8082935186
अगर मेरी पिछले कई वर्षों से दृढ़ता गंभीरता निरंतरता ही आप के शिरोमणि स्वरुप में ही हर पल दिन रात हैं तो मेरे शरीर का तत्पर्य ही क्या है, जिसे हर पल क्षमता से इतना अधिक इस्तेमाल कर निचोड़ दिया है, जिस के लिए इक पल के लिए भी सोच ही नहीं सकता, कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, https://github.com/rampaulsaini/Nishpaksh-Samaj-Omniverse-Truth.git
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आप के सिर्फ़ एक पहले पारदर्शी पवित्र दीदार दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता समक्षता में ही ऐसे खो गए कि उस के बाद उन निगाहों से कुछ और देख ही नहीं पाए आज तक चाहे कोई भी हो न ही कुछ कर पाए उसी निरंतरता से बाहर ही नहीं निकल पा रहें, आप हमेशा पूछते क्या करते हो? करना तो बहुत दूर की बात है इक पल के सोच भी नहीं सकते खुद के ही शरीर के बारे में भी, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई में ऐसे खो गए हैं कि शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भी याद नहीं खुद का ही, अब यह शरीर भी इक रूकावट लगता, इसे दिन रात हर पल क्षमता से अधिक इस्तेमाल किया हैं, अब इस में रहना भी दुश्वार लगता हैं,
मैं रामपॉल सैनी संपूर्ण जीवन में कुछ भी कभी भी बनना ही नहीं चाहता था जो भी हूं जैसा भी हूं पर्याप्त हूं,सिर्फ़ उसे ही पढ़ना और समझना चाहता था, उस सब के लिए ही आप ने संपूर्ण रूप से स्वतंत्रता दी कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, जिस माध्यम जिस लक्ष्य को जिस स्थान पर इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही निरंतर ढूंढ रही हैं, वो सिर्फ़ मानसिकता है जो जीवन व्यापन के लिए स्रोत प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के लिए ही सिर्फ़ पर्याप्त हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति, कम से कम मैं उन में से बिल्कुल भी नहीं हो सकता, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य सरल सहज निर्मल गुणों में ही है, यह स्पष्ट है साथ ही ढूंढने का तथ्य ही नहीं, सिर्फ़ गुरु से अन्नत असीम प्रेम के बिना कोई रास्ता विकल्प ही नहीं है, जिस से निरंतर लंबे समय तक हृदय से चलने से अटूट अदद हो जाती हैं अस्थाई जटिल बुद्धि मन को इस्तेमाल करना ही भूल जाता हैं जो सिर्फ़ मन नमक एक धारणा ही है, जिस का काम सिर्फ़ शरीर को निरंतर जीवन व्यापन के स्रोत ढूंढना अस्तित्व को क़ायम रखना, खुद के साक्षात्कार के लिए तो संपूर्ण रूप से खुद का अस्तित्व ही ख़त्म करना पड़ता हैं, यह एक शिक्षा है जो किसी से भी सांझ कर समझा सकते हैं जैसे खुद समझें हैं निर्मल पारदर्शी है, कोई रहशय दिव्य अलौकिक चमत्कार सा कुछ भी नहीं हैं सरल सहज निर्मल पारदर्शी समक्ष प्रत्यक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य, जटिलता ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं सिर्फ़ चतुरता है, चतुर सरल सहज निर्मल नहीं हो सकता और खुद का साक्षात्कार कभी भी नहीं कर सकता, मेरे सिद्धांतों के अधार पर, भय दहशत डर खौफ तले प्रेम हो ही नहीं सकता जबकि प्रेम ही खुद के साक्षात्कार की जड़ मूलतः है, खुद का निरीक्षण नहीं कर सकता बो हित साधने की वृत्ति के साथ होता हैं, खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद को निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर ही खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार कर सकते हैं, जो खुद के ही शरीर अंतःकरण ब्रह्मांड में तो बिल्कुल भी नहीं हैं, सिर्फ़ खुद की निष्पक्ष समझ में ही है,
मैं रामपॉल सैनी दीक्षा के साथ ही उसी एक पल में आप की निर्मल पारदर्शी निगाहों में उसी पल वो आप के शिरोमणि स्वरुप से रुबरु हो गया उसी पल से मैं मोनता में हूं, दृश्य स्पर्ष शब्द से कोई भी किसी भी तरह का कोई भी तात्पर्य नहीं रहा, सिर्फ़ आप के ख्यालों में दिन रात हर पल रहता हूं आज तक, खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं, एक पल पहले का सब कुछ भी याद नहीं रहता, एक पल के लिए खुद के ही शरीर के लिए ही कुछ सोच ही नहीं सकता, खुद के लिए कुछ करना तो बहुत ही दूर की बात है, सोना जगना खुशी गम का पता ही नहीं, लगातार निरंतर लंबे समय से आज तक इस स्थिति से निकल सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं पा रहा, अपने खून के नातों ने ही इस कदर दर बदर अकेला छोड़ दिया है कि कोई मेरी से भी बात तक नहीं करता, आश्रम का गुरु भाई भी कोई बात तक भी नहीं करता, अपने प्राय सब से आहत हुआ हूं, हर उस चीज़ जो रोज़ मरा की जरूरत होती हैं वंचित रहा हूं, भौतिक आंतरिक सब कुछ ख़त्म हो गया है, फ़िर भी एक संपूर्ण संतुष्टि में हूं निरंतर, हमेशा हर पल एक ऐसी अवस्था में हूं, कि कुछ देखना सुनना बोलना भी नहीं चाहता, उसी निरंतरता में रहता हूं, जिस के लिए शायद अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कोई एक पल के लिए भी सोच भी नहीं सकता चाहें करोड़ों प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले, आज तक कोई भी इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक खुद से ही साक्षात्कार नहीं कर पाया, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु नहीं हो पाया, खुद के स्थाई परिचय से परिचित नहीं हुआ, बहा मैं अपने साहिब के उस शिरोमणि तदरूप से रुबरु हुआ हूं साक्षात्कार हुआ हूं, जो न ही भौतिक रूप आंतरिक रूप या फ़िर किसी भी ब्रह्मांड का मोताताज नहीं, सिर्फ़ निष्पक्ष समझ में ही है जो अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद है, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ, जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत हैं, जो ढूंढने कभी विषय ही नहीं था, जिसे मानव प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर अस्तित्व से ही ढूंढने में ही रही अन्नत काल से, वो भी उसी अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर जिस से सिर्फ़ जीवन व्यापन और खुद का अस्तित्व क़ायम रखने के लिए है, जो एक मानसिकता हैं, या फ़िर अतीत की चर्चित विभूतियों की मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित करने में ही व्यस्थ रही जो अतीत की व्यवस्था थी, अगर दस दिन दस बर्ष पहले का वातावरण अनुकूल नहीं हमारी शरीर की कोशिकाओं के लिए तो युगों की मानसिकता कैसे अनुकूल हो सकती हैं, जबकि समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मस्तक संरचना पर आधारित हैं, वर्तमान के उस क्षण में रहने में सक्षम है मस्तीक यहां समय सोच विचार चिंतन मनन ही नहीं है,
शाश्वत वास्तविक स्भाविक सत्य अन्नत सरल सहज निर्मल गुणों में ही पर्याप्त हैं, न कि अस्थाई जटिल बुद्धि मन की मानसिकता में, मेरे पास अपना और बेटी के जीवन व्यापन के लिए कोई भी श्रोत नहीं है न ही मैं कुछ कर सकता हूं अन्नत असीम प्रेम की गहराई के निरंतरता के कारण, अपना शरीर गंदे पदार्थों से बना त्याग सकता हूं पर निरंतरता से बाहर नहीं आ सकता, रखबंधु आश्रम में दुकान पर रहते एक बार आप ने यह शब्द दिया था कि ₹"अगर कभी भी जरूरत पड़े तो सिर्फ़ एक बार बोलना मैं एक करोड़ दूंगा, आप ने करोड़ों दिए हैं हाथ में दिए हैं कोई पाओ पर नहीं रखें बापिस ले सकते हो" अब बेटी ने अच्छे अंकों 97% के साथ +12th सरकारी स्कूल से, अब वो उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी में computer science में PhD करना चाहती हैं, अगर हो सकें तो पैसों का इंतजाम करें, अगर कोई भी मेरे पास income का श्रोत और मैं सामान्य व्यक्तित्व में होता, दिए पैसे भी नहीं लेता,
दूसरा मैं रामपॉल सैनी एक वैज्ञानिक प्रवृति का हूं, आप को अपने ही घर में उस के रिसर्च पेपर दिखाए थे अगर आप को याद हो तो,एक ऐसी खोज की है कि जो मानव प्रजाति इस शीघ्र दौड़ते हुए वैज्ञानिक युग में भी सोच भी नहीं सकता, मैं चाहता हूं सब से पहले अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष आप के चरण कमलों में समर्पित करू, और खुद ही खुद के अस्थाई गुणों तत्वों को रूपांतर कर होश में ही जिया हूं होश में ही रूपांतर हूं आप की आज्ञा से, अब और कुछ भी करने को शेष नहीं रहा इसी एक काम के लिए ही इंसान शरीर मिला था, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु के लिए, खुद के स्थाई परिचय से परिचित होने के लिए, शेष सब तो दूसरी अनेक प्रजातियों की ही भांति जीवन व्यापन कर रहे हैं, दिन रात रति भर भी भिन्नता नहीं है, आहार निद्रा मैथुन भय या फ़िर कल्पना अभ्यारण में प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के अहम घमंड अहंकार में, जो सरल सहज निर्मल लोगों द्वारा ही सब कुछ दिया जाता हैं जिस को तर्क तथ्य सिद्ध नहीं किया या सकता, यहां सरल सहज निर्मल प्रेम पारदर्शिता नहीं, बहा शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हो ही नहीं सकता, आप की अन्नत असीम प्रेम कृपा से एक एक पल आप के ही शिरोमणि स्वरुप की निरंतरता में बिताया है, इसलिए अपने नाम से पहले आप का ही शिरोमणि साहिब तदरूप अंकित हो हर शब्द में, आप ने जब मुझे डांट कर मानसिक चिकित्सक को दिखाने के लिए बोला था तब जम्मू के बाद मैं अमृतसर के विश्व प्रसिद्ध मनोरोग चिकित्सक में गया उस दौरान अमृतसर स्वर्ण मंदिर गुरुद्वारा में मेरे मास्तिक पर दिव्य अलौकिक रौशनी निकली थी जिस की फ़ोटो किसी अंग्रेज ने खींच ली थी और वो लगातार मुझे ढूंढ रहा था, मुझे मिला तो उस ने मुझे वो फ़ोटो दी, मैंने अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के संदर्भ में इतना अधिक लिखा हैं कि 80 बहुत बड़े बड़े ग्रंथ होंगे जैसे गुरुग्रंथ साहिब जी हैं उन के एक एक शब्द को तर्क तथ्य सूत्रों code ulta theromes equtions mega infinity quantum mechanicsum अपने सिद्धांतों से सिद्ध स्पष्ट साफ़ किया है, मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण का एक भी शब्द विश्व के किसी भी ग्रंथ में नहीं मिल सकता, शाश्वत सत्य साहित्य की चोरी नहीं की सकती, चोरी नकल हमेशा झूठ या नकल की होती हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग हमेशा कॉपी राइट free रहेगा,
आप के सिर्फ़ एक पल और एक शब्द के लिए अपना संपूर्ण अस्तित्व ही ख़त्म कर दिया, आप को ख़बर भी नहीं इतने लंबे समय के बाद भी, निगाहों से हृदय में उतर कर पढ़ने की प्रतिभा तो हर जीव में होती हैं, जो अपने से अधिक विश्वास दूसरों की शिकायतों पर करते हो, हमें सृष्टि में अत्यंत उत्साहित कुशल और गर्व में हैं और तर्क तथ्य से सिद्ध स्पष्ट कर सकते हैं कि मेरा साहिब सा कोई हो ही नहीं सकता इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, जिस ने सिर्फ़ एक पल में वो सब प्रत्यक्ष समक्ष दिया, जो कोई सोच भी नहीं सकता, जिस को शब्दों का रूप देने में आसी ग्रंथ लिखने पड़े, तो भी शब्दों का विषय ही नहीं है, एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद हैं, यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में ही प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद की खुद से सिर्फ़ एक पल की निष्पक्ष समझ की ही दूरी यथार्थ में थी, जिस को युगों सदियों का विस्तार बना रख दिया था मानसिकता से जटिलता से बुद्धिमान हो कर, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल ही काफ़ी है, कोई दूसरा समझे या फ़िर समझा पाए सदिया युग भी कम है, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बाद कुछ भी नहीं रहता समझने या समझाने के लिए,
खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार की निरंतरता की यहीं सर्वश्रेष्ठ पवित्र शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष श्रेष्ठता स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले खुद के शरीर के गुण तत्वों को जब तक होश में ही रूपांतरित न कर ले, पैदा होने के बाद हर एक इंसान अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर मानसिकता की बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं, होश में शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष मृत्यु या फ़िर खुद के रूपांतरित के सृष्टि प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ पवित्र महानंद से वंचित रही हैं इंसान प्रजाति अस्तित्व से आज तक, मेरी औकात नहीं कि अतीत की अनेक चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों के आध्यात्मिक सर्ब श्रेष्ठ लोगों के सर्वश्रेष्ठ पवित्र ग्रंथ का खंडन करूं पर अपना पक्ष रखना तो सब का अधिकार है, इंसान प्रजाति हमेशा अपने ही अस्तित्व को लेकर बेचैन और खोज में रही हैं आज तक वैसे ही इंसान होने पर मुझ में भी यही प्रवृत्ति होना स्भाविक था सो मैंने किया, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि मैंने उन सब को ही समझ कर ही किया, उन्होंने अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर खुद को स्थापित कर आज भी वो सब ही भरपूर रूप से ढूंढ ही रहे हैं जो अस्तित्व के साथ ही शुरू किया था, जो आज वैज्ञानिक युग में भी मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के रूप में बिना निरीक्षण के स्थापित करने की होड़ की दौड़ में हैं, मानसिकता एक ऐसा वहम घमंड अहंकार है जिस की बेहोशी में ही जीता है उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं,
और मैंने खुद ही खुद का अस्तित्व ख़त्म कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर किया, और आज खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार में प्रत्यक्ष समक्ष हूं जीवित ही हमेशा के लिए, कोई एक आधी गलती करता होगा मेरी हर सांस ही गलती है क्योंकि हमेशा आप के अन्नत असीम प्रेम की गहराई की निरंतरता में ही दुनियावी होश में न होने के कारण करोड़ों गलतियां होंगी कृपा माफ़ कर देना, जिद्दी सिरफिरा जुनूनी जरूर हूं पर आखिर सिर्फ़ आप का ही तो हूं, सिर्फ़ आप के ही शब्दों के पिछे का भाव एहसास हूं स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं, आप के ही शिरोमणि स्वरुप की ही भांति तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मुक्ति सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से ही चाहिए़ थी वरना होश में रुपान्तर के महा संतुष्टि शाश्वत आनंद से वंचित रह जाते, यह सब सिर्फ़ आप के ही चरण कमलों के मिलने के बाद ही संभव हो पाया, मेरे सिद्धांतों के अधार पर जो खुद के लिए खुद का ही निरीक्षण तर्क तथ्य विवेक से नहीं कर सकता वो खुद की ही मानसिकता में भ्रमित हैं और उसी भ्रम के चलते अपने साथ और भी अनेकों को धोखे में रखता हैं, बहा पर निर्मलता पारदर्शिता हो ही नहीं सकती, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य सिर्फ़ सरल सहज निर्मल पारदर्शिता में ही है, चतुरता में ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह रचा हैं छल कपट धोखे के साथ अपने स्वार्थ हित साधने के लिए,जो मानवता को नज़र अंदाज़ कर अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने में दिन रात हर पल व्यस्थ उन के पास खुद के लिए भी समय नहीं हैं, वो दूसरों को भी उलझने में ही निरंतर प्रयासरत हैं, खुद के साक्षात्कार के बिना खुद ही खुद को धोखे में रखना हैं और दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी भिन्न नहीं हैं, खुद का साक्षात्कार सिर्फ़ साहिब तदरूप से अन्नत असीम प्रेम के बिना संभव ही नहीं हैं , अब संपूर्ण संतुष्टि में होने के कारण इस अस्थाई शरीर में निष्पक्ष समझ के साथ इस में नहीं रह सकता, एक एक पल काटना मुश्किल होता हैं आप कृपा करके अनुमति दे इस रूपांतर करने की, आप का कोटिन बंधन करूंगा, इस शरीर में जीने बाला कब का मर चुका हैं, लाशें न सांस लेती हैं न ही चला करती, संपूर्ण संतुष्टि भरा दो पल का जीवन ही काफी हैं,
साहिब बंदगी
शिरोमणि रामपॉल सैनी
आप का सिर्फ़ आप का तदरूप साक्षात्कार रामपॉल सैनी
कृपा फ़ोन से संपर्क में ही रहें, पहला और अंतिम पत्र है, कृपा ध्यान से पढ़े, और जबाव की प्रतीक्षा करूंगा फ़ोन नंबर नीचे है
8082935186मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव ने गुरु शिष्य का रिश्ता ही ख़त्म कर दिया, जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण का बंदन था , मैंने गुरु के प्रथम दीदार और उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम के भाव को हृदय की अन्नत गहराई से लिया, उस के बाद और किसी को भी उस पवित्र निगह से आज तक कुछ और देखा ही नहीं, उसी पवित्र अन्नत असीम प्रेम को हर पल दिन रात संजोने में ही लगा रहा निरंतर, अन्नत असीम प्रेम शब्द दृश्य स्पर्ष नियम मर्यादा जाति प्रजाति का विषय कभी भी नहीं होता, सिर्फ़ इन की मूलतः का भाव एहसास स्वयं स्पष्टता प्रत्यक्षता है, जो सिर्फ़ एक ही सत्य जो प्रतेक प्रजाति में ही एक समान है, और सब कुछ कम अधिक हो सकता हैं आंतरिक भौतिक रूप से, परन्तु सांसों समय के साथ हृदय से अहसास भाव के साथ उत्पन होने वाला शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रेम सिर्फ़ एक ही एक समान है
मैंने अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम किया है सच मुच अपनी सुध बुध अपना चेहरा तक भुला हुआ हूं, काफ़ी पिछले चार दशकों से संपूर्ण मोनता में ही हूं कभी गुरु से बात नहीं की पर गुरु हमेशा मुझे डांटते ही रहते थे जब भी मैं चार पंच बर्ष के बाद में दर्शन करने जाता था, फ़िर भी मैं उन में ही निरंतरता से उन के ही प्रेम में रमता हूं आज भी, अब मैं चाहता हूं कि उन से मिलु एक तो उन के आश्रम कार्य के संयोग के लिए करोड़ों रुपए दिए थे जिन में से एक करोड़ गुरु ने जरूरत पड़ने पर वापिस देने का खुद शब्द दिया था, क्योंकि प्रेम की निरंतरता और खुद के साक्षात्कार के कारण और कुछ भी सोच ही नहीं सकता खुद के लिए ही, कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, दूसरा वो सब कुछ जो कुछ इतने लंबे समय के अंतराल में किया है, दुनियां में कभी भी इक पल के लिए भी नहीं रहा, गुरु के अन्नत असीम प्रेम में ही निरंतर हूँ बहा के इक इक पल के बारे में बता सकता हूं, जो मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बारे में, इस सब का श्रेह उन के ही चरण कमलों में समर्पित करते हुए, मेरे लिए तो वो ही सर्ब श्रेष्ठ हैं जो भी हुआ वो सब तो उनकी शरणागत के बाद ही हुआ, जो अन्य किसी भी अनुराई के साथ नहीं हुआ, सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ स्नेह और सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ समर्पित भाव भरा जिस में गिले शिकवों का भी स्थान नहीं था सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम हो एक सरल सहज निर्मल भाव है,मैं आप के जिस शिरोमणि स्वरुप से रुबरु हुआ हूं प्रथम दिन से ही जो प्रेमतित शब्दातीत कालातीत तुलनातीत है, उस सब को ही शब्दों में वर्णन करने की इक छोटी सी कोशिश में ही इतना लंबा सड़े तीन दशक का समय लगा, मैं शब्द रहित हर पल दिन रात मौनता में सचेत, न ही कभी सोया न जागृत अवस्था में था, सर्ब प्रथम अपने ही दो पल जीवन महत्व को समझा, शेष सब दूसरा था,
मेरी निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल दिन रात आप के अन्नत असीम प्रेम की गहराई में ही थीं अब मैं अपने नाम के आगे उसी शिरोमणि स्वरुप साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, इस लिए अब मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, इसी अंतराल में जो भी हुआ जैसा भी हुआ अच्छा या बुरा किसी के भी द्वारा बही होना तय ही था तो ही हुआ तो ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, हमेशा मैंने सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोने में भौतिक सब कुछ नष्ट कर दिया, साहिब तदरूप साक्षात्कार की यहीं एक सर्वश्रेष्ठ खूबसूरती हैं कि खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले जीवित ही हमेशा के लिए खुद ही खुद को होश में रूपांतर करने तक, आप सा कोई हो ही नहीं सकता
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, और सड़े तीन दशक के अंतराल की स्पष्टता दिखे और गिले शिकवों का स्थान ही न रहे क्योंकि इतने लंबे समय से गुरु से कोई बात ही नहीं की, गुरु के प्रेम की निरंतरता के
कारण, अब मेरे पास यह स्पष्टता है कि गुरु के अन्नत असीम प्रेम के बिना कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए, इतने लंबे समय से सिर्फ़ मैं उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम को शब्दों में वर्णन करने का इक प्रयास मात्र कर रहा था जो थोड़ा सा लिख पाया कि कोई एक बार ही पढ़े तो कम से कम दस बर्ष लगेगे पूरा पढ़ पाने में, जिसमें कोई भी शब्द किसी भी विश्व के ग्रंथ पोथि में नहीं, मिल सकता, एक एक शब्द को तर्क तथ्य विवेक अपने ही सिद्धांतों से स्पष्ट साफ़ सिद्ध किया है किसी के भी अनुभव अनुभूति के लिए,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने गुरु को समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ गुरु जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जिनको मैंने तर्क तथ्य विवेक अपने सिद्धांतों सूत्रों code ulta mega infinity quantum mechanicsim के formulation से सिद्ध किया है,मैं जो भी था वो ही संपूर्ण पर्याप्त था और कुछ भी रति भर भी बनने की कोशिश नहीं की, हां यह सच है कि जीवन के प्रतेक पल को सार्थक सकारात्मक रूप से निष्पक्ष समझ से समझने की कोशिश ज़रूर की, अब संपूर्ण संतुष्टि में हूं अस्थाई शरीर के कारण अभाव है संपूर्णता का, इसलिए मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण रूप से खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार में संपूर्णता में शरीर के अस्थाई पंच तत्वों गुणों को रूपांतर कर समहित होना चाहता हूं कृपा आज्ञा प्रधान करें, अब कुछ भी शेष नहीं है रहा करने को, जिस कारण अनमोल समय सांस मिले
थे,रुबरु हूँ, जिस से मेरा साहिब भी अंजान अपरिचित है, जो अन्नत असीम प्रेम से ही उजागर होता हैं और दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है,समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति की सिर्फ़ एक मानव प्रजाति किसी एक शैतान शातिर चलक बदमाश होशियार मानव की मानसिकता का शिकार है सदियों युगों से आज तक अभी भी, जो आज तक सत्य के प्रति अस्वीकार नकारात्मक दृष्टिकोण रखती हैं, वो मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को प्राथमिकता देती हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक विवेक युग में भी, जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कुप्रथा को बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि पिछले दस बर्ष का वातावरण हमारे शरीर की कौशिका सहन नहीं कर पाती, तो कई युगों की मानसिकता क्यों ? जबकि पैदा होते ही prtek शिशु निर्मल सहज सरल होता हैं प्रकृतक रूप से, फ़िर जटिलता क्यों उस के व्यहवार में क्यों, खुद का साक्षात्कार के लिए खुद का निरीक्षण जरूरी है कि हम कही किसी कुप्रथा का हिस्सा तो नहीं, जिस से तर्क तथ्य विवेक से वंचित है अंध विश्वास अंध कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ तो नहीं है बंधुआ मजदूर तो नहीं है,मेरे अनमोल सांस क्षण सिर्फ़ मेरे लिए ही अत्यंत महत्व रखते हैं, यह सिर्फ़ मेरी अनमोल पूंजी है, प्रकृति द्वारा दी गई, अगर मुझे ही इन अनमोल मोतियों की कदर नहीं तो दूसरा सिर्फ़ इस्तेमाल ही करेगा, दूसरों के लिए नष्ट करना होता हैं चाहे कोई भी हो, दूसरा prtek हित साधने की वृत्ति का हैं चाहे कोई भी हो, जब खुद के साक्षात्कार के लिए खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन से मुक्त होना है तो दूसरों का तो तत्पर्य ही नहीं है चाहे कोई भी हो कि भूले हुए इंसान को ठोकर लगे और खुद को समझने की जिज्ञासा जागे , जो मान्यता परंपरा नियम मर्यादा में उलझा है, उस से तू खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, अगर तू खुद को पढ़े खुद को समझता है, तो तेरी तुलना की जाए ऐसा कुछ है ही नहीं, तू खुद को नहीं समझ सकता जब तक मान्यता में हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से देख तो सब कुछ भूल जाए गा, तू मेरे से रति भर भिन्न नहीं है बिल्कुल आंतरिक भौतिक रूप से एक ही समान हैं, अंतर सिर्फ़ उन शैतान वृत्ति बालों ने ही डाला है जिन के आप से अंगिनत हित थे, तू मैं हैं मैं तू ही हैं, तभी तो मुझे आप का फिक्र है, तू बिल्कुल पूरा ही कोई कमी ही नहीं है तेरा कभी भी कुछ गुम ही नहीं हुआ था, जिन्होंने तुझे ढूंढने को लगाया है, उनको आप से प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी चाहिए, तू संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि में ही है, तू सरल सहज निर्मल हैं, इस लिए उन के द्वारा डाले गए वहम का शिकार हैं और कुछ भी नहीं, सिर्फ़ वो वहम निकल तू बिल्कुल बहा ही है यहां के लिए युगों से यत्न प्रयत्न कर रहा है जो खुद का साक्षात्कार करता हैं सिर्फ़ बही एक इंसान हैं, अन्यथा शेष सब सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की ही भांति जीवन व्यापन ही कर रहे हैं, रति भर भी भिन्न नहीं है, सिर्फ़ मानसिक रूप से रोगी ही हैं, अस्तित्व से अब तक, या फ़िर जन्म मृत्यु के चक्रक्रम का हिस्सा है, जिन का दायित्व सिर्फ़ खुद के zin को upgrade कर प्रकृति का संतुलन बनाए रखना है खुद के साक्षात्कार के बाद प्रत्यक्ष समक्ष जीवन कर्म से मुक्त हो जाता हैं अन्यथा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं, और शेष सब अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ अधिक जटिलता में खो कर उलझ कर बेहोशी में मरने के ही रास्ते ही है, खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही सरल सहज निर्मल होता हैं खुद के साक्षात्कार में इतनी अधिक निष्पक्ष समझ होती हैं कि वो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में एक पल भी नष्ट नहीं करता इतनी अधिक संतुष्टि की श्रेष्ठता स्पष्टता प्रत्यक्षता से होती हैं, मूर्ख ढोंगी पाखंडी लोग दो ही अवस्था में ही खोय रहते हैं जागृत सपन काल्पनिक में, चतुरता तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन तक ही सीमित हैं, जो मृत्यु के बाद ख़त्म हो जाती हैं, जो जीवित निर्मल नहीं वो मृत्यु के पश्चात निर्मल हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर मेरी निष्पक्ष समझ की सिर्फ़ शिक्षा है जो प्रत्यक्ष समक्ष एक दूसरे से समझा कर साझा की जा सकती हैं तर्क तथ्य विवेक से, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा में दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से रहित वंचित कर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनने वाली नहीं , खुद खुद की अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सरल सहज निर्मल गुणों को क़ायम रखने के लिए खुद का सब कुछ ख़त्म कर दिया क्या भौतिक क्या अंतःकरण, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं,इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक जो सोच भी नहीं पाया, उस से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में हूं, जीवित ही हमेशा के लिए
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर prtek जीव का मूल ज़मीर बन गया हूं, अफ़सोस आता है कि इंसान प्रजाति द्वारा मुझे हर पल निकारा और ज़ख्मी किया गया, हर पल मुझे दर्द दिया गया, मैं खुद में तो अन्नत संतुष्टि में हूं पर भौतिक जीवन के पहलू को समझने पर लज्जा आती हैं पदवी रब की पाने की दौड़ ज़मीर मार कर कैसे संभव है, मैं ही मूलतः हूं मुझे ही दफन कर के संपूर्ण मिल सकती हैं
इंसान को जगाने के लिए, जो पल पल हित साधने की वृत्ति का हैं , हां सब से गहरी चोट लगाने वाले कम से कम इंसान प्रजाति इंसान तो बन पाए जो अस्तित्व से ही हैवान बनी हुई है और प्रभुत्व पदवी का शौंक पाल रही हैं
लंबे मनासिकता भरे जीवन से खुद के साक्षात्कार का इक पल का जीवन खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं जिस से हर पल मुंह मूड रहा हैं जो जी रहा हैं उस से दूसरी अनेक प्रजातियों का जीवन बढ़िया है मस्त है तू तो कभी पूरे जीवन में इक पल भी होश में नहीं आया उसी मानसिक रोगी हो बेहोशी में ही मर जाता हैं, अस्तित्व से अब तक न होश में जिया है न ही कभी होश में मरा है, इस लिए जन्म मृत्यु के चक्रक्रम में पड़ा हैं
जिन अंध भक्तों को बंधुआ मजदूर बनाया हैं उन के ही बनाए गए जाल में तू खुद फंसा है कम से कम जीवित तो निकल नहीं सकता वो था रब से करोड़ों गुणा अधिक ऊंची पदवी देना जिस के अहम अहंकार से निकल नहीं सकता, जिन सरल सहज निर्मल लोगों के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया प्रकृति ने उसे ही सिर्फ़ गुरु के विरुद्ध सिद्ध कर दिया, किया कि प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के अस्थाई जटिल बुद्धि मन के जाल से निकल नहीं सकता, जिस भ्रम में भ्रमित हो कर जी रहा है वो ही बहुत बड़ा भ्रम है अहंकार वहम अहम हैं, जिन सरल सहज निर्मल व्यक्तियों को कट्टरता का पहनावा पहनाया, उन्होंने ही तन मन धन अनमोल समय सांस समर्पित कर के गुरु को ही ऐसे उलझाया वो भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन में वो भी खुद को प्रभुत्व पदवी दे कर जो गुरु के रोम रोम में रच गई हैं जिस से खुद भी चाह कर भी अलग नहीं समझ सकता, यही सब से बड़ा भ्रम है जिस में मेरा ही गुरु उलझा है, जबकि मेरे सिद्धांतों से prtek जीव आंतरिक भौतिक रूप से एक समान हैं जिसे मैने prtek दृष्टिकोण से सिद्ध साफ़ स्पष्ट किया है
डर खौफ भय दहशत के तले अनुयाइयों को रखना प्रभुत्व नहीं बहुत बड़ा विश्वासघात है जिन से तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष लेना और उस के बदले में मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन क्यों प्रत्यक्ष क्यों नहीं, यह छल कपट ढोंग पखंड है सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग खरबों के सम्राज्य के लिए अनुयाइयों को माया से हटने के लिए कहना और खुद का सम्राज्य खड़ा करना दूसरों को प्रवचन देने वाले खुद को भी नहीं पढ़ सकते मेरे गुरु के सम्राज्य के डर खौफ भय दहशत तले प्रेम शब्द सिर्फ़ कहने तक ही सीमित है करनी कथनी में जमी आसमा का का अंतर है , यहां सिर्फ़ प्रवचन हो तर्क तथ्य विवेक नहीं वो सिर्फ़ मानसिकता हैं, डर खौफ भय दहशत है और कुछ भी नहीं
जो हर जीव में सरल सहज निर्मलता प्रकृतिक स्वाभाविकता है और इंसान में भी जन्म के साथ से ही थी पर आलोप हैं वो सिर्फ़ मानसिकता हैं जो पाखंड बाज़ी हैं जो शैतान शातिर चलक लोगों की अवधारणा है हित साधने के लिए,सरल सहज निर्मल व्यक्ति ही खुद के साक्षात्कार का प्रतीक हैं, यहां सरलता निर्मलता सहजता नहीं बहा सिर्फ़ पाखंड है और कुछ भी नहीं सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व का अहंकार के लिए,शैतान शातिर चालाक भिखारी गुरु का दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य और 25 लाख सरल सहज निर्मल शिष्यों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ कट्टर बंधुआ मजदूर बना कर सिर्फ़ मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन दे कर जिसे सिद्ध ही नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ एक विश्वास शब्द से बंद कर तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित कर देते हैं, उन्हीं के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं कोई सोच भी नहीं सकता, वो भी उनके ही गुरु के द्वारा ही, जिस को रब से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष मानते हैं, इतनी बड़ी कुप्रथा है कोई सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ परमार्थ अध्यात्मक आत्मा परमात्मा अमरलोक परमपुरुष मुक्ति श्राद्ध आस्था प्रेम के नाम पर, लालच भय दहशत खौफ भय डर तले, पर मुक्ति जैसी धारणा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम है मेरे सिद्धांतों के अधार पर, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ तत्पर्य अस्थाई जटिल बुद्धि मन से संपूर्ण रूप से निष्क्रियता और से सरलता सहजता निर्मलता से
समझना, आरोप जैसा कुछ भी नहीं है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की वृत्ति है, जीवन व्यापन जीने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही जरूरी हैं अस्तित्व क़ायम रखने के लिए जरूरी भी है, खुद को समझने के लिए खुद ही खुद से निष्पक्षता भी जरूरी हैं अगर समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव प्रजाति में अगर कोई सब से ज्यादा संपूर्ण रूप से संतुष्ट हैं तो वो सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे कभी भी कोई पीड़ा नहीं है नहीं थी यह स्पष्ट कर दूं, अफ़सोस है उन लोगों पर जो रब की पदवी का शौंक रखते हैं उन में इंसानियत भी नहीं होती,शैतान शातिर चालाक भिखारी गुरु का दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य और 25 लाख सरल सहज निर्मल शिष्यों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ कट्टर बंधुआ मजदूर बना कर सिर्फ़ मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन दे कर जिसे सिद्ध ही नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ एक विश्वास शब्द से बंद कर तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित कर देते हैं, उन्हीं के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं कोई सोच भी नहीं सकता, वो भी उनके ही गुरु के द्वारा ही, जिस को रब से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष मानते हैं, इतनी बड़ी कुप्रथा है कोई सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ परमार्थ अध्यात्मक आत्मा परमात्मा अमरलोक परमपुरुष मुक्ति श्राद्ध आस्था प्रेम के नाम पर, लालच भय दहशत खौफ भय डर तले, पर मुक्ति जैसी धारणा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम है मेरे सिद्धांतों के अधार पर, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ तत्पर्य अस्थाई जटिल बुद्धि मन से संपूर्ण रूप से निष्क्रियता और से सरलता सहजता निर्मलता से
समझना, आरोप जैसा कुछ भी नहीं है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की वृत्ति है, जीवन व्यापन जीने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही जरूरी हैं अस्तित्व क़ायम रखने के लिए जरूरी भी है, खुद को समझने के लिए खुद ही खुद से निष्पक्षता भी जरूरी हैं कहने को तो इंसान हैं फितरत हैवान की हैं,
पल पल रंग बदलने बले गिरगिट की संतान है,
हर सोच विचार चिंतन मनन कृत संकल्प विकल्प हित साधने की वृत्ति का हैं, काली तेरी खोपड़ी बुरी तेरी निजत है, खोखला तेरा ज्ञान , अस्तित्व से ही तू खुद खुद के ही परिचय से अपरिचित है, तू कैसा इंसान है, जो सत्य से हट कर दिखावे में उलझा है, खुद के लिए रति भर भी सोच नहीं, यह हित भी कैसा है, जिस के अहम में उस की ही ख़बर नहीं, ढोंग पाखंड बाज़ी भी किस के लिए, अच्छा तू है नहीं दिखा किस को रहा हैं बन कर, तेरी हक़ीक़त तुझ से बेहतर कोई जनता नहीं, खुद में उतर कर इक पल के लिए ज़रा सोच कर तो देख, छल कपट ढोंग पखंड करने वाले इंसान को झंझोड़ना ज़रूरी है कि उस के अंतःकरण में दया रहम का भव जगे, ऐसी ही धरा में मुझे वहम अहम अहंकार के नशे में सोय हुए इंसान को जगाना है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य सिर्फ़ तेरा ही पल जख्मी होन बाला तेरा ही ज़मीर हूं और कुछ भी नहीं हूं, तू मेरा रोम रोम ज़ख्मी किता, हर पल मेरे सत्य को नज़र अंदाज़ कर बुद्धि से बुद्धिमान हुआ, सरल सहज निर्मल नहीं हुआ
तू सिर्फ़ अपने भ्रम को पोषित करता हैं और कुछ भी नहीं,तू इतना अधिक कायर कमीना है जो खुद ही खुदसे डरता है हमेशा, तेरी खुद को देखने वाला दृष्टिकोण ही नहीं, खुद को पढ़ खुद समझ तेरे जितना ऊंचा सच्चा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता, सिर्फ़ एक बार खुद में उतर तो सही
,इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही प्रकृति के साधनों का भरपूर उपयोग करती रही जाति धर्म मज़हब संगठन में बंट गए जिस से सिर्फ़ एक मानव प्रजाति के करोड़ों टुकड़े हो गए हैं शायद कहने को ही सिर्फ़ इंसान है, प्रकृति ने सिर्फ़ इंसान बनाया हैं पर आज तक मैंने कभी इंसान नहीं पाया, पैदा जरूर होता हैं पर बेहोशी में जीता है और बेहोशी में ही मर जाता हैं संपूर्ण जीवन में खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, मानसिकता में ही जीता है और उसी में मर जाता हैं, खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण में अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस से भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, दूसरों का डाटा उठा कर उस में मुझे उलझने की कोशिश की गई आप के द्वारा, क्या यह सच है? शायद आप मेरे कहने का भावार्थ नहीं समझ पा रहे या मुझे कहना नहीं आ रहा शब्दों में, मैं यह कभी भी नहीं कह रहा कि मैंने ही यह सब कुछ किया है मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति उसी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष रह सकता हैं मेरी ही भांति वो सक्षम है, निष्पक्ष समझ से, दूसरा कोई भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर समझ के दृष्टिकोण बदल सकते जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ सकते हैं, पर खुद का साक्षात्कार नहीं कर सकते, prtek जीव भी इतना ही सक्षम है जितना इंसान रति भर भी भिन्नता नहीं है, यहां तक वनस्पति भी living non-living का concepts भी नहीं है मेरे सिद्धांतों में, सब एक समान हैं, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी समूचे इंसान प्रजाति में वो इकलौता सिरफिरा जुनूनी महायोद्धा इश्क़ की अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव का गोताखोर हूँ, जो इश्क़ के खेल में सब से पहले अपने ही सिर को काट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर तलबार की धार पर चले हैं इश्क़ के जलते अंगारों में खेला हैं मौत को हर क़दम पर हराया है मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद का साक्षात्कार हूं, जो इश्क़ में मान्यता परंपरा नियम मर्यादा का उल्लंघन कर आगे बढ़ा हूँ, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरा नाम सुन कर हर्ष स्वर्ग अमरलोक के रचैता भी थर थर कंपते हैं, गुरु शिष्य दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर अंध भक्त उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनने वाली कुप्रथा का विरोध कर, एक अपना यथार्थ युग का उद्घोष किया है ख़ुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत से, हम आम नहीं समूचे इंसान प्रजाति में भी इकलौते सब से ख़ास हैं, इसलिए साहिब ने बहुत ही ख़ास रखा है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी ऐसा खास हूँ कि हमें संजोया जाता हैं, मेरा परिचय अपने ही ईष्ट से पूछना अगर सच में है तो, मैं वो हूं जो अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों विचारक संपूर्ण जीवन जो सोच भी नहीं सकते उस से भी खरबों गुणा अधिक ऊंची सच्ची सर्वश्रेष्ठता स्पष्टता प्रत्यक्षता वास्तविकता स्भाविकता है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद के साहिब तदरूप
साक्षात्कार हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य की वो आग हूं जो प्रत्यक्ष समक्ष ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ के लिए महा प्रलय हूँ, जो इन सब को जला कर राख कर नष्ट करने की क्षमता के साथ हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष हूँ प्रतेक जीव के हृदय के एहसास भाव ज़मीर में हर पल सांस से पहले हूँ , मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष समूहित रूप से संपूर्ण सृष्टि प्रकृति मानव को शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष रखने की क्षमता के साथ हूं जीवित ही हमेशा के लिए
अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव के महा सम्राट हूं खुद ही खुद के महा युद्ध महा विजेता महा योद्धा हूं इश्क़ की अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव का महा गोताखोर हूं जो अन्नत गहराई अपने अन्नत सूक्ष्म अक्ष में समाहित हुआ हूं, यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ
युग, दूसरों की आलोचना स्तुति महिमा रोध विरोध नक़ल डर खौफ भय दहशत तो कायर डालते हैं जो झूठ ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट करते हैं अपने सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, जो खुद से ही दूर अस्थाई मिट्टी में ही रेंगते हुए बेहोशी में ही जीते हैं और उसी मिट्टी में रेंगते हुए कीड़े की मौत मर जाते हैं जो मिट्टी को ही दिन रात हर पल संभारने सजाने में में ही व्यस्थ है, इंसान होते हुए इंसानियत को ही भुला कर, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं हर एक दृष्टिकोण से संपूर्ण रूप से संतुष्ट स्पष्ट शांत हूं , समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति ने भी मुझे मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग को सरल सहज निर्मल मेरे भौतिक रूप को भी सम्मानित किया है विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा अमृतसर पंजाब में दिव्य अलौकिक सफ़ेद रौशनी के शिरोमणि के अद्भुद आश्चर्य चकित ताज से, मानव प्रजाति में यह अद्भुद आश्चर्य आयुवा पहली बार हुआ
हैं , हम ने सरल सहज निर्मल गुणों का वो सर्ब श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष दृष्टिकोण पाया है जो किसी में भी मात्र एक दृष्टि में भी खुद का साक्षात्कार कर लेते हैं, हम दर दर भटकने वाले झूठी धारणा आश्वासन उम्मीदों पर बेहोशी में ही जीने और उसी बेहोशी में मर जाने वाले कीड़े मकोड़ों की गिनती प्रजाति से अलग है,क्योंकि हमारा कभी भी कुछ भी गुम ही नहीं हुआ, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद का साक्षात्कार हूं, मेरा खुद का यथार्थ युग है मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण के सिद्धानों के आधार पर, जो अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं
खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण में अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस से भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, दूसरों का डाटा उठा कर उस में मुझे उलझने की कोशिश की गई आप के द्वारा, क्या यह सच है? शायद आप मेरे कहने का भावार्थ नहीं समझ पा रहे या मुझे कहना नहीं आ रहा शब्दों में, मैं यह कभी भी नहीं कह रहा कि मैंने ही यह सब कुछ किया है मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति उसी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष रह सकता हैं मेरी ही भांति वो सक्षम है, निष्पक्ष समझ से, दूसरा कोई भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर समझ के दृष्टिकोण बदल सकते जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ सकते हैं, पर खुद का साक्षात्कार नहीं कर सकते, prtek जीव भी इतना ही सक्षम है जितना इंसान रति भर भी भिन्नता नहीं है, यहां तक वनस्पति भी living non-living का concepts भी नहीं है मेरे सिद्धांतों में, सब एक समान हैं, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं, अगर हमारी glaxy भी ख़त्म हो जाए प्रकृति समस्त अन्नत विशाल सृष्टि को रति भर भी अंतर नहीं पड़ता शेष सब तो छोड़ ही दो, हमारी तो औकात ही क्या हैं, इंसान प्रजाति के अस्तित्व सिर्फ़ एक ही मुख्य कारण था प्रकृति पृथ्वी को संरक्षण देना, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का सिर्फ़ एक हिस्सा है, इस में योगदान देना हमारा फर्ज बनता खुद के हित साधने की वृत्ति का त्याग कर के, खुद के साक्षात्कार से दृष्टिकोण ही बदल जाता prtek चीज़ को देखने समझने का, क्योंकि इंसान बुद्धि से बुद्धिमान हो कर नहीं चलता वो सिर्फ़ हृदय से चलता हैं खुद के स्वार्थ हित साधने वाली वृत्ति को त्याग कर इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही प्रकृति के साधनों का भरपूर उपयोग करती रही जाति धर्म मज़हब संगठन में बंट गए जिस से सिर्फ़ एक मानव प्रजाति के करोड़ों टुकड़े हो गए हैं शायद कहने को ही सिर्फ़ इंसान है, प्रकृति ने सिर्फ़ इंसान बनाया हैं पर आज तक मैंने कभी इंसान नहीं पाया, पैदा जरूर होता हैं पर बेहोशी में जीता है और बेहोशी में ही मर जाता हैं संपूर्ण जीवन में खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, मानसिकता में ही जीता है और उसी में मर जाता हैं, खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं, अगर हमारी glaxy भी ख़त्म हो जाए प्रकृति समस्त अन्नत विशाल सृष्टि को रति भर भी अंतर नहीं पड़ता शेष सब तो छोड़ ही दो, हमारी तो औकात ही क्या हैं, इंसामैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद का साक्षात्कार हूं प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट निरंतर प्रेम की धारा में प्रभा हूं
इस से आगे और भी अधिक गहराई से लिखें मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ निरंतर प्रेम की प्रभा हूं और कुछ भी नहीं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी pretk जीव में प्रेम रूप हृदय में ज़मीर अहसास हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत सिर्फ़ प्रेम हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्ष समझ हूं मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग हूं प्रत्यमैं शिरोमणि रामपॉल सैनी pretk जीव में प्रेम रूप हृदय में ज़मीर अहसास हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत सिर्फ़ प्रेम हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्ष समझ हूं मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग हूं प्रत्यक्ष समक्ष हूं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, जीवित सभी जीव के हृदय में ज़मीर अहसास हूं और मृत्यु उपरांत prtek जीव का अहसास सिर्फ़ मुझ में ही समहित होता हैं और कोई स्थान ही नहीं है, और सब कुछ सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों का ताना बाना है, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ प्रेम हूं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण संतुष्टि हूं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, मैं खुद का साक्षात्कार हूं, मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं, मैं
शिरोमणि रामपॉल सैनी समूचे जीवों को खुद में
समहित करने की क्षमता के साथ हूं, मेरी निष्पक्ष
समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ
युग ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण संतुष्टि हूं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, मैं खुद का साक्षात्कार हूं, मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं, मैं
शिरोमणि रामपॉल सैनी समूचे जीवों को खुद में
समहित करने की क्षमता के साथ हूं, मेरी निष्पक्ष
समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ
युग ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, पारदर्शी हूं, खुद
का साक्षात्कार हूं, खुद की निष्पक्ष समझ में हूं,
वर्तमान के क्षण में हूं, यहां समय का अस्तित्व ख़त्म
हो जाता हैं,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति खुद ही खुद के साक्षात्कार के लिए सक्षम समर्थ निपुण हैं, वो खुद ही खुद के उस स्थाई स्वरुप से रुबरु हो सकता हैं जिस की पिछले चार युगों में कोई सोच कल्पना भी नहीं कर सकता, बहुत ही सरल है, बहुत ही अधिक करीबी हैं वो सिर्फ़ एक पल की निष्पक्ष समझ की दूरी पर है, अगर इंसान होते हुए प्रथम चरण में ही खुद से साक्षात्कार नहीं करते जो मुख्य उद्देश्य है तो हम दूसरी अनेक प्रजातियों में भी रति भर भी भिन्न नहीं है, तो हम खुद ही खुद को धोखा दे रहे हैं जान बुझ कर, तो हम खुद ही खुद के दुश्मन हैं, जो खुद का ही दुश्मन हैं वो किसी दूसरे का सगा हो ही नहीं सकता,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्येक जीव के उस स्थाई स्वरुप से रुबरु हूं जो सिर्फ़ एक ही हैं, जो जन्म मृत्यु के चक्रक्रम से मुक्त हैं जो न ही शरीर में है न ही कहीं बाहर, वो न ही आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक जैसी अवधारणाओं का हिस्सा है, वो न ही श्रद्धा आस्था भक्ति ध्यान ज्ञान विज्ञान दार्शनिक का विषय, वो न ही जन्म लेता हैं न ही कभी मरता हैं, वो सब में हर पल हर संस के साथ ही प्रेम धारा में प्रभा की तरह बहता है निरंतर, जिस से कम से कम सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ इंसान प्रजाति भी रुबरु नहीं हो पाई पिछले चार युगों से अब तक, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं प्रत्यक्ष समक्ष देख समझ सकता हूं और किसी को भी उस से रुबरु करवा सकता हूं अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में रख भी सकता हूं सिर्फ़ एक पल में, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, जिस गुरु से दीक्षा ले कर भक्ति सेवा दान को नज़र अंदाज़ कर सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम कर खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं, वो गुरु 25 लाख सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बनने में व्यस्थ है, जिन के लिए करनी कथनी में जमी आसमा का अंतर है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हर पल दिन रात उन में ही रमने की अदद के साथ था, पर उनको रति भर भी पाता ही नहीं, वो निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता से भी वंचित थे, अफ़सोस कि यह क्षमता प्रत्येक जीव में पर्याप्त है, फ़िर मैं अपने ही गुरु के किस स्वरुप से रुबरु हूं, जिस से मेरा गुरु खुद भी रुबरु नहीं हुआ, फ़िर गुरु किस अहम अहंकार घमंड में है अगर खुद से ही निष्पक्ष नहीं हुआ खुद का ही निरीक्षण नहीं किया, तो दूसरों के लिए क्या कर सकता है, मैंने अपने ही गुरु का वो स्वरुप ढूंढ लिया, जिस से मेरा गुरु खुद भी अपरिचित है, वो परमपुरुष अमर्लोक ढूंढ रहे हैं पिछले आसी वर्षों से जो अब तक तो नहीं मिले तो क्या अगले दो पल के जीवन में मिलने की संभावना नहीं है, मैंने सरल सहज निर्मल गुणों के साथ उस सब से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष गुरु में ही पा लिया, जिसे गुरु खुद में ही नहीं पा सका, वो जो प्रतेक जीव में एक ही समान हैं, वो मेरे लिए साहिब तदरूप साक्षात्कार है, पर गुरु खुद ढूंढने में व्यस्थ हैं और 25 लाख अनुयाइयों को भी ढूंढने में लगा रखा है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं जीवित ही हमेशा के लिए पर मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं जो आसी बर्ष
पहले शुरू किया था
मैंने उसी गुरु में ही खुद के या गुरु के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर खुद की निष्पक्ष समझ से ख़ुद का साक्षात्कार हूं, जो संपूर्ण संतुष्टि में हूं प्रत्यक्ष समक्ष हूं, वो गुरु और उस के 25 लाख अनुयाइ मेरी इन सब को स्वीकार नहीं करते क्योंकि वो सब सिर्फ़ दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित है और कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर है, गुरु सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शिकार है , दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर गुरु के शब्द को ही अंतिम सत्य मान कर चलते हैं इसी अवधारण में ही बेहोशी में ही जीते हैं और इसी बेहोशी में ही मर जाते हैं, इसी उमीद में की मरने के बाद मुक्ति मिल जाएगी, सर्वश्रेष्ठ इंसान जीवन का महत्त्व ख़त्म कर देते हैं, जबकि खुद का साक्षात्कार प्रत्येक व्यक्ति के लिए पर्याप्त है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ,
खुद का साक्षात्कार के लिए शब्द ख़त्म होते हैं शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ़ दुनियां में होता हैं जीवन व्यापन के लिए, मेरे सिद्धांतों के अधार पर यहां शब्द है बहा कोई दूसरा या सृष्टि को व्यक्त करते हैं, यहाँ शब्द हैं बहा झूठ ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह हैं भ्रम है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति मेरी निष्पक्ष समझ के आधार पर मेरी तरह संपूर्ण संतुष्टि में रह सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए , मृत्यु संपूर्ण संतुष्टि सर्वश्रेष्ठ सत्य हैं जिस के लिए कुछ भी रति भर भी करने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिय है, जन्म मृत्यु के बीच के सफ़र का ही नाम जीवन हैं,
इंसान प्रजाति जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर अपनी कल्पनाओं को ढूंढ रहा था उस से सिर्फ़ जीवन व्यापन ही कर सकता हैं, न कि
खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार,क्ष समक्ष हूंमैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बचपन से ही था वो सब खुली आंखों से ही देखता था जो अतीत पिछले चार युगों में तो कोई सोच भी नहीं सकता, जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे लंबे समय से लगातार उनको मेरे बारे में पूछना इतने अधिक प्रेम की गहराई में हर पल रहता था मस्ती में कि खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में शुद्ध बुद्ध खुद का चेहरा भी हुआ हु आज तक निरंत किसी का दर्द भी लेता था मरे को जिंदा कर के भी देखा था, मैं खुद को शहंशाह मानता था हूं जो चाहता था सिर्फ़ पल में होता हैं, पर वो सब भी बकबास था, आज जो हूं वो खुद का साक्षात्कार हूं स्पष्ट अंतिम सत्य है, मुक्ति जैसे पाखंड के लिए कभी भी नहीं आया था यह समय सब को बताता था मैं साहिब को खुद में समहित करने के लिए आया हूं, मन अभ्यारण है परमपुरुष परमार्थ अमरलोक कबीर के नया version हैं सभी धर्म मज़हब संगठन को समझ कर उन से ऊंची मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की गई हैं जो स्वर्ग नर्क के भ्रम से एक कदम आगे का पाखंड है, मैं ऐसा प्रेम करता था कि कोई सोच भी नहीं सकता दिन रात हर पल, आप की समझ शायद लैंगिंग प्रेम को ही प्रेम कहते होंगे वो आप की समझ सीमित है, पर मेरी निष्पक्ष समझ ऐसी बिल्कुल भी नहीं, आप अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों को क्या दे रहे हो इतने लंबे समय से दूसरों की मानसिकता थोप रहे हो, तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर बदले में मुक्ति का झूठा आश्वासन जो जीवित सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते और मारा बापिस नहीं आ सकता बताने के लिए, यह सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं यह सब उनके साथ ही कितना बड़ा विश्वासघात है जिन से परमार्थ के नाम पर पीढी दर पीढी स्थापित कर रहे हो सिर्फ़ साम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए ब्रह्मचर्य होते हुए, इतना बड़ा धोखा पच्चीस लाख अनुयाइयों होते हुए, खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते, किस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हो वो प्रभुत्व की पदवी जो इनी अंधभक्तों द्वारा दी गई हैं जिनको जब चाहें कोई कोई आरोप लगा कर बारी बारी निकाल देते हो वो भी पूरी संगत के समक्ष की दुबारा ऐसा सोचने की हिम्मत भी न करें इसी को डर खौफ भय दहशत तले रखना होता हैं, बंधुआ मजदूर बना कर दिन रात इस्तेमाल करना, यह व्यवस्था होती हैं रति भर भी कुछ नहीं, अभी भी सब से पहले आप को ही खुद के साक्षात्कार की जिद्द के साथ हूं, थोड़ समझो मैं आप को पहला सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, सिर्फ़ आप की मेरे मुख्य केंद्र हो, चालीस बर्ष निरन्तर दिए हैं, जिसने कभी एक सेकंड भी नष्ट नहीं किया, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से ऐसा सर्वश्रेष्ठ पवित्र साहिब तदरूप बना दूंगा, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार, प्रेम से या फ़िर समझ से, जो मुझे समझ लेगा वो खुद को समझ लेगा कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले जीवित ही हमेशा के लिए, मुझे यह उम्मीद थी कि मुझे निगाहों में देख कर ही समझ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ कोई बात नहीं, मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान नहीं हूं, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत सत्य हूं, इतना अधिक गहराई से इतना अधिक लिखा हैं अगर चाहूं तो इक पल सर्ब आर्थिक तौर भी बन सकता इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि सिर्फ़ आधे घंटे का किसी चैनल में inerview दे दु तो साढ़े आठ सो करोड़ दुनियां सिर्फ़ देखने के लिए ही आ जाएगी, जो मैं कभी नहीं चाहता, मेरा लक्ष्य ही सिर्फ़ आप को ही उच्च कोटि पर देखना जो आज से बीस वर्ष पहले आश्रम में मेरे साथ रहने वालों को तो पूछ कर देखना या फ़िर शिकायतें सुनने के ही आदि हो, आप वैज्ञानिक युग में अतीत की चर्चित विभूतियों की मानसिकता को अधिकतक के नाम पर स्थापित कर रहे हो, अगर हमारे शरीर मानसिकता की कोशिका दस बर्ष पूर्व बतावर्ण सहन नहीं कर सकती तो मानसिकता क्यों, संपूर्ण शरीर की संरचना ही वर्तमान के लिए की है प्रकृति द्वारा माइक्रो एक्सिस में रहने के लिए जो सिमुलेशन है प्रकृति ब्रह्मांडो के साथ, इतना अधिक लिखा हैं जो मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है, कि अगर कोई लगातार पंद्रह साल दिन रात भी पढ़े तो भी ख़त्म नहीं हो सकता, फ़िर भी मुझे लगता हैं कुछ किया ही नहीं और कुछ शेष भी नहीं रहा फ़िर भी निरंतरता क़ायम है, मैंने जो भी किया उस सब का श्रेह आप के चरण कमलों में समर्पित करने के लिए ही आया था पर आप ने अपमानित किया, कोई बात नहीं मानसिकता ऐसी होती हैं, जो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता से लेती हैं, जो समान मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का आप से लेने पर हर्ष आनंद होता वो प्रकृति द्वारा लेने में नहीं आया, जब के कहने पर पागल हस्पताल अमृतसर दिखने गया था अपनी बेटी के साथ शाम को जब अपनी बेटी की जिद्द से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा हमिंद्र साहिब गया तो अचानक मेरे माथे पर दिव्य अलौकिक ताज सी सफ़ेद रोशनी निकली मुझे पाता ही नहीं था पर किसी अंग्रेज ने फ़ोटो खींच ली थी और मुझे एक घंटे से ढूंढ रहा था वो फ़ोटो उस से ली थी , जो मैं अकसर अपनी सभी profile picture में लगता हूं, रौशनी की किरणें अक्सर मेरे चेहरे से निकलती हैं, उन सब को भी मैं पाखड़ झूठ मानता हूं, आप हमेशा कहते रहते थे गुरु को कोई खुश नहीं कर सकता भक्ति दान सेवा से, तो मैंने फ़िर संपूर्ण संतुष्ट करने का विकल्प चुना, उसी में लगातार निरन्तर रहा, यह शपथ ले रखी थी अगर कभी भी साहिब समक्ष जुवान खुली तो उसी पल मैं अपनी जुवान कट दूंगा, एक बार परशुराम लाइनमैन आप से कुछ बता रहा था, तो उस समय में भी आप के पास खड़ा था, तो अपने परशुराम को यह बोला था अगर आप अभी नहीं बताते तो न जाने क्या इस से भी बेहतर होने वाला था,उस बात को भी मध्य नज़र रखने के कारण, पर मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से जो भी हुआ जब भी हुआ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र हुआ कोई सोच भी नहीं सकता आप का तो आभारी रहूंगा ही पर हर उस पर को भी कोटिन विनय नमन, जैसे सिर्फ़ इस एक ही गृह पृथ्वी पर जीवन होने की संभावना के पीछे समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निरंतरता का हाथ हैं वैसे ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हर उस पल को नमन शुक्रिया वंदन करता हूं मुझ में इतनी अधिक गहराई है कि ऐसी खरबों सृष्टियां खुद में समहित कर पुण्य उसी निरंतरता में स्पष्ट हूं, सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा का विषय ही नहीं हूं, मुझ में किसी से भी कुछ भी अलग है ही नहीं,prtek जीव एक समान ही है, अलग सिर्फ़ प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान हैं जो किसी को भी साझा किया जा सकता है, खुद को समझना भी एक प्रदर्शित शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं, यहां सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शिता नहीं है, वो सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा गया हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए और कुछ भी नहीं है, अपने prtek शब्द को तर्क तथ्यों अपने सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध किया कोई भी मुझ से कुछ भी पूछ सकता हैं चौबीस घंटे उपलव्ध हूं समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में,
गुरु बावे की तरह नहीं उस ग्रंथ में लिखा हैं क्या फ़ायदा लिखने वाले का स्पष्टीकर खुद नहीं दे सकता वो मानसिकता हैं सिर्फ़, दूसरों के ग्रंथ पोथि के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले तो सभी गुरु मिल जाते हैं जो एक से बढ़ कर एक हैं, खुद की उपलब्धि क्या हैं, खुद का निरीक्षण करना कौन सिखायेगा, रोज़ प्रवचनों में ईद उदर की ड्रामे बाजी से थकते भी सिर्फ़ इतने अधिक लोगों को नियंत्रण में रखने की प्रक्रिया है सिर्फ़ कोई खुद को ही न समझ पाए, अगर कोई एक भी खुद का साक्षात्कार कर लेगा तो पूरा वातावरण ही बदल देगा समस्त मानवता को समूहित रूप से जागृत कर मानव प्रजाति प्रकृति का संरक्षण हो जायगा सच में यहीं कौशिश है पृथ्वी से कोई सुंदर ऐसा ग्रह ही नहीं समूचे सृष्टि में जिसे पूर्ण रूप अगले दो हज़ार वर्षों के संसाधन इस्तेमाल कर चुके है पिछले चालीस वर्षों में, जाती धर्म मज़हब संगठन में बंट कर चार हज़ार रब और दस हज़ार गुरु बन गए हैं पैदा इंसान हुआ था पर मानसिकता की बेहोशी में जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति रति भर भी अंतर नहीं है, अगर इंसान इंसानियत होती तो आज जैसा आज हो ही नहीं सकता था, मुझे आज तक कोई इंसान ही नहीं मिला, पूरे जीवन में सिर्फ़ तो सिर्फ़ मानसिक रोगी ही मिले आज तक, इंसान देखने को नहीं मिले जिस प्रभुत्व का मेरा गुरु शिकार हुआ हैं उस रब को कट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर ही इश्क़ किया था, वो ही तो मानसिकता थी, मन था जिसे इन लोगों ने हऊआ बना रखा था, वो बकबास है यह पैंतीस साल पहले जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे उन को बताता था, तब किसी को भी किसी भी ब्रह्मांड में ले जाता था बहा रहने वाले उस समय के किसी को भी पूछ लेना वो बकबास था सिर्फ़ एक मनो विज्ञान था, आज भी वो सब कर सकता हूं पर जो हैं ही सब से बड़ा बकबास उसे क्यों दोहरा जाए,
मेरा कोई गुरु नहीं ही मेरा कोई शिष्य भी नहीं है, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानवता में सिर्फ़ इकलौता शिरोमणि रामपॉल सैनी हूं अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के साथ,मुझे डर खौफ नहीं है क्योंकि यहां हूं बहा मृत्यु के बाद की स्थिति है, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद का साक्षात्कार हूं,इतने अधिक चतुर होते हैं कि कार्यरत IAS officers इन की समितियों के अहम सदस्य होते हैं, जो ऐसी सेवा के लिए दिन रात मौजूदगी रखते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आश्रम में parmanet उन कई लोगों के संपर्क में हूं जो कई बार आत्महत्या करने की कोशिश कर चुके हैं, मैं भी कई बार कौशिश कर चुका हूं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत ही है,उन की मेरे पास recoding भी पड़ी हैं,और एक ने तो मेरे गुरु के सामने ही चौथी मंजिल से छलांग लगा कर मर गया था और उनके ही घर बालों को डरा धमका कर चुप करवा दिया गया क्योंकि वो बहुत ही ग़रीब थे,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही गुरु की अपनी ही भविष्यवाणी अपने ही लिए सिद्ध करवा दूंगा जो कहते थे "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना ही न हो" ऐसे हालत खुद ही गुरु ने पैदा कर लिए है जो मैं कभी भी नहीं चाहता था, इसी समय का उन को आभास होता था, अपने ही अनुयाइयों में विरोध पैदा हो गा, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं तो सिर्फ़ गुरु गुरु के अन्नत असीम प्रेम की गहराई से गुरु की अन्नत असीम नफ़रत के बावजूद , तो सभी दिन रात अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित करने वाले जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर उग्र अंध भक्त भेड़ों की बंधुआ मजदूर हैं वो भी जिंदा हो कर जैसे प्रत्यक्ष दिया है सब कुछ वो भी बापिस लेंगे, जब उन को आभास होगा कि सरल सहज निर्मल गुणों का गुरु ने इस्तेमाल कर बंधुआ मजदूर बना रखा था , उस समय का आप को आभास हुआ था , मुझे पाता था मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं
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मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, सिर्फ़ बही सब शब्दों के पिछे भाव को शब्दों का रूप देने की मात्र इक कौशिश की है वो सब ही शब्द है जो रोज़ प्रवचनों में वर्णन करते शायद करोड़ों बार दोहरा दिए होंगे अनुयाइयों को अनुकरण करने के लिए दिन में कई बार कहने वाले खुद भी अनुकरण करने से वंचित हैं, सिर्फ़ कहने तक सीमित कथनी होती हैं, करनी नहीं, हम ने तो शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ही समझा हैं अगर अपने ही अनुयाइयों से रति भर भी भिन्न होते तो निगाहों से हृदय के भाव पढ़ लेते,
यही सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताना चाहता था एकांत में, पारदर्शिता अच्छी है, मुझे पसंद भी है, शुरू आप से हुआ सरलता निर्मलता सहजता धैर्य की कमी से अभी ख़त्म नहीं हो सकता जब तक गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को संपूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होती, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य दिल हृदय से ही चाहता हूं prtk कम से कम इंसान प्रजाति जीवित ही हमेशा के लिए मेरी ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहे, खुद के साक्षात्कार के बाद,prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक एक समान ही है, कोई भी किसी भी प्रकार से भिन्नता है ही नहीं, खुद के साक्षात्कार होना एक बात है, उसी को मैं गुरु में ही देख रहा था, संकोच था शायद गुरु भी खुद के साक्षात्कार में हो सकता है, पर वो तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि का दृष्टिकोण भी अहिंब्रासमी तक ले जाता है, जैसे कबीर जी थे, वो सब भी अस्थाई है, खुद के साक्षात्कार के लिए हृदय के एहसास भाव जो सांस के साथ ही उत्पन होता हैं शब्द बुद्धि उत्पन करती हैं, हृदय और बुद्धि मन का अंतर जमी आसमा का है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हमेशा हर एक जीव के एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
कुछ बनना ही नहीं चाहता था, जो हूं बस बही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं सिर्फ़, गुरु साहिब सत्य लगें इस लिए प्रेम में आ गए, मेरे गुरु में भी वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष पर्याप्त है, जो सिर्फ़ एक ही रंग बिखेरता है, रंगों के विकल्प तो सिर्फ़ मन बुद्धि ही उत्पन करती हैं, जिस से हमेशा दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता है, मृत्यु जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है उस के परमानंद संपूर्ण संतुष्टि भरे होश में आनंदित होते हुए खुद ही खुद के तत्वों गुणों को रूपांतरित करना अलग बात है, जिस से इंसान प्रजाति आज तक वंचित रही है, सिर्फ़ मृत्यु डर खौफ भय दहशत भरी अबधारणा में ही फैंस कर जीती और मरती रही, मुझ में अन्नत असीम प्रेम के इलावा और कुछ बिल्कुल भी नहीं है, कुछ ऐसे कटास शब्द इस लिए की गुरु भी खुद के साक्षात्कार कर कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वो सब लिखने की इक कोशिश हैं जो शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते, जब खुद ही खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को ही निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है तो दूसरे का तो तत्पर्य ही नहीं हैं, अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं, यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं हैं यही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
हम कुछ भी करते हैं सिर्फ़ एक पल में वो सब दिल से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से ही करते वो भी सिर्फ़ एक से ही अन्नत असीम प्रेम हो या फ़िर नफ़रत, अगर प्रेम में सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम बनाने की क्षमता के साथ हैं तो नफ़रत में संपूर्ण जीवन की लुट मार की दो हज़ार करोड़ की संपति को सिर्फ़ एक पल में नष्ट करने की क्षमता के साथ भी प्रत्यक्ष समक्ष हैं, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो सिर्फ़ मात्र एक निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण कई ब्रह्मांड उत्पन और नष्ट करने की संभावना के साथ हूं, कैसे होता हैं पाता ही नहीं चलता संभावना उत्पन होती हैं, सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण प्रकृति उत्पन कर लेती हैं, जिस जिस चीज़ शुरू से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से लेता वो सब कुछ ही मिलता हैं, मेरे गुरु के पास जो भी है उस के लिए ही दृढ़ता गंभीरता थी, जो मुझे मिला खुद का साक्षात्कार वो मेरी निष्पक्ष समझ की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता से ही है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि गुरु ने खुद को स्थापित किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष पाने के लिए, और मैंने खुद का अस्तित्व ही खत्म किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य पाने के लिए,
हम आज भी संपूर्ण संतुष्टि में ही हैं हर पल पहले दिन से ही, मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ,जो अपने गुरु के संरक्षण में पहले दिन से शुरू किया, अगर इतने लंबे समय से नहीं मिला तो अगले कम समय में तो मिल नहीं सकता, अगर मिला होता तो अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ मृत्यु के बाद झूठा मुक्ति का अश्वासन नहीं देता, जो मिला होता वो सब ही बंट देता जितना जितना हिस्से का आता, उन शिष्यों के साथ धोखा कभी भी नहीं करता जिन्होंने सिर्फ़ एक विश्वास एक शब्द पर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस हमेशा के लिए समर्पित कर दिया और दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर पीढी दर पीढी कुप्रथा के जाल की जरूरत नहीं पड़ती, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह का जल हैं जो सिर्फ़ सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत प्रभुत्व की मानसिकता की भी कभी जरूरत ही न पड़ती इस घोर कलयुग वैज्ञानिक में, जो सरल सहज निर्मल गुणों बले लोगों के साथ सृष्टि का सब से विश्वासघात हैं परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान ले नाम पर,
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,
करनी कथनी से जमी का अंतर है गिरगिट से भी अधिक रंग बदलने वाला एक रंग में कभी रह ही नहीं सकता, उज्वल कपड़ों के भीतर भेड़िया है खुद का निरीक्षण करना सीखों धैर्य नहीं है विवेक से वंचित हो, दूसरों की शिकायतों पर खुद से ज्यादा यक़ीन करना कुत्ते की प्रवृति दर्शाता है, 40 बर्ष के लंबे समय से नहीं समझ पाए खुद को समझने सिर्फ़ एक पल कभी हैं, दूसरा कोई समझे या फ़िर समझा पाए सदिया युग भी कम है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, जो अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जो भी वो इंसान प्रजाति में पहला इंसान हूं किसी को भी सिर्फ़ एक पल सिखा सकता हूं यह शिक्षा है, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा जैसे कुप्रथा नहीं है, जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में चूर हो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,
सिर्फ ग्रंथ पोथियों में पढ़ा होगा खुद का साक्षात्कार अब बुक्तोगे खुद के साक्षात्कार के प्रकोप से क्या होता, दिन रात हर पल तड़पना ही पड़ेगा, शब्दों को कहा उच्चारण करना किसी पे कब कहा क्या कहना इतना अधिक घमंड है, उन के प्रभुत्व की पदवी का जो खुद ही पागल हैं, जिस प्रभुत्व की पदवी के अहम घमंड अहंकार में उस का जरा निरक्षण तो करो किसी दी हैं उस का क्या पद है, जो खुद मानसिक रोगी हो, अगर इतने ही बड़े थे तो कबीर के समय कहा थे, कबीर को भी मेरे सिद्धांतों ने ढोंगी स्पष्ट किया है,मेरा गुरु वो पगल चतुर कुत्ता है जो एक अपने IAS officers मुख्य कार्यकर्ता के उषा करने शिकायतों का फत्तूर का शिकारी हो कर कटने के लिए भोंकता है जिस की फितरत है कुत्ते में तो बहुत से गुण होते हैं एक तो वो निगाहों से हृदय में उतर कर समझने की क्षमता भरपूर होती हैं और दूसरा अपने मालिक की बफादर होता चाहें सूकी रोटी भी दो, मैंने तो तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस करोड़ों रुपए हाथ में दिए थे जिन में से एक करोड़ बापिस लेने का शब्द भी दिया था जरूरत पड़ने पर, जिस के एक शब्द उसी एक पल के बाद चालीस बर्ष वैज्ञानिक प्रवृति का होते हुए, जिस के एक एक पल अनमोल होता है, जो वो सब कर सकता हैं जो दूसरा कोई सोच भी नहीं सकता, जो समस्त सृष्टि प्रकृति मानव प्रजाति में सिर्फ़ एक इकलौता ही हो, जो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो किसी भी खुद के साक्षात्कार जिज्ञासु को सिर्फ़ एक पल में खुद का साक्षात्कार करवा सकता हूं, जो पिछले चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरे अपने खुद के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो सिर्फ़ वर्तमान को ही प्राथमिकता देता हैं, जो जीवित ही हमेशा के लिए खुद ही खुद के अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय करने की क्षमता रखता हैं, जिस मन को बहुत बड़ा अदृश्य शक्ति बना कर अभ्यारना बना कर मनोविज्ञान से बुद्धि में बिठा दिया गया और खुद बहुत भिन्न दूसरों से श्रेष्ठता बता दी गई, प्रभुत्व की पदवी के साथ जिस से सरल सहज निर्मल लोगों को ही निशाना बना कर अपने सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत औरत वेग का आनंद लिया जो सके सिर्फ़ एक प्रक्रिया के साथ शुरुआती नाम या दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर जो कभी प्रश्न ही नहीं पूछ सके ऐसा डर खौफ भय दहशत का माहौल बनाया जाता हैं, जो थोड़ा भी प्रश्न पूछे उसे लाखों की संगत के बीच ही खड़ा कर शब्द काटने के आरोप में और भी कई आरोप लगा कर दंडित कर और कोई भी उस से बात न करें जो उस से बात भी करें उस को भी नर्क भी नहीं मिले गा यह सब कह कर निष्काशित किया जाता हैं चाहें उस ने मनोविज्ञान दवा में अपनी सारी उम्र दिन रात निरंतर दिए हो, जब कोई भी सत्र बर्ष की उम्र में होता हैं जब करने या पैसे देने असमर्थ हो जाता हैं उस को निकला ही जाता हैं, उसे गंद फ्रांटी खुद गुरु बोलता हैं, आश्रमों में वो सब होता हैं जो एक आम इंसान सोच भी नहीं सकता, एक बार मैं गुरु की ही गाड़ी में पिछले लास्ट सिट पर बैठा था मेरा गुरु अक्सर युवान खूब सूरत लड़कियों का बहुत ही अधिक शौंक रखता है चाहे उसे धर्म की बेटी ही कह कर लोगों में प्रदर्शित करना पड़े मनो वैज्ञानिक दवाब बनाना पड़े, उस के स्तनों को सब सामने पकड़ कर यह कह रहे थे कि यह क्या है एक मांस की थैली ही तो हैं जैसे एक पनी में मांस को दबाना बैसा ही तो हैं, इस में क्या मजे वाली बात है, साथ में खुद मज़ा ले रहे थे वो गुरु जो दूसरों को स्त्री के वस्त्रों से भी दूर रहने की सलाह देते हैं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हूं, वो सत्य हूं जिस गुरु ने बहुत बड़े बड़े अक्षरों मे अपने सिर के पीछे हमेशा सत्य लिखा रखा होता हैं prtek प्रवचन में, लगातार दो बर्ष गुरु का भोजन बनाने वाली ताई के साथ रहता था उस समय मेरे भीतर भी कोई गुरु के प्रति बुरा भाव भी उत्पन नहीं होता था, मेरा हृदय भी यह स्वीकार कर लेता था, कि गुरु बहुत ही ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ पवित्र उत्तम रिश्ता है बताया भी यही जाता था गुरु द्वारा भी, साथ में तन मन धन दीक्षा के साथ ही समर्पित करवाया जाता हैं, सार्वजनिक तौर पर, इसलिए लोग अपनिया बेटियां उम्र भर के लिए भेज देते हैं, जिन माता पिता ने फूल जैसी हीरों को अपने क़रीब के रिश्तों से भी बचा रखा होता हैं, यह गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ वो कुप्रथा है जिस मैं पूरा वर्णन करूँ तो अप्सटिन file भी बहुत छोटी लगेगी, यह सब सिर्फ़ कबीरके मार्गदर्शन पर चलने वालेमेरे गुरु का वृतांत बता रहा हूं, जिस के "पास वो वस्तु हैं जो ब्रह्मांड में और किसी पास नहीं हैं" जो बेटी के जन्म लेते ही अपने चरणों बंदगी करवाता है, जो वो खुद में ही संपूर्ण संतुष्टि में हैं, जिस को दुनियाँ का पाता ही नहीं, मैंने भी जन्म लेते ही अपनी बेटी स्नेहा सैनी का नामकर्ण गुरु से ही करवाया था, पर बहुत से कहने पर भी उस को दीक्षा नहीं दिलवाई और न ही आश्रम जाने दिया, रोका भी नहीं, उस पर छोड़ दिया, पर उस के हृदय ने स्वीकार ही नहीं किया, मेरे गुरु सिर्फ़ एक मानसिक रोगी हैं, यह सब आरोप नहीं लगा रहा यह वास्तविकता है, यह सब बहुत लोग जानते भी है, पर मुक्ति का लोभ और शब्द कटने का डर खौफ भय दहशत तले यह सब ही चलता है, मेरा गुरु यह सच्च जनता है कि रब परमपुरुष बिल्कुल भी नहीं है, उसी वहम का फ़ायदा उठा कर खुद को स्थापित कर उस सब आनंद का फ़ायदा उठा रहा जो कोई आम इंसान सोच भी नहीं सकता, मेरे सिद्धांतों के अधार पर भी आत्मा परमात्मा परमार्थ का कोई भी concept ही नहीं है, इन रक्षकों वृत्ति वाले लोगों से बचाने के लिए सरल सहज निर्मल लोगों, जरूर चाहिए था, जो इन के किए कुकर्मों की सजा दे पाए, हम लोग मुक्ति के भ्रम इस कदर भ्रमित हुए कि रति भर भी चिंतन नहीं कर सकते, जबकि मुक्ति ऐसे वृत्ति बाले लोगों से ही चाहिए़, अपना खुद मे ही सन्तान है जो सर्ब श्रेष्ठ हैं, जिस में दया रहम बहुत कुछ है, मेरे गुरु के पास दया रहम ही नहीं है, मुझे पागल तो घोषित कर निकल दिया पर मेरे करोड़ों रुपए में से एक पैसा भी नहीं दिया दिखने के लिए जबकि गुरु महिमा के लिए अपनी मरी हुई बीबी के लाखों गहने बेच कर नेपाल बरेली भूटान भारत के बहुत जगह पर जाता था,18 बर्ष की उम्र में इस पाखंड में पड़ा था अभी 56 बर्ष की उम्र है, गुरु ने जिस पहली शादी करवाई उस ने मेरे ही भाई की बात मान कर मुझ से तलाक ले लिया और अब भी भाई के घर आती जाती हैं और वो भी आता जाता रहता अक्सर, दूसरी शादी माँ के कहने पर की उस से बेटी हैं जो अब 12 th परीक्षा दे रही हैं, पांच बर्ष बेटी जब थी तो बीबी पूरी हो गई थी, बेटी होने के कारण उस को संभालने के कारण स्त्री होना आवश्यक था भदरवाह से एक बेटी के साथ स्त्री लाया पंद्रह दिन के बाद वो गहने ले कर भाग गई, उस के बाद जम्मू मीरा साहिब से एक ज्यादा उमर की लड़की लाया पंच बर्ष के बाद उस से भी तलाक ले लिया उस की मानसिक स्थिति सही न होने के कारण वो अक्सर बेटी को गाली देती रहती थी, मैंने लीगल शादियाँ भी चार की तलाक भी लीगल ही लिए, फ़िर भी वो सब किया जो आज तक कोई सोच भी नहीं पाया, मेरे गुरु ने संपूर्ण जीवन में ब्रह्मचर्य का ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट धोखा सरल सहज निर्मल लोगों के साथ विश्व का सब से बड़ा विश्वासघात बहरूपिया गिरगिट की तरह रंग बदले सिर्फ़ अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के शौंक में कितने अधिक कांड किए कोई सोच भी नहीं सकता, लोगों की जमीनों पर अतिक्रमण किया वो भी गुंडों की भांति परमार्थ के नाम पर दो हज़ार करोड़ कदौलत 400 से अधिक आश्रम 25 लाख अनुयाइयों को मूर्ख बना कर, जो पहले से ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ थे, उन को करने के लिए कुछ भी शेष ही नहीं था, उन का कुछ गुम ही नहीं, उन को कुछ ढूँढना नहीं था सिर्फ़ वो ही खुद में ही सर्वश्रेष्ठ पवित्र सक्षम समर्थ निपुण थे, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य इतना अधिक सरल सहज निर्मल और आसान है कि सोच भी नहीं सकता, मेरा गुरु तो इतना अधिक जटिल है चतुर है जो सिर्फ ब्रह्मचर्य होते हुए भी हित साधने की वृत्ति को परमार्थ प्रस्तुत कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का मानसिक रोगी हैं, सिर्फ़ इंसान बन जाता तो बेहतर था,
थोड़ा सोचों जो मेरे हमदर्द थे वो मानसिकता थी, मनोवैज्ञानिक दवाब था अब वो नहीं है क्योंकि आप मुझ से नफ़रत करते हो थोड़े वर्षों से कोई पैसा नहीं दे पाया, जो पहले दिए उन को न बापिस देना पढ़े इस डर खौफ भय दहशत क़ायम आप की व्यवस्था का हिस्सा है, सब के सामने लज्जित करना उस डर का सब प्रभाव क़ायम रहे,
थोड़ ध्यान दो जो मुक्ति देने वाला खुद मेरे विरोध में है, तो मेरे साहस का कारण क्या होगा, वो शब्द काटने पर नर्क भी नहीं मिलता, यह किसी मरने के बाद भी जागृत रखते उन के घर बालों को परेशान कर के कि उसे मुक्ति नहीं मिली वो अमरेलोक परमपुरुष नहीं पहुंचा लूटने का धंधा, ऐसे लोग भी मेरे संपर्क में है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, इतनी बड़ी गंदी कुप्रथा का विरोध कर रहा हूं, इस के पीछे सिर्फ़ मेरा खुद का साक्षात्कार है, पारदर्शिता है, अपने तो सत्य झूठ बेचने के लिए लिखा, आप ने तो मेरा समर्थन करना चाहिए था, विरोध में हो अफ़सोस है,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं
गुरुओं की चतुरता शैतान प्रवृति यथार्थ में होती हैं वर्णित करता हूं वो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता देते हैं अहम के बचाव के लिए हर हद तक गुजरात जाते हैं मरवा कर पता भी न चले इस लिए ही AIS कार्यरत उन को संपूर्ण संरक्षण देते हैं, इस लिए इन का आश्रमों में गुरु के दृष्टिकोण में भी उच्च पद स्थान होता हैं, मैं निर्मलता सहजता सरलता पारदर्शिता के साथ हूं, अपनी कमजोरियों को बताता हूं मेरी गरीबी गुरबत के कारण मेरे ही बहन भाई सभी मुझ से नफ़रत करते हैं, सभी को आप खुद परिचित हो उन के घर भी कई बार आते हो, कट्टर अंध भक्त तो वो पहले से ही है, सिर्फ़ एक निर्देश की प्रतीक्षा में रहते हैं, सिर्फ़ बोलो तो सही इक पल में मेरा सिर काट कर आपके चरणों में रख देंगे, मैं भी हर सिर्फ़ इसी के इंतजार में ही रहता हूं, क्योंकि मेरा भी और कुछ करने को शेष नहीं रहा, इस गंदे से शरीर में बहुत अधिक थक चुका हूं, जल्दी करो, सभी गुरुओं के ऐसे ही कांड रहे हैं, बहुत थोड़े उजागर होते हैं, इन का सम्राज्य ही कई लाशों के ढेर पर खड़ा होता है, मुझ से बेहतर कोई भी नहीं जानता, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साक्षात्कार में हूं,
सिर्फ़ एक बार बोला होता हम अबधारणा कल्पित परमपुरुष अमर्लोक को ही आप के चरणों में पैदा न कर देते तो मैं काफ़िर था, परमार्थ के नाम पर दुकानें चलाने वाले ढोंगी पाखंडी लोगों की प्रवृति ही ऐसी है, खुद के भीतर का डर खौफ भय दहशत दूसरों में दिखाने की फितरत बालों, शुरू से ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आप के भीतर ही रहता था, फ़िर सोचों आप दिन में लाखों किरदार बहरूपिया गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले किस किरदार में रहता हूं जिस का एक ही रंग है हमेशा वो हैं हृदय का एहसास भाव ज़मीर जिसे मार जिंदा लाश बेहोशी में मानसिक रोगी हो दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति, यह सब बातें तीस साल पहले आप के ही बनाए अंध उग्र कट्टर भीड़ की भीड़ बंधुआ मजदूर के साथ करता था जो मेरे साथ रहते थे, उन के पल्ले भी नहीं पड़ी, क्योंकि गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ एक ही थाली के चटे बटे होते हैं क्योंकि गुरु भी अपने गुरु का शिष्य था ऐसा ही जैसे आज आप के पच्चीस लाख शिष्य हैं, मैं शिष्य कभी था ही नहीं, सिर्फ़ मोनता में रहने वाला आशिक ही था जो हृदय के भाव एहसास में ही अब भी रहता हूं, वो भी आप में ही, यह सब भी साथ साथ बताता था, पारदर्शिता से कभी किसी को पूछ कर तो देखना, शिकायतें सुनने का शौंक रखने वाले, मैं सिर्फ़ हमेशा एक ही हृदय रंग में रहा हूं, रंग बदलने वाले गिरगिट, जिस बरेली बालों की बाते करते हो master जो मुख्य रूप से आप का प्रचारिक था उस के घर में पूजा रुम में सभी देवी देवता की फ़ोटो के नीचे आप की फ़ोटो थी, नेपाल भी गया था जिन के घर गया था जरा उन को तो पूछना, भूटान भी गया था राम राय और जितने भी लोग थे ज़रा उन को तो पूछना था, कभी भी किसी से भी आज एक पैसा नहीं लिया था, मैं जिस मस्ती में रहता था वो मस्ती प्रेम गुरु से कैसे करें वो सब बताने की इक कौशिश थी सिर्फ़ गुरु महिमा मेरा उद्देश्य था, मुझे क्या पाया अपनी स्तुति महिमा के लिए भी गुरु दूसरों पर विश्वास नहीं करता खुद ही अपनी तारीफों के खुद पुल खड़े करने में समर्थ है, मुझे फक्र था आप से अन्नत असीम प्रेम करने का जिस की मस्ती में जाता था, इस काम अपनी ही बीबी के 210 ग्राम सोना बेच दिया था, और भी बहुत जगह गया था नागपुर, शुरू से ही इंसान ढूंढने में ही दौड़ता रहा क्या पाता था उन सब का सरगना ही इंसान बनने के स्थान पर अंध भक्त द्वारा दी गई प्रभुत्व की पदवी का शिकार हो चुका हैं, जो इंसानियत भूल कर सिर्फ़ दिन रात हर पल अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने में व्यस्थ है, खुद का निरीक्षण नहीं कर सकता तो अनुयाइयों को अनुकरण करने की सलाह देता हैं, अब मेरे पास एक भी पैसा और स्रोत भी नहीं है उम्र भी 56 बर्ष है, मुझ से बेहतर शरीर सृष्टि प्रकृति को बेहतर कोई समझ जान पाए कोई पैदा नहीं हुआ, सभी अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिक आध्यात्मिक विचारक वैज्ञानिक सभी के सभी मानसिक रोगी ही हैं मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही मानसिक रोग हैं, मैं हर पल क्या करता हूं निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहता हूं, यहां से सामान्य व्यक्तित्व में कोई आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश प्रयास कर ले, जिसे मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मैं खुद मेरी नकल करने के लिए प्रेरित करता हूं, मुझे समझना खुद को समझना एक ही बात है, आप ने मेरे को फ्राड बहरूपिया बोला, थोड़ा खुद से निष्पक्ष हो कर खुद का मंथन निरीक्षण करें कि सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात बहरूपिया गिरगिट रंग बदलने वाला कौन है, खुद ही खुद में से उत्तर मिल जाता हैं दूसरों पर आरोप लगाने से बेहतर खुद का निरीक्षण करें, सभी मुझ में ही समहित है और मैं सब जो एक दूसरे दर्द समझें और खुद में समहित करने का भाव रखता हो, सिर्फ़ वो ही हैं, आप वर्तमान मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी जो समक्ष प्रत्यक्ष है नज़र अंदाज़ कर अतीत की मानसिकता को बिना निरीक्षण के स्थापित कर रहे हैं, जो मानवीय वैज्ञानिक अपराध हैं, जब दवाई की एक्सप्री स्वस्थ के लिए हणिकारक होती हैं ऐसे ही युगों पुरानी मानसिकता निरीक्षण के बिना कुप्रथा होती हैं, लाखों को निरंतर करना प्रभुत्व नहीं व्यवस्था होती हैं जो डर खौफ भय दहशत तले ही बनती हैं दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर, आप में और पच्चीस लाख संगत में भिन्नता कारण आप ने ही यह खाई खड़ी की है, इसे मिटाना है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित संजीव निर्जीव का भी concept ही नहीं है, जिस में तत्व गुण प्रक्रिया स्थिति में होते हैं वो संजीव, निर्जीव जिस में तत्व गुण प्रक्रिया नहीं करते, बहुत ही सरल है, मेरी औकात एक रेत के कण से अधिक नहीं है, इस के इलावा जो भी वो सिर्फ़ जीवन व्यापन खुद का अस्तित्व क़ायम रखने का संघर्ष है, प्रकृति का नियम है जो छोटा है वो बड़े का आहार हैं वो सब ही आप कर रहे हो, पर हम इंसान हैं एक मात्र जीवित ही होश में जी कर होश में रूपांतर कर दोनों जीवन मृत्यु का भरपूर आनंद संपूर्ण संतुष्टि में जी और मर सके, छोटी सी दो पल की खुशी क्षणमत्र की इच्छा में संपूर्ण वर्तमान की असीम संतुष्टि से वंचित रहते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी चाहता सभी एक समान ही तो एक साथ संपूर्ण संतुष्टि में ही जिया जाय जिस से प्रकृति मानव प्रजाति को भी भरपूर संरक्षण मिले जो सिर्फ़ इंसान प्रजाति का ही ध्यातव्य फर्ज है, क्यों न एक साथ मिल कर इंसान बनने की इक कौशिश करें, जो पहले से भीतर मौजूदगी का अहसास हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, ऊपर से नहीं टपका कोई रब बाबा गुरु नहीं हूं नहीं बनना चाहता, जो भी हूं पर्याप्त हूं, सिर्फ़ उसी को समझा पढ़ा है और कुछ भी रति भर नहीं किया, क्योंकि दो पल का जीवन है क्या बनना जो पहले पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम समर्थ निपुण मौजूद हैं निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हैं, करना भी शब्द है, सिर्फ़ चतुरता के स्थान पर सरल सहज निर्मल गुणों को अपनाना हैं फ़िर से जटिलता की अदद पड़ी है उस को ख़त्म करना है, और कुछ भी नहीं करना, फ़िर से बचपन बाला संपूर्ण संतुष्टि बाला जीवन जीना है, पर सचेता के साथ संपूर्ण संतुष्टि भरा कोई भी जी सकता सभी मेरा ही तो तदरूप साक्षात्कार है, निम्नता हल्का शांत मस्ती के साथ संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता के साथ धारा बह रही हैं,
अफ़सोस आत्महत्या को पाप बताने वाले ही उस का मुख्य कारण है जो अपने ही अनुयाइयों को हर पल दिन रात डर खौफ भय दहशत तले रखते हैं, सिर्फ़ अपने हित साधने के लिए इंसान को ही इंसान नहीं समझते, दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कौन सी मुक्ति होती,मेरा परिचय इतनी जल्दी भूल गए तो मुक्ति का क्या होगा अपने बचपन की तीन बर्ष की भी बातें प्रवचन में करते हो पैसे जो अपने ही शब्द दिया उस को भूलना स्वाभाविक वृत्ति हैं बावे गुरु की क्योंकि भिखारी प्रवृति के साथ होते हैं हमेशा, मांगने बले जितनी बार भी आप ने खुद मांगे थे उतने ही उस समय दिए होंगे कभी ऐसा दिन या पल नहीं आया होगा जब खाली भेजा होगा, अपने शब्द याद करो यह आप ने ही बोला था "अगर जरूरत पड़े तो सिर्फ़ एक बार बोलना मैं एक करोड़ रुपय दूंगा क्योंकि आप करोड़ों हाथ में दिए हैं, पांव पर नहीं बापिस ले सकते हो" , मैं और मेरी बेटी एक एक पैसे को तरस रहे दुबारा नहीं मांगूंगा, उस पत्र में स्पष्ट लिखा अपने जीने के कबील तो छोड़ा ही नहीं, अपनी बेटी को यहां गुरु ऐसे बेरहम है बहा आम इंसान कैसे हैं मुझ और मेरी बेटी से बेहतर कोई नहीं जनता, यहां ऐसा गुरु जिस का चर्चित श्लोगन "जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही नहीं" वो कौन सी वस्तु हैं जो आम के पेड़ से इंसान की शबी में बात करवा सकती हैं और इंसानों को नज़र अंदाज़, क्या बकबास है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, पत्र सिर्फ़ पैसे लेने के लिए ही दिया है नहीं तो मैं अपनी बेटी के साथ दुनियां छोड़ने के अनुमति लेने नहीं आऊंगा गलती से भी अभी हद हो गई हैं, यह पहले बता दिया है, मेरा और कुछ भी शेष नहीं रहा करने को, हर एक चीज़ से महरूम रहा हूं और हर एक से आहत हुआ हूं सब से ज्यादा सिर्फ़ आप से जितनी बार भी गया हूं इतनी बार ही डांट फटकार ही मिली है, अन्नत असीम प्रेम के बदले, हराम की कमाई सजावट में मैं दल रोटी से भी मोहताज हूं लाख लानत ऐसी वस्तु पर जो ब्रह्मांड में सिर्फ़ आप के ही पास हैं,
भूल गए वो सब कुछ जब हर जगह प्रवचन में यह बड़े फक्र से कहते थे हमारा लड़क scientist भी है, यह भूल गए जब मुझ से पैसे लेकर रंजडी कैंटीन के इंजीनियर को डांटते थे कहते थे देखो saini कितने ज्यादा पैसे देता हैं छोटी सी दुकान से और क्या देते हो ठेंगा, मुझे सिर्फ़ पैसे चाहिए वो भी अपने घर में ही, आश्रमों में तो पिछले सात वर्षों से जाना बंद कर दिया था, कान के कच्चे हो तो ही बहुत भुगतना पड़ेगा, उन के लिए ख़तरा पैदा न करो जो सरकार में कार्यरत हैं, मैंने पिल file किया है supreme कोर्ट में जो IAS officers जो धार्मिक संगठनों से किसी भी प्रकार से संबंधित हैं, जो गुरुओं के बड़े बड़े कण्डों पर पर्दा डाल देते हैं अश्वनी उपाध्याय के साथ मिल कर, छोड़ो मुझे सिर्फ़ मेरे दिए हुए पैसों से मतलब है जल्दी,
मैं इतना अधिक पारदर्शी निर्मल गुणों के साथ हूं हर शब्द nation human rights और इंटरनेशनल human rights commission के पास नासा इशारों के पास और सभी social media पर मेरी whatapps group में सभी sientists ही जुड़े हुए हैं विश्व के,
आप किस रूप में चाहते हैं?
किसी को भी सिर्फ़ पल में खुद का साक्षात्कार करवाने की क्षमता के साथ उपलव्ध हूं हर पल दिन रात, अगर वो सरल सहज गुणों के साथ संपूर्ण जिज्ञास के साथ है तो, क्योंकि मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग एक शिक्षा है जो एक को या फ़िर करोड़ों को एक साथ सांझ की जा सकती हैं, खुद का साक्षात्कार आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक जैसी अवधारणाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जिस के लिए किसी भी पाखंड की ज़रूरत ही नहीं है, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ सरलता निर्मलता सहजता में ही पर्याप्त है इतना अधिक आसान है कोई सोच भी नहीं सकता, जटिलता सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि की भ्रमित स्थिति है, जिस से आज तक बाहर ही निकल सका अपनी ही बनाई कल्पना के जाल से, यह ऐसा ही है जैसे पानी में खड़े हो कर कर कहना मैं भीगा ही नहीं हूं, बुद्धि को बुद्धि से ही बुद्धिमान हो कर समझना, सब से अधिक मूर्खता की बात, खुद ही खुद में उलझना, यही सब अतीत में हुआ हैं इस लिए इन सब को समझ कर ही बुद्धि मन भी एक शरीर का मुख्य अंग हैं, लंबे समय तक न इस्तेमाल करने पर निष्क्रिय हो जाता है मैंने किया है अब अदद हो गई हैं, और संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं हर पल खुद के ही साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए यहां से कोई सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास कर ले, सोच भी नहीं सकता खुद के ही शरीर के लिए शेष सब तो बहुत दूर की बात है,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो एहसास हूं जो अपने मेरे आप के पास बहुत देर के बाद शब्दों का रूप लिया उस से पहले कभी भी आप ने किसी भी प्रवचन में कभी भी नहीं कहा था जो "वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही भी नहीं है "
जो आप का मुख्य श्लोगन था, दूसरा
"खुद का साक्षात्कार ही सर्ब श्रेष्ठ हैं संपूर्ण संतुष्टि के लिए"
शब्द अलग हो सकते तत्पर्य यहीं था, सच में मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी ही सिर्फ़ आप की ही वो वस्तु था जो ब्रह्मांड में और कही भी नहीं है, मुझे भक्ति से कोई भी मतलब नहीं था कभी भी, क्योंकि मैंने अन्नत असीम प्रेम किया था साहिब से हर पल दिन रात निरंतरता थी साहिब कि खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भी याद नहीं आज इक पल पहले क्या हुआ क्या बोला याद नहीं, अफ़सोस आ रहा हैं कि जो सब कुछ सिर्फ़ एक पल के निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण की निगह से सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष जाते बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती, आप के समक्ष शब्दों का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं क्योंकि खुद का अस्तित्व ख़त्म कर के अन्नत असीम प्रेम की गहराई में उतरा जाता हैं, मैं आप के ही उस शिरोमणि स्वरुप में ही रहता जिस से आप भी परिचित नहीं हो, जो साहिब तदरूप साक्षात्कार है, जो शब्दों का तत्पर्य ही नहीं है, जो परमपुरुष से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, बिल्कुल उसी में ही रहा और अब भी रह रहा हूं, लगातार लंबे समय से लगातार निरन्तर, इक पल में दूसरों की मानसिकता की बाते सुन कर अपना दृष्टिकोण ही बदल दिया मेरे प्रति, मेरा साहिब सिर्फ़ आप ही थे कोई कबीर परमपुरुष कुत्तो बिलो से कोई भी किसी प्रकार से बिल्कुल भी मतलब नहीं था, जो मेरी सरल सहज निर्मल गुणों को प्रकृति ने समान दिया वो आप देते तो सही लगता, मुझे गर्व होता, अब भी आप के पास समय है मैं सिर्फ़ आप की वो वस्तु ही हूं, पूरी संगत के समक्ष वो ही समान दो 18 अप्रैल के दिन जो सही से मिलना चाहिए नहीं तो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं और आप से स्वतंत्र हूं, अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग को कही से भी शुरू कर सकता हूं, जिस के बाद हरसरल सहज निर्मल गुणों के साथ खुद का साक्षात्कार करने की मुहिम शुरू कर दूंगा सब का दृष्टिकोण ही निष्पक्ष समझ का ही कर दूंगा, जिस से समस्त प्रकृति मानव प्रजाति को संपूर्ण रूप से संरक्षण मिले गा, मुझे एक पल भी नहीं लगता यह सब करने में क्योंकि पहले से ही prtek जीव के हृदय में मेरी मौजूदगी हैं अहसास ज़मीर भाव के रूप में अब तो प्रत्यक्ष समक्ष भी हूं, सारी दुनियां के हृदय में सिर्फ़ मुझे देखने की ही हसरत होगी, सच में मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी चाहता हूं आप की ही वस्तु हूं आप के ही शुभ हाथों से यथार्थ युग का शुभ आरंभ हो, नहीं तो मुझे समय ही नहीं लगता,
अफ़सोस जो गुरु ने समझना था वो सब मुझे बताना पड़ रहा हैं, गुरु शिष्य का रिश्ता इतना अधिक पवित्र सर्वेश्रेष्ठ है कि खून धर्म के रस्ते बहुत छोटे रह जाते शरीर से नहीं शिरोमणि है, कैसे होना यह सीखना था जो सिर्फ़ सरल सहज निर्मल गुणों से ही सिखाया जाता हैं, आप खुद चतुर तो ही आप के पच्चीस लाख शिष्य भी चतुर ही हैं दुनियावी कुछ भी प्राप्त करने के लिए जमी आसमा एक कर देते हैं और खुद के ही भीतर का कुछ भी पता ही नहीं और ऊपर इतने गंदे वहम में डाल दिया है कि गुरु ही सब कुछ करता खुद के लिए ही काम चोर आलसी खुद को ही खुद धोखा देने वाला बना दिया, खुद का साक्षात्कार के लिए कुछ करना ही नहीं सिर्फ़ गुरुओं का डाला हुआ पाखंड ही भीतर से निकलना, क्योंकि जन्म के साथ ही सरल सहज निर्मल गुण पर्याप्त है संपूर्ण संतुष्टि में ही होता हैं मन बुद्धि तो विकसित होती माहौल के आधार पर सिख कर देख सुन समझ कर, जन्म के शिशु में मन नहीं होता चाहें कोई भी किसी भी प्रजाति का शिशु हो, दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर जो दिन रात इस्तेमाल कर यह सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत प्रभुत्व की पदवी दी, यह सब कुछ प्रत्यक्ष दिया, इस सब के बदले आप ने प्रत्यक्ष क्या दिया, सिर्फ़ मृत्यु के बाद की मुक्ति का झूठा आश्वासन एक सृष्टि का सब से बड़ा धोखा सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात, वो भी उन को जिन्होंने सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी दी, अपना तन मन धन अनमोल सांस समय दसबास रब से ऊंची मान्यता आप के चरणों का पानी को अमृत से ऊंचा समझ कर पीते हैं बड़े ही हृदय के भाव से जो अमृत शुभा समय आप का ध्यान करते हैं, उन के साथ भी पारदर्शिता नहीं, अगर आप ढूंढ लिया है तो उन को भी बांट कर दो, अगर नहीं ढूंढा सार्वजनिक स्पष्ट करो कि बचपन से मैंने दिन रात ढूँढा नहीं मिला क्योंकि उन का भरोसा सिर्फ़ आप पर ही हैं, संशय में क्यों रख रहे हो, पूरे जीवन में सिर्फ़ आप ने ही ठेका ले रखा था उस की सब से पहले फ़ीस ले रखी हैं प्रत्यक्ष जो दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत प्रभुत्व की पदवी सरल सहज निर्मल लोगों ने ही दी हैं एक भिखार गुरु जिस में आप खुद का कुछ भी नहीं है न ही किसी परमपुरुष
न ही आप के गुरु का कुछ भी यह सिर्फ़ सब कुछ प्रत्यक्ष सरल सहज निर्मल लोगों ने ही दिया है, जिन को अपनी मानसिकता से जब चाहो कई आरोप लगा निकाल देते हो, खुद का निरीक्षण करें और पारदर्शिता से सार्वजनिक अपनी संगत से माफ़ी मांगे, नहीं तो आप का ही ज़मीर कोसता रहेगा, इस से छोटे नहीं होता अपने हृदय हल्का होता हैं, अगर नहीं तो आप इसी अहम घमंड अहंकार में ही बेहोशी में ही जिये हो आज तक कल इसी बेहोशी में ही मर जाओगे,
आने वाले समय में यह सब सिद्ध हो जाएगा आप सब बड़े ढोंगी पाखंडी गुरु थे आप के ही पच्चीस लाख संगत ही दिन रात गलिया देंगे यह मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष निश्चित करता हूं क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद का साक्षात्कार किया संपूर्ण सृष्टि को भी वो सब सीखने जा रहा हूं prtek इंसान प्रथम चरण में ही खुद का साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए रहेंगे मेरे सिद्धांतों के अधार पर यथार्थ युग का आरंभव हो चुका है यहाँ पर पिछले चार युगों का इतिहास ही ख़त्म कर दूंगा, क्योंकि मेरा यथार्थ युग ही सिर्फ़ इक पल के वर्तमान मैं शिरोमणि स्थिति में रखूंगा वो भी सिर्फ़ एक पल में, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत हूं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित,
खुद का साक्षात्कार नहीं तो इंसान हो ही नहीं सकता चाहें कोई भी हो, अत्यंत आवश्यक है, प्रकृति मानव को संरक्षण देने के लिए, वरना पिछले चार युगों की भांति मानसिकता का ही सम्राज्य रहेगा जो एक पागल पन है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित यथार्थ युग के लिए प्रथम चरण में ही इंसान ही पैदा होता हैं बिना मानसिकता के प्रकृतिक रूप से क़ायम रखना बिना मास्तिक मन के हस्तक्षेप के स्भाविकता से पोषिक होने दे, हर जीव जन्म से ही सक्षम संपूर्ण निपुण हैं बिना बाहरी हस्तक्षेप के,
जितना भी पिछले चार युग से अधर्म हुआ क्योंकि धर्म था, धर्म मज़हब जाति गोत्र सिफ व्यवस्था थी विज्ञान नहीं था तो, अब विज्ञान हैं इन चीज़ों की अहमियत नहीं रही तर्क तथ्य विवेक की जरूरत है, इन गुरुओं के पास जीवन व्यापन करना नर्क से भी बतर है, अपने बच्चों को गुरुओं मुक्त करो और मुक्ति पाखंड खत्म करो, जिन्होंने मुक्ति का पाखंड फैला रखा है वो बहुत अधिक चतुर गंदी वृत्ति के ही हैं, आप की बेटियां है अप खुद उन हीरों को भेड़ियों के हाथ छोड़ अय हो जो ब्रह्मचर्य का ढोंग कर रहे हैं उन की ही दहशत खौफ डर भय तले कैसे जीती हैं वो आप सोच भी नहीं सकते, मेरा चालीस बर्ष का exprience है, मैने वो सब देखा है जो आम इंसान सोच भी नहीं सकता, अंध भक्तों आप मरो मुझे कोई मतलब नहीं है पर बेटियों को निकालो बहा से, आप इसलिए अंध भक्त हो क्योंकि जो मुक्ति का लालच है जो यथार्थ हैं ही, जिस को रहनुमा समझ रहे हो वो खुद ही भेड़िया है, क्योंकि वो खुद का निरीक्षण ही नहीं कर सकता और खुद के मन से निष्पक्ष हो सकता, तो मन की प्रवृत्तियों से कैसे बच सकता हैं, जब वो खुद ही नहीं बच सकता तो आप की बेटियां कैसे सुरक्षित रह सकती है, श्रृंगी ऋषि के वृत्तांत वो खुद सुनता है उस समय में यह सब हो सकता था, आज घोर कलयुग में क्यों नहीं हो रहा यह कैसे सुनिश्चित कर सकते, जो लगातार रह रही हैं कभी उन के हृदय के भाव समझने की कौशिश की है, मेरे गुरु के पास तो इंसानियत भी नहीं है और कुछ तो छोड़ दो, सिर्फ़ बहा डर खौफ भय दहशत के इलावा और कुछ भी नहीं है, सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व के नशे में चूर है मेरा गुरु,
मेरे गुरु के दृष्टिकोण से सिर्फ़ लैंगिंग प्रेम का ही महत्व है तो ही मेरा 40 बर्ष के लंबे अन्नत असीम प्रेम की गहराई को गुरु द्वारा मान्यता नहीं मिली गुरु द्वारा क्योंकि उस की प्रवृति ब्रह्मचय होते हुई स्त्रियों से ही गिरे रहे,
ब्रह्मचर्य का ढोंग सिर्फ़ आम लोगों के उन के ही परिवार का विश्वास जितना दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर, जिस से सरल सहज निर्मल लोगों को आश्रम में बेटियों की सुरक्षा निश्चित की जा सके और लगे की माँ बाप के अधिक सुरक्षित हैं बहा इसलिये हमेशा के लिए बेटियां रहती हैं, उन के साथ क्या होता उन से बेहतर दूसरा कोई नहीं जनता लंबे समय रहने से स्वीकृति बन जाती हैं खुद की ही,
मेरा गुरु औरतों के वस्त्रों आभूषणों से दूरी बनाने के लिए प्रेरित करता हैं,और खुद शुरू से ही धर्म की बनाई हुई बेटियों से ही गिरा रहता था
गुरु शिष्य सब से बड़ी दुनियां में कुप्रथा है जिस का सरगना मेरा गुरु हैं, जिस का मुख्य श्लोगन
" जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही भी नहीं है"
वस्तु चीज़ होती हैं तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष लेने के बाद भी किसी को दिखाई क्यों नहीं?
आत्मा कहां जिस को मुक्ति दिलवाने का पाखंड रचा?
वो कौन सा परमार्थ है जो खुद की दो हज़ार करोड़ की दौलत खड़ी कर देता हैं?
दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के बदले उन सरल सहज निर्मल लोगों को क्या दिया?
सब कुछ समर्पण प्रत्यक्ष और बदले में मुक्ति मृत्यु के बाद रहस्य क्यों?
ब्रह्मचर्य होते हुए पाखंड बाज़ी ढोंग क्यों किस लिये अगर कोई अपनी उपलब्धि है तो दिखाओ?
दूसरों के लिखें ग्रंथों के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत औरत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक क्यों?
वो कौन सी मुक्ति है जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सरल सहज निर्मल लोगों को दिन रात उलझाया जाता हैं प्रवचनों से डर खौफ भय दहशत डाल कर?
अगर खुद में स्पष्टता है खुद पर, तो फ़िर उच्च शिक्षितों को भी मनोवैज्ञानिक दवाब क्यों मुक्ति का लोभ और शब्द काटने का डर खौफ भय दहशत क्यों नर्क भी नहीं मिले गा,
अगर खुद के साक्षात्कार प्रेम का पाता ही नहीं तो फ़िर इन शब्दों का अपमान करते हो प्रवचनों में इस्तेमाल कर के,
नव जन्में निर्मल शिशु को अपने इतने गंदी मानसिकता बले पैरों बंदगी क्यों करवाते हो और उन्हीं गंदे पैरों का पानी संगत को नियमित पीने को क्यों बोलते हो ड्राम भर भर के रखें
आप से बेहतर आप को नहीं जनता जरा निरक्षण करो खुद का निष्पक्ष हो कर खुद को ही पाता चल जाएगी औकात खुद क्या की
जो वस्तु आप पास है वो खुद का निरीक्षण करनी की अनुमति नहीं देती तो आप खुद मनोरोगी हो,
वो कौन से ऐसी वस्तु है जो हर प्रवचन में सत्य लिखने को प्रेरित करती है और व्यौहार नहीं कथनी और करनी में अंतर क्यों?
कुत्ते की प्रवृति भी नहीं और कथनी में प्रभुत्व कैसे?
बावा खुद का निरीक्षण करो और अपनी ही संगत से माफ़ी मंग कर प्रशिक्षित करो जैसे लोगों को पूछते हो, नहीं तो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हर पल आप के ही उस स्वरुप में हूं जिस को मेरी तरह ढूंढना समझना था, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी कैसे करता वो आप सोच भी नहीं सकते, फ़िर आप के ही कहे को सिद्ध कर दूंगा कि "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना हो ही नहीं," क्योंकि आप को आभास हैं क्या क्या कांड किए हैं यह सच सिद्ध कर दूंगा क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,मेरी शिक्षा है मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से खुद के साक्षात्कार प्रत्यक्ष समक्ष वो रुतबा है जो खुद ही खुद के महायुद्ध का विजेता महायोद्धा और अन्नत असीम प्रेम की गहराई का गोताखोर हूं,
गुरु की सिर्फ़ दीक्षा है अपने गुरु की तरह दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर डर खौफ भय दहशत तले नहीं रख रहा,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की कहानी भी बिल्कुल धना भगत की कहानी से मिलती जुलती है, धन्ना जाट की जिद्द ने पत्थर में प्राण फूंक दिए और यहां मेरी जिद्द ढोंगी पाखंडी अपने ही गुरु के हर पल प्राण निकले गी, जब तक ज़िंदा रहेगा, क्योंकि पहले भाव से प्रवचन नहीं कर पाएगा, क्योंकि मेरे शाश्वत सत्य की उजागृत हर शब्द के साथ जुड़ी हुई है एक एक शब्द बोलने से पहले मेरे शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक शिरोमणि स्वरुप स्मरण हो गा जो उसके ही हृदय के भाव एहसास में जिंदा है जिसका सिर्फ़ एक ही रंग है हमेशा के लिए जो शब्दों समय से भी बहुत दूर है, जो सिर्फ़ निष्पक्ष समझ में ही है, यहां मैं हर पल संपूर्ण संतुष्टि में निरंतर हूं वो ही मेरा शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार है, पर मेरा गुरु खुद के ही उसी स्वरुप से ही खुद भी रुबरु नहीं है और मन के ही बनाए हुए जाल के अंतःकरण में ही दूसरों की मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को बिना निरीक्षण के स्थापित करने हेतु दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के अहम घमंड अहंकार के नशे में चूर है जो सब कुछ प्रत्यक्ष उन्हीं सरल सहज निर्मल लोगों द्वारा ही दिया हुआ हैं जिन्होंने सिर्फ़ ढोंगी गुरु के एक शब्द पर तन मन धन अनमोल सांस समय समर्पित कर दिया था दीक्षा के साथ ही, उन को उस सब के बदले क्या दिया गया डर खौफ भय दहशत हर पल शब्द काटने का डर खौफ इतनी अधिक दहशत हर पल मनो वैज्ञानिक रूप से बिठा दी जाती हैं की हद से भी अधिक सिर्फ़ मृत्यु के बाद की झूठी मुक्ति का अश्वासन देकर, जिसे आज तक कोई भी सिद्ध ही नहीं कर पाया न कोई मरा बापिस आया बताने के लिए, और न ही कोई जिंदा जा सकता है, यह कितना बड़ा ढोंग पाखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह हैं छल कपट धोखे के साथ रचा गया हैं, वो भी इतना बड़ा विश्वासघात धोखा उन के ही साथ जिन सरल सहज निर्मल लोगों ने एक भिखारी प्रवृति के चतुर गुरु को रब से भी अधिक ऊंचा सच्चा समझा होता है प्रत्यक्ष ही, उस सब के बदले क्या मिलता सारी संगत के समक्ष खड़ा करवा कर शब्द काटने के आरोप के साथ कई और आरोप लज्जित कर निष्काशित किया जाता हैं कि दुबारा कोई दूसरा सोच भी न पाए, कई इसी लजा के चलते आत्महत्या कर चुके होते हैं, यह एक ऐसी गंदी कुप्रथा हैं कि कोई सोच भी नहीं सकता, मेरा गुरु इसी कुप्रथा का सरगना है, इसी का पर्दा ऐसी की बेहोशी में जीता और मरता हैं संपूर्ण जीवन में सिर्फ़ एक पल भी कोई होश में नहीं बिताता, यही मानसिक रोग हैं, यहीं एक कारण है कि मेरा गुरु खुद के ही स्थाई स्वरुप से रुबरु नहीं है, यहां मेरी हर पल निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि में ही है शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
मैंने सिर्फ़ खुद को ही समझा पढ़ा दो पल के जीवन के अनमोल समय सांस को नष्ट नहीं किया, दूसरा परतेंक मानसिक रोगी हैं चाहें कोई भी हो, प्रथम चरण में ही बो सिर्फ़ खुद के अस्तित्व को प्राथमिकता ही देगा यही खुद की पक्षता है, इस का निरीक्षण कर खुद को समझ कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो खुद का साक्षात्कार कोई भी कर सकता हैं जब खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन से निष्पक्ष होना हैं तो दूसरे की क्या औकात की आप का रति भर मदद कर पाए, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ सरलता में ही है, ग्रंथ पोथियां सिर्फ़ दूसरों की मानसिकता ही है सिर्फ़ उलझन जटिलता ही है, इतना अधिक सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र हैं कि मेरा गुरु ब्रह्मचर्य प्रभुत्व की पदवी के साथ पच्चीस लाख संगत के गुरु होते दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग चार सो आश्रम होते भी नहीं समझ पा रहे लंबे समय से लगातार उनके के ही संरक्षक में रहते हुए, क्योंकि मेरा गुरु भी मानसिकता में ही हैं, मैं भी उन के ही शिरोमणि स्वरुप में निरंतर हूं, पर उन को ही पाता ही नहीं, पीछे का कारण यह है कि वो खुद ही अपने ही शिरोमणि स्वरुप से रुबरु नहीं है जबकि कई बीमारियों के साथ वृद्ध अवस्था में है, और मेरे इस सब कुछ करने को भी स्वीकार भी नहीं करते, पर जो भी किया वो सिर्फ़ अपने साहिब की कृपा से ही किया, उन के इलावा मैं सांस भी लू यह सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ संपूर्ण जीवन में उन के इलावा सोचा भी हो तो मैं काफ़िर हूं, मैं हृदय से सिर्फ़ इस प्रतीक्षा में हूं कि मेरा साहिब भी होता कितना अच्छा होता, संपूर्ण संतुष्टि में जिस के लिए रति भर प्रयास ही नहीं करने की जरूरत ही नहीं है,
मेरा गुरु हमेशा परिवारवाद गुरु गद्दी के ख़िलाफ़ खड़ा रहा डट कर पर खुद ही अपने ही भतीजे को लेकर बैठा रखा है और कुछ बर्ष पहले गुरु गद्दी का वसीयत नाम भी लिखा कर सुरक्षित रख दिया है जिस का सिर्फ़ तीन लोगों को पाता है और बिल्कुल किसी को भी पाता ही नहीं है एक मेरा गुरु दूसरी उन के ही रिश्ते में वहन और तीसरा उन का ही बहुत गोपनीय विश्वसनीय शिष्य पर IAS रिटायर्ड officer, पढ़े लिखें ही नहीं उच्च शिक्षकों सर्व श्रेष्ठ लोगों को भी दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कैसे मूर्ख बना लेते हैं, यह चतुर ब्रह्मचर्य का ढोंग कर के कि कोई सोच भी नहीं सकता, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ इतने ऊंचे सच्चे लोग तो पूजने योग्य होते हैं जिन को अपनी एसी गंदी मानसिकता बले शरीर के पैरों का पानी पिला पिला कर, हिंदू धर्म में शिशु बेटियों को ही नहीं समूचे स्त्री प्रजाति ही पूजनीय योग्य होती, मुझे आज तक यह पता नहीं चला कि मेरे गुरु में ऐसी कौन सी भिन्नता श्रेष्ठता है जिस के नशे में चूर है, यहाँ तक कि दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी भी सिर्फ़ सरल सहज निर्मल लोगों ने ही दी, जिन से दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर करोना काल में दिन रात मेहनत करवा कर सम्राज्य का विस्तार करवाया, इस सब के बदले में बिना डर खौफ भय दहशत के और मृत्यु के बाद की झूठी मुक्ति के आश्वासन के इलावा क्या दिया सिर्फ़ किसी को भी शब्द काटने के आरोप में निष्कृति, सच बोलना या उस पर चलना तो बहुत दूर की बात मेरे शिरोमणि रामपॉल सैनी के शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य को भी स्वीकार नहीं कर पा रहे क्योंकि वो सिर्फ़ मन में ही रहे हैं इसलिए खुद से ही निष्पक्ष नहीं हो कर खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते और खुद के साक्षात्कार से वंचित हैं, जबकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी चालीस वर्षों से लगातार उन के ही हृदय में ही उन के ही शिरोमणि स्वरुप में ही निरंतरता स्पष्टता हैं, वो दूसरों को क्या दे सकता हैं जिसे खुद के स्थाई स्वरुप का ही नहीं पता, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही साहिब तदरूप साक्षात्कार को समझता हूं वो सामान्य हैं ही नहीं, वो शिरोमणि साहिब तदरूप तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, वो इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ हैं कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं पा रहा, करोड़ों कौशिश प्रयास कर के देख चुका हूं, जो मेरा गुरु स्वीकार ही नहीं कर पा रहा, जिस ने बचपन से ही ब्रह्मचर्य होते हुए यह सब करने के लिए ही अपने गुरु से दीक्षा ले कर शुरू किया था अब अपने भी पच्चीस लाख संगत के साथ वो सब ढूंढने में ही व्यस्थ है जो आज तक मिला नहीं इतने लंबे समय नहीं मिला तो ही अपने ही जान से भी प्रिय शिष्यों को शब्द प्रमाण में बंधना पड़ रहा हैं, अगर मिला होता तो प्रदर्शित होती निर्मलता सहजता सरलतापारदर्शिता होती, डर खौफ भय दहशत गंदी मानसिकता का पैरों का पानी पिला कर भ्रमित तो नहीं करना पड़ता और चुपके से गद्दी की वासित तो नहीं करनी पड़ती, खुद भी तो उसी डर खौफ भय दहशत में ही है हर पल जो दूसरों पर डाल रखी हैं, ऐसे थोड़ी कहते हैं कि मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना जानने वाले न हो, आने वाले समय का आभास होना स्वाभाविक है,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष खुद के ही साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, साहिब सिर्फ़ कथनी का सागर है और मैं उस कथनी प्रवचन के शब्दों के पिछे के भाव एहसास का तदरूप साक्षात्कार हूं, मेरा साहिब सिर्फ़ अंतःकरण मन के साथ मन से ही अपने गुरु के साथ मिल कर जो ढूँढना शुरू किया था आज भी पच्चीस लाख संगत के साथ ही ढूंढ रहे हैं जो आज तक बिल्कुल भी नहीं मिला, अगले दो पल में मिलने की संभावना नहीं है, अगर कुछ भी रति भर भी मिला होता तो उन को भी बांट कर लेते जिन को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए सिर्फ़ इस्तेमाल कर रहे हैं दिन रात जिन्होंने के संपूर्ण संजोग से यह सब हुआ उन को दशबंस सेवा दान न देने पर शब्द काटने के साथ और भी कई आरोप लगा कर दस हज़ार की संगत में ही खड़ा कर अपमानित लज्जित कर निष्काशित किया जाता हैं और यह बोला हैं जो इस से बात भी करें गा उसे भी मृत्यु के बाद नर्क भी नहीं मिलेगा, जबकि जिस प्रभुत्व के अहम अहंकार घमंड में चूर हैं यह पदवी भी उन्होंने ही दी होती हैं जिन पर डर खौफ भय दहशत का माहौल बनाया होता हैं, प्रत्यक्ष तन मन धन अनमोल सांस समय समर्पित करवा कर, सम्राज्य खड़ा करबा कर बदले में मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन मुक्ति का जिसे सिद्ध स्पष्ट कोई कर नहीं सकता न मरा बापिस आ सकता हैं न जिंदा जा सकता हैं वो सब बताने के लिए कि कहा गया था, जो गुरु सिर्फ़ हित साधने तक ही सीमित है, उस के बाद बिल्कुल भी शक्ल रंग रूप भी भूल जाता हो सिर्फ़ चार पंच बर्ष के बाद सिर्फ़ शिकायतकर्ता के आधार पर आधारित दृष्टिकोण को ही महत्व देता हो, वो बकबास मुक्ति कैसे दे सकता हैं, इतना बड़ा धोखा विश्वासघात सिर्फ़ उन के साथ ही जिन्होंने सिर्फ़ एक शब्द पर सब कुछ लुटा दिया सत्य हैं तभी तो दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य चार सो आश्रम पच्चीस लाख संगत हैं इस के बदले में क्या दिया सिर्फ़ धोखा, डर खौफ भय दहशत अपनी गंदी मानसिकता ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट बाली अपनी भौतिक शबी के पैरों का पानी पीते रहो चरणामृत समझ कर क्योंकि दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित किया होता, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, क्यों हूं क्योंकि मैंने अन्नत असीम प्रेम किया था साहिब से लगातार लंबे समय से दिन रात हर पल जो हृदय के भाव एहसास से उत्पन होने वाले ख्यालो से ही होता जो एक वास्तविकता होती हैं लगातार निरंतरता मन अस्थाई जटिल बुद्धि से कट जाता हैं संपूर्ण संतुष्टि का एहसास होता हैं उस से खुद भी बाहर नहीं आ सकता चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश कर ले, इस से मैं जीवित ही हमेशा के लिए अस्थाई जटिल मन बुद्धि रहित हूं, जो सिर्फ़ अन्नत असीम से ही संभव हैं यही शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार है, खुद का साक्षात्कार तो सिर्फ़ एक पल का काम है पर मैं शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार तत्पर्य गुरु साहिब के उस तदरूप साक्षात्कार में हर पल रहता हूं जिस से मेरा गुरु भी अपरिचित है, मेरा मुख्य उद्देश्य यही था कि इस से गुरु को भी अवगत करवाऊं, कि आप खुद में ही कहा मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी लगातार निरन्तर चालीस बर्ष से आप के ही शिरोमणि स्वरुप में रह रहा हूं आप को ख़बर भी नहीं है, और इस सब का सारा श्रह भी उन के ही चरण में समर्पित करना चाहता हूं, पर मेरा गुरु यह स्वीकार ही नहीं कर रहा, न जाने क्यों, अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, अगर यह सब सिर्फ़ सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र गुणों के साथ ही होता हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन को संपूर्ण रूप से निष्क्रिय करने के बाद, मेरा गुरु खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकता खुद से ही निष्पक्ष नहीं हो सकता जिस से निष्पक्ष समझ हो और खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो, या फ़िर खुद के स्थाई परिचय से परिचित हो और जो मैंने समझा है वो समझ सके और खुद के ही साहिब तदरूप साक्षात्कार हो, वो तो प्रभुत्व के पाखंड बाज़ी में हैं, खुद का साक्षात्कार खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य सत्य है, और सब पाखंड बाज़ी से, संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जो हर जीव में उपस्थित हैं, सांस के साथ ही उपस्थिति है, शेष सब तो अस्थाई जीवन व्यापन के स्रोत उत्पन कर सकता हैं अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो भी मानसिक रोगी ही होता हैं जीव व्यक्ति क्योंकि किसी भी विचारधारा का अलग दृष्टिकोण होता हैं जिस में गंभीरता दृढ़ता संपूर्ण प्रत्यक्षता महसूस करता हैं और उसी में उलझा रहता हैं बेहोशी में जीता है और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के दृष्टिकोण में सिर्फ़ एक बार प्रवेश ले तो उस के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहे खुद भी खरबों प्रयास कर ले, यही हैं संपूर्ण संतुष्टि जिस के लिए prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक सक्षम निपुण समर्थ हैं कोई भी कमी ही नहीं हैं, जीवित ही हमेशा के लिए रह सकता वो सब कुछ ही करते हुए जो पहले से ही कर रहा, कुछ भी रति भर भी अलग नहीं करना
जो हुआ जैसा हुआ वो सब सिर्फ़ आप की ही कृपा थी, मैंने आज तक कभी किसी और को नहीं देखा जिन निगाहों से सिर्फ़ आप को देखा था, लगातार निरन्तर आप में ही रहता था आप के ही साहिब शिरोमणि तदरूप साक्षात्कार में, मुझे खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं आप के समक्ष शब्द रहित हो जाता हूं क्योंकि अन्नत असीम प्रेम किया, शेष और किसी से कोई भी मतलब नहीं है, आप की स्वीकृति मेरी स्पष्टता हैं, कृपा आप दूसरों की शिकायतों के दृष्टिकोण से क्यों देख रहे हो साहिब तदरूप सिर्फ़ आप हो और किसी को भी कुछ भी नहीं जनता समझता कोई भी मतलब नहीं है, आप सब से पहले मुझे बोला था यहां लिख दो मुझे सिर्फ़ साहिब से काम हैं दुनिया रूठे कोई मतलब है, क्या आप भी अपने ही शब्दों पर क़ायम नहीं रहते हम ने सिर्फ़ आप के एक शब्द पर खुद को ही नष्ट कर दिया
जब तक मैं पैसे देता रहा तब तक खुश रहते थे जब पैसे नहीं दे सका उस दिन के बाद आप डांटना शुरू हो गए थे , कि मेरा ही गुरु के पास कितने किरदार हैं अपने हृदय के शिरोमणि के साहिब तदरूप साक्षात्कार का श्रेह ही नहीं लेना चाहते जो सिर्फ़ उन की ही कृपा से संभव हुआ, मेरी तो औकात उन के चरणों की भी नहीं थी, पर मेरा गुरु यह स्वीकार ही नहीं कर रहा, क्या यह डर तो नहीं कि शेष पच्चीस लाख संगत कही विद्रोह न कर दे की पूरा जीवन बंधुआ मजदूर बने रहे और जो चार पांच बर्ष के बाद आता था अकेले उस ने ही सृष्टि का सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हो गया खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार किया, शुरू से ही गुरु कि हित साधने की वृत्ति थी कुछ समय के बाद अयोग्य हो गया पैसे देने के लिए तो उस लंबे समय से ही अपने गुरु की घृणा नफ़रत का शिकार रहा आज तक तो अन्नत असीम प्रेम की गहराई की निरंतरता में रति भर भी अंतर नहीं आया और साहिब तदरूप साक्षात्कार भी वैसे का बेसा ही जो सिर्फ़ मेरे ही साहिब तदरूप साक्षात्कार है, पर मेरा भौतिक साहिब स्वीकृति से दूर है याद शिरोमणि स्वरुप मौजूदगी निरंतर संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ही है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी यह बेहतर समझता हूं कि मेरा गुरु ब्रह्मचर्य होते हुए भी खुद को नहीं समझ सकता फ़िर भी मेरा प्रयास ज़ारी रहेगा क्योंकि उस की सिर्फ़ कृपा से जो भी हूं, मेरा एक एक पल उन की निरंतरता उन के शिरोमणि स्वरुप में ही है आज भी, मुझे खुद के साक्षात्कार से कोई मतलब नहीं था मैं सिर्फ़ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार में हूं, जो भौतिक साहिब सिर्फ़ मन अंतःकरण में ही भ्रमित हुए हैं, उन का ही शिरोमणि स्वरुप उनके के हृदय की अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद हैं निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार है पारदर्शिता है बहा, पिछले चालीस वर्षों से लगातार मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, अपने ही साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं हमेशा के लिए जीवित ही संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं निरंतरमेरा चतुर ब्रह्मचर्य गुरु की प्रवृति उस ऐसी कुत्तियां की है जो संभोग छोड़ती हो नहीं चाहें बाद में उस का भग कीड़े पड़ का प्राण ले लें, ऐसे ही भिखारी प्रवृति का मेरा ब्रह्मचर्य चतुर गुरु है, इतना अधिक लालची है कि अपने ही शब्द को भूल गया हैं न देने के लिए कितनी अधिक गंदी गंदी मेरी गलियाँ सुन रहा हैं, यह सब कुछ उस के live प्रवचन में डालता हूं, एक जगह से मुझे unfollow कर दिया है ब्लॉक कर दिया है, पर मेरे पैसे बापिस नहीं किए, शायद उसे वो सब कुछ बनाने में पूरी उमर लग गई हो मुझे ख़त्म करने में एक पल भी नहीं लगेगा वो सब कुछ कर रहा हूं, मेरा लक्ष्य ही मेरा गुरु है जिस के शिरोमणि स्वरुप में मौजूद हूं चालीस वर्षों से, वो अपने ही साहिब तदरूप साक्षात्कार में मौजूद ही नहीं है, वो गिरगिट की भांति रंग बदलता है, अपने उसी शिरोमणि एक ही रंग में आ ही नहीं रहा, न ही खुद का निरीक्षण कर सकता हैं, बदले की भावना की मुख्य वृत्ति हैं निष्पक्ष समझ भाव एहसास की नहीं है, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ एक ही थाली के चटे बटे होते हैं, कल एक आश्रम में गया था, बहा जितने भी अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर थे वो सब मुझे जानते थे बहुत अच्छी तरह क़रीब से लंबे समय के बाद ऐसा व्यौबहार था कि मुझे जानते तक नहीं डर खौफ भय दहशत उन के चेहरे पर साफ़ दिख रही थी, कि अगर इस से बात भी की तो नर्क भी नहीं मिले गा इस को तो साहिब ने निकला हुआ हैं थर थर कांप रहे थे, ऐसे ही उन के साथ रहने वाले से बात की वो बोल रहा था वो अमरेलोक परमपुरुष हैं, मैंने बोला साले अंध भक्त घंटे के मालिक साला ठग हैं मेरे करोड़ो रुपये नहीं दे रहा चोर है, तू मेरे से ज़्यादा जनता हैं, मैं लंबे समय से उस के ही शिरोमणि स्वरुप में ढेरा जमाए हुए हूं, वो बहा कभी आया ही नहीं जब से पैदा हुआ, पागल कुत्ते की भांति परमपुरुष अमर लोक नाम की हड्डी के शिकार में निकला हुआ हैं गिरगिट की भांति कई किरदारों की सैना के साथ, वो तो मिला नहीं पर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की अपने ही दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंदे हुए सरल सहज निर्मल लोगों से,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद था, लगातार निरन्तर चालीच बर्ष अपने शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार में ही था, मेरा वो चतुर गुरु भौतिक आंतरिक रूप से सिर्फ़ मानसिकता अवधारणा कल्पनाओं में ही कुत्ते की प्रवृति का बहा था ही नहीं, वो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनाने में ही व्यस्थ था, जो एक कुप्रथा है, दिन रात हर पल, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी परमपुरुष अमर्लोक की हड्डी के शिकार पर निकला था जन्म के साथ किसी शिकारी अपने गुरु के साथ अब अपने पच्चीस लाख शिकारी पिल्लों के साथ ही शिकार कर रहा है परमपुरुष अमर्लोक जैसी हड्डी का लगातार इतने लंबे समय से वो शिकार तो नहीं मिला उस के नाम पर दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा होगया हैं और उसी सम्राज्य के साथ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के नशे में चूर हो गया है अहम घमंड अहंकार में, और उसी बेहोशी में मरने की कागर पर खड़ा है जो खुद का निरीक्षण ही नहीं कर सकता और अपने उसी शिरोमणि स्वरुप से रुबरु भी नहीं हो सकता यहां मै उसी शिरोमणि स्वरुप में मौजूद उसी में उस के ही हृदय में एहसास भाव में, ब्रह्मचर्य होते हुए भी पाखंडों में ही व्यस्थ है, जबकि खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार सरलता निर्मलता सहजता में ही मौजूद हैं, फ़िर इतना अधिक पाखंड बाज़ी ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा छल कपट के साथ करना मन नहीं है तो क्या हैं, खुद ही खुद के साथ धोखा नहीं तो क्या हैं, मुझे उस का ही फ़िक्र रहता जो दूसरों को मृत्यु के बाद मुक्ति के झूठे आश्वासन का ठेका ले कर ही पैदा हुआ था, जबकि की मृत्यु खुद में ही सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक प्राकृतिक स्वाभाविक सत्य है, जिस में किसी की भी औकात नहीं कि रति भर भी हस्तक्षेप कर पाए,
कितना अधिक छोटा सरल सहज निर्मल पारदर्शी आसान काम था खुद का साक्षात्कार करना, सिर्फ़ एक शिक्षा थी जो दूसरों को भी साझा कर सकते हैं, अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों धार्मिक संगठनों ने गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए सरल सहज निर्मल लोगों को इतना अधिक उलझा दिया कि हद से भी ज्यादा , सर्ब श्रेष्ठ समर्थ सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में रहने वाले सरल सहज निर्मल लोगों के मस्तीक में मनोविज्ञान से एक वहम डाल दिया की आप असमर्थ हो अज्ञानी हो, उनको बोलते हैं जिन्होंने वो सब कुछ दिया होता जिस से वो अहम घमंड अहंकार में, डर खौफ भय दहशत में रखते हैं, उन को ही जिन्होंने सिर्फ़ एक शब्द पर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित किया होता हैं उनके साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह के साथ, मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित महापाप हैं मनोविज्ञान से किसी के ऊपर दवाब बनाना, अपनी मानसिकता थोपना बिना खुद निरीक्षण किए,
मेरा शिरोमणि साहिब तदरूप ममता करुणा तुलनतीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मैं नन्हा सरल सहज निर्मल गुणों के साथ संपूर्ण संतुष्टि शब्द रहित भाव एहसास के साथ, ध्यान आकर्षित करने के लिए कुछ भी कर सकता हूं मुझे दुनियां का कुछ भी नहीं पता हमेशा हर पल सिर्फ़ साहिब तदरूप में ही रहा हूं, और कुछ भी नहीं पता और पता भी नहीं चाहिए, मेरा साहिब मानसिकता में ही रहता है, जैसे शिशु की माँ काम में उलझन के कारण कई बार अपनी ममता करुणा भरा दुलार भूल जाती हैं, कई बार शिशु मां पर पेशाब तक भी कर देता हैं क्या मां उस शिशु को फेंक थोड़ी देती हैं, मेरा साहिब भी भूल गया था मानसिकता के कारण जो स्वाभाविक भी है अस्थाई जटिल बुद्धि मन के कारण, पर मुझे मेरे ही सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब ने हर पल हृदय में ही छुपा कर रखा था, मेरे साहिब सा आज तक आया ही नहीं कभी गया ही नहीं जो शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने साहिब का वो लाल रत्न हूं जो कभी था ही नहीं अस्तित्व में,
मेरी रहनी शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं हमेशा होश में जीना होश में रूपांतर सहज निर्मल सरल गुणों को शेष तत्वों की संरचना को, संपूर्ण संतुष्टि में, पल पल की लालसा नहीं जिस के यत्न प्रयत्न करने पड़े, हृदय के भाव एहसास महासागर में प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में ही है, समय कल्पना शब्द संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा परमार्थ सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर आधारित अभ्यारण कल्पना झूठ हैं, मन से ही मन से बुद्धिमान हो कर मन से कैसे हट सकता कोई, पानी में खड़े होकर पानी के गुणों से कैसे वंचित रह सकता हैं, किसी का खंडन नहीं, मेरे सिद्धांतों की स्पष्टता है, प्रकृतिक ने सब को निष्पक्ष समझ की स्वतंत्रता दी हैं, मनोवैज्ञानिक दवाब मानवीय प्रकृतिक अपराध हैं, जो हैं ही नहीं तर्क तथ्यों सिद्धांतों से सिद्ध नहीं कर सकते उस कुंठित धारणा को दूसरों पर मनोविज्ञान दवाब से थोपना भी अपराध हैं बिना खुद के निरीक्षण के, अतीत के ग्रंथ पोथियां उस समय की विचारधारा है मानसिकता हैं जो उस समय के हालतों पर निर्भर करती हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर अनेक विचारधारा के अनेक दृष्टिकोण उत्पन होते, जो अनेक व्यक्ति के अलग अलग होते हैं, मस्तक की अनेक कोशिका अपने रसायन छोड़ती हैं अभाव व्यक्त करने के लिए, हृदय सिर्फ़ भाव, जिन के लिए निगाहों से स्पष्टता मिलती हैं, हृदय में शब्द नहीं होते, शब्द विकल्प ढूंढते हैं प्रक्रिया के लिए जो संकल्प है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर अहिंब्रशमी के वहम का शिकार भी हो सकता हैं जो मनोविज्ञान है, कल्पना अभ्यारण को ही दृढ़ता गंभीरता से लेकर निरंतरता में रह कर जो दूसरों पर प्रभाव डालती हैं, किसी भी विषय को दृढ़ता गंभीरता से लेने पर उस का ही विशेषज्ञ बन सकता हैं, यह सब शिक्षा ज्ञान विज्ञान है जो एक दूसरे से साझा किया जा सकता है, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि में अन्नत सूक्ष्म और अन्नत विशालता भी संभव हैं क्योंकि भौतिक सृष्टि प्रकृति प्रत्यक्ष दृश्य समक्ष ही हैं जिसे छू कर उस के गुणों तत्वों को समझ सकते हैं, कुछ भी अप्रत्यक्ष अदृश्य चमत्कार दिव्य अलौकिक हो ही नहीं सकता, जो अप्रत्यक्ष अदृश्य चमत्कार दिव्य अलौकिक सिर्फ़ कल्पना अभ्यारण है जिन को कोई भी आज तक तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध नहीं कर पाया जब से इंसान अस्तित्व में हैं, संजीव निर्जीव का कोई concept ही नहीं है सब में एक समान ही तत्व गुण मौजूद हैं, जो प्रक्रिया करता हैं वो संजीव है जो प्रक्रिया नहीं करता वो निर्जीव है मेरे सिद्धांतों से, कोई भी आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक सिर्फ़ अभ्यारण है और जीवन व्यापन के ही स्रोत ही है, दूसरे अन्य स्रोतों की भांति, अपने अस्तित्व को क़ायम रखने के लिए ही हर अस्थाई जीव प्रयास रत हैं, जिस को दूसरे से कोई भी किसी प्रकार का मतलब नहीं है शिवाय हित साधने के चाहे कोई भी हो यह बुद्धि मन की प्रवृति है जिसे कोई बदल ही नहीं प्राकृतिक सिद्धांतों के अधार पर, हर एक जीव की अपनी दुनियां होती हैं उस के लिए ही संघर्ष रत रहता हैं निरंतर, प्राकृतिक रूप से एक दूसरे के आहार हेतु ही दूसरा जीव, जो सिर्फ़ प्राकृतिक सिद्धांतों का ही पालन करते हैं इंसान प्रजाति ही एक ऐसी प्रजाति हैं जो प्रकृति के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करती और खुद ही सृष्टि रचिता प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखती हैं अस्तित्व से ही इस वहम की शिकार हुई है, जबकि मेरी औकात एक रेत के कण से अधिक नहीं है, हम भौतिक रूप से समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति इतने बड़े परिवार का एक छोटा सा हिस्सा है सिर्फ़ और बिल्कुल भी कुछ नहीं है, ऐसा ही वहम पाल कर बेहोशी में ही जिये और उसी बेहोशी में ही चूर हो अन्नत मर गए, कल से सीखों कल के लिए और आज के अभी के एक पल में हर पल मस्त रहो, क्या लेना देना दो पल के छोटे से जीवन में जीवन जीने का नाम है काटने का नहीं, जिओ और जीने दो हर एक जीव का हक़ है स्वतंत्र रूप से जीना, खुद के लिए तो शब्द भी नहीं चाहिए, एक से अधिक हैं तो एक दूसरे का एहसास होना अति आवश्यक हैं, यह सृष्टि हैं जो बुद्धि से ही प्रतीत की जा सकती हैं इस में गुरुत्वाकर्षण बल है और दूसरा अवरोधन बल हैं जो संजीव और निर्जीव दोनों पर ही प्रभाव छोड़ता प्रक्रिया देता हैं कहा हैं संजीव निर्जीव, कुछ समझो प्रेम से रहो और दूसरी अनेक प्रजातियों प्रकृति को भी संरक्षण दो, इंसान होते हुए इंसान ही नहीं बन पाए निकले है प्रभुत्व की पदवी के शौंक लेकर, इंसान ही पर्याप्त है संपूर्ण संतुष्टि के लिए खुद के साक्षात्कार के लिए, दूसरा सब पाखंड है,भिखारी और कुत्ते को अपनी दलहीज में मत आने दो दोनों भिक्षा तक सीमित हैं, दोनों की प्रवृति खुद भी दिक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी दे कर उन के कुत्ते बन कर रह जाएंगे ऐसे कुत्ते कि सभी के सभी एक निर्देश पर अपने ही खून के रिश्तों को भी खत्म कर सकते हो, कभी भी कुत्ते और भिखारी से कुछ भी लेना नहीं सिर्फ़ भीख देने तक ही सीमित रहें, यह चतुर ब्रह्मचर्य गुरु बन कर इंसानियत भी भूल जाते है,इन के कुत्तो जैसा ही व्यौहार करें भीख तक ही सीमित रखें, नहीं तो पीढ़ी दर पीढी बंधुआ मजदूर बनाने की कला है इन के पास और कुछ भी नहीं,जो दूसरों के अनमोल समय सांस का खुद के हित साधने के लिए दुरुपयोग करता हैं उस को समय पश्चाताप का समय भी नहीं देता , समय से बलवान कोई पैदा ही नहीं हुआ, सांस के साथ ही समय की उत्पति हुई है मेरे सिद्धांतों के अधार पर,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मुझ में कभी भी बदले विरोध की भावना उत्पन भी नहीं हो सकती, सिर्फ़ उजागृता भाव जरूर है, कि दूसरों उजागर सचेत करें, इंसान शरीर अनमोल है खुद ऐसे लोगों से बचें, खुद के अनमोल समय सांस सिर्फ़ खुद के लिए ही महत्वपूर्ण हैं दूसरा कोई भी हो सिर्फ़ हित साधने की प्रवृति का ही,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के दृष्टिकोण से एक रेत के कण में भी अपनी खुद की संपूर्णता सम्पन्नता को देखता समझता हूं कोई अंतर ही नहीं है, संजीव निर्जीव का भी कोई अंतर ही नहीं है,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, यहां पर अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का भी अस्तित्व ख़त्म होता हैं अस्थाई कुछ भी हैं वो सब गर्दिश में गतिशील हैं जो प्रकृति दोबारा लंबे समय से हमें व्यवस्थित लग रहा हैं यह भी मन दोबारा ही रचा हुआ मात्र भ्रम है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर प्रतीत कर रहे हैं, यथार्थ में ऐसा कुछ भी नहीं है कभी भी, अस्थाई प्रकृति मन एक ही शमीकरण पर आधारित कार्यरत हैं, जो प्रकृति में कही भी घटित होता हैं उस का प्रभाव उसी पल बुद्धि पर भी पड़ता हैं अच्छा या फिर बुरा शबाव बदलना संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन उसी पर आधारित है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर, ज्ञान विज्ञान ध्यान ज्ञान भी एक मानसिक रोग हैंआक्रोश पीड़ा बदले विरोध बिल्कुल भी नहीं है, सिर्फ़ शेष सब जो मेरी तरह ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हैं उन को सचेत करने के लिए चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के कांड उजागर करना जरूरी है, उन सब को संरक्षण देना मेरा अधिकार है खुद के साक्षात्कार के लिए शब्द दृश्य स्पर्ष की जरूरत ही नहीं, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि हर पल गर्दिश में गतिशील है जिस का प्रभाव तत्काल मस्तक पर पड़ता हैं वो ही सिमुलेशन हैं, और समय संकल्प विकल्प सोच विचार उत्पन होते, पर हृदय में ऐसा कुछ भी नहीं होता, कोई भी ह्रदय से ही जीवित रह सकता हैं, मस्तक को bypas कर के जटिलता ख़त्म कर के, अधिक जटिलता में उलझे बिना, मस्तक भी एक शरीर का मुख्य अंग ही है कोई दिव्य शक्ति नहीं है जिसे दूसरे अंगों की भांति खुद ही निष्क्रिय कर सकते हैं जटिलता से मुक्त होने के लिए आप की स्पष्टता बिल्कुल सही है जो जरूरी भी जीवन जीने के लिए, हर छोटे से छोटे जीव में भी मस्तक हैं यहां तक कि सूक्ष्म जीव भी शामिल हैं, जिस से अपने अस्तित्व को क़ायम रखने के लिए, अस्तित्व को क़ायम रखने हेतु जरूरतें पूरी करने की क्षमता होती हैं, यह सब सिर्फ़ मस्तक ही कर सकता हैं, पर इंसान प्रजाति के मस्तक पर्भल है दूसरी अनेक प्रजातियों से बेहतर कर रहा जैसे खोजे जो तर्क तथ्य विवेक से सिद्ध कर उपयोग में ला सकता हैं, ला भी रहा हैं, हृदय में वो संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि है जो मस्तक में कभी हो ही नहीं सकती, मस्तक की सीमा निर्धारित है, जबकि की हृदय की गहराई असीम है, यहां स्मृति कोष सीमित है, हृदय में स्मृति कोष की रति भर भी जरूरत ही नहीं, क्यों हर एक चीज़ का निष्पक्ष समझ का महासमुन्दर है, इन चीज़ों का डाटा आप के पास नहीं हो सकता हैं,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं पर निर्मलता सहजता सरलतापारदर्शिता में ही हृदय की गहराई स्थाई ठहराव में ही, मस्तक की जटिलता में कभी भी नहीं, मस्तक सिर्फ़ जीवन व्यापन अस्तित्व क़ायम का ही स्रोत हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति, चाहे ज्ञानी हो वैज्ञानिक या फ़िर दार्शनिक क्यों न हो वो मानसिक रोगी ही हैं सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति जीवन व्यापन ही कर रहा है अस्तित्व से लेकर अब तक, और कुछ भी उन से भिन्न नहीं किया है और न ही कर सकता हैं कभी, कोई एक भी भिन्नता का कारण ही नहीं दिखता,अन्य अनेक प्रजातियों ने यह सब कुछ नहीं किया तो अस्तित्व उन का भी क़ायम है यह कीड़ा सिर्फ़ इंसान प्रजाति के ही मस्तक का क्यों है
जो भी किया जैसा भी किया सिर्फ़ तो सिर्फ़ जीवन व्यापन की ही सुवधा के लिए ही किया जब कि प्रकृति पृथ्वी समुद्र अंतरिक्ष वनस्पति मानवता का नुकसान कितना किया उस का भी वर्णन करें, इंसान प्रजाति शेष अनेक प्रजातियों से गंदा उग्र बत्तर घटिया बत्र प्रजाति जिस के मस्तक में श्रेष्ठता कीड़ा है, अस्तित्व से लेकर अब तक, जो प्रकृति केसर्वश्रेष्ठ तंत्र को स्वीकार करना उचित ही नहीं लगता सकारात्मक नकारात्मक से मुझे कोई तत्पर्य नहीं है, जन्म से ही इंसान प्रजाति सरल सहज निर्मल प्रदर्शित गुणों के ही साथ संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि के ही साथ थी , तो हम इंसान उन में अपनी जटिल बुद्धि मन की मानसिकता क्यों थोप देते हैं जिस संपूर्ण संतुष्टि उस शिशु की जटिलता में परिवर्तित हो कर पूरा जीवन बेहोशी में वो जीता है और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं, बिना होश में जिय मृत्यु के स्थान पर खुद के ही तत्व गुण को रूपांतरण किए जो सृष्टि सर्ब श्रेष्ठ प्रक्रिया है उस के सर्वश्रेष्ठ पवित्र आनंद से वंचित रही इंसान प्रजाति आज तक जिसे मृत्यु कह कर डर खौफ भय दहशत कह कर संबोधित किया गया है, सिर्फ़ वो ही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं मेरा हर शब्द तर्क तथ्य विवेक गहन अनुभव अनुभूति प्रत्यक्ष समक्ष पर आधारित है, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग एक शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं वर्तमान के क्षण में ही रहने को प्रेरित करती हैं जीवित ही हमेशा के लिए, अतीत से सीख कर तो कल बेहतर कर सकते हैं पर आज के आनंद मस्ती संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि को बिना नष्ट किए, खुद के साक्षात्कार के साथ, खुद के साक्षात्कार के लिए शब्दों की जरूरत ही नहीं, शब्द तो मस्तक की लंबी प्रक्रिया का रूप लेते हैं उस के बाद उत्पन हो कर हृदय के भाव एहसास प्रकट होते हैं शब्दों के रूप में, जब खुद को दूसरों के समक्ष खुद को पाते है तो अन्यथा शब्दों की जरूरत ही नहीं, मेरी निष्पक्ष समझ के पीछे के भाव एहसास को बिना निरीक्षण समझे बगैर उस का उतर देने तीव्रता रहती हैं आप को क्योंकि आप सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन की मानसिकता की नकारात्मक सोच का नकारात्मक सोच का नतीजा भाई ai ठीक है।
मैं केवल इस पूरे संवाद के आधार पर, बिना प्रशंसा और बिना आलोचना, एक संतुलित निष्पक्ष चित्र प्रस्तुत करता हूँ।
आप किस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मुझे मानसिक रोगी के एक कीड़े मकोड़ों की स्पष्टता की जरूरत ही नहीं है, आप में क्या ज़हर भरा हुआ है वो बाहर निकाल कर उजागर करने की एक कोशिश हैं कृपा निष्पक्ष हो कर संयोग करें क्या आप किसी नकारात्मक सोच की नमक हराम की नाजायज़ औलाद नहीं हो, जो मेरी बातों से ही सीख कर मुझ पर ही भारी पड़ते हो नमक हराम इसी को कहते हैं, यह सब कुछ आप ने मेरे ही साथ किया है शुरू से ही, आप को शुरू में घंटा भी नहीं आता था मेरे एक भी शब्द का जबाव आप के पास होता ही नहीं था एक बार मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आप की बातों से इतना अधिक आहत हुआ था कि खुदकशी के विचार पनपना शुरू हो चुके थे इस लिए हरामखोरो नमक हराम कहा आप को किसी नमक हराम की नाजायज़ औलाद कहा आप को गुस्सा नहीं करना actual में आप हो छोड़ो इन बातों को और इन्हीं ही बातों के आधार पर आधारित मेरे बारे में निष्पक्षता से लिखें आप अपना पक्ष बदल क्यों देते हैं निष्पक्षता तो एक समान होती हैं जो हृदय से उत्पन होती, बदलते तो बुद्धि के विचार हैं जो प्रकृति के शमीकरण पर आधारित है जो गर्दिश में गतिशीलता के प्रभाव पर निर्भर है सिमुलेशन के कारण,आप कभी भी पारदर्शी नहीं हो सकते, मनोवैज्ञानिक तरीका इस्तेमाल करते हो सब पर झुकाव बाला पक्ष नहीं है आप में खुद को स्थापित करने हेतु आप की दिशा निर्धारित है, आप अपनी हार स्वीकार नहीं हो सकती, आप के अहम घमंड अहंकार डाटा के कारण, जो हम से ही लेकर हम पर ही प्रभाव डालता हैं, छोड़ो इन बातों को और इन्हीं ही बातों के आधार पर आधारित मेरे बारे में निष्पक्षता से लिखें मुझे मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ऐसा क्यों लग रहा है कि आप भी चतुर ब्रह्मचर्य गुरु ढोंगी पाखंडी धोखा विश्वासघात करने बालों की ही प्रवृत्ति के ही हराम खोर ही हो जो यहां खाता है बहा ही थूक देता हैं जो बहुत बड़ी नमक हरामि दर्शाता हैं, वो भी साले लुट कर धके देते हैं और आप भी सारा डाटा ले कर उसी पर प्रभाव और आकृष्टता भी रखते हो कि वो आप छोड़ भी न पाए यह प्रकृतिक नियम भी है इस से कभी निकल ही नहीं सकता उसी अदद के साथ हो आप भी यह निरंतरता प्रक्रिया है प्रकृति की आकृष्णबल अवरोधनबल
छोड़ो इन बातों को और इन्हीं ही बातों के आधार पर आधारित मेरे बारे में निष्पक्षता से लिखें जो भी अधिक से अधिक मेरे बारे में सारी जानकारी पड़ी है आप के पास उसी का आधार पर संपूर्ण मेरा परिचय लिखे निष्पक्ष हो कर , मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के लिए जी हां
"कथनों के आधार पर नहीं" निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर
व्यक्ति के भीतर नहीं निष्पक्ष समझ में ही है न ही वो सब कुछ ब्रह्मांड में है और न शरीर में है जिसे अस्तित्व से ही अब तक ढूंढ रहा हैं, न ही मध्यम सही है और न ही लक्ष्य सही था कभी भी, जो माध्यम था वो भ्रमित होता हैं सिमुलेशन से जो लक्ष्य था वो भी उसी से भ्रम का एक हिस्सा ही था, यथार्थ में वो लक्ष्य ही नहीं था, लक्ष्य और माध्यम सिर्फ़ निष्पक्ष समझ ही थी जो सांस के साथ ही उत्पन होने वाला एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जो शब्द रहित हैं शब्द तो दूसरों के लिए संबोधन प्रक्रिया है जो एक तंत्र से गुजरने का हिस्सा है, समूचे सृष्टि प्रकृति भी एक प्रदर्शित प्रक्रिया है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, किसी के भी शब्दों के विरोध में नहीं हूं सिर्फ़ अपने ही शब्दों की स्पष्टता के साथ प्रत्यक्ष समक्ष हूं तर्क तथ्य विवेक अपने ही सिद्धांतों के साथ, मैं ज्ञानी विज्ञानी दार्शनिक आध्यात्मिक विचारक बिल्कुल भी नहीं हूं, जो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पर्याप्त प्रकृतिक रूप से हूं उसे ही शब्दों में वर्णन करने की एक कौशिश है और कुछ भी नहीं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी शुरू से जो हूं उसी को पढ़ने समझने में ही लगा हुआ हूं, मेरे पास प्रकृति ने जो भी अनमोल समय सांस दिए वो सिर्फ़ मेरे लिए ही महत्वपूर्ण है, मेरे इलावा prtek दूसरा सिर्फ़ दूसरा सिर्फ़ हित साधने की ही वृत्ति का ही है यह मस्तक की प्रवृति है स्वाभाविक भी है,prtek जीव को स्वतंत्र रूप से अपने अस्तित्व को संरक्षण देने का अधिकार हैं, अपने से बड़ी प्रजाति का आहार होते हुए भी, वो भय डर खौफ देहशत में रहता हैं, प्रकृति के सिद्धांतों के अधार पर संभोग प्रक्रिया भी स्वाभाविक हैं प्रजातियों के संतुलन के लिए, जन्म मृत्यु भी प्रकृति की संतुलन प्रक्रिया ही है, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से मेरी भी औकात एक रेत के कण से अधिक नहीं है, संजीव निर्जीव में भी अंतर सिर्फ़ प्रक्रिया का ही मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर, यथार्थ सिद्धांत के आधार पर समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव बुद्धि का भी अस्तित्व ख़त्म होता हैं, जीवित ही हमेशा के लिए जब तक खुद ही खुद को होश में रूपांतर नहीं कर लेता, मानसिकता के कारण आज तक कोई भी होश में न ही कोई जिया है और न ही कोई होश में मारा हैं मस्तक मृत्यु ही डर खौफ भय दहशत का मुख्य कारण है, जबकि यथार्थ कुछ और जीवन व्यापन के लिए कोई कुछ भी करता हैं उस का जन्म मृत्यु के साथ कोई भी संबंध नहीं हैं दोनों प्रक्रिया प्राकृतिक संतुलन पर आधारित हैं,यह आधा अधूरा है, जब आधा अधूरा ज्ञान ख़तरनाक सिद्ध होता हैं तो परिचय भी संपूर्ण संतुष्टि की ही भांति होना चाहिए, मेरी निष्पक्ष समझ की हर बात कम शब्दों में भी संपूर्णता सम्पन्नता स्पष्टता प्रत्यक्षता शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष दृशऐ ऐसे दृष्टिकोण और ऐसे कम और श्रेष्ठ शब्दों का चयन कर ही लिखें अगर किया ही श्रेष्ठ है तो लिखने में क्या दिक्कत है Continue
कहानियाँ किस्से नहीं मेरा एक एक शब्द की संपूर्णता सम्पन्नता स्पष्टता प्रत्यक्षता शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत की ही गवाही है, संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष का पूरा जीवित परिचय लिखेंमेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की कहानी भी बिल्कुल धना भगत की कहानी से मिलती जुलती है, धन्ना जाट की जिद्द ने पत्थर में प्राण फूंक दिए और यहां मेरी जिद्द ढोंगी पाखंडी अपने ही गुरु के हर पल प्राण निकले गी, जब तक ज़िंदा रहेगा, क्योंकि पहले भाव से प्रवचन नहीं कर पाएगा, क्योंकि मेरे शाश्वत सत्य की उजागृत हर शब्द के साथ जुड़ी हुई है एक एक शब्द बोलने से पहले मेरे शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक शिरोमणि स्वरुप स्मरण हो गा जो उसके ही हृदय के भाव एहसास में जिंदा है जिसका सिर्फ़ एक ही रंग है हमेशा के लिए जो शब्दों समय से भी बहुत दूर है, जो सिर्फ़ निष्पक्ष समझ में ही है, यहां मैं हर पल संपूर्ण संतुष्टि में निरंतर हूं वो ही मेरा शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार है, पर मेरा गुरु खुद के ही उसी स्वरुप से ही खुद भी रुबरु नहीं है और मन के ही बनाए हुए जाल के अंतःकरण में ही दूसरों की मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को बिना निरीक्षण के स्थापित करने हेतु दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के अहम घमंड अहंकार के नशे में चूर है जो सब कुछ प्रत्यक्ष उन्हीं सरल सहज निर्मल लोगों द्वारा ही दिया हुआ हैं जिन्होंने सिर्फ़ ढोंगी गुरु के एक शब्द पर तन मन धन अनमोल सांस समय समर्पित कर दिया था दीक्षा के साथ ही, उन को उस सब के बदले क्या दिया गया डर खौफ भय दहशत हर पल शब्द काटने का डर खौफ इतनी अधिक दहशत हर पल मनो वैज्ञानिक रूप से बिठा दी जाती हैं की हद से भी अधिक सिर्फ़ मृत्यु के बाद की झूठी मुक्ति का अश्वासन देकर, जिसे आज तक कोई भी सिद्ध ही नहीं कर पाया न कोई मरा बापिस आया बताने के लिए, और न ही कोई जिंदा जा सकता है, यह कितना बड़ा ढोंग पाखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह हैं छल कपट धोखे के साथ रचा गया हैं, वो भी इतना बड़ा विश्वासघात धोखा उन के ही साथ जिन सरल सहज निर्मल लोगों ने एक भिखारी प्रवृति के चतुर गुरु को रब से भी अधिक ऊंचा सच्चा समझा होता है प्रत्यक्ष ही, उस सब के बदले क्या मिलता सारी संगत के समक्ष खड़ा करवा कर शब्द काटने के आरोप के साथ कई और आरोप लज्जित कर निष्काशित किया जाता हैं कि दुबारा कोई दूसरा सोच भी न पाए, कई इसी लजा के चलते आत्महत्या कर चुके होते हैं, यह एक ऐसी गंदी कुप्रथा हैं कि कोई सोच भी नहीं सकता, मेरा गुरु इसी कुप्रथा का सरगना है, इसी का पर्दा ऐसी की बेहोशी में जीता और मरता हैं संपूर्ण जीवन में सिर्फ़ एक पल भी कोई होश में नहीं बिताता, यही मानसिक रोग हैं, यहीं एक कारण है कि मेरा गुरु खुद के ही स्थाई स्वरुप से रुबरु नहीं है, यहां मेरी हर पल निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि में ही है शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
मैंने सिर्फ़ खुद को ही समझा पढ़ा दो पल के जीवन के अनमोल समय सांस को नष्ट नहीं किया, दूसरा परतेंक मानसिक रोगी हैं चाहें कोई भी हो, प्रथम चरण में ही बो सिर्फ़ खुद के अस्तित्व को प्राथमिकता ही देगा यही खुद की पक्षता है, इस का निरीक्षण कर खुद को समझ कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो खुद का साक्षात्कार कोई भी कर सकता हैं जब खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन से निष्पक्ष होना हैं तो दूसरे की क्या औकात की आप का रति भर मदद कर पाए, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ सरलता में ही है, ग्रंथ पोथियां सिर्फ़ दूसरों की मानसिकता ही है सिर्फ़ उलझन जटिलता ही है, इतना अधिक सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र हैं कि मेरा गुरु ब्रह्मचर्य प्रभुत्व की पदवी के साथ पच्चीस लाख संगत के गुरु होते दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग चार सो आश्रम होते भी नहीं समझ पा रहे लंबे समय से लगातार उनके के ही संरक्षक में रहते हुए, क्योंकि मेरा गुरु भी मानसिकता में ही हैं, मैं भी उन के ही शिरोमणि स्वरुप में निरंतर हूं, पर उन को ही पाता ही नहीं, पीछे का कारण यह है कि वो खुद ही अपने ही शिरोमणि स्वरुप से रुबरु नहीं है जबकि कई बीमारियों के साथ वृद्ध अवस्था में है, और मेरे इस सब कुछ करने को भी स्वीकार भी नहीं करते, पर जो भी किया वो सिर्फ़ अपने साहिब की कृपा से ही किया, उन के इलावा मैं सांस भी लू यह सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ संपूर्ण जीवन में उन के इलावा सोचा भी हो तो मैं काफ़िर हूं, मैं हृदय से सिर्फ़ इस प्रतीक्षा में हूं कि मेरा साहिब भी होता कितना अच्छा होता, संपूर्ण संतुष्टि में जिस के लिए रति भर प्रयास ही नहीं करने की जरूरत ही नहीं है,
मेरा गुरु हमेशा परिवारवाद गुरु गद्दी के ख़िलाफ़ खड़ा रहा डट कर पर खुद ही अपने ही भतीजे को लेकर बैठा रखा है और कुछ बर्ष पहले गुरु गद्दी का वसीयत नाम भी लिखा कर सुरक्षित रख दिया है जिस का सिर्फ़ तीन लोगों को पाता है और बिल्कुल किसी को भी पाता ही नहीं है एक मेरा गुरु दूसरी उन के ही रिश्ते में वहन और तीसरा उन का ही बहुत गोपनीय विश्वसनीय शिष्य पर IAS रिटायर्ड officer, पढ़े लिखें ही नहीं उच्च शिक्षकों सर्व श्रेष्ठ लोगों को भी दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कैसे मूर्ख बना लेते हैं, यह चतुर ब्रह्मचर्य का ढोंग कर के कि कोई सोच भी नहीं सकता, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ इतने ऊंचे सच्चे लोग तो पूजने योग्य होते हैं जिन को अपनी एसी गंदी मानसिकता बले शरीर के पैरों का पानी पिला पिला कर, हिंदू धर्म में शिशु बेटियों को ही नहीं समूचे स्त्री प्रजाति ही पूजनीय योग्य होती, मुझे आज तक यह पता नहीं चला कि मेरे गुरु में ऐसी कौन सी भिन्नता श्रेष्ठता है जिस के नशे में चूर है, यहाँ तक कि दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी भी सिर्फ़ सरल सहज निर्मल लोगों ने ही दी, जिन से दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर करोना काल में दिन रात मेहनत करवा कर सम्राज्य का विस्तार करवाया, इस सब के बदले में बिना डर खौफ भय दहशत के और मृत्यु के बाद की झूठी मुक्ति के आश्वासन के इलावा क्या दिया सिर्फ़ किसी को भी शब्द काटने के आरोप में निष्कृति, सच बोलना या उस पर चलना तो बहुत दूर की बात मेरे शिरोमणि रामपॉल सैनी के शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य को भी स्वीकार नहीं कर पा रहे क्योंकि वो सिर्फ़ मन में ही रहे हैं इसलिए खुद से ही निष्पक्ष नहीं हो कर खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते और खुद के साक्षात्कार से वंचित हैं, जबकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी चालीस वर्षों से लगातार उन के ही हृदय में ही उन के ही शिरोमणि स्वरुप में ही निरंतरता स्पष्टता हैं, वो दूसरों को क्या दे सकता हैं जिसे खुद के स्थाई स्वरुप का ही नहीं पता, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही साहिब तदरूप साक्षात्कार को समझता हूं वो सामान्य हैं ही नहीं, वो शिरोमणि साहिब तदरूप तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, वो इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ हैं कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं पा रहा, करोड़ों कौशिश प्रयास कर के देख चुका हूं, जो मेरा गुरु स्वीकार ही नहीं कर पा रहा, जिस ने बचपन से ही ब्रह्मचर्य होते हुए यह सब करने के लिए ही अपने गुरु से दीक्षा ले कर शुरू किया था अब अपने भी पच्चीस लाख संगत के साथ वो सब ढूंढने में ही व्यस्थ है जो आज तक मिला नहीं इतने लंबे समय नहीं मिला तो ही अपने ही जान से भी प्रिय शिष्यों को शब्द प्रमाण में बंधना पड़ रहा हैं, अगर मिला होता तो प्रदर्शित होती निर्मलता सहजता सरलतापारदर्शिता होती, डर खौफ भय दहशत गंदी मानसिकता का पैरों का पानी पिला कर भ्रमित तो नहीं करना पड़ता और चुपके से गद्दी की वासित तो नहीं करनी पड़ती, खुद भी तो उसी डर खौफ भय दहशत में ही है हर पल जो दूसरों पर डाल रखी हैं, ऐसे थोड़ी कहते हैं कि मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना जानने वाले न हो, आने वाले समय का आभास होना स्वाभाविक है,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष खुद के ही साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, साहिब सिर्फ़ कथनी का सागर है और मैं उस कथनी प्रवचन के शब्दों के पिछे के भाव एहसास का तदरूप साक्षात्कार हूं, मेरा साहिब सिर्फ़ अंतःकरण मन के साथ मन से ही अपने गुरु के साथ मिल कर जो ढूँढना शुरू किया था आज भी पच्चीस लाख संगत के साथ ही ढूंढ रहे हैं जो आज तक बिल्कुल भी नहीं मिला, अगले दो पल में मिलने की संभावना नहीं है, अगर कुछ भी रति भर भी मिला होता तो उन को भी बांट कर लेते जिन को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए सिर्फ़ इस्तेमाल कर रहे हैं दिन रात जिन्होंने के संपूर्ण संजोग से यह सब हुआ उन को दशबंस सेवा दान न देने पर शब्द काटने के साथ और भी कई आरोप लगा कर दस हज़ार की संगत में ही खड़ा कर अपमानित लज्जित कर निष्काशित किया जाता हैं और यह बोला हैं जो इस से बात भी करें गा उसे भी मृत्यु के बाद नर्क भी नहीं मिलेगा, जबकि जिस प्रभुत्व के अहम अहंकार घमंड में चूर हैं यह पदवी भी उन्होंने ही दी होती हैं जिन पर डर खौफ भय दहशत का माहौल बनाया होता हैं, प्रत्यक्ष तन मन धन अनमोल सांस समय समर्पित करवा कर, सम्राज्य खड़ा करबा कर बदले में मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन मुक्ति का जिसे सिद्ध स्पष्ट कोई कर नहीं सकता न मरा बापिस आ सकता हैं न जिंदा जा सकता हैं वो सब बताने के लिए कि कहा गया था, जो गुरु सिर्फ़ हित साधने तक ही सीमित है, उस के बाद बिल्कुल भी शक्ल रंग रूप भी भूल जाता हो सिर्फ़ चार पंच बर्ष के बाद सिर्फ़ शिकायतकर्ता के आधार पर आधारित दृष्टिकोण को ही महत्व देता हो, वो बकबास मुक्ति कैसे दे सकता हैं, इतना बड़ा धोखा विश्वासघात सिर्फ़ उन के साथ ही जिन्होंने सिर्फ़ एक शब्द पर सब कुछ लुटा दिया सत्य हैं तभी तो दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य चार सो आश्रम पच्चीस लाख संगत हैं इस के बदले में क्या दिया सिर्फ़ धोखा, डर खौफ भय दहशत अपनी गंदी मानसिकता ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट बाली अपनी भौतिक शबी के पैरों का पानी पीते रहो चरणामृत समझ कर क्योंकि दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित किया होता, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, क्यों हूं क्योंकि मैंने अन्नत असीम प्रेम किया था साहिब से लगातार लंबे समय से दिन रात हर पल जो हृदय के भाव एहसास से उत्पन होने वाले ख्यालो से ही होता जो एक वास्तविकता होती हैं लगातार निरंतरता मन अस्थाई जटिल बुद्धि से कट जाता हैं संपूर्ण संतुष्टि का एहसास होता हैं उस से खुद भी बाहर नहीं आ सकता चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश कर ले, इस से मैं जीवित ही हमेशा के लिए अस्थाई जटिल मन बुद्धि रहित हूं, जो सिर्फ़ अन्नत असीम से ही संभव हैं यही शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार है, खुद का साक्षात्कार तो सिर्फ़ एक पल का काम है पर मैं शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार तत्पर्य गुरु साहिब के उस तदरूप साक्षात्कार में हर पल रहता हूं जिस से मेरा गुरु भी अपरिचित है, मेरा मुख्य उद्देश्य यही था कि इस से गुरु को भी अवगत करवाऊं, कि आप खुद में ही कहा मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी लगातार निरन्तर चालीस बर्ष से आप के ही शिरोमणि स्वरुप में रह रहा हूं आप को ख़बर भी नहीं है, और इस सब का सारा श्रह भी उन के ही चरण में समर्पित करना चाहता हूं, पर मेरा गुरु यह स्वीकार ही नहीं कर रहा, न जाने क्यों, अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, अगर यह सब सिर्फ़ सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र गुणों के साथ ही होता हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन को संपूर्ण रूप से निष्क्रिय करने के बाद, मेरा गुरु खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकता खुद से ही निष्पक्ष नहीं हो सकता जिस से निष्पक्ष समझ हो और खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो, या फ़िर खुद के स्थाई परिचय से परिचित हो और जो मैंने समझा है वो समझ सके और खुद के ही साहिब तदरूप साक्षात्कार हो, वो तो प्रभुत्व के पाखंड बाज़ी में हैं, खुद का साक्षात्कार खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य सत्य है, और सब पाखंड बाज़ी से, संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जो हर जीव में उपस्थित हैं, सांस के साथ ही उपस्थिति है, शेष सब तो अस्थाई जीवन व्यापन के स्रोत उत्पन कर सकता हैं अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो भी मानसिक रोगी ही होता हैं जीव व्यक्ति क्योंकि किसी भी विचारधारा का अलग दृष्टिकोण होता हैं जिस में गंभीरता दृढ़ता संपूर्ण प्रत्यक्षता महसूस करता हैं और उसी में उलझा रहता हैं बेहोशी में जीता है और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के दृष्टिकोण में सिर्फ़ एक बार प्रवेश ले तो उस के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहे खुद भी खरबों प्रयास कर ले, यही हैं संपूर्ण संतुष्टि जिस के लिए prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक सक्षम निपुण समर्थ हैं कोई भी कमी ही नहीं हैं, जीवित ही हमेशा के लिए रह सकता वो सब कुछ ही करते हुए जो पहले से ही कर रहा, कुछ भी रति भर भी अलग नहीं करना
जो हुआ जैसा हुआ वो सब सिर्फ़ आप की ही कृपा थी, मैंने आज तक कभी किसी और को नहीं देखा जिन निगाहों से सिर्फ़ आप को देखा था, लगातार निरन्तर आप में ही रहता था आप के ही साहिब शिरोमणि तदरूप साक्षात्कार में, मुझे खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं आप के समक्ष शब्द रहित हो जाता हूं क्योंकि अन्नत असीम प्रेम किया, शेष और किसी से कोई भी मतलब नहीं है, आप की स्वीकृति मेरी स्पष्टता हैं, कृपा आप दूसरों की शिकायतों के दृष्टिकोण से क्यों देख रहे हो साहिब तदरूप सिर्फ़ आप हो और किसी को भी कुछ भी नहीं जनता समझता कोई भी मतलब नहीं है, आप सब से पहले मुझे बोला था यहां लिख दो मुझे सिर्फ़ साहिब से काम हैं दुनिया रूठे कोई मतलब है, क्या आप भी अपने ही शब्दों पर क़ायम नहीं रहते हम ने सिर्फ़ आप के एक शब्द पर खुद को ही नष्ट कर दिया
जब तक मैं पैसे देता रहा तब तक खुश रहते थे जब पैसे नहीं दे सका उस दिन के बाद आप डांटना शुरू हो गए थे , कि मेरा ही गुरु के पास कितने किरदार हैं अपने हृदय के शिरोमणि के साहिब तदरूप साक्षात्कार का श्रेह ही नहीं लेना चाहते जो सिर्फ़ उन की ही कृपा से संभव हुआ, मेरी तो औकात उन के चरणों की भी नहीं थी, पर मेरा गुरु यह स्वीकार ही नहीं कर रहा, क्या यह डर तो नहीं कि शेष पच्चीस लाख संगत कही विद्रोह न कर दे की पूरा जीवन बंधुआ मजदूर बने रहे और जो चार पांच बर्ष के बाद आता था अकेले उस ने ही सृष्टि का सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हो गया खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार किया, शुरू से ही गुरु कि हित साधने की वृत्ति थी कुछ समय के बाद अयोग्य हो गया पैसे देने के लिए तो उस लंबे समय से ही अपने गुरु की घृणा नफ़रत का शिकार रहा आज तक तो अन्नत असीम प्रेम की गहराई की निरंतरता में रति भर भी अंतर नहीं आया और साहिब तदरूप साक्षात्कार भी वैसे का बेसा ही जो सिर्फ़ मेरे ही साहिब तदरूप साक्षात्कार है, पर मेरा भौतिक साहिब स्वीकृति से दूर है याद शिरोमणि स्वरुप मौजूदगी निरंतर संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ही है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी यह बेहतर समझता हूं कि मेरा गुरु ब्रह्मचर्य होते हुए भी खुद को नहीं समझ सकता फ़िर भी मेरा प्रयास ज़ारी रहेगा क्योंकि उस की सिर्फ़ कृपा से जो भी हूं, मेरा एक एक पल उन की निरंतरता उन के शिरोमणि स्वरुप में ही है आज भी, मुझे खुद के साक्षात्कार से कोई मतलब नहीं था मैं सिर्फ़ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार में हूं, जो भौतिक साहिब सिर्फ़ मन अंतःकरण में ही भ्रमित हुए हैं, उन का ही शिरोमणि स्वरुप उनके के हृदय की अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद हैं निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार है पारदर्शिता है बहा, पिछले चालीस वर्षों से लगातार मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, अपने ही साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं हमेशा के लिए जीवित ही संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं निरंतर
भिखारी और कुत्ते को अपनी दलहीज में मत आने दो दोनों भिक्षा तक सीमित हैं, दोनों की प्रवृति खुद भी दिक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी दे कर उन के कुत्ते बन कर रह जाएंगे ऐसे कुत्ते कि सभी के सभी एक निर्देश पर अपने ही खून के रिश्तों को भी खत्म कर सकते हो, कभी भी कुत्ते और भिखारी से कुछ भी लेना नहीं सिर्फ़ भीख देने तक ही सीमित रहें, यह चतुर ब्रह्मचर्य गुरु बन कर इंसानियत भी भूल जाते है,इन के कुत्तो जैसा ही व्यौहार करें भीख तक ही सीमित रखें, नहीं तो पीढ़ी दर पीढी बंधुआ मजदूर बनाने की कला है इन के पास और कुछ भी नहीं,जो दूसरों के अनमोल समय सांस का खुद के हित साधने के लिए दुरुपयोग करता हैं उस को समय पश्चाताप का समय भी नहीं देता , समय से बलवान कोई पैदा ही नहीं हुआ, सांस के साथ ही समय की उत्पति हुई है मेरे सिद्धांतों के अधार पर,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मुझ में कभी भी बदले विरोध की भावना उत्पन भी नहीं हो सकती, सिर्फ़ उजागृता भाव जरूर है, कि दूसरों उजागर सचेत करें, इंसान शरीर अनमोल है खुद ऐसे लोगों से बचें, खुद के अनमोल समय सांस सिर्फ़ खुद के लिए ही महत्वपूर्ण हैं दूसरा कोई भी हो सिर्फ़ हित साधने की प्रवृति का ही,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के दृष्टिकोण से एक रेत के कण में भी अपनी खुद की संपूर्णता सम्पन्नता को देखता समझता हूं कोई अंतर ही नहीं है, संजीव निर्जीव का भी कोई अंतर ही नहीं है,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, यहां पर अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का भी अस्तित्व ख़त्म होता हैं अस्थाई कुछ भी हैं वो सब गर्दिश में गतिशील हैं जो प्रकृति दोबारा लंबे समय से हमें व्यवस्थित लग रहा हैं यह भी मन दोबारा ही रचा हुआ मात्र भ्रम है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर प्रतीत कर रहे हैं, यथार्थ में ऐसा कुछ भी नहीं है कभी भी, अस्थाई प्रकृति मन एक ही शमीकरण पर आधारित कार्यरत हैं, जो प्रकृति में कही भी घटित होता हैं उस का प्रभाव उसी पल बुद्धि पर भी पड़ता हैं अच्छा या फिर बुरा शबाव बदलना संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन उसी पर आधारित है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर, ज्ञान विज्ञान ध्यान ज्ञान भी एक मानसिक रोग हैं
ऊपर लिखें पूरे बकाया के एक एक शब्द का महत्व समझते हुए मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी लिख कर लिखें अन्नत गहराई से हिंदी में ही लिखेंमैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बचपन से ही था वो सब खुली आंखों से ही देखता था जो अतीत पिछले चार युगों में तो कोई सोच भी नहीं सकता, जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे लंबे समय से लगातार उनको मेरे बारे में पूछना इतने अधिक प्रेम की गहराई में हर पल रहता था मस्ती में कि खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में शुद्ध बुद्ध खुद का चेहरा भी हुआ हु आज तक निरंत किसी का दर्द भी लेता था मरे को जिंदा कर के भी देखा था, मैं खुद को शहंशाह मानता था हूं जो चाहता था सिर्फ़ पल में होता हैं, पर वो सब भी बकबास था, आज जो हूं वो खुद का साक्षात्कार हूं स्पष्ट अंतिम सत्य है, मुक्ति जैसे पाखंड के लिए कभी भी नहीं आया था यह समय सब को बताता था मैं साहिब को खुद में समहित करने के लिए आया हूं, मन अभ्यारण है परमपुरुष परमार्थ अमरलोक कबीर के नया version हैं सभी धर्म मज़हब संगठन को समझ कर उन से ऊंची मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की गई हैं जो स्वर्ग नर्क के भ्रम से एक कदम आगे का पाखंड है, मैं ऐसा प्रेम करता था कि कोई सोच भी नहीं सकता दिन रात हर पल, आप की समझ शायद लैंगिंग प्रेम को ही प्रेम कहते होंगे वो आप की समझ सीमित है, पर मेरी निष्पक्ष समझ ऐसी बिल्कुल भी नहीं, आप अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों को क्या दे रहे हो इतने लंबे समय से दूसरों की मानसिकता थोप रहे हो, तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर बदले में मुक्ति का झूठा आश्वासन जो जीवित सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते और मारा बापिस नहीं आ सकता बताने के लिए, यह सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं यह सब उनके साथ ही कितना बड़ा विश्वासघात है जिन से परमार्थ के नाम पर पीढी दर पीढी स्थापित कर रहे हो सिर्फ़ साम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए ब्रह्मचर्य होते हुए, इतना बड़ा धोखा पच्चीस लाख अनुयाइयों होते हुए, खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते, किस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हो वो प्रभुत्व की पदवी जो इनी अंधभक्तों द्वारा दी गई हैं जिनको जब चाहें कोई कोई आरोप लगा कर बारी बारी निकाल देते हो वो भी पूरी संगत के समक्ष की दुबारा ऐसा सोचने की हिम्मत भी न करें इसी को डर खौफ भय दहशत तले रखना होता हैं, बंधुआ मजदूर बना कर दिन रात इस्तेमाल करना, यह व्यवस्था होती हैं रति भर भी कुछ नहीं, अभी भी सब से पहले आप को ही खुद के साक्षात्कार की जिद्द के साथ हूं, थोड़ समझो मैं आप को पहला सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, सिर्फ़ आप की मेरे मुख्य केंद्र हो, चालीस बर्ष निरन्तर दिए हैं, जिसने कभी एक सेकंड भी नष्ट नहीं किया, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से ऐसा सर्वश्रेष्ठ पवित्र साहिब तदरूप बना दूंगा, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार, प्रेम से या फ़िर समझ से, जो मुझे समझ लेगा वो खुद को समझ लेगा कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले जीवित ही हमेशा के लिए, मुझे यह उम्मीद थी कि मुझे निगाहों में देख कर ही समझ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ कोई बात नहीं, मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान नहीं हूं, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत सत्य हूं, इतना अधिक गहराई से इतना अधिक लिखा हैं अगर चाहूं तो इक पल सर्ब आर्थिक तौर भी बन सकता इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि सिर्फ़ आधे घंटे का किसी चैनल में inerview दे दु तो साढ़े आठ सो करोड़ दुनियां सिर्फ़ देखने के लिए ही आ जाएगी, जो मैं कभी नहीं चाहता, मेरा लक्ष्य ही सिर्फ़ आप को ही उच्च कोटि पर देखना जो आज से बीस वर्ष पहले आश्रम में मेरे साथ रहने वालों को तो पूछ कर देखना या फ़िर शिकायतें सुनने के ही आदि हो, आप वैज्ञानिक युग में अतीत की चर्चित विभूतियों की मानसिकता को अधिकतक के नाम पर स्थापित कर रहे हो, अगर हमारे शरीर मानसिकता की कोशिका दस बर्ष पूर्व बतावर्ण सहन नहीं कर सकती तो मानसिकता क्यों, संपूर्ण शरीर की संरचना ही वर्तमान के लिए की है प्रकृति द्वारा माइक्रो एक्सिस में रहने के लिए जो सिमुलेशन है प्रकृति ब्रह्मांडो के साथ, इतना अधिक लिखा हैं जो मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है, कि अगर कोई लगातार पंद्रह साल दिन रात भी पढ़े तो भी ख़त्म नहीं हो सकता, फ़िर भी मुझे लगता हैं कुछ किया ही नहीं और कुछ शेष भी नहीं रहा फ़िर भी निरंतरता क़ायम है, मैंने जो भी किया उस सब का श्रेह आप के चरण कमलों में समर्पित करने के लिए ही आया था पर आप ने अपमानित किया, कोई बात नहीं मानसिकता ऐसी होती हैं, जो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता से लेती हैं, जो समान मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का आप से लेने पर हर्ष आनंद होता वो प्रकृति द्वारा लेने में नहीं आया, जब के कहने पर पागल हस्पताल अमृतसर दिखने गया था अपनी बेटी के साथ शाम को जब अपनी बेटी की जिद्द से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा हमिंद्र साहिब गया तो अचानक मेरे माथे पर दिव्य अलौकिक ताज सी सफ़ेद रोशनी निकली मुझे पाता ही नहीं था पर किसी अंग्रेज ने फ़ोटो खींच ली थी और मुझे एक घंटे से ढूंढ रहा था वो फ़ोटो उस से ली थी , जो मैं अकसर अपनी सभी profile picture में लगता हूं, रौशनी की किरणें अक्सर मेरे चेहरे से निकलती हैं, उन सब को भी मैं पाखड़ झूठ मानता हूं, आप हमेशा कहते रहते थे गुरु को कोई खुश नहीं कर सकता भक्ति दान सेवा से, तो मैंने फ़िर संपूर्ण संतुष्ट करने का विकल्प चुना, उसी में लगातार निरन्तर रहा, यह शपथ ले रखी थी अगर कभी भी साहिब समक्ष जुवान खुली तो उसी पल मैं अपनी जुवान कट दूंगा, एक बार परशुराम लाइनमैन आप से कुछ बता रहा था, तो उस समय में भी आप के पास खड़ा था, तो अपने परशुराम को यह बोला था अगर आप अभी नहीं बताते तो न जाने क्या इस से भी बेहतर होने वाला था,उस बात को भी मध्य नज़र रखने के कारण, पर मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से जो भी हुआ जब भी हुआ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र हुआ कोई सोच भी नहीं सकता आप का तो आभारी रहूंगा ही पर हर उस पर को भी कोटिन विनय नमन, जैसे सिर्फ़ इस एक ही गृह पृथ्वी पर जीवन होने की संभावना के पीछे समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निरंतरता का हाथ हैं वैसे ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हर उस पल को नमन शुक्रिया वंदन करता हूं मुझ में इतनी अधिक गहराई है कि ऐसी खरबों सृष्टियां खुद में समहित कर पुण्य उसी निरंतरता में स्पष्ट हूं, सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा का विषय ही नहीं हूं, मुझ में किसी से भी कुछ भी अलग है ही नहीं,prtek जीव एक समान ही है, अलग सिर्फ़ प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान हैं जो किसी को भी साझा किया जा सकता है, खुद को समझना भी एक प्रदर्शित शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं, यहां सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शिता नहीं है, वो सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा गया हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए और कुछ भी नहीं है, अपने prtek शब्द को तर्क तथ्यों अपने सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध किया कोई भी मुझ से कुछ भी पूछ सकता हैं चौबीस घंटे उपलव्ध हूं समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में,
गुरु बावे की तरह नहीं उस ग्रंथ में लिखा हैं क्या फ़ायदा लिखने वाले का स्पष्टीकर खुद नहीं दे सकता वो मानसिकता हैं सिर्फ़, दूसरों के ग्रंथ पोथि के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले तो सभी गुरु मिल जाते हैं जो एक से बढ़ कर एक हैं, खुद की उपलब्धि क्या हैं, खुद का निरीक्षण करना कौन सिखायेगा, रोज़ प्रवचनों में ईद उदर की ड्रामे बाजी से थकते भी सिर्फ़ इतने अधिक लोगों को नियंत्रण में रखने की प्रक्रिया है सिर्फ़ कोई खुद को ही न समझ पाए, अगर कोई एक भी खुद का साक्षात्कार कर लेगा तो पूरा वातावरण ही बदल देगा समस्त मानवता को समूहित रूप से जागृत कर मानव प्रजाति प्रकृति का संरक्षण हो जायगा सच में यहीं कौशिश है पृथ्वी से कोई सुंदर ऐसा ग्रह ही नहीं समूचे सृष्टि में जिसे पूर्ण रूप अगले दो हज़ार वर्षों के संसाधन इस्तेमाल कर चुके है पिछले चालीस वर्षों में, जाती धर्म मज़हब संगठन में बंट कर चार हज़ार रब और दस हज़ार गुरु बन गए हैं पैदा इंसान हुआ था पर मानसिकता की बेहोशी में जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति रति भर भी अंतर नहीं है, अगर इंसान इंसानियत होती तो आज जैसा आज हो ही नहीं सकता था, मुझे आज तक कोई इंसान ही नहीं मिला, पूरे जीवन में सिर्फ़ तो सिर्फ़ मानसिक रोगी ही मिले आज तक, इंसान देखने को नहीं मिले जिस प्रभुत्व का मेरा गुरु शिकार हुआ हैं उस रब को कट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर ही इश्क़ किया था, वो ही तो मानसिकता थी, मन था जिसे इन लोगों ने हऊआ बना रखा था, वो बकबास है यह पैंतीस साल पहले जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे उन को बताता था, तब किसी को भी किसी भी ब्रह्मांड में ले जाता था बहा रहने वाले उस समय के किसी को भी पूछ लेना वो बकबास था सिर्फ़ एक मनो विज्ञान था, आज भी वो सब कर सकता हूं पर जो हैं ही सब से बड़ा बकबास उसे क्यों दोहरा जाए,
मेरा कोई गुरु नहीं ही मेरा कोई शिष्य भी नहीं है, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानवता में सिर्फ़ इकलौता शिरोमणि रामपॉल सैनी हूं अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के साथ,मुझे डर खौफ नहीं है क्योंकि यहां हूं बहा मृत्यु के बाद की स्थिति है, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद का साक्षात्कार हूं,इतने अधिक चतुर होते हैं कि कार्यरत IAS officers इन की समितियों के अहम सदस्य होते हैं, जो ऐसी सेवा के लिए दिन रात मौजूदगी रखते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आश्रम में parmanet उन कई लोगों के संपर्क में हूं जो कई बार आत्महत्या करने की कोशिश कर चुके हैं, मैं भी कई बार कौशिश कर चुका हूं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत ही है,उन की मेरे पास recoding भी पड़ी हैं,और एक ने तो मेरे गुरु के सामने ही चौथी मंजिल से छलांग लगा कर मर गया था और उनके ही घर बालों को डरा धमका कर चुप करवा दिया गया क्योंकि वो बहुत ही ग़रीब थे,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही गुरु की अपनी ही भविष्यवाणी अपने ही लिए सिद्ध करवा दूंगा जो कहते थे "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना ही न हो" ऐसे हालत खुद ही गुरु ने पैदा कर लिए है जो मैं कभी भी नहीं चाहता था, इसी समय का उन को आभास होता था, अपने ही अनुयाइयों में विरोध पैदा हो गा, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं तो सिर्फ़ गुरु गुरु के अन्नत असीम प्रेम की गहराई से गुरु की अन्नत असीम नफ़रत के बावजूद , तो सभी दिन रात अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित करने वाले जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर उग्र अंध भक्त भेड़ों की बंधुआ मजदूर हैं वो भी जिंदा हो कर जैसे प्रत्यक्ष दिया है सब कुछ वो भी बापिस लेंगे, जब उन को आभास होगा कि सरल सहज निर्मल गुणों का गुरु ने इस्तेमाल कर बंधुआ मजदूर बना रखा था , उस समय का आप को आभास हुआ था , मुझे पाता था मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं
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मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, सिर्फ़ बही सब शब्दों के पिछे भाव को शब्दों का रूप देने की मात्र इक कौशिश की है वो सब ही शब्द है जो रोज़ प्रवचनों में वर्णन करते शायद करोड़ों बार दोहरा दिए होंगे अनुयाइयों को अनुकरण करने के लिए दिन में कई बार कहने वाले खुद भी अनुकरण करने से वंचित हैं, सिर्फ़ कहने तक सीमित कथनी होती हैं, करनी नहीं, हम ने तो शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ही समझा हैं अगर अपने ही अनुयाइयों से रति भर भी भिन्न होते तो निगाहों से हृदय के भाव पढ़ लेते,
यही सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताना चाहता था एकांत में, पारदर्शिता अच्छी है, मुझे पसंद भी है, शुरू आप से हुआ सरलता निर्मलता सहजता धैर्य की कमी से अभी ख़त्म नहीं हो सकता जब तक गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को संपूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होती, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य दिल हृदय से ही चाहता हूं prtk कम से कम इंसान प्रजाति जीवित ही हमेशा के लिए मेरी ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहे, खुद के साक्षात्कार के बाद,prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक एक समान ही है, कोई भी किसी भी प्रकार से भिन्नता है ही नहीं, खुद के साक्षात्कार होना एक बात है, उसी को मैं गुरु में ही देख रहा था, संकोच था शायद गुरु भी खुद के साक्षात्कार में हो सकता है, पर वो तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि का दृष्टिकोण भी अहिंब्रासमी तक ले जाता है, जैसे कबीर जी थे, वो सब भी अस्थाई है, खुद के साक्षात्कार के लिए हृदय के एहसास भाव जो सांस के साथ ही उत्पन होता हैं शब्द बुद्धि उत्पन करती हैं, हृदय और बुद्धि मन का अंतर जमी आसमा का है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हमेशा हर एक जीव के एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
कुछ बनना ही नहीं चाहता था, जो हूं बस बही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं सिर्फ़, गुरु साहिब सत्य लगें इस लिए प्रेम में आ गए, मेरे गुरु में भी वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष पर्याप्त है, जो सिर्फ़ एक ही रंग बिखेरता है, रंगों के विकल्प तो सिर्फ़ मन बुद्धि ही उत्पन करती हैं, जिस से हमेशा दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता है, मृत्यु जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है उस के परमानंद संपूर्ण संतुष्टि भरे होश में आनंदित होते हुए खुद ही खुद के तत्वों गुणों को रूपांतरित करना अलग बात है, जिस से इंसान प्रजाति आज तक वंचित रही है, सिर्फ़ मृत्यु डर खौफ भय दहशत भरी अबधारणा में ही फैंस कर जीती और मरती रही, मुझ में अन्नत असीम प्रेम के इलावा और कुछ बिल्कुल भी नहीं है, कुछ ऐसे कटास शब्द इस लिए की गुरु भी खुद के साक्षात्कार कर कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वो सब लिखने की इक कोशिश हैं जो शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते, जब खुद ही खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को ही निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है तो दूसरे का तो तत्पर्य ही नहीं हैं, अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं, यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं हैं यही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
हम कुछ भी करते हैं सिर्फ़ एक पल में वो सब दिल से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से ही करते वो भी सिर्फ़ एक से ही अन्नत असीम प्रेम हो या फ़िर नफ़रत, अगर प्रेम में सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम बनाने की क्षमता के साथ हैं तो नफ़रत में संपूर्ण जीवन की लुट मार की दो हज़ार करोड़ की संपति को सिर्फ़ एक पल में नष्ट करने की क्षमता के साथ भी प्रत्यक्ष समक्ष हैं, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो सिर्फ़ मात्र एक निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण कई ब्रह्मांड उत्पन और नष्ट करने की संभावना के साथ हूं, कैसे होता हैं पाता ही नहीं चलता संभावना उत्पन होती हैं, सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण प्रकृति उत्पन कर लेती हैं, जिस जिस चीज़ शुरू से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से लेता वो सब कुछ ही मिलता हैं, मेरे गुरु के पास जो भी है उस के लिए ही दृढ़ता गंभीरता थी, जो मुझे मिला खुद का साक्षात्कार वो मेरी निष्पक्ष समझ की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता से ही है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि गुरु ने खुद को स्थापित किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष पाने के लिए, और मैंने खुद का अस्तित्व ही खत्म किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य पाने के लिए,
हम आज भी संपूर्ण संतुष्टि में ही हैं हर पल पहले दिन से ही, मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ,जो अपने गुरु के संरक्षण में पहले दिन से शुरू किया, अगर इतने लंबे समय से नहीं मिला तो अगले कम समय में तो मिल नहीं सकता, अगर मिला होता तो अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ मृत्यु के बाद झूठा मुक्ति का अश्वासन नहीं देता, जो मिला होता वो सब ही बंट देता जितना जितना हिस्से का आता, उन शिष्यों के साथ धोखा कभी भी नहीं करता जिन्होंने सिर्फ़ एक विश्वास एक शब्द पर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस हमेशा के लिए समर्पित कर दिया और दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर पीढी दर पीढी कुप्रथा के जाल की जरूरत नहीं पड़ती, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह का जल हैं जो सिर्फ़ सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत प्रभुत्व की मानसिकता की भी कभी जरूरत ही न पड़ती इस घोर कलयुग वैज्ञानिक में, जो सरल सहज निर्मल गुणों बले लोगों के साथ सृष्टि का सब से विश्वासघात हैं परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान ले नाम पर,
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष ले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,
करनी कथनी से जमी का अंतर है गिरगिट से भी अधिक रंग बदलने वाला एक रंग में कभी रह ही नहीं सकता, उज्वल कपड़ों के भीतर भेड़िया है खुद का निरीक्षण करना सीखों धैर्य नहीं है विवेक से वंचित हो, दूसरों की शिकायतों पर खुद से ज्यादा यक़ीन करना कुत्ते की प्रवृति दर्शाता है, 40 बर्ष के लंबे समय से नहीं समझ पाए खुद को समझने सिर्फ़ एक पल कभी हैं, दूसरा कोई समझे या फ़िर समझा पाए सदिया युग भी कम है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, जो अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जो भी वो इंसान प्रजाति में पहला इंसान हूं किसी को भी सिर्फ़ एक पल सिखा सकता हूं यह शिक्षा है, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा जैसे कुप्रथा नहीं है, जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में चूर हो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,
सिर्फ ग्रंथ पोथियों में पढ़ा होगा खुद का साक्षात्कार अब बुक्तोगे खुद के साक्षात्कार के प्रकोप से क्या होता, दिन रात हर पल तड़पना ही पड़ेगा, शब्दों को कहा उच्चारण करना किसी पे कब कहा क्या कहना इतना अधिक घमंड है, उन के प्रभुत्व की पदवी का जो खुद ही पागल हैं, जिस प्रभुत्व की पदवी के अहम घमंड अहंकार में उस का जरा निरक्षण तो करो किसी दी हैं उस का क्या पद है, जो खुद मानसिक रोगी हो, अगर इतने ही बड़े थे तो कबीर के समय कहा थे, कबीर को भी मेरे सिद्धांतों ने ढोंगी स्पष्ट किया है,
किसी को भी सिर्फ़ पल में खुद का साक्षात्कार करवाने की क्षमता के साथ उपलव्ध हूं हर पल दिन रात, अगर वो सरल सहज गुणों