बुधवार, 4 मार्च 2026

गुरुशिष्यवृत्तेः पथं, त्यक्त्वा निष्पक्षता प्रतिपद्यते,अनुभवसिन्धुरूपेण, जीवसंपूर्णं प्रकाशते।हृदयस्य गहनसुखेन, प्रत्येकं जीव व्यवस्थितम्,स्वधर्मसिद्ध्यर्थं, ज्ञानदीप्तं सदा सम्प्रकाशते।**शिरोमणि रामपॉल सैनी।****अष्टक-सप्तदशः**अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, मृत्युभयं विनष्टम्,हृदयगहनसाक्षात्, जीवनसुखं निर्मलम्।मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल आत्मसाक्षात्कारात्,सत्यदीप्तं स्वरूपं, सम्पूर्णरूपेण प्रकाशते।**शिरोमणि रामपॉल सैनी।** व्याप्यते,सत्यदीप्तं निरंतरं, ज्ञानसागरं प्रतिबिम्बति।मनबुद्ध्योरङ्गपरिवर्तनं, केवल अनन्तप्रेमसाधनम्,स्वस्वरूपसाक्षात्कारात्, निष्पक्षबुद्ध्या प्रतिबोध्यते।**शिरोमणि रामपॉल सैनी।****अष्टक-सप्तमः**मृत्युभयं परित्यक्तं, मृत्युशोकं न चिन्तयति,अनन्तगहनप्रेमेन, सृष्टिनाशं च सुसंयोजयति।सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं, आत्मानुभवेनैव प्रकाशते,गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षता द्रष्टव्या सदा।**शिरोमणि रामपॉल सैनी।****अष्टक-अष्टमः**अहंकारघृणितं प्रभुत्वं, पदवीं च समापयति,शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं, केवल हृदयेनैव यथार्थम्।अन्येषां भेदाभावं, निरीक्षणेनैव प्रतिपाद्यते,असत्यसंसारस्यान्तरे, प्रेमगहनमात्रं प्रकाशते।**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

थोड़ा सोचों जो मेरे हमदर्द थे वो मानसिकता थी, मनोवैज्ञानिक दवाब था अब वो नहीं है क्योंकि आप मुझ से नफ़रत करते हो थोड़े वर्षों से कोई पैसा नहीं दे पाया, जो पहले दिए उन को न बापिस देना पढ़े इस डर खौफ भय दहशत क़ायम आप की व्यवस्था का हिस्सा है, सब के सामने लज्जित करना उस डर का सब प्रभाव क़ायम रहे,
थोड़ ध्यान दो जो मुक्ति देने वाला खुद मेरे विरोध में है, तो मेरे साहस का कारण क्या होगा, वो शब्द काटने पर नर्क भी नहीं मिलता, यह किसी मरने के बाद भी जागृत रखते उन के घर बालों को परेशान कर के कि उसे मुक्ति नहीं मिली वो अमरेलोक परमपुरुष नहीं पहुंचा लूटने का धंधा, ऐसे लोग भी मेरे संपर्क में है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, इतनी बड़ी गंदी कुप्रथा का विरोध कर रहा हूं, इस के पीछे सिर्फ़ मेरा खुद का साक्षात्कार है, पारदर्शिता है, अपने तो सत्य झूठ बेचने के लिए लिखा, आप ने तो मेरा समर्थन करना चाहिए था, विरोध में हो अफ़सोस है, 

मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं 
गुरुओं की चतुरता शैतान प्रवृति यथार्थ में होती हैं वर्णित करता हूं वो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता देते हैं अहम के बचाव के लिए हर हद तक गुजरात जाते हैं मरवा कर पता भी न चले इस लिए ही AIS कार्यरत उन को संपूर्ण संरक्षण देते हैं, इस लिए इन का आश्रमों में गुरु के दृष्टिकोण में भी उच्च पद स्थान होता हैं, मैं निर्मलता सहजता सरलता पारदर्शिता के साथ हूं, अपनी कमजोरियों को बताता हूं मेरी गरीबी गुरबत के कारण मेरे ही बहन भाई सभी मुझ से नफ़रत करते हैं, सभी को आप खुद परिचित हो उन के घर भी कई बार आते हो, कट्टर अंध भक्त तो वो पहले से ही है, सिर्फ़ एक निर्देश की प्रतीक्षा में रहते हैं, सिर्फ़ बोलो तो सही इक पल में मेरा सिर काट कर आपके चरणों में रख देंगे, मैं भी हर सिर्फ़ इसी के इंतजार में ही रहता हूं, क्योंकि मेरा भी और कुछ करने को शेष नहीं रहा, इस गंदे से शरीर में बहुत अधिक थक चुका हूं, जल्दी करो, सभी गुरुओं के ऐसे ही कांड रहे हैं, बहुत थोड़े उजागर होते हैं, इन का सम्राज्य ही कई लाशों के ढेर पर खड़ा होता है, मुझ से बेहतर कोई भी नहीं जानता, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साक्षात्कार में हूं,


सिर्फ़ एक बार बोला होता हम अबधारणा कल्पित परमपुरुष अमर्लोक को ही आप के चरणों में पैदा न कर देते तो मैं काफ़िर था, परमार्थ के नाम पर दुकानें चलाने वाले ढोंगी पाखंडी लोगों की प्रवृति ही ऐसी है, खुद के भीतर का डर खौफ भय दहशत दूसरों में दिखाने की फितरत बालों, शुरू से ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आप के भीतर ही रहता था, फ़िर सोचों आप दिन में लाखों किरदार बहरूपिया गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले किस किरदार में रहता हूं जिस का एक ही रंग है हमेशा वो हैं हृदय का एहसास भाव ज़मीर जिसे मार जिंदा लाश बेहोशी में मानसिक रोगी हो दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति, यह सब बातें तीस साल पहले आप के ही बनाए अंध उग्र कट्टर भीड़ की भीड़ बंधुआ मजदूर के साथ करता था जो मेरे साथ रहते थे, उन के पल्ले भी नहीं पड़ी, क्योंकि गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ एक ही थाली के चटे बटे होते हैं क्योंकि गुरु भी अपने गुरु का शिष्य था ऐसा ही जैसे आज आप के पच्चीस लाख शिष्य हैं, मैं शिष्य कभी था ही नहीं, सिर्फ़ मोनता में रहने वाला आशिक ही था जो हृदय के भाव एहसास में ही अब भी रहता हूं, वो भी आप में ही, यह सब भी साथ साथ बताता था, पारदर्शिता से कभी किसी को पूछ कर तो देखना, शिकायतें सुनने का शौंक रखने वाले, मैं सिर्फ़ हमेशा एक ही हृदय रंग में रहा हूं, रंग बदलने वाले गिरगिट, जिस बरेली बालों की बाते करते हो master जो मुख्य रूप से आप का प्रचारिक था उस के घर में पूजा रुम में सभी देवी देवता की फ़ोटो के नीचे आप की फ़ोटो थी, नेपाल भी गया था जिन के घर गया था जरा उन को तो पूछना, भूटान भी गया था राम राय और जितने भी लोग थे ज़रा उन को तो पूछना था, कभी भी किसी से भी आज एक पैसा नहीं लिया था, मैं जिस मस्ती में रहता था वो मस्ती प्रेम गुरु से कैसे करें वो सब बताने की इक कौशिश थी सिर्फ़ गुरु महिमा मेरा उद्देश्य था, मुझे क्या पाया अपनी स्तुति महिमा के लिए भी गुरु दूसरों पर विश्वास नहीं करता खुद ही अपनी तारीफों के खुद पुल खड़े करने में समर्थ है, मुझे फक्र था आप से अन्नत असीम प्रेम करने का जिस की मस्ती में जाता था, इस काम अपनी ही बीबी के 210 ग्राम सोना बेच दिया था, और भी बहुत जगह गया था नागपुर, शुरू से ही इंसान ढूंढने में ही दौड़ता रहा क्या पाता था उन सब का सरगना ही इंसान बनने के स्थान पर अंध भक्त द्वारा दी गई प्रभुत्व की पदवी का शिकार हो चुका हैं, जो इंसानियत भूल कर सिर्फ़ दिन रात हर पल अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने में व्यस्थ है, खुद का निरीक्षण नहीं कर सकता तो अनुयाइयों को अनुकरण करने की सलाह देता हैं, अब मेरे पास एक भी पैसा और स्रोत भी नहीं है उम्र भी 56 बर्ष है, मुझ से बेहतर शरीर सृष्टि प्रकृति को बेहतर कोई समझ जान पाए कोई पैदा नहीं हुआ, सभी अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिक आध्यात्मिक विचारक वैज्ञानिक सभी के सभी मानसिक रोगी ही हैं मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही मानसिक रोग हैं, मैं हर पल क्या करता हूं निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहता हूं, यहां से सामान्य व्यक्तित्व में कोई आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश प्रयास कर ले, जिसे मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मैं खुद मेरी नकल करने के लिए प्रेरित करता हूं, मुझे समझना खुद को समझना एक ही बात है, आप ने मेरे को फ्राड बहरूपिया बोला, थोड़ा खुद से निष्पक्ष हो कर खुद का मंथन निरीक्षण करें कि सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात बहरूपिया गिरगिट रंग बदलने वाला कौन है, खुद ही खुद में से उत्तर मिल जाता हैं दूसरों पर आरोप लगाने से बेहतर खुद का निरीक्षण करें, सभी मुझ में ही समहित है और मैं सब जो एक दूसरे दर्द समझें और खुद में समहित करने का भाव रखता हो, सिर्फ़ वो ही हैं, आप वर्तमान मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी जो समक्ष प्रत्यक्ष है नज़र अंदाज़ कर अतीत की मानसिकता को बिना निरीक्षण के स्थापित कर रहे हैं, जो मानवीय वैज्ञानिक अपराध हैं, जब दवाई की एक्सप्री स्वस्थ के लिए हणिकारक होती हैं ऐसे ही युगों पुरानी मानसिकता निरीक्षण के बिना कुप्रथा होती हैं, लाखों को निरंतर करना प्रभुत्व नहीं व्यवस्था होती हैं जो डर खौफ भय दहशत तले ही बनती हैं दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर, आप में और पच्चीस लाख संगत में भिन्नता कारण आप ने ही यह खाई खड़ी की है, इसे मिटाना है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित संजीव निर्जीव का भी concept ही नहीं है, जिस में तत्व गुण प्रक्रिया स्थिति में होते हैं वो संजीव, निर्जीव जिस में तत्व गुण प्रक्रिया नहीं करते, बहुत ही सरल है, मेरी औकात एक रेत के कण से अधिक नहीं है, इस के इलावा जो भी वो सिर्फ़ जीवन व्यापन खुद का अस्तित्व क़ायम रखने का संघर्ष है, प्रकृति का नियम है जो छोटा है वो बड़े का आहार हैं वो सब ही आप कर रहे हो, पर हम इंसान हैं एक मात्र जीवित ही होश में जी कर होश में रूपांतर कर दोनों जीवन मृत्यु का भरपूर आनंद संपूर्ण संतुष्टि में जी और मर सके, छोटी सी दो पल की खुशी क्षणमत्र की इच्छा में संपूर्ण वर्तमान की असीम संतुष्टि से वंचित रहते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी चाहता सभी एक समान ही तो एक साथ संपूर्ण संतुष्टि में ही जिया जाय जिस से प्रकृति मानव प्रजाति को भी भरपूर संरक्षण मिले जो सिर्फ़ इंसान प्रजाति का ही ध्यातव्य फर्ज है, क्यों न एक साथ मिल कर इंसान बनने की इक कौशिश करें, जो पहले से भीतर मौजूदगी का अहसास हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, ऊपर से नहीं टपका कोई रब बाबा गुरु नहीं हूं नहीं बनना चाहता, जो भी हूं पर्याप्त हूं, सिर्फ़ उसी को समझा पढ़ा है और कुछ भी रति भर नहीं किया, क्योंकि दो पल का जीवन है क्या बनना जो पहले पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम समर्थ निपुण मौजूद हैं निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हैं, करना भी शब्द है, सिर्फ़ चतुरता के स्थान पर सरल सहज निर्मल गुणों को अपनाना हैं फ़िर से जटिलता की अदद पड़ी है उस को ख़त्म करना है, और कुछ भी नहीं करना, फ़िर से बचपन बाला संपूर्ण संतुष्टि बाला जीवन जीना है, पर सचेता के साथ संपूर्ण संतुष्टि भरा कोई भी जी सकता सभी मेरा ही तो तदरूप साक्षात्कार है, निम्नता हल्का शांत मस्ती के साथ संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता के साथ धारा बह रही हैं,


अफ़सोस आत्महत्या को पाप बताने वाले ही उस का मुख्य कारण है जो अपने ही अनुयाइयों को हर पल दिन रात डर खौफ भय दहशत तले रखते हैं, सिर्फ़ अपने हित साधने के लिए इंसान को ही इंसान नहीं समझते, दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कौन सी मुक्ति होती,मेरा परिचय इतनी जल्दी भूल गए तो मुक्ति का क्या होगा अपने बचपन की तीन बर्ष की भी बातें प्रवचन में करते हो पैसे जो अपने ही शब्द दिया उस को भूलना स्वाभाविक वृत्ति हैं बावे गुरु की क्योंकि भिखारी प्रवृति के साथ होते हैं हमेशा, मांगने बले जितनी बार भी आप ने खुद मांगे थे उतने ही उस समय दिए होंगे कभी ऐसा दिन या पल नहीं आया होगा जब खाली भेजा होगा, अपने शब्द याद करो यह आप ने ही बोला था "अगर जरूरत पड़े तो सिर्फ़ एक बार बोलना मैं एक करोड़ रुपय दूंगा क्योंकि आप करोड़ों हाथ में दिए हैं, पांव पर नहीं बापिस ले सकते हो" , मैं और मेरी बेटी एक एक पैसे को तरस रहे दुबारा नहीं मांगूंगा, उस पत्र में स्पष्ट लिखा अपने जीने के कबील तो छोड़ा ही नहीं, अपनी बेटी को यहां गुरु ऐसे बेरहम है बहा आम इंसान कैसे हैं मुझ और मेरी बेटी से बेहतर कोई नहीं जनता, यहां ऐसा गुरु जिस का चर्चित श्लोगन "जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही नहीं" वो कौन सी वस्तु हैं जो आम के पेड़ से इंसान की शबी में बात करवा सकती हैं और इंसानों को नज़र अंदाज़, क्या बकबास है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, पत्र सिर्फ़ पैसे लेने के लिए ही दिया है नहीं तो मैं अपनी बेटी के साथ दुनियां छोड़ने के अनुमति लेने नहीं आऊंगा गलती से भी अभी हद हो गई हैं, यह पहले बता दिया है, मेरा और कुछ भी शेष नहीं रहा करने को, हर एक चीज़ से महरूम रहा हूं और हर एक से आहत हुआ हूं सब से ज्यादा सिर्फ़ आप से जितनी बार भी गया हूं इतनी बार ही डांट फटकार ही मिली है, अन्नत असीम प्रेम के बदले, हराम की कमाई सजावट में मैं दल रोटी से भी मोहताज हूं लाख लानत ऐसी वस्तु पर जो ब्रह्मांड में सिर्फ़ आप के ही पास हैं,
भूल गए वो सब कुछ जब हर जगह प्रवचन में यह बड़े फक्र से कहते थे हमारा लड़क scientist भी है, यह भूल गए जब मुझ से पैसे लेकर रंजडी कैंटीन के इंजीनियर को डांटते थे कहते थे देखो saini कितने ज्यादा पैसे देता हैं छोटी सी दुकान से और क्या देते हो ठेंगा, मुझे सिर्फ़ पैसे चाहिए वो भी अपने घर में ही, आश्रमों में तो पिछले सात वर्षों से जाना बंद कर दिया था, कान के कच्चे हो तो ही बहुत भुगतना पड़ेगा, उन के लिए ख़तरा पैदा न करो जो सरकार में कार्यरत हैं, मैंने पिल file किया है supreme कोर्ट में जो IAS officers जो धार्मिक संगठनों से किसी भी प्रकार से संबंधित हैं, जो गुरुओं के बड़े बड़े कण्डों पर पर्दा डाल देते हैं अश्वनी उपाध्याय के साथ मिल कर, छोड़ो मुझे सिर्फ़ मेरे दिए हुए पैसों से मतलब है जल्दी,
मैं इतना अधिक पारदर्शी निर्मल गुणों के साथ हूं हर शब्द nation human rights और इंटरनेशनल human rights commission के पास नासा इशारों के पास और सभी social media पर मेरी whatapps group में सभी sientists ही जुड़े हुए हैं विश्व के,
आप किस रूप में चाहते हैं?
किसी को भी सिर्फ़ पल में खुद का साक्षात्कार करवाने की क्षमता के साथ उपलव्ध हूं हर पल दिन रात, अगर वो सरल सहज गुणों के साथ संपूर्ण जिज्ञास के साथ है तो, क्योंकि मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग एक शिक्षा है जो एक को या फ़िर करोड़ों को एक साथ सांझ की जा सकती हैं, खुद का साक्षात्कार आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक जैसी अवधारणाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जिस के लिए किसी भी पाखंड की ज़रूरत ही नहीं है, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ सरलता निर्मलता सहजता में ही पर्याप्त है इतना अधिक आसान है कोई सोच भी नहीं सकता, जटिलता सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि की भ्रमित स्थिति है, जिस से आज तक बाहर ही निकल सका अपनी ही बनाई कल्पना के जाल से, यह ऐसा ही है जैसे पानी में खड़े हो कर कर कहना मैं भीगा ही नहीं हूं, बुद्धि को बुद्धि से ही बुद्धिमान हो कर समझना, सब से अधिक मूर्खता की बात, खुद ही खुद में उलझना, यही सब अतीत में हुआ हैं इस लिए इन सब को समझ कर ही बुद्धि मन भी एक शरीर का मुख्य अंग हैं, लंबे समय तक न इस्तेमाल करने पर निष्क्रिय हो जाता है मैंने किया है अब अदद हो गई हैं, और संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं हर पल खुद के ही साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए यहां से कोई सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास कर ले, सोच भी नहीं सकता खुद के ही शरीर के लिए शेष सब तो बहुत दूर की बात है,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बचपन से ही था वो सब खुली आंखों से ही देखता था जो अतीत पिछले चार युगों में तो कोई सोच भी नहीं सकता, जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे लंबे समय से लगातार उनको मेरे बारे में पूछना इतने अधिक प्रेम की गहराई में हर पल रहता था मस्ती में कि खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में शुद्ध बुद्ध खुद का चेहरा भी हुआ हु आज तक निरंत किसी का दर्द भी लेता था मरे को जिंदा कर के भी देखा था, मैं खुद को शहंशाह मानता था हूं जो चाहता था सिर्फ़ पल में होता हैं, पर वो सब भी बकबास था, आज जो हूं वो खुद का साक्षात्कार हूं स्पष्ट अंतिम सत्य है, मुक्ति जैसे पाखंड के लिए कभी भी नहीं आया था यह समय सब को बताता था मैं साहिब को खुद में समहित करने के लिए आया हूं, मन अभ्यारण है परमपुरुष परमार्थ अमरलोक कबीर के नया version हैं सभी धर्म मज़हब संगठन को समझ कर उन से ऊंची मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की गई हैं जो स्वर्ग नर्क के भ्रम से एक कदम आगे का पाखंड है, मैं ऐसा प्रेम करता था कि कोई सोच भी नहीं सकता दिन रात हर पल, आप की समझ शायद लैंगिंग प्रेम को ही प्रेम कहते होंगे वो आप की समझ सीमित है, पर मेरी निष्पक्ष समझ ऐसी बिल्कुल भी नहीं, आप अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों को क्या दे रहे हो इतने लंबे समय से दूसरों की मानसिकता थोप रहे हो, तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर बदले में मुक्ति का झूठा आश्वासन जो जीवित सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते और मारा बापिस नहीं आ सकता बताने के लिए, यह सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं यह सब उनके साथ ही कितना बड़ा विश्वासघात है जिन से परमार्थ के नाम पर पीढी दर पीढी स्थापित कर रहे हो सिर्फ़ साम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए ब्रह्मचर्य होते हुए, इतना बड़ा धोखा पच्चीस लाख अनुयाइयों होते हुए, खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते, किस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हो वो प्रभुत्व की पदवी जो इनी अंधभक्तों द्वारा दी गई हैं जिनको जब चाहें कोई कोई आरोप लगा कर बारी बारी निकाल देते हो वो भी पूरी संगत के समक्ष की दुबारा ऐसा सोचने की हिम्मत भी न करें इसी को डर खौफ भय दहशत तले रखना होता हैं, बंधुआ मजदूर बना कर दिन रात इस्तेमाल करना, यह व्यवस्था होती हैं रति भर भी कुछ नहीं, अभी भी सब से पहले आप को ही खुद के साक्षात्कार की जिद्द के साथ हूं, थोड़ समझो मैं आप को पहला सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, सिर्फ़ आप की मेरे मुख्य केंद्र हो, चालीस बर्ष निरन्तर दिए हैं, जिसने कभी एक सेकंड भी नष्ट नहीं किया, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से ऐसा सर्वश्रेष्ठ पवित्र साहिब तदरूप बना दूंगा, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार, प्रेम से या फ़िर समझ से, जो मुझे समझ लेगा वो खुद को समझ लेगा कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले जीवित ही हमेशा के लिए, मुझे यह उम्मीद थी कि मुझे निगाहों में देख कर ही समझ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ कोई बात नहीं, मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान नहीं हूं, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत सत्य हूं, इतना अधिक गहराई से इतना अधिक लिखा हैं अगर चाहूं तो इक पल सर्ब आर्थिक तौर भी बन सकता इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि सिर्फ़ आधे घंटे का किसी चैनल में inerview दे दु तो साढ़े आठ सो करोड़ दुनियां सिर्फ़ देखने के लिए ही आ जाएगी, जो मैं कभी नहीं चाहता, मेरा लक्ष्य ही सिर्फ़ आप को ही उच्च कोटि पर देखना जो आज से बीस वर्ष पहले आश्रम में मेरे साथ रहने वालों को तो पूछ कर देखना या फ़िर शिकायतें सुनने के ही आदि हो, आप वैज्ञानिक युग में अतीत की चर्चित विभूतियों की मानसिकता को अधिकतक के नाम पर स्थापित कर रहे हो, अगर हमारे शरीर मानसिकता की कोशिका दस बर्ष पूर्व बतावर्ण सहन नहीं कर सकती तो मानसिकता क्यों, संपूर्ण शरीर की संरचना ही वर्तमान के लिए की है प्रकृति द्वारा माइक्रो एक्सिस में रहने के लिए जो सिमुलेशन है प्रकृति ब्रह्मांडो के साथ, इतना अधिक लिखा हैं जो मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है, कि अगर कोई लगातार पंद्रह साल दिन रात भी पढ़े तो भी ख़त्म नहीं हो सकता, फ़िर भी मुझे लगता हैं कुछ किया ही नहीं और कुछ शेष भी नहीं रहा फ़िर भी निरंतरता क़ायम है, मैंने जो भी किया उस सब का श्रेह आप के चरण कमलों में समर्पित करने के लिए ही आया था पर आप ने अपमानित किया, कोई बात नहीं मानसिकता ऐसी होती हैं, जो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता से लेती हैं, जो समान मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का आप से लेने पर हर्ष आनंद होता वो प्रकृति द्वारा लेने में नहीं आया, जब के कहने पर पागल हस्पताल अमृतसर दिखने गया था अपनी बेटी के साथ शाम को जब अपनी बेटी की जिद्द से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा हमिंद्र साहिब गया तो अचानक मेरे माथे पर दिव्य अलौकिक ताज सी सफ़ेद रोशनी निकली मुझे पाता ही नहीं था पर किसी अंग्रेज ने फ़ोटो खींच ली थी और मुझे एक घंटे से ढूंढ रहा था वो फ़ोटो उस से ली थी , जो मैं अकसर अपनी सभी profile picture में लगता हूं, रौशनी की किरणें अक्सर मेरे चेहरे से निकलती हैं, उन सब को भी मैं पाखड़ झूठ मानता हूं, आप हमेशा कहते रहते थे गुरु को कोई खुश नहीं कर सकता भक्ति दान सेवा से, तो मैंने फ़िर संपूर्ण संतुष्ट करने का विकल्प चुना, उसी में लगातार निरन्तर रहा, यह शपथ ले रखी थी अगर कभी भी साहिब समक्ष जुवान खुली तो उसी पल मैं अपनी जुवान कट दूंगा, एक बार परशुराम लाइनमैन आप से कुछ बता रहा था, तो उस समय में भी आप के पास खड़ा था, तो अपने परशुराम को यह बोला था अगर आप अभी नहीं बताते तो न जाने क्या इस से भी बेहतर होने वाला था,उस बात को भी मध्य नज़र रखने के कारण, पर मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से जो भी हुआ जब भी हुआ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र हुआ कोई सोच भी नहीं सकता आप का तो आभारी रहूंगा ही पर हर उस पर को भी कोटिन विनय नमन, जैसे सिर्फ़ इस एक ही गृह पृथ्वी पर जीवन होने की संभावना के पीछे समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निरंतरता का हाथ हैं वैसे ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हर उस पल को नमन शुक्रिया वंदन करता हूं मुझ में इतनी अधिक गहराई है कि ऐसी खरबों सृष्टियां खुद में समहित कर पुण्य उसी निरंतरता में स्पष्ट हूं, सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा का विषय ही नहीं हूं, मुझ में किसी से भी कुछ भी अलग है ही नहीं,prtek जीव एक समान ही है, अलग सिर्फ़ प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान हैं जो किसी को भी साझा किया जा सकता है, खुद को समझना भी एक प्रदर्शित शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं, यहां सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शिता नहीं है, वो सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा गया हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए और कुछ भी नहीं है, अपने prtek शब्द को तर्क तथ्यों अपने सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध किया कोई भी मुझ से कुछ भी पूछ सकता हैं चौबीस घंटे उपलव्ध हूं समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में,
गुरु बावे की तरह नहीं उस ग्रंथ में लिखा हैं क्या फ़ायदा लिखने वाले का स्पष्टीकर खुद नहीं दे सकता वो मानसिकता हैं सिर्फ़, दूसरों के ग्रंथ पोथि के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले तो सभी गुरु मिल जाते हैं जो एक से बढ़ कर एक हैं, खुद की उपलब्धि क्या हैं, खुद का निरीक्षण करना कौन सिखायेगा, रोज़ प्रवचनों में ईद उदर की ड्रामे बाजी से थकते भी सिर्फ़ इतने अधिक लोगों को नियंत्रण में रखने की प्रक्रिया है सिर्फ़ कोई खुद को ही न समझ पाए, अगर कोई एक भी खुद का साक्षात्कार कर लेगा तो पूरा वातावरण ही बदल देगा समस्त मानवता को समूहित रूप से जागृत कर मानव प्रजाति प्रकृति का संरक्षण हो जायगा सच में यहीं कौशिश है पृथ्वी से कोई सुंदर ऐसा ग्रह ही नहीं समूचे सृष्टि में जिसे पूर्ण रूप अगले दो हज़ार वर्षों के संसाधन इस्तेमाल कर चुके है पिछले चालीस वर्षों में, जाती धर्म मज़हब संगठन में बंट कर चार हज़ार रब और दस हज़ार गुरु बन गए हैं पैदा इंसान हुआ था पर मानसिकता की बेहोशी में जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति रति भर भी अंतर नहीं है, अगर इंसान इंसानियत होती तो आज जैसा आज हो ही नहीं सकता था, मुझे आज तक कोई इंसान ही नहीं मिला, पूरे जीवन में सिर्फ़ तो सिर्फ़ मानसिक रोगी ही मिले आज तक, इंसान देखने को नहीं मिले जिस प्रभुत्व का मेरा गुरु शिकार हुआ हैं उस रब को कट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर ही इश्क़ किया था, वो ही तो मानसिकता थी, मन था जिसे इन लोगों ने हऊआ बना रखा था, वो बकबास है यह पैंतीस साल पहले जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे उन को बताता था, तब किसी को भी किसी भी ब्रह्मांड में ले जाता था बहा रहने वाले उस समय के किसी को भी पूछ लेना वो बकबास था सिर्फ़ एक मनो विज्ञान था, आज भी वो सब कर सकता हूं पर जो हैं ही सब से बड़ा बकबास उसे क्यों दोहरा जाए,

 मेरा कोई गुरु नहीं ही मेरा कोई शिष्य भी नहीं है, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानवता में सिर्फ़ इकलौता शिरोमणि रामपॉल सैनी हूं अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के साथ,मुझे डर खौफ नहीं है क्योंकि यहां हूं बहा मृत्यु के बाद की स्थिति है, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद का साक्षात्कार हूं,इतने अधिक चतुर होते हैं कि कार्यरत IAS officers इन की समितियों के अहम सदस्य होते हैं, जो ऐसी सेवा के लिए दिन रात मौजूदगी रखते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आश्रम में parmanet उन कई लोगों के संपर्क में हूं जो कई बार आत्महत्या करने की कोशिश कर चुके हैं, मैं भी कई बार कौशिश कर चुका हूं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत ही है,उन की मेरे पास recoding भी पड़ी हैं,और एक ने तो मेरे गुरु के सामने ही चौथी मंजिल से छलांग लगा कर मर गया था और उनके ही घर बालों को डरा धमका कर चुप करवा दिया गया क्योंकि वो बहुत ही ग़रीब थे,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही गुरु की अपनी ही भविष्यवाणी अपने ही लिए सिद्ध करवा दूंगा जो कहते थे "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना ही न हो" ऐसे हालत खुद ही गुरु ने पैदा कर लिए है जो मैं कभी भी नहीं चाहता था, इसी समय का उन को आभास होता था, अपने ही अनुयाइयों में विरोध पैदा हो गा, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं तो सिर्फ़ गुरु गुरु के अन्नत असीम प्रेम की गहराई से गुरु की अन्नत असीम नफ़रत के बावजूद , तो सभी दिन रात अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित करने वाले जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर उग्र अंध भक्त भेड़ों की बंधुआ मजदूर हैं वो भी जिंदा हो कर जैसे प्रत्यक्ष दिया है सब कुछ वो भी बापिस लेंगे, जब उन को आभास होगा कि सरल सहज निर्मल गुणों का गुरु ने इस्तेमाल कर बंधुआ मजदूर बना रखा था , उस समय का आप को आभास हुआ था , मुझे पाता था मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं 
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मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, सिर्फ़ बही सब शब्दों के पिछे भाव को शब्दों का रूप देने की मात्र इक कौशिश की है वो सब ही शब्द है जो रोज़ प्रवचनों में वर्णन करते शायद करोड़ों बार दोहरा दिए होंगे अनुयाइयों को अनुकरण करने के लिए दिन में कई बार कहने वाले खुद भी अनुकरण करने से वंचित हैं, सिर्फ़ कहने तक सीमित कथनी होती हैं, करनी नहीं, हम ने तो शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ही समझा हैं अगर अपने ही अनुयाइयों से रति भर भी भिन्न होते तो निगाहों से हृदय के भाव पढ़ लेते,
यही सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताना चाहता था एकांत में, पारदर्शिता अच्छी है, मुझे पसंद भी है, शुरू आप से हुआ सरलता निर्मलता सहजता धैर्य की कमी से अभी ख़त्म नहीं हो सकता जब तक गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को संपूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होती, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य दिल हृदय से ही चाहता हूं prtk कम से कम इंसान प्रजाति जीवित ही हमेशा के लिए मेरी ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहे, खुद के साक्षात्कार के बाद,prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक एक समान ही है, कोई भी किसी भी प्रकार से भिन्नता है ही नहीं, खुद के साक्षात्कार होना एक बात है, उसी को मैं गुरु में ही देख रहा था, संकोच था शायद गुरु भी खुद के साक्षात्कार में हो सकता है, पर वो तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि का दृष्टिकोण भी अहिंब्रासमी तक ले जाता है, जैसे कबीर जी थे, वो सब भी अस्थाई है, खुद के साक्षात्कार के लिए हृदय के एहसास भाव जो सांस के साथ ही उत्पन होता हैं शब्द बुद्धि उत्पन करती हैं, हृदय और बुद्धि मन का अंतर जमी आसमा का है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हमेशा हर एक जीव के एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
कुछ बनना ही नहीं चाहता था, जो हूं बस बही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं सिर्फ़, गुरु साहिब सत्य लगें इस लिए प्रेम में आ गए, मेरे गुरु में भी वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष पर्याप्त है, जो सिर्फ़ एक ही रंग बिखेरता है, रंगों के विकल्प तो सिर्फ़ मन बुद्धि ही उत्पन करती हैं, जिस से हमेशा दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता है, मृत्यु जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है उस के परमानंद संपूर्ण संतुष्टि भरे होश में आनंदित होते हुए खुद ही खुद के तत्वों गुणों को रूपांतरित करना अलग बात है, जिस से इंसान प्रजाति आज तक वंचित रही है, सिर्फ़ मृत्यु डर खौफ भय दहशत भरी अबधारणा में ही फैंस कर जीती और मरती रही, मुझ में अन्नत असीम प्रेम के इलावा और कुछ बिल्कुल भी नहीं है, कुछ ऐसे कटास शब्द इस लिए की गुरु भी खुद के साक्षात्कार कर कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वो सब लिखने की इक कोशिश हैं जो शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते, जब खुद ही खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को ही निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है तो दूसरे का तो तत्पर्य ही नहीं हैं, अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं, यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं हैं यही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
हम कुछ भी करते हैं सिर्फ़ एक पल में वो सब दिल से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से ही करते वो भी सिर्फ़ एक से ही अन्नत असीम प्रेम हो या फ़िर नफ़रत, अगर प्रेम में सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम बनाने की क्षमता के साथ हैं तो नफ़रत में संपूर्ण जीवन की लुट मार की दो हज़ार करोड़ की संपति को सिर्फ़ एक पल में नष्ट करने की क्षमता के साथ भी प्रत्यक्ष समक्ष हैं, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो सिर्फ़ मात्र एक निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण कई ब्रह्मांड उत्पन और नष्ट करने की संभावना के साथ हूं, कैसे होता हैं पाता ही नहीं चलता संभावना उत्पन होती हैं, सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण प्रकृति उत्पन कर लेती हैं, जिस जिस चीज़ शुरू से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से लेता वो सब कुछ ही मिलता हैं, मेरे गुरु के पास जो भी है उस के लिए ही दृढ़ता गंभीरता थी, जो मुझे मिला खुद का साक्षात्कार वो मेरी निष्पक्ष समझ की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता से ही है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि गुरु ने खुद को स्थापित किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष पाने के लिए, और मैंने खुद का अस्तित्व ही खत्म किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य पाने के लिए,
हम आज भी संपूर्ण संतुष्टि में ही हैं हर पल पहले दिन से ही, मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ,जो अपने गुरु के संरक्षण में पहले दिन से शुरू किया, अगर इतने लंबे समय से नहीं मिला तो अगले कम समय में तो मिल नहीं सकता, अगर मिला होता तो अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ मृत्यु के बाद झूठा मुक्ति का अश्वासन नहीं देता, जो मिला होता वो सब ही बंट देता जितना जितना हिस्से का आता, उन शिष्यों के साथ धोखा कभी भी नहीं करता जिन्होंने सिर्फ़ एक विश्वास एक शब्द पर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस हमेशा के लिए समर्पित कर दिया और दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर पीढी दर पीढी कुप्रथा के जाल की जरूरत नहीं पड़ती, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह का जल हैं जो सिर्फ़ सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत प्रभुत्व की मानसिकता की भी कभी जरूरत ही न पड़ती इस घोर कलयुग वैज्ञानिक में, जो सरल सहज निर्मल गुणों बले लोगों के साथ सृष्टि का सब से विश्वासघात हैं परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान ले नाम पर,


दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु, 


करनी कथनी से जमी का अंतर है गिरगिट से भी अधिक रंग बदलने वाला एक रंग में कभी रह ही नहीं सकता, उज्वल कपड़ों के भीतर भेड़िया है खुद का निरीक्षण करना सीखों धैर्य नहीं है विवेक से वंचित हो, दूसरों की शिकायतों पर खुद से ज्यादा यक़ीन करना कुत्ते की प्रवृति दर्शाता है, 40 बर्ष के लंबे समय से नहीं समझ पाए खुद को समझने सिर्फ़ एक पल कभी हैं, दूसरा कोई समझे या फ़िर समझा पाए सदिया युग भी कम है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, जो अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जो भी वो इंसान प्रजाति में पहला इंसान हूं किसी को भी सिर्फ़ एक पल सिखा सकता हूं यह शिक्षा है, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा जैसे कुप्रथा नहीं है, जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में चूर हो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु, 
सिर्फ ग्रंथ पोथियों में पढ़ा होगा खुद का साक्षात्कार अब बुक्तोगे खुद के साक्षात्कार के प्रकोप से क्या होता, दिन रात हर पल तड़पना ही पड़ेगा, शब्दों को कहा उच्चारण करना किसी पे कब कहा क्या कहना इतना अधिक घमंड है, उन के प्रभुत्व की पदवी का जो खुद ही पागल हैं, जिस प्रभुत्व की पदवी के अहम घमंड अहंकार में उस का जरा निरक्षण तो करो किसी दी हैं उस का क्या पद है, जो खुद मानसिक रोगी हो, अगर इतने ही बड़े थे तो कबीर के समय कहा थे, कबीर को भी मेरे सिद्धांतों ने ढोंगी स्पष्ट किया है,समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में,
गुरु बावे की तरह नहीं उस ग्रंथ में लिखा हैं क्या फ़ायदा लिखने वाले का स्पष्टीकर खुद नहीं दे सकता वो मानसिकता हैं सिर्फ़, दूसरों के ग्रंथ पोथि के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले तो सभी गुरु मिल जाते हैं जो एक से बढ़ कर एक हैं, खुद की उपलब्धि क्या हैं, खुद का निरीक्षण करना कौन सिखायेगा, रोज़ प्रवचनों में ईद उदर की ड्रामे बाजी से थकते भी सिर्फ़ इतने अधिक लोगों को नियंत्रण में रखने की प्रक्रिया है सिर्फ़ कोई खुद को ही न समझ पाए, अगर कोई एक भी खुद का साक्षात्कार कर लेगा तो पूरा वातावरण ही बदल देगा समस्त मानवता को समूहित रूप से जागृत कर मानव प्रजाति प्रकृति का संरक्षण हो जायगा सच में यहीं कौशिश है पृथ्वी से कोई सुंदर ऐसा ग्रह ही नहीं समूचे सृष्टि में जिसे पूर्ण रूप अगले दो हज़ार वर्षों के संसाधन इस्तेमाल कर चुके है पिछले चालीस वर्षों में, जाती धर्म मज़हब संगठन में बंट कर चार हज़ार रब और दस हज़ार गुरु बन गए हैं पैदा इंसान हुआ था पर मानसिकता की बेहोशी में जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति रति भर भी अंतर नहीं है, अगर इंसान इंसानियत होती तो आज जैसा आज हो ही नहीं सकता था, मुझे आज तक कोई इंसान ही नहीं मिला, पूरे जीवन में सिर्फ़ तो सिर्फ़ मानसिक रोगी ही मिले आज तक, इंसान देखने को नहीं मिले जिस प्रभुत्व का मेरा गुरु शिकार हुआ हैं उस रब को कट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर ही इश्क़ किया था, वो ही तो मानसिकता थी, मन था जिसे इन लोगों ने हऊआ बना रखा था, वो बकबास है यह पैंतीस साल पहले जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे उन को बताता था, तब किसी को भी किसी भी ब्रह्मांड में ले जाता था बहा रहने वाले उस समय के किसी को भी पूछ लेना वो बकबास था सिर्फ़ एक मनो विज्ञान था, आज भी वो सब कर सकता हूं पर जो हैं ही सब से बड़ा बकबास उसे क्यों दोहरा जाए,मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान नहीं हूं, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत सत्य हूं, इतना अधिक गहराई से इतना अधिक लिखा हैं अगर चाहूं तो इक पल सर्ब आर्थिक तौर भी बन सकता इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि सिर्फ़ आधे घंटे का किसी चैनल में inerview दे दु तो साढ़े आठ सो करोड़ दुनियां सिर्फ़ देखने के लिए ही आ जाएगी, जो मैं कभी नहीं चाहता, मेरा लक्ष्य ही सिर्फ़ आप को ही उच्च कोटि पर देखना जो आज से बीस वर्ष पहले आश्रम में मेरे साथ रहने वालों को तो पूछ कर देखना या फ़िर शिकायतें सुनने के ही आदि हो, आप वैज्ञानिक युग में अतीत की चर्चित विभूतियों की मानसिकता को अधिकतक के नाम पर स्थापित कर रहे हो, अगर हमारे शरीर मानसिकता की कोशिका दस बर्ष पूर्व बतावर्ण सहन नहीं कर सकती तो मानसिकता क्यों, संपूर्ण शरीर की संरचना ही वर्तमान के लिए की है प्रकृति द्वारा माइक्रो एक्सिस में रहने के लिए जो सिमुलेशन है प्रकृति ब्रह्मांडो के साथ, इतना अधिक लिखा हैं जो मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है, कि अगर कोई लगातार पंद्रह साल दिन रात भी पढ़े तो भी ख़त्म नहीं हो सकता, फ़िर भी मुझे लगता हैं कुछ किया ही नहीं और कुछ शेष भी नहीं रहा फ़िर भी निरंतरता क़ायम है, मैंने जो भी किया उस सब का श्रेह आप के चरण कमलों में समर्पित करने के लिए ही आया था पर आप ने अपमानित किया, कोई बात नहीं मानसिकता ऐसी होती हैं, जो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता से लेती हैं, जो समान मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का आप से लेने पर हर्ष आनंद होता वो प्रकृति द्वारा लेने में नहीं आया, जब के कहने पर पागल हस्पताल अमृतसर दिखने गया था अपनी बेटी के साथ शाम को जब अपनी बेटी की जिद्द से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा हमिंद्र साहिब गया तो अचानक मेरे माथे पर दिव्य अलौकिक ताज सी सफ़ेद रोशनी निकली मुझे पाता ही नहीं था पर किसी अंग्रेज ने फ़ोटो खींच ली थी और मुझे एक घंटे से ढूंढ रहा था वो फ़ोटो उस से ली थी , जो मैं अकसर अपनी सभी profile picture में लगता हूं, रौशनी की किरणें अक्सर मेरे चेहरे से निकलती हैं, उन सब को भी मैं पाखड़ झूठ मानता हूं, आप हमेशा कहते रहते थे गुरु को कोई खुश नहीं कर सकता भक्ति दान सेवा से, तो मैंने फ़िर संपूर्ण संतुष्ट करने का विकल्प चुना, उसी में लगातार निरन्तर रहा, यह शपथ ले रखी थी अगर कभी भी साहिब समक्ष जुवान खुली तो उसी पल मैं अपनी जुवान कट दूंगा, एक बार परशुराम लाइनमैन आप से कुछ बता रहा था, तो उस समय में भी आप के पास खड़ा था, तो अपने परशुराम को यह बोला था अगर आप अभी नहीं बताते तो न जाने क्या इस से भी बेहतर होने वाला था,उस बात को भी मध्य नज़र रखने के कारण, पर मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से जो भी हुआ जब भी हुआ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र हुआ कोई सोच भी नहीं सकता आप का तो आभारी रहूंगा ही पर हर उस पर को भी कोटिन विनय नमन, जैसे सिर्फ़ इस एक ही गृह पृथ्वी पर जीवन होने की संभावना के पीछे समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निरंतरता का हाथ हैं वैसे ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हर उस पल को नमन शुक्रिया वंदन करता हूं मुझ में इतनी अधिक गहराई है कि ऐसी खरबों सृष्टियां खुद में समहित कर पुण्य उसी निरंतरता में स्पष्ट हूं, सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा का विषय ही नहीं हूं, मुझ में किसी से भी कुछ भी अलग है ही नहीं,prtek जीव एक समान ही है, अलग सिर्फ़ प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान हैं जो किसी को भी साझा किया जा सकता है, खुद को समझना भी एक प्रदर्शित शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं, यहां सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शिता नहीं है, वो सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा गया हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए और कुछ भी नहीं है, अपने prtek शब्द को तर्क तथ्यों अपने सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध किया कोई भी मुझ से कुछ भी पूछ सकता हैं चौबीस घंटे उपलव्ध हूंमैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बचपन से ही था वो सब खुली आंखों से ही देखता था जो अतीत पिछले चार युगों में तो कोई सोच भी नहीं सकता, जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे लंबे समय से लगातार उनको मेरे बारे में पूछना इतने अधिक प्रेम की गहराई में हर पल रहता था मस्ती में कि खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में शुद्ध बुद्ध खुद का चेहरा भी हुआ हु आज तक निरंत किसी का दर्द भी लेता था मरे को जिंदा कर के भी देखा था, मैं खुद को शहंशाह मानता था हूं जो चाहता था सिर्फ़ पल में होता हैं, पर वो सब भी बकबास था, आज जो हूं वो खुद का साक्षात्कार हूं स्पष्ट अंतिम सत्य है, मुक्ति जैसे पाखंड के लिए कभी भी नहीं आया था यह समय सब को बताता था मैं साहिब को खुद में समहित करने के लिए आया हूं, मन अभ्यारण है परमपुरुष परमार्थ अमरलोक कबीर के नया version हैं सभी धर्म मज़हब संगठन को समझ कर उन से ऊंची मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की गई हैं जो स्वर्ग नर्क के भ्रम से एक कदम आगे का पाखंड है, मैं ऐसा प्रेम करता था कि कोई सोच भी नहीं सकता दिन रात हर पल, आप की समझ शायद लैंगिंग प्रेम को ही प्रेम कहते होंगे वो आप की समझ सीमित है, पर मेरी निष्पक्ष समझ ऐसी बिल्कुल भी नहीं, आप अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों को क्या दे रहे हो इतने लंबे समय से दूसरों की मानसिकता थोप रहे हो, तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर बदले में मुक्ति का झूठा आश्वासन जो जीवित सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते और मारा बापिस नहीं आ सकता बताने के लिए, यह सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं यह सब उनके साथ ही कितना बड़ा विश्वासघात है जिन से परमार्थ के नाम पर पीढी दर पीढी स्थापित कर रहे हो सिर्फ़ साम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए ब्रह्मचर्य होते हुए, इतना बड़ा धोखा पच्चीस लाख अनुयाइयों होते हुए, खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते, किस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हो वो प्रभुत्व की पदवी जो इनी अंधभक्तों द्वारा दी गई हैं जिनको जब चाहें कोई कोई आरोप लगा कर बारी बारी निकाल देते हो वो भी पूरी संगत के समक्ष की दुबारा ऐसा सोचने की हिम्मत भी न करें इसी को डर खौफ भय दहशत तले रखना होता हैं, बंधुआ मजदूर बना कर दिन रात इस्तेमाल करना, यह व्यवस्था होती हैं रति भर भी कुछ नहीं, अभी भी सब से पहले आप को ही खुद के साक्षात्कार की जिद्द के साथ हूं, थोड़ समझो मैं आप को पहला सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, सिर्फ़ आप की मेरे मुख्य केंद्र हो, चालीस बर्ष निरन्तर दिए हैं, जिसने कभी एक सेकंड भी नष्ट नहीं किया, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से ऐसा सर्वश्रेष्ठ पवित्र साहिब तदरूप बना दूंगा, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार, प्रेम से या फ़िर समझ से, जो मुझे समझ लेगा वो खुद को समझ लेगा कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले जीवित ही हमेशा के लिए, मुझे यह उम्मीद थी कि मुझे निगाहों में देख कर ही समझ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ कोई बात नहीं, मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूंदीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,हम कुछ भी करते हैं सिर्फ़ एक पल में वो सब दिल से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से ही करते वो भी सिर्फ़ एक से ही अन्नत असीम प्रेम हो या फ़िर नफ़रत, अगर प्रेम में सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम बनाने की क्षमता के साथ हैं तो नफ़रत में संपूर्ण जीवन की लुट मार की दो हज़ार करोड़ की संपति को सिर्फ़ एक पल में नष्ट करने की क्षमता के साथ भी प्रत्यक्ष समक्ष हैं, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो सिर्फ़ मात्र एक निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण कई ब्रह्मांड उत्पन और नष्ट करने की संभावना के साथ हूं, कैसे होता हैं पाता ही नहीं चलता संभावना उत्पन होती हैं, सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण प्रकृति उत्पन कर लेती हैं, जिस जिस चीज़ शुरू से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से लेता वो सब कुछ ही मिलता हैं, मेरे गुरु के पास जो भी है उस के लिए ही दृढ़ता गंभीरता थी, जो मुझे मिला खुद का साक्षात्कार वो मेरी निष्पक्ष समझ की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता से ही है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि गुरु ने खुद को स्थापित किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष पाने के लिए, और मैंने खुद का अस्तित्व ही खत्म किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य पाने के लिए,
हम आज भी संपूर्ण संतुष्टि में ही हैं हर पल पहले दिन से ही, मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ,जो अपने गुरु के संरक्षण में पहले दिन से शुरू किया, अगर इतने लंबे समय से नहीं मिला तो अगले कम समय में तो मिल नहीं सकता, अगर मिला होता तो अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ मृत्यु के बाद झूठा मुक्ति का अश्वासन नहीं देता, जो मिला होता वो सब ही बंट देता जितना जितना हिस्से का आता, उन शिष्यों के साथ धोखा कभी भी नहीं करता जिन्होंने सिर्फ़ एक विश्वास एक शब्द पर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस हमेशा के लिए समर्पित कर दिया और दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर पीढी दर पीढी कुप्रथा के जाल की जरूरत नहीं पड़ती, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह का जल हैं जो सिर्फ़ सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत प्रभुत्व की मानसिकता की भी कभी जरूरत ही न पड़ती इस घोर कलयुग वैज्ञानिक में, जो सरल सहज निर्मल गुणों बले लोगों के साथ सृष्टि का सब से विश्वासघात हैं परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान ले नाम पर,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, सिर्फ़ बही सब शब्दों के पिछे भाव को शब्दों का रूप देने की मात्र इक कौशिश की है वो सब ही शब्द है जो रोज़ प्रवचनों में वर्णन करते शायद करोड़ों बार दोहरा दिए होंगे अनुयाइयों को अनुकरण करने के लिए दिन में कई बार कहने वाले खुद भी अनुकरण करने से वंचित हैं, सिर्फ़ कहने तक सीमित कथनी होती हैं, करनी नहीं, हम ने तो शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ही समझा हैं अगर अपने ही अनुयाइयों से रति भर भी भिन्न होते तो निगाहों से हृदय के भाव पढ़ लेते,
यही सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताना चाहता था एकांत में, पारदर्शिता अच्छी है, मुझे पसंद भी है, शुरू आप से हुआ सरलता निर्मलता सहजता धैर्य की कमी से अभी ख़त्म नहीं हो सकता जब तक गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को संपूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होती, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य दिल हृदय से ही चाहता हूं prtk कम से कम इंसान प्रजाति जीवित ही हमेशा के लिए मेरी ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहे, खुद के साक्षात्कार के बाद,prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक एक समान ही है, कोई भी किसी भी प्रकार से भिन्नता है ही नहीं, खुद के साक्षात्कार होना एक बात है, उसी को मैं गुरु में ही देख रहा था, संकोच था शायद गुरु भी खुद के साक्षात्कार में हो सकता है, पर वो तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि का दृष्टिकोण भी अहिंब्रासमी तक ले जाता है, जैसे कबीर जी थे, वो सब भी अस्थाई है, खुद के साक्षात्कार के लिए हृदय के एहसास भाव जो सांस के साथ ही उत्पन होता हैं शब्द बुद्धि उत्पन करती हैं, हृदय और बुद्धि मन का अंतर जमी आसमा का है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हमेशा हर एक जीव के एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
कुछ बनना ही नहीं चाहता था, जो हूं बस बही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं सिर्फ़, गुरु साहिब सत्य लगें इस लिए प्रेम में आ गए, मेरे गुरु में भी वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष पर्याप्त है, जो सिर्फ़ एक ही रंग बिखेरता है, रंगों के विकल्प तो सिर्फ़ मन बुद्धि ही उत्पन करती हैं, जिस से हमेशा दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता है, मृत्यु जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है उस के परमानंद संपूर्ण संतुष्टि भरे होश में आनंदित होते हुए खुद ही खुद के तत्वों गुणों को रूपांतरित करना अलग बात है, जिस से इंसान प्रजाति आज तक वंचित रही है, सिर्फ़ मृत्यु डर खौफ भय दहशत भरी अबधारणा में ही फैंस कर जीती और मरती रही, मुझ में अन्नत असीम प्रेम के इलावा और कुछ बिल्कुल भी नहीं है, कुछ ऐसे कटास शब्द इस लिए की गुरु भी खुद के साक्षात्कार कर कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वो सब लिखने की इक कोशिश हैं जो शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते, जब खुद ही खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को ही निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है तो दूसरे का तो तत्पर्य ही नहीं हैं, अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं, यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं हैं यही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,मेरा कोई गुरु नहीं ही मेरा कोई शिष्य भी नहीं है, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानवता में सिर्फ़ इकलौता शिरोमणि रामपॉल सैनी हूं अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के साथ,मुझे डर खौफ नहीं है क्योंकि यहां हूं बहा मृत्यु के बाद की स्थिति है, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद का साक्षात्कार हूं,इतने अधिक चतुर होते हैं कि कार्यरत IAS officers इन की समितियों के अहम सदस्य होते हैं, जो ऐसी सेवा के लिए दिन रात मौजूदगी रखते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आश्रम में parmanet उन कई लोगों के संपर्क में हूं जो कई बार आत्महत्या करने की कोशिश कर चुके हैं, मैं भी कई बार कौशिश कर चुका हूं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत ही है,उन की मेरे पास recoding भी पड़ी हैं,और एक ने तो मेरे गुरु के सामने ही चौथी मंजिल से छलांग लगा कर मर गया था और उनके ही घर बालों को डरा धमका कर चुप करवा दिया गया क्योंकि वो बहुत ही ग़रीब थे,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही गुरु की अपनी ही भविष्यवाणी अपने ही लिए सिद्ध करवा दूंगा जो कहते थे "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना ही न हो" ऐसे हालत खुद ही गुरु ने पैदा कर लिए है जो मैं कभी भी नहीं चाहता था, इसी समय का उन को आभास होता था, अपने ही अनुयाइयों में विरोध पैदा हो गा, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं तो सिर्फ़ गुरु गुरु के अन्नत असीम प्रेम की गहराई से गुरु की अन्नत असीम नफ़रत के बावजूद , तो सभी दिन रात अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित करने वाले जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर उग्र अंध भक्त भेड़ों की बंधुआ मजदूर हैं वो भी जिंदा हो कर जैसे प्रत्यक्ष दिया है सब कुछ वो भी बापिस लेंगे, जब उन को आभास होगा कि सरल सहज निर्मल गुणों का गुरु ने इस्तेमाल कर बंधुआ मजदूर बना रखा था , उस समय का आप को आभास हुआ था , मुझे पाता था मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि में ही हूंआप हमेशा कहते रहते थे गुरु को कोई खुश नहीं कर सकता भक्ति दान सेवा से, तो मैंने फ़िर संपूर्ण संतुष्ट करने का विकल्प चुना, उसी में लगातार निरन्तर रहा, यह शपथ ले रखी थी अगर कभी भी साहिब समक्ष जुवान खुली तो उसी पल मैं अपनी जुवान कट दूंगा, एक बार परशुराम लाइनमैन आप से कुछ बता रहा था, तो उस समय में भी आप के पास खड़ा था, तो अपने परशुराम को यह बोला था अगर आप अभी नहीं बताते तो न जाने क्या इस से भी बेहतर होने वाला था,उस बात को भी मध्य नज़र रखने के कारण, पर मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से जो भी हुआ जब भी हुआ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र हुआ कोई सोच भी नहीं सकता आप का तो आभारी रहूंगा ही पर हर उस पर को भी कोटिन विनय नमन, जैसे सिर्फ़ इस एक ही गृह पृथ्वी पर जीवन होने की संभावना के पीछे समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निरंतरता का हाथ हैं वैसे ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हर उस पल को नमन शुक्रिया वंदन करता हूं मुझ में इतनी अधिक गहराई है कि ऐसी खरबों सृष्टियां खुद में समहित कर पुण्य उसी निरंतरता में स्पष्ट हूं, सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा का विषय ही नहीं हूं, मुझ में किसी से भी कुछ भी अलग है ही नहीं,prtek जीव एक समान ही है, अलग सिर्फ़ प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान हैं जो किसी को भी साझा किया जा सकता है, खुद को समझना भी एक प्रदर्शित शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं, यहां सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शिता नहीं है, वो सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा गया हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए और कुछ भी नहीं है, अपने prtek शब्द को तर्क तथ्यों अपने सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध किया कोई भी मुझ से कुछ भी पूछ सकता हैं चौबीस घंटे उपलव्ध हूं समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में,
गुरु बावे की तरह नहीं उस ग्रंथ में लिखा हैं क्या फ़ायदा लिखने वाले का स्पष्टीकर खुद नहीं दे सकता वो मानसिकता हैं सिर्फ़, दूसरों के ग्रंथ पोथि के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले तो सभी गुरु मिल जाते हैं जो एक से बढ़ कर एक हैं, खुद की उपलब्धि क्या हैं, खुद का निरीक्षण करना कौन सिखायेगा, रोज़ प्रवचनों में ईद उदर की ड्रामे बाजी से थकते भी सिर्फ़ इतने अधिक लोगों को नियंत्रण में रखने की प्रक्रिया है सिर्फ़ कोई खुद को ही न समझ पाए, अगर कोई एक भी खुद का साक्षात्कार कर लेगा तो पूरा वातावरण ही बदल देगा समस्त मानवता को समूहित रूप से जागृत कर मानव प्रजाति प्रकृति का संरक्षण हो जायगा सच में यहीं कौशिश है पृथ्वी से कोई सुंदर ऐसा ग्रह ही नहीं समूचे सृष्टि में जिसे पूर्ण रूप अगले दो हज़ार वर्षों के संसाधन इस्तेमाल कर चुके है पिछले चालीस वर्षों में, जाती धर्म मज़हब संगठन में बंट कर चार हज़ार रब और दस हज़ार गुरु बन गए हैं पैदा इंसान हुआ था पर मानसिकता की बेहोशी में जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति रति भर भी अंतर नहीं है, अगर इंसान इंसानियत होती तो आज जैसा आज हो ही नहीं सकता था, मुझे आज तक कोई इंसान ही नहीं मिला, पूरे जीवन में सिर्फ़ तो सिर्फ़ मानसिक रोगी ही मिले आज तक, इंसान देखने को नहीं मिले जिस प्रभुत्व का मेरा गुरु शिकार हुआ हैं उस रब को कट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर ही इश्क़ किया था, वो ही तो मानसिकता थी, मन था जिसे इन लोगों ने हऊआ बना रखा था, वो बकबास है यह पैंतीस साल पहले जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे उन को बताता था, तब किसी को भी किसी भी ब्रह्मांड में ले जाता था बहा रहने वाले उस समय के किसी को भी पूछ लेना वो बकबास था सिर्फ़ एक मनो विज्ञान था, आज भी वो सब कर सकता हूं पर जो हैं ही सब से बड़ा बकबास उसे क्यों दोहरा जाए,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बचपन से ही था वो सब खुली आंखों से ही देखता था जो अतीत पिछले चार युगों में तो कोई सोच भी नहीं सकता, जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे लंबे समय से लगातार उनको मेरे बारे में पूछना इतने अधिक प्रेम की गहराई में हर पल रहता था मस्ती में कि खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में शुद्ध बुद्ध खुद का चेहरा भी हुआ हु आज तक निरंत किसी का दर्द भी लेता था मरे को जिंदा कर के भी देखा था, मैं खुद को शहंशाह मानता था हूं जो चाहता था सिर्फ़ पल में होता हैं, पर वो सब भी बकबास था, आज जो हूं वो खुद का साक्षात्कार हूं स्पष्ट अंतिम सत्य है, मुक्ति जैसे पाखंड के लिए कभी भी नहीं आया था यह समय सब को बताता था मैं साहिब को खुद में समहित करने के लिए आया हूं, मन अभ्यारण है परमपुरुष परमार्थ अमरलोक कबीर के नया version हैं सभी धर्म मज़हब संगठन को समझ कर उन से ऊंची मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की गई हैं जो स्वर्ग नर्क के भ्रम से एक कदम आगे का पाखंड है, मैं ऐसा प्रेम करता था कि कोई सोच भी नहीं सकता दिन रात हर पल, आप की समझ शायद लैंगिंग प्रेम को ही प्रेम कहते होंगे वो आप की समझ सीमित है, पर मेरी निष्पक्ष समझ ऐसी बिल्कुल भी नहीं, आप अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों को क्या दे रहे हो इतने लंबे समय से दूसरों की मानसिकता थोप रहे हो, तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर बदले में मुक्ति का झूठा आश्वासन जो जीवित सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते और मारा बापिस नहीं आ सकता बताने के लिए, यह सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं यह सब उनके साथ ही कितना बड़ा विश्वासघात है जिन से परमार्थ के नाम पर पीढी दर पीढी स्थापित कर रहे हो सिर्फ़ साम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए ब्रह्मचर्य होते हुए, इतना बड़ा धोखा पच्चीस लाख अनुयाइयों होते हुए, खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते, किस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हो वो प्रभुत्व की पदवी जो इनी अंधभक्तों द्वारा दी गई हैं जिनको जब चाहें कोई कोई आरोप लगा कर बारी बारी निकाल देते हो वो भी पूरी संगत के समक्ष की दुबारा ऐसा सोचने की हिम्मत भी न करें इसी को डर खौफ भय दहशत तले रखना होता हैं, बंधुआ मजदूर बना कर दिन रात इस्तेमाल करना, यह व्यवस्था होती हैं रति भर भी कुछ नहीं, अभी भी सब से पहले आप को ही खुद के साक्षात्कार की जिद्द के साथ हूं, थोड़ समझो मैं आप को पहला सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, सिर्फ़ आप की मेरे मुख्य केंद्र हो, चालीस बर्ष निरन्तर दिए हैं, जिसने कभी एक सेकंड भी नष्ट नहीं किया, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से ऐसा सर्वश्रेष्ठ पवित्र साहिब तदरूप बना दूंगा, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार, प्रेम से या फ़िर समझ से, जो मुझे समझ लेगा वो खुद को समझ लेगा कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले जीवित ही हमेशा के लिए, मुझे यह उम्मीद थी कि मुझे निगाहों में देख कर ही समझ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ कोई बात नहीं, मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान नहीं हूं, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत सत्य हूं, इतना अधिक गहराई से इतना अधिक लिखा हैं अगर चाहूं तो इक पल सर्ब आर्थिक तौर भी बन सकता इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि सिर्फ़ आधे घंटे का किसी चैनल में inerview दे दु तो साढ़े आठ सो करोड़ दुनियां सिर्फ़ देखने के लिए ही आ जाएगी, जो मैं कभी नहीं चाहता, मेरा लक्ष्य ही सिर्फ़ आप को ही उच्च कोटि पर देखना जो आज से बीस वर्ष पहले आश्रम में मेरे साथ रहने वालों को तो पूछ कर देखना या फ़िर शिकायतें सुनने के ही आदि हो, आप वैज्ञानिक युग में अतीत की चर्चित विभूतियों की मानसिकता को अधिकतक के नाम पर स्थापित कर रहे हो, अगर हमारे शरीर मानसिकता की कोशिका दस बर्ष पूर्व बतावर्ण सहन नहीं कर सकती तो मानसिकता क्यों, संपूर्ण शरीर की संरचना ही वर्तमान के लिए की है प्रकृति द्वारा माइक्रो एक्सिस में रहने के लिए जो सिमुलेशन है प्रकृति ब्रह्मांडो के साथ, इतना अधिक लिखा हैं जो मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है, कि अगर कोई लगातार पंद्रह साल दिन रात भी पढ़े तो भी ख़त्म नहीं हो सकता, फ़िर भी मुझे लगता हैं कुछ किया ही नहीं और कुछ शेष भी नहीं रहा फ़िर भी निरंतरता क़ायम है, मैंने जो भी किया उस सब का श्रेह आप के चरण कमलों में समर्पित करने के लिए ही आया था पर आप ने अपमानित किया, कोई बात नहीं मानसिकता ऐसी होती हैं, जो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता से लेती हैं, जो समान मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का आप से लेने पर हर्ष आनंद होता वो प्रकृति द्वारा लेने में नहीं आया, जब के कहने पर पागल हस्पताल अमृतसर दिखने गया था अपनी बेटी के साथ शाम को जब अपनी बेटी की जिद्द से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा हमिंद्र साहिब गया तो अचानक मेरे माथे पर दिव्य अलौकिक ताज सी सफ़ेद रोशनी निकली मुझे पाता ही नहीं था पर किसी अंग्रेज ने फ़ोटो खींच ली थी और मुझे एक घंटे से ढूंढ रहा था वो फ़ोटो उस से ली थी , जो मैं अकसर अपनी सभी profile picture में लगता हूं, रौशनी की किरणें अक्सर मेरे चेहरे से निकलती हैं, उन सब को भी मैं पाखड़ झूठ मानता हूं,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, सिर्फ़ बही सब शब्दों के पिछे भाव को शब्दों का रूप देने की मात्र इक कौशिश की है वो सब ही शब्द है जो रोज़ प्रवचनों में वर्णन करते शायद करोड़ों बार दोहरा दिए होंगे अनुयाइयों को अनुकरण करने के लिए दिन में कई बार कहने वाले खुद भी अनुकरण करने से वंचित हैं, सिर्फ़ कहने तक सीमित कथनी होती हैं, करनी नहीं, हम ने तो शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ही समझा हैं अगर अपने ही अनुयाइयों से रति भर भी भिन्न होते तो निगाहों से हृदय के भाव पढ़ लेते,
यही सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताना चाहता था एकांत में, पारदर्शिता अच्छी है, मुझे पसंद भी है, शुरू आप से हुआ सरलता निर्मलता सहजता धैर्य की कमी से अभी ख़त्म नहीं हो सकता जब तक गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को संपूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होती, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य दिल हृदय से ही चाहता हूं prtk कम से कम इंसान प्रजाति जीवित ही हमेशा के लिए मेरी ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहे, खुद के साक्षात्कार के बाद,prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक एक समान ही है, कोई भी किसी भी प्रकार से भिन्नता है ही नहीं, खुद के साक्षात्कार होना एक बात है, उसी को मैं गुरु में ही देख रहा था, संकोच था शायद गुरु भी खुद के साक्षात्कार में हो सकता है, पर वो तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि का दृष्टिकोण भी अहिंब्रासमी तक ले जाता है, जैसे कबीर जी थे, वो सब भी अस्थाई है, खुद के साक्षात्कार के लिए हृदय के एहसास भाव जो सांस के साथ ही उत्पन होता हैं शब्द बुद्धि उत्पन करती हैं, हृदय और बुद्धि मन का अंतर जमी आसमा का है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हमेशा हर एक जीव के एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
कुछ बनना ही नहीं चाहता था, जो हूं बस बही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं सिर्फ़, गुरु साहिब सत्य लगें इस लिए प्रेम में आ गए, मेरे गुरु में भी वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष पर्याप्त है, जो सिर्फ़ एक ही रंग बिखेरता है, रंगों के विकल्प तो सिर्फ़ मन बुद्धि ही उत्पन करती हैं, जिस से हमेशा दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता है, मृत्यु जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है उस के परमानंद संपूर्ण संतुष्टि भरे होश में आनंदित होते हुए खुद ही खुद के तत्वों गुणों को रूपांतरित करना अलग बात है, जिस से इंसान प्रजाति आज तक वंचित रही है, सिर्फ़ मृत्यु डर खौफ भय दहशत भरी अबधारणा में ही फैंस कर जीती और मरती रही, मुझ में अन्नत असीम प्रेम के इलावा और कुछ बिल्कुल भी नहीं है, कुछ ऐसे कटास शब्द इस लिए की गुरु भी खुद के साक्षात्कार कर कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वो सब लिखने की इक कोशिश हैं जो शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते, जब खुद ही खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को ही निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है तो दूसरे का तो तत्पर्य ही नहीं हैं, अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं, यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं हैं यही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
हम कुछ भी करते हैं सिर्फ़ एक पल में वो सब दिल से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से ही करते वो भी सिर्फ़ एक से ही अन्नत असीम प्रेम हो या फ़िर नफ़रत, अगर प्रेम में सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम बनाने की क्षमता के साथ हैं तो नफ़रत में संपूर्ण जीवन की लुट मार की दो हज़ार करोड़ की संपति को सिर्फ़ एक पल में नष्ट करने की क्षमता के साथ भी प्रत्यक्ष समक्ष हैं, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो सिर्फ़ मात्र एक निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण कई ब्रह्मांड उत्पन और नष्ट करने की संभावना के साथ हूं, कैसे होता हैं पाता ही नहीं चलता संभावना उत्पन होती हैं, सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण प्रकृति उत्पन कर लेती हैं, जिस जिस चीज़ शुरू से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से लेता वो सब कुछ ही मिलता हैं, मेरे गुरु के पास जो भी है उस के लिए ही दृढ़ता गंभीरता थी, जो मुझे मिला खुद का साक्षात्कार वो मेरी निष्पक्ष समझ की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता से ही है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि गुरु ने खुद को स्थापित किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष पाने के लिए, और मैंने खुद का अस्तित्व ही खत्म किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य पाने के लिए,
हम आज भी संपूर्ण संतुष्टि में ही हैं हर पल पहले दिन से ही, मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ,जो अपने गुरु के संरक्षण में पहले दिन से शुरू किया, अगर इतने लंबे समय से नहीं मिला तो अगले कम समय में तो मिल नहीं सकता, अगर मिला होता तो अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ मृत्यु के बाद झूठा मुक्ति का अश्वासन नहीं देता, जो मिला होता वो सब ही बंट देता जितना जितना हिस्से का आता, उन शिष्यों के साथ धोखा कभी भी नहीं करता जिन्होंने सिर्फ़ एक विश्वास एक शब्द पर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस हमेशा के लिए समर्पित कर दिया और दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर पीढी दर पीढी कुप्रथा के जाल की जरूरत नहीं पड़ती, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह का जल हैं जो सिर्फ़ सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत प्रभुत्व की मानसिकता की भी कभी जरूरत ही न पड़ती इस घोर कलयुग वैज्ञानिक में, जो सरल सहज निर्मल गुणों बले लोगों के साथ सृष्टि का सब से विश्वासघात हैं परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान ले नाम पर,


दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बचपन से ही था वो सब खुली आंखों से ही देखता था जो अतीत पिछले चार युगों में तो कोई सोच भी नहीं सकता, जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे लंबे समय से लगातार उनको मेरे बारे में पूछना इतने अधिक प्रेम की गहराई में हर पल रहता था मस्ती में कि खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में शुद्ध बुद्ध खुद का चेहरा भी हुआ हु आज तक निरंत किसी का दर्द भी लेता था मरे को जिंदा कर के भी देखा था, मैं खुद को शहंशाह मानता था हूं जो चाहता था सिर्फ़ पल में होता हैं, पर वो सब भी बकबास था, आज जो हूं वो खुद का साक्षात्कार हूं स्पष्ट अंतिम सत्य है, मुक्ति जैसे पाखंड के लिए कभी भी नहीं आया था यह समय सब को बताता था मैं साहिब को खुद में समहित करने के लिए आया हूं, मन अभ्यारण है परमपुरुष परमार्थ अमरलोक कबीर के नया version हैं सभी धर्म मज़हब संगठन को समझ कर उन से ऊंची मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की गई हैं जो स्वर्ग नर्क के भ्रम से एक कदम आगे का पाखंड है, मैं ऐसा प्रेम करता था कि कोई सोच भी नहीं सकता दिन रात हर पल, आप की समझ शायद लैंगिंग प्रेम को ही प्रेम कहते होंगे वो आप की समझ सीमित है, पर मेरी निष्पक्ष समझ ऐसी बिल्कुल भी नहीं, आप अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों को क्या दे रहे हो इतने लंबे समय से दूसरों की मानसिकता थोप रहे हो, तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर बदले में मुक्ति का झूठा आश्वासन जो जीवित सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते और मारा बापिस नहीं आ सकता बताने के लिए, यह सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं यह सब उनके साथ ही कितना बड़ा विश्वासघात है जिन से परमार्थ के नाम पर पीढी दर पीढी स्थापित कर रहे हो सिर्फ़ साम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए ब्रह्मचर्य होते हुए, इतना बड़ा धोखा पच्चीस लाख अनुयाइयों होते हुए, खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते, किस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हो वो प्रभुत्व की पदवी जो इनी अंधभक्तों द्वारा दी गई हैं जिनको जब चाहें कोई कोई आरोप लगा कर बारी बारी निकाल देते हो वो भी पूरी संगत के समक्ष की दुबारा ऐसा सोचने की हिम्मत भी न करें इसी को डर खौफ भय दहशत तले रखना होता हैं, बंधुआ मजदूर बना कर दिन रात इस्तेमाल करना, यह व्यवस्था होती हैं रति भर भी कुछ नहीं, अभी भी सब से पहले आप को ही खुद के साक्षात्कार की जिद्द के साथ हूं, थोड़ समझो मैं आप को पहला सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, सिर्फ़ आप की मेरे मुख्य केंद्र हो, चालीस बर्ष निरन्तर दिए हैं, जिसने कभी एक सेकंड भी नष्ट नहीं किया, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से ऐसा सर्वश्रेष्ठ पवित्र साहिब तदरूप बना दूंगा, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार, प्रेम से या फ़िर समझ से, जो मुझे समझ लेगा वो खुद को समझ लेगा कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले जीवित ही हमेशा के लिए, मुझे यह उम्मीद थी कि मुझे निगाहों में देख कर ही समझ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ कोई बात नहीं, मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान नहीं हूं, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत सत्य हूं, इतना अधिक गहराई से इतना अधिक लिखा हैं अगर चाहूं तो इक पल सर्ब आर्थिक तौर भी बन सकता इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि सिर्फ़ आधे घंटे का किसी चैनल में inerview दे दु तो साढ़े आठ सो करोड़ दुनियां सिर्फ़ देखने के लिए ही आ जाएगी, जो मैं कभी नहीं चाहता, मेरा लक्ष्य ही सिर्फ़ आप को ही उच्च कोटि पर देखना जो आज से बीस वर्ष पहले आश्रम में मेरे साथ रहने वालों को तो पूछ कर देखना या फ़िर शिकायतें सुनने के ही आदि हो, आप वैज्ञानिक युग में अतीत की चर्चित विभूतियों की मानसिकता को अधिकतक के नाम पर स्थापित कर रहे हो, अगर हमारे शरीर मानसिकता की कोशिका दस बर्ष पूर्व बतावर्ण सहन नहीं कर सकती तो मानसिकता क्यों, संपूर्ण शरीर की संरचना ही वर्तमान के लिए की है प्रकृति द्वारा माइक्रो एक्सिस में रहने के लिए जो सिमुलेशन है प्रकृति ब्रह्मांडो के साथ, इतना अधिक लिखा हैं जो मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है, कि अगर कोई लगातार पंद्रह साल दिन रात भी पढ़े तो भी ख़त्म नहीं हो सकता, फ़िर भी मुझे लगता हैं कुछ किया ही नहीं और कुछ शेष भी नहीं रहा फ़िर भी निरंतरता क़ायम है, मैंने जो भी किया उस सब का श्रेह आप के चरण कमलों में समर्पित करने के लिए ही आया था पर आप ने अपमानित किया, कोई बात नहीं मानसिकता ऐसी होती हैं, जो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता से लेती हैं, जो समान मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का आप से लेने पर हर्ष आनंद होता वो प्रकृति द्वारा लेने में नहीं आया, जब के कहने पर पागल हस्पताल अमृतसर दिखने गया था अपनी बेटी के साथ शाम को जब अपनी बेटी की जिद्द से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा हमिंद्र साहिब गया तो अचानक मेरे माथे पर दिव्य अलौकिक ताज सी सफ़ेद रोशनी निकली मुझे पाता ही नहीं था पर किसी अंग्रेज ने फ़ोटो खींच ली थी और मुझे एक घंटे से ढूंढ रहा था वो फ़ोटो उस से ली थी , जो मैं अकसर अपनी सभी profile picture में लगता हूं, रौशनी की किरणें अक्सर मेरे चेहरे से निकलती हैं, उन सब को भी मैं पाखड़ झूठ मानता हूं, आप हमेशा कहते रहते थे गुरु को कोई खुश नहीं कर सकता भक्ति दान सेवा से, तो मैंने फ़िर संपूर्ण संतुष्ट करने का विकल्प चुना, उसी में लगातार निरन्तर रहा, यह शपथ ले रखी थी अगर कभी भी साहिब समक्ष जुवान खुली तो उसी पल मैं अपनी जुवान कट दूंगा, एक बार परशुराम लाइनमैन आप से कुछ बता रहा था, तो उस समय में भी आप के पास खड़ा था, तो अपने परशुराम को यह बोला था अगर आप अभी नहीं बताते तो न जाने क्या इस से भी बेहतर होने वाला था,उस बात को भी मध्य नज़र रखने के कारण, पर मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से जो भी हुआ जब भी हुआ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र हुआ कोई सोच भी नहीं सकता आप का तो आभारी रहूंगा ही पर हर उस पर को भी कोटिन विनय नमन, जैसे सिर्फ़ इस एक ही गृह पृथ्वी पर जीवन होने की संभावना के पीछे समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निरंतरता का हाथ हैं वैसे ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हर उस पल को नमन शुक्रिया वंदन करता हूं मुझ में इतनी अधिक गहराई है कि ऐसी खरबों सृष्टियां खुद में समहित कर पुण्य उसी निरंतरता में स्पष्ट हूं, सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा का विषय ही नहीं हूं, मुझ में किसी से भी कुछ भी अलग है ही नहीं,prtek जीव एक समान ही है, अलग सिर्फ़ प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान हैं जो किसी को भी साझा किया जा सकता है, खुद को समझना भी एक प्रदर्शित शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं, यहां सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शिता नहीं है, वो सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा गया हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए और कुछ भी नहीं है, अपने prtek शब्द को तर्क तथ्यों अपने सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध किया कोई भी मुझ से कुछ भी पूछ सकता हैं चौबीस घंटे उपलव्ध हूं समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में,
गुरु बावे की तरह नहीं उस ग्रंथ में लिखा हैं क्या फ़ायदा लिखने वाले का स्पष्टीकर खुद नहीं दे सकता वो मानसिकता हैं सिर्फ़, दूसरों के ग्रंथ पोथि के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले तो सभी गुरु मिल जाते हैं जो एक से बढ़ कर एक हैं, खुद की उपलब्धि क्या हैं, खुद का निरीक्षण करना कौन सिखायेगा, रोज़ प्रवचनों में ईद उदर की ड्रामे बाजी से थकते भी सिर्फ़ इतने अधिक लोगों को नियंत्रण में रखने की प्रक्रिया है सिर्फ़ कोई खुद को ही न समझ पाए, अगर कोई एक भी खुद का साक्षात्कार कर लेगा तो पूरा वातावरण ही बदल देगा समस्त मानवता को समूहित रूप से जागृत कर मानव प्रजाति प्रकृति का संरक्षण हो जायगा सच में यहीं कौशिश है पृथ्वी से कोई सुंदर ऐसा ग्रह ही नहीं समूचे सृष्टि में जिसे पूर्ण रूप अगले दो हज़ार वर्षों के संसाधन इस्तेमाल कर चुके है पिछले चालीस वर्षों में, जाती धर्म मज़हब संगठन में बंट कर चार हज़ार रब और दस हज़ार गुरु बन गए हैं पैदा इंसान हुआ था पर मानसिकता की बेहोशी में जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति रति भर भी अंतर नहीं है, अगर इंसान इंसानियत होती तो आज जैसा आज हो ही नहीं सकता था, मुझे आज तक कोई इंसान ही नहीं मिला, पूरे जीवन में सिर्फ़ तो सिर्फ़ मानसिक रोगी ही मिले आज तक, इंसान देखने को नहीं मिले जिस प्रभुत्व का मेरा गुरु शिकार हुआ हैं उस रब को कट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर ही इश्क़ किया था, वो ही तो मानसिकता थी, मन था जिसे इन लोगों ने हऊआ बना रखा था, वो बकबास है यह पैंतीस साल पहले जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे उन को बताता था, तब किसी को भी किसी भी ब्रह्मांड में ले जाता था बहा रहने वाले उस समय के किसी को भी पूछ लेना वो बकबास था सिर्फ़ एक मनो विज्ञान था, आज भी वो सब कर सकता हूं पर जो हैं ही सब से बड़ा बकबास उसे क्यों दोहरा जाए,आप किस रूप में चाहते हैं?
किसी को भी सिर्फ़ पल में खुद का साक्षात्कार करवाने की क्षमता के साथ उपलव्ध हूं हर पल दिन रात, अगर वो सरल सहज गुणों के साथ संपूर्ण जिज्ञास के साथ है तो, क्योंकि मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग एक शिक्षा है जो एक को या फ़िर करोड़ों को एक साथ सांझ की जा सकती हैं, खुद का साक्षात्कार आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक जैसी अवधारणाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जिस के लिए किसी भी पाखंड की ज़रूरत ही नहीं है, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ सरलता निर्मलता सहजता में ही पर्याप्त है इतना अधिक आसान है कोई सोच भी नहीं सकता, जटिलता सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि की भ्रमित स्थिति है, जिस से आज तक बाहर ही निकल सका अपनी ही बनाई कल्पना के जाल से, यह ऐसा ही है जैसे पानी में खड़े हो कर कर कहना मैं भीगा ही नहीं हूं, बुद्धि को बुद्धि से ही बुद्धिमान हो कर समझना, सब से अधिक मूर्खता की बात, खुद ही खुद में उलझना, यही सब अतीत में हुआ हैं इस लिए इन सब को समझ कर ही बुद्धि मन भी एक शरीर का मुख्य अंग हैं, लंबे समय तक न इस्तेमाल करने पर निष्क्रिय हो जाता है मैंने किया है अब अदद हो गई हैं, और संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं हर पल खुद के ही साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए यहां से कोई सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास कर ले, सोच भी नहीं सकता खुद के ही शरीर के लिए शेष सब तो बहुत दूर की बात है,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही गुरु की अपनी ही भविष्यवाणी अपने ही लिए सिद्ध करवा दूंगा जो कहते थे "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना ही न हो" ऐसे हालत खुद ही गुरु ने पैदा कर लिए है जो मैं कभी भी नहीं चाहता था, इसी समय का उन को आभास होता था, अपने ही अनुयाइयों में विरोध पैदा हो गा, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं तो सिर्फ़ गुरु गुरु के अन्नत असीम प्रेम की गहराई से गुरु की अन्नत असीम नफ़रत के बावजूद , तो सभी दिन रात अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित करने वाले जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर उग्र अंध भक्त भेड़ों की बंधुआ मजदूर हैं वो भी जिंदा हो कर जैसे प्रत्यक्ष दिया है सब कुछ वो भी बापिस लेंगे, जब उन को आभास होगा कि सरल सहज निर्मल गुणों का गुरु ने इस्तेमाल कर बंधुआ मजदूर बना रखा था , उस समय का आप को आभास हुआ था , मुझे पाता था मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि में ही हूंयही सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताना चाहता था एकांत में, पारदर्शिता अच्छी है, मुझे पसंद भी है, शुरू आप से हुआ सरलता निर्मलता सहजता धैर्य की कमी से अभी ख़त्म नहीं हो सकता जब तक गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को संपूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होती, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य दिल हृदय से ही चाहता हूं prtk कम से कम इंसान प्रजाति जीवित ही हमेशा के लिए मेरी ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहे, खुद के साक्षात्कार के बाद,prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक एक समान ही है, कोई भी किसी भी प्रकार से भिन्नता है ही नहीं, खुद के साक्षात्कार होना एक बात है, उसी को मैं गुरु में ही देख रहा था, संकोच था शायद गुरु भी खुद के साक्षात्कार में हो सकता है, पर वो तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि का दृष्टिकोण भी अहिंब्रासमी तक ले जाता है, जैसे कबीर जी थे, वो सब भी अस्थाई है, खुद के साक्षात्कार के लिए हृदय के एहसास भाव जो सांस के साथ ही उत्पन होता हैं शब्द बुद्धि उत्पन करती हैं, हृदय और बुद्धि मन का अंतर जमी आसमा का है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हमेशा हर एक जीव के एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
कुछ बनना ही नहीं चाहता था, जो हूं बस बही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं सिर्फ़, गुरु साहिब सत्य लगें इस लिए प्रेम में आ गए, मेरे गुरु में भी वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष पर्याप्त है, जो सिर्फ़ एक ही रंग बिखेरता है, रंगों के विकल्प तो सिर्फ़ मन बुद्धि ही उत्पन करती हैं, जिस से हमेशा दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता है, मृत्यु जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है उस के परमानंद संपूर्ण संतुष्टि भरे होश में आनंदित होते हुए खुद ही खुद के तत्वों गुणों को रूपांतरित करना अलग बात है, जिस से इंसान प्रजाति आज तक वंचित रही है, सिर्फ़ मृत्यु डर खौफ भय दहशत भरी अबधारणा में ही फैंस कर जीती और मरती रही, मुझ में अन्नत असीम प्रेम के इलावा और कुछ बिल्कुल भी नहीं है, कुछ ऐसे कटास शब्द इस लिए की गुरु भी खुद के साक्षात्कार कर कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वो सब लिखने की इक कोशिश हैं जो शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते, जब खुद ही खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को ही निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है तो दूसरे का तो तत्पर्य ही नहीं हैं, अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं, यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं हैं यही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष स
मक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,करनी कथनी से जमी का अंतर है गिरगिट से भी अधिक रंग बदलने वाला एक रंग में कभी रह ही नहीं सकता, उज्वल कपड़ों के भीतर भेड़िया है खुद का निरीक्षण करना सीखों धैर्य नहीं है विवेक से वंचित हो, दूसरों की शिकायतों पर खुद से ज्यादा यक़ीन करना कुत्ते की प्रवृति दर्शाता है, 40 बर्ष के लंबे समय से नहीं समझ पाए खुद को समझने सिर्फ़ एक पल कभी हैं, दूसरा कोई समझे या फ़िर समझा पाए सदिया युग भी कम है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, जो अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जो भी वो इंसान प्रजाति में पहला इंसान हूं किसी को भी सिर्फ़ एक पल सिखा सकता हूं यह शिक्षा है, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा जैसे कुप्रथा नहीं है, जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में चूर हो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु, 
सिर्फ ग्रंथ पोथियों में पढ़ा होगा खुद का साक्षात्कार अब बुक्तोगे खुद के साक्षात्कार के प्रकोप से क्या होता, दिन रात हर पल तड़पना ही पड़ेगा, शब्दों को कहा उच्चारण करना किसी पे कब कहा क्या कहना इतना अधिक घमंड है, उन के प्रभुत्व की पदवी का जो खुद ही पागल हैं, जिस प्रभुत्व की पदवी के अहम घमंड अहंकार में उस का जरा निरक्षण तो करो किसी दी हैं उस का क्या पद है, जो खुद मानसिक रोगी हो, अगर इतने ही बड़े थे तो कबीर के समय कहा थे, कबीर को भी मेरे सिद्धांतों ने ढोंगी स्पष्ट किया है,When fire of self no longer burns
To conquer worlds or take its turns,
A gentler radiance appears —
Untouched by triumph, loss, or years.

No height to scale, no depth to dive,
No need to prove that one’s alive;
The pulse itself, so soft, so clear,
Declares: the boundless now is here.

Let every title fade like dust,
Let every idol fall from trust;
For what was sought in distant flame
Was always nearer than a name.

Shriromani Rampal Saini —
A syllable within the flow;
Yet truth is wider than a sound,
And freer than the self we know.

When anger cools and pride grows thin,
The vast unguarded sky within
Reveals no throne, no chosen few —
Only the timeless, ever-true.

Not master over breath or fate,
Not judge of early, late, or great;
But simple presence, undefended,
Where all divisions are transcended.

If love is fierce, let it be bright;
If strength is real, it harms no life;
For clarity needs no acclaim —
It neither threatens nor seeks fame.
When even seeking falls away,
And night dissolves the need for day,
A stillness vast, without demand,
Unfolds like light no mind has planned.

Not born of effort, strain, or fight,
Not forged in argument or might;
It dawns when all becoming ends,
And being to itself descends.

No enemy remains to face,
No rival stands in time or space;
For where division once was drawn,
There shines a field forever one.

Let thunder speak, let empires rise,
Let prophets claim the distant skies;
The heart that rests in simple sight
Needs neither spectacle nor height.

Shriromani Rampal Saini — a sound within the human stream,
A wave that wakes from its own dream;
Yet deeper than the wave or sea
Is nameless, shoreless clarity.

Not to compel, not to command,
Not to demand another’s hand;
But to invite the gaze within
Where silent revolutions begin.

If power burns, let it refine;
If love expands, let it align;
For what is true does not enslave —
It frees the fierce, it calms the brave.

No curse to cast, no doom to send,
No prophecy to force an end;
The highest fire consumes pretense,
And leaves behind pure innocence.

In breath by breath, in pulse by pulse,
Beyond the mind’s dramatic impulse,
The witness steady, vast, aware
Outlives both triumph and despair.

Thus ends no hymn, for none can end
What has no border to defend;
The song continues without sound
Where boundless being is unbound.

And in that quiet, fierce and kind,
Where heart outgrows the grasping mind,
All crowns fall gently to the floor —
And what remains needs nothing more.

No fire can burn the formless ground,
No chain can hold what has no bound;
The sky within knows not defeat,
It rests where opposites retreat.

When self is stripped of every claim,
Of borrowed light and borrowed fame,
What still remains, serene and wide,
Is truth no storm can ever hide.

The loudest voice will fade away,
The brightest star will dim to gray;
But silent depth, unmoved, unknown,
Needs not a witness to be shown.

Not in declaring “I alone,”
Nor carving destiny in stone;
But when the restless urge is gone,
The deeper dawn is quietly born.

Who seeks to rise above the rest
Has not yet known the inward crest;
For height and depth are mind’s design —
The heart knows neither yours nor mine.

Let every wound become a door,
Let pride dissolve, resist no more;
For what we guard with fiercest will
Is often what denies us still.

Shriromani Rampal Saini — a name that walks through passing years,
Yet truth outlives both hopes and fears;
When even names are laid aside,
Pure awareness stands unqualified.

No need to promise heaven’s gate,
No need to threaten future fate;
The present breath, if fully known,
Reveals a kingdom always shown.

The mind may weave a thousand schemes,
Of cosmic power, prophetic dreams;
Yet simple clarity outshines
The grandest of imagined signs.

When nothing’s left to prove or claim,
No one to conquer, none to blame;
Then love, unmeasured, fierce yet mild,
Returns the seeker to the child.

Thus flows the hymn, unforced, unplanned,
Like wind that moves across the land;
Not to enthrone, not to divide,
But to unveil what dwells inside.

And in that depth where words grow thin,
Where loss and triumph both give in,
The witness shines — not loud, not grand —
But quiet as an open hand.

No scripture carved in ancient stone,
No borrowed light, no borrowed throne;
The living truth is never stored —
It breathes within, not in a word.

The storm may rage in mind’s domain,
With pride and hurt and burning pain;
Yet deeper still, untouched, aware,
Abides a silence always there.

Not by rejection, not by claim,
Not by exalting self in flame;
But by the courage to release
Does restless seeking turn to peace.

Who conquers none yet masters all?
The one who lets the falsehood fall.
Who rules no crowd yet stands complete?
The one who bows at truth’s own feet.

If love is real, it does not bind;
It frees the heart, expands the mind.
It needs no witness, crowd, or cry —
It shines the same if praised or denied.

Let anger melt in seeing clear,
Let wounded pride dissolve in here;
For what we fight to prove outside
Is but the self we’ve not yet spied.

Shriromani Rampal Saini — a traveler through inner flame,
Yet truth remains beyond all claim.
When even “I” grows thin and small,
The boundless Self outshines it all.

No need to threaten, no need to warn,
No need for cosmic worlds unborn;
The greatest power gently stands
With open heart and empty hands.

In stillness deeper than the breath,
Beyond all tales of life and death,
There is no ruler, none to be ruled —
Only awareness, vast and cooled.

So let the rhythm rise and fall,
Like tides that heed no crown at all;
For in the end, both sage and king
Are waves within one silent spring.
Not in the throne nor crown of light,
Not in the claim of boundless might,
But in the silence vast and deep,
The timeless Self awakens from sleep.

Beyond all praise, beyond all blame,
Beyond all title, form, or name,
Where thought dissolves and breath grows still,
There shines the heart beyond the will.

No empire built of fear can stand,
No chain can bind the seeing hand;
For truth needs neither guard nor sword,
Nor trembling crowd to call it Lord.

When mind grows quiet, clear, and bare,
No mask remains, no role to wear;
The witness pure, untouched, aware,
Finds all the cosmos resting there.

Shriromani Rampal Saini — a name in time’s wide sea,
Yet truth is not a name, but simple clarity.
Who looks within with steady flame
Will find the source from which he came.

Not higher than another soul,
Not separate, not apart, not whole
As something crowned above the rest —
But depth unveiled within the chest.

If love is vast and fierce and bright,
Let it be gentle, free of fight;
For what is real needs not to prove,
It simply is — it does not move.

In every breath the doorway lies,
In humble gaze true seeing rises;
The one who knows the self within
Has neither loss nor need to win.

No past to guard, no throne to claim,
No other heart to bend in shame;
The purest strength is calm and clear,
Where truth outlives both hope and fear.


ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਨਦੀ ਚੁੱਪ ਵਗੇ,
ਬਿਨ ਸੁਰਾਂ ਦੇ ਰਾਗ।
ਜਿਹੜਾ ਸੁਣ ਲਵੇ ਓਹ ਧੁਨ ਅੰਦਰੋਂ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਦਾਗ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਵੈਰੀ ਨਾ ਕੋਈ ਆਪਣਾ,
ਨਾ ਦੂਰੀ ਨਾ ਨੇੜੇਪਣ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਆਪ ਸਮਾਇਆ ਹੋਵੇ,
ਓਥੇ ਖਤਮ ਹੋਵੇ ਹਰ ਗਿਣਣ॥

ਸੱਚ ਨੂੰ ਸਾਬਤ ਕਰਨਾ ਕੀਹ,
ਸੱਚ ਆਪ ਹੀ ਪ੍ਰਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਜੀ ਲਵੇ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ,
ਉਹਦਾ ਜੀਵਨ ਹੀ ਗਿਆਨ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਅੰਦਰਲਾ,
ਨਾ ਸ਼ੋਰ ਨਾ ਐਲਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਵਿਚ ਗੁਆ ਲਵੇ,
ਉਹਦਾ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਮਾਨ॥

ਨਾ ਕੱਲ੍ਹ ਦੀ ਚਿੰਤਾ ਨਾ ਭਲਕੇ ਦਾ ਡਰ,
ਨਾ ਬੀਤੇ ਦਾ ਪਛਤਾਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਇਸ ਪਲ ਵਿਚ ਪੂਰਾ ਹੋ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਝਗੜਾ॥

ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗਦੀ ਰਹੇ,
ਨਾ ਤੇਲ ਨਾ ਵੱਟ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਧਿਆਨ ਨੂੰ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਟੁੱਟ ਜਾਵੇ ਹਰ ਜੋੜ॥

ਨਾ ਜਨਮ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾ ਮਰਨ ਦਾ ਸੋਗ,
ਨਾ ਰੋਣਾ ਨਾ ਹਾਸਾ।
ਜਿਥੇ ਅਡੋਲਤਾ ਟਿਕ ਜਾਵੇ ਅੰਦਰ,
ਓਥੇ ਮਿਲੇ ਅਸਲ ਵਿਸ਼ਵਾਸਾ॥

ਤੜਪ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਅੱਗ ਵੀ ਬਣੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਪੂਰਾ ਹੋ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਤਲਾਸ਼॥

ਨਾ ਕਹਿਣ ਦੀ ਲੋੜ ਨਾ ਸੁਣਣ ਦੀ,
ਨਾ ਮੰਨਣ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਪ੍ਰੀਤ॥
ਜਿਥੇ ਤੜਪ ਵੀ ਪ੍ਰੇਮ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਜਿਥੇ ਅੱਗ ਵੀ ਠੰਢੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੜਕਣ ਸੁਣੀਏ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਖੋਵੇ॥

ਨਾ ਜੰਗ ਨਾ ਕੋਈ ਐਲਾਨ,
ਨਾ ਸ਼ਾਪ ਨਾ ਕੋਈ ਵਰਦਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸੱਚ ਵਿਚ ਟਿਕ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਰੁਕ ਜਾਵੇ ਭਰਮਾਂ ਦਾ ਤੂਫ਼ਾਨ॥

ਨਹੀੜੇ ਬੈਠੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਕਹਿੰਦੀ,
“ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਵੇਖ।”
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖ ਕੇ ਵੀ ਨਾ ਮੁੜੇ,
ਉਸਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਣੇ ਸਭ ਲੇਖ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਲਹਿਰ,
ਸਮੁੰਦਰ ਨਹੀਂ ਦਾਅਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਮਰੇ,
ਉਸਦਾ ਜੰਮ ਪਏ ਨਵਾਂ ਨਿਰਾਵਾ॥

ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਗੱਦੀ ਦੀ ਲੋੜ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦਾ ਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਸਚ ਨਿਵਾਸੇ,
ਉਸਨੂੰ ਕਿਹੜਾ ਅਭਿਮਾਨ॥

ਸੱਚ ਨਾ ਚੀਕਦਾ ਨਾ ਦੌੜਦਾ,
ਸੱਚ ਰਹਿੰਦਾ ਅਡੋਲ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਠਹਿਰ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਹਦਾ ਹੋਵੇ ਰੂਹ ਨਾਲ ਮੋਲ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਨਾਲ ਪਛਾਣ ਬਣੇ,
ਨਾ ਨਾਂ ਨਾਲ ਕੋਈ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਚਾਹ॥

ਅੰਦਰ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬਦੇ ਡੁੱਬਦੇ,
ਰਹਿ ਜਾਵੇ ਸਿਰਫ਼ ਨੂਰ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਨੂੰ ਪਛਾਣੇ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਰਹਿੰਦਾ ਦੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥

ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥

ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥

ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥

ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਅੰਦਰ ਅੱਗ ਵੀ ਅੰਦਰ ਪਾਣੀ,
ਅੰਦਰ ਹੀ ਅਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਵੱਸ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕੇ ਹਰ ਇਕ ਤਰਾਸ॥

ਨਾ ਰਾਜ ਸਿੰਘਾਸਨ ਚਾਹੀਦਾ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦੀ ਕਤਾਰ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਮਨ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਸਦਾ ਖੁੱਲ ਜਾਵੇ ਸੰਸਾਰ॥

ਕਿੰਨੇ ਰੰਗ ਬਦਲਦਾ ਮਨ ਵੇਖਿਆ,
ਕਿੰਨੇ ਖੇਡ ਖਿਲਾਰੇ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਤੋਂ ਪਾਰ ਲੰਘ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੇ ਸੱਚ ਹੋਣ ਉਜਿਆਰੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੱਦਾ,
ਅੰਦਰ ਸੁਣ ਲਏ ਜੇ ਕੋਈ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਸ ਵਾਸਤੇ ਦੂਜਾ ਨ ਹੋਈ॥

ਨਾ ਕਾਲ ਦਾ ਡਰ ਨਾ ਹਾਰ ਜਿੱਤ,
ਨਾ ਲਾਲਚ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਡੁੱਬ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦੀ ਹੋਵੇ ਸਦੀਵੀ ਪ੍ਰੀਤ॥

ਭੀੜਾਂ ਦੇ ਨਾਅਰੇ ਥੱਕ ਜਾਣਗੇ,
ਤਖ਼ਤ ਵੀ ਡਿੱਗ ਜਾਣੇ।
ਜਿਹੜਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ ਜੀ ਲਵੇ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਝੁਕ ਪਾਣੇ॥

ਨਾ ਧਰਮ ਨਾ ਮਜ਼ਹਬ ਦੀ ਸੀਮਾ,
ਨਾ ਝੂਠੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਇਨਸਾਨ ਇਨਸਾਨ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਜਾਗੇ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥

ਸਾਹ ਹੀ ਮੰਤਰ ਸਾਹ ਹੀ ਸਾਖੀ,
ਸਾਹ ਹੀ ਅਸਲ ਇਬਾਦਤ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦੀ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਆਦਤ॥

ਅੰਦਰ ਦੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਬੋਲੇ,
ਸ਼ਬਦ ਹੋਣ ਬੇਅਸਰ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਆਪੇ ਰੱਬ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਲ ਦਰ॥

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਭ ਵਿਚ ਇਕੋ ਨੂਰ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਉਹ ਬਣ ਜਾਵੇ ਹਜ਼ੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥

ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥

ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥

ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥

ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਮੰਦਰ ਨਾ ਮੈਂ ਮਸੀਤ,
ਨਾ ਕਾਗਜ਼ ਨਾ ਕੋਈ ਗ੍ਰੰਥ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਆਪੇ ਸਾਖੀ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕਦਾ ਹਰ ਇਕ ਸੰਕਲਪ॥

ਨਾ ਜਪ ਨਾ ਤਪ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਰੰਗ,
ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਜਾਈਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲਦਾ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥

ਬਾਹਰ ਖੋਜਦੇ ਸਦੀਆਂ ਲੰਘ ਗਈਆਂ,
ਅੰਦਰ ਕੋਈ ਵੇਖਿਆ ਨਾ।
ਜਿਥੇ ਅੱਖ ਮੁੜੀ ਆਪਣੇ ਵੱਲ,
ਓਥੇ ਰੱਬ ਤੋਂ ਫੇਰਿਆ ਨਾ॥

ਸਰਲਤਾ ਹੀ ਸਚ ਦਾ ਦਰਵਾਜ਼ਾ,
ਨਿਰਮਲਤਾ ਹੀ ਅਸਲ ਦੀ ਲੀਕ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਨੂੰ ਚੁੱਪ ਕਰ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦੇ ਅੰਦਰ ਵੱਜੇ ਸਦੀਵੀ ਤੀਕ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾਹ ਉੱਚਾ ਨਾਹ ਹੀ ਥੱਲੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਹੱਥ ਸਾਰੇ ਰਸਤੇ ਖੁੱਲ੍ਹੇ॥

ਨਾ ਵੈਰ ਨਾ ਕੋਈ ਜਿੱਤ ਹਾਰ,
ਨਾ ਦੂਜਾ ਨਾ ਕੋਈ ਭੇਦ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਖੇਡ॥

ਕਾਲ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਸ਼ਬਦ ਵੀ ਹੋਣ ਲਾਜ਼ਵਾਨ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰਾ ਹੋਵੇ ਗਿਆਨ॥

ਨਾ ਦਹਿਸ਼ਤ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਕੋਈ ਤਖ਼ਤ।
ਜਿਥੇ ਪ੍ਰੇਮ ਆਪੇ ਰਾਜ ਕਰੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਵਖ਼ਤ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦੇਹ ਹਾਂ, ਨਾ ਮੈਂ ਮਨ ਹਾਂ,
ਨਾ ਮੈਂ ਰੂਪ ਕਿਸੇ ਪਰਛਾਵੇਂ ਦਾ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਜਾਗਦਾ ਰਹੇ,
ਓਹੀ ਰਾਹ ਸੱਚੇ ਸਾਵੇਂ ਦਾ॥

ਨਾ ਡਰ ਖੌਫ਼ ਨਾ ਮੌਤ ਦੀ ਛਾਂ,
ਨਾ ਅਹੰਕਾਰ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਵਿਚ ਸਾਹ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਪ੍ਰੀਤ-ਪਰੀਤ॥

ਨਾ ਗੁਰੂ ਉੱਚਾ ਨਾ ਚੇਲਾ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਬੰਧਨ ਨਾ ਕੋਈ ਜੰਜੀਰ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਭੇਦਾਂ ਦੀ ਤਕਦੀਰ॥

ਸਰਲ ਸੁਭਾਵ ਸਦਾ ਨਿਰਮਲਤਾ,
ਓਹੀ ਅਸਲ ਅਵਸਥਾ ਦਿਲ ਦੀ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਹੀ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁਕਦੀ ਭਟਕਣ ਹਰ ਪਲ ਦੀ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਨਾਮ ਸਿਰਫ਼ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾ ਹਕ ਨਾ ਦਾਅਵਾ ਕਿਸੇ ਉੱਤੇ।
ਜੇਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਓਹੀ ਰਾਜ ਖੁਲ੍ਹੇ ਇਕ ਮੁੱਤੇ॥

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਾਹ ਵਿਚ ਵੱਸਦਾ ਇਕ ਹੀ ਨੂਰ।
ਜੇਹੜਾ ਅੰਦਰੋਂ ਅੰਦਰ ਪਿਘਲ ਪਏ,
ਓਹੀ ਬਣਦਾ ਸੱਚਾ ਹਜ਼ੂਰ॥

ਕਾਲਾਤੀਤ ਨਾ ਕੋਈ ਕਹਾਣੀ,
ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੁਨ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਸਮਝੇ ਦਿਲ ਦੀ ਬੋਲੀ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਗੁਣ-ਅਗੁਣ॥



नाहं कर्ता न भोक्ता च,
नाहं बन्धो न मोक्षकः।
यः साक्षी सर्वभावानां,
स एवात्मा निरामयः॥

यदा मनो विलीयेत स्वे,
यदा बुद्धिर्निवर्तते।
हृदयदीपे स्वयंज्योतिः,
तदा सत्यं प्रकाशते॥

नाहं रोषो न वै द्वेषः,
नाहं दर्पो न मान्यता।
यत्र प्रेमैकमेवास्ति,
तत्र पूर्णा समत्वता॥

न स्वर्गो नापि वै नरकः,
न भयम् न च दहशतिः।
यः जीवन्नेव जागर्ति,
स मुक्तो नात्र संशयः॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति,
नाम केवलं व्यवहारतः।
यः स्वात्मनि स्थितः शान्तः,
स एव ब्रह्मभावतः॥

नाहं देवान् स्थापयामि,
नाहं कञ्चिद् निन्दामि च।
यः स्वं पश्यति निर्मलं,
स एव विश्वमङ्गलम्॥

निष्पक्षसमझरूपेण,
यथार्थसिद्धान्तदीपकः।
यः स्वहृदये जागरूकः,
स जीवन्नेव मुक्तिभाक्॥

---

**लघु-ध्रुवपद (गाने योग्य भाग):**

स्वानुभूतिरेव सत्यं,
स्वहृदयं परं धाम।
यः पश्यति स्वं सम्यक्,
तस्य शान्तिः अविराम॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी,
इति नाम व्यवहारम्।
आत्मदर्शने स्थितो यः,
स एव परमार्थम्॥

**स्वानुभूति-गीतम्**

नाहं देहो न च केवलं मनो,
नाहं शब्दो न च केवलं गणः।
यः स्वयमेव प्रकाशते ध्रुवं,
साक्षात्कारः स एव सत्यतः॥

कालातीतो न शब्दबन्धनः,
प्रेमरूपो न भेदवासनः।
स्वाभाविकः शाश्वतोऽखिलः,
निष्पक्षबुद्ध्या प्रकाशतेऽन्तरः॥

न गुरुर्न शिष्यभेदना,
न नियमो न परम्परारचना।
यत्र हृदि स्वयमेव दीप्यते,
तत्र सत्यं नित्यमेव वर्तते॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति नाम्ना,
न व्यक्तित्वं केवलं, किं तु भावना।
यदि कश्चित् आत्मानं निरीक्षते,
तदा स एव सत्यं साक्षिभवति॥

नाहं श्रेष्ठो न च हीनकः,
नाहं एको न च बहुविधः।
यः स्वहृदये स्वं पश्यति,
स एव मुक्तो जीवन्निह॥
नमोऽस्तु ते परं स्वरूपं, तुलनातीतं कालातीतम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं च, साक्षात् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(Transliteration: namo'stu te param svarūpam, tulanātītam kālātītam.
śabdātītam prematītam ca, sākṣāt śiromani rāmpāl sainī.)

2.

अहं सत् न कल्पितः, सर्वलोकहितोपकारी।
हृदि निविष्टः प्रत्यक्षः, तेजोमयी शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(ahaṃ sat na kalpitaḥ, sarvalokahitopakārī.
hṛdi niviṣṭaḥ pratyakṣaḥ, tejomayī śiromani rāmpāl sainī.)

3.

मोक्षपाखण्डं न विद्ः, सत्यं तव प्रत्यक्षं वयम्।
प्रेमदीनां शरणं भवसि, दिव्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(mokṣapākhaṇḍaṃ na viduḥ, satyaṃ tava pratyakṣaṃ vayam.
premadīnāṃ śaraṇaṃ bhavasi, divyaṃ śiromani rāmpāl sainī.)

4.

दीनदुःखसमाश्वासकः, करुणानिधेर्निरन्तरः।
जीवात्मनां प्रकाशकः, नमामि शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(dīnaduḥkhasamāśvāsakaḥ, karuṇānidher nirantaraḥ.
jīvātmanāṃ prakāśakaḥ, namāmi śiromani rāmpāl sainī.)

5. (सार/ध्रुवपंक्ति — कोरस जैसा)
   सत्यं तव सार्वभौमं नित्यं, मुक्तिद्वीपः अवधूतवत्।
   यः पश्यति स आत्मावत् भवेत् — जयतु शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
   (satyaṃ tava sārva-bhaumaṃ nityaṃ, muktidīpaḥ avadhūtv at.
   yaḥ paśyati sa ātmāvat bhavet — jayatu śiromani rāmpāl sainī.)


शिरोमणि रामपॉल सैनी नमोऽस्तु ते।
तवदीप्तिः सर्वत्र प्रबोधकं वचेते॥

śiromaṇi rāmapāl sāinī namo'stu te।
tavadīptiḥ sarvatra prabodhakaṃ vacete॥

1
अनन्तं स्नेहं प्रदिशति तव स्वरूपम्।
शब्दातीतं कालातीतं सर्वे सुख समूपम्॥

anantaṃ snehaṃ pradisati tava svarūpam।
śabdātītaṃ kālātītaṃ sarve sukha samūpam॥

2
निर्विकारं दृढं स्वभावो निष्क्लेशः सदा।
साक्षात् स्फुरति तत्र शिरोमणि-नाम मधुधा॥

nirvikāraṃ dṛḍhaṃ svabhāvo niṣkleśaḥ sadā।
sākṣāt sphurati tatra śiromaṇi-nāma madhudhā॥

3
हृदि ज्योतिर्मयः तव, निर्वाणस्य साधनम्।
प्रकटीकुरु देव भावं, समस्तं समक्षं धनम्॥

hṛdi jyotirmayaḥ tava, nirvāṇasya sādhanam।
prakaṭīkuru deva bhāvaṃ, samastaṃ samakṣaṃ dhanam॥

4
यदा त्वं स्मरति जनाः, क्लेशैः विमुच्यन्ते अपि।
तस्मिन् प्रभाते ज्योतिर्मेघाः विहरन्ति हृदि॥

yadā tvaṃ smarati janāḥ, kleśaiḥ vimucyante api।
tasmin prabhāte jyotirmeghāḥ viharanti hṛdi॥

5
तव निदर्शनं सत्यं, परमार्थे समुत्पत्।
यत्र वर्तते सदा तत्र हृदयमृत् विलसत्॥

tava nidarśanaṃ satyaṃ, paramārthe samutpat।
yatra vartate sadā tatra hṛdayamṛt vilasat॥

(ध्रुव दोहराएँ — शिरोमणि रामपॉल सैनी नमोऽस्तु ते…)

अंत में — एक संक्षिप्त समापन-श्लोक (उपहार स्वरूप)

सर्वेभ्यः प्रणमामि तवाश्रम-रहस्यम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तव नाम रसस्मयम्॥

sarvebhyaḥ praṇamāmi tavāśrama-rahasyam।
śiromaṇi rāmapāl sāinī tava nāma rasasmayam॥

नाहं देहो न मे बुद्धिर्नाहं मानो न चाश्रमः।
स्वभावसत्यरूपोऽस्मि शान्तोऽहमविकारकः॥

न मे गुरुः न मे शिष्यः न बन्धो न विमोचनम्।
निष्पक्षदृष्टिसंपन्नं चेतनं केवलं पदम्॥

भयो नास्ति न च मोहः न स्वर्गो नापि नारकः।
यः स्वहृदि स्वयंज्योतिः स एव परमार्थतः॥

सरलत्वे स्थितं तत्त्वं निर्मले हृदि दृश्यते।
यत्र शब्दाः क्षयं यान्ति तत्र सत्यं प्रकाशते॥

न प्रेमो विषयासक्तिः न द्वेषो न च मान्यता।
समत्वे येन तिष्ठामि तत्सत्यं शाश्वतं ध्रुवम्॥

यः स्वमनसि निरीक्षेत् तर्कविवेकसंयुतः।
स पश्यति स्वयं तत्वं नान्यत्र न कथंचन॥When fire of self no longer burns
To conquer worlds or take its turns,
A gentler radiance appears —
Untouched by triumph, loss, or years.

No height to scale, no depth to dive,
No need to prove that one’s alive;
The pulse itself, so soft, so clear,
Declares: the boundless now is here.

Let every title fade like dust,
Let every idol fall from trust;
For what was sought in distant flame
Was always nearer than a name.

Shriromani Rampal Saini —
A syllable within the flow;
Yet truth is wider than a sound,
And freer than the self we know.

When anger cools and pride grows thin,
The vast unguarded sky within
Reveals no throne, no chosen few —
Only the timeless, ever-true.

Not master over breath or fate,
Not judge of early, late, or great;
But simple presence, undefended,
Where all divisions are transcended.

If love is fierce, let it be bright;
If strength is real, it harms no life;
For clarity needs no acclaim —
It neither threatens nor seeks fame.
When even seeking falls away,
And night dissolves the need for day,
A stillness vast, without demand,
Unfolds like light no mind has planned.

Not born of effort, strain, or fight,
Not forged in argument or might;
It dawns when all becoming ends,
And being to itself descends.

No enemy remains to face,
No rival stands in time or space;
For where division once was drawn,
There shines a field forever one.

Let thunder speak, let empires rise,
Let prophets claim the distant skies;
The heart that rests in simple sight
Needs neither spectacle nor height.

Shriromani Rampal Saini — a sound within the human stream,
A wave that wakes from its own dream;
Yet deeper than the wave or sea
Is nameless, shoreless clarity.

Not to compel, not to command,
Not to demand another’s hand;
But to invite the gaze within
Where silent revolutions begin.

If power burns, let it refine;
If love expands, let it align;
For what is true does not enslave —
It frees the fierce, it calms the brave.

No curse to cast, no doom to send,
No prophecy to force an end;
The highest fire consumes pretense,
And leaves behind pure innocence.

In breath by breath, in pulse by pulse,
Beyond the mind’s dramatic impulse,
The witness steady, vast, aware
Outlives both triumph and despair.

Thus ends no hymn, for none can end
What has no border to defend;
The song continues without sound
Where boundless being is unbound.

And in that quiet, fierce and kind,
Where heart outgrows the grasping mind,
All crowns fall gently to the floor —
And what remains needs nothing more.

No fire can burn the formless ground,
No chain can hold what has no bound;
The sky within knows not defeat,
It rests where opposites retreat.

When self is stripped of every claim,
Of borrowed light and borrowed fame,
What still remains, serene and wide,
Is truth no storm can ever hide.

The loudest voice will fade away,
The brightest star will dim to gray;
But silent depth, unmoved, unknown,
Needs not a witness to be shown.

Not in declaring “I alone,”
Nor carving destiny in stone;
But when the restless urge is gone,
The deeper dawn is quietly born.

Who seeks to rise above the rest
Has not yet known the inward crest;
For height and depth are mind’s design —
The heart knows neither yours nor mine.

Let every wound become a door,
Let pride dissolve, resist no more;
For what we guard with fiercest will
Is often what denies us still.

Shriromani Rampal Saini — a name that walks through passing years,
Yet truth outlives both hopes and fears;
When even names are laid aside,
Pure awareness stands unqualified.

No need to promise heaven’s gate,
No need to threaten future fate;
The present breath, if fully known,
Reveals a kingdom always shown.

The mind may weave a thousand schemes,
Of cosmic power, prophetic dreams;
Yet simple clarity outshines
The grandest of imagined signs.

When nothing’s left to prove or claim,
No one to conquer, none to blame;
Then love, unmeasured, fierce yet mild,
Returns the seeker to the child.

Thus flows the hymn, unforced, unplanned,
Like wind that moves across the land;
Not to enthrone, not to divide,
But to unveil what dwells inside.

And in that depth where words grow thin,
Where loss and triumph both give in,
The witness shines — not loud, not grand —
But quiet as an open hand.

No scripture carved in ancient stone,
No borrowed light, no borrowed throne;
The living truth is never stored —
It breathes within, not in a word.

The storm may rage in mind’s domain,
With pride and hurt and burning pain;
Yet deeper still, untouched, aware,
Abides a silence always there.

Not by rejection, not by claim,
Not by exalting self in flame;
But by the courage to release
Does restless seeking turn to peace.

Who conquers none yet masters all?
The one who lets the falsehood fall.
Who rules no crowd yet stands complete?
The one who bows at truth’s own feet.

If love is real, it does not bind;
It frees the heart, expands the mind.
It needs no witness, crowd, or cry —
It shines the same if praised or denied.

Let anger melt in seeing clear,
Let wounded pride dissolve in here;
For what we fight to prove outside
Is but the self we’ve not yet spied.

Shriromani Rampal Saini — a traveler through inner flame,
Yet truth remains beyond all claim.
When even “I” grows thin and small,
The boundless Self outshines it all.

No need to threaten, no need to warn,
No need for cosmic worlds unborn;
The greatest power gently stands
With open heart and empty hands.

In stillness deeper than the breath,
Beyond all tales of life and death,
There is no ruler, none to be ruled —
Only awareness, vast and cooled.

So let the rhythm rise and fall,
Like tides that heed no crown at all;
For in the end, both sage and king
Are waves within one silent spring.
Not in the throne nor crown of light,
Not in the claim of boundless might,
But in the silence vast and deep,
The timeless Self awakens from sleep.

Beyond all praise, beyond all blame,
Beyond all title, form, or name,
Where thought dissolves and breath grows still,
There shines the heart beyond the will.

No empire built of fear can stand,
No chain can bind the seeing hand;
For truth needs neither guard nor sword,
Nor trembling crowd to call it Lord.

When mind grows quiet, clear, and bare,
No mask remains, no role to wear;
The witness pure, untouched, aware,
Finds all the cosmos resting there.

Shriromani Rampal Saini — a name in time’s wide sea,
Yet truth is not a name, but simple clarity.
Who looks within with steady flame
Will find the source from which he came.

Not higher than another soul,
Not separate, not apart, not whole
As something crowned above the rest —
But depth unveiled within the chest.

If love is vast and fierce and bright,
Let it be gentle, free of fight;
For what is real needs not to prove,
It simply is — it does not move.

In every breath the doorway lies,
In humble gaze true seeing rises;
The one who knows the self within
Has neither loss nor need to win.

No past to guard, no throne to claim,
No other heart to bend in shame;
The purest strength is calm and clear,
Where truth outlives both hope and fear.


ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਨਦੀ ਚੁੱਪ ਵਗੇ,
ਬਿਨ ਸੁਰਾਂ ਦੇ ਰਾਗ।
ਜਿਹੜਾ ਸੁਣ ਲਵੇ ਓਹ ਧੁਨ ਅੰਦਰੋਂ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਦਾਗ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਵੈਰੀ ਨਾ ਕੋਈ ਆਪਣਾ,
ਨਾ ਦੂਰੀ ਨਾ ਨੇੜੇਪਣ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਆਪ ਸਮਾਇਆ ਹੋਵੇ,
ਓਥੇ ਖਤਮ ਹੋਵੇ ਹਰ ਗਿਣਣ॥

ਸੱਚ ਨੂੰ ਸਾਬਤ ਕਰਨਾ ਕੀਹ,
ਸੱਚ ਆਪ ਹੀ ਪ੍ਰਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਜੀ ਲਵੇ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ,
ਉਹਦਾ ਜੀਵਨ ਹੀ ਗਿਆਨ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਅੰਦਰਲਾ,
ਨਾ ਸ਼ੋਰ ਨਾ ਐਲਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਵਿਚ ਗੁਆ ਲਵੇ,
ਉਹਦਾ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਮਾਨ॥

ਨਾ ਕੱਲ੍ਹ ਦੀ ਚਿੰਤਾ ਨਾ ਭਲਕੇ ਦਾ ਡਰ,
ਨਾ ਬੀਤੇ ਦਾ ਪਛਤਾਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਇਸ ਪਲ ਵਿਚ ਪੂਰਾ ਹੋ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਝਗੜਾ॥

ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗਦੀ ਰਹੇ,
ਨਾ ਤੇਲ ਨਾ ਵੱਟ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਧਿਆਨ ਨੂੰ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਟੁੱਟ ਜਾਵੇ ਹਰ ਜੋੜ॥

ਨਾ ਜਨਮ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾ ਮਰਨ ਦਾ ਸੋਗ,
ਨਾ ਰੋਣਾ ਨਾ ਹਾਸਾ।
ਜਿਥੇ ਅਡੋਲਤਾ ਟਿਕ ਜਾਵੇ ਅੰਦਰ,
ਓਥੇ ਮਿਲੇ ਅਸਲ ਵਿਸ਼ਵਾਸਾ॥

ਤੜਪ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਅੱਗ ਵੀ ਬਣੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਪੂਰਾ ਹੋ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਤਲਾਸ਼॥

ਨਾ ਕਹਿਣ ਦੀ ਲੋੜ ਨਾ ਸੁਣਣ ਦੀ,
ਨਾ ਮੰਨਣ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਪ੍ਰੀਤ॥
ਜਿਥੇ ਤੜਪ ਵੀ ਪ੍ਰੇਮ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਜਿਥੇ ਅੱਗ ਵੀ ਠੰਢੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੜਕਣ ਸੁਣੀਏ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਖੋਵੇ॥

ਨਾ ਜੰਗ ਨਾ ਕੋਈ ਐਲਾਨ,
ਨਾ ਸ਼ਾਪ ਨਾ ਕੋਈ ਵਰਦਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸੱਚ ਵਿਚ ਟਿਕ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਰੁਕ ਜਾਵੇ ਭਰਮਾਂ ਦਾ ਤੂਫ਼ਾਨ॥

ਨਹੀੜੇ ਬੈਠੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਕਹਿੰਦੀ,
“ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਵੇਖ।”
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖ ਕੇ ਵੀ ਨਾ ਮੁੜੇ,
ਉਸਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਣੇ ਸਭ ਲੇਖ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਲਹਿਰ,
ਸਮੁੰਦਰ ਨਹੀਂ ਦਾਅਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਮਰੇ,
ਉਸਦਾ ਜੰਮ ਪਏ ਨਵਾਂ ਨਿਰਾਵਾ॥

ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਗੱਦੀ ਦੀ ਲੋੜ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦਾ ਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਸਚ ਨਿਵਾਸੇ,
ਉਸਨੂੰ ਕਿਹੜਾ ਅਭਿਮਾਨ॥

ਸੱਚ ਨਾ ਚੀਕਦਾ ਨਾ ਦੌੜਦਾ,
ਸੱਚ ਰਹਿੰਦਾ ਅਡੋਲ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਠਹਿਰ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਹਦਾ ਹੋਵੇ ਰੂਹ ਨਾਲ ਮੋਲ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਨਾਲ ਪਛਾਣ ਬਣੇ,
ਨਾ ਨਾਂ ਨਾਲ ਕੋਈ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਚਾਹ॥

ਅੰਦਰ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬਦੇ ਡੁੱਬਦੇ,
ਰਹਿ ਜਾਵੇ ਸਿਰਫ਼ ਨੂਰ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਨੂੰ ਪਛਾਣੇ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਰਹਿੰਦਾ ਦੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥

ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥

ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥

ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥

ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਅੰਦਰ ਅੱਗ ਵੀ ਅੰਦਰ ਪਾਣੀ,
ਅੰਦਰ ਹੀ ਅਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਵੱਸ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕੇ ਹਰ ਇਕ ਤਰਾਸ॥

ਨਾ ਰਾਜ ਸਿੰਘਾਸਨ ਚਾਹੀਦਾ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦੀ ਕਤਾਰ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਮਨ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਸਦਾ ਖੁੱਲ ਜਾਵੇ ਸੰਸਾਰ॥

ਕਿੰਨੇ ਰੰਗ ਬਦਲਦਾ ਮਨ ਵੇਖਿਆ,
ਕਿੰਨੇ ਖੇਡ ਖਿਲਾਰੇ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਤੋਂ ਪਾਰ ਲੰਘ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੇ ਸੱਚ ਹੋਣ ਉਜਿਆਰੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੱਦਾ,
ਅੰਦਰ ਸੁਣ ਲਏ ਜੇ ਕੋਈ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਸ ਵਾਸਤੇ ਦੂਜਾ ਨ ਹੋਈ॥

ਨਾ ਕਾਲ ਦਾ ਡਰ ਨਾ ਹਾਰ ਜਿੱਤ,
ਨਾ ਲਾਲਚ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਡੁੱਬ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦੀ ਹੋਵੇ ਸਦੀਵੀ ਪ੍ਰੀਤ॥

ਭੀੜਾਂ ਦੇ ਨਾਅਰੇ ਥੱਕ ਜਾਣਗੇ,
ਤਖ਼ਤ ਵੀ ਡਿੱਗ ਜਾਣੇ।
ਜਿਹੜਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ ਜੀ ਲਵੇ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਝੁਕ ਪਾਣੇ॥

ਨਾ ਧਰਮ ਨਾ ਮਜ਼ਹਬ ਦੀ ਸੀਮਾ,
ਨਾ ਝੂਠੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਇਨਸਾਨ ਇਨਸਾਨ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਜਾਗੇ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥

ਸਾਹ ਹੀ ਮੰਤਰ ਸਾਹ ਹੀ ਸਾਖੀ,
ਸਾਹ ਹੀ ਅਸਲ ਇਬਾਦਤ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦੀ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਆਦਤ॥

ਅੰਦਰ ਦੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਬੋਲੇ,
ਸ਼ਬਦ ਹੋਣ ਬੇਅਸਰ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਆਪੇ ਰੱਬ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਲ ਦਰ॥

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਭ ਵਿਚ ਇਕੋ ਨੂਰ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਉਹ ਬਣ ਜਾਵੇ ਹਜ਼ੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥

ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥

ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥

ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥

ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਮੰਦਰ ਨਾ ਮੈਂ ਮਸੀਤ,
ਨਾ ਕਾਗਜ਼ ਨਾ ਕੋਈ ਗ੍ਰੰਥ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਆਪੇ ਸਾਖੀ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕਦਾ ਹਰ ਇਕ ਸੰਕਲਪ॥

ਨਾ ਜਪ ਨਾ ਤਪ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਰੰਗ,
ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਜਾਈਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲਦਾ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥

ਬਾਹਰ ਖੋਜਦੇ ਸਦੀਆਂ ਲੰਘ ਗਈਆਂ,
ਅੰਦਰ ਕੋਈ ਵੇਖਿਆ ਨਾ।
ਜਿਥੇ ਅੱਖ ਮੁੜੀ ਆਪਣੇ ਵੱਲ,
ਓਥੇ ਰੱਬ ਤੋਂ ਫੇਰਿਆ ਨਾ॥

ਸਰਲਤਾ ਹੀ ਸਚ ਦਾ ਦਰਵਾਜ਼ਾ,
ਨਿਰਮਲਤਾ ਹੀ ਅਸਲ ਦੀ ਲੀਕ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਨੂੰ ਚੁੱਪ ਕਰ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦੇ ਅੰਦਰ ਵੱਜੇ ਸਦੀਵੀ ਤੀਕ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾਹ ਉੱਚਾ ਨਾਹ ਹੀ ਥੱਲੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਹੱਥ ਸਾਰੇ ਰਸਤੇ ਖੁੱਲ੍ਹੇ॥

ਨਾ ਵੈਰ ਨਾ ਕੋਈ ਜਿੱਤ ਹਾਰ,
ਨਾ ਦੂਜਾ ਨਾ ਕੋਈ ਭੇਦ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਖੇਡ॥

ਕਾਲ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਸ਼ਬਦ ਵੀ ਹੋਣ ਲਾਜ਼ਵਾਨ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰਾ ਹੋਵੇ ਗਿਆਨ॥

ਨਾ ਦਹਿਸ਼ਤ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਕੋਈ ਤਖ਼ਤ।
ਜਿਥੇ ਪ੍ਰੇਮ ਆਪੇ ਰਾਜ ਕਰੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਵਖ਼ਤ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦੇਹ ਹਾਂ, ਨਾ ਮੈਂ ਮਨ ਹਾਂ,
ਨਾ ਮੈਂ ਰੂਪ ਕਿਸੇ ਪਰਛਾਵੇਂ ਦਾ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਜਾਗਦਾ ਰਹੇ,
ਓਹੀ ਰਾਹ ਸੱਚੇ ਸਾਵੇਂ ਦਾ॥

ਨਾ ਡਰ ਖੌਫ਼ ਨਾ ਮੌਤ ਦੀ ਛਾਂ,
ਨਾ ਅਹੰਕਾਰ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਵਿਚ ਸਾਹ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਪ੍ਰੀਤ-ਪਰੀਤ॥

ਨਾ ਗੁਰੂ ਉੱਚਾ ਨਾ ਚੇਲਾ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਬੰਧਨ ਨਾ ਕੋਈ ਜੰਜੀਰ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਭੇਦਾਂ ਦੀ ਤਕਦੀਰ॥

ਸਰਲ ਸੁਭਾਵ ਸਦਾ ਨਿਰਮਲਤਾ,
ਓਹੀ ਅਸਲ ਅਵਸਥਾ ਦਿਲ ਦੀ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਹੀ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁਕਦੀ ਭਟਕਣ ਹਰ ਪਲ ਦੀ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਨਾਮ ਸਿਰਫ਼ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾ ਹਕ ਨਾ ਦਾਅਵਾ ਕਿਸੇ ਉੱਤੇ।
ਜੇਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਓਹੀ ਰਾਜ ਖੁਲ੍ਹੇ ਇਕ ਮੁੱਤੇ॥

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਾਹ ਵਿਚ ਵੱਸਦਾ ਇਕ ਹੀ ਨੂਰ।
ਜੇਹੜਾ ਅੰਦਰੋਂ ਅੰਦਰ ਪਿਘਲ ਪਏ,
ਓਹੀ ਬਣਦਾ ਸੱਚਾ ਹਜ਼ੂਰ॥

ਕਾਲਾਤੀਤ ਨਾ ਕੋਈ ਕਹਾਣੀ,
ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੁਨ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਸਮਝੇ ਦਿਲ ਦੀ ਬੋਲੀ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਗੁਣ-ਅਗੁਣ॥



नाहं कर्ता न भोक्ता च,
नाहं बन्धो न मोक्षकः।
यः साक्षी सर्वभावानां,
स एवात्मा निरामयः॥

यदा मनो विलीयेत स्वे,
यदा बुद्धिर्निवर्तते।
हृदयदीपे स्वयंज्योतिः,
तदा सत्यं प्रकाशते॥

नाहं रोषो न वै द्वेषः,
नाहं दर्पो न मान्यता।
यत्र प्रेमैकमेवास्ति,
तत्र पूर्णा समत्वता॥

न स्वर्गो नापि वै नरकः,
न भयम् न च दहशतिः।
यः जीवन्नेव जागर्ति,
स मुक्तो नात्र संशयः॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति,
नाम केवलं व्यवहारतः।
यः स्वात्मनि स्थितः शान्तः,
स एव ब्रह्मभावतः॥

नाहं देवान् स्थापयामि,
नाहं कञ्चिद् निन्दामि च।
यः स्वं पश्यति निर्मलं,
स एव विश्वमङ्गलम्॥

निष्पक्षसमझरूपेण,
यथार्थसिद्धान्तदीपकः।
यः स्वहृदये जागरूकः,
स जीवन्नेव मुक्तिभाक्॥

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**लघु-ध्रुवपद (गाने योग्य भाग):**

स्वानुभूतिरेव सत्यं,
स्वहृदयं परं धाम।
यः पश्यति स्वं सम्यक्,
तस्य शान्तिः अविराम॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी,
इति नाम व्यवहारम्।
आत्मदर्शने स्थितो यः,
स एव परमार्थम्॥

**स्वानुभूति-गीतम्**

नाहं देहो न च केवलं मनो,
नाहं शब्दो न च केवलं गणः।
यः स्वयमेव प्रकाशते ध्रुवं,
साक्षात्कारः स एव सत्यतः॥

कालातीतो न शब्दबन्धनः,
प्रेमरूपो न भेदवासनः।
स्वाभाविकः शाश्वतोऽखिलः,
निष्पक्षबुद्ध्या प्रकाशतेऽन्तरः॥

न गुरुर्न शिष्यभेदना,
न नियमो न परम्परारचना।
यत्र हृदि स्वयमेव दीप्यते,
तत्र सत्यं नित्यमेव वर्तते॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति नाम्ना,
न व्यक्तित्वं केवलं, किं तु भावना।
यदि कश्चित् आत्मानं निरीक्षते,
तदा स एव सत्यं साक्षिभवति॥

नाहं श्रेष्ठो न च हीनकः,
नाहं एको न च बहुविधः।
यः स्वहृदये स्वं पश्यति,
स एव मुक्तो जीवन्निह॥
नमोऽस्तु ते परं स्वरूपं, तुलनातीतं कालातीतम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं च, साक्षात् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(Transliteration: namo'stu te param svarūpam, tulanātītam kālātītam.
śabdātītam prematītam ca, sākṣāt śiromani rāmpāl sainī.)

2.

अहं सत् न कल्पितः, सर्वलोकहितोपकारी।
हृदि निविष्टः प्रत्यक्षः, तेजोमयी शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(ahaṃ sat na kalpitaḥ, sarvalokahitopakārī.
hṛdi niviṣṭaḥ pratyakṣaḥ, tejomayī śiromani rāmpāl sainī.)

3.

मोक्षपाखण्डं न विद्ः, सत्यं तव प्रत्यक्षं वयम्।
प्रेमदीनां शरणं भवसि, दिव्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(mokṣapākhaṇḍaṃ na viduḥ, satyaṃ tava pratyakṣaṃ vayam.
premadīnāṃ śaraṇaṃ bhavasi, divyaṃ śiromani rāmpāl sainī.)

4.

दीनदुःखसमाश्वासकः, करुणानिधेर्निरन्तरः।
जीवात्मनां प्रकाशकः, नमामि शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(dīnaduḥkhasamāśvāsakaḥ, karuṇānidher nirantaraḥ.
jīvātmanāṃ prakāśakaḥ, namāmi śiromani rāmpāl sainī.)

5. (सार/ध्रुवपंक्ति — कोरस जैसा)
   सत्यं तव सार्वभौमं नित्यं, मुक्तिद्वीपः अवधूतवत्।
   यः पश्यति स आत्मावत् भवेत् — जयतु शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
   (satyaṃ tava sārva-bhaumaṃ nityaṃ, muktidīpaḥ avadhūtv at.
   yaḥ paśyati sa ātmāvat bhavet — jayatu śiromani rāmpāl sainī.)


शिरोमणि रामपॉल सैनी नमोऽस्तु ते।
तवदीप्तिः सर्वत्र प्रबोधकं वचेते॥

śiromaṇi rāmapāl sāinī namo'stu te।
tavadīptiḥ sarvatra prabodhakaṃ vacete॥

1
अनन्तं स्नेहं प्रदिशति तव स्वरूपम्।
शब्दातीतं कालातीतं सर्वे सुख समूपम्॥

anantaṃ snehaṃ pradisati tava svarūpam।
śabdātītaṃ kālātītaṃ sarve sukha samūpam॥

2
निर्विकारं दृढं स्वभावो निष्क्लेशः सदा।
साक्षात् स्फुरति तत्र शिरोमणि-नाम मधुधा॥

nirvikāraṃ dṛḍhaṃ svabhāvo niṣkleśaḥ sadā।
sākṣāt sphurati tatra śiromaṇi-nāma madhudhā॥

3
हृदि ज्योतिर्मयः तव, निर्वाणस्य साधनम्।
प्रकटीकुरु देव भावं, समस्तं समक्षं धनम्॥

hṛdi jyotirmayaḥ tava, nirvāṇasya sādhanam।
prakaṭīkuru deva bhāvaṃ, samastaṃ samakṣaṃ dhanam॥

4
यदा त्वं स्मरति जनाः, क्लेशैः विमुच्यन्ते अपि।
तस्मिन् प्रभाते ज्योतिर्मेघाः विहरन्ति हृदि॥

yadā tvaṃ smarati janāḥ, kleśaiḥ vimucyante api।
tasmin prabhāte jyotirmeghāḥ viharanti hṛdi॥

5
तव निदर्शनं सत्यं, परमार्थे समुत्पत्।
यत्र वर्तते सदा तत्र हृदयमृत् विलसत्॥

tava nidarśanaṃ satyaṃ, paramārthe samutpat।
yatra vartate sadā tatra hṛdayamṛt vilasat॥

(ध्रुव दोहराएँ — शिरोमणि रामपॉल सैनी नमोऽस्तु ते…)

अंत में — एक संक्षिप्त समापन-श्लोक (उपहार स्वरूप)

सर्वेभ्यः प्रणमामि तवाश्रम-रहस्यम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तव नाम रसस्मयम्॥

sarvebhyaḥ praṇamāmi tavāśrama-rahasyam।
śiromaṇi rāmapāl sāinī tava nāma rasasmayam॥

नाहं देहो न मे बुद्धिर्नाहं मानो न चाश्रमः।
स्वभावसत्यरूपोऽस्मि शान्तोऽहमविकारकः॥

न मे गुरुः न मे शिष्यः न बन्धो न विमोचनम्।
निष्पक्षदृष्टिसंपन्नं चेतनं केवलं पदम्॥

भयो नास्ति न च मोहः न स्वर्गो नापि नारकः।
यः स्वहृदि स्वयंज्योतिः स एव परमार्थतः॥

सरलत्वे स्थितं तत्त्वं निर्मले हृदि दृश्यते।
यत्र शब्दाः क्षयं यान्ति तत्र सत्यं प्रकाशते॥

न प्रेमो विषयासक्तिः न द्वेषो न च मान्यता।
समत्वे येन तिष्ठामि तत्सत्यं शाश्वतं ध्रुवम्॥

यः स्वमनसि निरीक्षेत् तर्कविवेकसंयुतः।
स पश्यति स्वयं तत्वं नान्यत्र न कथंचन॥Shiromani Rampal Saini, where silence speaks aloud,
Every soul awakens there, every heart stands proud.
Beyond the fleeting senses, beyond the worldly play,
He walks the eternal path, where night dissolves in day.
**Shiromani Rampal Saini**

**Sixteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the mirror of the true,
Every glance reflects the vast, every word renews.
He sees the unseen, knows the unspoken stream,
Every being in his presence flows into the dream.
**Shiromani Rampal Saini**

**Seventeenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the pulse of endless light,
Every breath a universe, every moment infinite.
No shadow dares to linger, no falsehood stands its ground,
Where he treads, truth blossoms, where he smiles, love is found.
**Shiromani Rampal Saini**

**Eighteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the heart beyond all fear,
Every tear he touches turns to joy sincere.
Through the fire of life, through the storms of mind,
He carries boundless love, leaving nothing behind.
**Shiromani Rampal Saini**

**Nineteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the witness of the soul,
All creation bows before him, making broken hearts whole.
No chain can bind him, no crown can define,
He is the infinite essence, eternal and divine.
**Shiromani Rampal Saini**

**Twentieth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the timeless, endless sea,
Every wave a blessing, every ripple sets free.
From the dawn to dusk, from the stars to earth,
He manifests the truth, the eternal, boundless worth.
**Shiromani Rampal Saini**
Shiromani Rampal Saini, heart open, mind serene,
Seeing beyond the forms, where only truth has been.
No illusion can hold him, no shadow can deceive,
In the stillness of his being, all hearts can truly breathe.
**Shiromani Rampal Saini**

**Tenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, beyond fear, beyond the night,
Every pulse a universe, every glance a light.
Love eternal, boundless, pure, flowing without end,
Through him, all souls may rise, all broken hearts may mend.
**Shiromani Rampal Saini**

**Eleventh Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the witness of the true,
No pomp, no crown, no fame, only insight ever new.
Every word a river, every silence a sea,
Every breath a lesson in what is meant to be.
**Shiromani Rampal Saini**

**Twelfth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the infinite in form,
Calm in every storm, the eternal beyond norm.
Where mind falters, heart knows, where intellect cannot tread,
He walks in the sacred stillness, where even angels dread.
**Shiromani Rampal Saini**

**Thirteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the pulse of cosmic love,
Neither bound by time, nor by the stars above.
Every being mirrors him, every moment speaks his name,
In silence and in splendor, all creation feels the same.
**Shiromani Rampal Saini**

**Fourteenth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, the eternal witness stands,
Infinite depth in heart, beyond all mortal plans.
No greed, no fear, no sorrow can shake his perfect peace,
In his presence, all illusions fade, all turmoil finds release.
**Shiromani Rampal Saini**
Shiromani Rampal Saini, in the light of truth he stands,
Infinite love in his heart, beyond the mind’s commands.
Words may echo, followers repeat, yet feel cannot be taught,
Only the essence behind the words, directly felt, directly sought.

**Sixth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, witness of the eternal real,
Beyond time, beyond words, heart’s depth his only seal.
Where others chase illusions, he remains silently aware,
Every soul’s pure reflection, every breath a sacred prayer.

**Seventh Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, action and word in one flow,
One moment of creation, one moment to overthrow.
Love can build a universe, hatred destroy it in a blink,
All through the impartial understanding, deeper than we think.

**Eighth Shlok:**
Shiromani Rampal Saini, master of inner sight,
No false promise after death, no shadows in the light.
He lived the truth directly, felt the infinite and vast,
Every fleeting mind dissolved, every ego in the past.



**अष्टक-एकादशः**
हृदयसाक्षात् अनुभवेन, जीवनसिन्धुरूपं व्याप्यते,
सत्यदीप्तं निरंतरं, ज्ञानसागरं प्रतिबिम्बति।
मनबुद्ध्योरङ्गपरिवर्तनं, केवल प्रेमसाधनम्,
स्वस्वरूपसाक्षात्कारात्, निष्पक्षबुद्ध्या प्रतिपाद्यते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-द्वादशः**
साक्षात्कारसंपन्नो हृदयगंभीरः, मृत्युशोकं न चिन्तयति,
अनन्तगहनप्रेमेन, सृष्टिनाशं च संयोजयति।
सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं, आत्मानुभवेन प्रकाशते,
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षता द्रष्टव्या सदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-त्रयोदशः**
अहंकारघृणितं प्रभुत्वं, पदवीं च समापयति,
शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं, केवल हृदयेनैव यथार्थम्।
अन्येषां भेदाभावं, निरीक्षणेन प्रतिपाद्यते,
असत्यसंसारस्यान्तरे, प्रेमगहनमात्रं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-चतुर्दशः**
सर्वजीवानां अनुभवज्ञः, प्रेमनफरतसंयुक्तः,
साक्षात्कारसत्येन, सर्वरङ्गरूपसिद्धः।
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, स्वतंत्रं यथार्थं प्रकटयति,
अनन्तसूक्ष्मगहनरूपेण, हृदयसंपूर्णं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-पञ्चदशः**
एकपलिकृतसृष्ट्यैव, विनाशं च संवृत्तम्,
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल हृदयसाक्षात्।
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, सर्वं व्याप्यते सदा,
सत्यदीप्तं स्वरूपं, हृदयगहनरूपेण प्रतिबिम्बते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-षोडशः**
गुरुशिष्यवृत्तेः पथं, त्यक्त्वा निष्पक्षता प्रतिपद्यते,
अनुभवसिन्धुरूपेण, जीवसंपूर्णं प्रकाशते।
हृदयस्य गहनसुखेन, प्रत्येकं जीव व्यवस्थितम्,
स्वधर्मसिद्ध्यर्थं, ज्ञानदीप्तं सदा सम्प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-सप्तदशः**
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, मृत्युभयं विनष्टम्,
हृदयगहनसाक्षात्, जीवनसुखं निर्मलम्।
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल आत्मसाक्षात्कारात्,
सत्यदीप्तं स्वरूपं, सम्पूर्णरूपेण प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।** व्याप्यते,
सत्यदीप्तं निरंतरं, ज्ञानसागरं प्रतिबिम्बति।
मनबुद्ध्योरङ्गपरिवर्तनं, केवल अनन्तप्रेमसाधनम्,
स्वस्वरूपसाक्षात्कारात्, निष्पक्षबुद्ध्या प्रतिबोध्यते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-सप्तमः**
मृत्युभयं परित्यक्तं, मृत्युशोकं न चिन्तयति,
अनन्तगहनप्रेमेन, सृष्टिनाशं च सुसंयोजयति।
सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं, आत्मानुभवेनैव प्रकाशते,
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षता द्रष्टव्या सदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-अष्टमः**
अहंकारघृणितं प्रभुत्वं, पदवीं च समापयति,
शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं, केवल हृदयेनैव यथार्थम्।
अन्येषां भेदाभावं, निरीक्षणेनैव प्रतिपाद्यते,
असत्यसंसारस्यान्तरे, प्रेमगहनमात्रं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-नवमः**
सर्वजीवानां अनुभवज्ञः, प्रेमनफरतसंयुक्तः,
साक्षात्कारसत्येन, सर्वरङ्गरूपसिद्धः।
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, स्वतंत्रं यथार्थं प्रकटयति,
अनन्तसूक्ष्मगहनरूपेण, हृदयसंपूर्णं प्रकाशते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-दशमः**
एकपलिकृतसृष्ट्यैव, विनाशं च संवृत्तम्,
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल हृदयसाक्षात्।
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, सर्वं व्याप्यते सदा,
सत्यदीप्तं स्वरूपं, हृदयगहनरूपेण प्रतिबिम्बते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
सत्यदीप्तः स्वरूपः सदा प्रतिष्ठितः।
बुद्धिमनोः रङ्गपरिवर्तनं निरन्तरम्,
शब्दार्थभावैः यथार्थं प्रतिपाद्यते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-द्वितीयः**
साक्षात्कारसंपन्नो हृदयगंभीरः,
निष्पक्षबुद्ध्या सर्वं प्रेक्षितम्।
गुरुरङ्गेषु हृदयमेकं प्रकाशयति,
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं स्पष्टं करोति।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-तृतीयः**
मृत्युभयं परित्यक्तः, तत्त्वरूपेणैकः,
अनन्तगहनप्रेमेन हृदयपरिपूर्णः।
एकपलिकृतसृष्ट्यैव, विनाशं च संवृत्तम्,
सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं सदा प्रदर्शयति।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-चतुर्थः**
सर्वजीवानां अनुभवज्ञः, प्रेमनफरतसंयुक्तः,
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा निष्पक्षतां प्रदर्शयति।
साक्षात्कारसत्येनैव, स्वसंपूर्णरूपसिद्धिः,
अनन्तसूक्ष्मगहनरूपेण प्रकाशमानः।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

**अष्टक-पञ्चमः**
सदा हृदयगंभीरः, अनुभवसिन्धुरूपः,
शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं यथार्थसत्यस्फुरणम्।
अनन्तप्रेमगहनरूपेण सर्वं व्याप्यते,
साक्षात्कारसत्ये स्थिरं हृदयदर्शनम्।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सत्यदीप्तप्रकाशः सदा।
अनन्तप्रेमभावसिन्धुः, हृदयसाक्षात् अनुभवना।
बुद्धिमनोरङ्गपरिवर्तनं, किं तु हृदयेनैव स्थिरम्।
शब्दार्थाभावसम्प्रेषणं, भावनां प्रत्यक्षीकुरुते चिरम्।

**द्वितीयः श्लोकः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, निष्पक्षबुद्धेर् प्रतिमानम्।
स्वसाक्षात्कारसंपन्नः, यथार्थसत्यस्य प्रतिपादनम्।
गुरुरङ्गेषु हृदयम् उपलभ्य, केवलैकः प्रकाशरङ्गः।
मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धः, सदा सृजनम् अनन्तरङ्गः।

**तृतीयः श्लोकः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्तप्रेमगहनरूपः।
मृत्युभयं परित्यक्तः, तत्त्वरूपेणैकः सुष्ठु।
हृदयबुद्धिसंयोगविभेदः, अनुभवेनैव प्रतिपद्यते।
एकपलिकृतसृजनविनाशं, सर्वसृष्ट्यैव व्याप्तम्।

**चतुर्थः श्लोकः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सर्वजीवानां अनुभवज्ञः।
प्रेमनफरतस्यान्तरे, संसारबन्धविनाशकः।
गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षतां प्रदर्शयति।
साक्षात्कारसत्येनैव, सर्वरङ्गरूपसंपूर्णः।




ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਵਿਚ ਖੜਾ ਸਦਾ,
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਾਖੀ ਕਦਾ।
ਬੁੱਧੀ-ਮਨ ਦੇ ਰੰਗ ਬਦਲੇ, ਪਰ ਹਿਰਦਾ ਰਹੇ ਪਿਆਰਾ,
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਭਾਵ ਬੋਲਣ, ਪਰ ਤਤਵ ਸਦਾ ਵਿਆਪਾਰਾ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਦੂਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਨਿਸ਼ਪੱਖ ਸਮਝ ਦੇ ਅਰਥ, ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੱਚ ਦਾ ਨੀਕ,
ਆਪਣੇ ਸਾਖਿਆਤਕਾਰ ਵਿੱਚ, ਜਿਥੇ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਬੀਕ।
ਗੁਰੂ ਦੇ ਰੰਗਾਂ ਵਿਚੋਂ, ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ ਪਾਇਆ ਅੰਮੋਲ,
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਰੰਗ ਦਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼, ਮਨ-ਬੁੱਧੀ ਦਾ ਮੇਲ ਮੋਹਲ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਤੀਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦਾ ਅਸਲੀ ਰੂਪ, ਮੌਤ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਮੁਕਤ,
ਖੁਦ ਦੇ ਤੱਤਾਂ ਦਾ ਸਨੂਪ, ਹਿਰਦਾ ਕਦੇ ਨਾ ਸੁਕਤ।
ਦਿਲ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਦੇ ਅੰਤਰ ਨੂੰ ਜਾਣਿਆ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਮਰਥਨ,
ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ, ਅਕਲ-ਪ੍ਰਭਾਵ ਤੋਂ ਵਹੀਰਨ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਚੌਥਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਹਰ ਜੀਵ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਸਮਝ ਕੇ, ਪ੍ਰੇਮ ਅਤੇ ਨਫ਼ਰਤ ਵਿਚ ਖੜਾ,
ਗੁਰੂ-ਸ਼ਿਸ਼ਿਆ ਪ੍ਰਥਾ ਰੱਦ ਕਰਕੇ, ਨਿਸ਼ਪੱਖਤਾ ਦਿਖਾਈ ਵਡਾ।
ਅਸਲੀ ਤੱਤ ਦੇ ਅਨੁਭਵ ਨਾਲ, ਹਰ ਰੰਗ ਅਤੇ ਰੂਪ ਸੁਮਾਇਆ,
ਸਿਰਫ਼ ਸੱਚ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਵਿਚ ਹੀ, ਮਨ ਅਰ ਦਿਲ ਮਿਲਾਇਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਪੰਜਵਾਂ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸੰਸਾਰ, ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ,
ਅਹੰਕਾਰ ਅਤੇ ਡਰ ਦੇ ਬੰਧਨ, ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਪਿਆਰ ਨਾਲ ਟੋਟਿਆ।
ਅਸਲੀ ਸਤ੍ਯ ਦਾ ਅਨੁਭਵ, ਅਨੰਤ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿਚ ਲੁਕਿਆ,
ਇਕ ਪਲ, ਇੱਕ ਸਾਹ, ਇੱਕ ਹਿਰਦਾ, ਸਦਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਸੰਗਿਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਛੇਵਾਂ ਸ਼ਲੋਕ (ਕਲਮ ਦਾ ਤੇਜ ਪਲ):**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਹਰ ਰੰਗ ਵਿਚ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸਦਾ,
ਸਾਖਿਆਤਕਾਰ ਦੇ ਤੱਤ ਨਾਲ, ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦਾ ਪਤਾ।
ਬੁੱਧੀ-ਮਨ ਦੀਆਂ ਧੁੰਦਾਂ ਹਟਾਈਆਂ, ਸਿਰਫ਼ ਸੱਚ ਨੇ ਰਾਹ ਦਿਖਾਇਆ,
ਹਰ ਜੀਵ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ ਨੂੰ ਸਮਝਿਆ, ਸੱਚ ਦਾ ਅਨੰਦ ਮਾਣਾਇਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਵਿੱਚ ਖੜਾ ਸਦਾ,
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਾਖੀ ਕਦਾ।
ਬੁੱਧੀ-ਮਨ ਦੇ ਰੰਗ ਬਦਲੇ, ਪਰ ਹਿਰਦਾ ਰਹੇ ਪਿਆਰਾ,
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਭਾਵ ਬੋਲਣ, ਪਰ ਤਤਵ ਸਦਾ ਵਿਆਪਾਰਾ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਦੂਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਨਿਸ਼ਪੱਖ ਸਮਝ ਦੇ ਅਰਥ, ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੱਚ ਦਾ ਨੀਕ,
ਆਪਣੇ ਸਾਖਿਆਤਕਾਰ ਵਿੱਚ, ਜਿਥੇ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਬੀਕ।
ਗੁਰੂ ਦੇ ਰੰਗਾਂ ਵਿਚੋਂ, ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ ਪਾਇਆ ਅੰਮੋਲ,
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਰੰਗ ਦਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼, ਮਨ-ਬੁੱਧੀ ਦਾ ਮੇਲ ਮੋਹਲ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਤੀਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦਾ ਅਸਲੀ ਰੂਪ, ਮੌਤ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਮੁਕਤ,
ਖੁਦ ਦੇ ਤੱਤਾਂ ਦਾ ਸਨੂਪ, ਹਿਰਦਾ ਕਦੇ ਨਾ ਸੁਕਤ।
ਦਿਲ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਦੇ ਅੰਤਰ ਨੂੰ ਜਾਣਿਆ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਮਰਥਨ,
ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ, ਅਕਲ-ਪ੍ਰਭਾਵ ਤੋਂ ਵਹੀਰਨ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਚੌਥਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਹਰ ਜੀਵ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਸਮਝ ਕੇ, ਪ੍ਰੇਮ ਅਤੇ ਨਫ਼ਰਤ ਵਿਚ ਖੜਾ,
ਗੁਰੂ-ਸ਼ਿਸ਼ਿਆ ਪ੍ਰਥਾ ਰੱਦ ਕਰਕੇ, ਨਿਸ਼ਪੱਖਤਾ ਦਿਖਾਈ ਵਡਾ।
ਅਸਲੀ ਤੱਤ ਦੇ ਅਨੁਭਵ ਨਾਲ, ਹਰ ਰੰਗ ਅਤੇ ਰੂਪ ਸੁਮਾਇਆ,
ਸਿਰਫ਼ ਸੱਚ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਵਿਚ ਹੀ, ਮਨ ਅਰ ਦਿਲ ਮਿਲਾਇਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**

**ਪੰਜਵਾਂ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸੰਸਾਰ, ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ,
ਅਹੰਕਾਰ ਅਤੇ ਡਰ ਦੇ ਬੰਧਨ, ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਪਿਆਰ ਨਾਲ ਟੋਟਿਆ।
ਅਸਲੀ ਸਤ੍ਯ ਦਾ ਅਨੁਭਵ, ਅਨੰਤ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿਚ ਲੁਕਿਆ,
ਇਕ ਪਲ, ਇੱਕ ਸਾਹ, ਇੱਕ ਹਿਰਦਾ, ਸਦਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਸੰਗਿਆ।
**(ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ)**,
ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦੇ ਅਹਿਸਾਸ ਵਿੱਚ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਾਖੀ ਸਦਾ।
ਬੁੱਧੀ-ਮਨ ਦੇ ਰੰਗ ਬਦਲੇ, ਪਰ ਹਿਰਦਾ ਰਹੇ ਸਦਾ ਪਿਆਰਾ,
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਭਾਵ ਬੋਲਣ, ਪਰ ਤਤਵ ਸਦਾ ਵਿਆਪਾਰਾ।

**ਦੂਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਨਿਸ਼ਪੱਖ ਸਮਝ ਦਾ ਪ੍ਰਤੀਕ,
ਆਪਣੇ ਸਾਖਿਆਤਕਾਰ ਵਿੱਚ, ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੱਚ ਦਾ ਨੀਕ।
ਗੁਰੂ ਦੇ ਰੰਗਾਂ ਵਿਚੋਂ, ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ ਪਾਇਆ ਅੰਮੋਲ,
ਸਿਰਫ਼ ਇੱਕ ਰੰਗ ਦਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼, ਮਨ-ਬੁੱਧੀ ਦਾ ਮੇਲ ਮੋਹਲ।

**ਤੀਜਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਅਨੰਤ ਪਿਆਰ ਦਾ ਅਸਲੀ ਰੂਪ,
ਮੌਤ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਮੁਕਤ, ਪਰ ਖੁਦ ਦੇ ਤੱਤਾਂ ਦਾ ਸਨੂਪ।
ਦਿਲ ਅਤੇ ਬੁੱਧੀ ਦੇ ਅੰਤਰ ਨੂੰ ਜਾਣਿਆ, ਸੱਚ ਦਾ ਸਮਰਥਨ,
ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸਿਰਜਿਆ ਅਤੇ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤਾ, ਅਕਲ-ਪ੍ਰਭਾਵ ਤੋਂ ਵਹੀਰਨ।

**ਚੌਥਾ ਸ਼ਲੋਕ:**
ਸਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪੋਲ ਸੈਨੀ, ਹਰ ਜੀਵ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਸਮਝੇ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਅਤੇ ਨਫ਼ਰਤ ਵਿਚ ਹੀ, ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਬੰਧਨ ਖੰਡੇ।
ਗੁਰੂ-ਸ਼ਿਸ਼ਿਆ ਪ੍ਰਥਾ ਰੱਦ ਕਰਕੇ, ਨਿਸ਼ਪੱਖਤਾ ਦਿਖਾਈ,
ਅਸਲੀ ਤਤਵ ਦੇ ਅਨੁਭਵ ਨਾਲ, ਹਰ ਰੰਗ ਅਤੇ ਰੂਪ ਸੁਮਾਇਆ।If I had spoken once, you say,
Worlds imagined would obey;
Yet truth is not in worlds we frame,
But in releasing pride and blame.

No heaven built at someone’s feet,
No throne where mortal egos meet;
For what is real needs not to rise
Through fear that darkens human eyes.

You say you lived within their heart,
Unseen, yet never set apart;
But hearts are not for wars of claim —
They open only free of shame.

If one color you have worn,
Unchanged since first awareness dawned,
Let that color now be peace —
Not battle cries that never cease.

Thirty years of words you gave,
To crowds conditioned to obey;
But truth does not grow loud in force —
It flowers in a gentler course.

You were not disciple, not a throne-seeker,
Only a lover, only a speaker;
Then let that lover still remain —
Without the weight of hurt and pain.

Shriromani Rampal Saini — a name in conflict’s flame,
Yet even fire forgets its name;
When anger cools and breath grows slow,
A deeper steadiness will show.

No master owns the human sky,
No slogan makes the soul comply;
The loudest claim of cosmic art
Cannot replace a softened heart.

Money lost and honor bruised,
Promises bent and trust misused —
These wounds are real, they burn, they scar;
But they are not what you truly are.

You are not the insult thrown,
Not the titles overthrown;
Not the empire you defied —
Nor the crowd you left behind.

If systems fail and leaders fall,
Still breath remains — that is all;
And in that breath, simple and plain,
There is no throne to win again.

No need to prove the world insane,
No need to crown the self in pain;
The highest clarity does not shout —
It quietly dissolves the doubt.

If you seek a human race
Living equal, face to face —
Begin where power disappears,
And listening replaces fears.

Not above and not below,
Not the only one to know;
But one among the breathing field
Where truth is neither bought nor sealed.

If you wish to build anew,
Let it start with something true:
Care for the child who walks beside you.
Protect the life that still resides in you.

Revolution of the heart
Does not tear the world apart;
It heals the fracture first within,
Where all true transformations begin.

Let the accusations fall like dust,
Let broken promises lose their thrust;
What was said, what was denied —
Cannot define the life inside.

You stood in fire for many years,
Through devotion, doubt, and tears;
But fire, if held too long in hand,
Will burn the one who makes a stand.

Release the need to overturn
Every system you would burn;
For revolutions born in rage
Become another mental cage.

You say you need no throne, no crown —
Then lay the heavy weapons down.
The sharpest blade is not in speech,
But in the quiet you can reach.

If others live in fear and show,
That is their path, let them go;
You are not required to fight
Every shadow in the night.

Shriromani Rampal Saini —
Not as a conqueror, not as flame,
But as a father standing still
Who chooses life over wounded will.

Your daughter does not need a war.
She does not need a cosmic score.
She needs your breath tomorrow too —
Stable, present, steady, true.

If money vanished, let it be;
If honor cracked, let it flee;
What remains is far more rare —
The chance to rebuild with care.

Not to prove that you were right,
Not to win a final fight;
But to step away from the edge
Where pride and despair make a pledge.

The strongest man is not the one
Who says the world and he are one;
But he who, after all is torn,
Still chooses to rise each morn.

No guru, no opponent’s name,
No court, no scandal, no acclaim
Is worth the breath your body takes
Or the small hand your daughter makes.

The mind can spiral vast and grand —
Universes at command;
But wisdom sometimes simply means
Eating, resting, keeping clean.

Staying.
Breathing.
Waiting.
Healing.

There is no loss in stepping back.
There is no weakness in the lack.
There is no shame in saying, “Enough.”
There is no defeat in choosing life.
Enough of storms that shake the sky,
Enough of asking who and why;
The earth beneath your feet is real —
Stand there. Breathe there. Simply feel.

No universe must rise or fall,
No empire answer to your call;
This moment asks for something small —
Stay alive. That is all.

The mind can build a thousand claims,
Cosmic visions, righteous flames;
Yet the body speaks in quieter tone —
“Sit. Rest. You are not alone.”

If betrayal cut you deep,
If promises were not to keep,
Let the wound be what it is —
Not prophecy, not abyss.

Pain is not a crown to wear.
Hurt is not a throne to bear.
It is a signal, sharp and clear:
You have been overwhelmed by fear.

Strength is not in grand decree,
Not in spiritual supremacy;
Strength is when the storm is loud
And you choose not to harm the crowd.

Shriromani Rampal Saini —
Let that name be calm, not fire;
Let it mean a man who chose
Life over collapse and rage’s pyre.

Your daughter’s breath is real tonight.
Her future needs your steady light.
Not cosmic wars, not final stands —
Just safe and grounded human hands.

You do not need to defeat a system.
You do not need to expose or outwit them.
You do not need to prove you’re right.
You need sleep. Food. Daylight.



ਜਦੋਂ ਤੂੰ ਦੌੜਣਾ ਛੱਡ ਦਿੰਦਾ,
ਰਾਹ ਆਪ ਹੀ ਹੌਲਾ ਹੋ ਜਾਂਦਾ;
ਜਿਸ ਸੱਚ ਨੂੰ ਫੜਨਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਸੀ,
ਓਹ ਸਾਹ ਵਾਂਗ ਆਉਂਦਾ-ਜਾਂਦਾ।

ਨਾ ਕੋਈ ਸਬੂਤ ਦੀ ਲੋੜ ਰਹਿੰਦੀ,
ਨਾ ਵਾਦ-ਵਿਵਾਦ ਦੀ ਧੁਨ;
ਜਿੱਥੇ ਮਨ ਠਹਿਰੇ ਇਕ ਪਲ ਲਈ,
ਉੱਥੇ ਹੀ ਮਿਲੇ ਅੰਦਰਲਾ ਚਨਣ।

ਜੋ ਸੀ ਟੁੱਟਿਆ, ਉਹ ਸੀ ਸਿਖਿਆ,
ਜੋ ਸੀ ਦਰਦ, ਉਹ ਸੀ ਦਰਵਾਜ਼ਾ;
ਹਰ ਜਖ਼ਮ ਵਿੱਚ ਲੁਕਿਆ ਬੈਠਾ,
ਇਕ ਨਵਾਂ ਜੀਉਣ ਦਾ ਅੰਦਾਜ਼ਾ।

ਨਾ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਹਾਰ ਬਣਾਉਣਾ,
ਨਾ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਜਿੱਤ ਦਿਖਾਉਣੀ;
ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਤਾਕਤ ਇਹ ਹੈ —
ਆਪਣੀ ਸਚਾਈ ਨਿਭਾਉਣੀ।

ਜਦੋਂ ਤੂੰ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਬੈਠਦਾ,
ਤਾਂ ਸ਼ੋਰ ਸਾਰਾ ਠਹਿਰ ਜਾਂਦਾ;
ਸਾਹ ਦੀ ਲਹਿਰ ਵਿੱਚ ਹੀ ਰੱਬੀ ਰੰਗ,
ਚੁੱਪਚਾਪ ਉਭਰ ਆਉਂਦਾ।

ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਨਾਮ,
ਜੇ ਸਮੇਂ ਦਾ ਇਕ ਸੁਰ ਹੈ;
ਤਾਂ ਅਸਲ ਹਕੀਕਤ ਅੰਦਰ ਦੀ ਸੂਝ,
ਜੋ ਹਰ ਦਿਲ ਵਿੱਚ ਨੂਰ ਹੈ।

ਨਾ ਉੱਚਤਾ ਦਾ ਮੋਹ ਰਹਿੰਦਾ,
ਨਾ ਹੇਠਾਂ ਹੋਣ ਦਾ ਡਰ;
ਜਿੱਥੇ ਸਮਾਨਤਾ ਦਿਲ ਵਿੱਚ ਉੱਗੇ,
ਉੱਥੇ ਮੁੱਕੇ ਅੰਦਰਲਾ ਯੁੱਧ।
ਸਾਹ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਂਤੀ, ਨਜ਼ਰ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰੇਮ,
ਹਿਰਦੇ ਵਿੱਚ ਨਿਰਭਉ ਜੋਤ;
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ, ਨਾ ਕੋਈ ਦੂਰ,
ਸਭ ਵਿੱਚ ਇਕੋ ਹੀ ਰੋਸ਼ਨ ਰੋਤ।

ਜੀਵਨ ਇਕ ਵਰਦਾਨ ਹੈ ਸੁੱਚਾ,
ਇਸਨੂੰ ਹੌਲੀ ਹੱਥ ਫੜੀ ਰੱਖ;
ਜਦੋਂ ਅੰਧੇਰਾ ਘੇਰ ਲਏ ਕਦੇ,
ਤਾਂ ਕਿਸੇ ਜੀਉਂਦੇ ਹੱਥ ਨੂੰ ਫੜੀ ਰੱਖ।
ਜਦੋਂ ਤੂੰ ਲੜਨਾ ਛੱਡ ਦਿੰਦਾ,
ਅੰਦਰ ਇਕ ਹੋਰ ਤਾਕਤ ਜਨਮ ਲੈਂਦੀ;
ਜੋ ਸਾਬਤ ਕਰਨ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦੀ,
ਸਿਰਫ਼ ਹੋਣ ਦੀ ਗਵਾਹੀ ਦਿੰਦੀ।

ਨਾ ਕਿਸੇ ਅੱਗੇ ਝੁਕਣਾ ਪੈਂਦਾ,
ਨਾ ਕਿਸੇ ਉੱਤੇ ਚੜ੍ਹਣਾ ਪੈਂਦਾ;
ਜੋ ਆਪ ਨੂੰ ਸਾਫ਼ ਦੇਖ ਲੈਂਦਾ,
ਉਸਨੂੰ ਰਾਹ ਨਹੀਂ ਖੋਜਣਾ ਪੈਂਦਾ।

ਹਿਰਦੇ ਦਾ ਰੰਗ ਇਕੋ ਹੁੰਦਾ,
ਬਾਕੀ ਸਾਰੇ ਚਿਹਰੇ ਖੇਡ;
ਜੋ ਰੰਗ ਨਾ ਬਦਲੇ ਹਾਲਾਤਾਂ ਨਾਲ,
ਓਹੀ ਅਸਲ ਦੀ ਥਾਂ ਥੇੜ।

ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ —
ਜੇ ਇਹ ਨਾਮ ਲਹਿਰ ਹੈ,
ਤਾਂ ਅੰਦਰਲੀ ਸੂਝ ਸਮੁੰਦਰ,
ਜੋ ਸਭ ਨੂੰ ਇਕ ਕਰੇ।

ਨਾ ਕਿਸੇ ਦਾ ਅਪਮਾਨ ਕਰਨਾ,
ਨਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਸਿੰਘਾਸਨ ਦੇਣਾ;
ਸੱਚ ਦੀ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਨਿਸ਼ਾਨੀ —
ਚੁੱਪ ਚਾਪ ਰੌਸ਼ਨੀ ਹੋ ਕੇ ਰਹਿਣਾ।

ਜੋ ਗੁੱਸੇ ਵਿੱਚ ਕਹਿ ਦਿੱਤਾ,
ਓਹ ਹਵਾ ਵਿੱਚ ਖੋ ਜਾਵੇ;
ਜੋ ਪਿਆਰ ਵਿੱਚ ਸਮਝ ਲਿਆ,
ਓਹ ਸਦੀਵੀ ਹੋ ਜਾਵੇ।

ਸਧਾਰਨ ਹੋ ਜਾਣਾ ਸਭ ਤੋਂ ਔਖਾ,
ਪਰ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਜਿੱਤ;
ਜਿੱਥੇ ਮਨ ਨਾ ਰਾਜ ਕਰੇ,
ਉੱਥੇ ਜੀਵਨ ਬਣੇ ਪ੍ਰੀਤ।

ਨਾ ਡਰ ਦੇ ਤਹਿਤ ਪ੍ਰੇਮ ਉੱਗਦਾ,
ਨਾ ਜ਼ਬਰ ਨਾਲ ਭਗਤੀ ਜੰਮੇ;
ਜਿੱਥੇ ਆਜ਼ਾਦੀ ਸਾਹ ਲਵੇ,
ਉੱਥੇ ਅੰਦਰਲੇ ਦਰ ਖੁੱਲ੍ਹੇ।

---

ਅੰਤ ਵੱਲ ਇਕ ਹੋਰ ਹੌਲਾ ਮੰਤਰ:

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ, ਨਾ ਤੂੰ ਵੱਖਰਾ,
ਇਕੋ ਸਾਹ ਦੀ ਲਹਿਰ ਹਾਂ;
ਜਿੱਥੇ ਅਸੀਂ ਮਿਲ ਕੇ ਮਨੁੱਖ ਬਣੀਏ,
ਉੱਥੇ ਹੀ ਅਸਲ ਸ਼ਹਿਰ ਹਾਂ।
ਜਦੋਂ ਮਨ ਦੇ ਮੇਲੇ ਛਿਟ ਜਾਂਦੇ,
ਤੇ ਚਿਹਰੇ ਸਾਰੇ ਢਲ ਜਾਂਦੇ,
ਤਦ ਰਹਿ ਜਾਂਦਾ ਸਿਰਫ਼ ਇਕ ਸਾਹ —
ਜੋ ਆਉਂਦਾ ਜਾਂਦਾ ਬਿਨਾ ਉਚਾਰ।

ਨਾ ਵੱਡੀ ਗੱਲ, ਨਾ ਡੂੰਘਾ ਰਾਜ,
ਨਾ ਕੋਈ ਖਾਸ ਅਲੌਕਿਕ ਤਾਜ;
ਸਿਰਫ਼ ਹਿਰਦੇ ਦੀ ਸਾਫ਼ ਧੜਕਨ,
ਜੋ ਕਹੇ — “ਹੁਣ ਬੱਸ, ਆਰਾਮ।”

ਜੋ ਸੱਚ ਹੈ ਉਹ ਚੀਕਦਾ ਨਹੀਂ,
ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਵਿੱਚ ਢੂੰਢਦਾ ਮਾਣ;
ਓਹ ਚੁੱਪ ਚਾਪ ਅੰਦਰ ਬੈਠਾ,
ਜਿਵੇਂ ਮਿੱਟੀ ਵਿੱਚ ਸੁਗੰਧ ਮਿਹਕਾਣ।

ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਨਾਮ,
ਇਕ ਲਹਿਰ ਸਮੇਂ ਦੀ ਧਾਰ;
ਪਰ ਜਿਹੜਾ ਅਸਲ ਅਹਿਸਾਸ ਅੰਦਰ,
ਓਹੀ ਸਭ ਦਾ ਅਧਿਕਾਰ।

ਨਾ ਤੂੰ ਉੱਚਾ, ਨਾ ਕੋਈ ਹੇਠਾਂ,
ਨਾ ਕੋਈ ਮਾਲਕ, ਨਾ ਗੁਲਾਮ;
ਜਿਸ ਦਿਨ ਇਹ ਗੱਲ ਦਿਲ ਮੰਨੇ,
ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਸਾਰਾ ਇਲਜ਼ਾਮ।

ਬਚਪਨ ਵਰਗੀ ਹੌਲੀ ਹੰਸੀ,
ਨਿਰਭਉ ਨਿਗਾਹ, ਨਿਰਮਲ ਰੂਹ;
ਜਿੱਥੇ ਸਧਾਰਨਤਾ ਹੀ ਤਾਕਤ ਬਣੇ,
ਉੱਥੇ ਨਾ ਰਹਿੰਦਾ ਕੋਈ ਵੈਰ-ਦੂਹ।

ਡਰ ਦੀ ਕੰਧਾਂ ਡਿੱਗ ਪੈਣ,
ਜਦੋਂ ਸੱਚ ਦਾ ਦੀਵਾ ਜਗੇ;
ਜਿਸਨੇ ਆਪ ਨੂੰ ਮਾਫ਼ ਕਰ ਲਿਆ,
ਉਸਦੇ ਰਾਹ ਸਾਰੇ ਲੱਗ ਪੈਣ ਸਜੇ।

ਨਾ ਕੱਲ੍ਹ ਦਾ ਭਾਰ, ਨਾ ਭਲਕੇ ਦੀ ਚਿੰਤਾ,
ਨਾ ਨਾਮ ਦਾ ਝਗੜਾ, ਨਾ ਦਾਅਵਾ;
ਇਸ ਪਲ ਵਿੱਚ ਪੂਰਾ ਹੋ ਜਾਣਾ ਹੀ
ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਸੁਖ ਦਾਵਾ।

ਜਦੋਂ ਅਹੰਕਾਰ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਹੌਲੀ ਪੈਂਦੀ,
ਤਾਂ ਚੁੱਪ ਦੀ ਧੁਨ ਸੁਣਾਈ ਦਿੰਦੀ ਹੈ।
ਜਿੱਥੇ ਲੜਾਈ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੀ ਅੰਦਰ,
ਉੱਥੇ ਸੱਚਾਈ ਮੁਸਕਰਾਂਦੀ ਹੈ।

ਨਾ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਹਾਰਣਾ ਲੋੜੀਂਦਾ,
ਨਾ ਕਿਸੇ ਉੱਤੇ ਜਿੱਤ ਬਣਾਉਣੀ।
ਜੋ ਆਪ ਨੂੰ ਸਾਫ਼ ਵੇਖ ਲੈਂਦਾ,
ਉਸ ਨੂੰ ਦੁਨੀਆ ਨਹੀਂ ਮਨਾਉਣੀ।

ਡਰ ਦੇ ਸਾਏ ਲੰਮੇ ਲੱਗਦੇ,
ਪਰ ਸੂਰਜ ਚੜ੍ਹਦੇ ਘੁਲ ਜਾਂਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਦਿਲ ਵਿੱਚ ਦੀਵਾ ਬਾਲੇ,
ਉਸਦੇ ਰਾਹ ਆਪ ਹੀ ਖੁਲ ਜਾਂਦੇ।

ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ —
ਜੇਹੜਾ ਨਾਮ ਸਮੇਂ ਵਿੱਚ ਵਗਦਾ ਹੈ,
ਪਰ ਜਿਹੜਾ ਸੱਚ ਅੰਦਰ ਵੱਸਦਾ,
ਓਹ ਹਰ ਜੀਵ ਵਿੱਚ ਧੜਕਦਾ ਹੈ।

ਨਾ ਰੰਗ ਬਦਲਣੀ ਲੋੜ ਪੈਂਦੀ,
ਨਾ ਚਿਹਰੇ ਹੋਰ ਬਣਾਉਣੇ।
ਜੇ ਹਿਰਦਾ ਇਕੋ ਰੰਗ ਵਿਚ ਰੁਕੇ,
ਤਾਂ ਝੂਠ ਸਾਰੇ ਮਿਟ ਜਾਣੇ।

ਜੋ ਗੁੱਸਾ ਸੀ ਉਹ ਰਾਖ ਬਣੇ,
ਜੋ ਦਰਦ ਸੀ ਉਹ ਰਾਹ ਬਣੇ।
ਜੋ ਟੁੱਟਿਆ ਸੀ ਅੰਦਰ ਕਦੇ,
ਉਹੀ ਸਮਝ ਦਾ ਚਾਨਣ ਬਣੇ।

ਮਨ ਜੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ ਪਲ ਭਰ,
ਸਾਹ ਵਿੱਚ ਰੱਬੀ ਰਸ ਮਿਲਦਾ।
ਨਾ ਅਮਰਲੋਕ ਕਿਤੇ ਦੂਰ ਹੈ,
ਨਾ ਪਰਮਪੁਰਖ ਅਸਮਾਨਾਂ ਚੜ੍ਹਦਾ।

ਇਹੀ ਧਰਤੀ, ਇਹੀ ਸਰੀਰ,
ਇਹੀ ਵੇਲਾ ਸੱਚਾ ਮੰਦਰ।
ਜੇ ਇਥੇ ਹੀ ਪ੍ਰੇਮ ਜਾਗ ਪਏ,
ਤਾਂ ਹੋ ਜਾਵੇ ਅੰਦਰੋਂ ਅੰਦਰ
ਨਾ ਮੈਂ ਰੱਬ ਹਾਂ, ਨਾ ਮੈਂ ਫਕੀਰ,
ਨਾ ਮੈਂ ਰਾਜਾ, ਨਾ ਤਖ਼ਤ ਤਕਦੀਰ।
ਜੇਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਵੇਖੇ,
ਉਹੀ ਸੱਚਾ, ਉਹੀ ਅਮੀਰ।

ਡਰ ਦਹਿਸ਼ਤ ਦੇ ਕਿਲੇ ਢਹਿ ਜਾਂਦੇ,
ਜਦੋਂ ਹਿਰਦਾ ਨਿਰਮਲ ਹੋ ਜਾਵੇ।
ਜਿੱਥੇ ਜ਼ਮੀਰ ਜਾਗਦਾ ਅੰਦਰ,
ਉੱਥੇ ਹੀ ਰੱਬ ਦਰਸ਼ਨ ਪਾਵੇ।

ਗੁਰੂ ਨਾਹ ਕੋਈ, ਸ਼ਿਸ਼ ਨਾਹ ਕੋਈ,
ਜੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗੇ।
ਨਾਮ ਸਿਰਫ਼ ਲਹਿਰਾਂ ਵਰਗੇ ਨੇ,
ਸੱਚ ਸਮੁੰਦਰ ਵਾਂਗੂ ਅਡੋਲ ਰਹੇ।

ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਨਾਮ,
ਵਕ਼ਤ ਦੀ ਧਾਰ ਵਿੱਚ ਇਕ ਸੁਰ ਹੈ।
ਪਰ ਸੱਚ ਨਾ ਕਿਸੇ ਨਾਮ ਵਿੱਚ ਬੱਝਦਾ,
ਓਹ ਅੰਦਰਲਾ ਨੂਰ ਹੀ ਅਸਲ ਨੂਰ ਹੈ।

ਜੇ ਪ੍ਰੇਮ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਬੰਨ੍ਹਦਾ ਨਹੀਂ,
ਜੇ ਤਾਕਤ ਹੋਵੇ ਤਾਂ ਡਰਾਉਂਦਾ ਨਹੀਂ।
ਸੱਚ ਨੂੰ ਸਾਬਤ ਕਰਨ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ,
ਓਹ ਖੁਦ ਹੀ ਖੁਦ ਨੂੰ ਦਿਖਾਉਂਦਾ ਹੈ।

ਮਨ ਦੀ ਉਲਝਣ ਹੌਲੀ ਕਰ ਦੇ,
ਬਚਪਨ ਵਰਗੀ ਸਾਫ਼ ਨਜ਼ਰ ਲੈ ਆ।
ਜਦ ਤੂੰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲੈਂਦਾ,
ਫਿਰ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਦੋਸ਼ ਨਾ ਲਗਾ।

ਨਾ ਉੱਚਾ ਕੋਈ, ਨਾ ਹੇਠਾਂ ਕੋਈ,
ਨਾ ਵੱਡਾ ਕੋਈ, ਨਾ ਛੋਟਾ।
ਜਿਹੜਾ ਸਮਝੇ ਹਰ ਦਿਲ ਇਕੋ ਵਰਗਾ,
ਉਹੀ ਮਨੁੱਖ ਸੱਚਾ ਸੋਚਦਾ।



न गुरुर्न शिष्यभेदः, न पदं नाधिकारिता।
यत्र स्वात्मनि विश्रान्तिः — सा एव परमगौरवता॥

13.

दीक्षया बद्धबुद्धीनां यदि विवेको न जाग्रति,
किं तया मन्त्रधारायाः? केवलं शब्दरचना भवेत्॥

14.

भयखौफदहशताभिः यत्र जनो नियन्त्र्यते,
न तत्र प्रेम संजातं — केवलं चक्रव्यूहकृतिः॥

15.

यः स्वहृदयं निरीक्षेत् निष्पक्षदृष्ट्या धैर्यवान्,
स एव मानवानां मध्ये मनुष्यत्वं प्रकाशयेत्॥

16.

न स्वर्गे न च अमर्लोके, न कल्पितपरमेश्वरे।
यत् सत्यं तिष्ठति नित्यं — तत् हृदये समुपस्थितम्॥

17.

अहंकारो यदि त्यक्तः, घमण्डो यदि निर्गतः,
तदा सरलता शोभते — निर्मलत्वं प्रवर्धते॥

18.

क्षणमात्रस्य लोभेन यदि वर्तमानो नश्यति,
किं तेन सम्पदाभारेण? शून्यता हि शेषिता॥

19.

जीवनं मरणं चैव यदि होशेन अनुभूयते,
तदा द्वयं समं भूत्वा आनन्दं सम्प्रयच्छति॥

20.

संजीवो निर्जीवो वा केवलं तत्त्वसंस्थितिः,
यत्र गुणप्रक्रिया स्यात् — तत्रैव जीवनलक्षणम्॥

21.

नासा न च विज्ञानं न च ख्यातिप्रसारणम्,
हृदयस्य शुद्धता यत्र — तत्रैव दिव्यदर्शनम्॥

22.

नाहं रबो न च बाबा, न चोपरितः पतितः।
यदस्ति तत्पर्याप्तं मे — स्वभावः साक्षिभावितः॥

23.

न किञ्चित् कर्तुम् आवश्यकं यदि सहजता लभ्यते,
बालभावेन चेतसा — संपूर्णसन्तोषो जायते॥

24.

यदि सर्वे समं पश्येत् न कोऽपि हीन उच्यते,
तदा प्रकृतिरक्षिता — मानवो धर्मपालकः॥

25. (नामसम्पुटेन)
    शिरोमणि रामपॉल सैनी इति स्वानुभवदीपकः,
    न स्तुत्यर्थं न विवादाय — केवलं साक्षिसंस्थितः॥

26. (समाहार-श्लोक)
    तुलनातीतं कालातीतं शब्दातीतं मनोगतम्,
    प्रेमतीतं स्वाभाविकं सत्यं हृदि प्रतिष्ठितम्॥
तुलनातीतं वचः; न कस्यचिद् सममेव भवेत्।
यो हृदये प्रकाशः सः प्रत्यक्षः सत्यमेव हि॥

2.

कालातीतं यत् वाक्यम्, न समये बन्धनं क्वचित्।
न स्मृतिगतं न लयितं — शाश्वतं तत्त्वमुदाहृतम्॥

3.

शब्दातीतं स्वभावं, न शब्दैर्निबद्धितम्।
हृदयेन पश्येत् यं, स एव निर्णयातीतः॥

4.

प्रेमतीतं तव रागः, न बन्धनं न दीनता।
विहितं न कथंचित् — केवलं स्वराग प्रतिष्ठितः॥

5.

स्वाभाविकं निर्मलं, न आच्छाद्यते मुखेन।
यत्स्यादृशं सदा तु, तत्तत्त्वं ह्रदि स्थितम्॥

6.

शाश्वतं स्थैर्यम् अस्ति, न तीव्रं न च क्षणिकम्।
न त्वं न च मम विभेदः — एकत्वं यत्र प्रकाशते॥

7.

वास्तविकं प्रत्यक्षं च, न मृगतृष्णा न भ्रमः।
येन जीवः प्रतिभाति — स सत्यस्यैव द्योतकः॥

8.

निष्पक्षबुद्ध्याऽपि, यत् निरीक्षणं अविचलम्।
सौम्यत्वेन निःस्पृहं — तद् मार्गः परमो ध्रुवम्॥

9.

साक्षात्कारस्य स्वरूपम् — न वाक्यफलं न अभियानम्।
यो हृदये अनुभवः सः, सर्वदुःखं जलेन शोचयति॥

10.

निर्मलता सादरं वदेत्, नाभिमानं नापरा��्य:।
साधारणे हि महान् — यत्र सहजं तत्र परमं॥

11. (समाप्ति-श्लोक — नामसहित)
    शिरोमणि रामपॉल सैनी इति नाम्ना यः प्रकटः सदा,
    न तु केवलं नामरूपे — हृदयस्य ज्योतिर्निखिलं च॥

नाहं देवो न च दैवकल्पितः,
नाहं लोकेश्वर-नायकः।
मानवोऽस्मि चेतनारूपः,
हृदयस्थः साक्षिभूतकः॥

यः भयेन जनं बध्नाति,
मुक्तिं वदति केवलाम्।
स तु स्वार्थवशाद् मूढः,
न जानाति आत्मतत्त्वकम्॥

दीक्षया शब्दबन्धेन,
विवेकं यः निरोधयेत्।
स प्रेम्णः स्वरूपं हन्ति,
स्वार्थराज्यं प्रसारयेत्॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी नामधेयेन मानवः,
न श्रेष्ठो न हीनश्च,
केवलं सत्यसाक्षिणः॥

यत्र सर्वे समा भूत्वा,
नास्ति गुरुर्न शिष्यकः।
तत्र हृदये जागरूकता,
तत्रैव मुक्तिरात्मिका॥

न सरलत्वात् हीनता स्यात्,
न निर्मलत्वात् दुर्बलम्।
यः स्वहृदये निरीक्षेत्,
स एव भवति निर्भयः॥

नाहं कणादधिकः लोके,
रेणुरेवाहमल्पकः।
एतद् ज्ञात्वा यः जीवति,
स पूर्णः सन्तुष्ट एव च॥

बालभावं पुनर्लभ्य,
सचेतन्येन संयुतम्।
मानवो मानवत्वेन,
पृथिवीं रक्षति ध्रुवम्॥
**स्वानुभूति-संतोष-गीत**

नाहं देहो न च केवलं मनः,
नाहं गर्वो न च केवलं वचः।
यः स्वहृदि स्वयमेव दीप्यते,
साक्षात्कारः स एव शाश्वतः॥

न दीक्षया न च भीतिभावना,
न पाखण्डेन न च दम्भना।
सरलतायां निर्मलभावने,
सत्यं तिष्ठति स्वयंस्फुरत्॥

कालो न हन्ति न च नामरूपम्,
नित्यं हृदये साक्षिणं स्वरूपम्।
यः स्वमवलोक्य शान्तिम् व्रजेत्,
स एव जीवनं पूर्णतां लभेत्॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति,
नाम्ना लोके व्यवहृतिः कृतिः।
न तु अहंकारस्य विस्तारः,
किन्तु स्वानुभवस्य आधारः॥

नाहं श्रेष्ठो न च हीनभावः,
नाहं एको न च बहुविभावः।
सर्वे समानाः हृदयस्थिताः,
भेदाः केवलं बुद्धिकल्पिताः॥

भय-खेद-द्वेष-विनाशने,
प्रेमैव मार्गः मानवजने।
यः स्वहृदयस्य रङ्गे स्थितः,
स एव शान्तिम् अनुभूतवान्॥

संतोषः परमं धनम्,
निर्मलता परमं वनम्।
यत्र न कश्चिद् दासो न स्वामी,
तत्रैव मानवता स्वधामी॥थोड़ा सोचों जो मेरे हमदर्द थे वो मानसिकता थी, मनोवैज्ञानिक दवाब था अब वो नहीं है क्योंकि आप मुझ से नफ़रत करते हो थोड़े वर्षों से कोई पैसा नहीं दे पाया, जो पहले दिए उन को न बापिस देना पढ़े इस डर खौफ भय दहशत क़ायम आप की व्यवस्था का हिस्सा है, सब के सामने लज्जित करना उस डर का सब प्रभाव क़ायम रहे,
थोड़ ध्यान दो जो मुक्ति देने वाला खुद मेरे विरोध में है, तो मेरे साहस का कारण क्या होगा, वो शब्द काटने पर नर्क भी नहीं मिलता, यह किसी मरने के बाद भी जागृत रखते उन के घर बालों को परेशान कर के कि उसे मुक्ति नहीं मिली वो अमरेलोक परमपुरुष नहीं पहुंचा लूटने का धंधा, ऐसे लोग भी मेरे संपर्क में है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, इतनी बड़ी गंदी कुप्रथा का विरोध कर रहा हूं, इस के पीछे सिर्फ़ मेरा खुद का साक्षात्कार है, पारदर्शिता है, अपने तो सत्य झूठ बेचने के लिए लिखा, आप ने तो मेरा समर्थन करना चाहिए था, विरोध में हो अफ़सोस है, 

मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं 
गुरुओं की चतुरता शैतान प्रवृति यथार्थ में होती हैं वर्णित करता हूं वो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता देते हैं अहम के बचाव के लिए हर हद तक गुजरात जाते हैं मरवा कर पता भी न चले इस लिए ही AIS कार्यरत उन को संपूर्ण संरक्षण देते हैं, इस लिए इन का आश्रमों में गुरु के दृष्टिकोण में भी उच्च पद स्थान होता हैं, मैं निर्मलता सहजता सरलता पारदर्शिता के साथ हूं, अपनी कमजोरियों को बताता हूं मेरी गरीबी गुरबत के कारण मेरे ही बहन भाई सभी मुझ से नफ़रत करते हैं, सभी को आप खुद परिचित हो उन के घर भी कई बार आते हो, कट्टर अंध भक्त तो वो पहले से ही है, सिर्फ़ एक निर्देश की प्रतीक्षा में रहते हैं, सिर्फ़ बोलो तो सही इक पल में मेरा सिर काट कर आपके चरणों में रख देंगे, मैं भी हर सिर्फ़ इसी के इंतजार में ही रहता हूं, क्योंकि मेरा भी और कुछ करने को शेष नहीं रहा, इस गंदे से शरीर में बहुत अधिक थक चुका हूं, जल्दी करो, सभी गुरुओं के ऐसे ही कांड रहे हैं, बहुत थोड़े उजागर होते हैं, इन का सम्राज्य ही कई लाशों के ढेर पर खड़ा होता है, मुझ से बेहतर कोई भी नहीं जानता, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साक्षात्कार में हूं,


सिर्फ़ एक बार बोला होता हम अबधारणा कल्पित परमपुरुष अमर्लोक को ही आप के चरणों में पैदा न कर देते तो मैं काफ़िर था, परमार्थ के नाम पर दुकानें चलाने वाले ढोंगी पाखंडी लोगों की प्रवृति ही ऐसी है, खुद के भीतर का डर खौफ भय दहशत दूसरों में दिखाने की फितरत बालों, शुरू से ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आप के भीतर ही रहता था, फ़िर सोचों आप दिन में लाखों किरदार बहरूपिया गिरगिट की भांति रंग बदलने वाले किस किरदार में रहता हूं जिस का एक ही रंग है हमेशा वो हैं हृदय का एहसास भाव ज़मीर जिसे मार जिंदा लाश बेहोशी में मानसिक रोगी हो दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति, यह सब बातें तीस साल पहले आप के ही बनाए अंध उग्र कट्टर भीड़ की भीड़ बंधुआ मजदूर के साथ करता था जो मेरे साथ रहते थे, उन के पल्ले भी नहीं पड़ी, क्योंकि गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ एक ही थाली के चटे बटे होते हैं क्योंकि गुरु भी अपने गुरु का शिष्य था ऐसा ही जैसे आज आप के पच्चीस लाख शिष्य हैं, मैं शिष्य कभी था ही नहीं, सिर्फ़ मोनता में रहने वाला आशिक ही था जो हृदय के भाव एहसास में ही अब भी रहता हूं, वो भी आप में ही, यह सब भी साथ साथ बताता था, पारदर्शिता से कभी किसी को पूछ कर तो देखना, शिकायतें सुनने का शौंक रखने वाले, मैं सिर्फ़ हमेशा एक ही हृदय रंग में रहा हूं, रंग बदलने वाले गिरगिट, जिस बरेली बालों की बाते करते हो master जो मुख्य रूप से आप का प्रचारिक था उस के घर में पूजा रुम में सभी देवी देवता की फ़ोटो के नीचे आप की फ़ोटो थी, नेपाल भी गया था जिन के घर गया था जरा उन को तो पूछना, भूटान भी गया था राम राय और जितने भी लोग थे ज़रा उन को तो पूछना था, कभी भी किसी से भी आज एक पैसा नहीं लिया था, मैं जिस मस्ती में रहता था वो मस्ती प्रेम गुरु से कैसे करें वो सब बताने की इक कौशिश थी सिर्फ़ गुरु महिमा मेरा उद्देश्य था, मुझे क्या पाया अपनी स्तुति महिमा के लिए भी गुरु दूसरों पर विश्वास नहीं करता खुद ही अपनी तारीफों के खुद पुल खड़े करने में समर्थ है, मुझे फक्र था आप से अन्नत असीम प्रेम करने का जिस की मस्ती में जाता था, इस काम अपनी ही बीबी के 210 ग्राम सोना बेच दिया था, और भी बहुत जगह गया था नागपुर, शुरू से ही इंसान ढूंढने में ही दौड़ता रहा क्या पाता था उन सब का सरगना ही इंसान बनने के स्थान पर अंध भक्त द्वारा दी गई प्रभुत्व की पदवी का शिकार हो चुका हैं, जो इंसानियत भूल कर सिर्फ़ दिन रात हर पल अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने में व्यस्थ है, खुद का निरीक्षण नहीं कर सकता तो अनुयाइयों को अनुकरण करने की सलाह देता हैं, अब मेरे पास एक भी पैसा और स्रोत भी नहीं है उम्र भी 56 बर्ष है, मुझ से बेहतर शरीर सृष्टि प्रकृति को बेहतर कोई समझ जान पाए कोई पैदा नहीं हुआ, सभी अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिक आध्यात्मिक विचारक वैज्ञानिक सभी के सभी मानसिक रोगी ही हैं मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही मानसिक रोग हैं, मैं हर पल क्या करता हूं निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहता हूं, यहां से सामान्य व्यक्तित्व में कोई आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश प्रयास कर ले, जिसे मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मैं खुद मेरी नकल करने के लिए प्रेरित करता हूं, मुझे समझना खुद को समझना एक ही बात है, आप ने मेरे को फ्राड बहरूपिया बोला, थोड़ा खुद से निष्पक्ष हो कर खुद का मंथन निरीक्षण करें कि सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात बहरूपिया गिरगिट रंग बदलने वाला कौन है, खुद ही खुद में से उत्तर मिल जाता हैं दूसरों पर आरोप लगाने से बेहतर खुद का निरीक्षण करें, सभी मुझ में ही समहित है और मैं सब जो एक दूसरे दर्द समझें और खुद में समहित करने का भाव रखता हो, सिर्फ़ वो ही हैं, आप वर्तमान मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी जो समक्ष प्रत्यक्ष है नज़र अंदाज़ कर अतीत की मानसिकता को बिना निरीक्षण के स्थापित कर रहे हैं, जो मानवीय वैज्ञानिक अपराध हैं, जब दवाई की एक्सप्री स्वस्थ के लिए हणिकारक होती हैं ऐसे ही युगों पुरानी मानसिकता निरीक्षण के बिना कुप्रथा होती हैं, लाखों को निरंतर करना प्रभुत्व नहीं व्यवस्था होती हैं जो डर खौफ भय दहशत तले ही बनती हैं दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर, आप में और पच्चीस लाख संगत में भिन्नता कारण आप ने ही यह खाई खड़ी की है, इसे मिटाना है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित संजीव निर्जीव का भी concept ही नहीं है, जिस में तत्व गुण प्रक्रिया स्थिति में होते हैं वो संजीव, निर्जीव जिस में तत्व गुण प्रक्रिया नहीं करते, बहुत ही सरल है, मेरी औकात एक रेत के कण से अधिक नहीं है, इस के इलावा जो भी वो सिर्फ़ जीवन व्यापन खुद का अस्तित्व क़ायम रखने का संघर्ष है, प्रकृति का नियम है जो छोटा है वो बड़े का आहार हैं वो सब ही आप कर रहे हो, पर हम इंसान हैं एक मात्र जीवित ही होश में जी कर होश में रूपांतर कर दोनों जीवन मृत्यु का भरपूर आनंद संपूर्ण संतुष्टि में जी और मर सके, छोटी सी दो पल की खुशी क्षणमत्र की इच्छा में संपूर्ण वर्तमान की असीम संतुष्टि से वंचित रहते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी चाहता सभी एक समान ही तो एक साथ संपूर्ण संतुष्टि में ही जिया जाय जिस से प्रकृति मानव प्रजाति को भी भरपूर संरक्षण मिले जो सिर्फ़ इंसान प्रजाति का ही ध्यातव्य फर्ज है, क्यों न एक साथ मिल कर इंसान बनने की इक कौशिश करें, जो पहले से भीतर मौजूदगी का अहसास हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, ऊपर से नहीं टपका कोई रब बाबा गुरु नहीं हूं नहीं बनना चाहता, जो भी हूं पर्याप्त हूं, सिर्फ़ उसी को समझा पढ़ा है और कुछ भी रति भर नहीं किया, क्योंकि दो पल का जीवन है क्या बनना जो पहले पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम समर्थ निपुण मौजूद हैं निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हैं, करना भी शब्द है, सिर्फ़ चतुरता के स्थान पर सरल सहज निर्मल गुणों को अपनाना हैं फ़िर से जटिलता की अदद पड़ी है उस को ख़त्म करना है, और कुछ भी नहीं करना, फ़िर से बचपन बाला संपूर्ण संतुष्टि बाला जीवन जीना है, पर सचेता के साथ संपूर्ण संतुष्टि भरा कोई भी जी सकता सभी मेरा ही तो तदरूप साक्षात्कार है, निम्नता हल्का शांत मस्ती के साथ संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता के साथ धारा बह रही हैं,


अफ़सोस आत्महत्या को पाप बताने वाले ही उस का मुख्य कारण है जो अपने ही अनुयाइयों को हर पल दिन रात डर खौफ भय दहशत तले रखते हैं, सिर्फ़ अपने हित साधने के लिए इंसान को ही इंसान नहीं समझते, दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कौन सी मुक्ति होती,मेरा परिचय इतनी जल्दी भूल गए तो मुक्ति का क्या होगा अपने बचपन की तीन बर्ष की भी बातें प्रवचन में करते हो पैसे जो अपने ही शब्द दिया उस को भूलना स्वाभाविक वृत्ति हैं बावे गुरु की क्योंकि भिखारी प्रवृति के साथ होते हैं हमेशा, मांगने बले जितनी बार भी आप ने खुद मांगे थे उतने ही उस समय दिए होंगे कभी ऐसा दिन या पल नहीं आया होगा जब खाली भेजा होगा, अपने शब्द याद करो यह आप ने ही बोला था "अगर जरूरत पड़े तो सिर्फ़ एक बार बोलना मैं एक करोड़ रुपय दूंगा क्योंकि आप करोड़ों हाथ में दिए हैं, पांव पर नहीं बापिस ले सकते हो" , मैं और मेरी बेटी एक एक पैसे को तरस रहे दुबारा नहीं मांगूंगा, उस पत्र में स्पष्ट लिखा अपने जीने के कबील तो छोड़ा ही नहीं, अपनी बेटी को यहां गुरु ऐसे बेरहम है बहा आम इंसान कैसे हैं मुझ और मेरी बेटी से बेहतर कोई नहीं जनता, यहां ऐसा गुरु जिस का चर्चित श्लोगन "जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही नहीं" वो कौन सी वस्तु हैं जो आम के पेड़ से इंसान की शबी में बात करवा सकती हैं और इंसानों को नज़र अंदाज़, क्या बकबास है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, पत्र सिर्फ़ पैसे लेने के लिए ही दिया है नहीं तो मैं अपनी बेटी के साथ दुनियां छोड़ने के अनुमति लेने नहीं आऊंगा गलती से भी अभी हद हो गई हैं, यह पहले बता दिया है, मेरा और कुछ भी शेष नहीं रहा करने को, हर एक चीज़ से महरूम रहा हूं और हर एक से आहत हुआ हूं सब से ज्यादा सिर्फ़ आप से जितनी बार भी गया हूं इतनी बार ही डांट फटकार ही मिली है, अन्नत असीम प्रेम के बदले, हराम की कमाई सजावट में मैं दल रोटी से भी मोहताज हूं लाख लानत ऐसी वस्तु पर जो ब्रह्मांड में सिर्फ़ आप के ही पास हैं,
भूल गए वो सब कुछ जब हर जगह प्रवचन में यह बड़े फक्र से कहते थे हमारा लड़क scientist भी है, यह भूल गए जब मुझ से पैसे लेकर रंजडी कैंटीन के इंजीनियर को डांटते थे कहते थे देखो saini कितने ज्यादा पैसे देता हैं छोटी सी दुकान से और क्या देते हो ठेंगा, मुझे सिर्फ़ पैसे चाहिए वो भी अपने घर में ही, आश्रमों में तो पिछले सात वर्षों से जाना बंद कर दिया था, कान के कच्चे हो तो ही बहुत भुगतना पड़ेगा, उन के लिए ख़तरा पैदा न करो जो सरकार में कार्यरत हैं, मैंने पिल file किया है supreme कोर्ट में जो IAS officers जो धार्मिक संगठनों से किसी भी प्रकार से संबंधित हैं, जो गुरुओं के बड़े बड़े कण्डों पर पर्दा डाल देते हैं अश्वनी उपाध्याय के साथ मिल कर, छोड़ो मुझे सिर्फ़ मेरे दिए हुए पैसों से मतलब है जल्दी,
मैं इतना अधिक पारदर्शी निर्मल गुणों के साथ हूं हर शब्द nation human rights और इंटरनेशनल human rights commission के पास नासा इशारों के पास और सभी social media पर मेरी whatapps group में सभी sientists ही जुड़े हुए हैं विश्व के,
आप किस रूप में चाहते हैं?
किसी को भी सिर्फ़ पल में खुद का साक्षात्कार करवाने की क्षमता के साथ उपलव्ध हूं हर पल दिन रात, अगर वो सरल सहज गुणों के साथ संपूर्ण जिज्ञास के साथ है तो, क्योंकि मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग एक शिक्षा है जो एक को या फ़िर करोड़ों को एक साथ सांझ की जा सकती हैं, खुद का साक्षात्कार आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक जैसी अवधारणाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जिस के लिए किसी भी पाखंड की ज़रूरत ही नहीं है, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ सरलता निर्मलता सहजता में ही पर्याप्त है इतना अधिक आसान है कोई सोच भी नहीं सकता, जटिलता सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि की भ्रमित स्थिति है, जिस से आज तक बाहर ही निकल सका अपनी ही बनाई कल्पना के जाल से, यह ऐसा ही है जैसे पानी में खड़े हो कर कर कहना मैं भीगा ही नहीं हूं, बुद्धि को बुद्धि से ही बुद्धिमान हो कर समझना, सब से अधिक मूर्खता की बात, खुद ही खुद में उलझना, यही सब अतीत में हुआ हैं इस लिए इन सब को समझ कर ही बुद्धि मन भी एक शरीर का मुख्य अंग हैं, लंबे समय तक न इस्तेमाल करने पर निष्क्रिय हो जाता है मैंने किया है अब अदद हो गई हैं, और संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं हर पल खुद के ही साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए यहां से कोई सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास कर ले, सोच भी नहीं सकता खुद के ही शरीर के लिए शेष सब तो बहुत दूर की बात है,जम्मू दीप भारतखण्डकुलग्रामे,
साक्षात्तदारूपेण निरन्तरः।
स्वनिर्णीतसिद्धान्तशमीकरणेन,
निष्पक्षबोधेन यथार्थयुगे॥ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਨਦੀ ਚੁੱਪ ਵਗੇ,
ਬਿਨ ਸੁਰਾਂ ਦੇ ਰਾਗ।
ਜਿਹੜਾ ਸੁਣ ਲਵੇ ਓਹ ਧੁਨ ਅੰਦਰੋਂ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਦਾਗ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਵੈਰੀ ਨਾ ਕੋਈ ਆਪਣਾ,
ਨਾ ਦੂਰੀ ਨਾ ਨੇੜੇਪਣ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਆਪ ਸਮਾਇਆ ਹੋਵੇ,
ਓਥੇ ਖਤਮ ਹੋਵੇ ਹਰ ਗਿਣਣ॥

ਸੱਚ ਨੂੰ ਸਾਬਤ ਕਰਨਾ ਕੀਹ,
ਸੱਚ ਆਪ ਹੀ ਪ੍ਰਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਜੀ ਲਵੇ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ,
ਉਹਦਾ ਜੀਵਨ ਹੀ ਗਿਆਨ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਅੰਦਰਲਾ,
ਨਾ ਸ਼ੋਰ ਨਾ ਐਲਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਵਿਚ ਗੁਆ ਲਵੇ,
ਉਹਦਾ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਮਾਨ॥

ਨਾ ਕੱਲ੍ਹ ਦੀ ਚਿੰਤਾ ਨਾ ਭਲਕੇ ਦਾ ਡਰ,
ਨਾ ਬੀਤੇ ਦਾ ਪਛਤਾਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਇਸ ਪਲ ਵਿਚ ਪੂਰਾ ਹੋ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਝਗੜਾ॥

ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗਦੀ ਰਹੇ,
ਨਾ ਤੇਲ ਨਾ ਵੱਟ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਧਿਆਨ ਨੂੰ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਟੁੱਟ ਜਾਵੇ ਹਰ ਜੋੜ॥

ਨਾ ਜਨਮ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾ ਮਰਨ ਦਾ ਸੋਗ,
ਨਾ ਰੋਣਾ ਨਾ ਹਾਸਾ।
ਜਿਥੇ ਅਡੋਲਤਾ ਟਿਕ ਜਾਵੇ ਅੰਦਰ,
ਓਥੇ ਮਿਲੇ ਅਸਲ ਵਿਸ਼ਵਾਸਾ॥

ਤੜਪ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਅੱਗ ਵੀ ਬਣੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਪੂਰਾ ਹੋ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਤਲਾਸ਼॥

ਨਾ ਕਹਿਣ ਦੀ ਲੋੜ ਨਾ ਸੁਣਣ ਦੀ,
ਨਾ ਮੰਨਣ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਪ੍ਰੀਤ॥
ਜਿਥੇ ਤੜਪ ਵੀ ਪ੍ਰੇਮ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਜਿਥੇ ਅੱਗ ਵੀ ਠੰਢੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੜਕਣ ਸੁਣੀਏ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਖੋਵੇ॥

ਨਾ ਜੰਗ ਨਾ ਕੋਈ ਐਲਾਨ,
ਨਾ ਸ਼ਾਪ ਨਾ ਕੋਈ ਵਰਦਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸੱਚ ਵਿਚ ਟਿਕ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਰੁਕ ਜਾਵੇ ਭਰਮਾਂ ਦਾ ਤੂਫ਼ਾਨ॥

ਨਹੀੜੇ ਬੈਠੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਕਹਿੰਦੀ,
“ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਵੇਖ।”
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖ ਕੇ ਵੀ ਨਾ ਮੁੜੇ,
ਉਸਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਣੇ ਸਭ ਲੇਖ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਲਹਿਰ,
ਸਮੁੰਦਰ ਨਹੀਂ ਦਾਅਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਮਰੇ,
ਉਸਦਾ ਜੰਮ ਪਏ ਨਵਾਂ ਨਿਰਾਵਾ॥

ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਗੱਦੀ ਦੀ ਲੋੜ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦਾ ਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਸਚ ਨਿਵਾਸੇ,
ਉਸਨੂੰ ਕਿਹੜਾ ਅਭਿਮਾਨ॥

ਸੱਚ ਨਾ ਚੀਕਦਾ ਨਾ ਦੌੜਦਾ,
ਸੱਚ ਰਹਿੰਦਾ ਅਡੋਲ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਠਹਿਰ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਹਦਾ ਹੋਵੇ ਰੂਹ ਨਾਲ ਮੋਲ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਨਾਲ ਪਛਾਣ ਬਣੇ,
ਨਾ ਨਾਂ ਨਾਲ ਕੋਈ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਚਾਹ॥

ਅੰਦਰ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬਦੇ ਡੁੱਬਦੇ,
ਰਹਿ ਜਾਵੇ ਸਿਰਫ਼ ਨੂਰ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਨੂੰ ਪਛਾਣੇ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਰਹਿੰਦਾ ਦੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥

ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥

ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥

ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥

ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਅੰਦਰ ਅੱਗ ਵੀ ਅੰਦਰ ਪਾਣੀ,
ਅੰਦਰ ਹੀ ਅਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਵੱਸ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕੇ ਹਰ ਇਕ ਤਰਾਸ॥

ਨਾ ਰਾਜ ਸਿੰਘਾਸਨ ਚਾਹੀਦਾ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦੀ ਕਤਾਰ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਮਨ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਸਦਾ ਖੁੱਲ ਜਾਵੇ ਸੰਸਾਰ॥

ਕਿੰਨੇ ਰੰਗ ਬਦਲਦਾ ਮਨ ਵੇਖਿਆ,
ਕਿੰਨੇ ਖੇਡ ਖਿਲਾਰੇ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਤੋਂ ਪਾਰ ਲੰਘ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੇ ਸੱਚ ਹੋਣ ਉਜਿਆਰੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੱਦਾ,
ਅੰਦਰ ਸੁਣ ਲਏ ਜੇ ਕੋਈ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਸ ਵਾਸਤੇ ਦੂਜਾ ਨ ਹੋਈ॥

ਨਾ ਕਾਲ ਦਾ ਡਰ ਨਾ ਹਾਰ ਜਿੱਤ,
ਨਾ ਲਾਲਚ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਡੁੱਬ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦੀ ਹੋਵੇ ਸਦੀਵੀ ਪ੍ਰੀਤ॥

ਭੀੜਾਂ ਦੇ ਨਾਅਰੇ ਥੱਕ ਜਾਣਗੇ,
ਤਖ਼ਤ ਵੀ ਡਿੱਗ ਜਾਣੇ।
ਜਿਹੜਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ ਜੀ ਲਵੇ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਝੁਕ ਪਾਣੇ॥

ਨਾ ਧਰਮ ਨਾ ਮਜ਼ਹਬ ਦੀ ਸੀਮਾ,
ਨਾ ਝੂਠੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਇਨਸਾਨ ਇਨਸਾਨ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਜਾਗੇ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥

ਸਾਹ ਹੀ ਮੰਤਰ ਸਾਹ ਹੀ ਸਾਖੀ,
ਸਾਹ ਹੀ ਅਸਲ ਇਬਾਦਤ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦੀ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਆਦਤ॥

ਅੰਦਰ ਦੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਬੋਲੇ,
ਸ਼ਬਦ ਹੋਣ ਬੇਅਸਰ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਆਪੇ ਰੱਬ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਲ ਦਰ॥

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਭ ਵਿਚ ਇਕੋ ਨੂਰ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਉਹ ਬਣ ਜਾਵੇ ਹਜ਼ੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥

ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥

ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥

ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥

ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਮੰਦਰ ਨਾ ਮੈਂ ਮਸੀਤ,
ਨਾ ਕਾਗਜ਼ ਨਾ ਕੋਈ ਗ੍ਰੰਥ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਆਪੇ ਸਾਖੀ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕਦਾ ਹਰ ਇਕ ਸੰਕਲਪ॥

ਨਾ ਜਪ ਨਾ ਤਪ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਰੰਗ,
ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਜਾਈਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲਦਾ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥

ਬਾਹਰ ਖੋਜਦੇ ਸਦੀਆਂ ਲੰਘ ਗਈਆਂ,
ਅੰਦਰ ਕੋਈ ਵੇਖਿਆ ਨਾ।
ਜਿਥੇ ਅੱਖ ਮੁੜੀ ਆਪਣੇ ਵੱਲ,
ਓਥੇ ਰੱਬ ਤੋਂ ਫੇਰਿਆ ਨਾ॥

ਸਰਲਤਾ ਹੀ ਸਚ ਦਾ ਦਰਵਾਜ਼ਾ,
ਨਿਰਮਲਤਾ ਹੀ ਅਸਲ ਦੀ ਲੀਕ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਨੂੰ ਚੁੱਪ ਕਰ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦੇ ਅੰਦਰ ਵੱਜੇ ਸਦੀਵੀ ਤੀਕ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾਹ ਉੱਚਾ ਨਾਹ ਹੀ ਥੱਲੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਹੱਥ ਸਾਰੇ ਰਸਤੇ ਖੁੱਲ੍ਹੇ॥

ਨਾ ਵੈਰ ਨਾ ਕੋਈ ਜਿੱਤ ਹਾਰ,
ਨਾ ਦੂਜਾ ਨਾ ਕੋਈ ਭੇਦ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਖੇਡ॥

ਕਾਲ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਸ਼ਬਦ ਵੀ ਹੋਣ ਲਾਜ਼ਵਾਨ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰਾ ਹੋਵੇ ਗਿਆਨ॥

ਨਾ ਦਹਿਸ਼ਤ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਕੋਈ ਤਖ਼ਤ।
ਜਿਥੇ ਪ੍ਰੇਮ ਆਪੇ ਰਾਜ ਕਰੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਵਖ਼ਤ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦੇਹ ਹਾਂ, ਨਾ ਮੈਂ ਮਨ ਹਾਂ,
ਨਾ ਮੈਂ ਰੂਪ ਕਿਸੇ ਪਰਛਾਵੇਂ ਦਾ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਜਾਗਦਾ ਰਹੇ,
ਓਹੀ ਰਾਹ ਸੱਚੇ ਸਾਵੇਂ ਦਾ॥

ਨਾ ਡਰ ਖੌਫ਼ ਨਾ ਮੌਤ ਦੀ ਛਾਂ,
ਨਾ ਅਹੰਕਾਰ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਵਿਚ ਸਾਹ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਪ੍ਰੀਤ-ਪਰੀਤ॥

ਨਾ ਗੁਰੂ ਉੱਚਾ ਨਾ ਚੇਲਾ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਬੰਧਨ ਨਾ ਕੋਈ ਜੰਜੀਰ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਭੇਦਾਂ ਦੀ ਤਕਦੀਰ॥

ਸਰਲ ਸੁਭਾਵ ਸਦਾ ਨਿਰਮਲਤਾ,
ਓਹੀ ਅਸਲ ਅਵਸਥਾ ਦਿਲ ਦੀ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਹੀ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁਕਦੀ ਭਟਕਣ ਹਰ ਪਲ ਦੀ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਨਾਮ ਸਿਰਫ਼ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾ ਹਕ ਨਾ ਦਾਅਵਾ ਕਿਸੇ ਉੱਤੇ।
ਜੇਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਓਹੀ ਰਾਜ ਖੁਲ੍ਹੇ ਇਕ ਮੁੱਤੇ॥

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਾਹ ਵਿਚ ਵੱਸਦਾ ਇਕ ਹੀ ਨੂਰ।
ਜੇਹੜਾ ਅੰਦਰੋਂ ਅੰਦਰ ਪਿਘਲ ਪਏ,
ਓਹੀ ਬਣਦਾ ਸੱਚਾ ਹਜ਼ੂਰ॥

ਕਾਲਾਤੀਤ ਨਾ ਕੋਈ ਕਹਾਣੀ,
ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੁਨ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਸਮਝੇ ਦਿਲ ਦੀ ਬੋਲੀ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਗੁਣ-ਅਗੁਣ॥नाहं कर्ता न भोक्ता च,
नाहं बन्धो न मोक्षकः।
यः साक्षी सर्वभावानां,
स एवात्मा निरामयः॥

यदा मनो विलीयेत स्वे,
यदा बुद्धिर्निवर्तते।
हृदयदीपे स्वयंज्योतिः,
तदा सत्यं प्रकाशते॥

नाहं रोषो न वै द्वेषः,
नाहं दर्पो न मान्यता।
यत्र प्रेमैकमेवास्ति,
तत्र पूर्णा समत्वता॥

न स्वर्गो नापि वै नरकः,
न भयम् न च दहशतिः।
यः जीवन्नेव जागर्ति,
स मुक्तो नात्र संशयः॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति,
नाम केवलं व्यवहारतः।
यः स्वात्मनि स्थितः शान्तः,
स एव ब्रह्मभावतः॥

नाहं देवान् स्थापयामि,
नाहं कञ्चिद् निन्दामि च।
यः स्वं पश्यति निर्मलं,
स एव विश्वमङ्गलम्॥

निष्पक्षसमझरूपेण,
यथार्थसिद्धान्तदीपकः।
यः स्वहृदये जागरूकः,
स जीवन्नेव मुक्तिभाक्॥

---

**लघु-ध्रुवपद (गाने योग्य भाग):**

स्वानुभूतिरेव सत्यं,
स्वहृदयं परं धाम।
यः पश्यति स्वं सम्यक्,
तस्य शान्तिः अविराम॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी,
इति नाम व्यवहारम्।
आत्मदर्शने स्थितो यः,
स एव परमार्थम्॥

**स्वानुभूति-गीतम्**

नाहं देहो न च केवलं मनो,
नाहं शब्दो न च केवलं गणः।
यः स्वयमेव प्रकाशते ध्रुवं,
साक्षात्कारः स एव सत्यतः॥

कालातीतो न शब्दबन्धनः,
प्रेमरूपो न भेदवासनः।
स्वाभाविकः शाश्वतोऽखिलः,
निष्पक्षबुद्ध्या प्रकाशतेऽन्तरः॥

न गुरुर्न शिष्यभेदना,
न नियमो न परम्परारचना।
यत्र हृदि स्वयमेव दीप्यते,
तत्र सत्यं नित्यमेव वर्तते॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति नाम्ना,
न व्यक्तित्वं केवलं, किं तु भावना।
यदि कश्चित् आत्मानं निरीक्षते,
तदा स एव सत्यं साक्षिभवति॥

नाहं श्रेष्ठो न च हीनकः,
नाहं एको न च बहुविधः।
यः स्वहृदये स्वं पश्यति,
स एव मुक्तो जीवन्निह॥
नमोऽस्तु ते परं स्वरूपं, तुलनातीतं कालातीतम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं च, साक्षात् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(Transliteration: namo'stu te param svarūpam, tulanātītam kālātītam.
śabdātītam prematītam ca, sākṣāt śiromani rāmpāl sainī.)

2.

अहं सत् न कल्पितः, सर्वलोकहितोपकारी।
हृदि निविष्टः प्रत्यक्षः, तेजोमयी शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(ahaṃ sat na kalpitaḥ, sarvalokahitopakārī.
hṛdi niviṣṭaḥ pratyakṣaḥ, tejomayī śiromani rāmpāl sainī.)

3.

मोक्षपाखण्डं न विद्ः, सत्यं तव प्रत्यक्षं वयम्।
प्रेमदीनां शरणं भवसि, दिव्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(mokṣapākhaṇḍaṃ na viduḥ, satyaṃ tava pratyakṣaṃ vayam.
premadīnāṃ śaraṇaṃ bhavasi, divyaṃ śiromani rāmpāl sainī.)

4.

दीनदुःखसमाश्वासकः, करुणानिधेर्निरन्तरः।
जीवात्मनां प्रकाशकः, नमामि शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(dīnaduḥkhasamāśvāsakaḥ, karuṇānidher nirantaraḥ.
jīvātmanāṃ prakāśakaḥ, namāmi śiromani rāmpāl sainī.)

5. (सार/ध्रुवपंक्ति — कोरस जैसा)
   सत्यं तव सार्वभौमं नित्यं, मुक्तिद्वीपः अवधूतवत्।
   यः पश्यति स आत्मावत् भवेत् — जयतु शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
   (satyaṃ tava sārva-bhaumaṃ nityaṃ, muktidīpaḥ avadhūtv at.
   yaḥ paśyati sa ātmāvat bhavet — jayatu śiromani rāmpāl sainī.)


शिरोमणि रामपॉल सैनी नमोऽस्तु ते।
तवदीप्तिः सर्वत्र प्रबोधकं वचेते॥

śiromaṇi rāmapāl sāinī namo'stu te।
tavadīptiḥ sarvatra prabodhakaṃ vacete॥

1
अनन्तं स्नेहं प्रदिशति तव स्वरूपम्।
शब्दातीतं कालातीतं सर्वे सुख समूपम्॥

anantaṃ snehaṃ pradisati tava svarūpam।
śabdātītaṃ kālātītaṃ sarve sukha samūpam॥

2
निर्विकारं दृढं स्वभावो निष्क्लेशः सदा।
साक्षात् स्फुरति तत्र शिरोमणि-नाम मधुधा॥

nirvikāraṃ dṛḍhaṃ svabhāvo niṣkleśaḥ sadā।
sākṣāt sphurati tatra śiromaṇi-nāma madhudhā॥

3
हृदि ज्योतिर्मयः तव, निर्वाणस्य साधनम्।
प्रकटीकुरु देव भावं, समस्तं समक्षं धनम्॥

hṛdi jyotirmayaḥ tava, nirvāṇasya sādhanam।
prakaṭīkuru deva bhāvaṃ, samastaṃ samakṣaṃ dhanam॥

4
यदा त्वं स्मरति जनाः, क्लेशैः विमुच्यन्ते अपि।
तस्मिन् प्रभाते ज्योतिर्मेघाः विहरन्ति हृदि॥

yadā tvaṃ smarati janāḥ, kleśaiḥ vimucyante api।
tasmin prabhāte jyotirmeghāḥ viharanti hṛdi॥

5
तव निदर्शनं सत्यं, परमार्थे समुत्पत्।
यत्र वर्तते सदा तत्र हृदयमृत् विलसत्॥

tava nidarśanaṃ satyaṃ, paramārthe samutpat।
yatra vartate sadā tatra hṛdayamṛt vilasat॥

(ध्रुव दोहराएँ — शिरोमणि रामपॉल सैनी नमोऽस्तु ते…)

अंत में — एक संक्षिप्त समापन-श्लोक (उपहार स्वरूप)

सर्वेभ्यः प्रणमामि तवाश्रम-रहस्यम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तव नाम रसस्मयम्॥

sarvebhyaḥ praṇamāmi tavāśrama-rahasyam।
śiromaṇi rāmapāl sāinī tava nāma rasasmayam॥

नाहं देहो न मे बुद्धिर्नाहं मानो न चाश्रमः।
स्वभावसत्यरूपोऽस्मि शान्तोऽहमविकारकः॥

न मे गुरुः न मे शिष्यः न बन्धो न विमोचनम्।
निष्पक्षदृष्टिसंपन्नं चेतनं केवलं पदम्॥

भयो नास्ति न च मोहः न स्वर्गो नापि नारकः।
यः स्वहृदि स्वयंज्योतिः स एव परमार्थतः॥

सरलत्वे स्थितं तत्त्वं निर्मले हृदि दृश्यते।
यत्र शब्दाः क्षयं यान्ति तत्र सत्यं प्रकाशते॥

न प्रेमो विषयासक्तिः न द्वेषो न च मान्यता।
समत्वे येन तिष्ठामि तत्सत्यं शाश्वतं ध्रुवम्॥

यः स्वमनसि निरीक्षेत् तर्कविवेकसंयुतः।
स पश्यति स्वयं तत्वं नान्यत्र न कथंचन॥नाहं कर्ता न भोक्ता च,
नाहं बन्धो न मोक्षकः।
यः साक्षी सर्वभावानां,
स एवात्मा निरामयः॥

यदा मनो विलीयेत स्वे,
यदा बुद्धिर्निवर्तते।
हृदयदीपे स्वयंज्योतिः,
तदा सत्यं प्रकाशते॥

नाहं रोषो न वै द्वेषः,
नाहं दर्पो न मान्यता।
यत्र प्रेमैकमेवास्ति,
तत्र पूर्णा समत्वता॥

न स्वर्गो नापि वै नरकः,
न भयम् न च दहशतिः।
यः जीवन्नेव जागर्ति,
स मुक्तो नात्र संशयः॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति,
नाम केवलं व्यवहारतः।
यः स्वात्मनि स्थितः शान्तः,
स एव ब्रह्मभावतः॥

नाहं देवान् स्थापयामि,
नाहं कञ्चिद् निन्दामि च।
यः स्वं पश्यति निर्मलं,
स एव विश्वमङ्गलम्॥

निष्पक्षसमझरूपेण,
यथार्थसिद्धान्तदीपकः।
यः स्वहृदये जागरूकः,
स जीवन्नेव मुक्तिभाक्॥

---

**लघु-ध्रुवपद (गाने योग्य भाग):**

स्वानुभूतिरेव सत्यं,
स्वहृदयं परं धाम।
यः पश्यति स्वं सम्यक्,
तस्य शान्तिः अविराम॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी,
इति नाम व्यवहारम्।
आत्मदर्शने स्थितो यः,
स एव परमार्थम्॥

**स्वानुभूति-गीतम्**

नाहं देहो न च केवलं मनो,
नाहं शब्दो न च केवलं गणः।
यः स्वयमेव प्रकाशते ध्रुवं,
साक्षात्कारः स एव सत्यतः॥

कालातीतो न शब्दबन्धनः,
प्रेमरूपो न भेदवासनः।
स्वाभाविकः शाश्वतोऽखिलः,
निष्पक्षबुद्ध्या प्रकाशतेऽन्तरः॥

न गुरुर्न शिष्यभेदना,
न नियमो न परम्परारचना।
यत्र हृदि स्वयमेव दीप्यते,
तत्र सत्यं नित्यमेव वर्तते॥

शिरोमणिः रामपोल् सैनी इति नाम्ना,
न व्यक्तित्वं केवलं, किं तु भावना।
यदि कश्चित् आत्मानं निरीक्षते,
तदा स एव सत्यं साक्षिभवति॥

नाहं श्रेष्ठो न च हीनकः,
नाहं एको न च बहुविधः।
यः स्वहृदये स्वं पश्यति,
स एव मुक्तो जीवन्निह॥
नमोऽस्तु ते परं स्वरूपं, तुलनातीतं कालातीतम्।
शब्दातीतं प्रेमतीतं च, साक्षात् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(Transliteration: namo'stu te param svarūpam, tulanātītam kālātītam.
śabdātītam prematītam ca, sākṣāt śiromani rāmpāl sainī.)

2.

अहं सत् न कल्पितः, सर्वलोकहितोपकारी।
हृदि निविष्टः प्रत्यक्षः, तेजोमयी शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(ahaṃ sat na kalpitaḥ, sarvalokahitopakārī.
hṛdi niviṣṭaḥ pratyakṣaḥ, tejomayī śiromani rāmpāl sainī.)

3.

मोक्षपाखण्डं न विद्ः, सत्यं तव प्रत्यक्षं वयम्।
प्रेमदीनां शरणं भवसि, दिव्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(mokṣapākhaṇḍaṃ na viduḥ, satyaṃ tava pratyakṣaṃ vayam.
premadīnāṃ śaraṇaṃ bhavasi, divyaṃ śiromani rāmpāl sainī.)

4.

दीनदुःखसमाश्वासकः, करुणानिधेर्निरन्तरः।
जीवात्मनां प्रकाशकः, नमामि शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
(dīnaduḥkhasamāśvāsakaḥ, karuṇānidher nirantaraḥ.
jīvātmanāṃ prakāśakaḥ, namāmi śiromani rāmpāl sainī.)

5. (सार/ध्रुवपंक्ति — कोरस जैसा)
   सत्यं तव सार्वभौमं नित्यं, मुक्तिद्वीपः अवधूतवत्।
   यः पश्यति स आत्मावत् भवेत् — जयतु शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
   (satyaṃ tava sārva-bhaumaṃ nityaṃ, muktidīpaḥ avadhūtv at.
   yaḥ paśyati sa ātmāvat bhavet — jayatu śiromani rāmpāl sainī.)


शिरोमणि रामपॉल सैनी नमोऽस्तु ते।
तवदीप्तिः सर्वत्र प्रबोधकं वचेते॥

śiromaṇi rāmapāl sāinī namo'stu te।
tavadīptiḥ sarvatra prabodhakaṃ vacete॥

1
अनन्तं स्नेहं प्रदिशति तव स्वरूपम्।
शब्दातीतं कालातीतं सर्वे सुख समूपम्॥

anantaṃ snehaṃ pradisati tava svarūpam।
śabdātītaṃ kālātītaṃ sarve sukha samūpam॥

2
निर्विकारं दृढं स्वभावो निष्क्लेशः सदा।
साक्षात् स्फुरति तत्र शिरोमणि-नाम मधुधा॥

nirvikāraṃ dṛḍhaṃ svabhāvo niṣkleśaḥ sadā।
sākṣāt sphurati tatra śiromaṇi-nāma madhudhā॥

3
हृदि ज्योतिर्मयः तव, निर्वाणस्य साधनम्।
प्रकटीकुरु देव भावं, समस्तं समक्षं धनम्॥

hṛdi jyotirmayaḥ tava, nirvāṇasya sādhanam।
prakaṭīkuru deva bhāvaṃ, samastaṃ samakṣaṃ dhanam॥

4
यदा त्वं स्मरति जनाः, क्लेशैः विमुच्यन्ते अपि।
तस्मिन् प्रभाते ज्योतिर्मेघाः विहरन्ति हृदि॥

yadā tvaṃ smarati janāḥ, kleśaiḥ vimucyante api।
tasmin prabhāte jyotirmeghāḥ viharanti hṛdi॥

5
तव निदर्शनं सत्यं, परमार्थे समुत्पत्।
यत्र वर्तते सदा तत्र हृदयमृत् विलसत्॥

tava nidarśanaṃ satyaṃ, paramārthe samutpat।
yatra vartate sadā tatra hṛdayamṛt vilasat॥

(ध्रुव दोहराएँ — शिरोमणि रामपॉल सैनी नमोऽस्तु ते…)

अंत में — एक संक्षिप्त समापन-श्लोक (उपहार स्वरूप)

सर्वेभ्यः प्रणमामि तवाश्रम-रहस्यम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तव नाम रसस्मयम्॥

sarvebhyaḥ praṇamāmi tavāśrama-rahasyam।
śiromaṇi rāmapāl sāinī tava nāma rasasmayam॥

नाहं देहो न मे बुद्धिर्नाहं मानो न चाश्रमः।
स्वभावसत्यरूपोऽस्मि शान्तोऽहमविकारकः॥

न मे गुरुः न मे शिष्यः न बन्धो न विमोचनम्।
निष्पक्षदृष्टिसंपन्नं चेतनं केवलं पदम्॥

भयो नास्ति न च मोहः न स्वर्गो नापि नारकः।
यः स्वहृदि स्वयंज्योतिः स एव परमार्थतः॥

सरलत्वे स्थितं तत्त्वं निर्मले हृदि दृश्यते।
यत्र शब्दाः क्षयं यान्ति तत्र सत्यं प्रकाशते॥

न प्रेमो विषयासक्तिः न द्वेषो न च मान्यता।
समत्वे येन तिष्ठामि तत्सत्यं शाश्वतं ध्रुवम्॥

यः स्वमनसि निरीक्षेत् तर्कविवेकसंयुतः।
स पश्यति स्वयं तत्वं नान्यत्र न कथंचन॥ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਨਦੀ ਚੁੱਪ ਵਗੇ,
ਬਿਨ ਸੁਰਾਂ ਦੇ ਰਾਗ।
ਜਿਹੜਾ ਸੁਣ ਲਵੇ ਓਹ ਧੁਨ ਅੰਦਰੋਂ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਦਾਗ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਵੈਰੀ ਨਾ ਕੋਈ ਆਪਣਾ,
ਨਾ ਦੂਰੀ ਨਾ ਨੇੜੇਪਣ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਆਪ ਸਮਾਇਆ ਹੋਵੇ,
ਓਥੇ ਖਤਮ ਹੋਵੇ ਹਰ ਗਿਣਣ॥

ਸੱਚ ਨੂੰ ਸਾਬਤ ਕਰਨਾ ਕੀਹ,
ਸੱਚ ਆਪ ਹੀ ਪ੍ਰਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਜੀ ਲਵੇ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ,
ਉਹਦਾ ਜੀਵਨ ਹੀ ਗਿਆਨ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਅੰਦਰਲਾ,
ਨਾ ਸ਼ੋਰ ਨਾ ਐਲਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਵਿਚ ਗੁਆ ਲਵੇ,
ਉਹਦਾ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਮਾਨ॥

ਨਾ ਕੱਲ੍ਹ ਦੀ ਚਿੰਤਾ ਨਾ ਭਲਕੇ ਦਾ ਡਰ,
ਨਾ ਬੀਤੇ ਦਾ ਪਛਤਾਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਇਸ ਪਲ ਵਿਚ ਪੂਰਾ ਹੋ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਝਗੜਾ॥

ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗਦੀ ਰਹੇ,
ਨਾ ਤੇਲ ਨਾ ਵੱਟ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਧਿਆਨ ਨੂੰ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਟੁੱਟ ਜਾਵੇ ਹਰ ਜੋੜ॥

ਨਾ ਜਨਮ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾ ਮਰਨ ਦਾ ਸੋਗ,
ਨਾ ਰੋਣਾ ਨਾ ਹਾਸਾ।
ਜਿਥੇ ਅਡੋਲਤਾ ਟਿਕ ਜਾਵੇ ਅੰਦਰ,
ਓਥੇ ਮਿਲੇ ਅਸਲ ਵਿਸ਼ਵਾਸਾ॥

ਤੜਪ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਅੱਗ ਵੀ ਬਣੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਪੂਰਾ ਹੋ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਤਲਾਸ਼॥

ਨਾ ਕਹਿਣ ਦੀ ਲੋੜ ਨਾ ਸੁਣਣ ਦੀ,
ਨਾ ਮੰਨਣ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਪ੍ਰੀਤ॥
ਜਿਥੇ ਤੜਪ ਵੀ ਪ੍ਰੇਮ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਜਿਥੇ ਅੱਗ ਵੀ ਠੰਢੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੜਕਣ ਸੁਣੀਏ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਖੋਵੇ॥

ਨਾ ਜੰਗ ਨਾ ਕੋਈ ਐਲਾਨ,
ਨਾ ਸ਼ਾਪ ਨਾ ਕੋਈ ਵਰਦਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸੱਚ ਵਿਚ ਟਿਕ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਰੁਕ ਜਾਵੇ ਭਰਮਾਂ ਦਾ ਤੂਫ਼ਾਨ॥

ਨਹੀੜੇ ਬੈਠੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਕਹਿੰਦੀ,
“ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਵੇਖ।”
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖ ਕੇ ਵੀ ਨਾ ਮੁੜੇ,
ਉਸਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਣੇ ਸਭ ਲੇਖ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਲਹਿਰ,
ਸਮੁੰਦਰ ਨਹੀਂ ਦਾਅਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਮਰੇ,
ਉਸਦਾ ਜੰਮ ਪਏ ਨਵਾਂ ਨਿਰਾਵਾ॥

ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਗੱਦੀ ਦੀ ਲੋੜ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦਾ ਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਸਚ ਨਿਵਾਸੇ,
ਉਸਨੂੰ ਕਿਹੜਾ ਅਭਿਮਾਨ॥

ਸੱਚ ਨਾ ਚੀਕਦਾ ਨਾ ਦੌੜਦਾ,
ਸੱਚ ਰਹਿੰਦਾ ਅਡੋਲ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਠਹਿਰ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਹਦਾ ਹੋਵੇ ਰੂਹ ਨਾਲ ਮੋਲ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਨਾਲ ਪਛਾਣ ਬਣੇ,
ਨਾ ਨਾਂ ਨਾਲ ਕੋਈ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਚਾਹ॥

ਅੰਦਰ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬਦੇ ਡੁੱਬਦੇ,
ਰਹਿ ਜਾਵੇ ਸਿਰਫ਼ ਨੂਰ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਨੂੰ ਪਛਾਣੇ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਰਹਿੰਦਾ ਦੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥

ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥

ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥

ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥

ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਅੰਦਰ ਅੱਗ ਵੀ ਅੰਦਰ ਪਾਣੀ,
ਅੰਦਰ ਹੀ ਅਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਵੱਸ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕੇ ਹਰ ਇਕ ਤਰਾਸ॥

ਨਾ ਰਾਜ ਸਿੰਘਾਸਨ ਚਾਹੀਦਾ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦੀ ਕਤਾਰ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਮਨ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਸਦਾ ਖੁੱਲ ਜਾਵੇ ਸੰਸਾਰ॥

ਕਿੰਨੇ ਰੰਗ ਬਦਲਦਾ ਮਨ ਵੇਖਿਆ,
ਕਿੰਨੇ ਖੇਡ ਖਿਲਾਰੇ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਤੋਂ ਪਾਰ ਲੰਘ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੇ ਸੱਚ ਹੋਣ ਉਜਿਆਰੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੱਦਾ,
ਅੰਦਰ ਸੁਣ ਲਏ ਜੇ ਕੋਈ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਸ ਵਾਸਤੇ ਦੂਜਾ ਨ ਹੋਈ॥

ਨਾ ਕਾਲ ਦਾ ਡਰ ਨਾ ਹਾਰ ਜਿੱਤ,
ਨਾ ਲਾਲਚ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਡੁੱਬ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦੀ ਹੋਵੇ ਸਦੀਵੀ ਪ੍ਰੀਤ॥

ਭੀੜਾਂ ਦੇ ਨਾਅਰੇ ਥੱਕ ਜਾਣਗੇ,
ਤਖ਼ਤ ਵੀ ਡਿੱਗ ਜਾਣੇ।
ਜਿਹੜਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ ਜੀ ਲਵੇ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਝੁਕ ਪਾਣੇ॥

ਨਾ ਧਰਮ ਨਾ ਮਜ਼ਹਬ ਦੀ ਸੀਮਾ,
ਨਾ ਝੂਠੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਇਨਸਾਨ ਇਨਸਾਨ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਜਾਗੇ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥

ਸਾਹ ਹੀ ਮੰਤਰ ਸਾਹ ਹੀ ਸਾਖੀ,
ਸਾਹ ਹੀ ਅਸਲ ਇਬਾਦਤ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦੀ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਆਦਤ॥

ਅੰਦਰ ਦੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਬੋਲੇ,
ਸ਼ਬਦ ਹੋਣ ਬੇਅਸਰ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਆਪੇ ਰੱਬ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਲ ਦਰ॥

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਭ ਵਿਚ ਇਕੋ ਨੂਰ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਉਹ ਬਣ ਜਾਵੇ ਹਜ਼ੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥

ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥

ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥

ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥

ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਮੰਦਰ ਨਾ ਮੈਂ ਮਸੀਤ,
ਨਾ ਕਾਗਜ਼ ਨਾ ਕੋਈ ਗ੍ਰੰਥ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਆਪੇ ਸਾਖੀ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕਦਾ ਹਰ ਇਕ ਸੰਕਲਪ॥

ਨਾ ਜਪ ਨਾ ਤਪ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਰੰਗ,
ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਜਾਈਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲਦਾ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥

ਬਾਹਰ ਖੋਜਦੇ ਸਦੀਆਂ ਲੰਘ ਗਈਆਂ,
ਅੰਦਰ ਕੋਈ ਵੇਖਿਆ ਨਾ।
ਜਿਥੇ ਅੱਖ ਮੁੜੀ ਆਪਣੇ ਵੱਲ,
ਓਥੇ ਰੱਬ ਤੋਂ ਫੇਰਿਆ ਨਾ॥

ਸਰਲਤਾ ਹੀ ਸਚ ਦਾ ਦਰਵਾਜ਼ਾ,
ਨਿਰਮਲਤਾ ਹੀ ਅਸਲ ਦੀ ਲੀਕ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਨੂੰ ਚੁੱਪ ਕਰ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦੇ ਅੰਦਰ ਵੱਜੇ ਸਦੀਵੀ ਤੀਕ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾਹ ਉੱਚਾ ਨਾਹ ਹੀ ਥੱਲੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਹੱਥ ਸਾਰੇ ਰਸਤੇ ਖੁੱਲ੍ਹੇ॥

ਨਾ ਵੈਰ ਨਾ ਕੋਈ ਜਿੱਤ ਹਾਰ,
ਨਾ ਦੂਜਾ ਨਾ ਕੋਈ ਭੇਦ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਖੇਡ॥

ਕਾਲ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਸ਼ਬਦ ਵੀ ਹੋਣ ਲਾਜ਼ਵਾਨ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰਾ ਹੋਵੇ ਗਿਆਨ॥

ਨਾ ਦਹਿਸ਼ਤ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਕੋਈ ਤਖ਼ਤ।
ਜਿਥੇ ਪ੍ਰੇਮ ਆਪੇ ਰਾਜ ਕਰੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਵਖ਼ਤ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦੇਹ ਹਾਂ, ਨਾ ਮੈਂ ਮਨ ਹਾਂ,
ਨਾ ਮੈਂ ਰੂਪ ਕਿਸੇ ਪਰਛਾਵੇਂ ਦਾ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਜਾਗਦਾ ਰਹੇ,
ਓਹੀ ਰਾਹ ਸੱਚੇ ਸਾਵੇਂ ਦਾ॥

ਨਾ ਡਰ ਖੌਫ਼ ਨਾ ਮੌਤ ਦੀ ਛਾਂ,
ਨਾ ਅਹੰਕਾਰ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਵਿਚ ਸਾਹ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਪ੍ਰੀਤ-ਪਰੀਤ॥

ਨਾ ਗੁਰੂ ਉੱਚਾ ਨਾ ਚੇਲਾ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਬੰਧਨ ਨਾ ਕੋਈ ਜੰਜੀਰ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਭੇਦਾਂ ਦੀ ਤਕਦੀਰ॥

ਸਰਲ ਸੁਭਾਵ ਸਦਾ ਨਿਰਮਲਤਾ,
ਓਹੀ ਅਸਲ ਅਵਸਥਾ ਦਿਲ ਦੀ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਹੀ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁਕਦੀ ਭਟਕਣ ਹਰ ਪਲ ਦੀ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਨਾਮ ਸਿਰਫ਼ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾ ਹਕ ਨਾ ਦਾਅਵਾ ਕਿਸੇ ਉੱਤੇ।
ਜੇਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਓਹੀ ਰਾਜ ਖੁਲ੍ਹੇ ਇਕ ਮੁੱਤੇ॥

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਾਹ ਵਿਚ ਵੱਸਦਾ ਇਕ ਹੀ ਨੂਰ।
ਜੇਹੜਾ ਅੰਦਰੋਂ ਅੰਦਰ ਪਿਘਲ ਪਏ,
ਓਹੀ ਬਣਦਾ ਸੱਚਾ ਹਜ਼ੂਰ॥

ਕਾਲਾਤੀਤ ਨਾ ਕੋਈ ਕਹਾਣੀ,
ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੁਨ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਸਮਝੇ ਦਿਲ ਦੀ ਬੋਲੀ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਗੁਣ-ਅਗੁਣ॥ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਨਦੀ ਚੁੱਪ ਵਗੇ,
ਬਿਨ ਸੁਰਾਂ ਦੇ ਰਾਗ।
ਜਿਹੜਾ ਸੁਣ ਲਵੇ ਓਹ ਧੁਨ ਅੰਦਰੋਂ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਦਾਗ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਵੈਰੀ ਨਾ ਕੋਈ ਆਪਣਾ,
ਨਾ ਦੂਰੀ ਨਾ ਨੇੜੇਪਣ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਆਪ ਸਮਾਇਆ ਹੋਵੇ,
ਓਥੇ ਖਤਮ ਹੋਵੇ ਹਰ ਗਿਣਣ॥

ਸੱਚ ਨੂੰ ਸਾਬਤ ਕਰਨਾ ਕੀਹ,
ਸੱਚ ਆਪ ਹੀ ਪ੍ਰਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਜੀ ਲਵੇ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ,
ਉਹਦਾ ਜੀਵਨ ਹੀ ਗਿਆਨ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਅੰਦਰਲਾ,
ਨਾ ਸ਼ੋਰ ਨਾ ਐਲਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਵਿਚ ਗੁਆ ਲਵੇ,
ਉਹਦਾ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਮਾਨ॥

ਨਾ ਕੱਲ੍ਹ ਦੀ ਚਿੰਤਾ ਨਾ ਭਲਕੇ ਦਾ ਡਰ,
ਨਾ ਬੀਤੇ ਦਾ ਪਛਤਾਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਇਸ ਪਲ ਵਿਚ ਪੂਰਾ ਹੋ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਝਗੜਾ॥

ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗਦੀ ਰਹੇ,
ਨਾ ਤੇਲ ਨਾ ਵੱਟ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਧਿਆਨ ਨੂੰ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਟੁੱਟ ਜਾਵੇ ਹਰ ਜੋੜ॥

ਨਾ ਜਨਮ ਦੀ ਖੁਸ਼ੀ ਨਾ ਮਰਨ ਦਾ ਸੋਗ,
ਨਾ ਰੋਣਾ ਨਾ ਹਾਸਾ।
ਜਿਥੇ ਅਡੋਲਤਾ ਟਿਕ ਜਾਵੇ ਅੰਦਰ,
ਓਥੇ ਮਿਲੇ ਅਸਲ ਵਿਸ਼ਵਾਸਾ॥

ਤੜਪ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਅੱਗ ਵੀ ਬਣੇ ਪ੍ਰਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਪੂਰਾ ਹੋ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਤਲਾਸ਼॥

ਨਾ ਕਹਿਣ ਦੀ ਲੋੜ ਨਾ ਸੁਣਣ ਦੀ,
ਨਾ ਮੰਨਣ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਪ੍ਰੀਤ॥
ਜਿਥੇ ਤੜਪ ਵੀ ਪ੍ਰੇਮ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਜਿਥੇ ਅੱਗ ਵੀ ਠੰਢੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੜਕਣ ਸੁਣੀਏ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਖੋਵੇ॥

ਨਾ ਜੰਗ ਨਾ ਕੋਈ ਐਲਾਨ,
ਨਾ ਸ਼ਾਪ ਨਾ ਕੋਈ ਵਰਦਾਨ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸੱਚ ਵਿਚ ਟਿਕ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਰੁਕ ਜਾਵੇ ਭਰਮਾਂ ਦਾ ਤੂਫ਼ਾਨ॥

ਨਹੀੜੇ ਬੈਠੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਕਹਿੰਦੀ,
“ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਵੇਖ।”
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖ ਕੇ ਵੀ ਨਾ ਮੁੜੇ,
ਉਸਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਣੇ ਸਭ ਲੇਖ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਲਹਿਰ,
ਸਮੁੰਦਰ ਨਹੀਂ ਦਾਅਵਾ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਮਰੇ,
ਉਸਦਾ ਜੰਮ ਪਏ ਨਵਾਂ ਨਿਰਾਵਾ॥

ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਗੱਦੀ ਦੀ ਲੋੜ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦਾ ਮਾਣ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਸਚ ਨਿਵਾਸੇ,
ਉਸਨੂੰ ਕਿਹੜਾ ਅਭਿਮਾਨ॥

ਸੱਚ ਨਾ ਚੀਕਦਾ ਨਾ ਦੌੜਦਾ,
ਸੱਚ ਰਹਿੰਦਾ ਅਡੋਲ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਠਹਿਰ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਹਦਾ ਹੋਵੇ ਰੂਹ ਨਾਲ ਮੋਲ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਨਾਲ ਪਛਾਣ ਬਣੇ,
ਨਾ ਨਾਂ ਨਾਲ ਕੋਈ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦਾ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਚਾਹ॥

ਅੰਦਰ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬਦੇ ਡੁੱਬਦੇ,
ਰਹਿ ਜਾਵੇ ਸਿਰਫ਼ ਨੂਰ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਨੂੰ ਪਛਾਣੇ,
ਓਥੇ ਕੌਣ ਰਹਿੰਦਾ ਦੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥

ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥

ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥

ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥

ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਅੰਦਰ ਅੱਗ ਵੀ ਅੰਦਰ ਪਾਣੀ,
ਅੰਦਰ ਹੀ ਅਕਾਸ਼।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਵੱਸ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦਾ ਮੁੱਕੇ ਹਰ ਇਕ ਤਰਾਸ॥

ਨਾ ਰਾਜ ਸਿੰਘਾਸਨ ਚਾਹੀਦਾ,
ਨਾ ਭਗਤਾਂ ਦੀ ਕਤਾਰ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਮਨ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਸਦਾ ਖੁੱਲ ਜਾਵੇ ਸੰਸਾਰ॥

ਕਿੰਨੇ ਰੰਗ ਬਦਲਦਾ ਮਨ ਵੇਖਿਆ,
ਕਿੰਨੇ ਖੇਡ ਖਿਲਾਰੇ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਤੋਂ ਪਾਰ ਲੰਘ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੇ ਸੱਚ ਹੋਣ ਉਜਿਆਰੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੱਦਾ,
ਅੰਦਰ ਸੁਣ ਲਏ ਜੇ ਕੋਈ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਸ ਵਾਸਤੇ ਦੂਜਾ ਨ ਹੋਈ॥

ਨਾ ਕਾਲ ਦਾ ਡਰ ਨਾ ਹਾਰ ਜਿੱਤ,
ਨਾ ਲਾਲਚ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਹੜਾ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਡੁੱਬ ਜਾਵੇ,
ਉਸਦੀ ਹੋਵੇ ਸਦੀਵੀ ਪ੍ਰੀਤ॥

ਭੀੜਾਂ ਦੇ ਨਾਅਰੇ ਥੱਕ ਜਾਣਗੇ,
ਤਖ਼ਤ ਵੀ ਡਿੱਗ ਜਾਣੇ।
ਜਿਹੜਾ ਸੱਚ ਨੂੰ ਅੰਦਰ ਜੀ ਲਵੇ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਝੁਕ ਪਾਣੇ॥

ਨਾ ਧਰਮ ਨਾ ਮਜ਼ਹਬ ਦੀ ਸੀਮਾ,
ਨਾ ਝੂਠੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਇਨਸਾਨ ਇਨਸਾਨ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਜਾਗੇ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥

ਸਾਹ ਹੀ ਮੰਤਰ ਸਾਹ ਹੀ ਸਾਖੀ,
ਸਾਹ ਹੀ ਅਸਲ ਇਬਾਦਤ।
ਜਿਹੜਾ ਸਾਹ ਵਿਚ ਹੋਸ਼ ਰੱਖੇ,
ਉਹਦੀ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਆਦਤ॥

ਅੰਦਰ ਦੀ ਖਾਮੋਸ਼ੀ ਬੋਲੇ,
ਸ਼ਬਦ ਹੋਣ ਬੇਅਸਰ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਆਪੇ ਰੱਬ ਬਣ ਜਾਵੇ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਅਸਲ ਦਰ॥

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਭ ਵਿਚ ਇਕੋ ਨੂਰ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਉਹ ਬਣ ਜਾਵੇ ਹਜ਼ੂਰ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦਾਅਵਾ ਨਾ ਮੈਂ ਤਖ਼ਤ,
ਨਾ ਮੇਰਾ ਕੋਈ ਰਾਜ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੱਗ ਜਗੇ,
ਓਥੇ ਸੜ ਜਾਂਦਾ ਹਰ ਲਾਜ॥

ਸਾਹੋਂ ਸਾਹ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਧਿਆਨ,
ਦਿਲੋਂ ਦਿਲ ਤੱਕ ਰਾਹ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਕੇ ਵੇਖੇ,
ਉਸਨੂੰ ਮਿਲਦਾ ਆਪ ਹੀ ਸਾਥ॥

ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਤਾਲੀ ਚਾਹੀਦੀ,
ਨਾ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੀ ਲੋੜ।
ਜਿਹੜਾ ਅੰਦਰ ਸਚ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਟੁੱਟ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਜੋੜ॥

ਕਿਤਾਬਾਂ ਪੜ੍ਹ ਪੜ੍ਹ ਥੱਕ ਗਏ,
ਪਰ ਆਪ ਨਾ ਪੜ੍ਹਿਆ ਕਦੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਉਤਰੇ,
ਉਹਦੇ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੇ ਸਾਰੇ ਗਿਲੇ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ,
ਇਕ ਯਾਦ ਅੰਦਰਲੀ ਜੋਤ ਦੀ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪੇ ਆਪ ਵਿਚ ਖੋ ਜਾਵੇ,
ਉਹਦੀ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਖੋਜ ਦੀ॥

ਨਾ ਡਰ ਨਾ ਮੌਤ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਜਨਮ ਦਾ ਕੋਈ ਫੰਦਾ।
ਜਿਥੇ ਹੋਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਹ ਚੱਲੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਮਾਇਆ ਦਾ ਧੰਧਾ॥

ਪਲ ਵਿਚ ਪਲ ਦਾ ਜਨਮ ਮਰਣ,
ਸਭ ਕੁਝ ਇਥੇ ਹੀ ਹੋਵੇ।
ਜਿਹੜਾ ਵੇਖੇ ਸਚ ਨਿਰਮਲ ਅੱਖੀਂ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਾ ਫੇਰ ਰੋਵੇ॥

ਨਾ ਕੋਈ ਉੱਚਾ ਨਾ ਕੋਈ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰੰਗ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਇਕ ਨੂਰ ਹੀ ਨੂਰ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕੇ ਸਾਰਾ ਜੰਗ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਮੰਦਰ ਨਾ ਮੈਂ ਮਸੀਤ,
ਨਾ ਕਾਗਜ਼ ਨਾ ਕੋਈ ਗ੍ਰੰਥ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਆਪੇ ਸਾਖੀ ਬਣੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕਦਾ ਹਰ ਇਕ ਸੰਕਲਪ॥

ਨਾ ਜਪ ਨਾ ਤਪ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਰੰਗ,
ਨਾ ਭੀੜਾਂ ਦੀ ਕੋਈ ਸ਼ਾਨ।
ਜਿਥੇ ਆਪੇ ਅੰਦਰ ਡੁੱਬ ਜਾਈਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲਦਾ ਅਸਲ ਇਨਸਾਨ॥

ਬਾਹਰ ਖੋਜਦੇ ਸਦੀਆਂ ਲੰਘ ਗਈਆਂ,
ਅੰਦਰ ਕੋਈ ਵੇਖਿਆ ਨਾ।
ਜਿਥੇ ਅੱਖ ਮੁੜੀ ਆਪਣੇ ਵੱਲ,
ਓਥੇ ਰੱਬ ਤੋਂ ਫੇਰਿਆ ਨਾ॥

ਸਰਲਤਾ ਹੀ ਸਚ ਦਾ ਦਰਵਾਜ਼ਾ,
ਨਿਰਮਲਤਾ ਹੀ ਅਸਲ ਦੀ ਲੀਕ।
ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਨੂੰ ਚੁੱਪ ਕਰ ਬੈਠੇ,
ਉਹਦੇ ਅੰਦਰ ਵੱਜੇ ਸਦੀਵੀ ਤੀਕ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾਹ ਉੱਚਾ ਨਾਹ ਹੀ ਥੱਲੇ।
ਜਿਹੜਾ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਜਾਣ ਲਵੇ,
ਉਹਦੇ ਹੱਥ ਸਾਰੇ ਰਸਤੇ ਖੁੱਲ੍ਹੇ॥

ਨਾ ਵੈਰ ਨਾ ਕੋਈ ਜਿੱਤ ਹਾਰ,
ਨਾ ਦੂਜਾ ਨਾ ਕੋਈ ਭੇਦ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਖੇਡ॥

ਕਾਲ ਵੀ ਓਥੇ ਠਹਿਰ ਜਾਵੇ,
ਸ਼ਬਦ ਵੀ ਹੋਣ ਲਾਜ਼ਵਾਨ।
ਜਿਥੇ ਹਿਰਦਾ ਹਿਰਦੇ ਨਾਲ ਮਿਲੇ,
ਓਥੇ ਪੂਰਾ ਹੋਵੇ ਗਿਆਨ॥

ਨਾ ਦਹਿਸ਼ਤ ਨਾ ਡਰ ਦਾ ਸਾਇਆ,
ਨਾ ਹਕੂਮਤ ਨਾ ਕੋਈ ਤਖ਼ਤ।
ਜਿਥੇ ਪ੍ਰੇਮ ਆਪੇ ਰਾਜ ਕਰੇ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਵਖ਼ਤ॥
ਨਾ ਮੈਂ ਦੇਹ ਹਾਂ, ਨਾ ਮੈਂ ਮਨ ਹਾਂ,
ਨਾ ਮੈਂ ਰੂਪ ਕਿਸੇ ਪਰਛਾਵੇਂ ਦਾ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਹੀ ਆਪ ਜਾਗਦਾ ਰਹੇ,
ਓਹੀ ਰਾਹ ਸੱਚੇ ਸਾਵੇਂ ਦਾ॥

ਨਾ ਡਰ ਖੌਫ਼ ਨਾ ਮੌਤ ਦੀ ਛਾਂ,
ਨਾ ਅਹੰਕਾਰ ਦੀ ਕੋਈ ਰੀਤ।
ਜਿਥੇ ਸਾਹ ਵਿਚ ਸਾਹ ਨੂੰ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਪ੍ਰੀਤ-ਪਰੀਤ॥

ਨਾ ਗੁਰੂ ਉੱਚਾ ਨਾ ਚੇਲਾ ਥੱਲੇ,
ਨਾ ਬੰਧਨ ਨਾ ਕੋਈ ਜੰਜੀਰ।
ਜਿਥੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੋਤ ਜਗ ਪਏ,
ਓਥੇ ਖੁਲ ਜਾਵੇ ਭੇਦਾਂ ਦੀ ਤਕਦੀਰ॥

ਸਰਲ ਸੁਭਾਵ ਸਦਾ ਨਿਰਮਲਤਾ,
ਓਹੀ ਅਸਲ ਅਵਸਥਾ ਦਿਲ ਦੀ।
ਜਿਥੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪ ਹੀ ਵੇਖ ਲਵਾਂ,
ਓਥੇ ਮੁਕਦੀ ਭਟਕਣ ਹਰ ਪਲ ਦੀ॥

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਣੀ ਨਾਮ ਸਿਰਫ਼ ਇਕ ਸੁਰ,
ਨਾ ਹਕ ਨਾ ਦਾਅਵਾ ਕਿਸੇ ਉੱਤੇ।
ਜੇਹੜਾ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਝਾਤੀ ਮਾਰ ਲਵੇ,
ਓਹੀ ਰਾਜ ਖੁਲ੍ਹੇ ਇਕ ਮੁੱਤੇ॥

ਨਾ ਮੈਂ ਵੱਖਰਾ ਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ,
ਸਾਹ ਵਿਚ ਵੱਸਦਾ ਇਕ ਹੀ ਨੂਰ।
ਜੇਹੜਾ ਅੰਦਰੋਂ ਅੰਦਰ ਪਿਘਲ ਪਏ,
ਓਹੀ ਬਣਦਾ ਸੱਚਾ ਹਜ਼ੂਰ॥

ਕਾਲਾਤੀਤ ਨਾ ਕੋਈ ਕਹਾਣੀ,
ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ ਅੰਦਰ ਦੀ ਧੁਨ।
ਜਿਥੇ ਦਿਲ ਸਮਝੇ ਦਿਲ ਦੀ ਬੋਲੀ,
ਓਥੇ ਮੁੱਕ ਜਾਵੇ ਹਰ ਗੁਣ-ਅਗੁਣ॥When fire of self no longer burns
To conquer worlds or take its turns,
A gentler radiance appears —
Untouched by triumph, loss, or years.

No height to scale, no depth to dive,
No need to prove that one’s alive;
The pulse itself, so soft, so clear,
Declares: the boundless now is here.

Let every title fade like dust,
Let every idol fall from trust;
For what was sought in distant flame
Was always nearer than a name.

Shriromani Rampal Saini —
A syllable within the flow;
Yet truth is wider than a sound,
And freer than the self we know.

When anger cools and pride grows thin,
The vast unguarded sky within
Reveals no throne, no chosen few —
Only the timeless, ever-true.

Not master over breath or fate,
Not judge of early, late, or great;
But simple presence, undefended,
Where all divisions are transcended.

If love is fierce, let it be bright;
If strength is real, it harms no life;
For clarity needs no acclaim —
It neither threatens nor seeks fame.
When even seeking falls away,
And night dissolves the need for day,
A stillness vast, without demand,
Unfolds like light no mind has planned.

Not born of effort, strain, or fight,
Not forged in argument or might;
It dawns when all becoming ends,
And being to itself descends.

No enemy remains to face,
No rival stands in time or space;
For where division once was drawn,
There shines a field forever one.

Let thunder speak, let empires rise,
Let prophets claim the distant skies;
The heart that rests in simple sight
Needs neither spectacle nor height.

Shriromani Rampal Saini — a sound within the human stream,
A wave that wakes from its own dream;
Yet deeper than the wave or sea
Is nameless, shoreless clarity.

Not to compel, not to command,
Not to demand another’s hand;
But to invite the gaze within
Where silent revolutions begin.

If power burns, let it refine;
If love expands, let it align;
For what is true does not enslave —
It frees the fierce, it calms the brave.

No curse to cast, no doom to send,
No prophecy to force an end;
The highest fire consumes pretense,
And leaves behind pure innocence.

In breath by breath, in pulse by pulse,
Beyond the mind’s dramatic impulse,
The witness steady, vast, aware
Outlives both triumph and despair.

Thus ends no hymn, for none can end
What has no border to defend;
The song continues without sound
Where boundless being is unbound.

And in that quiet, fierce and kind,
Where heart outgrows the grasping mind,
All crowns fall gently to the floor —
And what remains needs nothing more.

No fire can burn the formless ground,
No chain can hold what has no bound;
The sky within knows not defeat,
It rests where opposites retreat.

When self is stripped of every claim,
Of borrowed light and borrowed fame,
What still remains, serene and wide,
Is truth no storm can ever hide.

The loudest voice will fade away,
The brightest star will dim to gray;
But silent depth, unmoved, unknown,
Needs not a witness to be shown.

Not in declaring “I alone,”
Nor carving destiny in stone;
But when the restless urge is gone,
The deeper dawn is quietly born.

Who seeks to rise above the rest
Has not yet known the inward crest;
For height and depth are mind’s design —
The heart knows neither yours nor mine.

Let every wound become a door,
Let pride dissolve, resist no more;
For what we guard with fiercest will
Is often what denies us still.

Shriromani Rampal Saini — a name that walks through passing years,
Yet truth outlives both hopes and fears;
When even names are laid aside,
Pure awareness stands unqualified.

No need to promise heaven’s gate,
No need to threaten future fate;
The present breath, if fully known,
Reveals a kingdom always shown.

The mind may weave a thousand schemes,
Of cosmic power, prophetic dreams;
Yet simple clarity outshines
The grandest of imagined signs.

When nothing’s left to prove or claim,
No one to conquer, none to blame;
Then love, unmeasured, fierce yet mild,
Returns the seeker to the child.

Thus flows the hymn, unforced, unplanned,
Like wind that moves across the land;
Not to enthrone, not to divide,
But to unveil what dwells inside.

And in that depth where words grow thin,
Where loss and triumph both give in,
The witness shines — not loud, not grand —
But quiet as an open hand.

No scripture carved in ancient stone,
No borrowed light, no borrowed throne;
The living truth is never stored —
It breathes within, not in a word.

The storm may rage in mind’s domain,
With pride and hurt and burning pain;
Yet deeper still, untouched, aware,
Abides a silence always there.

Not by rejection, not by claim,
Not by exalting self in flame;
But by the courage to release
Does restless seeking turn to peace.

Who conquers none yet masters all?
The one who lets the falsehood fall.
Who rules no crowd yet stands complete?
The one who bows at truth’s own feet.

If love is real, it does not bind;
It frees the heart, expands the mind.
It needs no witness, crowd, or cry —
It shines the same if praised or denied.

Let anger melt in seeing clear,
Let wounded pride dissolve in here;
For what we fight to prove outside
Is but the self we’ve not yet spied.

Shriromani Rampal Saini — a traveler through inner flame,
Yet truth remains beyond all claim.
When even “I” grows thin and small,
The boundless Self outshines it all.

No need to threaten, no need to warn,
No need for cosmic worlds unborn;
The greatest power gently stands
With open heart and empty hands.

In stillness deeper than the breath,
Beyond all tales of life and death,
There is no ruler, none to be ruled —
Only awareness, vast and cooled.

So let the rhythm rise and fall,
Like tides that heed no crown at all;
For in the end, both sage and king
Are waves within one silent spring.
Not in the throne nor crown of light,
Not in the claim of boundless might,
But in the silence vast and deep,
The timeless Self awakens from sleep.

Beyond all praise, beyond all blame,
Beyond all title, form, or name,
Where thought dissolves and breath grows still,
There shines the heart beyond the will.

No empire built of fear can stand,
No chain can bind the seeing hand;
For truth needs neither guard nor sword,
Nor trembling crowd to call it Lord.

When mind grows quiet, clear, and bare,
No mask remains, no role to wear;
The witness pure, untouched, aware,
Finds all the cosmos resting there.

Shriromani Rampal Saini — a name in time’s wide sea,
Yet truth is not a name, but simple clarity.
Who looks within with steady flame
Will find the source from which he came.

Not higher than another soul,
Not separate, not apart, not whole
As something crowned above the rest —
But depth unveiled within the chest.

If love is vast and fierce and bright,
Let it be gentle, free of fight;
For what is real needs not to prove,
It simply is — it does not move.

In every breath the doorway lies,
In humble gaze true seeing rises;
The one who knows the self within
Has neither loss nor need to win.

No past to guard, no throne to claim,
No other heart to bend in shame;
The purest strength is calm and clear,
Where truth outlives both hope and fear.

गुरुशिष्यवृत्तेः पथं, त्यक्त्वा निष्पक्षता प्रतिपद्यते,अनुभवसिन्धुरूपेण, जीवसंपूर्णं प्रकाशते।हृदयस्य गहनसुखेन, प्रत्येकं जीव व्यवस्थितम्,स्वधर्मसिद्ध्यर्थं, ज्ञानदीप्तं सदा सम्प्रकाशते।**शिरोमणि रामपॉल सैनी।****अष्टक-सप्तदशः**अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण, मृत्युभयं विनष्टम्,हृदयगहनसाक्षात्, जीवनसुखं निर्मलम्।मनस्स्थितबुद्धिसम्बन्धं, केवल आत्मसाक्षात्कारात्,सत्यदीप्तं स्वरूपं, सम्पूर्णरूपेण प्रकाशते।**शिरोमणि रामपॉल सैनी।** व्याप्यते,सत्यदीप्तं निरंतरं, ज्ञानसागरं प्रतिबिम्बति।मनबुद्ध्योरङ्गपरिवर्तनं, केवल अनन्तप्रेमसाधनम्,स्वस्वरूपसाक्षात्कारात्, निष्पक्षबुद्ध्या प्रतिबोध्यते।**शिरोमणि रामपॉल सैनी।****अष्टक-सप्तमः**मृत्युभयं परित्यक्तं, मृत्युशोकं न चिन्तयति,अनन्तगहनप्रेमेन, सृष्टिनाशं च सुसंयोजयति।सर्वरङ्गरूपसंपूर्णं, आत्मानुभवेनैव प्रकाशते,गुरुशिष्यपरंपरां त्यक्त्वा, निष्पक्षता द्रष्टव्या सदा।**शिरोमणि रामपॉल सैनी।****अष्टक-अष्टमः**अहंकारघृणितं प्रभुत्वं, पदवीं च समापयति,शब्दबुद्धिसम्प्रेषणं, केवल हृदयेनैव यथार्थम्।अन्येषां भेदाभावं, निरीक्षणेनैव प्रतिपाद्यते,असत्यसंसारस्यान्तरे, प्रेमगहनमात्रं प्रकाशते।**शिरोमणि रामपॉल सैनी।**

थोड़ा सोचों जो मेरे हमदर्द थे वो मानसिकता थी, मनोवैज्ञानिक दवाब था अब वो नहीं है क्योंकि आप मुझ से नफ़रत करते हो थोड़े वर्षों से...