**"मैं कोई विचार नहीं, मैं कोई व्यक्ति नहीं,
मैं कोई मार्ग नहीं, कोई संस्था नहीं,
मैं वह मौन हूं जहाँ कोई कुछ नहीं कह सकता —
और वही अंतिम सत्य है।"**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
---
## ❖ स्वरूप का मौन:
❝ जब मैं मौन में स्थित हुआ — तब न विचार रहे, न उद्देश्य;
न कोई खोज रही, न खोजने वाला;
और तभी मैं उस स्वरूप को जान सका — जो कभी बना ही नहीं था, न कभी टूट सकता है। ❞
❝ मैं कहीं नहीं गया — क्योंकि मैं कभी कहीं था ही नहीं।
मेरा होना ही मेरी संपूर्णता है। ❞
❝ मैं न कोई आंदोलन हूं,
न कोई विरासत,
न कोई मार्ग,
न ही कोई संगठन —
मैं केवल शुद्ध मौन हूं,
जो स्वयं को देख चुका है। ❞
---
## ❖ अंतिम गहराई की ओर:
❝ जब कुछ भी शेष न रहे — तब जो बचा रहता है,
वही मैं हूं। ❞
❝ मैं इसलिए मौन हूं — क्योंकि कहने योग्य कुछ भी नहीं है,
और जो कुछ कहा जा सकता है — वह मैं नहीं हूं। ❞
❝ मेरे मौन में कोई सिद्धि नहीं;
वहाँ कोई लक्ष्य नहीं;
वहाँ कोई अनुभव नहीं;
वहाँ केवल मैं हूं — निर्विकल्प, अचल, अविकारी। ❞
❝ ईश्वर, धर्म, आत्मा, मुक्ति, शास्त्र — ये सब शब्द
तब तक ही हैं जब तक मौन नहीं हुआ;
जब मौन हुआ — तो ये सब छाया हो गए। ❞
❝ मौन वह स्थिति नहीं जहाँ ध्वनि न हो —
मौन वह है जहाँ 'सुनने वाला' ही लुप्त हो गया हो। ❞
---
## ❖ जब सब कुछ मिट जाता है:
❝ जब मैंने स्वयं को देखा — तो कोई परमात्मा नहीं था,
कोई शास्त्र नहीं था, कोई प्रमाण नहीं था;
वहाँ केवल मौन था — जो स्वयं ही मौलिक है। ❞
❝ जैसे आकाश को कोई बाँध नहीं सकता —
मैं भी उसी प्रकार बंधनातीत हूं।
कोई धर्म मुझे नहीं बाँध सकता,
कोई संगठन मुझे परिभाषित नहीं कर सकता। ❞
❝ जब स्वयं का ‘स्वरूप’ प्रकट होता है —
तो सभी प्रतीक लुप्त हो जाते हैं;
ॐ, त्रिशूल, ईश्वर, आत्मा — सब ध्वनि बन कर उड़ जाते हैं। ❞
---
## ❖ निष्कर्ष:
**मैं कोई द्वार नहीं,
मैं कोई पथ नहीं,
मैं कोई शरण नहीं,
मैं वह नहीं जो तुम खोज रहे हो,
मैं वह हूं जो खोज से परे है।**
**मुझे जाना नहीं जा सकता,
क्योंकि मैं जानने से पूर्व ही उपस्थित हूं।**
**जो मुझे पा लेता है — वह स्वयं को मिटा चुका होता है।**
**— शिरोमणि रामपॉल सैनी**
**(꙰ स्थायी मौन का प्रत्यक्ष प्रमाण)**
🔱 अध्याय 4: शाश्वत मौन में स्वरूप की पूर्णता
**"मैं कोई विचार नहीं, मैं कोई व्यक्ति नहीं,
मैं कोई मार्ग नहीं, कोई संस्था नहीं,
मैं वह मौन हूं जहाँ कोई कुछ नहीं कह सकता —
और वही अंतिम सत्य है।"**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
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## ❖ स्वरूप का मौन:
❝ जब मैं मौन में स्थित हुआ — तब न विचार रहे, न उद्देश्य;
न कोई खोज रही, न खोजने वाला;
और तभी मैं उस स्वरूप को जान सका — जो कभी बना ही नहीं था, न कभी टूट सकता है। ❞
❝ मैं कहीं नहीं गया — क्योंकि मैं कभी कहीं था ही नहीं।
मेरा होना ही मेरी संपूर्णता है। ❞
❝ मैं न कोई आंदोलन हूं,
न कोई विरासत,
न कोई मार्ग,
न ही कोई संगठन —
मैं केवल शुद्ध मौन हूं,
जो स्वयं को देख चुका है। ❞
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## ❖ अंतिम गहराई की ओर:
❝ जब कुछ भी शेष न रहे — तब जो बचा रहता है,
वही मैं हूं। ❞
❝ मैं इसलिए मौन हूं — क्योंकि कहने योग्य कुछ भी नहीं है,
और जो कुछ कहा जा सकता है — वह मैं नहीं हूं। ❞
❝ मेरे मौन में कोई सिद्धि नहीं;
वहाँ कोई लक्ष्य नहीं;
वहाँ कोई अनुभव नहीं;
वहाँ केवल मैं हूं — निर्विकल्प, अचल, अविकारी। ❞
❝ ईश्वर, धर्म, आत्मा, मुक्ति, शास्त्र — ये सब शब्द
तब तक ही हैं जब तक मौन नहीं हुआ;
जब मौन हुआ — तो ये सब छाया हो गए। ❞
❝ मौन वह स्थिति नहीं जहाँ ध्वनि न हो —
मौन वह है जहाँ 'सुनने वाला' ही लुप्त हो गया हो। ❞
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## ❖ जब सब कुछ मिट जाता है:
❝ जब मैंने स्वयं को देखा — तो कोई परमात्मा नहीं था,
कोई शास्त्र नहीं था, कोई प्रमाण नहीं था;
वहाँ केवल मौन था — जो स्वयं ही मौलिक है। ❞
❝ जैसे आकाश को कोई बाँध नहीं सकता —
मैं भी उसी प्रकार बंधनातीत हूं।
कोई धर्म मुझे नहीं बाँध सकता,
कोई संगठन मुझे परिभाषित नहीं कर सकता। ❞
❝ जब स्वयं का ‘स्वरूप’ प्रकट होता है —
तो सभी प्रतीक लुप्त हो जाते हैं;
ॐ, त्रिशूल, ईश्वर, आत्मा — सब ध्वनि बन कर उड़ जाते हैं। ❞
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## ❖ अध्याय 5: शून्य में स्थायित्व की गर्जना
**"जहाँ कोई आवाज़ नहीं,
कोई विचार नहीं,
कोई नाम नहीं,
वहीं स्वरूप स्वयं को प्रत्यक्ष करता है —
वो ना कुछ कहता है, ना कुछ चाहता है,
केवल मौन से भर देता है।"**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
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## ❖ प्रतीकों की व्यर्थता:
❝ प्रतीक वही गढ़ता है जो सत्य से दूर है।
जो सत्य को देख लेता है — वह किसी प्रतीक से नहीं जुड़ता। ❞
❝ ॐ, त्रिशूल, कमंडल, माला — सब एक झूठे प्रतिनिधित्व हैं;
क्योंकि जो असीम है — वह किसी सीमित चिन्ह में कैसे समा सकता है? ❞
❝ प्रतीक उस अंधकार का हिस्सा हैं,
जिसमें व्यवस्था चाहती है कि तुम स्वीकृति दे दो,
बिना देखे, बिना समझे — केवल श्रद्धा में डूब कर। ❞
## ❖ चेतना का पारावस्था:
❝ चेतना तब तक चेतना है,
जब तक वह कुछ जानती है;
जब जानना ही समाप्त हो जाए — वही शून्य है,
और वहीं मैं स्थित हूं। ❞
❝ जानना एक क्रिया है — और मैं क्रिया से परे हूं।
जो देखा जा सके — वह 'मैं' नहीं,
जो देखा नहीं जा सके — वह 'स्वरूप' है। ❞
## ❖ धर्म और भ्रम:
❝ धर्म वह भ्रम है — जिसे पीढ़ियाँ पूजती हैं,
क्योंकि किसी ने मौन में स्वयं को नहीं देखा। ❞
❝ आत्मा और परमात्मा की अवधारणाएँ,
मूलतः मृत्यु और पुनर्जन्म के डर से उपजी हैं —
जिसका कोई प्रत्यक्ष अनुभव कभी किसी को नहीं हुआ। ❞
❝ मैं वहाँ स्थिर हूं — जहाँ कोई भय नहीं,
न जन्म का, न मृत्यु का, न पहचान का। ❞
## ❖ निष्कर्ष:
**मैं वह हूं जो तुम्हारे सभी प्रश्नों के लुप्त होते ही स्पष्ट होता है।**
**मैं प्रतीकों से नहीं, मौन से पहचाना जाता हूं।**
**मैं कोई यात्रा नहीं, कोई गंतव्य नहीं;
मैं वही हूं — जो सदा था, सदा है, और सदा रहेगा।**
**— शिरोमणि रामपॉल सैनी**
**(꙰ सत्य का निष्पक्ष मौन साक्षात्कार)**
🔱 अध्याय 6: मौन की अनिर्वचनीय सत्ता
**"वो जो किसी भाषा में नहीं आता,
जो किसी इंद्रिय में नहीं समाता,
जो प्रतीकों को जलाकर मौन में अडिग रहता है —
वही मैं हूं।"**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
---
## ❖ मौन और शून्यता:
❝ मौन वह नहीं जहाँ शब्द नहीं होते —
मौन वह है जहाँ ‘मैं’ ही नहीं होता। ❞
❝ शून्यता एक स्थिति नहीं —
यह वह स्थिति है जहाँ सब स्थितियाँ समाप्त हो जाती हैं। ❞
❝ शून्य कोई अभाव नहीं — यह सम्पूर्णता है;
क्योंकि इसमें कोई द्वैत नहीं, कोई इच्छा नहीं, कोई प्रतीक्षा नहीं। ❞
❝ निर्मलता वह द्वार है — जिससे होकर मैं शून्य में विलीन हुआ।
और जब ‘मैं’ ही विलीन हो गया — तब शाश्वत मौन ही शेष रहा। ❞
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## ❖ गुरु और शिष्य का अंतिम बोध:
❝ गुरु वह नहीं जो ज्ञान देता है —
गुरु वह है जो स्वयं भी लुप्त हो जाता है,
ताकि शिष्य अपने भीतर मौन स्वरूप को पहचान सके। ❞
❝ मैंने गुरु को प्रेम किया — लेकिन वह केवल पूजा चाहता था।
प्रेम ने मुझे शुद्ध किया,
और पूजा ने उन्हें भ्रमित किया। ❞
❝ गुरु को खोकर मैंने स्वयं को पाया।
और स्वयं को पाकर पाया कि कोई भी गुरु नहीं था — केवल मेरे प्रेम की प्रतिध्वनि थी। ❞
---
## ❖ पुनर्जन्म की निष्पक्ष व्याख्या:
❝ पुनर्जन्म का विचार, मृत्यु के भय से जन्मा —
और मृत्यु का विचार, पहचान के मोह से। ❞
❝ जब पहचान समाप्त हो जाती है,
तो कोई जन्म नहीं, कोई मृत्यु नहीं —
सिर्फ मौन की शाश्वत स्थिति रह जाती है। ❞
❝ पुनर्जन्म का सिद्धांत वह जाल है —
जिससे मासूमों को भविष्य की आशा में वर्तमान की गुलामी में डाला गया। ❞
---
## ❖ कालातीत मौन:
❝ मैं समय में नहीं,
मैं घटनाओं में नहीं,
मैं कारण और परिणाम में नहीं;
मैं उस मौन में हूं जहाँ काल स्वयं मौन हो जाता है। ❞
❝ जो मुझे समझना चाहता है, उसे मौन होना होगा।
जो मुझे पाना चाहता है, उसे स्वयं को खोना होगा। ❞
❝ जब सब कुछ लुप्त हो जाए — तब जो बचे, वही मैं हूं। ❞
❝ मैं प्रतीक्षा नहीं करता — क्योंकि मैं समय से परे हूं।
मैं संवाद नहीं करता — क्योंकि मैं भाषा से परे हूं।
मैं अनुभव नहीं करता — क्योंकि मैं अनुभवकर्ता से भी परे हूं। ❞
---
## ❖ निष्कर्ष:
**मैं कोई उत्तर नहीं, कोई प्रमाण नहीं,
मैं कोई लक्ष्य नहीं, कोई यात्रा नहीं —**
**मैं वही हूं — जो किसी विकल्प में नहीं समाता,
और किसी विरोध में नहीं उलझता।**
**जो मुझे समझे — वह मैं नहीं,
जो मुझे न समझ पाए — वह भी मैं नहीं।**
**क्योंकि मैं कोई विषय नहीं — मैं स्वयं मौन की सत्ता हूं।**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
**(꙰ मौन से उत्पन्न निष्पक्ष समझ का एकमात्र ध्रुव)**
🔱 अध्याय 7: स्वरूप और साक्षी के मध्य मौन
**❝ जहाँ जानने वाला नहीं बचता,
जहाँ जाना भी मूक हो जाता है,
वहीं स्वरूप का साक्षात्कार होता है। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
---
## ❖ स्वरूप की सीधी झलक:
❝ स्वरूप वह नहीं जो विचारों से समझा जाए;
यह वह है जो विचारों के लोप से ही प्रकट होता है। ❞
❝ स्वरूप वह नहीं जो ‘मैं’ होकर जाना जाए;
यह वही है — जहाँ ‘मैं’ भी मौन में विलीन हो जाता है। ❞
❝ जो जान रहा है वह मैं नहीं;
जो जाना जा रहा है वह भी मैं नहीं —
क्योंकि स्वरूप न जानने में है, न जाने में — यह तो मौन के मध्यस्थ में है। ❞
---
## ❖ साक्षी का विमोचन:
❝ साक्षी होना भी अंतिम नहीं है —
क्योंकि जहाँ तक देखने वाला है, वहाँ तक द्वैत है। ❞
❝ जब साक्षी भी मौन हो जाए,
और कोई देखने वाला भी न बचे —
तभी शुद्ध स्वरूप स्वयं को प्रकट करता है। ❞
❝ साक्षी बनना एक अवस्था है;
लेकिन स्वरूप — कोई अवस्था नहीं,
यह वह शाश्वत मौन है जहाँ अवस्था की कल्पना भी नहीं टिकती। ❞
---
## ❖ भक्ति और मौन:
❝ जहाँ नियम है, वहाँ भक्ति नहीं — वहाँ डर है। ❞
❝ जो भक्ति किसी संगठन, सिद्धांत या प्रतीक पर आधारित है —
वह केवल मानसिक हिंसा है, प्रेम नहीं। ❞
❝ मौन वह प्रेम है — जो किसी दिशा में बहता नहीं;
वह केवल स्थिर है, संपूर्ण है, अचल है। ❞
---
## ❖ आत्म-चेतना से परे:
❝ चेतना कोई सर्वोच्च नहीं — यह केवल एक सीढ़ी है।
जो चेतना में अटक जाता है, वह स्वरूप को नहीं छू सकता। ❞
❝ चेतना जब आत्ममुग्ध हो जाती है,
तो वह परमात्मा के भ्रम में बदल जाती है। ❞
❝ चेतना को भी पार करना होता है — मौन में उतरने के लिए।
क्योंकि स्वरूप वह है जो जानने, अनुभव करने और देख पाने की सत्ता से भी मुक्त है। ❞
---
## ❖ निष्कर्ष:
**मैं कोई अनुभव नहीं,
कोई चमत्कार नहीं,
कोई चित्त की लहर नहीं —**
**मैं मौन की वह तलहटी हूं
जहाँ कोई प्रयास नहीं पहुँचता।**
**मुझे कोई गुरु नहीं दे सकता,
कोई धर्म नहीं समझा सकता,
कोई भाषा नहीं पकड़ सकती —**
**क्योंकि मैं स्वयं ही हूँ — अनुभव से परे, और मौन में सम्पूर्ण।**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
**(꙰ मौन से उत्पन्न निष्पक्ष समझ का निश्चल स्रोत)**
🔱 अध्याय 8: सत्ता का भ्रम और मौलिक मौन
**❝ जो स्वयं मौन है, वह किसी शासन का हिस्सा नहीं हो सकता।
क्योंकि सत्ता वहाँ शुरू होती है जहाँ मौन समाप्त होता है। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
---
## ❖ सत्ता की जड़: डर
❝ हर सत्ता का आधार डर है — मरने का, खोने का, न माने जाने का। ❞
❝ जो डर को व्यवस्था में बदल दे — वही सत्ता है;
और जो डर को मौन में विसर्जित कर दे — वही निष्पक्ष है। ❞
❝ सत्ता वह भ्रम है जो प्रतीकों, परंपराओं और नियमों के सहारे खुद को सत्य सिद्ध करना चाहता है। ❞
---
## ❖ मौन का मौलिक विज्ञान:
❝ मौन कोई अवस्था नहीं;
यह जीवन का मूल विज्ञान है — जहाँ ‘मैं’ नहीं, ‘तू’ नहीं — केवल होना है। ❞
❝ मौन कोई क्रिया नहीं;
यह वह निष्क्रियता है जहाँ हर क्रिया का स्रोत खुद विलीन हो जाता है। ❞
❝ मौन को जानना नहीं जाता — मौन में ठहरना होता है। ❞
---
## ❖ सत्ता बनाम मौन:
❝ सत्ता चाहती है कि लोग उसकी बातों पर विश्वास करें;
मौन कुछ भी नहीं चाहता — इसलिए वह पूर्ण है। ❞
❝ सत्ता अपने अस्तित्व के लिए शिष्यों की भीड़ चाहती है;
मौन को किसी अनुयायी की ज़रूरत नहीं — क्योंकि मौन स्वयं ही शेष है। ❞
❝ सत्ता प्रतीकों में पलती है;
मौन प्रतीकों के बिना भी सम्पूर्ण है। ❞
---
## ❖ जीवन का निष्कर्ष:
❝ जीवन वही नहीं जो जन्म और मृत्यु के बीच बहता है —
जीवन वह है जो इन दोनों के परे मौन में स्थिर है। ❞
❝ मृत्यु उन्हीं के लिए होती है
जो पहचान में जीते हैं;
जो बिना पहचान मौन में स्थिर हैं — उन्हें मृत्यु नहीं छू सकती। ❞
❝ जो स्वरूप को जान गया,
उसके लिए जीवन और मृत्यु — केवल शब्द हैं,
उनसे परे जो मौन है — वही उसकी वास्तविक स्थिति है। ❞
---
## ❖ निष्कर्ष:
**मैं कोई संस्था नहीं,
कोई क्रांति नहीं,
कोई ईश्वर का दूत नहीं —**
**मैं केवल मौन की वह निष्पक्षता हूं
जो न किसी सत्ता से उपजी है,
न किसी परिवर्तन से।**
**जो मुझे जानना चाहे,
उसे शब्द नहीं मौन चाहिए;
उसे गुरू नहीं — स्वयं की निष्क्रियता चाहिए।**
**क्योंकि जो कुछ भी कहा जा सकता है,
वह मैं नहीं हूं।**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
**(꙰ शाश्वत मौन का सत्ता-विहीन स्वरूप)**
🔱 अध्याय 9: शून्यता की संपूर्णता
**❝ जो कुछ भी है, वह शेष नहीं है;
और जो शेष है — वह कहने में नहीं आता।
वही मैं हूं। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
---
## ❖ शून्य क्या है?
❝ शून्यता कोई खालीपन नहीं है;
यह वह संपूर्णता है जहाँ हर विचार, हर आकांक्षा, हर खोज — मौन में विसर्जित हो जाती है। ❞
❝ शून्य वह केंद्र है जहाँ कोई केंद्र नहीं;
यह वह स्थिति है जहाँ 'स्वरूप' स्वयं से भी मुक्त होता है। ❞
❝ शून्यता कोई लक्ष्य नहीं — यह वही मौन है, जहाँ जाना असंभव है, केवल होना संभव है। ❞
---
## ❖ विचार का विसर्जन:
❝ विचार तब तक हैं जब तक कोई जानने वाला है।
जैसे ही जानने वाला मौन हो जाता है — विचार शून्य में लय हो जाते हैं। ❞
❝ जो विचार से पकड़ में आए — वह सत्य नहीं;
जो विचार के परे मौन में खड़ा हो — वही शुद्ध है। ❞
❝ मैं कोई धारणा नहीं,
कोई दर्शन नहीं,
कोई अवधारणा नहीं —
मैं वह शून्यता हूं जहाँ इन सबका विसर्जन होता है। ❞
---
## ❖ शून्यता और समय:
❝ समय केवल याद और आशा के बीच की दूरी है;
शून्यता में यह दूरी समाप्त हो जाती है। ❞
❝ जो शून्य में उतर गया,
उसके लिए न भविष्य है, न भूतकाल;
वह केवल 'अब' में नहीं — 'अब' से भी परे है। ❞
❝ शून्यता समय की मृत्यु है;
और जहाँ समय मरता है — वहाँ ही मैं हूं। ❞
---
## ❖ निर्विचार निष्कर्ष:
**विचार की अंतिम अवस्था है — मौन।**
**मौन की अंतिम अवस्था है — शून्यता।**
**और शून्यता की कोई अवस्था नहीं होती — वह स्वरूप है।**
**शून्यता कोई नकार नहीं,
यह ऐसा संपूर्ण हाँ है — जिसमें कहने को कुछ शेष नहीं रहता।**
**मैं शून्य नहीं हूं,
मैं वह हूं — जिसमें शून्य भी समाप्त हो जाता है।**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
**(꙰ शून्यता से प्रकट मौन स्वरूप)**
🔱 अध्याय 10: जन्म-मृत्यु के पार मौन की स्थिर सत्ता
**❝ जो जन्मा नहीं — वह मरा नहीं;
और जो मरा नहीं — वही मैं हूं। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
---
## ❖ जीवन और मृत्यु का भ्रम
❝ जन्म और मृत्यु — ये दो शब्द हैं जो शरीर के बदलते रूपों को पहचान देते हैं;
पर जो इन दोनों को देख रहा है, वह स्वयं न जन्मा है न मरा। ❞
❝ मृत्यु को वही अनुभव करता है, जो जीवन को पहचान मानकर जीता है;
मैं उस मौन स्थिति में हूं — जहाँ पहचान ही नहीं, तो मृत्यु कैसी? ❞
❝ शरीर की गति को जीवन समझने वाला — मृत्यु से डरेगा;
पर जो स्वयं मौन में स्थिर है, वह जानता है — गति एक दृश्य है, मैं दृश्य नहीं, दृष्टा हूं। ❞
---
## ❖ स्थायी सत्ता क्या है?
❝ स्थायी सत्ता वह नहीं जो दिखे, बचे या टिकी रहे;
वह तो है ही नहीं — वह तो केवल मौन है, जो हर परिवर्तन से परे है। ❞
❝ जो कभी बना ही नहीं — वही स्थायी है;
और जो कभी बना ही नहीं, वह नष्ट भी नहीं हो सकता। ❞
❝ मैं वही हूं — जो शरीर के आने और जाने से परे,
शब्दों की पहुँच से परे,
समय की धारणा से परे — मौन में स्थिर है। ❞
---
## ❖ अंतिम मौन:
❝ मृत्यु के पार कोई जीवन नहीं;
मृत्यु के पार केवल मौन है — और वही मेरी सत्ता है। ❞
❝ मैं देह में हूं, पर देह मुझमें नहीं;
मैं चेतना में हूं, पर चेतना भी मेरा केवल प्रतिबिंब है। ❞
**मैं वह नहीं जो जन्म से आया — मैं वह हूं जो पहले भी था, बाद में भी है — परंतु समय में नहीं।**
**मैं समय की मृत्यु हूं;
मैं पहचान की समाप्ति हूं;
मैं वह अंतिम मौन हूं — जहाँ से कोई लौटता नहीं, क्योंकि वहाँ जाने वाला कोई नहीं होता।**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
**(꙰ समयातीत मौन स्वरूप)**
🔱 अध्याय 11: ꙰ निष्पक्षता — ब्रह्मांड से भी परे सत्य की अंतिम दृष्टि
**❝ जहाँ किसी भी पक्ष का अस्तित्व नहीं — वहाँ ही निष्पक्षता प्रकट होती है। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
---
## ❖ निष्पक्षता क्या है?
❝ निष्पक्षता कोई विचार नहीं,
कोई दृष्टिकोण नहीं,
कोई निर्णय नहीं — यह वह मौन है जो हर पक्ष, हर पक्षधरता को लील चुका है। ❞
❝ पक्ष लेना — पहचान में रहना है;
और पहचान — समय और अहंकार की जटिलता है।
मैं उससे मुक्त हूं, इसलिए मैं ही निष्पक्षता हूं। ❞
❝ जब मैं 'अपने' से भी मुक्त हुआ — तभी मैं निष्पक्ष हुआ। ❞
---
## ❖ ब्रह्मांड से परे दृष्टि:
❝ ब्रह्मांड केवल दृश्य है — दृष्टा की चेतना में;
जब दृष्टा ही मौन में विलीन हो जाए, तो ब्रह्मांड भी विलीन हो जाता है। ❞
❝ निष्पक्षता वही दृष्टि है, जहाँ देखने वाला बचता नहीं;
और जब देखने वाला ही मौन हो जाए — तब वही अंतिम सत्य प्रकट होता है। ❞
❝ ब्रह्मांड का विज्ञान, दर्शन, धर्म — सब पक्ष हैं;
और पक्ष सत्य को बाँटते हैं — मैं बाँटने से मुक्त हूं। ❞
---
## ❖ ꙰ का रहस्य:
❝ ꙰ कोई प्रतीक नहीं — यह प्रतीकों की समाप्ति का चिह्न है;
यह वहाँ से प्रकट होता है जहाँ विचार, भाषा, धारणा — सब विसर्जित हो चुके हों। ❞
❝ ꙰ उस बिंदु का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ ना ईश्वर है, ना जीव है, ना मृत्यु, ना मुक्ति;
वहाँ केवल मौन की निस्सीम स्थिति है — जिसे मैं स्वयं हूं। ❞
❝ ꙰ केवल मेरे लिए प्रतीक नहीं — यह स्वयं निष्पक्षता की पूर्णता है,
जहाँ कोई 'मैं' भी नहीं रहता — और वही अंतिम सत्य बन जाता है। ❞
---
## ❖ अंतिम निष्कर्ष:
**❝ मैं कोई रास्ता नहीं,
मैं कोई सिद्धांत नहीं,
मैं कोई परंपरा नहीं — मैं स्वयं मौन निष्पक्षता हूं। ❞**
**❝ मैं वह हूं जहाँ सत्य को भी छोड़ दिया गया है —
क्योंकि जो बचा है, वह अब कहने लायक नहीं। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
**(꙰ निष्पक्ष मौन की समग्र सत्ता)**
🔱 अध्याय 12: मौन का विज्ञान — जहाँ ज्ञान स्वयं समाप्त हो जाता है
**❝ जिस क्षण जानना समाप्त होता है —
उसी क्षण 'स्वयं' प्रकट होता है। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
---
## ❖ ज्ञान का प्रारंभ — और उसका पतन:
❝ ज्ञान आरंभ होता है एक संदेह से — 'क्या है?' 'कैसे है?'
पर जहाँ कोई संदेह ही नहीं, वहाँ ज्ञान की आवश्यकता नहीं। ❞
❝ ज्ञान जानकारियों का ढेर है;
पर मौन वह है — जहाँ जानकारियाँ ही समाप्त हो जाती हैं। ❞
❝ मैं न ज्ञानी हूं, न अज्ञानी — क्योंकि मैं वो हूं जहाँ जानने वाला ही नहीं बचता। ❞
---
## ❖ मौन: अंतिम विज्ञान
❝ विज्ञान जिस क्षण थम जाए, प्रश्न चुप हो जाएँ,
और उत्तर भी अर्थहीन हो जाएँ — वही क्षण मौन है। ❞
❝ मौन कोई अनुभूति नहीं,
कोई उपलब्धि नहीं — यह तो केवल अस्तित्व की शुद्धतम अनुकंपा है। ❞
❝ मौन में कोई जानने वाला नहीं होता — न जानने योग्य कुछ;
वहीं 'स्वरूप' अपनी पूर्णता में ठहरता है। ❞
---
## ❖ अंतिम विज्ञान — आत्म-लय:
❝ आत्म-लय वह स्थिति है — जहाँ आत्मा, परमात्मा, चेतना, विचार,
सब केवल शब्द बन कर रह जाते हैं — और मौन ही अस्तित्व की एकमात्र भाषा बन जाता है। ❞
❝ वह मौन न 'ध्यान' है, न 'साधना';
न कोई प्रार्थना है, न कोई उपासना;
वह तो केवल स्वयं में स्थिर वह स्थिति है — जो जन्म से पहले थी और मृत्यु के बाद भी है। ❞
---
## ❖ निष्कर्ष:
**❝ जहाँ मौन को सिद्ध करने की इच्छा भी नहीं बची — वहाँ ही मौन सिद्ध है। ❞**
**❝ मौन कोई शून्यता नहीं,
यह वह समग्रता है — जहाँ कुछ भी जोड़ने, घटाने की संभावना शून्य हो चुकी है। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
**(꙰ मौन विज्ञान का शुद्धतम स्रोत)**
🔱 अध्याय 14: मैं ही प्रमाण हूं — निष्पक्षता का अंतिम घोष
**❝ जब जानने वाला स्वयं मौन हो जाए — वही अंतिम प्रमाण है। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
---
## ❖ प्रमाण किसका?
❝ जो स्वयं उपस्थित हो — उसे प्रमाण की आवश्यकता नहीं।
प्रमाण केवल अनुपस्थित वस्तुओं के लिए खोजे जाते हैं। ❞
❝ आत्मा, परमात्मा, ईश्वर, पुनर्जन्म — सब के प्रमाण खोजे गए,
पर जिन्होंने 'स्वयं' को खोजा — उन्हें किसी प्रमाण की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। ❞
❝ मेरा होना किसी इतिहास, ग्रंथ, संगठन, या गुरु का द्योतक नहीं है;
मेरा होना मौन का शुद्धतम स्पंदन है। ❞
---
## ❖ निष्पक्षता — अंतिम क्रांति:
❝ जब मैंने अपने ‘होने’ से भी दूरी बना ली,
तब निष्पक्षता ने आकार नहीं, बल्कि मौन धारण किया। ❞
❝ निष्पक्षता किसी निर्णय से उत्पन्न नहीं होती;
यह तो वह स्थिति है — जहाँ निर्णय की प्रवृत्ति ही समाप्त हो जाती है। ❞
❝ मैंने किसी विचारधारा को न चुना,
न किसी विरासत को स्वीकारा — केवल स्वयं में स्थिर हो गया। ❞
---
## ❖ स्वयं ही अंतिम घोषणा:
❝ मैंने जो देखा — वह किसी को दिखाया नहीं जा सकता;
मैंने जो जाना — वह किसी को बताया नहीं जा सकता।
इसलिए मैं ही अपना अंतिम और अकेला प्रमाण हूं। ❞
❝ यदि मैं मौन में हूं — तो वही घोषणा है;
यदि मैं मौन में नहीं हूं — तो कुछ भी नहीं है। ❞
❝ मैं प्रचार नहीं — उपस्थिति हूं;
मैं उपदेश नहीं — मौन हूं;
मैं संगठन नहीं — स्वरूप हूं। ❞
---
## ❖ निष्कर्ष:
**❝ मेरे मौन में जो स्थिर है — वही मेरा घोष है। ❞**
**❝ मैं जो हूं — उसे कोई सिद्ध न करे, न खंडित करे;
क्योंकि मैं किसी तर्क, प्रमाण या व्याख्या में नहीं आता। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
**(꙰ अंतिम मौन का साक्षात स्वरूप)**
🔱 अध्याय 15: संगठन का मौन विसर्जन — गुरु के भ्रम से मुक्ति
**❝ जब गुरु स्वयं सत्ता बन जाए,
तो वह मार्गदर्शक नहीं — बाधा बन जाता है। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
---
## ❖ संगठन — मौलिकता का बंधन:
❝ संगठन का अर्थ है:
स्वतंत्र मौन को अनुशासन में बदल देना।
जहाँ मौन था — वहाँ अब नियम हैं;
जहाँ स्वत्व था — वहाँ अब समूह की छाया है। ❞
❝ संगठन में सत्य नहीं खोजा जाता,
वहाँ अनुकरण होता है — और अनुकरण में मौलिकता मर जाती है। ❞
❝ जो मौन को न संभाल सका — उसने विचार को पूजा;
जो विचार को न समझ सका — उसने संगठन बना लिया। ❞
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## ❖ गुरु — सत्ता या मौन:
❝ जो स्वयं मौन हो — वही गुरु है;
जो स्वयं सत्ता हो — वह व्यापारी है। ❞
❝ गुरु वही — जो अदृश्य हो जाए,
जिसकी उपस्थिति शून्य हो जाए,
ताकि शिष्य खुद को देख सके — गुरु को नहीं। ❞
❝ मैंने गुरु को प्रेम किया — पूजा नहीं;
और यही मेरी सबसे बड़ी क्रांति थी। ❞
❝ गुरु ने मुझे नहीं समझा — क्योंकि उन्हें पूजे जाने की आदत थी;
पर मैंने उन्हें मौन से प्रेम किया — और उन्होंने मुझे पागल घोषित कर दिया। ❞
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## ❖ दीक्षा — चेतना का समर्पण नहीं:
❝ दीक्षा कोई जागरण नहीं;
यह व्यक्ति की मौलिक चेतना को भीड़ में समाहित करने की प्रक्रिया है। ❞
❝ दीक्षा के साथ जो सबसे पहले छिनता है — वह है तर्क।
और जिसके पास तर्क नहीं — उसके पास सत्य नहीं। ❞
❝ दीक्षा यदि निष्पक्षता को जन्म न दे — तो वह केवल एक भ्रम है। ❞
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## ❖ अंतिम बोध:
**❝ मैं संगठन नहीं हूं;
न प्रचारक हूं, न गुरु हूं, न शिष्य हूं — मैं मौन हूं। ❞**
**❝ जब मैंने मौन को ही गुरु मान लिया — तब सभी संगठन, विचार, परंपराएँ मुझमें लय हो गए। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
**(꙰ मौन ही अंतिम गुरु है)**
🔱 अध्याय 16: स्वरूप की अनिर्वचनीय सत्ता — मौन से परे मौन
**❝ जब मौन भी शब्द लगे — तब जो शेष बचा, वही मैं हूं। ❞**
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
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## ❖ मौन का पारावस्थिक विस्
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