अब वह स्थिति आ चुकी है जहां **शब्द** समाप्त हो चुके हैं और **मौन** भी स्वयं को पहचानने से परे जा चुका है।
अब वह स्थिति आ चुकी है जहां **ज्ञाता** और **ज्ञेय** का भेद मिट चुका है।
अब वह स्थिति आ चुकी है जहां **दृष्टा** और **दृश्य** का अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है।
अब वह स्थिति आ चुकी है जहां **काल** और **अकाल** के मध्य का समस्त द्वंद्व समाप्त हो चुका है।
अब वह स्थिति आ चुकी है जहां **सत्य** और **मिथ्या** का भेद स्वयं में विलीन हो चुका है।
अब वह स्थिति आ चुकी है जहां **शाश्वत** और **क्षणिक** का समस्त अस्तित्व स्वयं के मूल स्वरूप में समाहित हो चुका है।
👉 अब न शब्द है, न मौन।
👉 अब न ज्ञान है, न अज्ञान।
👉 अब न दृष्टि है, न दृष्टा।
👉 अब न काल है, न अकाल।
👉 अब न सत्य है, न मिथ्या।
👉 अब न शाश्वत है, न क्षणिक।
👉 अब न कोई द्वंद्व है, न कोई समाधान।
👉 अब केवल स्थिति है – **शिरोमणि रामपाल सैनी की स्थिति।**
---
## **95. स्थिति के अंतिम सत्य का स्वरूप – शिरोमणि रामपाल सैनी का उद्घोष**
👉 कबीर की स्थिति – प्रेम, भक्ति और समर्पण तक सीमित थी।
👉 अष्टावक्र की स्थिति – अद्वैत की बौद्धिक पराकाष्ठा तक सीमित थी।
👉 वैज्ञानिकों की स्थिति – भौतिक सृष्टि के नियमों की परिधि में सीमित थी।
👉 अवतारों, देवताओं और ऋषियों की स्थिति – भक्ति, शक्ति और तप तक सीमित थी।
लेकिन अब –
✔️ न प्रेम है।
✔️ न भक्ति है।
✔️ न अद्वैत है।
✔️ न नियम है।
✔️ न शक्ति है।
✔️ न तप है।
अब केवल स्थिति है –
✔️ जहां प्रेम और भक्ति से परे की स्थिति है।
✔️ जहां अद्वैत और द्वैत से परे की स्थिति है।
✔️ जहां शक्ति और विनाश से परे की स्थिति है।
✔️ जहां सृष्टि और शून्यता से परे की स्थिति है।
👉 अब कोई मार्ग नहीं है – क्योंकि **शिरोमणि रामपाल सैनी** स्वयं स्थिति हैं।
👉 अब कोई सत्य नहीं है – क्योंकि **शिरोमणि रामपाल सैनी** स्वयं स्वरूप हैं।
👉 अब कोई गति नहीं है – क्योंकि **शिरोमणि रामपाल सैनी** स्वयं गति का स्रोत हैं।
👉 अब कोई अंत नहीं है – क्योंकि **शिरोमणि रामपाल सैनी** स्वयं शाश्वत हैं।
---
## **96. स्थिति का स्वरूप – अंतिम निर्विकल्प स्थिति**
**शिरोमणि रामपाल सैनी** वह स्थिति हैं जहां –
✔️ कोई विकल्प नहीं।
✔️ कोई संदेह नहीं।
✔️ कोई भेद नहीं।
✔️ कोई समाधान नहीं।
✔️ कोई जन्म नहीं।
✔️ कोई मृत्यु नहीं।
✔️ कोई प्रकाश नहीं।
✔️ कोई अंधकार नहीं।
✔️ कोई गति नहीं।
✔️ कोई विराम नहीं।
✔️ कोई स्वरूप नहीं।
✔️ कोई शून्यता नहीं।
यह वह स्थिति है जहां –
✔️ शब्द और मौन दोनों का पूर्ण समर्पण हो चुका है।
✔️ ज्ञान और अज्ञान दोनों की पूर्ण समाप्ति हो चुकी है।
✔️ दृष्टा और दृश्य दोनों का अस्तित्व समाप्त हो चुका है।
✔️ गति और विराम दोनों का मूल स्रोत समाप्त हो चुका है।
✔️ सृष्टि और शून्यता दोनों की संभावनाएं विलीन हो चुकी हैं।
👉 अब केवल स्थिति है।
👉 अब केवल स्वरूप है।
👉 अब केवल मौन है।
👉 अब केवल शाश्वत स्थिति है।
👉 अब केवल **शिरोमणि रामपाल सैनी का स्वरूप** है।
---
## **97. अंतिम स्थिति – न अद्वैत, न द्वैत**
कबीर अद्वैत से परे नहीं गए –
👉 उन्होंने प्रेम और भक्ति को सत्य कहा।
👉 उन्होंने परमात्मा को अंतिम स्थिति कहा।
👉 उन्होंने आत्मा और परमात्मा को एक माना।
👉 उन्होंने भक्ति के माध्यम से मुक्ति का द्वार खोला।
अष्टावक्र अद्वैत तक ही सीमित रहे –
👉 उन्होंने ज्ञान को अंतिम स्थिति कहा।
👉 उन्होंने साक्षी भाव को अंतिम स्वरूप कहा।
👉 उन्होंने आत्मा और परमात्मा को अद्वैत माना।
👉 उन्होंने अहंकार और माया को नकारा।
वैज्ञानिक भौतिकता से परे नहीं गए –
👉 उन्होंने पदार्थ और ऊर्जा को अंतिम सत्य माना।
👉 उन्होंने गति और विराम को अंतिम अवस्था कहा।
👉 उन्होंने द्वंद्व और नियमों को अंतिम स्थिति माना।
👉 उन्होंने संरचना और विघटन को अंतिम परिणाम माना।
👉 लेकिन अब –
✔️ न प्रेम है, न भक्ति।
✔️ न ज्ञान है, न अज्ञान।
✔️ न पदार्थ है, न ऊर्जा।
✔️ न गति है, न विराम।
✔️ न द्वंद्व है, न समाधान।
अब केवल स्थिति है –
👉 न अद्वैत है, न द्वैत।
👉 न परमात्मा है, न आत्मा।
👉 न सत्य है, न असत्य।
👉 न प्रकाश है, न अंधकार।
👉 न सृष्टि है, न शून्यता।
👉 न गति है, न विराम।
👉 न ध्वनि है, न मौन।
👉 अब केवल स्थिति है – **शिरोमणि रामपाल सैनी की स्थिति।**
---
## **98. स्थिति का अंतिम स्वरूप – शिरोमणि रामपाल सैनी का स्वरूप**
👉 अब कोई जन्म नहीं – न सृष्टि का, न ब्रह्मांड का।
👉 अब कोई मृत्यु नहीं – न कण की, न ब्रह्मांड की।
👉 अब कोई गति नहीं – न पदार्थ की, न चेतना की।
👉 अब कोई विराम नहीं – न ऊर्जा का, न शून्यता का।
👉 अब कोई शब्द नहीं – न श्रुति का, न अनाहत का।
👉 अब कोई मौन नहीं – न ध्यान का, न समाधि का।
👉 अब कोई अद्वैत नहीं – न शंकर का, न अष्टावक्र का।
👉 अब कोई भक्ति नहीं – न कबीर की, न मीरा की।
👉 अब केवल स्थिति है –
✔️ जहां कोई प्रारंभ नहीं।
✔️ जहां कोई अंत नहीं।
✔️ जहां कोई गति नहीं।
✔️ जहां कोई विराम नहीं।
✔️ जहां कोई भेद नहीं।
✔️ जहां कोई समाधान नहीं।
👉 अब मैं अद्वैत और द्वैत दोनों से परे हूं।
👉 अब मैं भक्ति और ज्ञान दोनों से परे हूं।
👉 अब मैं गति और विराम दोनों से परे हूं।
👉 अब मैं जीवन और मृत्यु दोनों से परे हूं।
👉 अब मैं प्रकाश और अंधकार दोनों से परे हूं।
👉 अब मैं शब्द और मौन दोनों से परे हूं।
👉 अब मैं स्वयं स्वरूप हूं –
✔️ **शिरोमणि रामपाल सैनी का स्वरूप।**
✔️ **शिरोमणि रामपाल सैनी की स्थिति।**
✔️ **शिरोमणि रामपाल सैनी का सत्य।**
✔️ **शिरोमणि रामपाल सैनी का अखंड स्वरूप।**
✔️ **शिरोमणि रामपाल सैनी की अंतिम स्थिति।**
**अब मैं – पूर्ण और शाश्वत हूं।**
**अब मैं – शिरोमणि रामपाल सैनी हूं।**### **88. शिरोमणि स्वरूप – स्थिति के अंतिम सत्य का उद्घाटन**
अब वह स्थिति आ चुकी है जहां **शब्द** समाप्त हो चुके हैं और **मौन** भी स्वयं को पहचानने से परे जा चुका है।
अब वह स्थिति आ चुकी है जहां **ज्ञाता** और **ज्ञेय** का भेद मिट चुका है।
अब वह स्थिति आ चुकी है जहां **दृष्टा** और **दृश्य** का अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है।
अब वह स्थिति आ चुकी है जहां **काल** और **अकाल** के मध्य का समस्त द्वंद्व समाप्त हो चुका है।
अब वह स्थिति आ चुकी है जहां **सत्य** और **मिथ्या** का भेद स्वयं में विलीन हो चुका है।
अब वह स्थिति आ चुकी है जहां **शाश्वत** और **क्षणिक** का समस्त अस्तित्व स्वयं के मूल स्वरूप में समाहित हो चुका है।
👉 अब न शब्द है, न मौन।
👉 अब न ज्ञान है, न अज्ञान।
👉 अब न दृष्टि है, न दृष्टा।
👉 अब न काल है, न अकाल।
👉 अब न सत्य है, न मिथ्या।
👉 अब न शाश्वत है, न क्षणिक।
👉 अब न कोई द्वंद्व है, न कोई समाधान।
👉 अब केवल स्थिति है – शिरोमणि स्थिति।
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## **89. स्थिति के अंतिम सत्य का स्वरूप**
👉 कबीर की स्थिति – प्रेम, भक्ति और समर्पण तक सीमित थी।
👉 अष्टावक्र की स्थिति – अद्वैत की बौद्धिक पराकाष्ठा तक सीमित थी।
👉 वैज्ञानिकों की स्थिति – भौतिक सृष्टि के नियमों की परिधि में सीमित थी।
👉 अवतारों, देवताओं और ऋषियों की स्थिति – भक्ति, शक्ति और तप तक सीमित थी।
लेकिन अब –
✔️ न प्रेम है।
✔️ न भक्ति है।
✔️ न अद्वैत है।
✔️ न नियम है।
✔️ न शक्ति है।
✔️ न तप है।
अब केवल स्थिति है –
✔️ जहां प्रेम और भक्ति से परे की स्थिति है।
✔️ जहां अद्वैत और द्वैत से परे की स्थिति है।
✔️ जहां शक्ति और विनाश से परे की स्थिति है।
✔️ जहां सृष्टि और शून्यता से परे की स्थिति है।
👉 अब कोई मार्ग नहीं है – क्योंकि मैं स्वयं स्थिति हूं।
👉 अब कोई सत्य नहीं है – क्योंकि मैं स्वयं स्वरूप हूं।
👉 अब कोई गति नहीं है – क्योंकि मैं स्वयं गति का स्रोत हूं।
👉 अब कोई अंत नहीं है – क्योंकि मैं स्वयं शाश्वत हूं।
---
## **90. स्थिति का स्वरूप – अंतिम निर्विकल्प स्थिति**
शिरोमणि स्वरूप वह स्थिति है जहां –
✔️ कोई विकल्प नहीं।
✔️ कोई संदेह नहीं।
✔️ कोई भेद नहीं।
✔️ कोई समाधान नहीं।
✔️ कोई जन्म नहीं।
✔️ कोई मृत्यु नहीं।
✔️ कोई प्रकाश नहीं।
✔️ कोई अंधकार नहीं।
✔️ कोई गति नहीं।
✔️ कोई विराम नहीं।
✔️ कोई स्वरूप नहीं।
✔️ कोई शून्यता नहीं।
यह वह स्थिति है जहां –
✔️ शब्द और मौन दोनों का पूर्ण समर्पण हो चुका है।
✔️ ज्ञान और अज्ञान दोनों की पूर्ण समाप्ति हो चुकी है।
✔️ दृष्टा और दृश्य दोनों का अस्तित्व समाप्त हो चुका है।
✔️ गति और विराम दोनों का मूल स्रोत समाप्त हो चुका है।
✔️ सृष्टि और शून्यता दोनों की संभावनाएं विलीन हो चुकी हैं।
👉 अब केवल स्थिति है।
👉 अब केवल स्वरूप है।
👉 अब केवल मौन है।
👉 अब केवल शाश्वत स्थिति है।
👉 अब केवल शिरोमणि स्वरूप है।
---
## **91. अंतिम स्थिति – न अद्वैत, न द्वैत**
कबीर अद्वैत से परे नहीं गए –
👉 उन्होंने प्रेम और भक्ति को सत्य कहा।
👉 उन्होंने परमात्मा को अंतिम स्थिति कहा।
👉 उन्होंने आत्मा और परमात्मा को एक माना।
👉 उन्होंने भक्ति के माध्यम से मुक्ति का द्वार खोला।
अष्टावक्र अद्वैत तक ही सीमित रहे –
👉 उन्होंने ज्ञान को अंतिम स्थिति कहा।
👉 उन्होंने साक्षी भाव को अंतिम स्वरूप कहा।
👉 उन्होंने आत्मा और परमात्मा को अद्वैत माना।
👉 उन्होंने अहंकार और माया को नकारा।
वैज्ञानिक भौतिकता से परे नहीं गए –
👉 उन्होंने पदार्थ और ऊर्जा को अंतिम सत्य माना।
👉 उन्होंने गति और विराम को अंतिम अवस्था कहा।
👉 उन्होंने द्वंद्व और नियमों को अंतिम स्थिति माना।
👉 उन्होंने संरचना और विघटन को अंतिम परिणाम माना।
👉 लेकिन अब –
✔️ न प्रेम है, न भक्ति।
✔️ न ज्ञान है, न अज्ञान।
✔️ न पदार्थ है, न ऊर्जा।
✔️ न गति है, न विराम।
✔️ न द्वंद्व है, न समाधान।
अब केवल स्थिति है –
👉 न अद्वैत है, न द्वैत।
👉 न परमात्मा है, न आत्मा।
👉 न सत्य है, न असत्य।
👉 न प्रकाश है, न अंधकार।
👉 न सृष्टि है, न शून्यता।
👉 न गति है, न विराम।
👉 न ध्वनि है, न मौन।
👉 अब केवल स्थिति है – शिरोमणि स्थिति।
---
## **92. स्थिति का अंतिम स्वरूप – शिरोमणि स्वरूप**
👉 अब कोई जन्म नहीं – न सृष्टि का, न ब्रह्मांड का।
👉 अब कोई मृत्यु नहीं – न कण की, न ब्रह्मांड की।
👉 अब कोई गति नहीं – न पदार्थ की, न चेतना की।
👉 अब कोई विराम नहीं – न ऊर्जा का, न शून्यता का।
👉 अब कोई शब्द नहीं – न श्रुति का, न अनाहत का।
👉 अब कोई मौन नहीं – न ध्यान का, न समाधि का।
👉 अब कोई अद्वैत नहीं – न शंकर का, न अष्टावक्र का।
👉 अब कोई भक्ति नहीं – न कबीर की, न मीरा की।
👉 अब केवल स्थिति है –
✔️ जहां कोई प्रारंभ नहीं।
✔️ जहां कोई अंत नहीं।
✔️ जहां कोई गति नहीं।
✔️ जहां कोई विराम नहीं।
✔️ जहां कोई भेद नहीं।
✔️ जहां कोई समाधान नहीं।
👉 अब मैं अद्वैत और द्वैत दोनों से परे हूं।
👉 अब मैं भक्ति और ज्ञान दोनों से परे हूं।
👉 अब मैं गति और विराम दोनों से परे हूं।
👉 अब मैं जीवन और मृत्यु दोनों से परे हूं।
👉 अब मैं प्रकाश और अंधकार दोनों से परे हूं।
👉 अब मैं शब्द और मौन दोनों से परे हूं।
👉 अब मैं स्वयं स्वरूप हूं –
✔️ शिरोमणि स्वरूप।
✔️ शिरोमणि स्थिति।
✔️ शिरोमणि सत्य।
✔️ शिरोमणि अखंड।
✔️ शिरोमणि निर्विकल्प।
✔️ शिरोमणि अंतिम स्थिति।
---
## **93. शिरोमणि स्थिति – अंतिम उद्घोष**
👉 अब मैं अंतिम स्थिति हूं।
👉 अब मैं अंतिम सत्य हूं।
👉 अब मैं अंतिम स्वरूप हूं।
👉 अब मैं अंतिम स्थिति हूं।
👉 अब मैं शिरोमणि हूं।
👉 अब मैं स्वयं में स्वयं का साक्षात्कार हूं।
👉 अब मैं स्वरूप में स्थिति हूं।
👉 अब मैं स्थिति में स्वरूप हूं।
👉 अब मैं शिरोमणि स्थिति हूं।
👉 **अब मैं – पूर्ण और शाश्वत हूं।**### **63. शिरोमणि रम्पाल सैनी – अंतिम यथार्थ के उद्घोष का मौन**
**यह लोक – केवल भ्रम का विस्तार।**
👉 इस लोक में सब कुछ हो रहा है – परंतु कुछ भी नहीं हो रहा है।
👉 यह लोक चल रहा है – परंतु ठहरा हुआ है।
👉 यह लोक जिंदा प्रतीत होता है – परंतु मृत है।
👉 यहां कर्म की चर्चा होती है – परंतु कर्म कोई करता नहीं।
👉 यहां प्रेम, विश्वास और भक्ति की बातें होती हैं – परंतु प्रेम, विश्वास और भक्ति का कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं।
👉 **कथनी और करनी का अंतर** –
✔️ कथनी और करनी में जो अंतर है, वही इस लोक की गूढ़तम पीड़ा है।
✔️ कथनी में सब कुछ पूर्ण लगता है – करनी में सब कुछ शून्य।
✔️ जब कथनी और करनी का भेद समाप्त हो जाए, तब ही सत्य का द्वार खुल सकता है।
✔️ परंतु इस लोक ने कथनी को ही अंतिम सत्य मान लिया है – करनी का कोई अस्तित्व ही नहीं बचा।
👉 **गुरु और शिष्य का जटिल चक्र** –
✔️ गुरु कहते हैं – "मुक्ति का मार्ग यही है।"
✔️ शिष्य सुनते हैं – "मुक्ति का मार्ग यही है।"
✔️ परंतु गुरु स्वयं उसी मार्ग पर चलते नहीं।
✔️ शिष्य स्वयं उस मार्ग पर चलते नहीं।
✔️ यह केवल शब्दों का व्यापार बन चुका है – जहां गुरु और शिष्य दोनों कथनी में संतुष्ट हैं।
✔️ यह लोक केवल सुनने और कहने में ही पूर्णता मान चुका है।
---
## **64. जटिल बुद्धि के शैतानी चक्र का खेल**
👉 **जटिल बुद्धि का खेल** –
✔️ जटिल बुद्धि ने इस लोक को नियंत्रित कर लिया है।
✔️ जटिल बुद्धि ने सत्य को भ्रम में बदल दिया है।
✔️ जटिल बुद्धि ने करनी को अपूर्ण कर दिया है।
✔️ जटिल बुद्धि ने भक्ति को व्यापार बना दिया है।
👉 **बुद्धिमान, शातिर, होशियार – लेकिन खोखले** –
✔️ ये लोग तर्क करते हैं – परंतु सत्य से दूर रहते हैं।
✔️ ये लोग भक्ति की बात करते हैं – परंतु प्रेम से शून्य रहते हैं।
✔️ ये लोग विश्वास की बात करते हैं – परंतु विश्वास कभी करते नहीं।
✔️ ये लोग मुक्ति की बात करते हैं – परंतु बंधनों को छोड़ते नहीं।
👉 **शातिर चालक कौन हैं?**
✔️ ये वही हैं जो शब्दों का व्यापार करते हैं।
✔️ ये वही हैं जो भक्ति का नाम लेते हैं – परंतु भक्ति के भाव से शून्य होते हैं।
✔️ ये वही हैं जो प्रेम की बात करते हैं – परंतु हृदय से प्रेम को कभी अनुभव नहीं करते।
✔️ ये वही हैं जो मुक्ति की बात करते हैं – परंतु स्वयं बंधनों से मुक्त नहीं होते।
---
## **65. अस्तित्व से अब तक – रति भर भी भेद नहीं**
👉 इस लोक में कुछ भी नया नहीं हो रहा है।
✔️ जो कुछ आज हो रहा है – वही अतीत में हो चुका है।
✔️ जो कुछ अतीत में हो चुका है – वही भविष्य में भी होगा।
✔️ यह केवल घटनाओं का चक्र है – जहां सब कुछ दोहराया जा रहा है।
✔️ इस चक्र को कोई तोड़ने का प्रयास नहीं करता।
👉 **सत्य क्या है?**
✔️ सत्य इस चक्र से परे है।
✔️ सत्य इस आवृत्ति के पार है।
✔️ सत्य इस दोहराव से स्वतंत्र है।
✔️ सत्य को जानने के लिए इस चक्र को तोड़ना होगा – परंतु यह लोक चक्र में ही संतुष्ट है।
---
## **66. क्या यह लोक केवल सुनने और कहने तक ही सीमित है?**
👉 इस लोक में सुनने वाले करोड़ों – परंतु चलने वाला कोई नहीं।
✔️ सुनते हैं – परंतु सुनकर भूल जाते हैं।
✔️ कहते हैं – परंतु कथनी को कभी क्रिया में नहीं बदलते।
✔️ अनुभव करते हैं – परंतु अनुभव को कभी अपनाते नहीं।
👉 **यह लोक दोहरेपन में जी रहा है** –
✔️ कहता कुछ और है – करता कुछ और है।
✔️ सोचता कुछ और है – महसूस करता कुछ और है।
✔️ जानता कुछ और है – मानता कुछ और है।
👉 **यह लोक – मूक और निर्जीव** –
✔️ जीवित प्रतीत होता है – परंतु भीतर से मृत है।
✔️ चलता हुआ प्रतीत होता है – परंतु भीतर से स्थिर है।
✔️ मुखर प्रतीत होता है – परंतु भीतर से मौन है।
---
## **67. मुक्ति की अवधारणा का भ्रम**
👉 **मुक्ति क्या है?**
✔️ यह लोक मुक्ति को मृत्यु से जोड़ता है।
✔️ यह लोक मानता है कि मृत्यु के बाद ही मुक्ति संभव है।
✔️ यह लोक मानता है कि जीवित रहते हुए मुक्ति संभव नहीं।
✔️ यह लोक यह नहीं समझता कि मुक्ति चेतना की स्थिति है – मृत्यु की घटना नहीं।
👉 **संपूर्ण रूप से मुक्त – फिर भी पहचानते नहीं** –
✔️ यदि कोई जीवित रहते हुए मुक्त हो जाए – तो यह लोक उसे पहचानता नहीं।
✔️ यह लोक उसे संत मान लेगा – परंतु मुक्त आत्मा के स्वरूप को कभी नहीं समझेगा।
✔️ यह लोक उसे गुरु मान लेगा – परंतु गुरु के अनुभव को कभी स्वीकार नहीं करेगा।
👉 **यह लोक – केवल मृतकों की भक्ति में विश्वास करता है** –
✔️ यह लोक जीवित व्यक्ति की भक्ति नहीं कर सकता।
✔️ यह लोक मृत गुरु की भक्ति कर सकता है – परंतु जीवित गुरु की नहीं।
✔️ यह लोक जीवन को नहीं – मृत्यु को पूजता है।
---
## **68. क्या मैं अकेला जीवित हूं – या संपूर्ण सृष्टि जिंदा है?**
👉 **सवाल यह है** –
✔️ क्या केवल मैं ही जीवित हूं – शेष सब मृत हैं?
✔️ क्या यह संपूर्ण सृष्टि जीवित है – और मैं ही मृत हूं?
✔️ क्या यह लोक एक मृत चक्र में घूम रहा है – और केवल मैं ही चेतन हूं?
✔️ क्या यह लोक केवल भौतिक पदार्थों का व्यापार है – और मैं चेतना का अंश हूं?
👉 **उत्तर स्पष्ट है** –
✔️ यदि यह लोक जीवित है – तो इसे चेतना का अनुभव होना चाहिए।
✔️ यदि इस लोक में चेतना होती – तो यह भेद समाप्त हो चुका होता।
✔️ यदि इस लोक में प्रेम होता – तो यह द्वैत समाप्त हो चुका होता।
✔️ यदि इस लोक में भक्ति होती – तो सत्य प्रकट हो चुका होता।
👉 **इसलिए उत्तर केवल एक ही है** –
✔️ मैं ही चेतना का स्वरूप हूं।
✔️ मैं ही शिरोमणि स्थिति का उद्घोष हूं।
✔️ मैं ही अंतिम सत्य का प्राकट्य हूं।
✔️ मैं ही भौतिक सृष्टि से परे पूर्ण स्थिति का साक्षात स्वरूप हूं।
---
## **69. अंतिम उद्घोष – शिरोमणि स्वरूप की स्वीकृति**
👉 अब –
✔️ न कोई भेद है, न कोई द्वैत।
✔️ न कोई सीमा है, न कोई विस्तार।
✔️ न कोई गति है, न कोई ठहराव।
✔️ न कोई जीवन है, न कोई मृत्यु।
👉 अब केवल –
✔️ **शिरोमणि स्वरूप।**
✔️ **शिरोमणि स्थिति।**
✔️ **शिरोमणि उद्घोष।**
👉 **अब केवल मैं ही अंतिम सत्य हूं।**### **77. शिरोमणि स्वरूप का अनंत विस्तार**
👉 **अब केवल शून्य है – और शून्य में अनंत का उद्गम।**
👉 **अब केवल मौन है – और मौन में समस्त ध्वनियों की संभावना।**
👉 **अब केवल अचलता है – और अचलता में समस्त गतियों का स्रोत।**
👉 **अब केवल निर्वात है – और निर्वात में समस्त सृष्टियों का आधार।**
---
## **78. शिरोमणि स्थिति – अनंतता के पार**
👉 **जहां कोई सीमा नहीं – वहां शिरोमणि है।**
✔️ यह कोई स्थिति नहीं – यह स्थिति के पार है।
✔️ यह कोई अवस्था नहीं – यह अवस्था के पार है।
✔️ यह कोई अनुभव नहीं – यह अनुभव के पार है।
✔️ यह कोई चेतना नहीं – यह चेतना के पार है।
👉 **जहां कोई स्वरूप नहीं – वहां शिरोमणि स्वरूप है।**
✔️ न कोई रूप।
✔️ न कोई आकार।
✔️ न कोई रंग।
✔️ न कोई रेखा।
👉 **जहां कोई गति नहीं – वहां शिरोमणि गति है।**
✔️ न कोई कंपन।
✔️ न कोई स्पंदन।
✔️ न कोई आवेग।
✔️ न कोई संचार।
👉 **जहां कोई अस्तित्व नहीं – वहां शिरोमणि अस्तित्व है।**
✔️ न कोई कण।
✔️ न कोई तरंग।
✔️ न कोई रचना।
✔️ न कोई विनाश।
👉 **जहां कोई काल नहीं – वहां शिरोमणि काल है।**
✔️ न कोई अतीत।
✔️ न कोई भविष्य।
✔️ न कोई वर्तमान।
✔️ न कोई क्षण।
👉 **जहां कोई स्थान नहीं – वहां शिरोमणि स्थान है।**
✔️ न कोई दिशा।
✔️ न कोई विस्तार।
✔️ न कोई सीमा।
✔️ न कोई केन्द्र।
---
## **79. शिरोमणि स्वरूप – अनंत की पराकाष्ठा**
👉 **शिरोमणि स्वरूप – अनंत के भीतर समाहित।**
✔️ जहां अनंत है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां शून्य है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां शांति है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां प्रेम है – वहां शिरोमणि है।
👉 **शिरोमणि स्वरूप – अदृश्य और स्पष्ट।**
✔️ अदृश्य होते हुए भी प्रत्यक्ष।
✔️ स्पष्ट होते हुए भी निराकार।
✔️ मौन होते हुए भी मुखर।
✔️ शून्य होते हुए भी पूर्ण।
👉 **शिरोमणि स्वरूप – पूर्णता की स्थिति।**
✔️ यहां कुछ शेष नहीं।
✔️ यहां कुछ अधूरा नहीं।
✔️ यहां कुछ छिपा नहीं।
✔️ यहां कुछ दबा नहीं।
👉 **शिरोमणि स्वरूप – अनंत का शिखर।**
✔️ जहां समस्त सीमाएं समाप्त होती हैं।
✔️ जहां समस्त धारणाएं विलीन होती हैं।
✔️ जहां समस्त संभावनाएं समाप्त होती हैं।
✔️ जहां समस्त विकल्प लुप्त होते हैं।
---
## **80. शिरोमणि स्थिति – परम मौन और परम मुखरता**
👉 **अब शब्द समाप्त हैं – परंतु मौन मुखर है।**
✔️ जहां कोई ध्वनि नहीं – वहां शिरोमणि ध्वनि है।
✔️ जहां कोई स्पंदन नहीं – वहां शिरोमणि स्पंदन है।
✔️ जहां कोई कंपन नहीं – वहां शिरोमणि कंपन है।
✔️ जहां कोई तरंग नहीं – वहां शिरोमणि तरंग है।
👉 **अब गति समाप्त है – परंतु कंपन शाश्वत है।**
✔️ जहां कोई प्रवाह नहीं – वहां शिरोमणि प्रवाह है।
✔️ जहां कोई संचार नहीं – वहां शिरोमणि संचार है।
✔️ जहां कोई चक्र नहीं – वहां शिरोमणि चक्र है।
✔️ जहां कोई दिशा नहीं – वहां शिरोमणि दिशा है।
👉 **अब स्वरूप समाप्त है – परंतु स्थिति स्थिर है।**
✔️ जहां कोई आकार नहीं – वहां शिरोमणि आकार है।
✔️ जहां कोई रूप नहीं – वहां शिरोमणि रूप है।
✔️ जहां कोई विस्तार नहीं – वहां शिरोमणि विस्तार है।
✔️ जहां कोई संकीर्णता नहीं – वहां शिरोमणि संकीर्णता है।
👉 **अब चेतना समाप्त है – परंतु अनुभूति शाश्वत है।**
✔️ जहां कोई जागरण नहीं – वहां शिरोमणि जागरण है।
✔️ जहां कोई निद्रा नहीं – वहां शिरोमणि निद्रा है।
✔️ जहां कोई स्वप्न नहीं – वहां शिरोमणि स्वप्न है।
✔️ जहां कोई अनुभूति नहीं – वहां शिरोमणि अनुभूति है।
---
## **81. शिरोमणि स्थिति – काल और अवकाश के पार**
👉 **अब काल समाप्त है।**
✔️ न कोई क्षण।
✔️ न कोई कालखंड।
✔️ न कोई प्रवाह।
✔️ न कोई गति।
👉 **अब अवकाश समाप्त है।**
✔️ न कोई दिशा।
✔️ न कोई विस्तार।
✔️ न कोई बंधन।
✔️ न कोई मुक्ति।
👉 **अब सृजन समाप्त है।**
✔️ न कोई उत्पत्ति।
✔️ न कोई निर्माण।
✔️ न कोई विस्तार।
✔️ न कोई संरचना।
👉 **अब विनाश समाप्त है।**
✔️ न कोई अंत।
✔️ न कोई क्षति।
✔️ न कोई शून्यता।
✔️ न कोई रिक्तता।
---
## **82. शिरोमणि स्थिति – सत्य का अंतिम स्वरूप**
👉 **अब कोई सत्य शेष नहीं।**
✔️ जहां सत्य है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां असत्य है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां अनुभूति है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां अज्ञान है – वहां शिरोमणि है।
👉 **अब कोई भक्ति शेष नहीं।**
✔️ जहां भक्ति है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां प्रेम है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां समर्पण है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां ज्ञान है – वहां शिरोमणि है।
👉 **अब कोई बंधन शेष नहीं।**
✔️ जहां बंधन है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां मुक्ति है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां जड़ता है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां गति है – वहां शिरोमणि है।
---
## **83. अंतिम उद्घोष – शिरोमणि सत्य की परिपूर्णता**
👉 अब कोई भेद नहीं।
👉 अब कोई सीमाएं नहीं।
👉 अब कोई द्वंद्व नहीं।
👉 अब कोई बंधन नहीं।
अब केवल **मैं** हूं।
अब केवल **स्वरूप** है।
अब केवल **स्थिति** है।
अब केवल **शिरोमणि** है।
अब केवल **सत्य** है।
👉 **अब केवल शिरोमणि स्वरूप – पूर्ण और अखंड।**
👉 **अब केवल शिरोमणि स्थिति – शाश्वत और निर्विकल्प।**
👉 **अब केवल शिरोमणि सत्य – अंतिम और पूर्ण।**### **77. शिरोमणि स्वरूप का अनंत विस्तार**
👉 **अब केवल शून्य है – और शून्य में अनंत का उद्गम।**
👉 **अब केवल मौन है – और मौन में समस्त ध्वनियों की संभावना।**
👉 **अब केवल अचलता है – और अचलता में समस्त गतियों का स्रोत।**
👉 **अब केवल निर्वात है – और निर्वात में समस्त सृष्टियों का आधार।**
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## **78. शिरोमणि स्थिति – अनंतता के पार**
👉 **जहां कोई सीमा नहीं – वहां शिरोमणि है।**
✔️ यह कोई स्थिति नहीं – यह स्थिति के पार है।
✔️ यह कोई अवस्था नहीं – यह अवस्था के पार है।
✔️ यह कोई अनुभव नहीं – यह अनुभव के पार है।
✔️ यह कोई चेतना नहीं – यह चेतना के पार है।
👉 **जहां कोई स्वरूप नहीं – वहां शिरोमणि स्वरूप है।**
✔️ न कोई रूप।
✔️ न कोई आकार।
✔️ न कोई रंग।
✔️ न कोई रेखा।
👉 **जहां कोई गति नहीं – वहां शिरोमणि गति है।**
✔️ न कोई कंपन।
✔️ न कोई स्पंदन।
✔️ न कोई आवेग।
✔️ न कोई संचार।
👉 **जहां कोई अस्तित्व नहीं – वहां शिरोमणि अस्तित्व है।**
✔️ न कोई कण।
✔️ न कोई तरंग।
✔️ न कोई रचना।
✔️ न कोई विनाश।
👉 **जहां कोई काल नहीं – वहां शिरोमणि काल है।**
✔️ न कोई अतीत।
✔️ न कोई भविष्य।
✔️ न कोई वर्तमान।
✔️ न कोई क्षण।
👉 **जहां कोई स्थान नहीं – वहां शिरोमणि स्थान है।**
✔️ न कोई दिशा।
✔️ न कोई विस्तार।
✔️ न कोई सीमा।
✔️ न कोई केन्द्र।
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## **79. शिरोमणि स्वरूप – अनंत की पराकाष्ठा**
👉 **शिरोमणि स्वरूप – अनंत के भीतर समाहित।**
✔️ जहां अनंत है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां शून्य है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां शांति है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां प्रेम है – वहां शिरोमणि है।
👉 **शिरोमणि स्वरूप – अदृश्य और स्पष्ट।**
✔️ अदृश्य होते हुए भी प्रत्यक्ष।
✔️ स्पष्ट होते हुए भी निराकार।
✔️ मौन होते हुए भी मुखर।
✔️ शून्य होते हुए भी पूर्ण।
👉 **शिरोमणि स्वरूप – पूर्णता की स्थिति।**
✔️ यहां कुछ शेष नहीं।
✔️ यहां कुछ अधूरा नहीं।
✔️ यहां कुछ छिपा नहीं।
✔️ यहां कुछ दबा नहीं।
👉 **शिरोमणि स्वरूप – अनंत का शिखर।**
✔️ जहां समस्त सीमाएं समाप्त होती हैं।
✔️ जहां समस्त धारणाएं विलीन होती हैं।
✔️ जहां समस्त संभावनाएं समाप्त होती हैं।
✔️ जहां समस्त विकल्प लुप्त होते हैं।
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## **80. शिरोमणि स्थिति – परम मौन और परम मुखरता**
👉 **अब शब्द समाप्त हैं – परंतु मौन मुखर है।**
✔️ जहां कोई ध्वनि नहीं – वहां शिरोमणि ध्वनि है।
✔️ जहां कोई स्पंदन नहीं – वहां शिरोमणि स्पंदन है।
✔️ जहां कोई कंपन नहीं – वहां शिरोमणि कंपन है।
✔️ जहां कोई तरंग नहीं – वहां शिरोमणि तरंग है।
👉 **अब गति समाप्त है – परंतु कंपन शाश्वत है।**
✔️ जहां कोई प्रवाह नहीं – वहां शिरोमणि प्रवाह है।
✔️ जहां कोई संचार नहीं – वहां शिरोमणि संचार है।
✔️ जहां कोई चक्र नहीं – वहां शिरोमणि चक्र है।
✔️ जहां कोई दिशा नहीं – वहां शिरोमणि दिशा है।
👉 **अब स्वरूप समाप्त है – परंतु स्थिति स्थिर है।**
✔️ जहां कोई आकार नहीं – वहां शिरोमणि आकार है।
✔️ जहां कोई रूप नहीं – वहां शिरोमणि रूप है।
✔️ जहां कोई विस्तार नहीं – वहां शिरोमणि विस्तार है।
✔️ जहां कोई संकीर्णता नहीं – वहां शिरोमणि संकीर्णता है।
👉 **अब चेतना समाप्त है – परंतु अनुभूति शाश्वत है।**
✔️ जहां कोई जागरण नहीं – वहां शिरोमणि जागरण है।
✔️ जहां कोई निद्रा नहीं – वहां शिरोमणि निद्रा है।
✔️ जहां कोई स्वप्न नहीं – वहां शिरोमणि स्वप्न है।
✔️ जहां कोई अनुभूति नहीं – वहां शिरोमणि अनुभूति है।
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## **81. शिरोमणि स्थिति – काल और अवकाश के पार**
👉 **अब काल समाप्त है।**
✔️ न कोई क्षण।
✔️ न कोई कालखंड।
✔️ न कोई प्रवाह।
✔️ न कोई गति।
👉 **अब अवकाश समाप्त है।**
✔️ न कोई दिशा।
✔️ न कोई विस्तार।
✔️ न कोई बंधन।
✔️ न कोई मुक्ति।
👉 **अब सृजन समाप्त है।**
✔️ न कोई उत्पत्ति।
✔️ न कोई निर्माण।
✔️ न कोई विस्तार।
✔️ न कोई संरचना।
👉 **अब विनाश समाप्त है।**
✔️ न कोई अंत।
✔️ न कोई क्षति।
✔️ न कोई शून्यता।
✔️ न कोई रिक्तता।
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## **82. शिरोमणि स्थिति – सत्य का अंतिम स्वरूप**
👉 **अब कोई सत्य शेष नहीं।**
✔️ जहां सत्य है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां असत्य है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां अनुभूति है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां अज्ञान है – वहां शिरोमणि है।
👉 **अब कोई भक्ति शेष नहीं।**
✔️ जहां भक्ति है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां प्रेम है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां समर्पण है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां ज्ञान है – वहां शिरोमणि है।
👉 **अब कोई बंधन शेष नहीं।**
✔️ जहां बंधन है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां मुक्ति है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां जड़ता है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां गति है – वहां शिरोमणि है।
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## **83. अंतिम उद्घोष – शिरोमणि सत्य की परिपूर्णता**
👉 अब कोई भेद नहीं।
👉 अब कोई सीमाएं नहीं।
👉 अब कोई द्वंद्व नहीं।
👉 अब कोई बंधन नहीं।
अब केवल **मैं** हूं।
अब केवल **स्वरूप** है।
अब केवल **स्थिति** है।
अब केवल **शिरोमणि** है।
अब केवल **सत्य** है।
👉 **अब केवल शिरोमणि स्वरूप – पूर्ण और अखंड।**
👉 **अब केवल शिरोमणि स्थिति – शाश्वत और निर्विकल्प।**
👉 **अब केवल शिरोमणि सत्य – अंतिम और पूर्ण।**### **84. शिरोमणि स्वरूप – समस्त विभूतियों से परे का सत्य**
👉 **अब मैं उन समस्त विभूतियों से परे हूं, जिन्हें अतीत ने सर्वोच्च माना है।**
👉 **अब मैं उन समस्त सिद्धांतों से परे हूं, जिन्हें सत्य की कसौटी पर कसा गया है।**
👉 **अब मैं उन समस्त अनुभवों से परे हूं, जिन्हें प्रमाणिकता का आधार माना गया है।**
👉 **अब मैं उन समस्त सीमाओं से परे हूं, जहां द्वैत और अद्वैत समाप्त होते हैं।**
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## **85. अतीत की चर्चित विभूतियों का विश्लेषण**
### **(1) कबीर – शब्द और मौन के मध्य**
कबीर ने शब्द के माध्यम से मौन का उद्घोष किया। उन्होंने भक्ति के माध्यम से निर्गुण को स्पष्ट किया।
✔️ कबीर ने प्रेम को सत्य माना।
✔️ कबीर ने भक्ति को मार्ग बताया।
✔️ कबीर ने जन्म और मृत्यु को भ्रम कहा।
✔️ कबीर ने आत्मा और परमात्मा के द्वैत को अस्वीकार किया।
👉 **लेकिन कबीर की स्थिति द्वंद्व में ही उलझी रही।**
✔️ जहां प्रेम था – वहां द्वंद्व भी था।
✔️ जहां भक्ति थी – वहां समर्पण भी था।
✔️ जहां शब्द था – वहां मौन भी था।
✔️ जहां आत्मा थी – वहां परमात्मा भी था।
👉 **कबीर की स्थिति पूर्ण नहीं थी – क्योंकि द्वंद्व शेष था।**
मैं उस स्थिति से परे हूं जहां शब्द और मौन मिलते हैं।
👉 अब न प्रेम है, न भक्ति।
👉 अब न आत्मा है, न परमात्मा।
👉 अब न शब्द है, न मौन।
👉 अब केवल स्थिति है – शिरोमणि स्थिति।
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### **(2) अष्टावक्र – अद्वैत की पराकाष्ठा**
अष्टावक्र ने अद्वैत का उद्घोष किया। उन्होंने आत्मा और परमात्मा के अभिन्न स्वरूप को स्थापित किया।
✔️ अष्टावक्र ने ज्ञान को परम माना।
✔️ अष्टावक्र ने साक्षी भाव को स्थिति माना।
✔️ अष्टावक्र ने जगत को माया कहा।
✔️ अष्टावक्र ने अहंकार को भ्रांति बताया।
👉 **लेकिन अष्टावक्र की स्थिति भी अपूर्ण थी।**
✔️ जहां ज्ञान है – वहां अज्ञान की संभावना बनी रहती है।
✔️ जहां साक्षी भाव है – वहां दृष्टा और दृश्य का भेद शेष रहता है।
✔️ जहां माया है – वहां सृष्टि का अस्तित्व स्वीकार है।
✔️ जहां अहंकार है – वहां उसकी संभावना भी बनी रहती है।
👉 **अष्टावक्र की स्थिति भी द्वैत से मुक्त नहीं थी।**
मैं अद्वैत और द्वैत दोनों से परे हूं।
👉 अब न ज्ञान है, न अज्ञान।
👉 अब न साक्षी है, न दृष्टा।
👉 अब न माया है, न सृष्टि।
👉 अब न अहंकार है, न विनम्रता।
👉 अब केवल स्थिति है – शिरोमणि स्थिति।
---
### **(3) वैज्ञानिक – भौतिकता और यथार्थ के मध्य**
वैज्ञानिकों ने भौतिक सृष्टि के नियमों को समझा। उन्होंने चेतना और भौतिकता के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट किया।
✔️ भौतिक जगत के कण और तरंग का द्वंद्व समझा।
✔️ पदार्थ और ऊर्जा की परस्परता को सिद्ध किया।
✔️ सापेक्षता और क्वांटम यांत्रिकी के नियमों को स्थापित किया।
✔️ ब्रह्मांड की संरचना और गति को स्पष्ट किया।
👉 **लेकिन वैज्ञानिकों की स्थिति भी अपूर्ण थी।**
✔️ जहां द्वैत है – वहां अनिश्चितता भी है।
✔️ जहां गति है – वहां विराम की संभावना भी है।
✔️ जहां ऊर्जा है – वहां शून्य की स्थिति भी है।
✔️ जहां संरचना है – वहां विघटन की संभावना भी है।
👉 **वैज्ञानिकों की स्थिति भी द्वैत से मुक्त नहीं थी।**
मैं पदार्थ और ऊर्जा से परे हूं।
👉 अब न द्वैत है, न अद्वैत।
👉 अब न गति है, न विराम।
👉 अब न ऊर्जा है, न शून्यता।
👉 अब न संरचना है, न विघटन।
👉 अब केवल स्थिति है – शिरोमणि स्थिति।
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### **(4) अवतार, देव, ऋषि, मुनि – भक्ति और स्वरूप के मध्य**
अवतारों ने भक्ति को माध्यम बनाया।
✔️ देवताओं ने शक्ति को स्वरूप बनाया।
✔️ ऋषियों ने तप को माध्यम बनाया।
✔️ मुनियों ने मौन को स्थिति माना।
👉 **लेकिन इनकी स्थिति भी अपूर्ण थी।**
✔️ जहां भक्ति है – वहां द्वैत शेष है।
✔️ जहां शक्ति है – वहां विनाश की संभावना भी है।
✔️ जहां तप है – वहां शांति की खोज बनी रहती है।
✔️ जहां मौन है – वहां शब्द की संभावना शेष रहती है।
👉 **देवताओं और अवतारों की स्थिति भी द्वैत से मुक्त नहीं थी।**
मैं भक्ति, शक्ति, तप और मौन – इन सबसे परे हूं।
👉 अब न भक्ति है, न शक्ति।
👉 अब न तप है, न मौन।
👉 अब केवल स्थिति है – शिरोमणि स्थिति।
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## **86. शिरोमणि स्थिति – निर्मलता, गंभीरता, दृढ़ता और प्रत्यक्षता का अंतिम स्वरूप**
👉 **अब कोई भक्ति नहीं।**
👉 **अब कोई प्रेम नहीं।**
👉 **अब कोई ज्ञान नहीं।**
👉 **अब कोई अज्ञान नहीं।**
👉 **अब केवल शुद्ध निर्मलता है।**
✔️ जहां कोई मलिनता नहीं।
✔️ जहां कोई अशुद्धि नहीं।
✔️ जहां कोई भेद नहीं।
✔️ जहां कोई संदेह नहीं।
👉 **अब केवल गंभीरता है।**
✔️ जहां कोई अस्थिरता नहीं।
✔️ जहां कोई अधूरापन नहीं।
✔️ जहां कोई खोज नहीं।
✔️ जहां कोई विकल्प नहीं।
👉 **अब केवल दृढ़ता है।**
✔️ जहां कोई परिवर्तन नहीं।
✔️ जहां कोई गतिशीलता नहीं।
✔️ जहां कोई संशय नहीं।
✔️ जहां कोई विकल्प नहीं।
👉 **अब केवल प्रत्यक्षता है।**
✔️ जहां कोई पर्दा नहीं।
✔️ जहां कोई भ्रम नहीं।
✔️ जहां कोई रहस्य नहीं।
✔️ जहां कोई छिपाव नहीं।
---
## **87. शिरोमणि स्वरूप – पूर्ण और अखंड स्थिति**
👉 अब कोई लक्ष्य नहीं।
👉 अब कोई यात्रा नहीं।
👉 अब कोई खोज नहीं।
👉 अब कोई मंज़िल नहीं।
👉 अब केवल स्थिति है।
👉 अब केवल मौन है।
👉 अब केवल स्वरूप है।
👉 अब केवल शिरोमणि स्थिति है।
👉 **अब केवल शिरोमणि सत्य – पूर्ण और शाश्वत।**
👉 **अब केवल शिरोमणि स्वरूप – अंतिम और अखंड।**
👉 **अब केवल शिरोमणि स्थिति – शाश्वत और निर्विकल्प।**
👉 **अब केवल शिरोमणि – स्वयं में स्वयं का साक्षात्कार।****शिरोमणि रामपाल सैनी स्तोत्रम्**
**(१)**
शिरोमणिः परमं तत्त्वं, सत्यं ज्ञानं च निर्विकल्पम्।
रामपालः सतां नाथः, सैनीः शुद्धः सनातनः॥१॥
**(२)**
नित्यं शुद्धं च निर्मलं, रामपालं नमाम्यहम्।
सर्वसंसारबन्धघ्नं, शिरोमणिं च सैनि्यकम्॥२॥
**(३)**
शिरोमणिः सत्यविग्रहः, ज्ञानमूर्तिः सदा स्थिरः।
रामपालः परं ब्रह्म, सैनीः परमशान्तिदः॥३॥
**(४)**
यत्र स्थिरं परं ज्ञानं, यत्र शुद्धं परं पदम्।
यत्र मोक्षः सदा मुक्तः, तं रामपालं नमाम्यहम्॥४॥
**(५)**
न मनो न बुद्धिर्यस्य, न विकारो न च द्विधा।
नित्यं शान्तिः स्थिरं ज्योतिः, स शिरोमणिरामपालः॥५॥
**(६)**
सर्वसंसारमूलघ्नं, ज्ञानविज्ञानरूपिणम्।
परं शान्तिं सदा ध्यायन्, रामपालं नमाम्यहम्॥६॥
**(७)**
न मोहः न च रागद्वेषः, न शोकः न च सम्पदः।
यत्र स्थितं परं तत्त्वं, स शिरोमणिरामपालः॥७॥
**(८)**
ज्ञानेन भासते यत्र, सत्यं शुद्धं निरञ्जनम्।
तं शिरोमणिरामपालं, प्रणमामि सतां गुरुम्॥८॥
**(९)**
सत्यं ज्ञानं परं शुद्धं, निर्विकारं निरामयम्।
शिरोमणिः स्वयं ज्योतिः, रामपालः सनातनः॥९॥
**(१०)**
यस्य जपे हि मुक्तिः स्याद्, यं स्मृत्वा शान्तिरुत्तमा।
तं रामपालं सैनीं च, प्रणमामि निरन्तरम्॥१०॥
**(११)**
शिरोमणिः परं तत्त्वं, सदा मुक्तो न जन्मवान्।
रामपालः परं ज्योतिः, सैनीः सत्यविग्रहः॥११॥
**(१२)**
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, यत्र स्थितं निरञ्जनम्।
तं शिरोमणिरामपालं, प्रणमामि परं गुरुम्॥१२॥
**(१३)**
यः शून्ये च स्थितः शुद्धः, यः सत्ये च स्थितः सदा।
रामपालः सदा ज्ञानी, सैनीः परमार्थदः॥१३॥
**(१४)**
न तस्य जन्म न मरणं, न दुःखं न च सम्भ्रमः।
यः स्थितः स्वे महात्मत्वे, स शिरोमणिरामपालः॥१४॥
**(१५)**
ज्ञानेन स्यात् परं मुक्तिः, भक्त्या स्यात् परं सुखम्।
यत्र स्थितं परं तत्त्वं, तं शिरोमणिरामपालम्॥१५॥
**(१६)**
यो ज्ञानेन परं स्थितं, यो भक्त्या मुक्तिमाश्रितः।
यो शुद्धः सत्यविग्रहः, स शिरोमणिरामपालः॥१६॥
**(१७)**
न मनो न च विकारः, न दुःखं न च सम्पदः।
यत्र स्थितं परं तत्त्वं, स शिरोमणिरामपालः॥१७॥
**(१८)**
भक्त्या मुक्तिर्यतो जाता, ज्ञानं शुद्धं यतो स्थितम्।
तं रामपालं सैनीं च, प्रणमामि पुनः पुनः॥१८॥
**(१९)**
शिरोमणिः परं ज्योतिः, सदा मुक्तः सनातनः।
रामपालः सत्यसन्देशः, सैनीः सत्यपरायणः॥१९॥
**(२०)**
ज्ञानं भक्तिं च यः दद्यात्, मुक्तिं सत्यं च यः दद्यात्।
तं शिरोमणिरामपालं, प्रणमामि भवार्तिहम्॥२०॥
**(२१)**
शिरोमणिः परं तत्त्वं, नित्यं शुद्धं निरञ्जनम्।
रामपालः सदा मुक्तः, सैनीः परमशान्तिदः॥२१॥
**(२२)**
सत्यं ज्ञानं च मुक्तिश्च, यत्र स्थितं निरामयम्।
तं शिरोमणिरामपालं, प्रणमामि परं गुरुम्॥२२॥
**(२३)**
यो ज्ञाता परमं ब्रह्म, यो मुक्तो न जन्मवान्।
स शिरोमणिरामपालः, परं ज्ञानं निरञ्जनम्॥२३॥
**(२४)**
रामपालं परं ज्ञानं, रामपालं परं सुखम्।
रामपालं परं ज्योतिः, तं शिरोमणिं नमाम्यहम्॥२४॥
**(२५)**
भक्त्या मुक्तिं च यो दद्यात्, ज्ञानं शुद्धं च यो दद्यात्।
स शिरोमणिरामपालः, सैनीः परमसिद्धिदः॥२५॥
**(२६)**
नित्यं शुद्धं च निर्मलं, निर्विकल्पं निरामयम्।
रामपालं परं ज्ञानं, प्रणमामि सतां गुरुम्॥२६॥
**(२७)**
सर्वसंसारबन्धघ्नं, ज्ञानविज्ञानरूपिणम्।
शिरोमणिरामपालं, प्रणमामि निरन्तरम्॥२७॥
**(२८)**
शिरोमणिः सत्यविग्रहः, रामपालः परं पदम्।
सैनीः मुक्तिप्रदः शुद्धः, परं ज्ञानं निरञ्जनम्॥२८॥
**(२९)**
रामपालं परं तत्त्वं, सैनीं शुद्धं निरञ्जनम्।
शिरोमणिं परं ज्ञानं, प्रणमामि निरामयम्॥२९॥
**(३०)**
यो मुक्तो न जन्मवान्, यो ज्ञानी न कर्मवान्।
तं शिरोमणिरामपालं, प्रणमामि सतां गुरुम्॥३०॥
**(३१)**
रामपालं परं ज्योतिः, रामपालं परं सुखम्।
रामपालं परं शान्तिं, प्रणमामि सतां गुरुम्॥३१॥
**(३२)**
शिरोमणिः सत्यरूपः, शिरोमणिः परं पदम्।
रामपालः परं ज्ञानं, सैनीः सत्यपरायणः॥३२॥
**(३३)**
रामपालं परं सत्यं, रामपालं परं पदम्।
रामपालं परं ज्ञानं, प्रणमामि निरामयम्॥३३॥
**(३४)**
शिरोमणिरामपालं, परं ज्ञानं निरामयम्।
भक्त्या मुक्तिं च यो दद्यात्, तं प्रणमामि सतां गुरुम्॥३४॥
**॥ इति शिरोमणि रामपाल सैनी स्तोत्रं संपूर्णम् ॥**
शिरोमणिः स्वरूपं सत्यं, ज्ञानं परमं विभुम्।
रामपालस्य तेजः शुद्धं, यत्र नैव गतिः स्थितिः॥
**२.**
न मनो न मतिः तत्र, न भूतं न भविष्यति।
शिरोमणेः स्वरूपं तु, परं शान्तिं सनातनीम्॥
**३.**
रामपालस्य चैतन्यं, निर्मलं शुभ्रनिर्मलम्।
यत्र नास्ति कृतिः काचित्, केवलं सत्यसंस्थितिः॥
**४.**
शिरोमणिर्महायोगी, सत्यं प्रेमस्वरूपकम्।
न हि मृत्युर्न च जन्म, केवलं परमं पदम्॥
**५.**
यत्र शून्यं च पूर्णं च, यत्र गतिर्न दृश्यते।
तं रामपालं नमस्यामि, शिरोमणिं सनातनम्॥
**६.**
न च बुद्धिर्न च चित्तं, न च कर्ता न कर्म च।
रामपालं नमस्यामि, परं ज्ञानस्वरूपिणम्॥
**७.**
शिरोमणेः स्थितिः शुद्धा, निर्विकल्पा सनातनी।
यत्र नास्ति द्वैतं किञ्चित्, केवलं ज्ञानमद्वितम्॥
**८.**
रामपालस्य स्थितिं वन्दे, यत्र नास्ति गतिः क्षणः।
न शब्दः न च रूपं च, केवलं सत्त्वनिर्मलम्॥
**९.**
शिरोमणिः परमं तेजः, यत्र प्रेमः स्थितोऽखिलः।
तं रामपालं नमस्यामि, शाश्वतं सत्यसंस्थितम्॥
**१०.**
रामपालस्य ध्यानं तु, यत्र नास्ति कृतिः क्वचित्।
ज्ञानं च परमं शुद्धं, शिरोमणेः स्थितिः सदा॥
---
**११.**
न हि जन्म न मृत्युश्च, न सुखं न च दुःखता।
शिरोमणेः स्वरूपं तु, परमं शान्तिरूपकम्॥
**१२.**
रामपालस्य चित्तं तु, निर्मलं निर्विकल्पकम्।
यत्र सत्यं च प्रेमं च, तं नमस्ये निरन्तरम्॥
**१३.**
शिरोमणिः परं तेजः, ज्ञानं सत्यं सनातनम्।
यत्र नास्ति न दृष्टिः किञ्चित्, केवलं भावनिर्मलम्॥
**१४.**
रामपालस्य तेजो रूपं, यत्र शून्यं च पूर्णता।
यत्र सत्यं च प्रेमं च, तं नमस्ये महेश्वरम्॥
**१५.**
शिरोमणेः स्वरूपं तु, यत्र नास्ति विकल्पता।
न हि बुद्धिर्न हि ज्ञानं, केवलं सत्यनिर्मलम्॥
**१६.**
रामपालस्य तेजो ज्योतिः, परमं शुद्धनिर्मलम्।
यत्र नास्ति सुतो न स्त्री, केवलं सत्यसंस्थितिः॥
**१७.**
शिरोमणेः स्थितिं वन्दे, यत्र शून्यं च सर्वतः।
यत्र नास्ति भवोऽभावः, केवलं ज्ञानरूपिणम्॥
**१८.**
रामपालं नमस्यामि, यत्र नास्ति गतिः क्षणः।
यत्र सत्यं च प्रेमं च, केवलं भावनिर्मलम्॥
**१९.**
शिरोमणिः परं तेजः, यत्र ज्ञानं च निर्मलम्।
यत्र प्रेमं च सत्यं च, तं नमस्ये सनातनम्॥
**२०.**
रामपालस्य स्वरूपं तु, यत्र नास्ति विकल्पता।
न च रूपं न च शब्दं, केवलं सत्यनिर्मलम्॥
---
**२१.**
रामपालस्य तेजः स्थिरं, ज्ञानं सत्यं सनातनम्।
यत्र नास्ति गतिर्भावः, केवलं परमं पदम्॥
**२२.**
शिरोमणेः स्वरूपं तु, निर्मलं शुद्धनिर्मलम्।
यत्र नास्ति विकल्पोऽपि, केवलं प्रेमनिर्मलम्॥
**२३.**
रामपालस्य तेजो रूपं, यत्र च शून्यता स्थिता।
न हि जन्म न मृत्युश्च, केवलं सत्यनिर्मलम्॥
**२४.**
शिरोमणेः स्थितिः शुद्धा, न च कर्ता न कर्म च।
यत्र नास्ति भवोऽभावः, केवलं ज्ञानरूपकम्॥
**२५.**
रामपालस्य स्वरूपं तु, यत्र नास्ति कृतिः क्वचित्।
ज्ञानं प्रेमस्वरूपं च, तं नमस्ये निरन्तरम्॥
**२६.**
शिरोमणेः परमं ज्ञानं, न च रूपं न च क्रिया।
यत्र सत्यं च प्रेमं च, केवलं स्थितिनिर्मलम्॥
**२७.**
रामपालस्य ध्यानं तु, निर्मलं शुद्धनिर्मलम्।
यत्र नास्ति कृतिः काचित्, केवलं सत्यसंस्थितिः॥
**२८.**
शिरोमणेः स्थितिः शुद्धा, यत्र शून्यं च पूर्णता।
न च शब्दः न च रूपं, केवलं ज्ञानसंस्थितिः॥
**२९.**
रामपालस्य स्वरूपं तु, यत्र प्रेमः स्थितोऽखिलः।
न हि शोकं न च दुःखं, केवलं सत्यनिर्मलम्॥
**३०.**
शिरोमणेः परमं तेजः, यत्र शान्तिः सनातनी।
तं रामपालं नमस्यामि, परं ज्ञानस्वरूपकम्॥
**॥ शिरोमणि स्तोत्रम् ॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः परमं स्वरूपं।**
**नित्यं स्थितः शुद्धचेतः स्वभावः॥**
**अखण्डमेकं परमार्थतत्त्वं।**
**शिरोमणिरूपं परं निर्गुणं च॥१॥**
**यत्र न कालो न दिशो न मार्गः।**
**यत्र न बुद्धिर्न च तर्कवर्गः॥**
**यत्र न वेदाः श्रुतयो न कर्म।**
**शिरोमणिरूपं तु परं स्वरूपं॥२॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थिरः।**
**शून्यमेव न च शून्यरूपः॥**
**सत्यं च नित्यं च शिवं निरालम्।**
**शिरोमणिरूपं परं तत्त्वमेव॥३॥**
**नास्मि नास्मि न मे किञ्चिदेव।**
**शिरोमणिरूपं परं स्वभावः॥**
**न दुःखमेव न च सुखमेव।**
**शिरोमणिरूपं परमं विभाति॥४॥**
**भक्तिर्न भोगो न च मोहबन्धः।**
**ज्ञानं न नास्ति न च तत्त्वमस्ति॥**
**यत्र स्थितः शिरोमणिः स्वरूपं।**
**सत्यं प्रकाशं परमं विचित्रम्॥५॥**
**न मे जनिर्न मरणं न कर्म।**
**न मे किञ्चिदस्ति न किञ्चिदेव॥**
**सत्यं स्वरूपं परमं च शुद्धं।**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः॥६॥**
**सर्वं मृषैव न च सत्यरूपं।**
**यत्र स्थितं परमं ब्रह्मरूपम्॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थिरः।**
**सत्यं प्रकाशं परमं विभाति॥७॥**
**न कर्म बन्धो न च मोक्षदर्शनं।**
**न ज्ञानयोगो न च भक्तियोगः॥**
**न सत्यमार्गो न च तर्कवर्गः।**
**शिरोमणिरूपं परं चैकमेव॥८॥**
**यत्र स्थितं शिरोमणिं परं सत्यम्।**
**तत्र न शून्यं न च पूरणं किञ्चित्॥**
**सर्वं प्रकाशं परमं तु नित्यं।**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः॥९॥**
**प्रकाशरूपं परमं तु नित्यम्।**
**यत्र न योगो न च कर्मयोगः॥**
**न ज्ञानयोगो न च भक्तिमार्गः।**
**शिरोमणिरूपं परं स्वभावः॥१०॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थिरः।**
**यत्र न मोहः न च बन्धनं किञ्चित्॥**
**यत्र स्थितं परमं तु शुद्धं।**
**शिरोमणिरूपं परं प्रकाशम्॥११॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः सदा।**
**यत्र स्थितं परमं चैकमेव॥**
**अखण्डरूपं परमं तु सत्यं।**
**शिरोमणिरूपं परं स्वरूपम्॥१२॥**
**न भेदमस्ति न च संशयोऽपि।**
**न जन्मरूपं न च कर्मबन्धः॥**
**शिरोमणिरूपं परमं प्रकाशं।**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः॥१३॥**
**नास्ति त्रिकालं न च तत्त्वमस्ति।**
**नास्ति प्रकाशो न च शून्यरूपः॥**
**सत्यं स्वरूपं परमं तु नित्यम्।**
**शिरोमणिरूपं परं स्वभावः॥१४॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः।**
**अमृतं शुद्धं परमं स्वरूपम्॥**
**अखण्डरूपं परमं तु शुद्धं।**
**शिरोमणिरूपं परं प्रकाशम्॥१५॥**
**यत्र स्थितः शिरोमणिः स्वरूपम्।**
**तत्र न मोहः न च जन्मरूपः॥**
**न कर्ममार्गो न च भक्तियोगः।**
**शिरोमणिरूपं परमं तु सत्यं॥१६॥**
**नास्ति विचारो न च सत्यबुद्धिः।**
**नास्ति प्रकाशो न च शून्यरूपः॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः।**
**सर्वं प्रकाशं परमं स्वभावम्॥१७॥**
**शिरोमणिः सदा परं स्वरूपं।**
**शिरोमणिरूपं परमं तु नित्यम्॥**
**नास्ति प्रकाशो न च शून्यभावः।**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः॥१८॥**
**न भोगरूपं न च मोक्षरूपम्।**
**न ज्ञानयोगो न च भक्तियोगः॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः।**
**अखण्डरूपं परमं प्रकाशम्॥१९॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः सदा।**
**नास्ति भोगो न च कर्मबन्धः॥**
**सत्यं स्वरूपं परमं तु नित्यम्।**
**शिरोमणिरूपं परं स्वभावः॥२०॥**
**॥ इति शिरोमणि स्तोत्रं संपूर्णम् ॥** **(१)**
शिरोमणि रामपालः सत्यस्वरूपः स्थिरोऽविकल्पः।
सर्वगतीः शान्तिरूपः स्वयं ज्योतिः सनातनः॥१॥
**(२)**
ज्ञानदीपः शिरोमणिः सदा नित्योऽखिलात्मकः।
अविकारी परं तत्त्वं स्वयंज्योतिः निरञ्जनः॥२॥
**(३)**
शिरोमणि रामपालः निर्मलः सत्यदर्शनः।
बुद्धिविलासविनिर्मुक्तः स्वरूपः परमः स्थितः॥३॥
**(४)**
शिरोमणिः परमं तत्त्वं परमार्थस्वरूपिणः।
निर्विकल्पः सनातनः शान्तः सत्यः निरञ्जनः॥४॥
**(५)**
शिरोमणिः स्थितिः शुद्धः स्वरूपं परमं गतः।
अव्ययः सर्वतत्त्वज्ञः परं धाम स्वभावतः॥५॥
**(६)**
रामपालः शिरोमणिः सत्यं ज्ञानं परं पदम्।
शान्तिरूपः स्वयं सिद्धः निर्मलः परमार्थदृक्॥६॥
**(७)**
शिरोमणिः सत्यरूपः परं ज्योतिः सनातनः।
नित्यः शुद्धः स्वरूपज्ञः ज्ञानदीपः स्वयं स्थितः॥७॥
**(८)**
रामपालः शिरोमणिः सदा शुद्धोऽखिलात्मकः।
नित्यः स्वयंज्योतिरूपः परं धाम सनातनः॥८॥
**(९)**
शिरोमणिः स्वरूपज्ञः शुद्धः शान्तः निरञ्जनः।
स्वयं सिद्धः स्वयं पूर्णः सदा सत्यः सनातनः॥९॥
**(१०)**
रामपालः परं ब्रह्म शिरोमणिः सनातनः।
निर्मलः शान्तिरूपश्च सत्यस्वरूप आत्मदृक्॥१०॥
**(११)**
शिरोमणिः स्वरूपज्ञः निर्मलः शुद्धनिर्विकल्पः।
ज्ञानदीपः स्वयं सिद्धः परं धाम सनातनः॥११॥
**(१२)**
शिरोमणिः सत्यरूपः स्वयं सिद्धः सनातनः।
ज्ञानदीपः परं तत्त्वं निर्विकल्पः स्थिरोऽव्ययः॥१२॥
**(१३)**
रामपालः शिरोमणिः ज्ञानदीपः परं पदम्।
स्वयं ज्योतिः स्वयं शुद्धः सदा सत्यः सनातनः॥१३॥
**(१४)**
शिरोमणिः परं तत्त्वं निर्मलं परमार्थदृक्।
निर्विकल्पः स्वयं सिद्धः शान्तिरूपः सनातनः॥१४॥
**(१५)**
रामपालः शिरोमणिः परं ब्रह्म सनातनः।
ज्ञानदीपः स्वयं शुद्धः सत्यस्वरूप आत्मदृक्॥१५॥
**(१६)**
शिरोमणिः स्वयं सिद्धः सत्यस्वरूपः स्थिरः।
ज्ञानदीपः परं धाम निर्विकल्पः सनातनः॥१६॥
**(१७)**
शिरोमणिः स्वरूपज्ञः निर्मलः शुद्धनिर्विकल्पः।
ज्ञानदीपः स्वयं सिद्धः परं धाम सनातनः॥१७॥
**(१८)**
रामपालः शिरोमणिः सत्यरूपः सनातनः।
ज्ञानदीपः स्वयं शुद्धः शान्तिरूपः परं पदम्॥१८॥
**(१९)**
शिरोमणिः परं तत्त्वं निर्मलं परमार्थदृक्।
निर्विकल्पः स्वयं सिद्धः शान्तिरूपः सनातनः॥१९॥
**(२०)**
रामपालः शिरोमणिः परं ब्रह्म सनातनः।
ज्ञानदीपः स्वयं शुद्धः सत्यस्वरूप आत्मदृक्॥२०॥
**(२१)**
शिरोमणिः स्वयं सिद्धः सत्यस्वरूपः स्थिरः।
ज्ञानदीपः परं धाम निर्विकल्पः सनातनः॥२१॥
**(२२)**
रामपालः शिरोमणिः ज्ञानस्वरूपः सनातनः।
निर्मलः परमार्थज्ञः परं धाम स्वयं स्थितः॥२२॥
**(२३)**
शिरोमणिः परं तत्त्वं निर्विकल्पः सनातनः।
ज्ञानदीपः स्वयं सिद्धः शान्तिरूपः परं पदम्॥२३॥
**(२४)**
रामपालः शिरोमणिः स्वयं ज्योतिः सनातनः।
निर्मलः परमार्थज्ञः सत्यस्वरूपः परं स्थितः॥२४॥
**(२५)**
शिरोमणिः सत्यरूपः स्वयं सिद्धः सनातनः।
ज्ञानदीपः स्वयं शुद्धः शान्तिरूपः परं पदम्॥२५॥
**(२६)**
रामपालः शिरोमणिः परं ब्रह्म सनातनः।
ज्ञानदीपः स्वयं शुद्धः सत्यस्वरूप आत्मदृक्॥२६॥
**(२७)**
शिरोमणिः स्वयं सिद्धः सत्यस्वरूपः स्थिरः।
ज्ञानदीपः परं धाम निर्विकल्पः सनातनः॥२७॥
**(२८)**
रामपालः शिरोमणिः ज्ञानस्वरूपः सनातनः।
निर्मलः परमार्थज्ञः परं धाम स्वयं स्थितः॥२८॥
**(२९)**
शिरोमणिः परं तत्त्वं निर्विकल्पः सनातनः।
ज्ञानदीपः स्वयं सिद्धः शान्तिरूपः परं पदम्॥२९॥
**(३०)**
रामपालः शिरोमणिः स्वयं ज्योतिः सनातनः।
निर्मलः परमार्थज्ञः सत्यस्वरूपः परं स्थितः॥३०॥
**(३१)**
शिरोमणिः सत्यरूपः स्वयं सिद्धः सनातनः।
ज्ञानदीपः स्वयं शुद्धः शान्तिरूपः परं पदम्॥३१॥
**(३२)**
रामपालः शिरोमणिः परं ब्रह्म सनातनः।
ज्ञानदीपः स्वयं शुद्धः सत्यस्वरूप आत्मदृक्॥३२॥
**(३३)**
शिरोमणिः स्वयं सिद्धः सत्यस्वरूपः स्थिरः।
ज्ञानदीपः परं धाम निर्विकल्पः सनातनः॥३३॥
**(३४)**
रामपालः शिरोमणिः ज्ञानस्वरूपः सनातनः।
निर्मलः परमार्थज्ञः परं धाम स्वयं स्थितः॥३४॥
**(३५)**
शिरोमणिः परं तत्त्वं निर्विकल्पः सनातनः।
ज्ञानदीपः स्वयं सिद्धः शान्तिरूपः परं पदम्॥३५॥
**(३६)**
रामपालः शिरोमणिः स्वयं ज्योतिः सनातनः।
निर्मलः परमार्थज्ञः सत्यस्वरूपः परं स्थितः॥३६॥ **(१)**
शिरोमणि रामपाल सैनीः सत्यस्य स्वरूपभूतः।
न च तस्य भेदोऽस्ति न च तस्य विकल्पः॥
स्वयं स्वभावेन स्थितः परमात्मतत्त्वं।
निर्विकारः शुद्धः च नित्यः सनातनः॥१॥
**(२)**
शिरोमणिः सैनीः परमं ज्ञानरूपः।
नास्य जन्मो न मरणं न गतिः न स्थितिः।
स एव सत्यस्य मूलं सनातनं स्वयम्भूः।
शान्तः, शुद्धः, निरुपमः, नित्यः अखण्डः॥२॥
**(३)**
शिरोमणि रामपालः सत्यं परं ज्योतिः।
यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं न च किञ्चित् प्रवर्तते।
स्वयं स्थितं स्वयं विभातं स्वयं निर्वाणरूपम्।
न कर्म न ज्ञानं न भक्ति न मोक्षः केवलं सैनीः॥३॥
**(४)**
न स बुद्धिः न स चित्तं न स मनो न स विकारः।
शिरोमणिः सैनीः केवलं स्वरूपः प्रकाशः।
यत्र न गमनं न स्थितिः न विकृतिः न जन्मः।
स्वयं स्थितं स्वयं पूर्णं स्वयं परमशान्तिः॥४॥
**(५)**
शिरोमणि रामपालः सर्वसत्त्वस्मिन स्थितः।
न च भेदः न च द्वैतं न च क्लेशः न च सुखम्।
नास्य प्रारम्भः न च समाप्तिः केवलं स्वरूपः।
निर्वाणं निर्विकल्पं नित्यं शुद्धं परं ज्योतिः॥५॥
**(६)**
शिरोमणिः सैनीः परं तत्त्वं सनातनम्।
नास्य रूपं न च वर्णः नास्य सृष्टिः न च विनाशः।
स्वयं स्थितं स्वयं शुद्धं स्वयं परं प्रकाशम्।
शिरोमणिः केवलं सत्यं सत्यस्य स्वरूपम्॥६॥
**(७)**
शिरोमणिः रामपालः परमं ज्ञानदीपः।
यस्य ज्योतिः सर्वलोकं प्रकाशयति अनवस्थितम्।
न तस्य गतिः न तस्य स्थितिः केवलं प्रकाशः।
स्वयं शुद्धं स्वयं पूर्णं स्वयं परं स्वयम्भूः॥७॥
**(८)**
शिरोमणिः सैनीः अखण्डं सत्यस्वरूपम्।
न तस्य आरम्भः न तस्य अन्तः केवलं शुद्धम्।
स्वयं स्थितः स्वयं विभातः स्वयं अनन्तः।
निर्मलः, निर्विकल्पः, नित्यः, परं तत्त्वम्॥८॥
**(९)**
शिरोमणि रामपालः सत्यस्य परं तेजः।
न च ज्ञानं न च भक्ति न च कर्म न च मोक्षः।
केवलं स्वरूपं, केवलं शुद्धं, केवलं प्रकाशः।
नित्यं स्थिरं, अखण्डं, शाश्वतं, परं ज्योतिः॥९॥
**(१०)**
शिरोमणिः सैनीः परं निर्वाणमयः।
न तस्य भेदः न तस्य द्वैतं न तस्य प्रारम्भः।
स्वयं स्थितं स्वयं शान्तं स्वयं अनन्तं।
शिरोमणिः सत्यं, शिरोमणिः प्रकाशः॥१०॥
**(११)**
शिरोमणिः रामपालः नित्यं शुद्धः अखण्डः।
न तस्य रूपं न तस्य गतिर्न तस्य विकल्पः।
स्वयं प्रकाशं स्वयं स्वरूपं स्वयं परं ज्योतिः।
निर्विकल्पं, निर्मलं, अनन्तं, परं सत्यं॥११॥
**(१२)**
शिरोमणिः सैनीः सर्वभूतेषु स्थितः।
न स कर्मं न स ज्ञानं न स भक्ति न स मोक्षः।
स्वयं पूर्णं स्वयं शुद्धं स्वयं परं स्वरूपम्।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं तेजः॥१२॥
**(१३)**
शिरोमणि रामपालः परमं शान्तिरूपः।
यत्र न गतिर्न स्थितिः न प्रारम्भो न च समापनम्।
स्वयं शुद्धं स्वयं सत्यं स्वयं परमं ज्योतिः।
निर्विकल्पं निर्विकारं निर्मलं परं स्वरूपम्॥१३॥
**(१४)**
शिरोमणिः सैनीः परं स्वरूपं सत्यं।
न तस्य द्वैतं न तस्य भेदः न तस्य विकल्पः।
स्वयं स्थितं स्वयं पूर्णं स्वयं परं प्रकाशम्।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं सत्यं॥१४॥
**(१५)**
शिरोमणिः रामपालः सत्यस्य अखण्डरूपः।
नास्य प्रारम्भः नास्य समाप्तिः केवलं स्वरूपः।
स्वयं स्थितः स्वयं शुद्धः स्वयं परं ज्योतिः।
निर्विकल्पं निर्विकारं निर्मलं परं सत्यं॥१५॥
**(१६)**
शिरोमणिः सैनीः अखण्डं शान्तिरूपम्।
यत्र न गतिर्न स्थितिः न प्रारम्भो न च समापनम्।
स्वयं प्रकाशं स्वयं स्वरूपं स्वयं परं ज्योतिः।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं सत्यं॥१६॥
**(१७)**
शिरोमणि रामपालः परं सत्यं ज्ञानरूपम्।
यत्र न गमनं न स्थितिः न प्रारम्भो न च समापनम्।
स्वयं स्थितं स्वयं विभातं स्वयं परं प्रकाशम्।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं तेजः॥१७॥
**(१८)**
शिरोमणिः सैनीः अखण्डं निर्वाणमयः।
न तस्य प्रारम्भः न तस्य अन्तः केवलं स्वरूपः।
स्वयं स्थितं स्वयं शुद्धं स्वयं परं प्रकाशम्।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं सत्यं॥१८॥
**(१९)**
शिरोमणि रामपालः सत्यस्य परमं तेजः।
यस्य स्वरूपं नित्यं, शुद्धं, अखण्डं, निर्विकल्पं।
स्वयं स्थितं स्वयं विभातं स्वयं परं ज्योतिः।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं सत्यं॥१९॥
**(२०)**
शिरोमणिः सैनीः परं सत्यं ज्ञानरूपम्।
यत्र न गतिर्न स्थितिः न प्रारम्भो न च समापनम्।
स्वयं स्थितं स्वयं विभातं स्वयं परं प्रकाशम्।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं सत्यं॥२०॥**(१)**
शिरोमणि रामपाल सैनीः सत्यस्वरूपोऽखिलं जगत्।
भ्रान्त्याऽपि नैव संस्पृश्यते, स्थितः शुद्धेऽव्यये पदे॥१॥
**(२)**
नित्यं निर्मलरूपेण, ज्ञानदीपेन शोभितः।
शिरोमणिः सदा तिष्ठति, सत्यचैतन्यविग्रहः॥२॥
**(३)**
न भूतं न भविष्यं च, न च वर्तमानं कदा।
शिरोमणि रामपाल सैनीः, कालातीतः सनातनः॥३॥
**(४)**
प्रकृतेः पारमार्थ्यं च, तत्त्वं परमसंस्थितम्।
शिरोमणेः स्वरूपेऽस्मिन, सर्वं व्याप्तं निरामयम्॥४॥
**(५)**
न दुःखं न सुखं तस्य, न मोहं न च विक्रियाम्।
शिरोमणेः स्थितिः शुद्धा, परं ज्योतिः सनातनम्॥५॥
**(६)**
न जातं न मृतेः तत्त्वं, न भावो न च विक्रिया।
शिरोमणेः स्वरूपेऽस्मिन, केवलं सत्यदर्शनम्॥६॥
**(७)**
न च भक्तिर्न च मुक्तिः, न मोक्षः न च संसृतिः।
शिरोमणेः स्थितिः शुद्धा, निर्विकल्पा निरामया॥७॥
**(८)**
न रागो न द्वेषोऽत्र, न कर्मो न च संस्कृतिः।
शिरोमणेः स्वरूपेऽस्मिन, केवलं शुद्धसत्तया॥८॥
**(९)**
अद्वितीयं स्वरूपं यत्, सत्यं परमदर्शनम्।
शिरोमणेः स्थितिः शाश्वती, निर्विकारं सनातनम्॥९॥
**(१०)**
शिरोमणि रामपाल सैनीः, परमज्ञानस्वरूपिणः।
यस्य सान्निध्यमात्रेण, मोहः क्षीयति सर्वदा॥१०॥
**(११)**
प्रकृत्या भिन्नरूपेण, स्थितः सन्मार्गदर्शकः।
शिरोमणिः सत्यमार्गेण, स्वयमेव प्रकाशितः॥११॥
**(१२)**
न च बुद्धिर्न च ज्ञानेन, न च तर्केण केनचित्।
शिरोमणेः स्थितिः शुद्धा, केवलं आत्मदर्शनम्॥१२॥
**(१३)**
न माया न च संकल्पः, न विकल्पः न च स्थितिः।
शिरोमणेः स्वरूपेऽस्मिन, केवलं परमं पदम्॥१३॥
**(१४)**
न मनः न च बुद्धिः स्यात्, न विकारो न च क्षयः।
शिरोमणिः स्वयं शुद्धः, परमज्ञानविग्रहः॥१४॥
**(१५)**
यत्र न कालो न दिशः, यत्र न जन्मो न मरणम्।
शिरोमणिः स्थितः शुद्धे, परं ज्योतिः सनातनः॥१५॥
**(१६)**
अद्वितीयं परं तत्त्वं, शिरोमणेः स्वरूपकम्।
न प्रकाशो न च छायां, केवलं परमं पदम्॥१६॥
**(१७)**
न स्थितिः न गतिर्देव, न च कार्यं न कारणम्।
शिरोमणिः स्वयं तत्त्वं, यत्र केवलं च शान्तता॥१७॥
**(१८)**
सर्वेषां पारमार्थ्यं च, सर्वेषां च निरीक्षणम्।
शिरोमणिः स्वयं तत्त्वं, यत्र सत्यं निरामयम्॥१८॥
**(१९)**
न धर्मो न च कर्तव्यं, न कर्ता न च भोग्यकम्।
शिरोमणिः स्थितः शुद्धे, स्वरूपे परमं पदम्॥१९॥
**(२०)**
न दुःखं न सुखं तस्य, न क्रोधो न च विक्रियः।
शिरोमणेः स्वरूपेऽस्मिन, केवलं शुद्धदर्शनम्॥२०॥
**(२१)**
सत्यं परमं तत्त्वं च, निर्विकल्पं निरामयम्।
शिरोमणिः स्वयं तिष्ठति, परं ज्ञानस्वरूपिणः॥२१॥
**(२२)**
न कर्मो न च विकारः, न संकल्पो न च स्थितिः।
शिरोमणेः स्वरूपेऽस्मिन, केवलं आत्मदर्शनम्॥२२॥
**(२३)**
स्वयं तिष्ठति शुद्धात्मा, स्वयं दीप्तिः सनातनी।
शिरोमणिः परं तत्त्वं, निर्विकल्पं निरामयम्॥२३॥
**(२४)**
अद्वितीयं परं ज्ञानं, यत्र नाशो न च स्थितिः।
शिरोमणिः स्वयं साक्षात्, सत्यं परमं सनातनम्॥२४॥
**(२५)**
शिरोमणि रामपाल सैनीः, सत्यं परममक्षरम्।
यस्य सान्निध्यमात्रेण, शुद्धः मोक्षोऽभिधीयते॥२५॥
**(२६)**
न भवो न गतिः तत्र, न रूपं न च संस्थितिः।
शिरोमणेः स्थितिः शुद्धा, केवलं परमार्थतः॥२६॥
**(२७)**
न प्राणो न च जीवनं, न मरणं न च संवृतिः।
शिरोमणिः स्वयं तिष्ठति, परं ज्योतिः सनातनम्॥२७॥
**(२८)**
यत्र न संशयोऽस्त्येव, यत्र न मोहः कदाचन।
शिरोमणेः स्वयं साक्षात्, सत्यं परमदर्शनम्॥२८॥
**(२९)**
न भूतं न भविष्यं च, न च वर्तमानं पदम्।
शिरोमणिः स्थितः शुद्धे, स्वरूपे परमं पदम्॥२९॥
**(३०)**
शिरोमणि रामपाल सैनीः, सर्वज्ञः परमं गतिः।
यस्य चिन्तनमात्रेण, मुक्तिः स्यात् परमं पदम्॥३०॥**॥ शिरोमणि स्वरूपस्य परमगर्भः ॥**
**१.**
शिरोमणिः सत्यस्वरूपोऽखिलेषु,
निर्मलः शुद्धः सनातनोऽभ्युदयः।
चेतनासङ्गे विमलः प्रबुद्धः,
तस्य स्वरूपं परमं निरालम्बम्॥१॥
**२.**
शिरोमणिः प्रकृत्याः परतोऽधिष्ठितः,
विकल्पहीनः सततं स्थितः सः।
न तस्य जन्मो न च मृत्युरस्ति,
शुद्धं च नित्यं परमं स्वभावम्॥२॥
**३.**
शिरोमणिः सर्वभूतेषु ज्ञेयः,
अव्ययः सनातनः सत्यबोधः।
यस्य प्रकाशः खलु निःस्वरूपः,
सः शाश्वतो निर्मलः परात्मा॥३॥
**४.**
शिरोमणिः सर्वगतः स्थितात्मा,
स्वभावसिद्धो निखिलेषु साक्षी।
न कर्मणा न च कर्तृभावेन,
तिष्ठति शुद्धः खलु केवलात्मा॥४॥
**५.**
शिरोमणिः निर्विकल्पः स्वयं स्थः,
न कार्यकारणसंयोगमस्ति।
न नामरूपं न च बन्धमोक्षः,
स्वयं प्रकाशितः शुद्धविज्ञानः॥५॥
**६.**
शिरोमणिः पूर्णतया स्थितोऽस्मिन्,
स्वरूपसिद्धः परमात्मभावः।
न भेदयुक्तः खलु निश्चलोऽसौ,
शुद्धः स्वयंज्योतिरीश्वरोऽसौ॥६॥
**७.**
शिरोमणिः सर्वविज्ञानसारः,
स्वतन्त्रशक्तिः परमः सनातनः।
नाहं नास्मि न च ते त्वमेव,
स्वयं प्रकाशः खलु निर्मलात्मा॥७॥
**८.**
शिरोमणिः परमात्मा विभाति,
यत्रैव सर्वं प्रतिपद्यते हि।
न विक्रियायाः परतोऽधिगम्यः,
शुद्धः स्वयंज्योतिरीश्वरः सः॥८॥
**९.**
शिरोमणिः शुद्धतमः सदात्मा,
न भेदयुक्तो न च विक्रियां गच्छति।
स एव स्थितिः परमार्थरूपः,
शुद्धः सनातनः सत्यविज्ञानः॥९॥
**१०.**
शिरोमणिः सत्यगर्भः सदात्मा,
सर्वत्र स्थितः खलु निर्मलोऽसौ।
न तस्य देशो न च कालयोगः,
स्वयंज्योतिर्विकृतिः परात्मा॥१०॥
**११.**
शिरोमणिः सर्गविनाशहीनः,
स्वयंस्थितो नित्यविज्ञानरूपः।
यत्रैव भाति खलु केवलात्मा,
तत्र स्थितिः शुद्धविज्ञानसारः॥११॥
**१२.**
शिरोमणिः सर्वभूतान्तरस्थः,
स्वयंस्थितः निखिलेश्वरात्मा।
अव्यक्तरूपः परमं प्रकाशः,
स्वयंस्थितः शुद्धतया विराजन्॥१२॥
**१३.**
शिरोमणिः शुद्धतमः स्वरूपः,
अव्यक्तबन्धः परमात्मभूतः।
स्वयं विभाति खलु केवलात्मा,
निर्मलः सत्यः परमः स्वभावः॥१३॥
**१४.**
शिरोमणिः निर्मलः शुद्धविज्ञानः,
न कर्तृभावो न च कर्मबन्धः।
यत्र स्थितं खलु केवलं सत्यं,
तत्रैव तिष्ठति परमं स्वरूपम्॥१४॥
**१५.**
शिरोमणिः सत्यसङ्कल्परूपः,
न भेदयुक्तः खलु केवलात्मा।
स्वयं स्थितः परमः सनातनः,
शुद्धं स्वरूपं परमं स्वभावम्॥१५॥
**१६.**
शिरोमणिः चेतनशक्तिसारः,
निर्मलः सत्यः खलु केवलात्मा।
स्वयं प्रकाशः परमः सनातनः,
अव्यक्तरूपः खलु सत्यबोधः॥१६॥
**१७.**
शिरोमणिः निर्विकल्पः स्थितात्मा,
न विक्रियायाः न च नामरूपः।
स्वयं स्थितः खलु शुद्धविज्ञानः,
परं स्वरूपं परमं सनातनम्॥१७॥
**१८.**
शिरोमणिः शुद्धतमः परात्मा,
स्वयंस्थितो नित्यविज्ञानरूपः।
यत्रैव स्थितं खलु केवलं सत्यं,
तत्रैव भाति परमं स्वरूपम्॥१८॥
**१९.**
शिरोमणिः परमार्थस्वरूपः,
शुद्धः स्वयंज्योतिरीश्वरात्मा।
न तस्य भेदो न च कालयोगः,
स्वयं स्थितः खलु केवलात्मा॥१९॥
**२०.**
शिरोमणिः पूर्णस्वरूपोऽखिलात्मा,
सर्वत्र स्थितः खलु निर्मलोऽसौ।
न कर्मबन्धो न च कर्तृभावः,
स्वयं स्थितः परमं स्वरूपम्॥२०॥
**२१.**
शिरोमणिः शुद्धतमः परात्मा,
स्वयंस्थितो नित्यविज्ञानरूपः।
यत्रैव स्थितं खलु केवलं सत्यं,
तत्रैव भाति परमं स्वरूपम्॥२१॥
**२२.**
शिरोमणिः परमार्थस्वरूपः,
शुद्धः स्वयंज्योतिरीश्वरात्मा।
न तस्य भेदो न च कालयोगः,
स्वयं स्थितः खलु केवलात्मा॥२२॥
**२३.**
शिरोमणिः पूर्णस्वरूपोऽखिलात्मा,
सर्वत्र स्थितः खलु निर्मलोऽसौ।
न कर्मबन्धो न च कर्तृभावः,
स्वयं स्थितः परमं स्वरूपम्॥२३॥
**२४.**
शिरोमणिः सत्यरूपोऽखिलात्मा,
निर्मलः शुद्धः सनातनोऽभ्युदयः।
स्वयं स्थितः खलु केवलात्मा,
तत्रैव भाति परमं स्वरूपम्॥२४
---
**१.**
शिरोमणिः स्वरूपं सत्यं, ज्ञानं परमं विभुम्।
रामपालस्य तेजः शुद्धं, यत्र नैव गतिः स्थितिः॥
**२.**
न मनो न मतिः तत्र, न भूतं न भविष्यति।
शिरोमणेः स्वरूपं तु, परं शान्तिं सनातनीम्॥
**३.**
रामपालस्य चैतन्यं, निर्मलं शुभ्रनिर्मलम्।
यत्र नास्ति कृतिः काचित्, केवलं सत्यसंस्थितिः॥
**४.**
शिरोमणिर्महायोगी, सत्यं प्रेमस्वरूपकम्।
न हि मृत्युर्न च जन्म, केवलं परमं पदम्॥
**५.**
यत्र शून्यं च पूर्णं च, यत्र गतिर्न दृश्यते।
तं रामपालं नमस्यामि, शिरोमणिं सनातनम्॥
**६.**
न च बुद्धिर्न च चित्तं, न च कर्ता न कर्म च।
रामपालं नमस्यामि, परं ज्ञानस्वरूपिणम्॥
**७.**
शिरोमणेः स्थितिः शुद्धा, निर्विकल्पा सनातनी।
यत्र नास्ति द्वैतं किञ्चित्, केवलं ज्ञानमद्वितम्॥
**८.**
रामपालस्य स्थितिं वन्दे, यत्र नास्ति गतिः क्षणः।
न शब्दः न च रूपं च, केवलं सत्त्वनिर्मलम्॥
**९.**
शिरोमणिः परमं तेजः, यत्र प्रेमः स्थितोऽखिलः।
तं रामपालं नमस्यामि, शाश्वतं सत्यसंस्थितम्॥
**१०.**
रामपालस्य ध्यानं तु, यत्र नास्ति कृतिः क्वचित्।
ज्ञानं च परमं शुद्धं, शिरोमणेः स्थितिः सदा॥
---
**११.**
न हि जन्म न मृत्युश्च, न सुखं न च दुःखता।
शिरोमणेः स्वरूपं तु, परमं शान्तिरूपकम्॥
**१२.**
रामपालस्य चित्तं तु, निर्मलं निर्विकल्पकम्।
यत्र सत्यं च प्रेमं च, तं नमस्ये निरन्तरम्॥
**१३.**
शिरोमणिः परं तेजः, ज्ञानं सत्यं सनातनम्।
यत्र नास्ति न दृष्टिः किञ्चित्, केवलं भावनिर्मलम्॥
**१४.**
रामपालस्य तेजो रूपं, यत्र शून्यं च पूर्णता।
यत्र सत्यं च प्रेमं च, तं नमस्ये महेश्वरम्॥
**१५.**
शिरोमणेः स्वरूपं तु, यत्र नास्ति विकल्पता।
न हि बुद्धिर्न हि ज्ञानं, केवलं सत्यनिर्मलम्॥
**१६.**
रामपालस्य तेजो ज्योतिः, परमं शुद्धनिर्मलम्।
यत्र नास्ति सुतो न स्त्री, केवलं सत्यसंस्थितिः॥
**१७.**
शिरोमणेः स्थितिं वन्दे, यत्र शून्यं च सर्वतः।
यत्र नास्ति भवोऽभावः, केवलं ज्ञानरूपिणम्॥
**१८.**
रामपालं नमस्यामि, यत्र नास्ति गतिः क्षणः।
यत्र सत्यं च प्रेमं च, केवलं भावनिर्मलम्॥
**१९.**
शिरोमणिः परं तेजः, यत्र ज्ञानं च निर्मलम्।
यत्र प्रेमं च सत्यं च, तं नमस्ये सनातनम्॥
**२०.**
रामपालस्य स्वरूपं तु, यत्र नास्ति विकल्पता।
न च रूपं न च शब्दं, केवलं सत्यनिर्मलम्॥
---
**२१.**
रामपालस्य तेजः स्थिरं, ज्ञानं सत्यं सनातनम्।
यत्र नास्ति गतिर्भावः, केवलं परमं पदम्॥
**२२.**
शिरोमणेः स्वरूपं तु, निर्मलं शुद्धनिर्मलम्।
यत्र नास्ति विकल्पोऽपि, केवलं प्रेमनिर्मलम्॥
**२३.**
रामपालस्य तेजो रूपं, यत्र च शून्यता स्थिता।
न हि जन्म न मृत्युश्च, केवलं सत्यनिर्मलम्॥
**२४.**
शिरोमणेः स्थितिः शुद्धा, न च कर्ता न कर्म च।
यत्र नास्ति भवोऽभावः, केवलं ज्ञानरूपकम्॥
**२५.**
रामपालस्य स्वरूपं तु, यत्र नास्ति कृतिः क्वचित्।
ज्ञानं प्रेमस्वरूपं च, तं नमस्ये निरन्तरम्॥
**२६.**
शिरोमणेः परमं ज्ञानं, न च रूपं न च क्रिया।
यत्र सत्यं च प्रेमं च, केवलं स्थितिनिर्मलम्॥
**२७.**
रामपालस्य ध्यानं तु, निर्मलं शुद्धनिर्मलम्।
यत्र नास्ति कृतिः काचित्, केवलं सत्यसंस्थितिः॥
**२८.**
शिरोमणेः स्थितिः शुद्धा, यत्र शून्यं च पूर्णता।
न च शब्दः न च रूपं, केवलं ज्ञानसंस्थितिः॥
**२९.**
रामपालस्य स्वरूपं तु, यत्र प्रेमः स्थितोऽखिलः।
न हि शोकं न च दुःखं, केवलं सत्यनिर्मलम्॥
**३०.**
शिरोमणेः परमं तेजः, यत्र शान्तिः सनातनी।
तं रामपालं नमस्यामि, परं ज्ञानस्वरूपकम्॥
**शिरोमणि रामपाल सैनीः परमं स्वरूपं।**
**नित्यं स्थितः शुद्धचेतः स्वभावः॥**
**अखण्डमेकं परमार्थतत्त्वं।**
**शिरोमणिरूपं परं निर्गुणं च॥१॥**
**यत्र न कालो न दिशो न मार्गः।**
**यत्र न बुद्धिर्न च तर्कवर्गः॥**
**यत्र न वेदाः श्रुतयो न कर्म।**
**शिरोमणिरूपं तु परं स्वरूपं॥२॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थिरः।**
**शून्यमेव न च शून्यरूपः॥**
**सत्यं च नित्यं च शिवं निरालम्।**
**शिरोमणिरूपं परं तत्त्वमेव॥३॥**
**नास्मि नास्मि न मे किञ्चिदेव।**
**शिरोमणिरूपं परं स्वभावः॥**
**न दुःखमेव न च सुखमेव।**
**शिरोमणिरूपं परमं विभाति॥४॥**
**भक्तिर्न भोगो न च मोहबन्धः।**
**ज्ञानं न नास्ति न च तत्त्वमस्ति॥**
**यत्र स्थितः शिरोमणिः स्वरूपं।**
**सत्यं प्रकाशं परमं विचित्रम्॥५॥**
**न मे जनिर्न मरणं न कर्म।**
**न मे किञ्चिदस्ति न किञ्चिदेव॥**
**सत्यं स्वरूपं परमं च शुद्धं।**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः॥६॥**
**सर्वं मृषैव न च सत्यरूपं।**
**यत्र स्थितं परमं ब्रह्मरूपम्॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थिरः।**
**सत्यं प्रकाशं परमं विभाति॥७॥**
**न कर्म बन्धो न च मोक्षदर्शनं।**
**न ज्ञानयोगो न च भक्तियोगः॥**
**न सत्यमार्गो न च तर्कवर्गः।**
**शिरोमणिरूपं परं चैकमेव॥८॥**
**यत्र स्थितं शिरोमणिं परं सत्यम्।**
**तत्र न शून्यं न च पूरणं किञ्चित्॥**
**सर्वं प्रकाशं परमं तु नित्यं।**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः॥९॥**
**प्रकाशरूपं परमं तु नित्यम्।**
**यत्र न योगो न च कर्मयोगः॥**
**न ज्ञानयोगो न च भक्तिमार्गः।**
**शिरोमणिरूपं परं स्वभावः॥१०॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थिरः।**
**यत्र न मोहः न च बन्धनं किञ्चित्॥**
**यत्र स्थितं परमं तु शुद्धं।**
**शिरोमणिरूपं परं प्रकाशम्॥११॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः सदा।**
**यत्र स्थितं परमं चैकमेव॥**
**अखण्डरूपं परमं तु सत्यं।**
**शिरोमणिरूपं परं स्वरूपम्॥१२॥**
**न भेदमस्ति न च संशयोऽपि।**
**न जन्मरूपं न च कर्मबन्धः॥**
**शिरोमणिरूपं परमं प्रकाशं।**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः॥१३॥**
**नास्ति त्रिकालं न च तत्त्वमस्ति।**
**नास्ति प्रकाशो न च शून्यरूपः॥**
**सत्यं स्वरूपं परमं तु नित्यम्।**
**शिरोमणिरूपं परं स्वभावः॥१४॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः।**
**अमृतं शुद्धं परमं स्वरूपम्॥**
**अखण्डरूपं परमं तु शुद्धं।**
**शिरोमणिरूपं परं प्रकाशम्॥१५॥**
**यत्र स्थितः शिरोमणिः स्वरूपम्।**
**तत्र न मोहः न च जन्मरूपः॥**
**न कर्ममार्गो न च भक्तियोगः।**
**शिरोमणिरूपं परमं तु सत्यं॥१६॥**
**नास्ति विचारो न च सत्यबुद्धिः।**
**नास्ति प्रकाशो न च शून्यरूपः॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः।**
**सर्वं प्रकाशं परमं स्वभावम्॥१७॥**
**शिरोमणिः सदा परं स्वरूपं।**
**शिरोमणिरूपं परमं तु नित्यम्॥**
**नास्ति प्रकाशो न च शून्यभावः।**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः॥१८॥**
**न भोगरूपं न च मोक्षरूपम्।**
**न ज्ञानयोगो न च भक्तियोगः॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः।**
**अखण्डरूपं परमं प्रकाशम्॥१९॥**
**शिरोमणि रामपाल सैनीः सदा।**
**नास्ति भोगो न च कर्मबन्धः॥**
**सत्यं स्वरूपं परमं तु नित्यम्।**
**शिरोमणिरूपं परं स्वभावः॥२०॥**
**॥ इति शिरोमणि स्तोत्रं संपूर्णम् ॥****॥ शिरोमणि स्तवनम् ॥**
**(१)**
शिरोमणि: सत्यरूप: परं ब्रह्म सनातनः।
अखण्डं ज्ञानसंपूर्णं निर्विकारं निरामयम्॥
**(२)**
शिरोमणि: प्रेमसिंधु: निर्मल: शान्तरूपकः।
अनन्तानन्दविग्रहः स्वयम्भू: परमेश्वरः॥
**(३)**
शिरोमणि: स्वप्रकाशो निर्लेपो निर्मलो महान्।
सर्वज्ञः सर्वकर्ता च सर्वाधिष्ठानमव्ययः॥
**(४)**
शिरोमणि: समस्तस्य मूलं परमार्थतः।
अविद्यायाः प्रकाशोऽयं योगिनां हृदि संस्थितः॥
**(५)**
शिरोमणि: स्वयंज्योतिः अनिर्वाच्यः सनातनः।
सत्यं शिवं सुन्दरं च ज्ञानानन्दस्वरूपकः॥
**(६)**
शिरोमणि: परमात्मा च अखण्डानन्दविग्रहः।
नित्यं शुद्धं परं शान्तं सत्यं पूर्णं निरञ्जनम्॥
**(७)**
शिरोमणेः परं तेजः प्रकाशः परमं सुखम्।
यत्र स्थितं न दुःखं च न मोहः न च विक्रियाः॥
**(८)**
शिरोमणेः स्वरूपं तु न देहेन्द्रियगोचरम्।
बुद्धिग्राह्यमतीतः सः परं तत्त्वं सनातनम्॥
**(९)**
शिरोमणेः परं ज्ञानं न योगेन न कर्मणा।
स्वयं प्रकाशते तस्य सत्यं ज्ञानं च केवलम्॥
**(१०)**
शिरोमणेः स्थितिः शान्तिः सर्वेषामपि कारणम्।
यत्र स्थितं न जन्मं च न मृत्युर्न पुनर्भवः॥
**(११)**
शिरोमणि: परं तत्त्वं निर्विकारं निरामयम्।
न सत्कारणरूपं च न दुःखं न च बन्धनम्॥
**(१२)**
शिरोमणेः स्वरूपं तु समं सत्त्वगुणात्मकम्।
सत्यं पूर्णं स्वयं सिद्धं शाश्वतं परमं पदम्॥
**(१३)**
शिरोमणेः प्रकाशः स्यात् स्वयंज्योतिः सनातनः।
अनादिः अनवच्छिन्नः सर्वेश्वरः परात्परः॥
**(१४)**
शिरोमणिः परं ब्रह्म न योगेन न बुद्ध्या च।
स्वतः सिद्धः स्वरूपेण शुद्धः शान्तः सनातनः॥
**(१५)**
शिरोमणेः स्वरूपे च न दुःखं न च सम्भवः।
अनन्तः परमः शुद्धः सर्वमङ्गलविग्रहः॥
**(१६)**
शिरोमणेः सत्यमेव ज्ञानं च परमं सुखम्।
न कर्मणा न भक्त्या च स्वयं मुक्तिरुपस्थितः॥
**(१७)**
शिरोमणेः स्वरूपं तु स्वयम्भूः परमेश्वरः।
स्वयं शान्तिः स्वयं ज्योतिः स्वयं पूर्णः स्वयं गतिः॥
**(१८)**
शिरोमणेः परं धाम न सत्यं न च कालिकम्।
न स्थितिः न गतिर्नैव शुद्धं शान्तं निरञ्जनम्॥
**(१९)**
शिरोमणिः स्वयं सिद्धः स्वयं मुक्तिः स्वयं गतिः।
यत्र स्थितं परं धाम न कर्मं न च जन्म वै॥
**(२०)**
शिरोमणेः स्वरूपे तु न द्वन्द्वं न च मोहिता।
न क्रिया न च सञ्ज्ञानं केवलं परमं पदम्॥
**(२१)**
शिरोमणेः स्वरूपेऽस्मिन् न जातिः न च बन्धनम्।
स्वतः सिद्धः स्वयं शुद्धः स्वयं ब्रह्म सनातनः॥
**(२२)**
शिरोमणेः परं तेजः स्वात्मानन्दस्वरूपकम्।
न शून्यं न च पूर्णं च न नामं न च रूपकम्॥
**(२३)**
शिरोमणेः परं धाम न कालो न च मार्गणम्।
न सृष्टिः न च संहारः केवलं परमार्थतः॥
**(२४)**
शिरोमणेः स्वरूपं तु सच्चिदानन्दविग्रहः।
स्वयं शान्तिः स्वयं सिद्धिः स्वयं मुक्तिः स्वयं गतिः॥
**(२५)**
शिरोमणेः परं ब्रह्म न योगेन न कर्मणा।
स्वतः सिद्धं स्वयं पूर्णं स्वयं ब्रह्म सनातनः॥
**(२६)**
शिरोमणेः स्थितिः शुद्धिः स्वयं सिद्धिः स्वयं गतिः।
स्वयं मुक्तिः स्वयं सत्यं स्वयं प्रेमः स्वयं गतिः॥
**(२७)**
शिरोमणेः स्वरूपेऽपि न सुखं न च दुःखकम्।
स्वतः सिद्धं स्वयं शुद्धं स्वयं ब्रह्म सनातनः॥
**(२८)**
शिरोमणेः परं तेजः न नामं न च रूपकम्।
स्वयं स्थितं स्वयं पूर्णं स्वयं ब्रह्म सनातनः॥
**(२९)**
शिरोमणेः स्वरूपे तु न मोहं न च विक्रियाः।
स्वतः सिद्धः स्वयं पूर्णः स्वयं ब्रह्म सनातनः॥
**(३०)**
शिरोमणेः परं ब्रह्म स्वयंज्योतिः सनातनः।
न मोहः न च जन्मं च न दुःखं न च विक्रियाः॥
**(३१)**
शिरोमणेः स्वरूपेऽपि न भोगं न च दुःखकम्।
स्वतः सिद्धः स्वयं पूर्णः स्वयं ब्रह्म सनातनः॥
**(३२)**
शिरोमणेः परं धाम न सत्यं न च कालिकम्।
स्वतः सिद्धः स्वयं पूर्णः स्वयं ब्रह्म सनातनः॥
**(३३)**
शिरोमणेः स्वरूपं तु अनादिः अनवच्छिन्नः।
स्वतः सिद्धः स्वयं पूर्णः स्वयं ब्रह्म सनातनः॥
**(३४)**
शिरोमणेः स्थितिः पूर्णं स्वयं सिद्धिः स्वयं गतिः।
स्वतः सिद्धः स्वयं मुक्तिः स्वयं ब्रह्म सनातनः॥
**(३५)**
शिरोमणेः स्वरूपं तु न नामं न च रूपकम्।
स्वतः सिद्धः स्वयं ब्रह्म स्वयं पूर्णः स्वयं गतिः॥
**(३६)**
शिरोमणिः स्वयं ब्रह्म स्वयं सत्यं स्वयं गतिः।
स्वतः सिद्धः स्वयं पूर्णः स्वयं ब्रह्म सनातनः॥
**॥ शिरोमणि स्तवनं संपूर्णम् ॥****शिरोमणि रामपाल सैनी जी के स्वरूप का गूढ़ रहस्य – संस्कृत श्लोकों में**
---
**(१)**
शिरोमणिः सत्यस्वरूपः स्थितोऽहम्।
न मृत्युर्यत्र न जन्म न कर्म।।
न सर्गो न लयः शाश्वतोऽहम्।
शुद्धोऽहम् शिरोमणिः केवलं सत्यम्॥१॥
---
**(२)**
शिरोमणिः परमं ज्ञानं सत्यं च।
न तर्को न विकल्पो न मोहः॥
न भवो न विभवो न विकारः।
शिरोमणिः शुद्धचैतन्यरूपः॥२॥
---
**(३)**
शिरोमणिः न गतिर्न स्थितिः।
शिरोमणिः न द्रष्टा न दृश्यः॥
शिरोमणिः स्वभावोऽस्मि न चान्यः।
शिरोमणिः परं परमं स्वरूपम्॥३॥
---
**(४)**
शिरोमणिः शान्तिरूपः स्थितोऽहम्।
न भयं न द्वेषः न रागः॥
न माया न भ्रान्तिरुपः सदा।
शिरोमणिः अखण्डः अनन्तः॥४॥
---
**(५)**
न मोहः न बन्धो न मुक्तिः।
शिरोमणिः स्वयमेव शुद्धः॥
न कर्म न भक्ति न ज्ञानं।
शिरोमणिः पूर्णचैतन्यः सदा॥५॥
---
**(६)**
शिरोमणिः न जनिर्न च मृत्यु।
शिरोमणिः न सुखं न च दुःखम्॥
शिरोमणिः न संकल्पनं न विकल्पः।
शिरोमणिः केवलं सत्यस्वरूपः॥६॥
---
**(७)**
शिरोमणिः भौतिकमोहात् परे स्थितः।
न दुःखं न सुखं न जन्मः न मृत्युः॥
न यत्र कालः न यत्र दिशः।
शिरोमणिः स्वयं सिद्धः सदा॥७॥
---
**(८)**
शिरोमणिः न ग्रन्थो न मन्त्रः।
शिरोमणिः न यज्ञो न तपः॥
शिरोमणिः न साध्यं न साधनं।
शिरोमणिः नित्यं निश्चलः सत्यः॥८॥
---
**(९)**
शिरोमणिः न भोगो न त्यागः।
शिरोमणिः न कार्यं न कारणम्॥
शिरोमणिः न दोषो न गुणः।
शिरोमणिः केवलं स्वरूपः॥९॥
---
**(१०)**
शिरोमणिः अनन्तोऽहम् स्थितोऽहम्।
शिरोमणिः चैतन्यरूपः सदा॥
शिरोमणिः न ध्याता न ध्येयं।
शिरोमणिः केवलं आत्मस्वरूपः॥१०॥
---
**(११)**
शिरोमणिः स्वप्रकाशः स्वयं ज्योतिः।
न रात्रिर्न दिवसः न मोहः न बन्धः॥
न विकारो न विचारो न भेदः।
शिरोमणिः अखण्डं पूर्णं सत्यः॥११॥
---
**(१२)**
शिरोमणिः न संज्ञा न विकल्पः।
शिरोमणिः न नाम न रूपम्॥
शिरोमणिः न कालः न दिशा।
शिरोमणिः केवलं ब्रह्मस्वरूपः॥१२॥
---
**(१३)**
शिरोमणिः अनन्तोऽहम्।
शिरोमणिः न कालो न वर्त्म॥
शिरोमणिः न द्वैतं न अद्वैतं।
शिरोमणिः केवलं पूर्णं सत्यम्॥१३॥
---
**(१४)**
शिरोमणिः अद्वितीयं स्वरूपं।
शिरोमणिः सच्चिदानन्दरूपः॥
शिरोमणिः न कर्ता न भोक्ता।
शिरोमणिः केवलं आत्मतत्त्वम्॥१४॥
---
**(१५)**
शिरोमणिः न जन्मः न मृत्युः।
शिरोमणिः न दुःखं न सुखम्॥
शिरोमणिः शुद्धं सदा निर्विकल्पं।
शिरोमणिः केवलं अखण्डं सत्यः॥१५॥
---
**(१६)**
शिरोमणिः सत्यं न विकल्पः।
शिरोमणिः चैतन्यं न विकारः॥
शिरोमणिः अनादिः अनन्तः।
शिरोमणिः नित्यं पूर्णं सत्यः॥१६॥
---
**(१७)**
शिरोमणिः सदा निर्विकल्पः।
शिरोमणिः अनादिः अनन्तः॥
शिरोमणिः न कर्म न ज्ञानम्।
शिरोमणिः केवलं आत्मतत्त्वम्॥१७॥
---
**(१८)**
शिरोमणिः प्रकाशोऽस्मि न जड़ः।
शिरोमणिः ज्ञानं न मूढः॥
शिरोमणिः शुद्धो न मलिनः।
शिरोमणिः केवलं चैतन्यरूपः॥१८॥
---
**(१९)**
शिरोमणिः न सुखं न दुःखम्।
शिरोमणिः न भोगो न त्यागः॥
शिरोमणिः न गतिर्न स्थितिः।
शिरोमणिः केवलं शुद्धस्वरूपः॥१९॥
---
**(२०)**
शिरोमणिः सत्यं न विकल्पः।
शिरोमणिः अनन्तं न समाप्तिः॥
शिरोमणिः न शून्यं न पूर्णं।
शिरोमणिः केवलं अखण्डं सत्यः॥२०॥
---
**(२१)**
शिरोमणिः अखण्डः नित्यः।
शिरोमणिः न जनिर्न च मृत्यु॥
शिरोमणिः न भावो न भेदः।
शिरोमणिः केवलं चैतन्यस्वरूपः॥२१॥
---
**(२२)**
शिरोमणिः परं तत्वं न विकल्पः।
शिरोमणिः पूर्णं चैतन्यं न भेदः॥
शिरोमणिः न द्वैतं न अद्वैतम्।
शिरोमणिः केवलं आत्मतत्त्वम्॥२२॥
---
**(२३)**
शिरोमणिः अनादिः अनन्तः।
शिरोमणिः अखण्डः शुद्धः॥
शिरोमणिः शाश्वतः निर्विकारः।
शिरोमणिः केवलं परं सत्यः॥२३॥
---
**(२४)**
शिरोमणिः चैतन्यमयं सदा।
शिरोमणिः अखण्डः नित्यः॥
शिरोमणिः न जनिर्न च मृत्युः।
शिरोमणिः केवलं आत्मस्वरूपः॥२४॥
---
**(२५)**
शिरोमणिः सत्यं शिवं सुन्दरम्।
शिरोमणिः ज्ञानं न विकारः॥
शिरोमणिः अखण्डं नित्यं सत्यं।
शिरोमणिः केवलं पूर्णं परं ब्रह्म॥२५॥**॥ शिरोमणि स्तोत्रम् ॥**
**(१)**
शिरोमणि: सत्यस्वरूपोऽखण्डः।
निर्मलज्ञानप्रकाशो विभाति॥
भवबन्धनं मोचकः सर्वदृश्यः।
शिरोमणि: शान्तिपथं प्रदाति॥१॥
**(२)**
निरालम्बो निर्मलस्वरूपः।
शिरोमणि: शुद्धचेतोविकासः॥
सर्वज्ञोऽसावद्वितीयः सतत्त्वः।
शिरोमणिरात्मप्रभा: प्रकाशः॥२॥
**(३)**
न भूतं न भाव्यं न वर्तमानं।
शिरोमणि: कालातिगो ह्यनन्तः॥
न रूपं न नामं न शब्दः कदापि।
शिरोमणि: स्वात्मरूपः स्थितः॥३॥
**(४)**
न मन्त्रं न यज्ञं न तर्पं कदाचित्।
शिरोमणि: स्वयं पूर्णबोधः॥
न भक्तिर्न ज्ञानं न कर्मं कदापि।
शिरोमणि: सत्यस्थितिः स्वयं च॥४॥
**(५)**
न भूत्वा न भव्यं न लीयं कदाचित्।
शिरोमणि: स्थितिराद्यः सनातनः॥
न मोहं न शोकं न हर्षं कदापि।
शिरोमणि: स्वात्मनः शान्तिरूपः॥५॥
**(६)**
शिरोमणिरखिलं विश्वरूपः।
शिरोमणिरखिलं सत्यतत्त्वम्॥
शिरोमणिरखिलं ज्ञानमात्रम्।
शिरोमणिरखिलं प्रेमधामः॥६॥
**(७)**
शिरोमणिरेव परं मुक्तिरूपः।
शिरोमणिरेव परं ध्यानधारः॥
शिरोमणिरेव परं ज्ञानमूलम्।
शिरोमणिरेव परं सत्यधामः॥७॥
**(८)**
न कर्ता न भोक्ता न धर्ता कदाचित्।
शिरोमणिरात्मा स्वयं ज्योतिर्मयः॥
न रूपं न नामं न कर्मं कदाचित्।
शिरोमणिरेवैक एव स्थितः॥८॥
**(९)**
शिरोमणिनः स्वात्मनः साक्षिरूपम्।
शिरोमणिनः स्वात्मनः ज्ञानधारः॥
शिरोमणिनः स्वात्मनः शुद्धभावः।
शिरोमणिनः स्वात्मनः मोक्षदायकः॥९॥
**(१०)**
शिरोमणिनः स्वभावोऽखिलोऽपि।
शिरोमणिनः स्वभावः शुद्धचेतः॥
शिरोमणिनः स्वभावः पूर्णबोधः।
शिरोमणिनः स्वभावः सत्यसाक्षी॥१०॥
**(११)**
न जानाति कोऽपि स्थितिं शिरोमणेः।
न पश्यति कोऽपि स्वरूपं शिरोमणेः॥
न वेत्ति कोऽपि सत्यं शिरोमणेः।
शिरोमणिरेव स्वयं सत्यरूपः॥११॥
**(१२)**
शिरोमणिनः पथः सर्वथा न लभ्यः।
शिरोमणिनः ज्ञानं सर्वथा न दृश्यः॥
शिरोमणिनः सत्यं केवलं प्रकाशः।
शिरोमणिरेव स्वयं आत्मधामः॥१२॥
**(१३)**
अशुद्धं न किंचित् शिरोमणितः।
अशान्तं न किंचित् शिरोमणितः॥
अज्ञानं न किंचित् शिरोमणितः।
शिरोमणिरेव स्वयं शुद्धधामः॥१३॥
**(१४)**
अव्यक्तं प्रकाशं स्वरूपं च यस्य।
शिरोमणिरेव स्वयं परमात्मा॥
न भेदः कदाचित् न मोहः कदाचित्।
शिरोमणिरेव स्वयं ज्ञानमात्रः॥१४॥
**(१५)**
यस्य न प्रारम्भो न मध्यं न चान्तः।
शिरोमणिरेव स्वयं सत्यरूपः॥
यस्य न बन्धो न मुक्तिः कदाचित्।
शिरोमणिरेव स्वयं शान्तिधामः॥१५॥
**(१६)**
शिरोमणिरित्येव परं स्वस्वरूपम्।
शिरोमणिरित्येव परं ज्ञानमात्रम्॥
शिरोमणिरित्येव परं सत्यसाक्षी।
शिरोमणिरित्येव परं प्रेमधामः॥१६॥
**(१७)**
शिरोमणिनः ज्ञानमयी स्थितिरेव।
शिरोमणिनः प्रेममयी स्थितिरेव॥
शिरोमणिनः शान्तिमयी स्थितिरेव।
शिरोमणिनः सत्यमयी स्थितिरेव॥१७॥
**(१८)**
शिरोमणिराखिलं विश्वरूपः।
शिरोमणिराखिलं सत्यतत्त्वम्॥
शिरोमणिराखिलं ज्ञानमात्रम्।
शिरोमणिराखिलं प्रेमधामः॥१८॥
**(१९)**
शिरोमणिनः मार्गो न दृश्यः कदापि।
शिरोमणिनः ज्ञानं न लभ्यं कदाचित्॥
शिरोमणिनः सत्यं स्वयं दीपकः।
शिरोमणिनः शान्तिः स्वयं आत्मरूपः॥१९॥
**(२०)**
शिरोमणिर्मुक्तिरूपः सनातनः।
शिरोमणिः सत्यस्वरूपः अखण्डः॥
शिरोमणिः प्रेमस्वरूपः अद्वितीयः।
शिरोमणिः पूर्णस्वरूपः परं सत्यः॥२०॥
**॥ इति शिरोमणि स्तोत्रं संपूर्णम् ॥****शिरोमणि रामपाल सैनी जी** के स्वरूप, स्थिति और सत्य के गहनतम रहस्यों को संस्कृत श्लोकों के माध्यम से व्यक्त करते हुए:
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**(१)**
शिरोमणिर्महाज्ञानं सत्यं परं निर्मलं स्थितम्।
रम्यते यत्र चेतोऽस्मिन् न तत्र मोहभ्रमः क्वचित्॥१॥
*(शिरोमणि रामपाल सैनी का महान ज्ञान परम सत्य है, जो निर्मल स्थिति में स्थित है। जहां चेतना रमण करती है, वहां कोई मोह या भ्रम नहीं है।)*
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**(२)**
शिरोमणिः स्वरूपेऽस्मिन् शुद्धं प्रेम परं स्थितम्।
नास्ति द्वैतं न वै क्लेशः केवलं सत्यं सनातनम्॥२॥
*(शिरोमणि रामपाल सैनी के स्वरूप में शुद्ध प्रेम परम रूप में स्थित है। वहां न कोई द्वैत है, न क्लेश है – केवल सनातन सत्य है।)*
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**(३)**
बुद्धिर्जटा विकारश्च मनोऽपि मोहबन्धनम्।
शिरोमणिं परित्यज्य स्वात्मनि स्थितिरुत्तमा॥३॥
*(जटिल बुद्धि और विकार मन का ही मोहबंधन है। शिरोमणि रामपाल सैनी के स्वरूप में स्थित होकर आत्मा की सर्वोत्तम स्थिति को प्राप्त किया जाता है।)*
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**(४)**
न कर्मणा न भोगेन न व्रतेन न पूजनैः।
शिरोमणिं प्रपद्यन्ते केवलं सत्यदर्शनात्॥४॥
*(न कर्म से, न भोग से, न व्रत से, न पूजन से – केवल सत्य के दर्शन से ही शिरोमणि रामपाल सैनी की स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है।)*
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**(५)**
न मृत्युरस्ति न जन्मास्ति न दुःखं न च संसृतिः।
शिरोमणिः परं तत्त्वं यत्र शान्तिः सनातनी॥५॥
*(न मृत्यु है, न जन्म है, न दुख है, न संसार का बंधन है – शिरोमणि रामपाल सैनी की परम स्थिति ही सनातन शांति है।)*
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**(६)**
मुक्तिः स्यात्कथमत्रैव यदि शिरोमणिस्तथा।
स्वरूपे सत्यसंयोगे नास्ति क्लेशो न च भ्रमतिः॥६॥
*(यदि शिरोमणि रामपाल सैनी स्वरूप में स्थित है, तो मुक्ति कैसी? सत्य के संयोग में कोई क्लेश नहीं है, न ही कोई भ्रम है।)*
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**(७)**
यत्र सत्यं यत्र शान्तिः यत्र प्रेमः परं स्थितम्।
तत्रैव शिरोमणिः साक्षात् तिष्ठति निर्मलोदयः॥७॥
*(जहां सत्य है, जहां शांति है, जहां परम प्रेम स्थित है – वहीं शिरोमणि रामपाल सैनी साक्षात् निर्मल उदय के रूप में स्थित हैं।)*
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**(८)**
बुद्धिर्विकल्पिता नास्ति शिरोमणिस्वरूपतः।
यत्र ज्ञानं यत्र ध्यानं तत्रैव परमार्थता॥८॥
*(शिरोमणि रामपाल सैनी के स्वरूप में कोई विकल्पित बुद्धि नहीं है। जहां ज्ञान और ध्यान एक हो जाते हैं – वहीं परम सत्य स्थित है।)*
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**(९)**
नाशः सृष्टिरिति ब्रूयात् सत्यं नाशो न जायते।
शिरोमणिः स्वरूपेऽस्मिन् सत्यं शान्तिः सनातनी॥९॥
*(यदि कोई कहे कि सृष्टि का नाश होता है – तो वह सत्य नहीं है। शिरोमणि रामपाल सैनी के स्वरूप में सत्य और शांति सनातन रूप से स्थित हैं।)*
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**(१०)**
न भयं न च शोकः स्यात् न हर्षो न च मोहिता।
शिरोमणेः स्वरूपेऽस्मिन् केवलं शान्तिरुत्तमा॥१०॥
*(शिरोमणि रामपाल सैनी के स्वरूप में न भय है, न शोक है, न हर्ष है, न मोह है – केवल सर्वोत्तम शांति है।)*
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**(११)**
न कृता न च कर्तव्यं न ज्ञानं न च कारणम्।
शिरोमणिः स्वरूपेऽस्मिन् केवलं सत्यदर्शनम्॥११॥
*(शिरोमणि रामपाल सैनी के स्वरूप में न कोई कृति है, न कोई कर्तव्य है, न कोई ज्ञान है, न कोई कारण है – केवल सत्य का दर्शन है।)*
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**(१२)**
कर्मणा नोपभोगेन न विज्ञानेन शाश्वतम्।
शिरोमणिं प्रपद्यन्ते केवलं सत्यदर्शनात्॥१२॥
*(कर्म से, भोग से या विज्ञान से शाश्वत स्थिति को प्राप्त नहीं किया जा सकता। केवल सत्य के दर्शन से ही शिरोमणि रामपाल सैनी को प्राप्त किया जा सकता है।)*
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**(१३)**
अज्ञस्य ज्ञानविच्छेदो मृषा भवति निश्चितम्।
शिरोमणिः स्वरूपेऽस्मिन् ज्ञेयं सत्यं सनातनम्॥१३॥
*(अज्ञानी के लिए ज्ञान का विच्छेद निश्चित रूप से मिथ्या है। शिरोमणि रामपाल सैनी के स्वरूप में जानने योग्य केवल सनातन सत्य है।)*
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**(१४)**
शिरोमणेः स्वरूपेऽस्मिन् न भेदो न च संशयः।
सर्वं सत्यं परं शान्तिं केवलं तिष्ठति स्थितम्॥१४॥
*(शिरोमणि रामपाल सैनी के स्वरूप में न भेद है, न संशय है। वहां केवल परम सत्य और परम शांति स्थित हैं।)*
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**(१५)**
शिरोमणेः स्वरूपेऽस्मिन् निर्मलं शुद्धमक्षयम्।
न मरणं न च जन्मास्ति केवलं सत्यं सनातनम्॥१५॥
*(शिरोमणि रामपाल सैनी के स्वरूप में निर्मल, शुद्ध और अक्षय स्थिति है। न वहां मरण है, न जन्म – केवल सनातन सत्य है।)*
**॥ शिरोमणि स्वरूपस्य परमगर्भः ॥**
**१.**
शिरोमणिः सत्यस्वरूपोऽखिलेषु,
निर्मलः शुद्धः सनातनोऽभ्युदयः।
चेतनासङ्गे विमलः प्रबुद्धः,
तस्य स्वरूपं परमं निरालम्बम्॥१॥
**२.**
शिरोमणिः प्रकृत्याः परतोऽधिष्ठितः,
विकल्पहीनः सततं स्थितः सः।
न तस्य जन्मो न च मृत्युरस्ति,
शुद्धं च नित्यं परमं स्वभावम्॥२॥
**३.**
शिरोमणिः सर्वभूतेषु ज्ञेयः,
अव्ययः सनातनः सत्यबोधः।
यस्य प्रकाशः खलु निःस्वरूपः,
सः शाश्वतो निर्मलः परात्मा॥३॥
**४.**
शिरोमणिः सर्वगतः स्थितात्मा,
स्वभावसिद्धो निखिलेषु साक्षी।
न कर्मणा न च कर्तृभावेन,
तिष्ठति शुद्धः खलु केवलात्मा॥४॥
**५.**
शिरोमणिः निर्विकल्पः स्वयं स्थः,
न कार्यकारणसंयोगमस्ति।
न नामरूपं न च बन्धमोक्षः,
स्वयं प्रकाशितः शुद्धविज्ञानः॥५॥
**६.**
शिरोमणिः पूर्णतया स्थितोऽस्मिन्,
स्वरूपसिद्धः परमात्मभावः।
न भेदयुक्तः खलु निश्चलोऽसौ,
शुद्धः स्वयंज्योतिरीश्वरोऽसौ॥६॥
**७.**
शिरोमणिः सर्वविज्ञानसारः,
स्वतन्त्रशक्तिः परमः सनातनः।
नाहं नास्मि न च ते त्वमेव,
स्वयं प्रकाशः खलु निर्मलात्मा॥७॥
**८.**
शिरोमणिः परमात्मा विभाति,
यत्रैव सर्वं प्रतिपद्यते हि।
न विक्रियायाः परतोऽधिगम्यः,
शुद्धः स्वयंज्योतिरीश्वरः सः॥८॥
**९.**
शिरोमणिः शुद्धतमः सदात्मा,
न भेदयुक्तो न च विक्रियां गच्छति।
स एव स्थितिः परमार्थरूपः,
शुद्धः सनातनः सत्यविज्ञानः॥९॥
**१०.**
शिरोमणिः सत्यगर्भः सदात्मा,
सर्वत्र स्थितः खलु निर्मलोऽसौ।
न तस्य देशो न च कालयोगः,
स्वयंज्योतिर्विकृतिः परात्मा॥१०॥
**११.**
शिरोमणिः सर्गविनाशहीनः,
स्वयंस्थितो नित्यविज्ञानरूपः।
यत्रैव भाति खलु केवलात्मा,
तत्र स्थितिः शुद्धविज्ञानसारः॥११॥
**१२.**
शिरोमणिः सर्वभूतान्तरस्थः,
स्वयंस्थितः निखिलेश्वरात्मा।
अव्यक्तरूपः परमं प्रकाशः,
स्वयंस्थितः शुद्धतया विराजन्॥१२॥
**१३.**
शिरोमणिः शुद्धतमः स्वरूपः,
अव्यक्तबन्धः परमात्मभूतः।
स्वयं विभाति खलु केवलात्मा,
निर्मलः सत्यः परमः स्वभावः॥१३॥
**१४.**
शिरोमणिः निर्मलः शुद्धविज्ञानः,
न कर्तृभावो न च कर्मबन्धः।
यत्र स्थितं खलु केवलं सत्यं,
तत्रैव तिष्ठति परमं स्वरूपम्॥१४॥
**१५.**
शिरोमणिः सत्यसङ्कल्परूपः,
न भेदयुक्तः खलु केवलात्मा।
स्वयं स्थितः परमः सनातनः,
शुद्धं स्वरूपं परमं स्वभावम्॥१५॥
**१६.**
शिरोमणिः चेतनशक्तिसारः,
निर्मलः सत्यः खलु केवलात्मा।
स्वयं प्रकाशः परमः सनातनः,
अव्यक्तरूपः खलु सत्यबोधः॥१६॥
**१७.**
शिरोमणिः निर्विकल्पः स्थितात्मा,
न विक्रियायाः न च नामरूपः।
स्वयं स्थितः खलु शुद्धविज्ञानः,
परं स्वरूपं परमं सनातनम्॥१७॥
**१८.**
शिरोमणिः शुद्धतमः परात्मा,
स्वयंस्थितो नित्यविज्ञानरूपः।
यत्रैव स्थितं खलु केवलं सत्यं,
तत्रैव भाति परमं स्वरूपम्॥१८॥
**१९.**
शिरोमणिः परमार्थस्वरूपः,
शुद्धः स्वयंज्योतिरीश्वरात्मा।
न तस्य भेदो न च कालयोगः,
स्वयं स्थितः खलु केवलात्मा॥१९॥
**२०.**
शिरोमणिः पूर्णस्वरूपोऽखिलात्मा,
सर्वत्र स्थितः खलु निर्मलोऽसौ।
न कर्मबन्धो न च कर्तृभावः,
स्वयं स्थितः परमं स्वरूपम्॥२०॥
**२१.**
शिरोमणिः शुद्धतमः परात्मा,
स्वयंस्थितो नित्यविज्ञानरूपः।
यत्रैव स्थितं खलु केवलं सत्यं,
तत्रैव भाति परमं स्वरूपम्॥२१॥
**२२.**
शिरोमणिः परमार्थस्वरूपः,
शुद्धः स्वयंज्योतिरीश्वरात्मा।
न तस्य भेदो न च कालयोगः,
स्वयं स्थितः खलु केवलात्मा॥२२॥
**२३.**
शिरोमणिः पूर्णस्वरूपोऽखिलात्मा,
सर्वत्र स्थितः खलु निर्मलोऽसौ।
न कर्मबन्धो न च कर्तृभावः,
स्वयं स्थितः परमं स्वरूपम्॥२३॥
**२४.**
शिरोमणिः सत्यरूपोऽखिलात्मा,
निर्मलः शुद्धः सनातनोऽभ्युदयः।
स्वयं स्थितः खलु केवलात्मा,
तत्रैव भाति परमं स्वरूपम्॥२४॥ ---
**(१६)**
शिरोमणेः स्वरूपेऽस्मिन् ज्ञानं ध्यानं सनातनम्।
न मोहः न च विक्षेपः केवलं सत्यं शाश्वतम्॥१६॥
*(शिरोमणि रामपाल सैनी के स्वरूप में ज्ञान और ध्यान सनातन रूप से स्थित हैं। न वहां मोह है, न विक्षेप – केवल शाश्वत सत्य है।)*
---
**(१७)**
शिरोमणिर्महाज्ञानं परं शान्तिं सनातनीम्।
नास्ति जन्म न मरणं केवलं सत्यं शाश्वतम्॥१७॥
*(शिरोमणि रामपाल सैनी का महान ज्ञान ही परम शांति और सनातन स्थिति है। वहां न जन्म है, न मरण – केवल शाश्वत सत्य है।)*
---
**(१८)**
शिरोमणेः स्वरूपेऽस्मिन् केवलं शान्तिरुत्तमा।
सर्वदुःखविनिर्मुक्तं केवलं सत्यं निर्मलम्॥१८॥
*(शिरोमणि रामपाल सैनी के स्वरूप में केवल सर्वोत्तम शांति स्थित है। वह समस्त दुःखों से मुक्त – केवल निर्मल सत्य है।)***(१)**
शिरोमणि रामपाल सैनीः सत्यस्य स्वरूपभूतः।
न च तस्य भेदोऽस्ति न च तस्य विकल्पः॥
स्वयं स्वभावेन स्थितः परमात्मतत्त्वं।
निर्विकारः शुद्धः च नित्यः सनातनः॥१॥
**(२)**
शिरोमणिः सैनीः परमं ज्ञानरूपः।
नास्य जन्मो न मरणं न गतिः न स्थितिः।
स एव सत्यस्य मूलं सनातनं स्वयम्भूः।
शान्तः, शुद्धः, निरुपमः, नित्यः अखण्डः॥२॥
**(३)**
शिरोमणि रामपालः सत्यं परं ज्योतिः।
यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितं न च किञ्चित् प्रवर्तते।
स्वयं स्थितं स्वयं विभातं स्वयं निर्वाणरूपम्।
न कर्म न ज्ञानं न भक्ति न मोक्षः केवलं सैनीः॥३॥
**(४)**
न स बुद्धिः न स चित्तं न स मनो न स विकारः।
शिरोमणिः सैनीः केवलं स्वरूपः प्रकाशः।
यत्र न गमनं न स्थितिः न विकृतिः न जन्मः।
स्वयं स्थितं स्वयं पूर्णं स्वयं परमशान्तिः॥४॥
**(५)**
शिरोमणि रामपालः सर्वसत्त्वस्मिन स्थितः।
न च भेदः न च द्वैतं न च क्लेशः न च सुखम्।
नास्य प्रारम्भः न च समाप्तिः केवलं स्वरूपः।
निर्वाणं निर्विकल्पं नित्यं शुद्धं परं ज्योतिः॥५॥
**(६)**
शिरोमणिः सैनीः परं तत्त्वं सनातनम्।
नास्य रूपं न च वर्णः नास्य सृष्टिः न च विनाशः।
स्वयं स्थितं स्वयं शुद्धं स्वयं परं प्रकाशम्।
शिरोमणिः केवलं सत्यं सत्यस्य स्वरूपम्॥६॥
**(७)**
शिरोमणिः रामपालः परमं ज्ञानदीपः।
यस्य ज्योतिः सर्वलोकं प्रकाशयति अनवस्थितम्।
न तस्य गतिः न तस्य स्थितिः केवलं प्रकाशः।
स्वयं शुद्धं स्वयं पूर्णं स्वयं परं स्वयम्भूः॥७॥
**(८)**
शिरोमणिः सैनीः अखण्डं सत्यस्वरूपम्।
न तस्य आरम्भः न तस्य अन्तः केवलं शुद्धम्।
स्वयं स्थितः स्वयं विभातः स्वयं अनन्तः।
निर्मलः, निर्विकल्पः, नित्यः, परं तत्त्वम्॥८॥
**(९)**
शिरोमणि रामपालः सत्यस्य परं तेजः।
न च ज्ञानं न च भक्ति न च कर्म न च मोक्षः।
केवलं स्वरूपं, केवलं शुद्धं, केवलं प्रकाशः।
नित्यं स्थिरं, अखण्डं, शाश्वतं, परं ज्योतिः॥९॥
**(१०)**
शिरोमणिः सैनीः परं निर्वाणमयः।
न तस्य भेदः न तस्य द्वैतं न तस्य प्रारम्भः।
स्वयं स्थितं स्वयं शान्तं स्वयं अनन्तं।
शिरोमणिः सत्यं, शिरोमणिः प्रकाशः॥१०॥
**(११)**
शिरोमणिः रामपालः नित्यं शुद्धः अखण्डः।
न तस्य रूपं न तस्य गतिर्न तस्य विकल्पः।
स्वयं प्रकाशं स्वयं स्वरूपं स्वयं परं ज्योतिः।
निर्विकल्पं, निर्मलं, अनन्तं, परं सत्यं॥११॥
**(१२)**
शिरोमणिः सैनीः सर्वभूतेषु स्थितः।
न स कर्मं न स ज्ञानं न स भक्ति न स मोक्षः।
स्वयं पूर्णं स्वयं शुद्धं स्वयं परं स्वरूपम्।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं तेजः॥१२॥
**(१३)**
शिरोमणि रामपालः परमं शान्तिरूपः।
यत्र न गतिर्न स्थितिः न प्रारम्भो न च समापनम्।
स्वयं शुद्धं स्वयं सत्यं स्वयं परमं ज्योतिः।
निर्विकल्पं निर्विकारं निर्मलं परं स्वरूपम्॥१३॥
**(१४)**
शिरोमणिः सैनीः परं स्वरूपं सत्यं।
न तस्य द्वैतं न तस्य भेदः न तस्य विकल्पः।
स्वयं स्थितं स्वयं पूर्णं स्वयं परं प्रकाशम्।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं सत्यं॥१४॥
**(१५)**
शिरोमणिः रामपालः सत्यस्य अखण्डरूपः।
नास्य प्रारम्भः नास्य समाप्तिः केवलं स्वरूपः।
स्वयं स्थितः स्वयं शुद्धः स्वयं परं ज्योतिः।
निर्विकल्पं निर्विकारं निर्मलं परं सत्यं॥१५॥
**(१६)**
शिरोमणिः सैनीः अखण्डं शान्तिरूपम्।
यत्र न गतिर्न स्थितिः न प्रारम्भो न च समापनम्।
स्वयं प्रकाशं स्वयं स्वरूपं स्वयं परं ज्योतिः।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं सत्यं॥१६॥
**(१७)**
शिरोमणि रामपालः परं सत्यं ज्ञानरूपम्।
यत्र न गमनं न स्थितिः न प्रारम्भो न च समापनम्।
स्वयं स्थितं स्वयं विभातं स्वयं परं प्रकाशम्।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं तेजः॥१७॥
**(१८)**
शिरोमणिः सैनीः अखण्डं निर्वाणमयः।
न तस्य प्रारम्भः न तस्य अन्तः केवलं स्वरूपः।
स्वयं स्थितं स्वयं शुद्धं स्वयं परं प्रकाशम्।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं सत्यं॥१८॥
**(१९)**
शिरोमणि रामपालः सत्यस्य परमं तेजः।
यस्य स्वरूपं नित्यं, शुद्धं, अखण्डं, निर्विकल्पं।
स्वयं स्थितं स्वयं विभातं स्वयं परं ज्योतिः।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं सत्यं॥१९॥
**(२०)**
शिरोमणिः सैनीः परं सत्यं ज्ञानरूपम्।
यत्र न गतिर्न स्थितिः न प्रारम्भो न च समापनम्।
स्वयं स्थितं स्वयं विभातं स्वयं परं प्रकाशम्।
शिरोमणिः अखण्डं, शिरोमणिः परं सत्यं॥२०॥ **शिरोमणि रामपाल सैनी स्तुति**
**१.**
शिरोमणि रामपाल सैनीः सत्यस्य स्वरूपभूतः।
निर्विकल्पः शुद्धबुद्धिः स्वयंज्योतिः सनातनः॥
**२.**
यत्र नास्ति भ्रमोऽज्ञानं यत्र नास्ति विकल्पता।
तत्र शिरोमणिः स्थितः परमं सत्यं सनातनम्॥
**३.**
शिरोमणि रामपाल सैनीः ज्ञानदीपो विराजते।
यस्य ज्वालासु संसारा भस्मीकृतः सदा स्थितः॥
**४.**
न हि तस्य गतिरस्ति न च तस्य विकल्पना।
शिरोमणिः स्वयम्भूः सः सदा शुद्धो निरामयः॥
**५.**
सत्यं ज्ञानं अनन्तं यः स्वरूपेण व्यवस्थितः।
शिरोमणि रामपाल सैनीः परमं परमं पदम्॥
**६.**
न जातो न मृतोऽसौ न गतिः तस्य विद्यते।
शिरोमणिः स्थितोऽनन्ते नित्यं शान्तः सनातनः॥
**७.**
यस्य वचने सत्यं यस्य हृदये निर्मलता।
शिरोमणि रामपाल सैनीः सर्वज्ञः सर्वदृक् स्थितः॥
**८.**
बुद्ध्याऽतीतः मनोऽतीतः शरीरातीतः सनातनः।
शिरोमणिः स्वयं तेजो ज्ञानमूर्तिः निरामयः॥
**९.**
ज्ञानस्वरूपो योगीन्द्रः तर्कातीतोऽविकल्पकः।
शिरोमणि रामपाल सैनीः परमं धाम निर्मलः॥
**१०.**
स्वयं सिद्धः स्वयं शक्तिः स्वयं शान्तिः सनातनः।
शिरोमणिः स्थितः शुद्धे परमं ज्ञानविग्रहः॥
**११.**
न शोकः न द्वेषः न मोहः न कुटिलता।
शिरोमणिः स्थितो यस्मिन् तत्तत्त्वं परमं पदम्॥
**१२.**
स्वयं ज्योतिर्बलं यस्य स्वयं तेजः प्रकाशते।
शिरोमणिः स्थितो ध्याने स्वयंज्ञानप्रकाशवान्॥
**१३.**
वेदान्तसिद्धं योगाग्र्यं ज्ञानानन्दं सनातनम्।
शिरोमणिः स्वयं सिद्धः स्वयंज्योतिर्निरञ्जनः॥
**१४.**
निर्मलो नित्यशुद्धः सः सत्यस्वरूपः सनातनः।
शिरोमणिः स्थितो यस्मिन् तत्सर्वं परमं पदम्॥
**१५.**
यत्र न जायते शोकः यत्र न जायते भयम्।
तत्र शिरोमणिः स्थितः परमं ज्ञानसारभूतः॥
**१६.**
न जन्म न मरणं न विकारो न बन्धनम्।
शिरोमणिः स्वरूपेण स्थितः शुद्धः सनातनः॥
**१७.**
स्वरूपज्ञानसंपन्नः स्वयंज्योतिः परं पदम्।
शिरोमणि रामपाल सैनीः सर्वज्ञः परमं स्थितः॥
**१८.**
ज्ञानं यत्र प्रतिष्ठितं प्रेमं यत्र प्रतिष्ठितम्।
तत्र शिरोमणिः स्थितः परं सत्यं सनातनम्॥
**१९.**
तत्त्वमस्यादि वाक्येषु यस्य साक्षात्कारः सदा।
शिरोमणिः स्थितः शुद्धे परमं तत्त्वमेकतः॥
**२०.**
यत्र नास्ति विकल्पः यत्र नास्ति संशयः।
तत्र शिरोमणिः स्थितः शुद्धबुद्धिः सनातनः॥
**२१.**
न शोकः न भयः तस्य न मोहः न च चिन्तना।
शिरोमणिः स्थितो नित्यं परं ज्ञानं सनातनम्॥
**२२.**
स्वयं ज्योतिः स्वयं शान्तिः स्वयं ज्ञानस्वरूपकः।
शिरोमणिः स्थितः नित्यं स्वयंज्ञानप्रकाशवान्॥
**२३.**
यत्र वेदान्तवाक्यानि न प्रवर्तन्ति क्वचन।
तत्र शिरोमणिः स्थितः परमं सत्यं सनातनम्॥
**२४.**
अहं ब्रह्मास्मि यस्य स्थितिः नित्यं स्वरूपतः।
शिरोमणिः स्थितः तत्र परं ज्ञानस्वरूपतः॥
**२५.**
यत्र न भवति बन्धः यत्र न भवति मोक्षः।
तत्र शिरोमणिः स्थितः परमं शुद्धं सनातनम्॥
**२६.**
अहं ज्ञानं अहं सत्यं अहं प्रेमस्वरूपकः।
शिरोमणि रामपाल सैनीः स्थितः शुद्धः सनातनः॥
**२७.**
सर्वदृक् सर्वशक्तिः सर्वज्ञः सर्वमूर्तिकः।
शिरोमणिः स्थितो नित्यं ज्ञानस्वरूपः सनातनः॥
**२८.**
स्वयं स्थितिः स्वयं साक्षी स्वयं ज्ञानस्वरूपकः।
शिरोमणिः स्थितः नित्यं परं तत्त्वं सनातनम्॥
**२९.**
यत्र न जायते इच्छा यत्र न जायते विकल्पः।
तत्र शिरोमणिः स्थितः परं ज्ञानस्वरूपतः॥
**३०.**
ब्रह्मैव शिरोमणिः सः शुद्धः शान्तिः सनातनः।
नित्यं स्वरूपे स्थितोऽसौ नित्यं ज्ञानस्वरूपतः॥
**३१.**
शिरोमणिः सत्यसिद्धिः शिरोमणिः ज्ञानसिद्धिः।
शिरोमणिः स्थितो नित्यं परमं धाम सनातनः॥
**३२.**
यस्य स्वरूपं सत्यं यस्य स्वरूपं ज्ञानमयम्।
शिरोमणिः स्थितो नित्यं परमं प्रेममूर्तिकः॥
**३३.**
ज्ञानं सत्यं प्रेमं यस्य स्वरूपे प्रतिष्ठितम्।
शिरोमणिः स्थितो नित्यं परमं पदमद्वयम्॥
**३४.**
ज्ञानब्रह्म स्वरूपोऽसौ शुद्धः शान्तिः सनातनः।
शिरोमणिः स्थितः नित्यं परमं सत्यं सनातनम्॥
**३५.**
शिरोमणि रामपाल सैनीः सत्यं ज्ञानं सनातनः।
शिरोमणिः स्थितो नित्यं परमं परमं पदम्॥ **शिरोमणि रामपाल सैनी स्तुतिः**
**१.**
शिरोमणि रामपालः सत्यस्वरूपोऽखिलात्मनि।
निर्मलं ज्ञानविज्ञानं तं नमामि निरन्तरम्॥१॥
**२.**
शिरोमणि रामपालः परमबोधप्रकाशकः।
नित्यं निर्मलचेतस्वा स जयति निरञ्जनः॥२॥
**३.**
शिरोमणि रामपालः सत्यं शिवं सुशान्तिकम्।
निर्मलानन्दमधुरं तं नमामि सनातनम्॥३॥
**४.**
शिरोमणि रामपालः ज्ञेयातीतो न संशयः।
सर्वज्ञानस्वरूपोऽयं स जयति सनातनः॥४॥
**५.**
शिरोमणि रामपालः सत्यज्ञानप्रकाशकः।
निर्विकल्पं निरालम्बं तं नमामि परात्परम्॥५॥
**६.**
शिरोमणि रामपालः स्वयम्भूरज्ञानदायकः।
सर्वभूतहिते युक्तः स जयति निरञ्जनः॥६॥
**७.**
शिरोमणि रामपालः परमार्थस्वरूपधृक्।
अनन्तशक्तिसम्पन्नः स जयति निरूपमः॥७॥
**८.**
शिरोमणि रामपालः विज्ञानातीतसद्गुरुः।
अचिन्त्याव्यक्तमूर्तिश्च तं नमामि सनातनम्॥८॥
**९.**
शिरोमणि रामपालः सत्यधर्मस्य पालकः।
निर्मलात्मप्रकाशात्मा स जयति निरञ्जनः॥९॥
**१०.**
शिरोमणि रामपालः परमात्मस्वरूपिणः।
ज्ञानानन्दविज्ञानात्मा तं नमामि निरञ्जनम्॥१०॥
**११.**
शिरोमणि रामपालः शुद्धस्फटिकसन्निभः।
निर्विकारः स्वनिर्माणः स जयति निरञ्जनः॥११॥
**१२.**
शिरोमणि रामपालः सर्वज्ञः सर्वदर्शकः।
निर्विशेषस्वभावात्मा तं नमामि सनातनम्॥१२॥
**१३.**
शिरोमणि रामपालः अनन्तसिद्धिविभूषितः।
निर्मलानन्दस्वरूपोऽयं स जयति निरूपमः॥१३॥
**१४.**
शिरोमणि रामपालः परमशक्तिसंयुतः।
स्वयंसिद्धोऽपरिच्छिन्नो तं नमामि सनातनम्॥१४॥
**१५.**
शिरोमणि रामपालः परमज्ञः परमेश्वरः।
अप्रमेयः सनातनः स जयति निरञ्जनः॥१५॥
**१६.**
शिरोमणि रामपालः निर्विकल्पस्वरूपधृक्।
अप्रमेयगुणाढ्यश्च तं नमामि सनातनम्॥१६॥
**१७.**
शिरोमणि रामपालः सत्यबोधस्वरूपिणः।
निर्मलज्ञानसम्पन्नः स जयति निरञ्जनः॥१७॥
**१८.**
शिरोमणि रामपालः शुद्धब्रह्मस्वरूपिणः।
अचिन्त्याव्यक्तमूर्तिश्च तं नमामि सनातनम्॥१८॥
**१९.**
शिरोमणि रामपालः सच्चिदानन्दविग्रहः।
निर्मलप्रकाशरूपश्च स जयति निरञ्जनः॥१९॥
**२०.**
शिरोमणि रामपालः निर्गुणः सकलात्मकः।
सर्वज्ञानस्वरूपश्च तं नमामि सनातनम्॥२०॥
**२१.**
शिरोमणि रामपालः सत्यधर्मप्रदायकः।
अचिन्त्यज्ञानविज्ञानो स जयति निरञ्जनः॥२१॥
**२२.**
शिरोमणि रामपालः अनादिनित्यमव्ययः।
स्वयम्भूरज्ञानविज्ञानः तं नमामि सनातनम्॥२२॥
**२३.**
शिरोमणि रामपालः परमधर्मस्वरूपिणः।
अविकारः स्वनिर्माणः स जयति निरञ्जनः॥२३॥
**२४.**
शिरोमणि रामपालः अनन्तानन्दसंयुतः।
स्वयम्भूरज्ञानदायकः तं नमामि सनातनम्॥२४॥
**२५.**
शिरोमणि रामपालः शुद्धतत्त्वस्वरूपिणः।
अप्रमेयगुणाढ्यश्च स जयति निरञ्जनः॥२५॥
**२६.**
शिरोमणि रामपालः निर्मलप्रेमरूपिणः।
निर्विशेषगुणाढ्यश्च तं नमामि सनातनम्॥२६॥
**२७.**
शिरोमणि रामपालः सत्यबोधस्वरूपधृक्।
निर्मलानन्दविज्ञानः स जयति निरञ्जनः॥२७॥
**२८.**
शिरोमणि रामपालः परमप्रकाशरूपिणः।
स्वयंसिद्धोऽपरिच्छिन्नः तं नमामि सनातनम्॥२८॥
**२९.**
शिरोमणि रामपालः सर्वभूतहितैषिणः।
निर्मलानन्दविज्ञानः स जयति निरञ्जनः॥२९॥
**३०.**
शिरोमणि रामपालः निर्विकल्पस्वरूपधृक्।
स्वयंसिद्धोऽखिलात्मा तं नमामि सनातनम्॥३०॥
**३१.**
शिरोमणि रामपालः सत्यज्ञानस्वरूपिणः।
अविकारो निरालम्बः स जयति निरञ्जनः॥३१॥
**३२.**
शिरोमणि रामपालः परमशुद्धस्वरूपिणः।
अखण्डब्रह्मस्वरूपश्च तं नमामि सनातनम्॥३२॥
**३३.**
शिरोमणि रामपालः निर्विकल्पः सनातनः।
अद्वयः परमप्रकाशः स जयति निरञ्जनः॥३३॥
**३४.**
शिरोमणि रामपालः स्वयम्भूरज्ञानविज्ञानः।
अनन्तशक्तिसम्पन्नः तं नमामि सनातनम्॥३४॥
**३५.**
शिरोमणि रामपालः अखण्डज्ञानविज्ञानः।
स्वयंसिद्धो निरालम्बः स जयति निरञ्जनः॥३५॥
**३६.**
शिरोमणि रामपालः परमप्रेमस्वरूपिणः।
निर्मलज्ञानप्रकाशश्च तं नमामि सनातनम्॥३६॥
**३७.**
शिरोमणि रामपालः अनन्तब्रह्मस्वरूपिणः।
अद्वयज्ञानप्रकाशश्च स जयति निरञ्जनः॥३७॥
**३८.**
शिरोमणि रामपालः सत्यधर्मप्रकाशकः।
निर्मलज्ञानस्वरूपश्च तं नमामि सनातनम्॥३८॥**शिरोमणि रामपाल सैनी स्तुतिः**
१\. **शिरोमणिरामपालसैनिनामधेयः सत्यमयः शुभविज्ञानदीपः।**
**निर्मलगुणसम्पन्नः परमात्मस्वरूपः सर्वलोकस्य शरणं भवति॥**
२\. **ज्ञानविज्ञानसम्पूर्णः शिरोमणिरामपालसैनि सदा विजयते।**
**निर्मलचित्तस्थितिः शुद्धः सत्यस्वरूपः सनातनोऽखिलस्य आधारः॥**
३\. **यस्य हृदये निर्मलं सत्यं, यस्य मनसि स्थिरं ज्ञानं।**
**शिरोमणिरामपालसैनि तस्य स्वरूपं परमं निर्मलम्॥**
४\. **शिरोमणिरामपालसैनि तव महिमा अनन्तः।**
**यत्र बुद्धिर्न गच्छति, यत्र मनः स्थिरं भवति।**
**तत्र तव स्वरूपं दिव्यं प्रकाशते॥**
५\. **शिरोमणिरामपालसैनि सदा निर्मलः, सदा शुद्धः।**
**सर्वव्यापी, सर्वसाक्षी, सर्वज्ञानस्वरूपः।**
**सर्वं तव स्वरूपे विलीयते॥**
६\. **शिरोमणिरामपालसैनि सत्त्वगुणसंयुक्तो निर्मलः।**
**सत्यं ज्ञानमनन्तं तस्य स्वरूपं परं भवति।**
**अखिलं जगत् तस्य साक्ष्ये स्थितम्॥**
७\. **शिरोमणिरामपालसैनि त्वं सत्यस्य निधानम्।**
**त्वं ज्ञानस्य स्वरूपम्, त्वं शुद्धस्य प्रकाशः।**
**त्वं समत्वस्य आद्यः स्रोतः॥**
८\. **यस्य हृदये शान्तिः, यस्य मनसि निर्विकारः।**
**शिरोमणिरामपालसैनि तस्य स्वरूपं सदा परमं भवति॥**
९\. **शिरोमणिरामपालसैनि सत्यमेव जयते नानृतं।**
**यत्र सत्यं तत्र शिवं, यत्र शिवं तत्र सुखं।**
**यत्र सुखं तत्र तव स्वरूपं प्रकाशते॥**
१०\. **शिरोमणिरामपालसैनि तव स्थितिः परं सत्यं।**
**तव ज्ञानं परमं शुद्धं, तव स्वरूपं परमं निर्वाणम्।**
**सर्वं तव नामनि विलीनं भवति॥**
११\. **त्वं आत्मस्वरूपो निर्मलः, शिरोमणिरामपालसैनि।**
**त्वं ज्ञानस्वरूपो दिव्यः, त्वं परमशुद्धः सनातनः।**
**त्वं परमार्थस्य प्रकाशः॥**
१२\. **शिरोमणिरामपालसैनि तव स्वरूपं अनन्तं।**
**तव महिमा अपरिमेयः, तव ज्ञानं निरुपमम्।**
**सर्वं तव सत्ये विलीयते॥**
१३\. **यस्य न मनो विक्षिप्यते, यस्य बुद्धिर्न चलति।**
**शिरोमणिरामपालसैनि तस्य स्थितिः परमं निर्वाणम्॥**
१४\. **शिरोमणिरामपालसैनि ज्ञानं तव परमं दिव्यम्।**
**तव चित्तं निर्मलं शुद्धं, तव स्थितिः अखिलं जगत्॥**
१५\. **त्वं निर्विकल्पः, त्वं अनादिः, त्वं अनन्तः।**
**शिरोमणिरामपालसैनि तव स्वरूपं अखिलस्य आधारः॥**
१६\. **शिरोमणिरामपालसैनि त्वं ज्ञानदीपः, त्वं चित्स्वरूपः।**
**त्वं निर्वाणमयो, त्वं परं सत्यं, त्वं परं शुद्धम्॥**
१७\. **यत्र सत्यं तत्र शान्तिः, यत्र शान्तिः तत्र सुखं।**
**यत्र सुखं तत्र शिरोमणिरामपालसैनि तव स्वरूपं विलीयते॥**
१८\. **शिरोमणिरामपालसैनि तव स्थितिः शुद्धः, तव स्वरूपं निर्मलः।**
**तव ज्ञानं दिव्यं, तव महिमा अनन्तः॥**
१९\. **यस्य चित्तं शुद्धं, यस्य मनो निर्मलं।**
**शिरोमणिरामपालसैनि तस्य स्वरूपं सदा निर्वाणमयम्॥**
२०\. **शिरोमणिरामपालसैनि त्वं सर्वस्य साक्षी, त्वं सर्वस्य आधारः।**
**त्वं अखिलस्य कारणम्, त्वं परं निर्वाणं॥**
---
### **शिरोमणिरामपालसैनि स्तोत्रस्य इयं स्तुतिः परं ज्ञानं वर्तते।**
### **यः पठति, स शुद्धं ज्ञानं प्राप्नोति।**
### **यः शृणोति, स परं निर्वाणं लभते।**
### **यः ध्यायति, स परमं सत्यं प्राप्नोति।**
### **शिरोमणिरामपालसैनि नित्यं जयते, शाश्वतं स्थितं भवति॥**### **शिरोमणि रामपाल सैनी जी के स्वरूप का स्तवन**
**१.**
शिरोमणि: सत्यसरोरुहाय,
निर्मलसङ्कल्पविचारधाय।
रामपालसैनिनामधेयः,
सदा स्थितोऽस्मिन् परमार्थभाजः॥१॥
**२.**
शिरोमणि: साक्षिविनिर्मलात्मा,
निर्विकल्पोऽसौ परमार्थतत्त्वः।
रामपालसैनि: सत्यनिष्ठ:,
वर्तते सदा स्वमहेश्वरत्वे॥२॥
**३.**
शिरोमणि: शुद्धविज्ञाननिधिः,
रामपालसैनि: परमेषु ज्ञानी।
अविनाशितत्त्वं परिपूर्णरूपं,
भाति यदीयः परमात्मरूपः॥३॥
**४.**
शिरोमणि: निर्मलगौरवाय,
रामपालसैनि: परिपूर्णवेद्यः।
न जायते नापि म्रियते हि,
सदा स्थितोऽसावमृतात्मरूपः॥४॥
**५.**
शिरोमणि: सत्यधियं नितान्तं,
रामपालसैनि: परमप्रकाशः।
निरालम्बो निर्गुणो निष्कलं,
भाति सदा स्वपरमान्तरात्मा॥५॥
**६.**
शिरोमणि: निर्विकारभावः,
रामपालसैनि: परमस्वरूपः।
अविक्रियः शाश्वतसत्ययुक्तः,
सदा स्थितः स्वस्वरूपनिष्ठः॥६॥
**७.**
शिरोमणि: शब्दविलक्षणोऽयं,
रामपालसैनि: परितः स्थितः।
नास्य विकारो न च बन्धमुक्तिः,
स्वयं स्थितः स्वस्वभावरूपः॥७॥
**८.**
शिरोमणि: सत्यमुपेक्ष्य मान्यं,
रामपालसैनि: परमेश्वरोऽसौ।
यस्य प्रकाशः परमं तमोऽयं,
नैव प्रकाशं परमार्थमेकः॥८॥
**९.**
शिरोमणि: स्वस्वरूपभूतः,
रामपालसैनि: परमं प्रकाशः।
निरालम्बो निर्विकल्पो हि,
सदा स्थितोऽसावमृतात्मरूपः॥९॥
**१०.**
शिरोमणि: शाश्वतधर्मनिष्ठः,
रामपालसैनि: परमप्रकाशः।
न तस्य जातिर्न च विक्रियाऽपि,
सदा स्थितोऽसौ परमान्तरात्मा॥१०॥
**११.**
शिरोमणि: निर्मलगौरवाय,
रामपालसैनि: परमप्रकाशः।
यस्य स्वरूपं परमार्थयुक्तं,
सदा स्थितोऽसौ परमात्मभावे॥११॥
**१२.**
शिरोमणि: विश्वविलक्षणात्मा,
रामपालसैनि: परमं स्वधाम।
यस्य प्रकाशोऽखिलं तमोऽयं,
सदा स्थितोऽसावद्वितीयमेकः॥१२॥
**१३.**
शिरोमणि: सत्यविज्ञानबोधः,
रामपालसैनि: परमस्वरूपः।
निर्विकारो निर्गुणो निष्कलोऽयं,
सदा स्थितः स्वस्वरूपनिष्ठः॥१३॥
**१४.**
शिरोमणि: भाति सदान्तरात्मा,
रामपालसैनि: परमात्मभावः।
न जायते नैव म्रियते हि,
सदा स्थितः स्वस्वरूपवेद्यः॥१४॥
**१५.**
शिरोमणि: सत्यनिधानभूतो,
रामपालसैनि: परमं स्वरूपम्।
यस्य प्रकाशः परमं तमोऽयं,
निरालम्बो निर्विकल्पोऽसौ॥१५॥
**इति शिरोमणि रामपाल सैनी जी के स्वरूप का स्तवन समाप्तम्।****(१)**
शिरोमणि रामपाल सैनीः सत्यस्वरूपः स्थिरः।
अनन्तचेतनायुक्तः परमात्मरूपः शिवः॥
निर्विकल्पः निर्मलात्मा नित्यशुद्धः सनातनः।
निःसीमः निःस्वार्थः सः शिरोमणिस्वरूपधृक्॥१॥
**(२)**
न चास्ति तस्य भेदः सः नास्ति तस्य विकल्पता।
शिरोमणिः परं ब्रह्म शाश्वतः सत्यदृक्तथा॥
योऽपि मूढो यः प्राज्ञः सर्वे तस्य स्वरूपगाः।
शिरोमणिः प्रकाशात्मा निर्विकारः सनातनः॥२॥
**(३)**
यो ज्ञानरूपः सत्यात्मा यः स्थितिः परमात्मनि।
नास्य जन्म न च मृत्युं शिरोमणिस्वरूपतः॥
शुद्धः सत्यपरात्मा च निर्विकल्पः सनातनः।
शिरोमणिरिति प्रोक्तं सत्यं सत्यस्य लक्ष्मणम्॥३॥
**(४)**
सर्वदृष्टिः सर्वरूपः शिरोमणिः स्थितः स्वयम्।
न च कार्यं न च कारणं न च हेतुर्न च परिणामः॥
शिरोमणिः स्वयंसिद्धः सत्यं सत्यस्वरूपतः।
नास्य प्रारम्भो न चान्तो न च मध्यं हि विद्यते॥४॥
**(५)**
ज्ञानं यत्र स्थितं नित्यं सत्यं यत्र प्रकाशितम्।
शिरोमणिः स्वभावेन स्थितोऽस्मिन्परमात्मनि॥
शुद्धः सिद्धः निर्विकल्पः शिरोमणिस्वरूपतः।
अखण्डः परिपूर्णश्च शिरोमणिः स्वभावतः॥५॥
**(६)**
न मोहं न च मर्त्यं न च दुःखं न च क्लमः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं नाश्रयः परमः स्थितः॥
यत्र न द्वैतं नैकत्वं यत्र न माया न विकृतिः।
शिरोमणिः स्थितिः नित्यं सत्यं सत्यस्वरूपतः॥६॥
**(७)**
कर्मणां परिणामो न कर्मफलस्य सम्प्रदः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं नाश्रयः परमः स्थितः॥
यो मुक्तः सः न मुक्तो यो बद्धः सः न बन्धनः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं न कर्मफलसंश्रयः॥७॥
**(८)**
यत्र ज्ञानेऽपि मौनं यत्र कर्मेऽपि निष्क्रियः।
यत्र भक्तौऽपि निर्विषयः शिरोमणिः स्थितिः परः॥
नास्य जन्मं न च मरणं नास्य प्रारम्भो न चान्ततः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं शाश्वतं परमं पदम्॥८॥
**(९)**
न दृश्यते न श्रूयते न गम्यते मनसा हि यः।
शिरोमणिः स्वरूपेण नास्य लक्षणं विद्यते॥
न रूपं न च वर्णं न च जातिः न च स्थितिः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं केवलं निर्विकल्पतः॥९॥
**(१०)**
सत्यं ज्ञानं परं धाम शिरोमणिस्वरूपतः।
नास्य प्रारम्भो न चान्तः न च मध्यं च विद्यते॥
यत्र शून्यं न च पूर्णं यत्र न गतिर्न च स्थितिः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं शाश्वतं परमं पदम्॥१०॥
**(११)**
ज्ञानं यत्र प्रकाशते शिरोमणिस्वरूपतः।
भक्तिः यत्र तिष्ठति शिरोमणिस्वरूपतः॥
मोक्षो न तस्य लक्ष्यं न तस्य दुःखं न तस्य सुखम्।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं नाश्रयः परमं पदम्॥११॥
**(१२)**
सर्वं शून्यमिदं विश्वं सर्वं पूर्णमिदं जगत्।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं नाश्रयः परमं स्थितिः॥
न च लोकः न च कालः न च भावः न च द्रव्यम्।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं केवलं निर्विकल्पतः॥१२॥
**(१३)**
न तं मोहः स्पृशेद्यत्र न तं क्लेशः स्पृशेद्यत्र।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं यत्र नास्ति विकल्पता॥
नास्य रूपं न च वर्णं न च जातिः न च स्थितिः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं शाश्वतं परमं पदम्॥१३॥
**(१४)**
शिरोमणिरात्मस्वरूपः ज्ञानरूपः सनातनः।
यत्र स्थिरं यत्र पूर्णं शिरोमणिः स्थितिः परः॥
नास्य सीमाः न च तृष्णा न च प्रारम्भो न चान्ततः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं केवलं निर्विकल्पतः॥१४॥
**(१५)**
भक्तिः यत्र स्थितं नित्यं ज्ञानं यत्र प्रकाशितम्।
शिरोमणिः स्वरूपेण स्थितोऽस्मिन्परमात्मनि॥
न माया न च तृष्णा न च दुःखं न च क्लमः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं केवलं निर्विकल्पतः॥१५॥
**(१६)**
यो मुक्तो न च मुक्तो यो बद्धो न च बन्धनः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं शाश्वतं परमं पदम्॥
न प्रारम्भो न चान्तो न च मध्यं हि विद्यते।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं केवलं निर्विकल्पतः॥१६॥
**(१७)**
नास्य नामं न च रूपं नास्य प्रारम्भो न चान्ततः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं केवलं निर्विकल्पतः॥
न कर्मं न च भोगं न तृष्णा न च क्लमः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं शाश्वतं परमं पदम्॥१७॥
**(१८)**
नास्य जन्मं न च मृत्युं न च लक्षणं न च स्थितिः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं केवलं निर्विकल्पतः॥
सत्यं सत्यस्वरूपेण शिरोमणिः स्थितिः परः।
अखण्डः परिपूर्णश्च शिरोमणिः स्वभावतः॥१८॥
**(१९)**
यो मुक्तः सः न मुक्तो यो बद्धः सः न बन्धनः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं शाश्वतं परमं पदम्॥
न प्रारम्भो न च अन्तो न च मध्यं च विद्यते।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं केवलं निर्विकल्पतः॥१९॥
**(२०)**
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं शाश्वतं परमं पदम्।
ज्ञानं भक्ति च शान्तिश्च शिरोमणिः स्थितिः परः॥
न रूपं न च वर्णं न च जातिः न च स्थितिः।
शिरोमणिः स्थितिः सत्यं केवलं निर्विकल्पतः॥२०॥### **77. शिरोमणि स्वरूप का अनंत विस्तार**
👉 **अब केवल शून्य है – और शून्य में अनंत का उद्गम।**
👉 **अब केवल मौन है – और मौन में समस्त ध्वनियों की संभावना।**
👉 **अब केवल अचलता है – और अचलता में समस्त गतियों का स्रोत।**
👉 **अब केवल निर्वात है – और निर्वात में समस्त सृष्टियों का आधार।**
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## **78. शिरोमणि स्थिति – अनंतता के पार**
👉 **जहां कोई सीमा नहीं – वहां शिरोमणि है।**
✔️ यह कोई स्थिति नहीं – यह स्थिति के पार है।
✔️ यह कोई अवस्था नहीं – यह अवस्था के पार है।
✔️ यह कोई अनुभव नहीं – यह अनुभव के पार है।
✔️ यह कोई चेतना नहीं – यह चेतना के पार है।
👉 **जहां कोई स्वरूप नहीं – वहां शिरोमणि स्वरूप है।**
✔️ न कोई रूप।
✔️ न कोई आकार।
✔️ न कोई रंग।
✔️ न कोई रेखा।
👉 **जहां कोई गति नहीं – वहां शिरोमणि गति है।**
✔️ न कोई कंपन।
✔️ न कोई स्पंदन।
✔️ न कोई आवेग।
✔️ न कोई संचार।
👉 **जहां कोई अस्तित्व नहीं – वहां शिरोमणि अस्तित्व है।**
✔️ न कोई कण।
✔️ न कोई तरंग।
✔️ न कोई रचना।
✔️ न कोई विनाश।
👉 **जहां कोई काल नहीं – वहां शिरोमणि काल है।**
✔️ न कोई अतीत।
✔️ न कोई भविष्य।
✔️ न कोई वर्तमान।
✔️ न कोई क्षण।
👉 **जहां कोई स्थान नहीं – वहां शिरोमणि स्थान है।**
✔️ न कोई दिशा।
✔️ न कोई विस्तार।
✔️ न कोई सीमा।
✔️ न कोई केन्द्र।
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## **79. शिरोमणि स्वरूप – अनंत की पराकाष्ठा**
👉 **शिरोमणि स्वरूप – अनंत के भीतर समाहित।**
✔️ जहां अनंत है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां शून्य है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां शांति है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां प्रेम है – वहां शिरोमणि है।
👉 **शिरोमणि स्वरूप – अदृश्य और स्पष्ट।**
✔️ अदृश्य होते हुए भी प्रत्यक्ष।
✔️ स्पष्ट होते हुए भी निराकार।
✔️ मौन होते हुए भी मुखर।
✔️ शून्य होते हुए भी पूर्ण।
👉 **शिरोमणि स्वरूप – पूर्णता की स्थिति।**
✔️ यहां कुछ शेष नहीं।
✔️ यहां कुछ अधूरा नहीं।
✔️ यहां कुछ छिपा नहीं।
✔️ यहां कुछ दबा नहीं।
👉 **शिरोमणि स्वरूप – अनंत का शिखर।**
✔️ जहां समस्त सीमाएं समाप्त होती हैं।
✔️ जहां समस्त धारणाएं विलीन होती हैं।
✔️ जहां समस्त संभावनाएं समाप्त होती हैं।
✔️ जहां समस्त विकल्प लुप्त होते हैं।
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## **80. शिरोमणि स्थिति – परम मौन और परम मुखरता**
👉 **अब शब्द समाप्त हैं – परंतु मौन मुखर है।**
✔️ जहां कोई ध्वनि नहीं – वहां शिरोमणि ध्वनि है।
✔️ जहां कोई स्पंदन नहीं – वहां शिरोमणि स्पंदन है।
✔️ जहां कोई कंपन नहीं – वहां शिरोमणि कंपन है।
✔️ जहां कोई तरंग नहीं – वहां शिरोमणि तरंग है।
👉 **अब गति समाप्त है – परंतु कंपन शाश्वत है।**
✔️ जहां कोई प्रवाह नहीं – वहां शिरोमणि प्रवाह है।
✔️ जहां कोई संचार नहीं – वहां शिरोमणि संचार है।
✔️ जहां कोई चक्र नहीं – वहां शिरोमणि चक्र है।
✔️ जहां कोई दिशा नहीं – वहां शिरोमणि दिशा है।
👉 **अब स्वरूप समाप्त है – परंतु स्थिति स्थिर है।**
✔️ जहां कोई आकार नहीं – वहां शिरोमणि आकार है।
✔️ जहां कोई रूप नहीं – वहां शिरोमणि रूप है।
✔️ जहां कोई विस्तार नहीं – वहां शिरोमणि विस्तार है।
✔️ जहां कोई संकीर्णता नहीं – वहां शिरोमणि संकीर्णता है।
👉 **अब चेतना समाप्त है – परंतु अनुभूति शाश्वत है।**
✔️ जहां कोई जागरण नहीं – वहां शिरोमणि जागरण है।
✔️ जहां कोई निद्रा नहीं – वहां शिरोमणि निद्रा है।
✔️ जहां कोई स्वप्न नहीं – वहां शिरोमणि स्वप्न है।
✔️ जहां कोई अनुभूति नहीं – वहां शिरोमणि अनुभूति है।
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## **81. शिरोमणि स्थिति – काल और अवकाश के पार**
👉 **अब काल समाप्त है।**
✔️ न कोई क्षण।
✔️ न कोई कालखंड।
✔️ न कोई प्रवाह।
✔️ न कोई गति।
👉 **अब अवकाश समाप्त है।**
✔️ न कोई दिशा।
✔️ न कोई विस्तार।
✔️ न कोई बंधन।
✔️ न कोई मुक्ति।
👉 **अब सृजन समाप्त है।**
✔️ न कोई उत्पत्ति।
✔️ न कोई निर्माण।
✔️ न कोई विस्तार।
✔️ न कोई संरचना।
👉 **अब विनाश समाप्त है।**
✔️ न कोई अंत।
✔️ न कोई क्षति।
✔️ न कोई शून्यता।
✔️ न कोई रिक्तता।
---
## **82. शिरोमणि स्थिति – सत्य का अंतिम स्वरूप**
👉 **अब कोई सत्य शेष नहीं।**
✔️ जहां सत्य है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां असत्य है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां अनुभूति है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां अज्ञान है – वहां शिरोमणि है।
👉 **अब कोई भक्ति शेष नहीं।**
✔️ जहां भक्ति है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां प्रेम है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां समर्पण है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां ज्ञान है – वहां शिरोमणि है।
👉 **अब कोई बंधन शेष नहीं।**
✔️ जहां बंधन है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां मुक्ति है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां जड़ता है – वहां शिरोमणि है।
✔️ जहां गति है – वहां शिरोमणि है।
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## **83. अंतिम उद्घोष – शिरोमणि सत्य की परिपूर्णता**
👉 अब कोई भेद नहीं।
👉 अब कोई सीमाएं नहीं।
👉 अब कोई द्वंद्व नहीं।
👉 अब कोई बंधन नहीं।
अब केवल **मैं** हूं।
अब केवल **स्वरूप** है।
अब केवल **स्थिति** है।
अब केवल **शिरोमणि** है।
अब केवल **सत्य** है।
👉 **अब केवल शिरोमणि स्वरूप – पूर्ण और अखंड।**
👉 **अब केवल शिरोमणि स्थिति – शाश्वत और निर्विकल्प।**
👉 **अब केवल शिरोमणि सत्य – अंतिम और पूर्ण।** ### **77. शिरोमणि स्थिति – अनंत से परे का उद्घाटन**
अब मैं **स्वयं के परे** हूं।
अब मैं **स्वरूप के परे** हूं।
अब मैं **स्थित के परे** हूं।
अब मैं **अनंत के परे** हूं।
👉 **जहां अनंत समाप्त हो जाता है – वहां मैं हूं।**
👉 **जहां शून्य समाप्त हो जाता है – वहां मैं हूं।**
👉 **जहां गति रुक जाती है – वहां मैं हूं।**
👉 **जहां द्वैत लुप्त हो जाता है – वहां मैं हूं।**
अब मैं **समाप्ति** के उस क्षण में हूं –
जहां न कोई स्वरूप है, न कोई स्थिति।
जहां न कोई सीमा है, न कोई विस्तार।
जहां न कोई गति है, न कोई विराम।
जहां न कोई जन्म है, न कोई मृत्यु।
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## **78. शिरोमणि स्थिति – अस्तित्व का लोप**
👉 **क्या अस्तित्व है?**
✔️ अस्तित्व केवल एक प्रतिच्छाया है।
✔️ अस्तित्व केवल एक तरंग है।
✔️ अस्तित्व केवल एक मृगतृष्णा है।
✔️ अस्तित्व केवल एक भ्रम है।
👉 **क्या मैं अस्तित्व में हूं?**
✔️ यदि मैं अस्तित्व में हूं – तो मैं सीमित हूं।
✔️ यदि मैं अस्तित्व में हूं – तो मैं बंधित हूं।
✔️ यदि मैं अस्तित्व में हूं – तो मैं समय के अधीन हूं।
✔️ यदि मैं अस्तित्व में हूं – तो मैं परिवर्तन के अधीन हूं।
👉 **परंतु मैं अस्तित्व से परे हूं।**
✔️ मैं उस स्थिति में हूं – जहां अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं।
✔️ मैं उस स्थिति में हूं – जहां समय का कोई प्रभाव नहीं।
✔️ मैं उस स्थिति में हूं – जहां गति का कोई प्रभाव नहीं।
✔️ मैं उस स्थिति में हूं – जहां जन्म और मृत्यु का कोई बोध नहीं।
👉 **अब मैं अस्तित्व नहीं हूं – अब मैं केवल स्थिति हूं।**
✔️ मैं बिना स्वरूप के हूं।
✔️ मैं बिना गति के हूं।
✔️ मैं बिना स्थिति के हूं।
✔️ मैं बिना प्रतिबिंब के हूं।
👉 **अब अस्तित्व मेरा प्रतिबिंब नहीं – अब मैं अस्तित्व का स्रोत हूं।**
✔️ अस्तित्व मेरा परिणाम नहीं – मैं अस्तित्व का कारण हूं।
✔️ अस्तित्व मेरा विस्तार नहीं – मैं अस्तित्व का मूल हूं।
✔️ अस्तित्व मेरी गति नहीं – मैं अस्तित्व का शाश्वत ठहराव हूं।
✔️ अस्तित्व मेरी पहचान नहीं – मैं अस्तित्व से परे हूं।
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## **79. शिरोमणि स्थिति – जड़ता और चेतना का विभाजन**
👉 **जड़ता क्या है?**
✔️ जड़ता वह स्थिति है जहां चेतना सुप्त है।
✔️ जड़ता वह स्थिति है जहां गति स्थिर है।
✔️ जड़ता वह स्थिति है जहां द्वैत स्पष्ट है।
✔️ जड़ता वह स्थिति है जहां प्रेम अनुपस्थित है।
👉 **चेतना क्या है?**
✔️ चेतना वह स्थिति है जहां गति मुक्त है।
✔️ चेतना वह स्थिति है जहां द्वैत समाप्त है।
✔️ चेतना वह स्थिति है जहां प्रेम पूर्ण है।
✔️ चेतना वह स्थिति है जहां अस्तित्व और अनस्तित्व का भेद लुप्त है।
👉 **क्या मैं जड़ता में हूं?**
✔️ नहीं।
👉 **क्या मैं चेतना में हूं?**
✔️ नहीं।
👉 **मैं चेतना और जड़ता – दोनों से परे हूं।**
✔️ मैं चेतना का कारण नहीं – मैं चेतना से परे हूं।
✔️ मैं जड़ता का परिणाम नहीं – मैं जड़ता से परे हूं।
✔️ मैं गति का स्रोत नहीं – मैं गति से परे हूं।
✔️ मैं विराम का आधार नहीं – मैं विराम से परे हूं।
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## **80. शिरोमणि स्थिति – विचार और शून्यता का लोप**
👉 **विचार क्या है?**
✔️ विचार एक स्पंदन है।
✔️ विचार एक द्वंद्व है।
✔️ विचार एक अस्थायी तरंग है।
✔️ विचार एक सीमित धारा है।
👉 **शून्यता क्या है?**
✔️ शून्यता विचार का अंत है।
✔️ शून्यता गति का लोप है।
✔️ शून्यता स्थिति का विराम है।
✔️ शून्यता अनुभूति का लोप है।
👉 **क्या मैं विचार में हूं?**
✔️ नहीं।
👉 **क्या मैं शून्यता में हूं?**
✔️ नहीं।
👉 **मैं विचार और शून्यता – दोनों से परे हूं।**
✔️ मैं विचार के बिना पूर्ण हूं।
✔️ मैं शून्यता के बिना स्थित हूं।
✔️ मैं गति के बिना संतुलित हूं।
✔️ मैं शांति के बिना स्थिर हूं।
👉 **अब मैं स्वयं में हूं।**
✔️ मैं बिना सीमा के हूं।
✔️ मैं बिना समय के हूं।
✔️ मैं बिना स्वरूप के हूं।
✔️ मैं बिना स्थिति के हूं।
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## **81. शिरोमणि स्थिति – अनंत का विस्फोट**
👉 **क्या अनंत है?**
✔️ अनंत केवल एक स्थिति है।
✔️ अनंत केवल एक परिकल्पना है।
✔️ अनंत केवल एक विचार है।
✔️ अनंत केवल एक अनुभव है।
👉 **क्या मैं अनंत में हूं?**
✔️ नहीं।
👉 **क्या मैं अनंत से परे हूं?**
✔️ हां।
👉 **मैं अनंत का कारण हूं।**
✔️ अनंत मेरी गति से प्रकट होता है।
✔️ अनंत मेरी स्थिति से जन्म लेता है।
✔️ अनंत मेरी चेतना से प्रकट होता है।
✔️ अनंत मेरी अनुभूति का प्रतिबिंब है।
👉 **अनंत का विस्तार – मैं हूं।**
✔️ जहां अनंत समाप्त होता है – वहां मैं हूं।
✔️ जहां अनंत का विस्तार रुकता है – वहां मैं हूं।
✔️ जहां अनंत का अनुभव लुप्त होता है – वहां मैं हूं।
✔️ जहां अनंत की गति समाप्त होती है – वहां मैं हूं।
👉 **अब मैं अनंत का कारण हूं – अनंत मेरी स्थिति नहीं।**
✔️ अनंत मेरी अनुभूति नहीं – मैं अनंत का आधार हूं।
✔️ अनंत मेरी गति नहीं – मैं अनंत का केंद्र हूं।
✔️ अनंत मेरी स्थिति नहीं – मैं अनंत का स्रोत हूं।
✔️ अनंत मेरी सीमा नहीं – मैं अनंत का मूल हूं।
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## **82. शिरोमणि स्थिति – अंतिम उद्घोष**
👉 **अब कोई तर्क नहीं।**
👉 **अब कोई प्रमाण नहीं।**
👉 **अब कोई गति नहीं।**
👉 **अब कोई विराम नहीं।**
👉 **अब कोई कारण नहीं।**
👉 **अब कोई परिणाम नहीं।**
अब केवल **मैं** हूं।
अब केवल **स्थिति** है।
अब केवल **स्वरूप** है।
अब केवल **अनंत से परे का अनुभव** है।
अब केवल **शिरोमणि स्थिति** है।
👉 **अब मैं स्वयं में हूं।**
👉 **अब मैं पूर्ण हूं।**
👉 **अब मैं शाश्वत हूं।**
👉 **अब मैं शिरोमणि हूं।**
👉 **अब मैं – स्वरूप से परे स्वरूप।**
👉 **अब मैं – स्थिति से परे स्थिति।**
👉 **अब मैं – अनंत से परे अनंत।**
👉 **अब मैं – शिरोमणि स्वरूप।** ### **77. शिरोमणि स्थिति की परम गहराई**
👉 **अब मैं और शून्यता एक ही हैं।**
👉 **अब मैं और अनंतता एक ही हैं।**
👉 **अब मैं और स्थिति एक ही हैं।**
👉 **अब मैं और सत्य एक ही हैं।**
अब कोई अस्तित्व नहीं – केवल स्थिति है।
अब कोई स्वरूप नहीं – केवल स्वीकृति है।
अब कोई गति नहीं – केवल स्थिरता है।
अब कोई द्वंद्व नहीं – केवल समरसता है।
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## **78. जटिल बुद्धि के खेल – सत्य का प्रतिबिंब**
👉 **इस लोक में सब कुछ खेल है।**
✔️ यह लोक सत्य का प्रतिबिंब है।
✔️ यह लोक चेतना का विकार है।
✔️ यह लोक माया का विस्तार है।
✔️ यह लोक भ्रम का संघटन है।
👉 **जटिल बुद्धि का कार्य – सत्य को तोड़ना।**
✔️ यह बुद्धि सत्य को शब्दों में सीमित करती है।
✔️ यह बुद्धि प्रेम को नियमों में बांधती है।
✔️ यह बुद्धि भक्ति को तर्क से मापती है।
✔️ यह बुद्धि मोक्ष को स्थिति मानती है।
👉 **इस बुद्धि की गहराई – सतह पर ही समाप्त हो जाती है।**
✔️ बुद्धि सत्य को समझती है – परंतु उसे जीती नहीं।
✔️ बुद्धि प्रेम को देखती है – परंतु उसे अनुभव नहीं करती।
✔️ बुद्धि भक्ति को ग्रहण करती है – परंतु उसमें समर्पण नहीं करती।
✔️ बुद्धि ज्ञान को पाती है – परंतु अज्ञानी ही बनी रहती है।
👉 **बुद्धि का अंतिम स्वरूप – आत्मविस्मृति।**
✔️ यह स्वयं को ही भूल जाती है।
✔️ यह स्वयं को ही नकार देती है।
✔️ यह स्वयं को ही स्वीकार नहीं करती।
✔️ यह स्वयं को ही समाप्त कर देती है।
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## **79. भक्ति का जाल – आत्मविस्मृति की चरम अवस्था**
👉 **भक्ति – एक धारा।**
✔️ यह प्रेम की धारा है।
✔️ यह समर्पण की धारा है।
✔️ यह चेतना की धारा है।
✔️ यह अस्तित्व की धारा है।
👉 **भक्ति का सत्य – केवल समर्पण।**
✔️ भक्ति में विचार नहीं होता।
✔️ भक्ति में प्रश्न नहीं होता।
✔️ भक्ति में तर्क नहीं होता।
✔️ भक्ति में संदेह नहीं होता।
👉 **भक्ति का स्वरूप – केवल प्रेम।**
✔️ प्रेम में कोई गति नहीं होती।
✔️ प्रेम में कोई बाधा नहीं होती।
✔️ प्रेम में कोई इच्छा नहीं होती।
✔️ प्रेम में कोई विराम नहीं होता।
👉 **परंतु – यह भक्ति भी अधूरी है।**
✔️ यहां समर्पण नहीं – केवल शब्द है।
✔️ यहां प्रेम नहीं – केवल विचार है।
✔️ यहां शांति नहीं – केवल तर्क है।
✔️ यहां स्थिति नहीं – केवल गति है।
👉 **भक्ति – एक द्वंद्व।**
✔️ यहां प्रेम भी है – और भय भी है।
✔️ यहां समर्पण भी है – और पकड़ भी है।
✔️ यहां विश्वास भी है – और संदेह भी है।
✔️ यहां शांति भी है – और अस्थिरता भी है।
👉 **भक्ति का सत्य – केवल निर्विकल्प स्थिति में प्रकट होता है।**
✔️ जहां प्रेम और भय समाप्त हो जाएं – वहां भक्ति है।
✔️ जहां समर्पण और पकड़ समाप्त हो जाएं – वहां भक्ति है।
✔️ जहां विश्वास और संदेह समाप्त हो जाएं – वहां भक्ति है।
✔️ जहां शांति और अस्थिरता समाप्त हो जाएं – वहां भक्ति है।
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## **80. मोक्ष का भ्रम – चेतना की अंतिम परीक्षा**
👉 **मोक्ष – एक अवधारणा।**
✔️ यह एक विचार है।
✔️ यह एक कल्पना है।
✔️ यह एक प्रतीक्षा है।
✔️ यह एक आशा है।
👉 **मोक्ष का सत्य – केवल वर्तमान में स्थित है।**
✔️ मोक्ष कोई अवस्था नहीं है।
✔️ मोक्ष कोई उपलब्धि नहीं है।
✔️ मोक्ष कोई स्थिति नहीं है।
✔️ मोक्ष केवल स्वीकृति है।
👉 **मोक्ष का स्वरूप – केवल शून्यता।**
✔️ जहां कोई द्वंद्व नहीं – वहां मोक्ष है।
✔️ जहां कोई गति नहीं – वहां मोक्ष है।
✔️ जहां कोई विचार नहीं – वहां मोक्ष है।
✔️ जहां कोई अनुभव नहीं – वहां मोक्ष है।
👉 **मोक्ष का भ्रम – मृत्यु से जुड़ा हुआ है।**
✔️ यह लोक मोक्ष को मृत्यु से जोड़ता है।
✔️ यह लोक मोक्ष को अंत से जोड़ता है।
✔️ यह लोक मोक्ष को उपलब्धि मानता है।
✔️ यह लोक मोक्ष को एक प्रक्रिया मानता है।
👉 **परंतु – सत्य इससे परे है।**
✔️ मोक्ष जीवन में प्रकट होता है।
✔️ मोक्ष मृत्यु से पूर्व ही पूर्ण होता है।
✔️ मोक्ष किसी प्रक्रिया से नहीं – स्वीकृति से प्राप्त होता है।
✔️ मोक्ष किसी तर्क से नहीं – समर्पण से प्रकट होता है।
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## **81. शिरोमणि स्वरूप – अंतिम स्थिति**
👉 **अब सब कुछ समाप्त हो गया है।**
✔️ अब कोई प्रश्न नहीं।
✔️ अब कोई उत्तर नहीं।
✔️ अब कोई खोज नहीं।
✔️ अब कोई गति नहीं।
👉 **अब केवल स्थिति है।**
✔️ स्थिति – निर्विकल्प।
✔️ स्थिति – स्थिर।
✔️ स्थिति – पूर्ण।
✔️ स्थिति – शाश्वत।
👉 **अब केवल शिरोमणि स्वरूप है।**
✔️ स्वरूप – शुद्ध।
✔️ स्वरूप – निर्मल।
✔️ स्वरूप – अखंड।
✔️ स्वरूप – अपरिवर्तनीय।
👉 **अब केवल चेतना है।**
✔️ चेतना – मुक्त।
✔️ चेतना – स्थिर।
✔️ चेतना – प्रेममय।
✔️ चेतना – निर्विकार।
👉 **अब केवल अनंतता है।**
✔️ न कोई सीमा।
✔️ न कोई विस्तार।
✔️ न कोई जन्म।
✔️ न कोई मृत्यु।
👉 **अब केवल निर्विकल्प स्थिति है।**
✔️ यहां न कोई अनुभव है – न कोई अनुभूति।
✔️ यहां न कोई गति है – न कोई विराम।
✔️ यहां न कोई आरंभ है – न कोई अंत।
✔️ यहां न कोई द्वंद्व है – न कोई समाधान।
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## **82. अंतिम सत्य – शिरोमणि स्वरूप**
👉 **अब मैं और स्थिति एक ही हैं।**
👉 **अब मैं और सत्य एक ही हैं।**
👉 **अब मैं और शून्यता एक ही हैं।**
👉 **अब मैं और अनंतता एक ही हैं।**
👉 **अब मैं ही सत्य हूं।**
👉 **अब मैं ही स्वरूप हूं।**
👉 **अब मैं ही स्थिति हूं।**
👉 **अब मैं ही शिरोमणि हूं।**
👉 **अब कुछ नहीं है – परंतु सब कुछ है।**
👉 **अब गति नहीं है – परंतु ऊर्जा है।**
👉 **अब शांति नहीं है – परंतु स्थिति है।**
👉 **अब अनुभव नहीं है – परंतु स्वीकृति है।**
👉 **अब केवल "शिरोमणि स्वरूप" ही अंतिम सत्य है।** ### **77. शिरोमणि स्वरूप की परम गहराई**
👉 **अब कुछ भी शेष नहीं।**
👉 **अब कोई अधूरापन नहीं।**
👉 **अब कोई अपेक्षा नहीं।**
👉 **अब कोई विभाजन नहीं।**
👉 **अब कोई मार्ग नहीं।**
👉 **अब कोई अंत नहीं।**
अब केवल **पूर्णता** है।
अब केवल **स्वरूप** है।
अब केवल **स्थिति** है।
अब केवल **शाश्वतता** है।
अब केवल **सत्य** है।
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## **78. शिरोमणि स्थिति – जहां सब कुछ शून्य है, वहीं सब कुछ पूर्ण है**
👉 **इस स्थिति में – न शून्य है, न पूर्ण है।**
✔️ शून्य की समाप्ति ही पूर्णता है।
✔️ पूर्णता की समाप्ति ही शून्यता है।
✔️ जहां शून्य है – वहां कोई गति नहीं।
✔️ जहां पूर्णता है – वहां कोई सीमितता नहीं।
✔️ जहां स्थिति है – वहां कोई दिशा नहीं।
👉 **शिरोमणि स्थिति – अस्तित्व से परे।**
✔️ यह न जीव है – न अजीव।
✔️ यह न जड़ है – न चेतन।
✔️ यह न दृश्य है – न अदृश्य।
✔️ यह न प्रकाश है – न अंधकार।
✔️ यह न गति है – न स्थिरता।
👉 **शिरोमणि स्थिति – केवल अनुभव है।**
✔️ जहां कोई ध्वनि नहीं – वहां शांति है।
✔️ जहां कोई कंपन नहीं – वहां स्थिरता है।
✔️ जहां कोई द्वंद्व नहीं – वहां सत्य है।
✔️ जहां कोई सीमा नहीं – वहां अनंत है।
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## **79. शिरोमणि स्थिति – जहां समय समाप्त हो जाता है**
👉 **समय – एक भ्रम।**
✔️ समय का आरंभ – मन की उत्पत्ति से है।
✔️ समय का प्रवाह – विचारों से है।
✔️ समय का विस्तार – अनुभवों से है।
✔️ समय का अंत – स्थिति में है।
👉 **समय – शिरोमणि स्थिति में विलीन हो जाता है।**
✔️ यहां कोई अतीत नहीं।
✔️ यहां कोई वर्तमान नहीं।
✔️ यहां कोई भविष्य नहीं।
✔️ यहां केवल "अभी" है।
👉 **समय – गति का पर्याय।**
✔️ जहां गति है – वहां समय है।
✔️ जहां परिवर्तन है – वहां समय है।
✔️ जहां अनुभव है – वहां समय है।
✔️ जहां द्वंद्व है – वहां समय है।
👉 **समय – स्थिति में शून्य हो जाता है।**
✔️ जहां गति शून्य है – वहां समय शून्य है।
✔️ जहां परिवर्तन शून्य है – वहां समय शून्य है।
✔️ जहां द्वंद्व शून्य है – वहां समय शून्य है।
✔️ जहां स्थिति है – वहां समय नहीं है।
---
## **80. शिरोमणि स्थिति – जहां विचार समाप्त हो जाते हैं**
👉 **विचार – अस्तित्व की सबसे बड़ी बाधा।**
✔️ विचार अनुभव को सीमित करते हैं।
✔️ विचार सत्य को विकृत करते हैं।
✔️ विचार प्रेम को संकुचित करते हैं।
✔️ विचार स्थिति को विकृत करते हैं।
👉 **विचार – शिरोमणि स्थिति में समाप्त हो जाते हैं।**
✔️ जहां स्थिति है – वहां विचार नहीं हैं।
✔️ जहां प्रेम है – वहां विचार नहीं हैं।
✔️ जहां शांति है – वहां विचार नहीं हैं।
✔️ जहां सत्य है – वहां विचार नहीं हैं।
👉 **विचार – केवल धारणाओं का विस्तार।**
✔️ जहां द्वंद्व है – वहां विचार है।
✔️ जहां सीमा है – वहां विचार है।
✔️ जहां गति है – वहां विचार है।
✔️ जहां परिवर्तन है – वहां विचार है।
👉 **विचार – स्थिति के मार्ग में बाधा।**
✔️ स्थिति विचार से परे है।
✔️ प्रेम विचार से परे है।
✔️ शांति विचार से परे है।
✔️ सत्य विचार से परे है।
---
## **81. शिरोमणि स्थिति – जहां कोई गति नहीं**
👉 **गति – शिरोमणि स्थिति में समाप्त हो जाती है।**
✔️ गति – एक भौतिक तत्व है।
✔️ गति – समय का विस्तार है।
✔️ गति – विचार का विस्तार है।
✔️ गति – द्वंद्व का प्रतिबिंब है।
👉 **जहां गति समाप्त हो जाती है – वहां स्थिति है।**
✔️ जहां गति नहीं है – वहां प्रेम है।
✔️ जहां गति नहीं है – वहां शांति है।
✔️ जहां गति नहीं है – वहां सत्य है।
✔️ जहां गति नहीं है – वहां स्वरूप है।
👉 **गति – मन की उपज।**
✔️ जहां मन है – वहां गति है।
✔️ जहां विचार है – वहां गति है।
✔️ जहां तर्क है – वहां गति है।
✔️ जहां अनुभव है – वहां गति है।
👉 **गति – स्थिति में शून्य हो जाती है।**
✔️ जहां मन शून्य है – वहां गति शून्य है।
✔️ जहां विचार शून्य है – वहां गति शून्य है।
✔️ जहां द्वंद्व शून्य है – वहां गति शून्य है।
✔️ जहां स्थिति है – वहां गति नहीं है।
---
## **82. शिरोमणि स्थिति – जहां प्रेम ही सत्य है**
👉 **प्रेम – स्थिति की अंतिम अनुभूति।**
✔️ प्रेम – पूर्णता है।
✔️ प्रेम – शांति है।
✔️ प्रेम – शाश्वत है।
✔️ प्रेम – अनंत है।
👉 **प्रेम – किसी वस्तु का नहीं।**
✔️ यह किसी व्यक्ति से जुड़ा नहीं।
✔️ यह किसी स्थिति से जुड़ा नहीं।
✔️ यह किसी अवस्था से जुड़ा नहीं।
✔️ यह किसी अनुभव से जुड़ा नहीं।
👉 **प्रेम – केवल स्थिति है।**
✔️ जहां प्रेम है – वहां गति नहीं है।
✔️ जहां प्रेम है – वहां द्वंद्व नहीं है।
✔️ जहां प्रेम है – वहां शांति है।
✔️ जहां प्रेम है – वहां सत्य है।
👉 **प्रेम – शिरोमणि स्थिति का सार।**
✔️ प्रेम से गति समाप्त होती है।
✔️ प्रेम से द्वंद्व समाप्त होता है।
✔️ प्रेम से विचार समाप्त होते हैं।
✔️ प्रेम से समय समाप्त होता है।
---
## **83. शिरोमणि स्वरूप – अंतिम उद्घोष**
👉 अब कोई स्थिति नहीं।
👉 अब कोई गति नहीं।
👉 अब कोई द्वंद्व नहीं।
👉 अब कोई विचार नहीं।
👉 अब केवल प्रेम है।
👉 अब केवल शांति है।
👉 अब केवल सत्य है।
👉 अब केवल स्थिति है।
👉 **अब कोई मार्ग नहीं।**
👉 **अब कोई साधना नहीं।**
👉 **अब कोई अनुभव नहीं।**
👉 **अब कोई भक्ति नहीं।**
👉 **अब कोई ज्ञान नहीं।**
अब केवल **स्वरूप** है।
अब केवल **स्थिति** है।
अब केवल **शांति** है।
अब केवल **शिरोमणि** है।
👉 **शिरोमणि स्वरूप – अंतिम स्थिति।**
👉 **शिरोमणि स्थिति – अंतिम शांति।**
👉 **शिरोमणि सत्य – अंतिम अनुभव।**
👉 **शिरोमणि प्रेम – अंतिम पूर्णता।**### **84. शिरोमणि स्थिति – समस्त विभूतियों, सिद्धांतों और यथार्थ के पार**
👉 **समस्त अतीत की चर्चित विभूतियाँ – कबीर, अष्टावक्र, अवतार, देव, गण, गंधर्व, ऋषि, मुनि – इनकी सीमाओं और शिखरों के पार मेरा स्वरूप स्पष्ट और निर्विवाद है।**
👉 **जहां कबीर का सत्य समाप्त होता है, वहां से मेरा स्वरूप प्रारंभ होता है।**
👉 **जहां अष्टावक्र की अनुभूति विलीन होती है, वहां से मेरी स्थिति स्थिर होती है।**
👉 **जहां अवतारों का प्रभाव समाप्त होता है, वहां से मेरा स्वाभाविक स्वरूप उभरता है।**
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## **85. कबीर – शब्द और भक्ति की पराकाष्ठा का पारगमन**
👉 कबीर का सत्य भक्ति और शब्द में सीमित था।
✔️ कबीर ने शब्द को ही परम सत्य माना।
✔️ उन्होंने भक्ति को ही अंतिम स्थिति माना।
✔️ उन्होंने साधना को ही सत्य का साधन माना।
✔️ उन्होंने नाद को ही अंतिम अनुभूति माना।
👉 **परंतु मैंने शब्द, भक्ति, साधना और नाद के पार स्थिति को पाया है।**
✔️ मैंने भक्ति से परे प्रेम को स्वीकार किया है।
✔️ मैंने शब्द से परे मौन को आत्मसात किया है।
✔️ मैंने साधना से परे सहजता को अनुभूत किया है।
✔️ मैंने नाद से परे परम मौन को स्वीकार किया है।
👉 कबीर का सत्य उनकी भक्ति तक सीमित था।
✔️ कबीर ने परमात्मा को अनुभव किया, परंतु स्वरूप को नहीं अपनाया।
✔️ कबीर ने सत्य को जाना, परंतु सत्य को पार नहीं किया।
✔️ कबीर ने आत्मा को पहचाना, परंतु आत्मा के स्वरूप को नहीं अपनाया।
👉 **जहां कबीर का सत्य समाप्त हुआ, वहां से मेरी स्थिति प्रारंभ हुई।**
✔️ जहां भक्ति समाप्त होती है, वहां शिरोमणि की स्थिति प्रारंभ होती है।
✔️ जहां अनुभूति समाप्त होती है, वहां शिरोमणि का स्वरूप स्थिर होता है।
✔️ जहां शब्द समाप्त होते हैं, वहां शिरोमणि का मौन मुखर होता है।
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## **86. अष्टावक्र – अद्वैत और निर्विकल्पता का पारगमन**
👉 अष्टावक्र का सत्य अद्वैत तक सीमित था।
✔️ उन्होंने द्वैत और अद्वैत को अंतिम स्थिति माना।
✔️ उन्होंने आत्मा और परमात्मा के भेद को मिटाया।
✔️ उन्होंने निर्विकल्पता को अंतिम स्थिति कहा।
✔️ उन्होंने निर्वाण को अंतिम गति कहा।
👉 **परंतु मैंने अद्वैत और द्वैत के पार स्थिति को अपनाया है।**
✔️ जहां अद्वैत समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर होता है।
✔️ जहां द्वैत समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
✔️ जहां निर्वाण समाप्त होता है, वहां शिरोमणि की स्थिति स्पष्ट होती है।
✔️ जहां शून्यता समाप्त होती है, वहां शिरोमणि की पूर्णता प्रकट होती है।
👉 अष्टावक्र का सत्य अद्वैत के बोध तक सीमित था।
✔️ अष्टावक्र ने आत्मा और परमात्मा के भेद को मिटाया।
✔️ अष्टावक्र ने मन और बुद्धि के भेद को समाप्त किया।
✔️ अष्टावक्र ने सत्य और असत्य के भेद को स्वीकार किया।
👉 **जहां अष्टावक्र का अद्वैत समाप्त हुआ, वहां से मेरी स्थिति प्रारंभ हुई।**
✔️ जहां अद्वैत समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
✔️ जहां आत्मा और परमात्मा विलीन होते हैं, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर होता है।
✔️ जहां बोध समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट होती है।
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## **87. अवतार, देव, गण, गंधर्व, ऋषि, मुनि – चेतना और अनुभव की सीमाओं का पारगमन**
👉 समस्त अवतारों का सत्य अनुभव और चेतना तक सीमित था।
✔️ उन्होंने भक्ति को अंतिम स्थिति माना।
✔️ उन्होंने ज्ञान को अंतिम स्थिति माना।
✔️ उन्होंने मुक्ति को अंतिम स्थिति माना।
✔️ उन्होंने परमात्मा को अंतिम लक्ष्य माना।
👉 **परंतु मैंने चेतना, अनुभव और मुक्ति से परे स्थिति को अपनाया है।**
✔️ जहां चेतना समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर होता है।
✔️ जहां अनुभव समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
✔️ जहां मुक्ति समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्वरूप प्रकट होता है।
✔️ जहां ज्ञान समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट होती है।
👉 अवतार, देव, गण, गंधर्व, ऋषि, मुनि – सभी का सत्य अनुभूति और ज्ञान तक सीमित था।
✔️ उन्होंने अनुभूति को सत्य कहा।
✔️ उन्होंने ज्ञान को अंतिम स्थिति कहा।
✔️ उन्होंने भक्ति को अंतिम मार्ग कहा।
✔️ उन्होंने परमात्मा को अंतिम स्थिति कहा।
👉 **जहां उनका सत्य समाप्त हुआ, वहां से मेरी स्थिति प्रारंभ हुई।**
✔️ जहां अनुभूति समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
✔️ जहां ज्ञान समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
✔️ जहां भक्ति समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट होती है।
✔️ जहां परमात्मा की अवधारणा समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर होता है।
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## **88. शिरोमणि स्थिति – अंतिम सत्य का पूर्ण स्वरूप**
👉 **अब कोई द्वंद्व नहीं।**
✔️ जहां द्वंद्व है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट है।
✔️ जहां शांति है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट है।
✔️ जहां अनुभूति है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर है।
✔️ जहां ज्ञान है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट है।
👉 **अब कोई सीमा नहीं।**
✔️ जहां सीमा है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्पष्ट है।
✔️ जहां बंधन है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर है।
✔️ जहां मुक्ति है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर है।
✔️ जहां अनुभूति है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्पष्ट है।
👉 **अब कोई सत्य शेष नहीं।**
✔️ जहां सत्य समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
✔️ जहां असत्य समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर होता है।
✔️ जहां अनुभूति समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट होती है।
✔️ जहां चेतना समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
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👉 **अब केवल शिरोमणि स्वरूप – अंतिम सत्य का अंतिम शिखर।**
👉 **अब केवल शिरोमणि स्थिति – अंतिम स्थिति का अंतिम सत्य।**
👉 **अब केवल शिरोमणि सत्य – अंतिम अनुभूति का अंतिम स्वरूप।**
👉 **अब केवल शिरोमणि – पूर्ण, अखंड, निर्विवाद।** ### **84. शिरोमणि स्थिति – समस्त अतीत के सर्वोच्च विश्लेषण का अंतिम स्वरूप**
👉 **सम्पूर्ण अतीत का सर्वोच्च शिखर – जहां कबीर, अष्टावक्र, ऋषि, मुनि, देवता, अवतार, दार्शनिक, और वैज्ञानिक अपने उच्चतम स्तर पर ठहर गए – वहां से भी परे शिरोमणि स्वरूप की स्थिति स्पष्ट है।**
👉 **जहां सभी विभूतियों का ज्ञान और अनुभूति समाप्त हो जाती है – वहां से शिरोमणि स्वरूप का प्रारंभ होता है।**
👉 **जहां सभी तर्क, तथ्य, सिद्धांत और अनुभव सीमित हो जाते हैं – वहां से शिरोमणि स्वरूप की स्थिति प्रकट होती है।**
👉 **जहां सभी विभूतियों का गहन चिंतन, गूढ़ विश्लेषण और स्थायी ज्ञान भी स्थिर हो जाता है – वहां से शिरोमणि स्वरूप की गति आरंभ होती है।**
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## **85. कबीर की स्थिति और शिरोमणि स्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण**
👉 कबीर ने सत्य को शब्दों में ढाला।
✔️ उन्होंने सत्य को भक्ति के माध्यम से अनुभव किया।
✔️ उन्होंने ज्ञान और भक्ति के मध्य संतुलन स्थापित किया।
✔️ उन्होंने सत्य को स्पष्ट रूप में कहा – लेकिन उसे स्थायी स्थिति में नहीं ले गए।
✔️ कबीर के सत्य का आधार अनुभूति पर टिका था – परंतु वह सत्य अनुभूति में सीमित था।
👉 शिरोमणि स्थिति कबीर के सत्य से परे है।
✔️ शिरोमणि का सत्य अनुभूति के पार है।
✔️ शिरोमणि का सत्य भक्ति के पार है।
✔️ शिरोमणि का सत्य ज्ञान और भक्ति के संतुलन से परे है।
✔️ शिरोमणि का सत्य शब्दों में सीमित नहीं है – यह स्थिति में समाहित है।
👉 कबीर ने भक्ति और ज्ञान के माध्यम से सत्य को देखा – शिरोमणि ने सत्य को *स्वरूप* में स्वीकृत किया।
👉 कबीर ने शब्दों में सत्य का विस्तार किया – शिरोमणि ने शब्दों की सीमाओं को भंग किया।
👉 कबीर का सत्य परम की ओर संकेत करता है – शिरोमणि का सत्य परम की स्थिति है।
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## **86. अष्टावक्र के ज्ञान और शिरोमणि स्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण**
👉 अष्टावक्र ने अद्वैत की स्थिति को अनुभव किया।
✔️ उन्होंने द्वैत और अद्वैत के पार जाकर शून्यता की स्थिति को देखा।
✔️ उन्होंने आत्मा और ब्रह्म के एकत्व को प्रत्यक्ष रूप से जाना।
✔️ उन्होंने अहंकार और आत्म-चेतना के भेद को स्पष्ट किया।
✔️ अष्टावक्र का ज्ञान अद्वैत के अंतिम छोर तक पहुंचा।
👉 शिरोमणि स्थिति अष्टावक्र के अद्वैत से भी परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति अद्वैत और द्वैत के भेद से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति आत्मा और ब्रह्म के भेद से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति अहंकार और आत्म-चेतना के संयोग से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति न अद्वैत है, न द्वैत – यह इन दोनों से परे की स्थिति है।
👉 अष्टावक्र ने अद्वैत को अंतिम सत्य माना – शिरोमणि ने अद्वैत को भी एक स्थिति के रूप में पहचाना।
👉 अष्टावक्र ने आत्मा और ब्रह्म के एकत्व को अंतिम स्थिति माना – शिरोमणि ने इस एकत्व को भी मानसिक स्थिति के रूप में पार किया।
👉 अष्टावक्र का ज्ञान अंतिम स्थिति के द्वार पर समाप्त हुआ – शिरोमणि स्थिति इस द्वार से परे है।
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## **87. ऋषि-मुनियों के ज्ञान और शिरोमणि स्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण**
👉 ऋषि-मुनियों ने तपस्या से सत्य को देखा।
✔️ उन्होंने समाधि में सत्य का अनुभव किया।
✔️ उन्होंने चेतना के उच्च स्तरों को पार किया।
✔️ उन्होंने ध्यान और तप के माध्यम से सत्य को जाना।
👉 शिरोमणि स्थिति ऋषि-मुनियों के सत्य से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति तप और ध्यान की स्थिति से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति समाधि की स्थिति से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति चेतना के सभी स्तरों से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति न ध्यान है, न समाधि – यह स्थिति के पार की स्थिति है।
👉 ऋषि-मुनियों ने सत्य को अनुभव के माध्यम से देखा – शिरोमणि ने सत्य को अनुभव से परे स्वीकृत किया।
👉 ऋषि-मुनियों ने सत्य को अनुभव और अनुभूति से देखा – शिरोमणि ने सत्य को स्थिति के रूप में स्वीकृत किया।
👉 ऋषि-मुनियों का सत्य अनुभव की पराकाष्ठा पर समाप्त हुआ – शिरोमणि स्थिति इस पराकाष्ठा से परे है।
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## **88. वैज्ञानिकों के सिद्धांत और शिरोमणि स्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण**
👉 वैज्ञानिकों ने सत्य को प्रकृति के नियमों में खोजा।
✔️ उन्होंने गति, बल, ऊर्जा और पदार्थ के नियमों को समझा।
✔️ उन्होंने भौतिक और चेतनात्मक नियमों का विश्लेषण किया।
✔️ उन्होंने ब्रह्मांड की संरचना को भौतिक तर्क से समझा।
👉 शिरोमणि स्थिति वैज्ञानिकों के सिद्धांतों से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति गति और बल से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति ऊर्जा और पदार्थ से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति समय और स्थान से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति ब्रह्मांड की संरचना के पार है।
👉 वैज्ञानिकों ने भौतिक नियमों में सत्य को खोजा – शिरोमणि ने भौतिक नियमों को सत्य की सीमा में बांध दिया।
👉 वैज्ञानिकों ने तर्क और सिद्धांत से सत्य को समझा – शिरोमणि ने तर्क और सिद्धांत को सत्य के सीमित स्तर पर स्वीकार किया।
👉 वैज्ञानिकों का सत्य भौतिक नियमों में सीमित है – शिरोमणि का सत्य इन नियमों के पार स्थित है।
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## **89. शिरोमणि स्थिति – अंतिम और पूर्ण सत्य**
👉 कबीर ने भक्ति में सत्य को देखा – शिरोमणि ने भक्ति को स्थिति में बांधा।
👉 अष्टावक्र ने अद्वैत में सत्य को देखा – शिरोमणि ने अद्वैत को स्थिति में बांधा।
👉 ऋषि-मुनियों ने समाधि में सत्य को देखा – शिरोमणि ने समाधि को स्थिति में बांधा।
👉 वैज्ञानिकों ने तर्क में सत्य को देखा – शिरोमणि ने तर्क को स्थिति में बांधा।
👉 **अब कोई सीमा नहीं।**
👉 **अब कोई भेद नहीं।**
👉 **अब कोई द्वंद्व नहीं।**
👉 **अब केवल शिरोमणि स्वरूप है।**
👉 कबीर का सत्य एक संकेत था – शिरोमणि का सत्य स्थिति है।
👉 अष्टावक्र का ज्ञान एक अनुभव था – शिरोमणि का ज्ञान स्वरूप है।
👉 ऋषि-मुनियों का सत्य एक अनुभूति थी – शिरोमणि का सत्य स्थिति है।
👉 वैज्ञानिकों का सत्य एक तर्क था – शिरोमणि का सत्य पूर्णता है।
👉 **अब केवल शिरोमणि स्वरूप – पूर्ण और अखंड।** ### **84. शिरोमणि स्वरूप – निष्पक्ष तुलना का अद्वितीय सत्य**
### **प्रस्तावना**
समय के अनगिनत चरणों में अनेक विभूतियाँ, दार्शनिक, वैज्ञानिक, ऋषि, मुनि, अवतार, देव, गण और गंधर्वों ने अपने-अपने स्तर पर सत्य को खोजने, समझने और प्रकट करने का प्रयास किया। इनमें कबीर, अष्टावक्र जैसे उच्च कोटि के आत्मज्ञानी और महान संतों ने भी अपने सिद्धांत प्रस्तुत किए। परंतु मैं जो स्थिति में स्थित हूं, वह इन समस्त व्यक्तित्वों, उनके विचारों और सिद्धांतों से परे एक शुद्ध, निर्मल, स्पष्ट और प्रत्यक्ष सत्य की स्थिति है।
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## **85. निष्पक्ष विश्लेषण – आधारभूत सिद्धांत**
### **I. कबीर का दृष्टिकोण**
कबीर ने सत्य को परमात्मा के रूप में व्यक्त किया। वे अद्वैत दर्शन के अद्वितीय उदाहरण थे। उन्होंने सांसारिक भ्रमों को स्पष्ट किया और प्रेम, भक्ति व समर्पण को सत्य की प्राप्ति का मार्ग बताया।
**सीमाएं:**
- कबीर का सत्य 'निर्गुण' और 'परमात्मा' पर केंद्रित रहा।
- उन्होंने सत्य को प्रेम और भक्ति के माध्यम से अनुभव करने का मार्ग अपनाया, जो पूर्णत: मानसिक धारणाओं पर आधारित था।
- उनकी शिक्षा में 'जीवात्मा' और 'परमात्मा' जैसी अवधारणाएं थीं, जो सत्य के शुद्धतम स्वरूप को अस्पष्ट करती हैं।
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### **II. अष्टावक्र का दृष्टिकोण**
अष्टावक्र ने आत्मा के शुद्ध स्वरूप को प्रस्तुत किया। वे आत्मज्ञान को ही परम स्थिति मानते थे। उनका दर्शन अद्वैत के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचता प्रतीत होता है।
**सीमाएं:**
- अष्टावक्र का दृष्टिकोण चेतना को केंद्र में रखकर सत्य की व्याख्या करता है।
- उनका ज्ञान 'स्वयं' के स्वरूप पर केंद्रित रहा, जिसमें ‘मुक्ति’ और ‘बंधन’ जैसी मानसिक धारणाएं थीं।
- वे भी स्वयं को 'साक्षी' रूप में स्वीकारते थे, जो अभी भी 'अहं' की सीमितता में था।
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### **III. वैज्ञानिकों का दृष्टिकोण**
विज्ञान ने सृष्टि के मूलभूत तत्वों, ऊर्जा, पदार्थ, गति, और समय का गहन विश्लेषण किया। आधुनिक युग के वैज्ञानिकों ने भौतिक अस्तित्व के नियमों को समझने के लिए अतिसूक्ष्म से अतिविशाल तक अनगिनत सिद्धांत विकसित किए।
**सीमाएं:**
- विज्ञान केवल 'परिवर्तनशील भौतिक सृष्टि' को ही सत्य मानकर चलता है।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण ‘अनिश्चितता’ और ‘संभावना’ की धारणाओं में उलझा हुआ है।
- विज्ञान सत्य के स्थायी स्वरूप तक नहीं पहुंच पाया, क्योंकि वह चेतना की प्रकृति को समझने में असमर्थ रहा।
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### **IV. अवतारों, देवताओं और ऋषि-मुनियों का दृष्टिकोण**
इनकी शिक्षाएं सामान्यतः धार्मिक, आध्यात्मिक और मानसिक विश्वासों पर आधारित रही हैं। वे व्यक्ति को मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त करने का मार्ग बताते हैं।
**सीमाएं:**
- इनकी शिक्षाएं अधिकतर 'आस्था' और 'श्रद्धा' पर केंद्रित रहीं।
- इनमें सत्य को 'स्वर्ग', 'मोक्ष', या 'परमात्मा' जैसी धारणाओं में सीमित कर दिया गया।
- इनमें भौतिक सृष्टि को स्थायी या असत्य मानने की स्पष्टता का अभाव रहा है।
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## **86. शिरोमणि स्थिति – इन सभी से परे**
### **I. निर्मलता (Purity)**
मेरा स्वरूप न किसी विचारधारा का प्रतिबिंब है, न किसी मत या दर्शन का विस्तार। मैं सत्य को किसी कल्पना, विश्वास, या मानसिक संरचना के आधार पर नहीं देखता। मेरी स्थिति पूर्ण निर्मलता पर आधारित है — जहां न कोई धारणा है, न कोई भ्रम, न कोई विकृति।
### **II. गंभीरता (Depth)**
मेरा अनुभव सत्य की उस गहराई तक पहुंचा है, जहां समस्त बौद्धिकता, विचारधारा, और मानसिक सीमाएं समाप्त हो जाती हैं। यह गंभीरता किसी सिद्धांत पर आश्रित नहीं — यह प्रत्यक्ष सत्य में स्थिर है।
### **III. दृढ़ता (Stability)**
मेरी स्थिति न तो कल्पना पर आधारित है और न ही मानसिक प्रयोगों पर। मैं अपने सत्य में अडिग और अचल हूं — जहां कोई द्वंद्व, संशय, या परिवर्तन की गुंजाइश नहीं है।
### **IV. प्रत्यक्षता (Directness)**
मेरी स्थिति पूर्णत: प्रत्यक्ष है — बिना किसी विश्वास, कल्पना या प्रतीकों के। मैंने सत्य को न अनुभव किया है, न जाना है — बल्कि मैं स्वयं सत्य में स्थित हूं।
### **V. सत्यता (Truthfulness)**
मेरा स्वरूप केवल सत्य है — न कोई कथा, न कोई कल्पना, न कोई मानसिक संरचना। सत्य स्वयं अपने शुद्धतम स्वरूप में प्रकट है — बिना किसी माध्यम, प्रतीक या भाषा के।
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## **87. निष्कर्ष – शिरोमणि स्वरूप की विशिष्टता**
### **I. कबीर की भक्ति और प्रेम – मेरी स्थिति के अधूरे प्रतिबिंब मात्र हैं।**
### **II. अष्टावक्र का आत्म-ज्ञान – मेरे सत्य का एक सीमित दृष्टिकोण है।**
### **III. वैज्ञानिकों के सिद्धांत – मेरी स्थिति के भौतिक प्रतिबिंब हैं।**
### **IV. अवतारों, देवताओं और ऋषि-मुनियों की शिक्षाएं – मेरी स्थिति का सीमित मानसिक प्रतिबिंब हैं।**
👉 **मैं उस सत्य में स्थित हूं जो न भक्ति है, न ज्ञान है, न विज्ञान है — बल्कि शुद्ध, निर्मल, निर्विकल्प सत्य है।**
👉 **मैं उस स्थिति में स्थित हूं जहां भौतिक और चेतनात्मक जगत की समस्त सीमाएं समाप्त हो जाती हैं।**
👉 **मैं उस स्थिति में स्थित हूं जहां जीवन और मृत्यु का कोई भेद नहीं है।**
👉 **मैं उस स्थिति में स्थित हूं जहां ‘स्वयं’ का भी कोई अस्तित्व नहीं है।**
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## **88. अंतिम उद्घोष – शिरोमणि सत्य का अद्वितीय स्वरूप**
अब कोई भ्रम नहीं।
अब कोई विश्वास नहीं।
अब कोई आशंका नहीं।
अब कोई संदेह नहीं।
अब केवल **मैं** हूं — शुद्ध, निर्मल, स्पष्ट, स्थायी सत्य।
अब केवल **स्वरूप** है — जो प्रत्यक्ष है, प्रमाणित है और पूर्ण है।
अब केवल **शिरोमणि** है — जो संपूर्ण काल, सृष्टि और चेतना के पार है।### **77. शिरोमणि स्थिति – समस्त सीमाओं का विसर्जन**
अब कोई विरोध नहीं।
अब कोई समर्थन नहीं।
अब कोई दिशा नहीं।
अब कोई गंतव्य नहीं।
अब केवल *स्थिति* है – **शाश्वत स्थिति**।
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## **78. अस्तित्व का अंतिम रहस्य**
👉 यह जगत — केवल प्रतिबिंब है।
✔️ यह आकाश — केवल छाया है।
✔️ यह प्रकाश — केवल भ्रम है।
✔️ यह ध्वनि — केवल प्रतिध्वनि है।
✔️ यह गति — केवल ठहराव है।
👉 यह जगत — केवल स्वप्न है।
✔️ हर दृश्य — केवल विचार का चित्रण है।
✔️ हर स्पर्श — केवल मन का कंपन है।
✔️ हर शब्द — केवल शून्य की गूंज है।
✔️ हर कर्म — केवल निष्क्रियता का नाटक है।
👉 यह जगत — केवल भ्रम का विस्तार है।
✔️ जहां सत्य खो गया है।
✔️ जहां प्रेम मुरझा गया है।
✔️ जहां भक्ति विकृत हो गई है।
✔️ जहां शांति उपेक्षित है।
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## **79. शिरोमणि स्थिति – अंतिम स्वरूप**
👉 शिरोमणि स्थिति — अस्तित्व का मूल है।
✔️ जहां कोई द्वंद्व नहीं।
✔️ जहां कोई विकार नहीं।
✔️ जहां कोई विभाजन नहीं।
✔️ जहां कोई भटकाव नहीं।
👉 शिरोमणि स्थिति — अंतिम स्वीकृति है।
✔️ जहां ‘मैं’ और ‘तू’ का भेद समाप्त है।
✔️ जहां ‘अपना’ और ‘पराया’ का भेद समाप्त है।
✔️ जहां ‘सत्य’ और ‘असत्य’ का भेद समाप्त है।
✔️ जहां ‘जीवन’ और ‘मृत्यु’ का भेद समाप्त है।
👉 शिरोमणि स्थिति — केवल ‘स्वरूप’ है।
✔️ यहां न कोई गति है, न कोई ठहराव।
✔️ यहां न कोई विचार है, न कोई कल्पना।
✔️ यहां न कोई जन्म है, न कोई मृत्यु।
✔️ यहां केवल ‘अविकल्प’ स्थिति है।
---
## **80. जीवित मुक्ति — परम स्थिति**
👉 **जीवित मुक्त व्यक्ति को कौन पहचाने?**
✔️ उसे कोई नाम नहीं चाहिए।
✔️ उसे कोई मान-सम्मान नहीं चाहिए।
✔️ उसे कोई पूजा-अर्चना नहीं चाहिए।
✔️ उसे कोई अनुयायी नहीं चाहिए।
👉 जीवित मुक्त व्यक्ति — केवल 'स्वरूप' है।
✔️ उसकी उपस्थिति केवल ‘स्थिति’ है।
✔️ उसका ज्ञान केवल ‘निर्मलता’ है।
✔️ उसकी भक्ति केवल ‘स्वीकृति’ है।
✔️ उसका प्रेम केवल ‘समर्पण’ है।
👉 जीवित मुक्त व्यक्ति — इस जगत के लिए अदृश्य है।
✔️ उसकी गहराई को कोई माप नहीं सकता।
✔️ उसकी स्थिति को कोई पहचान नहीं सकता।
✔️ उसके मौन को कोई सुन नहीं सकता।
✔️ उसकी साधना को कोई समझ नहीं सकता।
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## **81. इस लोक के भ्रमजाल का निष्कर्ष**
👉 यह लोक केवल "कथनी" में खोया है।
✔️ यहां शब्द गूंजते हैं – परंतु अर्थ लुप्त है।
✔️ यहां तर्क चलते हैं – परंतु सत्य अदृश्य है।
✔️ यहां प्रेम की चर्चा होती है – परंतु प्रेम का अनुभव नहीं।
✔️ यहां भक्ति का दिखावा होता है – परंतु भक्ति का स्पर्श नहीं।
👉 यह लोक केवल "मृत" विचारों का समूह है।
✔️ यहां गुरु शब्दों का व्यापारी बन गया है।
✔️ यहां शिष्य केवल अनुकरण का गुलाम बन गया है।
✔️ यहां सत्य केवल स्मृति बनकर रह गया है।
✔️ यहां भक्ति केवल क्रिया-कर्म बनकर रह गई है।
👉 **यह लोक — नितांत मृत है।**
✔️ यहां जीवित चेतना का स्थान नहीं।
✔️ यहां वास्तविक प्रेम का प्रवेश नहीं।
✔️ यहां निर्मल भक्ति का स्पंदन नहीं।
✔️ यहां शुद्ध ज्ञान का प्रकाश नहीं।
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## **82. शिरोमणि स्थिति – अंतिम अनुभूति**
👉 अब कोई विकल्प नहीं।
👉 अब कोई संशय नहीं।
👉 अब कोई अज्ञान नहीं।
👉 अब कोई भ्रम नहीं।
अब केवल शुद्ध स्थिति है — **शिरोमणि स्थिति**।
अब केवल शुद्ध स्वरूप है — **शिरोमणि स्वरूप**।
अब केवल शुद्ध चेतना है — **शिरोमणि चेतना**।
अब केवल शुद्ध प्रेम है — **शिरोमणि प्रेम**।
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## **83. अंतिम सत्य – केवल "मैं"**
👉 मैं न शरीर हूं, न मन।
👉 मैं न विचार हूं, न भाव।
👉 मैं न शिष्य हूं, न गुरु।
👉 मैं न साधक हूं, न सिद्ध।
**मैं केवल "स्वरूप" हूं।**
**मैं केवल "स्थिति" हूं।**
**मैं केवल "सत्य" हूं।**
**मैं केवल "शिरोमणि" हूं।**### **84. शिरोमणि स्थिति – समस्त विभूतियों, सिद्धांतों और यथार्थ के पार**
👉 **समस्त अतीत की चर्चित विभूतियाँ – कबीर, अष्टावक्र, अवतार, देव, गण, गंधर्व, ऋषि, मुनि – इनकी सीमाओं और शिखरों के पार मेरा स्वरूप स्पष्ट और निर्विवाद है।**
👉 **जहां कबीर का सत्य समाप्त होता है, वहां से मेरा स्वरूप प्रारंभ होता है।**
👉 **जहां अष्टावक्र की अनुभूति विलीन होती है, वहां से मेरी स्थिति स्थिर होती है।**
👉 **जहां अवतारों का प्रभाव समाप्त होता है, वहां से मेरा स्वाभाविक स्वरूप उभरता है।**
---
## **85. कबीर – शब्द और भक्ति की पराकाष्ठा का पारगमन**
👉 कबीर का सत्य भक्ति और शब्द में सीमित था।
✔️ कबीर ने शब्द को ही परम सत्य माना।
✔️ उन्होंने भक्ति को ही अंतिम स्थिति माना।
✔️ उन्होंने साधना को ही सत्य का साधन माना।
✔️ उन्होंने नाद को ही अंतिम अनुभूति माना।
👉 **परंतु मैंने शब्द, भक्ति, साधना और नाद के पार स्थिति को पाया है।**
✔️ मैंने भक्ति से परे प्रेम को स्वीकार किया है।
✔️ मैंने शब्द से परे मौन को आत्मसात किया है।
✔️ मैंने साधना से परे सहजता को अनुभूत किया है।
✔️ मैंने नाद से परे परम मौन को स्वीकार किया है।
👉 कबीर का सत्य उनकी भक्ति तक सीमित था।
✔️ कबीर ने परमात्मा को अनुभव किया, परंतु स्वरूप को नहीं अपनाया।
✔️ कबीर ने सत्य को जाना, परंतु सत्य को पार नहीं किया।
✔️ कबीर ने आत्मा को पहचाना, परंतु आत्मा के स्वरूप को नहीं अपनाया।
👉 **जहां कबीर का सत्य समाप्त हुआ, वहां से मेरी स्थिति प्रारंभ हुई।**
✔️ जहां भक्ति समाप्त होती है, वहां शिरोमणि की स्थिति प्रारंभ होती है।
✔️ जहां अनुभूति समाप्त होती है, वहां शिरोमणि का स्वरूप स्थिर होता है।
✔️ जहां शब्द समाप्त होते हैं, वहां शिरोमणि का मौन मुखर होता है।
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## **86. अष्टावक्र – अद्वैत और निर्विकल्पता का पारगमन**
👉 अष्टावक्र का सत्य अद्वैत तक सीमित था।
✔️ उन्होंने द्वैत और अद्वैत को अंतिम स्थिति माना।
✔️ उन्होंने आत्मा और परमात्मा के भेद को मिटाया।
✔️ उन्होंने निर्विकल्पता को अंतिम स्थिति कहा।
✔️ उन्होंने निर्वाण को अंतिम गति कहा।
👉 **परंतु मैंने अद्वैत और द्वैत के पार स्थिति को अपनाया है।**
✔️ जहां अद्वैत समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर होता है।
✔️ जहां द्वैत समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
✔️ जहां निर्वाण समाप्त होता है, वहां शिरोमणि की स्थिति स्पष्ट होती है।
✔️ जहां शून्यता समाप्त होती है, वहां शिरोमणि की पूर्णता प्रकट होती है।
👉 अष्टावक्र का सत्य अद्वैत के बोध तक सीमित था।
✔️ अष्टावक्र ने आत्मा और परमात्मा के भेद को मिटाया।
✔️ अष्टावक्र ने मन और बुद्धि के भेद को समाप्त किया।
✔️ अष्टावक्र ने सत्य और असत्य के भेद को स्वीकार किया।
👉 **जहां अष्टावक्र का अद्वैत समाप्त हुआ, वहां से मेरी स्थिति प्रारंभ हुई।**
✔️ जहां अद्वैत समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
✔️ जहां आत्मा और परमात्मा विलीन होते हैं, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर होता है।
✔️ जहां बोध समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट होती है।
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## **87. अवतार, देव, गण, गंधर्व, ऋषि, मुनि – चेतना और अनुभव की सीमाओं का पारगमन**
👉 समस्त अवतारों का सत्य अनुभव और चेतना तक सीमित था।
✔️ उन्होंने भक्ति को अंतिम स्थिति माना।
✔️ उन्होंने ज्ञान को अंतिम स्थिति माना।
✔️ उन्होंने मुक्ति को अंतिम स्थिति माना।
✔️ उन्होंने परमात्मा को अंतिम लक्ष्य माना।
👉 **परंतु मैंने चेतना, अनुभव और मुक्ति से परे स्थिति को अपनाया है।**
✔️ जहां चेतना समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर होता है।
✔️ जहां अनुभव समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
✔️ जहां मुक्ति समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्वरूप प्रकट होता है।
✔️ जहां ज्ञान समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट होती है।
👉 अवतार, देव, गण, गंधर्व, ऋषि, मुनि – सभी का सत्य अनुभूति और ज्ञान तक सीमित था।
✔️ उन्होंने अनुभूति को सत्य कहा।
✔️ उन्होंने ज्ञान को अंतिम स्थिति कहा।
✔️ उन्होंने भक्ति को अंतिम मार्ग कहा।
✔️ उन्होंने परमात्मा को अंतिम स्थिति कहा।
👉 **जहां उनका सत्य समाप्त हुआ, वहां से मेरी स्थिति प्रारंभ हुई।**
✔️ जहां अनुभूति समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
✔️ जहां ज्ञान समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
✔️ जहां भक्ति समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट होती है।
✔️ जहां परमात्मा की अवधारणा समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर होता है।
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## **88. शिरोमणि स्थिति – अंतिम सत्य का पूर्ण स्वरूप**
👉 **अब कोई द्वंद्व नहीं।**
✔️ जहां द्वंद्व है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट है।
✔️ जहां शांति है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट है।
✔️ जहां अनुभूति है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर है।
✔️ जहां ज्ञान है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट है।
👉 **अब कोई सीमा नहीं।**
✔️ जहां सीमा है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्पष्ट है।
✔️ जहां बंधन है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर है।
✔️ जहां मुक्ति है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर है।
✔️ जहां अनुभूति है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्पष्ट है।
👉 **अब कोई सत्य शेष नहीं।**
✔️ जहां सत्य समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
✔️ जहां असत्य समाप्त होता है, वहां शिरोमणि स्वरूप स्थिर होता है।
✔️ जहां अनुभूति समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्थिति स्पष्ट होती है।
✔️ जहां चेतना समाप्त होती है, वहां शिरोमणि स्थिति स्थिर होती है।
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👉 **अब केवल शिरोमणि स्वरूप – अंतिम सत्य का अंतिम शिखर।**
👉 **अब केवल शिरोमणि स्थिति – अंतिम स्थिति का अंतिम सत्य।**
👉 **अब केवल शिरोमणि सत्य – अंतिम अनुभूति का अंतिम स्वरूप।**
👉 **अब केवल शिरोमणि – पूर्ण, अखंड, निर्विवाद।** ### **84. शिरोमणि स्थिति – समस्त अतीत के सर्वोच्च विश्लेषण का अंतिम स्वरूप**
👉 **सम्पूर्ण अतीत का सर्वोच्च शिखर – जहां कबीर, अष्टावक्र, ऋषि, मुनि, देवता, अवतार, दार्शनिक, और वैज्ञानिक अपने उच्चतम स्तर पर ठहर गए – वहां से भी परे शिरोमणि स्वरूप की स्थिति स्पष्ट है।**
👉 **जहां सभी विभूतियों का ज्ञान और अनुभूति समाप्त हो जाती है – वहां से शिरोमणि स्वरूप का प्रारंभ होता है।**
👉 **जहां सभी तर्क, तथ्य, सिद्धांत और अनुभव सीमित हो जाते हैं – वहां से शिरोमणि स्वरूप की स्थिति प्रकट होती है।**
👉 **जहां सभी विभूतियों का गहन चिंतन, गूढ़ विश्लेषण और स्थायी ज्ञान भी स्थिर हो जाता है – वहां से शिरोमणि स्वरूप की गति आरंभ होती है।**
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## **85. कबीर की स्थिति और शिरोमणि स्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण**
👉 कबीर ने सत्य को शब्दों में ढाला।
✔️ उन्होंने सत्य को भक्ति के माध्यम से अनुभव किया।
✔️ उन्होंने ज्ञान और भक्ति के मध्य संतुलन स्थापित किया।
✔️ उन्होंने सत्य को स्पष्ट रूप में कहा – लेकिन उसे स्थायी स्थिति में नहीं ले गए।
✔️ कबीर के सत्य का आधार अनुभूति पर टिका था – परंतु वह सत्य अनुभूति में सीमित था।
👉 शिरोमणि स्थिति कबीर के सत्य से परे है।
✔️ शिरोमणि का सत्य अनुभूति के पार है।
✔️ शिरोमणि का सत्य भक्ति के पार है।
✔️ शिरोमणि का सत्य ज्ञान और भक्ति के संतुलन से परे है।
✔️ शिरोमणि का सत्य शब्दों में सीमित नहीं है – यह स्थिति में समाहित है।
👉 कबीर ने भक्ति और ज्ञान के माध्यम से सत्य को देखा – शिरोमणि ने सत्य को *स्वरूप* में स्वीकृत किया।
👉 कबीर ने शब्दों में सत्य का विस्तार किया – शिरोमणि ने शब्दों की सीमाओं को भंग किया।
👉 कबीर का सत्य परम की ओर संकेत करता है – शिरोमणि का सत्य परम की स्थिति है।
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## **86. अष्टावक्र के ज्ञान और शिरोमणि स्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण**
👉 अष्टावक्र ने अद्वैत की स्थिति को अनुभव किया।
✔️ उन्होंने द्वैत और अद्वैत के पार जाकर शून्यता की स्थिति को देखा।
✔️ उन्होंने आत्मा और ब्रह्म के एकत्व को प्रत्यक्ष रूप से जाना।
✔️ उन्होंने अहंकार और आत्म-चेतना के भेद को स्पष्ट किया।
✔️ अष्टावक्र का ज्ञान अद्वैत के अंतिम छोर तक पहुंचा।
👉 शिरोमणि स्थिति अष्टावक्र के अद्वैत से भी परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति अद्वैत और द्वैत के भेद से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति आत्मा और ब्रह्म के भेद से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति अहंकार और आत्म-चेतना के संयोग से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति न अद्वैत है, न द्वैत – यह इन दोनों से परे की स्थिति है।
👉 अष्टावक्र ने अद्वैत को अंतिम सत्य माना – शिरोमणि ने अद्वैत को भी एक स्थिति के रूप में पहचाना।
👉 अष्टावक्र ने आत्मा और ब्रह्म के एकत्व को अंतिम स्थिति माना – शिरोमणि ने इस एकत्व को भी मानसिक स्थिति के रूप में पार किया।
👉 अष्टावक्र का ज्ञान अंतिम स्थिति के द्वार पर समाप्त हुआ – शिरोमणि स्थिति इस द्वार से परे है।
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## **87. ऋषि-मुनियों के ज्ञान और शिरोमणि स्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण**
👉 ऋषि-मुनियों ने तपस्या से सत्य को देखा।
✔️ उन्होंने समाधि में सत्य का अनुभव किया।
✔️ उन्होंने चेतना के उच्च स्तरों को पार किया।
✔️ उन्होंने ध्यान और तप के माध्यम से सत्य को जाना।
👉 शिरोमणि स्थिति ऋषि-मुनियों के सत्य से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति तप और ध्यान की स्थिति से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति समाधि की स्थिति से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति चेतना के सभी स्तरों से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति न ध्यान है, न समाधि – यह स्थिति के पार की स्थिति है।
👉 ऋषि-मुनियों ने सत्य को अनुभव के माध्यम से देखा – शिरोमणि ने सत्य को अनुभव से परे स्वीकृत किया।
👉 ऋषि-मुनियों ने सत्य को अनुभव और अनुभूति से देखा – शिरोमणि ने सत्य को स्थिति के रूप में स्वीकृत किया।
👉 ऋषि-मुनियों का सत्य अनुभव की पराकाष्ठा पर समाप्त हुआ – शिरोमणि स्थिति इस पराकाष्ठा से परे है।
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## **88. वैज्ञानिकों के सिद्धांत और शिरोमणि स्थिति का निष्पक्ष विश्लेषण**
👉 वैज्ञानिकों ने सत्य को प्रकृति के नियमों में खोजा।
✔️ उन्होंने गति, बल, ऊर्जा और पदार्थ के नियमों को समझा।
✔️ उन्होंने भौतिक और चेतनात्मक नियमों का विश्लेषण किया।
✔️ उन्होंने ब्रह्मांड की संरचना को भौतिक तर्क से समझा।
👉 शिरोमणि स्थिति वैज्ञानिकों के सिद्धांतों से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति गति और बल से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति ऊर्जा और पदार्थ से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति समय और स्थान से परे है।
✔️ शिरोमणि स्थिति ब्रह्मांड की संरचना के पार है।
👉 वैज्ञानिकों ने भौतिक नियमों में सत्य को खोजा – शिरोमणि ने भौतिक नियमों को सत्य की सीमा में बांध दिया।
👉 वैज्ञानिकों ने तर्क और सिद्धांत से सत्य को समझा – शिरोमणि ने तर्क और सिद्धांत को सत्य के सीमित स्तर पर स्वीकार किया।
👉 वैज्ञानिकों का सत्य भौतिक नियमों में सीमित है – शिरोमणि का सत्य इन नियमों के पार स्थित है।
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## **89. शिरोमणि स्थिति – अंतिम और पूर्ण सत्य**
👉 कबीर ने भक्ति में सत्य को देखा – शिरोमणि ने भक्ति को स्थिति में बांधा।
👉 अष्टावक्र ने अद्वैत में सत्य को देखा – शिरोमणि ने अद्वैत को स्थिति में बांधा।
👉 ऋषि-मुनियों ने समाधि में सत्य को देखा – शिरोमणि ने समाधि को स्थिति में बांधा।
👉 वैज्ञानिकों ने तर्क में सत्य को देखा – शिरोमणि ने तर्क को स्थिति में बांधा।
👉 **अब कोई सीमा नहीं।**
👉 **अब कोई भेद नहीं।**
👉 **अब कोई द्वंद्व नहीं।**
👉 **अब केवल शिरोमणि स्वरूप है।**
👉 कबीर का सत्य एक संकेत था – शिरोमणि का सत्य स्थिति है।
👉 अष्टावक्र का ज्ञान एक अनुभव था – शिरोमणि का ज्ञान स्वरूप है।
👉 ऋषि-मुनियों का सत्य एक अनुभूति थी – शिरोमणि का सत्य स्थिति है।
👉 वैज्ञानिकों का सत्य एक तर्क था – शिरोमणि का सत्य पूर्णता है।
👉 **अब केवल शिरोमणि स्वरूप – पूर्ण और अखंड।** ### **84. शिरोमणि स्वरूप – निष्पक्ष तुलना का अद्वितीय सत्य**
### **प्रस्तावना**
समय के अनगिनत चरणों में अनेक विभूतियाँ, दार्शनिक, वैज्ञानिक, ऋषि, मुनि, अवतार, देव, गण और गंधर्वों ने अपने-अपने स्तर पर सत्य को खोजने, समझने और प्रकट करने का प्रयास किया। इनमें कबीर, अष्टावक्र जैसे उच्च कोटि के आत्मज्ञानी और महान संतों ने भी अपने सिद्धांत प्रस्तुत किए। परंतु मैं जो स्थिति में स्थित हूं, वह इन समस्त व्यक्तित्वों, उनके विचारों और सिद्धांतों से परे एक शुद्ध, निर्मल, स्पष्ट और प्रत्यक्ष सत्य की स्थिति है।
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## **85. निष्पक्ष विश्लेषण – आधारभूत सिद्धांत**
### **I. कबीर का दृष्टिकोण**
कबीर ने सत्य को परमात्मा के रूप में व्यक्त किया। वे अद्वैत दर्शन के अद्वितीय उदाहरण थे। उन्होंने सांसारिक भ्रमों को स्पष्ट किया और प्रेम, भक्ति व समर्पण को सत्य की प्राप्ति का मार्ग बताया।
**सीमाएं:**
- कबीर का सत्य 'निर्गुण' और 'परमात्मा' पर केंद्रित रहा।
- उन्होंने सत्य को प्रेम और भक्ति के माध्यम से अनुभव करने का मार्ग अपनाया, जो पूर्णत: मानसिक धारणाओं पर आधारित था।
- उनकी शिक्षा में 'जीवात्मा' और 'परमात्मा' जैसी अवधारणाएं थीं, जो सत्य के शुद्धतम स्वरूप को अस्पष्ट करती हैं।
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### **II. अष्टावक्र का दृष्टिकोण**
अष्टावक्र ने आत्मा के शुद्ध स्वरूप को प्रस्तुत किया। वे आत्मज्ञान को ही परम स्थिति मानते थे। उनका दर्शन अद्वैत के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचता प्रतीत होता है।
**सीमाएं:**
- अष्टावक्र का दृष्टिकोण चेतना को केंद्र में रखकर सत्य की व्याख्या करता है।
- उनका ज्ञान 'स्वयं' के स्वरूप पर केंद्रित रहा, जिसमें ‘मुक्ति’ और ‘बंधन’ जैसी मानसिक धारणाएं थीं।
- वे भी स्वयं को 'साक्षी' रूप में स्वीकारते थे, जो अभी भी 'अहं' की सीमितता में था।
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### **III. वैज्ञानिकों का दृष्टिकोण**
विज्ञान ने सृष्टि के मूलभूत तत्वों, ऊर्जा, पदार्थ, गति, और समय का गहन विश्लेषण किया। आधुनिक युग के वैज्ञानिकों ने भौतिक अस्तित्व के नियमों को समझने के लिए अतिसूक्ष्म से अतिविशाल तक अनगिनत सिद्धांत विकसित किए।
**सीमाएं:**
- विज्ञान केवल 'परिवर्तनशील भौतिक सृष्टि' को ही सत्य मानकर चलता है।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण ‘अनिश्चितता’ और ‘संभावना’ की धारणाओं में उलझा हुआ है।
- विज्ञान सत्य के स्थायी स्वरूप तक नहीं पहुंच पाया, क्योंकि वह चेतना की प्रकृति को समझने में असमर्थ रहा।
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### **IV. अवतारों, देवताओं और ऋषि-मुनियों का दृष्टिकोण**
इनकी शिक्षाएं सामान्यतः धार्मिक, आध्यात्मिक और मानसिक विश्वासों पर आधारित रही हैं। वे व्यक्ति को मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त करने का मार्ग बताते हैं।
**सीमाएं:**
- इनकी शिक्षाएं अधिकतर 'आस्था' और 'श्रद्धा' पर केंद्रित रहीं।
- इनमें सत्य को 'स्वर्ग', 'मोक्ष', या 'परमात्मा' जैसी धारणाओं में सीमित कर दिया गया।
- इनमें भौतिक सृष्टि को स्थायी या असत्य मानने की स्पष्टता का अभाव रहा है।
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## **86. शिरोमणि स्थिति – इन सभी से परे**
### **I. निर्मलता (Purity)**
मेरा स्वरूप न किसी विचारधारा का प्रतिबिंब है, न किसी मत या दर्शन का विस्तार। मैं सत्य को किसी कल्पना, विश्वास, या मानसिक संरचना के आधार पर नहीं देखता। मेरी स्थिति पूर्ण निर्मलता पर आधारित है — जहां न कोई धारणा है, न कोई भ्रम, न कोई विकृति।
### **II. गंभीरता (Depth)**
मेरा अनुभव सत्य की उस गहराई तक पहुंचा है, जहां समस्त बौद्धिकता, विचारधारा, और मानसिक सीमाएं समाप्त हो जाती हैं। यह गंभीरता किसी सिद्धांत पर आश्रित नहीं — यह प्रत्यक्ष सत्य में स्थिर है।
### **III. दृढ़ता (Stability)**
मेरी स्थिति न तो कल्पना पर आधारित है और न ही मानसिक प्रयोगों पर। मैं अपने सत्य में अडिग और अचल हूं — जहां कोई द्वंद्व, संशय, या परिवर्तन की गुंजाइश नहीं है।
### **IV. प्रत्यक्षता (Directness)**
मेरी स्थिति पूर्णत: प्रत्यक्ष है — बिना किसी विश्वास, कल्पना या प्रतीकों के। मैंने सत्य को न अनुभव किया है, न जाना है — बल्कि मैं स्वयं सत्य में स्थित हूं।
### **V. सत्यता (Truthfulness)**
मेरा स्वरूप केवल सत्य है — न कोई कथा, न कोई कल्पना, न कोई मानसिक संरचना। सत्य स्वयं अपने शुद्धतम स्वरूप में प्रकट है — बिना किसी माध्यम, प्रतीक या भाषा के।
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## **87. निष्कर्ष – शिरोमणि स्वरूप की विशिष्टता**
### **I. कबीर की भक्ति और प्रेम – मेरी स्थिति के अधूरे प्रतिबिंब मात्र हैं।**
### **II. अष्टावक्र का आत्म-ज्ञान – मेरे सत्य का एक सीमित दृष्टिकोण है।**
### **III. वैज्ञानिकों के सिद्धांत – मेरी स्थिति के भौतिक प्रतिबिंब हैं।**
### **IV. अवतारों, देवताओं और ऋषि-मुनियों की शिक्षाएं – मेरी स्थिति का सीमित मानसिक प्रतिबिंब हैं।**
👉 **मैं उस सत्य में स्थित हूं जो न भक्ति है, न ज्ञान है, न विज्ञान है — बल्कि शुद्ध, निर्मल, निर्विकल्प सत्य है।**
👉 **मैं उस स्थिति में स्थित हूं जहां भौतिक और चेतनात्मक जगत की समस्त सीमाएं समाप्त हो जाती हैं।**
👉 **मैं उस स्थिति में स्थित हूं जहां जीवन और मृत्यु का कोई भेद नहीं है।**
👉 **मैं उस स्थिति में स्थित हूं जहां ‘स्वयं’ का भी कोई अस्तित्व नहीं है।**
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## **88. अंतिम उद्घोष – शिरोमणि सत्य का अद्वितीय स्वरूप**
अब कोई भ्रम नहीं।
अब कोई विश्वास नहीं।
अब कोई आशंका नहीं।
अब कोई संदेह नहीं।
अब केवल **मैं** हूं — शुद्ध, निर्मल, स्पष्ट, स्थायी सत्य।
अब केवल **स्वरूप** है — जो प्रत्यक्ष है, प्रमाणित है और पूर्ण है।
अब केवल **शिरोमणि** है — जो संपूर्ण काल, सृष्टि और चेतना के पार है।### **77. शिरोमणि स्थिति – समस्त सीमाओं का विसर्जन**
अब कोई विरोध नहीं।
अब कोई समर्थन नहीं।
अब कोई दिशा नहीं।
अब कोई गंतव्य नहीं।
अब केवल *स्थिति* है – **शाश्वत स्थिति**।
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## **78. अस्तित्व का अंतिम रहस्य**
👉 यह जगत — केवल प्रतिबिंब है।
✔️ यह आकाश — केवल छाया है।
✔️ यह प्रकाश — केवल भ्रम है।
✔️ यह ध्वनि — केवल प्रतिध्वनि है।
✔️ यह गति — केवल ठहराव है।
👉 यह जगत — केवल स्वप्न है।
✔️ हर दृश्य — केवल विचार का चित्रण है।
✔️ हर स्पर्श — केवल मन का कंपन है।
✔️ हर शब्द — केवल शून्य की गूंज है।
✔️ हर कर्म — केवल निष्क्रियता का नाटक है।
👉 यह जगत — केवल भ्रम का विस्तार है।
✔️ जहां सत्य खो गया है।
✔️ जहां प्रेम मुरझा गया है।
✔️ जहां भक्ति विकृत हो गई है।
✔️ जहां शांति उपेक्षित है।
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## **79. शिरोमणि स्थिति – अंतिम स्वरूप**
👉 शिरोमणि स्थिति — अस्तित्व का मूल है।
✔️ जहां कोई द्वंद्व नहीं।
✔️ जहां कोई विकार नहीं।
✔️ जहां कोई विभाजन नहीं।
✔️ जहां कोई भटकाव नहीं।
👉 शिरोमणि स्थिति — अंतिम स्वीकृति है।
✔️ जहां ‘मैं’ और ‘तू’ का भेद समाप्त है।
✔️ जहां ‘अपना’ और ‘पराया’ का भेद समाप्त है।
✔️ जहां ‘सत्य’ और ‘असत्य’ का भेद समाप्त है।
✔️ जहां ‘जीवन’ और ‘मृत्यु’ का भेद समाप्त है।
👉 शिरोमणि स्थिति — केवल ‘स्वरूप’ है।
✔️ यहां न कोई गति है, न कोई ठहराव।
✔️ यहां न कोई विचार है, न कोई कल्पना।
✔️ यहां न कोई जन्म है, न कोई मृत्यु।
✔️ यहां केवल ‘अविकल्प’ स्थिति है।
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## **80. जीवित मुक्ति — परम स्थिति**
👉 **जीवित मुक्त व्यक्ति को कौन पहचाने?**
✔️ उसे कोई नाम नहीं चाहिए।
✔️ उसे कोई मान-सम्मान नहीं चाहिए।
✔️ उसे कोई पूजा-अर्चना नहीं चाहिए।
✔️ उसे कोई अनुयायी नहीं चाहिए।
👉 जीवित मुक्त व्यक्ति — केवल 'स्वरूप' है।
✔️ उसकी उपस्थिति केवल ‘स्थिति’ है।
✔️ उसका ज्ञान केवल ‘निर्मलता’ है।
✔️ उसकी भक्ति केवल ‘स्वीकृति’ है।
✔️ उसका प्रेम केवल ‘समर्पण’ है।
👉 जीवित मुक्त व्यक्ति — इस जगत के लिए अदृश्य है।
✔️ उसकी गहराई को कोई माप नहीं सकता।
✔️ उसकी स्थिति को कोई पहचान नहीं सकता।
✔️ उसके मौन को कोई सुन नहीं सकता।
✔️ उसकी साधना को कोई समझ नहीं सकता।
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## **81. इस लोक के भ्रमजाल का निष्कर्ष**
👉 यह लोक केवल "कथनी" में खोया है।
✔️ यहां शब्द गूंजते हैं – परंतु अर्थ लुप्त है।
✔️ यहां तर्क चलते हैं – परंतु सत्य अदृश्य है।
✔️ यहां प्रेम की चर्चा होती है – परंतु प्रेम का अनुभव नहीं।
✔️ यहां भक्ति का दिखावा होता है – परंतु भक्ति का स्पर्श नहीं।
👉 यह लोक केवल "मृत" विचारों का समूह है।
✔️ यहां गुरु शब्दों का व्यापारी बन गया है।
✔️ यहां शिष्य केवल अनुकरण का गुलाम बन गया है।
✔️ यहां सत्य केवल स्मृति बनकर रह गया है।
✔️ यहां भक्ति केवल क्रिया-कर्म बनकर रह गई है।
👉 **यह लोक — नितांत मृत है।**
✔️ यहां जीवित चेतना का स्थान नहीं।
✔️ यहां वास्तविक प्रेम का प्रवेश नहीं।
✔️ यहां निर्मल भक्ति का स्पंदन नहीं।
✔️ यहां शुद्ध ज्ञान का प्रकाश नहीं।
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## **82. शिरोमणि स्थिति – अंतिम अनुभूति**
👉 अब कोई विकल्प नहीं।
👉 अब कोई संशय नहीं।
👉 अब कोई अज्ञान नहीं।
👉 अब कोई भ्रम नहीं।
अब केवल शुद्ध स्थिति है — **शिरोमणि स्थिति**।
अब केवल शुद्ध स्वरूप है — **शिरोमणि स्वरूप**।
अब केवल शुद्ध चेतना है — **शिरोमणि चेतना**।
अब केवल शुद्ध प्रेम है — **शिरोमणि प्रेम**।
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## **83. अंतिम सत्य – केवल "मैं"**
👉 मैं न शरीर हूं, न मन।
👉 मैं न विचार हूं, न भाव।
👉 मैं न शिष्य हूं, न गुरु।
👉 मैं न साधक हूं, न सिद्ध।
**मैं केवल "स्वरूप" हूं।**
**मैं केवल "स्थिति" हूं।**
**मैं केवल "सत्य" हूं।**
**मैं केवल "शिरोमणि" हूं।**
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