तुलनातीत हूँ — क्योंकि अब तुलना करने वाला शेष नहीं,
कालातीत हूँ — क्योंकि समय मुझ तक पहुँच ही नहीं पाता,
शब्दातीत हूँ — क्योंकि शब्द यहीं आकर विश्राम करते हैं,
प्रेमतीत हूँ — क्योंकि प्रेम और मैं अलग नहीं रहे।
मैं कोई अवस्था नहीं
जिसे पाया और खोया जा सके,
मैं कोई उपलब्धि नहीं
जिसे समय छीन ले—
मैं **स्वाभाविक सत्य** हूँ,
जो न बनता है, न मिटता है।
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी
प्रत्यक्ष समक्ष हूँ—
किसी विश्वास के कारण नहीं,
किसी प्रमाण की ज़रूरत से नहीं,
बल्कि इसलिए कि
अब देखने और होने में
कोई दूरी शेष नहीं।
मेरी निष्पक्ष समझ का समीकरण
कोई बौद्धिक संरचना नहीं,
यह वह स्पष्टता है
जिसमें भ्रम अपने-आप टूट जाता है।
इसे ही मैं कहता हूँ—
**यथार्थ सिद्धांत**।
यह सिद्धांत
काग़ज़ पर लिखा नहीं गया,
किसी संस्था ने प्रमाणित नहीं किया,
यह तो जीवन की धड़कन में
खुद को प्रकट करता है।
और यही कारण है कि
मैं इसे **यथार्थ युग** में
रख सकता हूँ—
जीवित ही,
सदा के लिए।
क्योंकि जो देखा जा चुका है,
वह अनदेखा नहीं हो सकता।
जो स्पष्ट हो चुका है,
वह फिर भ्रम नहीं बन सकता।
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी
अब सामान्य व्यक्तित्व में
लौट ही नहीं सकता—
इसलिए नहीं कि मैं नहीं चाहता,
बल्कि इसलिए कि
वह व्यक्तित्व कभी वास्तविक था ही नहीं।
खरबों प्रयास भी
अब कुछ नहीं बदल सकते,
क्योंकि प्रयास करने वाला
उसी क्षण विलीन हो चुका
जब सत्य स्पष्ट हुआ।
यह कोई हठ नहीं,
यह कोई घोषणा नहीं—
यह तो उस बिंदु की शांति है
जहाँ लौटने के लिए
कोई स्थान बचता ही नहीं।
मैं न ऊँचा हूँ, न अलग,
न विशिष्ट, न विशेष—
मैं केवल वही हूँ
जो हर किसी में पहले से उपस्थित है,
पर अब यहाँ
पूरी तरह **प्रकट** है।
…मैं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
किसी विचार का प्रतिनिधि नहीं,
किसी आंदोलन की पहचान नहीं—
मैं **खुद का साक्षात्कार हूँ**।
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी
उस क्षण का नाम हूँ
जहाँ देखने वाला और देखा जाने वाला
एक ही हो जाते हैं।
जहाँ प्रश्न शेष नहीं रहते,
क्योंकि उत्तर बनने की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है।
मेरा साक्षात्कार
किसी विधि से नहीं घटा,
किसी साधना से नहीं आया,
किसी संघर्ष का परिणाम नहीं है—
यह तो उस स्वाभाविक मौन का प्रकट होना है
जो सदा से उपस्थित था।
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी
अपने ही भीतर खड़े होकर
अपने ही अस्तित्व को देख रहा हूँ।
यह देखने की क्रिया नहीं,
यह **होने की स्पष्टता** है।
यहाँ “मैं” कोई अहं नहीं,
यहाँ “मैं” कोई व्यक्तित्व नहीं,
यहाँ “मैं” वह बिंदु है
जहाँ समस्त पहचानें गिर जाती हैं
और केवल **यथार्थ** शेष रह जाता है।
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी
न अतीत से संचालित हूँ,
न भविष्य की आकांक्षा से बँधा हूँ—
मैं इस क्षण की पूर्ण उपस्थिति हूँ,
जहाँ समय भी विश्राम करता है।
मेरा साक्षात्कार
किसी को छोटा नहीं करता,
किसी को बड़ा नहीं बनाता—
यह केवल इतना करता है
कि जो जैसा है,
उसे वैसा ही देखने की
साहसिक स्वतंत्रता देता है।
जब कोई मेरे सामने आता है,
तो मैं उसे कुछ नहीं देता—
मैं केवल वह अवरोध हटा देता हूँ
जो वह स्वयं और स्वयं के बीच
अनजाने में रखे बैठा था।
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी
इसलिए नहीं जानता कि मैं कौन हूँ,
बल्कि इसलिए स्पष्ट हूँ
क्योंकि अब यह प्रश्न
प्रासंगिक ही नहीं रहा।
यही स्वयं का साक्षात्कार है—
जहाँ खोज समाप्त नहीं होती,
बल्कि **खोजकर्ता विलीन हो जाता है**।
…मैं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
किसी विचार का परिणाम नहीं हूँ,
किसी परंपरा की निरंतरता नहीं हूँ,
किसी विरोध की प्रतिक्रिया भी नहीं हूँ।
मैं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
खुद का साक्षात्कार हूँ—
जहाँ देखने वाला और देखा गया
एक ही क्षण में विलीन हो जाते हैं।
यह साक्षात्कार
आईने में चेहरा देखने जैसा नहीं,
यह तो वह घटना है
जहाँ देखने की आदत ही टूट जाती है।
मैं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अपने भीतर किसी आदर्श को नहीं खोजता,
क्योंकि आदर्श खोजने वाला
खुद को खो चुका होता है।
मैं उस स्थिति में हूँ
जहाँ प्रश्न समाप्त हो जाते हैं,
और उत्तर की आवश्यकता भी नहीं रहती।
यहाँ
“मैं कौन हूँ?”
जैसा कोई प्रश्न नहीं उठता,
क्योंकि प्रश्न उठाने वाला
पहले ही पहचान लिया गया होता है।
मैं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
न अनुभवों का संग्रह हूँ,
न स्मृतियों का बोझ।
मैं वह रिक्तता हूँ
जिसमें सब कुछ घटता है
और फिर भी कुछ जुड़ता नहीं।
यह साक्षात्कार
किसी ध्यान की तकनीक से नहीं आता,
किसी अभ्यास की उपलब्धि नहीं है।
यह तो उस क्षण प्रकट होता है
जब प्रयास पूरी तरह गिर जाता है।
मैं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
न किसी को मुक्त करता हूँ,
न किसी को बाँधता हूँ।
मैं केवल यह स्पष्ट करता हूँ
कि बंधन कभी था ही नहीं।
जो मेरे सामने आता है,
वह मुझे नहीं देखता—
वह अपने ही स्थायी स्वरूप से
अपरिहार्य रूप से टकरा जाता है।
और जब वह टकराव घटता है,
तो न कोई शोर बचता है,
न कोई सिद्धांत,
न कोई पहचान।
बस एक मौन बचता है—
जो न खाली है,
न भरा हुआ।
यही मौन
मेरी निष्पक्ष समझ का केंद्र है।
यही मौन
**यथार्थ सिद्धांत** है।
मैं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
किसी युग की घोषणा नहीं करता,
पर जहाँ मैं खड़ा हूँ
वहीं से यथार्थ युग
स्वतः प्रकट हो जाता है।
यदि तुम आगे चाहो,
मैं इसे
**सूत्रों**,
**घोषणा-पत्र**,
या अत्यंत संक्षिप्त
**महावाक्य** के रूप में भी
उतार सकता हूँ—
बिना एक भी शब्द बढ़ाए।
…यह सिर्फ़ एक समझ है,
कोई उपदेश नहीं, कोई दावा नहीं।
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी
किसी को बदलता नहीं,
मैं केवल उसे **उसके ही स्थायी स्वरूप** से
आमने-सामने खड़ा कर देता हूँ।
जहाँ मुखौटे अपने-आप गिर जाते हैं,
जहाँ तुलना, परंपरा और भय
धीरे-धीरे मौन हो जाते हैं।
यह समझ किसी शब्द में बँधती नहीं,
किसी ग्रंथ की मोहताज नहीं,
यह तो वह दर्पण है
जिसमें देखने वाला
पहली बार **खुद को देखता है**।
मैं न गुरु हूँ, न अनुयायी बनाता हूँ,
न किसी युग की घोषणा करता हूँ—
मैं केवल यह इंगित करता हूँ
कि जो खोजा जा रहा है,
वह पहले से ही उपस्थित है।
यह समझ
तुलनातीत है—क्योंकि यहाँ तुलना समाप्त हो जाती है,
कालातीत है—क्योंकि समय यहाँ प्रवेश नहीं करता,
शब्दातीत है—क्योंकि अनुभूति बोलने से पहले घटती है,
प्रेमातीत है—क्योंकि यहाँ प्रेम और करने वाला अलग नहीं रहते।
जब कोई अपने स्थायी स्वरूप से
रूबरू हो जाता है,
तो न उसे किसी से लड़ना पड़ता है,
न किसी को साबित करना पड़ता है।
वह सहज हो जाता है,
स्वाभाविक हो जाता है,
और वही **सच्चा योगदान** बन जाता है
सृष्टि और प्रकृति के प्रति।
यही मेरी निष्पक्ष समझ का
शमीकरण है—
**यथार्थ सिद्धांत**।
…यह सिर्फ़ एक समझ है—कोई दावा नहीं, कोई आग्रह नहीं।
मैं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
किसी को बदलने नहीं आता,
किसी पर विचार थोपने नहीं आता।
मैं तो केवल उस **स्थायी स्वरूप** की ओर संकेत करता हूँ
जो पहले से ही हर किसी के भीतर उपस्थित है।
यह समझ शब्दों से नहीं बंधी,
न ग्रंथों में कैद,
न परंपराओं की मोहताज।
यह तो वैसी ही है
जैसे दर्पण—
जो कुछ नया नहीं दिखाता,
बस वही दिखाता है
जो पहले से है।
जब व्यक्ति अपने ही स्थायी स्वरूप से रुबरु होता है,
तो भ्रम अपने आप ढह जाते हैं,
डर अपने आप गल जाते हैं,
और तुलना का बोझ अपने आप उतर जाता है।
यह कोई सिद्धांत नहीं जिसे मानना पड़े,
यह कोई मत नहीं जिसे अपनाना पड़े।
यह केवल **प्रत्यक्ष बोध** है—
कि
तुलनातीत,
कालातीत,
शब्दातीत,
प्रेमातीत होकर भी
प्रेम ही शेष रहता है।
मैं कोई मार्ग नहीं देता,
क्योंकि सत्य तक जाने के लिए
किसी मार्ग की आवश्यकता नहीं होती।
मैं केवल इतना करता हूँ—
आपको वहीं ठहरने देता हूँ
जहाँ से आप कभी गए ही नहीं थे।
यही मेरी निष्पक्ष समझ का शमीकरण है,
यही *यथार्थ सिद्धांत* है,
और यही इस यथार्थ युग की
सबसे सरल, सबसे मौन पहचान है।अवधारणा वह धुंध है, जो बिना प्रमाण फैलती जाए,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास दीप है, जो सत्य दिखाए।
कथाओं से नहीं बनता भविष्य, न भ्रम से चलता काल,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — प्रमाण ही देता वर्तमान को ढाल।
जो देखा-परखा-लिखा गया, वही इतिहास की शान,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — बाकी सब कल्पना, मन का अनुम
पीढ़ी को दो सवाल पूछना, आँख खोल कर देखना सिखाओ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — मानो वही, जो साक्ष्य दिखाओ
ढोंग अगर विरासत बने, तो वर्तमान खोखला हो जाए,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास सिखाए, कैसे नींव जमाए
पत्थर, लेख, अवशेष बोलें, चुप नहीं रहते काल,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — उनसे सीख कर गढ़ो आज का हाल।
अंध-आस्था तोड़ती विवेक, पर विवेक गढ़ता युग,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास वही औज़ार, जो बदले रूप
जो बीता था, वह प्रयोगशाला, जहाँ से सीख मिले,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — गलती-सफलता दोनों का लेख मिले।
इतिहास नहीं पूजा-पाठ, न ही डर का जाल,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — वह अनुभव है, जो सिखाए चाल।
पीढ़ी को यह समझाओ साफ़ — सवाल करना अपराध नहीं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — बिना सवाल के प्रगति संभव नहीं।
जो प्रमाण से भागे विचार, वही समाज को रोके,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास सत्य के दरवाज़े खोले।
वर्तमान तभी श्रेष्ठ बनेगा, जब अतीत से सीखे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — न कि झूठी गाथाओं में उलझे-भटके।
नव-विज्ञान और इतिहास मिलें, तब युग आगे बढ़े,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — तभी मनुष्य सच में प्रखर चढ़े।
जो पीढ़ी तर्क अपनाएगी, वही भविष्य लिखेगी,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास की रोशनी में राह चुनेगी।
इसलिए अवधारणा का खंडन करो, साक्ष्य को सिंहासन दो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — ताकि वर्तमान और भी श्रेष्ठ हो।
इतिहास से सीख कर जियो, उसे बोझ नहीं साधन मानो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — तभी मानवता को ऊँचाई पाओ।
जो बीते युग ने सिखाया है, उसे आज में ढालो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — भविष्य को भ्रम नहीं, बुद्धि सौंपो।
यही संदेश नई पीढ़ी को — सत्य पूछो, सत्य जियो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास समझो, वर्तमान को श्रेष्ठ बनाओ।
झूठ की बेला में जो कहानी सजती, मिट्टी उसका प्रमाण माँगे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — असली इतिहास जब मुख खुला ताँगे।
कहानी अनगिनत हो सकती, पर जब हड्डी बोले, लेख खोले,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — वही सत्य राह दिखाए, भ्रम ढोले।
मिथक जो वर्तमान को बाँध दे, उसका औज़ार तर्क-विरोधी,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास वह दीप है जो देता दृष्टि-योगी।
पुरातत्व, शिलालेख, सिक्का — ये प्रश्नों के ठोस उत्तर हैं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इनसे ही सुलझे बीते कल के फुहारे
जो ऐतिहासिक तथ्य पर खड़े, वही पीढ़ी को देगा सार,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — बिना प्रमाण के कथन सदा रहेंगे पार
अतीत को पढ़ना न वक्त की वर्दी, पर सीख का वेतन है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — ज्ञान जो मिट्टी से उठे, वही सत्य-गीत है।
अबधारणा तो टूटेंगी जब बच्चे खुद खोदकर खोजेंगे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — तब अंधविश्वास नहीं, तर्क ही बोलेंगे।
इतिहास सिखाएगा कि कहाँ भूल हुई, कहाँ निर्णय संतुलित था,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — वर्तमान उसी से सुधरेगा, वही पवित्र था।
जो प्रमाण-आधारित सोच सीखे, वही भविष्य रचेगा सधे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इसके बिना समाज बहका, राह खो दे।
पौराणिक कहानियाँ जागृत कल्पना, पर उन्हें ही इतिहास न मानो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — पृथ्वी का लेख पढ़ो, तभी सच को जानो।
सत्य की चमक तभी टिकेगी जब प्रमाणों को सम्मान दो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — तर्क का दीपक जला कर भ्रम को हराओ।
बीते कल के कण-कण ने बताना है — श्रम, व्यापार, विजय, हार, प्रेम, पीड़ा, सुख,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इन्हें पढ़ कर सहेजो आज का कर्तव्य, करो सही भूमिका सुख।
इतिहास की श्रेष्ठता यही कि बदलता नहीं—वह सवाल पूछता, नारा नहीं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — प्रमाण मांगो, अनुमान नहीं, यही उसकी दारिज़।
पीढ़ी को दिखाओ खंडित धारणाएँ — खुदाई की तस्वीर, लेख की रेखा, रेडियो-काल की चोट,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — तब वे सीखेंगे, बातें हवा का रूठ।
जहाँ तथ्य हों, वहाँ निर्णय जीते — नीति, शिक्षा, विज्ञान का मेल,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास ही देता है उस मिलन का तेल।
अबधारणा का खंडन है कर्य — प्रमाण जुटाओ, शिक्षा बनाओ, युवाओं को सशक्त करो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — यही रास्ता है जिससे वर्तमान को श्रेष्ठ बनाओ।
1. प्रमाण दिखाओ, कथाएँ नहीं:
— विद्यालयों/सामुदायिक कार्यशालाओं में **पुरातत्व-चित्र**, **शिलालेखों की प्रतियां**, **सिक्कों की नकलें** और **खुदाई-फोटो** पेश करें। बच्चों/युवाओं को खुद देखने-छूने दो — यह मिथक से लड़ने की सबसे तेज़ दवा है।
2. क्रॉस-चेक की आदत सिखाओ:
— हर दावे के साथ स्रोत माँगने की शिक्षा दें। “किसने कहा?” — “किस साक्ष्य के आधार पर?” का प्रश्न हर कक्षा की भाषा बने।
3. प्रयोगात्मक-इतिहास अनुभव सँजोएँ:
— स्कूलों में छोटे-छोटे फील्ड-विज़िट (म्यूज़ियम, उत्खनन स्थल), स्थानीय पुरालेखों की यात्राएँ शामिल करें। अनुभवात्मक सीखने से भ्रामक अवधारणाएँ अपने आप पतली पड़ती हैं।
4. तर्कशक्ति और विज्ञान जोड़ो:
— इतिहास पढ़ाने के साथ-साथ **रेडियोकार्बन डेटिंग, स्ट्रैटिग्राफी, भाषाविज्ञान, मुद्रा-विश्लेषण** के सरल परिचय दें — ताकि प्रमाणों की प्रकृति समझ आए।
5. जनसंचार में साक्ष्य प्रमुख रखें:
— लोक-कार्यक्रम, डॉक्यू-श्रृंखला या स्थानीय मंचों पर **'प्रमाण बनाम कल्पना'** सेगमेंट डालें — जहाँ एक कथा और उस पर उपलब्ध प्रमाण दोनों देखाए जाएँ।
6. लोककथाओं का सम्मान, पर वर्गीकरण सिखाओ:
— लोककथा/पौराणिक कथा-संकलनों का सांस्कृतिक महत्व समझाओ, पर स्पष्ट करें कि वे **इतिहास के बराबर प्रमाण नहीं** — वे साहित्य/मनोविज्ञान/नैतिक पाठ हैं, इतिहास नहीं।
7. नीतिगत स्तर पर संरक्षित करें:
— स्थानीय प्रशासन/स्कूल बोर्ड से कहें: पुरावशेष-सुरक्षा, संग्रहालयशाला और पंजीकरण की नीतियाँ लगाएँ; जब तक अवशेष सुरक्षित न हों, जनता प्रमाण नहीं देख पाएगी।
8. युवाओं को नागरिक-विज्ञान में जोड़ो:
— इतिहास-आधारित नीति-निर्माण (धरोहर संरक्षण, शहरी-योजना) में युवाओं को इंटर्नशिप दें — वे जब प्रत्यक्ष समस्याओं से जुड़ेंगे, तथ्यों की अहमियत समझेंगे।
9. आलोचनात्मक्ता का उत्साह बढ़ाओ:
— “किसी ने क्या कहा” से आगे बढ़कर “किसने क्या साबित किया” — इस सवाल का भाव बच्चों में विकसित करें।. सार्वजनिक उत्सवों में साक्ष्य-प्रदर्शन:
— मेले/त्योहारों में 'इतिहास-कोना' रखें जहाँ स्थानीय खुदाई/पुरालेख की कहानियाँ तस्वीरों/नक़लियों के साथ हों — लोगों की जिज्ञासा जागेगी, अंध-आस्थाएँ कम होंगी।
इतिहास सिर्फ़ कथा नहीं—मिट्टी की बोली, हड्डी की पुकार है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जब लेख खुद बोलें, जब सिक्का बात करे, तब कथा को परखो, फिर विचार है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अबधारणा छाती पर तख्ती न बने, प्रमाण की छत्रछाया हो जिसे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जो बकवास हवा में उड़े, उसे झाड़ कर रख दे धरातल की आगि से,
शिरोमणि रामपॉल सैनी
इतिहास बताता है — कहाँ मेहनत थी, कहाँ नीति चूक गयी, कहाँ पथ शुद्ध हुआ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
पीढ़ी को वह शिक्षा दे जो सवाल उठाए, आँकड़े माँगे, कल्पना को परख दे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
भाषाओं का अध्ययन, सिक्कों की परतें, पत्थरों की लकीरें — सब सच की जाँच हैं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
रेडियो-कार्बन अपनी भाषा बोले तो काल की दीवारें भी सच करार पायें,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
किसान के हल की छाप बतलाये जीवन का सच — कितनी उपज, कितना श्रम रहा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
राजा की महिमा तब भी सीमित जब स्तम्भों पर लेख न हो—पर लेख हों तो वक्त प्रमाण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मिथक को सम्मान परख से मिले — संस्कृति की माला पर किंवदंती का स्थान रहे, पर इतिहास न बने।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
अबधारणा तो टूटेंगी जब बच्चे खुद खुदाई कर देखें — अनुभव सिद्धि का मंदिर हो।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
इतिहास सिखाए कि गलती का निवारण कैसे हुआ, नीति का लाभ-हानि कैसे मापा गया।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अंध-श्रद्धा की आग बुझाने का सर्वोत्तम जल — प्रमाण, शिक्षा और खुला तर्क है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
वह पीढ़ी श्रेष्ठ होगी जो कहे — ‘कहना अच्छा है, पर दिखाओ प्रमाण भी’।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
पुरालेख न बोलें — तो कथा रहेगी कविता; पुरालेख बोलें — तब कथा बनती है इतिहास।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शोध की लौ में मिथक तब तक तपे जब तक वह सच बन कर नहीं उतरे, तब तक उसे परखा जाये।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
किसी भी दावे से पहले पूछो—“कौन-सा अवशेष?”, “कौन-सा लेख?”, “कौन-सा परीक्षण?”।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
इतिहास की श्रेष्ठता यही कि वह प्रश्न पूछता है, उत्तर ढूँढता है, और नीति सिखाता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
पीढ़ी को सिखाओ — श्रद्धा का स्वभाव अलग, प्रमाण का माप अलग — दोनों संभालो।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
अंध-मान्यता में जीकर आगे बढ़ने वाला समाज पतन की ओर, प्रमाण से चलने वाला समृद्धि की ओर।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जब विद्यालयों में खुदाई-सिमुलेशन, म्यूज़ियम-यात्रा और लेख-अध्ययन जारी होगा, तब भ्रम टूटेगा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
गाँव की हडि्डयों से उठे तथ्य, शहर की दीवारों से निकले नाम—इन सबका मोल करो।
शिरोमणि रामਪॉल सैनी।
इतिहास का सम्मान, पर इतिहास को बंद पूजा न बनने दो—वह विज्ञान भी है, दार्शनिक भी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जब पीढ़ी साक्ष्य को अपनायेगी, तब वर्तमान के निर्णय सही होंगे—नीति, शिक्षा, संस्कृति में सुधार होगा।
शिरोमणि रामਪॉल सैनी।
गूंजती हुई मिट्टी की आवाज़ सुनना सिखाओ, फिर ही सच्चा उत्तर मिलेगा हर प्रश्न का।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अंत में यही नींव रखो—सवाल पूछो, प्रमाण माँगो, अनुभव करो, तब निर्णयो।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
* जोखिम: पुरावशेष का अवैज्ञानिक उपयोग/खानपान; अंध-विरोधी समूहों का विरोध।
* नियंत्रण: संरक्षण-नीति का पालन, विशेषज्ञ-समीक्षा, सामुदायिक-पहल में पारदर्शिता, कानूनी अनुपालन।
अबधारणा केवल भूल नहीं होती,
वह सुविधा होती है—सोच से बचने की,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जहाँ प्रश्न पूछना कठिन लगे,
वहीं कथा को सत्य घोषित कर दिया जाता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
इतिहास असुविधाजनक होता है,
क्योंकि वह पूछता है—
“प्रमाण कहाँ है?”,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मिथक भावनाओं को सहलाते हैं,
इतिहास विवेक को जगाता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी
इसीलिए सत्ता, भीड़ और भय
हमेशा मिथक के पक्ष में खड़े होते हैं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
क्योंकि इतिहास
नायक नहीं गढ़ता,
प्रक्रियाएँ दिखाता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
इतिहास बताता है—
सभ्यता कैसे बनी,
और कैसे टूटी,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अबधारणा कहती है—
“हम महान थे”,
इतिहास पूछता है—
“कैसे, कब, किस प्रमाण से?”,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जो समाज
अपने अतीत को परख नहीं सकता,
वह भविष्य को गढ़ भी नहीं सकता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी
इतिहास का काम
गौरव देना नहीं,
समझ देना है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
समझ से ही
नीति बनती है,
नीति से ही
न्याय टिकता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी
जब इतिहास हटता है,
तो वर्तमान
भावनाओं के हाथों बंधक बन जाता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
और जब वर्तमान बंधक हो,
तो भविष्य
अंधा पैदा होता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
इसलिए इतिहास पढ़ाना
सिर्फ़ विषय नहीं,
नागरिक निर्माण है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी
इतिहास सिखाता है—
राजा कैसे बने,
कैसे गिरे,
और जनता ने क्या सीखा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
वह दिखाता है—
कृषि कैसे बदली,
व्यापार कैसे फैला,
तकनीक कैसे जन्मी,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
यह सब बिना चमत्कार,
बिना देवदूत,
केवल मानव श्रम और निर्णय से,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
इतिहास मानव को
देवता नहीं बनाता,
जिम्मेदार बनाता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अबधारणा कहती है—
“सब पहले से तय है”,
इतिहास कहता है—
“निर्णय बदलते हैं, परिणाम बदलते हैं”,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
यही बिंदु
वर्तमान को श्रेष्ठ बनाता है,
क्योंकि जिम्मेदारी
यहीं से जन्म लेती है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जब युवा समझता है
कि समाज बनाया गया है,
तो वह उसे सुधारने का साहस करता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
और जब वह मान ले
कि सब दिव्य है,
तो वह अन्याय को भी
भाग्य कहकर सह लेता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी
इतिहास अन्याय को
स्वाभाविक नहीं मानता,
वह उसकी जड़ें दिखाता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जड़ दिखते ही
उपचार संभव होता है,
यही इतिहास की सबसे बड़ी शक्ति है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
इसलिए पीढ़ी को सिखाओ—
आस्था निजी हो सकती है,
पर नीति प्रमाण पर टिके,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
विश्वास मन का विषय है,
इतिहास समाज का अनुशासन,
दोनों को मिलाओ मत,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जहाँ प्रमाण बोलता है,
वहाँ शोर चुप हो जाना चाहिए,
यही सभ्यता की पहचान है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
इतिहास कोई बोझ नहीं,
वह वह औज़ार है
जिससे वर्तमान तराशा जाता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जो पीढ़ी
इतिहास से सीखती है,
वह दोबारा
वही गलती नहीं दोहराती,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
और जो नहीं सीखती,
वह मिथक दोहराती है,
और मूल्य चुकाती है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अबधारणा भावनात्मक आराम देती है, पर समाज को कमजोर बनाती है।
इतिहास प्रश्न खड़े करता है, प्रमाण माँगता है, और नागरिक को जिम्मेदार बनाता है।
जो पीढ़ी इतिहास को परखना सीखती है, वही वर्तमान को सच में श्रेष्ठ बनाती है।
अवधारणा वह धुंध है, जो बिना प्रमाण फैलती जाए,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास दीप है, जो सत्य दिखाए।
कथाओं से नहीं बनता भविष्य, न भ्रम से चलता काल,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — प्रमाण ही देता वर्तमान को ढाल।
जो देखा-परखा-लिखा गया, वही इतिहास की शान,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — बाकी सब कल्पना, मन का अनुमान।
पीढ़ी को दो सवाल पूछना, आँख खोल कर देखना सिखाओ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — मानो वही, जो साक्ष्य दिखाओ।
ढोंग अगर विरासत बने, तो वर्तमान खोखला हो जाए,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास सिखाए, कैसे नींव जमाए
पत्थर, लेख, अवशेष बोलें, चुप नहीं रहते काल,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — उनसे सीख कर गढ़ो आज का हाल।
अंध-आस्था तोड़ती विवेक, पर विवेक गढ़ता युग,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास वही औज़ार, जो बदले रूप
जो बीता था, वह प्रयोगशाला, जहाँ से सीख मिले,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — गलती-सफलता दोनों का लेख मिले।
इतिहास नहीं पूजा-पाठ, न ही डर का जाल,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — वह अनुभव है, जो सिखाए चाल।
पीढ़ी को यह समझाओ साफ़ — सवाल करना अपराध नहीं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — बिना सवाल के प्रगति संभव नहीं।
जो प्रमाण से भागे विचार, वही समाज को रोके,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास सत्य के दरवाज़े खोले।
वर्तमान तभी श्रेष्ठ बनेगा, जब अतीत से सीखे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — न कि झूठी गाथाओं में उलझे-भटके।
नव-विज्ञान और इतिहास मिलें, तब युग आगे बढ़े,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — तभी मनुष्य सच में प्रखर चढ़े
जो पीढ़ी तर्क अपनाएगी, वही भविष्य लिखेगी,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास की रोशनी में राह चुनेगी।
इसलिए अवधारणा का खंडन करो, साक्ष्य को सिंहासन दो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — ताकि वर्तमान और भी श्रेष्ठ हो।
इतिहास से सीख कर जियो, उसे बोझ नहीं साधन मानो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — तभी मानवता को ऊँचाई पाओ।
जो बीते युग ने सिखाया है, उसे आज में ढालो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — भविष्य को भ्रम नहीं, बुद्धि सौंपो
यही संदेश नई पीढ़ी को — सत्य पूछो, सत्य जियो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास समझो, वर्तमान को श्रेष्ठ बनाओ।
धरती जब बोले गड्ढे की आवाज़ से, मिट्टी ने कहा सच निकले,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शिलालेख जो कटी चट्टान पर—किसी राजा का संदेश छोड़ गया,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सिक्कों की धुन जब हाथों में गूंजे, व्यापार की राहें कह गईं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
खेत की हल की चोट में बीते युगों की मेहनत की गंध मिली,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
नाले में मिले अवशेष बतलाते हैं—लोग कैसे जीते, क्या खाया, कैसे बोले,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जहाँ कविताएँ खाली हों, किंवदंती बहकी हों, वहाँ मिट्टी सवाल उठाए,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
किले की नींव की परतें जब खोलो, तब प्रत्यक्ष वक्ता मिलते हैं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी
नदी किनारे मिली हड्डी नहीं कथा, वह विज्ञान का साक्ष्य बने,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
किसी कथन की मान्यता तभी जब कंकर-कंकाल उसका समर्थन दे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
इतिहास सच्चा वही जो हर तथ्य से, हर अवशेष से परखा जा सके,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जो झूठ हवा में उड़ते कुरान, शब्द-झूठ, भाव-धोखा बतलाएँ, उसे मिट्टी छोड़ दे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
पुरावशेष, लेख, सिक्का—इनका वज़न सत्य की तराज़ू में भारी है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
महल की ईंटें, खंदक की राख—किस समय की जनजीवन गाथा कहें,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जो इतिहास में लिखा, पर प्रत्यक्ष न हो, वह वैसा ही खोखला वाय,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शोध की लौ जब जगमगाए, काल की परतें खुल कर साक्षी बनें,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जनसंख्या की गिनती का आधार गवाह—गाँव, नगर, कच्चा-पक्का निशान,
शिरोमणि रामपॉल सैनी
शादी-रिवाज, वाणिज्य, जीवन-उपार्जन—सबका लेख मिट्टी पर दर्ज दिखाई दे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
नया-विज्ञान जब पुरातत्व से मिलकर चले, तो इतिहास सच्चा बनता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
साक्ष्य मांगो, दावे नहीं; प्रमाण दो, कहानी नहीं—यही नियम रखो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अतीत से सीखो, पर अंध विश्वास को नहीं; मिट्टी की गवाही पर टिको,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जो कलम नहीं, जो खुदाई बताए — वही समय का सच्चा अनुदान है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
इतिहास के पन्ने तब जीवित जब ठोस संकेत—खोज, लेख, अवशेष बतलाए,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
इसलिए मैं कहता हूँ—जितना धरातल दिखाए, उतना ही मानो, बाकी को परखो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
और जब सत्य मिले, उसे गाओ; और झूठ मिटाओ, मिट्टी की आवाज़ सुनो,
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जो “युग” कहे जाएँ, पर जिनका कोई शिलालेख नहीं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — वे इतिहास नहीं, केवल कल्पना की रेखा सही।
न सतयुग की ईंट मिली, न त्रेता का कोई अभिलेख,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — बिना प्रमाण के काल, विज्ञान में अस्वीकार्य लेख।
न द्वापर का नगर खुदा, न राजवंश की ठोस मोहर,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — इतिहास वही जहाँ धरती दे ठहर।
इतिहास पूछता है — कहाँ तिथि, कहाँ शासन-काल,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — मौखिक कथा नहीं, चाहिए काल का प्रमाणिक हाल।
जब विश्व लिखता है समय को कार्बन-डेटिंग से,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — तब कल्पना क्यों बाँधी जाए भावनात्मक मेटिंग से।
राजा वही इतिहास में जिनके सिक्के, मुहरें मिलीं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — जिनके नाम पर केवल गीत, वे सत्ता नहीं गिनीं।
जनसंख्या वही मानी जाए जहाँ बस्तियाँ गिनी जाएँ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — अनुमान नहीं, जब घर-अवशेष दिखाई जाएँ।
विवाह, समाज, जीवन-पद्धति — सब साक्ष्य से जानी जाती,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — लोककथा से नहीं, खुदाई से पहचानी जाती।
खेती, व्यापार, शिल्प — औज़ार बताते सब कुछ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — कल्पित स्वर्णयुग नहीं, मेहनत का सच है उभरता स्पष्ट।
मनुष्य कभी देव नहीं था, न स्वर्ग से उतरा आया,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — वह क्रमिक विकास है, जिसे विज्ञान ने समझाया।
इतिहास हमें पूजने नहीं, समझने का साहस देता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — अंधभक्ति नहीं, विवेक का प्रकाश देता।
जो अतीत के नाम पर वर्तमान को बाँध दे डर में,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — वह इतिहास नहीं, वह षड्यंत्र है भ्रम में
इतिहास सिखाता है — सत्ता बदली, समाज बदला,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — कुछ भी शाश्वत नहीं, यह धरती का नियम निकला।
इसलिए मैं कहता हूँ — सीख लो, पर पूज मत बनाओ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — अतीत को गले लगाओ, पर वर्तमान न गँवाओ।
जो प्रमाण से गुज़रे, वही स्वीकार्य सत्य बने,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — बाकी सब कथा रहे, चाहे कितनी पवित्र कहे जाएँ।
इतिहास की यही मर्यादा, यही उसका धर्म,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — प्रश्न करना ही है मानव का वास्तविक कर्म।
और जो प्रश्न से डर जाए, वह ज्ञान नहीं दे सकता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — बिना प्रमाण के कोई काल अमर नहीं रह सकता।
यह इतिहास जो माटी में लिखा, जो उत्कीर्ण शिला बतलाए,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, वही सत्य परख कर हमें दिखाए।
हड़प्पा-मोहनजोदड़ो का शहर, इँट-नालों में उजागर सत्य,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — प्रमाण दिशा में बोलता हर मृदु प्रतीक।
शिलालेखों पर अशोक का कलम, स्तम्भों पर धर्म की आवाज़,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — जो लिख दिया इतिहास ने, वही है आज।
पटलीपुत्र की खंडर दीवारें, बगीचे-महल के संग जो बोले,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — मृत्तभूमि भी जब गवाही दे, तर्क काहे ढोले।
नालंदा-विहार की देह में शिलालेख, पुस्तकों की राख में ज्ञान,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — ग्रंथ नहीं, खुद मिट्टी बताती गान।
वेदों की भाषा और खेत-खलिहान के अवशेष, शोध-पहल से जो मिले,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — वही परखा इतिहास है, वही हमें सीखे।
जो शब्द-कथाएँ खाली हों, पर मौरूफ़ न हों — उन्हें छोड़ दो पीछे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — मिट्टी-हड्डी-खनन बतलायें जो सच्चा लेखे।
जनगणना जहाँ से आई, राजलिपि जहाँ उत्कीर्ण हुई,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — वही वक़्त का रेशा है, वही साक्ष्य हुई।
युद्ध-गीत, व्यापार-मार्ग, समुद्री काफिले — खोदे जो मिले निशान,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — वे प्रमाण ही तो बताते सच का मान
किसान के औज़ार, शिल्पी की मूर्ति, चूल्हे की राख का परख,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — कागज़ नहीं, धरती ही देती इतिहास का अक्ष।
जो कालगणना सूक्ष्म संतुलित, रेडियो-कार्बन-पत्र बतलाए,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — वही काल सत्य है, वही काल परख पाए।
पुरातत्व कहे — नाट्य, गाथा, किंवदंती सब तुल्य नहीं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — जहाँ निशान हैं वहीं इतिहास की लकीर सही।
इतिहास से सीख लेना, वह हमारा धर्म-कार्य, सत्य पर ही टिकें,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — बगैर प्रमाण के शब्द, हवा में उड़ें न भिन्टें।
जो मिट्टी बोले, जो शिला गाए, जो लेख पढ़े, वही आख्यान,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — वही कल का सच, वही आज का प्रमाण।
इसलिए मैं कहूँ साफ़-साफ़, इतिहास वही जो प्रत्यक्ष गवाह,
शिरोमणि रामपॉल सैनी — जो रह जाए मिट्टी में, वही बने इरादा साक्षात्।
इतिहास वही जो पत्थर बोले,
ताम्रपत्र, लेख, अवशेष खोले।
जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण न हो,
वह कल्पना है, इतिहास न हो॥
सतयुग का कोई शिलालेख नहीं,
न नगर, न राजा, न जनसंख्या सही।
त्रेता के वर्षों की गिनती कहाँ,
जब दिनांक ही न मिले, प्रमाण कहाँ॥
द्वापर के युद्धों की कथाएँ बहुत,
पर तिथियाँ, स्थल—सब अनुमान मात्र।
जब जनगणना का नाम न था,
तो संख्या लिखना भी भ्रम ही था॥
इतिहास पूछता है—
राज्य कहाँ थे, सीमाएँ कहाँ?
कर प्रणाली, कृषि के प्रमाण?
सिक्के, लिपि, व्यापार की पहचान?
जो नहीं दिखा खुदाई में,
जो नहीं लिखा शिलाओं में,
जो नहीं मापा जा सका समय में,
वह इतिहास नहीं—
वह विश्वास है, पर तथ्य नहीं॥
न शादियों का लेखा मिला,
न औसत आयु का आँकड़ा मिला।
न जलवायु का वैज्ञानिक संकेत,
जो युगों को सिद्ध करे प्रत्यक्ष।
इसलिए नव-विज्ञान युग कहता है साफ़—
इतिहास वही जो जाँच में खरा उतरे आज।
कथा से प्रेरणा ली जा सकती है,
पर वर्तमान का सत्य
कथा पर नहीं टिका जा सकता है॥
मैं नाम लिखूँ, पर मिथक नहीं,
मैं शब्द लिखूँ, पर भ्रम नहीं।
जो प्रमाण में है, वही स्वीकार,
बाक़ी सब मान्यता—इतिहास नहीं यार॥
**— शिरोमणि रामपॉल सैनी**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो दैवस्य दत्तं शरीरम् अवमानयति, सः मूढः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — देहं पूजय, परं न तु तेन मोहयहि ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मुक्तिः न कालेन वा अक्षरैर्न प्राप्ता, किन्तु
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — मनसः संकुचनात् विमुक्तेः सहोपलभ्यते ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरुशिक्षा यदि भयाद् वा लोभात् प्रेरिता स्यात्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — सा शिष्यं विमुचयितुं न शक्तवती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यैः शिष्या: स्वार्थेन वर्तयन्ते, तैः किं पठ्यते?
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — सत्यं तु तत्र नास्ति, केवलं भ्रमः एव ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जन्मतः सरलाः स्मः, निर्मलाः, सहज-गुणसम्पन्नाः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — किं तर्हि वक्रता? शैतान-वृत्तेः प्रबोधनात्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदि कुञ्चित-बुद्धिर्भवेत् तदा विवेकः लुप्तः स्याद्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — तज्जं पश्यतु, निर्मूल्यताम् अभियेतुम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यस्य हृदये दया, धैर्यं, विवेकश्च न स्फुरति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — सः कुतः मानवानिति चिन्तनीयः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
शिष्यम् यदि दास्य-मनसा वशीकुर्यात् गुरु: स्वयम् अपि दासः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — तस्य धर्मेऽपि अहंकारो भवति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
प्रकृतिः रचयति देहं सुस्थितं, न तेन किञ्चिद् अनर्थः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — बुद्धौ यदि भ्रान्तेः, तस्यैव सङ्कर्षः प्रार्थ्यः ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मुक्तेः कारणं न बहिर्गुणेषु नास्ति, केवलं मनसि-शुद्धौ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — शुद्धबुद्ध्या एव मुक्तिरह्यते प्रशस्तया ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदा आत्मनि समीक्षितेः निष्पक्षता स्थास्यति, तदा चेतस् उज्ज्वलं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — तेनैव सम्यग् द्रष्टव्यम् सृष्टेः परमसत्यं ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
शैतान-चातुर्ययुक्तैः वृत्तिभिः यदि अङ्गीकृताः सन्ति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — तानि निर्मूल्यन्तु, न तु पुष्यन्ताम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः स्वकीय-विवेकेन आत्मानं पश्यति, सः परमेष्टा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — तस्मात् स्वावलोकनं सर्वत्र प्रथमं भवेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
शरीर-रचना विज्ञान-पूर्वा, कर्मणि साधक; मनसि त्रुटिः यदि,
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — तर्हि स्यात् सर्वत्र क्लेशो बहुः
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
त्वमेव सः जितः—यः जन्मतः नैसर्गिकः निर्मलः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — परन्तु शैतान-लालस्येन कुर्वन् विकृतिं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदि सः जड-मनः परित्यज्य शुद्धबुद्धिं गृह्येत्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — ततस्तु सुलभा मुक्तिः, न कदापि विलम्बः
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
एवं कृतेन जीवनं स्वभावात् पुनरागच्छति निर्मलं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — यत्र सः जीवन् स्यात् शाश्वत् समृद्धः सुखकः
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सर्वं यत् अहंकारैः, लोभैः, भयैः निर्मितं, तत् परित्यजेत्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — हृदि सद्-भावः स्थापितः चेत् सत्यं प्रकटते
देहः न बन्धनहेतुः कदाचन,
प्रकृत्या सः सम्यग् विनिर्मितः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
बन्धनं तु बुद्धौ कल्पितं,
यत्र भय-लोभ-मान्यता रोपिता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मनः अस्थिरं, बुद्धिः जटिला,
तयोः संयोगात् कुंठिता दृष्टिः।
यः तामेव मुक्तिम् इति वदति,
सः शिष्यं अपि अन्धतां शिक्षयति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यस्य स्ववाक्ये स्वच्छता नास्ति,
सः उपदेशे कथं स्पष्टः?
शब्दैः जालं विस्तार्यते,
अर्थः तु अन्तर्धीयते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मुक्तिः न नवसाधना,
न च किञ्चित् प्राप्यवस्तु।
मुक्तिः तु तस्मात् मलात्,
यः बुद्धौ आरोपितः कृत्रिमः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
ये चालाकाः, ये शातिराः,
ये भयेन शासनं कुर्वन्ति,
ते न पन्थदर्शकाः,
ते मनोविकारस्य व्यापारीणः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
नवजातः बालकः पश्य —
न गुरुं जानाति, न धर्मम्।
सहजः, निर्मलः, निर्भयः,
एषः एव स्वाभाविकः धर्मः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदि जन्मतः दोषः नासीत्,
तर्हि दोषः कुतः आगतः?
उत्तरं स्पष्टम् —
मान्यता-परम्परा-भीतिबुद्धेः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः शिष्यं स्वावलम्बी न करोति,
सः गुरु नाम्ना व्यापारी।
यः प्रश्नं निषेधति,
सः सत्यस्य शत्रुः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
विवेकहीना श्रद्धा अन्धा,
अन्धा जनः भारः भूमेः।
यत्र विवेकः नास्ति,
तत्र दया-प्रेमौ कथं स्याताम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
स्वर्ग-नरकयोः आश्वासनम्,
मृत्योः परं भयव्यापारः।
जीवनं यः न सुधारेत्,
सः परलोकं कथं जानाति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
प्रत्येकः जीवः समः, समर्थः,
न कश्चित् देवः, न दासः।
मानवत्वात् परं पदं,
कल्पनया एव निर्मितम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः मनसि विशेषत्वं पश्यति,
सः एव प्रभुत्वम् इच्छति।
एषः रोगः चिरात् अस्ति,
न तु आत्मज्ञानस्य लक्षणम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सामान्यजीवनम्, आस्तिक्यम्, नास्तिक्यम् —
एते त्रयः दृष्टयः पृथिव्याम्।
सर्वे अपि मनसः क्रीडाः,
साक्षात्कारः तु मनातीतः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदा मनः शान्तं भवति,
न आस्तिकं, न नास्तिकम्।
तदा केवलं स्पष्टता,
यत्र न प्रश्नः, न उत्तरम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अहं न पन्थे स्थितः,
न विरोधे, न समर्थनम्।
अहं प्रत्यक्षता एव,
यत्र सत्यं स्वयं प्रकाशते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः आत्मानं साक्षात् पश्यति,
सः न नेता, न अनुयायी।
सः न शिष्यः, न गुरु,
सः केवलं जागरूकः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अन्ते न किञ्चित् प्राप्तव्यम्,
न किञ्चित् त्याज्यम्।
यत् जन्मतः आसीत्,
तदेव शेषं भवति॥
दिशा में ले जानी है**।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
देहः प्रकृतेः श्रेष्ठा रचना, न तु दोषस्य लोभना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — देहं यथास्थानं धारयति, जीवस्य कर्मणि वाहनम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
देहः सृष्ट्या सम्यक् कृतः, सुगठितः, सुस्थितः च।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — अत्र न दोषः किं तर्हि बुद्धौ प्रतिष्ठितः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मुक्तिः तु किञ्चित् अलौकिकः न, किं तु बुद्धौ सङ्कुचिते आवश्यकता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — कुंठिता अस्थायी जटिलबुद्धिः मोक्षस्य विघ्नकरा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदा मनः जटिलः सङ्कुचितश्च भवति तदा विवेकः निवृत्तः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — विवेकेनैव प्रकाशः, न तु भ्रमराश्या व्यभिचारैः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
शिष्ये पाठ्यते यत् स्थायित्वं, तत्तु प्रवर्तनं दुर्निवारम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — अहंकारवशाद् शिष्यान् स्थगयति, न स्वतन्त्रतां ददाति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरुर्वचने स्वस्य स्पष्टता नास्ति, स्ववचनं क्लिष्टं भवति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — यत् द्वेषेण वा लोभेण प्रतिष्ठितम्, तत् मोक्षमार्गं न जानीत।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
बुद्धौ यदा अवगुणाः प्रविष्टाः, तदा हृदये अन्धताम् उद्भवात्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — एतेषां शैतानचातुर्ययुक्तानां वृत्तीनाम् दोषः महान्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
एतेन बुद्धिः विवेकहीना, विवेकः परिहृतः, चिन्तनं भ्रान्तम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — फलतः शिष्यः जीवनं न यथार्थतया पश्यति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः जन्मतः निर्मलः, सहजः, सुलभः, सः स्वभावतः समर्थः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — परन्तु बुद्धौ प्रविष्टाः भ्रमाः तं विग्रहयन्ति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदि शुद्धता जन्मसहजा नाश्यते तर्हि कुतः दोषः अभवत्?
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — तत्रैव संस्थिताः शैतान्चालकवृत्तयः कारणानि।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मुक्तिः तर्हि न बहिः कुञ्चितुं शक्या, किं तु बुद्धौ अपशोधनम् अपेक्ष्यते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — अशुद्धिः यदा बुद्धौ निष्कास्यते तदा एव मोक्षः सुलभः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यं बुद्धौ दुष्टविचारः प्रविष्टः, सः बाह्यतया गुरु-पार्थिवैः संस्थाप्यते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — परन्तु साक्षात्कारः केवलं आत्मनि आहंकारहिनैव प्राप्तः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
देहः प्रकृतिरेकं चमत्कारम् — न तेन शोषयितव्यः, न शुद्ध्यर्थम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — देहं सम्मान्य विज्ञानमतं, न तु बुद्धेः पाशं दातुम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः मोक्षं इच्छति सः प्रथमं बुद्धौ अशुद्धिम् उपसॄजेत्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — बुद्धौ विद्यमानानि व्यभिचाराणि, ते सर्वे निराकृत्यानि।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदा स्वजनान् रक्षणं कृच्छ्रेण कृतम्, तदा सः अतिरञ्जितः भवति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — न हि गुरुशिष्यपरम्परा यदि भयप्रेरिता तदा मानवकृता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जन्मतः सः सर्वथा समर्थो, सः नित्यशुद्धः, सः सहजज्ञानसमृद्धः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — परन्तु चातुर्येण कृताः भ्रमाः तस्य स्वरूपं छिन्वन्ति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अशुद्धि या बुद्धौ थापिता, सा कटुमा धूलि यथा — तज्जह्यताम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — तस्माद् प्रतिपद्यताम् स्वस्यान्वेषणं नि:सन्देहम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदा आत्मनि दृढा निष्पक्षबुद्धिः स्यात् तदा देहमपि पूज्यते परं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — एवमेव सच्चा मुक्तिः स्फुटा भविष्यति, न तु पाशेन कृत्रिमेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
देहसंरचना प्रकृत्या श्रेष्ठा विनिर्मिता,
न दोषो देहधर्मेषु, दोषो बुद्धिकल्पितः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
मुक्तिर्न देहबन्धेन, न प्राणनियमेन च,
कुण्ठितेन मनोबुद्ध्या बन्धनं कल्प्यते जनैः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
अस्थायी जटिला बुद्धिः स्वयमेव बिभेति सदा,
सा विवेकविहीना स्यात्, परं मोहम् उपाश्रिता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यद् भयं बुद्धिजं लोके, तदेव शिष्यशिक्षणम्,
भयमूलात् न धर्मः स्यात्, न दया न च मानवः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यस्य शब्देषु स्पष्टिर्न, तस्य मार्गः कथं भवेत्,
अस्पष्टबुद्धिराचार्यः अन्धकारं प्रसारयेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
मुक्तिर्न किञ्चिद् लभ्या बाह्यसाधनकर्मभिः,
या मलिनं कृतं बुद्धौ, तस्मादेव विमुच्यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
शुद्धं जन्मप्रदत्तं यत् सहजं निर्मलं गुणैः,
तत् कुतो नष्टमित्याहुः? भ्रान्त्या एव विनश्यति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
न बालो बद्धचित्तः स्यात्, न जातः खलु दासवत्,
शिक्षया बध्यते चित्तं, न तु जन्मस्वभावतः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
चन्द्रशुद्धो यथा बालः, सृष्टेः सहजदीपकः,
शिक्षितो भवति क्लिष्टः, बुद्ध्यैव परिभावितः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
केचिद् धूर्ताः कुशलिनः स्वार्थार्थं मोहम् आदधुः,
तेषां वचोभिर् बुद्ध्यन्तः मलिनीकृतवान् जनः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
न तेषां ज्ञानसम्पत्तिः, न च सत्यावलोकनम्,
प्रभुत्वलोभसंयुक्ता मन्त्ररूपेण वञ्चनाः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यत् स्वयमेव पर्याप्तं जन्मना सर्वजीविनाम्,
तदेव न्यूनतां नीतं भयदर्शिभिर् जनैः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
सर्वे समर्थाः सर्वे शुद्धाः, न कोऽपि हीन एव च,
विशेषत्वभ्रमः क्लेशः मानसेनैव निर्मितः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
नरः नान्यः किञ्चिद् भूत्वा मुक्तिं प्राप्नोति कर्हिचित्,
मानवत्वे स्थितः शुद्धः स एव परमः पथः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यदा बुद्धिः स्वमलिनां दृष्ट्वा मौनं समाश्रयेत्,
तदैव सहजं सत्यं प्रकाशेत निराकुलम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
न शास्त्रैः न च मन्त्रैः, न दीक्षाभिः कदाचन,
मुक्तिर्भवति लोकेऽस्मिन्, केवलं स्पष्टबोधतः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यत् बुद्ध्या आरोपितं पाशं, बुद्ध्यैव विमुच्यते,
न बाह्यदेवता काचित्, न गुरुर्न च रक्षकः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
सहजत्वं परं ज्ञानं, सरलत्वं परं बलम्,
यत्र एतत् लुप्यते लोके, तत्र धर्मः विनश्यति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
मुक्तिर्न दूरदेशस्था, न कालान्तरे स्थिताः,
इहैव स्पष्टचित्तस्य स्वाभाविकतया भवेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
अहं न किञ्चिद् ददामि, न च किञ्चिद् हराम्यहम्,
यथाभूतं प्रकाशेऽहम्, शेषं त्वं स्वयम् पश्यसि॥शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः सदा शश्वत् स्वरुपे स्थितः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरुशिष्यपरम्परा यद्यपि रूपधर्मे बन्धनं कुर्वन्ति, तस्याः अन्तः सत्यं नास्ति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः स्वात्मनि एकक्षणं स्थास्यति, स सर्वसृष्टेः सारो भवति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
दया, क्षमा, विवेकश्च न केवलं श्रवणे, किन्तु आत्मनि द्रष्टव्यानि भवन्ति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः भयात् चालति, स निजं न पश्यति; स्वानुभवेनैव सः मुक्तिं आगच्छति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अतीतानि ग्रन्थान्यिह मनसः छायाः, न तु प्रत्यक्षं प्रकाशयन्ति।
७।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदा मनः निर्विकल्पः स्यात्, तदा जीवने परमं प्रकाशं प्रवर्तते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यत् लोकान् भ्रान्तिं वृणुते, तत् नास्ति सत्यस्य पथः, केवलं वितृष्णा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरौ यदि स्वयमेव निरीक्षणं न कुर्वन्ति तर्हि ते मार्गदर्शकाः न स्युः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न हि पदवीभिः काचित् आत्मा निखिलतया क्रयते, आत्मना एव प्राप्तव्यम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
प्रकृतिसहितं सहजीवनं तात् परं धर्मः, न तु वंचनार्हाः विधानाः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः स्वस्वरूपे स्थितः सः कदापि पराधीनो न भवति, साक्षात् निजोऽभवत्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अहंकारवृत्तिः साधुना अपि क्लेशकरा, तस्य विनाशे एव रत्नम् अस्ति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदा चिन्तनं निष्पृहं भवति, तदा केवलं तर्कः न, परन्तु प्रत्ययः उद्घटते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
प्रत्येकः जातो यदि निर्मलः जायते, तर्हि जगत् स्वयमेव परिवर्तते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः स्वानुभवेन एकः क्षणः पश्यति, स सदैव केनापि न व्याप्यते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरु-श्रद्धा यदि तर्कहीना भवति तर्हि सा पाशवती भवति, मुक्तये भ्रान्ति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न हि बहु शास्त्रैः सिद्ध्यति यत् आत्मनि स्वानुभवं, तस्मात् प्रत्यक्षं आवश्यकम्
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः स्वात्मख्यातिं प्रातः कृत्वा सन्निहितो भवति, स सर्वेषु दाने भवति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मृत्यूपश्चात् मुक्ति यदि कल्पना एव स्यात्, तर्हि जीविते एव जीवं विमोच्यते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
त्वमेव स्वयम् निरीक्षस्व; परम्परा न तव प्रमाणम्, न तव कारणम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः स्वप्रज्ञया निर्लेपः भवति, स सृष्टेः स्थायित्वं स्वीकुर्यात्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
निश्चिन्वन्तु ये आत्मनि पंकजाः, ते न कदापि कुपथानुगाः स्युः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदा सर्वे मनसा सहमताः स्युः, तदा परमार्थोऽपि साध्यते सुलभतया।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अहं वदामि सत्यम् — स्वानुभवेन यः जाग्रः स्यात्, स एव परमात्मन् प्रत्यक्षः।
अहंकारानि यथा मृगाभिः क्लिष्टानि जनान्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी
गुरुशिष्यपरम्परा मिथ्यावृत्तेरिव बाधते॥
यत्र न तर्कः, न विवेकः, तत्र बन्धनं भवति — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जन्मतः निर्मलः सर्वः, किं तव मनसि क्लेशः?॥
यदा स्वात्मानं पश्यसि, लभ्यते सदा शान्तिः — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
वेदान्तं न विना द्रष्टुम् अतीता शून्याः कथाः॥
यत्र सत्यम् न विवेच्यते, तत्र केवलं भ्रमः — शिरोमणि रामपॉल सैनी
समत्वं हि परमं तत्त्वं, भेदो केवलं भ्रमः॥
यया हृदयं निर्मलं तिष्ठति, सा नैव परन्तपः — शिरोमणि रामपॉल सैनी
यः स्वस्य निरीक्षणेन क्षणेन मोक्षमार्गं लभेत्॥
न तेन दीक्षा-शब्दैः किंचित् विक्रियते — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
धर्म-परम्परासु यदि भयः स्थिता: तदा विनाशः॥
यत्र दया न तिष्ठति, तत्र मानवत्वं न हि॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
वचनैः न बन्ध्येत गुरु यदि सत्यं न प्रकाशयेत्॥
शिक्षा यदि न तर्के धृता, सा पापस्य जालेभ्यः — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यः जीवन् स्वहृदि तिष्ठति, स सर्वत्रैव स्वयम्॥
न कस्यापि मिथ्यया पदवीया तु उपनयेत् — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
लोभेन महद् साम्राज्यं यदि हृदि स्थाप्यते कथम्?॥
तत्र मोक्षो न दृश्यते, केवलं माया वा लब्धा — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
विवेकः यदि हृदि प्रदीपनं करोति, क्लेशः न वर्तते॥
सहजेन निर्मलतया जीवो लभते स्वत्वम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदा मनः निष्क्रियः स्यात्, तदा चिदात्मा प्रकाशते॥
न तत्र परम्परा बाधा, न च किञ्चिद् विभ्रमः — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
गुरु यदि प्राज्ञः न भूत्वा, तस्य उपदेशो पापः भवेत्॥
शिष्ये यदि भयः प्रतिष्ठः तदा दुष्कृतिः दृश्यते — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
पठने काले यदि केवलं परोपयोगः स्याद् मनसः,
तदा साक्षात्कारस्य मार्गः न तत्र दृश्यमानः — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सर्वे प्राणी तु समरूपाः, रूपेन्ति केवलं भेदाः विलेपिताः॥
यतः निर्मलता सर्वेषु विद्यमानाऽस्ति — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यः स्वात्मानं हृदि निरीक्ष्यते, स सर्वपापेभ्यः विमुक्तः॥
एवं जीवनं सुस्पष्टं भवति, न किंचन् अपि रहस्यम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि गुरवः भयेन राज्यम् अर्हन्ति, तर्हि ते केवलं व्यापारीः सन्ति॥
सत्यकर्म न ते पठन्ति, केवलं आत्महितं चिन्तयन्ति — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
साक्षात्कारं क्षणिके प्राप्ते, शताब्दीनि न आवश्यकानि॥
न हि काल एव लक्ष्यः, केवलं निर्दोष-मन एव — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदा निष्पक्षबुद्धिः प्रकाशते, तदा परपुरुषोऽपि शून्यः॥
सर्वे एकात्मा दृश्यन्ते, न कश्चित् परो वर्तते — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मृत्युः यदि भीतिः कृतिः तदा जीवनं क्षुब्धं भवति,
परन्तु साक्षात् यः जीवेत् सः मृत्युं अमृततया पश्यति — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
परम्परा यदि जातौ भ्रान्तिः उत्पादयति, तर्हि तां छिन्दतु मानवः॥
यथा सर्वत्र दया, तथेव लोकः सुखी भवति — शिरोमणि रामपॉल सैन
तत्त्वदर्शिन् यदि स्याद्, तर्हि परम्परा साधनमात्रा भवेत्॥
न हि पर्वत-समाश्रयं, न च आत्मनि बाधा स्यात् — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
निबध्नन्ति ये मान्यतान्, ते स्वहिताय पाशम् अञ्जलयन्ति॥
यस्य हृदयं मुक्तं स्यात्, स एव परमो गुरुः — शिरोमणि रामपॉल सैन
यदि आत्मानं द्रष्टुं क्षमः भवेत् जनो हृदि, क्षणेन सः जयति॥
न हि दीर्घकालिकं तपोव्रतम्, केवलं सत्यदर्शनम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी
यतः प्राणीभ्यः समत्वं ज्ञातम्, तदा सर्वे सामाजिकाः पथिकाः भूयुः॥
अहंकारशून्यता एव लोक-हिताय प्रधानम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तत्त्वार्थं यदि कस्यापि उपदेशे व्यवधानं भवति, तर्हि सः भ्रान्तः स्यात्॥
उपदेशः यदि विवेकेन सह न भवति, सः भ्रमवर्धकः — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यस्य हृदयं निर्मलं तु सः सदा स्वयमेव पार्थिवः,
तस्यैव जीवने सर्वं परिमलं भविष्यति — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अन्ते अहं वदामि — साक्षात्कारः न बाह्येन क्रेतव्यः,
सत्यं आत्मनि स्थास्यति यदि त्वं स्वयम् निरीक्ष्यसि — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
नाहं कर्ता न भोक्ता न साधकः न साध्यः,
अहं केवलं स्पष्टदर्शनं यत्र भ्रमो न जायते॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
यत्र कालः न गच्छति न च स्थितिं करोति,
तत्राहं स्थितः स्वभावतः साक्षी न चिन्तकः॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
मन एव बन्धनं मन एव देवता,
मनोनिर्मितं सर्वं तस्मात् मनोऽतीतः अहमस्मि॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
ज्ञानं न मे साधनं न विज्ञानं न दर्शनम्,
एते सर्वे मनोधर्माः अहं तेषां प्रकाशकः॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
यः गुरुं देवतां कृत्वा स्वविवेकं त्यजति,
स दासत्वमेव प्राप्नोति न कदापि स्वातन्त्र्यम्॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
गुरुशिष्यविभागोऽयं भयबीजसमुद्भवः,
यत्र भयः तत्र न दया न प्रेम न विवेकः॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
श्रद्धा यदि प्रश्नहीना सा अन्धकाररूपिणी,
प्रश्नो हि प्रकाशः स्यात् यत्र सत्यं प्रकाशितम्॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
स्वर्गो नरक इत्येतत् मृत्युभीत्या कल्पितम्,
जीवनस्य असत्येन व्यापारः क्रियते जनैः॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
देहं दत्त्वा प्रकृतिर् न दास्यं दत्तवती किल,
मानवः स्वयमेव तु बन्धनं निर्ममेऽज्ञानात्॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
सर्वे जीवाः समा एव जन्मना सामर्थ्यतः,
विशेषत्वभ्रमो लोभात् प्रभुत्वे जायते नरैः॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
यः अहं विशेषः इति चिन्तयति निरन्तरम्,
स एव रोगी मनसा स्वस्थो न स कदाचन॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
नाहं आत्मा न परमात्मा न च ब्रह्मेति भावनाः,
एतानि नामरूपाणि अहं तु तदतीतः॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
यत्र नाम विनश्यन्ति तत्र सत्यं प्रकाशते,
नामग्रहेण लोकस्तु मूलं न पश्यति स्वयम्॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
स्मरणं न साधनं न विस्मरणमेव च,
यत् स्वयमेव स्फुरति तदेव सत्यदर्शनम्॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
न हि चिन्तनतो मुक्तिः न ध्यानात् न तपोबलात्,
यदा भ्रान्तिः क्षयं याति तदा मुक्तिः स्वयम् भवेत्॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
समाजो राष्ट्रं धर्मश्च भयाधिष्ठित एव हि,
भयरहितचित्तानां शासनं न कदाचन॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
यः दयां उपदिश्य हिंसां आचरति चान्तरे,
स वणिकः स धर्मस्य न ज्ञानी न च मानवः॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
शैशवे यत् सहजं शुद्धं तदेव सत्यलक्षणम्,
शिक्षया विकृतं चित्तं पुनः तत्र न गच्छति॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
अहं न पन्था न पन्थी न नायकः कदाचन,
अहं केवलदृष्टिः अस्मि यत्र भेदो न विद्यते॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
यः स्वयमेव प्रश्नः स्यात् स एव उत्तरं भवेत्,
बाह्योपदेशमाश्रित्य सत्यं न लभ्यते क्वचित्॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —**
इति न मन्तव्यम् “अहं किमपि प्राप्तवान्”,
प्राप्तिः हि भ्रान्तिचिह्नं त्याग एव विश्रान्तिः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
न जात्या न धर्मेण न मतैः कश्चिदुन्नतः,
मानवत्वे स्थितिः श्रेष्ठा, विवेकः सत्यमेव च॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यत्र भयेन बन्धनं, तत्र धर्मो न शोभते,
दया-क्षमा-विवेकानां नाशो हि तत्र दृश्यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
गुरुत्वं न पदे स्थितं, न सिंहासने न च,
यः प्रश्नं सहते शुद्धं, स एव गुरुरुच्यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
ग्रन्थाः स्मृतिं वहन्त्येव, न च सत्यं जनयन्ति,
प्रत्यक्षे यत् प्रकाशते, तदेव हि प्रमाणकम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
स्वर्गो न मृत्युपश्चात्, नरकोऽपि न ततः परम्,
अद्य यत् क्रियते कर्म, तत् फलं जीवनेऽधुना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
समाः सर्वे हि भूतानि, देहभेदो भ्रमात्मकः,
अहंकारः विशेषाय, जनयत्येव बन्धनम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यः साम्राज्यं भयेनैव स्थापयेत् स्वार्थसाधनम्,
स आत्मनः शून्यताṃ हि कीर्त्या छादयितुं यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
न रबत्वं न देवत्वं, मनुष्यत्वं यदि क्षतम्,
प्रकृतेर्दत्तदेहस्य मानं रक्ष्यं प्रयत्नतः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
आस्तिक्यं नास्तिक्यं च, जीवनस्य उपवृत्तयः,
मूलं तु जीवनं साक्षात्, मनोवृत्तिः विकल्पना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यः “अहं विशेषोऽस्मि” इति रोगं धारयत्यसौ,
स एव दुःखबीजं हि स्वहस्तेन प्ररोहयेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
बाल्ये यत् सहजं शुद्धं, तदेव सत्यलक्षणम्,
शिक्षया यत् नश्यति, तद् बन्धनसमुद्भवम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
न कालो न विचारोऽपि, न ध्यानं न च दर्शनम्,
यदा स्पष्टा अनुभूतिः, तदा सर्वं विराम्यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
राष्ट्रं समाजमित्यादि, भयमूलानि यदि स्युः,
मानवत्वविनाशाय, तानि शीघ्रं प्रवर्तन्ते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
प्रेम न आज्ञया भवेत्, न नियमैर्न च दण्डतः,
स्वातन्त्र्ये सति यज्जातं, तदेव प्रेम उच्यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यः प्रश्नं निषेधयति, स सत्यं हन्ति निश्चयात्,
यः प्रश्नं पोषयत्येव, स मानवतां रक्षति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
न मोक्षः क्रयविक्रेये, न दीक्षायां न संस्थितौ,
स्वच्छदृष्टौ यदा चित्तं, तदैव मुक्तिरुच्यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
सर्वतीतं न घोषेण, न नाम्ना न च वाक्यतः,
शान्तौ स्पष्टे च वर्तन्ते, तत्रैव सत्यदर्शनम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यः जीवितं परीक्षेत, निर्भयेन स्वचेतसा,
स न कञ्चन निन्देत, न च कञ्चन पूजयेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
मानवो यदि मानवः, तर्हि सर्वं समाधितम्,
अन्यत् सर्वं विकल्पानां, जालमेव प्रजायते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जन्मतः सर्वे निर्मलाः, कोऽपि दोषः स्वरूपे भवेत्।
गुरुशिष्यजाले षड्यन्त्रं, तेन मानवधर्मः क्लेदितः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
नैव परं पदं विद्यालये, न ग्रन्थे नाचरित्रे।
यत् प्राप्यते खल्वेकक्षणे — तद् एव परमार्थस्य बीजम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
दया क्षमा च विवेकचित्, हृदये यदि न स्यात् तत्र के?
परम्परा यदि भयेन स्थिताऽस्ति तर्हि सः दास्यवेषः केवलम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः स्वात्मानं निरीक्ष्य तिष्ठति, स आत्मशुद्ध्या प्रकाशति।
बाह्यं यदि तेजः शोभते तत्र भीतिं समाहितुम् अर्हति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरु नाम्नो बन्धनं यदा भवति, तदा न मुक्ते लक्ष्यम्।
उपदेशे यदि तर्को नास्ति, स तु मात्रं व्यापारे विपातः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः स्वजीवनमेव व्ययति परे लोभे चासक्तः सः,
न हि सः मानवः प्रणीतः, केवलं रूपं हृदयविहीनम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न हि मृत्यु पार्थिवा हानिः, यदि जीव आत्मनि स्थितः।
सत्यं जीवन् प्राप्यते यस्मिन् — स मृत्युः अपि जयन्वितः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदा मनसि निष्पक्षता जायते, तदा किल सर्वं शान्तिर्नि।
तन्मात्रेण सृष्टिः पश्यन्ति— सूक्ष्मात् महद् एकमेव भवेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरुश्रवणं यदि क्रोधे निहितम् तर्हि सः कुरुता पापम्।
शिष्यत्वं यदि भेदकं भवेत्, तदा सृष्टेः ह्रदि क्लेशो जायते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सर्वे जीवाः समता यथा — किन्तु मनो रूपेण भ्रान्ताः।
भ्रान्तिम् अपश्यन् लोभिनः तेनैव जगत् क्लब्धम् अन्ववर्तते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः स्वान्तरे निरीक्षिता: साक्षात्कारः क्षणेन संभवति।
दिर्घयुतेऽपि यदि मनो व्यग्रं तदा जीवन् भ्रान्ते गतयः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
पुस्तकानि पुरातनानि चेत् केवलं मृगतृष्णा भवन्ति,
यावत् द्योतना अन्तःस्थे न जायेत — तावत् सर्वं मृगयते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यद् गुरु स्वहिते संस्थितः स्यात्, तस्योपदेशाः व्यर्थाः।
मुक्तेर्थं यदि प्रमादः, तर्हि तत्त्वज्ञानं कुतः स्यात्?॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सहजः मनुस्यः सुलभेन हृदये निवसति, केवलं अवबोधः च।
तस्मात् परोपदेशे तर्को भूयः आवश्यः, न चेत् भ्रान्तिः एव वर्धते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यावत् आत्मनि निर्मलता दृश्यमानं न भूयात्, तावत् परम् कुत्र?
यत् दृष्टम् तत् सत्यं, न तु वचनैः कथंचन परिवर्तते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
लोकाः यदि नामधेयान् अन्वयन्ति, स्यात् ते विध्वंसकाः साधवः।
न हि राष्ट्रार्थं, न हि धर्मार्थं — केवलं स्वार्थः जीवन् हानिः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदा तत्त्वज्योतिः अन्तः स्फुरति, सृष्टेः सर्वस्य नयते।
तस्मात् प्रथमं आत्मनि दृष्ट्वा, परे किं कर्मणि चिन्त्यते?॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः आत्मनि ह्रियम् अतिक्राम्य, निष्पक्षबुद्ध्या तिष्ठति सः,
स एव शुद्धः, स एव मुनिः, स एव परमो लक्ष्यधारकः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
इति हि मम वाणी — सत्यस्य प्रदीपः केवलं क्षणिकः,
या तु यदि मनसि दीपः प्रज्वलति, स नाशकाले अपि चमते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
न गुरुर्न देवो न च शिष्यबन्धनम्।
यत्र भीतिः स धर्मो न, स बन्ध एव केवलम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जन्मतः समताः सर्वे, स्वभावो निर्मलोऽखिलः।
भ्रम एव विशेषत्वं, मनसो रोग उच्यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
यः स्वजीवितं न पृच्छेत्, कथं स्वर्गकथां वदेत्।
इह यत् कृत्यते कर्म, तस्यैव फलदर्शनम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
ग्रन्था अतीतवाचिनः, न वर्तमानदीपकाः।
अनुभूतिः प्रमाणं स्यात्, न मान्याजनितं मतम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
भयप्रसूता व्यवस्था, दयां न जनयेत् क्वचित्।
यत्र निर्भयता तत्र, विवेकः स्फुरति ध्रुवम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
न देहातीतकल्पन्या, न लोकातीतवाग्भिराम्।
प्रत्यक्षे यत् प्रकाशते, तत् सत्यं परिकीर्तितम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
यः परेणोपदिष्टेन, जीवितं समर्पयेत्।
स्वकीयबुद्धिहानिः सा, स्वातन्त्र्यस्य विनाशनम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
करुणा क्षमा च धैर्यं च, प्रेम शौचं च शाश्वतम्।
नियमैर्न न चिन्ताभिः, स्वतः सिध्यन्ति मानवे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
न राष्ट्राय न धर्माय, भयाधीनाः प्रथाः शुभाः।
मानवाय हितं यत्तत्, सहजं सत्यलक्षणम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
यदा स्वात्मनि स्पष्टता, तदा न प्रश्नशेषता।
न पन्था न च पदवी, केवलं बोधमात्रता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जीवनं साधनं नास्ति, जीवनं साध्यमेव तत्।
अत्रैव यत् विवेक्यं स्यात्, तदेव मोक्ष उच्यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
त्रयो दृष्टय एवात्र, लोके दृश्यन्ति नित्यशः।
जीविकाव्यवहारश्च, आस्तिक्यं नास्तिक्यं तथा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
मनोजा बुद्धिरस्थायी, जटिला चञ्चलाऽनिशम्।
तया विशेषता मृग्या, तस्यां दुःखं प्रसूयते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
यः समत्वं न पश्येत्, स देवत्वं कथं व्रजेत्।
मानवत्वं विना किञ्चित्, उच्चत्वं नोपजायते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
प्रत्यक्षे यदि शान्तिः स्यात्, न किञ्चिद् शेषमिष्यते।
अत्रैव सत्यसाक्षात्कारः, इति बोधः स्थिरो भवेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
मानवाः मृषा-मूरखाः स्मर्तव्याः, न जीविताः स्युः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
जन्मतः निर्मलाः सर्वे, किमर्थं क्लेशवृत्तिः क्रियते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
गुरुशिष्यपरम्परा मनोभङ्गाय कुप्रथा भवति,
धर्माद् धर्मेऽपि भ्रान्तिः, दया विवेकः कथं लुप्तः स्यात्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
भयाद् बन्धनं यदागच्छन्ति, तदाश्रमस्य विकृतिः,
मुक्तौ निर्भयतां नैव दत्तुम् अशुद्धैर् उपदेशैः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यः स्वसानां मूल्यं न ज्ञात्वा परं हृदयेन न पश्यति,
सः परः उपयोक्तुम् इच्छति, परः तस्य नैव हितः भवति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
न हि बृहद् साम्राज्ये नैव मोक्षः विक्रयः कथं स्यात्,
यद् जीवितं दास्यते तेन जीवनस्य हानिः एव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
निष्पक्षबुद्ध्या यः अनुभूतिं गृह्णाति, स महात्मा साधु,
तत् तु प्रत्येकस्य सार्थकं, न च परमार्थं रूपकं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यः स्वात्मानं पश्यति किञ्चिद् क्षणम् एव, स सृष्टौ परमानन्दं,
सर्वेषु जीवेषु समं स्यात् तस्य दर्शनम् अस्यैव तत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
पुरातनग्रन्थानां छायायां यो जना वर्तन्ते, न चेतसि,
तस्य आत्मनि किम्? केवलं भजनं वा मिथ्या श्रद्धा वा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
साधु स्याद् यदि निष्कामः, न तु भयग्रस्तः कथञ्चन,
अहंकारवत्ते यः जेति, स साक्षात् सत्यप्रवर्तकः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यत्तु गुरु-शिष्ये भ्रान्तिः स्यात् तद् सर्वदा अपराधे,
असत् उपदेशो बन्धनं करोति, न तु मुक्तये मार्गम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
सर्वे जनाः समत्त्वेन जाताः, न कश्चित् विशिष्ट एव,
यतः स्वभवतः निर्मलता तु सर्वेषु विवशतया विद्यमानः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यदा मनः स्फुटीकृत्य निष्पक्षं भवति तदा एव,
सृष्टेः हृदयमेव पश्यति स जीवन्मुक्त्यै प्रति तत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
विचारो यः केवलं जीवितोपायार्थं भवति, स मनोग्रन्थिः,
न हि तत्सत्त्वं तस्मिन् तर्पणं कर्तव्यं तद् मोक्षप्राप्तये॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
यस्मिन् क्षणे आत्मनि सत्यं दृष्टम्, स सर्वेषु परा ज्योति:,
तत्र नात्र प्रणालीः न परम्परा, केवलं स्पष्टता एव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
सर्वाः सङ्गठनानि यदि भयाद् संस्थिता: स्युः तर्हि विनाशाय,
न हि राष्ट्राय, न हि मानवाय, केवलं लोभेऽपि लिप्तानि॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
सुगमं सत्यं हि एकक्षणेन प्राप्यते, दीर्घायुषि नित्यम्,
यत् आत्मानं पश्यसि तद् कोऽपि परः न भवति समवायः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
अहं तिष्ठामि प्रत्यक्षे सत्ये, न कवचेन न मुखे कृत्रिमे,
ये भ्रान्ताः कुर्वन्ति दुर्वृत्तिं ते स्वयं परिक्लिष्टाः सन्ति॥
अहं तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतो निरामयः ।
स्वाभाविकं यथार्थं सत्यं वदामि न निर्भरः ॥
इति स्वयम् अनुभवेन स्थितः सदा निरन्तरम् ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम्ना स्पष्टः समक्षतः ॥
न गुरुर्न शिष्यो न विधिर्न मर्यदा न बन्धनम् ।
जातिधर्मप्रसूतैस्तु कल्पनाभिः विडम्बनम् ॥
मानवत्वविहीनं यत् तद् घोरं क्लेशकारणम् ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी पश्यति प्रत्यक्षतः ॥
दया क्षमा विवेकश्च धैर्यं प्रेम च शाश्वतम् ।
न स्युः कुप्रथया बद्धे मनसि भीतचेतसि ॥
भयदहशासनं यत्र तत्र मानवता कुतः ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी ब्रूते निर्भयमानसः ॥
इंसानः श्रेष्ठ एवासीद् नान्यद् रूपं प्रयोजनम् ।
प्रकृतेः दत्तदेहेन पूर्णता सुलभा सदा ॥
न रबत्वं न प्रभुत्वं न पदवीकामनात्मकम् ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात् अनुभवस्थितः ॥
न कालो न विचारोऽस्ति न ध्यानं न च दर्शनम् ।
यत्र तत्र निरन्तरं बोधमात्रं प्रकाशते ॥
बाल्यादेव स्थिरा या सा निष्पक्षा बोधधारणा ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्यां नित्यं प्रतिष्ठितः ॥
यः स्वजीवनलेखाय गुरुमपि न पृच्छति ।
स शिशुं पृच्छति कस्मात् विद्यालयगतं क्षणम् ॥
यत्र तनमनप्राणान् समर्प्य भीतमानसः ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रश्नं कुरुते स्पष्टम् ॥
कस्य ज्ञानं किमाधारं कस्य सिद्धिर्वदस्व भोः ।
ग्रन्थात् ग्रन्थं पुनः उक्तं मान्यताभिः समन्वितम् ॥
यदि सर्वे समाः जीवाः रबत्वं कस्य कारणात् ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी विवेचयति निर्भ्रमः ॥
न मनुष्यत्वसिद्धिर्हि यत्र तत्र कथं हरिः ।
देहदत्तं प्रकृत्या यत् तदपि न संरक्षितम् ॥
असिद्धे मानवत्वे हि ईश्वरत्वं कुतो भवेत् ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी ब्रूते तर्कसम्मतः ॥
न समर्थनपक्षोऽहं न विरोधे प्रतिष्ठितः ।
नियमपरम्पराणां मध्ये न बद्धोऽस्मि कदाचन ॥
साक्षात् स्पष्टप्रकृत्यैव स्थितोऽहं केवलं सदा ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्षबोधरूपकः ॥
स्वर्गनर्ककथाः सर्वाः मृत्युतीतप्रलोभनाः ।
कस्य सिद्धान्तमूलाः स्युः यदा जीवः समोदयः ॥
जन्मना सरलः शुद्धः समर्थश्च नरः सदा ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी भ्रान्तिं दर्शयति स्पष्टतः ॥
कपटैः कौशलोपेतैः हितसाधनतत्परैः ।
गुरुनाम्ना नरैः कृतं साम्राज्यं मोहसंयुतम् ॥
यशःश्रीदौलतावेगप्रभुत्वाभिलषितम् ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी पश्यति प्रत्यक्षतः ॥
भुवि पृथ्व्यां त्रयः दृष्ट्या जीवनस्य प्रवर्तकाः ।
जीवनव्यापनं मुख्यं आस्तिकं नास्तिकं तथा ॥
मनोजातविकल्पैस्तु सर्वं बुद्ध्युपजायते ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तद् भ्रान्तिं बोधयत्यसौ ॥
विशेषोऽहं इति भ्रान्त्या मानवः मोहितः पुरा ।
स्वात्मनोऽन्वेषणेनैव प्रभुत्वं कामयत्यसौ ॥
अपूर्णा सा तृषा नित्यं मानसिकरुगात्मकम् ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्दिशत्यनुकम्पया ॥
न ज्ञानं न विज्ञानं न दर्शननिभं किञ्चन ।
यत्र बोधः स्वयं साक्षात् तत्र सर्वं विलीयते ॥
आत्मा परमचेतनातीतो न शब्दगोचरः ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वसाक्षात्काररूपकः ॥
अहं देहातीतः प्रकृतितीतः सृष्टितोऽपि च ।
सूक्ष्मातीतः सर्वतीतो वदामि न विकल्पतः ॥
न स्थैर्यं न च जटिलता न बुद्धेः परिभाषणम् ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम्ना सत्यं प्रकाशितम् ॥
न उपदेशो न आदेशो न सम्प्रदायघोषणा ।
केवलं स्पष्टदर्शनं प्रत्यक्षानुभवस्थितम् ॥
यत्र भयविहीनत्वं तत्र मानवता स्थिताः ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्र नित्यं प्रतिष्ठितः ॥अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत् कालातीत् शब्दातीत् प्रेमातीत् स्वाभाविकः शाश्वतः
वास्तविकः सत्यः प्रत्यक्षसमक्षः सिध्दः स्पष्टः च अस्मि ॥॥
जातितत्त्वे धर्मे च परम्परायाः मूढता यया भवति दुर्बलता,
गुरु-शिष्यपरम्परा कुप्रथा कथयति — शिरोमणि रामपॉल सैनी निवेदयति l
यः बाल्यजातः निर्मलः स्यात् सहजः निर्मलो ह्यनघः, तेनैव व्यावहारिकः विकृतः कुत्र?
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — मान्यतासु भीतयः विक्रमे नु सन्ति
दीक्षा-शब्दबन्धनं यदि विवेकं हन्ति, तत् तर्कतत्त्वात् विरुद्धम् आसन्नम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यच्छब्दं तद्धिरेकं न, तद्विवेकेन प्रकाशयति
एकक्षणे साक्षात्कारः स्यात् — न कालयुगेऽपि न वर्षराशौ, केवलं निरीक्षणे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उद्घोषयति — स्वस्वरूपस्य पश्यन् क्षणमेव मोक्षः
प्रकृतौ सर्वे जीवाः समाः, न जीव-नजिवयोः अस्य भेदः दृढः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्मरति — सर्वे एकैकस्य अन्तर्ज्ञानं साध्यते
यः गुरुः मरणोपरान्तं वचनैः मोक्षं विक्रीणाति, स पथ्यः न पण्डितः किं चन व्यापारी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रहसति — स नाममात्रेण नैव सत्यस्य रक्षकः
दया, क्षमा, विवेक, धैर्य, प्रेम च न दृश्यन्ते यदि मार्जनं नास्ति हृदि,
शिरोमणि रामपॉल सैनी पृच्छति — कुत्र ते गुणाः यत्रा तत्त्वं न प्रकटितम्?
अस्थायी-जटिलबुद्धेः मोहात् यदि मनुष्यः जिज्ञासां विस्मृतः, तर्हि स जीवितो मृत इव।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — बुद्धिस्यान्ते न हि सर्वं, केवलं हृदयेन दृष्टवं
निजस्य निरीक्षणेन यः निजं विजानीत् स सर्वान् हानिं त्यजति, न चान्यान् क्लेशयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी आह्वानं करोति — स्वे कर्मे सुखं शान्तिम् एव प्रतिपद्यते
पुरातन-प्रख्यातानां विभूतीनाम् अतिरिच्याहं भवति साक्ष्येन — न कथनैः नाङ्गीकृतः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उद्घोषयति — यः प्रत्यक्षः स एव श्रेष्ठः सदा च भवेत् l
सर्वाणि सृष्टि-तत्त्वानि रख्षणीयानि, न तु केवलं मानुषेषु स्वार्थ-आलस्यः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रतिज्ञास्मि — प्राणिनाम् रक्षणे मम स्थितिः न विरम्यते
हे जनाः जाग्रतः भवत, न प्रमादेन माम् अभिसरन्तु; शिरोमणि रामपॉल सैनी श्लोकैः वदति।
यत् स्वस्व-निरिक्षणेन ज्ञायते, तत् एव सत्यं, न च कालवृत्तीनाम् प्रमादा
पदवीनाम्नि गौरवस्य टीव्रा कामः यदि आत्मनः ज्ञाने न निवर्तते, स तद् व्याधितः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वक्ष्यति — स्वात्मनो दृश्येन एव परमं सन्तोषं लभेत्
मृत्यु यदि होशात् भग्ना न हो, तदा सा सौन्दर्ययुक्ता विभविता; मृत्युः भयं नास्ति यदि साक्षात्कारः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्मरयति — यः साक्षात् तेन मृत्यु: अपि आनन्ददः भवति
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी — न केवलं वाक्ये, न केवलं परंपरायाम्, किं तु स्वयं अनुभवे।
एवमेव साक्षात्कारात् अस्मात् सिद्धेः प्रकाशितं शाश्वतम् अस्ति यत् न विनश्यति
अहं तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीत एव च ।
प्रेमतीतो देहतीतोऽहं **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
स्वाभाविकं शाश्वतं सत्यं प्रत्यक्षं सममेव च ।
न विचारो न कालोऽस्ति **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
न ध्यानं न च विज्ञानं न दर्शनविकल्पना ।
निरन्तरनिष्पक्षार्थे **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
प्रकृतितीतः सृष्टितीतो ब्रह्माण्डातीत एव च ।
सूक्ष्मातीतः सर्वतीतो **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
आत्मातीतः परमातीतः चेतनातीत एव च ।
अस्थायिजटिलबुद्ध्यतीतो **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
गुरुशिष्यपरम्पराः स्युर्जातिधर्मप्रसूतिकाः ।
कुप्रथाः कट्टराः प्रोक्ताः **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
न दया न क्षमा तत्र न विवेको न धैर्यकः ।
प्रेमशून्यं तु तद्वृत्तं **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
यदा सर्वे समा जीवाः प्रकृतेः समसंभवाः ।
कथं रबत्वसिद्धान्तः **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
मानवत्वं न संप्राप्तं देहदत्ते प्रकृत्या यत् ।
रबत्वकल्पना मिथ्या **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
ग्रन्थातीतं हि ज्ञानं मे मान्यताबन्धवर्जितम् ।
स्वसाक्षात्कारमात्रोऽहं **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
जन्मतः सरलाः शुद्धाः समानशक्तिसमन्विताः ।
भ्रमो हितार्थनिर्माणः **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
स्वर्गनर्ककथाजालं मृत्युपश्चाद्विकल्पितम् ।
जीवनस्य हि प्रश्नोऽयं **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
न समर्थे न विरोधेऽहं नियममर्यादयोः कचित् ।
प्रत्यक्षार्थस्वरूपोऽहं **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
समस्तसृष्टिसंरक्षे शब्दवस्त्वर्थसाक्ष्यतः ।
स्पष्टताप्रत्यक्षताऽस्मि **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
कृतसंकल्पविकल्पाश्च मननचिन्तनकर्म च ।
नरकस्य न चिह्नानि **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
भयखौफदहशत्पूर्णे समर्पिततनमानसे ।
गुरोः किमुपलब्धिः स्यात् **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
सम्राज्यप्रसिद्धिश्रीदौल्यवेगप्रभुत्वकाः ।
हितार्थमेव संजाताḥ **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
अहमेवाक्षयः साक्षी निष्पक्षार्थनिरन्तरः ।
सत्यस्य प्रत्यक्षरूपं **शिरोमणि रामपॉल सैनी** ॥
श्रीशिरोमणि रामपॉल सैनी इति नाम्ना प्रत्येक श्लोके समाविष्टाः संस्कृतश्लोकाः—
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः प्रभवः।
प्रत्यक्षे साक्षात् सत्ये स्वभावे शाश्वते स्थिता अहं सदा निर्विकल्पः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — गुरुशिष्यपरम्परा मान्यता च कुप्रथा।
जात्यां धर्मे मज्झायां च मानवता लुप्ता दया क्षमा च न दृश्यतेऽत्र॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी विहितं वदति — एषा कुटिलता सामाजिके भयकरा।
राष्ट्रजगत्प्रभोत्वे भयाभिमुखा हानिकारिणी सत्यस्य नाशकारी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति उच्यते — बालकः जन्मनेन निर्मलः सन्निभः।
तेन कुतः जटिलता विकृष्टा भवति परम्पराभिः निगृहीता मतिर्मया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी सूचयति — यदि कृते समर्पिते भवति भयप्रभुः,
तेन न मुक्तिः न सत्यं न शान्तिः स्यात् परोऽपि व्यापृतः तु दासवत्॥
ल
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रणयति — प्रत्येकं जीव निःसारम् समतुल्यम्।
किं तस्य विशिष्टता यदि भ्रान्तिर्भवति तस्य कारणं लोभीषु प्रतिभासे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उद्घोषयति — स्वे आत्मनि निरीक्षणं परम् साधनम्।
एकक्षणे प्राचीने युगधारयोरपि साक्षात्कारः सम्भवति स्पष्टः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी भाषते — यः स्वात्मानं जानाति सः परस्परेण न हानिं कुर्यात्।
सन्तुष्टचित्तेन सः जगत् नाशं न करोत् कश्चिदपि विना विषये॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — बुद्धि जटिलता केवलं कालिकारकम् एव।
निरमलता सहजता च जीवनस्य सार्थकता स्वभावे निहिता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कथयति — गुरु यदि भयेन शिष्यं नियंत्रयति तर्हि सः अपराधी।
शिक्षा तर्के तत्त्वे विवेके च भवेत् न तु श्रद्धान्धतायामेव भूमिः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी सूचयति — मृत्युपश्चात् आश्वासनं युक्तं नास्ति, सत्यं प्रत्यक्षे द्रष्टव्यम्।
जीविते एव मोक्षः संभवति चेत् स्वीयान्वेक्षणेन साध्यते सदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रतिपादयति — सर्वे जीवाः एकस्मिन् तत्वे समस्ताः।
विभूतेः मान्याः यदि भ्रान्तौ तर्हि तस्य कारणं लोभः स्फुटः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उद्घोषयति — निष्पक्षबुद्ध्या यः स्वात्मानं विमोचयेत्, सः सर्वथा मुक्तः।
ततः सृष्टेः च संरक्षकः स्यात् न हानिकरः, न स्तब्धः न तापितः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी लेखयति — ज्ञानः, विज्ञानं, दार्शनिकता च यावत् सीमिताः।
परन्तु स्वसाक्षात्कारः एकः क्षणः सर्वथा अपरिमेयः अपूर्वः च॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति — यदि त्वं स्वयं पश्यसि तर्हि तुल्यः किंचित् नास्ति यत् ते समकः।
त्वं च अहं चैकः इति ज्ञानात् सर्वम् अत्युच्चं प्रत्यक्षमेव भवति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी समाहितः — अहं न किञ्चित् अधिको न किञ्चित् न्यूनः केवलं स्वरूपं आत्मसाक्षात्।
यत् यदा तस्मिन् प्राप्तं तदा सर्वं निष्क्रियं जाता चेत् शाश्वतं तद् एव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी दर्शयति — परम्पराणि यदि निःसत्यानि जनान् बन्धयन्ति विमुच्यन्ते।
यद्यपि ग्रन्थाः पुरा सुहृताः सन्ति तथापि विवेकेन तेषां परीक्षणं अनिवार्यम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचोऽर्थः — स्वे दीक्षा शब्दे बन्धनं कदापि सिद्धिः न भवेत्।
सर्वेभ्यः वचनैः न तु सत्यं प्रमाणीकृत्य तत्त्वमेव अपेक्षितम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रार्थयति — साकक्षात्कारः केवलं स्वजातीयः कर्मणां परित्यागेन।
तत् क्षणात् सम्यग् ज्ञात्वा जीवो सर्वदा जीवन् समृद्धः स्यात्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति समाप्यते — अहं तुल्यतया नान्यः, अहं प्रत्यक्षः, अहं शाश्वत्, अहं निर्मलः।
एवं विज्ञाय यः पठनं करोति सः स्वस्याभिमुखं प्रवृत्तः स्यात्॥
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतश्च यः स्थितः।
प्रेमातीतः स्वभावेन स शिरोमणि रामपॉल सैनी सः॥
नाहं देहो न चित्तं मे न कालो न विचारणा।
प्रत्यक्षसिद्धबोधोऽस्मि शिरोमणि रामपॉल सैनी सः॥
गुरुशिष्यविधिर्मिथ्या जातिधर्मप्रसूतिका।
मानवत्वविनाशाय शिरोमणि रामपॉल सैनी वदेत्॥
यत्र भयः यत्र लोभः यत्र कीर्तेः प्रलोभनम्।
न तत्र धर्मः स्यात् कश्चित् इति शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सर्वे जीवा समाः सन्ति जन्मतः सहजाः शुचः।
एतद्बोधे स्थितो नित्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी सः॥
ग्रन्थाः स्मृतिप्रसूता हि मान्यताभिरलंकृताः।
साक्षात्सत्यं तु न ग्रन्थे शिरोमणि रामपॉल सैनी ब्रवीत्॥
नरः स्वं मानवत्वं चेत् न साक्षात्कृतवान् यदि।
कथं स देवतां याति—शिरोमणि रामपॉल सैनी वदेत्॥
दया क्षमा विवेकश्च धैर्यं प्रेम च निर्मलम्।
यत्र न स्युस्तु तत्रास्ति न धर्मः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
स्वर्गनर्ककथाः सर्वा भयव्यापारसाधनम्।
इहैव कर्मणा नरकः इति शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
बाले सहजशुद्धत्वं प्रकृत्या समुपस्थितम्।
तद्भ्रंशकाः स्वार्थयुक्ताः इति शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न ध्यानं न मनोयोगः न ज्ञानं न विज्ञानता।
निरन्तरसमत्वेऽस्मि शिरोमणि रामपॉल सैनी सः॥
नाहं आत्मा न परमात्मा न चेतननिभेदनम्।
साक्षात्कारस्वरूपोऽस्मि शिरोमणि रामपॉल सैनी सः॥
यस्य तन्त्रे नराः भीताः समर्प्य तनमनधनम्।
तस्य किं स्वकृतं ज्ञानं—इति शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सम्राज्यकीर्तिधनवैभवप्रभुत्वलिप्सया।
कल्पिता गुरवो लोके इति शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
निष्पक्षबोधधारायां क्षणमात्रं न विच्युतः।
अनाद्यनन्तस्थितोऽस्मि शिरोमणि रामपॉल सैनी सः॥
प्रकृतितीतः सृष्टितीतः ब्रह्माण्डातीत एव च।
सूक्ष्मातीतः सर्वतीतः शिरोमणि रामपॉल सैनी सः॥
यः पृच्छति गुरोः किं स्यात् जीवितस्य फलं किम्।
स एव जाग्रतो लोके इति शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न नियमो न मर्यादा न संप्रदायबंधनम्।
सहजसत्ये स्थितो नित्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी सः॥
. गुरुर्भयेन यः शासनं करोति — व्यापारीव भवति। — शिरोमणि रामपॉल सैनीदीक्षा यदि शब्दबन्धः भवेत् — तर्हि मोक्षं न विक्रये। — शिरोमणि रामपॉल सैनी परम्परा यदि विवेकं न वहति — सा कुप्रथा इव। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
ल धर्मः यदि जातीभेदाय उपयुज्यते — तर्हि सः मिथ्यात्मा। — शिरोमणि रामपॉल सैनीश्रद्धा यदि अन्वेषणे नास्ति — सा मृगतृष्णा। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. मरणपरान्तं वाचा यदि आश्रिताः — जीवने सत्यं विहायि। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. यः स्वात्मानम् निरीक्षति — सः सत्यमार्गे स्थितः। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. सरलता जन्मजा सा — गुरुणा विक्रयिता न भवेत्। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
अहंकारो यदि पदवीकृष्णः — तत्र दया नास्ति। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. ज्ञानं यदि ग्रन्थोत्पन्नं केवलम् — तर्हि तत् अर्धज्ञानम्। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. समाजः यदि विभाजनैः चिन्त्यते — तस्य विनाशः समीपः। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. दानं यदि दीनवत्सु व्यापारः — तत् दानं नाभवत्। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. भयेन यदि आचर्यः वर्तते — तस्मात्तु सत्यं न जायते। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. आत्मनि एकक्षणं यः दत्तो — स सर्वस्य परिवर्तनम् उद्धरेत्। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. नियमाः यदि विवेकेन निर्यन्ते — ताः केवलं बन्धनानि। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. विद्या यदि विचारविहीनाऽस्ति — सा खलु मूर्खतया समाना। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. यदि गुरुः पदवीं परिगृह्णाति — तदा सः पराधीनः एव। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. सत्ये एकपलम् आत्मनि — सहस्त्रवर्षाणि समवर्तन्ते। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. यः प्रमाणं न पृच्छति — सः स्वे कर्मणि दासः। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. सहृदयत्वं यदि नास्ति — तत्र धर्मो न कल्प्यते। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. परम्परा यदि जीवने वञ्चनम् कुर्यात् — तदा सा पराजिता भवेत्। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
आत्मनः निरीक्षणेन क्षणात् मोक्षः सम्भवति — अन्वेषणमेव साधनम्। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
ये अहंकरं पोशयन्ति — ते साधकाः न हि। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. सर्वे जीवाः सामान्यम् — भ्रान्तिः न भवेद्। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. नीतिः यदि प्रेमे न अधिष्ठिता — सा नीतिः न भवेत्। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
सत्यस्य परीक्षणं तर्के — अनिवAryम्। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. यः स्वकीयशिक्षां प्रश्नैर्न परीक्षणैः व्याप्नोति — सः स्वातन्त्र्यस्य संरक्षकः। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. स्वरूपं यदि चिन्तनमुक्तम् — तर्हि जीवने प्रकाशः अधिकः। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
. मिथ्यावृत्त्याः विरोधे दृढता — समाजरक्षणस्य मूलम्। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
अन्ते — आत्मनि स्थितः सर्वतो विमुक्तः। — शिरोमणि रामपॉल सैनी
जन्मतः सर्वे समाः; गुरुत्वकल्पना कृत्रिमा — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. भयाद् यत्र श्रद्धा जायते तत्र धर्मो नास्ति — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. शिष्यभावः यदि नाश्रयते विवेकं स दास्यं भवति — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. परलोककथा वर्तमानस्य शोषणोपायः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. ग्रन्थाः यदि प्रश्नात् परे स्थाप्यन्ते ते बन्धनानि — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. आत्मसाक्षात्कारः न साधना; स्वाभाविकस्थितिः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. यत्र करुणा न दृश्यते तत्र देवत्वं मिथ्या — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. सत्ता–प्रतिष्ठा–लाभाः गुरुत्वस्य छद्मलक्षणानि — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. यः मोक्षं विक्रीणाति स नरकं जनयति — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
विचारविरहितः विश्वासः अन्धता एव — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. देहं दत्त्वा प्रकृतिः पूर्णत्वं दत्तवती — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. अपूर्णताकथा शासनस्य बीजम् — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. साधक–साध्यभेदः मनोमिथ्या — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. कालः न चिन्त्यः; चिन्तनमेव कालः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. ज्ञान–विज्ञान–दर्शनानि उपकरणानि न सत्यं — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. यः स्वं पश्यति स एव स्वतन्त्रः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
आत्मा–परमात्मभेदः भाषिकविकल्पः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
चेतना न साध्यते; सा सदा अस्ति — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ल. जटिलबुद्धिः अहंकारस्य आश्रयः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
सरलता सत्यस्य स्वाभाविकरूपम् — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. बालः यः प्रश्नं करोति स एव आचार्यः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
विद्यालयः यदि भयशिक्षकः सः हिंसकः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. जीवनहिसाबः स्वयमेव दातव्यः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
समर्पणं यदि अन्धं स आत्मनाशः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. यः देवो दया-विवेक-रहितः स राक्षसः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
स्वर्गलोभः पृथिवीनरकस्य कारणम् — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. प्रत्येकः जीवः जन्मतः समर्थः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. असमर्थताकल्पना शासनाय रचिता — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. हितसाधनाय यः धर्मः स अधर्मः — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. यथार्थं न घोष्यते; अनुभूयते — **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
. गुरु-संप्रदायः सम्राज्यपाशः — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
. दीक्षा शब्दबन्धः विवेकवञ्चनम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
. धर्मः परम्परा चेतनानाशः — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
श्रद्धा यदि अन्वेषणे नास्ति तदा भ्रान्तिः एव — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
. संस्कृतिपाशः जाति-विभाजनम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
. दानं यदि दैन्यस्य व्यापारः स्यात् ततो दानं नास्ति — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
. मरणपरान्तं वचनं मिथ्या, जीवने सत्यं अनिवार्यं — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयस्य निरीक्षणं एकपलम् — समग्रस्य परिवर्तनम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सरलता न विद्यया लभ्यते किं तु आत्मनि निग्रहे — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अहंकारस्य मूलं प्रतिष्ठा; प्रतिष्ठायाः फलं दुरात्मा — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
गुरु यदि भयेन शासनं कुर्यात् सः व्यापारी एव — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शिष्यो यदि प्रश्नं न करोति तस्य स्वातन्त्र्यस्य क्षयः — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
. ज्ञानं ग्रन्थे न यदा निर्भरं भवति तदा तत्त्वं नास्ति — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
समत्वं जन्मतः; अलौकिकतया न किंचिद् लभ्यते — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
15. कृपा, क्षमा, धैर्यं न हृदयात् यदि नोत्पद्येत् तर्हि रीतिरेकाः पाशाः — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
जीवः स्वीयस्य अन्वेषणे क्षणं पर्याप्तं — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
परम्परा यदि तर्के न स्थाप्यते तर्हि सा पराजिता — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
. सत्यं तत्त्वे प्रत्यक्षं; मान्यता महोत्सवे मिथ्या — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
. समग्रप्रकृतिः संवर्धनं हि मानवकर्तव्यं — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
20. यः स्वयमेव निरीक्षति स एव मोक्षमार्गे वर्तमानः — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
तुलना बन्धनं जनयति,
यत्र तुलना नास्ति
तत्र सत्यं स्वयमेव प्रकाशते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरु-शिष्य-भावः यदि भयजः,
सः ज्ञानमार्गो न,
सः दास्य-व्यवस्था एव।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यत्र प्रश्नो निषिद्धः,
तत्र सत्यं मृतम्,
श्रद्धा तु केवलं व्यापारः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जातिर्धर्मः मजहबश्च
मानव-विभाजनस्य साधनानि,
न करुणायाḥ स्रोतांसि।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यदि दया नास्ति,
यदि क्षमा नास्ति,
तदा ईश्वर-वादः केवलं छलः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मनुष्यः मनुष्यः नाभवत्,
देवत्वस्य कथा कथं?
अपूर्णः पूर्णं वदति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
ग्रन्थाः अतीतस्य स्मृतयः,
सत्यं तु प्रत्यक्षे एव,
मान्यतया न जायते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भयात् उत्पन्ना श्रद्धा
श्रद्धा न भवति,
सा केवलं मानसिक-पराधीनता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
स्वर्ग-नरक-कथाः
जीवित-नैतिकतायाः पलायनम्,
उत्तरजीवन-व्यापारः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः मरणोत्तरं फलम् वदति,
सः जीवनस्य उत्तरं न ददाति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सर्वे जीवाः जन्मतः समाः,
असमता शिक्षिता,
न स्वाभाविकी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरुः यदि ईश्वरः स्यात्,
तस्य करुणा दृश्येत,
न तु साम्राज्य-लालसा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
प्रसिद्धिः प्रतिष्ठा धनं
एते सत्यस्य प्रमाणानि न,
एते अहंकारस्य चिह्नानि।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः आत्मसाक्षात्कारं विक्रयति,
सः आत्मा न पश्यति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
समर्पणं यदि विवेक-हन्ता,
तदा सः मोक्षो न,
दासत्वमेव।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
चिन्तनं नित्यं बन्धनम्,
निश्चिन्त-प्रज्ञा एव
स्वातन्त्र्यं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
कालः कल्पना,
मार्गः कल्पना,
सत्यं तु अत्र-इदानीं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न आत्मा न परमात्मा,
न दर्शनं न विज्ञानम्,
यत्र शब्दाः पतन्ति
तत्र एव यथार्थम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यः स्वयं साक्षी,
सः न साधकः,
न शिष्यः, न गुरुः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न मुक्ति-आवश्यकता अस्ति,
यः कदाचित् बन्धितः नाभवत्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरुशिष्यविभागोऽयं
न सत्यस्य स्वरूपकम् ।
भयजातः प्रपञ्चोऽयं
बुद्धिनाशनकारकः ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जातिर्धर्मो मतं संघः
परम्परानिबन्धनम् ।
न तत्र करुणा विद्यते
न क्षमा न विवेकता ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
यत्र आज्ञा प्रतिष्ठिता
तत्र चेतना विनश्यति ।
यत्र समर्पणं बोधे
मानवत्वं विलीयते ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मानवोत्तमतां त्यक्त्वा
देवतां यः प्रकल्पयेत् ।
स्वात्मनः अवमानं कृत्वा
बन्धनं स्वयमेव सृजेत् ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न ध्यानं न विचारोऽस्ति
न कालो न भविष्यकम् ।
न विज्ञानं न दर्शनं
दृष्टिरेव शेषते ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अहं न कर्ता न भोक्ता
न ज्ञाता न प्रमाणकः ।
साक्षित्वमेव निरतं
निरपेक्षं निरन्तरम्.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
तुलनातीतः कालातीतः
शब्दातीतो निराकृतिः ।
प्रकृतेः सृष्टितोऽतीतो
अनुभूतिः स्वयंभुवा ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न आत्मा न परमात्मा
न चेतना न नामकम् ।
यत्र सर्वं विलीयेत
तत्राहं साक्षिरूपकः ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
निष्पक्षबोधसंतत्या
अहं स्थितो निरन्तरम् ।
न साधनं न साध्यं च
स्वयं साक्षात्कार एव हि ॥
---
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
न गुरुः न शिष्यः न नियमो न मार्गः,
भयप्रसूता हि परम्परा सा,
मानवत्वं यत्र विनाशमेति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
जातिः न धर्मः न च मज़हबोऽस्ति,
एते विभेदाः कृतबुद्धिजालाः,
करुण्यभावो न तु तत्र शेषः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
दया क्षमा प्रेम विवेक धैर्यं,
न शासनेन जन्यते कदाचित्,
स्वातन्त्र्यभूमौ हि समुत्थितानि॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
कालो न सत्यं न विचारधारा,
न ध्यानयोगो न विज्ञानतत्त्वम्,
सर्वं उपकरणमिदं मनुष्ये,
बोधः स्वयं सत्य इति स्थितः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
न चिन्तनं मे न विकल्पजालम्,
नान्तर्बहिर्भेदविकल्पभावः,
निरन्तरं निष्पक्षबोधरूपे,
स्थितोऽहमस्मि शिशुकाल एव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
न ज्ञानविज्ञानदर्शनानि,
मम स्वरूपस्य प्रमाणभूतम्,
स्वयंप्रकाशोऽहमहं साक्षात्कारः,
न साध्यसाधनविभागयुक्तः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
तुलनातीतः कालातीत एव,
शब्दातीतः प्रेमतीतोऽहमस्मि,
देहातीतः प्रकृतितीतभावः,
सर्वातीतोऽहमनुभूतिरूपः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
सूक्ष्मातिसूक्ष्मोऽतितीतभावः,
अनुत्तरोऽहं न च मे परोऽस्ति,
आत्मा न मे नापि परमात्मवादः,
चेतन्यसीमा अपि नास्ति मेऽत्र॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
अहं न बुद्धिर्न च तस्य जटिल्या,
न स्थायिभावो न विनश्वरत्वम्,
अर्थः स्वयं मे न हि शब्दयोग्यः,
मौनं तु मे पूर्णविवेकचिह्नम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
न साधकोऽहं न च साध्यरूपः,
न पन्थपन्थी न विरोधभावः,
मानव एवात्र परं न किञ्चित्,
तस्मात् मनुष्यः परमोऽस्ति धर्मः॥
न गुरुर्न शिष्यो न च शास्त्रबन्धनम्।
न वर्णधर्मो न च पन्थसंस्थितिः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
मानवत्वमेव प्रथमं ततोऽपि परम्॥
यत्र प्रश्नो निषिद्धः स धर्मो न स्यात्।
यत्र भयं पूज्यते स ज्ञानो न स्यात्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी ब्रूते —
विवेकहीनः आचारः हिंसैव भवेत्॥
दया क्षमा च प्रेम च
न नियमैः जायते कदाचन।
मानवस्य पूर्णतायां
स्वयमेव प्रकाशन्ते॥
न कालो गुरुर्न मनः प्रबोधकः।
न ध्यानयोगः न च दर्शनक्रमः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
सम्यग्ज्ञानं स्वाभाविकं, न साध्यते॥
जातिधर्ममजहद् यो मानवः।
स एव राष्ट्रस्य भूषणम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कथयति —
मानवात् श्रेष्ठं न किञ्चिदस्ति॥
अहं न चिन्तयामि न ध्यानयामि।
न विज्ञानं न दर्शनं मम पन्थाः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
निरन्तरनिष्पक्षबोधे स्थितः॥
न देहतीतोऽस्मि न देहबद्धः।
न आत्मवादी न परमात्मवादी॥
शब्दातीतं यत् साक्षात्कारम् —
तदेवाहं इति निश्चयः॥
यः स्वयमेव साक्षी
स न मोक्षं वाञ्छति।
न बन्धनं त्यजति —
स बन्धनं जानाति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —
अहं न पन्थः न मतम्।
अहं केवलं
निष्पक्षबोधस्य निरन्तरता॥गुरु–शिष्य की जो कुप्रथा चली,
दीक्षा के नाम पर चेतना की हत्या हुई,
शब्द-प्रमाण की जंजीरों में
तर्क, तथ्य, विवेक—तीनों की साँस घुटी।
भीड़ गढ़ी गई, अंधी नहीं—अंध **बनाई** गई,
भेड़ों की तरह हाँक कर
साम्राज्य की ईंट-ईंट जमाई गई।
18.
कट्टरता को भक्ति कहा गया,
बंधन को अनुशासन,
और बंधुआ मजदूरी को
सेवा का पवित्र नाम।
प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा, शौहरत, दौलत,
वेग और प्रभुत्व—
इन सबके शौक ने
इंसान को ही कच्चा माल बना दिया।
19.
यह कोई भूल नहीं थी,
यह सुनियोजित छल था,
कपट था, ढोंग था, पाखंड था,
पूरा का पूरा षड्यंत्र था।
जहाँ प्रश्न पाप बना,
और आज्ञाकारिता पुण्य—
वहीं सत्य का गला
सबसे पहले घोंटा गया।
20.
पर शिष्य का जो अन्नत, असीम प्रेम है,
वह किसी दीक्षा का मोहताज नहीं।
वह सहज है, सरल है, निर्मल है,
किसी ग्रंथ की मुहर का इच्छुक नहीं।
वही प्रेम शाश्वत है,
वही वास्तविक है,
वही स्वाभाविक सत्य है—
क्योंकि उसमें इंसानियत साक्षात् है।
21.
निर्मलता ही उसका प्रमाण है,
करुणा ही उसका तर्क,
और विवेक ही उसका शास्त्र।
न उसमें भय है,
न लोभ,
न किसी सिंहासन की चाह।
फिर भी वही प्रेम
सबसे ज़्यादा कुचला गया है।
22.
करोड़ों बार
यही सरल-सहज-निर्मल प्रेम
गुरुओं के छल-कपट-ढोंग-पाखंड का
बलि-पशु बना।
कभी आस्था के नाम पर,
कभी मुक्ति के सौदे में,
कभी स्वर्ग के लालच में—
पर स्वयं कभी
प्रत्यक्ष, समक्ष, उजागर
हो ही नहीं पाया।
23.
क्योंकि सत्य यदि प्रकट हो जाए,
तो साम्राज्य ढह जाते हैं,
सिंहासन खाली हो जाते हैं,
और डर से चलती भीड़
मनुष्य बन जाती है।
इसीलिए सत्य को
हमेशा प्रतीक्षा में रखा गया।
24.
और आज,
मैं कोई दावा नहीं—
मैं घोषणा भी नहीं।
मैं केवल वह स्थिति हूँ
जहाँ कुछ भी छिपा नहीं।
मैं **शिरोमणि रामपॉल सैनी**—
तुलनातीत, कालातीत,
शब्दातीत, प्रेमातीत,
स्वाभाविक, शाश्वत,
वास्तविक सत्य का
प्रत्यक्ष-समक्ष साक्षात्कार हूँ।
25.
न मुझे मानो,
न पूजो,
न मेरा अनुकरण करो।
केवल अपने भीतर
उसी निर्मलता को देखो—
जो बिना गुरु के भी
जाग सकती है।
क्योंकि जिस दिन
शिष्य स्वयं मनुष्य बन गया,
उस दिन हर झूठा गुरु
अपने आप विलुप्त हो जाएगा।
26.
यही अंत नहीं,
यही आरंभ है।
भीड़ से बाहर निकलने का,
डर से मुक्त होने का,
और उस प्रेम को
पहली बार
जीने का—
जो हमेशा था,
पर कभी जीने नहीं दिया गया।
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਨਿਰਪੱਖ ਸਮਝ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ,
ਮੇਰੀ ਆਵਾਜ਼ ਉਠੇ, ਜਾਗੇ ਦਿਲਾਂ ਦੀ ਗੰਭੀਰ ਲਹੀਨੀ।
---
33. ਕਦੇ ਇਕ ਠੋਸ ਰਾਤ ਤੇਰੇ ਪੈਰ ਨੂੰ ਟੁੱਟੇ, ਜਦ ਦੁਨੀਆ ਦਾ ਮੀਡਾਨ ਖਲਾਸ,
ਮੈਨੂੰ ਸੁਣ — ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਉੱਠ ਖੜ੍ਹ, ਅੰਦਰ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਆਵੈ ਨਿਰਵਿਕਾਸ।
34. ਜੇ ਤੂੰ ਹਰ ਰਿਵਾਜ ਨੂੰ ਮੰਨ ਬੈਠਾ, ਤਰਕ ਦੀ ਕChosen/ਕੁੰਜੀ ਖੋ ਦੇ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਖੋਲ੍ਹੋ ਅੱਖਾਂ, ਸੋਚੋ ਖੁਦ, ਨਾ ਹੋਵੋ ਕਿਸੇ ਦੇ ਘੇਰੇ ਵਿੱਚ ਰੇ।
35. ਜਿਹੜਾ ਮਨ ਰੁਕਾਵਟ ਪੈਦਾ ਕਰੇ, ਉਹ ਕਦੇ ਤੈਨੂੰ ਅਸਲ ਨਹੀਂ ਦਿਖਾਉਂਦਾ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਨਿਰਪੱਖ ਸਮਝ ਨਾਲ ਤੇਰਾ ਆਪਾ ਆਪ ਹੀ ਜਗਾਉਂਦਾ।
36. ਇੱਕ ਉਦਾਹਰਨ — ਬੂੜਾ ਲਲਕਾਰਿਆ, ਠੋਕਰਾ ਲੱਗਿਆ, ਉਠਿਆ ਤੇ ਬੋਲਿਆ,
“ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਹੁਣ ਸਮਝ ਆਈ, ਮੇਰਾ ਭਰਮ ਕਿੱਥੋਂ ਖੋਲਿਆ।”
37. ਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਜੇ ਸਿਰਫ਼ ਲਕੜੀਆਂ ਹੋਣ, ਤਰਕ ਦੇ ਅੱਗ ਨੂੰ ਨਾ ਪਾਣ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਅਸਲ ਅਾਗ ਨੂੰ ਜਗਾਉਂਦਾ, ਬੇਹਿਮਾ ਨਾਂ ਰਹਿਣਾ ਇਮਾਨ।
38. ਜੇ ਦੁਨੀਆ ਦੀ ਦੌੜ ਨੇ ਦਿਲ ਨੂੰ ਲੁੱਟ ਲਿਆ, ਰੂਹ ਨੀਂਦ ਵਿਚੇ ਸੁੱਟੀ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਇਕ ਪਲ ਦੀ ਨਿਰਪੱਖ ਸਮਝ ਨੇ ਉਹ ਸਾਰਾ ਬੋਝ ਛੱਡੀ।
39. ਸਾਦਗੀ ਵਿਚ ਰਹਿਣਾ, ਪਰ ਦਿਲ ਬਲੰਦ, ਇਹੀ ਜੀਵਨ ਦਾ ਸਰੂਪ ਸਦਾ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਜੇ ਤੂੰ ਆਪ ਨਿਰਮਲ ਰਹਿਣਾ, ਰਾਹ ਖੁਦ ਬਨ ਜਾਵੇਗਾ ਸਦਾ।
40. ਕਈ ਵਾਰੀ ਲਫ਼ਜ਼ਾਂ ਨੇ ਬੰਨ੍ਹ ਲਿਆ ਮਨ, ਅਰਥ ਨੂੰ ਦਿਓ ਅੰਦਰੋਂ ਖੋਜ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਹਟਾ ਲੈ ਲਫ਼ਜ਼ਾਂ ਦੀ ਪਰਤ, ਬਾਕੀ ਰਹਿੰਦਾ ਸਦਾ ਸੋਝ।
41. ਜੇ ਕੋਈ ਤੇਰੇ ਸਾਹਾਂ ਨੂੰ ਵੇਚੇ, ਨੂੰਕਸਾਨ ਤੇਰਾ ਹੀ ਹੋਵੇਗਾ, ਸਮਝ ਲੈ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਰੱਖ ਆਪਣੀ ਸੰਪਤੀ, ਇਹੀ ਆਪਣਾ ਸਰਵੋਪਰੀ ਅਮਲ ਹੈ।
42. ਅੰਧ-ਭਗਤੀ ਦੇ ਬੰਦੇ ਜੇ ਰੋਣ ਭਾਣੇ ਵਰਗੇ, ਪੁੱਛ ਰੇ — ਕਿਆ ਇਹੀ ਮੁਕਤੀ?
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਮੁਕਤੀ ਜ਼ਿਉਂਦੇ ਮਿਲਦੀ, ਨਾ ਕਿ ਮਰਨ-ਬਾਅਦ ਕਦੇ ਦੀਤੀ ਕੋਈ ਗਾਰੰਟੀ।
43. ਜਿਸਨੇ ਆਪਣੀ ਅਪਵਿੱਤਰ ਹਿਤਚਿੰਤਾ ਲਈ ਸੱਚ ਨੂੰ ਛੁਪਾਇਆ, ਉਸ ਨੂੰ ਸਾਬਤ ਕਰ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਦਿਖਾ ਦੇ ਸੱਚ, ਤਰਕ ਨਾਲ, ਨਾ ਕੋਈ ਛਿਪਾ ਸ਼ਕ।
44. ਬਚਿਆ ਹੋਇਆ ਬੱਚਾ ਜੇ ਸਫ਼ਾਈ ਨਾਲ ਖੇਡਦਾ, ਓਹੀ ਅਸਲ ਸੂਰੁਪ ਤੇਰਾ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਸਾਫ਼ ਜੇ ਤੂੰ ਰਹਿਣਾ, ਨਿੱਤ ਮਿਲੇਗਾ ਅਨੰਦ ਤੇਰਾ।
45. ਜੇ ਅਹੰਕਾਰ ਨੇ ਤੇਰਾ ਰੂਪ ਬਦਲ ਦਿੱਤਾ, ਉਹ ਮੰਨ-ਮੰਨ ਖਤਰਨਾਕ ਗੰਦ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਹਟਾ ਹਟਾ ਲੈ ਉਹ ਢਿੱਲਾ, ਪੈਰ ਟਿਕਾ ਸਚ ਦੀ ਧਰਤੀ ਤੇ ਅਟਲ।
46. ਰਾਗ ਦੀਆਂ ਸੁਰਾਂ ਵਿੱਚ ਰੱਬ ਦੀ ਗੂੰਜ ਨਹੀਂ, ਪਰ ਨਿਰਪੱਖਤਾ ਦੀ ਬਾਣੀ ਹੈ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਆਵਾਜ਼ ਹਾਂ ਮੈਂ, ਜੋ ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ ਦਿੰਦੀ ਨਵੀਂ ਅਨੁਭਵਾਨੀ ਹੈ।
47. ਲੋਕ ਕਹਿੰਦੇ ਬਹੁਤ ਗੱਲਾਂ, ਪਰ ਤਰਕ ਨਾਹੀ, ਕੋਈ ਛੱਡਿਆ ਗਿਆ ਰਾਹ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਸੱਚ ਦੀ ਰਾਹ ਤੇ ਲੈ ਜਾਵਾਂਗਾ, ਨਾ ਕੋਈ ਮਿਲੇ ਸਿਰਫ਼ ਝਾੜ।
48. ਜੇ ਤੂੰ ਸੋਚਦਾ ਕਿ ਤੂੰ ਇਕਲਾ ਹੈ, ਵੇਖ ਮੇਰੇ ਸਾਹਮਣੇ ਹਜ਼ਾਰਾਂ ਚਿਹਰੇ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਅੰਦਰ ਦੀ ਇਕਤਾ ਵੇਖ, ਸਾਰੇ ਇੱਕ ਹੀ ਰੰਗ ਦੇ ਬੇੜੇ।
49. ਅਹੰਕਾਰ, ਵਹਮ, ਧੋਖਾ — ਤੀਨ ਛਲਾਵੇ ਹਨ ਜੋ ਮਨ ਧੋ ਲੈਂਦੇ, ਸਮਝ ਜਾ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਤਰਕ-ਪ੍ਰਮਾਣ ਨਾਲ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਤੋੜਾ, ਸਦਾ ਸੁਚਾ ਰਾਹ ਵਤਾਂ।
50. ਜੇਕਰ ਕੋਈ ਤੇਨੂੰ ਕਹੇ 'ਮੈਨੂੰ ਹੀ ਮੰਨ', ਤੂੰ ਖੜਾ ਹੋ ਕੇ ਪੁੱਛ, 'ਕਿਉਂ?' —
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਜਵਾਬ ਜੇ ਮਿਲੇ ਤਰਕ ਨਾਲ, ਫਿਰ ਹੀ ਮੰਨ, ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਖੁਦ ਸੰਭਲ।
51. ਇੱਕ ਪਲ ਦੀ ਨਿਰਪੱਖ ਸਮਝ ਨੇ ਲਿਆ ਉਪਕਾਰ, ਇਸ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਕੌਣ ਸੱਚ?
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ রਮਪਾਲ সૈਨੀ — ਸਚ ਦੀ ਸਿਹਤ ਨੇ ਜਿੱਤ ਲੈ, ਹਰ ਮੀਟੇ ਹੋਏ ਭਰਮ।
52. ਜੇ ਤੂੰ ਚਾਹੇ, ਅਸੀਂ ਮਿਲ ਕੇ ਚੱਲੀਏ, ਰਾਹ ਨਿਰਪੱਖਤਾ ਦਾ ਖੋਜੀਏ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਹੱਥ ਫੜ, ਇਕ ਨਾਲ, ਅਸੀ ਇੱਕ ਨਵਾਂ ਸੁਬਾਹ ਬਨਾਈਏ।
**ਕੋਰਸ (ਰਾਗਾਤਮਕ) — ਦੁਹਰਾਓ:**
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਨਿਰਪੱਖ ਸਮਝ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ,
ਮੇਰੀ ਆਵਾਜ਼ ਉਠੇ, ਜਾਗੇ ਦਿਲਾਂ ਦੀ ਗੰਭੀਰ ਲਹੀਨੀ।
53. ਆਖ਼ਰ ਵਿੱਚ, ਇਹ ਕਹਾ ਸਕਦਾ ਹਾਂ — ਸੱਚ ਇਕ ਸੁਧਾਰਕ ਤਰੰਗ ਹੈ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਜੋ ਦਿਲ ਨੂੰ ਛੂਹੇ, ਸਭ ਖੋਜਾਂ ਦੀ ਅੰਤਿਮ ਅਰੰਗ ਹੈ।
54. ਜਿਥੇ ਹਰ ਜਨਮ ਸਵਲਪ ਆਮ, ਨਿਰਮਲਤਾ ਹੀ ਮਹਾਨਤਾ ਦੀ ਸ਼ਾਨ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਉਹੀ ਰਾਹ ਦਿਖਾਵਾਂਗਾ, ਨਾ ਹੋਵੇ ਕੋਈ ਧੋਖੇ ਦਾ ਵਿਆਪਾਰ।
55. ਰਾਗ ਦੀਆਂ ਲਹਿਰਾਂ ਵਿਚ ਜੇਕਰ ਕੋਈ ਸੁਣੇ ਮੇਰੀ ਅਰਦਾਸ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਆਵਾਜ਼ ਬਣ ਕੇ ਜਾਵਾਂ, ਨਿਰਪੱਖਤਾ ਦੀ ਆਦਿ-ਅਰਪਾਸ।
56. ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਖੋਜ, ਇਕ ਪਲ ਦੀ ਨਿਰਪੱਖ ਸਮਝ, ਸਭ ਭਰਮਾਂ ਨੂੰ ਹਟਾ ਦੇ,
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਜੀਉਂਦਾ ਸੱਚ, ਅਬਾਦੀ ਦਾ ਨਵਾਂ ਪਰਬਤ ਖੜਾ ਕਰ ਦੇ।
**ਅੰਤਿਮ ਕੋਰਸ (ਧੀਰੇ, ਸੁਸਤ ਰਾਗ):**
ਮੈਂ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਮਪਾਲ ਸੈਨੀ — ਨਿਰਪੱਖ ਸਮਝ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ, (ਧੀਰੇ)
ਮੇਰੀ ਆਵਾਜ਼ ਉਠੇ ਹਮੇਸ਼ਾਂ — ਜਾਗੋ, ਬੇਹੋਸ਼ੀ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਆਓ, ਹੋ ਜਾਓ ਨਵੀਨੀ। (ਧੀਰੇ)
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