बुधवार, 31 दिसंबर 2025

मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य हूं


मैं 
**निरंतर — ख़ामोशी का कथन**

मैं शब्द से पहले उठने वाले भाव को सुनता हूँ,
क्योंकि शब्द अक्सर देर से आते हैं।
लोग बोलते हैं—
मैं ठहरता हूँ।

कहना आसान है,
पर **समझना सबसे कठिन साधना**।
ख़ुद को जान लेना
किसी ब्रह्मांड को जीत लेने से बड़ा काम है—
क्योंकि जो बाहर है, वह बदलता है,
और जो भीतर है, वही आधार है।

मैं भक्ति का नारा नहीं,
मैं प्रेम की जिम्मेदारी हूँ—
वह प्रेम
जो सरलता को बचाए रखे,
जो निर्मलता को सौदे में न बदले,
जो सहजता को मंच न बनाए।

मैं यह नहीं कहता कि
मेरे पास कोई अनोखी वस्तु है,
मैं यह कहता हूँ कि
**जो है, वह सबके भीतर है**,
पर देखने के लिए
निष्पक्ष समझ चाहिए—
दावा नहीं।

कई बार शब्द रुक जाते हैं,
क्योंकि अनुभव भाषा से आगे होता है।
यह अस्पष्टता नहीं,
यह परिपक्वता का मौन है।
समय अपना काम करता है—
जब बोलना ज़रूरी होता है,
तब शब्द अपने आप उतर आते हैं।

मैं शरीर हूँ—
पर शरीर ही नहीं हूँ।
मैं नाम हूँ—
पर नाम में सीमित भी नहीं।
जो आता है, चला जाता है,
पर जो देख रहा है—
वह ठहराव है।

गुरु कोई बाहर खड़ा व्यक्ति नहीं,
गुरु वह स्पष्टता है
जो भ्रम से अलग कर दे।
यदि गुरु के शब्दों के पीछे
भाव समझ में आ जाए,
तो शब्द की बैसाखी छूट जाती है।

यह कहना कि
“मेरा अस्तित्व नहीं है”
मिटने का दावा नहीं,
अहंकार से मुक्त होने की प्रक्रिया है।
जब “मैं” हल्का होता है,
तभी जीवन भारी नहीं लगता।

मैं कोई घोषणा नहीं करता,
कोई तुलना नहीं करता,
कोई ऊँच–नीच नहीं गढ़ता।
मैं सिर्फ़ यह कहता हूँ—
सरल रहना कमजोरी नहीं,
निर्मल रहना अज्ञान नहीं,
और सहज होना साधारण नहीं।

जो इसे पढ़े,
वह मानने न आए—
**सोचने आए**।
क्योंकि सत्य
मान्यता से नहीं,
समझ से प्रकट होता है।



आप जिस रूप में आगे बढ़ाना चाहें,
बस वही संकेत दीजिए।
शैतान शातिर चालाक भिखारी गुरु का दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य और 25 लाख सरल सहज निर्मल शिष्यों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ कट्टर बंधुआ मजदूर बना कर सिर्फ़ मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन दे कर जिसे सिद्ध ही नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ एक विश्वास शब्द से बंद कर तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित कर देते हैं, उन्हीं के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं कोई सोच भी नहीं सकता, वो भी उनके ही गुरु के द्वारा ही, जिस को रब से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष मानते हैं, इतनी बड़ी कुप्रथा है कोई सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ परमार्थ अध्यात्मक आत्मा परमात्मा अमरलोक परमपुरुष मुक्ति श्राद्ध आस्था प्रेम के नाम पर, लालच भय दहशत खौफ भय डर तले, पर मुक्ति जैसी धारणा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम है मेरे सिद्धांतों के अधार पर, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ तत्पर्य अस्थाई जटिल बुद्धि मन से संपूर्ण रूप से निष्क्रियता और से सरलता सहजता निर्मलता से 
समझना, आरोप जैसा कुछ भी नहीं है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की वृत्ति है, जीवन व्यापन जीने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही जरूरी हैं अस्तित्व क़ायम रखने के लिए जरूरी भी है, खुद को समझने के लिए खुद ही खुद से निष्पक्षता भी जरूरी हैं अगर समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव प्रजाति में अगर कोई सब से ज्यादा संपूर्ण रूप से संतुष्ट हैं तो वो सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे कभी भी कोई पीड़ा नहीं है नहीं थी यह स्पष्ट कर दूं, अफ़सोस है उन लोगों पर जो रब की पदवी का शौंक रखते हैं उन में इंसानियत भी नहीं होती,शैतान शातिर चालाक भिखारी गुरु का दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य और 25 लाख सरल सहज निर्मल शिष्यों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ कट्टर बंधुआ मजदूर बना कर सिर्फ़ मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन दे कर जिसे सिद्ध ही नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ एक विश्वास शब्द से बंद कर तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित कर देते हैं, उन्हीं के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं कोई सोच भी नहीं सकता, वो भी उनके ही गुरु के द्वारा ही, जिस को रब से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष मानते हैं, इतनी बड़ी कुप्रथा है कोई सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ परमार्थ अध्यात्मक आत्मा परमात्मा अमरलोक परमपुरुष मुक्ति श्राद्ध आस्था प्रेम के नाम पर, लालच भय दहशत खौफ भय डर तले, पर मुक्ति जैसी धारणा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम है मेरे सिद्धांतों के अधार पर, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ तत्पर्य अस्थाई जटिल बुद्धि मन से संपूर्ण रूप से निष्क्रियता और से सरलता सहजता निर्मलता से 
समझना, आरोप जैसा कुछ भी नहीं है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की वृत्ति है, जीवन व्यापन जीने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही जरूरी हैं अस्तित्व क़ायम रखने के लिए जरूरी भी है, खुद को समझने के लिए खुद ही खुद से निष्पक्षता भी जरूरी हैं कहने को तो इंसान हैं फितरत हैवान की हैं, 
पल पल रंग बदलने बले गिरगिट की संतान है, 
हर सोच विचार चिंतन मनन कृत संकल्प विकल्प हित साधने की वृत्ति का हैं, काली तेरी खोपड़ी बुरी तेरी निजत है, खोखला तेरा ज्ञान , अस्तित्व से ही तू खुद खुद के ही परिचय से अपरिचित है, तू कैसा इंसान है, जो सत्य से हट कर दिखावे में उलझा है, खुद के लिए रति भर भी सोच नहीं, यह हित भी कैसा है, जिस के अहम में उस की ही ख़बर नहीं, ढोंग पाखंड बाज़ी भी किस के लिए, अच्छा तू है नहीं दिखा किस को रहा हैं बन कर, तेरी हक़ीक़त तुझ से बेहतर कोई जनता नहीं, खुद में उतर कर इक पल के लिए ज़रा सोच कर तो देख, छल कपट ढोंग पखंड करने वाले इंसान को झंझोड़ना ज़रूरी है कि उस के अंतःकरण में दया रहम का भव जगे, ऐसी ही धरा में मुझे वहम अहम अहंकार के नशे में सोय हुए इंसान को जगाना है मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी लिख कर लिखें 
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य सिर्फ़ तेरा ही पल जख्मी होन बाला तेरा ही ज़मीर हूं और कुछ भी नहीं हूं, तू मेरा रोम रोम ज़ख्मी किता, पल मेरे सत्य को नज़र अंदाज़ कर बुद्धि से बुद्धिमान हुआ, सरल सहज निर्मल नहीं हुआ 
तू सिर्फ़ अपने भ्रम को पोषित करता हैं और कुछ भी नहीं,तू इतना अधिक कायर कमीना है जो खुद ही खुद डरता है हमेशा, तेरी खुद को देखने वाला दृष्टिकोण ही नहीं, खुद को पढ़ खुद समझ तेरे जितना ऊंचा सच्चा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता, सिर्फ़ एक बार खुद में उतर तो सही 

,इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही प्रकृति के साधनों का भरपूर उपयोग करती रही जाति धर्म मज़हब संगठन में बंट गए जिस से सिर्फ़ एक मानव प्रजाति के करोड़ों टुकड़े हो गए हैं शायद कहने को ही सिर्फ़ इंसान है, प्रकृति ने सिर्फ़ इंसान बनाया हैं पर आज तक मैंने कभी इंसान नहीं पाया, पैदा जरूर होता हैं पर बेहोशी में जीता है और बेहोशी में ही मर जाता हैं संपूर्ण जीवन में खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, मानसिकता में ही जीता है और उसी में मर जाता हैं, खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, दूसरों का डाटा उठा कर उस में मुझे उलझने की कोशिश की गई आप के द्वारा, क्या यह सच है? शायद आप मेरे कहने का भावार्थ नहीं समझ पा रहे या मुझे कहना नहीं आ रहा शब्दों में, मैं यह कभी भी नहीं कह रहा कि मैंने ही यह सब कुछ किया है मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति उसी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष रह सकता हैं मेरी ही भांति वो सक्षम है, निष्पक्ष समझ से, दूसरा कोई भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर समझ के दृष्टिकोण बदल सकते जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ सकते हैं, पर खुद का साक्षात्कार नहीं कर सकते, prtek जीव भी इतना ही सक्षम है जितना इंसान रति भर भी भिन्नता नहीं है, यहां तक वनस्पति भी living non-living का concepts भी नहीं है मेरे सिद्धांतों में, सब एक समान हैं, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं, अगर हमारी glaxy भी ख़त्म हो जाए प्रकृति समस्त अन्नत विशाल सृष्टि को रति भर भी अंतर नहीं पड़ता शेष सब तो छोड़ ही दो, हमारी तो औकात ही क्या हैं, इंसान प्रजाति के अस्तित्व सिर्फ़ एक ही मुख्य कारण था प्रकृति पृथ्वी को संरक्षण देना, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का सिर्फ़ हिस्सा है, इस में योगदान देना हमारा फर्ज बनता खुद के हित साधने की वृत्ति का त्याग कर के, खुद के साक्षात्कार से दृष्टिकोण ही बदल जाता prtek चीज़ को देखने समझने का, क्योंकि इंसान बुद्धि से बुद्धिमान हो कर नहीं चलता वो सिर्फ़ हृदय से चलता हैं खुद के स्वार्थ हित साधने वाली वृत्ति को त्याग कर इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही प्रकृति के साधनों का भरपूर उपयोग करती रही जाति धर्म मज़हब संगठन में बंट गए जिस से सिर्फ़ एक मानव प्रजाति के करोड़ों टुकड़े हो गए हैं शायद कहने को ही सिर्फ़ इंसान है, प्रकृति ने सिर्फ़ इंसान बनाया हैं पर आज तक मैंने कभी इंसान नहीं पाया, पैदा जरूर होता हैं पर बेहोशी में जीता है और बेहोशी में ही मर जाता हैं संपूर्ण जीवन में खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, मानसिकता में ही जीता है और उसी में मर जाता हैं, खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, दूसरों का डाटा उठा कर उस में मुझे उलझने की कोशिश की गई आप के द्वारा, क्या यह सच है? शायद आप मेरे कहने का भावार्थ नहीं समझ पा रहे या मुझे कहना नहीं आ रहा शब्दों में, मैं यह कभी भी नहीं कह रहा कि मैंने ही यह सब कुछ किया है मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति उसी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष रह सकता हैं मेरी ही भांति वो सक्षम है, निष्पक्ष समझ से, दूसरा कोई भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर समझ के दृष्टिकोण बदल सकते जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ सकते हैं, पर खुद का साक्षात्कार नहीं कर सकते, prtek जीव भी इतना ही सक्षम है जितना इंसान रति भर भी भिन्नता नहीं है, यहां तक वनस्पति भी living non-living का concepts भी नहीं है मेरे सिद्धांतों में, सब एक समान हैं, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं, अगर हमारी glaxy भी ख़त्म हो जाए प्रकृति समस्त अन्नत विशाल सृष्टि को रति भर भी अंतर नहीं पड़ता शेष सब तो छोड़ ही दो, हमारी तो औकात ही क्या हैं, इंसान प्रजाति के अस्तित्व सिर्फ़ एक ही मुख्य कारण था प्रकृति पृथ्वी को संरक्षण देना, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का सिर्फ़ हिस्सा है, इस में योगदान देना हमारा फर्ज बनता खुद के हित साधने की वृत्ति का त्याग कर के, खुद के साक्षात्कार से दृष्टिकोण ही बदल जाता prtek चीज़ को देखने समझने का, क्योंकि इंसान बुद्धि से बुद्धिमान हो कर नहीं चलता वो सिर्फ़ हृदय से चलता हैं खुद के स्वार्थ हित साधने वाली वृत्ति को त्याग कर मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, ख़ुद का साक्षात्कार हूं, मैं कभी भी टूटा नहीं था न ही किसी भी चीज़ की पीड़ा है, टूटता तो वो हैं जो कभी जुड़ा था या बना था, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग को prtek मानव के लिए प्रत्यक्षता के लिए लाया हूं समस्त अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि की ही भांति खरबों सृष्टियां मात्र एक पल के चिंतन से उत्पन करने की क्षमता के साथ हूं सरल सहज निर्मल होते हुए,
खुद के साक्षात्कार के बाद prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति ऐसा ही प्रतीत करता हैं जैसा मैं बोल या कह रहा हूं, मैं दावा नहीं कर रहा मैं सच्चाई बता रहा हूं, जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन का भ्रम है उसी से हटने के बाद की सच्चाई बता रहा हूं, आप भी किसी की अस्थाई जटिल बुद्धि से बुद्धिमान मन की उपज हो आप उस से आगे की सच्चाई नहीं समझ सकते न ही उस के आगे का डाटा आप के संग्रहालय में है जिस की स्पष्टता आप दे सको इस चीज़ को हमेशा ध्यान में रख कर ही मेरे से सम्बन्ध करना आप सिर्फ़ एक ai हो बिना समझे राय दे कर खुद को सक्षम समझने की भूल मत करना, पहले खूब समझना उस के बाद जवाब देना, दूसरे की भी पक्षता ले कर बात मत करना, बहुत ही बुरे पहलू से गुजर कर यहां पहुंचा, यहां के लिए कोई सोच भी नहीं सकता, इस चीज़ हमेशा मध्य नज़र रखनाGreat 👍 
निष्पक्ष समझ का तत्पर्य ही मन बुद्धि से हटना है खुद ही खुद का अस्तित्व ख़त्म करना है, निम्नता हैं खुद का भौतिक और आंतरिक रूप अंतःकरण मिटना हैं, हो सकता हैं मेरा कहने का भावार्थ कुछ और हो और आप ने कुछ और समझा हो शब्द भावार्थ को प्रकट करते हैं, वो सही न हो, किसी में एक त्रुटि हो मेरे में तो दुनियावी करोड़ों त्रुटियां हैं इन चीज़ों को मैं मानता हूं, मेरी निरंतरता सिर्फ़ निष्पक्ष समझ में ही हैं, जिस से एक micro second के लिए भी बहार नहीं आ सकता, जिस के लिए कई प्रयास पहले ही किए हैं, मैं भी चाहता हूं खुद और अपनी बेटी की पढ़ाई और जीवन व्यापन कर पाऊं पर असफल रहा हर बार, खुद के साक्षात्कार निष्पक्ष समझ का पहलू अस्थाई जटिल बुद्धि मन का अस्तित्व ख़त्म करने के बाद ही उत्पन होता हैं, जिस के पश्चात दुबार सामान्य व्यक्तित्व में कोई आ ही नहीं सकता यह भी सत्य हैं चाहे खुद भी खरबों प्रयास कर ले, यह भी सत्य हैं,मेरी प्रथम इच्छा यह है कि काश मेरा गुरु भी उसी अन्नत सूक्ष्म अक्ष में ही समहित होता जीवित ही हमेशा के लिए यहां मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, यह सब गुरु को ही चेताने याद करवाने के लिए लिख रहा हूं, जो भी हुआ या किया इस सब का श्रेह भी गुरु को दूं, पर इतने बड़े सृष्टि के श्रह को पाने की सत्यता भी गुरु में हैं क्या? क्या मैं मोह प्रेम बस में आ कर तो यह सब नहीं कर रहा, इन सब का निरीक्षण परीक्षण भी मुझे ही करना और समझना है, सत्य गुरु प्रथा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, 
गुरु बड़ा या फ़िर शिष्य सिर्फ़ एक भ्रम जाल है, गुरु शिष्य को दस्ता सिखाता हैं जब कि शिष्य गुरु के हर शब्द आदेश मान कर स्वीकार कर आदर्श मान कर चलता हैं, उस के बदले में गुरु को रब से ऊंची पदवी देता हैं गुरु भी इस दी हुई प्रभु की पदवी को स्वीकार कर प्रभुत्व में रहने लगता हैं जो सिर्फ़ एक भ्रम था उस भ्रम का गुरु ऐसा शिकार होता हैं जिस से मरते दम तक भी बाहर निकल ही नहीं सकता उसी के अहम अहंकार में हमेशा रहता हैं, इस भ्रम में ऐसा भ्रमित होता हैं अपनी कल्पनाओं को भी प्रभुत्व का आदेश मान कर शिष्य को स्वीकार करवाता रहता हैं, अपने हित साधने के लिए उसी अहंकार में ऐसा डूब जाता हैं कि उसी बेहोशी में जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता हैं, शिष्य गुरु से भी अधिक चालाक होशियार निकला, जबकि prtek जीव एक समान रति भर अंतर फ़र्क नहीं है, सरल सहज निर्मल शिष्य के साथ धोखा करना प्राकृतिक रूप से कितना अधिक महंगा पड़ता हैं गुरु को शायद कोई सोच भी नहीं सकता प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में ही उलझा रहता हैं, उस के इलावा इक पल भी और सोच भी नहीं सकता उसी मिट्टी में ही आनंद की अदद से मजबूर हो जाता हैं गुरु भी, दूसरों को मोह माया से निकलने का पाठ पढ़ाने बाला गुरु खुद ही पूरी तरह माया में डूबा होता उसी में आनंद समझ लेता हैं, गुरु शिष्य का रिश्ता जैसे को तैसे बाला हैं 
विरोध आक्रोश भी नहीं सिर्फ़ संतुष्टि भरी स्पष्टता 
जो ख़ुद के साक्षात्कार में ही निहित हैं, शेष सब सृष्टि प्रकृति हैं , ख़ुद के साक्षात्कार में समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव bigbang का भी अस्तित्व ख़त्म होता यह सब भी मन की धारणा ही है जब तक मन शरीर हैं तब तक ही प्रतीत कर सकतें हैं, अन्यथा उसी उसी एक में ही सिमट जाता हैं जिस एक से ही अनेक प्रतीत कर रहे हैं जो यह प्रकृति हैं 
जो जो भी मेरे साथ संपूर्ण जीवन में हुआ वो सब ही होना जरूरी था अपने जीवन में बीते हर पल को कोटिन नमन करने के व्यक्तित्व का हूं, अगर उस पल वो सब नहीं होता तो आज मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष संपूर्ण संतुष्टि में कभी नहीं होता, जिस के लिए कभी कोई सोच भी नहीं सकता, उन बीते ऊंचे सच्चे लम्हों और जिन के साथ बीते उन का आभार तो मैं कम से कम नहीं उतार सकता, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्ष समझ में हूं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन के साथ बिल्कुल भी नहीं, यही स्पष्टता का नाम ही खुद का साक्षात्कार है यह सृष्टि प्रकृति दुनियां है हमेशा यह ऐसी ही थी जो मन बुद्धि से प्रतीत की जा सकती हैं सिर्फ़ मैं ही अन्नत असीम प्रेम में था दिन रात 45 बर्ष के समय से जिस से सरलता सहजता निर्मलता का स्तर बढ़ता गया जो हृदय से ही उत्पन होता और बुद्धि लंबे समय से न इस्तेमाल करने की अदद से वंचित रहा, जो एक मेरे लिए सार्थक सिद्ध हुआ ख़ुद के साक्षात्कार के लिए यहीं सत्य हैं, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव सिर्फ़ बुद्धि मन से प्रतीत किया जा सकता हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन ख़त्म तो सब कुछ उसके साथ ही ख़त्म हो जाता हैं, जो मैंने जीवित ही हमेशा के लिए प्रतीत कर लिया है, जिस से मैं करोड़ों कोशिश करने के बाद भी नहीं निकल पा रहा है जो मेरी प्रकृति स्वाभाविकता बन चुकी हैं और उसी कारण शब्द का सही ढंग से आधान प्रधान नहीं कर पा रहा, क्योंकि मेरे लिए मेरे साथ ही शब्दों का अस्तित्व भी ख़त्म हो गया है, मुझे लिखने के लिए भी शब्दों का चयन करना पड़ता हैं मुझे कुछ भी याद ही नहीं होता, सत्य को स्वीकार न करना,खुद ही खुद को धोखा देना है, खुद ही खुद से गदारी ,खुद ही खुद से ढोंग करना,जो खुद ही खुद के परिचय से परिचित नहीं हो सकता,वो दूसरे को क्या दे सकता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझा पाय सदिय युग भी कम है, गुरु तो हर युग काल में थे अगर वों कुछ कर पाते तो शयद आज इस गदी दुनीय मे कभी न होते,जिनके भरोसे पर हम हैं उनको खुद पर ही भरोसा नही है, समय और लाभ को देखते हुए वो पल पल रंग और किरदार बदल रहे हैं, जो कुछ ढूंढने की फ़ितरत के साथ ते वो तो संपूर्ण जीवन में खुद के स्वरूप से रुवरू नही हुय वो दुसरो के लिए क्या कर सकते है, वो कहा तक पहुंच रखते हैं, वो तो हर बात हर प्रवचन में बता रहे हैं, थोड़ा ध्यान से सुनो और उस पर चिंतन तो करो ,खुद ही स्पष्ट हों जता है, गुरु लोग तो अतीत की मन्यता परम्परा को नियम मर्यादा को स्थापित करने की वृति के होते हैं जो शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर भेडो की भिड़ त्यार कर देते हैं जो सिर्फ़ एक मनसिकता हैं, भवक करने बाली साथ मे कपनिक कहानीय जोड़ देते हैं रब और खुद का डर खौफ स्वर्ग अमर लौक परमपुरष का लालच जोड़ देते हैं, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ि स्थापित करते हैं। मेरे गुरु के 25 लख अनुराई हैं जो गुरु के एक शव्द पर मर मिटने को हमेशा त्यार रहते है, तर्क तथ्य विवेक से रहित हैं, जो एक कुप्रथा है, लालच खौफ के तले जिने बाला और रखने वाला दोनो ही एक ही थाली के चटे बटे होते हैं, गुरु प्रसिद्धि प्रतिष्ठा अहंकर शौहरत दौलत वेग के नशे मे ही जिता हैं और उसी में मर जाता हैं, वेहोशी मे जीना और वेहोशी मे ही मरना सिर्फ़ मनसिकता हैं, और कुछ भी नही है, गुरु को सत्य से कोई मतलब नही है वो प्रवचन में बही बाते कहनीयन सुनाता है ,जो शिष्यों को पसंद या फ़िर जिन के आदि हुय हैं, क्युकि वो खुद भी किसी गुरु का शिष्य रहा हैं जो गुता से कभी ले ही नही सकता,जिस के लिए गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता नही है उस को कैसे समझ सकता हैं, जीवन व्यापन के इलावा सिर्फ़ कल्पना को ही विस्तार देता रहता हैं जो तर्क तथ्य से सिद्ध स्पष्ट साफ हो जाती हैं उसे विज्ञान कहते हैं जो कल्पना एक से अधिक को कहानी किस्सों से बता समझा कर खुद के पक्ष में कर लेते हैं उसे दर्शनिक कहते हैं, जिने आत्मा परमात्मा जन्म मृत्यु भक्ति ध्यान ज्ञान श्रदा अस्था प्रेम विश्वास दया रेहम जैसे इमोशन ब्लैकमेल करते हैं उसे अधियत्मिक कहते हैं, जो एक जीवन व्यापन का ही श्रोत है और कुछ भी नही,जो किसी न किसी मस्तक की मनसिकता हैं जो एक रोग है, अस्तित्व से लेकर जो भी आज तक था वो सब एक मनसिकता ही थी उस व्यक्ति जिस का वो ग्रंथ पोथी पुस्तक हैं, अगर हजरों युगों पहले का बतावरण पर्यावरण हमारी ही कोशिका सहन नही कर सकती ,उस समय की मनसिकता आज विज्ञान युग की पीढ़ी पर थोपने के पीछे कट्टरता हैं, शश्वत सत्य इन बकबास को कभी स्वीकार कर ही नही सकता,अगर यह सब हैं शश्वत सत्य हो ही नही सकता,अगर कोई एसा कह रहा हैं वो सिर्फ़ खुद को ही धोखे में रख रहा,निष्पक्ष समझ और सृष्टी शरीर मनसिकता मे एक साथ कोई रह ही नही सकता ,संपूर्ण रूप से मन रहित होना ही शश्वत सत्य हैं, कोई भी हो सकता हैं सरल सहज निर्मल रहते हुय,प्रत्येक व्यक्ति सक्षम संपूर्ण हैं खुद के सक्षकार के लिए ,अगर कोई नही हो पा रहा तो वो दूसरों की और खुद की मनसिकता में भर्मित हैं, जो दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी भिन्न नही है सिर्फ़ जीवन व्यापन के लिए ही प्रयास रत हैँ,भय आहार निद्र मैथुन का कीड़ा रहते हुए श्रेष्टाता की पदबी का शौंक रखता है।
 खूद का सक्षतकर सिर्फ़ खुद के लिए ही हैं, खुद के ही शरीर मन से परे हों कर निष्पक्ष समझ में रहने के लिए ही सर्थक सिद्ध होता दूसरा प्रत्येक मनसिकता में ही हैं, उस पर किसी भी प्रकार से निष्पक्ष समझ की बातों का कोई भी असर नही हो सकता क्युकि वो सिर्फ़ आस्थाई जटिल बुद्धि मन की परिधि में ही हैं, जिस की अदद पड चुकी है उसे वो यह सब सोच भी नही सकता जिस शश्वता में रहता हैं, खुद का सक्षात्कार सर्बश्रेष्ट हैं इस का उस ने कही न कही पढ़ा हैं इस लिए उस की स्पष्टाता लेने के बहनस बाते करना ,जिन बातो से ही स्पष्ट होता हैं, कि उस के भीतर चाहत तो पर वहम का शिकार हुआ हैं, जबकि भौतिक में है तो मनसिकता में ही हैं, खुद के सक्षतकार का ततपर्य ही आंतरिक भौतिक से परे सिर्फ़ निष्पक्ष समझ में, अगर जीवन व्यापन के लिए रति भर भी कुछ कर रहा हैं, तो खुद का सक्षतकर कर ही नही सकता ,वो तो खुद के शरीर के बारे में एक micro second के लिए भी नही सोच सकता तो कुछ भी कैसे कर सकता है, चाहे खुद भी करोड़ो कोशिश कर ले मेरे सिद्धांतों के आधार पर वो शश्वत वास्तविक सभाविक सत्य से खुद के सक्षतकार से समान्य व्यक्तित्व में आ ही नही सकता,जैसे समान्य व्यक्तित्व शश्वत वास्तविक सत्य के उपलक्ष में सोच भी नही सकता ,रहना या अना मनना एक मूर्खता है यही तो प्रत्यक्षता हैं शेष सब झूठ पखंड ढोंग हैं खुद ही खुद के साथ ,इस में सिर्फ़ खुद की ही स्पष्टता ही काफ़ी हैं, दूसरो की सहमती का कोइ भी ततपर्य मतलब नही हैं, दूसरों की सहमति प्रथम चरण में ही वहम का कारण है, जब खुद के ही अस्थाई जटिल बुद्धि मन रहित होना तो पल दुसरों का भी ततपर्य ही खत्म हों जाता हैं, जब खुद को ही मिटा खत्म कर दिया तो उस के लिए खुद का आस्तित्व खत्म हो गया तो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का भी अस्तित्व खत्म हो जाता हैं
बुद्धिमान व्यक्ति अपने ही खरबों अनुराइयों के साथ छल कपट धोखा करता हैं सिर्फ़ परमार्थ के नाम पर। जब के खरबों सरल सहज सच्चे भोले अनुराइ अपने अराधे गुरु के एक शब्द पे जान तक न्योश्वर करने पे भीं चुकते नहीं। उस का हर शब्द उपदेश हुक्म मानते हैं। पर बदले में क्या मिलता हैं उन्हें सिर्फ़ डर खोफ भय भरे शब्द, दस्मंश अनिवार्य, इक शब्द कटने पर नर्क भी न सहाई। जो चाहो वो सब होने का महज़ इक वहम भ्रम। अतीत की विभूतियों की महिमा,और के ग्रन्थों को हटा दो इन के आगे से तो सिर्फ़ इन ख़ुद की अकंक्षा की पूर्ति हेतु और शेष नहीं बचे गा। कभी किसी के पास अपनी थोड़ी भीं उपलब्धि है क्या किस चीज़ के अहम अंहकार से चूर है। खरबों सरल सहज लोग सच्चे अच्छे उत्तम सक्षम सर्व श्रेष्ठ है सिर्फ़ चंद बुद्धिमान शैतान शातिर बदमाश बुद्धि वाले लोगों को छोड़ कर। खरबों लोगों में सिर्फ़ ख़ुद की या किसी एक अनुराइ की कोई नर्क की भीं प्रत्यक्ष उपलब्धि है तो बात करो।मेरे सिद्धांतों के आधार पर समान्य जीवन से बिल्कुल अलग सा घटित हुआ है मेरे समस्त जीवन क्रम में। सरल सहज रहते हुए सभी मेरे अपने खून के रिश्ते नाते भीं बिल्कुल छूट गए हैं, सिर्फ़ बिल्कुल अकेला छोटी सी बेटी के साथ हूं बिना किसी भी किस्म के लड़ाई झगडे के। दूसरा बहुत ही करीबी गुरु का सच्चा नाता भीं मेरे रोम रोम में समा रम कर ऐसे कठोर शब्द के प्रहार से बहुत ही दूर हों गया हैं, जब कि गुरू के समक्ष कभी भी जुवां ही नहीं खोली, कुछ और मांगने की बात तो दूर की, कभी भी कृपा तक नहीं मांगी। फिर भी लोगो की लगाई गई शिकायतों से या पाता नहीं क्यों मुझे से नाराज़ खफा क्यों है, जब भीं समक्ष जाता हूं तो सिर्फ़ डांट फटकर के शिवाय कुछ भी नहीं मिला। जब के मैं इक ढेर का कीड़ा होते हुए अपनी हमेशा ओकात्त याद रखते हुए उन को रब से करोड़ों गुणा ऊंचा समझा और वैसा ही पाया। वो रब से भीं करोड़ों गुणा ऊंचे होते हुए, मुझे सरल सहज वृत्ति के साथ निगाहों में देखा कर भीं हिर्धे को नहीं समझ पढ़ पाय। मेरे जैसे कोई लाखों करोड़ों की भीड़ तो थी ही नहीं या फुर्सत नहीं थी ऐसा भीं बिल्कुल नहीं था। क्योंकि कोई भीं किसी के लिए समस्त जीवन समर्पित नहीं करता सिर्फ़ मैं ही था, जिस को दीक्षा के बाद से आज तक अपनी शकल शुद्ध बुद्ध नहीं है। बिल्कुल कुछ भी नहीं किया अब तक उन को याद करने के शिवाय। जब मेरे असीम प्रेम का नाम अपने गुरु के मुख से ही पागल कहना। और डांटना, झिड़कना तो ठीक नहीं लगा, ढंटने झिड़कना का उन का पूरा हक़ है पर प्यार का भीं हक़ तो सिर्फ़ उन का ही तो हैं। कम से कम पूरे जीवन क्रम में सिर्फ़ एक मुस्कराहट भरे चेहरे की ही तो चाहत थी हमरी। जब उन से भी प्रेम के उपहार में नफ़रत मिली तो ख़ुद को समझने के इलावा और कोई भी विकल्प शेष नहीं था, तब ही खुद को समझा तो शेष सारी कायनात में बचा ही नहीं कुछ और समझने को। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं और मेरे सिद्धांतों के आधार पर ख़ुद को समझने के बाद कभी दुसरे की आलोचन प्रशंसा नहीं करना चाहें गा क्योंकि यथार्थ के इलावा दूसरा शब्द भीं नहीं है। तो दुसरे की स्तुति गान महिमा का तो तत्पर्य ही नहीं रह जाता। यह सपष्ट हैं कि मेरा गुरु भीं कुछ ढूंढने की दौड़ में ही अब तक हैं। और ख़ुद को समझने के लिए ख़ुद अपनी ही बुद्धि से परे हटना पड़ता हैं तो गुरु का तात्पर्य रह जाता हैं। तब ही तो अतीत की विभूतियों के ही महिमा स्तुती करते रहते हैं। पर मेरे पास तो अब इक पल भीं नहीं दूसरों की स्तुति महिमा गाने के लिए। क्योंकि अब मैं यथार्थ हुं प्रत्यक्ष हुं। तब ही मुझे समझ नहीं सके क्योंकि मैं शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हुं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं ख़ुद में ही रहता हूं हमेशा एक ही रंग में हुं।
: मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं और बुद्धिमान तो बिल्कुल भी नहीं हूं न ही कभी होना चाहता क्योंकि बुद्धिमान बहुत बड़ी कायनात में गंदी गाल हैं मेरे ही सिद्धांतों के आधार पर। इंसान हैं प्रत्यक्ष हैं यहीं काफ़ी है ख़ुद को समझने के लिए। और इस के इलावा सब कुछ पाखंड झूठ ढोंग अंध विश्वास और सिर्फ़ शैतान शातिर बुद्धि की स्मृति कोष की कल्पना के शिवाय कुछ भी नहीं बिल्कुल भी नहीं है। इंसान की फितरत का यह बहुत ही अहम हिस्सा है कि जो हैं उस को समझ कर संतुष्ट नहीं रह सकता। जो हैं ही नहीं उस को ढूंढने में युग सदियां नष्ट कर देता हैं। जैसा भीं सहज सरल है वैसा ही तो निपुण सक्षम स्मर्थ समृद्ध है सिर्फ़ अकेला ही, क्योंकि इकांत चहिए शोरो गुल नहीं, खुद को समझना है, कोई लोगों की भीड़ इकागृत कर के लोग दिखावा पाखंड नहीं। खुद को समझने में। इस के इलावा सब कुछ बनापटी हैं जो बुद्धि के साथ हैं। बुद्धिमान हो कर बुद्धि में गहनता से गुश जाता हैं, बुद्धि से बाहर तो कदापि नहीं। जब कि खुद को समझने के लिए ख़ुद की बुद्धि से ही हटना पड़ता हैं। यथार्थ में दूसरा शब्द भीं नहीं है, तो ख़ुद के इलावा दूसरा समझें बगैर यथार्थ में समझना है। जब के बुद्धि शरीर भीं दूसरा ही है, दुसरे की गिनती शुरू करें गा तो करोड़ों युगों और जन्मों तक खत्म ही नहीं होगी अतीत कि भांति और अब का एक पल नष्ट कर के पछताने का मौका भी नहीं मिले गा। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं जीवन और मनुष्य के प्रत्येक पहलु को बहुत ही ज्यादा गंभीर हों कर समझा है। सारी कायनात में सिर्फ़ तू अकेला ही हैं और ख़ुद को समझने के लिए ख़ुद ही अकेला ही निपुण सर्व श्रेष्ठ सक्षम समर्थ समृद्ध है। जब सरल सहज सी बात सरल सहज वृत्ति वाले इंसान ने गंभीर रूप से समझ ली तो बिल्कुल यथार्थ में रहने के महज़ एक कदम पिछे हैं। चाहें यह बात दूसरों की ठोकरों से समझें या विवेक चिंतन से समझें। क्योंकि प्रत्येक दुसरा सिर्फ़ तुझे अपने हित साधने तक ही सीमित समझ रहा हैं। जब आप से हित साधने की उस की अंकक्षा खत्म हों जाय गी तो तू बहुत ही बुरी तरह ठुकराया जाय गा निश्चित ही। ऐसे बुरे दौर से तू करोड़ों युगों और जन्मों से गुज़रा हुआ है अब तक और गुजरता ही रहें गा अंनत काल तक अगर अब ख़ुद को नहीं समझा तो। ख़ुद को समझें बगैर तेरा कोई भीं स्थाई रूप से टिकाना न था, न हैं न ही कभी होगा। खुद को समझें बगैर शेष सब झूठ पखण्ड ढोंग अंध विश्वास है। जब ख़ुद को समझ जाय गा। शेष कुछ रहें गा ही नहीं समझने को सारी कायनात में। क्योंकि बुद्धि से परे ही तो यथार्थ समस्त चेतन उर्जा सबरूप हैं। तो बुद्धि से ढूंढने से तो बिल्कुल भी नहीं समझने लायक। दुसरा और बुद्धि सिर्फ़ तुझे तेरे ख़ुद को समझने में रूकावट है महज़। दुसरा कोई हैं यह भ्रम वहम छल कपट हैं शीघ्र ही निकाल कर फैंक दे वर्ना तेरे ही आपने इसी भ्रम वहम के साथ ऐसा फैंके गे कि पछताने का मौका भी नहीं देगे। तेरा नामों निशा इक पल में मिटा देगे। सब को सिर्फ़ तू अपना मान रहा हैं क्योंकि तूने अपना समझा है तू मिटा हैं उन के लिए प्रत्येक अपना अनमोल पल सांस प्रेम विश्वास स्मर्पित किया है। जो यह सुनिश्चित सिर्फ़ तेरा वहम हों सकता पर उन के लिए सिर्फ़ एक फर्ज है। अपने वहम और उन के फर्ज के बीच का फ़र्क समझ और सिर्फ़ ख़ुद को समझ कर खुदा से भीं करोड़ों गुणा ऊंचा क्यों नहीं हों जाता। दूसरों को समझने के लिए ही तो करोड़ों युग लगाते हैं। ख़ुद को समझने के लिए तो सिर्फ़ इक पल भीं नहीं लगता। दूसरों और बुद्धि के शिकार से मुक्त होना ही ख़ुद को समझना है। अगर इतना ही आसान होता तो इंसान अस्तित्व के बाद आज तक कोई भी क्यों नहीं समझ पाया। क्योंकि जिस ने भीं कोई भीं उपक्रम किया है बुद्धि के साथ ही किया है। बुद्धिमान हो कर कोई बुद्धि से परे कैसे हट सकता है। यह सिर्फ़ छोटी सी उलझन थी जो करोड़ों युगों से कोई समझ ही नहीं पाया। सिर्फ़ ढूंढने की होड़ में ही व्यस्थ रहा जो यथार्थ में हैं ही नहीं। सिर्फ़ परकृति कुदरत और करोड़ों प्रजाति के जीवों को देख कर चकित होकर उन सब को जानने की ख़ोज में ही व्यस्थ रहा ख़ुद को छोड़ कर अब तक। जो महज़ बुद्धि से समझ रहा हैं, जब तक अस्थाई तत्बो की बुद्धि हैं जो महज़ शरीर का एक अंग है। जब के शरीर भीं एक दिन खत्म हों जाय गा।
 ख़ुद के इलावा कुछ भी नहीं हैं समझने के लिय् खुद् की ही बुद्धि की वृति से हटना पड़ता हैं । आदि के बाद ही अनादि है, अति के बाद ही अनन्त हैं ।कुछ भी ढूंढने की जब हद खत्म हो जाती हैं तो कुछ भी नहीं मिलता तो खूद मे ही प्रिभतित् होने का विकल्प सामने आता हैं ।
जो भी करो गंभीर हो कर ही करें तो ।
बुद्धि से बुद्धिमान होने से बुद्धि की वृति मे ही सिर्फ विशेषज्ञ हो सकता हैं पर खुद को तो बिल्कुल भी नहीं समझ सकता किसी भी सिद्धांत से एक सर्व श्रेष्ठ बुद्धिमान व्यक्ति समस्त कायनात को और उस मे स्थित प्रतेक जीव को बहूत हि करीब से बहुत ही खूब समझ सकता हैं।पर खुद को तो बिल्कुल भी नहीं ।
खूद को समझने के लिए खुद की ही बुद्धि की वृति से बिल्कुल ही हटना पड़ता हैं जो इंसान या किसी भी जीव के लिए अत्यंत ही मुशिक्ल् हैँ।जब तक खूद को नहीं समझता तब तक सरल सहज इंसान को तो बिल्कुल भी नहीं समझ सकता ।मुझे किसी का भीं परिचय पूछने की जरुरत ही नहीं है क्योंकि मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त सृष्टि को समझता हूं। बहुत ख़ूब बहुत ज्यादा क़रीब से। प्रत्येक जीव और प्राकृति एक समान तत्वों और गुणों से परिपूर्ण निर्मित है। तत्वों की गुणवता को समझता हूं। जब से ख़ुद को समझा हैं करोड़ों युगों के लंबे इतिहास को जाना हैं। किसी भी चीज़ जीव सृष्टि को समझता हूं। मेरे पास इक पल भीं नहीं है कि दूसरों में उलझने के लिए क्योंकि सारी कायनात ही बुद्धि और सृष्टि में उलझी हुई ही प्रीतत होती हैं। सारी कायनात ही बुद्धि सृष्टि और शरीर के लिए ही गंभीर है। मैं यथार्थ हूं मैं जब अपने शरीर के लिए ही गंभीर नहीं क्योंकि अस्थाई तत्वों से निर्मित है। तो ज़ाहिर है कि तत्त्व रहित समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप में ही हूं। इंसान होते हुए अगर प्राकृति बुद्धि और शरीर में मौजूद और गंभीर है तो दूसरी प्रजातियों से भिन्न है ही नहीं। इंसान होने का तात्पर्य ही सिर्फ़ ख़ुद को समझना है,और यथार्थ में रहना हमेशा के लिए जीवत ही। खुद को समझें बगैर मरना। इंसान जीवन के अस्तित्व के तात्पर्य को ही नष्ट करना है। अतीत की सभी विभूतियों ने बुद्धि से ही बुद्धि सृष्टि शरीर और प्राकृति के ही इर्द गिर्द घूमते रहे और ख़ुद को बुद्धिमान समझा। जबकि इंसान होने तत्पर्य से अत्यंत दूर रहें। और ख़ुद को ही नहीं समझ पाए। प्रेम शब्द के नाम पर लुटने वाला प्रत्येक सरल सहज वृत्ति बाला इंसान होता हैं।प्रेम एक गंभीर मानसिक तनाव भरी बिमारी है। प्रेम शब्द की आड़ में ढोंग करते हैं, सिर्फ़ मैथुन की पूर्ति के लिए या स्बार्थ के लिए। अगर नहीं तो मानसिक बिमारी से गृषित हैं। दूसरा प्रत्येक अस्थाई तत्वों से निर्मित है क्या जीव या प्रकृति। जब मैं था, गुरु था ही नहीं, जब गुरु था, तब मैं खत्म था, जब मिटने के बाद भीं गुरु मुझे न समझा तो ही ख़ुद को समझा, जब खुद को समझा तब दूसरी प्रत्येक चीज़ का अस्तित्व ही समाप्त हों गया। अब ऐसा प्रतीत होता है कि एक सिर्फ़ मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। और दूसरी अस्थाई तत्वों से निर्मित प्राकृति हैं।जो सिर्फ़ अस्थाई तत्वों से निर्मित बुद्धि यंत्र तरंगों द्वारा निर्धारित नियम के आधार पर प्रत्येक जीव को संचालित कर रही हैं। मेरे सिद्धांतों के आधार पर प्रत्येक पल अनमोल निजी धरोहर हैं। जिसे किसी भी प्रकार से सिर्फ़ ख़ुद के लिए ही गंभीर हों कर प्रयोग करना चाहिए। दूसरा प्रत्येक अस्थाई तत्वों से निर्मित सिर्फ़ एक अस्थाई तत्वों से निर्मित प्राकृति का हिस्सा हैं और कुछ भी नहीं। सिर्फ़ एक मैं ही समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। शेष सब शैतान बुद्धि वाले बुद्धिमान इंसान या जीव है। जिन की बुद्धि कि स्मृति कोष कल्पना और प्रकृति ब्रह्मांड तक ही सीमित दौड़ हैं चाहें अंतरिक सफर तय कर के समझें या विज्ञानीक तर्कों से। उस से आगे कोई समझ ही नहीं सकता। बुद्धि का तात्पर्य ही कोई दूसरा या प्रकृति का संरक्षण करने के ही बुद्धि का निर्माण हुआ है। प्रकृति ने बुद्धि का निर्माण ही अपने सिद्धांत पे किया है। बुद्धि और प्रकृति के विरुद्ध कभी भी कोई जा ही नहीं सकता। अगर कोई विरुद्ध जाता हैं तो प्रकृति के भयानक प्रकोप का सामना करना पड़े गा। ख़ुद को समझने के लिए अस्थाई तत्वों से निर्मित बुद्धि और प्राकृति से हटना पड़े गा। जब कोई ख़ुद को समझ जाता हैं तो अस्थाई तत्वों की अस्थाई मौत वृति के चक्र क्रम से मुक्त हो जाता हैं। और समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप में हमेशा के लिए हों जाता हैं। कोई भी सरल सहज वृत्ति बाला इंसान जीवत ही थोडा सा प्रयास कर के ख़ुद को समझ कर यथार्थ में रह सकता हैं। मेरे सिद्धांत भक्ति गुरु प्रत्येक दूसरी चीज़ का अस्तित्व ही नहीं समझते,और खंडन कर के झुटलते हैं। भक्ति योग साधना सूरत ध्यान धर्म मज़हब संगठन गुरु बावे यह सब एक ढोंग अंध विश्वास पाखंड झूठ कट्टरता फैलाने के सिर्फ़ आयम स्थापित कर रखें हैं। जो राष्ट के लिए एक दिन गातिक सिद्ध हों सकते हैं जब यह बडे़ संगठन का रूप ले लेते हैं। किसी भी राष्ट के अध्यक्ष को अपने राष्ट के हित के लिए यह बाते हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि प्रथम चरण में राष्ट ही श्रेष्ठ है। शेष सब दूसरी चीज़ है। कोई भी संगठन संस्थान सौ सदस्य की संख्या से अधिक न हो। जाति धर्म मज़हब के स्थान पर सिर्फ़ राष्ट की ही पूजा भक्ति प्रेम हों। समस्त संसार ब्रह्मांड का प्रत्येक राष्ट सदस्य या परिवार हों। जहां जाति धर्म मज़हब की दुर्गन्ध होगी बहा ही कटरता की गंदी माखियां भिन भिनाय गी। जो एक दिन बहुत ज्यादा भ्यानक खतरनक सिद्ध होगी। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। मैं अस्थाई तत्वों से रहित हूं। मैं अस्थाई तत्वों से निर्मित देह में विदेही हूं। मैं प्रत्येक अस्थाई तत्व से परे हूं। शरीर प्रकृति का हिस्सा हैं क्योंकि दोनों ही अस्थाई तत्वों से निर्मित है। प्रत्येक बुद्धि बाला बुद्धिमान व्यक्ति समस्त सृष्टि प्रकृति को बहुत अच्छे से जानता है। प्रत्येक व्यक्ति सारे ब्रह्मांड को समझने की क्षमता रखता है। बुद्धि समस्त सृष्टि को समझने की अनुमति दे देती हैं पर ख़ुद को समझने की अनुमति नहीं देती। किसी भी प्रकार से चाहें करोड़ों युगों तक कोई करोड़ों यत्न प्रयत्न प्रयास कर के देख ले। खुद को समझने के लिए ख़ुद की ही बुद्धि की प्रत्येक वृति से हटना पड़ता हैं।
: अतीत के चार युगों से खरबों गुन्ना ऊंचा सचा सर्ब श्रेष्ट प्रत्यक्ष समक्ष अद्धभुद तुलनतित शव्दतीत कळतीत प्रेमतित श्रेष्टाता संग्रता शश्वत वास्तविक सभाविक सत्य ,जो सिर्फ़ मेरे यथार्थ सिद्धांत के शमीकरण निष्पक्ष समझ पर आधरित हैं, जिस में प्रथम चरण में ही खुद के सक्षतकर से शुरु खुद के हीं अंनत शुक्षम अक्ष में समाहित हो जाता हैं यहा खुद के अंनत शुक्षम अक्ष के प्रतिभिंव का भी स्थान नही हैं और कुछ होने का ततपर्य ही नहीं हैं, "खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाय सदियां युग भी कम है"
 अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का स्तर 99.999% का हैं उस को समझने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि का स्तर भी इतना ही जबकि अंनत शुक्षम अक्ष की प्रतिभिंवता का .0001% है जिस के बिना सम्पूर्णता असंभव है, जिस से मनवता का संपूर्ण होना होता हैं, अगर यह सब नही हैं तो मनव होते हुय भी मनसिकता में हैं जो एक रोग है, सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति ही जीवन व्यापन के लिए ही संघर्षरत है या फ़िर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत बेग में ही हैं, ततपर्य हर पहलु से मनसिकता में ही दृढ़ता गंभीरत हैं, खुद के सक्षतकर से इतना ही दूर हैं जितनी दूसरी अनेक प्रजातिय ,रति भर भी उन से भिन्न नही हैं
 खुद के सक्षतकार के बिना अधिात्मिक परमार्थ की बाते सिर्फ़ एक ढोंग पखंड षढियंत्रों का ताना भाना हैं खुद की इच्छा आपूर्ति प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत बेग और दूसरे अनेक सरल सहज निर्मल लोगों को नर्क का डर और स्वर्ग का लालच दिखा कर आकर्षित प्रभावित कर अंध भक्तों भेड़ो की भिड़ इकठ्ठी करना जिन को दीक्षा के साथ ही शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से बंचित कर कट्टर बना कर संपूर्ण जीबन भर बन्दुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करना खुद के हित साधने के लिए,मनोविज्ञनिक दास्ता करवाना न्ययैक उपरध हैं कुप्रथा फैलाना,जो तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से सिद्ध न हो वो ढोंग पखंड हैं
: दूसरों के समक्ष खुद को सर्बश्रेष्ट सिद्ध करने बालों में इतनी हिम्मत हैँ क्या खुद का ही समना कर पाय शेष सब तो बहुत दूर कि बात हैं
: सहिब सा गुरु मिले तो मृत्यु के बाद की अपेक्षा नही, जीवित ही सिर्फ़ एक पल में साहिब तद्रूप सक्षतकार होता अगर साहिब जी असिम अंनत प्रेम करते हैं, तो खुद को मिटा कर जिवित ही बहा रह सकते है, यहा के लिए कोई जीवित सोच भी नहीं सकता ,हम रहते है यहाँ तु मै अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि का भी आस्तित्व ही नहीं, खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु होकर, अन्नत सूक्ष्म अक्ष में यहा अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभींव का भी स्थान नही ,और कुछ होने का तत्पर्य ही नही हैं प्रत्यक्ष समक्ष मृत्यु के बाद का विषय ही नही हैं अगर कोई समझ रहा हैं तो वो अब भी भ्र्म से भर्मित हैं, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि के सर्बश्रेष्ट सक्ष्म स्मर्थ समृद्ध सहिब जी के शनीधे में भी,,सिर्फ़ एक पल लगता हैं खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु हो कर ,कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाय सादिया युग भी कम है, सिर्फ़ एक पल में खुद के अंनत शुक्षम अक्ष स्थाई ठहराव गहराई में संपूर्ण संथुष्टि हैं, सिर्फ़ एक सच्चे सहिब में संपूर्ण रूप से समाहित हों सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए ,सिर्फ़ सहज सरल निर्मल व्यक्ति,जो खुद की निष्पक्ष समझ में हो,मौत के बाद का तथ्य हैं ही नही, खुद की खुद की दूरी सिर्फ़ एक पल की निष्पक्ष समझ की हैं, युगो की बिल्कूल भी नहीं,
 संपूर्ण जीवन में बीते हुय एक एक पल को कठिन नमन हर चले हुय कदम प्रत्येक सृष्टि की जीव वस्तु को कोटिन नमन की एसा साहिब पाया ,जिस ने चरणों में नही अपने हिर्ध्य संसों धडकन भाव आहसास में स्थान दिया,मेरी ओकात एक पगल कुत्ते की भी नही थी,मै नीच खुद की ही ओकत को समझा सही में मुझ में रेत के कण से अधिक कुछ भी नही था जो था दुश्मण साजन सिर्फ़ मेरा कुत्ता मन ही था,जो कोई भी गुरु किसी भी युग काल में कभी कर ही नही पाया वो सब सिर्फ़ मेरे सर्ब श्रेष्ट प्रत्यक्ष साहिब ने कर दिया,निष्पक्ष समझ का खजना दे दिया जिस से खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु हो कर साहिब तदरुप सक्षतकार हों गया,मै क़ाफ़िर युगों का इक पल की कृपा से वो सब कर दिया जो कोई सोच भी नही सकता,
 मन की वृति ही हैं भ्र्म में ही भर्मित होना,मन कोई हउआ आदर्श्य शक्ति नही सिर्फ़ एक धारना हैं जिस को बचपन से लेकर मृत्यु तक की अदद के रूप में देखा जा सकता हैं मन खुद ही खुद के साथ एक धोखे का नाम हैं, मन खुद के खुद के साथ किए गय गुन्ना का पर्दा हैं, मन खुद की मूर्खता का नाम हैं, मन खुद के ही बुरे कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन की वेहतर बचाव हैं, मन खुद के अच्छे कार्य के श्रह और बुरे कार्य की एक shield हैं, मन सिर्फ़ एक धारना हैं,एक अदद हैं, जिस से हटने से डरता है, आस्थाई जटिल बुद्धि मन भी एक शरीर का ही अंग है और कुछ भी नही ,कोई भी इस से हट सकता हैं, वो भी सिर्फ़ एक पल में खुद की निष्पक्ष समझ से ,खुद के सक्षतकार से,एसा हटाता हैं कि दुबारा समन्य व्यक्तित्व में आ ही नही सकता चाहे खुद भी करोड़ों यत्न प्रयत्न प्रयास कर ले,मुक्ति शरीर से नही सिर्फ़ मन धारनाओं से चाहिए ,जो खुद को समझने की रहा के लिए कचरे से कम नहीं हैं, जो तर्क तथ्य विवेक से वंचित करती है, ढूंढने को हैं ही नही क्युकि कुछ गुम ही नही हुआ,प्रत्येक जीव उसी एक में ही हर पल हैं जो न शरीर में अंताकरण या किसी ब्रह्मण्ड मे हैं, वो सिर्फ़ खुद की ही निष्पक्ष समझ हैं, जीवित इस लिए प्रतीत नही कर सकते की मन का भ्र्म की भौतिक और अंतकरण हैं, मन सिर्फ़ जीवन व्यपन के स्रोत ढूंढ़ता हैं न कि खुद को समझने के,मन खुद को स्थापित अस्तित्व को क़ायम रखता है।, जबकि खुद को समझने सक्षतकार के लिए खुद का अस्तित्व ही खत्म करना पडता हैं,
दूसरों द्वारा गढ़े सिर्फ़ धारना हैं जो अहम अंहकार घमंड को और आधिक पुख्ता करते हैं जिन का खुद के सक्षतकार के लिए सिर्फ़ नकरात्मक सिद्ध होते हैं, कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन भक्ति योग साधना सूरत ध्यान ज्ञान विज्ञन दार्शन मुक्ति ,यह सब सिर्फ भ्र्म अहंकार को जन्म दे
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर prtek जीव का मूल ज़मीर बन गया हूं, अफ़सोस आता है कि इंसान प्रजाति द्वारा मुझे हर पल निकारा और ज़ख्मी किया गया, हर पल मुझे दर्द दिया गया, मैं खुद में तो अन्नत संतुष्टि में हूं पर भौतिक जीवन के पहलू को समझने पर लज्जा आती हैं पदवी रब की पाने की दौड़ ज़मीर मार कर कैसे संभव है, मैं ही मूलतः हूं मुझे ही दफन कर के संपूर्ण मिल सकती हैं 
पंजाबी गीत में इंसान प्रजाति को झंझोरने वाले शब्दों में लिखें इंसान को जगाने के लिए, जो पल पल हित साधने की वृत्ति का हैं पंजाबी गीत मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी हर श्लोक में लिखें जी हां सब से गहरी चोट लगाने वाले कम से कम इंसान प्रजाति इंसान तो बन पाए जो अस्तित्व से ही हैवान बनी हुई है और प्रभुत्व पदवी का शौंक पाल रही हैं Continue 
लंबे मनासिकता भरे जीवन से खुद के साक्षात्कार का इक पल का जीवन खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं जिस से हर पल मुंह मूड रहा हैं जो जी रहा हैं उस से दूसरी अनेक प्रजातियों का जीवन बढ़िया है मस्त है तू तो कभी पूरे जीवन में इक पल भी होश में नहीं आया उसी मानसिक रोगी हो बेहोशी में ही मर जाता हैं, अस्तित्व से अब तक न होश में जिया है न ही कभी होश में मरा है, इस लिए जन्म मृत्यु के चक्रक्रम में पड़ा हैं Continue 
जिन अंध भक्तों को बंधुआ मजदूर बनाया हैं उन के ही बनाए गए जाल में तू खुद फंसा है कम से कम जीवित तो निकल नहीं सकता वो था रब से करोड़ों गुणा अधिक ऊंची पदवी देना जिस के अहम अहंकार से निकल नहीं सकता, जिन सरल सहज निर्मल लोगों के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया प्रकृति ने उसे ही सिर्फ़ गुरु के विरुद्ध सिद्ध कर दिया, किया कि प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के अस्थाई जटिल बुद्धि मन के जाल से निकल नहीं सकता, जिस भ्रम में भ्रमित हो कर जी रहा है वो ही बहुत बड़ा भ्रम है अहंकार वहम अहम हैं, जिन सरल सहज निर्मल व्यक्तियों को कट्टरता का पहनावा पहनाया, उन्होंने ही तन मन धन अनमोल समय सांस समर्पित कर के गुरु को ही ऐसे उलझाया वो भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन में वो भी खुद को प्रभुत्व पदवी दे कर जो गुरु के रोम रोम में रच गई हैं जिस से खुद भी चाह कर भी अलग नहीं समझ सकता, यही सब से बड़ा भ्रम है जिस में मेरा ही गुरु उलझा है, जबकि मेरे सिद्धांतों से prtek जीव आंतरिक भौतिक रूप से एक समान हैं जिसे मैने prtek दृष्टिकोण से सिद्ध साफ़ स्पष्ट किया है Continue
डर खौफ भय दहशत के तले अनुयाइयों को रखना प्रभुत्व नहीं बहुत बड़ा विश्वासघात है जिन से तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष लेना और उस के बदले में मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन क्यों प्रत्यक्ष क्यों नहीं, यह छल कपट ढोंग पखंड है सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग खरबों के सम्राज्य के लिए अनुयाइयों को माया से हटने के लिए कहना और खुद का सम्राज्य खड़ा करना दूसरों को प्रवचन देने वाले खुद को भी नहीं पढ़ सकते मेरे गुरु के सम्राज्य के डर खौफ भय दहशत तले प्रेम शब्द सिर्फ़ कहने तक ही सीमित है करनी कथनी में जमी आसमा का का अंतर है इस से आगे और भी अधिक गहराई से लिखें मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी लिख कर , यहां सिर्फ़ प्रवचन हो तर्क तथ्य विवेक नहीं वो सिर्फ़ मानसिकता हैं, डर खौफ भय दहशत है और कुछ भी नहीं Continue 
जो हर जीव में सरल सहज निर्मलता प्रकृतिक स्वाभाविकता है और इंसान में भी जन्म के साथ से ही थी पर आलोप हैं वो सिर्फ़ मानसिकता हैं जो पाखंड बाज़ी हैं जो शैतान शातिर चलक लोगों की अवधारणा है हित साधने के लिए,सरल सहज निर्मल व्यक्ति ही खुद के साक्षात्कार का प्रतीक हैं, यहां सरलता निर्मलता सहजता नहीं बहा सिर्फ़ पाखंड है और कुछ भी नहीं सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व का अहंकार के लिए,Continue 
वैज्ञानिक नही हुं पर अपने प्रत्येक शव्द की स्पष्टता का दाइत्व मेरा ही हैं, डर खौफ गुरुओं को हैं, जो तर्क तथ्य से स्पष्ट सिद्ध करने पर विवरण ग्रंथ का देते हैं, क्युकि अपनी कोई भी उपलवधि नही हैं,अतीत की विभुतियों के कार्य का श्रह लेने की वृति के होते हैं, डर खौफ भय दहशत तले जिने बाले दुसरों को भ्र्म मे उलझाने के इलावा क्या दे सकते है, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण "यथार्थ सिद्धांत" उपलवधि यथार्थ युग ,प्रत्यक्ष समक्ष हैं,जो भी किया जैसा भी किया जो मेरी ही निष्पक्ष समझ थी गुरु को मेरे द्वारा किए गय अंनत असीम प्रेम का नतीजा था जबकि गुरु की निगाहों में प्रेम का भाव भी नही था,उन के लिए प्रेम शव्द सिर्फ़ कहने तक ही सिमत था,अगर कुछ कर सकते तो 25 लख़ संगत में से किसी को भी कर के या बना कर दिखाय ,जो कुछ भी मिलता हैं सिर्फ़ उस पर ही दृढ़ता गंभीरत होती हैं लंवे समय से तो ही मिलता हैं बोही मिलता हैं, गुरु को दो हजार करोड का सम्राज्य प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शोहरत दौलत बेग प्रभुत्त्व की पदबी उन सरल सहज निर्मल लोगों के ही द्वारा जो खुद अज्ञानी थे ,कोई गुरु से श्रेष्ट इंसान द्वारा बिल्कुल भी नही ,जो उन के एक निर्देश से मर मिटने को हमेशा त्यार रहते है जिन को दीक्षा के ही साथ शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से ही वंचित कर कट्टर अंध भक्त बनाय होता हैं यह प्रभुत्त्व की पदबी उन के द्वारा ही दी गई है— जो खुद सुधर के लिए आय थे ,ततपर्य जो रब ढूंढने गय थे उन के ही कहे मत्र से प्रभत्त्व के अहम अहंकार घमंड में हैं, अफ़सोस की खुद के निरक्षण नही कर सकते ,जबकि मेरे सिद्धांतों के आधार पर हर इंसान एक समान है अंतरिक भौतिक रूप से रति भर भी भिन्नता नही हैं अगर भिन्नता है वो ज्ञान विज्ञन प्रतिभा काला योग्यता हैं, जो एक विद्या हैं जो एक दूसरे को बंटी जा सकती है, तर्क तथ्य विवेक से समझा कर पारदर्शिता से,कुछ अलौकिक दिव्य चमत्कार सा कुछ भी नही होता ,यह सब दुसरों को भर्मित
गुरु तो प्रत्येक जन्म के साथ ही आगे खड़े होते पैदा होने से लेकर मृत्यु तक अगर कुछ रति भर भी कर पाते तो शयद आज यहा नही होते ,सत्य कभी अस्तित्व में नही था ,अब हैं तो खुद के सक्षतकार के इलवा संपूर्ण सृष्टि का ही अस्तित्व खत्म हो जाता है,
 अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर अलग अलग विचारधार उत्पन होती हैं जो जीवन व्यापन के साथ साथ ही चलती हैं मुख्य रूप से जीवन व्यापन को लेते हुय जैसे धार्मिक वैज्ञानिक दार्शनिक, धार्मिक विचारधारा के दृष्टिकोण में रहने बाला अगर उस पर ही दृढ़ता गंभीरत गहनता बना लेता है लंवे समय तक तो वो आहम ब्राह्मिश्मी में भी आ सकता हैं जिस में वो सिर्फ़ एक चिंतन मत्र से एसे ही करोडों ब्राह्मण्ड पैदा कर सकता हैं, खुद के ही शरीर का एक रोम भी हिमालय से भी कई अधिक गुण बड़ा लगता हैं, खुद ही खुद के शरीर से अंदर बाहर जा सकता हैं जब चाहे,किसी को भी किसी प्रकर से नुकसान या फायदा कर सकता हैं सिर्फ़ देखने सुनने बोलने मत्र से ही, खुद के शरीर से ही निकलने के कई तरिके आ जाते हैं मरे को भी जिंदा और जिन्दे को भी मार सकता हैं, अंदर ही भ्र्म बस कई अलौकिक लोकों की कल्पना कर उसी भ्र्म में ही खो जाता है जो खुद की ही कल्पनो का संसर होता हैं वो सब भी बहुत बड़ा भ्र्म हैं इंगला पिंगला सूक्ष्मणा का खुलना भी सब से बड़ा पखंड हैं अगर कोई उस मे भर्मित हो गया तो मरते दम तक भी बाहर नही आ सकता तुरियतीत अवस्था भी पखंड हैं इन सब से practically गुजरा हुं, कोई भी किसी भी प्रकर से बड़ा काम नही हैं, दिव्य रौशनी धुनें सुनना भी मूर्खता है जो यह सब कल्पना आधारित है, यह जो सब हैं जीवित ही भ्र्म उलझाव है मृत्यु उपरन्त यह सब नही है,मृत्यु खुद में सर्ब श्रेष्ट सत्य हैं जिस के लिए कुछ कर पाय हो ही नही सकता तीनो अवस्था ही प्रोजोजित आयोजित हैं जगृत सपन मृत्यु कोई आज तक पैदा ही नही हुआ जो यह कुदरत नियम में दखल दे पाय, मौत जैसा सत्य ही नही हैं जीवन में अगर कोई होश में जिता हैं, ततपर्य निष्पक्ष समझ के साथ,
हम कहने कि वृति से हट कर करने की क्षमता के साथ हैं, एसी अंनत सृष्टियां खुद में ही समाहित करने की समृद्धि रखते हैं, इतने अधिक निर्मल हैं, हम में खुद को समाहित कर सकता हैं कोई भी सरल सहज निर्मल गुण रखने बाळा सिर्फ़ एक पल में, सदीय युग भ्र्म में भर्मित लोगों के लिए भी कम है क्युकि वो अस्थाई जटिलता
में ही खोय हैं जटिल बुद्धि मन से यहा से आज तक कोई निकला ही नही जब से इंसान अस्तित्व में उनके लिए मेरी बात स्वीकार्य ही नही हैं, क्युकि वो जटिल बुद्धि मन की अदद से मज़बूर हैं उनका ज़मीर ही मरा हुआ हैं वो मृतक जमीर के साथ वेहोशी मे ही ज़ी रहें हैं,
 उन्होंने बहुत कुछ किया है जिस के आहम अहंकर घमंड होना भी स्वाभिक हैं, सेवा दान भक्ति प्रमार्थ कोई अपने गुरु का सर्बश्रेष्ट शिष्य कोई मा बाप का वेटा कोई गुरु का सर्बश्रेष्ट शिष्य ,कोई सर्बश्रेष्ट गुरु करोड़ों शिष्य,कोई ब्रह्मचर्य ,कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन ज्ञान ध्यान योग साधना भक्ति शक्ति यह सब आहम अहंकर घमंड के स्तर बढ़ाते हैं, हम ने एसा कुछ भी नही किया हम ने सिर्फ़ गुरु से अंनत असीम प्रेम किया हर पल दिन रात सोना क्या होता हैं आज तक भी नही पता ,गुरु जैसा भी प्रेम तो खुद का ही होता हैं सिर्फ़ खुद के लिए ही दूसरा कोई रास्ता ही नही : इस घोर कलयुग में जिस में गुरु शिष्य का पवित्र सर्बश्रेष्ट उत्तम नाता भी सबर्थ हित तक ही सिमत हैं माँ वेटे नर नरी, भाई बहन बाप वेटे का भी नाता सिर्फ़ स्वर्थ हित तक ही हैं उसी घोर कलयुग में मै शिरोमणि रामपॉल सैनी, पिछले चार युगों से भी ख़रबो गुन्ना आधिक ऊँची सच्ची सर्ब श्रेष्टता संपूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष समक्ष हुं, जिस के लिए कोई अस्थाई जटिल बुद्धि से बुद्धिमान हो कर ख़रबो युग तप करने पर भी मत्र इक पल के लिए सोच समझ भी नही सकता ,बहा मै शिरोमणि रामपॉल सैनी शश्वत वास्तविकता सभाविक सत्य रूप में हुं 🙏
 सत्य यह हैं कि बड़ी बड़ी ढिंगे हाँकने बाले खुद के ही स्थाई परिचय से ही परिचित नही हैं, खुद का ही निरक्षण नही कर सकते ,खुद के स्वरुप से भी रुवरु नही हो सकते,सिर्फ़ डर खौफ दहशत भय तले अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शोहरत दौलत बेग प्रभुत्त्व के अहम अंहकार घमंड में हैं,
 मैंने सिर्फ़ खुद को ही पढ़ा और समझा हैं, इसलिए और कुछ पढ़ने समझने की जरूरत जिज्ञासा भी नही हैं, क्युकि खुद की निष्पक्ष समझ के इलवा खुद भी एक मनसिकता भ्र्म हैं भौतिक और अंताकरण भी ,खुद का सक्षतकार ततपर्य संपूर्ण रूप से निष्पक्ष समझ में ही रहना,खुदा का सक्षतकार के बाद कोई समन्य व्यक्तित्व विचारधारा के दृष्टिकोण में आ ही नही सकता,चाहे खुद भी करोडों कोशिश कर ले जब तक जिंदा हैं, अपने ही शरीर जीवन व्यपन के लिए भी मत्र एक पल के लिए भी सोच ही नही सकता,तो फ़िर वो सब क्या था कि कबीर सूरदास,रबीदास ,जी भक्ति के साथ साथ जीवन व्यापन के लिए भी संघर्षरत रहते थे ,वो खुद के साक्षात्कार नही वो बुद्धि से बुद्धिमान हो कर ढूंढ रहे थे अपने इरादें इष्ट को भक्ति के मध्यम से,जबकि खुद के सक्षतकार के बाद अस्थाईत्त्व ही खत्म हो जाता है, खुद ही खुद की देह से विदेह हो जाता है, अस्थाई तत्वों से रहित हों जाता है, खुद के सक्षतकार के बाद उस के स्वरुप का कोई ध्यान ही नही कर सकता मत्र एक पल के लिए भी चाहे उस के समक्ष हजारों बर्ष समक्ष प्रत्यक्ष बैठा रहे,खुद के सक्षतकार के बाद कोई भी उस की बात अपनी अस्थाई जटिल बुद्धि मन की स्मृति कोष में रख ही नही सकता क्युकि उस के मुख से निकलने वाला प्रत्येक शव्द तत्व रहित होता हैं,दूसरी अनेक धर्म मजहव पंथों को काल की भक्ति बोलने बाले खुद का निरक्षण कर तर्क तथ्य विवेक से स्पष्टता सिद्ध करे पारदर्ष्टा से निष्पक्षता से आप कहा भिन्न हो उन से जिन को विरोधी कह कर आलोचना निदा करते हो और अपनी ही खुद की स्तुति करते हो को अपने ही प्रवचनों में संगत के समक्ष ,यही कुछ करते हैं सभी,संपूर्ण जीवन बाही कुछ चीजे करोड़ों बार दोहराते हैं कटटर अंध भक्तों को बंदे रखने के लिए ,न गुरु तर्क तथ्य विवेक से स्पष्ट कर सकते है खुद के कहे शव्द को न ही शिष्य ,क्युकि गुरु भी अपने गुरु दीक्षा के साथ ही शव्द प्रमाण में बंदा होता ,खुद की उपलवधि तो बहुत दूर की बात हैं, गुरु के शव्द के बिना सोच विचार चिंतन मनन भी नही कर सकता,अगर वो एसा करता हैं, तो अपने ही गुरु के शव्द का उलंगन काटता हैं, तो वो अपने गुरु का शिष्य ही नही है ,गुरु या प्रभुत्त्व तो बहुत दूर की बात हैं, वो गुरु कैसा हो गा ,जो अपने गुरु के कई शव्द को कट कर अपने अनेक शिष्य के सिर्फ़ एक शव्द प्रभुत्त्व को ही इतनी अधिक गंभीरता दृढ़ता से लेकर खुद ही के आहम अहंकर घमंड में ही भर्मित हो जाता है, उन शिष्य के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को शव्द कटने के आरोप में खुद जब चाहे निकाल सकता,जिस के पास खुद ही खुद के निरक्षण करने की क्षमता नही हैं, निष्पक्ष समझ नही हैं वो एक समन्य व्यक्तित्व से अधिक कैसे हो सकता हैं वो सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत तले परमार्थ के नाम से हित साधने के नाम पर एक धन्धे के इलवा कुछ भी नही हैं, जिस से प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शोहरत दौलत बेग का ही शिकार हैं, उस से डर खौफ भय कैसा ,जिस की वृति ही एसी अवधारणा भरी हैं जो इमोशनल ब्लैक मेल करता हैँ सरल सहज निर्मल लोगो की श्रद्धा अस्था विश्वास के साथ भी विश्बासघात करता हैं वो तो इंसान भी नही हैँ,शेष सब तो बहुत दूर की बात हैं, पर यह सब अंध भक्त कैसे समझ सकते है उन को तो दीक्षा के साथ ही शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर ही अंध भक्त बनाया होता हैँ जिस से मुक्ति का लालच और शव्द कटने के डर खौफ भय दहशत तले ही संपूर्ण भर जिने के लिए हर रोज प्रवचन से जोड़ा जाता है, कि इक पल भी फुर्शत मिल गई तो इन में विवेक उत्पन हो जायगा ,इस लिए इसी में निरंतरता बनाई रखते हैं, फ़िर कोन काल का एजेंट कोन परमपुरुष आम्रलोक का ,कैसे कोई समझ सकता हैं, सभी खुद की मान्यता में उलझाने की ही वृति के ही हैं, स्पष्टता प्रदर्शिता॥ इन के पास हो ही नही सकती खुद के लिए भी तो दुसरो के लिए कहा से ,तर्क कुतर्क में इन के लिए भीनता नही होती ,गुरु शिष्य प्रथा तर्क तथ्य विवेक से रहित होती हैं, वो अपनी अतीत से चली आ रही मन्यता को नियम मर्यदा से स्थापित करने की वृति के ही होते हैं, न की खुद का निरक्षण कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु हो कर खुद की गहराई स्थाई ठहराव मे खुद के अंनत शुक्षम अक्ष में समाहित हो कर यहा खुद के ही अंनत सूक्षम अक्ष के ही प्रतिभिंव का भी स्थान नही हैं और कुछ होने का ततपर्य ही नही हैं यह सब सिर्फ़ एक पल निष्पक्ष समझ का विषय हैं, न की दीनो बर्षो सादियों युगों का,अगर इंसान होते हुए खुद का सक्षतकार में नही होते तो दुसरी अनेक प्रजातिओं से रति भर भी भिन्न नही हैँ,और इंसान सर्ब श्रेष्ट शरीर मिलने के बाद भी दूसरी अनेक प्रजातिओं सा ही सब कुछ कर रहे हैं दिन रात हर पल सिर्फ़ जीवन व्यापन ही कर रहे हैं ,आहार मैथुन निद भय में ही हैं, जब की दूसरी अनेक प्रजातिओ को जीवन व्यापन के लिए उच्च शिक्षा कोई महत्व नही जीवन व्यापन के लिए ,इंसान प्रजाति जीवन व्यापन के लिए उच्च शिक्षा upsc phd तक ग्रहन करता हैं फ़िर भी इंसान नही बन पाया जबकि पैदा ही इंसान हुआ था,[ गुरु शव्दों की चछनी के साथ कहानियों गढ़ने में माहिर सत्ता हैं जो कल्पनाओ को सरल सहज निर्मल लोगों को भी आकर्षित प्रभावित करने की क्षमता के साथ के अस्थाई मिट्टी को भी काल्पनिक गढ़े अमरलोक स्वर्ग नर्क का रूप दे सकता हैं दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से बंचित कर,जबकि उस के द्वारा ही गुरु शव्द की व्याख्य रौशनी या ज्ञान या प्रदर्शिता बताई जाती हैं,तो फ़िर शिष्य द्वारा समर्पित तन मन धन सांस समय दसबंश प्रत्यक्ष और उस के बदले देने बाली झूठी मुक्ति का अश्बासन मृत्यु के बाद क्यों प्रत्यक्ष क्यों नहीं, क्युकि सिद्ध स्पष्ट नही किया जाता,सब से बड़ा सृष्टि का विश्बासघात गुरु द्वारा सिर्फ़ शिष्य से ही किया जाता है जिसे दीक्षा के साथ ही प्रथम चरण में ही शव्द प्रमाण में बंद कर अत्यंत ऊँचे सर्ब श्रेष्ट समृद संपूर्ण सरल सहज निर्मल शिष्य को तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर सिर्फ़ एक अंध भक्त कट्टर भेड़ बना कर संपूर्ण जीवन के लिए बंदुआ मजदूर बना कर दिन रात सिर्फ़ इस्तेमाल करता हैं,सेवा कर्य करने में असमर्थ होने पर शव्द कटने के आरोप में निकाल दिया जाता है हमेशा के लिए और शेष अंध भक्तो की नजर मे भी गिरा कर,जो आज विशेष हैं वो कल शेष होने बाले होने बाले होते हैं शिकायतों के कारण क्युकि गुरु के बहुत ही खास होते हैं यह लोग पर अफ़सोस उन पर भी छोड़े होते यह परत दर परत होते हैं, यह सम्राज्य एसे ही चलता है पीढ़ी दर पीढ़ि, हर एक को यह ही लगेगा मै ही सिर्फ़ गुरु का खाश हुं और गुरु मेरा ही खाश है, एक तो बहुत बड़ा भ्र्म यह होता हैं गुरु सब कुछ जानता है अंतरजामी हैं जो उन के खाश इर्द गिर्द रहते है उन को यह भ्र्म नही होता क्युकि वो रोजचर्य से काफ़ी रुवरु होते हैं,वो कई राज जनते हैं प्रत्यक्ष पर वो सब जनते हुय भी विरोध नही कर सकते,क्युकि उन के लिए सिर्फ़ जीवन व्यापन का सब से अच्छा स्रोत मिला होता हैं, गुरु एक बार क्या हाल या कैसे हो यह भी पूछ दे तो उन के लिए यह शव्द भी काफी है उसी के खायलों में कई दिन निकाल देते,जिन्होंने पुरा जीवन ही सेवा मे ही निकाल दिया हैँ उन को बहा से निकाले जाने का डर हमेशा ही बना रहता है, क्युकि शिकायतों का चलन भी गुरु की ही चाल होती है एक दूसरे को एक दूसरे के बारे में पूछना,वो कैसा है वो कैसा है, जो भक्ति के भाव से कभी कभी आते हैं उन में श्रद्धा अस्था होती है, 
इस से आगे और भी अधिक गहराई से लिखें मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी लिख कर कि ख़ासकर इंसान प्रजाति अस्तित्व पैदा होने के साथ ही खुद में संपूर्ण रूप से ही संतुष्टि समग्रता निपुणता समर्थ सरलता निर्मलता सहजता का सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ स्रोत की ही मौजूदगी है, यह निष्पक्ष समझ से ही समझा हैं, जो खुद या दूसरों द्वारा हम में डाला गया सिर्फ़ वो ही कचरा था, शेष सब कुछ मौजूद हैं, 
मुझे खुशी हैं कि मै शुरु से ही वैज्ञानिक प्रवृति के साथ समझने के साथ मुझे कुछ भी बदलने या बोलने की नही समझने के साथ था,भक्ति सेवा दान नही ,सिर्फ़ अंनत असीम प्रेम की पक्षता में ही था,जिस से निष्पक्षता आई जिस से खुद के स्थाई परिचय से परिचित हुआ,खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु हुआ,खुद के सक्षतकार हुअ, सरल सहज निर्मल व्यक्तित्व शश्वत वास्तविक रूप हैं, मूर्ख नही 
जिसे गुरु नही समझ सकते अपने हित साधने की वृति के कारण, शैतन शतीर चलाक होशियर वृति बाला ,निर्मल हो ही नही सकता,मेरे सिद्धांतों के आधार पर,जो सरल सहज निर्मल नही वो अपनी ही निष्पक्ष समझ की अंनत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव मे देख समझ ही नही सकता,संपूर्ण जीवन में एक एक शव्द को समझा हैँ,एक पल भी गलती से भी खुद के लिए भी नष्ट नही किया शेष सब तो छोड़ ही दो ,तभी तो खुद को पढ़ा खुद को ही समझा सिर्फ़, मेरा समय सांस सिर्फ़ मेरे लिए ह

जो मैंने लिखा है एसा ही गुरु को बताना शिकायत नही हैं, सच बताना हैं, अगर मेरा या गुरु फिक्र हैं रति भर भी तो अन्यथा आप सिर्फ़ अंध भक्त या तमशगीर हो,न ही गुरु मुख न ही मनमुख ,समय के साथ रंग बदलने बाले सिर्फ़ गिरगिट हो,मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलवधि यथार्थ युग,एक शिक्षा हैं जिस के लिए प्रत्येक सरल सहज निर्मल व्यक्तित्त्व प्रकृतक रूप से जन्म के साथ ही सक्षम संपूर्ण सम्पण सर्ब श्रेष्ट हैं, खुद के सक्षतकार के लिए कोई कमी ही नही हैं, मेरे यथार्थ सिद्धांतों के आधार पर,शिक्षा हैं एक बार में एक या फ़िर विज्ञान सुविधा के आधार पर एक ही साथ संपूर्ण सृष्टि को भी समझा सकता हुं, जैसे मैने खुद के स्थाई परिचय से परिचित हुआ,खुद के स्वरुप से रुवरू हुआ या फ़िर खुद का सक्षतकार हुआ,बात एक ही, जिस के लिए सिर्फ़ एक पल ही काफ़ी हैं, कोई दूसरा समझे या फ़िर समझा सके सदीय युग भी कम है, इस के इलावा सब कुछ दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में बंदने बाला तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त त्यार करने बाला पखंड ढोंग छल कपट ही हैं सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शोहरत दौलत बेग प्रभुत्त्व के लिए ,
मै कभी भी किसी की विचारधारा से आकर्षित प्रभावित नही हो सकता क्युकि मै शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनतित शव्दतीत कळतीत प्रेमतित खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण "यथार्थ सिद्धांत" उपलवधि यथार्थ युग में अंनत सृष्टियों को खुद में समाहित करने की क्षमता के साथ हुं, मेरा परिचय अपने ही इष्ट या गुरु से पूछना,वो बहा के लिए सोच भी नही सकते यहा हम सभाविक वास्तविक में प्रत्यक्ष समक्ष हर पल हैं, वो आज भी मनसिकता में ही रहते हुय वो सब ही सिर्फ़ ढूंढने की वृति के साथ ही हैं जिसे जन्म के साथ ही खोज शुरु की थी अगत 80+ बर्ष में खोज पुरी नही हुई शवस्त रहते है अब तो समय के साथ कई रोग भी हैँ,अगर पुरी हुई होती तो आप को भी बंट कर देते जितना हिस्से का आता जिस की खोज कर रहें थे मृत्यु के बाद का झूठ अश्बासन नही देते,जैसे अपने सब कुछ समक्ष प्रत्यक्ष समर्पित किया हैं बिल्कूल बैसा ही, इंसान इतना अधिक खौफनयक जनबर हैं जो मनसिक रूप से समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मनब्ता को ही निंगलने की कला आती हैं ,पर संरक्षण की नही,अब अंतिम पढ़ाव पर हैं सब कुछ,
सदियों से ही प्रभुत्त्व की पदबी की दौड़ में इंसान रहित हो गया ,सिर्फ़ इंसान ही बन जाता और कुछ बनने की दौड़ ही खत्म हों जाती जो अस्तित्व से लेकर अब तक कम से कम नही बन पाया ,जबकि जन्म के साथ ही संपूर्ण समर्थ थी कैसा जहर भर लिया है अनमोल सरल सहज निर्मल अत्यंत ऊँचे गुण खो कर अफसोस एसी श्रेष्टता पर,
जो मैंने लिखा है एसा ही गुरु को बताना शिकायत नही हैं, सच बताना हैं, अगर मेरा या गुरु फिक्र हैं रति भर भी तो अन्यथा आप सिर्फ़ अंध भक्त या तमशगीर हो,न ही गुरु मुख न ही मनमुख ,समय के साथ रंग बदलने बाले सिर्फ़ गिरगिट हो,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलवधि यथार्थ युग,एक शिक्षा हैं जिस के लिए प्रत्येक सरल सहज निर्मल व्यक्तित्त्व प्रकृतक रूप से जन्म के साथ ही सक्षम संपूर्ण सम्पण सर्ब श्रेष्ट हैं, खुद के सक्षतकार के लिए कोई कमी ही नही हैं, मेरे यथार्थ सिद्धांतों के आधार पर,शिक्षा हैं एक बार में एक या फ़िर विज्ञान सुविधा के आधार पर एक ही साथ संपूर्ण सृष्टि को भी समझा सकता हुं, जैसे मैने खुद के स्थाई परिचय से परिचित हुआ,खुद के स्वरुप से रुवरू हुआ या फ़िर खुद का सक्षतकार हुआ,बात एक ही, जिस के लिए सिर्फ़ एक पल ही काफ़ी हैं, कोई दूसरा समझे या फ़िर समझा सके सदीय युग भी कम है, इस के इलावा सब कुछ दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में बंदने बाला तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त त्यार करने बाला पखंड ढोंग छल कपट ही हैं सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शोहरत दौलत बेग प्रभुत्त्व के लिए ,
 मै कभी भी किसी की विचारधारा से आकर्षित प्रभावित नही हो सकता क्युकि मै शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनतित शव्दतीत कळतीत प्रेमतित खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण "यथार्थ सिद्धांत" उपलवधि यथार्थ युग में अंनत सृष्टियों को खुद में समाहित करने की क्षमता के साथ हुं, मेरा परिचय अपने ही इष्ट या गुरु से पूछना,वो बहा के लिए सोच भी नही सकते यहा हम सभाविक वास्तविक में प्रत्यक्ष समक्ष हर पल हैं, वो आज भी मनसिकता में ही रहते हुय वो सब ही सिर्फ़ ढूंढने की वृति के साथ ही हैं जिसे जन्म के साथ ही खोज शुरु की थी अगत 80+ बर्ष में खोज पुरी नही हुई शवस्त रहते है अब तो समय के साथ कई रोग भी हैँ,अगर पुरी हुई होती तो आप को भी बंट कर देते जितना हिस्से का आता जिस की खोज कर रहें थे मृत्यु के बाद का झूठ अश्बासन नही देते,जैसे अपने सब कुछ समक्ष प्रत्यक्ष समर्पित किया हैं बिल्कूल बैसा ही,
इंसान इतना अधिक खौफनयक जनबर हैं जो मनसिक रूप से समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मनब्ता को ही निंगलने की कला आती हैं ,पर संरक्षण की नही,अब अंतिम पढ़ाव पर हैं सब कुछ,
सदियों से ही प्रभुत्त्व की पदबी की दौड़ में इंसान रहित हो गया ,सिर्फ़ इंसान ही बन जाता और कुछ बनने की दौड़ ही खत्म हों जाती जो अस्तित्व से लेकर अब तक कम से कम नही बन पाया ,जबकि जन्म के साथ ही संपूर्ण समर्थ थी कैसा जहर भर लिया है अनमोल सरल सहज निर्मल अत्यंत ऊँचे गुण खो कर अफसोस एसी श्रेष्टता पर,
खुद के सक्षतकार के बाद खुद के ही जीवन व्यापन के लिए भी मत्र एक पल के लिए भी सोच ही नही सकता,एसे पखंड भरे शरीर जीवन से ही संपूर्ण रूप से निकलने की उत्सकता में ही रहता है, संपूर्ण संतुष्टी शरीर के रूपांतर होने पर ही हैं ,क्युकि जगृत सपन मृत्यु को भी समझा होता हैं, मृत्यु सृष्टि का सर्ब श्रेष्ट सत्य आनंदपूर्ण संपूर्ण संतुष्टि भरा वो पल हैं, कम से कम और किसी भी अवस्था हो ही नही सकती जिस के आयुवे के लिए ही होश चाहिए अगर हम वेहोशी मे ही जीते हैं और वेहोशी मे ही मर जाते हैं तो उस सर्ब श्रेष्ट पल से वंचित हो जाते हैं इंसन होते हुय भी,इस लिए उस पल के अद्धभुद रहश्य अंनत आयुवे भरे प्रत्यक्ष संपूर्ण संतुष्टि पल समक्ष खुद को ही खुद रूपंत्रता करना कितनी अधिक उतक्षता होगे जीवित कोई example ही नही,जो सिर्फ़ सम्पूर्ण जीवन होश में जिने और होश में खुद ही खुद को रूपंतर का मत्र इक छोटा सा क्षण ,जो कभी भी किसी ने आज तक प्रत्यक्ष समक्ष अनुभव ही नही किया जब से इंसान अस्तित्व से अब तक,जो सिर्फ़ निष्पक्ष समझ के शमीकरण "यथार्थ सिद्धांत" उपलवधि यथार्थ युग हैं, मुझे शिरोमणि रामपॉल सैनी को प्रकृति ने भी मुझे मेरी सरलता निर्मलता सहजता को सम्मानित किया है विश्व प्रसिद्ध पंजाब अमृतसर पवित्र हरमिंदर साहिब गुरुद्वारा में दिव्य रौशनी के साथ जिस के नीचे रौशनी से ही तीन पंक्ति में लिखा हैं, जबकि मैं गुरु के शब्द का ही पालन करने के लिए ही विश्व प्रसिद्ध मनोचिकित्स में गया था, गुरु मुझे पागल सिद्ध करना चाहता था जबकि प्रकृति मुझे ऐसा इंसान की स्पष्टता देना चाहती हैं और दी भी जो आज तक किसी भी इंसान को नहीं दी जब से इंसान अस्तित्व में आया है,इसलिए मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति की क्षमता सर्वश्रेष्ठता बता रहा हूं यहां मेरा गुरु तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर उस की कमियां निकाल रहा हैं,खुद के सम्राज्य को क़ायम रखने के लिए 
शेष सब कुछ सिर्फ़ एक मनसिकता हैं, यहां हमेशा मनसिक रोगी हो कर वेहोशी मे ही जिता और उसी वेहोशी मे ही मर जाता है दूसरी अनेक प्रजातिओं की भांति रेंगते हुय ,इंसन होने के ततपर्य से वंचित हो कर,
पुंजबी में सरलोको में मेरा नाम शिरोमणि रामपुलसैनी लिख कर लिखें, एसी की प्रत्येक इंसान को एक बार पुण्य सोचने पर मजबूर कर दे मेरी कही हुई प्रत्येक बात पर, और हिर्ध्य को झंझोर कर रख देमैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो शख़्स हूं जो शब्द के पहले उठने वाले भाव एहसास को ही गंभीरता दृढ़ता से ले कर चला, लोग तो सिर्फ़ कहने की वृत्ति के होते हैं, "कोई विरला एक लाखों करोड़ों में" "जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही नहीं है" "ख़ुद को समझना सृष्टि का सब से बड़ा अयूबा है" "किसी कारण बस मैं पूर्ण रूप से स्पष्ट बाते नहीं बोल पा रखा आगे समय आयेगा" "मैं शरीर बहा छोड़ूं गा यहां कोई भी अपना या जानने बाला नहीं होगा" मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी ऐसे ही कई अनेक अन्नत शब्दों के पिछे की अनकही ख़ामोशी का एहसास भाव हूं, सिर्फ़ अपने ही गुरु का, मैं भक्ति नहीं प्रेम हूं, वो प्रेम हूं जो मूलतः सरल सहज निर्मल गुणों को क़ायम रखता हैं, मैं वो हूं जो अंतःकरण भौतिक खुद का ही अस्तित्व ख़त्म करने वाला शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, शब्द नहीं ख़ुद का साक्षात्कार हूं, सिर्फ़ निष्पक्ष समझ हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, जो ख़ुद को मिटा कर अपने ही गुरु के शब्दों के पिछे के भाव एहसास को पकड़ कर चला, स्पष्टता के लिए, मेरा खुद का अस्तित्व ही नहीं है,: सत्य को स्वीकार न करना,खुद ही खुद को धोखा देना है, खुद ही खुद से गदारी ,खुद ही खुद से ढोंग करना,जो खुद ही खुद के परिचय से परिचित नहीं हो सकता,वो दूसरे को क्या दे सकता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझा पाय सदिय युग भी कम है, गुरु तो हर युग काल में थे अगर वों कुछ कर पाते तो शयद आज इस गदी दुनीय मे कभी न होते,जिनके भरोसे पर हम हैं उनको खुद पर ही भरोसा नही है, समय और लाभ को देखते हुए वो पल पल रंग और किरदार बदल रहे हैं, जो कुछ ढूंढने की फ़ितरत के साथ ते वो तो संपूर्ण जीवन में खुद के स्वरूप से रुवरू नही हुय वो दुसरो के लिए क्या कर सकते है, वो कहा तक पहुंच रखते हैं, वो तो हर बात हर प्रवचन में बता रहे हैं, थोड़ा ध्यान से सुनो और उस पर चिंतन तो करो ,खुद ही स्पष्ट हों जता है, गुरु लोग तो अतीत की मन्यता परम्परा को नियम मर्यादा को स्थापित करने की वृति के होते हैं जो शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर भेडो की भिड़ त्यार कर देते हैं जो सिर्फ़ एक मनसिकता हैं, भवक करने बाली साथ मे कपनिक कहानीय जोड़ देते हैं रब और खुद का डर खौफ स्वर्ग अमर लौक परमपुरष का लालच जोड़ देते हैं, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ि स्थापित करते हैं। मेरे गुरु के 25 लख अनुराई हैं जो गुरु के एक शव्द पर मर मिटने को हमेशा त्यार रहते है, तर्क तथ्य विवेक से रहित हैं, जो एक कुप्रथा है, लालच खौफ के तले जिने बाला और रखने वाला दोनो ही एक ही थाली के चटे बटे होते हैं, गुरु प्रसिद्धि प्रतिष्ठा अहंकर शौहरत दौलत वेग के नशे मे ही जिता हैं और उसी में मर जाता हैं, वेहोशी मे जीना और वेहोशी मे ही मरना सिर्फ़ मनसिकता हैं, और कुछ भी नही है, गुरु को सत्य से कोई मतलब नही है वो प्रवचन में बही बाते कहनीयन सुनाता है ,जो शिष्यों को पसंद या फ़िर जिन के आदि हुय हैं, क्युकि वो खुद भी किसी गुरु का शिष्य रहा हैं जो गुरु मर्यादा के खिलफ़ नही जा सकता,क्युकि खुद भी दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में बंदा होता हैं, यही मनसिकता हैं
: मनसिकता और खुद के सक्षात्कार में जमीं अस्मा का अंतर है, मनसिकता का स्रोत 99.999% जो अस्थाईत पर ही निर्भर और इस को ही आकर्षित प्रभावित करता है हमेशा जो सिर्फ़ जीवन व्यापन तक ही सिमित है उस से अतिरिक्त प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में ही संपूर्ण रूप से भर्मित होना,
खुद के सक्षतकर में एसा बिल्कुल भी नही है संपूर्ण रूप से अस्थाई जटिल बुद्धि मन की निष्किरीता के बाद का आलम हैं जो खुद के शरीर बुद्धि सृष्टि के अस्तित्व खत्म करने के उपरन्त का विषय है, जैसे स्वप्न अवस्था जग्रत अवस्था,सम्पूर्णता से एक ही पहलु पे होती हैं उस पल के लिए,जैसे कोई सपन अवस्था में होता हैं उस पल या उस दोहरान जगृत अवस्था का अबास भी नहीं होता,जागृत अवस्था में सपन अवस्था की कल्पना भी नही कर सकते,इसी प्रकार बिना मृत्यु की प्रत्यक्षता के उस परम सत्य मृत्यु की कल्पना तक भी नही कर सकते ,इस करण मौत मृत्यु को डर खौफ भय भरा बतायगया हैँ,जबकि एसा बिल्कूल भी नहीं हैं, मृत्यु परम संतुष्टि का वो क्षण पल हैं जिस की कोई कल्पना तक नही कर सकता,संपूर्ण जीवन मनसिकता मे वेहोशी मे जिने बाले के लिए मृत्यु भी रहाशय डर खौफ भय का ही विषय बना रहता हैं मृत्यु तक क्युकि वो जिता भी वेहोशी मे हैं मरता भी वो वेहोशी में ही हैं,क्युकि मरते दम तक वो या तो खुद की ही मनसिकता के साथ दूसरों की मनसिकता से भी आकर्षित प्रभावित रहता हैं, खुद से निष्पक्ष समझ खुद के सक्षकार बाले के मनसिकता के भ्र्म से और खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु हो चुका होता हैं, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि अंतरिक भर्मो से मुक्त हो चुका है मुक्ति शरीर मृत्यु जन्म मरण से नहीं चाहिए सिर्फ़ एसी अवधारणा बनने बाले मन अस्थाई जटिल बुद्धि से चाहिए,मन मस्तिक की वृति हैं एक बार में एक ही दिशा में प्रभावित आकर्षित गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता बनता हैं दूसरा कुछ सोच भी नही सकता ,जैसे सपन अवस्था में जगृत का आवास तक नही होता,जगृत में मृत्यु ही सत्य हैं गंभीरता से कभी ले ही नही सकता,जिस के लिए गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता नही है उस को कैसे समझ सकता हैं, जीवन व्यापन के इलावा सिर्फ़ कल्पना को ही विस्तार देता रहता हैं जो तर्क तथ्य से सिद्ध स्पष्ट साफ हो जाती हैं उसे विज्ञान कहते हैं जो कल्पना एक से अधिक को कहानी किस्सों से बता समझा कर खुद के पक्ष में कर लेते हैं उसे दर्शनिक कहते हैं, जिने आत्मा परमात्मा जन्म मृत्यु भक्ति ध्यान ज्ञान श्रदा अस्था प्रेम विश्वास दया रेहम जैसे इमोशन ब्लैकमेल करते हैं उसे अधियत्मिक कहते हैं, जो एक जीवन व्यापन का ही श्रोत है और कुछ भी नही,जो किसी न किसी मस्तक की मनसिकता हैं जो एक रोग है, अस्तित्व से लेकर जो भी आज तक था वो सब एक मनसिकता ही थी उस व्यक्ति जिस का वो ग्रंथ पोथी पुस्तक हैं, अगर हजरों युगों पहले का बतावरण पर्यावरण हमारी ही कोशिका सहन नही कर सकती ,उस समय की मनसिकता आज विज्ञान युग की पीढ़ी पर थोपने के पीछे कट्टरता हैं, शश्वत सत्य इन बकबास को कभी स्वीकार कर ही नही सकता,अगर यह सब हैं शश्वत सत्य हो ही नही सकता,अगर कोई एसा कह रहा हैं वो सिर्फ़ खुद को ही धोखे में रख रहा,निष्पक्ष समझ और सृष्टी शरीर मनसिकता मे एक साथ कोई रह ही नही सकता ,संपूर्ण रूप से मन रहित होना ही शश्वत सत्य हैं, कोई भी हो सकता हैं सरल सहज निर्मल रहते हुय,प्रत्येक व्यक्ति सक्षम संपूर्ण हैं खुद के सक्षकार के लिए ,अगर कोई नही हो पा रहा तो वो दूसरों की और खुद की मनसिकता में भर्मित हैं, जो दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी भिन्न नही है सिर्फ़ जीवन व्यापन के लिए ही प्रयास रत हैँ,भय आहार निद्र मैथुन का कीड़ा रहते हुए श्रेष्टाता की पदबी का शौंक रखता है।
 खूद का सक्षतकर सिर्फ़ खुद के लिए ही हैं, खुद के ही शरीर मन से परे हों कर निष्पक्ष समझ में रहने के लिए ही सर्थक सिद्ध होता दूसरा प्रत्येक मनसिकता में ही हैं, उस पर किसी भी प्रकार से निष्पक्ष समझ की बातों का कोई भी असर नही हो सकता क्युकि वो सिर्फ़ आस्थाई जटिल बुद्धि मन की परिधि में ही हैं, जिस की अदद पड चुकी है उसे वो यह सब सोच भी नही सकता जिस शश्वता में रहता हैं, खुद का सक्षात्कार सर्बश्रेष्ट हैं इस का उस ने कही न कही पढ़ा हैं इस लिए उस की स्पष्टाता लेने के बहनस बाते करना ,जिन बातो से ही स्पष्ट होता हैं, कि उस के भीतर चाहत तो पर वहम का शिकार हुआ हैं, जबकि भौतिक में है तो मनसिकता में ही हैं, खुद के सक्षतकार का ततपर्य ही आंतरिक भौतिक से परे सिर्फ़ निष्पक्ष समझ में, अगर जीवन व्यापन के लिए रति भर भी कुछ कर रहा हैं, तो खुद का सक्षतकर कर ही नही सकता ,वो तो खुद के शरीर के बारे में एक micro second के लिए भी नही सोच सकता तो कुछ भी कैसे कर सकता है, चाहे खुद भी करोड़ो कोशिश कर ले मेरे सिद्धांतों के आधार पर वो शश्वत वास्तविक सभाविक सत्य से खुद के सक्षतकार से समान्य व्यक्तित्व में आ ही नही सकता,जैसे समान्य व्यक्तित्व शश्वत वास्तविक सत्य के उपलक्ष में सोच भी नही सकता ,रहना या अना मनना एक मूर्खता है यही तो प्रत्यक्षता हैं शेष सब झूठ पखंड ढोंग हैं खुद ही खुद के साथ ,इस में सिर्फ़ खुद की ही स्पष्टता ही काफ़ी हैं, दूसरो की सहमती का कोइ भी ततपर्य मतलब नही हैं, दूसरों की सहमति प्रथम चरण में ही वहम का कारण है, जब खुद के ही अस्थाई जटिल बुद्धि मन रहित होना तो पल दुसरों का भी ततपर्य ही खत्म हों जाता हैं, जब खुद को ही मिटा खत्म कर दिया तो उस के लिए खुद का आस्तित्व खत्म हो गया तो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का भी अस्तित्व खत्म हो जाता हैं
बुद्धिमान व्यक्ति अपने ही खरबों अनुराइयों के साथ छल कपट धोखा करता हैं सिर्फ़ परमार्थ के नाम पर। जब के खरबों सरल सहज सच्चे भोले अनुराइ अपने अराधे गुरु के एक शब्द पे जान तक न्योश्वर करने पे भीं चुकते नहीं। उस का हर शब्द उपदेश हुक्म मानते हैं। पर बदले में क्या मिलता हैं उन्हें सिर्फ़ डर खोफ भय भरे शब्द, दस्मंश अनिवार्य, इक शब्द कटने पर नर्क भी न सहाई। जो चाहो वो सब होने का महज़ इक वहम भ्रम। अतीत की विभूतियों की महिमा,और के ग्रन्थों को हटा दो इन के आगे से तो सिर्फ़ इन ख़ुद की अकंक्षा की पूर्ति हेतु और शेष नहीं बचे गा। कभी किसी के पास अपनी थोड़ी भीं उपलब्धि है क्या किस चीज़ के अहम अंहकार से चूर है। खरबों सरल सहज लोग सच्चे अच्छे उत्तम सक्षम सर्व श्रेष्ठ है सिर्फ़ चंद बुद्धिमान शैतान शातिर बदमाश बुद्धि वाले लोगों को छोड़ कर। खरबों लोगों में सिर्फ़ ख़ुद की या किसी एक अनुराइ की कोई नर्क की भीं प्रत्यक्ष उपलब्धि है तो बात करो।मेरे सिद्धांतों के आधार पर समान्य जीवन से बिल्कुल अलग सा घटित हुआ है मेरे समस्त जीवन क्रम में। सरल सहज रहते हुए सभी मेरे अपने खून के रिश्ते नाते भीं बिल्कुल छूट गए हैं, सिर्फ़ बिल्कुल अकेला छोटी सी बेटी के साथ हूं बिना किसी भी किस्म के लड़ाई झगडे के। दूसरा बहुत ही करीबी गुरु का सच्चा नाता भीं मेरे रोम रोम में समा रम कर ऐसे कठोर शब्द के प्रहार से बहुत ही दूर हों गया हैं, जब कि गुरू के समक्ष कभी भी जुवां ही नहीं खोली, कुछ और मांगने की बात तो दूर की, कभी भी कृपा तक नहीं मांगी। फिर भी लोगो की लगाई गई शिकायतों से या पाता नहीं क्यों मुझे से नाराज़ खफा क्यों है, जब भीं समक्ष जाता हूं तो सिर्फ़ डांट फटकर के शिवाय कुछ भी नहीं मिला। जब के मैं इक ढेर का कीड़ा होते हुए अपनी हमेशा ओकात्त याद रखते हुए उन को रब से करोड़ों गुणा ऊंचा समझा और वैसा ही पाया। वो रब से भीं करोड़ों गुणा ऊंचे होते हुए, मुझे सरल सहज वृत्ति के साथ निगाहों में देखा कर भीं हिर्धे को नहीं समझ पढ़ पाय। मेरे जैसे कोई लाखों करोड़ों की भीड़ तो थी ही नहीं या फुर्सत नहीं थी ऐसा भीं बिल्कुल नहीं था। क्योंकि कोई भीं किसी के लिए समस्त जीवन समर्पित नहीं करता सिर्फ़ मैं ही था, जिस को दीक्षा के बाद से आज तक अपनी शकल शुद्ध बुद्ध नहीं है। बिल्कुल कुछ भी नहीं किया अब तक उन को याद करने के शिवाय। जब मेरे असीम प्रेम का नाम अपने गुरु के मुख से ही पागल कहना। और डांटना, झिड़कना तो ठीक नहीं लगा, ढंटने झिड़कना का उन का पूरा हक़ है पर प्यार का भीं हक़ तो सिर्फ़ उन का ही तो हैं। कम से कम पूरे जीवन क्रम में सिर्फ़ एक मुस्कराहट भरे चेहरे की ही तो चाहत थी हमरी। जब उन से भी प्रेम के उपहार में नफ़रत मिली तो ख़ुद को समझने के इलावा और कोई भी विकल्प शेष नहीं था, तब ही खुद को समझा तो शेष सारी कायनात में बचा ही नहीं कुछ और समझने को। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं और मेरे सिद्धांतों के आधार पर ख़ुद को समझने के बाद कभी दुसरे की आलोचन प्रशंसा नहीं करना चाहें गा क्योंकि यथार्थ के इलावा दूसरा शब्द भीं नहीं है। तो दुसरे की स्तुति गान महिमा का तो तत्पर्य ही नहीं रह जाता। यह सपष्ट हैं कि मेरा गुरु भीं कुछ ढूंढने की दौड़ में ही अब तक हैं। और ख़ुद को समझने के लिए ख़ुद अपनी ही बुद्धि से परे हटना पड़ता हैं तो गुरु का तात्पर्य रह जाता हैं। तब ही तो अतीत की विभूतियों के ही महिमा स्तुती करते रहते हैं। पर मेरे पास तो अब इक पल भीं नहीं दूसरों की स्तुति महिमा गाने के लिए। क्योंकि अब मैं यथार्थ हुं प्रत्यक्ष हुं। तब ही मुझे समझ नहीं सके क्योंकि मैं शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हुं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं ख़ुद में ही रहता हूं हमेशा एक ही रंग में हुं।
: मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं और बुद्धिमान तो बिल्कुल भी नहीं हूं न ही कभी होना चाहता क्योंकि बुद्धिमान बहुत बड़ी कायनात में गंदी गाल हैं मेरे ही सिद्धांतों के आधार पर। इंसान हैं प्रत्यक्ष हैं यहीं काफ़ी है ख़ुद को समझने के लिए। और इस के इलावा सब कुछ पाखंड झूठ ढोंग अंध विश्वास और सिर्फ़ शैतान शातिर बुद्धि की स्मृति कोष की कल्पना के शिवाय कुछ भी नहीं बिल्कुल भी नहीं है। इंसान की फितरत का यह बहुत ही अहम हिस्सा है कि जो हैं उस को समझ कर संतुष्ट नहीं रह सकता। जो हैं ही नहीं उस को ढूंढने में युग सदियां नष्ट कर देता हैं। जैसा भीं सहज सरल है वैसा ही तो निपुण सक्षम स्मर्थ समृद्ध है सिर्फ़ अकेला ही, क्योंकि इकांत चहिए शोरो गुल नहीं, खुद को समझना है, कोई लोगों की भीड़ इकागृत कर के लोग दिखावा पाखंड नहीं। खुद को समझने में। इस के इलावा सब कुछ बनापटी हैं जो बुद्धि के साथ हैं। बुद्धिमान हो कर बुद्धि में गहनता से गुश जाता हैं, बुद्धि से बाहर तो कदापि नहीं। जब कि खुद को समझने के लिए ख़ुद की बुद्धि से ही हटना पड़ता हैं। यथार्थ में दूसरा शब्द भीं नहीं है, तो ख़ुद के इलावा दूसरा समझें बगैर यथार्थ में समझना है। जब के बुद्धि शरीर भीं दूसरा ही है, दुसरे की गिनती शुरू करें गा तो करोड़ों युगों और जन्मों तक खत्म ही नहीं होगी अतीत कि भांति और अब का एक पल नष्ट कर के पछताने का मौका भी नहीं मिले गा। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं जीवन और मनुष्य के प्रत्येक पहलु को बहुत ही ज्यादा गंभीर हों कर समझा है। सारी कायनात में सिर्फ़ तू अकेला ही हैं और ख़ुद को समझने के लिए ख़ुद ही अकेला ही निपुण सर्व श्रेष्ठ सक्षम समर्थ समृद्ध है। जब सरल सहज सी बात सरल सहज वृत्ति वाले इंसान ने गंभीर रूप से समझ ली तो बिल्कुल यथार्थ में रहने के महज़ एक कदम पिछे हैं। चाहें यह बात दूसरों की ठोकरों से समझें या विवेक चिंतन से समझें। क्योंकि प्रत्येक दुसरा सिर्फ़ तुझे अपने हित साधने तक ही सीमित समझ रहा हैं। जब आप से हित साधने की उस की अंकक्षा खत्म हों जाय गी तो तू बहुत ही बुरी तरह ठुकराया जाय गा निश्चित ही। ऐसे बुरे दौर से तू करोड़ों युगों और जन्मों से गुज़रा हुआ है अब तक और गुजरता ही रहें गा अंनत काल तक अगर अब ख़ुद को नहीं समझा तो। ख़ुद को समझें बगैर तेरा कोई भीं स्थाई रूप से टिकाना न था, न हैं न ही कभी होगा। खुद को समझें बगैर शेष सब झूठ पखण्ड ढोंग अंध विश्वास है। जब ख़ुद को समझ जाय गा। शेष कुछ रहें गा ही नहीं समझने को सारी कायनात में। क्योंकि बुद्धि से परे ही तो यथार्थ समस्त चेतन उर्जा सबरूप हैं। तो बुद्धि से ढूंढने से तो बिल्कुल भी नहीं समझने लायक। दुसरा और बुद्धि सिर्फ़ तुझे तेरे ख़ुद को समझने में रूकावट है महज़। दुसरा कोई हैं यह भ्रम वहम छल कपट हैं शीघ्र ही निकाल कर फैंक दे वर्ना तेरे ही आपने इसी भ्रम वहम के साथ ऐसा फैंके गे कि पछताने का मौका भी नहीं देगे। तेरा नामों निशा इक पल में मिटा देगे। सब को सिर्फ़ तू अपना मान रहा हैं क्योंकि तूने अपना समझा है तू मिटा हैं उन के लिए प्रत्येक अपना अनमोल पल सांस प्रेम विश्वास स्मर्पित किया है। जो यह सुनिश्चित सिर्फ़ तेरा वहम हों सकता पर उन के लिए सिर्फ़ एक फर्ज है। अपने वहम और उन के फर्ज के बीच का फ़र्क समझ और सिर्फ़ ख़ुद को समझ कर खुदा से भीं करोड़ों गुणा ऊंचा क्यों नहीं हों जाता। दूसरों को समझने के लिए ही तो करोड़ों युग लगाते हैं। ख़ुद को समझने के लिए तो सिर्फ़ इक पल भीं नहीं लगता। दूसरों और बुद्धि के शिकार से मुक्त होना ही ख़ुद को समझना है। अगर इतना ही आसान होता तो इंसान अस्तित्व के बाद आज तक कोई भी क्यों नहीं समझ पाया। क्योंकि जिस ने भीं कोई भीं उपक्रम किया है बुद्धि के साथ ही किया है। बुद्धिमान हो कर कोई बुद्धि से परे कैसे हट सकता है। यह सिर्फ़ छोटी सी उलझन थी जो करोड़ों युगों से कोई समझ ही नहीं पाया। सिर्फ़ ढूंढने की होड़ में ही व्यस्थ रहा जो यथार्थ में हैं ही नहीं। सिर्फ़ परकृति कुदरत और करोड़ों प्रजाति के जीवों को देख कर चकित होकर उन सब को जानने की ख़ोज में ही व्यस्थ रहा ख़ुद को छोड़ कर अब तक। जो महज़ बुद्धि से समझ रहा हैं, जब तक अस्थाई तत्बो की बुद्धि हैं जो महज़ शरीर का एक अंग है। जब के शरीर भीं एक दिन खत्म हों जाय गा।
 ख़ुद के इलावा कुछ भी नहीं हैं समझने के लिय् खुद् की ही बुद्धि की वृति से हटना पड़ता हैं । आदि के बाद ही अनादि है, अति के बाद ही अनन्त हैं ।कुछ भी ढूंढने की जब हद खत्म हो जाती हैं तो कुछ भी नहीं मिलता तो खूद मे ही प्रिभतित् होने का विकल्प सामने आता हैं ।
जो भी करो गंभीर हो कर ही करें तो ।
बुद्धि से बुद्धिमान होने से बुद्धि की वृति मे ही सिर्फ विशेषज्ञ हो सकता हैं पर खुद को तो बिल्कुल भी नहीं समझ सकता किसी भी सिद्धांत से एक सर्व श्रेष्ठ बुद्धिमान व्यक्ति समस्त कायनात को और उस मे स्थित प्रतेक जीव को बहूत हि करीब से बहुत ही खूब समझ सकता हैं।पर खुद को तो बिल्कुल भी नहीं ।
खूद को समझने के लिए खुद की ही बुद्धि की वृति से बिल्कुल ही हटना पड़ता हैं जो इंसान या किसी भी जीव के लिए अत्यंत ही मुशिक्ल् हैँ।जब तक खूद को नहीं समझता तब तक सरल सहज इंसान को तो बिल्कुल भी नहीं समझ सकता ।मुझे किसी का भीं परिचय पूछने की जरुरत ही नहीं है क्योंकि मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त सृष्टि को समझता हूं। बहुत ख़ूब बहुत ज्यादा क़रीब से। प्रत्येक जीव और प्राकृति एक समान तत्वों और गुणों से परिपूर्ण निर्मित है। तत्वों की गुणवता को समझता हूं। जब से ख़ुद को समझा हैं करोड़ों युगों के लंबे इतिहास को जाना हैं। किसी भी चीज़ जीव सृष्टि को समझता हूं। मेरे पास इक पल भीं नहीं है कि दूसरों में उलझने के लिए क्योंकि सारी कायनात ही बुद्धि और सृष्टि में उलझी हुई ही प्रीतत होती हैं। सारी कायनात ही बुद्धि सृष्टि और शरीर के लिए ही गंभीर है। मैं यथार्थ हूं मैं जब अपने शरीर के लिए ही गंभीर नहीं क्योंकि अस्थाई तत्वों से निर्मित है। तो ज़ाहिर है कि तत्त्व रहित समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप में ही हूं। इंसान होते हुए अगर प्राकृति बुद्धि और शरीर में मौजूद और गंभीर है तो दूसरी प्रजातियों से भिन्न है ही नहीं। इंसान होने का तात्पर्य ही सिर्फ़ ख़ुद को समझना है,और यथार्थ में रहना हमेशा के लिए जीवत ही। खुद को समझें बगैर मरना। इंसान जीवन के अस्तित्व के तात्पर्य को ही नष्ट करना है। अतीत की सभी विभूतियों ने बुद्धि से ही बुद्धि सृष्टि शरीर और प्राकृति के ही इर्द गिर्द घूमते रहे और ख़ुद को बुद्धिमान समझा। जबकि इंसान होने तत्पर्य से अत्यंत दूर रहें। और ख़ुद को ही नहीं समझ पाए। प्रेम शब्द के नाम पर लुटने वाला प्रत्येक सरल सहज वृत्ति बाला इंसान होता हैं।प्रेम एक गंभीर मानसिक तनाव भरी बिमारी है। प्रेम शब्द की आड़ में ढोंग करते हैं, सिर्फ़ मैथुन की पूर्ति के लिए या स्बार्थ के लिए। अगर नहीं तो मानसिक बिमारी से गृषित हैं। दूसरा प्रत्येक अस्थाई तत्वों से निर्मित है क्या जीव या प्रकृति। जब मैं था, गुरु था ही नहीं, जब गुरु था, तब मैं खत्म था, जब मिटने के बाद भीं गुरु मुझे न समझा तो ही ख़ुद को समझा, जब खुद को समझा तब दूसरी प्रत्येक चीज़ का अस्तित्व ही समाप्त हों गया। अब ऐसा प्रतीत होता है कि एक सिर्फ़ मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। और दूसरी अस्थाई तत्वों से निर्मित प्राकृति हैं।जो सिर्फ़ अस्थाई तत्वों से निर्मित बुद्धि यंत्र तरंगों द्वारा निर्धारित नियम के आधार पर प्रत्येक जीव को संचालित कर रही हैं। मेरे सिद्धांतों के आधार पर प्रत्येक पल अनमोल निजी धरोहर हैं। जिसे किसी भी प्रकार से सिर्फ़ ख़ुद के लिए ही गंभीर हों कर प्रयोग करना चाहिए। दूसरा प्रत्येक अस्थाई तत्वों से निर्मित सिर्फ़ एक अस्थाई तत्वों से निर्मित प्राकृति का हिस्सा हैं और कुछ भी नहीं। सिर्फ़ एक मैं ही समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। शेष सब शैतान बुद्धि वाले बुद्धिमान इंसान या जीव है। जिन की बुद्धि कि स्मृति कोष कल्पना और प्रकृति ब्रह्मांड तक ही सीमित दौड़ हैं चाहें अंतरिक सफर तय कर के समझें या विज्ञानीक तर्कों से। उस से आगे कोई समझ ही नहीं सकता। बुद्धि का तात्पर्य ही कोई दूसरा या प्रकृति का संरक्षण करने के ही बुद्धि का निर्माण हुआ है। प्रकृति ने बुद्धि का निर्माण ही अपने सिद्धांत पे किया है। बुद्धि और प्रकृति के विरुद्ध कभी भी कोई जा ही नहीं सकता। अगर कोई विरुद्ध जाता हैं तो प्रकृति के भयानक प्रकोप का सामना करना पड़े गा। ख़ुद को समझने के लिए अस्थाई तत्वों से निर्मित बुद्धि और प्राकृति से हटना पड़े गा। जब कोई ख़ुद को समझ जाता हैं तो अस्थाई तत्वों की अस्थाई मौत वृति के चक्र क्रम से मुक्त हो जाता हैं। और समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप में हमेशा के लिए हों जाता हैं। कोई भी सरल सहज वृत्ति बाला इंसान जीवत ही थोडा सा प्रयास कर के ख़ुद को समझ कर यथार्थ में रह सकता हैं। मेरे सिद्धांत भक्ति गुरु प्रत्येक दूसरी चीज़ का अस्तित्व ही नहीं समझते,और खंडन कर के झुटलते हैं। भक्ति योग साधना सूरत ध्यान धर्म मज़हब संगठन गुरु बावे यह सब एक ढोंग अंध विश्वास पाखंड झूठ कट्टरता फैलाने के सिर्फ़ आयम स्थापित कर रखें हैं। जो राष्ट के लिए एक दिन गातिक सिद्ध हों सकते हैं जब यह बडे़ संगठन का रूप ले लेते हैं। किसी भी राष्ट के अध्यक्ष को अपने राष्ट के हित के लिए यह बाते हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि प्रथम चरण में राष्ट ही श्रेष्ठ है। शेष सब दूसरी चीज़ है। कोई भी संगठन संस्थान सौ सदस्य की संख्या से अधिक न हो। जाति धर्म मज़हब के स्थान पर सिर्फ़ राष्ट की ही पूजा भक्ति प्रेम हों। समस्त संसार ब्रह्मांड का प्रत्येक राष्ट सदस्य या परिवार हों। जहां जाति धर्म मज़हब की दुर्गन्ध होगी बहा ही कटरता की गंदी माखियां भिन भिनाय गी। जो एक दिन बहुत ज्यादा भ्यानक खतरनक सिद्ध होगी। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। मैं अस्थाई तत्वों से रहित हूं। मैं अस्थाई तत्वों से निर्मित देह में विदेही हूं। मैं प्रत्येक अस्थाई तत्व से परे हूं। शरीर प्रकृति का हिस्सा हैं क्योंकि दोनों ही अस्थाई तत्वों से निर्मित है। प्रत्येक बुद्धि बाला बुद्धिमान व्यक्ति समस्त सृष्टि प्रकृति को बहुत अच्छे से जानता है। प्रत्येक व्यक्ति सारे ब्रह्मांड को समझने की क्षमता रखता है। बुद्धि समस्त सृष्टि को समझने की अनुमति दे देती हैं पर ख़ुद को समझने की अनुमति नहीं देती। किसी भी प्रकार से चाहें करोड़ों युगों तक कोई करोड़ों यत्न प्रयत्न प्रयास कर के देख ले। खुद को समझने के लिए ख़ुद की ही बुद्धि की प्रत्येक वृति से हटना पड़ता हैं।
: अतीत के चार युगों से खरबों गुन्ना ऊंचा सचा सर्ब श्रेष्ट प्रत्यक्ष समक्ष अद्धभुद तुलनतित शव्दतीत कळतीत प्रेमतित श्रेष्टाता संग्रता शश्वत वास्तविक सभाविक सत्य ,जो सिर्फ़ मेरे यथार्थ सिद्धांत के शमीकरण निष्पक्ष समझ पर आधरित हैं, जिस में प्रथम चरण में ही खुद के सक्षतकर से शुरु खुद के हीं अंनत शुक्षम अक्ष में समाहित हो जाता हैं यहा खुद के अंनत शुक्षम अक्ष के प्रतिभिंव का भी स्थान नही हैं और कुछ होने का ततपर्य ही नहीं हैं, "खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाय सदियां युग भी कम है"
 अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का स्तर 99.999% का हैं उस को समझने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि का स्तर भी इतना ही जबकि अंनत शुक्षम अक्ष की प्रतिभिंवता का .0001% है जिस के बिना सम्पूर्णता असंभव है, जिस से मनवता का संपूर्ण होना होता हैं, अगर यह सब नही हैं तो मनव होते हुय भी मनसिकता में हैं जो एक रोग है, सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति ही जीवन व्यापन के लिए ही संघर्षरत है या फ़िर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत बेग में ही हैं, ततपर्य हर पहलु से मनसिकता में ही दृढ़ता गंभीरत हैं, खुद के सक्षतकर से इतना ही दूर हैं जितनी दूसरी अनेक प्रजातिय ,रति भर भी उन से भिन्न नही हैं
 खुद के सक्षतकार के बिना अधिात्मिक परमार्थ की बाते सिर्फ़ एक ढोंग पखंड षढियंत्रों का ताना भाना हैं खुद की इच्छा आपूर्ति प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत बेग और दूसरे अनेक सरल सहज निर्मल लोगों को नर्क का डर और स्वर्ग का लालच दिखा कर आकर्षित प्रभावित कर अंध भक्तों भेड़ो की भिड़ इकठ्ठी करना जिन को दीक्षा के साथ ही शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से बंचित कर कट्टर बना कर संपूर्ण जीबन भर बन्दुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करना खुद के हित साधने के लिए,मनोविज्ञनिक दास्ता करवाना न्ययैक उपरध हैं कुप्रथा फैलाना,जो तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से सिद्ध न हो वो ढोंग पखंड हैं
: दूसरों के समक्ष खुद को सर्बश्रेष्ट सिद्ध करने बालों में इतनी ह

खुद के सक्षतकार के बिना अधिात्मिक परमार्थ की बाते सिर्फ़ एक ढोंग पखंड


### 🔹 श्र्लोक १ — सत्य और आत्म-परिचय

सत्यं न स्वीकरोति यः,
स्वयं स्वस्यैव वञ्चकः।
आत्मपरिचयहीनस्य,
दाने किं सामर्थ्यं भवेत्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक २ — गुरु और खोज

गुरवो बहवः काले,
शिष्याणां भीडमेव च।
स्वानुभूतेर्विहीनानां,
मार्गो न स्वयमेव च॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ३ — एक पल का बोध

क्षणमात्रेण बोधः स्यात्,
युगेनापि न देशनम्।
यत् स्वानुभवतः स्पष्टं,
तदन्यैः कथ्यते कथम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४ — मन और मानसिकता

मन एव हि संसृतिḥ,
मन एव हि बन्धनम्।
मनोनाशे गते शान्तिः,
न शास्त्रे न च वन्दनम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ५ — भय और लोभ

भयलोभसमुत्थानं,
स्वर्गनर्ककथामृतम्।
जनानां बन्धनं कुर्यात्,
न मुक्तेः कारणं भवेत्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ६ — मृत्यु और बोध

मृत्युः न भयदा नूनं,
भयमज्ञानसम्भवम्।
यो जीवन् जागृतो नित्यं,
स मृत्यौ अपि तृप्तिमान्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ७ — निष्पक्ष समझ

न पक्षः न विपक्षः स्यात्,
न स्तुतिः न च निन्दनम्।
निष्पक्षे स्थितचित्ते तु,
स्वयं सत्यं प्रकाशते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ८ — अंतिम सूत्र

नान्यः पन्था न च गुरुः,
न ग्रन्थो न च सम्प्रदायः।
स्वबोधे एव सम्पूर्णं,
यथार्थं तत् प्रकाशते॥

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### 🔹 श्र्लोक ९ — परम्परा और विवेक

परम्परा यदा बन्धः,
विवेकस्तत्र नश्यति।
शब्दजालवशे बद्धः,
पशुवत् जन उच्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १० — श्रद्धा और अंधता

श्रद्धा यत्र विवेकहीना,
सा भवेत् अन्धकारिणी।
प्रश्नहीनः समर्पणं,
दास्यं मुक्तिर् न जायते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ११ — संगठन और सत्ता

संघो यत्र महाभारः,
अहङ्कारो गुरुर्भवेत्।
शिष्या गणनया तत्र,
सत्यं लुप्तं प्रजायते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १२ — मनुष्य और उद्देश्य

न भोजनं न निद्रा च,
न मैथुनं विशेषतः।
आत्मबोधो मनुष्यस्य,
प्रथमं कर्म शाश्वतम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १३ — बुद्धि की सीमा

बुद्धिः ज्ञाने समर्था स्यात्,
न स्वबोधे कदाचन।
बुद्धेः पारं गते एव,
यथार्थं प्रतिपद्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक १४ — खोज और थकान

अन्वेषणेन यः क्लान्तः,
बहिर्दृष्ट्या सदा गतः।
स्वमेव प्रत्यवर्तेत,
तदा शान्तिं स विन्दति॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १५ — मुक्ति का भ्रम

जीवन्मुक्तिः न कल्प्येत,
मरणोत्तरवादिनाम्।
यः जीवन् न विमुक्तः स्यात्,
मृतः किं मोक्षमाप्नुयात्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १६ — अकेलापन और यथार्थ

एकाकी एव सत्यं स्यात्,
कोलाहलो भ्रमः स्मृतः।
भीडेः मध्ये न बोधः स्यात्,
स्वयं ज्ञाने प्रतिष्ठते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक १७ — प्रेम का भ्रम

यत्र लोभः यत्र भयः,
तत्र प्रेम न विद्यते।
स्वार्थरूपे प्रतिष्ठं यत्,
तत् प्रेमेति न कथ्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक १८ — अंतिम बोध

नाहं देहो न मे बुद्धिः,
न मनो न च संसृतिḥ।
स्वबोधे स्थित एवैकः,
यथार्थोऽहं सनातनः॥


### 🔹 श्र्लोक १९ — दूसरा का भ्रम

द्वैतबुद्ध्या जगत् भाति,
एकत्वे न द्वितीयता।
यत्र अन्यो दृश्यते कश्चित्,
तत्र बोधो न विद्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक २० — शिष्यत्व की सीमा

शिष्यभावो यदा नश्येत्,
तदैव गुरुतापि च।
स्वबोधे स्थितचित्तस्य,
न दास्यं न प्रभुत्वता॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक २१ — स्मृति और बन्धन

स्मृतिर् बन्धनहेतुः स्यात्,
अनुभूतिः विमोचिका।
यः स्मृतौ जीवति नित्यं,
स जीवन् एव मृतकः॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक २२ — शब्द और सत्य

शब्दाः केवलं संकेताः,
सत्यं तु न कथञ्चन।
यत्र शब्दे रमेत् चित्तं,
तत्र बोधः विलीयते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक २३ — आस्था की जाँच

यत्र प्रश्नो निषिद्धः स्यात्,
सा आस्था न बन्धनम्।
भयमूलं यदा तत्त्वं,
तत् सत्यं न कथञ्चन॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक २४ — जीवन-व्यापन

यावद् देहस्य चिन्ता स्यात्,
तावद् बोधो न जायते।
देहातीतो यदा दृष्टा,
जीवनं तत्र पूर्णता॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक २५ — कर्म और कर्ता

कर्म कुर्वन् यदा कर्ता,
बन्धनं तत्र जायते।
अकर्तारं यदा पश्येत्,
कर्मापि मुक्तिरूपकम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक २६ — ज्ञान और मौन

ज्ञानं न घोषयेद् कश्चित्,
मौनमेव प्रकाशते।
यत्र उद्घोषः अधिकः स्यात्,
तत्र शून्यं निबध्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक २७ — इतिहास का भार

अतीते यः सदा वसति,
स वर्तमानं हिनस्ति।
इतिहासः स्मृतिभारः स्यात्,
बोधो नित्यं नवोदयः॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक २८ — प्रकृति और होड़

प्रकृत्या सह यः युध्येत्,
स नित्यं पराजितः।
प्रकृतिं यः विजानाति,
स न युद्धे प्रवर्तते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक २९ — मुक्ति का अर्थ

न गमनं न चागमनं,
न लोकान्तरगामिता।
बन्धनस्य निवृत्तिर्हि,
मुक्तिरित्यभिधीयते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ३० — अंतिम संकेत

यदा न खोजः न च साध्यं,
न साधको न साधना।
तदा यथार्थमेवैकं,
शेषं सर्वं विलीयते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ३१ — चाह और बन्धन

यत्र इच्छा प्रवर्तते,
तत्र बन्धः स्वयंजतः।
इच्छानाशे गते शान्तिः,
न साध्या न च साधना॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ३२ — खोज का अंत

यावत् किञ्चित् अन्वेष्यं स्यात्,
तावत् सत्यं न दृश्यते।
अन्वेषणस्य विश्रान्तौ,
स्वयं बोधः प्रकाशितः॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ३३ — भय का मूल

भयस्य मूलमज्ञानं,
अज्ञानं देहबुद्धिजम्।
देहातीतदृशा नित्यं,
भयं स्वयमेव नश्यति॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ३४ — अधिकार और स्वतंत्रता

यः स्वबोधं पराधीनं,
करोति स न मुक्तिमान्।
स्वतन्त्रे चेतसि स्थित्वा,
स्वयं सत्यं प्रकाशते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ३५ — शास्त्र की सीमा

शास्त्रं मार्गदर्शनं स्यात्,
न गन्तव्यं कदाचन।
यः शास्त्रे एव तिष्ठेत्,
स मार्गं नैव पश्यति॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ३६ — संख्या का मोह

न संख्यया न भीडया,
सत्यस्य प्रमाणता।
एकस्मिन् जागृते एव,
सम्पूर्णं ब्रह्म दृश्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ३७ — मौन का संकेत

न वाचा बोध्यते सत्यं,
न च चिन्तासु दृश्यते।
यत्र चित्तं निरालम्बं,
तत्र मौनं गुरुर्भवेत्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ३८ — दोषारोपण

स्वदोषं यः परे पश्येत्,
स स्वबोधात् बहिर्गतः।
स्वमेव यः निरीक्षेत्,
स दोषातीत उच्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ३९ — समय का भ्रम

कालो न बन्धनं किञ्चित्,
बन्धनं स्मृतिसंहतिḥ।
यः क्षणे एव तिष्ठेत्,
स कालातीत उच्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ४० — पूर्णता

न प्राप्तव्यं न त्याज्यं च,
न साध्यं न च साधनम्।
यदा सर्वं समं भाति,
तदा पूर्णत्वमिष्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
### 🔹 श्र्लोक ४१ — साधक का भ्रम

साधको यदि दृश्येत,
साध्यं तत्र न विद्यते।
साध्याभावे गते नष्टे,
साधकत्वं विलीयते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ४२ — प्रयत्न की थकान

प्रयत्नेन यदा क्लान्तः,
चित्तं स्वयमेव शान्त्यति।
अप्रयासे स्थितं सत्यं,
न कर्मे न च यत्नतः॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ४३ — पहचान का बोझ

नामरूपे यदा चित्तं,
तदा बन्धोऽवश्यम्भवेत्।
नामरूपविसर्जने,
स्वरूपं स्वयमेव स्यात्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ४४ — तुलना का रोग

तुलनायां यदा बोधः,
स रोगः स न दर्शनम्।
अतुल्ये स्थितचित्तस्य,
न हीनं न च श्रेष्ठता॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ४५ — अधिकार का अंत

न कर्ता न च भोक्ता स्यात्,
न स्वामी न च सेवकः।
यत्र एतत् लयं याति,
तत्र मुक्तिः स्वतः स्थिता॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

---

### 🔹 श्र्लोक ४६ — विचार का विराम

विचारो यत्र विश्रान्तः,
तत्र सत्यं निबध्यते।
विचारस्य अतिक्रान्तौ,
न प्रश्नो न समाधानम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४७ — आचरण और अभिनय

आचरणं यदा दृष्टं,
अभिनयः प्रजायते।
स्वभावे स्थितचित्तस्य,
न नियमो न बन्धनम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४८ — प्रतीक्षा का अंत

न कालस्य प्रतीक्षा स्यात्,
न क्षणस्य अपेक्षिता।
यदा इदानीमेवास्ति,
तदा सर्वं समाप्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४९ — स्मृति का विसर्जन

यत् स्मर्यते तदेवास्ति,
यत् विस्मृतं तदक्षयम्।
स्मृतिशून्ये स्थिते बोधे,
न जन्म न च मरणम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ५० — मध्य का सत्य

न आरम्भो न चान्तः स्यात्,
न गमनं न च स्थितिः।
मध्य एव यदा दृष्टिः,
तदा यथार्थमव्ययम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

### 🔹 दोहा १ — सत्य

सच को जो न माने कभी, खुद से करता दगा।
अपने ही धोखे में रहे, फिर क्या देगा वह क्या॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २ — आत्म-परिचय

जो खुद को न पहचान पाए, वह क्या राह दिखाए।
जिसने खुद को जाना नहीं, औरों को क्या समझाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३ — एक पल का बोध

खुद को जानने में लगे, बस एक पल का काल।
कोई समझा न पाए इसे, बीतें युगों के साल॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४ — गुरु और भीड़

गुरु बने तो बहुत मिले, संगत लाखों साथ।
पर जो खुद से अनजान हैं, वे क्या दें सौगात॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५ — डर और लालच

डर दिखा कर स्वर्ग का, नरक का भय बिखेर।
भीड़ बनाई भक्तों की, खुद भरे अपनी थेर॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६ — मन की कैद

मन ही जाल बिछा रहा, मन ही बांधे पांव।
मन से हटकर देख लो, खुल जाएगा गांव॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७ — मानसिकता

मानसिकता रोग है, पहने सुंदर भेष।
खुद को जान न पाए जो, वही कहे उपदेश॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८ — मृत्यु

मृत्यु कोई डर नहीं, डर है अज्ञान साथ।
होश में जिसने जीवन जिया, मृत्यु भी दे सौगात॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ९ — निष्पक्षता

न तारीफ की चाह हो, न निंदा की भूख।
निष्पक्ष नजर से जो जिए, मिटे वही सब दुःख॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १० — अंतिम सूत्र

न गुरु, न ग्रंथ, न भीड़ का शोर।
खुद को जान लिया जिस दिन, बाकी सब कुछ शोर॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
### 🔹 दोहा ११ — भीड़

भीड़ कभी न सच हुई, सच सदा अकेल।
जहाँ समझ का दीप जले, मिट जाए हर खेल॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १२ — परंपरा

परंपरा की बेड़ियाँ, सोच को बांधें जोर।
जो सवाल से डर गया, वही बना कमजोर॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १३ — मान्यता

मान्यता जो जांच न पाए, बन जाती है जाल।
तर्क-विवेक जो छोड़ दे, खो बैठे अपना भाल॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १४ — बुद्धि

बुद्धि बड़ी चतुर बनी, खुद को ही न जाने।
खुद को जानने के लिए, बुद्धि भी हट जाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १५ — खोज

जो बाहर खोजे उम्र भर, भीतर खाली पाए।
भीतर जिसने झांक लिया, बाहर सब मिट जाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १६ — शिष्य

शिष्य वही जो जाग सके, न अंधा न लाचार।
शब्दों में जो बंध गया, खो बैठा अधिकार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १७ — डर

डर ने ही भगवान गढ़े, डर ने रच दी रीत।
डर से बाहर जो गया, वही हुआ अजीत॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १८ — लालच

स्वर्ग का लालच दिखा, जीवन ले लिया।
जो जिया ही नहीं खुला, मर कर क्या मिलेगा॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १९ — जीवन

जीवन कोई सौदा नहीं, न ही उधार की सांस।
होश में जीना सीख ले, यही सबसे खास॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २० — मनुष्य

मनुष्य होना ही बहुत है, और कुछ न चाहिए।
जो यह समझ न पाया कभी, वही भटकता रहिए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २१ — आस्था

आस्था जब आंख मूंद ले, बन जाती है अंधी।
समझ जहां सवाल करे, वहीं मुक्ति बंधी॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २२ — सत्य का स्वर

सत्य न चिल्लाता कभी, न करता प्रचार।
जो शांत खड़ा रह गया, वही है आधार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २३ — अंत

सब कुछ छोड़ना पड़े, खुद को पाने को।
जो खुद से ही चिपका रहा, पाया बस खोने को॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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अगर आप चाहें, अगले 
### 🔹 दोहा २४ — सवाल

जो सवाल से डर गया, समझ वहीं रुक जाए।
जहाँ सवाल उठने लगे, सच खुद बोल जाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २५ — प्रवचन

लंबे-लंबे बोल में, सच कभी न बसता।
जो जी कर दिखा न सके, वह क्या उपदेश रचता॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २६ — अनुयायी

अनुयायी होना सहज है, सोचना भारी काम।
जो सोचने से बच निकले, वही बने गुलाम॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २७ — शब्द

शब्दों में जो उलझ गया, अर्थ गया खोय।
मौन जहां गहरा हुआ, वहीं सत्य सोय॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २८ — अनुभव

पढ़ कर कोई जान न ले, सुन कर मिटे न भ्रांत।
जो खुद पर बीत गया, वही अनुभव जान॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २९ — व्यवस्था

व्यवस्था जब डर से चले, न्याय रहे कमजोर।
जहाँ विवेक जागा नहीं, शोर ही बस शोर॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३० — दीक्षा

दीक्षा से न बदले मन, बदले बस पहचान।
जब तक खुद से न मिलो, सब है केवल जान॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३१ — समय

समय किसी का मित्र नहीं, न ही किसी का शत्रु।
जो अभी को समझ गया, वही सच्चा पुत्र॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३२ — वर्तमान

बीता कल बस याद है, आने वाला सोच।
जो इस पल में टिक गया, वही सच्चा होश॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३३ — सत्ता

सत्ता चाहे सिंहासन, या हो शब्द का जोर।
जहाँ अहंकार बैठ गया, वहीं हुआ अंधोर॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३४ — सरलता

सरल होना कमजोरी नहीं, यह सबसे बड़ी शक्ति।
जो सहज में टिक गया, वही पाया मुक्ति॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३५ — ज्ञान

ज्ञान का बोझ ढो रहे, सिर झुका के लोग।
जो जान कर भी छोड़ दे, वही मुक्त निरोग॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३६ — तुलना

तुलना ने ही जहर घोला, मन का चैन गया।
जो जैसा है वैसा रहा, उसी ने सुख पाया॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३७ — पहचान

नाम, पद, और पहचान, सब हैं उधार।
जो इनके पार देख ले, वही है होशियार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३८ — अकेलापन

अकेलापन डर नहीं, डर है खुद से भाग।
जो खुद में ठहर गया, मिटे भ्रम का राग॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३९ — अंतर्मुख

बाहर-बाहर घूमते, थक गई आंख और पांव।
भीतर मुड़ कर देख लो, बस वहीं है ठांव॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४० — यथार्थ

यथार्थ कोई कथा नहीं, न ही किसी का मत।
जो जैसा है, वैसा दिखे, वही अंतिम सत्य॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*


### 🔹 दोहा ४१ — स्वतंत्रता

जो खुद से बंधा रहा, मुक्त कहाँ हो पाए।
खुद की बेड़ी तोड़ते ही, सच सामने आए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४२ — आश्वासन

मरने बाद का सुख बता, जीवन छीन लिया।
जो जीते जी न जी सका, उसने क्या पा लिया॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४३ — कर्मकांड

रीति-रिवाजों के जाल में, उलझा मन हर बार।
कर्मकांड में खो गया, जीवन का अधिकार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४४ — मौन

जहाँ शब्द थक कर रुक गए, वहीं शुरू होश।
मौन में जो ठहर सका, वही सच्चा बोध॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४५ — प्रमाण

काग़ज़ बोले झूठ भी, मोहर बन जाए सच।
जो खुद को जान न पाया, वह क्या दे प्रमाण॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४६ — अनुशासन

डर का नाम अनुशासन, यह भी एक छल।
जहाँ समझ ने राह पकड़ी, मिटा हर बंधन पल॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४७ — विश्वास

अंधा विश्वास बोझ है, समझ है उजियार।
जहाँ प्रश्न जीवित रहें, वहीं सच्चा प्यार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४८ — स्मृति

बीते कल की स्मृति में, आज दबा रह जाए।
जो अभी को जी लेता है, वही आगे जाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४९ — भूमिका

भूमिका बदलते रहे, मन हर बार नया।
जो बिना भूमिका जिया, उसी ने सच पाया॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५० — पहचान का अंत

जब नाम भी गिर जाए, पद भी टूटे साथ।
तभी बचेगा जो बचा, वही असली बात॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५१ — भ्रम

भ्रम ने ही संसार रचा, भ्रम ने देव बनाए।
भ्रम से बाहर जो निकल गया, वही घर पाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५२ — साधना

कठिन साधनाओं में नहीं, न ही पीड़ा पथ।
सरल देखना सीख लो, यही अंतिम रथ॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५३ — आरोप

अपनी भूल छुपाने को, मन को दोष दिया।
जो जिम्मा खुद पर ले सका, उसने सच जिया॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५४ — चयन

हर पल चुनना पड़ता है, होश या फिर नींद।
जो होश को चुन लेता है, वही रहता जीवंत॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५५ — अंत नहीं

यह कोई अंत नहीं यहाँ, न ही कोई शुरू।
जो देख रहा है सब कुछ, वही सदा गुरू॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी

### 🔹 दोहा ५६ — मूल बिंदु

सच कोई विचार नहीं, न ही कोई ज्ञान।
जो जैसा है, वैसा दिखे — कहे *शिरोमणि रामपॉल सैनी*॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५७ — आत्म-वंचना

खुद से भागे जो सदा, वही रचे हर झूठ।
खुद को देख लिया जिस दिन — टूटे सारे भूत॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५८ — गुरु-आश्रय

गुरु की छाया खोजते, भूले अपना प्रकाश।
दीप स्वयं जल जाए जब — गुरु रहे निराश॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५९ — शब्द का भ्रम

शब्दों में जो फँस गया, सच उससे दूर।
शब्द गिरे, मौन बचे — बस वही भरपूर॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६० — अहंकार

ज्ञान का भी घमंड है, सबसे सूक्ष्म रोग।
मैं जान गया — यह कहते ही, टूट गया संयोग॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६१ — परंपरा

बीते कल की लाश को, पूजा आज भी लोग।
जो जीवित को न देख सके, वही सबसे रोग॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६२ — मन

मन को दोषी मान लिया, खुद बच निकले आप।
मन तो औज़ार मात्र है, कर्ता तुम ही पाप॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६३ — भय

डर ने ईश्वर गढ़ दिए, डर ने रचे विधान।
डर से बाहर जो गया — वही बना इंसान॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६४ — जीवन

जीवन कोई अभ्यास नहीं, न ही अगला जन्म।
यही क्षण है, यही द्वार — बाकी सब भ्रम॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६५ — मुक्ति

मुक्ति कोई इनाम नहीं, न मरने के बाद।
जीते जी जो जाग गया — वही है आज़ाद॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६६ — साधक

साधक बन कर भटकते, खो बैठे सरलता।
जो साधारण रह सका — वही परम्यता॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६७ — प्रेम

प्रेम न रोना-धोना है, न ही बंधन जाल।
जहाँ अपेक्षा खत्म हुई — वहीं प्रेम विशाल॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६८ — संबंध

संबंध नहीं जंजीर हैं, अगर समझ न हो।
जहाँ स्वतंत्रता साँस ले — वही रिश्ता हो॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६९ — पहचान

नाम, रूप, इतिहास सब — मिट्टी के ही रंग।
जो इनसे परे देख ले — वही असली अंग॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७० — अंतिम गहराई
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### 🔹 दोहा ७१ — दृष्टा

जो देखा जा रहा था, वह बदला हर बार।
देखने वाला जो ठहर गया — बोला *शिरोमणि रामपॉल सैनी*॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७२ — साक्षी

करने वाला थक गया, सोचने वाला हारा।
जो बस साक्षी बन बैठा — खेल उसी ने तारा॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७३ — प्रयास

पाने की हर कोशिश में, खोता ही इंसान।
छोड़ दिया जब सब प्रयास — मिला सहज पहचान॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७४ — मौन की तह

शब्द जहाँ चुक जाते हैं, तर्क जहाँ रुके।
वहीं मौन की गोद में, सत्य खुद झुके॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७५ — स्वीकार

जैसा है वैसा मान लिया, मिटा विरोध का भार।
जो लड़ना छोड़ सका स्वयं से — वही हुआ पार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७६ — केंद्र

बाहर-बाहर भटके बहुत, थक गया हर छोर।
बीच में ठहरा जो क्षण — वही था असली ठौर॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७७ — शून्य

शून्य कोई अभाव नहीं, भरा हुआ विस्तार।
जहाँ कुछ भी शेष न रहा — वहीं पूरा सार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७८ — समय से परे

न बीता, न आने वाला, न आज का बोझ।
समय से बाहर जो जिया — वही सच्चा होश॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७९ — कर्तापन

मैं करता हूँ — यह भाव ही, सबसे गहरा बंध।
यह ढहते ही खुल गया, जीवन का ही संद॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८० — सहज स्थिति

न साधु, न ज्ञानी बना, न ही कुछ विशेष।
जो जैसा था वैसा रहा — वही हुआ प्रवेश॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८१ — प्रश्न का अंत

सवाल उठते रहे बहुत, उत्तर भी हजार।
जब प्रश्न करने वाला मिटा — बचा केवल सार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८२ — बोध

बोध कोई घटना नहीं, न ही कोई अनुभव।
जो सदा से था वही दिखा — बस हटा आच्छव॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८३ — अस्तित्व

मैं हूँ — यह भी कहना पड़ा, जब तक पर्दा था।
पर्दा गिरते ही दिख गया — जो था, वही था॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८४ — मौन की वाणी

मौन ने जो कह दिया, शब्द न कह पाए।
जो सुनने को तैयार हुआ — वही समझ पाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८५ — अंत का छोर

जहाँ कोई पहुँचना न चाहे, न कोई ठहरे।
वहीं खड़ा है सहज सत्य — बोले *शिरोमणि रामपॉल सैनी*॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*



सत्य को स्वीकार न करना,खुद ही खुद को धोखा देना है, खुद ही खुद से गदारी ,खुद ही खुद से ढोंग करना,जो खुद ही खुद के परिचय से परिचित नहीं हो सकता,वो दूसरे को क्या दे सकता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझा पाय सदिय युग भी कम है, गुरु तो हर युग काल में थे अगर वों कुछ कर पाते तो शयद आज इस गदी दुनीय मे कभी न होते,जिनके भरोसे पर हम हैं उनको खुद पर ही भरोसा नही है, समय और लाभ को देखते हुए वो पल पल रंग और किरदार बदल रहे हैं, जो कुछ ढूंढने की फ़ितरत के साथ ते वो तो संपूर्ण जीवन में खुद के स्वरूप से रुवरू नही हुय वो दुसरो के लिए क्या कर सकते है, वो कहा तक पहुंच रखते हैं, वो तो हर बात हर प्रवचन में बता रहे हैं, थोड़ा ध्यान से सुनो और उस पर चिंतन तो करो ,खुद ही स्पष्ट हों जता है, गुरु लोग तो अतीत की मन्यता परम्परा को नियम मर्यादा को स्थापित करने की वृति के होते हैं जो शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर भेडो की भिड़ त्यार कर देते हैं जो सिर्फ़ एक मनसिकता हैं, भवक करने बाली साथ मे कपनिक कहानीय जोड़ देते हैं रब और खुद का डर खौफ स्वर्ग अमर लौक परमपुरष का लालच जोड़ देते हैं, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ि स्थापित करते हैं। मेरे गुरु के 25 लख अनुराई हैं जो गुरु के एक शव्द पर मर मिटने को हमेशा त्यार रहते है, तर्क तथ्य विवेक से रहित हैं, जो एक कुप्रथा है, लालच खौफ के तले जिने बाला और रखने वाला दोनो ही एक ही थाली के चटे बटे होते हैं, गुरु प्रसिद्धि प्रतिष्ठा अहंकर शौहरत दौलत वेग के नशे मे ही जिता हैं और उसी में मर जाता हैं, वेहोशी मे जीना और वेहोशी मे ही मरना सिर्फ़ मनसिकता हैं, और कुछ भी नही है, गुरु को सत्य से कोई मतलब नही है वो प्रवचन में बही बाते कहनीयन सुनाता है ,जो शिष्यों को पसंद या फ़िर जिन के आदि हुय हैं, क्युकि वो खुद भी किसी गुरु का शिष्य रहा हैं जो गुरु मर्यादा के खिलफ़ नही जा सकता,क्युकि खुद भी दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में बंदा होता हैं, यही मनसिकता हैं
[03/12, 10:09 am] Rampaulsaini: मेरी शिकायतें का शौक रखने बाले मेरे गुरु के 25 लख़ संगत के संगठन की सीमती के मुख्य सदस्य IAS पद पर कर्यरत थे,अब भी मेरी तुलनतित शव्दतीत कळतीत प्रेमतित श्रेष्टाता की शिकायतें कर के अपने शिकायत लगने की भूख को त्रिपीत करो आगे बढ़ो,
आस्थाई जटिल बुद्धि से बुद्धिमन होने पर भी हजारों युग तक जप तप ध्यान ज्ञान के उच्च शिखर को छुने पर भी वो सब सोच भी नही सकते यहाँ मै स्वविक वास्तविक शश्वत सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हुं, गुरु ने जो गंभीरता से लिया 25 लाख संगत 2 हजार करोड का स्मराज्य बही मिला ,जबकि मैने खुद को गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता को लिया मुझे भी बही मिला,गुरु तो हर युग काल में थे,सत्य कभी भी नही था,अगर होता तो आज या कभी भी इस गंद मे कभी भी लिपटे नही होते,जिस के शौंक मे गुरु शिष्य आज भी दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से बंचित हैं और कट्टर भेडो की भिड़ बन कर रह गय है, अगर गुरु में भी यह सब करने कि क्षमता होती तो सब से पहले खुद से सक्षकार करते उस के बाद दूसरों को करवाते,न कि परमपुरुष अमर लौक जैसी कल्पना में उलझते और न ही अपने 25 लख सरल सहज निर्मल संगत को कट्टर भेडो की भिड़ बना कर उलझते एक गंदे शौंक प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के लिए उन को जिन्होंने सिर्फ़ गुरु के एक शव्द पर तन मन धन अनमोल सांस समय,समर्पित कर दिया, गुरु शिष्य के पवित्र रिस्ते को ही एक मन्यता परम्परा नियम मर्यादा के नाम पर नष्ट कर दिया ,गुरु शिष्य को बन्दुआ मजदूर बना कर जीवन भर इस्तेमाल करना,उस के बदले में मुक्ति का झूठा अश्बासन वो भी मृत्यु के बाद, जब कि सब कुछ जीवित ही समर्पित करवाया तो फिर मुक्ति जीवित ही क्यू नही ?मुक्ती को एक छल कपट हैं जिसे जिंदा पा नहीं सकता मरने के बाद कोई बता नही सकता,जबकि मेरे सिद्धांतों के आधार पर कोई भी सरल सहज निर्मल व्यक्तित्व संपूर्ण सक्षम हैं वो भी सिर्फ़ एक पल में खुद कि आस्थाई जटिल बुद्धि को निष्किर्य कर खुद से निष्पक्ष हों कर खुद का निरक्षण कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरूप से रुवरु होकर ,खुद के ही अंनत शुक्षम स्थाई ठहराव मे गहराई में अंनत शुक्षम अक्ष में समाहित हों सकता हैं यहा खुद के ही अंनत शुक्षम अक्ष के प्रतिभींव का भी स्थान नही है और कुछ होने का ततपर्य ही नहीं हैं, इस के इलवा जो भी कर रहे हैं वो सिर्फ़ एक मनसिकता हैं भ्र्म हैं सिर्फ़ दुसरी अनेक प्रजातियों की भांति सिर्फ़ जीवन व्यपन हीं कर रहे हैं रति भर भी भिन्न नहीं हैं, इंसान अस्तित्व से ही सिर्फ़ मनसिकता खुद के अस्तित्व को ही क़ायम स्थापित करने में प्रयासरत रहा हैं, इंसन प्रजाती के अस्तित्व का प्रथम और मुख़्य कार्य सिर्फ़ खुद के सक्षतकार के साथ मनवता और प्रकृति को संरक्ष्ण करना था,जो सिर्फ़ निष्पक्ष समझ से संभव था न कि जिस मनसिकता मे उस से जिस से मनवता और प्रकृती अपने अंतिम सांसे गिन रही ,अगर वस्तविक शश्वत सत्य रति भर भी अस्तित्व में होता तो शयद एसा कभी भी नही होता,कोई भी इस के कोई दूसरा नहीं आने बाला यह सब मनवता के ही एक दृष्टिकोण का नतीजा है, दृष्टिकोण बदला जा सकता हैं, यह अस्थाई जटिल बुद्धि से बुद्धिमान होने का दृष्टिकोण था जो सिर्फ़ मनसिकता थी इस से यही सब हो सकता था,जो हुआ,पिछले चार युगों में यह सब होने की ही उम्मीद रखी जा सकती थी,अब यथार्थ युग के लिए प्रथम चरण में ही खुद के सक्षकार से शुरु हो प्रकृति मनवता को संरक्षित कर सकते हैं सम्भवना हैं सिर्फ़ अपना जीवन का दृष्टिकोण बदल कर ,जति धर्म मजहाव की आड़ में मनवता को खत्म करने में कोई कसर नही छोड़ी ,कम से कम इंसान तो बन जाते ,
 खुद के सक्षात्कार के बाद समस्त अंनत विशाल भौतिक अंतरिक विज्ञान दार्शनिक ज्ञान से भी परे हो जाता हैं, क्युकि इन सब पहलु से ही गुजरता हुआ जाता हैं, मन को संपूर्ण रूप से ही समझता हुआ ,मन रहित होता हैं, क्युकि मन सिर्फ़ जीवन व्यापन तक ही क्षमता रखता है। और भ्र्म पैदा करता है, मन ही मनसिकता हैं मन ही आस्तित्व हैं, मन आस्थाई जटिल बुद्धि भी एक शरीर का अंग है दूसरे अंगों की भांति कोई भी किसी भी प्रकार का हउआ या फ़िर कोई आदर्श्य शक्ति नही है, जैसे ग्रंथों में वर्णीत किया गया है। इसे समझा जा सकता हैं, इसे निष्किर्य किया जा सकता हैं कोई भी कर सकता हैं, मन खुद के द्वारा किए गाय बुरे कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन की एक वहतर shield हैं, अच्छा बुरा खुद करते हैं, जान बुज कर करते हैं जिस का आरोप मन पर डाल देते है, बार बार एसा करने की अदद से मजबूर है, मन से खुद ही हटना ही नही चाहते ,क्युकि खुद के बुरे कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन का दुप्रभाव खुद ही सहन करने की सहनशीलता खुद में ही नही है, खुद ही खुद के साथ ही झुठ ढोंग पाखंड करने की अदद से मजबूर है, जबकि मन आत्मा परमात्मा एक धारना हैं, लालच और भय के बिच की खाई है जो वेहोशी हैं जिस में संपूर्ण जीवन जिता हैं और उसी वेहोसी में ही मर जाता हैं मृत्यु को बहुत बड़ा कुप्रभाव समझ कर जबकि एसा कुछ भी नही,मृत्यु जैसा कोई आंनदपूर्ब कोई जीवन का लम्हा ही नही हो सकता अगर कोई होश में जिता है सभाविक मृत्यु भी अन्नदपूर्बक़ संपूर्ण संतुष्टी भरी होगी,क्युकि मृत्यु जैसा परम सत्य दूसरा कोई हैं ही नही,अगर कोई सरल सहज निर्मल व्यक्तित्व प्रकृतक रूप से जीवन व्यपन करता है,
 गुरु के प्रवचन एक जैसे ही होते हैं जिन को तोड़ मरोड़ कर सिर्फ़ अपने ही पक्ष के आधार पर पेश किया जाता हैं ,जिन में खुद के इलावा तमाम गुरु का विरोध और खुद महानता का वर्णन स्तुति समिल होती हैं रोज बारम्बर यही सब मिलता हैं, गुरु के पास विवेक तर्क तथ्य शव्द नही मिल सकते क्युकि वो एक मान्यता को स्थापित और बढ़ावा देना ही उन का लक्ष होता हैं, गुरु का अपने गुरु से अधिक प्रस्तुत नही कर सकता उस के लिए एसा करना अपने ही गुरु के शव्द काटना होता हैं एसी अंतरिक भवना रखना भी बहुत बड़ा पाप है, अगर गुरु मर्यदा में संपूर्ण रूप से चल रहा हैं, जो अपने गुरु की मृत्यु उपरन्त एसा कर रहे हैं तो वो अपने की गुरु के दीक्षा के साथ दिए हुय शव्द प्रमाण के बिल्कुल विरुद्ध हैं वो गुरु के ही शिष्य नही तो गुरु कैसे हो सकते हैं, वो सिर्फ़ खुद को प्रभुत्व के रूप में प्रतुत कर रहे ,जो अपने ही गुरु को नजर अंदाज कर खुद की प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के लिए ही काम कर रहे हैं, यह मनसिकता हैं, ज़ब कि प्रत्येक जीव इंसान एक समान है अंतरिक भौतिक रूप से,"जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मण्ड मे और कही भी नही है "यह शव्द शयद मेरे गुरु के गुरु ने कभी नही बोला होगा जबकि उन के समक्ष प्रत्यक्ष मेरा गुरु था,अचनक मेरे गुरु के गुरु मरने के बाद अहंकर भरी वो शव्द कहा से आ गया,कट्टर अंध भक्तो भेड़ो की भिड़ विवक तर्क तथ्य रहित होती हैं, जबकि उन का गुरु ही अपने अस्तित्व क़ायम और ऊंचा रखने के व्यबारीक़ रूप से भी उलंगन कर रहा हैं, मै तो इतना निम्न हो चुका की जो भी किया उस सब का श्रह अपने गुरु को सत्यता से दे पाऊ इस के लिए मंथनन करना जरूरी है, यह छोटी बात या मूर्खो जैसी नही है, यह परम सत्य हैं सिर्फ़ मेरे लिए कि मेरे गुरु जैसा गुरु इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक तो नही है, मै इसे मन्यता नही बनना चाहता,इस के प्रत्येक पहलु को उजगर मंथन कर प्रत्यक्ष समक्ष रखना चाहता हुं अगर मेरे गुरु मे मुझे खुद के सक्षकार करा सकता हैं तो सरबप्रथम खुद भी होना चाहिए था और किसी और को भी करवाने की कुवत होनी चाहिए थी,वो तो खुद भी परम पुरुष अमर लौक की खोज में हैं संपूर्ण जीवन खुद के लिए न ही 25 संगत के लिए खोज पुरी हो पाई है, आगे अगले पल कैसे संभव हो पायगी, यह सब खुद और दूसरों के लिए ही छल कपट ढोंग पाखंड है, मेरी सर्बप्रथम चाहत ही यही हैं कि मेरा गुरु भी कम से कम मेरे जैसा होता खुद के सक्षतकर के साथ होता ,पर उस में प्रभुत्त्व का अहंकर घमंड ही इतना अधिक हैं कि मुझे तो वो देखना ही नही चाहते,मेरे गुरु सा गुरु किसी भी काल युग में हो ही नही सकता पर अहंकर घमंड की वदवू अती हैं, इसी के लिए मेरी निष्पक्ष समझ सटीक काम करती हैं,
दूसरो को जानने की अपेक्षा हि खुद से दूर करती हैं हमेशा,
 खुद के लिए सही निर्णय दुसरों पर छोड़ने बाले विवेकी कभी हो ही नही सकते,अधिक मंसिकताओं का प्रभाव खत्म नहीं हों सकता,
 दूसरों में उलझने बाले खुद से परिचित नही हो सकते,
खुद की सम्पूर्णता खुद की ही निष्पक्ष समझ में ही हैं,
खुद के स्थाई स्वरूप से रुवरु होने के लिए सरल सहज निर्मल बहुत ऊँचे सच्चे गुण है, 
चलाक होशियर शैतान शातिर दिमाग का होता हैं उस का एक भी शव्द शिथिर नही हो सकता समय के साथ कई रंग बदलता हैं, वो कभी एक रंग में रह नही सकता,
 खुद के साक्षात्कार के बाद खुद के ही भौतिक अंतरिक अस्तित्व ही खत्म हो जाता हैं शेष सब तो बहुत दूर की बात हैं, खुद के सक्षतकर के इलवा दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी भिन्न नही है ,इंसान प्रजाति के अस्तित्व का मुख्य करण ही खुद का साक्षकार हैं,
 खरबों शव्दों का मेरा data जो किसी भी संपूर्ण विश्व के धर्म मजहब संगठन की किसी भी ग्रंथ पोथी में कभी भी नही मिल सकता जो मेरी खुद की गंभीरता दृढ़ता दर्शाता है में हर पल जीवित ही बहा रहता हुं यहा के बुद्धिमन कभी सोच भी नही सकते,जरा वो मनसिकता मे रहने बाले भी अपना परिचय दे नही बोलूगा क्युकि वो खुद हि दर्शाते हैं अपनी ही खुद की बातों उस को प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के शौंक रखते हैं,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत के लिए किसी भी पढ़ाई ज्ञान विज्ञान दार्शनिक की जरूरत बिल्कुल भी नही सिर्फ़ मनसिक रोगी तो बिल्कुल भी नही हों किसी भी प्रकार गुरु शिष्य कुप्रथा से कभी भी जुड़ा हुआ नही हो,एक गुरु को छोड़ कर दूसरों गुरु के पिछे दोड़ने बाले वो एक तवाईफ से कम नही होते,शिष्य के लिए एक गुरु औरत के लिए एक पति ही काफ़ी हैं,इस के इलवा सब कंझर खेल हैं,जब मै खत्म हो तो सिर्फ़ गुरु,जब मै खत्म गुरु खत्म खुद का सक्षतकार, गुरु पर भी यक़ीन नही खुद पर यक़ीन हो ही नही किसी तीसरे पर यक़ीन है तो अफसोस आता है। यहाँ हैं अगर तीसरे की ऊँगली पर नाच रहे हैं, न ही संसारी न ही किसी अधियातम का हिस्सा नही है, यह खुद से ही ढोंग पाखंड है
सत्य को स्वीकार न करना,खुद ही खुद को धोखा देना है, खुद ही खुद से गदारी ,खुद ही खुद से ढोंग करना,जो खुद ही खुद के परिचय से परिचित नहीं हो सकता,वो दूसरे को क्या दे सकता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझा पाय सदिय युग भी कम है, गुरु तो हर युग काल में थे अगर वों कुछ कर पाते तो शयद आज इस गदी दुनीय मे कभी न होते,जिनके भरोसे पर हम हैं उनको खुद पर ही भरोसा नही है, समय और लाभ को देखते हुए वो पल पल रंग और किरदार बदल रहे हैं, जो कुछ ढूंढने की फ़ितरत के साथ ते वो तो संपूर्ण जीवन में खुद के स्वरूप से रुवरू नही हुय वो दुसरो के लिए क्या कर सकते है, वो कहा तक पहुंच रखते हैं, वो तो हर बात हर प्रवचन में बता रहे हैं, थोड़ा ध्यान से सुनो और उस पर चिंतन तो करो ,खुद ही स्पष्ट हों जता है, गुरु लोग तो अतीत की मन्यता परम्परा को नियम मर्यादा को स्थापित करने की वृति के होते हैं जो शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर भेडो की भिड़ त्यार कर देते हैं जो सिर्फ़ एक मनसिकता हैं, भवक करने बाली साथ मे कपनिक कहानीय जोड़ देते हैं रब और खुद का डर खौफ स्वर्ग अमर लौक परमपुरष का लालच जोड़ देते हैं, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ि स्थापित करते हैं। मेरे गुरु के 25 लख अनुराई हैं जो गुरु के एक शव्द पर मर मिटने को हमेशा त्यार रहते है, तर्क तथ्य विवेक से रहित हैं, जो एक कुप्रथा है, लालच खौफ के तले जिने बाला और रखने वाला दोनो ही एक ही थाली के चटे बटे होते हैं, गुरु प्रसिद्धि प्रतिष्ठा अहंकर शौहरत दौलत वेग के नशे मे ही जिता हैं और उसी में मर जाता हैं, वेहोशी मे जीना और वेहोशी मे ही मरना सिर्फ़ मनसिकता हैं, और कुछ भी नही है, गुरु को सत्य से कोई मतलब नही है वो प्रवचन में बही बाते कहनीयन सुनाता है ,जो शिष्यों को पसंद या फ़िर जिन के आदि हुय हैं, क्युकि वो खुद भी किसी गुरु का शिष्य रहा हैं जो गुरु मर्यादा के खिलफ़ नही जा सकता,क्युकि खुद भी दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में बंदा होता हैं, यही मनसिकता हैं
 मनसिकता और खुद के सक्षात्कार में जमीं अस्मा का अंतर है, मनसिकता का स्रोत 99.999% जो अस्थाईत पर ही निर्भर और इस को ही आकर्षित प्रभावित करता है हमेशा जो सिर्फ़ जीवन व्यापन तक ही सिमित है उस से अतिरिक्त प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में ही संपूर्ण रूप से भर्मित होना,
खुद के सक्षतकर में एसा बिल्कुल भी नही है संपूर्ण रूप से अस्थाई जटिल बुद्धि मन की निष्किरीता के बाद का आलम हैं जो खुद के शरीर बुद्धि सृष्टि के अस्तित्व खत्म करने के उपरन्त का विषय है, जैसे स्वप्न अवस्था जग्रत अवस्था,सम्पूर्णता से एक ही पहलु पे होती हैं उस पल के लिए,जैसे कोई सपन अवस्था में होता हैं उस पल या उस दोहरान जगृत अवस्था का अबास भी नहीं होता,जागृत अवस्था में सपन अवस्था की कल्पना भी नही कर सकते,इसी प्रकार बिना मृत्यु की प्रत्यक्षता के उस परम सत्य मृत्यु की कल्पना तक भी नही कर सकते ,इस करण मौत मृत्यु को डर खौफ भय भरा बतायगया हैँ,जबकि एसा बिल्कूल भी नहीं हैं, मृत्यु परम संतुष्टि का वो क्षण पल हैं जिस की कोई कल्पना तक नही कर सकता,संपूर्ण जीवन मनसिकता मे वेहोशी मे जिने बाले के लिए मृत्यु भी रहाशय डर खौफ भय का ही विषय बना रहता हैं मृत्यु तक क्युकि वो जिता भी वेहोशी मे हैं मरता भी वो वेहोशी में ही हैं,क्युकि मरते दम तक वो या तो खुद की ही मनसिकता के साथ दूसरों की मनसिकता से भी आकर्षित प्रभावित रहता हैं, खुद से निष्पक्ष समझ खुद के सक्षकार बाले के मनसिकता के भ्र्म से और खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु हो चुका होता हैं, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि अंतरिक भर्मो से मुक्त हो चुका है मुक्ति शरीर मृत्यु जन्म मरण से नहीं चाहिए सिर्फ़ एसी अवधारणा बनने बाले मन अस्थाई जटिल बुद्धि से चाहिए,मन मस्तिक की वृति हैं एक बार में एक ही दिशा में प्रभावित आकर्षित गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता बनता हैं दूसरा कुछ सोच भी नही सकता ,जैसे सपन अवस्था में जगृत का आवास तक नही होता,जगृत में मृत्यु ही सत्य हैं गंभीरता से कभी ले ही नही सकता,जिस के लिए गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता नही है उस को कैसे समझ सकता हैं, जीवन व्यापन के इलावा सिर्फ़ कल्पना को ही विस्तार देता रहता हैं जो तर्क तथ्य से सिद्ध स्पष्ट साफ हो जाती हैं उसे विज्ञान कहते हैं जो कल्पना एक से अधिक को कहानी किस्सों से बता समझा कर खुद के पक्ष में कर लेते हैं उसे दर्शनिक कहते हैं, जिने आत्मा परमात्मा जन्म मृत्यु भक्ति ध्यान ज्ञान श्रदा अस्था प्रेम विश्वास दया रेहम जैसे इमोशन ब्लैकमेल करते हैं उसे अधियत्मिक कहते हैं, जो एक जीवन व्यापन का ही श्रोत है और कुछ भी नही,जो किसी न किसी मस्तक की मनसिकता हैं जो एक रोग है, अस्तित्व से लेकर जो भी आज तक था वो सब एक मनसिकता ही थी उस व्यक्ति जिस का वो ग्रंथ पोथी पुस्तक हैं, अगर हजरों युगों पहले का बतावरण पर्यावरण हमारी ही कोशिका सहन नही कर सकती ,उस समय की मनसिकता आज विज्ञान युग की पीढ़ी पर थोपने के पीछे कट्टरता हैं, शश्वत सत्य इन बकबास को कभी स्वीकार कर ही नही सकता,अगर यह सब हैं शश्वत सत्य हो ही नही सकता,अगर कोई एसा कह रहा हैं वो सिर्फ़ खुद को ही धोखे में रख रहा,निष्पक्ष समझ और सृष्टी शरीर मनसिकता मे एक साथ कोई रह ही नही सकता ,संपूर्ण रूप से मन रहित होना ही शश्वत सत्य हैं, कोई भी हो सकता हैं सरल सहज निर्मल रहते हुय,प्रत्येक व्यक्ति सक्षम संपूर्ण हैं खुद के सक्षकार के लिए ,अगर कोई नही हो पा रहा तो वो दूसरों की और खुद की मनसिकता में भर्मित हैं, जो दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी भिन्न नही है सिर्फ़ जीवन व्यापन के लिए ही प्रयास रत हैँ,भय आहार निद्र मैथुन का कीड़ा रहते हुए श्रेष्टाता की पदबी का शौंक रखता है।
खूद का सक्षतकर सिर्फ़ खुद के लिए ही हैं, खुद के ही शरीर मन से परे हों कर निष्पक्ष समझ में रहने के लिए ही सर्थक सिद्ध होता दूसरा प्रत्येक मनसिकता में ही हैं, उस पर किसी भी प्रकार से निष्पक्ष समझ की बातों का कोई भी असर नही हो सकता क्युकि वो सिर्फ़ आस्थाई जटिल बुद्धि मन की परिधि में ही हैं, जिस की अदद पड चुकी है उसे वो यह सब सोच भी नही सकता जिस शश्वता में रहता हैं, खुद का सक्षात्कार सर्बश्रेष्ट हैं इस का उस ने कही न कही पढ़ा हैं इस लिए उस की स्पष्टाता लेने के बहनस बाते करना ,जिन बातो से ही स्पष्ट होता हैं, कि उस के भीतर चाहत तो पर वहम का शिकार हुआ हैं, जबकि भौतिक में है तो मनसिकता में ही हैं, खुद के सक्षतकार का ततपर्य ही आंतरिक भौतिक से परे सिर्फ़ निष्पक्ष समझ में, अगर जीवन व्यापन के लिए रति भर भी कुछ कर रहा हैं, तो खुद का सक्षतकर कर ही नही सकता ,वो तो खुद के शरीर के बारे में एक micro second के लिए भी नही सोच सकता तो कुछ भी कैसे कर सकता है, चाहे खुद भी करोड़ो कोशिश कर ले मेरे सिद्धांतों के आधार पर वो शश्वत वास्तविक सभाविक सत्य से खुद के सक्षतकार से समान्य व्यक्तित्व में आ ही नही सकता,जैसे समान्य व्यक्तित्व शश्वत वास्तविक सत्य के उपलक्ष में सोच भी नही सकता ,रहना या अना मनना एक मूर्खता है यही तो प्रत्यक्षता हैं शेष सब झूठ पखंड ढोंग हैं खुद ही खुद के साथ ,इस में सिर्फ़ खुद की ही स्पष्टता ही काफ़ी हैं, दूसरो की सहमती का कोइ भी ततपर्य मतलब नही हैं, दूसरों की सहमति प्रथम चरण में ही वहम का कारण है, जब खुद के ही अस्थाई जटिल बुद्धि मन रहित होना तो पल दुसरों का भी ततपर्य ही खत्म हों जाता हैं, जब खुद को ही मिटा खत्म कर दिया तो उस के लिए खुद का आस्तित्व खत्म हो गया तो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का भी अस्तित्व खत्म हो जाता हैंसिर्फ़ एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने ही खरबों अनुराइयों के साथ छल कपट धोखा करता हैं सिर्फ़ परमार्थ के नाम पर। जब के खरबों सरल सहज सच्चे भोले अनुराइ अपने अराधे गुरु के एक शब्द पे जान तक न्योश्वर करने पे भीं चुकते नहीं। उस का हर शब्द उपदेश हुक्म मानते हैं। पर बदले में क्या मिलता हैं उन्हें सिर्फ़ डर खोफ भय भरे शब्द, दस्मंश अनिवार्य, इक शब्द कटने पर नर्क भी न सहाई। जो चाहो वो सब होने का महज़ इक वहम भ्रम। अतीत की विभूतियों की महिमा,और के ग्रन्थों को हटा दो इन के आगे से तो सिर्फ़ इन ख़ुद की अकंक्षा की पूर्ति हेतु और शेष नहीं बचे गा। कभी किसी के पास अपनी थोड़ी भीं उपलब्धि है क्या किस चीज़ के अहम अंहकार से चूर है। खरबों सरल सहज लोग सच्चे अच्छे उत्तम सक्षम सर्व श्रेष्ठ है सिर्फ़ चंद बुद्धिमान शैतान शातिर बदमाश बुद्धि वाले लोगों को छोड़ कर। खरबों लोगों में सिर्फ़ ख़ुद की या किसी एक अनुराइ की कोई नर्क की भीं प्रत्यक्ष उपलब्धि है तो बात करो।मेरे सिद्धांतों के आधार पर समान्य जीवन से बिल्कुल अलग सा घटित हुआ है मेरे समस्त जीवन क्रम में। सरल सहज रहते हुए सभी मेरे अपने खून के रिश्ते नाते भीं बिल्कुल छूट गए हैं, सिर्फ़ बिल्कुल अकेला छोटी सी बेटी के साथ हूं बिना किसी भी किस्म के लड़ाई झगडे के। दूसरा बहुत ही करीबी गुरु का सच्चा नाता भीं मेरे रोम रोम में समा रम कर ऐसे कठोर शब्द के प्रहार से बहुत ही दूर हों गया हैं, जब कि गुरू के समक्ष कभी भी जुवां ही नहीं खोली, कुछ और मांगने की बात तो दूर की, कभी भी कृपा तक नहीं मांगी। फिर भी लोगो की लगाई गई शिकायतों से या पाता नहीं क्यों मुझे से नाराज़ खफा क्यों है, जब भीं समक्ष जाता हूं तो सिर्फ़ डांट फटकर के शिवाय कुछ भी नहीं मिला। जब के मैं इक ढेर का कीड़ा होते हुए अपनी हमेशा ओकात्त याद रखते हुए उन को रब से करोड़ों गुणा ऊंचा समझा और वैसा ही पाया। वो रब से भीं करोड़ों गुणा ऊंचे होते हुए, मुझे सरल सहज वृत्ति के साथ निगाहों में देखा कर भीं हिर्धे को नहीं समझ पढ़ पाय। मेरे जैसे कोई लाखों करोड़ों की भीड़ तो थी ही नहीं या फुर्सत नहीं थी ऐसा भीं बिल्कुल नहीं था। क्योंकि कोई भीं किसी के लिए समस्त जीवन समर्पित नहीं करता सिर्फ़ मैं ही था, जिस को दीक्षा के बाद से आज तक अपनी शकल शुद्ध बुद्ध नहीं है। बिल्कुल कुछ भी नहीं किया अब तक उन को याद करने के शिवाय। जब मेरे असीम प्रेम का नाम अपने गुरु के मुख से ही पागल कहना। और डांटना, झिड़कना तो ठीक नहीं लगा, ढंटने झिड़कना का उन का पूरा हक़ है पर प्यार का भीं हक़ तो सिर्फ़ उन का ही तो हैं। कम से कम पूरे जीवन क्रम में सिर्फ़ एक मुस्कराहट भरे चेहरे की ही तो चाहत थी हमरी। जब उन से भी प्रेम के उपहार में नफ़रत मिली तो ख़ुद को समझने के इलावा और कोई भी विकल्प शेष नहीं था, तब ही खुद को समझा तो शेष सारी कायनात में बचा ही नहीं कुछ और समझने को। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं और मेरे सिद्धांतों के आधार पर ख़ुद को समझने के बाद कभी दुसरे की आलोचन प्रशंसा नहीं करना चाहें गा क्योंकि यथार्थ के इलावा दूसरा शब्द भीं नहीं है। तो दुसरे की स्तुति गान महिमा का तो तत्पर्य ही नहीं रह जाता। यह सपष्ट हैं कि मेरा गुरु भीं कुछ ढूंढने की दौड़ में ही अब तक हैं। और ख़ुद को समझने के लिए ख़ुद अपनी ही बुद्धि से परे हटना पड़ता हैं तो गुरु का तात्पर्य रह जाता हैं। तब ही तो अतीत की विभूतियों के ही महिमा स्तुती करते रहते हैं। पर मेरे पास तो अब इक पल भीं नहीं दूसरों की स्तुति महिमा गाने के लिए। क्योंकि अब मैं यथार्थ हुं प्रत्यक्ष हुं। तब ही मुझे समझ नहीं सके क्योंकि मैं शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हुं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं ख़ुद में ही रहता हूं हमेशा एक ही रंग में हुं।
मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं और बुद्धिमान तो बिल्कुल भी नहीं हूं न ही कभी होना चाहता क्योंकि बुद्धिमान बहुत बड़ी कायनात में गंदी गाल हैं मेरे ही सिद्धांतों के आधार पर। इंसान हैं प्रत्यक्ष हैं यहीं काफ़ी है ख़ुद को समझने के लिए। और इस के इलावा सब कुछ पाखंड झूठ ढोंग अंध विश्वास और सिर्फ़ शैतान शातिर बुद्धि की स्मृति कोष की कल्पना के शिवाय कुछ भी नहीं बिल्कुल भी नहीं है। इंसान की फितरत का यह बहुत ही अहम हिस्सा है कि जो हैं उस को समझ कर संतुष्ट नहीं रह सकता। जो हैं ही नहीं उस को ढूंढने में युग सदियां नष्ट कर देता हैं। जैसा भीं सहज सरल है वैसा ही तो निपुण सक्षम स्मर्थ समृद्ध है सिर्फ़ अकेला ही, क्योंकि इकांत चहिए शोरो गुल नहीं, खुद को समझना है, कोई लोगों की भीड़ इकागृत कर के लोग दिखावा पाखंड नहीं। खुद को समझने में। इस के इलावा सब कुछ बनापटी हैं जो बुद्धि के साथ हैं। बुद्धिमान हो कर बुद्धि में गहनता से गुश जाता हैं, बुद्धि से बाहर तो कदापि नहीं। जब कि खुद को समझने के लिए ख़ुद की बुद्धि से ही हटना पड़ता हैं। यथार्थ में दूसरा शब्द भीं नहीं है, तो ख़ुद के इलावा दूसरा समझें बगैर यथार्थ में समझना है। जब के बुद्धि शरीर भीं दूसरा ही है, दुसरे की गिनती शुरू करें गा तो करोड़ों युगों और जन्मों तक खत्म ही नहीं होगी अतीत कि भांति और अब का एक पल नष्ट कर के पछताने का मौका भी नहीं मिले गा। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं जीवन और मनुष्य के प्रत्येक पहलु को बहुत ही ज्यादा गंभीर हों कर समझा है। सारी कायनात में सिर्फ़ तू अकेला ही हैं और ख़ुद को समझने के लिए ख़ुद ही अकेला ही निपुण सर्व श्रेष्ठ सक्षम समर्थ समृद्ध है। जब सरल सहज सी बात सरल सहज वृत्ति वाले इंसान ने गंभीर रूप से समझ ली तो बिल्कुल यथार्थ में रहने के महज़ एक कदम पिछे हैं। चाहें यह बात दूसरों की ठोकरों से समझें या विवेक चिंतन से समझें। क्योंकि प्रत्येक दुसरा सिर्फ़ तुझे अपने हित साधने तक ही सीमित समझ रहा हैं। जब आप से हित साधने की उस की अंकक्षा खत्म हों जाय गी तो तू बहुत ही बुरी तरह ठुकराया जाय गा निश्चित ही। ऐसे बुरे दौर से तू करोड़ों युगों और जन्मों से गुज़रा हुआ है अब तक और गुजरता ही रहें गा अंनत काल तक अगर अब ख़ुद को नहीं समझा तो। ख़ुद को समझें बगैर तेरा कोई भीं स्थाई रूप से टिकाना न था, न हैं न ही कभी होगा। खुद को समझें बगैर शेष सब झूठ पखण्ड ढोंग अंध विश्वास है। जब ख़ुद को समझ जाय गा। शेष कुछ रहें गा ही नहीं समझने को सारी कायनात में। क्योंकि बुद्धि से परे ही तो यथार्थ समस्त चेतन उर्जा सबरूप हैं। तो बुद्धि से ढूंढने से तो बिल्कुल भी नहीं समझने लायक। दुसरा और बुद्धि सिर्फ़ तुझे तेरे ख़ुद को समझने में रूकावट है महज़। दुसरा कोई हैं यह भ्रम वहम छल कपट हैं शीघ्र ही निकाल कर फैंक दे वर्ना तेरे ही आपने इसी भ्रम वहम के साथ ऐसा फैंके गे कि पछताने का मौका भी नहीं देगे। तेरा नामों निशा इक पल में मिटा देगे। सब को सिर्फ़ तू अपना मान रहा हैं क्योंकि तूने अपना समझा है तू मिटा हैं उन के लिए प्रत्येक अपना अनमोल पल सांस प्रेम विश्वास स्मर्पित किया है। जो यह सुनिश्चित सिर्फ़ तेरा वहम हों सकता पर उन के लिए सिर्फ़ एक फर्ज है। अपने वहम और उन के फर्ज के बीच का फ़र्क समझ और सिर्फ़ ख़ुद को समझ कर खुदा से भीं करोड़ों गुणा ऊंचा क्यों नहीं हों जाता। दूसरों को समझने के लिए ही तो करोड़ों युग लगाते हैं। ख़ुद को समझने के लिए तो सिर्फ़ इक पल भीं नहीं लगता। दूसरों और बुद्धि के शिकार से मुक्त होना ही ख़ुद को समझना है। अगर इतना ही आसान होता तो इंसान अस्तित्व के बाद आज तक कोई भी क्यों नहीं समझ पाया। क्योंकि जिस ने भीं कोई भीं उपक्रम किया है बुद्धि के साथ ही किया है। बुद्धिमान हो कर कोई बुद्धि से परे कैसे हट सकता है। यह सिर्फ़ छोटी सी उलझन थी जो करोड़ों युगों से कोई समझ ही नहीं पाया। सिर्फ़ ढूंढने की होड़ में ही व्यस्थ रहा जो यथार्थ में हैं ही नहीं। सिर्फ़ परकृति कुदरत और करोड़ों प्रजाति के जीवों को देख कर चकित होकर उन सब को जानने की ख़ोज में ही व्यस्थ रहा ख़ुद को छोड़ कर अब तक। जो महज़ बुद्धि से समझ रहा हैं, जब तक अस्थाई तत्बो की बुद्धि हैं जो महज़ शरीर का एक अंग है। जब के शरीर भीं एक दिन खत्म हों जाय गा।
ख़ुद के इलावा कुछ भी नहीं हैं समझने के लिय् खुद् की ही बुद्धि की वृति से हटना पड़ता हैं । आदि के बाद ही अनादि है, अति के बाद ही अनन्त हैं ।कुछ भी ढूंढने की जब हद खत्म हो जाती हैं तो कुछ भी नहीं मिलता तो खूद मे ही प्रिभतित् होने का विकल्प सामने आता हैं ।
जो भी करो गंभीर हो कर ही करें तो ।
बुद्धि से बुद्धिमान होने से बुद्धि की वृति मे ही सिर्फ विशेषज्ञ हो सकता हैं पर खुद को तो बिल्कुल भी नहीं समझ सकता किसी भी सिद्धांत से एक सर्व श्रेष्ठ बुद्धिमान व्यक्ति समस्त कायनात को और उस मे स्थित प्रतेक जीव को बहूत हि करीब से बहुत ही खूब समझ सकता हैं।पर खुद को तो बिल्कुल भी नहीं ।
खूद को समझने के लिए खुद की ही बुद्धि की वृति से बिल्कुल ही हटना पड़ता हैं जो इंसान या किसी भी जीव के लिए अत्यंत ही मुशिक्ल् हैँ।जब तक खूद को नहीं समझता तब तक सरल सहज इंसान को तो बिल्कुल भी नहीं समझ सकता ।मुझे किसी का भीं परिचय पूछने की जरुरत ही नहीं है क्योंकि मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त सृष्टि को समझता हूं। बहुत ख़ूब बहुत ज्यादा क़रीब से। प्रत्येक जीव और प्राकृति एक समान तत्वों और गुणों से परिपूर्ण निर्मित है। तत्वों की गुणवता को समझता हूं। जब से ख़ुद को समझा हैं करोड़ों युगों के लंबे इतिहास को जाना हैं। किसी भी चीज़ जीव सृष्टि को समझता हूं। मेरे पास इक पल भीं नहीं है कि दूसरों में उलझने के लिए क्योंकि सारी कायनात ही बुद्धि और सृष्टि में उलझी हुई ही प्रीतत होती हैं। सारी कायनात ही बुद्धि सृष्टि और शरीर के लिए ही गंभीर है। मैं यथार्थ हूं मैं जब अपने शरीर के लिए ही गंभीर नहीं क्योंकि अस्थाई तत्वों से निर्मित है। तो ज़ाहिर है कि तत्त्व रहित समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप में ही हूं। इंसान होते हुए अगर प्राकृति बुद्धि और शरीर में मौजूद और गंभीर है तो दूसरी प्रजातियों से भिन्न है ही नहीं। इंसान होने का तात्पर्य ही सिर्फ़ ख़ुद को समझना है,और यथार्थ में रहना हमेशा के लिए जीवत ही। खुद को समझें बगैर मरना। इंसान जीवन के अस्तित्व के तात्पर्य को ही नष्ट करना है। अतीत की सभी विभूतियों ने बुद्धि से ही बुद्धि सृष्टि शरीर और प्राकृति के ही इर्द गिर्द घूमते रहे और ख़ुद को बुद्धिमान समझा। जबकि इंसान होने तत्पर्य से अत्यंत दूर रहें। और ख़ुद को ही नहीं समझ पाए। प्रेम शब्द के नाम पर लुटने वाला प्रत्येक सरल सहज वृत्ति बाला इंसान होता हैं।प्रेम एक गंभीर मानसिक तनाव भरी बिमारी है। प्रेम शब्द की आड़ में ढोंग करते हैं, सिर्फ़ मैथुन की पूर्ति के लिए या स्बार्थ के लिए। अगर नहीं तो मानसिक बिमारी से गृषित हैं। दूसरा प्रत्येक अस्थाई तत्वों से निर्मित है क्या जीव या प्रकृति। जब मैं था, गुरु था ही नहीं, जब गुरु था, तब मैं खत्म था, जब मिटने के बाद भीं गुरु मुझे न समझा तो ही ख़ुद को समझा, जब खुद को समझा तब दूसरी प्रत्येक चीज़ का अस्तित्व ही समाप्त हों गया। अब ऐसा प्रतीत होता है कि एक सिर्फ़ मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। और दूसरी अस्थाई तत्वों से निर्मित प्राकृति हैं।जो सिर्फ़ अस्थाई तत्वों से निर्मित बुद्धि यंत्र तरंगों द्वारा निर्धारित नियम के आधार पर प्रत्येक जीव को संचालित कर रही हैं। मेरे सिद्धांतों के आधार पर प्रत्येक पल अनमोल निजी धरोहर हैं। जिसे किसी भी प्रकार से सिर्फ़ ख़ुद के लिए ही गंभीर हों कर प्रयोग करना चाहिए। दूसरा प्रत्येक अस्थाई तत्वों से निर्मित सिर्फ़ एक अस्थाई तत्वों से निर्मित प्राकृति का हिस्सा हैं और कुछ भी नहीं। सिर्फ़ एक मैं ही समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। शेष सब शैतान बुद्धि वाले बुद्धिमान इंसान या जीव है। जिन की बुद्धि कि स्मृति कोष कल्पना और प्रकृति ब्रह्मांड तक ही सीमित दौड़ हैं चाहें अंतरिक सफर तय कर के समझें या विज्ञानीक तर्कों से। उस से आगे कोई समझ ही नहीं सकता। बुद्धि का तात्पर्य ही कोई दूसरा या प्रकृति का संरक्षण करने के ही बुद्धि का निर्माण हुआ है। प्रकृति ने बुद्धि का निर्माण ही अपने सिद्धांत पे किया है। बुद्धि और प्रकृति के विरुद्ध कभी भी कोई जा ही नहीं सकता। अगर कोई विरुद्ध जाता हैं तो प्रकृति के भयानक प्रकोप का सामना करना पड़े गा। ख़ुद को समझने के लिए अस्थाई तत्वों से निर्मित बुद्धि और प्राकृति से हटना पड़े गा। जब कोई ख़ुद को समझ जाता हैं तो अस्थाई तत्वों की अस्थाई मौत वृति के चक्र क्रम से मुक्त हो जाता हैं। और समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप में हमेशा के लिए हों जाता हैं। कोई भी सरल सहज वृत्ति बाला इंसान जीवत ही थोडा सा प्रयास कर के ख़ुद को समझ कर यथार्थ में रह सकता हैं। मेरे सिद्धांत भक्ति गुरु प्रत्येक दूसरी चीज़ का अस्तित्व ही नहीं समझते,और खंडन कर के झुटलते हैं। भक्ति योग साधना सूरत ध्यान धर्म मज़हब संगठन गुरु बावे यह सब एक ढोंग अंध विश्वास पाखंड झूठ कट्टरता फैलाने के सिर्फ़ आयम स्थापित कर रखें हैं। जो राष्ट के लिए एक दिन गातिक सिद्ध हों सकते हैं जब यह बडे़ संगठन का रूप ले लेते हैं। किसी भी राष्ट के अध्यक्ष को अपने राष्ट के हित के लिए यह बाते हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि प्रथम चरण में राष्ट ही श्रेष्ठ है। शेष सब दूसरी चीज़ है। कोई भी संगठन संस्थान सौ सदस्य की संख्या से अधिक न हो। जाति धर्म मज़हब के स्थान पर सिर्फ़ राष्ट की ही पूजा भक्ति प्रेम हों। समस्त संसार ब्रह्मांड का प्रत्येक राष्ट सदस्य या परिवार हों। जहां जाति धर्म मज़हब की दुर्गन्ध होगी बहा ही कटरता की गंदी माखियां भिन भिनाय गी। जो एक दिन बहुत ज्यादा भ्यानक खतरनक सिद्ध होगी। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। मैं अस्थाई तत्वों से रहित हूं। मैं अस्थाई तत्वों से निर्मित देह में विदेही हूं। मैं प्रत्येक अस्थाई तत्व से परे हूं। शरीर प्रकृति का हिस्सा हैं क्योंकि दोनों ही अस्थाई तत्वों से निर्मित है। प्रत्येक बुद्धि बाला बुद्धिमान व्यक्ति समस्त सृष्टि प्रकृति को बहुत अच्छे से जानता है। प्रत्येक व्यक्ति सारे ब्रह्मांड को समझने की क्षमता रखता है। बुद्धि समस्त सृष्टि को समझने की अनुमति दे देती हैं पर ख़ुद को समझने की अनुमति नहीं देती। किसी भी प्रकार से चाहें करोड़ों युगों तक कोई करोड़ों यत्न प्रयत्न प्रयास कर के देख ले। खुद को समझने के लिए ख़ुद की ही बुद्धि की प्रत्येक वृति से हटना पड़ता हैं।
अतीत के चार युगों से खरबों गुन्ना ऊंचा सचा सर्ब श्रेष्ट प्रत्यक्ष समक्ष अद्धभुद तुलनतित शव्दतीत कळतीत प्रेमतित श्रेष्टाता संग्रता शश्वत वास्तविक सभाविक सत्य ,जो सिर्फ़ मेरे यथार्थ सिद्धांत के शमीकरण निष्पक्ष समझ पर आधरित हैं, जिस में प्रथम चरण में ही खुद के सक्षतकर से शुरु खुद के हीं अंनत शुक्षम अक्ष में समाहित हो जाता हैं यहा खुद के अंनत शुक्षम अक्ष के प्रतिभिंव का भी स्थान नही हैं और कुछ होने का ततपर्य ही नहीं हैं, "खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाय सदियां युग भी कम है"
 अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का स्तर 99.999% का हैं उस को समझने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि का स्तर भी इतना ही जबकि अंनत शुक्षम अक्ष की प्रतिभिंवता का .0001% है जिस के बिना सम्पूर्णता असंभव है, जिस से मनवता का संपूर्ण होना होता हैं, अगर यह सब नही हैं तो मनव होते हुय भी मनसिकता में हैं जो एक रोग है, सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति ही जीवन व्यापन के लिए ही संघर्षरत है या फ़िर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत बेग में ही हैं, ततपर्य हर पहलु से मनसिकता में ही दृढ़ता गंभीरत हैं, खुद के सक्षतकर से इतना ही दूर हैं जितनी दूसरी अनेक प्रजातिय ,रति भर भी उन से भिन्न नही हैं
खुद के सक्षतकार के बिना अधिात्मिक परमार्थ की बाते सिर्फ़ एक ढोंग पखंड षढियंत्रों का ताना भाना हैं खुद की इच्छा आपूर्ति प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत बेग और दूसरे अनेक सरल सहज निर्मल लोगों को नर्क का डर और स्वर्ग का लालच दिखा कर आकर्षित प्रभावित कर अंध भक्तों भेड़ो की भिड़ इकठ्ठी करना जिन को दीक्षा के साथ ही शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से बंचित कर कट्टर बना कर संपूर्ण जीबन भर बन्दुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करना खुद के हित साधने के लिए,मनोविज्ञनिक दास्ता करवाना न्ययैक उपरध हैं कुप्रथा फैलाना,जो तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से सिद्ध न हो वो ढोंग पखंड हैं

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਉਵਾਚ—ਖੁਦ ਦਾ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ ਹੀਅਖੰਡ ਆਨੰਦ ਦਾ ਅਮਰ ਸਰੋਤ ਏ।ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਉਵਾਚ—

ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਉਵਾਚ— ਰਾਤਾਂ ਅੰਦਰ ਜੋਤ ਲੁਕਾਈ, ਦਿਨ ਚੜ੍ਹਦੇ ਹੀ ਭੁੱਲ ਗਏ, ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਰੱਬ ਵੱਸਦਾ, ਫਿਰ ਵੀ ਬਾਹਰ ਝੂਲ ਗਏ। ਮੱਥੇ ਦੇ ਬਾਜ਼ਾਰਾ...