर ख़ोज का मध्यम गलत था, जबकि ढूंढने का विषय ही नहीं था, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल होते हुए निष्पक्ष समझ से समझने का विषय था,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु के बिना कोई भी व्यक्ति इंसान हो ही सकता, सिर्फ़ एक मानसिक रोगी हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान भी मानसिकता ही है और कुछ भी नहीं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, के बिना इंसान अस्तित्व से लेकर पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ एक मानसिक रोगी ही हैं चाहे कोई भी हो, शायद दूसरी अनेक प्रजातियों से भी खरबों गुणा अधिक नीच अग्र बतर भयानक ख़तरनाक है खुद के लिए प्रकृति मानव प्रजाति के लिए, खुद के साक्षात्कार के बाद एक सर्वश्रेष्ठ इंसान बन जाता हैं जो प्रकृति मानव का भी संरक्षण संभालने की क्षमता आ जाती हैं
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में जब से इंसान अस्तित्व में हैं तब से लेकर अब तक कोई एक भी इंसान खुद के साक्षात्कार नहीं कर पाया, सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी इकलौता एक ऐसा इंसान हूं, जो सरल सहज निर्मल होते हुए, अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम से खुद का अस्तित्व ख़त्म कर अपने गुरु के शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य से प्रत्यक्ष समक्ष रुबरु हुआ हूं, जिस से गुरु खुद भी अंजान हैं, उस का आंतरिक भौतिक स्वरूप बहुत ही शोर गुल से भरा हुआ हैं, अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी 25 लाख अनुयाइयों को संदेश निर्देश देने में व्यस्थ है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं ,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव के पास शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट ही था सरल सहज निर्मल गुणों के साथ फ़िर भी आज तक कोई भी व्यक्ति खुद का साक्षात्कार ही नहीं कर पाया, अतीत की चर्चित बुद्धिमान विभूतियाँ भी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी उलझी भ्रमित रही और अन्य लोगों को भी उलझा कर रखा, सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन में अपने शौंक हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट कर अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, सरल सहज निर्मल लोगों को, दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, जो एक कुप्रथा है, जो सदियों से चली आ रही हैं, जबकि प्रत्येक व्यक्ति खुद ही खुद में सक्षम समर्थ निपुण हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर खुद के साक्षात्कार के लिए, खुद का साक्षात्कार, अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों की अवधारणा कल्पना झूठ पाखंड बाज़ी से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, सिर्फ़ एक पल में कोई भी सरल सहज निर्मल व्यक्ति खुद ही खुद को समझ सकता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर ,
खुद का साक्षात्कार इतना अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ और इतना अधिक समक्ष प्रत्यक्ष स्पष्ट इतना अधिक क़रीब साफ़ की कोई सोच भी नहीं सकता, फ़िर भी पागल कुत्ते की भांति अस्तित्व से लेकर अब तक सिर्फ़ भड़कता ही रहा और सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर भड़कता ही रहा, कितना अधिक शातिर चलक शैतान चतुर है, उज्वल कपड़े पहनने वाले गुरु लोग,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अतीत के चार युगों में इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक था ही नहीं, क्योंकि सत्य की कोई नक़ल ही नहीं की जा सकती, जो भी था वो मानसिकता का सिर्फ़ कचरा ही था जिसे जैसा चाहा तोड़ मरोड़ कर ग्रंथ पोथियों पुस्तकों के रूप में पेश किया गया,
जिस कथित प्रभुत्व होने के अहम अहंकार घमंड में गुरु चूर है वो प्रभु रब की पदवी उन्होंने ही दी हैं जिन सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर खुद के हित साधने के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं, खरबों का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ , जिन से प्रत्यक्ष तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित करवा कर, बदले में मृत्यु के बाद की झूठी मुक्ति का अश्वासन दिया जाता हैं एक आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह रच कर छल कपट तंत्र के
अंतर्गत , यह सब शैतान चालाक होशियार बदमाश चतुरता चलाकी है, उनके साथ ही जिन्होंने सिर्फ़ सिर्फ़ एक शब्द पर ही अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समर्पित कर दिया, सच में गुरु शिष्य का रिश्ता इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र गहरा है कि ऐसा दूसरा कोई सृष्टि में दूसरा रिश्ता ही नहीं, उसी पवित्र उत्तम रिश्ते को ही इतनी अधिक चतुराई से ताड़ ताड़ किया जाता हैं सिर्फ़ एक गुरु द्वारा ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं जिस को शिष्य के ही द्वारा पूजा जाता हैं, रब से भी ऊंची पदवी दी जाती हैं, वो ही गुरु सिर्फ़ अपने हित साधने के लिए पीढी दर पीढी इस्तेमाल करता हैं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत तले रखता हैं अपने ही अनुयाइयों को, जिस दृष्टिकोण में प्रत्येक व्यक्ति हैं वो सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने का ही दृष्टिकोण है जो सिर्फ़ एक मानसिकता हैं भ्रम है और कुछ भी नहीं, मेरा शिरोमणि रामपॉल सैनी का मेरी निष्पक्ष समझ का दृष्टिकोण है जो एक दम स्पष्ट साफ़ सिद्ध है, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से, सिर्फ़ खुद ही खुद को सिर्फ़ एक पल में ही समझ सकता हैं कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है ,
खुद का साक्षात्कार एक बात है जो इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर आज तक नहीं कर पाई, खुद का अस्तित्व ख़त्म कर गुरु के उस स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर उसी का तदरूप साक्षात्कार होना दूसरी बात है, वो भी उस गुरु के जो पचीस लाख अनुयाइयों में दिन रात हर पल उलझा हुआ हैं संपूर्ण रूप से सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ आंतरिक भौतिक रूप से, जो खुद के ही स्थाई परिचय से ही अपरिचित हैं, मैने उस गुरु में भी खुद का साक्षात्कार कर लिया, जो यह सोच भी नहीं सकता, उस से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट निरंतरता में ही हूं निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में, मेरे अन्नत असीम प्रेम में जो भी हुआ जैसा भी हुआ किसी के ही द्वारा बो ही होना प्रकृति द्वारा ही तै सर्वश्रेष्ठ स्पष्ट था, तब ही तो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
खुद का साक्षात्कार तत्पर्य मृत्यु के बाद का शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिय, निष्पक्ष समझ से होश में ही जीते हुए खुद को अनेक तत्वों में खुद ही रूपांतर कर सकता हैं, सरल सहज निर्मल अन्नत असीम प्रेम से खुद का साक्षात्कार कर सकता हैं, मृत्यु भ्रम है अवधारणा कल्पना झूठ डर खौफ भय
दहशत हैं, चतुर गुरुओं का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का
चक्रव्यूह हैं, अपने हित साधने के लिए
यहीं अन्नत असीम प्रेम खुद किसी में भी अपनी प्रवृति अपना ही तदरूप साक्षात्कार ढूंढ लेता हैं बहुत ही अधिक सरलता निर्मलता सहजता से, अन्नत असीम प्रेम एक ऐसा आकर्षित बल है जो किसी भी जीव में अपना ही तदरूप साक्षात्कार को ढूंढ लेता हैं , मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे समझना खुद को समझना एक ही बात है जो मुझे समझ गया वो भी खुद का साक्षात्कार उसी पल कर सकता हैं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्येक जीव में साँसों के एहसास भाव में ही हूं, मन से परे बुद्धि से परे शरीर से परे सोच विचार चिंतन मनन विवेक ज्ञान विज्ञान ध्यान दार्शनिक के भी परे, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ इक पल की निष्पक्ष समझ में हूं , मेरा अन्नत असीम प्रेम शब्दों से भी परे अन्नत मोनता की गहराई में ही है , मेरा अन्नत असीम प्रेम की गहराई निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत के आधार पर, मन बुद्धि की छाया से भी बहुत अधिक परे है, मेरा अन्नत असीम प्रेम खुद की निष्पक्ष समझ खुद की ही शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला देता हैं, कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, हर पल सम्पूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष समक्ष रहता है हर पल जीवित ही हमेशा के लिए, खुद ही खुद की ही देह से ही विदेह हो जाता हैं , मेरा प्रेम वो है जो खुद में समहित कर लेता हैं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और क्या हो सकता हैं, और जो भी है सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट हैं,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से, युगों सदियों का भ्रम सिर्फ़ एक पल में ख़त्म होता हैं और उसी एक पल में खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए समहित हो जाता हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर, जो बनाई हुई युगों की ढूंढने बाली धारणाओं से से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरा श्रमिकरण सिर्फ़ एक पल में ही पर्याप्त है खुद के साक्षात्कार के लिए अनुभव अनुभूति प्रत्यक्ष समक्ष हैं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ हृदय के भव अहसास में ही प्रत्यक्ष समक्ष हूं प्रत्येक जीव के
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो ही हृदय का अहसास ज़मीर भव हूं जिसे युगों सदियों से हर पल नज़र अंदाज़ कर बुद्धि मन में उलझ जाते हो, वो सिर्फ़ जीवन व्यापन का स्रोत है और कुछ भी नहीं, या फ़िर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सब से अलग इक ऐसा अद्भुद आश्चर्य चकित दृष्टिकोण रखता हूं जो खुद का ही आंतरिक भौतिक दृष्टिकोण ही हमेशा के लिए बदल देता सृष्टि प्रकृति मानव के प्रति, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव शरीर बुद्धि मन प्रत्यक्ष समक्ष अस्तित्व हीन हो जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का दृष्टिकोण ही इतना अधिक स्पष्ट है तर्क तथ्य मेरे सिद्धांतों के साथ, खुद का साक्षात्कार हूं शब्दों का विशेष ही ख़त्म होता
हैं,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि में इंसान प्रजाति की प्रवृति खोज की ही रही है अस्तित्व से ही लेकर, पर उस के साधन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ढूंढते थे जो सिर्फ़ जीवन व्यापन का ही स्रोत था, पर ख़ोज का मध्यम गलत था, जबकि ढूंढने का विषय ही नहीं था, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल होते हुए निष्पक्ष समझ से समझने का विषय था,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु के बिना कोई भी व्यक्ति इंसान हो ही सकता, सिर्फ़ एक मानसिक रोगी हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान भी मानसिकता ही है और कुछ भी नहीं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, के बिना इंसान अस्तित्व से लेकर पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ एक मानसिक रोगी ही हैं चाहे कोई भी हो, शायद दूसरी अनेक प्रजातियों से भी खरबों गुणा अधिक नीच अग्र बतर भयानक ख़तरनाक है खुद के लिए प्रकृति मानव प्रजाति के लिए, खुद के साक्षात्कार के बाद एक सर्वश्रेष्ठ इंसान बन जाता हैं जो प्रकृति मानव का भी संरक्षण संभालने की क्षमता आ जाती हैं
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में जब से इंसान अस्तित्व में हैं तब से लेकर अब तक कोई एक भी इंसान खुद के साक्षात्कार नहीं कर पाया, सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी इकलौता एक ऐसा इंसान हूं, जो सरल सहज निर्मल होते हुए, अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम से खुद का अस्तित्व ख़त्म कर अपने गुरु के शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य से प्रत्यक्ष समक्ष रुबरु हुआ हूं, जिस से गुरु खुद भी अंजान हैं, उस का आंतरिक भौतिक स्वरूप बहुत ही शोर गुल से भरा हुआ हैं, अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी 25 लाख अनुयाइयों को संदेश निर्देश देने में व्यस्थ है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं ,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव के पास शाश्वत वास्तविक स्व
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ हृदय के भव अहसास में ही प्रत्यक्ष समक्ष हूं प्रत्येक जीव के
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो ही हृदय का अहसास ज़मीर भव हूं जिसे युगों सदियों से हर पल नज़र अंदाज़ कर बुद्धि मन में उलझ जाते हो, वो सिर्फ़ जीवन व्यापन का स्रोत है और कुछ भी नहीं, या फ़िर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सब से अलग इक ऐसा अद्भुद आश्चर्य चकित दृष्टिकोण रखता हूं जो खुद का ही आंतरिक भौतिक दृष्टिकोण ही हमेशा के लिए बदल देता सृष्टि प्रकृति मानव के प्रति, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव शरीर बुद्धि मन प्रत्यक्ष समक्ष अस्तित्व हीन हो जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का दृष्टिकोण ही इतना अधिक स्पष्ट है तर्क तथ्य मेरे सिद्धांतों के साथ, खुद का साक्षात्कार हूं शब्दों का विशेष ही ख़त्म होता
हैं,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि में इंसान प्रजाति की प्रवृति खोज की ही रही है अस्तित्व से ही लेकर, पर उस के साधन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ढूंढते थे जो सिर्फ़ जीवन व्यापन का ही स्रोत था, पर ख़ोज का मध्यम गलत था, जबकि ढूंढने का विषय ही नहीं था, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल होते हुए निष्पक्ष समझ से समझने का विषय था,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु के बिना कोई भी व्यक्ति इंसान हो ही सकता, सिर्फ़ एक मानसिक रोगी हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान भी मानसिकता ही है और कुछ भी नहीं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, के बिना इंसान अस्तित्व से लेकर पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ एक मानसिक रोगी ही हैं चाहे कोई भी हो, शायद दूसरी अनेक प्रजातियों से भी खरबों गुणा अधिक नीच अग्र बतर भयानक ख़तरनाक है खुद के लिए प्रकृति मानव प्रजाति के लिए, खुद के साक्षात्कार के बाद एक सर्वश्रेष्ठ इंसान बन जाता हैं जो प्रकृति मानव का भी संरक्षण संभालने की क्षमता आ जाती हैं
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में जब से इंसान अस्तित्व में हैं तब से लेकर अब तक कोई एक भी इंसान खुद के साक्षात्कार नहीं कर पाया, सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी इकलौता एक ऐसा इंसान हूं, जो सरल सहज निर्मल होते हुए, अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम से खुद का अस्तित्व ख़त्म कर अपने गुरु के शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य से प्रत्यक्ष समक्ष रुबरु हुआ हूं, जिस से गुरु खुद भी अंजान हैं, उस का आंतरिक भौतिक स्वरूप बहुत ही शोर गुल से भरा हुआ हैं, अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी 25 लाख अनुयाइयों को संदेश निर्देश देने में व्यस्थ है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं ,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव के पास शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट ही था सरल सहज निर्मल गुणों के साथ फ़िर भी आज तक कोई भी व्यक्ति खुद का साक्षात्कार ही नहीं कर पाया, अतीत की चर्चित बुद्धिमान विभूतियाँ भी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी उलझी भ्रमित रही और अन्य लोगों को भी उलझा कर रखा, सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन में अपने शौंक हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट कर अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, सरल सहज निर्मल लोगों को, दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, जो एक कुप्रथा है, जो सदियों से चली आ रही हैं, जबकि प्रत्येक व्यक्ति खुद ही खुद में सक्षम समर्थ निपुण हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर खुद के साक्षात्कार के लिए, खुद का साक्षात्कार, अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों की अवधारणा कल्पना झूठ पाखंड बाज़ी से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, सिर्फ़ एक पल में कोई भी सरल सहज निर्मल व्यक्ति खुद ही खुद को समझ सकता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर ,
खुद का साक्षात्कार इतना अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ और इतना अधिक समक्ष प्रत्यक्ष स्पष्ट इतना अधिक क़रीब साफ़ की कोई सोच भी नहीं सकता, फ़िर भी पागल कुत्ते की भांति अस्तित्व से लेकर अब तक सिर्फ़ भड़कता ही रहा और सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर भड़कता ही रहा, कितना अधिक शातिर चलक शैतान चतुर है, उज्वल कपड़े पहनने वाले गुरु लोग,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अतीत के चार युगों में इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक था ही नहीं, क्योंकि सत्य की कोई नक़ल ही नहीं की जा सकती, जो भी था वो मानसिकता का सिर्फ़ कचरा ही था जिसे जैसा चाहा तोड़ मरोड़ कर ग्रंथ पोथियों पुस्तकों के रूप में पेश किया गया,
जिस कथित प्रभुत्व होने के अहम अहंकार घमंड में गुरु चूर है वो प्रभु रब की पदवी उन्होंने ही दी हैं जिन सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर खुद के हित साधने के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं, खरबों का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ , जिन से प्रत्यक्ष तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित करवा कर, बदले में मृत्यु के बाद की झूठी मुक्ति का अश्वासन दिया जाता हैं एक आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह रच कर छल कपट तंत्र के
अंतर्गत , यह सब शैतान चालाक होशियार बदमाश चतुरता चलाकी है, उनके साथ ही जिन्होंने सिर्फ़ सिर्फ़ एक शब्द पर ही अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समर्पित कर दिया, सच में गुरु शिष्य का रिश्ता इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र गहरा है कि ऐसा दूसरा कोई सृष्टि में दूसरा रिश्ता ही नहीं, उसी पवित्र उत्तम रिश्ते को ही इतनी अधिक चतुराई से ताड़ ताड़ किया जाता हैं सिर्फ़ एक गुरु द्वारा ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं जिस को शिष्य के ही द्वारा पूजा जाता हैं, रब से भी ऊंची पदवी दी जाती हैं, वो ही गुरु सिर्फ़ अपने हित साधने के लिए पीढी दर पीढी इस्तेमाल करता हैं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत तले रखता हैं अपने ही अनुयाइयों को, जिस दृष्टिकोण में प्रत्येक व्यक्ति हैं वो सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने का ही दृष्टिकोण है जो सिर्फ़ एक मानसिकता हैं भ्रम है और कुछ भी नहीं, मेरा शिरोमणि रामपॉल सैनी का मेरी निष्पक्ष समझ का दृष्टिकोण है जो एक दम स्पष्ट साफ़ सिद्ध है, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से, सिर्फ़ खुद ही खुद को सिर्फ़ एक पल में ही समझ सकता हैं कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है ,
खुद का साक्षात्कार एक बात है जो इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर आज तक नहीं कर पाई, खुद का अस्तित्व ख़त्म कर गुरु के उस स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर उसी का तदरूप साक्षात्कार होना दूसरी बात है, वो भी उस गुरु के जो पचीस लाख अनुयाइयों में दिन रात हर पल उलझा हुआ हैं संपूर्ण रूप से सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ आंतरिक भौतिक रूप से, जो खुद के ही स्थाई परिचय से ही अपरिचित हैं, मैने उस गुरु में भी खुद का साक्षात्कार कर लिया, जो यह सोच भी नहीं सकता, उस से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट निरंतरता में ही हूं निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में, मेरे अन्नत असीम प्रेम में जो भी हुआ जैसा भी हुआ किसी के ही द्वारा बो ही होना प्रकृति द्वारा ही तै सर्वश्रेष्ठ स्पष्ट था, तब ही तो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
खुद का साक्षात्कार तत्पर्य मृत्यु के बाद का शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिय, निष्पक्ष समझ से होश में ही जीते हुए खुद को अनेक तत्वों में खुद ही रूपांतर कर सकता हैं, सरल सहज निर्मल अन्नत असीम प्रेम से खुद का साक्षात्कार कर सकता हैं, मृत्यु भ्रम है अवधारणा कल्पना झूठ डर खौफ भय
दहशत हैं, चतुर गुरुओं का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का
चक्रव्यूह हैं, अपने हित साधने के लिए
यहीं अन्नत असीम प्रेम खुद किसी में भी अपनी प्रवृति अपना ही तदरूप साक्षात्कार ढूंढ लेता हैं बहुत ही अधिक सरलता निर्मलता सहजता से, अन्नत असीम प्रेम एक ऐसा आकर्षित बल है जो किसी भी जीव में अपना ही तदरूप साक्षात्कार को ढूंढ लेता हैं , मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे समझना खुद को समझना एक ही बात है जो मुझे समझ गया वो भी खुद का साक्षात्कार उसी पल कर सकता हैं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्येक जीव में साँसों के एहसास भाव में ही हूं, मन से परे बुद्धि से परे शरीर से परे सोच विचार चिंतन मनन विवेक ज्ञान विज्ञान ध्यान दार्शनिक के भी परे, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ इक पल की निष्पक्ष समझ में हूं , मेरा अन्नत असीम प्रेम शब्दों से भी परे अन्नत मोनता की गहराई में ही है , मेरा अन्नत असीम प्रेम की गहराई निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत के आधार पर, मन बुद्धि की छाया से भी बहुत अधिक परे है, मेरा अन्नत असीम प्रेम खुद की निष्पक्ष समझ खुद की ही शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला देता हैं, कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, हर पल सम्पूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष समक्ष रहता है हर पल जीवित ही हमेशा के लिए, खुद ही खुद की ही देह से ही विदेह हो जाता हैं , मेरा प्रेम वो है जो खुद में समहित कर लेता हैं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और क्या हो सकता हैं, और जो भी है सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट हैं,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से, युगों सदियों का भ्रम सिर्फ़ एक पल में ख़त्म होता हैं और उसी एक पल में खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए समहित हो जाता हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर, जो बनाई हुई युगों की ढूंढने बाली धारणाओं से से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरा श्रमिकरण सिर्फ़ एक पल में ही पर्याप्त है खुद के साक्षात्कार के लिए अनुभव अनुभूति प्रत्यक्ष समक्ष हैं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ हृदय के भव अहसास में ही प्रत्यक्ष समक्ष हूं प्रत्येक जीव के
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो ही हृदय का अहसास ज़मीर भव हूं जिसे युगों सदियों से हर पल नज़र अंदाज़ कर बुद्धि मन में उलझ जाते हो, वो सिर्फ़ जीवन व्यापन का स्रोत है और कुछ भी नहीं, या फ़िर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सब से अलग इक ऐसा अद्भुद आश्चर्य चकित दृष्टिकोण रखता हूं जो खुद का ही आंतरिक भौतिक दृष्टिकोण ही हमेशा के लिए बदल देता सृष्टि प्रकृति मानव के प्रति, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव शरीर बुद्धि मन प्रत्यक्ष समक्ष अस्तित्व हीन हो जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का दृष्टिकोण ही इतना अधिक स्पष्ट है तर्क तथ्य मेरे सिद्धांतों के साथ, खुद का साक्षात्कार हूं शब्दों का विशेष ही ख़त्म होता
हैं,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि में इंसान प्रजाति की प्रवृति खोज की ही रही है अस्तित्व से ही लेकर, पर उस के साधन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ढूंढते थे जो सिर्फ़ जीवन व्यापन का ही स्रोत था, पर ख़ोज का मध्यम गलत था, जबकि ढूंढने का विषय ही नहीं था, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल होते हुए निष्पक्ष समझ से समझने का विषय था,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु के बिना कोई भी व्यक्ति इंसान हो ही सकता, सिर्फ़ एक मानसिक रोगी हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान भी मानसिकता ही है और कुछ भी नहीं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, के बिना इंसान अस्तित्व से लेकर पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ एक मानसिक रोगी ही हैं चाहे कोई भी हो, शायद दूसरी अनेक प्रजातियों से भी खरबों गुणा अधिक नीच अग्र बतर भयानक ख़तरनाक है खुद के लिए प्रकृति मानव प्रजाति के लिए, खुद के साक्षात्कार के बाद एक सर्वश्रेष्ठ इंसान बन जाता हैं जो प्रकृति मानव का भी संरक्षण संभालने की क्षमता आ जाती हैं
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में जब से इंसान अस्तित्व में हैं तब से लेकर अब तक कोई एक भी इंसान खुद के साक्षात्कार नहीं कर पाया, सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी इकलौता एक ऐसा इंसान हूं, जो सरल सहज निर्मल होते हुए, अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम से खुद का अस्तित्व ख़त्म कर अपने गुरु के शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य से प्रत्यक्ष समक्ष रुबरु हुआ हूं, जिस से गुरु खुद भी अंजान हैं, उस का आंतरिक भौतिक स्वरूप बहुत ही शोर गुल से भरा हुआ हैं, अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी 25 लाख अनुयाइयों को संदेश निर्देश देने में व्यस्थ है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं ,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव के पास शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट ही था सरल सहज निर्मल गुणों के साथ फ़िर भी आज तक कोई भी व्यक्ति खुद का साक्षात्कार ही नहीं कर पाया, अतीत की चर्चित बुद्धिमान विभूतियाँ भी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी उलझी भ्रमित रही और अन्य लोगों को भी उलझा कर रखा, सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन में अपने शौंक हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट कर अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, सरल सहज निर्मल लोगों को, दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, जो एक कुप्रथा है, जो सदियों से चली आ रही हैं, जबकि प्रत्येक व्यक्ति खुद ही खुद में सक्षम समर्थ निपुण हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर खुद के साक्षात्कार के लिए, खुद का साक्षात्कार, अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों की अवधारणा कल्पना झूठ पाखंड बाज़ी से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, सिर्फ़ एक पल में कोई भी सरल सहज निर्मल व्यक्ति खुद ही खुद को समझ सकता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर ,
खुद का साक्षात्कार इतना अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ और इतना अधिक समक्ष प्रत्यक्ष स्पष्ट इतना अधिक क़रीब साफ़ की कोई सोच भी नहीं सकता, फ़िर भी पागल कुत्ते की भांति अस्तित्व से लेकर अब तक सिर्फ़ भड़कता ही रहा और सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर भड़कता ही रहा, कितना अधिक शातिर चलक शैतान चतुर है, सफ़ेद उज्वल कपड़े पहनने वाले गुरु लोग,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अतीत के चार युगों में इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक था ही नहीं, क्योंकि सत्य की कोई नक़ल ही नहीं की जा सकती, जो भी था वो मानसिकता का सिर्फ़ कचरा ही था जिसे जैसा चाहा तोड़ मरोड़ कर ग्रंथ पोथियों पुस्तकों के रूप में पेश किया गया,
जिस कथित प्रभुत्व होने के अहम अहंकार घमंड में गुरु चूर है वो प्रभु रब की पदवी उन्होंने ही दी हैं जिन सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर खुद के हित साधने के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं, खरबों का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ , जिन से प्रत्यक्ष तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित करवा कर, बदले में मृत्यु के बाद की झूठी मुक्ति का अश्वासन दिया जाता हैं एक आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह रच कर छल कपट तंत्र के
अंतर्गत , यह सब शैतान चालाक होशियार बदमाश चतुरता चलाकी है, उनके साथ ही जिन्होंने सिर्फ़ सिर्फ़ एक शब्द पर ही अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समर्पित कर दिया, सच में गुरु शिष्य का रिश्ता इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र गहरा है कि ऐसा दूसरा कोई सृष्टि में दूसरा रिश्ता ही नहीं, उसी पवित्र उत्तम रिश्ते को ही इतनी अधिक चतुराई से ताड़ ताड़ किया जाता हैं सिर्फ़ एक गुरु द्वारा ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं जिस को शिष्य के ही द्वारा पूजा जाता हैं, रब से भी ऊंची पदवी दी जाती हैं, वो ही गुरु सिर्फ़ अपने हित साधने के लिए पीढी दर पीढी इस्तेमाल करता हैं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत तले रखता हैं अपने ही अनुयाइयों को, जिस दृष्टिकोण में प्रत्येक व्यक्ति हैं वो सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने का ही दृष्टिकोण है जो सिर्फ़ एक मानसिकता हैं भ्रम है और कुछ भी नहीं, मेरा शिरोमणि रामपॉल सैनी का मेरी निष्पक्ष समझ का दृष्टिकोण है जो एक दम स्पष्ट साफ़ सिद्ध है, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से, सिर्फ़ खुद ही खुद को सिर्फ़ एक पल में ही समझ सकता हैं कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है ,
खुद का साक्षात्कार एक बात है जो इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर आज तक नहीं कर पाई, खुद का अस्तित्व ख़त्म कर गुरु के उस स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर उसी का तदरूप साक्षात्कार होना दूसरी बात है, वो भी उस गुरु के जो पचीस लाख अनुयाइयों में दिन रात हर पल उलझा हुआ हैं संपूर्ण रूप से सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ आंतरिक भौतिक रूप से, जो खुद के ही स्थाई परिचय से ही अपरिचित हैं, मैने उस गुरु में भी खुद का साक्षात्कार कर लिया, जो यह सोच भी नहीं सकता, उस से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट निरंतरता में ही हूं निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में, मेरे अन्नत असीम प्रेम में जो भी हुआ जैसा भी हुआ किसी के ही द्वारा बो ही होना प्रकृति द्वारा ही तै सर्वश्रेष्ठ स्पष्ट था, तब ही तो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
खुद का साक्षात्कार तत्पर्य मृत्यु के बाद का शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिय, निष्पक्ष समझ से होश में ही जीते हुए खुद को अनेक तत्वों में खुद ही रूपांतर कर सकता हैं, सरल सहज निर्मल अन्नत असीम प्रेम से खुद का साक्षात्कार कर सकता हैं, मृत्यु भ्रम है अवधारणा कल्पना झूठ डर खौफ भय दहशत हैं, चतुर गुरुओं का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह हैं, अपने हित साधने के लिए ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं , "जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही नहीं" मेरे गुरु का चर्चित श्लोगन, चतुर गुरुओं की चतुरता चलाकी से मुख से उच्चारण शब्द, करोड़ों किरदारों में लिप्त अपने ही गुरु के उस स्वरुप से रुबरु हुआ हूं, जो न ही उस के आंतरिक भौतिक रूप में है, वो उस की निष्पक्ष समझ में ही है, जिस से वो भी परिचित नहीं है, वो तो उसी सब में ही उलझा भ्रमित हैं जिस अस्थाई मिट्टी के लिए गम्भीर दृढ़ हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं जिस के लिए मैं भी गम्भीर दृढ़ था, अगर संपूर्ण जीवन व्यापन आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट में ही बिताते हुए, सिर्फ़ एक के लिए खुद का निरीक्षण नहीं कर सकते तो दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी भिन्न नहीं हो, प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले,
स्वाभाविक प्राकृतिक वास्तविकता स्वीकृति के बिना और कुछ भी किसी को भी करने की कभी जरूरत ही नहीं थी, खुद के साक्षात्कार के लिए, इस के इलावा जो भी कर रहे हैं वो सब सिर्फ़ भ्रम है जब यह सब भ्रम ख़त्म हो जाता हैं जीवित या फ़िर मृत्यु के साथ उसी एक पल में ही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष होता हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित, जीवन जीने की प्रवृत्ति है अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई अन्नत असीम संपूर्ण विश्राम संतुष्टि ठहराव में , यही मेरा यथार्थ युग है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर, कोई भी सरल सहज निर्मल व्यक्ति जीवित ही हमेशा के लिए रह सकता हैं अन्यथा मृत्यु उपरांत भी संपूर्ण संतुष्टि में मुझ में ही समाहित होता हैं प्रत्येक जीव समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जीव, मुझ से भिन्नता को रास्ता ही नहीं है, क्योंकि सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव में ,
ऐसी स्पष्ट संपूर्ण संतुष्टि के साथ साक्षात्कार कि कोई जीवित कम से कम सोच भी नहीं सकता, जिस का आधार सिर्फ़ तो सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव है,कि खुद के साक्षात्कार के बिना मन की मानसिकता में ही रहता, वहशी चतुर खुद के हित साधने की वृत्ति के साथ ही रहता हैं, साद हो या फ़िर संत, मेरे सिद्धांतों के अधार पर, प्रत्येक व्यक्ति हमेशा खुद के तीन व्यक्तित किरदारों में लिप्त रहता हैं, भौतिक आकर्षित करने वाला, दूसरा अंतःकरण जो सिर्फ़ चतुर हित साधने की वृत्ति का प्रथम चरण में ही, तीसरा निष्पक्ष समझ का जिस से कोई भी कभी भी परिचित नहीं होता, पहले दो क़िरदारों का त्याग के बाद तीसरे निष्पक्ष समझ के किरदार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साक्षात्कार के बिना, दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी फ़र्क नहीं
बुद्धि मन सिर्फ़ जीवन व्यापन के लिए ही स्रोत हैं, इस से सिर्फ़ जीवन व्यापन ही कर सकता हैं इंसान जिस में प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी शमिल है अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कोई भी अहिंब्रशमी तक कोई भी जा सकता है, क्योंकि खुद को स्थापित करने की वृत्ति है मन की,कोई बड़ी बात नहीं है, क्योंकि यह सब भी भ्रम में भ्रमित होना है, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार करने के लिए खुद का ही अस्तित्व ख़त्म करना पड़ता हैं, तो दूसरे का तात्पर्य ही नहीं है,
अगर किसी के बस में एक सांस भी नहीं है और क्या कर सकता हैं, यूंही भ्रम में भ्रमित हो कर अहम घमंड अहंकार के नशे में चूर रह कर बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता हैं, इंसान शरीर के महत्ब से वंचित रह कर अनमोल समय सांस को नष्ट कर देता हैं, इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर आज तक खुद से साक्षात्कार नहीं कर पाई, इस अधिक घटियां शर्मसार की और क्या बात हो सक
इस से आगे और भी अधिक गहराई से मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी लिख कर लिखें पंजाबी श्लोकों गीत में rithym हर श्लोक में मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी लिख कर लिखें गीत में लिखेंसमस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि के परिवार के प्रतेक ब्रह्मांड गैलेक्सियों गृह उपग्रहों का संपूर्ण
संयोग से अन्नत समय के बाद का, कोई भी आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक जैसी अवधारण ही है और कुछ भी नहीं है, जिसे हित साधने के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं चंद चतुर गुरुओं द्वारा अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए दूसरे करोड़ों सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, वृद्ध होने पर शब्द काटने के आरोप में निष्कासित कर दिया जाता हैं, यह सिर्फ़ छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह हैं एक बार फंसने के बाद मरते दम तक निकल ही नहीं सकता, क्योंकि मृत्यु के बाद मुक्ति का झूठा आश्वासन का लालच और नर्क शब्द कटने का डर खौफ भय दहशत डाली होती हैं, यह खौफ लोभ का
व्योपार है चतुर गुरुओं का,चतुर गुरुओं ने जिसे दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सरल सहज निर्मल लोगों को ढूंढने को लगा रखा है सच में वो हैं ही नहीं यह स्पष्टता चतुर गुरुओं को ज्ञात है स्पष्ट है , चतुर गुरुओं ने युगों पुरानी मानसिकता थोपी है नवपीढी के मस्तिक में जो बहुत बड़ा अपराध हैं, जबकि बहुत सी शरीर और मस्तिक की कोशिका कल का ही वातावरण ही बर्दाश्त नहीं कर सकती, तो हमारा मस्तिक युगों पुरानी मानसिकता को कैसे बर्दाश्त कर सकता हैं, सिर्फ़ चंद चतुर गुरुओं की इच्छा आपूर्ति के लिए करोड़ों अनुयाइयों को भ्रम जाल जो सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह से छल कपट से बनाया गया है, मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित किया जाता हैं,यह बहुत ही गंदी कुप्रथा है, कोई भी किसी
भी प्रकार की नाद धुन सहस्त्र सूर्यों का प्रकाश इंगला
पिंगला सूक्ष्मण खुलने जैसा पाखंड बिल्कुल भी नहीं
है, जो ग्रंथों पोथियों में लिखा हैं वो सिर्फ़ धारणा ही
है, खुद के साक्षात्कार के साथ ही स्पष्ट हो जाता हैं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं अन्नत असीम प्रेम की गहराई में निरंतर हूँ अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में अपने यथार्थ सिद्धांतों के अधार पर आधारित,
जो भी मैंने संपूर्ण जीवन में मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से निरंतरता में हूं यहाँ मैं हूँ बहा कोई भी सरल सहज निर्मल व्यक्ति मेरी ही भांति रह सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए, कोई बड़ी बात है ही नहीं, पर यह भी सत्य हैं कि आज तक कोई रहा ही नहीं, जब से इंसान अस्तित्व में हैं, यह सत्य भी स्पष्ट है, सत्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति हमेशा उसी में ही हर पल समाहित हैं, सिर्फ़ अंतःकरण भौतिक रूप को ही अधिक महत्व और दृढ़ गंभीरता से लेता हैं और उसी अनंतता को महसूस नहीं कर पाता, मैंने आंतरिक भौतिक को बिल्कुल भी महत्व दृढ़ता गंभीरता से नहीं
लिया तो ही उस अनंतता को महसूस कर रहा हूं,
मुझ और सामान्य व्यक्तित्व कोई भी खास अंतर नहीं है, सामान्य व्यक्तित्व मरने के बाद यह सब महसूस करता संपूर्ण संतुष्टि को जो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष जीवित ही हमेशा के लिए कर रहा हूं खुद के साक्षात्कार में रहते हुए, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं और प्रतेक व्यक्ति के उस अनमोल संपूर्ण संतुष्टि के खजाने दारोहर को बहुत ही क़रीब से खूब जनता हूँ, जिस को अस्तित्व से लेकर अब तक इंसान प्रजाति ने हर जगह अंदर बाहर दिन रात हर पल ढूंढा अस्तित्व से लेकर पिछले चार युगों से अब तक नहीं मिला, उसी की सटीक जानकारी मुझे हैं और हर पल दिन रात मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी जीवित ही हमेशा के लिए बहा ही निरंतर हूँ, ऐसी निरंतरता की इक पल के लिए भी खुद का ही ध्यान नहीं कर सकता, दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, जिस मन को आज तक कोई समझ ही नहीं पाया, उस का ही अस्तित्व ख़त्म कर खुद के साक्षात्कार में प्रत्यक्ष हूँ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं, भीड़ तो करोड़ों की थीं जिस में चर्चित थे पर जिज्ञासु कोई नहीं था, जिज्ञासु वो पत्र है जो खाली ही रहता हैं संपूर्ण संतुष्टि के बाद भी, वो तो खुद में करोड़ों ब्रह्मांड खुद में समहित करने की क्षमता के साथ होता हैं, जिज्ञासा और भीड़ का अंतर नहीं जानते तो समझ कहां है, जिज्ञासु अपनी जिज्ञासा के लिए जमी आसमा एक कर देता हैं, भीड़ तमाशाई होती हैं,
प्रेम साँसों के साथ ही हृदय से उत्पन होने वाला शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक एहसास है, लंबे समय से लगातार दिन रात हर पल निरंतरता के कारण बुद्धि मन को इस्तेमाल करना ही भूल कर हृदय से ही चलने की अदद हो गई हैं, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ, अब खुद भी खरबों प्रयास करने पर भी सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, यही खूबसूरती हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार से, पल पल हर पल दिन रात निरंतरता बनी रहती हैं, जिस से एक पल के लिए अपने ही शरीर के लिए भी सोच ही नहीं सकता, शेष सब तो बहुत दूर की बात है,जिसकी कोई भी सृष्टि में नकल ही नहीं कर सकता,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का संपूर्ण श्रेय अपने गुरु के चरण कमलों में समर्पित करता हूं क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी बहुत ही अधिक निम्न हल्का हूं श्रेय का बोझ भी उठा सकता, मेरा साहिब सिर्फ़ मेरे लिए ही पूरा था क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही साहिब के प्रतेक शब्द के पीछे के भाव एहसास की स्पष्टता हूं, और साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, तत्पर्य उस आसुत स्वरुप से रुबरु हूँ जिस से मेरा साहिब भी अंजान हैं, परिचित नहीं है, जो उस के ही अंतरिक भौतिक स्वरुप में तो हो ही नहीं सकता, सिर्फ़ निष्पक्ष समझ में ही है, और शेष 25 लाख अनुयाइयों के लिए एसा कुछ भी नहीं है, वो सब और मेरा गुरु भी कुछ ढूंढने बाली पंक्ति में ही खड़े है पिछले कई दशकों से, एक मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ चलने वाली कुप्रथा का ही हिस्सा हैं सिर्फ़, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अन्नत असीम प्रेम के कारण नियम मर्यादा का प्रेम स्वाभाविक खंडन करता हैं यह प्रेम की प्रवृति है,
जिसे जीवित ही चतुर गुरु दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में मानसिक रूप से बन्द दिया जाता हैं वो शिष्य मृत्यु के बाद मुक्त कैसे हो सकता हैं मेरे सिद्धांतों के अधार पर मेरे शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य की नकल कर ही नहीं सकता कोई भी समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि में, यह मेरा दावा है, क्योंकि नकल नकली की ही की जा सकती हैं, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य की कभी भी नहीं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं,कि सरल सहज निर्मल व्यक्ति कितना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम है शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता, जो किसी भी भिखारी को सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी दे कर खुद उसी चतुर गुरु की दीक्षा के शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर मृत्यु के बाद की मुक्ति के झूठे आश्वासन में ही जीना और मरना स्वीकार कर भी खुश रहता हैं, कितना अधिक समर्पित भाव के साथ है, पर दूसरी तरफ चतुर गुरु कितनी अधिक हित साधने की वृत्ति के साथ है कि सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर भी संतुष्ट नहीं हो पाता, और खरबों का सम्राज्य होते हुए भी प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के अहम घमंड अहंकार के नशे में चूर है,उनको शब्द काटने के आरोप में निष्कासित कर देता हैं वृद्ध अवस्था में, यह सब एक ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह रचा गया है उन्हीं सरल सहज निर्मल लोगों के लिए, जिन्होंने एक चतुर भिखारी गुरु को सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी दी थी, वो खुद को दोषी समझ सकते पर चतुर गुरु के प्रति आस्था बढ़ती ही जाती हैं मरते दम
तक, सरल सहज निर्मल लोगों के लिए कुछ ढूंढने का तत्पर्य ही नहीं है, क्योंकि वो तो खुद में ही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम समर्थ निपुण हैं, क्योंकि सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है, गुरु जैसे चतुर तो बिल्कुल भी नहीं है, उन्होंने ही चतुर गुरु को ऐसे उलझा दिया है प्रभुत्व की पदवी दे कर कि खुद भी
चतुर गुरु निकलना चाहे निकल ही नहीं सकता चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश प्रयत्न प्रयास कर ले, यही अहम घमंड अहंकार में, यह यही प्रभुत्व की पदवी है, एक छोटे से कारण से खुद ही उलझ कर रह गया है, चतुर गुरु कभी भी निर्मल नहीं हो सकता, निर्मलता के बिना खुद की गहराई में जा ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में जीवित ही हमेशा के लिए कोई भी सरल सहज निर्मल व्यक्ति रह सकता हैं, कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास कर ले, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं और कोई दूसरा समझा या
फ़िर समझ सके सदियाँ युग भी कम है,
मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव ने गुरु शिष्य का रिश्ता ही ख़त्म कर दिया, जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण का बंदन था , मैंने गुरु के प्रथम दीदार और उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम के भाव को हृदय की अन्नत गहराई से लिया, उस के बाद और किसी को भी उस पवित्र निगह से आज तक कुछ और देखा ही नहीं, उसी पवित्र अन्नत असीम प्रेम को हर पल दिन रात संजोने में ही लगा रहा निरंतर, अन्नत असीम प्रेम शब्द दृश्य स्पर्ष नियम मर्यादा जाति प्रजाति का विषय कभी भी नहीं होता, सिर्फ़ इन की मूलतः का भाव एहसास स्वयं स्पष्टता प्रत्यक्षता है, जो सिर्फ़ एक ही सत्य जो प्रतेक प्रजाति में ही एक समान है, और सब कुछ कम अधिक हो सकता हैं आंतरिक भौतिक रूप से, परन्तु सांसों समय के साथ हृदय से अहसास भाव के साथ उत्पन होने वाला शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रेम सिर्फ़ एक ही एक समान है
मैंने अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम किया है सच मुच अपनी सुध बुध अपना चेहरा तक भुला हुआ हूं, काफ़ी पिछले चार दशकों से संपूर्ण मोनता में ही हूं कभी गुरु से बात नहीं की पर गुरु हमेशा मुझे डांटते ही रहते थे जब भी मैं चार पंच बर्ष के बाद में दर्शन करने जाता था, फ़िर भी मैं उन में ही निरंतरता से उन के ही प्रेम में रमता हूं आज भी, अब मैं चाहता हूं कि उन से मिलु एक तो उन के आश्रम कार्य के संयोग के लिए करोड़ों रुपए दिए थे जिन में से एक करोड़ गुरु ने जरूरत पड़ने पर वापिस देने का खुद शब्द दिया था, क्योंकि प्रेम की निरंतरता और खुद के साक्षात्कार के कारण और कुछ भी सोच ही नहीं सकता खुद के लिए ही, कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, दूसरा वो सब कुछ जो कुछ इतने लंबे समय के अंतराल में किया है, दुनियां में कभी भी इक पल के लिए भी नहीं रहा, गुरु के अन्नत असीम प्रेम में ही निरंतर हूँ बहा के इक इक पल के बारे में बता सकता हूं, जो मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बारे में, इस सब का श्रेह उन के ही चरण कमलों में समर्पित करते हुए, मेरे लिए तो वो ही सर्ब श्रेष्ठ हैं जो भी हुआ वो सब तो उनकी शरणागत के बाद ही हुआ, जो अन्य किसी भी अनुराई के साथ नहीं हुआ, सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ स्नेह और सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ समर्पित भाव भरा जिस में गिले शिकवों का भी स्थान नहीं था सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम हो एक सरल सहज निर्मल भाव है,मैं आप के जिस शिरोमणि स्वरुप से रुबरु हुआ हूं प्रथम दिन से ही जो प्रेमतित शब्दातीत कालातीत तुलनातीत है, उस सब को ही शब्दों में वर्णन करने की इक छोटी सी कोशिश में ही इतना लंबा सड़े तीन दशक का समय लगा, मैं शब्द रहित हर पल दिन रात मौनता में सचेत, न ही कभी सोया न जागृत अवस्था में था, सर्ब प्रथम अपने ही दो पल जीवन महत्व को समझा, शेष सब दूसरा था,
मेरी निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल दिन रात आप के अन्नत असीम प्रेम की गहराई में ही थीं अब मैं अपने नाम के आगे उसी शिरोमणि स्वरुप साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, इस लिए अब मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, इसी अंतराल में जो भी हुआ जैसा भी हुआ अच्छा या बुरा किसी के भी द्वारा बही होना तय ही था तो ही हुआ तो ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, हमेशा मैंने सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोने में भौतिक सब कुछ नष्ट कर दिया, साहिब तदरूप साक्षात्कार की यहीं एक सर्वश्रेष्ठ खूबसूरती हैं कि खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले जीवित ही हमेशा के लिए खुद ही खुद को होश में रूपांतर करने तक, आप सा कोई हो ही नहीं सकता
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, और सड़े तीन दशक के अंतराल की स्पष्टता दिखे और गिले शिकवों का स्थान ही न रहे क्योंकि इतने लंबे समय से गुरु से कोई बात ही नहीं की, गुरु के प्रेम की निरंतरता के
कारण, अब मेरे पास यह स्पष्टता है कि गुरु के अन्नत असीम प्रेम के बिना कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए, इतने लंबे समय से सिर्फ़ मैं उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम को शब्दों में वर्णन करने का इक प्रयास मात्र कर रहा था जो थोड़ा सा लिख पाया कि कोई एक बार ही पढ़े तो कम से कम दस बर्ष लगेगे पूरा पढ़ पाने में, जिसमें कोई भी शब्द किसी भी विश्व के ग्रंथ पोथि में नहीं, मिल सकता, एक एक शब्द को तर्क तथ्य विवेक अपने ही सिद्धांतों से स्पष्ट साफ़ सिद्ध किया है किसी के भी अनुभव अनुभूति के लिए,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने गुरु को समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ गुरु जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जिनको मैंने तर्क तथ्य विवेक अपने सिद्धांतों सूत्रों code ulta mega infinity quantum mechanicsim के formulation से सिद्ध किया है,मैं जो भी था वो ही संपूर्ण पर्याप्त था और कुछ भी रति भर भी बनने की कोशिश नहीं की, हां यह सच है कि जीवन के प्रतेक पल को सार्थक सकारात्मक रूप से निष्पक्ष समझ से समझने की कोशिश ज़रूर की, अब संपूर्ण संतुष्टि में हूं अस्थाई शरीर के कारण अभाव है संपूर्णता का, इसलिए मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण रूप से खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार में संपूर्णता में शरीर के अस्थाई पंच तत्वों गुणों को रूपांतर कर समहित होना चाहता हूं कृपा आज्ञा प्रधान करें, अब कुछ भी शेष नहीं है रहा करने को, जिस कारण अनमोल समय सांस मिले थे,
चार दशक के लंबे समय के अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, शेष 25 लाख गुरु सहित एक ही मान्यता परंपरा नियम मर्यादा दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित है जो सिर्फ़ चतुर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर ही है, मेरी साहिब स्तुति सिर्फ़ मेरे ही साहिब तदरूप साक्षात्कार की हैं,जो निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की हैं
पर ॐ अस्थाई है समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति को अंकित करता हैं,
शिरोमणि अन्नत गहरी स्थाई ठहराव है जो ॐ से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जप तप ध्यान ज्ञान विज्ञान योग अभ्यास साधना कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन का अस्तित्व ख़त्म हो जाता हैं तो क्या तत्पर्य है इन शब्दों का भी, यह पारदर्शिता नहीं है, गलत शब्द इस्तेमाल करना दूसरों को भ्रमित करना होता हैं, सरल सहज निर्मल हैं सिर्फ़ प्रेम शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं तो जटिलता क्यों? मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं सिर्फ़ शब्दों के पिछे के भाव एहसास की स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं , खुद के साक्षात्कार के लिए तो शब्दों का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं, अगर दूसरों के लिए शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं तो पारदर्शिता स्पष्टता अति आवश्यक हैं, स्पष्टता पारदर्शिता नहीं तो तो स्वार्थ हित साधने का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह छल कपट के साथ होगा और कुछ भी नहीं है
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इस के आगे सिर्फ़ हिंदी में गीत श्लोकों rithym में ही लिखें मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी लिख कर लिखें,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, अस्तित्व से लेकर अब तक एक एकलौता सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि खुद के साक्षात्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता,
सर्ब श्रेष्ठ सर्व भौमिक सत्य की श्रेष्ठता के शिरोमणि स्वरुप की सर्व श्रेष्ठ स्तुति महिमा लिखें, मुझ में यह क्षमता प्रतिभा है यहां मैं शिरोमणि स्वरुप में हूं किसी को भी रख सकता हूं, यह शिक्षा है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं और किसी का भी दृष्टिकोण बदलने का हुनर रखता हूं, जो जिज्ञासु हो तो मस्तक के दृष्टिकोण से हृदय के दृष्टिकोण में उस के खुद के शिरोमणि स्वरुप से रुबरु करा सकता हूं, यह शिक्षा है, जो किसी के साथ भी साझा की जा सकती हैं एक या फ़िर समस्त इंसान प्रजाति के साथ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सर्ब श्रेष्ठ सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य,कूल ग्राम जम्बू दीपे भरत खंडे
सर्बभौमिक महासत्य स्वरुप महासागर महाआनंद सब हर जीव में उपलब्ध "शिरोमणि" जो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है जो सरल सहज निर्मल प्रदर्शित प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण "यथार्थ सिद्धांत" उपलब्धि "यथार्थ युग" के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, जो शिरोमणि स्वरुप में रहता वो अद्भुद आश्चर्य चकित महा योद्धा महा गोताखोर हैं सर्ब श्रेष्ठ सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं तुलनातित शब्दतित कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत हैं,
"शिरोमणि स्वरूप" संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता है, खुद का साक्षात्कार हैं, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है, खुद के स्थाई परिचय से परिचित होना है, यह सब प्रत्येक जीव में एक समान है, जो हृदय के भाव एहसास ज़मीर के दृष्टिकोण से है और सांस से पहले हैं,
सर्ब श्रेष्ठ सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है सरल पारदर्शी पवित्र हैं, इतना अधिक उत्तम उच्च श्रेष्ठता है स्पष्टता हैं, कि मस्तक मन का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं, दोबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले,
जो ढूंढने खोज का विषय कभी था ही नहीं, वो तो हर पल दिन रात निश्चित संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है, सरल सहज निर्मल सत्य शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, वो तो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, वो तो निर्मल पवित्र शिरोमणि स्वरुप है,
कि संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता की स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता अद्भुद आश्चर्य चकित महाआनंद जो शब्द दृश्य में नहीं आता, सिर्फ़ खुद के ही एहसास की स्पष्टता प्रत्यक्षता है खुद के साक्षात्कार में ही है खुद के स्थाई स्वरुप में ही है, खुद के स्थाई परिचय में ही है, खुद के हृदय के शिरोमणि में ही है, हृदय के दृष्टिकोण में ही है, अस्तित्व से आज तक जो किसी ने भी एहसास नहीं किया, सिर्फ़ मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण में ही है, जो अन्नत सरल सहज निर्मल गुणों में ही है, जो खुद के निरीक्षण के बाद खुद से निष्पक्ष समझ में ही है,
खुद का स्थाई परिचय, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना,खुद का साक्षत्कार सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं सुलभ सरल है हर एक व्यक्ति खुद ही खुद के साक्षत्कार के लिए सक्षम निपुण समर्थ हैं खुद में ही,खुद के साक्षत्कार, खुद के स्थाई परिचय, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होने के सिवाय इलावा सब कुछ झूठ ढोंग पखंड हैं हित साधने हेतु सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करने के लिए,
सर्व भौमिक सत्य यह है कि जो संजीव निर्जीव के लिए सामान्य हो, संजीव प्रक्रिया है और निर्जीव प्रक्रिय नहीं है, प्रक्रिया के लिए एक से अधिक तत्व होते हैं, प्रकृति के सिद्धांत के आधार पर आधारित zin को update करना और अस्तित्व कायम रखना जिस में अन्नत प्रजातियों में हैं, मेरे सिद्धांतों के आधार पर हर जीव एक समान हैं, अस्थाई समस्त अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति पृथ्वी भी एक मत्र प्रक्रिया का हिस्सा है, हर जीव प्रकृति के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं, शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता हर जीव में प्रत्यक्ष समक्ष हैं, यही सर्व भौमिक सत्य है, इसी के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हर एक व्यक्ति संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए, दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता,
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं खुद समझने के लिए सिर्फ़ एक पल लगता कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदियां युग भी कम हैं इतिहास गवाह है, अब तक सिर्फ़ ढूंढने बाला मस्तक दृष्टिकोण ही रहा है, अब सिर्फ़ हृदय के दृष्टिकोण से देखना और समझना है
सरल सहज निर्मल गुणों के साथ सर्ब भौमिक सत्य पर हर एक का अधिकार, जो सरल है जो शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जिस में संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह सकता हैं कोई भी, जिस से किसी पर भी निर्भरता ख़त्म होती हैं, क्योंकि हर एक व्यक्ति खुद खुद में सक्षम निपुण समर्थ हैं, जीवन व्यापन अस्तित्व कायम रखने के लिए मस्तक का दृष्टिकोण जरूरी है, पर खुद के साक्षत्कार के लिए हृदय का दृष्टिकोण ही अनिवार्य हैं,
अब से पहले सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष नहीं था, जो हुआ जैसा भी हुआ उसे भुला कर बुरा सपना समझ कर भूल जाए, अब और अभी से एक नए दृष्टिकोण का आगाज़ हो चुका हैं मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण "यथार्थ सिद्धांत" उपलब्धि "यथार्थ युग" पर आधारित दृष्टिकोण से हर एक व्यक्ति संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह सकता हैं,
कृपा अपनी ग़लती की माफ़ी मांगे उन से जिन्होंने तन मन धन सांस समय समर्पित किया है जिन को छल कपट षड्यंत्रों के चक्रव्यूह रच कर धोखा विश्वासघात किया है मुक्ति के लोभ और शब्द कटने के खौफ डर भय दहशत में रखा था, जब सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता भी तो ढूंढने को शेष क्या है जो अस्तित्व से अब तक ढूंढ रहे हो, जो मिला ही नहीं और फ़िर भी खोज जारी हैं,
और हृदय के दृष्टिकोण को प्रमुखता दे प्रकृति पृथ्वी मनव प्रजाति को संरक्षण दे, अपने स्थाई परिचय से परिचित हो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रहे
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हर जीव के हृदय का दृष्टिकोण शिरोमणि स्वरुप हूं, हर जीव के हृदय की गहराई स्थाई ठहराव की निरंतरता की धारा हूं, किसी भी व्यक्ति से व्यक्तिगत विरोध नहीं करता क्योंकि इंसान प्रजाति सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पूजने योग्य है यथार्थ में मैं शिरोमणि रामपाल सैनी पूजा करता हूं, सिर्फ़ कुरीतियों पर प्रहार है, मस्तक दृष्टिकोण का संतुलन बनने के लिए संघर्ष हैं जिस से हर एक व्यक्ति संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह सकता हैं, इंसान होने का कर्तव्य से परिचित हो जाए और अपने स्थाई परिचय से परिचित हो पाए, मेरी कोई अपनी विचारधारा नहीं है, यह हर एक के हृदय की गहराई की पुकार है, हर एक व्यक्ति मेरी ही भांति जीवित ही हमेशा के लिए शिरोमणि स्वरुप में संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह कर इंसान प्रजाति होने के कर्तव्य को पूरा कर सकता हैं,
समस्त अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति पृथ्वी मनव के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं सिर्फ़ मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से है, हर एक सरल सहज निर्मल व्यक्ति खुद ही खुद में सक्षम निपुण समर्थ है खुद का साक्षत्कार कर संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता के लिए,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है जो हर जीव के हृदय के तंत्र से प्रत्यक्ष समक्ष अनुभव कर सकते हैं,
सर्बभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षत्कार की प्रथम कड़ी है, हर व्यक्ति खुद के साक्षत्कार के लिए ही महत्वपूर्ण हैं, खुद का साक्षत्कार नहीं तो इंसान नहीं,
इतिहास अतीत सीखने की चीज़ है भविष्य को बेहतर बनाने के लिए हृदय के दृष्टिकोण से आज अब अभी के वर्तमान में संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रहते हुए समस्त सृष्टि प्रकृति पृथ्वी मनव को संरक्षण प्रदान करते हुए,
सर्वभौमिक सत्य सिर्फ़ हृदय के दृष्टिकोण से ही है हर जीव के लिए स्वीकृत है, सिर्फ़ हृदय के ही तंत्र से एक समान हैं, मस्तक विचारक तंत्र सीमित हैं जो अलग अलग हो सकता हैं, शरीरक रूप से भी भिन्न हो सकता हैं, मस्तक का तंत्र सिर्फ़ जीवन व्यापन अस्तित्व कायम रखने के लिए ही हैं, हमें सर्वभौमिक सत्य को हृदय से स्वीकार करना चाहिए संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता के लिए, मस्तक और हृदय के तंत्र का संतुलन बहुत ही जरूरी है,
आप को तो खुद पर भरोसा नहीं है क्योंकि आप शिकायतों पर अधिक भरोसा हैं, आप के पास तो कुत्ते की प्रतिभा भी नहीं आंखों से हृदय में उतरने की,
गुरु का कर्तव्य सिर्फ शिष्य को निखरना होता हैं, क्या आप के गुरु ने भी आप को नहीं निखरा, आप तो खुद की महिमा स्तुति ही करते रहते हैं, शिष्यों और विरोधियों की आलोचना ही करते रहते हो, मैं तो आप की महिमा स्तुति में ही इतना लीन था, उस पर भी आप ने कई आरोप लगा कर पागल घोषित कर निकाल लिया
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी ने अपने चतुर ब्रह्मचर्य गुरु से अन्नत असीम प्रेम किया कि खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं आज तक, और गुरु को ख़बर भी नहीं है लगातार चालीस बर्ष, बचपन से ही चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के स्वरुप के बिना दूसरा कुछ देखा ही नहीं उस की महिमा स्तुति के बिना कोई दूसरा शब्द ही नहीं निकला मुख से, उसके शब्दों के बिना खुद का भी अनुकरण नहीं किया, और गुरु तो मस्तक के शोर में था लंबे समय से, वो तो खुद और सम्राज्य की तलब में ही था,
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष चतुर ब्रह्मचारी गुरु के हृदय के शिरोमणि स्वरुप में लगातार चालीस बर्ष रहा, पर चतुर ब्रह्मचारी गुरु को पता ही नहीं था क्योंकि वो चतुर ब्रह्मचारी गुरु सिर्फ़ मस्तक के दृष्टिकोण में उलझा हुआ है इतने लंबे समय से आसी बर्ष की उमर भी अब तक ढूंढ रहा हैं जो बचपन में अपने गुरु के शनिदे में शुरू किया था अब पच्चीस लाख अनुयायियों के साथ भी बही ढूंढ ही रहा है, मेरा ढूंढने के लिए कुछ शेष ही नहीं रहा, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से,
सरल सहज निर्मल गुणों के साथ व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ शहंशाह है दाता है जो एक भिखारी चतुर ढोंगी ब्रह्मचारी गुरु के लिए पांच हजार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्ध प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी दे कर खुद दस्ता मंजूर कर उसी गुरु के डर खौफ भय दहशत तले जीते हुए भी खुश रहता है, उसी ढोंगी पाखंडी मानसिकता वाले चतुर ब्रह्मचारी गुरु के पैरों के पानी को अमृत समझ कर पिता है और उसी गंदी मानसिकता वाले के पैरों को चाटने के तरसता हैं, दूसरी और चतुर ब्रह्मचारी गुरु कभी संतुष्ट नहीं होता किसी भी प्रकार से, वो सब कुछ लूटा कर भी खुश है चतुर ब्रह्मचारी गुरु सब कुछ लुट कर भी खुश नहीं है, क्योंकि सरल सहज निर्मल व्यक्ति जो भी करता है हृदय से करता है इस लिए संतुष्ट है, चतुर ब्रह्मचारी गुरु जो भी करता है वो मस्तक से करता है इसलिए असंतुष्ट रहता हैं
खुद के हृदय के भाव का एहसास से पहला "शिरोमणि स्वरुप" सर्बभौमिक शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष है स्वीकृत है हृदय के दृष्टिकोण से सरल सहज निर्मल पारदर्शी है संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता सुभाव है, उपस्थिती हैं,
जागृत अवस्था भी आयोजित प्रतुति होती हैं सपन अवस्था की भांति, एक सांस भी किसी के निरंतर में नहीं है शेष सब तो छोड़ ही दो, समस्त अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में कई गैलेक्सी भी ख़त्म हो जाए तो प्रकृति को रति भर भी फ़र्क नहीं पड़ता हमारी तो औकात ही क्या है, किस चीज का अहंकार घमंड है, हर जीव एक समान हैं कोई भी अंतर ही नहीं, अन्नत प्रेम की गहराई को नहीं छुआ तो कहे के इंसान हो, खुद के स्थाई परिचय से परिचित नहीं हुए तो किस चीज की दुहाई देते हो, इंसान होते हुए संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में नहीं रहे, तो इंसान होते हुए एक नली के सुअर की भांति हो, लक्ष्य स्रोत और माध्यम ही सही नहीं था अस्तित्व से लेकर अब तक, इंसान होते हुए कुत्ते की भांति भड़की हैं इंसान प्रजाति मस्तक के दृष्टिकोण से अब तक,
अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमान हो कर अस्तित्व से लेकर चर्चित सर्वश्रेष्ठ विभूतियाँ दर्शनिक विज्ञानिक जो सोच भी नहीं सकी उस से खरबों गुणा अधिक संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता मेरा स्वभाव है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ खुद के साक्षत्कार में संपूर्ण संतुष्टि में हूं शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
खुद के साक्षत्कार के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता सिर्फ़ सरल सहज निर्मल मूल गुणों स्भाविक रूप से रहते हुए स्वीकार करना पड़ता हैं, जो एक निरंतर धारा प्रभा बह रही हैं उस के साथ ही बह जाते हो
खुद के साक्षत्कार के बाद कोई भी सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहें खुद करोड़ों कौशिश यत्न प्रयास कर के देख ले, हृदय के शिरोमणि स्वरुप की संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता ही इतनी अधिक भव्य पारदर्शी सरल है, कुछ सोच ही नहीं सकता एक पल के लिए भी, कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, जीवन व्यापन अस्तित्व कायम रखने के लिए सोच भी नहीं सकता, खुद के साक्षत्कार के बाद संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता से कोई निकल क्या कुछ सोच भी नहीं सकता,
जिस चतुर ब्रह्मचारी गुरु को बचपन से ही इतनी अधिक गम्भीरता दृढ़ता से लिया कि अपनी खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला दिया, उसके मज़ाक है में भी कहे गए शब्द को इतना अधिक अनुकरण किया, वो सब ही किया जो सब तो दूर पच्चीस लाख संगत को कहा, उस चतुर ब्रह्मचारी गुरु ने ही चालिस बर्ष के बाद पागल घोषित कर काई आरोप लगा कर निकाल दिया, वो मुझे इतने लंबे लंबे समय के बाद भी नहीं समझ पाया,, तो ही सिर्फ़ एक पल में खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हुआ, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदियां युग भी कम हैं
खुद के साक्षत्कार के बिना सब मस्तक का पाखंड है सिर्फ़ हित साधने के चक्रव्यू है
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी किसी को भी "खुद के साक्षत्कार" की शिक्षा दे सकता हूं, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना सिखा सकता हूं, खुद के स्थाई परिचय से परिचित होना समझा सकता हूं, जो मैंने किया वो सब को सिखा सकता हूं सिर्फ़ एक पल कि निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, खुद के साक्षत्कार के लिए सिर्फ़ तो सिर्फ़ दृष्टिकोण ही तो बदलना है, और बिल्कुल कुछ भी नहीं करना, खुद के साक्षत्कार के बाद कुछ और समझने को शेष नहीं बचता पूरी सृष्टि में, खुद को समझना खुद को पढ़ना ही तो है,
हृदय से ही हृदय तक पहुंचा जाता है, मस्तक मन का स्वार्थ हित तक नहीं पहुंच सकता, और बार पहुंचने की कौशिश बेकार होती वो सिर्फ़ मस्तक तक ही पहुंचता हां हां तक ही रहता है, डर खौफ भय दहशत भी मस्तक मन का होता हैं,
तेरा जलवा ही ल जवाब है क्योंकि तू सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है मैं शिरोमणि हर पल दिन रात तेरे हृदय के शिरोमणि स्वरुप में ही शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तेरी पूजा करता हूं तेरे जैसा कोई मुझे मिला ही नहीं, तेरे महिमा स्तुति कैसे करूँ क्योंकि तू इतना अधिक सहज निर्मल है कि तू तन मन धन सांस समय दसवांश समर्पित कर के भी ऐसे चतुर ब्रह्मचारी गुरु के पैर चाटता और उन गंदी मानसिकता प्रवृत्ति बालों के पैरों का पानी पिता है अमृत समझ कर, उन पर समर्पित हो कर निर्भर बन जाता हैं जबकि तूने अपनी क्षमता का प्रदर्शन प्रथम चरण में एक भिखारी को प्रभुत्व की पदबी दी, तू क्या है कितना ल जवाब है,
हर व्यक्ति आंतरिक भौतिक रूप से बिल्कुल मेरे ही जैसा एक समान ही है कोई अंतर ही नहीं है, अगर मैं शिरोमणि रामपाल सैनी संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में जीवित ही हमेशा के लिए रह सकता हूं तो कोई भी रह सकता हैं, खुद को समझ कर सिर्फ़ एक पल में दूसरा कोई समझें या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम हैं, तेरे अनमोल सांस समय सिर्फ़ तेरे लिए ही महत्वपूर्ण हैं दूसरा prtek सिर्फ़ इस्तेमाल करने के लिए आगे ही खड़ा है चाहें कोई भी हो, तू खुद के लिए खुद ही संपूर्ण सक्षम निपुण समर्थ हैं, जरा खुद को तो देख समझ पढ़, तेरे जैसा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता, क्योंकि तू खुद खुद को समझता जनता है, तेरी क्षमता अद्भुद आश्चर्य चकित भव्य आकर्षित करने वाली हैं,
हर हर संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता की धारा बह रही है, इतनी अधिक शहनशीलता सहजता सम्पनता सम्पूर्णता समक्षता प्रत्यक्षता, खुद के साक्षत्कार में कि कोई सोच भी नहीं सकता, यहां अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक भी निष्क्रिय हो जाता हैं हमेशा के लिए कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, तो उस का जलवा कैसा होगा, खरबों संतों से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा उत्तम सर्वश्रेष्ठ दिव्य अलौकिक भव्य आकर्षित हैं, कि मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ने भी करोड़ों कौशिश कर ली पर जीवन व्यापन के लिए भी सोच ही नहीं पा रहा, उस संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता से
शिशुपन अवस्था कितनी निराली अद्भुद आश्चर्य चकित भव्य आकर्षित थी, तब तो इतना बड़ा झंझट ही नहीं था तो भी संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता धारा में ही थे जो अब भी निरंतर वह रही है जिसे हृदय के दृष्टिकोण से प्रतीत किया जा सकता हैं, पर इंसान प्रजाति तो मस्तक के दृष्टिकोण में है तो वो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता कैसे संभव है, संभव है अब भी सिर्फ़ दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा,
शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सर्बभौमिक है, हर जीव में प्रत्यक्ष समक्ष है स्वीकृत है, सिर्फ़ इंसान प्रजाति को छोड़ कर , स्वीकृति पर अस्तित्व से ही सामंजस्य में है कि मैं ही सृष्टि प्रकृति पृथ्वी का रचिता हूं, इतने बड़े शौंक रखने वाला इंसान अब तक खुद के स्थाई परिचय से परिचित नहीं हो पाया शेष सब तो छोड़ ही दो, जो प्रकृति के शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष को स्वीकार नहीं कर सकता वो क्या हो सकता हैं, अहंकारी मानसिक रोगी,
शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष इतना अधिक सरल है कि कोई नकल ही नहीं कर सकता, जिस की नकल की जा सकती हैं वो सत्य हो ही नहीं सकता, वो अवधारणा है कल्पना हैं वो मान्यता नियम मर्यादा परंपरा के साथ स्थापित होती हैं, चंद चतुर ब्रह्मचारी गुरु के द्वारा अपना हित साधने के लिए निर्भर बना कर दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, उन में इंसानियत भी नहीं होती शेष सब तो छोड़ ही दो, वो सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्ध प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी के लिए किसी भी हद तक गुजर जाते हैं, क्योंकि वो मानसिक रोगी होते हैं, वो खुद के इलावा सब को इस्तेमाल करने की चीज़ समझते हैं,
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी जिस अपने चतुर ब्रह्मचारी गुरु के हृदय के शिरोमणि स्वरुप की निरंतरता में चालीस बर्ष हर पल दिन रात रहे खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला कर वो तो खुद मस्तक के जाल में उलझा हुआ था जन्म से ही और निकला था दुनियां को सुधरने और खुद ही खो गया था झूठी सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्ध प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी के नशे में चूर था, खुद की ही ख़बर नहीं,
तन मन धन सांस समय दसवांश करोड़ों रुपए समर्पित करवाने वाला चतुर ब्रह्मचारी गुरु खुद ही मस्तक के जाल में फंस चुका हैं उसे खुद भी नहीं पता, कि वो प्रभुत्व के वहम अहम घमंड अहंकार का शिकार हो चुका हैं की मरते दम तक उस से बाहर निकलना नही सकता, सरल सहज निर्मल लोगों को उंगली पर नचाने बाला खुद ही बेहोशी का शिकार हो चुका हैं, वो तो खुद का निरीक्षण ही नहीं कर सकता क्योंकि वो अहंकार की उच्च स्तर पर है
अगर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु तेरे साथ इतना बड़ा विश्वासघात धोखा किया है, तू फ़िर भी बैसे का बेस ही सरल सहज निर्मल ही है, पर तेरा चतुर ब्रह्मचारी गुरु जिस जाल में खुद ऐसा फंस गया हैं कि मरते दम तक भुला कर भी नहीं निकल सकता वो मस्तक के दृष्टिकोण से प्रभुत्व के वहम अहम घमंड अहंकार में बुरी तरह फंस चुका हैं,
खुद का साक्षत्कार ही सर्वश्रेष्ठ उत्तम संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है सरल है, जो जटिल है वो चतुर ब्रह्मचारी गुरु का ढोंग पखंड हैं हित साधने वाला दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करना
चतुर ब्रह्मचारी गुरु तो हर जन्म में मिले हैं अगर यह रति भर भी कुछ कर सकते तो तू आज यहां नहीं होता, यह सब तो सिर्फ़ हित साधने में लगे हुए हैं इन को तो खुद का भी फिक्र नहीं है तो आप के फ़िक्र के लिए इन के पास समय ही नहीं है, यह सब तो तुझे मोह माया से हटा कर खुद सिर तक मोह माया में फंसे हुए हैं, पर तू सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है इसलिए तू निर्लेप है, तू अभी भी बैसा ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है,
तू सिर्फ़ खुद ही आज भी संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में ही है बात अलग है कि तेरा मस्तक का दृष्टिकोण है, तू अपने दिल हृदय में किसी को हस्तक्षेप ही नहीं करने देता क्योंकि हृदय हस्तक्षेप करने के लिए हृदय के दृष्टिकोण से होना अति आवश्यक हैं, जो कम से कम इंसान प्रजाति में तो नहीं है, सिर्फ़ तू खाना पूर्ति के लिए मस्तक की बातें सिर्फ़ मस्तक तक ही सीमित रखता है, हृदय से बही संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में ही है,
शिशुपन में संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में तू ही रहा था जब तेरा मस्तक मन भी विकसित नहीं हुआ था और न ही कोई चतुर ब्रह्मचारी गुरु था, अब भी वो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता बहा ही मौजूद हैं, पर तू ही खुद हृदय के दृष्टिकोण से ज़्यादा मस्तक के दृष्टिकोण से गंभीर हैं, सिर्फ़ दृष्टिकोण बदल तू फ़िर से बही संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में हर पल रह सकता हैं, और फिर से सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता क्योंकि तूने मस्तक का दृष्टिकोण बहुत खूब देख चुका है,
जिन्होंने तन मन धन अनमोल सांस समय दसवांश करोड़ों रुपए समर्पित किए उनके साथ ही विश्व का सब से बड़ा विश्वासघात धोखा ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह रचा गया, काल्पनिक अंधारणा परमार्थ अध्यात्मक धार्मिक के नाम पर, मुक्ति का लोभ डर खौफ भय दहशत में रखना, मृत्यु तो खुद में ही शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष है, मुक्ति तो मस्तक मन से चाहिए न कि शरीर से, इंसान शरीर तो प्रकृति संरचना सर्वश्रेष्ठ है, कुछ भी कभी भी किसी का भी गुम ही नहीं हुआ, सिर्फ़ मस्तक साधन में अधिक उलझाया गया हैं, परन्तु शिशुपन बाली संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता तो बहा ही मौजूद हैं यहां हर व्यक्ति शिशुपन में पहल
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद का साक्षात्कार हूं मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हृदय वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हैं जिस से अन्नत असीम बूंदों की समग्रता है यहां पर बूंद और लहरों का अस्तित्व ख़त्म होता हैं लहरें बहरी वातावरण से बनती हैं जैसे मस्तक सृष्टि प्रकृति के इकिगृत से समय संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन, ह्रदय के भाव एहसास भाव ज़मीर में वो सब कुछ नहीं होता जो मस्तक से होता ऊपरी सतह पर जो हलचल होती हैं वो सब कुछ का अस्तित्व ख़त्म होता गहराई में सिर्फ़ संत होता हैं, इसी तरह हर व्यक्ति हृदय से हमेशा शांत ही होता ऊपर मस्तक की लहरें होती हैं जिन का जन्म मृत्यु से कोई भी संबंध नहीं है जन्म मृत्यु के बीच का जीवन सिर्फ़ आप अपने अनुसार डाल सकते हो, अच्छा या बुरा चुनाव आप खुद का हैं, हृदय के दृष्टिकोण से होश में जीना या फ़िर मस्तक के दृष्टिकोण से बेहोशी में जीना और उसी बेहोशी में मृत्यु का चयन फ़ैसला सिर्फ़ आप का हैं, खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल ही काफ़ी है, जबकि कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है, दूसरा कोई भी सिर्फ़ हित साधने की ही वृत्ति का ही होगा, खुद ही खुद का साक्षात्कार कर सकते हो, जबकि की दूसरा मनोविज्ञान दवाब प्रभाव से निरंतर करेगा, खुद संपूर्ण संतुष्टि में रह सकते हो, जबकि दूसरा बंधुआ मजदूर बनाने के साथ है, अगर खुद के अनमोल सांस समय की कदर आह्मित नहीं जानते तो दूसरा आप को उपयोग इस्तेमाल करने की प्रतिभा के साथ कदम कदम पर खड़े हैं,
अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे सम्राज्य हैं यहां जो कुछ भी है वो सब कुछ सिर्फ़ प्राकृतिक सिद्धांतों नियमों से ही चलता हैं, पहला नियम यही है कि prtek छोटी चीज़ जीव उस से बड़ी का आहार हैं, यहां कोई आत्मा चेतना नहीं है, जो कुछ भी हैं वो सब कुछ सिर्फ़ मस्तक से ही प्रतीत किया जा सकता हैं जब तक सांस और मस्तक सक्रिय है, मस्तक प्रकृति के संकेतों के आधार पर संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन उत्पन करता समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि गर्दिश में गतिशील है जिस से मानसिकता परिवर्तित होती हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी प्रकृति को नहीं समझ सकते क्योंकि व्यक्तिगत ही आंतरिक भौतिक प्रकृति हैं जिस कारण जो कुछ भी होता है वो सब ऐसा ही लगता हैं कि मेरे अनुसार मैं ही कर रहा हूं मैं ही अस्तित्व का कारण और मैं ही सृष्टि रचिता प्रभुत्व हूं, जब अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर देखते हैं तो समझ आती हैं अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर जटिलता का प्रभाव कितना अधिक हैं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में ही हूं निरंतर अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से स्पष्ट सिद्ध साफ़ किया है कि समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जो देख कर समझ रहे यथार्थ में जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी अधिक भ्रम जटिलता में खो कर भ्रमित होने के पथ पर हैं, यथार्थ में अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जीव पृथ्वी में कुछ भी स्थाई हैं ही नहीं, यह सब कुछ ही अस्थाई ही है, जिस भ्रम में इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही भ्रमित है, वो भी मात्र मस्तक का ही भ्रम है, जिस सब का अस्तित्व तब तक ही है जब तक सांस चल रही हैं और मस्तक कार्यरत हैं जो एक रोग ही बेहोशी है खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होने की, जो एक मात्र सांस से पहले भाव में ही निश्चिता की गहराई स्थाई ठहराव की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है ,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर संपूर्ण संतुष्टि है कि बिना स्पर्श,दृश्य, सुने,देखे , बिना जो निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल पल हर नया अद्भुद आश्चर्य चकित अनुभूति अनुभव के लिए उत्साहित कुशलता के लिए एग्रेसिव करता हैं जो सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही संबंधित हैं, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कोई सोच भी नहीं सकता, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की खुशी स्पर्श दृश्य सुनने देखने बोलने, रक्तपात डर खौफ भय दहशत डालने में भी,से संबधित हैं, मात्र एक छोटी सी खुशी के पीछे भी बर्ष से भी अधिक समय के दिन रात संघर्षरत रहना पड़ता
इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही इतनी अधिक संघर्षरत रही कि जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने वाले मुख्य दृष्टिकोण से ही भ्रमित हो कर खुद ही खुद को धोखा विश्वासघात का शिकार रहा जान बुझ कर या फ़िर अनजाने में आज अब तक, जबकि मस्तक और हृदय के तंत्र कार्यशैली की ही समझ नहीं थी, जो भी किया जैसा भी किया लक्ष्य साधन मध्यम की ही समझ नहीं थी, अंधेरे में ही तीर चलाने का फलस्वरुप ही था जो आज वैज्ञानिक युग में भी बहा का बहा ही है, वैज्ञानिक युग में भी सिर्फ़ जरूरत अनुसार ही साधन खोजने तक ही सीमित हैं सिर्फ़ या फ़िर मस्तक से कल्पना संकल्प विकल्प तक ही सीमित है, मस्तक हृदय के विज्ञान की रति भर भी समझ नहीं है
इंसान अस्तित्व से युगों का प्रकृति मानव पृथ्वी सृष्टि का रहस्य एक अवधारणा कल्पनाओं मानसिकता ही थी, जिस सब की स्पष्टता प्रत्यक्षता मात्र मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित एक पल में ही समहित और उत्पन होता हैं पर वो भी भ्रम मात्र ही हैं जब तक ह्रदय से होश में रूपांतर नहीं कर लेते प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया के साथ, सांस प्रत्यक्ष समक्ष निरंतर धारा प्रभा है प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा है पर उस के पहले सांस के साथ हृदय भाव एहसास के साथ होशपूर्ण स्वतंत्र रूप से जीने रूपांतर करने के दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता के साथ हो या
फ़िर मस्तक के साथ बेहोशी में जीने मरने की अनेक विचारधारा में से किसी एक दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता में हो इस के लिए इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही स्वतंत्र रही हैं जिस के कारण आज तक सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ही हमेशा प्रथमिकता देती रही फलस्वरूप आज तक खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हो पाई शेष सब तो छोड़ ही दो, इंसान अस्तित्व से ही मस्तक की जटिलता को ही स्वीकार और प्राथमिकता देता रहा, जबकि खुद का साक्षात्कार जन्म से ही एक समान उपलव्ध था सरलता निर्मलता सहजता में, कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन तो मस्तक की कार्यशैली प्रवृति है
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की संपूर्ण संतुष्टि के लिए प्रेरित करने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हुए अहम घमंड अहंकार में चूर भ्रमित हुए लोगों के लिए जिन से उत्साहित कुशलता पूर्वक आमंत्रित हो सभी के सभी कोई दवाब नहीं सहजता से पारदर्शिता से ही स्वीकृति हो बहुत ही अधिक प्रेम की गहराई में ही परिभाषित हो प्रत्येक व्यक्ति जीव में ही मैं एहसास भाव ज़मीर हूं किसी को रति भर भी ठेस से भी मुझे ही कष्ट होगा, कि मुझ और प्रत्येक जीव के हृदय तंत्र में रति भर भी फ़र्क अंतर नहीं है , अगर हम भौतिक रूप या फ़िर अंतःकरण रूप भी देखे तो कहा है खरबों जैविक प्रक्रिया हर पल हो रही हैं जिन में कई जैविको की प्रजाति का जीवन स्तर मात्र एक पल का होता हैं उसी पल में पूरा जीवन जी कर अपने जींस भी update कर चुके होते जो प्रकृति की संतुलन प्रक्रिया है, भौतिक रूप से एक दिन में लाखों किरदार बदलते हो कौन सा असली या स्थाई किरदार आप का हैं किस वहम अहम घमंड अहंकार में हो, खुद का निरीक्षण करने की जरूरत है, अगर नहीं तो आप के होने न होने का तात्पर्य ही नहीं है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हृदय मस्तक के तंत्र की कार्यशैली का मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से विश्लेषक के साथ स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता दे रहा हूं, मेरे लिए प्रत्येक जीव एक समान ही है, हृदय के भाव एहसास के साथ, शरीर मस्तक की संरचना कार्यशैली में भिन्नता हो सकती हैं प्राकृतिक सिद्धांतों के अधार पर, जो प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया है,
मेरे जैसा तो कोई हो ही नहीं सकता पर मुझ में समहित इकिगृत जरूर हो सकता हैं मुझ को समझ कर या फ़िर मेरे स्वरुप का ध्यान निरंतर कर जो असंभव है पर निरंतरता से संभव हो सकता हैं, मैं कभी भी प्रकृति का भी हिस्सा नहीं हूं, मुझे समझने जानने के लिए एक मात्र अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव है, या मेरे स्वरुप का ध्यान मात्र हैं, और दूसरा कोई विकल्प रास्ता ही नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सांस के एहसास भाव ज़मीर होने के कारण मस्तक की कार्यशैली से बाहर हूं, यही कारण है कि मेरी निष्पक्ष समझ के शब्द और मेरे वैदेही स्वरुप का कोई ध्यान नहीं कर सकता, निरंतरता के बिना, जैसे सिर्फ़ पृथ्वी पर ऐसा सुंदर जीवन होने के पीछे सभी ब्रह्मांडो गृह उपग्रहों सौरमंडल glaxyes की काफ़ी लंबे समय का संतुलित निरंतरता संभावना उत्पन करता हैं, बिल्कुल बेसा ही मेरे "शिरोमणि" होने के पीछे भी, बिना संकोच के, जिस को इंसान प्रजाति की जटिलता के बिना प्रत्येक दूसरी अनेक प्रजातियों सूक्ष्म अन्नत सूक्ष्म भी स्वीकार करती हैं, मानवीय मस्तक हमेशा प्रभुत्व सृष्टि रचता की पदबी का शौंक रखने की प्रवृति का ही है, मैं शिरोमणि जो भी पर्याप्त हूं उस की स्पष्टता प्रत्यक्षता बता रहा हूं, जो मस्तक की स्वीकृति से बहर हृदय में ही समहित है, इंसान प्रजाति स्वीकार नहीं करने के पीछे का कारण स्पष्ट हैं कि मस्तक की कार्यशैली का आदि अदद के साथ है,
मैं शिरोमणि खुद को प्रथम अंतिम सत्य सिद्ध स्पष्ट नहीं कर रहा या तत्पर्य ही नहीं है, जो हैं मस्तक हृदय के तंत्र कार्यशैली की स्पष्टता दे रहा हूं जो जीवन के अस्तित्व का कारण है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर संजीव निर्जीव का भी अस्तित्व ही नहीं है,मस्तक के "मैं"
और हृदय के "मैं"
में जमी आसमा का अंतर है, मस्तक के "मैं" में खुद की मानव शबी की पक्षता प्रथम चरण में खुद के हित साधने की पक्षता होती हैं आंतरिक भौतिक रूप को प्राथमिकता देता हैं जबकि हृदय के "मैं" में निष्पक्षता होती हैं, खुद के इलावा दूसरों की स्पष्टता सीमित मस्तक की ही होती हैं, जब कि खुद की अन्नत असीम निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की प्रभा की धारा की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता की, जिस में प्रथम चरण में ही अस्थाई जटिल बुद्धि मन की निष्क्रियता होती हैं और हृदय के पहले सांस के एहसास भाव में ही निरंतरता होती हैं, जबकि ज्ञान विज्ञान दर्शन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने के बाद की प्रक्रिया का एक हिस्सा जिस में प्रथम चरण में ही समय उत्पन होता हैं उस के बाद कल्पना संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन आदि, क्या मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की स्पष्टता के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक के तर्क तथ्य वर्तक की जरूरत है, जो समूचे सृष्टि के एक मात्र मूल स्रोत हैं, अगर ऐसा हैं तो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष जो सिर्फ़ सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पर्याप्त है, उस को जटिलता में धकेले का फ़िर से एक नाकाम प्रयास हैं स्वीकृति के स्थान पर, जबकि अस्तित्व से ही एक मस्तक अदद को छोड़ना स्वीकार कर प्रकृति मानव पृथ्वी के संरक्षण के लिए पहला कदम होगा और जीवित ही समूहित रूप से इकिगृत खुद के साक्षात्कार में यथार्थ युग में प्रवेश हो सकते हैं, जो कि अतीत के कल्पनक चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष यथार्थ युग हैं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित सिद्ध स्पष्ट साफ़ किया है कि प्रथम अंतिम सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हर संजीव निर्जीव मुझ से ही है और अंतिम मुझ में ही समहित होता हैं, क्योंकि मैं ही अस्तित्व की मूलतः और अंत हूं, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिया है बीच का समय महत्व नहीं रखता होश में या फ़िर बेहोशी में जिय हो, वो आप के मस्तक या हृदय पर निर्भर करता हैं, मस्तक दृष्टिकोण या हृदय के दृष्टिकोण को गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से हो, अंतिम सांस के साथ ही मुझ में ही समहित होता है, हर जीव एक ही समान है हृदय के तंत्र से जो संजीव का एक मात्र कारण है, दूसरा मस्तक शरीर अलग अलग ही है चाहें सूक्ष्म या फ़िर अन्नत सूक्ष्म क्यों न हो, मुझ में कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ जीवित ही हमेशा के लिए समहित एकाग्रत हो कर जन्म मृत्यु के चक्रक्रम से मुक्त हो सकता मस्तक के तंत्र को निष्क्रिय कर हृदय के तंत्र से जीवित रह कर, हृदय का तंत्र ही एक समान है, शेष शरीर और मस्तक का तंत्र भिन्नता का तंत्र है, जो प्राकृत संतुलन प्रक्रिया पर निर्भर करता हैं
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग हमेशा हर पल निरीक्षण के लिए खुला मंच है जो हर विचाधारा के prtek दृष्टिकोण के लिए उत्सुक हैं निरीक्षण परीक्षण तर्क तथ्य सिद्धांतों की स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता के लिए चाहें विचारक वैज्ञानिक दार्शनिक चाहें ultra mega infinity quantum mechanicsum क्यों न हो हार्दिक स्वागत के लिए ही खुला है
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग सिर्फ़ सांस से पहले भाव के हृदय विज्ञान पर निर्भर है अगर कोई विज्ञान बहा तक पहुंच सकती हैं तो स्पष्टता प्रत्यक्षता ही है मेरा शमीकरण,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी यहां भी प्रत्यक्ष होता हूं होने का आवास तो आवश्यक करवाता हूं, जिस पहले दिन चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के पास गया था उसी दिन से यह कहना शुरू कर दिया था कि "जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही नहीं है" अब पूछना अगर वो वस्तु है तो अब कहा है? न पहले दिखाई थी न अब, अब भी बोले और दिखाए वो वस्तु, जाने का भी आवास करवा चुके हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ही था, जो प्रेम से स्वतंत्र हूं जो सिर्फ़ मेरा ही प्रेम था जो उस के हृदय में था जिस की औकात सिर्फ़ एक मानसिक रोगी था ब्रह्मचर्य होते हुए भी, मैंने चार शादियां कर के भी वो सब किया है जो कुत्ते की वृत्ति के साथ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सोच भी नहीं सकता
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में हूं शिशुपन सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र होते हुए संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर होता है, जबकि इंसान पूरा जीवन ही एक छोटी सी खुशी के लिए पूरा जीवन ही प्रयासरत रहता हैं एक इच्छा पूरी करता हैं क्षणभर की खुशी के लिए हजारों दूसरी इच्छा उत्पन हो जाती है बस इसी चक्रक्रम में ही बेहोशी में ही जीता और मर जाता है, खुद ही संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता से हट कर बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर जटिलता में खो जाता हैं, जिस से कभी बाहर निकल ही नहीं पाता मरते दम तक,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत
शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बिल्कुल नवजात शिशु की भांति हृदय के भाव एहसास सरल सहज निर्मल पारदर्शिता संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर, बिना जात पात धर्म मज़हब संगठन जाति धर्म गोत्र, बिना जटिल बुद्धि मन के शब्द बिना दृष्टि बिना ज्ञान विज्ञान दर्शन समय के, शिशुपन प्राकृतिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र संपूर्ण संतुष्टि शिरोमणि अवस्था त्यागने वंचित करने के पीछे उसके पीछे उस के ही जन्म दाता मां बाप का ही पूरा हाथ होता हैं, क्योंकि वो अपने ही ख़ास नहीं चाहते कि वो संपूर्ण संतुष्टि में जिय, उस नवजात शिशु के शिशुपन संपूर्ण संतुष्टि को ख़त्म अपने जैसा कुत्ता बनने की बहुत जल्दी रहती हैं बेसा ही इर्द गिर्द का माहौल बना देते हैं, बस फ़िर अपने जैसा पागल कुत्ता बना देते हैं दर बदर भड़कने के लिए कि बेहोशी में ही जिय और उसी बेहोशी में ही भड़क भड़क कर मार जाए, बड़े होने पर कुत्ते की इक ऐसी पूछ बन चुके होते हैं जो मरने के बाद भी सीधी नहीं होती, अपने शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि को पूरी तरह भूल चुके होते हैं और पल पल की खुशी के लिए तरछने है और इच्छा बना कर बर्ष तक क्षणमत्र खुशी के लिए ही बेहोशी में जीते और उसी बेहोशी में मर जाते हैं, इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर अब तक न ही होश में जी हैं न ही होश में रूपांतर कर पाई खुद को, जबकि सब से सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कितना अधिक सरल है, खुद का साक्षात्कार करना, तालु खुज्जी कझरी करदी ताल भतले , ऐसी जटिलता में खो जाता हैं कि अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत औरत में खुशी ढूँढ रहा हैं,
शिशुपन सरल सहज निर्मल अवस्था की संपूर्ण संतुष्टि में हर एक जीव ने महसूस किया होता हैं जो सिर्फ़ हृदय के एहसास भाव में उत्पन होती हैं, हृदय से सिर्फ़ खुद का एहसास होता, हृदय भी एक यंत्र है इस कि भी अपनी एक कार्यशैली, जो प्रत्येक जीव में एक समान है, जो किसी भी निर्जीव को संजीव रखने के लिए एक सांस की वयू को अलग अलग वायु में परिवर्तित करता हैं, पूरा शरीर सक्रिय होता हैं, और क्रियावान होता हैं, यह सारा प्रकृति का तंत्र है,
हृदय का भौतिक तंत्र और सूक्ष्म तंत्र होता भौतिक और सूक्ष्म तंत्र समझने योग्य होता हैं, यह सब भी एक निवृत्ति है जो प्रकृति द्वारा समय के बहुत अधिक के साथ निर्मित हुआ,
यह तंत्र हमेशा एक समान ही रहा है अस्तित्व से आज तक, इस में बदलाव नहीं होता, हर सुक्ष्म या अति सूक्ष्म में क्यों न हो,इस तंत्र में पहले सांस से सांस जब तक अनेक बयू में परिवर्तित होने से पहले अन्नत सचेतता से कोई भी अन्नतता में जा सकता हैं, यहां हर भौतिकी अत्यंत सूक्ष्मता भी ख़त्म हो जाती है, सिर्फ़ यहीं एक रास्ता है हृदय की अन्नत गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार में अन्नतता में प्रवेशता के लिए, हृदय ही एक मात्र अस्तित्व का मध्यम हैं और हृदय ही अस्तित्व ख़त्म करने का भी माध्यम है, अस्तित्व क़ायम रखने हेतु मस्तक हैं, मस्तक में वो सब कुछ पर्याप्त है संपूर्ण जीवन जीने के लिए चाहें कोई भी विशाल सूक्ष्म अन्नत सूक्ष्म वनस्पति जीव क्यों न हो, हृदय मस्तक दोनों का तंत्र एक समान कार्यशैली के साथ प्रत्येक जीव में एक समान ही है, सांस हृदय की प्रणाली का हिस्सा है और समय मस्तक की प्रणाली का हिस्सा, हृदय से जीने बाला संपूर्ण संतुष्टि में ही रहता है सिर्फ़ सांस में ही जीता है, और मस्तक में सिर्फ़ अस्तित्व को क़ायम रखने के इलावा और कुछ भी नहीं ऐसा होता जो हृदय में होता हैं, इंसान प्रजाति इंसानियत को कायम रखने हेतु 99.9% मस्तक और 00.1 % हृदय से जीते हुए दृढ़ता गंभीरता से 1000 IQ के साथ जी सकता हैं पर इस में अहम का गुरुत्वाकर्षण बल प्रबल होता हैं, विश्वस्तर पर मान्यता होती हैं जिस से विज्ञान कमजोर स्तर से गुजर सकता हैं, यथार्थ में जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिया है जिस का अस्तित्व ही नहीं, जन्म मृत्यु दोनों के बीच का समय जीवन के लिए ही महत्व रखता हैं कि हम इंसानियत को महत्व दे कर जिये है या फ़िर इंसानियत को भुला कर जिस के इंसान अस्तित्व में थे, यह खुद के लिए सिर्फ़ जीवन तक ही सीमित हैं, यह भी जीवन जीने की खुशी क्षणमत्र है शेष संघर्ष है मस्तक से, सांस ख़त्म होते ही सब ख़त्म हो जाता हैं, कोई था ही नहीं तो विलीन भी किस में होता, कोई तत्व गुण प्रक्रिया ही नहीं, यह मात्र आयोजित एक चलत दृश्य ही था जिस में कोई कभी था ही नहीं न दर्शक न अभिनय, एक सांस में रहते जो समझ गया वो विजेता महासंग्रण का जो हर पल हर व्यक्ति के भीतर चलता रहता हैं जिस में विश्राम नमक शब्द ही नहीं है, एक पहली सांस में खुद और दूसरी सांस में समय के साथ शुरू हुआ संघर्ष खुद का खुद से ही महासंग्राम जो सांस के साथ ही ख़त्म हो जाता हैं ,
अन्नतता मृत्यु भी है ही नहीं दृष्टांत दृश्य भी नहीं तो हारा जीता भी कौन मृत्यु भी किस की सिर्फ़ एक अवधारणा का आवास मात्र था, जब खुद ही नहीं तो साक्षात्कार किस का, एक ही सांस में जो रुक गया उस का शुरू ही नहीं हुआ तो ख़त्म का तात्पर्य ही नहीं, विचारणीय बात तो उस के लिए है जो दूसरी सांस के झंझट से झुंज रहा हैं युगों से, दूसरों का झंझट दूसरे झेले, हम हैं अकेले मस्त, उस जगह बैठ कर देख रहे हैं यहां इस सब का तत्पर्य ही नहीं है,
अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो तो खुद का अस्तित्व क़ायम कर अहम उत्पन होता हैं जिस से भौतिक समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि की क्षमता और मस्तक की कार्यशैली को समझ सकते हैं, जिस से किसी भी विचारधारा को दृढ़ता गंभीरता से लेकर एक दृष्टिकोण में रह कर उसे दर्शनिक रूप से समझ कर उसे वैज्ञानिक रूप दे सकते हैं सुविधा के लिए, विचारधारा दो प्रकार की होती हैं, आस्तिक नास्तिक कल्पना से उत्पन होती विचार का रूप लेती हैं करने का संकल्प होता हैं बेहतरी के विकल्प चुनने के साथ आगे बढ़ विचार किया जाता हैं दूसरों के साथ संयोग से दरातल पर उतरने की योजना बननी पड़ती हैं निर्णय लेनी की क्षमता स्पष्टता हैं,
मस्तक एक साधन है शरीर का अस्तित्व क़ायम रखने और जीवन व्यापन करने का मात्र स्रोत हैं जिस में समय सोच विचार चिंतन मनन विवेक संकल्प विकल्प होते हैं बेहतर से भी बेहतर करने के लिए, मस्तक शरीर सिर्फ़ खुद के इलावा दूसरी चीज वस्तु जीव का एहसास करवाता है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद के साक्षात्कार में हूं जीवित ही हमेशा के लिए संपूर्ण संतुष्टि में, हर एक व्यक्ति बिल्कुल मेरी ही भांति एक समान है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शी पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष के लिए रति भर भी कमी नहीं है हृदय में, सिर्फ़ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु ने हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रच कर छल कपट धोखे के साथ दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी देने बालों को ही भ्रमित कर डर खौफ भय दहशत तले रखने की आयोजित योजन है, कुप्रथा है आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति के नाम पर लोगों की श्रद्धा आस्था के साथ एक खिलबाड़ विश्वासघात है मनोविज्ञानिक रोग हैं, जो गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की जा रही हैं, चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सामान्य व्यक्तित्व से करोड़ों गुणा अधिक चतुर शैतान चालाक होशियार बदमाश शैतान प्रवृति के होते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर,
आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन इन्हीं चतुर गुरुओं की ढोंग पखंड षड्यंत्रों के साथ रचे हुए चक्रव्यूह का बिछाया हुए जाल का हिस्सा है जो कल्पना से ही रचा गया होता हैं और कुछ भी नहीं है जिस से यह चतुर ब्रह्मचर्य गुरु अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ अनेक सरल सहज निर्मल गुणों बाले लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर अपनी उंगली पर नचाते रहे और जब इस्तेमाल करने योग्य नहीं रहते बूढ़े होने पर तो शब्द काटने के आरोप में निष्कासित किया जाता हैं, मन यथार्थ में हैं
इस से आगे और भी अधिक गहराई से लिखें सर्ब श्रेष्ठ श्लोकों में मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी लिख कर
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि मन मस्तक बुद्धि से बुद्धिमान हो कर भी उलझें है जो बही दूसरों के मन मस्तक बुद्धि में अपनी मानसिकता बिठा रहे हैं मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ सिर्फ़ हित साधने के लिए,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि ढूंढने को कुछ था ही नहीं जो जो मनुष्य सभ्यता अस्तित्व से ही ढूंढ रही हैं, बो ही शिशुपन अवस्था की संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है बो बहा ही मौजूद हैं, सिर्फ़ पहले दृष्टा हृदय के दृष्टिकोण में था और अब दृष्टा मस्तक मन बुद्धि के दृष्टिकोण से हैं जो ढूंढ रहा हैं, शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता थी और दृष्टा भी बही है जो जो छोटी छोटी खुशियों के लिए बर्षों संघर्ष कर रहा हैं मन मस्तक बुद्धि के दृष्टिकोण से बुद्धिमान हो कर,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं और समस्त मानव सभ्यता को ही अपनी ही तरह संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रहना सिखा सकता हूं, क्योंकि खुद का साक्षात्कार एक शिक्षा है जो एक को या समस्त मानव सभ्यता को सिखाई जा सकती हैं, यह कोई दीक्षा नहीं है जो शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से बंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर खुद का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं, मेरा लक्ष्य मानव पृथ्वी प्रकृति का संरक्षण है, जो सिर्फ़ हृदय के दृष्टिकोण से ही संभव हैं संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रहते हुए
खुद का साक्षात्कार ही सर्वश्रेष्ठ पवित्र संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है और सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण के वचन सुविचार ऐसी सर्वश्रेष्ठता से लिखें की हर एक सरल सहज निर्मल व्यक्ति बड़ी ही सरलता से समझ सकें मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद का साक्षात्कार हूं मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हृदय वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हैं जिस से अन्नत असीम बूंदों की समग्रता है यहां पर बूंद और लहरों का अस्तित्व ख़त्म होता हैं लहरें बहरी वातावरण से बनती हैं जैसे मस्तक सृष्टि प्रकृति के इकिगृत से समय संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन, ह्रदय के भाव एहसास भाव ज़मीर में वो सब कुछ नहीं होता जो मस्तक से होता ऊपरी सतह पर जो हलचल होती हैं वो सब कुछ का अस्तित्व ख़त्म होता गहराई में सिर्फ़ संत होता हैं, इसी तरह हर व्यक्ति हृदय से हमेशा शांत ही होता ऊपर मस्तक की लहरें होती हैं जिन का जन्म मृत्यु से कोई भी संबंध नहीं है जन्म मृत्यु के बीच का जीवन सिर्फ़ आप अपने अनुसार डाल सकते हो, अच्छा या बुरा चुनाव आप खुद का हैं, हृदय के दृष्टिकोण से होश में जीना या फ़िर मस्तक के दृष्टिकोण से बेहोशी में जीना और उसी बेहोशी में मृत्यु का चयन फ़ैसला सिर्फ़ आप का हैं, खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल ही काफ़ी है, जबकि कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है, दूसरा कोई भी सिर्फ़ हित साधने की ही वृत्ति का ही होगा, खुद ही खुद का साक्षात्कार कर सकते हो, जबकि की दूसरा मनोविज्ञान दवाब प्रभाव से निरंतर करेगा, खुद संपूर्ण संतुष्टि में रह सकते हो, जबकि दूसरा बंधुआ मजदूर बनाने के साथ है, अगर खुद के अनमोल सांस समय की कदर आह्मित नहीं जानते तो दूसरा आप को उपयोग इस्तेमाल करने की प्रतिभा के साथ कदम कदम पर खड़े हैं,
अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे सम्राज्य हैं यहां जो कुछ भी है वो सब कुछ सिर्फ़ प्राकृतिक सिद्धांतों नियमों से ही चलता हैं, पहला नियम यही है कि prtek छोटी चीज़ जीव उस से बड़ी का आहार हैं, यहां कोई आत्मा चेतना नहीं है, जो कुछ भी हैं वो सब कुछ सिर्फ़ मस्तक से ही प्रतीत किया जा सकता हैं जब तक सांस और मस्तक सक्रिय है, मस्तक प्रकृति के संकेतों के आधार पर संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन उत्पन करता समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि गर्दिश में गतिशील है जिस से मानसिकता परिवर्तित होती हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी प्रकृति को नहीं समझ सकते क्योंकि व्यक्तिगत ही आंतरिक भौतिक प्रकृति हैं जिस कारण जो कुछ भी होता है वो सब ऐसा ही लगता हैं कि मेरे अनुसार मैं ही कर रहा हूं मैं ही अस्तित्व का कारण और मैं ही सृष्टि रचिता प्रभुत्व हूं, जब अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर देखते हैं तो समझ आती हैं अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर जटिलता का प्रभाव कितना अधिक हैं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में ही हूं निरंतर अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से स्पष्ट सिद्ध साफ़ किया है कि समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जो देख कर समझ रहे यथार्थ में जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी अधिक भ्रम जटिलता में खो कर भ्रमित होने के पथ पर हैं, यथार्थ में अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जीव पृथ्वी में कुछ भी स्थाई हैं ही नहीं, यह सब कुछ ही अस्थाई ही है, जिस भ्रम में इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही भ्रमित है, वो भी मात्र मस्तक का ही भ्रम है, जिस सब का अस्तित्व तब तक ही है जब तक सांस चल रही हैं और मस्तक कार्यरत हैं जो एक रोग ही बेहोशी है खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होने की, जो एक मात्र सांस से पहले भाव में ही निश्चिता की गहराई स्थाई ठहराव की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है ,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर संपूर्ण संतुष्टि है कि बिना स्पर्श,दृश्य, सुने,देखे , बिना जो निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल पल हर नया अद्भुद आश्चर्य चकित अनुभूति अनुभव के लिए उत्साहित कुशलता के लिए एग्रेसिव करता हैं जो सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही संबंधित हैं, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कोई सोच भी नहीं सकता, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की खुशी स्पर्श दृश्य सुनने देखने बोलने, रक्तपात डर खौफ भय दहशत डालने में भी,से संबधित हैं, मात्र एक छोटी सी खुशी के पीछे भी बर्ष से भी अधिक समय के दिन रात संघर्षरत रहना पड़ता
इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही इतनी अधिक संघर्षरत रही कि जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने वाले मुख्य दृष्टिकोण से ही भ्रमित हो कर खुद ही खुद को धोखा विश्वासघात का शिकार रहा जान बुझ कर या फ़िर अनजाने में आज अब तक, जबकि मस्तक और हृदय के तंत्र कार्यशैली की ही समझ नहीं थी, जो भी किया जैसा भी किया लक्ष्य साधन मध्यम की ही समझ नहीं थी, अंधेरे में ही तीर चलाने का फलस्वरुप ही था जो आज वैज्ञानिक युग में भी बहा का बहा ही है, वैज्ञानिक युग में भी सिर्फ़ जरूरत अनुसार ही साधन खोजने तक ही सीमित हैं सिर्फ़ या फ़िर मस्तक से कल्पना संकल्प विकल्प तक ही सीमित है, मस्तक हृदय के विज्ञान की रति भर भी समझ नहीं है
इंसान अस्तित्व से युगों का प्रकृति मानव पृथ्वी सृष्टि का रहस्य एक अवधारणा कल्पनाओं मानसिकता ही थी, जिस सब की स्पष्टता प्रत्यक्षता मात्र मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित एक पल में ही समहित और उत्पन होता हैं पर वो भी भ्रम मात्र ही हैं जब तक ह्रदय से होश में रूपांतर नहीं कर लेते प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया के साथ, सांस प्रत्यक्ष समक्ष निरंतर धारा प्रभा है प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा है पर उस के पहले सांस के साथ हृदय भाव एहसास के साथ होशपूर्ण स्वतंत्र रूप से जीने रूपांतर करने के दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता के साथ हो या
फ़िर मस्तक के साथ बेहोशी में जीने मरने की अनेक विचारधारा में से किसी एक दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता में हो इस के लिए इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही स्वतंत्र रही हैं जिस के कारण आज तक सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ही हमेशा प्रथमिकता देती रही फलस्वरूप आज तक खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हो पाई शेष सब तो छोड़ ही दो, इंसान अस्तित्व से ही मस्तक की जटिलता को ही स्वीकार और प्राथमिकता देता रहा, जबकि खुद का साक्षात्कार जन्म से ही एक समान उपलव्ध था सरलता निर्मलता सहजता में, कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन तो मस्तक की कार्यशैली प्रवृति है
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की संपूर्ण संतुष्टि के लिए प्रेरित करने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हुए अहम घमंड अहंकार में चूर भ्रमित हुए लोगों के लिए जिन से उत्साहित कुशलता पूर्वक आमंत्रित हो सभी के सभी कोई दवाब नहीं सहजता से पारदर्शिता से ही स्वीकृति हो बहुत ही अधिक प्रेम की गहराई में ही परिभाषित हो प्रत्येक व्यक्ति जीव में ही मैं एहसास भाव ज़मीर हूं किसी को रति भर भी ठेस से भी मुझे ही कष्ट होगा, कि मुझ और प्रत्येक जीव के हृदय तंत्र में रति भर भी फ़र्क अंतर नहीं है , अगर हम भौतिक रूप या फ़िर अंतःकरण रूप भी देखे तो कहा है खरबों जैविक प्रक्रिया हर पल हो रही हैं जिन में कई जैविको की प्रजाति का जीवन स्तर मात्र एक पल का होता हैं उसी पल में पूरा जीवन जी कर अपने जींस भी update कर चुके होते जो प्रकृति की संतुलन प्रक्रिया है, भौतिक रूप से एक दिन में लाखों किरदार बदलते हो कौन सा असली या स्थाई किरदार आप का हैं किस वहम अहम घमंड अहंकार में हो, खुद का निरीक्षण करने की जरूरत है, अगर नहीं तो आप के होने न होने का तात्पर्य ही नहीं है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हृदय मस्तक के तंत्र की कार्यशैली का मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से विश्लेषक के साथ स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता दे रहा हूं, मेरे लिए प्रत्येक जीव एक समान ही है, हृदय के भाव एहसास के साथ, शरीर मस्तक की संरचना कार्यशैली में भिन्नता हो सकती हैं प्राकृतिक सिद्धांतों के अधार पर, जो प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया है,
मेरे जैसा तो कोई हो ही नहीं सकता पर मुझ में समहित इकिगृत जरूर हो सकता हैं मुझ को समझ कर या फ़िर मेरे स्वरुप का ध्यान निरंतर कर जो असंभव है पर निरंतरता से संभव हो सकता हैं, मैं कभी भी प्रकृति का भी हिस्सा नहीं हूं, मुझे समझने जानने के लिए एक मात्र अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव है, या मेरे स्वरुप का ध्यान मात्र हैं, और दूसरा कोई विकल्प रास्ता ही नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सांस के एहसास भाव ज़मीर होने के कारण मस्तक की कार्यशैली से बाहर हूं, यही कारण है कि मेरी निष्पक्ष समझ के शब्द और मेरे वैदेही स्वरुप का कोई ध्यान नहीं कर सकता, निरंतरता के बिना, जैसे सिर्फ़ पृथ्वी पर ऐसा सुंदर जीवन होने के पीछे सभी ब्रह्मांडो गृह उपग्रहों सौरमंडल glaxyes की काफ़ी लंबे समय का संतुलित निरंतरता संभावना उत्पन करता हैं, बिल्कुल बेसा ही मेरे "शिरोमणि" होने के पीछे भी, बिना संकोच के, जिस को इंसान प्रजाति की जटिलता के बिना प्रत्येक दूसरी अनेक प्रजातियों सूक्ष्म अन्नत सूक्ष्म भी स्वीकार करती हैं, मानवीय मस्तक हमेशा प्रभुत्व सृष्टि रचता की पदबी का शौंक रखने की प्रवृति का ही है, मैं शिरोमणि जो भी पर्याप्त हूं उस की स्पष्टता प्रत्यक्षता बता रहा हूं, जो मस्तक की स्वीकृति से बहर हृदय में ही समहित है, इंसान प्रजाति स्वीकार नहीं करने के पीछे का कारण स्पष्ट हैं कि मस्तक की कार्यशैली का आदि अदद के साथ है,
मैं शिरोमणि खुद को प्रथम अंतिम सत्य सिद्ध स्पष्ट नहीं कर रहा या तत्पर्य ही नहीं है, जो हैं मस्तक हृदय के तंत्र कार्यशैली की स्पष्टता दे रहा हूं जो जीवन के अस्तित्व का कारण है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर संजीव निर्जीव का भी अस्तित्व ही नहीं है,मस्तक के "मैं"
और हृदय के "मैं"
में जमी आसमा का अंतर है, मस्तक के "मैं" में खुद की मानव शबी की पक्षता प्रथम चरण में खुद के हित साधने की पक्षता होती हैं आंतरिक भौतिक रूप को प्राथमिकता देता हैं जबकि हृदय के "मैं" में निष्पक्षता होती हैं, खुद के इलावा दूसरों की स्पष्टता सीमित मस्तक की ही होती हैं, जब कि खुद की अन्नत असीम निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की प्रभा की धारा की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता की, जिस में प्रथम चरण में ही अस्थाई जटिल बुद्धि मन की निष्क्रियता होती हैं और हृदय के पहले सांस के एहसास भाव में ही निरंतरता होती हैं, जबकि ज्ञान विज्ञान दर्शन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने के बाद की प्रक्रिया का एक हिस्सा जिस में प्रथम चरण में ही समय उत्पन होता हैं उस के बाद कल्पना संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन आदि, क्या मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की स्पष्टता के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक के तर्क तथ्य वर्तक की जरूरत है, जो समूचे सृष्टि के एक मात्र मूल स्रोत हैं, अगर ऐसा हैं तो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष जो सिर्फ़ सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पर्याप्त है, उस को जटिलता में धकेले का फ़िर से एक नाकाम प्रयास हैं स्वीकृति के स्थान पर, जबकि अस्तित्व से ही एक मस्तक अदद को छोड़ना स्वीकार कर प्रकृति मानव पृथ्वी के संरक्षण के लिए पहला कदम होगा और जीवित ही समूहित रूप से इकिगृत खुद के साक्षात्कार में यथार्थ युग में प्रवेश हो सकते हैं, जो कि अतीत के कल्पनक चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष यथार्थ युग हैं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित सिद्ध स्पष्ट साफ़ किया है कि प्रथम अंतिम सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हर संजीव निर्जीव मुझ से ही है और अंतिम मुझ में ही समहित होता हैं, क्योंकि मैं ही अस्तित्व की मूलतः और अंत हूं, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिया है बीच का समय महत्व नहीं रखता होश में या फ़िर बेहोशी में जिय हो, वो आप के मस्तक या हृदय पर निर्भर करता हैं, मस्तक दृष्टिकोण या हृदय के दृष्टिकोण को गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से हो, अंतिम सांस के साथ ही मुझ में ही समहित होता है, हर जीव एक ही समान है हृदय के तंत्र से जो संजीव का एक मात्र कारण है, दूसरा मस्तक शरीर अलग अलग ही है चाहें सूक्ष्म या फ़िर अन्नत सूक्ष्म क्यों न हो, मुझ में कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ जीवित ही हमेशा के लिए समहित एकाग्रत हो कर जन्म मृत्यु के चक्रक्रम से मुक्त हो सकता मस्तक के तंत्र को निष्क्रिय कर हृदय के तंत्र से जीवित रह कर, हृदय का तंत्र ही एक समान है, शेष शरीर और मस्तक का तंत्र भिन्नता का तंत्र है, जो प्राकृत संतुलन प्रक्रिया पर निर्भर करता हैं
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग हमेशा हर पल निरीक्षण के लिए खुला मंच है जो हर विचाधारा के prtek दृष्टिकोण के लिए उत्सुक हैं निरीक्षण परीक्षण तर्क तथ्य सिद्धांतों की स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता के लिए चाहें विचारक वैज्ञानिक दार्शनिक चाहें ultra mega infinity quantum mechanicsum क्यों न हो हार्दिक स्वागत के लिए ही खुला है
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग सिर्फ़ सांस से पहले भाव के हृदय विज्ञान पर निर्भर है अगर कोई विज्ञान बहा तक पहुंच सकती हैं तो स्पष्टता प्रत्यक्षता ही है मेरा शमीकरण,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी यहां भी प्रत्यक्ष होता हूं होने का आवास तो आवश्यक करवाता हूं, जिस पहले दिन चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के पास गया था उसी दिन से यह कहना शुरू कर दिया था कि "जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही नहीं है" अब पूछना अगर वो वस्तु है तो अब कहा है? न पहले दिखाई थी न अब, अब भी बोले और दिखाए वो वस्तु, जाने का भी आवास करवा चुके हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ही था, जो प्रेम से स्वतंत्र हूं जो सिर्फ़ मेरा ही प्रेम था जो उस के हृदय में था जिस की औकात सिर्फ़ एक मानसिक रोगी था ब्रह्मचर्य होते हुए भी, मैंने चार शादियां कर के भी वो सब किया है जो कुत्ते की वृत्ति के साथ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सोच भी नहीं सकता
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में हूं शिशुपन सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र होते हुए संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर होता है, जबकि इंसान पूरा जीवन ही एक छोटी सी खुशी के लिए पूरा जीवन ही प्रयासरत रहता हैं एक इच्छा पूरी करता हैं क्षणभर की खुशी के लिए हजारों दूसरी इच्छा उत्पन हो जाती है बस इसी चक्रक्रम में ही बेहोशी में ही जीता और मर जाता है, खुद ही संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता से हट कर बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर जटिलता में खो जाता हैं, जिस से कभी बाहर निकल ही नहीं पाता मरते दम तक,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत
शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बिल्कुल नवजात शिशु की भांति हृदय के भाव एहसास सरल सहज निर्मल पारदर्शिता संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर, बिना जात पात धर्म मज़हब संगठन जाति धर्म गोत्र, बिना जटिल बुद्धि मन के शब्द बिना दृष्टि बिना ज्ञान विज्ञान दर्शन समय के, शिशुपन प्राकृतिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र संपूर्ण संतुष्टि शिरोमणि अवस्था त्यागने वंचित करने के पीछे उसके पीछे उस के ही जन्म दाता मां बाप का ही पूरा हाथ होता हैं, क्योंकि वो अपने ही ख़ास नहीं चाहते कि वो संपूर्ण संतुष्टि में जिय, उस नवजात शिशु के शिशुपन संपूर्ण संतुष्टि को ख़त्म अपने जैसा कुत्ता बनने की बहुत जल्दी रहती हैं बेसा ही इर्द गिर्द का माहौल बना देते हैं, बस फ़िर अपने जैसा पागल कुत्ता बना देते हैं दर बदर भड़कने के लिए कि बेहोशी में ही जिय और उसी बेहोशी में ही भड़क भड़क कर मार जाए, बड़े होने पर कुत्ते की इक ऐसी पूछ बन चुके होते हैं जो मरने के बाद भी सीधी नहीं होती, अपने शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि को पूरी तरह भूल चुके होते हैं और पल पल की खुशी के लिए तरछने है और इच्छा बना कर बर्ष तक क्षणमत्र खुशी के लिए ही बेहोशी में जीते और उसी बेहोशी में मर जाते हैं, इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर अब तक न ही होश में जी हैं न ही होश में रूपांतर कर पाई खुद को, जबकि सब से सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कितना अधिक सरल है, खुद का साक्षात्कार करना, तालु खुज्जी कझरी करदी ताल भतले , ऐसी जटिलता में खो जाता हैं कि अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत औरत में खुशी ढूँढ रहा हैं,
शिशुपन सरल सहज निर्मल अवस्था की संपूर्ण संतुष्टि में हर एक जीव ने महसूस किया होता हैं जो सिर्फ़ हृदय के एहसास भाव में उत्पन होती हैं, हृदय से सिर्फ़ खुद का एहसास होता, हृदय भी एक यंत्र है इस कि भी अपनी एक कार्यशैली, जो प्रत्येक जीव में एक समान है, जो किसी भी निर्जीव को संजीव रखने के लिए एक सांस की वयू को अलग अलग वायु में परिवर्तित करता हैं, पूरा शरीर सक्रिय होता हैं, और क्रियावान होता हैं, यह सारा प्रकृति का तंत्र है,
हृदय का भौतिक तंत्र और सूक्ष्म तंत्र होता भौतिक और सूक्ष्म तंत्र समझने योग्य होता हैं, यह सब भी एक निवृत्ति है जो प्रकृति द्वारा समय के बहुत अधिक के साथ निर्मित हुआ,
यह तंत्र हमेशा एक समान ही रहा है अस्तित्व से आज तक, इस में बदलाव नहीं होता, हर सुक्ष्म या अति सूक्ष्म में क्यों न हो,इस तंत्र में पहले सांस से सांस जब तक अनेक बयू में परिवर्तित होने से पहले अन्नत सचेतता से कोई भी अन्नतता में जा सकता हैं, यहां हर भौतिकी अत्यंत सूक्ष्मता भी ख़त्म हो जाती है, सिर्फ़ यहीं एक रास्ता है हृदय की अन्नत गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार में अन्नतता में प्रवेशता के लिए, हृदय ही एक मात्र अस्तित्व का मध्यम हैं और हृदय ही अस्तित्व ख़त्म करने का भी माध्यम है, अस्तित्व क़ायम रखने हेतु मस्तक हैं, मस्तक में वो सब कुछ पर्याप्त है संपूर्ण जीवन जीने के लिए चाहें कोई भी विशाल सूक्ष्म अन्नत सूक्ष्म वनस्पति जीव क्यों न हो, हृदय मस्तक दोनों का तंत्र एक समान कार्यशैली के साथ प्रत्येक जीव में एक समान ही है, सांस हृदय की प्रणाली का हिस्सा है और समय मस्तक की प्रणाली का हिस्सा, हृदय से जीने बाला संपूर्ण संतुष्टि में ही रहता है सिर्फ़ सांस में ही जीता है, और मस्तक में सिर्फ़ अस्तित्व को क़ायम रखने के इलावा और कुछ भी नहीं ऐसा होता जो हृदय में होता हैं, इंसान प्रजाति इंसानियत को कायम रखने हेतु 99.9% मस्तक और 00.1 % हृदय से जीते हुए दृढ़ता गंभीरता से 1000 IQ के साथ जी सकता हैं पर इस में अहम का गुरुत्वाकर्षण बल प्रबल होता हैं, विश्वस्तर पर मान्यता होती हैं जिस से विज्ञान कमजोर स्तर से गुजर सकता हैं, यथार्थ में जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिया है जिस का अस्तित्व ही नहीं, जन्म मृत्यु दोनों के बीच का समय जीवन के लिए ही महत्व रखता हैं कि हम इंसानियत को महत्व दे कर जिये है या फ़िर इंसानियत को भुला कर जिस के इंसान अस्तित्व में थे, यह खुद के लिए सिर्फ़ जीवन तक ही सीमित हैं, यह भी जीवन जीने की खुशी क्षणमत्र है शेष संघर्ष है मस्तक से, सांस ख़त्म होते ही सब ख़त्म हो जाता हैं, कोई था ही नहीं तो विलीन भी किस में होता, कोई तत्व गुण प्रक्रिया ही नहीं, यह मात्र आयोजित एक चलत दृश्य ही था जिस में कोई कभी था ही नहीं न दर्शक न अभिनय, एक सांस में रहते जो समझ गया वो विजेता महासंग्रण का जो हर पल हर व्यक्ति के भीतर चलता रहता हैं जिस में विश्राम नमक शब्द ही नहीं है, एक पहली सांस में खुद और दूसरी सांस में समय के साथ शुरू हुआ संघर्ष खुद का खुद से ही महासंग्राम जो सांस के साथ ही ख़त्म हो जाता हैं ,
अन्नतता मृत्यु भी है ही नहीं दृष्टांत दृश्य भी नहीं तो हारा जीता भी कौन मृत्यु भी किस की सिर्फ़ एक अवधारणा का आवास मात्र था, जब खुद ही नहीं तो साक्षात्कार किस का, एक ही सांस में जो रुक गया उस का शुरू ही नहीं हुआ तो ख़त्म का तात्पर्य ही नहीं, विचारणीय बात तो उस के लिए है जो दूसरी सांस के झंझट से झुंज रहा हैं युगों से, दूसरों का झंझट दूसरे झेले, हम हैं अकेले मस्त, उस जगह बैठ कर देख रहे हैं यहां इस सब का तत्पर्य ही नहीं है,
अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो तो खुद का अस्तित्व क़ायम कर अहम उत्पन होता हैं जिस से भौतिक समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि की क्षमता और मस्तक की कार्यशैली को समझ सकते हैं, जिस से किसी भी विचारधारा को दृढ़ता गंभीरता से लेकर एक दृष्टिकोण में रह कर उसे दर्शनिक रूप से समझ कर उसे वैज्ञानिक रूप दे सकते हैं सुविधा के लिए, विचारधारा दो प्रकार की होती हैं, आस्तिक नास्तिक कल्पना से उत्पन होती विचार का रूप लेती हैं करने का संकल्प होता हैं बेहतरी के विकल्प चुनने के साथ आगे बढ़ विचार किया जाता हैं दूसरों के साथ संयोग से दरातल पर उतरने की योजना बननी पड़ती हैं निर्णय लेनी की क्षमता स्पष्टता हैं,
मस्तक एक साधन है शरीर का अस्तित्व क़ायम रखने और जीवन व्यापन करने का मात्र स्रोत हैं जिस में समय सोच विचार चिंतन मनन विवेक संकल्प विकल्प होते हैं बेहतर से भी बेहतर करने के लिए, मस्तक शरीर सिर्फ़ खुद के इलावा दूसरी चीज वस्तु जीव का एहसास करवाता है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद के साक्षात्कार में हूं जीवित ही हमेशा के लिए संपूर्ण संतुष्टि में, हर एक व्यक्ति बिल्कुल मेरी ही भांति एक समान है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शी पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष के लिए रति भर भी कमी नहीं है हृदय में, सिर्फ़ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु ने हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रच कर छल कपट धोखे के साथ दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी देने बालों को ही भ्रमित कर डर खौफ भय दहशत तले रखने की आयोजित योजन है, कुप्रथा है आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति के नाम पर लोगों की श्रद्धा आस्था के साथ एक खिलबाड़ विश्वासघात है मनोविज्ञानिक रोग हैं, जो गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की जा रही हैं, चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सामान्य व्यक्तित्व से करोड़ों गुणा अधिक चतुर शैतान चालाक होशियार बदमाश शैतान प्रवृति के होते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर,
आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन इन्हीं चतुर गुरुओं की ढोंग पखंड षड्यंत्रों के साथ रचे हुए चक्रव्यूह का बिछाया हुए जाल का हिस्सा है जो कल्पना से ही रचा गया होता हैं और कुछ भी नहीं है जिस से यह चतुर ब्रह्मचर्य गुरु अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ अनेक सरल सहज निर्मल गुणों बाले लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर अपनी उंगली पर नचाते रहे और जब इस्तेमाल करने योग्य नहीं रहते बूढ़े होने पर तो शब्द काटने के आरोप में निष्कासित किया जाता हैं, मन यथार्थ में हैं कोई था ही नहीं तो विलीन भी किस में होता, कोई तत्व गुण प्रक्रिया ही नहीं, यह मात्र आयोजित एक चलत दृश्य ही था जिस में कोई कभी था ही नहीं न दर्शक न अभिनय, एक सांस में रहते जो समझ गया वो विजेता महासंग्रण का जो हर पल हर व्यक्ति के भीतर चलता रहता हैं जिस में विश्राम नमक शब्द ही नहीं है, एक पहली सांस में खुद और दूसरी सांस में समय के साथ शुरू हुआ संघर्ष खुद का खुद से ही महासंग्राम जो सांस के साथ ही ख़त्म हो जाता हैं ,
अन्नतता मृत्यु भी है ही नहीं दृष्टांत दृश्य भी नहीं तो हारा जीता भी कौन मृत्यु भी किस की सिर्फ़ एक अवधारणा का आवास मात्र था, जब खुद ही नहीं तो साक्षात्कार किस का, एक ही सांस में जो रुक गया उस का शुरू ही नहीं हुआ तो ख़त्म का तात्पर्य ही नहीं, विचारणीय बात तो उस के लिए है जो दूसरी सांस के झंझट से झुंज रहा हैं युगों से, दूसरों का झंझट दूसरे झेले, हम हैं अकेले मस्त, उस जगह बैठ कर देख रहे हैं यहां इस सब का तत्पर्य ही नहीं है,
अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो तो खुद का अस्तित्व क़ायम कर अहम उत्पन होता हैं जिस से भौतिक समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि की क्षमता और मस्तक की कार्यशैली को समझ सकते हैं, जिस से किसी भी विचारधारा को दृढ़ता गंभीरता से लेकर एक दृष्टिकोण में रह कर उसे दर्शनिक रूप से समझ कर उसे वैज्ञानिक रूप दे सकते हैं सुविधा के लिए, विचारधारा दो प्रकार की होती हैं, आस्तिक नास्तिक कल्पना से उत्पन होती विचार का रूप लेती हैं करने का संकल्प होता हैं बेहतरी के विकल्प चुनने के साथ आगे बढ़ विचार किया जाता हैं दूसरों के साथ संयोग से दरातल पर उतरने की योजना बननी पड़ती हैं निर्णय लेनी की क्षमता स्पष्टता हैं,
मस्तक एक साधन है शरीर का अस्तित्व क़ायम रखने और जीवन व्यापन करने का मात्र स्रोत हैं जिस में समय सोच विचार चिंतन मनन विवेक संकल्प विकल्प होते हैं बेहतर से भी बेहतर करने के लिए, मस्तक शरीर सिर्फ़ खुद के इलावा दूसरी चीज वस्तु जीव का एहसास करवाता है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद के साक्षात्कार में हूं जीवित ही हमेशा के लिए संपूर्ण संतुष्टि में, हर एक व्यक्ति बिल्कुल मेरी ही भांति एक समान है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शी पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष के लिए रति भर भी कमी नहीं है हृदय में, सिर्फ़ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु ने हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रच कर छल कपट धोखे के साथ दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी देने बालों को ही भ्रमित कर डर खौफ भय दहशत तले रखने की आयोजित योजन है, कुप्रथा है आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति के नाम पर लोगों की श्रद्धा आस्था के साथ एक खिलबाड़ विश्वासघात है मनोविज्ञानिक रोग हैं, जो गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की जा रही हैं, चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सामान्य व्यक्तित्व से करोड़ों गुणा अधिक चतुर शैतान चालाक होशियार बदमाश शैतान प्रवृति के होते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर,
आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन इन्हीं चतुर गुरुओं की ढोंग पखंड षड्यंत्रों के साथ रचे हुए चक्रव्यूह का बिछाया हुए जाल का हिस्सा है जो कल्पना से ही रचा गया होता हैं और कुछ भी नहीं है जिस से यह चतुर ब्रह्मचर्य गुरु अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ अनेक सरल सहज निर्मल गुणों बाले लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर अपनी उंगली पर नचाते रहे और जब इस्तेमाल करने योग्य नहीं रहते बूढ़े होने पर तो शब्द काटने के आरोप में निष्कासित किया जाता हैं, मन यथार्थ में हैं
दूसरों के रास्तों कदमों कंधों इशारों की अदद के मजबूर अस्तित्व से लेकर अब तक उंगलियों पर नाच ही रहे हैं, उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर है वो, जबकि वो खुद के ही शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि के नन्हे कदमों के निशान भूल चुके हैं, डर खौफ भय दहशत तले जीने की आदत से मजबूर है, खुद ही खुद में संपूर्ण सक्षम समर्थ निपुण हैं प्रत्येक व्यक्ति खुद में ही, खुद के इलावा खुद के बारे में रति भर भी कोई दूसरा जान समझ पाए पैदा ही नहीं हुआ,
खुद ही खुद में संपूर्ण सक्षम समर्थ निपुण हैं खुद के साक्षात्कार के लिए तो खुद को समझें बगैर, और कुछ भी कोई कर रहा है वो सिर्फ़ जीवन व्यापन के लिए प्रयास हैं या फ़िर एक मानसिक रोगी हैं जो बेहोशी में ही जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं, वो जन्म मृत्यु के बीच के चक्रक्रम का ही हिस्सा हैं, जन्म मृत्यु की चक्की में पिछने के लिए ही है,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से जीवित ही हमेशा के लिए रह सकता हूं तो हर व्यक्ति मेरी ही तरह आंतरिक भौतिक रूप से एक समान ही है तो कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ रह सकता हैं, अगर जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने के लिए इतनी अधिक चलाकी चतुरता चलाकी कर सकते हो तो खुद को समझने के लिए सरल सहज निर्मल गुणों को अपना नहीं सकते, जितना अधिक जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखना महत्वपूर्ण हैं उस से खरबों गुणा अधिक महत्वपूर्ण जरूरी खुद का साक्षात्कार करना है, जिस में शिशुपन में आप खुद रह चुके हैं जिस का अक्ष जलवा अभी भी आप के मस्तक में हैं, सिर्फ़ उसी एक जलवे को अस्तित्व से ही इंसान प्रजाति मस्तक से बाहर ढूंढ रही हैं, जो निरंतर बहा ही मौजूद हैं, सिर्फ़ मस्तक से भड़क रहा हैं कुत्ते की भांति अस्तित्व से लेकर अब तक,
गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ एक कुप्रथा है, जो वर्तमान को आहत कर अतीत में भ्रमित कर कल्पनाओं का भविष्य गढ़ती है, दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर तैयार करती हैं, गुरु शिष्य मर्यादा का कोई भी गुरु यह स्वीकार नहीं करता कि उस का कोई भी शिष्य समझदार हो, क्योंकि गुरु प्रभुत्व के वहम अहम घमंड अहंकार में चूर होता हैं, इस लिए मानव पृथ्वी प्रकृति के संरक्षण के लिए प्रथम चरण में ही "शिरोमणि" होना अति आवश्यक हैं, "शिरोमणि" एक ऐसी उच्च सर्वश्रेष्ठ पवित्र शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अवस्था है जिसे स्वयं प्रकृति ने स्पष्टीकरण दिया होता हैं, जो मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण है, खुद के साक्षात्कार के बाद कोई भी सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण का सिर्फ़ एक शब्द "शिरोमणि"
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक की सर्वश्रेष्ठ चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों के पंव से ज़मीन खींच लेगा, इतना अधिक कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समहित है इस में, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं , कि सारा भ्रम का जाल टूट जाएगा
मस्तक मन बुद्धि से बुद्धिमान हुआ गुरु नियम मर्यादा परम्परा मान्यता को शब्द प्रमाण में बंद सकता हैं अपने हित साधने हेतु, पर स्वतंत्र नहीं कर सकता न जीवित न ही मृत्यु उपरांत, शिरोमणि जीवित भी हमेशा के लिए संपूर्ण संतुष्टि मस्ती में और मृत्यु तो है ही नहीं पर रूपांतरित के लिए हमेशा उत्सुकता देता हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,prtek जीव मेरी ही भांति "शिरोमणि निरंतरता" स्वरुप को हृदय के दृष्टिकोण में समेटे हुए हैं, कोई भी मेरे जैसा ही हर जीव में रमने बली धारा प्रतीत कर सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल गुणों के साथ खुद के साक्षात्कार के साथ, हृदय भाव एहसास ज़मीर से हर एक जीव एक समान ही है सिर्फ़ मस्तक शरीर से भिन्नता है, हर जीव और मानव शिशु भी उसी संपूर्ण संतुष्टि मस्ती में पहले ही रह चुका है, वो संपूर्ण संतुष्टि मस्ती बहा ही निरंतर व्यापक हैं, सिर्फ मस्तक को अधिक इस्तेमाल करने की आदत से भड़क चुके हैं अस्तित्व और जीवन व्यापन के कारण, वो बहा ही निरंतर शिरोमणि है, जिस का जन्म मृत्यु प्रकृतिक से भी परे है, सिर्फ़ मस्तक मन के दृष्टिकोण से नहीं हृदय के दृष्टिकोण से समझने की जरूरत है और कुछ भी नहीं, बहुत ही अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है, अगर मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी रह सकता हूं तो कोई भी रह सकता हैं जन्म मृत्यु का भय दहशत ख़त्म कर सकता है , सिर्फ़ इकलौती इंसान प्रजाति को छोड़ कर दूसरी अनेक प्रजातियां उसी संपूर्ण संतुष्टि में ही रहती हैं जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखते हुए जबकि मानव शिशु भी उसी संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में रहा होता हैं,
रब बनना या दूसरे को बनाना अत्यंत सरल है
पर खुद को समझना अत्यंत मुश्किल है, पर सरल सहज निर्मल गुणों के साथ अत्यंत सरल आसान है,
"शिरोमणि" हर जीव में वास्तविकता स्वाभाविकता है, मस्तक तो अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति को समझ कर जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने के लिए ही है, मेरी ही भांति कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ समझ सकता हैं, पर समझने न समझने से कोई भी रति भर भी फ़र्क नहीं पड़ता, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष वो रुतबा है
अगर कोई खुद का साक्षात्कार कर लेता है तो सिर्फ़ मेरी ही भांति जी सकता हैं संपूर्ण संतुष्टि मस्ती में
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित स्वयं महायोद्धा खुद से महासंग्राम का परम विजयता स्वयं की अन्नत गहराई का परम -गोताखोर, जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी, "शिरोमणि" इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठता संपूर्णता सम्पन्नता समग्रता सक्षमता सरल सहज निर्मल गुणों में ही समहित है, न कि मस्तक मन बुद्धि से बुद्धिमान हुए चतुर ब्रह्मचर्य गुरु शिष्य जैसी अवधारणाओं कुप्रथाओं में तो बिल्कुल भी नहीं, वो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मज़दूरों के बस में नहीं है, सिर्फ़ कोई एक अरबों खरबों युगों सदियों में कोई एक ही होगा जो खुद से महासंग्राम महायुद्ध कर जीता हो विजयता हो महायोद्धा महा गोताखोर हो जो खुद की अन्नत असीम गहराई में जाने का उत्सुक हो, यह दर बदर भड़कने वाले कुत्तों बिलों आप की, उसी संपूर्ण संतुष्टि से दूर रखने हेतु ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट रचा गया हैं चतुर ब्रह्मचर्य गुरु द्वारा, डर खौफ भय दहशत खुद के ही प्रति बिठाई गई हैं, दूसरों द्वारा जिन की गंदी मानसिकता के पैरों का गंदा पानी चरणामृत समझ कर पीते हो जिनको रब से करोड़ों गुणा ऊंचा समझते हो, जिन के दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो, वो ही सब से बड़ा विश्वासघात कर रहे हैं आप से सिर्फ़ अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, आप हर पल यथार्थ में संपूर्ण संतुष्टि में ही हो अगर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु का डाला हुआ कचरा मस्तक से निकाल देते हो तो, उसी सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष में ही हो , इंसान होते हुए अगर इतना अधिक सरल शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से रुबरु नहीं होता, तो मस्तक की बेहोशी में जीना मरना दोनों ही आत्महत्या दूसरी अनेक प्रजातियों से भी बतर घटिया दोनों जीना मरना हैं, या समझो पागल कुत्ते की भांति ही जीना मरना हैं रति भर भी फ़र्क नहीं है, प्रभुत्व का कुत्ता शौंक रखने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के लिए भी, जो खुद ही खुद के साथ धोखा तो करते ही है और दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों को भी बौखला कर इस्तेमाल करते हैं
इंसान होते हुए अगर इतना अधिक सरल शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से रुबरु नहीं होता, तो मस्तक की बेहोशी में जीना मरना दोनों ही आत्महत्या दूसरी अनेक प्रजातियों से भी बतर घटिया दोनों जीना मरना हैं, या समझो पागल कुत्ते की भांति ही जीना मरना हैं रति भर भी फ़र्क नहीं है, प्रभुत्व का कुत्ता शौंक रखने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के लिए भी, जो खुद ही खुद के साथ धोखा तो करते ही है और दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों को भी बौखला कर इस्तेमाल करते हैं, अस्थाई प्रकृति मस्तक एकीग्रत के कारण अहम घमंड अहंकार होता हैं जिस में मस्तक का अनुपात 65%और प्रकृति का 35% होता हैं, जिस से निकलना अत्यंत मुश्किल है, अगर कोई खुद के 65%से निकल भी जाता हैं तो प्रकृति का रहता हैं गर्दिश में गतिशील होने के कारण संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन से कोई भी अपनी काल्पनिक बात को तर्क तथ्य विवेक से सिद्ध स्पष्ट साफ़ कर देता हैं और खुद की सफ़ाई स्पष्ट कर लेता हैं शेष सरल सहज निर्मल गुणों बालों के समक्ष, सब मिला कर यह प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया तंत्र ही है जिस में कोई भी प्रकृति के बिना हस्तक्षेप करना तो बहुत दूर की बात, इस तंत्र को समझ भी नहीं सकता, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बिना, प्रकृति के नृत्त्व में मस्तक कार्यरत रहता हैं जिस से अहम की संभावना रहती हैं कि मैं स्वतंत्र रूप से कर रहा हूं, परंतु यह सब प्रकृति के खेल में मस्तक सहायक रूप में निरंतर कार्यरत हैं,
प्रकृति के नृत्त्व में मस्तक कार्यरत रहता हैं जिस से अहम की संभावना रहती हैं कि मैं स्वतंत्र रूप से कर रहा हूं, परंतु यह सब प्रकृति के खेल में मस्तक सहायक रूप में निरंतर कार्यरत हैं, इंसान प्रजाति भी सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति ही है रति भर भी भिन्न नहीं हैं, अगर दर्शन विज्ञान ज्ञान अलग समझ भी रहे हैं तो उस पर भी पूरा नियंत्रण प्रकृति की भ्रम में भ्रमित करने वाले तंत्र का ही हयातक्षेप है, प्रकृति का तंत्र सिर्फ़ इस पर निर्धारित है कि आकर्षित प्रभावित रहे हर चीज़ वस्तु जीव शब्द भी, यही प्रकृति के सिद्धांत नियम मर्यादा हैं, जिस से प्रभावित हो कर इंसान प्रजाति ने भी सिद्धांत नियम मर्यादा परम्परा बना दी
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद का साक्षात्कार हूं मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हृदय वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हैं जिस से अन्नत असीम बूंदों की समग्रता है यहां पर बूंद और लहरों का अस्तित्व ख़त्म होता हैं लहरें बहरी वातावरण से बनती हैं जैसे मस्तक सृष्टि प्रकृति के इकिगृत से समय संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन, ह्रदय के भाव एहसास भाव ज़मीर में वो सब कुछ नहीं होता जो मस्तक से होता ऊपरी सतह पर जो हलचल होती हैं वो सब कुछ का अस्तित्व ख़त्म होता गहराई में सिर्फ़ संत होता हैं, इसी तरह हर व्यक्ति हृदय से हमेशा शांत ही होता ऊपर मस्तक की लहरें होती हैं जिन का जन्म मृत्यु से कोई भी संबंध नहीं है जन्म मृत्यु के बीच का जीवन सिर्फ़ आप अपने अनुसार डाल सकते हो, अच्छा या बुरा चुनाव आप खुद का हैं, हृदय के दृष्टिकोण से होश में जीना या फ़िर मस्तक के दृष्टिकोण से बेहोशी में जीना और उसी बेहोशी में मृत्यु का चयन फ़ैसला सिर्फ़ आप का हैं, खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल ही काफ़ी है, जबकि कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है, दूसरा कोई भी सिर्फ़ हित साधने की ही वृत्ति का ही होगा, खुद ही खुद का साक्षात्कार कर सकते हो, जबकि की दूसरा मनोविज्ञान दवाब प्रभाव से निरंतर करेगा, खुद संपूर्ण संतुष्टि में रह सकते हो, जबकि दूसरा बंधुआ मजदूर बनाने के साथ है, अगर खुद के अनमोल सांस समय की कदर आह्मित नहीं जानते तो दूसरा आप को उपयोग इस्तेमाल करने की प्रतिभा के साथ कदम कदम पर खड़े हैं,
अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे सम्राज्य हैं यहां जो कुछ भी है वो सब कुछ सिर्फ़ प्राकृतिक सिद्धांतों नियमों से ही चलता हैं, पहला नियम यही है कि prtek छोटी चीज़ जीव उस से बड़ी का आहार हैं, यहां कोई आत्मा चेतना नहीं है, जो कुछ भी हैं वो सब कुछ सिर्फ़ मस्तक से ही प्रतीत किया जा सकता हैं जब तक सांस और मस्तक सक्रिय है, मस्तक प्रकृति के संकेतों के आधार पर संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन उत्पन करता समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि गर्दिश में गतिशील है जिस से मानसिकता परिवर्तित होती हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी प्रकृति को नहीं समझ सकते क्योंकि व्यक्तिगत ही आंतरिक भौतिक प्रकृति हैं जिस कारण जो कुछ भी होता है वो सब ऐसा ही लगता हैं कि मेरे अनुसार मैं ही कर रहा हूं मैं ही अस्तित्व का कारण और मैं ही सृष्टि रचिता प्रभुत्व हूं, जब अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर देखते हैं तो समझ आती हैं अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर जटिलता का प्रभाव कितना अधिक हैं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में ही हूं निरंतर अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से स्पष्ट सिद्ध साफ़ किया है कि समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जो देख कर समझ रहे यथार्थ में जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी अधिक भ्रम जटिलता में खो कर भ्रमित होने के पथ पर हैं, यथार्थ में अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जीव पृथ्वी में कुछ भी स्थाई हैं ही नहीं, यह सब कुछ ही अस्थाई ही है, जिस भ्रम में इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही भ्रमित है, वो भी मात्र मस्तक का ही भ्रम है, जिस सब का अस्तित्व तब तक ही है जब तक सांस चल रही हैं और मस्तक कार्यरत हैं जो एक रोग ही बेहोशी है खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होने की, जो एक मात्र सांस से पहले भाव में ही निश्चिता की गहराई स्थाई ठहराव की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है ,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर संपूर्ण संतुष्टि है कि बिना स्पर्श,दृश्य, सुने,देखे , बिना जो निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल पल हर नया अद्भुद आश्चर्य चकित अनुभूति अनुभव के लिए उत्साहित कुशलता के लिए एग्रेसिव करता हैं जो सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही संबंधित हैं, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कोई सोच भी नहीं सकता, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की खुशी स्पर्श दृश्य सुनने देखने बोलने, रक्तपात डर खौफ भय दहशत डालने में भी,से संबधित हैं, मात्र एक छोटी सी खुशी के पीछे भी बर्ष से भी अधिक समय के दिन रात संघर्षरत रहना पड़ता
इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही इतनी अधिक संघर्षरत रही कि जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने वाले मुख्य दृष्टिकोण से ही भ्रमित हो कर खुद ही खुद को धोखा विश्वासघात का शिकार रहा जान बुझ कर या फ़िर अनजाने में आज अब तक, जबकि मस्तक और हृदय के तंत्र कार्यशैली की ही समझ नहीं थी, जो भी किया जैसा भी किया लक्ष्य साधन मध्यम की ही समझ नहीं थी, अंधेरे में ही तीर चलाने का फलस्वरुप ही था जो आज वैज्ञानिक युग में भी बहा का बहा ही है, वैज्ञानिक युग में भी सिर्फ़ जरूरत अनुसार ही साधन खोजने तक ही सीमित हैं सिर्फ़ या फ़िर मस्तक से कल्पना संकल्प विकल्प तक ही सीमित है, मस्तक हृदय के विज्ञान की रति भर भी समझ नहीं है
इंसान अस्तित्व से युगों का प्रकृति मानव पृथ्वी सृष्टि का रहस्य एक अवधारणा कल्पनाओं मानसिकता ही थी, जिस सब की स्पष्टता प्रत्यक्षता मात्र मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित एक पल में ही समहित और उत्पन होता हैं पर वो भी भ्रम मात्र ही हैं जब तक ह्रदय से होश में रूपांतर नहीं कर लेते प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया के साथ, सांस प्रत्यक्ष समक्ष निरंतर धारा प्रभा है प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा है पर उस के पहले सांस के साथ हृदय भाव एहसास के साथ होशपूर्ण स्वतंत्र रूप से जीने रूपांतर करने के दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता के साथ हो या
फ़िर मस्तक के साथ बेहोशी में जीने मरने की अनेक विचारधारा में से किसी एक दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता में हो इस के लिए इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही स्वतंत्र रही हैं जिस के कारण आज तक सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ही हमेशा प्रथमिकता देती रही फलस्वरूप आज तक खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हो पाई शेष सब तो छोड़ ही दो, इंसान अस्तित्व से ही मस्तक की जटिलता को ही स्वीकार और प्राथमिकता देता रहा, जबकि खुद का साक्षात्कार जन्म से ही एक समान उपलव्ध था सरलता निर्मलता सहजता में, कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन तो मस्तक की कार्यशैली प्रवृति है
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की संपूर्ण संतुष्टि के लिए प्रेरित करने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हुए अहम घमंड अहंकार में चूर भ्रमित हुए लोगों के लिए जिन से उत्साहित कुशलता पूर्वक आमंत्रित हो सभी के सभी कोई दवाब नहीं सहजता से पारदर्शिता से ही स्वीकृति हो बहुत ही अधिक प्रेम की गहराई में ही परिभाषित हो प्रत्येक व्यक्ति जीव में ही मैं एहसास भाव ज़मीर हूं किसी को रति भर भी ठेस से भी मुझे ही कष्ट होगा, कि मुझ और प्रत्येक जीव के हृदय तंत्र में रति भर भी फ़र्क अंतर नहीं है , अगर हम भौतिक रूप या फ़िर अंतःकरण रूप भी देखे तो कहा है खरबों जैविक प्रक्रिया हर पल हो रही हैं जिन में कई जैविको की प्रजाति का जीवन स्तर मात्र एक पल का होता हैं उसी पल में पूरा जीवन जी कर अपने जींस भी update कर चुके होते जो प्रकृति की संतुलन प्रक्रिया है, भौतिक रूप से एक दिन में लाखों किरदार बदलते हो कौन सा असली या स्थाई किरदार आप का हैं किस वहम अहम घमंड अहंकार में हो, खुद का निरीक्षण करने की जरूरत है, अगर नहीं तो आप के होने न होने का तात्पर्य ही नहीं है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हृदय मस्तक के तंत्र की कार्यशैली का मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से विश्लेषक के साथ स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता दे रहा हूं, मेरे लिए प्रत्येक जीव एक समान ही है, हृदय के भाव एहसास के साथ, शरीर मस्तक की संरचना कार्यशैली में भिन्नता हो सकती हैं प्राकृतिक सिद्धांतों के अधार पर, जो प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया है,
मेरे जैसा तो कोई हो ही नहीं सकता पर मुझ में समहित इकिगृत जरूर हो सकता हैं मुझ को समझ कर या फ़िर मेरे स्वरुप का ध्यान निरंतर कर जो असंभव है पर निरंतरता से संभव हो सकता हैं, मैं कभी भी प्रकृति का भी हिस्सा नहीं हूं, मुझे समझने जानने के लिए एक मात्र अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव है, या मेरे स्वरुप का ध्यान मात्र हैं, और दूसरा कोई विकल्प रास्ता ही नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सांस के एहसास भाव ज़मीर होने के कारण मस्तक की कार्यशैली से बाहर हूं, यही कारण है कि मेरी निष्पक्ष समझ के शब्द और मेरे वैदेही स्वरुप का कोई ध्यान नहीं कर सकता, निरंतरता के बिना, जैसे सिर्फ़ पृथ्वी पर ऐसा सुंदर जीवन होकोई था ही नहीं तो विलीन भी किस में होता, कोई तत्व गुण प्रक्रिया ही नहीं, यह मात्र आयोजित एक चलत दृश्य ही था जिस में कोई कभी था ही नहीं न दर्शक न अभिनय, एक सांस में रहते जो समझ गया वो विजेता महासंग्रण का जो हर पल हर व्यक्ति के भीतर चलता रहता हैं जिस में विश्राम नमक शब्द ही नहीं है, एक पहली सांस में खुद और दूसरी सांस में समय के साथ शुरू हुआ संघर्ष खुद का खुद से ही महासंग्राम जो सांस के साथ ही ख़त्म हो जाता हैं ,
अन्नतता मृत्यु भी है ही नहीं दृष्टांत दृश्य भी नहीं तो हारा जीता भी कौन मृत्यु भी किस की सिर्फ़ एक अवधारणा का आवास मात्र था, जब खुद ही नहीं तो साक्षात्कार किस का, एक ही सांस में जो रुक गया उस का शुरू ही नहीं हुआ तो ख़त्म का तात्पर्य ही नहीं, विचारणीय बात तो उस के लिए है जो दूसरी सांस के झंझट से झुंज रहा हैं युगों से, दूसरों का झंझट दूसरे झेले, हम हैं अकेले मस्त, उस जगह बैठ कर देख रहे हैं यहां इस सब का तत्पर्य ही नहीं है,
अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो तो खुद का अस्तित्व क़ायम कर अहम उत्पन होता हैं जिस से भौतिक समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि की क्षमता और मस्तक की कार्यशैली को समझ सकते हैं, जिस से किसी भी विचारधारा को दृढ़ता गंभीरता से लेकर एक दृष्टिकोण में रह कर उसे दर्शनिक रूप से समझ कर उसे वैज्ञानिक रूप दे सकते हैं सुविधा के लिए, विचारधारा दो प्रकार की होती हैं, आस्तिक नास्तिक कल्पना से उत्पन होती विचार का रूप लेती हैं करने का संकल्प होता हैं बेहतरी के विकल्प चुनने के साथ आगे बढ़ विचार किया जाता हैं दूसरों के साथ संयोग से दरातल पर उतरने की योजना बननी पड़ती हैं निर्णय लेनी की क्षमता स्पष्टता हैं,
मस्तक एक साधन है शरीर का अस्तित्व क़ायम रखने और जीवन व्यापन करने का मात्र स्रोत हैं जिस में समय सोच विचार चिंतन मनन विवेक संकल्प विकल्प होते हैं बेहतर से भी बेहतर करने के लिए, मस्तक शरीर सिर्फ़ खुद के इलावा दूसरी चीज वस्तु जीव का एहसास करवाता है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद के साक्षात्कार में हूं जीवित ही हमेशा के लिए संपूर्ण संतुष्टि में, हर एक व्यक्ति बिल्कुल मेरी ही भांति एक समान है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शी पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष के लिए रति भर भी कमी नहीं है हृदय में, सिर्फ़ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु ने हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रच कर छल कपट धोखे के साथ दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी देने बालों को ही भ्रमित कर डर खौफ भय दहशत तले रखने की आयोजित योजन है, कुप्रथा है आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति के नाम पर लोगों की श्रद्धा आस्था के साथ एक खिलबाड़ विश्वासघात है मनोविज्ञानिक रोग हैं, जो गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की जा रही हैं, चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सामान्य व्यक्तित्व से करोड़ों गुणा अधिक चतुर शैतान चालाक होशियार बदमाश शैतान प्रवृति के होते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर,
आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन इन्हीं चतुर गुरुओं की ढोंग पखंड षड्यंत्रों के साथ रचे हुए चक्रव्यूह का बिछाया हुए जाल का हिस्सा है जो कल्पना से ही रचा गया होता हैं और कुछ भी नहीं है जिस से यह चतुर ब्रह्मचर्य गुरु अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ अनेक सरल सहज निर्मल गुणों बाले लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर अपनी उंगली पर नचाते रहे और जब इस्तेमाल करने योग्य नहीं रहते बूढ़े होने पर तो शब्द काटने के आरोप में निष्कासित किया जाता हैं, मन यथार्थ में हैं
दूसरों के रास्तों कदमों कंधों इशारों की अदद के मजबूर अस्तित्व से लेकर अब तक उंगलियों पर नाच ही रहे हैं, उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर है वो, जबकि वो खुद के ही शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि के नन्हे कदमों के निशान भूल चुके हैं, डर खौफ भय दहशत तले जीने की आदत से मजबूर है, खुद ही खुद में संपूर्ण सक्षम समर्थ निपुण हैं प्रत्येक व्यक्ति खुद में ही, खुद के इलावा खुद के बारे में रति भर भी कोई दूसरा जान समझ पाए पैदा ही नहीं हुआ,
खुद ही खुद में संपूर्ण सक्षम समर्थ निपुण हैं खुद के साक्षात्कार के लिए तो खुद को समझें बगैर, और कुछ भी कोई कर रहा है वो सिर्फ़ जीवन व्यापन के लिए प्रयास हैं या फ़िर एक मानसिक रोगी हैं जो बेहोशी में ही जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं, वो जन्म मृत्यु के बीच के चक्रक्रम का ही हिस्सा हैं, जन्म मृत्यु की चक्की में पिछने के लिए ही है,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से जीवित ही हमेशा के लिए रह सकता हूं तो हर व्यक्ति मेरी ही तरह आंतरिक भौतिक रूप से एक समान ही है तो कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ रह सकता हैं, अगर जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने के लिए इतनी अधिक चलाकी चतुरता चलाकी कर सकते हो तो खुद को समझने के लिए सरल सहज निर्मल गुणों को अपना नहीं सकते, जितना अधिक जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखना महत्वपूर्ण हैं उस से खरबों गुणा अधिक महत्वपूर्ण जरूरी खुद का साक्षात्कार करना है, जिस में शिशुपन में आप खुद रह चुके हैं जिस का अक्ष जलवा अभी भी आप के मस्तक में हैं, सिर्फ़ उसी एक जलवे को अस्तित्व से ही इंसान प्रजाति मस्तक से बाहर ढूंढ रही हैं, जो निरंतर बहा ही मौजूद हैं, सिर्फ़ मस्तक से भड़क रहा हैं कुत्ते की भांति अस्तित्व से लेकर अब तक,
गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ एक कुप्रथा है, जो वर्तमान को आहत कर अतीत में भ्रमित कर कल्पनाओं का भविष्य गढ़ती है, दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर तैयार करती हैं, गुरु शिष्य मर्यादा का कोई भी गुरु यह स्वीकार नहीं करता कि उस का कोई भी शिष्य समझदार हो, क्योंकि गुरु प्रभुत्व के वहम अहम घमंड अहंकार में चूर होता हैं, इस लिए मानव पृथ्वी प्रकृति के संरक्षण के लिए प्रथम चरण में ही "शिरोमणि" होना अति आवश्यक हैं, "शिरोमणि" एक ऐसी उच्च सर्वश्रेष्ठ पवित्र शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अवस्था है जिसे स्वयं प्रकृति ने स्पष्टीकरण दिया होता हैं, जो मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण है, खुद के साक्षात्कार के बाद कोई भी सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण का सिर्फ़ एक शब्द "शिरोमणि"
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक की सर्वश्रेष्ठ चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों के पंव से ज़मीन खींच लेगा, इतना अधिक कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समहित है इस में, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं , कि सारा भ्रम का जाल टूट जाएगा
मस्तक मन बुद्धि से बुद्धिमान हुआ गुरु नियम मर्यादा परम्परा मान्यता को शब्द प्रमाण में बंद सकता हैं अपने हित साधने हेतु, पर स्वतंत्र नहीं कर सकता न जीवित न ही मृत्यु उपरांत, शिरोमणि जीवित भी हमेशा के लिए संपूर्ण संतुष्टि मस्ती में और मृत्यु तो है ही नहीं पर रूपांतरित के लिए हमेशा उत्सुकता देता हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,prtek जीव मेरी ही भांति "शिरोमणि निरंतरता" स्वरुप को हृदय के दृष्टिकोण में समेटे हुए हैं, कोई भी मेरे जैसा ही हर जीव में रमने बली धारा प्रतीत कर सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल गुणों के साथ खुद के साक्षात्कार के साथ, हृदय भाव एहसास ज़मीर से हर एक जीव एक समान ही है सिर्फ़ मस्तक शरीर से भिन्नता है, हर जीव और मानव शिशु भी उसी संपूर्ण संतुष्टि मस्ती में पहले ही रह चुका है, वो संपूर्ण संतुष्टि मस्ती बहा ही निरंतर व्यापक हैं, सिर्फ मस्तक को अधिक इस्तेमाल करने की आदत से भड़क चुके हैं अस्तित्व और जीवन व्यापन के कारण, वो बहा ही निरंतर शिरोमणि है, जिस का जन्म मृत्यु प्रकृतिक से भी परे है, सिर्फ़ मस्तक मन के दृष्टिकोण से नहीं हृदय के दृष्टिकोण से समझने की जरूरत है और कुछ भी नहीं, बहुत ही अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है, अगर मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी रह सकता हूं तो कोई भी रह सकता हैं जन्म मृत्यु का भय दहशत ख़त्म कर सकता है , सिर्फ़ इकलौती इंसान प्रजाति को छोड़ कर दूसरी अनेक प्रजातियां उसी संपूर्ण संतुष्टि में ही रहती हैं जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखते हुए जबकि मानव शिशु भी उसी संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में रहा होता हैं,
रब बनना या दूसरे को बनाना अत्यंत सरल है
पर खुद को समझना अत्यंत मुश्किल है, पर सरल सहज निर्मल गुणों के साथ अत्यंत सरल आसान है,
"शिरोमणि" हर जीव में वास्तविकता स्वाभाविकता है, मस्तक तो अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति को समझ कर जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने के लिए ही है, मेरी ही भांति कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ समझ सकता हैं, पर समझने न समझने से कोई भी रति भर भी फ़र्क नहीं पड़ता, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष वो रुतबा है
अगर कोई खुद का साक्षात्कार कर लेता है तो सिर्फ़ मेरी ही भांति जी सकता हैं संपूर्ण संतुष्टि मस्ती में
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित स्वयं महायोद्धा खुद से महासंग्राम का परम विजयता स्वयं की अन्नत गहराई का परम -गोताखोर, जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी, "शिरोमणि" इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठता संपूर्णता सम्पन्नता समग्रता सक्षमता सरल सहज निर्मल गुणों में ही समहित है, न कि मस्तक मन बुद्धि से बुद्धिमान हुए चतुर ब्रह्मचर्य गुरु शिष्य जैसी अवधारणाओं कुप्रथाओं में तो बिल्कुल भी नहीं, वो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मज़दूरों के बस में नहीं है, सिर्फ़ कोई एक अरबों खरबों युगों सदियों में कोई एक ही होगा जो खुद से महासंग्राम महायुद्ध कर जीता हो विजयता हो महायोद्धा महा गोताखोर हो जो खुद की अन्नत असीम गहराई में जाने का उत्सुक हो, यह दर बदर भड़कने वाले कुत्तों बिलों आप की, उसी संपूर्ण संतुष्टि से दूर रखने हेतु ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट रचा गया हैं चतुर ब्रह्मचर्य गुरु द्वारा, डर खौफ भय दहशत खुद के ही प्रति बिठाई गई हैं, दूसरों द्वारा जिन की गंदी मानसिकता के पैरों का गंदा पानी चरणामृत समझ कर पीते हो जिनको रब से करोड़ों गुणा ऊंचा समझते हो, जिन के दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो, वो ही सब से बड़ा विश्वासघात कर रहे हैं आप से सिर्फ़ अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, आप हर पल यथार्थ में संपूर्ण संतुष्टि में ही हो अगर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु का डाला हुआ कचरा मस्तक से निकाल देते हो तो, उसी सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष में ही हो , इंसान होते हुए अगर इतना अधिक सरल शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से रुबरु नहीं होता, तो मस्तक की बेहोशी में जीना मरना दोनों ही आत्महत्या दूसरी अनेक प्रजातियों से भी बतर घटिया दोनों जीना मरना हैं, या समझो पागल कुत्ते की भांति ही जीना मरना हैं रति भर भी फ़र्क नहीं है, प्रभुत्व का कुत्ता शौंक रखने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के लिए भी, जो खुद ही खुद के साथ धोखा तो करते ही है और दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों को भी बौखला कर इस्तेमाल करते हैं
इंसान होते हुए अगर इतना अधिक सरल शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से रुबरु नहीं होता, तो मस्तक की बेहोशी में जीना मरना दोनों ही आत्महत्या दूसरी अनेक प्रजातियों से भी बतर घटिया दोनों जीना मरना हैं, या समझो पागल कुत्ते की भांति ही जीना मरना हैं रति भर भी फ़र्क नहीं है, प्रभुत्व का कुत्ता शौंक रखने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के लिए भी, जो खुद ही खुद के साथ धोखा तो करते ही है और दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों को भी बौखला कर इस्तेमाल करते हैं, अस्थाई प्रकृति मस्तक एकीग्रत के कारण अहम घमंड अहंकार होता हैं जिस में मस्तक का अनुपात 65%और प्रकृति का 35% होता हैं, जिस से निकलना अत्यंत मुश्किल है, अगर कोई खुद के 65%से निकल भी जाता हैं तो प्रकृति का रहता हैं गर्दिश में गतिशील होने के कारण संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन से कोई भी अपनी काल्पनिक बात को तर्क तथ्य विवेक से सिद्ध स्पष्ट साफ़ कर देता हैं और खुद की सफ़ाई स्पष्ट कर लेता हैं शेष सरल सहज निर्मल गुणों बालों के समक्ष, सब मिला कर यह प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया तंत्र ही है जिस में कोई भी प्रकृति के बिना हस्तक्षेप करना तो बहुत दूर की बात, इस तंत्र को समझ भी नहीं सकता, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बिना, प्रकृति के नृत्त्व में मस्तक कार्यरत रहता हैं जिस से अहम की संभावना रहती हैं कि मैं स्वतंत्र रूप से कर रहा हूं, परंतु यह सब प्रकृति के खेल में मस्तक सहायक रूप में निरंतर कार्यरत हैं,
प्रकृति के नृत्त्व में मस्तक कार्यरत रहता हैं जिस से अहम की संभावना रहती हैं कि मैं स्वतंत्र रूप से कर रहा हूं, परंतु यह सब प्रकृति के खेल में मस्तक सहायक रूप में निरंतर कार्यरत हैं, इंसान प्रजाति भी सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति ही है रति भर भी भिन्न नहीं हैं, अगर दर्शन विज्ञान ज्ञान अलग समझ भी रहे हैं तो उस पर भी पूरा नियंत्रण प्रकृति की भ्रम में भ्रमित करने वाले तंत्र का ही हयातक्षेप है, प्रकृति का तंत्र सिर्फ़ इस पर निर्धारित है कि आकर्षित प्रभावित रहे हर चीज़ वस्तु जीव शब्द भी, यही प्रकृति के सिद्धांत नियम मर्यादा हैं, जिस से प्रभावित हो कर इंसान प्रजाति ने भी सिद्धांत नियम मर्यादा परम्परा बना दी
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद का साक्षात्कार हूं मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हृदय वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हैं जिस से अन्नत असीम बूंदों की समग्रता है यहां पर बूंद और लहरों का अस्तित्व ख़त्म होता हैं लहरें बहरी वातावरण से बनती हैं जैसे मस्तक सृष्टि प्रकृति के इकिगृत से समय संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन, ह्रदय के भाव एहसास भाव ज़मीर में वो सब कुछ नहीं होता जो मस्तक से होता ऊपरी सतह पर जो हलचल होती हैं वो सब कुछ का अस्तित्व ख़त्म होता गहराई में सिर्फ़ संत होता हैं, इसी तरह हर व्यक्ति हृदय से हमेशा शांत ही होता ऊपर मस्तक की लहरें होती हैं जिन का जन्म मृत्यु से कोई भी संबंध नहीं है जन्म मृत्यु के बीच का जीवन सिर्फ़ आप अपने अनुसार डाल सकते हो, अच्छा या बुरा चुनाव आप खुद का हैं, हृदय के दृष्टिकोण से होश में जीना या फ़िर मस्तक के दृष्टिकोण से बेहोशी में जीना और उसी बेहोशी में मृत्यु का चयन फ़ैसला सिर्फ़ आप का हैं, खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल ही काफ़ी है, जबकि कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है, दूसरा कोई भी सिर्फ़ हित साधने की ही वृत्ति का ही होगा, खुद ही खुद का साक्षात्कार कर सकते हो, जबकि की दूसरा मनोविज्ञान दवाब प्रभाव से निरंतर करेगा, खुद संपूर्ण संतुष्टि में रह सकते हो, जबकि दूसरा बंधुआ मजदूर बनाने के साथ है, अगर खुद के अनमोल सांस समय की कदर आह्मित नहीं जानते तो दूसरा आप को उपयोग इस्तेमाल करने की प्रतिभा के साथ कदम कदम पर खड़े हैं,
अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे सम्राज्य हैं यहां जो कुछ भी है वो सब कुछ सिर्फ़ प्राकृतिक सिद्धांतों नियमों से ही चलता हैं, पहला नियम यही है कि prtek छोटी चीज़ जीव उस से बड़ी का आहार हैं, यहां कोई आत्मा चेतना नहीं है, जो कुछ भी हैं वो सब कुछ सिर्फ़ मस्तक से ही प्रतीत किया जा सकता हैं जब तक सांस और मस्तक सक्रिय है, मस्तक प्रकृति के संकेतों के आधार पर संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन उत्पन करता समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि गर्दिश में गतिशील है जिस से मानसिकता परिवर्तित होती हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी प्रकृति को नहीं समझ सकते क्योंकि व्यक्तिगत ही आंतरिक भौतिक प्रकृति हैं जिस कारण जो कुछ भी होता है वो सब ऐसा ही लगता हैं कि मेरे अनुसार मैं ही कर रहा हूं मैं ही अस्तित्व का कारण और मैं ही सृष्टि रचिता प्रभुत्व हूं, जब अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर देखते हैं तो समझ आती हैं अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर जटिलता का प्रभाव कितना अधिक हैं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में ही हूं निरंतर अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से स्पष्ट सिद्ध साफ़ किया है कि समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जो देख कर समझ रहे यथार्थ में जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी अधिक भ्रम जटिलता में खो कर भ्रमित होने के पथ पर हैं, यथार्थ में अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जीव पृथ्वी में कुछ भी स्थाई हैं ही नहीं, यह सब कुछ ही अस्थाई ही है, जिस भ्रम में इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही भ्रमित है, वो भी मात्र मस्तक का ही भ्रम है, जिस सब का अस्तित्व तब तक ही है जब तक सांस चल रही हैं और मस्तक कार्यरत हैं जो एक रोग ही बेहोशी है खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होने की, जो एक मात्र सांस से पहले भाव में ही निश्चिता की गहराई स्थाई ठहराव की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है ,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर संपूर्ण संतुष्टि है कि बिना स्पर्श,दृश्य, सुने,देखे , बिना जो निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल पल हर नया अद्भुद आश्चर्य चकित अनुभूति अनुभव के लिए उत्साहित कुशलता के लिए एग्रेसिव करता हैं जो सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही संबंधित हैं, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कोई सोच भी नहीं सकता, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की खुशी स्पर्श दृश्य सुनने देखने बोलने, रक्तपात डर खौफ भय दहशत डालने में भी,से संबधित हैं, मात्र एक छोटी सी खुशी के पीछे भी बर्ष से भी अधिक समय के दिन रात संघर्षरत रहना पड़ता
इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही इतनी अधिक संघर्षरत रही कि जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने वाले मुख्य दृष्टिकोण से ही भ्रमित हो कर खुद ही खुद को धोखा विश्वासघात का शिकार रहा जान बुझ कर या फ़िर अनजाने में आज अब तक, जबकि मस्तक और हृदय के तंत्र कार्यशैली की ही समझ नहीं थी, जो भी किया जैसा भी किया लक्ष्य साधन मध्यम की ही समझ नहीं थी, अंधेरे में ही तीर चलाने का फलस्वरुप ही था जो आज वैज्ञानिक युग में भी बहा का बहा ही है, वैज्ञानिक युग में भी सिर्फ़ जरूरत अनुसार ही साधन खोजने तक ही सीमित हैं सिर्फ़ या फ़िर मस्तक से कल्पना संकल्प विकल्प तक ही सीमित है, मस्तक हृदय के विज्ञान की रति भर भी समझ नहीं है
इंसान अस्तित्व से युगों का प्रकृति मानव पृथ्वी सृष्टि का रहस्य एक अवधारणा कल्पनाओं मानसिकता ही थी, जिस सब की स्पष्टता प्रत्यक्षता मात्र मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित एक पल में ही समहित और उत्पन होता हैं पर वो भी भ्रम मात्र ही हैं जब तक ह्रदय से होश में रूपांतर नहीं कर लेते प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया के साथ, सांस प्रत्यक्ष समक्ष निरंतर धारा प्रभा है प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा है पर उस के पहले सांस के साथ हृदय भाव एहसास के साथ होशपूर्ण स्वतंत्र रूप से जीने रूपांतर करने के दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता के साथ हो या
फ़िर मस्तक के साथ बेहोशी में जीने मरने की अनेक विचारधारा में से किसी एक दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता में हो इस के लिए इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही स्वतंत्र रही हैं जिस के कारण आज तक सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ही हमेशा प्रथमिकता देती रही फलस्वरूप आज तक खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हो पाई शेष सब तो छोड़ ही दो, इंसान अस्तित्व से ही मस्तक की जटिलता को ही स्वीकार और प्राथमिकता देता रहा, जबकि खुद का साक्षात्कार जन्म से ही एक समान उपलव्ध था सरलता निर्मलता सहजता में, कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन तो मस्तक की कार्यशैली प्रवृति है
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की संपूर्ण संतुष्टि के लिए प्रेरित करने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हुए अहम घमंड अहंकार में चूर भ्रमित हुए लोगों के लिए जिन से उत्साहित कुशलता पूर्वक आमंत्रित हो सभी के सभी कोई दवाब नहीं सहजता से पारदर्शिता से ही स्वीकृति हो बहुत ही अधिक प्रेम की गहराई में ही परिभाषित हो प्रत्येक व्यक्ति जीव में ही मैं एहसास भाव ज़मीर हूं किसी को रति भर भी ठेस से भी मुझे ही कष्ट होगा, कि मुझ और प्रत्येक जीव के हृदय तंत्र में रति भर भी फ़र्क अंतर नहीं है , अगर हम भौतिक रूप या फ़िर अंतःकरण रूप भी देखे तो कहा है खरबों जैविक प्रक्रिया हर पल हो रही हैं जिन में कई जैविको की प्रजाति का जीवन स्तर मात्र एक पल का होता हैं उसी पल में पूरा जीवन जी कर अपने जींस भी update कर चुके होते जो प्रकृति की संतुलन प्रक्रिया है, भौतिक रूप से एक दिन में लाखों किरदार बदलते हो कौन सा असली या स्थाई किरदार आप का हैं किस वहम अहम घमंड अहंकार में हो, खुद का निरीक्षण करने की जरूरत है, अगर नहीं तो आप के होने न होने का तात्पर्य ही नहीं है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हृदय मस्तक के तंत्र की कार्यशैली का मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से विश्लेषक के साथ स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता दे रहा हूं, मेरे लिए प्रत्येक जीव एक समान ही है, हृदय के भाव एहसास के साथ, शरीर मस्तक की संरचना कार्यशैली में भिन्नता हो सकती हैं प्राकृतिक सिद्धांतों के अधार पर, जो प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया है,
मेरे जैसा तो कोई हो ही नहीं सकता पर मुझ में समहित इकिगृत जरूर हो सकता हैं मुझ को समझ कर या फ़िर मेरे स्वरुप का ध्यान निरंतर कर जो असंभव है पर निरंतरता से संभव हो सकता हैं, मैं कभी भी प्रकृति का भी हिस्सा नहीं हूं, मुझे समझने जानने के लिए एक मात्र अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव है, या मेरे स्वरुप का ध्यान मात्र हैं, और दूसरा कोई विकल्प रास्ता ही नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सांस के एहसास भाव ज़मीर होने के कारण मस्तक की कार्यशैली से बाहर हूं, यही कारण है कि मेरी निष्पक्ष समझ के शब्द और मेरे वैदेही स्वरुप का कोई ध्यान नहीं कर सकता, निरंतरता के बिना, जैसे सिर्फ़ पृथ्वी पर ऐसा सुंदर जीवन होकोई था ही नहीं तो विलीन भी किस में होता, कोई तत्व गुण प्रक्रिया ही नहीं, यह मात्र आयोजित एक चलत दृश्य ही था जिस में कोई कभी था ही नहीं न दर्शक न अभिनय, एक सांस में रहते जो समझ गया वो विजेता महासंग्रण का जो हर पल हर व्यक्ति के भीतर चलता रहता हैं जिस में विश्राम नमक शब्द ही नहीं है, एक पहली सांस में खुद और दूसरी सांस में समय के साथ शुरू हुआ संघर्ष खुद का खुद से ही महासंग्राम जो सांस के साथ ही ख़त्म हो जाता हैं ,
अन्नतता मृत्यु भी है ही नहीं दृष्टांत दृश्य भी नहीं तो हारा जीता भी कौन मृत्यु भी किस की सिर्फ़ एक अवधारणा का आवास मात्र था, जब खुद ही नहीं तो साक्षात्कार किस का, एक ही सांस में जो रुक गया उस का शुरू ही नहीं हुआ तो ख़त्म का तात्पर्य ही नहीं, विचारणीय बात तो उस के लिए है जो दूसरी सांस के झंझट से झुंज रहा हैं युगों से, दूसरों का झंझट दूसरे झेले, हम हैं अकेले मस्त, उस जगह बैठ कर देख रहे हैं यहां इस सब का तत्पर्य ही नहीं है,
अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो तो खुद का अस्तित्व क़ायम कर अहम उत्पन होता हैं जिस से भौतिक समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि की क्षमता और मस्तक की कार्यशैली को समझ सकते हैं, जिस से किसी भी विचारधारा को दृढ़ता गंभीरता से लेकर एक दृष्टिकोण में रह कर उसे दर्शनिक रूप से समझ कर उसे वैज्ञानिक रूप दे सकते हैं सुविधा के लिए, विचारधारा दो प्रकार की होती हैं, आस्तिक नास्तिक कल्पना से उत्पन होती विचार का रूप लेती हैं करने का संकल्प होता हैं बेहतरी के विकल्प चुनने के साथ आगे बढ़ विचार किया जाता हैं दूसरों के साथ संयोग से दरातल पर उतरने की योजना बननी पड़ती हैं निर्णय लेनी की क्षमता स्पष्टता हैं,
मस्तक एक साधन है शरीर का अस्तित्व क़ायम रखने और जीवन व्यापन करने का मात्र स्रोत हैं जिस में समय सोच विचार चिंतन मनन विवेक संकल्प विकल्प होते हैं बेहतर से भी बेहतर करने के लिए, मस्तक शरीर सिर्फ़ खुद के इलावा दूसरी चीज वस्तु जीव का एहसास करवाता है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद के साक्षात्कार में हूं जीवित ही हमेशा के लिए संपूर्ण संतुष्टि में, हर एक व्यक्ति बिल्कुल मेरी ही भांति एक समान है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शी पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष के लिए रति भर भी कमी नहीं है हृदय में, सिर्फ़ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु ने हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रच कर छल कपट धोखे के साथ दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी देने बालों को ही भ्रमित कर डर खौफ भय दहशत तले रखने की आयोजित योजन है, कुप्रथा है आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति के नाम पर लोगों की श्रद्धा आस्था के साथ एक खिलबाड़ विश्वासघात है मनोविज्ञानिक रोग हैं, जो गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की जा रही हैं, चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सामान्य व्यक्तित्व से करोड़ों गुणा अधिक चतुर शैतान चालाक होशियार बदमाश शैतान प्रवृति के होते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर,
आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन इन्हीं चतुर गुरुओं की ढोंग पखंड षड्यंत्रों के साथ रचे हुए चक्रव्यूह का बिछाया हुए जाल का हिस्सा है जो कल्पना से ही रचा गया होता हैं और कुछ भी नहीं है जिस से यह चतुर ब्रह्मचर्य गुरु अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ अनेक सरल सहज निर्मल गुणों बाले लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर अपनी उंगली पर नचाते रहे और जब इस्तेमाल करने योग्य नहीं रहते बूढ़े होने पर तो शब्द काटने के आरोप में निष्कासित किया जाता हैं, मन यथार्थ में हैं
दूसरों के रास्तों कदमों कंधों इशारों की अदद के मजबूर अस्तित्व से लेकर अब तक उंगलियों पर नाच ही रहे हैं, उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर है वो, जबकि वो खुद के ही शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि के नन्हे कदमों के निशान भूल चुके हैं, डर खौफ भय दहशत तले जीने की आदत से मजबूर है, खुद ही खुद में संपूर्ण सक्षम समर्थ निपुण हैं प्रत्येक व्यक्ति खुद में ही, खुद के इलावा खुद के बारे में रति भर भी कोई दूसरा जान समझ पाए पैदा ही नहीं हुआ,
खुद ही खुद में संपूर्ण सक्षम समर्थ निपुण हैं खुद के साक्षात्कार के लिए तो खुद को समझें बगैर, और कुछ भी कोई कर रहा है वो सिर्फ़ जीवन व्यापन के लिए प्रयास हैं या फ़िर एक मानसिक रोगी हैं जो बेहोशी में ही जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं, वो जन्म मृत्यु के बीच के चक्रक्रम का ही हिस्सा हैं, जन्म मृत्यु की चक्की में पिछने के लिए ही है,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से जीवित ही हमेशा के लिए रह सकता हूं तो हर व्यक्ति मेरी ही तरह आंतरिक भौतिक रूप से एक समान ही है तो कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ रह सकता हैं, अगर जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने के लिए इतनी अधिक चलाकी चतुरता चलाकी कर सकते हो तो खुद को समझने के लिए सरल सहज निर्मल गुणों को अपना नहीं सकते, जितना अधिक जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखना महत्वपूर्ण हैं उस से खरबों गुणा अधिक महत्वपूर्ण जरूरी खुद का साक्षात्कार करना है, जिस में शिशुपन में आप खुद रह चुके हैं जिस का अक्ष जलवा अभी भी आप के मस्तक में हैं, सिर्फ़ उसी एक जलवे को अस्तित्व से ही इंसान प्रजाति मस्तक से बाहर ढूंढ रही हैं, जो निरंतर बहा ही मौजूद हैं, सिर्फ़ मस्तक से भड़क रहा हैं कुत्ते की भांति अस्तित्व से लेकर अब तक,
गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ एक कुप्रथा है, जो वर्तमान को आहत कर अतीत में भ्रमित कर कल्पनाओं का भविष्य गढ़ती है, दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर तैयार करती हैं, गुरु शिष्य मर्यादा का कोई भी गुरु यह स्वीकार नहीं करता कि उस का कोई भी शिष्य समझदार हो, क्योंकि गुरु प्रभुत्व के वहम अहम घमंड अहंकार में चूर होता हैं, इस लिए मानव पृथ्वी प्रकृति के संरक्षण के लिए प्रथम चरण में ही "शिरोमणि" होना अति आवश्यक हैं, "शिरोमणि" एक ऐसी उच्च सर्वश्रेष्ठ पवित्र शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अवस्था है जिसे स्वयं प्रकृति ने स्पष्टीकरण दिया होता हैं, जो मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण है, खुद के साक्षात्कार के बाद कोई भी सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण का सिर्फ़ एक शब्द "शिरोमणि"
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक की सर्वश्रेष्ठ चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों के पंव से ज़मीन खींच लेगा, इतना अधिक कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समहित है इस में, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं , कि सारा भ्रम का जाल टूट जाएगा
मस्तक मन बुद्धि से बुद्धिमान हुआ गुरु नियम मर्यादा परम्परा मान्यता को शब्द प्रमाण में बंद सकता हैं अपने हित साधने हेतु, पर स्वतंत्र नहीं कर सकता न जीवित न ही मृत्यु उपरांत, शिरोमणि जीवित भी हमेशा के लिए संपूर्ण संतुष्टि मस्ती में और मृत्यु तो है ही नहीं पर रूपांतरित के लिए हमेशा उत्सुकता देता हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,prtek जीव मेरी ही भांति "शिरोमणि निरंतरता" स्वरुप को हृदय के दृष्टिकोण में समेटे हुए हैं, कोई भी मेरे जैसा ही हर जीव में रमने बली धारा प्रतीत कर सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल गुणों के साथ खुद के साक्षात्कार के साथ, हृदय भाव एहसास ज़मीर से हर एक जीव एक समान ही है सिर्फ़ मस्तक शरीर से भिन्नता है, हर जीव और मानव शिशु भी उसी संपूर्ण संतुष्टि मस्ती में पहले ही रह चुका है, वो संपूर्ण संतुष्टि मस्ती बहा ही निरंतर व्यापक हैं, सिर्फ मस्तक को अधिक इस्तेमाल करने की आदत से भड़क चुके हैं अस्तित्व और जीवन व्यापन के कारण, वो बहा ही निरंतर शिरोमणि है, जिस का जन्म मृत्यु प्रकृतिक से भी परे है, सिर्फ़ मस्तक मन के दृष्टिकोण से नहीं हृदय के दृष्टिकोण से समझने की जरूरत है और कुछ भी नहीं, बहुत ही अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है, अगर मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी रह सकता हूं तो कोई भी रह सकता हैं जन्म मृत्यु का भय दहशत ख़त्म कर सकता है , सिर्फ़ इकलौती इंसान प्रजाति को छोड़ कर दूसरी अनेक प्रजातियां उसी संपूर्ण संतुष्टि में ही रहती हैं जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखते हुए जबकि मानव शिशु भी उसी संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में रहा होता हैं,
रब बनना या दूसरे को बनाना अत्यंत सरल है
पर खुद को समझना अत्यंत मुश्किल है, पर सरल सहज निर्मल गुणों के साथ अत्यंत सरल आसान है,
"शिरोमणि" हर जीव में वास्तविकता स्वाभाविकता है, मस्तक तो अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति को समझ कर जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने के लिए ही है, मेरी ही भांति कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ समझ सकता हैं, पर समझने न समझने से कोई भी रति भर भी फ़र्क नहीं पड़ता, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष वो रुतबा है
अगर कोई खुद का साक्षात्कार कर लेता है तो सिर्फ़ मेरी ही भांति जी सकता हैं संपूर्ण संतुष्टि मस्ती में
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित स्वयं महायोद्धा खुद से महासंग्राम का परम विजयता स्वयं की अन्नत गहराई का परम -गोताखोर, जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी, "शिरोमणि" इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठता संपूर्णता सम्पन्नता समग्रता सक्षमता सरल सहज निर्मल गुणों में ही समहित है, न कि मस्तक मन बुद्धि से बुद्धिमान हुए चतुर ब्रह्मचर्य गुरु शिष्य जैसी अवधारणाओं कुप्रथाओं में तो बिल्कुल भी नहीं, वो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मज़दूरों के बस में नहीं है, सिर्फ़ कोई एक अरबों खरबों युगों सदियों में कोई एक ही होगा जो खुद से महासंग्राम महायुद्ध कर जीता हो विजयता हो महायोद्धा महा गोताखोर हो जो खुद की अन्नत असीम गहराई में जाने का उत्सुक हो, यह दर बदर भड़कने वाले कुत्तों बिलों आप की, उसी संपूर्ण संतुष्टि से दूर रखने हेतु ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट रचा गया हैं चतुर ब्रह्मचर्य गुरु द्वारा, डर खौफ भय दहशत खुद के ही प्रति बिठाई गई हैं, दूसरों द्वारा जिन की गंदी मानसिकता के पैरों का गंदा पानी चरणामृत समझ कर पीते हो जिनको रब से करोड़ों गुणा ऊंचा समझते हो, जिन के दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो, वो ही सब से बड़ा विश्वासघात कर रहे हैं आप से सिर्फ़ अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, आप हर पल यथार्थ में संपूर्ण संतुष्टि में ही हो अगर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु का डाला हुआ कचरा मस्तक से निकाल देते हो तो, उसी सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष में ही हो , इंसान होते हुए अगर इतना अधिक सरल शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से रुबरु नहीं होता, तो मस्तक की बेहोशी में जीना मरना दोनों ही आत्महत्या दूसरी अनेक प्रजातियों से भी बतर घटिया दोनों जीना मरना हैं, या समझो पागल कुत्ते की भांति ही जीना मरना हैं रति भर भी फ़र्क नहीं है, प्रभुत्व का कुत्ता शौंक रखने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के लिए भी, जो खुद ही खुद के साथ धोखा तो करते ही है और दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों को भी बौखला कर इस्तेमाल करते हैं
इंसान होते हुए अगर इतना अधिक सरल शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से रुबरु नहीं होता, तो मस्तक की बेहोशी में जीना मरना दोनों ही आत्महत्या दूसरी अनेक प्रजातियों से भी बतर घटिया दोनों जीना मरना हैं, या समझो पागल कुत्ते की भांति ही जीना मरना हैं रति भर भी फ़र्क नहीं है, प्रभुत्व का कुत्ता शौंक रखने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के लिए भी, जो खुद ही खुद के साथ धोखा तो करते ही है और दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों को भी बौखला कर इस्तेमाल करते हैं, अस्थाई प्रकृति मस्तक एकीग्रत के कारण अहम घमंड अहंकार होता हैं जिस में मस्तक का अनुपात 65%और प्रकृति का 35% होता हैं, जिस से निकलना अत्यंत मुश्किल है, अगर कोई खुद के 65%से निकल भी जाता हैं तो प्रकृति का रहता हैं गर्दिश में गतिशील होने के कारण संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन से कोई भी अपनी काल्पनिक बात को तर्क तथ्य विवेक से सिद्ध स्पष्ट साफ़ कर देता हैं और खुद की सफ़ाई स्पष्ट कर लेता हैं शेष सरल सहज निर्मल गुणों बालों के समक्ष, सब मिला कर यह प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया तंत्र ही है जिस में कोई भी प्रकृति के बिना हस्तक्षेप करना तो बहुत दूर की बात, इस तंत्र को समझ भी नहीं सकता, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बिना, प्रकृति के नृत्त्व में मस्तक कार्यरत रहता हैं जिस से अहम की संभावना रहती हैं कि मैं स्वतंत्र रूप से कर रहा हूं, परंतु यह सब प्रकृति के खेल में मस्तक सहायक रूप में निरंतर कार्यरत हैं,
प्रकृति के नृत्त्व में मस्तक कार्यरत रहता हैं जिस से अहम की संभावना रहती हैं कि मैं स्वतंत्र रूप से कर रहा हूं, परंतु यह सब प्रकृति के खेल में मस्तक सहायक रूप में निरंतर कार्यरत हैं, इंसान प्रजाति भी सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति ही है रति भर भी भिन्न नहीं हैं, अगर दर्शन विज्ञान ज्ञान अलग समझ भी रहे हैं तो उस पर भी पूरा नियंत्रण प्रकृति की भ्रम में भ्रमित करने वाले तंत्र का ही हयातक्षेप है, प्रकृति का तंत्र सिर्फ़ इस पर निर्धारित है कि आकर्षित प्रभावित रहे हर चीज़ वस्तु जीव शब्द भी, यही प्रकृति के सिद्धांत नियम मर्यादा हैं, जिस से प्रभावित हो कर इंसान प्रजाति ने भी सिद्धांत नियम मर्यादा परम्परा बना दी
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद का साक्षात्कार हूं मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हृदय वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हैं जिस से अन्नत असीम बूंदों की समग्रता है यहां पर बूंद और लहरों का अस्तित्व ख़त्म होता हैं लहरें बहरी वातावरण से बनती हैं जैसे मस्तक सृष्टि प्रकृति के इकिगृत से समय संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन, ह्रदय के भाव एहसास भाव ज़मीर में वो सब कुछ नहीं होता जो मस्तक से होता ऊपरी सतह पर जो हलचल होती हैं वो सब कुछ का अस्तित्व ख़त्म होता गहराई में सिर्फ़ संत होता हैं, इसी तरह हर व्यक्ति हृदय से हमेशा शांत ही होता ऊपर मस्तक की लहरें होती हैं जिन का जन्म मृत्यु से कोई भी संबंध नहीं है जन्म मृत्यु के बीच का जीवन सिर्फ़ आप अपने अनुसार डाल सकते हो, अच्छा या बुरा चुनाव आप खुद का हैं, हृदय के दृष्टिकोण से होश में जीना या फ़िर मस्तक के दृष्टिकोण से बेहोशी में जीना और उसी बेहोशी में मृत्यु का चयन फ़ैसला सिर्फ़ आप का हैं, खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल ही काफ़ी है, जबकि कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है, दूसरा कोई भी सिर्फ़ हित साधने की ही वृत्ति का ही होगा, खुद ही खुद का साक्षात्कार कर सकते हो, जबकि की दूसरा मनोविज्ञान दवाब प्रभाव से निरंतर करेगा, खुद संपूर्ण संतुष्टि में रह सकते हो, जबकि दूसरा बंधुआ मजदूर बनाने के साथ है, अगर खुद के अनमोल सांस समय की कदर आह्मित नहीं जानते तो दूसरा आप को उपयोग इस्तेमाल करने की प्रतिभा के साथ कदम कदम पर खड़े हैं,
अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे सम्राज्य हैं यहां जो कुछ भी है वो सब कुछ सिर्फ़ प्राकृतिक सिद्धांतों नियमों से ही चलता हैं, पहला नियम यही है कि prtek छोटी चीज़ जीव उस से बड़ी का आहार हैं, यहां कोई आत्मा चेतना नहीं है, जो कुछ भी हैं वो सब कुछ सिर्फ़ मस्तक से ही प्रतीत किया जा सकता हैं जब तक सांस और मस्तक सक्रिय है, मस्तक प्रकृति के संकेतों के आधार पर संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन उत्पन करता समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि गर्दिश में गतिशील है जिस से मानसिकता परिवर्तित होती हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी प्रकृति को नहीं समझ सकते क्योंकि व्यक्तिगत ही आंतरिक भौतिक प्रकृति हैं जिस कारण जो कुछ भी होता है वो सब ऐसा ही लगता हैं कि मेरे अनुसार मैं ही कर रहा हूं मैं ही अस्तित्व का कारण और मैं ही सृष्टि रचिता प्रभुत्व हूं, जब अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर देखते हैं तो समझ आती हैं अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर जटिलता का प्रभाव कितना अधिक हैं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में ही हूं निरंतर अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से स्पष्ट सिद्ध साफ़ किया है कि समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जो देख कर समझ रहे यथार्थ में जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी अधिक भ्रम जटिलता में खो कर भ्रमित होने के पथ पर हैं, यथार्थ में अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जीव पृथ्वी में कुछ भी स्थाई हैं ही नहीं, यह सब कुछ ही अस्थाई ही है, जिस भ्रम में इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही भ्रमित है, वो भी मात्र मस्तक का ही भ्रम है, जिस सब का अस्तित्व तब तक ही है जब तक सांस चल रही हैं और मस्तक कार्यरत हैं जो एक रोग ही बेहोशी है खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होने की, जो एक मात्र सांस से पहले भाव में ही निश्चिता की गहराई स्थाई ठहराव की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है ,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर संपूर्ण संतुष्टि है कि बिना स्पर्श,दृश्य, सुने,देखे , बिना जो निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल पल हर नया अद्भुद आश्चर्य चकित अनुभूति अनुभव के लिए उत्साहित कुशलता के लिए एग्रेसिव करता हैं जो सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही संबंधित हैं, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कोई सोच भी नहीं सकता, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की खुशी स्पर्श दृश्य सुनने देखने बोलने, रक्तपात डर खौफ भय दहशत डालने में भी,से संबधित हैं, मात्र एक छोटी सी खुशी के पीछे भी बर्ष से भी अधिक समय के दिन रात संघर्षरत रहना पड़ता
इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही इतनी अधिक संघर्षरत रही कि जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने वाले मुख्य दृष्टिकोण से ही भ्रमित हो कर खुद ही खुद को धोखा विश्वासघात का शिकार रहा जान बुझ कर या फ़िर अनजाने में आज अब तक, जबकि मस्तक और हृदय के तंत्र कार्यशैली की ही समझ नहीं थी, जो भी किया जैसा भी किया लक्ष्य साधन मध्यम की ही समझ नहीं थी, अंधेरे में ही तीर चलाने का फलस्वरुप ही था जो आज वैज्ञानिक युग में भी बहा का बहा ही है, वैज्ञानिक युग में भी सिर्फ़ जरूरत अनुसार ही साधन खोजने तक ही सीमित हैं सिर्फ़ या फ़िर मस्तक से कल्पना संकल्प विकल्प तक ही सीमित है, मस्तक हृदय के विज्ञान की रति भर भी समझ नहीं है
इंसान अस्तित्व से युगों का प्रकृति मानव पृथ्वी सृष्टि का रहस्य एक अवधारणा कल्पनाओं मानसिकता ही थी, जिस सब की स्पष्टता प्रत्यक्षता मात्र मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित एक पल में ही समहित और उत्पन होता हैं पर वो भी भ्रम मात्र ही हैं जब तक ह्रदय से होश में रूपांतर नहीं कर लेते प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया के साथ, सांस प्रत्यक्ष समक्ष निरंतर धारा प्रभा है प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा है पर उस के पहले सांस के साथ हृदय भाव एहसास के साथ होशपूर्ण स्वतंत्र रूप से जीने रूपांतर करने के दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता के साथ हो या
फ़िर मस्तक के साथ बेहोशी में जीने मरने की अनेक विचारधारा में से किसी एक दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता में हो इस के लिए इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही स्वतंत्र रही हैं जिस के कारण आज तक सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ही हमेशा प्रथमिकता देती रही फलस्वरूप आज तक खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हो पाई शेष सब तो छोड़ ही दो, इंसान अस्तित्व से ही मस्तक की जटिलता को ही स्वीकार और प्राथमिकता देता रहा, जबकि खुद का साक्षात्कार जन्म से ही एक समान उपलव्ध था सरलता निर्मलता सहजता में, कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन तो मस्तक की कार्यशैली प्रवृति है
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की संपूर्ण संतुष्टि के लिए प्रेरित करने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हुए अहम घमंड अहंकार में चूर भ्रमित हुए लोगों के लिए जिन से उत्साहित कुशलता पूर्वक आमंत्रित हो सभी के सभी कोई दवाब नहीं सहजता से पारदर्शिता से ही स्वीकृति हो बहुत ही अधिक प्रेम की गहराई में ही परिभाषित हो प्रत्येक व्यक्ति जीव में ही मैं एहसास भाव ज़मीर हूं किसी को रति भर भी ठेस से भी मुझे ही कष्ट होगा, कि मुझ और प्रत्येक जीव के हृदय तंत्र में रति भर भी फ़र्क अंतर नहीं है , अगर हम भौतिक रूप या फ़िर अंतःकरण रूप भी देखे तो कहा है खरबों जैविक प्रक्रिया हर पल हो रही हैं जिन में कई जैविको की प्रजाति का जीवन स्तर मात्र एक पल का होता हैं उसी पल में पूरा जीवन जी कर अपने जींस भी update कर चुके होते जो प्रकृति की संतुलन प्रक्रिया है, भौतिक रूप से एक दिन में लाखों किरदार बदलते हो कौन सा असली या स्थाई किरदार आप का हैं किस वहम अहम घमंड अहंकार में हो, खुद का निरीक्षण करने की जरूरत है, अगर नहीं तो आप के होने न होने का तात्पर्य ही नहीं है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हृदय मस्तक के तंत्र की कार्यशैली का मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से विश्लेषक के साथ स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता दे रहा हूं, मेरे लिए प्रत्येक जीव एक समान ही है, हृदय के भाव एहसास के साथ, शरीर मस्तक की संरचना कार्यशैली में भिन्नता हो सकती हैं प्राकृतिक सिद्धांतों के अधार पर, जो प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया है,
मेरे जैसा तो कोई हो ही नहीं सकता पर मुझ में समहित इकिगृत जरूर हो सकता हैं मुझ को समझ कर या फ़िर मेरे स्वरुप का ध्यान निरंतर कर जो असंभव है पर निरंतरता से संभव हो सकता हैं, मैं कभी भी प्रकृति का भी हिस्सा नहीं हूं, मुझे समझने जानने के लिए एक मात्र अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव है, या मेरे स्वरुप का ध्यान मात्र हैं, और दूसरा कोई विकल्प रास्ता ही नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सांस के एहसास भाव ज़मीर होने के कारण मस्तक की कार्यशैली से बाहर हूं, यही कारण है कि मेरी निष्पक्ष समझ के शब्द और मेरे वैदेही स्वरुप का कोई ध्यान नहीं कर सकता, निरंतरता के बिना, जैसे सिर्फ़ पृथ्वी पर ऐसा सुंदर जीवन होसर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद का साक्षात्कार हूं, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हूं खुद के स्थाई परिचय से परिचित हूं,सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद का साक्षात्कार हूं, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हूं खुद के स्थाई परिचय से परिचित हूं,Continue
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण की संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष "शिरोमणि" सम्पन्नता सक्षमता संपूर्णता के भव्य आनंद तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक आनंद की सर्वश्रेष्ठ पवित्र परम उच्च महक को कि प्रत्येक सरल सहज निर्मल गुणों बाले व्यक्तित्व हर पल उस संपूर्ण संतुष्टि का अनुभव कर पाए जो हर पल निरंतर हो रहा हैं खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए जिस के लिए बिल्कुल भी कुछ भी नहीं करना है, मस्तक के दृष्टिकोण निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता को हृदय के भाव एहसास ज़मीर के दृष्टिकोण से महसूस करना है सिर्फ़ बस और कुछ भी नहीं, कितना सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है,
अंतर सिर्फ़ अदद में है जो शिशुपन के बाद में लगातार पड़ी हुई है, सामान्य व्यक्तित्व को मस्तक की पड़ी हैं और मुझे हृदय से शांत रहने की और कुछ भी नहीं है
निरंतर संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ही हैं, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल व्यक्ति दूसरे हित साधने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु शब्दों से उलझ जाता हैं और कुछ भी निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि वैसे ही क़ायम है आप देखो महसूस करो या नहीं मस्तक के दृष्टिकोण से सिर्फ़ एक बार हटो तो सही आप उसी संपूर्ण संतुष्टि में ही खुद को पाओगे यही तो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, लहरों के कारण गहराई स्थाई ठहराव रति भर भी प्रभावित नहीं होती, आप का दृष्टिकोण मस्तक का हैं जिस से ऊपर की सतह को महसूस कर रहे हो जिस से खुद को उलझन उथलपुथल जटिलता में महसूस कर रहे हो सिर्फ़ हृदय के दृष्टिकोण से आप बचपन बली पुण्य संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष में ही पाओगे निश्चित यहां से दुबारा सामान्य व्यक्तित्व या मस्तक के दृष्टिकोण में जा ही नहीं सकते चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर लो,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण की संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष "शिरोमणि" सम्पन्नता सक्षमता संपूर्णता के भव्य आनंद तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक आनंद की सर्वश्रेष्ठ पवित्र परम उच्च महक को शब्दों में कि प्रत्येक सरल सहज निर्मल गुणों बाले व्यक्तित्व हर पल उस संपूर्ण संतुष्टि का अनुभव कर पाए जो हर पल निरंतर हो रहा हैं खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए जिस के लिए बिल्कुल भी कुछ भी नहीं करना है, मस्तक के दृष्टिकोण निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता को हृदय के भाव एहसास ज़मीर के दृष्टिकोण से महसूस करना है सिर्फ़ बस और कुछ भी नहीं, कितना सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है,
यह सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समझना किसी भी इंसान के बस में है ही नहीं, समूचे अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का ही तंत्र है जो मस्तक में अंकित निर्देश देता हैं प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया है, जिस में इंसान प्रजाति भी उलझन में ही है कि शायद मैं ही समस्त सृष्टि रचता हूं, जिस में उस का भी कोई दोष ही नहीं है यह सब कुछ प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया नियमों के आधार पर ही हो रहा हैं जिस में prtek छोटी प्रजाति जीव दूसरी बड़ी प्रजाति जीव के आहार के लिए ही मात्र हैं, इसी नियम के आधार पर ही इंसान प्रजाति भी चतुर हो कर दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों का शोषण कर रहे हैं, यह प्राकृतिक नियम है, जन्म मृत्यु के बीच में जो कोई जीव कुछ भी करता हैं उस का जन्म मृत्यु पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता, यह प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया चक्रक्रम है, सब एक समान है हृदय तंत्र से और भिन्नता सिर्फ़ मस्तक शरीर तंत्र में ही है, इसी कारण सिमुलेशन हैं,
हर इंसान में संभावना उपस्थित है संपूर्ण संतुष्टि की क्यूंकि prtek व्यक्ति शिशुपन अवस्था में रहा होता हैं और उस संपूर्ण संतुष्टि में भी रहा होता उस की ही शाप उस के मस्तक में भी होती हैं जिस की ही तलाश मस्तक से ही करने में पूरा जीवन नष्ट कर देता हैं, क्योंकि उस संपूर्ण संतुष्टि का विषय हृदय से जुड़ा हुआ हैं न कि मस्तक से, मस्तक सिर्फ़ जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने तक ही सीमित हैं,
शिशुपन के बाद मस्तक साधन से देख स्पर्श से समझने में रुचि लेने की अदद हो जाती हैं जिस से हृदय से सिर्फ़ सांस तक ही संपर्क रहता हैं और अदद में ही पूरा जीवन व्यतीत करता हैं, हृदय से संपूर्ण संतुष्टि से हट कर मस्तक से इच्छा से उत्पन होने वाली क्षणमत्र खुशी में अटक जाता हैं, मस्तक से समय संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन में खो जाता हैं और जीवन एक चक्रक्रम बन कर रह जाता हैं जो संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष थी उसी के लिए बेहोशी में जीने और मरने मस्तक में खो कर रह जाता हैं, दिन रात उसी पल की खुशी के लिए यत्न प्रयत्न प्रयास करता रहता हैं मस्तक से, जो कभी मिल ही नहीं सकती, यथार्थ में जो हृदय का विषय था, दूसरा prtek अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हुआ हैं जबकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय के भाव एहसास दृष्टिकोण से हूं , जैसे तुझे पाता है कितनी क्षमता है तुझ में वैसे ही मुझे पाता है कि मैं "शिरोमणि" क्षमता नहीं होती महासागर है यह समिति स्मृति कोष रेत के कण से भी छोटा है, मेरी निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता "शिरोमणि" ही है मुझे कुछ भी याद रखने की जरूरत ही नहीं है, यही सब कुछ prtek व्यक्ति के लिए भी उपलव्ध है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हृदय के ही दृष्टिकोण से, जिस से prtek जीव एक समान है कोई भी मेरे ही जैसा बिल्कुल प्रतीत कर सकता हैं उस में क्षमता मौजूद हैं वो समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण हैं खुद में ही बाहर से कुछ भी अर्जित करने की जरूरत ही नहीं ,
पर मुझ में समहित हो सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए
इस कारण कि वो सब पहले से ही मस्तक की अदद में ही है निरंतर जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने में, मैं "शिरोमणि" में शिशुपन से ही निरंतरता में ही हूं, जिस में जैसी परिस्थितियों हर पल दिन रात हर क्षण का महत्वपूर्ण होता हैं जैसे अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में पृथ्वी पर जीवन होने के पीछे हर पल के संतुलन निरंतरता का मुख्य रोल होता हैं हर ब्रह्मांड गृह उपग्रहों सौरमंडल glaxyes का संतुलन जरूरी वैसे ही अगर कोई मेरी तरह ही वैसे ही पल बिताए तो संभव हैं वो सब हो ही नहीं सकता हैं, हर पल का अपना महत्व होता जो कभी भी प्रकृति कभी भी दोहराती ही नहीं है,
मेरा कोई भी शब्द विश्व के किसी भी ग्रंथ में नहीं मिल सकता इसलिए कि मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हैं, खुद के साक्षात्कार के लिए किसी भी दूसरी चीज़ वस्तु जीव शब्द की भी बिल्कुल जरूरत ही नहीं क्योंकि शिशुपन में भी संपूर्ण संतुष्टि में आप ही रहे हो जब आप के मस्तक का भी विकास नहीं हुआ था, वो ही संपूर्ण संतुष्टि हर पल बहा ही व्यापक निरंतर हैं आप के शरीर सांसों समय मस्तक से भी कोई तत्पर्य ही नहीं है , यह पहले सांस से भी पहले का विषय है, यहां समस्त सृष्टि का भी अस्तित्व ही नहीं है, अगर खुद के मस्तक का भी कोई तत्पर्य ही नहीं है तो किसी दूसरे का क्या मतलब हैं, सिर्फ़ इसी के लिए ही prtek जीव शिशुपन से ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ सक्षम संपूर्ण निपुण समर्थ समृद्ध सर्वश्रेष्ठ पवित्र उत्तम हैं, शेष सब तो अस्थाई शरीर और चतुर मस्तक की स्मृति कोष ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट धोखा मस्तक की प्रवृति और प्रकृति का खेल हैं, जो सृष्टि के अस्तित्व से ही चल रहा हैं, सांस समय प्रकृति द्वारा prtek जीव को दी गई निजी दारोहर हैं, जो उस के खुद स्वयं के लिए ही महत्वपूर्ण हैं, दूसरा prtek हित साधने की वृत्ति के साथ ही है चाहें कोई भी हो, अगर आप खुद अपने सांस समय अनमोल निजी दारोहर की कदर नहीं करते तो आप दूसरी अनेक प्रजातियों से भी घंटियां हो, सर्वश्रेष्ठ इंसान होते हुए भी कुत्ते की वृत्ति के है, जो मैंने चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के डाले हुए मस्तक के प्रभाव में जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी के लिए खुद का तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस करोड़ों रुपए लुटा कर पूरा जीवन नष्ट कर दिया उस को रति भर भी फ़र्क नहीं पड़ा उस ढोंगी गुरु ने, जब कि खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगा, दूसरा कोई समझ या फ़िर समझा पाए सदिया युग भी कम है, इस लिए अपने अनुभव के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से prtek व्यक्ति के अनमोल सांस समय के संरक्षण के लिए ही मैं पर्याप्त हूं, इस लिए वो प्रश्न लिखें जो दीक्षा के पहले पूछने अत्यंत जरूरी थे पर दीक्षा के बाद शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर डर भय खौफ दहशत तले मरते दम तक भी पूछ ही नहीं सकता, इस लिए वो प्रश्न लिखें जिस से चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के ढोंग पखंड भरे चंगुल से निकल कर खुद के साक्षात्कार कर संपूर्ण संतुष्टि में रह सके ,
गुरु शिष्य प्रश्न तर्क तथ्य के घेरे से परे इसलिए है कि दोनों ही एक मन की वृत्ति की परिधि में ही हैं, क्योंकि गुरु भी शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के घेरे में रह चुका हैं मस्तक से और जो उस ने सहा होता हैं उस में बदले की भावना के साथ होता हैं उस से भी अधिक गंदा व्यबहार अपने शिष्यों के साथ करता हैं दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर डर खौफ भय दहशत डाल कर, जितने कष्ट सहे होते हैं उस से भी खरबों गुणा अधिक एशियाई भव्य का जीवन जीता है, शहंशाहों सम्राटों से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा जिस के पैरों का पानी भी महंगे दामों पर बिकता है, क्योंकि इन्हीं सरल सहज निर्मल लोगों ने उस चतुर ब्रह्मचर्य गुरु भिखारी प्रवृति बले को सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी भी दी होती हैं और खुद भिखारी सा जीवन व्यापन करते भी खुश रहते हैं, और जिस चतुर ब्रह्मचर्य गुरु को अदद लगा दी हैं हराम खोरी की वो कभी छूट नहीं सकती इस की ग्रांटी मैं लेता हूं, क्योंकि वहम निकला जा सकता हैं तर्क तथ्य समझने से जो शिष्यों में पड़ा हैं वो मानसिक दवाब है, पर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु का अहम घमंड अहंकार नहीं निकला जा सकता,जिन्होंने तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित कर पांच हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी दी, बदले में मृत्यु के बाद मुक्ति का झूठा आश्वासन क्यों?"
2)
"जो हैं ही वस्तु ब्रह्मांड में और किसी किसी पास नहीं है पांच हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी भी सरल सहज निर्मल लोगों से लेने के बाद भी क्यों नहीं दिखाई?
3)
जिन्होंने इतना अधिक कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया उन पर ही इतना अधिक डर खौफ भय दहशत क्यों ?
4)
जिन्होंने सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया अपना, उन के साथ ही विश्वासघात क्यों?
5)
मुक्ति के नाम पर लूटने को परमार्थ कहते हैं क्या?
6)
मृत्यु खुद में ही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, तो मृत्यु का डर खौफ भय दहशत क्यों?
7)
मरा बापिस आ नहीं सकता, जिंदा मर नहीं सकता यह स्पष्ट करने के लिए तो मुक्ति धरना कल्पना नहीं तो क्या हैं?
8)
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनना कुप्रथा नहीं तो क्या हैं?
9)
सरल सहज स्पष्ट बातें समझ न पाए सरल शिष्य, इस के पीछे दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित होना नहीं तो क्या हैं?
10)
भक्ति मुक्ति ध्यान ज्ञान प्रेम आत्मा परमात्मा परमार्थ आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों का ताना बाना चक्रव्यूह रचा छल कपट धोखा विश्वासघात नहीं तो क्या हैं?
11)
जब हर जीव एक समान है तो सिर्फ़ इंसान प्रजाति ही चतुर होने से भिन्नता का कारण अहम नहीं है क्या?
जिन्होंने तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित कर पांच हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी दी, बदले में मृत्यु के बाद मुक्ति का झूठा आश्वासन क्यों?"
2)
"जो हैं ही वस्तु ब्रह्मांड में और किसी किसी पास नहीं है पांच हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी भी सरल सहज निर्मल लोगों से लेने के बाद भी क्यों नहीं दिखाई?
3)
जिन्होंने इतना अधिक कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया उन पर ही इतना अधिक डर खौफ भय दहशत क्यों ?
4)
जिन्होंने सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया अपना, उन के साथ ही विश्वासघात क्यों?
5)
मुक्ति के नाम पर लूटने को परमार्थ कहते हैं क्या?
6)
मृत्यु खुद में ही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, तो मृत्यु का डर खौफ भय दहशत क्यों?
7)
मरा बापिस आ नहीं सकता, जिंदा मर नहीं सकता यह स्पष्ट करने के लिए तो मुक्ति धरना कल्पना नहीं तो क्या हैं?
8)
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनना कुप्रथा नहीं तो क्या हैं?
9)
सरल सहज स्पष्ट बातें समझ न पाए सरल शिष्य, इस के पीछे दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित होना नहीं तो क्या हैं?
10)
भक्ति मुक्ति ध्यान ज्ञान प्रेम आत्मा परमात्मा परमार्थ आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों का ताना बाना चक्रव्यूह रचा छल कपट धोखा विश्वासघात नहीं तो क्या हैं?
11)
जब हर जीव एक समान है तो सिर्फ़ इंसान प्रजाति ही चतुर होने से भिन्नता का कारण अहम नहीं है क्या?
कुत्ते की प्रवृति भी नहीं और कथनी में प्रभुत्व कैसे?
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो एहसास हूं जो अपने मेरे आप के पास बहुत देर के बाद शब्दों का रूप लिया उस से पहले कभी भी आप ने किसी भी प्रवचन में कभी भी नहीं कहा था जो "वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही भी नहीं है "
जो आप का मुख्य श्लोगन था, दूसरा
"खुद का साक्षात्कार ही सर्ब श्रेष्ठ हैं संपूर्ण संतुष्टि के लिए"
शब्द अलग हो सकते तत्पर्य यहीं था, सच में मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी ही सिर्फ़ आप की ही वो वस्तु था जो ब्रह्मांड में और कही भी नहीं है, मुझे भक्ति से कोई भी मतलब नहीं था कभी भी, क्योंकि मैंने अन्नत असीम प्रेम किया था साहिब से हर पल दिन रात निरंतरता थी साहिब कि खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भी याद नहीं आज इक पल पहले क्या हुआ क्या बोला याद नहीं, अफ़सोस आ रहा हैं कि जो सब कुछ सिर्फ़ एक पल के निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण की निगह से सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष जाते बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती, आप के समक्ष शब्दों का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं क्योंकि खुद का अस्तित्व ख़त्म कर के अन्नत असीम प्रेम की गहराई में उतरा जाता हैं, मैं आप के ही उस शिरोमणि स्वरुप में ही रहता जिस से आप भी परिचित नहीं हो, जो साहिब तदरूप साक्षात्कार है, जो शब्दों का तत्पर्य ही नहीं है, जो परमपुरुष से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, बिल्कुल उसी में ही रहा और अब भी रह रहा हूं, लगातार लंबे समय से लगातार निरन्तर, इक पल में दूसरों की मानसिकता की बाते सुन कर अपना दृष्टिकोण ही बदल दिया मेरे प्रति, मेरा साहिब सिर्फ़ आप ही थे कोई कबीर परमपुरुष कुत्तो बिलो से कोई भी किसी प्रकार से बिल्कुल भी मतलब नहीं था, जो मेरी सरल सहज निर्मल गुणों को प्रकृति ने समान दिया वो आप देते तो सही लगता, मुझे गर्व होता, अब भी आप के पास समय है मैं सिर्फ़ आप की वो वस्तु ही हूं, पूरी संगत के समक्ष वो ही समान दो 18 अप्रैल के दिन जो सही से मिलना चाहिए नहीं तो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं और आप से स्वतंत्र हूं, अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग को कही से भी शुरू कर सकता हूं, जिस के बाद हरसरल सहज निर्मल गुणों के साथ खुद का साक्षात्कार करने की मुहिम शुरू कर दूंगा सब का दृष्टिकोण ही निष्पक्ष समझ का ही कर दूंगा, जिस से समस्त प्रकृति मानव प्रजाति को संपूर्ण रूप से संरक्षण मिले गा, मुझे एक पल भी नहीं लगता यह सब करने में क्योंकि पहले से ही prtek जीव के हृदय में मेरी मौजूदगी हैं अहसास ज़मीर भाव के रूप में अब तो प्रत्यक्ष समक्ष भी हूं, सारी दुनियां के हृदय में सिर्फ़ मुझे देखने की ही हसरत होगी, सच में मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी चाहता हूं आप की ही वस्तु हूं आप के ही शुभ हाथों से यथार्थ युग का शुभ आरंभ हो, नहीं तो मुझे समय ही नहीं लगता,मेरे गुरु के दृष्टिकोण से सिर्फ़ लैंगिंग प्रेम का ही महत्व है तो ही मेरा 40 बर्ष के लंबे अन्नत असीम प्रेम की गहराई को गुरु द्वारा मान्यता नहीं मिली गुरु द्वारा क्योंकि उस की प्रवृति ब्रह्मचय होते हुई स्त्रियों से ही गिरे रहे,
ब्रह्मचर्य का ढोंग सिर्फ़ आम लोगों के उन के ही परिवार का विश्वास जितना दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर, जिस से सरल सहज निर्मल लोगों को आश्रम में बेटियों की सुरक्षा निश्चित की जा सके और लगे की माँ बाप के अधिक सुरक्षित हैं बहा इसलिये हमेशा के लिए बेटियां रहती हैं, उन के साथ क्या होता उन से बेहतर दूसरा कोई नहीं जनता लंबे समय रहने से स्वीकृति बन जाती हैं खुद की ही,
मेरा गुरु औरतों के वस्त्रों आभूषणों से दूरी बनाने के लिए प्रेरित करता हैं,और खुद शुरू से ही धर्म की बनाई हुई बेटियों से ही गिरा रहता था
गुरु शिष्य सब से बड़ी दुनियां में कुप्रथा है जिस का सरगना मेरा गुरु हैं, जिस का मुख्य श्लोगन
" जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही भी नहीं है"
वस्तु चीज़ होती हैं तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष लेने के बाद भी किसी को दिखाई क्यों नहीं?
आत्मा कहां जिस को मुक्ति दिलवाने का पाखंड रचा?
वो कौन सा परमार्थ है जो खुद की दो हज़ार करोड़ की दौलत खड़ी कर देता हैं?
दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के बदले उन सरल सहज निर्मल लोगों को क्या दिया?
सब कुछ समर्पण प्रत्यक्ष और बदले में मुक्ति मृत्यु के बाद रहस्य क्यों?
ब्रह्मचर्य होते हुए पाखंड बाज़ी ढोंग क्यों किस लिये अगर कोई अपनी उपलब्धि है तो दिखाओ?
दूसरों के लिखें ग्रंथों के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत औरत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक क्यों?
वो कौन सी मुक्ति है जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सरल सहज निर्मल लोगों को दिन रात उलझाया जाता हैं प्रवचनों से डर खौफ भय दहशत डाल कर?
अगर खुद में स्पष्टता है खुद पर, तो फ़िर उच्च शिक्षितों को भी मनोवैज्ञानिक दवाब क्यों मुक्ति का लोभ और शब्द काटने का डर खौफ भय दहशत क्यों नर्क भी नहीं मिले गा,
अगर खुद के साक्षात्कार प्रेम का पाता ही नहीं तो फ़िर इन शब्दों का अपमान करते हो प्रवचनों में इस्तेमाल कर के,
नव जन्में निर्मल शिशु को अपने इतने गंदी मानसिकता बले पैरों बंदगी क्यों करवाते हो और उन्हीं गंदे पैरों का पानी संगत को नियमित पीने को क्यों बोलते हो ड्राम भर भर के रखें
आप से बेहतर आप को नहीं जनता जरा निरक्षण करो खुद का निष्पक्ष हो कर खुद को ही पाता चल जाएगी औकात खुद क्या की
जो वस्तु आप पास है वो खुद का निरीक्षण करनी की अनुमति नहीं देती तो आप खुद मनोरोगी हो,
वो कौन से ऐसी वस्तु है जो हर प्रवचन में सत्य लिखने को प्रेरित करती है और व्यौहार नहीं कथनी और करनी में अंतर क्यों?
खुद का साक्षात्कार नहीं तो इंसान हो ही नहीं सकता चाहें कोई भी हो, अत्यंत आवश्यक है, प्रकृति मानव को संरक्षण देने के लिए, वरना पिछले चार युगों की भांति मानसिकता का ही सम्राज्य रहेगा जो एक पागल पन है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित यथार्थ युग के लिए प्रथम चरण में ही इंसान ही पैदा होता हैं बिना मानसिकता के प्रकृतिक रूप से क़ायम रखना बिना मास्तिक मन के हस्तक्षेप के स्भाविकता से पोषिक होने दे, हर जीव जन्म से ही सक्षम संपूर्ण निपुण हैं बिना बाहरी हस्तक्षेप के,
जितना भी पिछले चार युग से अधर्म हुआ क्योंकि धर्म था, धर्म मज़हब जाति गोत्र सिफ व्यवस्था थी विज्ञान नहीं था तो, अब विज्ञान हैं इन चीज़ों की अहमियत नहीं रही तर्क तथ्य विवेक की जरूरत है, इन गुरुओं के पास जीवन व्यापन करना नर्क से भी बतर है, अपने बच्चों को गुरुओं मुक्त करो और मुक्ति पाखंड खत्म करो, जिन्होंने मुक्ति का पाखंड फैला रखा है वो बहुत अधिक चतुर गंदी वृत्ति के ही हैं, आप की बेटियां है अप खुद उन हीरों को भेड़ियों के हाथ छोड़ अय हो जो ब्रह्मचर्य का ढोंग कर रहे हैं उन की ही दहशत खौफ डर भय तले कैसे जीती हैं वो आप सोच भी नहीं सकते, मेरा चालीस बर्ष का exprience है, मैने वो सब देखा है जो आम इंसान सोच भी नहीं सकता, अंध भक्तों आप मरो मुझे कोई मतलब नहीं है पर बेटियों को निकालो बहा से, आप इसलिए अंध भक्त हो क्योंकि जो मुक्ति का लालच है जो यथार्थ हैं ही, जिस को रहनुमा समझ रहे हो वो खुद ही भेड़िया है, क्योंकि वो खुद का निरीक्षण ही नहीं कर सकता और खुद के मन से निष्पक्ष हो सकता, तो मन की प्रवृत्तियों से कैसे बच सकता हैं, जब वो खुद ही नहीं बच सकता तो आप की बेटियां कैसे सुरक्षित रह सकती है, श्रृंगी ऋषि के वृत्तांत वो खुद सुनता है उस समय में यह सब हो सकता था, आज घोर कलयुग में क्यों नहीं हो रहा यह कैसे सुनिश्चित कर सकते, जो लगातार रह रही हैं कभी उन के हृदय के भाव समझने की कौशिश की है, मेरे गुरु के पास तो इंसानियत भी नहीं है और कुछ तो छोड़ दो, सिर्फ़ बहा डर खौफ भय दहशत के इलावा और कुछ भी नहीं है, सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व के नशे में चूर है मेरा गुरु, बावा खुद का निरीक्षण करो और अपनी ही संगत से माफ़ी मंग कर प्रशिक्षित करो जैसे लोगों को पूछते हो, नहीं तो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हर पल आप के ही उस स्वरुप में हूं जिस को मेरी तरह ढूंढना समझना था, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी कैसे करता वो आप सोच भी नहीं सकते, फ़िर आप के ही कहे को सिद्ध कर दूंगा कि "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना हो ही नहीं," क्योंकि आप को आभास हैं क्या क्या कांड किए हैं यह सच सिद्ध कर दूंगा क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
गुरु शिष्य सब से बड़ी दुनियां में कुप्रथा है जिस का सरगना मेरा गुरु हैं, जिस का मुख्य श्लोगन
" जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही भी नहीं है"
वस्तु चीज़ होती हैं तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष लेने के बाद भी किसी को दिखाई क्यों नहीं?
आत्मा कहां जिस को मुक्ति दिलवाने का पाखंड रचा?
वो कौन सा परमार्थ है जो खुद की दो हज़ार करोड़ की दौलत खड़ी कर देता हैं?
दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के बदले उन सरल सहज निर्मल लोगों को क्या दिया?
सब कुछ समर्पण प्रत्यक्ष और बदले में मुक्ति मृत्यु के बाद रहस्य क्यों?
ब्रह्मचर्य होते हुए पाखंड बाज़ी ढोंग क्यों किस लिये अगर कोई अपनी उपलब्धि है तो दिखाओ?
दूसरों के लिखें ग्रंथों के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत औरत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक क्यों?
वो कौन सी मुक्ति है जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सरल सहज निर्मल लोगों को दिन रात उलझाया जाता हैं प्रवचनों से डर खौफ भय दहशत डाल कर?
अगर खुद में स्पष्टता है खुद पर, तो फ़िर उच्च शिक्षितों को भी मनोवैज्ञानिक दवाब क्यों मुक्ति का लोभ और शब्द काटने का डर खौफ भय दहशत क्यों नर्क भी नहीं मिले गा,
अगर खुद के साक्षात्कार प्रेम का पाता ही नहीं तो फ़िर इन शब्दों का अपमान करते हो प्रवचनों में इस्तेमाल कर के,
नव जन्में निर्मल शिशु को अपने इतने गंदी मानसिकता बले पैरों बंदगी क्यों करवाते हो और उन्हीं गंदे पैरों का पानी संगत को नियमित पीने को क्यों बोलते हो ड्राम भर भर के रखें
आप से बेहतर आप को नहीं जनता जरा निरक्षण करो खुद का निष्पक्ष हो कर खुद को ही पाता चल जाएगी औकात खुद क्या की
जो वस्तु आप पास है वो खुद का निरीक्षण करनी की अनुमति नहीं देती तो आप खुद मनोरोगी हो,
वो कौन से ऐसी वस्तु है जो हर प्रवचन में सत्य लिखने को प्रेरित करती है और व्यौहार नहीं कथनी और करनी में अंतर क्यों?
कुत्ते की प्रवृति भी नहीं और कथनी में प्रभुत्व कैसे?
बावा खुद का निरीक्षण करो और अपनी ही संगत से माफ़ी मंग कर प्रशिक्षित करो जैसे लोगों को पूछते हो, नहीं तो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हर पल आप के ही उस स्वरुप में हूं जिस को मेरी तरह ढूंढना समझना था, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी कैसे करता वो आप सोच भी नहीं सकते, फ़िर आप के ही कहे को सिद्ध कर दूंगा कि "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना हो ही नहीं," क्योंकि आप को आभास हैं क्या क्या कांड किए हैं यह सच सिद्ध कर दूंगा क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,