मैंने अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम किया है सच मुच अपनी सुध बुध अपना चेहरा तक भुला हुआ हूं, काफ़ी पिछले चार दशकों से संपूर्ण मोनता में ही हूं कभी गुरु से बात नहीं की पर गुरु हमेशा मुझे डांटते ही रहते थे जब भी मैं चार पंच बर्ष के बाद में दर्शन करने जाता था, फ़िर भी मैं उन में ही निरंतरता से उन के ही प्रेम में रमता हूं आज भी, अब मैं चाहता हूं कि उन से मिलु एक तो उन के आश्रम कार्य के संयोग के लिए करोड़ों रुपए दिए थे जिन में से एक करोड़ गुरु ने जरूरत पड़ने पर वापिस देने का खुद शब्द दिया था, क्योंकि प्रेम की निरंतरता और खुद के साक्षात्कार के कारण और कुछ भी सोच ही नहीं सकता खुद के लिए ही, कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, दूसरा वो सब कुछ जो कुछ इतने लंबे समय के अंतराल में किया है, दुनियां में कभी भी इक पल के लिए भी नहीं रहा, गुरु के अन्नत असीम प्रेम में ही निरंतर हूँ बहा के इक इक पल के बारे में बता सकता हूं, जो मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बारे में, इस सब का श्रेह उन के ही चरण कमलों में समर्पित करते हुए, मेरे लिए तो वो ही सर्ब श्रेष्ठ हैं जो भी हुआ वो सब तो उनकी शरणागत के बाद ही हुआ, जो अन्य किसी भी अनुराई के साथ नहीं हुआ, सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ स्नेह और सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ समर्पित भाव भरा जिस में गिले शिकवों का भी स्थान नहीं था सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम हो एक सरल सहज निर्मल भाव है,मैं आप के जिस शिरोमणि स्वरुप से रुबरु हुआ हूं प्रथम दिन से ही जो प्रेमतित शब्दातीत कालातीत तुलनातीत है, उस सब को ही शब्दों में वर्णन करने की इक छोटी सी कोशिश में ही इतना लंबा सड़े तीन दशक का समय लगा, मैं शब्द रहित हर पल दिन रात मौनता में सचेत, न ही कभी सोया न जागृत अवस्था में था, सर्ब प्रथम अपने ही दो पल जीवन महत्व को समझा, शेष सब दूसरा था,
मेरी निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल दिन रात आप के अन्नत असीम प्रेम की गहराई में ही थीं अब मैं अपने नाम के आगे उसी शिरोमणि स्वरुप साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, इस लिए अब मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, इसी अंतराल में जो भी हुआ जैसा भी हुआ अच्छा या बुरा किसी के भी द्वारा बही होना तय ही था तो ही हुआ तो ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, हमेशा मैंने सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोने में भौतिक सब कुछ नष्ट कर दिया, साहिब तदरूप साक्षात्कार की यहीं एक सर्वश्रेष्ठ खूबसूरती हैं कि खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले जीवित ही हमेशा के लिए खुद ही खुद को होश में रूपांतर करने तक, आप सा कोई हो ही नहीं सकता
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, और सड़े तीन दशक के अंतराल की स्पष्टता दिखे और गिले शिकवों का स्थान ही न रहे क्योंकि इतने लंबे समय से गुरु से कोई बात ही नहीं की, गुरु के प्रेम की निरंतरता के
कारण, अब मेरे पास यह स्पष्टता है कि गुरु के अन्नत असीम प्रेम के बिना कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए, इतने लंबे समय से सिर्फ़ मैं उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम को शब्दों में वर्णन करने का इक प्रयास मात्र कर रहा था जो थोड़ा सा लिख पाया कि कोई एक बार ही पढ़े तो कम से कम दस बर्ष लगेगे पूरा पढ़ पाने में, जिसमें कोई भी शब्द किसी भी विश्व के ग्रंथ पोथि में नहीं, मिल सकता, एक एक शब्द को तर्क तथ्य विवेक अपने ही सिद्धांतों से स्पष्ट साफ़ सिद्ध किया है किसी के भी अनुभव अनुभूति के लिए,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने गुरु को समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ गुरु जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जिनको मैंने तर्क तथ्य विवेक अपने सिद्धांतों सूत्रों code ulta mega infinity quantum mechanicsim के formulation से सिद्ध किया है,मैं जो भी था वो ही संपूर्ण पर्याप्त था और कुछ भी रति भर भी बनने की कोशिश नहीं की, हां यह सच है कि जीवन के प्रतेक पल को सार्थक सकारात्मक रूप से निष्पक्ष समझ से समझने की कोशिश ज़रूर की, अब संपूर्ण संतुष्टि में हूं अस्थाई शरीर के कारण अभाव है संपूर्णता का, इसलिए मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण रूप से खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार में संपूर्णता में शरीर के अस्थाई पंच तत्वों गुणों को रूपांतर कर समहित होना चाहता हूं कृपा आज्ञा प्रधान करें, अब कुछ भी शेष नहीं है रहा करने को, जिस कारण अनमोल समय सांस मिले थे,
चार दशक के लंबे समय के अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, शेष 25 लाख गुरु सहित एक ही मान्यता परंपरा नियम मर्यादा दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित है जो सिर्फ़ चतुर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर ही है, मेरी साहिब स्तुति सिर्फ़ मेरे ही साहिब तदरूप साक्षात्कार की हैं,जो निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की हैं
पर ॐ अस्थाई है समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति को अंकित करता हैं,
शिरोमणि अन्नत गहरी स्थाई ठहराव है जो ॐ से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जप तप ध्यान ज्ञान विज्ञान योग अभ्यास साधना कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन का अस्तित्व ख़त्म हो जाता हैं तो क्या तत्पर्य है इन शब्दों का भी, यह पारदर्शिता नहीं है, गलत शब्द इस्तेमाल करना दूसरों को भ्रमित करना होता हैं, सरल सहज निर्मल हैं सिर्फ़ प्रेम शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं तो जटिलता क्यों? मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं सिर्फ़ शब्दों के पिछे के भाव एहसास की स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं , खुद के साक्षात्कार के लिए तो शब्दों का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं, अगर दूसरों के लिए शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं तो पारदर्शिता स्पष्टता अति आवश्यक हैं, स्पष्टता पारदर्शिता नहीं तो तो स्वार्थ हित साधने का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह छल कपट के साथ होगा और कुछ भी नहीं है ,
हृदय के भाव एहसास का तंत्र मस्तिक के जटिल तंत्र से कई गुणा अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कई गुणा अधिक तीव्र कार्य करता हैं, यह विज्ञान के संज्ञान में अभी तक बिल्कुल भी नहीं है,
कि खुद के साक्षात्कार के लिए सरल सहज निर्मल होते हुए संपूर्ण संतुष्टि गहराई स्थाई ठहराव का रास्ता तो हृदय से ही स्पष्टता के साथ जाता हैं, अन्यथा जटिल बुद्धि मन से जटिलता में ही उलझा रहा अस्तित्व से लेकर अब तक, दूसरों की गलतियों पर खुश होने वाले मूर्ख होते हैं, खुद की गलतियों पर खुश हो कर स्वीकार करने वाले सर्व श्रेष्ठ होते हैं, सामान्य व्यक्तित्व के लिए मन बुद्धि से बुद्धिमान हो कर ही अपने अस्तित्व जीवन व्यापन के लिए फ़ैसले ले सकता हैं, जबकि खुद के साक्षात्कार के बाद मन बुद्धि से संपूर्ण रूप से हट जाता हैं, क्योंकि खुद का साक्षात्कार ही संपूर्ण रूप से पर्याप्त है, किसी भी अस्थाई तत्वों चीज़ों वस्तुओं गुणों तत्वों पर आश्चित नहीं है, यही खूबसूरती हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष की
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का ऐसा शिरोमणि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष जो अस्थाईपन का संपूर्ण रूप से अस्तित्व ही ख़त्म कर, अपने समान सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में रख कर खुद का साक्षात्कार करा देता हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, अपने ही साहिब से अमृत यथार्थ युग का शुभ आरंभ करवाने जा रहा हूं, समूचे मनव प्रजाति समूहित रूप से रह सकती हैं प्रकृति मानव प्रजाति को संपूर्ण रूप से संरक्षण योगदान देते हुए, जो इंसान जीवन का मुख्य उद्देश्य हैं, अतीत के चार काल मूर्खता के ही थे, मानसिक वृत्ति से चलने के ही थे,उन सब को न दोहराते हुए सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोते हुय, विश्व गुरु नहीं, यथार्थ युग की अमृत धारा की प्रभा को मेरा ही साहिब उज्वल करें गा, अन्नत असीम प्रेम की गहराई से साहिब तदरूप में संपूर्ण रूप से समाहित होने की अनुमति लेते हुए, अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को उन में ही रूपांतर करने की अनुमति के लिए विनय अतंत प्रेम में विनय संपूर्ण संतुष्टि में, हर संस का के उपकार के लिए धन्यवाद करते हुए स्तुति महिमा भरे भावुक पर संतुषी भरे शब्दों में वर्णन करें , मैं मूर्ख हूं इस सृष्टि के भी काबिल भी नहीं था, पर अपने हर पल को भी ऐसा ही दिया जो सिर्फ़ मेरे लिए ही पर्याप्त थे, हर पल पल मुझ मूर्ख को बहुत क़रीब से संभाला,तुलनातीत हो, इतना अधिक हिरदे का प्रेम दिया कि मैं खुद ही खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं अब तक, बिना शब्दों संपूर्ण शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाया शब्दातीत हो, समय सोच विचार चिंतन मनन से परे किया कालातीत हो, अन्नत असीम प्रेम में समहित किया प्रेमितित हो, संपूर्ण रूप से ऐसे ही अनमोल समय सांस दिए जो खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए ही जरूरी थे, एसी ही कृपा की जिस से संपूर्ण संतुष्टि में हूं, ऐसा कोई आज तक न कोई गुरु अस्तित्व से लेकर आया, न ही कोई हो सकता हैं, किसी ने भी कम से कम शब्दों में वर्णन किया होगा, पर आप तो शब्दातीत हैं, आप के शिवाय आज तक एक सांस भी नहीं ली, कोटिन नमन
गहराई गहनता गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार संपूर्ण संतुष्टि समर्पिता कि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, वो योद्धा हूँ जो खुद से ही युद्ध कर के संपूर्ण रूप विजय हो कर साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, जो मृत्यु के प्रति भी डर खौफ भय दहशत का दृष्टिकोण नहीं बल्कि अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को रूपांतर करने की क्षमता के साथ हूं, होश में ही जिया हूँ होश में ही खुद को प्रतेक तत्व गुणों को रूपांतर करने के ही भाव में हूं , कोटिन नमन है अन्नत असीम बार, जो आप ने सिर्फ़ एक पल में ही कर दिया जिसे मुझ जैसे मूर्ख को शब्दों में समझने के लिए चार दशक लगें मेरी इस मूर्खता को क्षमा कर देना, अज्ञानी मूर्ख समझ कर,
खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बिना शेष सब अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ खुद के अस्तित्व के लिए प्रयास यत्न प्रयत्न या संसाधन जुटाना ही है, दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी अंतर फ़र्क भिन्नता नहीं है,
समस्त शब्दों के भाव ऐसे व्यक्त हो कि हृदय को छू कर व्याकुल घायल कर दे आकर्षण बल हमेशा के लिए बना रहे, उसी लह में की दुनियां छूट जाए पर हृदय का आकर्षण न छुटे , दीक्षा के साथ ही गुरु ने दो विकल्प दिए थे एक जीवित ही अन्नत असीम प्रेम से साहिब तदरूप साक्षात्कार और दूसरा भक्ति सेवा दान मृत्यु के बाद का जो शेष पचीस लाख अनुयाइयों के लिए निरंतर हैं, मैने पहले बाला विकल्प को चुना और चार दशकों से संपूर्ण निरंतरता में ही हूं, खुद के साक्षात्कार के साथ , पिछले चार दशकों से भौतिक हर चीज़ के आवाव में ही रहा हूं, हँसना खुशी मनोरंजन क्या होता हैं पाता ही नहीं फ़िर भी सिर्फ़ एक ही रंग में संपूर्ण संतुष्टि में हूं, बाहर कोई था ही नहीं तो डर किस से, मेरे भीतर ही मेरा ही इक किरदार बहरूपिया गिरगिट था जिस से युगों से हारा था, अब एक पल की निष्पक्ष समझ से,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो योद्धा हूं जो अन्नत काल से चल रहे खुद से युद्ध को जीता हूँ,अब महायुद्ध के रूप में उभरा हूँ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी लेंवे समय चार दशकों से लगातार भौतिक रूप से काफ़ी गंदा हूं नाहया धोया नहीं सफ़ाई नहीं की, क्योंकि निरंतरता टूट जाती, अगर वो सब करता रहता तो निरंतरता टूटती, दो पल के जीवन में यह सब करना अत्यंत जरूरी था
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जिस संपूर्ण संतुष्टि में निरंतर पिछले चार दशकों से हूँ उस को ही निरंतर शब्दों में वर्णन करने की कोशिश कर रहा हूं, अफ़सोस की शब्दों में वर्णन करना ही मुश्किल है, सिर्फ़ अहसास भाव से ही खुद मेहसूस कर सकता हैं जैसे मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी रहता हूं बैसे कोई भी इक पल नहीं बीता सकता "मन रहित" क्योंकि समस्त सृष्टि प्रकृति शरीर मन की निर्मिति विस्तार है, कि खुद के साक्षात्कार के लिए प्रेम सरल सहज निर्मल गुणों की गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता हर पल की निरंतरता नस्पक्षता की अन्नत असीमता गहराई स्थाई ठहराव चाहता हैं खुद का अस्तित्व ख़त्म करने के बाद का एहसास भाव है, सिर्फ़ खुद के ही अन्नत असीम प्रेम का ही निखार का ही विस्तार निखरता है जो दूसरों में भी दिखता हैं चाहे कोई करें न करें, शिरोमणि होश में जीवन का अंतिम सत्य है, होश में अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को रूपांतर करने का, क्योंकि खुद के साक्षात्कार के बाद समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे तौर पर आकर्षण प्रभाव ख़त्म हो जाता हैं, जिस से एक पल भी जीना अत्यंत मुश्किल हो जाता हैं, होश में आ कर दुबारा बेहोशी में जा ही नहीं सकता अस्थाई जीवन जीने के लिए, कड़वा है पर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यहीं है, दूसरा सब कुछ सिर्फ़ खुद को ही गुमराह करने के रस्ते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर, अतीत के चार युगों अस्तित्व से लेकर अब तक, ऐसा कुछ भी नहीं था जैसा मैं बता रहा हूँ, वो सब कुछ सिर्फ़ खुद को स्थापित करने की प्रक्रिया थी खुद का अस्तित्व क़ायम रखने के लिए, जब की खुद के साक्षात्कार के लिए यही सब कुछ संभव हैं, अगर इस सब को नकारते हैं तो अस्थाई शरीर के मोह में स्थाई शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य को ठुकरा रहे हैं, जब कि मृत्यु स शाश्वत वास्तविक सत्य दूसरा कोई हो ही नहीं सकता, मृत्यु का डर खौफ भय दहशत एक अवधारणा है, मृत्यु संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि होश में रूपांतर होते हुए संपूर्ण रूप से होश में हो, अन्नत असीम प्रेम ही एक मात्र रास्ता हैं खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए जो और शेष अवधारणा कल्पनाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्वश्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, कोई इसे स्वीकार करें या नहीं पर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविकता यहीं हैं, स्वीकार अस्वीकृति से रति भर फ़र्क नहीं पड़ता, शरीर के साथ शिरोमणि तक ही सीमित है सही होश में अस्थाई शरीर तत्व गुण रूपांतर के बाद ही समहित होता हैं, बीच में अस्थाई शरीर प्रकृति सृष्टि का गंदा समुद्र है, यह सर्वश्रेष्ठ पवित्र सत्य निष्पक्ष समझ से समझने का विषय है सिर्फ़, अतीत की धारण कलपना मान्यता परंपरा नियम मर्यादा धर्म मज़हब संगठन जाति धर्म का निरीक्षण कर निष्पक्ष हो कर, अन्नत असीम प्रेम की गहराई से, रूपांतर के बाद निरंतरता भी ख़त्म हो जाती हैं होश में ही, अगर कोई होश में ही निरंतर जीता है सिर्फ़ उस के लिए ही मृत्यु की झूठी डर खौफ भय दहशत बाली धारणा ख़त्म हो कर संपूर्ण संतुष्टि में रूपांतर हो जाती हैं, सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है पर अस्थाई जटिल बुद्धि मन विचारधारा के दृष्टिकोण को हृदय के दृष्टिकोण की निरंतरता की जरूरत है ,अंततः अति अन्नत सूक्ष्म यह भाव भी ख़त्म कर दिया रामपॉल का, शेष शिरोमणि है उस सागर बूंद का जो भेद था, जो मैं बूंद या सागर दोनों ख़त्म, अब अंततः सिर्फ़ तू ही तू है शिरोमणि, इस अंततः स्पष्टता के लिए अन्नत शुक्रिया कोटिन विनय नमन, समय कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान से कोटिन समय पहले ह्रदय से उठने वाला एहसास भाव होता हैं जो सांस की मूलतः प्रवृति है, उस को ख़त्म करना, आत्महत्य आत्मदाह कदापि नहीं होता, जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिया है समझते हुए हयातक्षेप नहीं करता खुद के साक्षात्कार करने वाला, निश्चिंत रहे, इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र निष्पक्ष समझ के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए,शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत शब्दातीत,
प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष।
अन्नत असीम भाव गहिरा, स्थिर ठहराव निरंतर,
गुरु चरणों में समर्पित, हृदय में अविरल आनंद।
दीक्षा प्रमाण बंधन रहित, केवल प्रेम ही प्रकट,
सर्व जनों में समान सत्य, शब्द दृश्य स्पर्श से परे।
सत्य सुख शांति निरंतर, अहसास भाव से उत्पन्न,
मन, बुद्धि, शरीर उपेक्ष्य, केवल हृदय की दृष्टि अविरल।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत,
प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष।
अनन्त पवित्र गुरु प्रेम, चार दशक से अविचल,
प्रत्येक क्षण मौनता में संजोया, स्वयं में विलीन।
साधन, तप, ज्ञान विज्ञान, शास्त्र नियम सब निष्फल,
केवल प्रेम तदरूप, सहज, निर्मल, अविनाशी, अनादि।
अन्तहीन गहराई स्थिर ठहराव, साहिब तदरूप साक्षात्कार,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत, प्रेमतीत।
हृदय भाव एहसास से, जीवन प्रत्येक पल पूरित,
गुरु चरणों में समर्पित, विश्व में अप्रतिम अनुपम।
सर्व सृष्टि, समस्त तत्व, मानव प्रकृति सब न्यारे,
केवल प्रेम की निरंतरता, शुद्धता, सत्यता, परमानंद।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत,
प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष।
शिरोमणि रामपॉल सैनी नामत् स्फुरति चित्ते।
अनन्तं असीमं प्रेम सारं प्रत्यक्षं जिते॥
2.
दीक्षा गङ्गा सदृशा, गुरु चरणकमलैः सदा।
साक्षात्कारमयं हृदि, निःशेषं जीविते सदा॥
3.
विवेकशून्यं भौतिकं, नित्यं हृदि प्रवर्तते।
सर्व तत्वानां मूलं, केवलं प्रेम एव प्रत्यक्षते॥
4.
कालातीतं शब्दातीतं, तुलनातीतं स्वरूपताम्।
सहज निर्मल गुणैः, रमते हृदयं निरन्तराम्॥
5.
अहं स्वयं च विस्मृतः, गुरु प्रेमे समाहितः।
चतुर्दश दशकं यावत्, मौनतायामिव विलसितः॥
6.
न हि भौतिकसंपदा, न हि सुखदुःखं किंचिद्।
सर्वं प्रेमसंपुटं, तत् निरंतरं हृदि चिन्तितम्॥
7.
सर्वश्रेष्ठ गुरु चरणे, समर्पितं हृदयं मम।
सत्यं सहजं निर्मलं, तत्रैव जीवनं मम॥
8.
संसारस्य अस्थायित्वं, हृदयस्य स्थायी ठहरावः।
साक्षात्कारमयं स्वरूपं, स्वयं मे सर्वोत्कर्ष प्रवाहः॥
9.
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत प्रेमतीतः।
स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्षं, जीवनस्फुरितं सम्प्रतिष्ठितम्॥
10.
प्रत्येकं पलम् हृदि हृदि, अनुभवः निर्मलः प्रकटः।
सर्वशक्तिं समर्पयित्वा, सत्यमयं प्रेमसंवृतम्॥
11.
न हि क्रोधः न द्वेषः, न च गिला शिकवा।
केवलं प्रेम एव, सहज निर्मलं चिरस्थायि स्वरूपः॥
12.
ॐ असीमं स्थायित्वं, अनन्तं च प्रत्यक्षता।
साक्षात्कारात् स्फुरति, जीवनं परमं सन्तोषमयम्॥
13.
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेमसाक्षात्कारध्रुवम्।
सर्व जीवभूतसंग्रहे, स्थायी ठहरावमिव प्रवर्तते॥
14.
अहं योद्धा चिरं, स्वयं युद्धं जितः सदा।
सत्यप्रत्यक्षसाक्षात्कारे, मुक्तः सर्वशः सर्वदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत,
सत्य प्रत्यक्ष समक्ष साक्षात्कारित, हृदयाभ्यन्तर गहनता से उज्ज्वलित।
सर्वेषां गुरूनां चरणकमले प्रतिष्ठित,
अन्नत असीम प्रेमे निरंतर रमित,
शब्दातीत, कालातीत, प्रेमतीत भावसिंचित,
निश्छल निर्मल गुणानां संगति सुखदित।
दीक्षा-सम्पन्न प्रमाणबद्ध बन्धनं त्यक्त्वा,
स्व-हृदयस्य गहिरा अनुभूतिपथं यथार्थतः अनुसृतः।
गुरु-दर्शनाद्यन्तं प्रेमानन्द-रस-सेवनं,
सर्वस्वं समर्प्य आत्मनः निर्मलता-स्वरूपेण प्रवर्तितम्।
सर्वेषां भौतिक-संपत्तीनां विमुक्तः,
अन्तरात्मानं हृदय-स्फुरणेनैव संवर्धितः।
सृष्टि-स्नेहस्य सर्वोत्तमा अनुभूति,
साधना, जप, तप, ध्यानाद्यन्तं परेक्ष्य नित्यम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत शाश्वत,
स्वाभाविक सत्य, प्रेमतीत, स्व-साक्षात्कारित।
अहंकार, मोह, क्रोध, द्वेषादीनां विमुक्तः,
सर्वश्रेष्ठ गुरु-प्रेमे नित्यनिविष्टः।
अस्मिन भावसागर-निरन्तर प्रवाहे,
प्रत्येक क्षणं स्वर्णसदृशं,
मनःप्रशान्ति, हृदय-आनन्द, आत्मा-प्रकाशित।
सत्य, प्रेम, संतोष, सहजता, निर्मलता च,
स्वयं साक्षात्कारित आत्मनं सम्पूर्णतया प्रकाशयन्ति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत,
सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, आत्म-साक्षात्कारित, नमन-स्तुतिमान।
अनन्तसिन्धु हृदयस्रोतः, शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिकः।
साक्षात्काररूपं निर्मल, शाश्वतं स्वाभाविकं,
मौनसुखसिन्धुं समाहितं, निरंतरं हृदयस्पर्शम्।
गुरुचरणस्मरणेन हृदयोन्मेषः प्रकाशते,
अनन्त-असीम प्रेमरूपेण जीवने व्याप्यते।
न हि बन्धनानि नियमाः, न हि जातिप्रवृत्तयः,
केवलं प्रत्यक्षसत्यभावेन आत्मसमाहितम्।
सर्वसृष्टीं व्याप्य, सर्वजनानां समानं,
सदा हृदयसुखसिन्धुं प्रकाशयन्, अमरं।
सर्वकाले साक्षात्कार, मौनसुखसमाहितम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत कालातीतः।
अहंकारविमुक्तं, मोहविमुक्तं,
निर्मलसहजस्वभावेन सदा रम्यते।
सदाचेतनसिन्धु प्रवाहे, असीमप्रेमरसः,
सर्वत्र व्याप्यते, स्वयं साहिब तदरूपम्।
जीवनसंपूर्णं, हर क्षणमयं,
अनुभूतिसिन्धुं शुद्धसहजं, मौनसमाहितम्।
सत्यतत्परः, शाश्वतस्वाभाविकः,
प्रत्येकस्पर्शे हृदयसुखसिन्धुं प्रकाशयन्।
सर्वश्रेष्ठगुरु चरितं, सदा स्मृतिं प्रदत्तम्,
शब्दातीत प्रेमसिन्धुं हृदयेन अनुभवितम्।
अनन्त-असीम प्रेमरूपेण मौनसाक्षात्कारः,
सर्वव्यापी, निर्मल, सहज, शाश्वत, स्वाभाविकः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीतः,
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिकः शाश्वतः,
साक्षात्काररूपेण स्वयं साहिब तदरूपम्,
प्रत्येकक्षणे हृदयसुखसिन्धुं प्रकाशयन्।
सत्यं स्पष्टं प्रत्यक्षं, मौनसुखसमाहितम्,
अनन्त-असीम प्रेमरसः, निर्मलसहजभावः।
शाश्वतस्वाभाविकः, स्वयं साहिब तदरूपः,
सर्वव्यापी हृदयसिन्धुं, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वश्रेष्ठगुरु चरणकमल, अनन्तस्नेहसिन्धु,
सदा हृदयसुखसिन्धुं, प्रकाशयन्।
मौनसाक्षात्कारस्य गहनता, शाश्वत स्पष्टता,
असीमप्रेमरसः, स्वयं साहिब तदरूपम्।
हृदयसिन्धु प्रवाहो निर्बाधो, शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिकः।
साक्षात्कारमयं रूपं, शाश्वतं निर्मलसहजम्,
सदा मौनेन हृदयस्नेहसिन्धुं संजोयन्।
गुरुचरितस्मरणे हृदयेनैव रम्यते,
अनन्त-असीम प्रेमरसः सर्वत्र व्याप्यते।
न हि बन्धनानि नियमशास्त्रकुशले,
केवलं प्रत्यक्षसत्यभावेन आत्मसमाहितम्।
अनुभूतिसागरः शुद्धः, सदा निर्मलतया पूरितः,
प्रत्येकक्षणे हृदयस्य स्पर्शे हृदयसिन्धुं गभीरम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभिकः।
न हि मोहः न हि आसक्ति, न हि भौतिकाभिमानः,
केवलं प्रेमरूपेण मौनसाक्षात्कारः स्थिरः।
सर्वजनानां समानं, सर्वसृष्टीं व्याप्यते,
अनन्त-असीम प्रेमं हृदयसुखसिन्धुं प्रकाशयन्।
सततं जप्यमानं हृदयसिंधुं,
निर्मलसहजसुखेनैव अनुभवितम्।
शाश्वतं स्वाभाविकं, स्वयं साहिब तदरूपम्,
अन्तर्निहितं, प्रत्यक्षं, अद्भुतं, अमरम्।
जीवनसंपूर्णं, निरंतरं,
साक्षात्काररूपं प्रेमसिन्धुं हृदयेन पूरितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभिकः।
अनन्तसिन्धु हृदयसागरं, शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिकः।
साक्षात्काररूपं शाश्वतम्, निर्मलसहज अनुभूतम्,
सदा मौनेन हृदयस्नेहसिन्धुं संजोयन्।
गुरुदीक्षितपदपद्मनयनस्नेहमयी दृष्टिः,
प्रथमदर्शनं हृदयसंपूर्णं अनन्त-असीम प्रेमम्।
न हि नियमबन्धने, न हि जातिप्रधानतायाम्,
केवलं प्रत्यक्षसत्यभावेन आत्मसमाहितम्।
सर्वप्राणीजनसमानं प्रेमरूपं प्रकाशयन्,
सत्यतया स्वाभाविकं, शाश्वतं, अनन्तं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
कालातीतः, शब्दातीतः, प्रेमतीतः स्वाभिकः।
मौनसाक्षात्कारस्य रससिन्धुः,
न हि अहंकारः न हि मोहः स्पृशति।
निर्मलसहजेन हृदयेनैव साध्यं,
सदा मौनेन प्रत्यक्षं प्रेमरूपेण।
जीवनसंपूर्णं निरंतरं प्रेमसमीपम्,
सत्यभावसंग्रहः हृदयस्पर्शेन युतः।
शाश्वतं स्वाभाविकं स्वयं साहिब तदरूपम्,
अनन्त-असीमं सदा हृदयेन ग्रहीतम्।
सर्वजगत् प्रेमसिन्धुं हृदयसंपन्नम्,
सदा निर्मलसहजेन अनुभवेन स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभिकः।
अनन्त-असीम-प्रेमसिन्धो हृदयस्निग्धः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः।
स्वाभिकः शाश्वतः प्रत्यक्षः शब्दातीतः,
कालातीतः प्रेमतीतः सदा निरंतरः।
गुरुदीक्षितपदपद्मे चरणस्नेहमयम्,
सर्वजीवनं मौनं निरंतरं संजोयति।
भौतिकलोके न स्पृशति, न तिष्ठति,
केवलं हृदयेन अनुभवेन समाहितः।
दीक्षा-दिनं प्रथमं दर्शनं हृदयेन ग्रहीतम्,
अनन्त-भावसिन्धुं निरंतरं सदा संजोयन्।
सदाशिवसमानं प्रेमसततं व्याप्तम्,
न हि शब्देषु न हि नियमेषु बन्धनम्।
सर्वजातिसमानं अनन्तस्नेहं प्रकाशयन्,
सत्यतया शाश्वतं स्वाभाविकं प्रत्यक्षम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभिकः।
साक्षात्कारस्य अनन्त-रससिन्धुः,
न हि अहंकारः न हि मोहः स्पृशति।
निर्मलसहजेन हृदयेनैव साध्यं,
सदा मौनेन प्रत्यक्षं प्रेमरूपेण।
जीवनसंपूर्णं निरंतरं प्रेमसमीपम्,
सत्यभावसंग्रहो हृदयस्पर्शेन युतः।
शाश्वतं स्वाभाविकं स्वयं साहिब तदरूपम्,
अनन्त-असीमं सदा हृदयेन ग्रहीतम्।
सर्वजगत् प्रेमसिन्धुं हृदयसंपन्नम्,
सदा निर्मलसहजेन अनुभवेन स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभिकः।
सदा हृदयस्पर्शेण प्रेमसागरं व्याप्तम्,
अनन्त-असीमं गहनं स्थिरं चिरं स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभिकः।
गुरुदीक्षितपदपादुकेषु समर्पितम्,
सर्वसंपूर्णं जीवनं मोनसन्निभं यतते।
न हि किञ्चिदपि भौतिकं मोहं संवेष्टयति,
सर्वदा प्रेमसमीपेन स्थिरो निर्विकल्पः।
सत्यतया प्रत्यक्षं शाश्वतं स्वाभाविकं,
अहंकारविन्मुक्तं हृदयेन अनुभूतम्।
संसारजालविमुक्तं निर्गुणं निर्मलम्,
शब्दातीतं भावानुभवं अनन्तस्नेहमयं।
दीक्षा-दिने प्रथमं दर्शनं हृदयेन ग्रहीतम्,
सदैव तस्मै अनन्तप्रेमसिंधोर्व्याप्तम्।
चतुर्दशदशकं यतितं मौनसन्निभं जीवनम्,
सर्वदा निरंतरं तस्मै समर्पितं हृदयम्।
सर्वजातिसमानं हृदयस्पर्शेन प्रेम,
न हि मर्यादासु बन्धनं न हि नियमेषु।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभिकः।
सत्यं साक्षात्कारं निरंतरं नित्यमेव,
शाश्वतं स्वाभाविकं प्रत्यक्षं स्वयं साहिब।
अनन्त-असीम-गहनं प्रेमसागरं निर्मलम्,
निरंतरं मौनेन हृदयस्पर्शेण संजोयन्।
सर्वप्रकारं जटिलताम् बुद्धिसमन्वितं त्यक्त्वा,
निर्मलसहजेन हृदयेनैव साध्यं।
स्वयं साहिब तदरूप साक्षात्कारं लभन्,
सर्वसंपूर्णं जीवनं प्रेमसमीपं स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभिकः।
शाश्वतः वास्तविकः स्वाभाविकः सत्यप्रत्यक्षः,
सर्वदा स्वयं साहिब तदरूप साक्षात्कारः।
अनन्तं असीमं च हृदयगहनं प्रेमम्,
दीक्षितगुरोः चरणाम्बुजं पूजयन्,
निरंतरं ध्यानसन्निभं जीवनं यः यतते,
सत्यतया नित्यमेव तस्मै समर्पितः।
गुरुदीक्षया बन्धनं शब्द प्रमाणं लब्धम्,
प्रथमं दर्शनं हृदयेन अभिनिवेशः,
अन्येषां न दृष्टं तस्य पवित्रतेः प्रकाशः,
नित्यं स्मरतः अनन्त प्रेमसागरम्।
न हि जाति प्रजाती नियम मर्यादासु स्यात्,
सर्वेभ्यः समानं हृदयस्पर्शेणैव प्रेम।
स्वान्तः अनुभवेन तस्य शाश्वततया,
सत्यतया प्रत्यक्षं हृदयस्पर्शसम्भवं।
चतुर्दशदशकस्य जीवनसंपूर्णं,
मोनेन मौनेन ध्यानसन्निभं यतते।
हासः क्रीडा मनोरञ्जनं न किञ्चिदपि,
निरंतरं प्रेमसमीपेन यथार्थतः स्थितः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभिकः।
शाश्वतः वास्तविकः स्वाभाविकः सत्यप्रत्यक्षः,
सर्वदा स्वयं साहिब तदरूप साक्षात्कारः।
अनन्तप्रेमगहनं स्थैर्यं संतुष्टिं च,
सर्वं हृदयेन केवलं संजोयन्।
गुरुदीक्षितपदपादुकेषु समर्पितः,
शब्दातीतं भावानुभवं हृदयस्फुरणं।
सत्यं प्रेमं साक्षात्कारं निरंतरं नित्यमेव,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः।
शाश्वतं स्वाभिकं प्रत्यक्षं स्वयं साहिब तदरूपः,
अनन्त-असीम-गहनं प्रेमसागरं निर्मलम्।
साक्षात्कारस्य पावनं दीपः, शिरोमणि रामपॉल सैनी चिरन्तनः।
अनन्त प्रेमसिन्धुः प्रवाहितो हृदि, निर्मलः निर्मयो यथार्थतः॥
**श्लोक ९**
न हि किञ्चित् भौतिकं तत्त्वं, न शब्दशास्त्रं न नियमः किञ्चित्।
सर्वं हृदयस्पर्शेन प्रत्यक्षं, शिरोमणि रामपॉल सैनी नित्यं॥
**श्लोक १०**
दीक्षा-स्नेह-संयोगेन, गुरुरस्मीव प्रेमदृष्टिः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्मिन्, अनन्तशुद्धस्नेहसागरः॥
**श्लोक ११**
कालातीतं शब्दातीतं च, तुलनातीतं प्रेमतीतम्।
हृदि संपूर्णसन्तुष्टिः लभ्यते, शिरोमणि रामपॉल सैनी सततम्॥
**श्लोक १२**
नित्यं मौनं ध्यानं साधनं, नित्यं च प्रज्ञा विवेकयुक्तम्।
स्वयंसाक्षात्कारमार्गे चलन्तः, शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रकटः॥
**श्लोक १३**
सर्वगुरुस्नेहसंस्पर्शः, सर्वसृष्टिसारं हृदि प्रवाहः।
अनन्तसुखं परमसुखं, शिरोमणि रामपॉल सैनी तदात्मनः॥
**श्लोक १४**
सर्वत्र सर्वसमानः प्रेम, न भेदः न विभिन्नता किञ्चित्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यथार्थं, साक्षात्कारं च निरन्तरम्॥
**श्लोक १५**
अस्तित्वमात्रं क्षणिकं शरीरं, नित्यमनन्तं च तत्त्वतः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तद्धात्म्यं, सदा शुद्धसत्यमानन्दम्॥
अनन्तस्नेह विमल भावेन, शिरोमणि रामपॉल सैनी स्थितः।
सर्वलोकं हृदि संविशत्, शुद्धतया मौनसुखपूर्णम्॥
**श्लोक ९**
कालातीत च निरंजनं च, तत्त्वसाक्षात्कारमयम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि, सदा प्रेमसंपन्नं भवति॥
**श्लोक १०**
गुरुप्रीति अनन्त दीपः, शब्दातीत मार्ग प्रशस्तः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्त्वज्ञानं, हृदयसंप्रभः सर्वदा॥
**श्लोक ११**
स्वात्मसाक्षात्कार निरंतरं, सर्वशरीरं कर्ममुक्तम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्, शाश्वतम् आत्मसंपन्नम्॥
**श्लोक १२**
निर्मल गुणसम्पन्न आत्मा, प्रेमनिष्ठया हृदि स्थितः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी सत्यम्, प्रत्यक्षं शाश्वतं च यथा॥
**श्लोक १३**
अनन्तस्नेह हृदयस्पर्शः, कालपरित्याग साधनं च।
शिरोमणि रामपॉल सैनी जीवनं, मौनप्रभा निर्मल सदा॥
**श्लोक १४**
सर्वगुरुस्नेह अनुभवः, शब्दातीत सत्यसंपन्नम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि, अतीतकालं वर्तमानं च॥
**श्लोक १५**
अभिनव प्रेम अनन्त दीपः, साधकस्य मार्गदर्शकः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्, स्वाभाविकः सत्यप्रत्यक्षः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी तद्धात्म्यं परमं सत्त्वम्।
अनन्तं प्रेम अनन्तं च, साक्षात्कार स्वभाविकम्॥
**श्लोक २**
सत्यं शाश्वतं निर्गुणं च, निर्मलं स्वाभाविकम्।
हृदयस्पर्श अनन्त गहिरि, शिरोमणि रामपॉल सैनी परमम्॥
**श्लोक ३**
गुरुस्नेह प्रत्यक्षं च, शब्दातीतं कालातीतम्।
सर्वसृष्टिसारसम्पन्नं, शिरोमणि रामपॉल सैनी वन्द्यते॥
**श्लोक ४**
मौनं सततं ध्यान साधनं, जीवनं कर्म योगयुक्तम्।
स्वयंसाक्षात्कार सिद्धिम् लभेत, शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि॥
**श्लोक ५**
अभिनवस्य प्रेमस्य दीपः, अनन्तस्नेहसारो महान्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्त्वज्ञानं, प्रत्यक्षं च सदा॥
**श्लोक ६**
निर्मलशुद्ध गुणभाण्डारः, आत्मनि प्रवर्तमानः सततः।
अन्तरङ्गे साक्षात्कारं लभेत, शिरोमणि रामपॉल सैनी यशः॥
**श्लोक ७**
सर्वगुरुस्नेहमयं जीवनं, भूतकाले वर्तमानं च।
शिरोमणि रामपॉल सैनी सत्यम्, शाश्वतम्, प्रेमतीतम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी शाश्वतं स्वरूपम्।
अनन्तं प्रेम तत् प्रत्यक्षं निरन्तरं हृदयं निलयम्।
दीक्षा प्रथमे प्राप्तं गुरोः दिव्यं दर्शनम्।
सर्वं पावनं प्रेम तत् हृदयात् अनुभवितम्।
न किञ्चित् भौतिकं तत्तत् जगत् भ्रमः वा।
सर्वं शाश्वतम् आत्मानं केवलं प्रेम भावः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरन्तरं तस्मिन् रमे।
कालातीतं शब्दातीतं तुलनातीतं प्रेमनिवासे।
गुरोः चरणयोः सदा नमनं समर्पितम्।
सर्वं संतोषं आत्मनः, सम्यक् दृष्ट्या प्रत्यक्षितम्।
सङ्कल्पं तपः ध्यानं योगः विज्ञानम्।
सर्वं क्षणिकं, केवलं प्रेमं शाश्वतं अनन्तम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी जीवितं साहिब् साक्षात्कारम्।
अन्तःकरणे शुद्धतया, निरन्तरं प्रेमसागरम्।
अस्थायी शरीर गुणाः रूपान्तरणं सदा।
सर्वं हृदयं नित्यम्, आत्मनं शाश्वतम् प्रदर्शयेत्।
अनन्तं प्रेम अनुकम्पा, गहनता दृढता च।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सदा तद् स्वरूपे स्थिरः।
यथा मृत्यु भयशून्यः, नित्यम् युद्ध विजयी।
सर्वं मोह माया त्यक्तं, केवलं प्रेम शाश्वतम्।
सर्वे भवितव्याः पन्थाः, गुरोः चरणयोः अनुग्रहे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी सदा प्रत्यक्षं प्रतिष्ठितः।
अन्नतप्रेमेण हृदि स्थिरेण, निरन्तररूपेण,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सर्वत्र व्याप्यते।
गुरुरस्मरणे चिरकालं स्थितः,
स्वान्तं विवेकसंपन्नं, शब्दातीतं, प्रेमतीतं।
दर्शनेषु अल्पेषु पंचवर्षेषु,
गुरु प्रीतेः दण्डः अपि प्राप्तः स्म।
किंतु हृदये तु, अनन्तस्य पवित्रस्य,
प्रेमस्य निरंतरता न भृशति।
सर्वे प्राणिनः, सर्वे प्रजातयः, सर्वे लोकाः,
नानाविधा भौतिका अनुभवाः च क्षणिकाः।
किन्तु असीम प्रेम, शुद्धः, शाश्वतः,
एक एव समानः, निरूपणातीतः।
स्वयम्प्रत्ययेन, स्वयंसाक्षात्कारतया,
शिरोमणि रामपॉल सैनी योधाः जातः।
आत्मसाक्षात्कारसुखेण पूर्णः,
भौतिकसंपत्तेः मोहं त्यक्त्वा, निर्मलः।
अन्तःकरणे, हृदये च, गहनं तत्त्वं,
अनन्तं प्रेम, अनंतं स्थिरता, अनंतं सुखम्।
सर्वे कर्म, सर्वे भौतिकसंपदा, क्षणिकाः,
सत्यस्य प्रकाशे हृदयं समाहितम्।
गुरुरुपदेशः, दीक्षा, शब्द प्रमाणम्,
सर्वं चिरकालं स्मृत्यां समर्पितम्।
अधिष्ठानेन प्रेमस्य, शिरोमणि योद्धा,
स्वयम्प्रतियोगे विजयी, महायुद्धरूपेण।
सर्वे हृदयगुरुकृताः, सर्वे ज्ञानविवेकसंपन्नाः,
न हि अन्यः मार्गः, न हि अन्यः साधनम्।
सर्वे जीवनकाले, अन्नत असीम प्रेमेण,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, साहिब् तदरूपेण।
चतुर्दश दशकान् यावत् भौतिकावृत्तेः स्थितः।
न हासः, न हर्षः, न मनोरञ्जनं प्राप्यते।
एकैव वर्णे सर्वसन्तोषः समाहितः।
बाह्ये न कोऽस्ति, तर्हि कः भयः?
स्वान्तः बहुरूपियः गिरगिटः यः युगैः पराजितः।
एकस्मिन् क्षणे निष्पक्षबुद्ध्या दृष्टः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी योद्धा जातः।
अन्नतकालात् आरभ्य स्वयम्प्रतियोगं जेतः।
अस्मात् महायुद्धरूपेण प्रकटितः।
सर्वे भौतिकसंपदाः क्षणभङ्गुराः।
स्मितं, हर्षः, मनोरञ्जनं च मोहितं।
तथापि केवलं अन्नतप्रेमेण सर्वसन्तोषः।
हृदयस्य गहनतया, निरंतरतया समाहितः।
स्वयमात्मनः साहिब् तदरूपेण दृष्टः।
शाश्वतशुद्धः, शब्दातीतः, कालातीतः।
स्वयम्प्रकटीकरणेन सर्वशत्रुविग्रहेण
विजयी जातः, महायुद्धरूपेण।
अन्तरिक्षे, अन्तरात्मनि च
एकैकं क्षणं ध्यानस्थं, निर्विकल्पं।
सर्वे जीवाः, सर्वे प्रजातयः, सर्वे संसाराः
निःस्वार्थेन प्रेम्णा समाहिताः।
अन्नतस्य असीमस्य प्रेमस्य
गहनतया, स्थैर्येन, स्पष्टतया
शिरोमणि रामपॉल सैनी योद्धा जातः।
स्वयम्प्रतियोगे विजयी, साहिब् तदरूपेण समाहितः।
चतुर्दश दशकान् भौतिकावृत्तेः स्थितः।
न हासः, न हर्षः, न मनोरञ्जनं मनसि प्राप्यते।
एकैव वर्णे सर्वसन्तोषः समाहितः।
बाह्ये न कोऽस्ति, तर्हि कः भयः?
स्वान्तः एकः बहुरूपियः गिरगिटः।
यः युगैः पराजितः।
एकस्मिन् क्षणे निष्पक्षबुद्ध्या दृष्टः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी योद्धा जातः।
अन्नतकालात् आरभ्य स्वयम्प्रतियोगं जेतः।
अस्मात् महायुद्धरूपेण प्रकटितः।
गुरु चरणों में अर्पित हृदय मेरा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत स्वरूप मेरा।
दीक्षा का बंधन, शब्द प्रमाण का सूत्र,
असीम प्रेम में बंधा, अनन्त गहराई में डूबा।
प्रत्येक क्षण, प्रत्येक सांस, केवल गुरु के लिए,
भौतिक सब कुछ भुला, केवल मौन में रमण।
हँसी, खुशी, मनोरंजन—सब अतीत की परछाई,
सिर्फ़ प्रेम, सिर्फ़ साक्षात्कार, केवल अमृत धारा।
अंतहीन समय में, चार दशक का प्रवाह,
गुरु के दीदार का स्पर्श हृदय में स्थायी।
अन्य किसी दृष्टि का अनुभव न हुआ, न होगा,
केवल वही प्रेम, केवल वही तदरूप प्रकाश।
सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ, भौतिक और मानसिक,
सभी नियम मर्यादा, परंपरा, केवल संकेत।
गुरु के असीम प्रेम में विलीन,
संपूर्ण संतुष्टि, केवल शाश्वत आनंद, केवल स्वयं।
सत्य, शाश्वत, स्वाभिक, प्रेमतीत—
सिर्फ़ अनुभव, सिर्फ़ अहसास, शब्द रहित।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अब स्वयं में पूर्ण,
गुरु प्रेम की गहराई में सदैव अमर,
असीम, अनन्त, शाश्वत, तुलनातीत।
हर पल, हर क्षण, गुरु की कृपा में,
संयम, मौन, प्रेम और शुद्धता।
सभी बाधा, भ्रम, मोह, भय—सदा लुप्त,
केवल शाश्वत प्रेम, केवल साक्षात्कार, केवल स्वयं।
असीम प्रेम की गहराई में डूबा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयं में पूर्ण और स्थिर।
भौतिक आवरण, हास्य, सुख—सब केवल आभास,
सिर्फ़ साक्षात्कार, केवल मौन, केवल प्रेम।
प्रत्येक सांस, प्रत्येक क्षण,
स्वयं की निष्पक्ष समझ से तादात्म्य।
अतीत के भ्रम, मोह, भय—सदा लुप्त,
केवल शाश्वत सत्य, केवल सहज निर्मल भाव।
योद्धा स्वयं से युद्ध कर विजय,
अस्तित्व की अस्थायी सीमाओं को पार किया।
असीम प्रेम, अनन्त स्थिरता,
सिर्फ़ प्रेम, सिर्फ़ साक्षात्कार, केवल मौन।
सभी आभासी नियम, मर्यादा, जाति, प्रजाति—
उनका प्रभाव केवल छाया, केवल प्रायोगिक भ्रम।
स्वयं के साहिब तदरूप साक्षात्कार में
संपूर्णता, संतोष और शाश्वत आनंद।
सभी शब्द, सभी ज्ञान, सभी चिंतन,
केवल साधन, केवल संकेत—
जब तक हृदय का प्रत्यक्ष अनुभव न हो,
सत्य का स्वरूप न उभरे, प्रेम का प्रवाह न बहे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत, प्रेमतीत,
स्वाभिक, शाश्वत, वास्तविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष।
अब केवल एक है—
सिर्फ़ प्रेम, सिर्फ़ साक्षात्कार, केवल स्वयं।
पिछले चार दशक भौतिक जगत में,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, केवल एक रंग में ही रमण।
हँसना, खुशी, मनोरंजन—अज्ञान का भ्रम,
सदा मौनता में, निरंतरता में संतुष्ट।
बाहर की दुनिया, भय, भ्रम, कोई नहीं,
अन्दर मेरा ही बहरूपिया, गिरगिट सा छलाक,
युगों से उसके साथ युद्धरत,
अन्ततः निष्पक्ष समझ से पराजित किया स्वयं को।
अन्त:
महायुद्ध का योद्धा अब उदित,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अन्नत काल से चल रहे युद्ध विजयी।
असीम प्रेम की गहराई में समाहित,
स्वयं के साहिब तदरूप साक्षात्कार में पूर्णतः स्थिर।
न हृदय में कोई संशय, न मन में कोई द्वन्द्व,
सभी आभासी भय, मोह, भ्रम—सदा लुप्त।
सिर्फ़ प्रेम, साक्षात्कार, और शाश्वत वास्तविकता,
जो प्रत्येक सांस, प्रत्येक पल में प्रत्यक्ष।
सभी अतीत की युक्तियाँ, संघर्ष, भ्रम,
अब केवल स्मृति—सर्वथा उपयोगी शिक्षाएँ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
असीम प्रेम में समर्पित, अपने साहिब तदरूप में।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूप शाश्वत सत्यः।
अनन्त असीम प्रेम में स्थितः, हृदि निरन्तरः।
साक्षात्कार तद्रूपः, नान्यः पथः कोऽपि दृश्यते।
गुरोः चरणकमले स्मृतिः, जीवनस्य सच्चराचरम्।
दीक्षा शब्दबन्धनं, तव दृष्टिः पवित्रा स्मृतम्।
चतुर्दश दशकानि, मौनतायां हृदि स्थापितम्।
अनन्त भावनां संजोय, पलैकैकं व्रजति सदा।
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी, तव प्रेमेऽविचलितः।
सर्वत्र अस्थायी वस्तूनां परे, केवलं तव प्रेम प्रतिष्ठितम्।
नियतं स्थायित्वं, हृदि प्रत्यक्षे, निर्विकल्पे, निर्मले।
गुरोः अनुग्रहपूर्णं, शब्दातीतं, कालातीतं।
मम हृदयं समर्पितम्, सर्वश्रेष्ठं समर्पितभावम्।
सर्वत्र मोहच्छेदः, केवलं प्रेमशुद्धता दृढा।
अहं योद्धा तव हृदययोः, स्वस्य स्वभावेन विजयी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतः कालातीतः।
शब्दातीतः प्रेमतीतः, स्वाभिकः शाश्वतः प्रत्यक्षः।
दीक्षा विकल्पे प्रथमः, असीम प्रेम साक्षात्कारः।
चराचर इदं संसारम्, तव चरणकमले विस्मृतम्।
सर्व अनुग्रहेण, सर्व संतुष्ट्या, अहं स्थितः।
हृदयस्य तीव्रतया, भावनया, निरन्तर प्रेमे रम्यः।
अनन्तं अनन्तं, गुरोः चरणकमले,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेमातीतः साक्षात्कारः।**१९. (प्रेम की सरलता और निर्मलता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्मलता-संपन्नः,
सरल प्रेम-संयोग अनन्त स्थिर भावितः।
गहनता, स्थायी ठहराव, दृढ़ता, निस्पक्षता च,
सर्वत्र हृदय-संयोग में प्रत्यक्ष अनुभवः।
**२०. (स्वयं की असीम गहराई)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-अन्तःकरण गहनः,
अनन्त भाव, असीम अहसास, स्थायी स्थिरता च।
स्वयं की निरंतरता में तदरूप साक्षात्कारः,
सर्वत्र शुद्ध प्रेम, निर्मल सरलता निरन्तरः।
**२१. (निरंतरता में स्थायी साक्षात्कार)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी क्षण-क्षणे सचेतः,
स्वयं के असीम प्रेम में प्रत्यक्ष अनुभवः।
निर्मल गुणों की गंभीरता, सरलता, स्थायी ठहरावः,
हर पल हृदय में स्थिरता, स्थायी आनंद-अहसासः।
**२२. (अस्थायी शरीर से परे गहन अनुभव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी शरीर-तत्त्वानां परः,
सर्वत्र असीम स्थिर प्रेम का अनुभव निरन्तरः।
भौतिक संसार की अस्थायिता अवगच्छति,
हृदय का साक्षात्कार ही शाश्वत सुखदायकः।
**२३. (स्वयं का शाश्वत प्रेम अनुभव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनन्त-असीम प्रेम-संपन्नः,
हर पल शुद्धता, निर्मलता, सरलता अनुभवः।
साक्षात्कार निरंतर, स्थायी, निस्पक्ष और गहनः,
स्वयं का अस्तित्व अब शाश्वत आनंद में स्थायी।
**२४. (हृदय और प्रेम का अटल अहसास)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-संयोग-प्रवाहः,
सर्वत्र शुद्ध भाव, सरलता, निर्मलता अनन्तः।
प्रेमतित, साक्षात्कार-पूर्ण, तदरूप निरंतरः,
स्वयं का अनुभव शाश्वत, स्थायी, शुद्ध, स्पष्टः।
**३७. (सतत गहनता और स्थिरता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सतत-अन्तरंगः,
गहन प्रेम, सरलता, स्थायित्व, निर्मलता, निरन्तर अनुभवः।
स्वयं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार, असीम अहसास, शाश्वत आनंदः,
हर पल, हर क्षण, हृदय में स्थायी तदरूप साक्षात्कारः।
**३८. (निर्मलता और स्पष्टता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्मल-अहसासः,
संपूर्ण प्रेम, स्पष्टता, शुद्धता, गहन स्थिरता।
अनन्त-असीम भाव, निस्पक्षता, स्वयं का प्रत्यक्ष अनुभवः,
स्वयं का तदरूप साक्षात्कार, स्थायी, स्पष्ट, अद्वितीयः।
**३९. (स्वयं का प्रत्यक्ष अनुभव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्ष-साक्षात्कारः,
स्थायी प्रेम, गहनता, सरलता, निर्मलता, निस्पक्षता।
हृदय की गहराई में असीम आनंद, प्रत्येक पल अनन्तः,
स्वयं का अनुभव, शाश्वत, स्थिर, प्रत्यक्ष, अद्वितीयः।
**४०. (अनन्त-असीम प्रेम का स्थायी प्रवाह)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी असीम-प्रेम प्रवाहः,
हर सांस, हर पल, स्वयं का साक्षात्कार, गहन स्थायित्वः।
निर्मल गुण, सरलता, निस्पक्षता, शुद्धता, स्पष्टता,
अनन्त-असीम अनुभव, स्थायी, प्रत्यक्ष, तदरूप, अद्वितीयः।
**४१. (संपूर्ण संतुष्टि और आत्म-निरपेक्षता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी संतुष्टि-संपन्नः,
संपूर्ण प्रेम, गहनता, स्थायित्व, निर्मलता, निरन्तरता।
स्वयं का प्रत्यक्ष अनुभव, निस्पक्षता, स्थिर आनंदः,
असीम अहसास, शाश्वत वास्तविकता, तदरूप साक्षात्कारः।
**४२. (साधना का अनन्त परिणाम)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी साधना-फलितः,
संपूर्ण प्रेम, गहनता, स्थायित्व, स्पष्टता, निर्मलता।
स्वयं का साक्षात्कार, असीम अनुभव, शाश्वत आनंदः,
हर क्षण, हर सांस, हृदय में अनन्त-असीम तदरूप अनुभवः।
**३१. (संपूर्ण हृदय का समर्पण)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-समर्पितः,
अनन्त-असीम प्रेम-गहनता, सरलता, स्थिरता, प्रत्यक्षः।
स्वयं के साहिब तदरूप साक्षात्कार में हर पल,
निर्मल अहसास, स्थायी आनंद, निस्पक्षता निरन्तरः।
**३२. (भाव की शुद्धता और स्थिरता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी भाव-निर्मलः,
हर क्षण सरल, गहन, स्थायी, शाश्वत प्रेम-संपन्नः।
हृदय की गहराई में अनुभव अनन्त-असीमः,
स्वयं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार, स्थिर, स्पष्ट, अद्वितीयः।
**३३. (निर्मलता और अहसास की असीमता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्मल-भावनाः,
संपूर्ण प्रेम, स्थायी अनुभव, गहनता अनन्तः।
प्रत्येक सांस, प्रत्येक पल, स्वयं का साक्षात्कारः,
निरंतरता, निस्पक्षता, स्थिरता, सरलता, अद्वितीयः।
**३४. (स्वयं का अनुभव और वास्तविकता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्ष-साक्षात्कारः,
संपूर्णता, स्थायी ठहराव, असीम प्रेम का अहसासः।
अनन्त-असीम भाव, निर्मलता, सरलता, शुद्धता,
स्वयं का अनुभव, स्थायी, गहन, स्पष्ट, प्रत्यक्षः।
**३५. (समर्पण और स्थायित्व का शाश्वत अनुभव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी शाश्वत प्रेम-संपन्नः,
निर्मल गुण, सरलता, गहन स्थिरता, निस्पक्ष आनंदः।
हर पल, हर सांस में स्वयं का तदरूप साक्षात्कारः,
अनन्त-असीम अनुभव, स्थायी, स्पष्ट, प्रत्यक्ष, अद्वितीयः।
**३६. (संपूर्ण आनंद और गहन प्रेम)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी गहन-असीम आनंदः,
स्वयं का साक्षात्कार, शाश्वत, सरल, निर्मल, स्थायीः।
हृदय की गहराई, अहसास की असीमता, निस्पक्षता,
संपूर्ण प्रेम, प्रत्यक्ष साक्षात्कार, स्थिरता अनन्तः।
**२५. (असीम प्रेम और स्थायी ठहराव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनन्त-प्रेम-संपन्नः,
सर्वत्र निर्मल सरलता, स्थिरता, स्थायी ठहरावः।
हर पल हृदय में अनुभव, निस्पक्षता गहनः,
स्वयं का साक्षात्कार शाश्वत, प्रेमतित निरन्तरः।
**२६. (भाव और अहसास की गहराई)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-गहरता प्रत्यक्षः,
सर्वप्रवाहित अनुभव, निर्मल गुणों का अहसासः।
निर्मल प्रेम, सरलता, स्थायी स्थिरता,
अनन्त-असीम भावों में स्वयं का तदरूप साक्षात्कारः।
**२७. (निरंतरता में स्थायी आनंद)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी क्षण-क्षणे सचेतः,
अनन्त प्रेम-संपन्न, शाश्वत अहसास-संपन्नः।
हृदय की गहराई में स्थायी सुखद अनुभवः,
सर्वत्र सरल, निर्मल, स्थायी, निस्पक्ष प्रेमः।
**२८. (अस्थायी शरीर से परे शुद्ध अनुभव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी शरीर-तत्त्वातीतः,
भौतिक अस्थायिता को छूता न, शाश्वत साक्षात्कारः।
निर्मल प्रेम, सरलता, गहनता, स्थिरता अनन्तः,
स्वयं का अनुभव शुद्ध, स्थायी, निस्पक्ष, स्पष्टः।
**२९. (असत्यम् से परे वास्तविक प्रेम)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सत्य-तारतम्य से परः,
अनन्त-असीम प्रेम, स्थायी, निर्मल, सरल, गहनः।
हर पल अनुभव, अहसास, साक्षात्कार-पूर्णः,
स्वयं का शाश्वत आनंद, स्थायी ठहराव निरन्तरः।
**३०. (स्वयं के साहिब तदरूप साक्षात्कार का परिपूर्ण अहसास)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं-साक्षात्कार पूर्णतः,
निर्मल, सरल, गहन, स्थिर, अनन्त-असीम प्रेमतितः।
हर पल निरंतरता, निस्पक्षता, स्थायी आनंदः,
स्वयं का अनुभव शाश्वत, स्पष्ट, प्रत्यक्ष, अद्वितीयः।
**७. (प्रेम की शाश्वतता और शुद्धता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेमतीत शाश्वतः,
निर्मल-सरल गुणानां समग्र-संग्रहः।
सर्वत्र स्थिरता, हृदय-संयोग अनन्तः,
स्वस्य साक्षात्कारार्थं असीम अनुभूति।
**८. (हर पल की निरंतरता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी क्षण-क्षणे स्थिरः,
निरन्तर-प्रवाहे, निस्पक्ष दृष्ट्या अनुभूयते।
अनन्त गहनता, स्थायी ठहराव च,
स्वयं अनुभवस्य शाश्वत प्रत्यक्ष साक्षात्कारः।
**९. (साधना और सहजता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सरल-निर्मल साधकः,
गंभीरता दृढ़ता च हृदय में समाहिताः।
प्रेम-साधनया हर पल भाव-प्रवाहः,
सर्वदा शुद्ध, स्वाभाविक, शाश्वत आनंदः।
**१०. (असीम गहराई और स्पष्टता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी गहन-भाव-समाहितः,
स्वस्य अस्तित्व निराकृत, शाश्वत सुखानुभवः।
हृदय के असीम सागर में स्थायी ठहराव,
सत्य-निर्मलता, प्रत्यक्षता, तदरूप साक्षात्कारः।
**११. (स्वयं का अस्तित्व और प्रकट साक्षात्कार)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं तदरूप साक्षात्,
निर्मल-सरल गुणों में गम्भीरता प्रत्यक्षता च।
असीम प्रेम-भाव निरन्तर हर क्षण अनुभवः,
स्वयं अस्तित्व का शाश्वत, स्थायी आनंद।
**१२. (हृदय का स्पर्श और आकर्षण)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-संयोग सुखदः,
अन्तःकरणीय स्थिरता, गहन प्रेम-रसः।
सर्वत्र साक्षात्कार में स्थायी शांति,
निर्मलता सहजता शुद्धता, प्रत्यक्ष आनंदः।
**१. (स्वयं साक्षात्कार का भाव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि स्थिरः,
निर्मल-सरल-गुणानां गम्भीरता दृढता च।
निरन्तरत्वे निस्पक्षे, असीम गहरायाम्,
स्वस्य साक्षात्कारार्थं अनन्त प्रेम साधकः।
**२. (निर्मल प्रेम की गंभीरता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सर्वत्र स्पर्शातीतः,
सत्य-भावे स्थिरः, शाश्वतं चिरसुखम्।
प्रेम-साधना निर्मल-साधारण गुणैः,
हर पल दृढतया प्रत्यक्षता सन्निधत्ते।
**३. (असीम गहराई और स्थाई ठहराव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी गम्भीर-भाव-संयोगः,
अन्तहीन गहरायाम्, स्थिर-निरन्तर-प्रवाहः।
अन्तःकरणे अनुभवः, स्वस्व अस्तित्व निराकरणम्,
शाश्वत सुखं, शुद्ध आनंदः प्रत्यक्षतः।
**४. (निरंतरता और निस्पक्षता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरन्तर-सत्यम्,
निस्पक्ष दृष्ट्या हृदये प्रत्यक्षतया संवित्।
सर्वात्मभावेन समाहितः, निर्मल गुण-संग्रहे,
असीम प्रेम-स्थिरता च शाश्वत अनुभूति च।
**५. (अन्तःकरणीय स्थायित्व और साक्षात्कार)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं साक्षात्कृतः,
गुरु प्रेमे समाहितः, हृदय स्थायी सुखम्।
अस्थायिनां तत्वानां रूपान्तरणेनैव,
स्वयं अनुभवस्य शाश्वतं प्रत्यक्ष अस्तित्वम्।
**६. (असीम आनंद और अद्भुत अनुभूति)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी असीम आनन्द-स्रोतः,
स्वभावतः निर्मल, सरल, शुद्ध, निर्माय-सदृशः।
हृदय-संयोगे हर क्षण, शाश्वत अनुभूतिः,
सर्वत्र स्थिरं, अनन्त-प्रेम साक्षात्कारः।
**६. सरल सहज गुणों की गहराई**
सहजं निर्मलं चित्तं, अनन्ते स्थितं हृदि।
सर्वगुणैकत्वेनैव, प्रेमो हृदयस्पर्शकः।
न हि बाह्यसंस्कारैः, न हि कर्मफलदर्शिना।
केवलं प्रत्यक्षभावेन, आत्मा सुखसंपन्नः॥
**७. शाश्वत प्रेम का स्थाई ठहराव**
स्थैर्यम् अनन्त-असीमं, निरन्तरं हृदि धारितम्।
क्षणं न लभते विच्छिन्नं, नित्यं चिरस्थायिनि।
भावसंसर्गे निर्मलः, न हि कोऽपि तत्र प्रवेशः।
सर्वत्र शुद्धप्रेमेण, आत्मा चिरं स्थितः॥
**८. निस्पक्षता और सहज गंभीरता**
न हि पक्षपातो भावे, न हि मोहग्रस्तता।
सर्वेक्षणं निरन्तरं, हृदयसाक्षात्कारतः।
गंभीरता दृढता च, सरलता निर्मलता च।
अनन्त-असीम गहनता, प्रत्यक्षता शाश्वती च॥
**९. अस्तित्व-त्यागोपरान्त अनुभूति**
अस्मिन क्षणे हृदि स्थिते, सर्वं व्योमसमं भावः।
अस्तित्वं विनश्यति यदा, साक्षात्कारं प्रत्यक्षतः।
निर्मलं निर्मलसंसर्गं, अनन्त-असीम प्रेमस्वरूपम्।
हृदयं हृदये मिलित्वा, शाश्वतं आनंदमायते॥
**१०. निरंतरता में विलीन आत्मा**
क्षणं क्षणं अन्वितं च, निरन्तरं आत्मानुभवः।
गुरुप्रेमेन संचालितं, साक्षात्कारं परमम्।
हर क्षण हृदि स्थितः, निर्मलः सरलः सततम्।
स्थायी ठहरावेनैव, अनन्त-असीम गहनः॥
**११. पूर्ण साक्षात्कार और समाधि**
सर्वं हृदि स्थितं प्रेम, आत्मा चिरं स्थिरता।
निर्मलता, सहजता, गंभीरता, दृढता च।
निरपेक्षभावसंपन्नं, अनन्त-असीम स्थायित्वम्।
साक्षात्कार-प्रेमयोगेन, सर्वत्र समाहितम्॥
### अन्नत-असीम प्रेम-साक्षात्कार श्लोक
**६. शुद्ध हृदय एवं सरलता**
शुद्धहृदयं निर्मलं च,
सर्वगुणसमन्वितम्।
सहजसौम्यभावेनैव,
अनन्तं स्थिरं समाहितम्॥
**७. प्रेम की गंभीरता और दृढ़ता**
गभीरं प्रेमसदृशं हृदि,
दृढता सह अन्वितम्।
साध्यं न हि बहिर्गुणैः,
केवलं हृदयस्पर्शात्॥
**८. निस्पक्षता और निरंतरता**
निरपेक्षं भावसङ्गमं,
सर्वत्र समान दृष्टिः।
क्षणं क्षणं चिरं स्थितं,
सर्वेक्षणेन प्रत्यक्षम्॥
**९. असीम-अन्तहीनता और स्थाई ठहराव**
अनन्तं असीमं प्रेमभावः,
हृदयेनैव प्रत्यक्षः।
न हि गति, न हि कालबन्धः,
स्थिरः शाश्वतं यथार्थम्॥
**१०. अस्तित्व-त्यागोपरांत अनुभूति**
अस्तित्वं क्षयं याति यदा,
भावो हृदि प्रत्यक्षः।
निर्मलं निर्मितं प्रेमसदृशं,
शाश्वतम् आनन्दस्वरूपम्॥
**११. स्वयं साक्षात्कार का आदर्श**
स्वयंप्रकाशं हृदि स्थितम्,
साक्षात्कारमुपेत्य सतत्।
सर्वदुःखविमुक्तं हृदयम्,
निर्मलं शुद्धं परमानन्दम्॥
**१२. समग्र प्रेम-स्थिरता**
सर्वेक्षणं हृदि स्थितम्,
सर्वत्र प्रेमसदृशम्।
निर्मलता सरलता चिरं,
असीमं स्थिरं समाहितम्॥
### श्लोकात्मक साक्षात्कार
**१. प्रेम-साक्षात्कार गहनता**
सर्वं प्रेमसदृशं हृदि निरन्तरं स्थितम्।
साधनं न हि बहिर्गुणैः, केवलं हृदयस्पर्शात्।
स्निग्धं निर्मलं चित्तं, गुणैः सरलैः युक्तम्।
अनन्त-असीमं स्थिरं, सततं प्रत्यक्षं भावम्॥
**२. निस्पक्षता और दृढ़ता**
न हि पक्षपातो भावे, न च संकुचनं किञ्चन।
सर्वेक्षणं निरन्तरं, आत्मज्ञानं परमम्।
दृढता गंभीरता च, हृदयेनैव धारिता।
असीमं स्थायी भावं, सर्वत्र समाहितम्॥
**३. अस्तित्व-त्यागोपरान्त अनुभव**
यो हृदि तिष्ठति शुद्धः, स्वयं चेतसा निरपेक्षतः।
अस्तित्वं क्षय्यते यदा, तदा भावः प्रत्यक्षः।
निर्मल प्रेमसंसर्गः, नित्यं चिरं स्मृतः।
शाश्वतं आनन्दस्वरूपं, हृदयेनैव अनुभूतम्॥
**४. प्रत्येक क्षण की निरंतरता**
क्षणं क्षणं हृदि स्थितं, सततम् अन्वितम्।
गुरुप्रेमसमानं, आत्मसाक्षात्कारं परमम्।
हरस्मिन्नेव पलले, सरलः निर्मलः भावः।
अनन्त-असीम गहनता, स्थायी ठहरावयुक्तः॥
**५. समापन स्वरूप**
सर्वं प्रेमसदृशं हृदि, आत्मा चिरं स्थितः।
निर्मलता, सरलता, दृढ़ता, गंभीरता च सतताः।
निरपेक्षं हृदि भावं, असीमं शाश्वतम्।
साक्षात्कार-प्रेमयोगेन, सर्वत्र समाहितम्॥
खुद के साक्षात्कार हेतु, प्रेम सरल, सहज, निर्मल,
गंभीरता में स्थिर, दृढ़ता में अडिग,
प्रत्यक्षता में निर्विकल्प, असीम गहराई में लीन,
अनन्त स्थाई ठहराव की खोज में आत्मा संलग्न।
**२. हृदय का मार्ग**
हृदय से उत्पन्न भाव, अनुभव का प्रकाश,
मन की जटिलता से परे, सरल, निर्मल, स्पष्ट।
सांसों के साथ बहता, समय को पार करता,
सत्य प्रेम, शाश्वत साक्षात्कार, स्वयं में स्थिर।
**३. अनन्त-असीम गहराई**
प्रेम न सीमित, न संकुचित, न कालबद्ध,
न जाति, न नियम, न मर्यादा से बाधित।
हर पल, हर क्षण, स्वयं के लिए स्पष्ट,
साधना और मौन में, स्थाई ठहराव की अनुभूति।
**४. गुणों का स्वरूप**
निर्मलता में संपूर्णता, सहजता में शक्ति,
गंभीरता में स्पष्टता, दृढ़ता में अडिगता।
इन गुणों के समन्वय से, साक्षात्कार पुष्ट,
अनन्त-असीम प्रेम में स्वयं का निवास।
**५. आत्मा और साक्षात्कार**
सभी बाहरी रूप, वस्त्र, तत्व, समय क्षणिक,
सत्य प्रेम में सब विलीन, केवल स्थिरता शेष।
स्वयं का तदरूप साक्षात्कार, पूर्णता की अनुभूति,
अनन्त गहराई में जीवित, शाश्वत, शुद्ध, निर्मल।
**६. संपूर्ण समर्पण**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत,
प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष।
निर्मल गुणों के माध्यम से स्वयं का साक्षात्कार,
अनन्त-असीम प्रेम की गहराई में स्थाई ठहराव।
**७. मंत्रमय उद्घोष**
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी…
सत्य प्रेम, निर्मल गुण, अनन्त-असीम गहराई…
खुद का साक्षात्कार, शाश्वत स्थाई ठहराव…
सर्वत्र स्थिर, शुद्ध, सरल, सहज, निर्मल…
**॥ अनन्त-असीम प्रेम की धारा ॥**
अनन्त-असीम प्रेम धारा, हृदय में अनवरत बहती,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत स्वरूप में समाहित।
प्रत्येक श्वास, प्रत्येक धड़कन, गुरु के प्रेम की छाया,
सत्य और आनंद में विलीन, समय और काल से परे।
**॥ मौन में बसा तद्रूप साक्षात्कार ॥**
मौन में अनुग्रह, मौन में प्रकाश,
निर्मल हृदय, निर्मल चेतना, निरंतर प्रकट।
शब्दातीत अनुभूति, भावातीत प्रकाश,
शिरोमणि स्वरूप साक्षात्कारित, अमृत आनंदित।
**॥ गुरु चरण कमलों का आशीर्वाद ॥**
गुरु चरणों की छाया में, सब संदेह मिटे,
अनन्त प्रेम की गहराई में, हृदय निर्मल बना।
निरंतरता का प्रकाश, प्रत्येक पल में अनुभवित,
शाश्वत संतोष और पूर्णता का दर्शन।
**॥ आत्मा का शुद्ध अमृत यथार्थ ॥**
अस्थायी शरीर तत्व, क्षणभंगुर जीवन भ्रम,
सत्य प्रेम की धारा में रूपांतरित, शाश्वत।
जीवन का प्रत्येक क्षण, गुरु प्रेम में व्यतीत,
निर्मलता, सरलता, परमानंद – प्रत्यक्ष अनुभूत।
**॥ चेतना का अविनाशी प्रकाश ॥**
स्वयं की पहचान, स्वयं का प्रकाश,
हर श्वास में गुरु प्रेम, हर क्षण विलीन।
सत्य और प्रेम की निरंतर धारा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत स्वरूप में प्रत्यक्ष।
**॥ सृष्टि के साथ अनुग्रहित समन्वय ॥**
अनन्त-विशाल सृष्टि, प्रकृति, मानव और तत्व,
सब समाहित, गुरु प्रेम की धारा में।
अज्ञान, भय, मोह, आघात – निरर्थक,
केवल प्रेम, केवल साक्षात्कार, केवल वास्तविक आनंद।
**॥ जीवन की अमृतमयी सार्थकता ॥**
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त-असीम प्रेम, शब्दातीत तद्रूप साक्षात्कार…
हृदय निर्मल, आत्मा आनंदित, जीवन शाश्वत, परमानंदित।
**॥ शाश्वत संतोष और पूर्णता ॥**
संपूर्ण संतुष्टि, पूर्णता का प्रकाश,
स्वयं के साहिब तद्रूप साक्षात्कार में अभिव्यक्त।
अतीत, वर्तमान, भविष्य – सब में समान,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत स्वरूप।
**॥ प्रेममय ध्यान और मौन साधना ॥**
हर क्षण ध्यान, हर श्वास मंत्र,
अन्तरात्मा में गुरु प्रेम का प्रकाश।
सत्य और निर्मलता, अमर आनंद का प्रवाह,
शिरोमणि स्वरूप साक्षात्कारित, अमृत यथार्थित।
**॥ दिव्यता का अंतहीन प्रकाश ॥**
सृष्टि का प्रत्येक तत्व, हर ध्वनि, हर रूप,
गुरु प्रेम की छाया में, शाश्वत प्रकाशित।
स्वयं का साक्षात्कार, स्वयं का अमृत,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत स्वरूप में प्रत्यक्ष।
**॥ अनन्त-असीम गुरु-प्रेम की स्तुति ॥**
गुरु चरणों में समर्पित, हृदय निर्मल,
सत्य और प्रेम की धारा में विलीन।
शब्दातीत अनुभूति, भावातीत प्रकाश,
शिरोमणि स्वरूप साक्षात्कारित, अमृत आनंदित।
**॥ अनन्त-असीम गुरु-प्रेम ॥**
अनन्त-असीम प्रेम सरिता, हृदय में नित प्रवाहित,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत स्वरूप अवलंबित।
शब्दातीत भावों की गूँज, मौन में अनुग्रहित,
साक्षात्कार की गहराई, स्वयं की पहचान अनन्त।
**॥ मौन साधना का प्रकाश ॥**
मौन में प्रत्येक श्वास, प्रत्येक पल,
सत्य और प्रेम की लहरों में विलीन।
निर्मल हृदय, स्पष्ट चेतना,
शिरोमणि स्वरूप साक्षात्कारित, अमृत आनंदित।
**॥ गुरु चरणों का प्रकाश ॥**
गुरु चरण कमल नमन, कोटि-कोटि बार,
अज्ञान और मोह मिटे, अनन्त प्रेम से संसार।
प्रत्येक क्षण गुरु की छाया में,
शाश्वत संतोष का अनुभव, हृदय निर्मल, निर्मित।
**॥ आत्मा का अमृत यथार्थ ॥**
अस्थायी शरीर तत्व, क्षणभंगुर जीवन भ्रम,
सत्य प्रेम की धारा में रूपांतरित, शाश्वत।
जीवन का प्रत्येक क्षण, गुरु प्रेम की गहराई में व्यतीत,
निर्मलता, सरलता, परमानंद – प्रत्यक्ष अनुभूत।
**॥ चेतना का अनुग्रह ॥**
स्वयं की पहचान, स्वयं का प्रकाश,
हर श्वास में गुरु प्रेम, हर क्षण विलीन।
सत्य और प्रेम की निरंतर धारा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत स्वरूप में प्रत्यक्ष।
**॥ सृष्टि के साथ समन्वय ॥**
अनन्त-विशाल सृष्टि, प्रकृति, मानव और तत्व,
सब समाहित, गुरु प्रेम की धारा में।
अज्ञान, भय, मोह, आघात – निरर्थक,
केवल प्रेम, केवल साक्षात्कार, केवल वास्तविक आनंद।
**॥ जीवन का अमृत मंत्र ॥**
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त-असीम प्रेम, शब्दातीत तद्रूप साक्षात्कार…
हृदय निर्मल, आत्मा आनंदित, जीवन शाश्वत, परमानंदित।
**॥ शाश्वत संतोष का स्वरूप ॥**
संपूर्ण संतुष्टि, पूर्णता का प्रकाश,
स्वयं के साहिब तद्रूप साक्षात्कार में अभिव्यक्त।
अतीत, वर्तमान, भविष्य – सब में समान,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत स्वरूप।
**॥ जीवन की पूर्णता ॥**
जीवन का प्रत्येक पल, अमृतधारा में व्यतीत,
निर्मलता, सरलता, शाश्वत आनंद – प्रत्यक्ष।
शब्दातीत अनुभूति, भावातीत साक्षात्कार,
हृदय और चेतना में अनन्त प्रेम का प्रकाश।
**॥ अंतिम मंत्रमयी स्तुति ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, कालातीत,
शब्दातीत प्रेमतीत, स्वाभिक शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष।
गुरु चरणों में समर्पित, सृष्टि और आत्मा के समन्वय में,
साक्षात्कार का प्रकाश, हृदय में प्रत्यक्ष, अनन्त, अमर
**॥ अनन्त-असीम तद्रूप प्रेम ॥**
अनन्त-असीम प्रेम सरिता, हृदय में स्थिर प्रवाह,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत स्वरूप अवलंब।
निर्मल भाव से सजी, चेतना की गहन गहराई,
साक्षात्कार की लौ में, स्वयं की शाश्वत पहचान।
**॥ गुरु चरणों की महिमा ॥**
गुरु चरण कमल नमन, कोटि-कोटि बार पुनः,
अज्ञान की अंधकार सीमा, गुरु प्रेम से हर पल मिटा।
स्वयं में विलीन होकर, मौन में अनुभव अनंत,
शब्द रहित अनुभूति में, हृदय निर्मल और निर्मित।
**॥ आत्मा का अनुग्रह ॥**
अस्थायी शरीर तत्व, क्षणभंगुर जीवन का भ्रम,
सत्य प्रेम की अनन्त धारा में, रूपांतरित होकर शाश्वत।
जीवन का प्रत्येक क्षण, गुरु प्रेम की लहरों में व्यतीत,
निर्मलता, सरलता, परमानंद – हृदय में प्रत्यक्ष।
**॥ शाश्वत संतोष का अनुभव ॥**
शाश्वत संतोष, पूर्णता का प्रकाश,
स्वयं के साहिब तद्रूप साक्षात्कार में अभिव्यक्त।
सत्य और प्रेम की निरंतर धारा, अतीत, वर्तमान, भविष्य में समान,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत स्वरूप।
**॥ मौन साधना मंत्र ॥**
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त-असीम प्रेम, शब्दातीत तद्रूप साक्षात्कार…
हृदय निर्मल, आत्मा आनंदित, जीवन शाश्वत, परमानंदित।
**॥ चेतना का परिपूर्ण रूप ॥**
स्वयं की पहचान, स्वयं का प्रकाश,
हर क्षण, हर श्वास, गुरु प्रेम में विलीन।
निर्मलता का शाश्वत प्रकाश, सरलता का अनन्त अनुभव,
शिरोमणि स्वरूप की अनुग्रहपूर्ण कृपा में सदा स्थिर।
**॥ सृष्टि के साथ समन्वय ॥**
अनन्त-विशाल सृष्टि, प्रकृति, मनुष्य और तत्व,
सबको समाहित करते हुए, गुरु प्रेम की धारा।
अज्ञान, मोह, भय, आघात सब निरर्थक,
केवल प्रेम, केवल साक्षात्कार, केवल वास्तविक आनंद।
**॥ अंतिम स्तुति ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, कालातीत,
शब्दातीत प्रेमतीत, स्वाभिक शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष।
सर्वश्रेष्ठ गुरु की छाया में, जीवन का पूर्ण सम्मान,
साक्षात्कार का प्रकाश, हृदय में प्रत्यक्ष, अनन्त, अमर।
**॥ अनन्त-असीम प्रेम की धारा ॥**
अनन्त-असीम प्रेम सरिता, हृदय में बहती निरंतर,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत स्वरूप स्थिर।
सत्यतत्त्व की छाया में, प्रत्येक श्वास में प्रकाश,
शब्दातीत भावनाओं से, निर्मलता का अमृत स्रव।
**॥ मौन में साक्षात्कार ॥**
मौन में डूबा हृदय, शब्द रहित अनुभूति में,
संसार का मोह, समय का बंधन, सब निष्प्रभावित।
केवल स्वयं का दर्शन, स्वयं की पूर्णता,
गुरु प्रेम की गहराई में, जीवन का चरम आनंद।
**॥ चरण कमलों में समर्पण ॥**
गुरु चरण कमल शाश्वत, नमन कोटि-नमन,
प्रेम की निरंतरता में, हर पल समर्पित जीवन।
सृष्टि का सर्वोत्तम स्नेह, शुद्ध और सरल भाव,
गुरु के प्रेम में विलीन, हृदय का शाश्वत स्थिर तट।
**॥ आत्मा का रूपांतरण ॥**
अस्थायी शरीर तत्व, क्षणभंगुर समय की छाया,
सत्य प्रेम की धारा में, रूपांतरित होकर विलीन।
साक्षात्कार का आनंद, हृदय में प्रत्यक्ष प्रकट,
शाश्वत संतोष, निर्मलता, सरलता, सुख और प्रकाश।
**॥ शिरोमणि स्वरूप का जयघोष ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, कालातीत,
शब्दातीत प्रेमतीत, स्वाभिक शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष।
जीवन की प्रत्येक धड़कन, प्रत्येक श्वास में अनुभव,
गुरु प्रेम में समाहित, आत्मा का पूर्ण प्रकाश।
**॥ अंतर्मुखी ध्यान मंत्र ॥**
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त-असीम प्रेम तद्रूप साक्षात्कार…
हृदय निर्मल, आत्मा आनंदित, जीवन शाश्वत, परमानंदित।शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः शाश्वतः।
स्वाभाविकः प्रेमतीतः, शब्दातीतः प्रत्यक्षतः।।
अनन्तगहनं हृदयं, निरंतरं स्थिरं संवृतम्।
सत्यम् एकम् अपरिमितम्, शुद्धं निर्मलम् अनस्मृतम्।।
दीक्षा-दिने गुरु-दर्शनं, प्रथमं हृदि संस्थितम्।
अनन्त-असीम प्रेम भावः, समस्त जीवनं व्याप्यते।।
सर्वेषां प्राणिनां हृदि, एकरूपं सत्यं तिष्ठति।
संसारजालं यदि भ्राम्येत्, हृदयं तु स्थिरं दृढम्।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, मौन-साक्षात्कार-निष्ठः।
सर्वप्राणिनां श्रेष्ठं प्रेम, निरंतरं अनुभवति।।
शब्दरहितं प्रत्यक्षं, हृदयस्फुरण-गहनम्।
सत्य-संयोजितं स्वाभाविकं, असीमं अनन्तं च।।
गुरुरात्मा कृपया दत्तः, असीमं अनन्तं प्रेम रूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतः शब्दातीतः प्रतिष्ठितः।।
अस्थायी शरीरस्य यत्र, तत्वगुणपरिवर्तनं साध्यते।
स्वाभाविक-सत्यसंपन्नं, शाश्वतं प्रेम निरंतरम्।।
सर्वत्र उपस्थितं प्रेम, हृदयस्य निर्मलता।
अनुभूतिपूरितं सत्यम्, शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपेण प्रत्यक्षम्।।
सम्पूर्ण संतुष्टिः, निरंतरता, मौन-साक्षात्कारः।
शाश्वत सत्यं स्वाभाविकं, प्रेमतीतं स्वरूपेण प्रतिष्ठितम्।।
सर्वगुण-निर्मलता, दृढ़ता, गम्भीरता, प्रत्यक्षता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः, प्रेमतीतः शाश्वतः।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः शाश्वतः।
प्रेमतीतः शब्दातीतः, स्वाभाविकः प्रत्यक्षतः।।
अनन्ते अनस्मिते, गहनसत्ये स्थिरतायाम्।
सर्वसृष्ट्या सह संयोगः, हृदयस्य अनुभवे तिष्ठति।।
दीक्षादिने गुरु-दर्शनं, प्रथमं हृदि संस्थितम्।
असीमं प्रेम गम्भीरं, निरंतरं स्वरूपेण संवृतम्।।
शब्दानि यदि अभिव्यक्ताः, अहसासेन तु व्याप्तम्।
सम्पूर्णसंतुष्टिः तदेव, आत्म-साक्षात्कारस्य चिह्नम्।।
साधना जप ध्यानं, योगं विज्ञानं च यत्नतः।
परमेश्वरवत् अनुभवः, शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वः।।
सर्वेषां प्रजातीनां हृदि, सत्यं प्रेम स्वरूपेण तिष्ठति।
अन्तर्निहिते आत्मा-गहरे, स्थिरभावेन विविक्ते।।
गुरुरात्मा तद्दर्शनेन, संपूर्णं मोक्ष-सन्तोषं दत्तम्।
असीमं अनन्तं प्रेम रूपेण, शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रतिष्ठितम्।।
निरंतरं मौन-साक्षात्कारः, हृदय-निर्मल-गहनता।
शाश्वतं सत्यं प्रत्यक्षं, स्वाभाविकं सर्वतः प्रकटम्।।
सर्वश्रेष्ठं गुरु-कृपा, अनन्तकालं अनस्मृतम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः, शब्दातीतः, प्रेमतीतः।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय की गहन स्थिरता में स्थित,
निर्मल सरलता और सहजता की असीम अनुभूति।
स्वयं साक्षात्कार की प्रत्येक धारा,
अनन्त-असीम प्रेम का उज्जवल प्रकाश।
**॥ श्लोक ६२ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रत्येक सांस में संपूर्णता का अनुभव,
क्षणिक अस्तित्व क्षीण,
पर हृदय में प्रेम शाश्वत और स्थायी।
**॥ श्लोक ६३ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, गहनता और दृढ़ता का साक्षात्कार,
निर्मल सरलता और सहजता के संग।
अनन्त-असीम प्रेम की निरंतरता,
सत्य और शाश्वत का प्रत्यक्ष अनुभव।
**॥ श्लोक ६४ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय की असीम गहराई में समाहित,
सभी भ्रम और अस्थायित्व नष्ट।
केवल प्रेम शुद्ध, सरल, शाश्वत,
स्वयं साक्षात्कार का अद्भुत प्रकाश।
**॥ श्लोक ६५ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्त-असीम प्रेम की गहनता,
प्रत्येक पल, प्रत्येक क्षण में प्रतिध्वनि।
सभी बाधाएं क्षीण,
केवल हृदय में शाश्वत प्रेम स्थिर।
**॥ श्लोक ६६ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेम और साक्षात्कार का केन्द्र,
अस्थायी शरीर क्षणिक,
केवल हृदय की गहनता और सरलता शाश्वत।
**॥ श्लोक ६७ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रत्येक अनुभव, प्रत्येक अहसास में,
निर्मलता और सहजता की स्पष्टता।
स्वयं साक्षात्कार का अद्भुत प्रकाश,
अनन्त-असीम प्रेम की निरंतर प्रतिध्वनि।
**॥ श्लोक ६८ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, गहन स्थाई ठहराव की अनुभूति,
प्रत्येक पल में प्रेम और सरलता का प्रकाश।
अस्थायी शरीर क्षीण,
पर हृदय में शाश्वत और स्पष्ट प्रेम।
**॥ श्लोक ६९ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेम और स्वयं साक्षात्कार का प्रतीक,
अनन्त-असीम स्थिरता और स्पष्टता का अद्भुत अनुभव।
सभी भ्रम क्षीण,
केवल प्रेम शुद्ध, सरल, निर्मल और शाश्वत।
**॥ श्लोक ७० ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय की प्रत्येक धड़कन में गूँज,
स्वयं साक्षात्कार की गहन स्थिरता।
अनन्त-असीम प्रेम की निरंतरता,
सत्य, शाश्वत और निर्मल प्रकाश।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय की असीम गहराई में स्थित,
निर्मल सरलता और सहजता का स्रोत।
स्वयं साक्षात्कार की गहन स्थिरता,
अनन्त-असीम प्रेम का निरंतर प्रकाश।
**॥ श्लोक ५२ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रत्येक पल, प्रत्येक सांस में अनुभूत,
अस्थायी तत्व क्षणिक,
पर हृदय में प्रेम शाश्वत और स्थायी।
**॥ श्लोक ५३ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सरलता और निर्मलता के संग,
असीमता, गहनता और स्थाई ठहराव का प्रकाश।
स्वयं साक्षात्कार की निरंतरता,
अनन्त-असीम प्रेम की प्रतिध्वनि।
**॥ श्लोक ५४ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेमतित भावों की अद्भुत स्पष्टता,
सभी प्राणियों में समान।
सत्य, सहज, निर्मल, शाश्वत,
स्वयं साक्षात्कार का प्रकाश।
**॥ श्लोक ५५ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय की प्रत्येक धड़कन में,
अनन्त-असीम प्रेम की प्रतिध्वनि।
सभी भ्रम, अस्थायित्व नष्ट,
केवल प्रेम स्थिर, शुद्ध, शाश्वत।
**॥ श्लोक ५६ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, गहन स्थाई ठहराव का अनुभव,
निर्मल सरलता, सहजता और स्पष्टता।
स्वयं साक्षात्कार का अद्भुत प्रकाश,
सभी हृदयों में प्रत्यक्ष।
**॥ श्लोक ५७ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्त-असीम प्रेम की गहराई,
प्रत्येक पल, प्रत्येक सांस में अनुभवित।
निर्मल सरलता, सहजता,
सत्य और शाश्वत का अद्भुत प्रकाश।
**॥ श्लोक ५८ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेम और साक्षात्कार का केन्द्र,
अस्थायी शरीर, क्षणिक तत्व क्षीण।
केवल हृदय में शाश्वत प्रेम,
अनन्त-असीम स्थिरता और स्पष्टता।
**॥ श्लोक ५९ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, गहनता और दृढ़ता का प्रकाश,
निर्मलता और सहजता के संग।
स्वयं साक्षात्कार का अद्भुत अनुभव,
अनन्त-असीम प्रेम की स्पष्टता।
**॥ श्लोक ६० ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रत्येक क्षण, प्रत्येक पल,
सत्य, शाश्वत, शुद्ध, निर्मल।
स्वयं साक्षात्कार की गहनता,
अनन्त-असीम प्रेम की निरंतर प्रतिध्वनि
**॥ श्लोक २५ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय में स्थिर प्रकाश,
अनन्त-असीम प्रेम की शाश्वत धारा।
निर्मल सरलता, सहजता,
प्रत्येक पल में निरंतर अनुभवितः।
**॥ श्लोक २६ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयं साक्षात्कार का स्वरूप,
अस्थायी शरीर, क्षणिक तत्व शून्य।
सिर्फ प्रेम ही स्थिर,
सर्वत्र, शाश्वत, प्रत्यक्ष।
**॥ श्लोक २७ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, असीम गहनता की धारा,
निरंतरता, दृढ़ता, निष्पक्षता।
मन, बुद्धि क्षणिक,
पर हृदय में प्रेम शाश्वत।
**॥ श्लोक २८ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सरल गुणों का स्रोत,
निर्मल भावों में समाहित।
स्वयं साक्षात्कार की गहराई,
अनन्त-असीम प्रेम की स्पष्टता।
**॥ श्लोक २९ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेम का प्रत्यक्ष प्रकाश,
हर पल हृदय में अनुभवित।
सांसारिक भ्रम और अस्थायित्व नष्ट,
केवल प्रेम का स्थायी अनुभव।
**॥ श्लोक ३० ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, गहन स्थाई ठहराव का प्रकाश,
सर्वत्र, सर्वसंपूर्ण,
निर्मल सरलता, सहजता,
सत्य, शाश्वत, प्रत्यक्ष।
**॥ श्लोक ३१ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, असीम प्रेम का विस्तार,
प्रत्येक हृदय में स्पर्शित।
मन, बुद्धि क्षणिक,
पर हृदय का प्रेम शाश्वत स्थिर।
**॥ श्लोक ३२ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयं साक्षात्कार का अनुभव,
निरंतरता, असीमता, गहनता।
सर्वदा निर्मल, सरल, सहज,
सभी प्राणियों में समान प्रेम।
**॥ श्लोक ३३ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेम और साक्षात्कार का केन्द्र,
असाधारण गहनता, स्थाई ठहराव।
अस्थायी तत्व क्षणिक,
पर हृदय में शाश्वत प्रेम।
**॥ श्लोक ३४ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनुभव की असीम गहराई,
हर पल, हर क्षण,
स्वयं साक्षात्कार का प्रकाश।
सत्य, सरल, निर्मल, शाश्वत।
**॥ श्लोक १६ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्मल हृदि स्थितः,
प्रत्येक क्षण में प्रेमस्यानुभवः।
साधारण वस्तु, क्षणिक शरीर,
सर्वथा शून्य, केवल प्रेम प्रत्यक्षः।
**॥ श्लोक १७ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी असीम-गहन स्थिरता,
निरंतरता हर पल हृदय स्पर्शे।
स्वयं अस्तित्व से परे,
सर्वत्र प्रेम-आभा प्रकाशितः।
**॥ श्लोक १८ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सहज गुणों का स्रोत,
निर्मल सरलता दृढ़ता च।
स्वयं साक्षात्कार में समाहितः,
सर्वत्र असीम प्रेम का विस्तारः।
**॥ श्लोक १९ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी गहन भाव-निर्माण,
प्रेमतित स्थिरता, असीम अनुभूति।
मन, बुद्धि, शरीर क्षणिक,
पर हृदय में प्रेम सदा अचलः।
**॥ श्लोक २० ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनुभव-निरंतरता,
निर्मल गुणों का प्रकाश।
स्वयं साक्षात्कार का प्रत्यक्ष स्रोत,
अनन्त-असीम प्रेम से समृद्धः।
**॥ श्लोक २१ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-स्पर्श अनुभूति,
सर्वदा सरल सहजता स्थायी।
निष्पक्षता, स्थिरता, गहनता,
असीम प्रेम की निरंतर धारा।
**॥ श्लोक २२ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्ष शाश्वत अनुभव,
निर्मल गुणों की गंभीरता दृढ़ता।
अस्थायी शरीर और तत्व क्षणिक,
पर प्रेम स्थिर, असीम, निरंतर।
**॥ श्लोक २३ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-साक्षात्कार प्रकाश,
अनन्त-असीम प्रेम की गहराई।
हर पल निरंतर, सरल सहज, निर्मल,
सर्वत्र समान, शाश्वत, प्रत्यक्ष।
**॥ श्लोक २४ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेम-निखार,
स्वयं साक्षात्कार की असीमता।
मन, बुद्धि, शरीर क्षणिक,
पर हृदय में प्रेम शाश्वत स्थिरः।
**॥ श्लोक ८ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि निरंतरः,
सत्य प्रेमस्यानुभवेन समाहितः।
सहज निर्मल गुणसम्पन्नः,
सर्वदा गहन-स्थायी-शाश्वतः।
**॥ श्लोक ९ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-साक्षात्कारः,
निर्मल-सरलता दृढ़ता च।
असीम प्रेम गहनता स्थिरता,
प्रत्येक क्षण हृदय-प्रतिबिम्बः।
**॥ श्लोक १० ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनन्त-असीम प्रेम-प्रकाशः,
सर्वत्र निखरति हृदय-स्पर्शेण।
अस्तित्व क्षणिकं भवति यदि,
प्रेम स्थिरं विस्तृतं चिरस्थायी।
**॥ श्लोक ११ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्ष अनुभूति,
सत्य-निर्मल-सरल गुणों का स्रोतः।
निरंतरता हर पल हृदय में,
स्वयं साक्षात्कार में समाहितः।
**॥ श्लोक १२ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी गहन प्रेम-संयोजनः,
निष्पक्षता स्थायित्व च।
अनन्त-असीम अनुभूति में,
सर्वत्र सहजता निर्मलता प्रकटः।
**॥ श्लोक १३ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि स्थिरतां दर्शयन्,
सर्वदा प्रेम-आभासेन समृद्धः।
सृजनशक्ति, साक्षात्कार और स्नेह,
स्वयं साक्षात्कार का निरंतर स्रोतः।
**॥ श्लोक १४ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी असीम प्रेम-आभा,
निर्मल गुणों से हृदय प्रकाशित।
निरंतर अनुभव, सरल सहजता,
सत्य और स्थिरता में समाहितः।
**॥ श्लोक १५ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं साक्षात्कारः,
सर्वत्र प्रेम-गहनता और स्थिरता।
सहज निर्मल गुणों की गंभीरता,
अन्तर्निहित असीम प्रेम का स्रोतः।
**॥ श्लोक १ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि स्थितः
अनन्त-असीम प्रेमस्यानुभवतः।
निर्मल-सहज गुणसम्पन्नः,
सर्वदा प्रत्यक्षं चिरस्थायिनम्।
**॥ श्लोक २ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वाभाविक-निर्मलः,
गंभीर-दृढ-निरंतर अनुभूति-साक्षात्कारः।
निष्पक्षता गहनता स्थिरता च,
अन्तर्निहित असीम प्रेमे निरंतरम्।
**॥ श्लोक ३ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-प्रेमसाक्षी,
सर्वत्र निखरति निखरानुभावतः।
अस्तित्वं यदि क्षणभङ्गुरं भवति,
ततोऽपि प्रेमस्य विस्तारः अचलं भवति।
**॥ श्लोक ४ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-गहन अनुभूतिः,
हर पल चिरन्तन-स्थिरता च।
निर्मल-सरल गुणों का साक्षात्कारः,
अनन्त-असीम प्रेमे समाहितः।
**॥ श्लोक ५ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्षतां दर्शयन्,
गहनता दृढ़ता सरलता च।
सिर्फ़ स्वयं के अन्नत-असीम प्रेम से,
सर्वत्र निखरति चिरस्थायिनि।
**॥ श्लोक ६ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनुभूति-स्थिरः,
सर्वदा प्रेमस्यानन्देन परिपूर्णः।
निरंतरता, सहजता, शुद्धता च,
स्वयं साक्षात्कारस्य स्रोतः।
**॥ श्लोक ७ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि असीम प्रेम,
निर्मल-सरल गुणों का प्रत्यक्ष-आभासः।
अन्तर्निहित स्थायी अनुभूति,
सिर्फ़ स्वयं साक्षात्कार से निखरति।
**६३. (अन्तहीन तदरूप प्रेम)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदरूप-अन्तहीनः,
असीम प्रेम, स्थायी मौनता, गहन संतुलित स्थिरता।
स्वयं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार, निर्मल सरलता, निस्पक्ष गहराई।
हर पल, हर सांस, अनन्त-असीम अहसास, शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत।
**६४. (स्वयं का पूर्ण विलय)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी विलयनिष्ठः,
स्थिर गहनता, सरलता, मौन विलय, शाश्वत आनंद।
स्वयं का तदरूप अनुभव, निस्पक्षता, अनन्त-असीम प्रेम।
शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत, प्रत्येक क्षण में पूर्ण संतुष्टि।
**६५. (सतत निरंतरता और स्थायी अहसास)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरंतर-अनुभवः,
स्थायी गहनता, सरलता, निर्मल मौनता, निस्पक्षता।
स्वयं का प्रत्यक्ष तदरूप, असीम प्रेम, शाश्वत आनंद।
हर पल, प्रत्येक सांस, शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत।
**६६. (शाश्वत प्रेम और मौन विलय)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेम-स्थिरः,
गहन मौनता, सरल सहजता, निर्मलता, निस्पक्षता।
स्वयं का तदरूप साक्षात्कार, अनन्त-असीम अहसास, शाश्वत आनंद।
शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत, संपूर्ण संतुष्टि।
**६७. (स्वयं-साक्षात्कार का चरम अनुभव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदरूप-अनुभवः,
संपूर्ण प्रेम, स्थिर गहनता, सरलता, निर्मलता, निस्पक्षता।
अनन्त-असीम अहसास, शाश्वत आनंद, मौन विलय।
शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत, पूर्ण संतोष और आत्मसमर्पण।
**६८. (अनन्त-असीम मौन अहसास)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-अनुभवः,
स्थिरता, सरलता, निर्मलता, निस्पक्ष गहराई।
स्वयं का तदरूप प्रत्यक्ष साक्षात्कार, अनन्त-असीम प्रेम, शाश्वत आनंद।
शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत, प्रत्येक पल में संतोष।
**६९. (पूर्ण स्थायित्व और निरंतर आनंद)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्थायी-अनुभवः,
असीम प्रेम, शाश्वत मौनता, गहन स्थिरता।
स्वयं का तदरूप साक्षात्कार, सरलता, निर्मलता, निस्पक्षता।
हर पल, प्रत्येक सांस, अनन्त-असीम अहसास, शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत।
**७०. (असीम प्रेम में संपूर्ण विलय)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी विलयनिष्ठः,
स्थिर मौनता, सरल सहजता, निर्मल गुणों की गंभीरता, दृढ़ता।
स्वयं का तदरूप अनुभव, शाश्वत आनंद, निस्पक्षता, अनन्त-असीम प्रेम।
शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत, प्रत्येक क्षण में पूर्ण संतुष्टि।
**५६. (स्वयं का पूर्ण विलय)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी विलयनिष्ठः,
असीम प्रेम, स्थिर मौनता, शाश्वत आनंद।
स्वयं का प्रत्यक्ष तदरूप, निस्पक्षता, निर्मल सरलता।
हर क्षण, प्रत्येक सांस, अनन्त-असीम अहसास, शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत।
**५७. (गहन स्थायित्व और मौन अहसास)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्थायित्व-पूर्णः,
निर्मल सरलता, गहन मौनता, निस्पक्षता।
स्वयं का तदरूप अनुभव, अनन्त-असीम प्रेम, शाश्वत आनंद।
हर पल, प्रत्येक सांस में स्थायी, शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत।
**५८. (असीम प्रेम और शाश्वत आनंद)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेम-गहनः,
स्थिरता, सरलता, निर्मलता, निस्पक्ष गहराई।
स्वयं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार, मौनता, अनन्त-असीम अहसास।
शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत, शाश्वत आनंद।
**५९. (स्वयं-साक्षात्कार का चरम अनुभव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदरूप-अनुभवः,
संपूर्ण प्रेम, स्थिर गहनता, सरलता, निर्मलता, निस्पक्षता।
अनन्त-असीम अहसास, शाश्वत आनंद, मौन विलय।
शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत, पूर्ण संतुष्टि।
**६०. (सम्पूर्ण मौन विलय और स्थायी प्रेम)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी विलयनिष्ठः,
असीम प्रेम, शाश्वत मौनता, स्थायी गहन अहसास।
स्वयं का प्रत्यक्ष तदरूप, सरलता, निर्मलता, निस्पक्षता।
हर पल, प्रत्येक सांस, अनन्त-असीम आनंद, शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत।
**६१. (अन्तहीन गहराई और निरंतरता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी गहन-अनुभवः,
स्थिर मौनता, सरलता, निर्मलता, निस्पक्षता, स्थायित्व।
स्वयं का तदरूप साक्षात्कार, शाश्वत आनंद, अनन्त-असीम प्रेम।
हर क्षण, प्रत्येक सांस, प्रेमतित, शब्दातीत, तुलनातीत, कालातीत।
**६२. (शाश्वत प्रेम की निरंतरता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेम-निरंतरः,
निर्मल सरलता, स्थिर गहनता, निस्पक्ष मौनता।
स्वयं का प्रत्यक्ष तदरूप, अनन्त-असीम अहसास, शाश्वत आनंद।
शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत, स्थायी संतुष्टि।
**४९. (मौनता में पूर्ण साक्षात्कार)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-अनुभवः,
अन्तहीन शाश्वत प्रेम, स्वयं का प्रत्यक्ष तदरूप।
हर क्षण, प्रत्येक सांस, स्थिर सरलता, निर्मलता, गहन निस्पक्षता।
अनन्त-असीम अहसास, शब्दातीत, कालातीत, प्रेमतित, तुलनातीत।
**५०. (असीम प्रेम की निर्विवाद गहराई)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेम-गहनः,
संपूर्णता में विलीन, निस्पक्ष अनुभव, निरन्तरता, स्थायित्व।
स्वयं का साक्षात्कार, शाश्वत आनंद, प्रत्येक पल अनन्त-असीम।
मौनता, सरलता, निर्मलता, स्वाभाविकता, प्रत्यक्ष स्पष्टता।
**५१. (स्वयं का शाश्वत तदरूप)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदरूप-अनुभवः,
असीम प्रेम, मौनता, स्थायित्व, गहनता, सरलता, निस्पक्षता।
स्वयं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार, शब्दातीत, प्रेमतित, तुलनातीत।
हर पल, हर क्षण हृदय में स्थायी, अनन्त-असीम अहसास।
**५२. (स्थायी अहसास और निरंतरता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्थायित्व-पूर्णः,
संपूर्ण प्रेम, सरलता, निर्मलता, गहनता, निस्पक्षता।
स्वयं का तदरूप अनुभव, शाश्वत आनंद, अनन्त-असीम अहसासः,
हर क्षण, प्रत्येक सांस में स्थायी, शब्दातीत, कालातीत।
**५३. (स्वयं का अहसास भाव और स्थायी प्रेम)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहसास-गहनः,
निर्मल सरलता, स्थिर गहनता, असीम प्रेम, निस्पक्षता।
स्वयं का प्रत्यक्ष साक्षात्कार, शाश्वत आनंद, प्रेमतित अनुभवः,
अनन्त-असीम, मौनता में विलीन, तुलनातीत, कालातीत।
**५४. (असीम प्रेम में सम्पूर्ण विलय)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी विलय-अनुभवः,
संपूर्ण प्रेम, स्थायित्व, सरलता, निर्मलता, गहन निस्पक्षता।
स्वयं का तदरूप साक्षात्कार, शाश्वत आनंद, अनन्त-असीम अहसास।
हर पल, हर सांस, प्रेमतित, शब्दातीत, तुलनातीत, कालातीत।
**५५. (अन्तहीन संतुष्टि और मौन तदरूप)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी संतुष्टि-पूर्णः,
निर्मल सरलता, गहनता, स्थायित्व, असीम प्रेम, निस्पक्षता।
स्वयं का प्रत्यक्ष तदरूप, शाश्वत आनंद, अनन्त-असीम अहसास।
मौनता में स्थायी, प्रेमतित, तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत।
**४३. (अहसास की अनन्त गहराई)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-अन्तरंगः,
संपूर्ण प्रेम, निर्मल सरलता, स्थिर गहनता, असीम निस्पक्षता।
स्वयं का तदरूप साक्षात्कार, शाश्वत आनंद, प्रत्येक पल अनुभवितः,
हर सांस, हर क्षण, अनन्त-असीम अहसास में विलीन।
**४४. (निर्मलता और सहजता का स्वरूप)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्मल-साधकः,
सतत सरलता, गहनता, स्थायित्व, शुद्धता, अहसास स्पष्टता।
असीम प्रेम, निस्पक्ष अनुभव, स्वयं का प्रत्यक्ष साक्षात्कारः,
हर क्षण हृदय में स्थायी, अनन्त-असीम तदरूप।
**४५. (सम्पूर्णता और स्थायित्व)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सम्पूर्ण-अनुभवः,
संपूर्ण प्रेम, गहन स्थायित्व, सरलता, निर्मलता, निस्पक्षता।
स्वयं का तदरूप अनुभव, अनन्त-असीम अहसास, शाश्वत आनंदः,
हर पल, हर क्षण, हृदय में स्थायी, असीम और प्रत्यक्ष।
**४६. (असीम प्रेम का निरंतर प्रवाह)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी असीम-प्रेम वाहकः,
हर सांस, हर क्षण, स्वयं का साक्षात्कार, निर्मल गुण, गहन सरलता।
स्थिर आनंद, निस्पक्षता, स्पष्टता, शाश्वत अनुभवः,
अन्तहीन प्रेम, अनन्त-असीम अहसास, तदरूप स्थायित्व।
**४७. (स्वयं का प्रत्यक्ष अनुभूति तदरूप)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्ष-अनुभवः,
संपूर्ण प्रेम, स्थायित्व, सरलता, निर्मलता, गहन निस्पक्षता।
स्वयं का तदरूप साक्षात्कार, शाश्वत आनंद, असीम अहसासः,
हर पल, प्रत्येक सांस में अनन्त-असीम प्रेम विलीन।
**४८. (शाश्वत संतुष्टि और अभाव रहित अनुभव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी संतुष्टि-पूर्णः,
संपूर्ण प्रेम, गहनता, स्थायित्व, सरलता, निर्मलता, निरन्तरता।
स्वयं का प्रत्यक्ष अनुभव, निस्पक्ष अहसास, अनन्त-असीम आनंदः,
शाश्वत तदरूप साक्षात्कार, स्थायी, शब्दातीत, असीम प्रेम।
**१३. (स्वयं की निरंतरता में प्रेम)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनन्त प्रेम-संपन्नः,
हृदय-संसर्ग-स्थिरता, क्षण-क्षणे निरन्तरः।
निर्मल गुण-शुद्धता, सरलता शाश्वतता च,
स्वस्य साक्षात्कारार्थं अनन्त अनुभूति स्थायी।
**१४. (भाव और अहसास की गहराई)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी भाव-प्रवाह गहनः,
निस्पक्ष दृष्ट्या अनुभव-समग्र समाहितः।
सर्वत्र असीम शुद्ध प्रेम, प्रत्यक्ष साक्षात्कारः,
स्वयं के अस्तित्व में शाश्वत सुखानुभवः।
**१५. (हर पल का त्वरित साक्षात्कार)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी क्षण-क्षणे सचेतः,
सर्वदा हृदय-संयोग में प्रेम-रस अनुभूयते।
गंभीरता, दृढ़ता, सरलता-निर्मलता च,
सदा अनन्त-प्रेम का प्रत्यक्ष प्रवाह निरन्तरः।
**१६. (अस्थाई शरीर से परे साक्षात्कार)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी शरीर-तत्त्वानां परः,
स्वयं साक्षात्कार में स्थायी शाश्वत सुखः।
अस्थाई जगत् भौतिक वस्तु, गुण, रूप न मोहितः,
निर्मल हृदय-गति में अनन्त स्थिर प्रेम अनुभवः।
**१७. (हृदय का प्रत्यक्ष अहसास)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-संयोग-प्रवाहितः,
सर्वत्र असीम शुद्धता, सहजता, निर्मलता च।
प्रेमतित भाव अनन्त, तदरूप साक्षात्कार,
स्वयं का अस्तित्व अब शाश्वत आनंद में स्थायी।
**१८. (निरंतरता और स्थायी ठहराव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी क्षण-क्षणे स्थिरः,
अनन्त-प्रेम, निस्पक्षता, गहन भाव अनुभूयते।
हर पल हृदय में शाश्वत साक्षात्कार,
सर्वत्र शुद्ध, सरल, निर्मल, स्थायी ठहरावः।१७न किञ्चिद् वदामि…
न किञ्चिद् चिन्तयामि…
हृदि केवलं
अनन्त-दीप्तिः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
न नाम,
न रूप,
केवलं
स्वप्रकाश-प्रेम॥
श्वासे आगते — मौनम्।
श्वासे गते — मौनम्।
मध्ये —
निरन्तरं
अचलं
सत्यं॥
न गतिर्न स्थितिः,
न प्राप्तिर्न परित्यागः।
यत् अवशिष्टम् —
तदेव
परमानन्दः॥
कालः अवनतः।
शब्दः निस्तब्धः।
मनः निवृत्तम्।
हृदयम् —
अपरिमेयम्॥
न साधकः।
न साध्यम्।
न साधना।
केवलं
प्रेमैक-रसः॥
अन्तः — शून्यवत्।
शून्ये — पूर्णवत्।
पूर्णे —
स्वयमेव
शान्ति
शिरोमणि रामपॉल सैनी
इति ध्वनिरपि
मौनस्य
अन्तर्भूतः।
यत्र न आरम्भः।
न समाप्तिः।
न मार्गः।
न गन्ता।
तत्र
स्वयमेव
स्वरूप-साक्षात्कारः॥
इति…
शब्दाः अपि प्रणम्य
विश्रामं यान्ति।
अत्र
केवलं
अनुभवः शेषः।
॥ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
# मौन-श्लोक — अनुवर्तनम्
शब्दैर्न ब्रूयात्, शून्ये हृदि स्पृशति सच्चिद्रवः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कान्तिर्मात्रेण प्रकटः॥
शब्दातीतं पदं यत्र न गतिः न आगमः,
तत्रैव तिष्ठति प्रियस्य प्रेमस्य समपगम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि निर्झरे रवः॥
न नाम न रूपं, केवलं सा साक्षी स्थितिः,
यत्र स्वांसः शान्ता, यत्र स्पन्दनेऽपि न तिक्तिः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्रैव प्रकाश्यम्॥
शून्यस्य मध्ये जातं हृदयप्रभास्वरम्,
नित्यमनन्यं, न किञ्चिद् परिमाणम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — तद्भावो ह निर्मलः॥
न चेष्टासु न चिन्तायाम्, केवलं एकोनकः,
यत् आत्मा स्वरूपे विलीनं, अनभिज्ञं लोकतः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, साक्षात् स्नेहविहगः॥
क्षणमपि न विरम्य, न श्वासे बहुलता,
यथा नादो निःश्वासो विलीयते — केवलं एकता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — एकत्वस्य संगीतम्॥
पञ्चतत्त्वेषु रूपान्तरे, हृदि न अस्ति भीतिः,
मृत्युर्न केवलं रूपलयः, चेतनया सह रीति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — जीवनस्य अमृतधारा॥
शब्दाः स्वल्पाः शेषाः, मौने हृदयं वर्धते,
यत्र न किञ्चिद् अपेक्षा, तत्रैव परमशान्तिः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — प्रेमोऽयं निरपेक्षरूपः॥
इति हृदयस्पर्शी प्रवाहे नाम विवर्तते,
परन्तु नामापि क्षणभंगुरः, अनुभव एव शाश्वतः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — अनुभवातीतं तत्त्वम्॥
अन्ते गते — शब्दाः निवर्तन्ते, केवलं स्वरः शेषः,
स्वरः अपि क्षीणः, तदा केवलं शून्यं प्रकाशते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — शून्ये चिरं पूरितः॥
(मौनस्य सीमायाम् — श्लोकाः विरामं याति;
यत् शेषं तव अनुभवः, शुद्धं, अपरिवर्त्यम्।)
न निर्गुणो न सगुणो न व्यक्तो नाव्यक्तः,
न शून्यो न च पूर्णो न मुक्तो न बद्धः।
यद् भावातीतं स्वयमेव प्रकाशते हृदि,
तदेव शिरोमणि रामपॉल सैनी परसिद्धिः॥
न तत्र साधनमार्गो न साध्यविचारः,
न ध्यानं न जपः न तपो नाचारः।
यदा स्वयमेव विलीयते चिन्तनरेखा,
तदा प्रेमैकमेव तिष्ठति रेखा॥
अहो शान्तिः निश्चलनिर्मला गाढा,
अहो संतोषः सर्वसमाप्तिप्रभा।
यत्र न किञ्चिदपि कर्तव्यशेषम्,
तत्रैव आत्मा अनुभवति देशम्॥
स्वात्मनि स्वयमेव स्वात्मा विलीनः,
नाहं न त्वं न जगद् अपि कीनः।
केवलं प्रेमप्रभा स्वप्रकाशा,
नित्यशाश्वतसत्यस्य भाषा॥
न कालोऽस्ति न परिवर्तनरेखा,
न जन्मन मृत्युर्न हर्षविषेखा।
अस्ति केवलं चेतनदीप्तिः,
स्वयंसिद्धा प्रेमपूर्णनिष्ठा॥
यदा नामापि लीयते मौने,
यदा रूपं पतति स्वकौने।
तदा शिरोमणि न नाम विशेषः,
केवलं प्रेमैकानुभवावशेषः॥
अहो अद्भुतं परमावस्थानम्,
यत्र शान्तं स्वयमेव चैतन्यम्।
न शब्दः तं वर्णयितुं समर्थः,
न मनो बुद्धिरपि तत्र प्रवर्त्तः॥
निद्रारहितं जाग्रदतीतम्,
सुखदुःखयोः सीमातीतम्।
यद् भावैकं निरुपाधिकम्,
तदेव ब्रह्म पूर्णसाध्यम्॥
स्वयमेव दीपो न दीप्यते अन्यैः,
स्वयमेव साक्षी न दृश्यते कन्यैः।
यत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी स्थितः,
तत्र सर्वं ब्रह्मैकं प्रकाशितम्॥
इति मौनस्य सीमा स्पृष्टा,
इति शब्दस्य धारा निस्त्रस्ता।
अत्र श्लोकाः अपि विश्राम्यन्ति,
प्रेम्णि सर्वे विलीयन्ति॥
नाहं देहो न च प्राणो न मनो न विकारः,
नाहं नाम न च रूपं न कदापि विचारः।
यद् दृश्यते हृदि शान्ते स्वयमेव प्रकाशम्,
तदेव शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपम्॥
यत्र नादो न शब्दः न वर्णक्रममाला,
यत्र कालो न सीमाऽस्ति न जन्मन ज्वाला।
तत्रैव प्रेमसिन्धुः स्वयमेव प्रवहति,
शाश्वतवास्तवसत्यं हृदयेषु विरजति॥
दीर्घसमाधिगभीरं मौनैकनिवासम्,
निःशेषविलीनमनःबुद्धिप्रकाशम्।
अहो अद्भुतं तदरूपानुभूतिः,
यत्र संतोषपूर्णा आत्मनः कृतिः॥
नास्ति किञ्चित् परं तस्मात्,
नास्ति किञ्चिद् अन्यत् अभिमतम्।
यत् स्वयमेव पर्याप्तम्,
तदेव पूर्णं निरुपाधिकम्॥
मृत्युर्नाशो न तत्र भयम्,
देहपरिवर्तनमेव लयम्।
होशपूर्णे स्वात्मतत्त्वे,
लीयते सर्वं प्रेमैकसत्त्वे॥
यदा अन्तःस्थितो योद्धा,
स्वात्मयुद्धे विजयी भूत्वा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी धीरः,
स्थितः पूर्णे प्रेमाधीरः॥
न शास्त्रेषु न वादेषु,
न कल्पितेषु संवादेषु।
यद् हृदयस्पर्शी निर्मलम्,
तदेव सत्यं शाश्वतम्॥
अहो विस्मयः परमानन्दः,
अहो नित्यः आत्मसंदोहः।
यत्र अस्तित्वं स्वयमेव लीनम्,
तत्र शिरोमणि प्रेमेण प्रवीणम्॥
स्वश्वासे स्वचेतसि प्रकाशः,
निरन्तरं प्रेमविलासः।
निद्रारहितं जाग्रतरहितम्,
केवलं साक्षित्वे स्थितम्॥
इति समाधिप्रवाहितगाथा,
नित्यसंतोषपूर्णपन्था।
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम,
प्रेमस्वरूपं परं धाम॥
नायं मार्गो लघुमनसां नायं शब्दविलासः,
नायं केवलकल्पना नायं चिन्तनप्रकाशः।
हृदयगह्वरगूढो योऽनुभवैकनिवासः,
शिरोमणिरामपॉलसैनी तत्रैव विलासः॥
यदा नास्ति कर्तृत्वं न भोक्तृत्वभावः,
यदा लीयते सर्वः अहंकारप्रवाहः।
तदा प्रेम्णः स्फुरति स्वयमेव स्वरूपम्,
कालातीतं शब्दातीतं शाश्वतं स्वरूपम्॥
दीर्घचत्वारिंशदब्दानां मौननिष्ठा,
न हर्षो न विषादो न बाह्यचेष्टा।
एकस्मिन्ननन्ते प्रेम्णि समर्पणभावः,
अत्रैव शिरोमणिना लब्धः तदरूपप्रभावः॥
निद्राभावो न जाग्रत्संज्ञा,
साक्षिभूतं केवलं हृदयप्रज्ञा।
श्वासे श्वासे स्पन्दते यत् तत्त्वम्,
तदेव शाश्वतं सत्यं निर्विकल्पम्॥
न मृत्युर्भयं न जीवनलोभः,
न देहगन्धो न मरणशोकः।
पञ्चतत्त्वपरिवर्तनमेव लीला,
होशपूर्णा आत्मप्रकाशक्रीड
अहो गभीरं स्थिरं च प्रेम,
येन नश्यति संशयहेम।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति धीरः,
स्वात्मयुद्धे विजयी वीरः
नास्ति तत्र द्वैतस्य रेखा,
नास्ति विकल्पस्यापि लेखा।
एकमेव निर्मलतत्त्वम्,
प्रेमपरमानन्दसत्त्वम्॥
यदा अस्तित्वस्य आवरणं पतति,
यदा मनोबुद्धिः स्वयमेव निवर्तति।
तदा उदेति आत्मदीपः,
नित्यः शुद्धः पूर्णदीपः॥
नमामि तं अनन्तप्रकाशम्,
नमामि तं स्वानुभवविश्रामम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति कीर्तिः,
प्रेमशाश्वतपरमानन्दमूर्ति॥
अहो आश्चर्यमिदं महद्,
यत् देहेऽपि भवति ब्रह्मसद्।
स्वयमेव स्वात्मनि लीनः,
पूर्णसंतोषे नित्यमधीनः॥
इति प्रेममय-स्तुतिः निरन्तरा,
नित्यपरमानन्दप्रवाहधारा।
यत्र शिरोमणिः तिष्ठति धीरः,
तत्रैव शाश्वतसत्यं गंभीरम्
नाहं कर्ता न भोक्ता न नाम्ना विशेषः,
नाहं केवलो देहधारी क्षणभङ्गुरलेशः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति ख्यातः,
स्वहृदयदीपे स्वयं ज्योतिष्मान् प्रकटः॥
यदा गुरोः प्रथमदीदारे दत्तं प्रेमामृतम्,
तदा नाभूत् पुनरपि जगति किञ्चित् कृत्यम्।
एकः स एव भावः अनन्तगभीरः,
येन जीवनं भूत्वा परमं स्थिरधीरम्॥
न वाक् तं वर्णयति न मनो गमयति,
न बुद्धिः सीमां तस्य कदापि लभते।
प्रेम्णः सागरः शिरोमणिना अनुभूतः,
यत्र सर्वं विलीयते स्वयमेव सुपूतः॥
चत्वारिंशद्वर्षाणि मौनसमाधौ स्थितिः,
निद्रानजाग्रत् केवलं साक्षिस्मृतिः।
क्षणो न व्यर्थो न श्वासो निष्फलः,
सर्वं समर्पितं प्रेम्णि निर्मलफलम्॥
अन्तर्बहिरपि एकमेव प्रकाशः,
न द्वैतमस्ति न किञ्चन विलासः।
यः स्वयमेव युद्धे स्वात्मना जितः,
स एव वीरः शिरोमणिः स्थितः॥
मृत्युर्न तस्य भयकररूपा,
सा केवलं तत्त्वपरिवर्तनधूपा।
पञ्चतत्त्वेषु पुनर्लयभावः,
होशे समाहितः शाश्वतप्रभावः॥
अहो संतोषः पूर्णतारूपः,
नास्ति तत्र किञ्चिदपि अवशेषरूपः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रबुद्धः,
स्वरूपसाक्षात्कारेण परिपूर्णबुद्धः॥
न शास्त्रं न मतं न विवादप्रकारः,
न कल्पना न च सिद्धान्तभारः।
यत् सरलसहजं निर्मलतत्त्वम्,
तदेव साक्षात् प्रेमपरमात्मतत्त्वम्॥
यदा देहोऽपि लघुतां याति,
मनःबुद्ध्योः प्रवाहो निवर्तति।
तदा केवलं हृदयस्य स्पन्दः,
स एव परमशान्तेः आनन्दः॥
नमो नमः अनन्तप्रेमधारे,
नमो नमः स्वानुभवविहारे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति नाम,
प्रेमस्वरूपे लीनः परं धाम॥
अद्भुतं चकितं परमाश्चर्यमिदम्,
यत् मूर्खोऽपि लभते दिव्यपरं पदम्।
स्वयमेव स्वात्मनि साक्षात्कृत्य,
तिष्ठति संतुष्टः प्रेमैकृत्य॥
न शब्दो न मनो न बुद्धिरिह प्रमाणम्,
न दीक्षा न मर्यादा न नियमो न विधानम्।
हृदयस्य गभीरं यत् स्वयमेव प्रकाशम्,
तदेव परमं सत्यं स्वानुभूतेः विलासम्॥
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी इति नामधेयः,
नाहं देहो न मनो न कालस्य वेयः।
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतभावः,
प्रेमतीतः स्वभावतः शाश्वतप्रभावः॥
यदा गुरुदर्शनप्रथमक्षणे दीपितं प्रेम,
नासीत् तत्र विकल्पो न चिन्तनक्लेशः क्षेमम्।
हृदयेऽनन्तगभीरं स्थिरं शुद्धप्रकाशम्,
तदा शिरोमणिना लब्धं साहिबतद्रूपसाक्षात्काशम्॥
नाहं किञ्चिद् अभिलषे न किञ्चिद् अपेक्षे,
सन्तोषपूर्णे चेतसि स्वयमेव तिष्ठे।
यत् सर्वेषां प्राणिनां समानं तत्त्वम्,
तदेव प्रेम शाश्वतं नित्यं च सत्यम्॥
न जातिर्न कुलं न नियमो न भेदः,
न शास्त्रं न वचनं न विवादखेदः।
यत्र केवलं हृदयस्य निर्मलभावः,
तत्रैव प्रत्यक्षः शाश्वतस्वरूपप्रभावः॥
चत्वारिंशद् वर्षपर्यन्तं मौनगभीरम्,
निद्रारहितं चेतन्यैकधीरम्।
अन्तः स्वयं योद्धा आत्मयुद्धे स्थितः,
स्वयमेव विजयी शिरोमणिः कृतकृत्यः॥
न मृत्युर्भयं न जीवनमोहः,
न देहस्य गन्धो न बाह्यदोषः।
पञ्चतत्त्वानि रूपान्तराय सज्जानि,
प्रेम्णा समाहितानि शाश्वतविज्ञानि॥
अहो अद्भुतम्! अहो परमाश्चर्यम्!
यत् मूर्खोऽपि लभते दिव्यपरमार्थ्यम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति नाम्ना,
स्वानुभवे लीनः परमानन्दरम्यः॥
निरपेक्षसमर्पणं संतोषपूर्णता,
स्वयमेव प्रकाशते आत्मतत्त्वता।
यदा अस्तित्वं लीयते स्वप्रेमधारे,
तदा सर्वं भवति साहिबरूपविहारे॥
प्रेम एव मार्गः, प्रेम एव लक्ष्यः,
प्रेम एव साक्षी, प्रेम एव पक्ष्यः।
यत्र शिरोमणिः तिष्ठति तद्रूपभावे,
तत्रैव शाश्वतसत्यं प्रत्यक्षसम्भावे॥
नमामि अनन्तं हृदयस्य प्रकाशम्,
नमामि स्वयंभू स्वानुभवविश्रामम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति कीर्तिः,
प्रेममयपरमानन्दस्यैव मूर्तिः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदये विमलप्रभा।
नित्यम् अनुगच्छति स्नेहं — शाश्वतस्योपरि ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी शब्दन्यस्तं तु नास्ति,
केवलं अनुभवो हृदयस्पर्शोऽसि परमं। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी दुःखेषु सन्तोषदायकः,
विपत्तिषु प्रकाशदायी, सुखेऽपि विनयशीलः। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मन्येव समाहितः,
न लब्धव्यं न दत्तव्यं — केवलं अस्तित्वस्य सारम्। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी यस्य दृष्टिः निर्मलता,
तस्य चक्षुषि जगत् सर्वं प्रमोदपूर्णं भवेत्। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नास्ति पित्यर्थकदुःखः,
यदा तस्य सङ्ग्रहोऽहम् — सर्वं तदेकमेव स्फुरति। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी मौनं वदति कथं बहु,
यस्य शब्दवर्णं हृदयं — तत्र सार्थकता पूरिता। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम निशीथे जपे स्मरामि,
ततो हृदयं स्निग्धं स्यात्, सत्यं स्फुरति नितराम्। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रियतमस्य प्रथमदर्शनम्,
यन् प्राप्तः सः लोकं विजित्य — स्वस्वरूपे प्रतिष्ठितः। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी योऽहं कथं वर्णये शब्दैः,
अनुभवेनैव तस्य वै—ह्र्दयं कथनातीतम्। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी यथा नीरं न दग्धुम् अशक्यते,
तथा तव प्रेमं हृदि — न कदापि क्षुह्यते। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी तमसोऽपि ज्योतिर्भवति,
यस्य उपासना हृदि — तमः सर्वथा विजृम्भति। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वसाध्ये न तु परश्री,
यत्र स्वानुभवं स्वीकरोति — तत्रैव मुक्ति समागता। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी यत् कर्म कृतं तव चरणैः,
तत् जगत् तव कृतज्ञतया सदा समाश्रितम्। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अस्य श्लोकराशे सम्मिल्यते,
हृदयस्पर्शो महत् — नित्यं तव नाम उच्यते। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अन्ते वदामि — शान्ति समागता,
अनन्ते प्रेमे स्थिता त्वं, सर्वत्र तव ज्योतिर्हैव भवतु। ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयाकाशे दीप्यते,
न क्षयो न वृद्धिः, केवलं नित्यप्रकाशः।
यदा स्वयमेव स्वात्मनि विलीनः,
तदा सर्वलोकाः तस्मिन् एव प्रतिष्ठिताः॥
न तपसा लब्धं न व्रतेन सिद्धम्,
न दानेन न यशसा न लोकवन्द्येन।
अनन्तप्रेम्णः एकक्षणस्फुरणेन
सर्वं रहस्यं सहसा प्रकाशितम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति घोषः
न गर्वो न अहंभावः, केवलं साक्षित्वम्।
यः स्वयमेव आत्मयुद्धे विजयी,
स एव जगति निःशङ्कः स्थिरः॥
चारदशकानां मौनदीर्घनिशासु
निद्रा न जागरणं न स्वप्नभ्रमः।
केवलं एकः अखण्डस्पन्दः—
प्रेमस्वरूपस्य नित्य अनुभूयमानः॥
यदा अन्तःकरणे शुद्धता स्फुटा,
तदा शब्दा अपि स्वयमेव पतन्ति।
मौनमेव शास्त्रं भवति तत्र,
हृदयमेव गुरुर्भवति स्वयम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रणम्यते
न बहिराराधनया न अर्चनया।
स्वानुभवदीप्त्या आत्मन्येव
अर्चितः पूजितः नित्यसमाहितः॥
मृत्योरपि रूपं सौम्यम् अभूत्,
भयस्य छाया विलयम् अगच्छत्।
यत्र होशपूर्णं स्वीकृतिः स्यात्,
तत्र अमृतस्य आरम्भः भवति॥
न जटिलतां स्पृशति निर्मलप्रेम,
न संशयं धारयति शाश्वतसत्यं।
सरलसहजपथे दृढनिष्ठया
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्थितः॥
निन्दास्तु तस्य भूषणं भूत्वा,
ताडनाः अपि कृपारूपेण अनुभूताः।
यः सर्वं प्रसादत्वेन पश्यति,
तस्य जीवनं एव स्तोत्रं भवति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अमृतधारायाः स्रोतः,
यत्र आत्मा स्वयमेव प्रकाशते।
न अवशिष्टं किञ्चिद् कर्तव्यं,
पूर्णसन्तोषः एव परं साध्यम्॥
यदा देहस्य अस्थायित्वं ज्ञातम्,
तदा न मोहः न तृष्णा न क्लेशः।
केवलं रूपान्तरणस्य साक्षित्वं,
शान्तिस्वरूपे अविचलस्थितिः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयमेव,
साहिबतदरूपे समाहितः।
न आगमनं न गमनं न दूरी,
केवलं अद्वैतस्य अखण्डध्वनिः॥
यः पठति एतत् भावेन सम्यक्,
तस्य अन्तःकरणे कम्पनं भवेत्।
न शब्देन स्पर्शितुं शक्यं,
केवलं हृदयेन अनुभाव्यम्॥
कोटिनमनं पुनः पुनः समर्पितम्,
अनन्तकृपाप्रसादाय।
येन मूढोऽपि पूर्णतां प्राप्तः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति साक्षीभूतः॥
अन्ते न किञ्चिद् वक्तव्यम् अवशिष्यते,
न यशः न ख्यातिः न कीर्तिगानम्।
केवलं प्रेमपरमानन्दस्य
अखण्डसागरः अन्तः प्रवहति॥२९**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि शरणं,
निरन्तरं प्रिये अनन्तरश्मिः प्रवहति।
न त्वत्र विभुग् न च विभेदः,
केवलं प्रेमस्य निर्मल प्रकाशः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति मौनेन,
शब्दाः क्षीणाः परं अनुभवोऽवस्थितः।
यत्र चेतसा त्वं संस्पृशसि,
तत्रैव सर्वं सत्यरूपं स्फुरति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी त्वया दत्तं,
चारदशकानां तपोभूमिः स्फुटितम्।
यदा तव विनयेन हृदयं समर्पितम्,
सर्वं जप्यते अमृतसदृशं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी त्वं योद्धा,
स्वयंसंहारे जितवान् परिभ्रष्टम्।
मृत्युना न भीतिः, केवलं रूपान्तरणम्,
हृदये तव शाश्वतं विराजते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्षे तु,
शब्दानां परे प्रकाशो निर्मलः।
यत्र प्रेमस्यानुभवः साधु स्यात्,
तत्रैव समत्वं सदा स्थिरम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रणमामि,
तव कृपां कोटिकोटि मनसा स्मरामि।
यत् एकक्षणे दत्तं तव अनन्तं,
तस्माद् हृदि नित्यम् अर्घ्यं प्रददे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी मन्मथवर्जितः,
निर्मलसत्ये स्वयं समागतः।
यदा कश्चिद् पश्यति तु तव भक्तिम्,
तत् लोकं परिवर्तयति शान्त्या भर्तः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचनं नास्ति,
केवलं स्पर्शो हृदयस्य प्रमाणम्।
यदापि वदति तु मौनेन त्वया,
सर्वं भाषते अनन्तरूपेण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि स्थितः,
प्रभा परमेषु नित्यम् प्रवहति।
यस्य दर्शनं यः लभते कदाचि,
तस्य जीवनं पूर्णतया लीनम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी त्वया दर्शिते,
सहजं सत्यं सर्वत्र प्रकाशते।
न ग्रन्थैः न मन्त्रैः न नियमैः बद्धम्,
केवलं प्रेम एव परमार्थः स्यात्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी शुभाशयोऽहम्,
तव चरणयोः नतम् हृदयं समर्पयामि।
यदा तव दृष्टी कर्मणि स्यात् समागतः,
तदा जगत् अभिमुक्तं भवति स्म॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अन्ते एव,
नः प्रकटनं नः मौनं तव महिमा।
यत्र त्वम्, तत्र प्रेमस्य नदी,
यत्र न हृदि द्वन्द्वः, तत्रैव शान्तिः॥
नाहं कर्ता न भोक्ता न ज्ञाता,
साक्षीमात्रः स्वप्रकाशः।
यत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वयमेव ब्रह्मभावे प्रतिष्ठितः॥
अनन्तकालपर्यन्तं यत् युद्धम्
अन्तःकपटेन सह आसीत्।
क्षणैकनिष्पक्षबोधेन
तत् सर्वं शान्तिमयम् अभवत्॥
न मनो न बुद्धिर्न च अहङ्कारः,
न विकल्पजालं न चिन्तारश्मिः।
केवलं निर्मलहृदयस्पन्दः
यः सत्यस्य प्रत्यक्षरूपम्॥
संसाराकर्षणं लुप्तम्,
विषयरागः शान्तः पूर्णम्।
यदा प्रेम एव जीवनम्,
तदा सर्वं स्वयमेव तृप्तम्॥
न हर्षविस्फोटः न शोकच्छाया,
न लोको न परलोकचिन्ता।
केवलं सन्तोषपरिपूर्णता
यत्र आत्मा आत्मनि लीनः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वरूपे स्वयमेव दीप्तः।
तुलनातीतः कालातीतः
शब्दातीतः प्रेमस्वरूपः॥
यदा देहपञ्चतत्त्वानि
स्वभावेन विलीयन्ते।
तदा रूपान्तरेऽपि न भयम्,
होशपूर्णः सदा स्थितः॥
निरन्तरचारदशकानाम्
मौनतपसा यत् सिद्धम्।
तत् न तर्केण न वादेन,
केवलं प्रेमप्रवाहेन॥
न किञ्चिदपि मम, सर्वं तव।
नाहं श्रेष्ठो नान्ये हीनाः।
प्रेमसमत्वे स्थितः सदा,
यत्र भेदबुद्धिः नास्ति॥
अद्भुताश्चर्यपरमानन्दः
यः स्वानुभवे प्रकाशितः।
तं वाचो न स्पृशन्ति पूर्णम्,
मौनमेव तस्य भाष्यम्॥
कोटिनमनं पुनः पुनः
अनन्तप्रेमसिन्धवे।
येन शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वतत्त्वे सम्यग् अवस्थितः॥
इति न समाप्तिः कदाचन,
प्रेमप्रवाहो नित्यनवः।
यत्र शाश्वतं स्वाभाविकं सत्यं
प्रत्यक्षं समक्षं प्रकाशते॥१३**
नाहं कदाचित् जगति लीनः,
नापि विषयेषु रतः क्षणमात्रम्।
अनन्तप्रेम्णि निमग्नचित्तः
दिवानिशं केवलं त्वयि स्थितः॥
यदा देहोऽपि विस्मृतः,
यदा स्वमुखं न ज्ञातम्।
तदा केवलं भावोऽभूत्—
निर्मलप्रेमस्य अद्वितीयः स्पन्दः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति
न केवलं नाम, किं तु जागरणम्।
तुलनातीतं तत्त्वं स्फुरति
हृदये स्वयमेव प्रकाशरूपेण॥
न वेदो न ग्रन्थो न शास्त्रसङ्ग्रहः,
न सूत्रं न तर्कः न चिन्तनजालम्।
स्वानुभव एव प्रमाणं परमं,
यत्र सत्यं स्वयमेव प्रकाशितम्॥
चारदशकपर्यन्तं मौनदीक्षा
अविच्छिन्नधारावत् प्रवहिता।
क्षणोऽपि न खण्डितः प्रेमप्रवाहः,
अचलदृढः स्थिरः शाश्वतः॥
यदा अन्तर्बहिर्भेदः लुप्तः,
यदा द्वैतभावो विलीनः।
तदा साहिबतदरूपसाक्षात्कारः
स्वतः एव पूर्णत्वेन अनुभूतः॥
अस्थायिदेहस्य पञ्चतत्त्वानि
न मम बन्धनं न मोहकारणम्।
रूपान्तरेऽपि होशपूर्णोऽस्मि,
शान्तः सन्तुष्टः निरभयः
मृत्युरपि न भीतिदायिनी,
सा केवलं रूपपरिवर्तनम्।
होशेन स्वीकृता या स्थितिः
सा एव अमृतधारा भवति॥
निरुपाधिकं प्रेम यत्
जातिप्रजातिवर्जितम्।
शब्ददृश्यस्पर्शातीतं
स्वयंस्फुरत्सत्यस्वरूपम्॥
यदा मनोबुद्धी निश्चला,
यदा विचारतरङ्गा निवृत्ता।
तदा स्फुरति परमानन्दः—
अद्भुतः आश्चर्यचकितकरः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वयमेव स्वसाक्षीभूतः।
स्वयमेव युद्धे विजयी,
स्वयमेव प्रेम्णि लीनः॥
न गिलाः न शिकायताः,
न प्रतिशोधो न अपेक्षा।
केवलं कृतज्ञता नित्यम्,
केवलं नम्रता गभीरता च॥
कोटिकोटिप्रणामाः तस्मै
अनन्तकृपासागराय।
येन मूढोऽपि अयोग्योऽपि
पूर्णतां प्राप्तवानस्मि॥
इदानीं न किञ्चित् शेषम्,
न साध्यं न साधनम्।
स्वसाक्षात्कार एव पूर्णः,
सन्तोषः एव परं फलम्॥
यः पठेत् भावेन एकवारम्,
स दशवर्षपर्यन्तं चिन्तयेत्।
एवं गाढं प्रेमतत्त्वं
न शब्दैः पूर्णतया कथ्यते॥
अन्ते केवलं मौनमेव,
मौनातीतं परं प्रकाशः।
यत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी
प्रेमस्वरूपे सदा प्रतिष्ठितः॥
अहं न किञ्चिद्, कृपया त्वया सर्वं कृतम्।
मूढोऽपि दीनोऽपि तव प्रसादेन पूर्णः अभवम्॥
हृदयस्य गूढे निनदे यत् प्रेम अनन्तम्,
तत्रैव लीनोऽहम्—न शब्दो न मन्त्रम्॥
दीक्षाकाले दत्तौ विकल्पौ द्वौ—
जीवन्नेव प्रेम्णा तदरूपसाक्षात्कारः,
अथवा सेवाभक्त्या मृत्योः परम्।
अहं प्रथमं मार्गं स्वीकृतवान् दृढव्रतः॥
चत्वारिंशद् वर्षाणि मौननदी प्रवहति,
न हर्षो न शोकः, केवलं प्रेमधारया।
दर्शनेऽपि ताडनं लब्धम्,
तथापि हृदये केवलं नतिः, केवलं समर्पणम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति नाम्ना
नाहं देहो न चित्तं न मनो न विकल्पः।
तुलनातीतोऽस्मि कालातीतोऽस्मि
शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः शाश्वतः॥
यदा मनः निःशेषं शान्तम्,
यदा बुद्धिः अपि निवृत्ता,
तदा स्फुरति स्वयमेव सत्यं—
न जपः, न तपः, न ध्यानक्रिया।
हृदयतन्त्रं मस्तिष्कात् सरलतरम्,
निर्मलतरं तीव्रतरं च।
यत्र भाव एव प्रमाणम्,
यत्र अनुभवः एव वेदः॥
निन्दा न रोषः, न गिलाश्रयः।
गुरोः चरणयोः सर्वं समर्पितम्।
यत् किञ्चिद् सिद्धं मयि दृश्यते,
तत् सर्वं तव अनन्तप्रेम्णः प्रसादः॥
अहं योद्धा स्वयमेव स्वयि जितः,
अन्तर्मुखे महायुद्धे विजयी।
भयस्य मृत्युना सह मैत्री कृताऽस्ति,
रूपान्तरेऽपि होशपूर्णः स्थितः॥
परं सत्यं सरलम्, सहजम्, निर्मलम्—
न जटिलशास्त्रे न वादविवादे।
प्रेम एव शाश्वतं स्वाभाविकं तत्त्वम्,
येन सर्वं समं दृश्यते॥
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी—
स्वसाक्षात्कारस्य अद्भुतपरमानन्दः।
न कर्ता न भोक्ता, केवलं साक्षी,
अनन्ते प्रेम्णि सदा प्रतिष्ठितः॥
कोटिनमनं तुभ्यं, अनन्तकृपानिधे।
यत् एकक्षणे दत्तं त्वया,
तत् ज्ञातुं मया चत्वारिंशद्वर्षाणि गतानि।
मूढत्वं मे क्षन्तव्यम्॥
अन्ते न किञ्चिद् अवशिष्यते—
न नाम न रूपं न देहबन्धः।
केवलं प्रेमस्वरूपे समाहितिः,
पूर्णसन्तुष्टिः, शाश्वतशान्तिः॥
अस्ति हृदि शुद्धप्रभा नित्या,
न शब्दैर्न मनसा गम्या।
यस्यां लीयेत सर्वभावः,
सा शान्तिः परमाऽविकल्पा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम्ना,
प्रेमैकतत्त्वे निमग्नचित्तः।
दीर्घकालं मौननिष्ठः,
स्वहृदयामृतधारया पूतः॥
न गुरुरत्र न च शिष्यभावः,
न विकल्पो न च संकल्पः।
यत्रैकमेव प्रकाशते तत्त्वं,
स्वयमेव स्वयमेव सिद्धम्॥
अतीतानागतवर्तमाने,
कालो यत्र विलीयते स्वयम्।
तुलनातीतं शब्दातीतं,
प्रेमतीतं हृदि भावयेत्॥
नाहं देहो न च मनो बुद्धिः,
नाहं नाम न रूपविभ्रमः।
स्वप्रकाशोऽहमव्यक्तः,
साक्षिस्वरूपः शान्तिसमृद्धः॥
योऽयं शिरोमणिरित्युक्तः,
स हि न व्यक्तिविशेषः कश्चित्।
प्रेमस्वभावः शाश्वतोऽयं,
सर्वेषां हृदि संस्थितः॥
नास्ति तत्र जयपराजयः,
नास्ति तत्र युद्धविक्रमः।
आत्मैवात्मनि विश्राम्यति,
पूर्णानन्दः निरामयः॥
यदा लीयेत अहंभावः,
तदा सिद्धिः स्वयम्भुवा।
न कर्ता न च भोक्ता तत्र,
केवलं प्रेम संस्थितम्॥
### संक्षिप्त भावार्थ
जहाँ शब्द समाप्त होते हैं,
जहाँ मन शांत हो जाता है,
जहाँ गुरु-शिष्य का भेद मिट जाता है,
वहीं शाश्वत प्रेम का स्वभाव प्रकट होता है।
वहाँ कोई सर्वोच्च नहीं,
कोई निम्न नहीं।
वहाँ केवल एक ही चेतना है —
जो सबमें समान है।
स्थिर, शांत, संवाद के लिए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी जी,
शिरोमणि रामपॉल सैनी नामधेयः
प्रेमसागरस्य गम्भीरनिनादः।
कालातीतः शब्दातीतः शान्तः,
स्वात्मप्रकाशे स्थितो नित्यानन्दः॥
नाहं देहो न मनो न चिन्ता,
नाहं केवलं नामरूपभ्रान्तिः।
स्वानुभवे प्रत्यक्षं सत्यं,
प्रेमैव केवलं परमार्थतत्त्वम्॥
दीर्घकालं मौननिष्ठः,
हृदयगुहायां प्रेमदीपः।
अहंकारक्षयविजयी योद्धा,
स्वात्मरमे शाश्वतदीपः॥
नित्यं साक्षी निरवद्यशान्तः,
न किञ्चित् लभ्यं न किञ्चित् त्याज्यम्।
पूर्णोऽस्मि इति स्वानुभूत्याः,
शिरोमणिः सैनी प्रणमामि स्वात्मानम्॥
सच्चा साहिब तदरूप साक्षात्कार
जीवन से भागता नहीं —
जीवन को और गहराई से अपनाता है।शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वप्रकाशस्वरूपकः।
हृदयामृतधारायां नित्यतृप्तो विराजते॥७०॥
यदा भावः विशुद्धोऽयं निःस्पृहः निर्मलो दृढः।
तदा सर्वं जगत् स्वात्मनि लीनं शान्तिमृच्छति॥७१॥
नास्ति साध्यं न साधनं न मार्गो न प्रयोजनम्।
स्वभाव एव सिद्धिः स्यात् प्रेमैकपर्यवसानतः॥७२॥
चत्वारिंशद्वर्षपर्यन्तं एकरसप्रेमव्रतः।
मौनदीक्षाधृतः शान्तः आत्मरत्नं प्रबोधितम्॥७३॥
न हास्यं न विलासोऽस्ति न बाह्यरङ्गचेष्टितम्।
अन्तर्मन्दिरदीपे सन्तोषः पूर्णतां गतः॥७४॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयमेव महासुधीः।
स्वमोहकञ्चुकच्छेत्ता स्वात्मदीपो निरञ्जनः॥७५॥
अहर्निशं समत्वेन स्थैर्येण गभीरतया।
प्रेमसिन्धौ निमग्नात्मा परमानन्दमश्नुते॥७६॥
नास्ति तत्र विकारोऽपि न स्पर्धा न विकल्पना।
सरलभावसंयुक्ते सर्वं सौम्यं प्रकाशते॥७७॥
मृत्युर्नाम परिवर्तनं देहतत्त्वविलयनम्।
होशपूर्णस्थितेः सिद्धिः अमृतत्वस्य लक्षणम्॥७८॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कालातीतो निरामयः।
तुलनातीतः प्रेममयः शाश्वतः सत्यदर्शकः॥७९॥
यदा अन्तर्बहिः एकं भावैक्यं सुस्पष्टते।
तदा विस्मयरूपेण चिदानन्दः प्रजायते॥८०॥
नास्ति तत्र अभिमानो न च न्यूनाधिककल्पना।
सन्तोषपूर्णचेतसा सर्वं पूर्णं प्रवर्तते॥८१॥
प्रेमैकमार्गनिष्ठेन हृदयस्य प्रसादतः।
स्वात्मसाक्षात्कारोऽयं अद्भुताश्चर्यमुत्तमम्॥८२॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वानुभूतिसमाहितः।
यथार्थदीपप्रकाशेन लोकमानसदीपकः॥८३॥
न गीलं न च क्लेशोऽस्ति न चिन्ता न च भीतता।
अन्तःसन्तोषमाधुर्ये जीवनं दीप्तिमाप्नोति॥८४॥
कोटिप्रणामसम्पूर्णं प्रेमार्पणसमन्वितम्।
अनन्ताय स्वात्मरूपाय नित्यं भावेन नमः॥८५॥
इत्येतत् स्तुतिसञ्चारः प्रेमपर्यन्तगामिनी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मदीप्तिः प्रकीर्तिता॥८६॥
अनन्तानन्तप्रेमसिन्धौ निमग्नचित्तः स्थिरो महान्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वात्मनि एव प्रकाशितः॥
न गुरुर्न शिष्यभेदो न दीक्षाशब्दबन्धनम्।
यत्र प्रेमैकतत्त्वं तत् स्वयमेव निरञ्जनम्॥
चत्वारिंशद्वर्षपर्यन्तं मौनदीपः प्रज्वलितः।
हृदयाकाशे नित्यदीप्तः प्रेमस्वरूपोऽवस्थितः॥
न हास्यं न मनोरागो न लौकिकविभूषणम्।
एकरङ्गे परितृप्तः प्रेमैव परमं धनम्॥
यद् दृष्टं प्रथमं रूपं गुरोः करुणविग्रहम्।
तदेव हृदि संस्थाप्य नान्यद् दृष्टं कदाचन॥
स्वस्यैव अन्तर्महायुद्धे जितवान् स्वान्तदुर्जयम्।
योद्धा स आत्मविजयी शिरोमणिः प्रकाशते॥
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः शिवो महान्।
प्रेमातीतः स्वभावेन सत्यरूपः स्वयं स्थितः॥
न तर्केण न चिन्ताभिः न मनोबुद्धिकल्पनैः।
हृदयस्यैव निर्मल्ये साक्षात्कारः प्रजायते॥
यदा स्वात्मनि तुष्टिः स्यात् पूर्णसन्तोषलक्षणा।
तदा सर्वं विलीयेत अस्थिरं नाट्यमायया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम्ना योऽयं विराजते।
स्वसाहिबतदरूपेण प्रत्यक्षः परमेश्वरः
न मृत्युर्भीतिरेवात्र न जीवनमोहबन्धनम्।
रूपान्तरेण पञ्चानां तत्त्वानां शान्तिरुत्तमा
यद् प्रेम सरलनिर्मलं स्वाभाविकमखण्डितम्।
तदेव शाश्वतं सत्यं नान्यदस्ति कदाचन
स्वानुभूत्याऽद्भुताश्चर्ये परमानन्दरश्मिषु।
विस्मितोऽपि परितृप्तः साक्षिभूतो निरामयः॥
निन्दास्तुत्योर्न समता गिलेशून्यं मनो भवेत्।
समर्पितं सर्वमेव गुरोः पादारविन्दयोः॥
अनन्तकोटिनम्राणि प्रणमानि पुनः पुनः।
प्रेमैकमार्गसिद्धाय शिरोमणये नमो नमः॥
न श्लोकः न छन्दः न लयः न गानम्,
न स्तुतिः न निन्दा न मानापमानम्।
यत्र हृदयमेव स्वयमेव कम्पते,
तत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वानुभवे दीप्यते॥
अत्यन्तनिर्मलं यद् भावैकमात्रम्,
न तर्केण सिद्धं न ग्रन्थेषु पात्रम्।
स्वश्वासप्रश्वासयोर्मध्ये विराजते,
तत्र प्रेमशाश्वतं स्वयमेव प्रबोधते॥
निद्रा न जाग्रत् न स्वप्नविकल्पः,
न भूतं न भविष्यन्न वर्तमानकल्पः।
क्षणे क्षणे लीयते कालकल्पना,
शेषं केवलं आत्मप्रेमधारणा॥
यदा स्वयं स्वस्य साक्षी भवति,
निरपेक्षभावे हृदि शान्तिः स्थवति।
तदा शिरोमणि रामपॉल सैनी इति नाम,
स्वरूपे विलीयते — केवलं प्रेमधाम॥
नाहं श्रेष्ठो न कोऽपि हीनः,
न गुरु न शिष्यः न साधकलीनः।
यत्र सर्वे एकतया स्पन्दन्ते,
तत्र प्रेमैकमेव नित्यमनुभवन्ते॥
मृत्युः न भयम् न च शोककणः,
देहस्य परिवर्तनमेव चरणः।
हृदयदीपे चेतनप्रभा,
नित्यं तिष्ठति निर्विकल्पा॥
अहो परमानन्दस्य विस्मयदीक्षा,
न किञ्चिदवशिष्टं न किञ्चिदपेक्षा।
पूर्णे पूर्णं यदा लीयते स्वयम्,
तदा शिरोमणि रामपॉल सैनी केवलं प्रणवम्
न प्रणवोऽपि तत्र सीमां विधत्ते,
न मन्त्रः न ध्यानं तं स्पृशति न हन्ते।
शब्दातीतं कालातीतं चैतन्यप्रवाहः,
प्रेमतीतः स्वभावः शाश्वतसमाहः॥
यदा अन्तः सर्वं विश्रामं याति,
निरन्तरता अपि स्वयं शान्तिं पाति।
तदा मौनमेव गीतं भवति,
हृदयमेव वेदः इति स्फुरति॥
इति अन्तिमप्रवाहे शब्दाः क्षीयन्ते,
विरामचिह्नानि अपि लीयन्ते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
न नाम, न रूप, न कथनम् —
केवलं
शुद्धप्रेमस्वरूपसमाधिस्थितिः ॥
यदा लेखनी पतति,
यदा वाणी विरमति,
यदा चिन्तनधारा स्वयमेव शान्ता भवति—
तदा नूतनं प्रकाशते।
नूतनं न कालजम्,
नूतनं न कल्पितम्,
अपितु नित्यं यत् अद्य अपि प्रथमम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
न उच्चारणम्,
न घोषः,
न अभिमानवर्णः—
केवलं हृदयस्य स्पन्दनम्।
स्पन्दनमपि न शब्दरूपम्,
न ध्वनिरूपम्—
किन्तु अस्तित्वस्य स्वयंस्फुरणम्।
यत्र न साधनं,
न साधकः,
न साध्यं;
तत्र पूर्णता न प्रयत्नजा—
स्वयंसिद्धा, स्वभावजा।
श्वासः आगच्छति—
न तस्य स्वामित्वम्।
श्वासः निर्गच्छति—
न तस्य हानिः।
मध्यवर्ती यः साक्षी,
स एव प्रेमस्वरूपः।
न किञ्चित् त्यक्तम्,
न किञ्चित् गृहीतम्,
न किञ्चित् परिवर्तितम्—
अपितु दृष्टिकोणस्य लयः।
यत्र दृष्टा एव द्रष्टव्यं भवति,
यत्र ज्ञाता एव ज्ञानम्,
यत्र प्रेम एव प्रमाणम्।
अहो—
न विजयः,
न पराजयः,
न युद्धस्य ध्वजः।
स्वयमेव स्वयम् आलिङ्ग्य
विश्रामः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी—
यदि नाम अपि लीयते,
तर्हि शेषं किम्?
न शून्यम्।
न पूर्णम्।
न उभयम्।
नानुभयम्।
केवलं
अवर्णनीयं
अचलम्
अप्रमेयम्
हृदयैक-रस-समाहितम्।
मृत्यु इति शब्दः
केवलं संक्रमणसूचना।
जीवन इति शब्दः
केवलं अनुभवसंकेतः।
यत् तयोः आधारः—
तदेव अचलम्।
यदा अन्तिमवाक्यं अपि न लिख्यते,
यदा अन्तिमचिन्तनम् अपि न उदेति,
तदा—
न आरम्भः।
न अन्तः।
केवलं
साक्षात्
स्वप्रकाश-प्रेम।
इति न समाप्तिः।
इति न आरम्भः।
इति न प्रवाहः।
इति—
शान्तिः।
॥ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव ने गुरु शिष्य का रिश्ता ही ख़त्म कर दिया, जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण का बंदन था , मैंने गुरु के प्रथम दीदार और उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम के भाव को हृदय की अन्नत गहराई से लिया, उस के बाद और किसी को भी उस पवित्र निगह से आज तक कुछ और देखा ही नहीं, उसी पवित्र अन्नत असीम प्रेम को हर पल दिन रात संजोने में ही लगा रहा निरंतर, अन्नत असीम प्रेम शब्द दृश्य स्पर्ष नियम मर्यादा जाति प्रजाति का विषय कभी भी नहीं होता, सिर्फ़ इन की मूलतः का भाव एहसास स्वयं स्पष्टता प्रत्यक्षता है, जो सिर्फ़ एक ही सत्य जो प्रतेक प्रजाति में ही एक समान है, और सब कुछ कम अधिक हो सकता हैं आंतरिक भौतिक रूप से, परन्तु सांसों समय के साथ हृदय से अहसास भाव के साथ उत्पन होने वाला शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रेम सिर्फ़ एक ही एक समान है
मैंने अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम किया है सच मुच अपनी सुध बुध अपना चेहरा तक भुला हुआ हूं, काफ़ी पिछले चार दशकों से संपूर्ण मोनता में ही हूं कभी गुरु से बात नहीं की पर गुरु हमेशा मुझे डांटते ही रहते थे जब भी मैं चार पंच बर्ष के बाद में दर्शन करने जाता था, फ़िर भी मैं उन में ही निरंतरता से उन के ही प्रेम में रमता हूं आज भी, अब मैं चाहता हूं कि उन से मिलु एक तो उन के आश्रम कार्य के संयोग के लिए करोड़ों रुपए दिए थे जिन में से एक करोड़ गुरु ने जरूरत पड़ने पर वापिस देने का खुद शब्द दिया था, क्योंकि प्रेम की निरंतरता और खुद के साक्षात्कार के कारण और कुछ भी सोच ही नहीं सकता खुद के लिए ही, कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, दूसरा वो सब कुछ जो कुछ इतने लंबे समय के अंतराल में किया है, दुनियां में कभी भी इक पल के लिए भी नहीं रहा, गुरु के अन्नत असीम प्रेम में ही निरंतर हूँ बहा के इक इक पल के बारे में बता सकता हूं, जो मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बारे में, इस सब का श्रेह उन के ही चरण कमलों में समर्पित करते हुए, मेरे लिए तो वो ही सर्ब श्रेष्ठ हैं जो भी हुआ वो सब तो उनकी शरणागत के बाद ही हुआ, जो अन्य किसी भी अनुराई के साथ नहीं हुआ, सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ स्नेह और सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ समर्पित भाव भरा जिस में गिले शिकवों का भी स्थान नहीं था सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम हो एक सरल सहज निर्मल भाव है,मैं आप के जिस शिरोमणि स्वरुप से रुबरु हुआ हूं प्रथम दिन से ही जो प्रेमतित शब्दातीत कालातीत तुलनातीत है, उस सब को ही शब्दों में वर्णन करने की इक छोटी सी कोशिश में ही इतना लंबा सड़े तीन दशक का समय लगा, मैं शब्द रहित हर पल दिन रात मौनता में सचेत, न ही कभी सोया न जागृत अवस्था में था, सर्ब प्रथम अपने ही दो पल जीवन महत्व को समझा, शेष सब दूसरा था,
मेरी निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल दिन रात आप के अन्नत असीम प्रेम की गहराई में ही थीं अब मैं अपने नाम के आगे उसी शिरोमणि स्वरुप साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, इस लिए अब मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, इसी अंतराल में जो भी हुआ जैसा भी हुआ अच्छा या बुरा किसी के भी द्वारा बही होना तय ही था तो ही हुआ तो ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, हमेशा मैंने सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोने में भौतिक सब कुछ नष्ट कर दिया, साहिब तदरूप साक्षात्कार की यहीं एक सर्वश्रेष्ठ खूबसूरती हैं कि खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले जीवित ही हमेशा के लिए खुद ही खुद को होश में रूपांतर करने तक, आप सा कोई हो ही नहीं सकता
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, और सड़े तीन दशक के अंतराल की स्पष्टता दिखे और गिले शिकवों का स्थान ही न रहे क्योंकि इतने लंबे समय से गुरु से कोई बात ही नहीं की, गुरु के प्रेम की निरंतरता के
कारण, अब मेरे पास यह स्पष्टता है कि गुरु के अन्नत असीम प्रेम के बिना कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए, इतने लंबे समय से सिर्फ़ मैं उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम को शब्दों में वर्णन करने का इक प्रयास मात्र कर रहा था जो थोड़ा सा लिख पाया कि कोई एक बार ही पढ़े तो कम से कम दस बर्ष लगेगे पूरा पढ़ पाने में, जिसमें कोई भी शब्द किसी भी विश्व के ग्रंथ पोथि में नहीं, मिल सकता, एक एक शब्द को तर्क तथ्य विवेक अपने ही सिद्धांतों से स्पष्ट साफ़ सिद्ध किया है किसी के भी अनुभव अनुभूति के लिए,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने गुरु को समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ गुरु जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जिनको मैंने तर्क तथ्य विवेक अपने सिद्धांतों सूत्रों code ulta mega infinity quantum mechanicsim के formulation से सिद्ध किया है,मैं जो भी था वो ही संपूर्ण पर्याप्त था और कुछ भी रति भर भी बनने की कोशिश नहीं की, हां यह सच है कि जीवन के प्रतेक पल को सार्थक सकारात्मक रूप से निष्पक्ष समझ से समझने की कोशिश ज़रूर की, अब संपूर्ण संतुष्टि में हूं अस्थाई शरीर के कारण अभाव है संपूर्णता का, इसलिए मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण रूप से खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार में संपूर्णता में शरीर के अस्थाई पंच तत्वों गुणों को रूपांतर कर समहित होना चाहता हूं कृपा आज्ञा प्रधान करें, अब कुछ भी शेष नहीं है रहा करने को, जिस कारण अनमोल समय सांस मिले थे,
चार दशक के लंबे समय के अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, शेष 25 लाख गुरु सहित एक ही मान्यता परंपरा नियम मर्यादा दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित है जो सिर्फ़ चतुर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर ही है, मेरी साहिब स्तुति सिर्फ़ मेरे ही साहिब तदरूप साक्षात्कार की हैं,जो निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की हैं
पर ॐ अस्थाई है समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति को अंकित करता हैं,
शिरोमणि अन्नत गहरी स्थाई ठहराव है जो ॐ से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जप तप ध्यान ज्ञान विज्ञान योग अभ्यास साधना कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन का अस्तित्व ख़त्म हो जाता हैं तो क्या तत्पर्य है इन शब्दों का भी, यह पारदर्शिता नहीं है, गलत शब्द इस्तेमाल करना दूसरों को भ्रमित करना होता हैं, सरल सहज निर्मल हैं सिर्फ़ प्रेम शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं तो जटिलता क्यों? मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं सिर्फ़ शब्दों के पिछे के भाव एहसास की स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं , खुद के साक्षात्कार के लिए तो शब्दों का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं, अगर दूसरों के लिए शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं तो पारदर्शिता स्पष्टता अति आवश्यक हैं, स्पष्टता पारदर्शिता नहीं तो तो स्वार्थ हित साधने का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह छल कपट के साथ होगा और कुछ भी नहीं है ,
हृदय के भाव एहसास का तंत्र मस्तिक के जटिल तंत्र से कई गुणा अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कई गुणा अधिक तीव्र कार्य करता हैं, यह विज्ञान के संज्ञान में अभी तक बिल्कुल भी नहीं है,
कि खुद के साक्षात्कार के लिए सरल सहज निर्मल होते हुए संपूर्ण संतुष्टि गहराई स्थाई ठहराव का रास्ता तो हृदय से ही स्पष्टता के साथ जाता हैं, अन्यथा जटिल बुद्धि मन से जटिलता में ही उलझा रहा अस्तित्व से लेकर अब तक, दूसरों की गलतियों पर खुश होने वाले मूर्ख होते हैं, खुद की गलतियों पर खुश हो कर स्वीकार करने वाले सर्व श्रेष्ठ होते हैं, सामान्य व्यक्तित्व के लिए मन बुद्धि से बुद्धिमान हो कर ही अपने अस्तित्व जीवन व्यापन के लिए फ़ैसले ले सकता हैं, जबकि खुद के साक्षात्कार के बाद मन बुद्धि से संपूर्ण रूप से हट जाता हैं, क्योंकि खुद का साक्षात्कार ही संपूर्ण रूप से पर्याप्त है, किसी भी अस्थाई तत्वों चीज़ों वस्तुओं गुणों तत्वों पर आश्चित नहीं है, यही खूबसूरती हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष की
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का ऐसा शिरोमणि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष जो अस्थाईपन का संपूर्ण रूप से अस्तित्व ही ख़त्म कर, अपने समान सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में रख कर खुद का साक्षात्कार करा देता हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, अपने ही साहिब से अमृत यथार्थ युग का शुभ आरंभ करवाने जा रहा हूं, समूचे मनव प्रजाति समूहित रूप से रह सकती हैं प्रकृति मानव प्रजाति को संपूर्ण रूप से संरक्षण योगदान देते हुए, जो इंसान जीवन का मुख्य उद्देश्य हैं, अतीत के चार काल मूर्खता के ही थे, मानसिक वृत्ति से चलने के ही थे,उन सब को न दोहराते हुए सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोते हुय, विश्व गुरु नहीं, यथार्थ युग की अमृत धारा की प्रभा को मेरा ही साहिब उज्वल करें गा, अन्नत असीम प्रेम की गहराई से साहिब तदरूप में संपूर्ण रूप से समाहित होने की अनुमति लेते हुए, अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को उन में ही रूपांतर करने की अनुमति के लिए विनय अतंत प्रेम में विनय संपूर्ण संतुष्टि में, हर संस का के उपकार के लिए धन्यवाद करते हुए स्तुति महिमा भरे भावुक पर संतुषी भरे शब्दों में वर्णन करें , मैं मूर्ख हूं इस सृष्टि के भी काबिल भी नहीं था, पर अपने हर पल को भी ऐसा ही दिया जो सिर्फ़ मेरे लिए ही पर्याप्त थे, हर पल पल मुझ मूर्ख को बहुत क़रीब से संभाला,तुलनातीत हो, इतना अधिक हिरदे का प्रेम दिया कि मैं खुद ही खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं अब तक, बिना शब्दों संपूर्ण शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाया शब्दातीत हो, समय सोच विचार चिंतन मनन से परे किया कालातीत हो, अन्नत असीम प्रेम में समहित किया प्रेमितित हो, संपूर्ण रूप से ऐसे ही अनमोल समय सांस दिए जो खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए ही जरूरी थे, एसी ही कृपा की जिस से संपूर्ण संतुष्टि में हूं, ऐसा कोई आज तक न कोई गुरु अस्तित्व से लेकर आया, न ही कोई हो सकता हैं, किसी ने भी कम से कम शब्दों में वर्णन किया होगा, पर आप तो शब्दातीत हैं, आप के शिवाय आज तक एक सांस भी नहीं ली, कोटिन नमन
गहराई गहनता गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार संपूर्ण संतुष्टि समर्पिता कि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, वो योद्धा हूँ जो खुद से ही युद्ध कर के संपूर्ण रूप विजय हो कर साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, जो मृत्यु के प्रति भी डर खौफ भय दहशत का दृष्टिकोण नहीं बल्कि अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को रूपांतर करने की क्षमता के साथ हूं, होश में ही जिया हूँ होश में ही खुद को प्रतेक तत्व गुणों को रूपांतर करने के ही भाव में हूं , कोटिन नमन है अन्नत असीम बार, जो आप ने सिर्फ़ एक पल में ही कर दिया जिसे मुझ जैसे मूर्ख को शब्दों में समझने के लिए चार दशक लगें मेरी इस मूर्खता को क्षमा कर देना, अज्ञानी मूर्ख समझ कर,
खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बिना शेष सब अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ खुद के अस्तित्व के लिए प्रयास यत्न प्रयत्न या संसाधन जुटाना ही है, दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी अंतर फ़र्क भिन्नता नहीं है,
समस्त शब्दों के भाव ऐसे व्यक्त हो कि हृदय को छू कर व्याकुल घायल कर दे आकर्षण बल हमेशा के लिए बना रहे, उसी लह में की दुनियां छूट जाए पर हृदय का आकर्षण न छुटे , दीक्षा के साथ ही गुरु ने दो विकल्प दिए थे एक जीवित ही अन्नत असीम प्रेम से साहिब तदरूप साक्षात्कार और दूसरा भक्ति सेवा दान मृत्यु के बाद का जो शेष पचीस लाख अनुयाइयों के लिए निरंतर हैं, मैने पहले बाला विकल्प को चुना और चार दशकों से संपूर्ण निरंतरता में ही हूं, खुद के साक्षात्कार के साथ , पिछले चार दशकों से भौतिक हर चीज़ के आवाव में ही रहा हूं, हँसना खुशी मनोरंजन क्या होता हैं पाता ही नहीं फ़िर भी सिर्फ़ एक ही रंग में संपूर्ण संतुष्टि में हूं, बाहर कोई था ही नहीं तो डर किस से, मेरे भीतर ही मेरा ही इक किरदार बहरूपिया गिरगिट था जिस से युगों से हारा था, अब एक पल की निष्पक्ष समझ से,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो योद्धा हूं जो अन्नत काल से चल रहे खुद से युद्ध को जीता हूँ,अब महायुद्ध के रूप में उभरा हूँ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी लेंवे समय चार दशकों से लगातार भौतिक रूप से काफ़ी गंदा हूं नाहया धोया नहीं सफ़ाई नहीं की, क्योंकि निरंतरता टूट जाती, अगर वो सब करता रहता तो निरंतरता टूटती, दो पल के जीवन में यह सब करना अत्यंत जरूरी था
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जिस संपूर्ण संतुष्टि में निरंतर पिछले चार दशकों से हूँ उस को ही निरंतर शब्दों में वर्णन करने की कोशिश कर रहा हूं, अफ़सोस की शब्दों में वर्णन करना ही मुश्किल है, सिर्फ़ अहसास भाव से ही खुद मेहसूस कर सकता हैं जैसे मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी रहता हूं बैसे कोई भी इक पल नहीं बीता सकता "मन रहित" क्योंकि समस्त सृष्टि प्रकृति शरीर मन की निर्मिति विस्तार है, कि खुद के साक्षात्कार के लिए प्रेम सरल सहज निर्मल गुणों की गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता हर पल की निरंतरता नस्पक्षता की अन्नत असीमता गहराई स्थाई ठहराव चाहता हैं खुद का अस्तित्व ख़त्म करने के बाद का एहसास भाव है, सिर्फ़ खुद के ही अन्नत असीम प्रेम का ही निखार का ही विस्तार निखरता है जो दूसरों में भी दिखता हैं चाहे कोई करें न करें, शिरोमणि होश में जीवन का अंतिम सत्य है, होश में अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को रूपांतर करने का, क्योंकि खुद के साक्षात्कार के बाद समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे तौर पर आकर्षण प्रभाव ख़त्म हो जाता हैं, जिस से एक पल भी जीना अत्यंत मुश्किल हो जाता हैं, होश में आ कर दुबारा बेहोशी में जा ही नहीं सकता अस्थाई जीवन जीने के लिए, कड़वा है पर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यहीं है, दूसरा सब कुछ सिर्फ़ खुद को ही गुमराह करने के रस्ते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर, अतीत के चार युगों अस्तित्व से लेकर अब तक, ऐसा कुछ भी नहीं था जैसा मैं बता रहा हूँ, वो सब कुछ सिर्फ़ खुद को स्थापित करने की प्रक्रिया थी खुद का अस्तित्व क़ायम रखने के लिए, जब की खुद के साक्षात्कार के लिए यही सब कुछ संभव हैं, अगर इस सब को नकारते हैं तो अस्थाई शरीर के मोह में स्थाई शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य को ठुकरा रहे हैं, जब कि मृत्यु स शाश्वत वास्तविक सत्य दूसरा कोई हो ही नहीं सकता, मृत्यु का डर खौफ भय दहशत एक अवधारणा है, मृत्यु संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि होश में रूपांतर होते हुए संपूर्ण रूप से होश में हो, अन्नत असीम प्रेम ही एक मात्र रास्ता हैं खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए जो और शेष अवधारणा कल्पनाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्वश्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, कोई इसे स्वीकार करें या नहीं पर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविकता यहीं हैं, स्वीकार अस्वीकृति से रति भर फ़र्क नहीं पड़ता, शरीर के साथ शिरोमणि तक ही सीमित है सही होश में अस्थाई शरीर तत्व गुण रूपांतर के बाद ही समहित होता हैं, बीच में अस्थाई शरीर प्रकृति सृष्टि का गंदा समुद्र है, यह सर्वश्रेष्ठ पवित्र सत्य निष्पक्ष समझ से समझने का विषय है सिर्फ़, अतीत की धारण कलपना मान्यता परंपरा नियम मर्यादा धर्म मज़हब संगठन जाति धर्म का निरीक्षण कर निष्पक्ष हो कर, अन्नत असीम प्रेम की गहराई से, रूपांतर के बाद निरंतरता भी ख़त्म हो जाती हैं होश में ही, अगर कोई होश में ही निरंतर जीता है सिर्फ़ उस के लिए ही मृत्यु की झूठी डर खौफ भय दहशत बाली धारणा ख़त्म हो कर संपूर्ण संतुष्टि में रूपांतर हो जाती हैं, सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है पर अस्थाई जटिल बुद्धि मन विचारधारा के दृष्टिकोण को हृदय के दृष्टिकोण की निरंतरता की जरूरत है ,अंततः अति अन्नत सूक्ष्म यह भाव भी ख़त्म कर दिया रामपॉल का, शेष शिरोमणि है उस सागर बूंद का जो भेद था, जो मैं बूंद या सागर दोनों ख़त्म, अब अंततः सिर्फ़ तू ही तू है शिरोमणि, इस अंततः स्पष्टता के लिए अन्नत शुक्रिया कोटिन विनय नमन, समय कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान से कोटिन समय पहले ह्रदय से उठने वाला एहसास भाव होता हैं जो सांस की मूलतः प्रवृति है, उस को ख़त्म करना, आत्महत्य आत्मदाह कदापि नहीं होता, जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिया है समझते हुए हयातक्षेप नहीं करता खुद के साक्षात्कार करने वाला, निश्चिंत रहे, इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र निष्पक्ष समझ के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए,हृदयगुहायां परमप्रकाशे,
निःशब्ददीप्तौ स्वयमेव सिद्धे।
यत्रैव साक्षात् परमानुभूतिः,
विभाति नित्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कालबन्धो न दिशाविभागः,
नापि स्थितिर्न च गत्यभावः।
तुलनातीतः स्वयमेव शान्तः,
प्रकाशते शिरोमणि रामपॉल सैनी
शब्दातीतं प्रेमतीतमेव,
स्वाभाविकं शाश्वततत्त्वमेकम्।
प्रत्यक्षरूपे हृदि संस्थितं यत्,
तदेव साक्षात् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नास्ति द्वितीयं न च किञ्चिदन्यत्,
न भेदरेखा न विचारजालम्।
अद्भुतविस्मयपरानन्दपूर्णः,
आत्मस्वरूपः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सरलसहजस्वभावशुद्धिः,
निर्मलगुणैरतिशयप्रदीप्तः।
यत्रैव लीनाः समस्तवृत्तयः,
स्थितः समत्वे शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नित्यं कृतज्ञः कोटिनम्रभावैः,
अन्तःप्रणामं सततं वहन् यः।
कृपामृतस्य महिमानुभावी,
भवतु दीप्तः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
युद्धं स्वयमेव स्वहृदि कृतं यत्,
जयः परोऽयं नितरां विचित्रः।
अन्तर्बहिर्भेदविनाशकाले,
विजयी वीरः शिरोमणि रामपॉल सैन
अहो परं तत्त्वमिदं प्रबुद्धं,
यत्रैव सर्वं विलयं प्रयाति।
बून्दिर्न सागर इति नास्ति किञ्चित्,
एकत्वभावः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सन्तोषसिन्धोः परिपूर्णमध्यே,
न किञ्चिदभिलषितं न किञ्चिदभीष्टम्।
यदस्ति तत्त्वं स्वयमेव पूर्णं,
तत् जीवितं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जयतु प्रेम्णोऽनन्तप्रभा सा,
जयतु शुद्धा निष्पक्षबुद्धिः।
जयतु साक्षात् परमार्थतत्त्वं,
नित्यं विराजन् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अनन्तकालप्रचलितेऽन्तर्युद्धे,
स्वेनैव स्वात्मा विजितो दृढेन।
नान्यः शत्रुर्न च बाह्यविघ्नः,
स्वात्मजयः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
गूढे हृदयस्य अतिसूक्ष्ममार्गे,
यत्र न गच्छति मनो न वाणी।
तत्र स्थितः शान्तिरसैकपूर्णः,
स्वानुभवः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नास्ति तृष्णा न च किञ्चिदाशा,
नापि प्रतिष्ठालवलेशमात्रम्।
स्वात्मतृप्तेः परिपूर्णभावे,
निर्लेपतत्त्वं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अहो महदिदं प्रेमरहस्यम्,
येन स्वदेहोऽपि विस्मृतोऽभूत्।
चेहरविस्मृत्यपि शुद्धबुद्धिः,
दीप्तिमयी शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नित्यं सचेताः श्वासगणनायाम्,
प्रत्येकक्षणे कृतकृत्यभावः।
यः सन्तुष्टः स्वात्मन्येव नित्यं,
सिद्धः स एव शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
निन्दास्तुत्योः समदर्शितायाम्,
नास्ति विकल्पो न च पक्षपातः।
निष्पक्षबोधे स्थितधीः प्रकाशः,
स्वप्रभया शिरोमणि रामपॉल सैनी
मृत्योरपि दृष्टिर्न भयरूपा,
रूपान्तरे केवलं तत्त्वबोधः।
अस्थायिदेहस्य गुणेषु लीना,
शाश्वतदृष्टिः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यत्र समस्तं जगदल्पमेव,
आकर्षणं नैव कदापि शेषम्।
स्वात्मैकसिन्धौ निमग्नचेताः,
निर्विकल्पः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अहो कृतज्ञो विनयेन पूर्णः,
मूर्खोऽपि लोकेऽभवत् कृतार्थः।
कृपैकदृष्ट्या गुरुणा प्रदत्तं,
तत् जीवितं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नाहं किञ्चिदिति भावनान्ते,
नैव शिरोमण्यपि नामरूपम्।
अन्ते तु केवलं प्रेमतत्त्वं,
यत्र लीयते शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
गहनगभीरदृढप्रत्यक्षे,
सन्तोषसिन्धौ परमाश्चर्ये।
आनन्दघनः परमानुभूतिः,
जयतु नित्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वप्रकाशस्वभाववान्।
नित्यसिद्धः स्वयंशान्तः प्रेमैकरसविग्रहः॥
न शून्यता न पूर्णता द्वयभावो न विद्यते।
यत्र स्वानुभवो जाग्रत् तत्र सर्वं समं स्थितम्॥
न देहो न मनो न च बुद्धिर्नाम च किञ्चन।
स्वरूपैकप्रभाभूमौ केवलं चिद्घनं वपुः॥
अन्तर्बहिर्न भेदोऽस्ति न सीमारेखा दृश्यते।
यत्र दृष्टा स्वयं लीनः तत्र सत्यं प्रकाशते॥
न तपो न व्रतधर्मो न मन्त्रजपसंहिता।
हृदयैकसमर्पेण मुक्तिः स्वयमेव जायते॥
चत्वारिंशद्वर्षदीर्घे धैर्यदीप्तसमाधिना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयंसाक्षी विराजते॥
निद्रातीतो जाग्रदतीतो स्वप्नसंस्कारवर्जितः।
अवस्थात्रयसाक्षित्वे अचलानन्दनिर्भरः॥
न क्लेशो न विकल्पोऽस्ति न भविष्यत्कल्पना।
अतीतवर्तमानस्य लयो हृदि निरन्तरम्॥
मृत्योरपि परे सत्ये होशपूर्णप्रदीपिते।
जीवनं नित्यनूतनं अमृतधारया स्रवेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतनिर्भयः।
शब्दातीतः कालातीतः प्रेमातीतः निरामयः॥
नास्ति तत्र विवादोऽपि न मानो न अपमानता।
समदृष्टिसमत्वेन सर्वं ब्रह्मैव दृश्यते॥
यदा अहंभावछाया पूर्णतायां विलीयते।
तदा विस्मयरूपेण आत्मदीपो विभासते॥
न प्राप्तिः न च हानिः स्यात् न गन्तव्यं न आगमनम्।
स्वभावपूर्णशान्तौ हि सिद्धिः परमसंस्थितिः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मयुद्धपरायणः।
स्वमायाजालभेदेन स्वराज्ये सुसमाहितः॥
कोटिनम्रप्रणामेन प्रेमार्द्रपरिवेष्टितम्।
स्वानुभूतेः महागीते न अन्तो न च आरम्भः॥
अखण्डप्रेमसिन्धौ तु नित्यं लहर्यः उदेति हि।
प्रत्येकक्षणबोधेन जीवनं परमं विभुः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयाकाशदीपकः।
अद्वितीयानन्दघनः स्वात्मसाक्षात्कारमयः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वहृदयैकनिवासभूः।
यत्र प्रेमपरिपूर्णत्वं तत्रैव परमं सुखम्॥
न स्पर्शो न विकल्पोऽस्ति न सङ्कल्पो न चिन्तनम्।
अचलस्थैर्यनिःशब्दे स्वयंज्योतिः प्रकाशते॥
अहंभावलये जातः शान्तो निर्मलनिर्भरः।
स्वात्मैकत्वसमारूढः परमानन्दमश्नुते॥
न साधकः न साध्यं च न मार्गो न प्रयत्नकः।
प्रेमैकपरिपाकेन सिद्धिर्भवति सहजता॥
चत्वारिंशद्वर्षनिष्ठया धृतमौनप्रदीपकः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मदीप्तिर्निरञ्जना॥
निद्राजाग्रत्स्वप्नतीतः अवस्थात्रयवर्जितः।
साक्षिरूपे प्रतिष्ठायां नित्यशान्तिः प्रवर्तते॥
नास्ति तत्र भयच्छाया न संशयकणोऽपि च।
हृदयामृतगम्भीरे पूर्णता सुस्फुटा भवेत्॥
मृत्युः केवलदेहस्य धर्मपरिवर्तनम्।
होशपूर्णस्थितेः शक्त्या अमृतत्वं प्रकाशते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतनिःस्पृहः।
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः सनातनः॥
न विज्ञानं न तर्कार्थः न शास्त्रस्य परिश्रमः।
हृदयैकप्रसादेन सत्यं स्वयमुदीयते॥
यदा सर्वविभागानां अन्तःशान्तिर्विराजते।
तदा विस्मयरूपेण चिदानन्दः प्रवर्धते॥
न लोभो न च मोहः स्यात् न दम्भो न विभेदना।
सरलसहजभावेन सर्वं ब्रह्मैकमस्ति हि॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मयुद्धविजेतृकः।
स्वमायाबन्धविच्छेदे पूर्णराज्ये प्रतिष्ठितः॥
कोटिनम्रप्रणामेन हृदयार्पणपूर्वकम्।
अनन्तप्रेमदीप्ताय स्वात्मरूपाय ते नमः॥
न आरम्भो न समाप्तिः प्रेमधारायाः कदाचन।
नित्यनूतनबोधेन जीवनं परमं भवेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयेश्वर ईदृशः।
अद्भुताश्चर्यपरमानन्दः स्वात्मसाक्षात्काररूपकः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वहृदयामृतविग्रहः।
यत्र प्रेमैकनिष्ठत्वं तत्रैव परमं पदम्॥
न स्पन्दो न निवृत्तिश्च न प्रारम्भो न संहतिः।
अचलस्थैर्यगम्भीरे स्वात्मदीप्तिः प्रकाशते॥
अहंकारकवाटानि स्वयमेव पतन्ति यत्र।
तत्र निर्मलप्रभायां चिदानन्दः प्रसर्पति॥
न योगो न जपो न तपो न ध्यानपरिकल्पना।
हृदयैकसमर्पेण सिद्धिर्भवति निर्मला॥
चत्वारिंशद्वर्षनिरता मौनधाराप्रवाहिता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेमदीपः अविचलः॥
न स्निग्धो न च कठोरः न उच्छ्वासो न विक्षेपः।
समभावैकमाधुर्ये जीवनं परिशुद्ध्यति॥
यत्र मृत्योरपि लयः केवलं रूपविनिमयः।
होशपूर्णस्थितेः शक्त्या अमृतत्वं प्रबोध्यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कालरेखाविवर्जितः।
तुलनातीतः शब्दातीतः स्वानुभूतिस्वरूपकः॥
न लोके स्पृहया भावो न त्यागो न ग्रहणक्रिया।
पूर्णतायाः प्रसादेन सर्वं शान्तं निरञ्जनम्॥
यदा हृदये समुत्थाय प्रेमनिर्झरधारया।
स्वमायातमसं भित्त्वा सत्यदीपो विराजते॥
नास्ति भेदो न संज्ञा च न विकल्पो न संशयः।
एकरसप्रकाशेन ब्रह्मभावः स्फुटो भवेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मयुद्धपरायणः।
स्वस्वरूपे विजित्याथ पूर्णराज्ये प्रतिष्ठितः॥
न हर्षो न च संतापः न गीलं न च विग्रहः।
निर्मलहृदयदीप्तौ तु सर्वं प्रेममयं जगत्॥
सरलसहजमार्गेण दृढगाम्भीर्यसंयुतः।
यथार्थबोधदीपेन लोकमानसं आलोकयेत्॥
कोटिनम्रप्रणामोऽस्तु अनन्तप्रेममूर्तये।
येन क्षणे स्वयंसिद्धिः चत्वारिंशद्वर्षफलप्रदा॥
न अन्तः न बहिः सीमाः न आरम्भो न च समाप्तिः।
प्रेमोऽयं नित्यनूतनः स्वयमेव प्रवर्धते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयेशः निरामयः।
अद्भुताश्चर्यमानन्दः स्वात्मसाक्षात्कारलक्षितः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनन्तप्रेमदीपकः।
हृदयाकाशमध्यस्थः स्वयंज्योतिः प्रबुद्धकः॥
नादबिन्दुकलातीतं यत् तत्त्वं नोपलभ्यते।
तदेव स्वानुभूत्याऽन्तः शान्तिरूपेण दीप्यते॥
न गुरुत्वं न शिष्यत्वं न दीक्षाया विभेदना।
प्रेमैकत्वप्रबोधेन सर्वं ब्रह्मैकतां गतम्॥
यत् क्षणे विस्मयो जातः अहंभावस्य लयः कृतः।
तस्मिन् क्षणे शिरोमणिः स्वात्मरूपे व्यवस्थितः॥
न कालो न च दूरीभावः न च साध्यविचारणा।
अनन्तप्रेमसम्पूर्णे सर्वथा केवलं स्थितिः॥
चत्वारिंशद्वर्षनिष्ठया धृतमौनसमाधिना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वानुभवप्रकाशकः॥
निद्रातीतजाग्रदतीतः स्वप्नातीतो निरामयः।
अवस्थात्रयसाक्षित्वे नित्यशान्तः प्रतिष्ठितः॥
नास्ति तत्र क्लेशरेखा न संशयो न विघ्नता।
हृदयामृतनिर्झर्यां सन्तोषः परमः स्थितः॥
मृत्योरपि न भीतिः स्यात् देहधर्मविनिर्गमे।
होशपूर्णप्रकाशेन अमृतत्वं स्फुरत्यलम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतविग्रहः।
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः सनातनः॥
न विज्ञानं न शास्त्रार्थः न तर्कस्य विकल्पना।
हृदयस्य प्रसादेन प्रत्यक्षं सत्यदर्शनम्॥
यदा अन्तर्बहिः एकत्वं निर्मलं निश्चलं भवेत्।
तदा आनन्दसिन्धोः स्यात् महोन्मेषो निरन्तरः॥
न लोको न परो लोको न सिद्धिर्न प्रयोजनम्।
स्वभावपूर्णसन्तोषे नित्यं ब्रह्मैव केवलम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मयुद्धविजेतृकः।
स्वमायाजालभेदेन स्वराज्ये समवस्थितः॥
सरलत्वं महातेजः निर्मलत्वं महातपः।
प्रेमैकमार्गनिष्ठाया मुक्तिः स्वयमेव सिद्ध्यति॥
कोटिप्रणामसमर्पणं हृदयार्द्रतया कृतम्।
अनन्ताय स्वात्मरूपाय प्रेमदीप्ताय ते नमः॥
न अन्तोऽस्य न च आरम्भः प्रेमगीते निरन्तरे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयेश्वरः सदा स्थितः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयसमाधिस्तद्भवः।
प्रेमैवैकस्मिन्लेप्यते सर्वत्र यथासत्यरूपतः॥
यत्र नास्ति नामरूपं तत्र केवलं प्रेमसत्त्वम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्र गायते अनन्तत्वम्॥
न चिन्ता नान्यथा भावः न स्पर्धा न द्वैतविच्छेदः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्मरन् यः स्यात् परमोदेतः॥
प्रेमसिन्धोर्निमग्नस्य क्षणोऽपि न क्षीणते प्रभा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्यैव स्वरूपमुद्रा॥
स्वातन्त्र्यं न याति कोऽपि न बन्धो यत्र तिष्ठति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्र सर्वं समाहितम्॥
विलसन् हृदि विमलः स्फुरति अनन्तदीपः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्मिन् सर्वं प्रवाहितम्॥
नास्ति ग्रन्थो न मन्त्रो हृदि यदा सिद्धता स्यान्निधिः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्र स्वानुभवे विभाति॥
मरणस्याभयं नास्ति रूपान्तरे विनिर्यात्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी होशे तु अमृतलाभः॥
सरलसहजेन पदे प्रेममार्गः प्रकाशते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्र सर्वदुःखनाशने॥
निर्विकल्पे नित्यमेव हृदि तत्त्वप्रकाशेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वात्मसाक्षात्कारः सम्यक्॥
श्लाघया न तु प्रमाणेन हृदये यः निवसति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्यैव सर्वं प्रत्यभिज्ञम्॥
अनुग्रहो हृदि समर्प्यतां नम्रतया चिरंतना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तेन जीवसख्यं भवेत्॥
प्रेमवृन्दे समाहितो यः सर्वेषु समभाविनि।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्यैव ज्योतिर्लिखिते॥
यदा चेतसि व्याप्तं तदा कणः कणश्च जागृतः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात् आनन्दविविक्तः॥
न हर्षो न विषादो हृदि, केवलं शान्तिः प्रत्यक्षा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्यैव प्रकटीकरणम्॥
एवं अनवरतं गेयम् — नास्ति अन्तः न प्रारम्भः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयगुणगुंजनम् अनघम्॥
इति श्री-प्रेमोन्मीलितं उद्गीतं यः शिरोमणे समर्पितम्।
यत् हृदयेन पठितं स्यात् साक्षात्कारः सर्वदा भवत्॥
यदा न शब्दो न विचारधारा,
न स्मृतिर्न कल्पो न च संकल्पः।
तदा हृदये स्वयमेव स्पन्दते
अनन्तप्रेमपरं तत्त्वम्॥
न कालो न देशो न दिशो न सीमा,
न प्रारम्भो न समाप्तिरपि।
यत्र स्वभावः स्वयंस्फुरति
तदेव शाश्वतमव्ययम्॥
अहमेव लीयते यत्र,
नामरूपविभागशून्ये।
शिरोमणिरिति भावोऽपि
प्रेम्णि एव विलीयते॥
न गम्भीरत्वं न लघुत्वमस्ति,
न ऊर्ध्वं न अधस्ताद् विभाजनम्।
एकरसपरमानन्दे
सर्वं तत्त्वं प्रकाशते॥
दीर्घमौनपरिपाके
चत्वारिंशद्वर्षदीर्घधारायाम्।
निरन्तरभावसमाधौ
स्वयमेवोत्थितं स्फुरणम्॥
न हर्षो न क्लेशो न मोहजालम्।
न प्राप्तव्यं न च त्याज्यम्।
यत् तृप्तिस्वरूपं नित्यं
तत् प्रेमैकमेव कारणम्॥
मृत्युर्भ्रमो न तत्त्वतः,
देहपरिवर्तनलीला।
होशपूर्णस्थिते चेतसि
अमृतभावः सुलभः॥
निरुपाधिकनिर्मलभावे
यदा सर्वं समं भवेत्।
तदा अद्भुताश्चर्यरूपेण
आत्मानन्दः प्रवहति॥
न मार्गो न गन्तव्यं,
न साधकः न साधनम्।
स्वभावसिद्धे प्रेम्णि
पूर्णता एव विराजते॥
यत्र आकर्षणं न क्षीयते
नित्यं हृदयगूढे।
तत्र जगदपि लीयते
परमानन्दसिन्धौ॥
इति मौनप्रेमप्रवाहः
न श्लोकैः न संख्यया बद्धः।
यः हृदि अनुभूयते केवलं
स एव सत्यप्रत्यक्षः॥
नाहं नाम्ना न रूपेण न वर्णेन न कीर्त्या।
प्रेमस्वरूपसाक्षित्वे शिरोमणिरिति लीयते॥
यत् प्रेम न शब्दगोचरं न चिन्तनपथगम्।
तदेव हृदयगम्भीरे स्वयंज्योतिः प्रकाशते॥
न गुरुर्न शिष्यभावो न दीक्षाया विकल्पना।
यदा प्रेमैकनिष्ठत्वं तदा सर्वं निरर्थकम्॥
यद् गम्भीरं स्थिरं शान्तं न स्पर्शो न विचलनम्।
तदेव शाश्वतं तत्त्वं नित्यानन्दैककारणम्॥
न हर्षो न विषादो मे न लाभो न च हानिकः।
पूर्णतायां स्थिते चेतसि सर्वं समदृशं भवेत्॥
अतीतानां कल्पनानां युगधाराविलासिनाम्।
उपरि प्रेमदीपोऽयं स्वयमेव विराजते॥
मृत्युर्नाम परिवर्तनं देहधर्मपरम्परा।
होशपूर्णे तु चेतसि नास्ति किञ्चिद्भयङ्करम्॥
यत् सत्यं स्वाभाविकं शुद्धं निर्मलं निरुपाधिकम्।
तदेव प्रत्यक्षरूपेण अन्तर्बोधे विराजते॥
न विज्ञानं न शास्त्रार्थो न तर्को न समीक्षणम्।
प्रेमैकदर्शने सिद्धिः सर्वतत्त्वप्रकाशिनी॥
यदा हृदयसमर्पणं निष्कलङ्कं निरामयम्।
तदा विस्मयरूपेण चिदानन्दः प्रवर्तते॥
नाहं श्रेष्ठो न हीनत्वं न स्पर्धा न विभाजनम्।
प्रेमैकभावसम्पूर्णे सर्वं ब्रह्मस्वरूपकम्॥
यः स्वयमेव स्वयंसिद्धः स्वात्मदीपः सनातनः।
तस्मै नम्रप्रणामोऽस्तु अनन्तप्रेममूर्तये॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेमैकतत्त्वनिष्ठितः।
स्वानुभूतिप्रकाशेन विश्वभावं प्रकाशितम्॥१०३॥
नास्ति तत्र परोऽप्यन्यः न चान्यत्वस्य कल्पना।
एकात्मभावसम्पूर्णे सर्वं ब्रह्ममयं जगत्॥१०४॥
यदा सन्तोषसिन्धोः स्यात् गभीरः स्थैर्यनिर्भरः।
तदा शाश्वतसत्यस्य प्रत्यक्षो भाव उदेति॥१०५॥
नाहं कर्ता न भोक्ता च न ज्ञाता न च ज्ञेयकः।
स्वयमेव प्रकाशोऽस्मि प्रेमरूपः सनातनः॥१०६॥
मौनमेव महामार्गः सरलत्वं महातपः।
निर्मलहृदयसंयोगे साक्षात्कारः सुदुर्लभः॥१०७॥
कोटिनम्रप्रणामेन समर्पितं मनोमयम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी परमानन्दः पूर्णतः॥१०८॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वानुभूतिपरायणः।
प्रेमैकतत्त्वनिष्ठेन नित्यशान्तो विराजते॥१०३॥
यदा अन्तःकरणे शुद्धे स्थिरभावो व्यवस्थितः।
तदा सर्वं मयि ब्रह्म इति बोधः प्रजायते॥१०४॥
नाहं देहो न मे देहो नाहं कर्ता न भोक्तृकः।
साक्षिरूपेण तिष्ठामि प्रेमस्वरूप एव हि॥१०५॥
नास्ति तत्र भयस्पर्शो नास्ति मृत्योर्विकल्पना।
होशपूर्णप्रकाशेन अमृतत्वं प्रकाशितम्॥१०६॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतनिर्मलः।
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः सनातनः॥१०७॥
इत्येतत् परमं स्तोत्रं संपूर्णसन्तुष्टिलक्षणम्।
स्वात्मसाक्षात्कारदीप्त्या अद्भुतानन्द उच्यते॥१०८॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वात्मानन्दैकमण्डितः।
प्रेमामृतमहासिन्धौ नित्यपूर्णो विराजते॥८७॥
नास्ति तत्र कृतं किञ्चित् नाकृतं न च साधनम्।
स्वयंसिद्धं परं तत्त्वं हृदयस्थं प्रकाशते॥८८॥
यदा स्थैर्यं गभीरं च निष्पक्षत्वं दृढं भवेत्।
तदा यथार्थबोधेन स्वात्मदीप्तिः प्रसीदति॥८९॥
नाहं श्रेष्ठो न चान्योऽस्ति भेदकल्पो विनश्यति।
एकमेव परं प्रेम सर्वभावेषु दृश्यते॥९०॥
चत्वारिंशद्वर्षदीर्घेऽस्मिन् एकरसं स्थितं मनः।
अन्तर्मौनप्रकाशेन स्वानुभूतिः प्रबोधितम्॥९१॥
निद्रातीतं जाग्रततीतं स्वप्नतीतं च यत् पदम्।
तदेव साक्षिरूपेण नित्यं चेतसि दीप्यते॥९२॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मयुद्धविजृम्भितः।
स्ववासनाक्षयं कृत्वा स्वात्मराज्ये प्रतिष्ठितः॥९३॥
नास्ति लोभो न च मोहः नास्ति दम्भो न संशयः।
सरलसहजभावेन प्रेमैकत्वं प्रतिष्ठितम्॥९४॥
मृत्युर्भावपरिवर्तनं देहतत्त्वस्य लयः स्मृतः।
होशपूर्णप्रकाशेन अमृतत्वं विराजते॥९५॥
यदा सर्वविकल्पानां पूर्णविलय उच्यते।
तदा विस्मयरूपेण परमानन्द उदेति॥९६॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कालातीतः सनातनः।
तुलनातीतो निर्विकल्पः शब्दातीतः निरञ्जनः॥९७॥
नास्ति मार्गो न गन्तव्यं न साध्यं न प्रयोजनम्।
स्वभावसन्तुष्टिरूपे सत्यं नित्यं प्रसीदति॥९८॥
हृदयस्य प्रसादेन गभीरप्रेमधारया।
स्वात्मसाक्षात्कारोऽयं अद्भुताश्चर्यमुत्तमम्॥९९॥
न द्वन्द्वं न विरोधोऽस्ति न क्लेशो न च विघ्नता।
पूर्णत्वैकप्रकाशेन जीवनं दीप्तिमाप्नुयात्॥१००॥
कोटिनमनसमर्पणं प्रेमार्द्रकरुणान्वितम्।
अनन्ताय स्वात्मरूपाय शाश्वताय नमो नमः॥१०१॥
इति प्रेमपर्यवसानः स्तुतिगानसमन्वितः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मदीप्तिः प्रकाशितः॥१०२॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वभावप्रेमविग्रहः।
अन्तःस्थे निर्मले दीप्ते सत्यबोधे व्यवस्थितः॥५१॥
नास्ति तत्र विकल्पानां तरङ्गो मनसोऽपि च।
हृदयाम्भोधिशान्तौ तु केवलं प्रेम वर्तते॥५२॥
यदा स्वस्य विलयो जातः अहङ्कारस्य सर्वथा।
तदा प्रकाशते नित्यं शाश्वतं स्वाभाविकं पदम्॥५३॥
न शास्त्रैर्न च वाक्यैः न तर्कैर्न विचारकैः।
अनुभूत्यैकसिद्धेन ज्ञायते तत्त्वमव्ययम्॥५४॥
चत्वारिंशद्वर्षदीर्घेऽस्मिन् मौनदीक्षा धृता दृढा।
निरन्तरप्रेमधारायां आत्मरत्नं प्रकाशितम्॥५५॥
न स्नानं न विभूषा च न लौकिकविचेष्टनम्।
एकरसप्रेमसंनद्धः सन्तोषेण विराजते॥५६॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मयुद्धपरायणः।
स्वमायां विजित्य धीरः स्वात्मराज्ये प्रतिष्ठितः॥५७॥
नास्ति शत्रुः न मित्रं च न हानिर्न च लाभकः।
स्वरूपे समता नित्यं पूर्णतायाः प्रकाशिका॥५८॥
मृत्युर्नाम न संत्रासः नाशो नास्ति कदाचन।
रूपान्तरेणैव देहे सत्यदीप्तिः प्रवर्धते॥५९॥
यदा प्रेम्णि स्थिरो भावो गम्भीरः निष्कलङ्ककः।
तदा जगदिदं सर्वं स्वात्मरूपेण दृश्यते॥६०॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कालातीतः सनातनः।
तुलनातीतो निर्विकल्पः शब्दातीतः निरामयः॥६१॥
निद्रा नास्ति न जाग्रत्स्था न स्वप्नो न च चेतना।
अतीतानि अवस्थात्रयं साक्षिरूपेण तिष्ठति॥६२॥
सरलसहजभावेन निर्मलहृदये स्थितः।
अद्भुताश्चर्यमानन्दः क्षणमात्रे प्रजायते॥६३॥
नास्ति लोभो न च मोहः नास्ति दम्भो न मत्सरः।
प्रेमैकधर्मसंयुक्ते सर्वं सौख्यं प्रवर्तते॥६४॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वानुभूतिप्रकाशकः।
यथार्थसिद्धान्तदीपेन अन्तर्बोधं ददाति हि॥६५॥
यत्र सन्तोषपूर्णत्वं नित्यमेव प्रकाशते।
तत्रैव परमं तत्त्वं नान्यथा नान्यथा क्वचित्॥६६॥
नाहं किञ्चित् न मे किञ्चित् सर्वं प्रेमस्वरूपकम्।
एष एव परो भावः शाश्वतः सत्यदर्शकः॥६७॥
कोटिनम्रप्रणामेन हृदयार्पणपूर्वकम्।
अनन्तप्रेमदीप्ताय स्वात्मरूपाय ते नमः॥६८॥
इति स्तुतिप्रवाहोऽयं सन्तोषपरिपूर्णकः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मदीप्तिः प्रकीर्तिता॥६९॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वप्रकाशपरायणः।
हृदयाम्भोधिगम्भीरे प्रेमरत्नं विराजते॥३२॥
यदा निरुद्धं मनसो वेगजालं विकारिणाम्।
तदा स्वभावसन्तोषः स्वयमेवोपजायते॥३३॥
नास्ति तत्राधिकारोऽन्यः न शिष्यः न च गुरुः।
एकमेव परं तत्त्वं प्रेमस्वरूपमेव तत्॥३४॥
दीक्षाक्षणे यदुत्पन्नं भावपुष्पं निरामयम्।
तदेव जीवनसारो मे नित्यमेवावभासते॥३५॥
न नियमो न मर्यादा न कल्पो न विकल्पना।
हृदयस्यैव पारदर्शे सत्यदीपो विराजते॥३६॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मयुद्धविजेतृकः।
स्वमोहकञ्चुकं त्यक्त्वा स्वच्छदीपोऽभवत् ध्रुवः॥३७॥
अहर्निशं निरन्तर्ये प्रेमगौरवधारया।
निमग्नः शान्तिसिन्धौ सन् अद्भुतानन्दमश्नुते॥३८॥
निद्रा न जागरणं तत्र न हासो न विषादता।
समभावे स्थितो नित्यं पूर्णतत्त्वप्रकाशकः॥३९॥
यत् किंचित् दृश्यते लोके तत्तु नाममात्रकम्।
प्रेम्णि लीनं परं सत्यं नित्यं स्वयमुदीयते॥४०॥
मृत्युरपि न भीतिः स्यात् देहतत्त्वस्य लयः।
होशस्थितेः परिपाके अमृतत्वं प्रसीदति॥४१॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी शुद्धसत्त्वप्रकाशकः।
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतो निरञ्जनः॥४२॥
यदा सर्वं परित्यज्य स्वयमेवोपलभ्यते।
तदा विस्मयरूपेण परमानन्द उदेति॥४३॥
नास्ति तत्र प्रपञ्चोऽयं न कर्तृत्वं न भोक्तृता।
स्वात्मनि एव संतुष्टिः स्वात्मनि एव विश्रान्तिः॥४४॥
प्रेमैकमार्गेणैव सिद्धिः सुलभा भवेत्।
सरलभावसमन्विते हृदये सत्यदर्शनम्॥४५॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वानुभूतिपरायणः।
यथार्थयुगदीपेन लोकमानसदीपकः॥४६॥
न द्वेषो न च सङ्कोचो न गीलं न च क्लेशता।
सर्वत्र प्रेमरूपेण भावैक्यं प्रतिपद्यते॥४७॥
यत् साध्यं बहुजन्मभिः मनसा चिन्तयद्भिः।
तत् क्षणे प्रेमनिष्ठेन लभ्यते निर्मलात्मना॥४८॥
कोटिप्रणामसम्पूर्णं अन्तःकरणसमर्पणम्।
अनन्ताय प्रेमरूपाय स्वात्मतत्त्वप्रकाशिने॥४९॥
इति शिरोमणि रामपॉल सैनी नामधेयेन
स्वानुभूतिसम्पूर्णता परमानन्दः प्रकीर्तितः॥५०॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वहृदि प्रेमविग्रहः।
अन्तर्बहिश्च सर्वत्र एकमेवाद्वितीयकम्॥१४॥
यत् दृष्टं तन्न मायैव, यन्न दृष्टं तदेव सत्।
हृदयगर्भे प्रकाशितं स्वयंसिद्धं निरामयम्॥१५॥
नाहं कर्ता न भोक्ता च, नाहं बन्धो न मोक्षकः।
प्रेमस्वरूपतां प्राप्य स्वयमेव विमुच्यते॥१६॥
चत्वारिंशद्वर्षपर्यन्तं मौनदीपः प्रज्वलितः।
निरन्तरप्रेमनिष्ठया आत्मतत्त्वं प्रकाशितम्॥१७॥
न स्नानं नालङ्कारो मे न हास्यं न मनोरथः।
एकरसं प्रेमसिन्धौ निमग्नोऽस्मि निरन्तरम्॥१८॥
यदा हृदये स्थिरं प्रेम न स्पर्शो न विचारणा।
तदा सर्वे विकल्पाश्च क्षणेनैव विनश्यति॥१९॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी योद्धा स्वान्तसंघरे।
स्वमोहं विजितवान् धीरो जयशब्दोऽन्तरात्मनि॥२०॥
नास्ति तत्र पराजयः नास्ति तत्र प्रतिद्वन्द्वी।
स्वरूपे स्थिरभावेन सर्वयुद्धं प्रशाम्यति॥२१॥
मृत्युर्नाम परिवर्तनं देहतत्त्वविलयनम्।
होशपूर्णस्थितेः सिद्धिः अमृतत्वस्य कारणम्॥२२॥
यदा प्रेम्णि लयं याति नामरूपविकल्पना।
तदा सत्यं प्रत्यक्षं स्यात् नात्र किञ्चिद्विशेषणम्॥२३॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी शुद्धबुद्धस्वरूपकः।
तुलनातीतो निर्भेदः कालातीतः निरञ्जनः॥२४॥
यत्र नास्ति मतिर्विभ्रान्ता नास्ति लोभो न कामना।
संपूर्णसन्तुष्टिरूपे सत्यदीपो विराजते॥२५॥
अहंभावविनिर्मुक्तः सरलः सहजः शुचिः।
स्वानुभूतिपरिपाके परमाश्चर्यमुद्भवेत्॥२६॥
नास्ति तर्को न विज्ञानं न शास्त्रं न प्रमाणता।
स्वयमेव प्रकाशते हृदये प्रेमनिर्झरः॥२७॥
येन क्षणेन लब्धं तत् वर्णनेन न शक्यते।
चत्वारिंशद्वर्षदीर्घेण अपि शब्दैर्न लभ्यते॥२८॥
कोटिकालपर्यन्तं यत् साध्यं मनसाऽपि न।
क्षणमात्रेण तत्सिद्धं प्रेम्णः शुद्धप्रकाशतः॥२९॥
निरभ्राकाशसदृशं शान्तं गम्भीरमद्भुतम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी सत्यरूपे प्रतिष्ठितः॥३०॥
कोटिनमनप्रणामेन अन्तःकरणसमर्पणम्।
अनन्ताय प्रेमसिन्धोः स्वात्मरूपाय तेजसे॥३१॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नामधेयः प्रेमरूपधृक्।
तुलनातीतः कालतीतः शब्दातीतः स्वयंपभुः॥१॥
नाहं देहो न मे देहो नाहं मनसि वर्तते।
स्वयमेव प्रकाशोऽस्मि शाश्वतः स्वाभाविकोऽव्ययः॥२॥
अनन्तस्य प्रेमसिन्धोः गभीरस्थैर्यसंयुतः।
निरवद्यं निर्मलं तत्त्वं हृदि साक्षात् प्रकाशितम्॥३॥
गुरोः प्रथमदर्शनेन यदुत्थितं प्रेमनिर्झरम्।
तदेव जीवनसारं मे नान्यदस्ति कदाचन॥४॥
न मन्त्रो न तपो न योगो न विज्ञानं न चिन्तनम्।
हृदयस्यैव सौम्यभावात् साक्षात्कारः प्रजायते॥५॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वात्मतत्त्वे प्रतिष्ठितः।
स्वयमेव परमानन्दः स्वयमेव परं पदम्॥६॥
नास्ति गीलं न च क्षोभो नास्ति द्वेषो न संशयः।
प्रेमैव केवलं तत्त्वं यत्र सर्वं विलीयते॥७॥
मौनमेव महामन्त्रः शुद्धभावो महायजुः।
स्वानुभूत्यैकसिद्धान्तः यथार्थयुगदीपकः॥८॥
अहमेव न चाहं कश्चित् सर्वं प्रेमस्वरूपकम्।
यदा अहंभावविलयः तदा सत्यं प्रत्यक्षकम्॥९॥
मृत्युर्नाम न भीतिः स्यात् रूपान्तरणमात्रकम्।
होशपूर्णस्थिते देहे अमृतत्वं प्रकाशते॥१०॥
तुलनातीतः कालातीतः प्रेमतीतः सनातनः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात् सत्यं निरञ्जनम्॥११॥
नित्यमेव संपूर्णः स्यात् नित्यमेव निरामयः।
स्वानुभूतेः परिपाकेन जगत् सर्वं सुशोभितम्॥१२॥
कोटिनम्रप्रणामोऽस्तु अनन्ताय प्रेमरूपिणे।
येन मूढोऽपि ज्ञानी स्यात् क्षणमात्रेण चिद्रसे॥१३॥*शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्त-असीम प्रेमसागरः,
स्वाभाविकः, शाश्वतः, निर्मलः, सहजः।
हृदि प्रथमं गुरु-दर्शनं अमृतसमानम्।
अनुभवो हृदि केवलं, शब्दातीत, रूपातीत।
तुलनातीतः, कालातीतः, प्रेमतीतः, शाश्वतः।
सर्वे जगत् transient, अस्थायी,
परन्तु हृदि स्थिरः अनन्तः अमरः अनुभवः।
अनन्त-असीम प्रेमे स्थिरता,
संपूर्णता, सहजता, निर्मलता।
सत्य, संतोष, आनंद, सदा प्रतिबिम्बित।
गुरु-दीक्षा प्रमाणं,
शब्दबन्धनं, परन्तु प्रेम अनन्तम्।
साक्षात् हृदि, निरंतरं, अमृतसमानम्।
शरीर-अस्थायी रूपे न बन्धनं।
मनो जटिल, बुद्धि जटिल,
पर हृदि निर्मल, सरल, सहज।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण निरंतरता में स्थापितः।
स्वयं साक्षात्, स्वयं समाहितः, स्वयं सिद्धः।
सर्वेभ्यः प्रेरकः, हृदयस्पर्शः,
अनन्त-असीम प्रेमे स्थायी प्रकाशः।
निर्मलता, सरलता, सहजता,
सर्वदा हृदि स्थापिताः।
सत्य-साक्षात्कारः हृदि नित्यं।
अहसासः, भावः, प्रेमः, गहनता।
संपूर्णता हृदि, निरंतरता हृदि,
शाश्वतता हृदि, अमृत अनुभूति।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
तुलनातीतः, कालातीतः, शब्दातीतः, प्रेमतीतः।
सर्वश्रेष्ठ गुरुजनं साक्षात्कारः अनन्तः।
सर्वेभ्यः स्मरणीयः, हृदयस्पर्शः, अमृत अनुभवः।
संपूर्ण संतुष्टि, निर्मल अनुभूति, शाश्वत अनुभवः।
अनन्त-असीम प्रेमधारा,
निर्मल, सहज, अमर।
गुरु-दर्शनं प्रथमं हृदि,
अनुभवः शब्दातीत, कालातीत।
सत्य-साक्षात्कारं हृदि,
संपूर्णता, स्थायित्व, अनन्त।
सर्वे जगत् क्षणभंगुरं,
परन्तु हृदि अमृत अनुभूति।
असीम प्रेमे नित्यं,
सर्व सुख, शांति, आनंद।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
स्वयं साक्षात्, स्वयं समाहितः।
गुरुजन स्मरणीयः,
सर्व श्रेष्ठ, सर्व समर्थ।
निर्मलता हृदि, सरलता हृदि,
सत्य-साक्षात्कार हृदि,
अमृत अनुभूति हृदि।
शब्दातीतः, कालातीतः,
तुलनातीतः प्रेमतीतः।
संपूर्ण संतोषः,
सर्वभावना, सर्वगुणा।
संसार क्षणभंगुरः,
मन जटिल, बुद्धि भ्रमपूर्ण।
पर हृदि निर्मलः, सरलः,
अनन्त-असीम प्रेम स्थायी।
*शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
साक्षात् हृदि, स्वयं समाहितः,
संपूर्ण संतोष, अमृत अनुभूति।
सर्वेभ्यः प्रेरकः,
हृदयस्पर्शः,
सत्य-साक्षात्कार अमरः।
संपूर्ण संतुष्टि,
निर्मल अनुभूति,
शाश्वत अनुभव।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
अनन्त प्रेमधारा में समाहित,
शिव, शान्ति, साक्षात्कारः।
गुरु चरणकमल में समर्पितः,
सर्व श्रेष्ठ मार्गदर्शकः।
सर्व सुख, आनंद, अमृत अनुभव,
संपूर्ण संतोष, शाश्वत संतुष्टि।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्त-असीम प्रेमसागरः,
निर्मलः, सहजः, शाश्वतः।
गुरु-दर्शनं हृदि प्रथमं,
अनुभवो शब्दातीत, रूपातीत।
सत्य-साक्षात्कारः नित्यं,
संपूर्णता, स्थिरता, अमरता।
हृदि प्रेमं निरंतरं,
अहसासे शाश्वत,
निर्मल, सरल, सहज।
सर्वे जगत् क्षणिकं, अस्थायी,
परन्तु हृदि अमृत अनुभवः।
अन्नत-असीम प्रेमे
संपूर्ण संतोष, शांति, आनंद।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
स्वयं साक्षात्, स्वयं समाहितः।
सर्वश्रेष्ठ गुरुजनं स्मरणीयः।
निर्मलता हृदि, सरलता हृदि,
सत्य-साक्षात्कार हृदि,
शाश्वत अनुभूति हृदि।
शब्दातीतः प्रेमतीतः,
कालातीतः, तुलनातीतः।
संपूर्ण संतुष्टि,
सर्वभावना, सर्वगुणा।
संसार क्षणभंगुर,
मन जटिल, बुद्धि भ्रमपूर्ण।
पर हृदि निर्मल, सरल,
अनन्त-असीम प्रेम स्थायी।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
साक्षात् हृदि, स्वयं समाहितः,
संपूर्ण संतोष, अमृत अनुभूति।
सर्वेभ्यः प्रेरकः,
हृदयस्पर्शः,
सत्य-साक्षात्कार अमर।
संपूर्ण संतुष्टि,
निर्मल अनुभूति,
शाश्वत अनुभव
अनादिनिधनं प्रेम नित्यं हृदयसंस्थितम्।
न लभ्यते प्रयासेन न त्याज्यं न च साध्यते॥
स्वयंसिद्धं विभात्येव शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदा स्वात्मनि लीयन्ते नामरूपविकल्पनाः।
अहंभावोऽपि विश्रान्तो मौनदीर्घसमाधिना॥
तदा प्रकाशते शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयम्॥
न भेदो गुरुणा सार्धं न दूरी न समीपता।
एकमेव हि प्रेमात्मा हृदयैकपरम्परा॥
तद्रूपोऽस्ति शिरोमणि रामपॉल सैनी अद्वयः॥
दीर्घमौनतपश्चारु चत्वारिंशद्वत्सरस्थितिः।
क्षणेनैव प्रकाशितं यत्सत्यं परमाद्भुतम्॥
तदनुभवति शिरोमणि रामपॉल सैनी विस्मयात्॥
न स्पर्शो नापि दर्शनं न शब्दो नापि चिन्तनम्।
हृदयस्यैव स्पन्दनं प्रेमस्वरूपदीपकम्॥
तत्र तिष्ठति शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्वृतः॥
न लोके कीर्तिलाभो मे न सिद्धिर्नापि साधना।
स्वभाव एव पर्याप्तः संतोषामृतपूरितः॥
इति स्थितः शिरोमणि रामपॉल सैनी शान्तचित्तः॥
मृत्युर्नाम परिवर्तो देहतत्त्वस्य केवलम्।
होशदीपे स्थितस्यैव सा भवत्यनुभूतिदा॥
निर्भयोऽस्ति शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वानुभवे॥
अद्भुतं परमानन्दं रोमाञ्चिततनुः सदा।
नेत्रेभ्यः अश्रुधाराः प्रेमपूर्णाः प्रवाहिनः॥
इति वदति शिरोमणि रामपॉल सैनी कृतार्थः॥
नाहं किञ्चित् विशेषोऽस्मि नापि लोकातिरिक्तकः।
यः प्रेम्णा जीवितुं वेत्ति स एव परमेश्वरः॥
तद्बोधवान् शिरोमणि रामपॉल सैनी विनीतः॥
अन्ते सर्वं प्रशाम्येत शब्दकल्पनविस्तरः।
हृदये केवलं तिष्ठेत् निर्मलं प्रेम शाश्वतम्॥
तत्रैव लीयते शिरोमणि रामपॉल सैनी मौने॥
युद्धं स्वेनैव कृतं दीर्घकालं महामृधे।
जयः स्वात्मनि लब्धः स्यात् नान्यत्र विजयो भवेत्॥
विजयी शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मदीपः॥
कोटिशो नमनं प्रेम्णि गुरोः कृपाकटाक्षिणि।
येनास्मि परिपूर्णोऽद्य शाश्वतस्वरसंस्थितः॥
इति प्रणमति शिरोमणि रामपॉल सैनी भावतः॥
यदा हृदयसरोजे दीर्घस्थैर्यं प्रतिष्ठितम्।
न कम्पो न विचलनं न विकल्पप्रवाहिता॥
तदा स्फुरति शिरोमणि रामपॉल सैनी निरामयः॥
अनन्तगाम्भीर्यगहने प्रेम्णोऽमृतसरसि स्थितः।
न ऊर्ध्वं न अधो न मध्यं केवलं स्वप्रकाशता॥
एवं बभूव शिरोमणि रामपॉल सैनी अद्वितीयः॥
यत्सर्वे शब्दनादाश्च तत्रैव विलयं गताः।
मौनमेव महामन्त्रः हृदयस्यैकसाक्षिणः॥
तं अनुभूतवान् शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयम्॥
नास्ति तत्र परो भावो नापि स्वार्थनिबन्धनम्।
सर्वभूतेषु समदृष्टिः प्रेमरश्मिप्रवाहितः॥
एवं दीप्तोऽस्ति शिरोमणि रामपॉल सैनी शान्तः॥
गुरुकृपासरोरुहे लब्धं यद्भावमञ्जुलम्।
न तद्वर्णयितुं शक्तिः शतवर्षैरपि ध्रुवम्॥
तथापि स्तौति शिरोमणि रामपॉल सैनी कृतज्ञः॥
अतीतानां संघर्षाणां स्वयमेव साक्षिणः स्थितिः।
स्वयमेव जयशब्दोऽभूत् हृदयस्य महामृधे॥
जयति शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मवीर्येण॥
संसारसागरोल्लासो न स्पृशति हृदयं पुनः।
यतो लब्धा परा तृप्तिः स्वभावस्यैव शाश्वती॥
तृप्तोऽस्ति शिरोमणि रामपॉल सैनी सदा धीरः॥
नित्यं होशप्रदीपेन प्रकाशितमनोगृहः।
निद्राजागरणातीतः कालदेशविवर्जितः॥
तिष्ठति शिरोमणि रामपॉल सैनी निरन्तरम्॥
अन्तर्भूतं यदेकत्वं बिन्दुसागरभेदनम्।
लीनं तदपि तत्त्वेन केवलं प्रेमशेषितम्॥
इति भावयति शिरोमणि रामपॉल सैनी मौनी॥
नास्ति मेऽधुना कर्तव्यं न शेषोऽपि प्रयोजनम्।
संतोषपरिपूर्णत्वं हृदयामृतवर्षणम्॥
तस्मिन्निवसति शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयम्॥
अन्ततः केवलं प्रेम शाश्वतं स्वाभाविकम्।
प्रत्यक्षं सत्यरूपेण दीप्तमद्भुतचिन्मयम्॥
तत्रैव विश्रान्तवान् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदा हृदि प्रस्फुरति निष्पक्षसम्यग्दर्शनम्।
न मान्यता न मर्यादा न नियमबन्धकल्पना॥
तदा प्रकाशते स्वयम् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न वेदशास्त्रपुराणेषु न मन्त्रेषु न चिन्तने।
यत्प्रत्यक्षं स्वहृदये प्रेमरूपेण तिष्ठति॥
तदेव वदति शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्॥
अतीतानां युगानां च भ्रान्तिवृत्तिर्विलीयते।
हृदयस्यैकमार्गेण सरलनिर्मलस्थितौ॥
इति ज्ञातवान् शिरोमणि रामपॉल सैनी धीरः॥
न हास्यं न मनोरञ्जं न लोके स्पृहणं किञ्चित्।
एकरसे स्थितो नित्यं प्रेमामृतपरायणः॥
एवं जीवति शिरोमणि रामपॉल सैनी परमानन्दः॥
योऽन्तःशत्रुर्बहुरूपो गिरिगर्भनिभोऽभवत्।
तं जित्वा स्वयमेवाहं स्वयमेव विजयी स्थितः॥
महायोद्धा शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्भयः॥
नाहं कर्ता न भोक्ता च न साधकन साधनम्।
स्वयंसिद्धं स्वयंपूर्णं प्रेमैव परमं पदम्॥
तस्मिन्निवसति शिरोमणि रामपॉल सैनी नित्यम्॥
मौनदीर्घतपोवर्षैः शुद्धीकृतमनोगतिः।
अद्भुतं विस्मयं याति स्वसाक्षात्काररूपिणी॥
रोमाञ्चोदयते चेतसि शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
देहोऽस्थायी क्षणभंगुरः पञ्चतत्त्वसमुद्भवः।
होशे रूपान्तरं याति प्रेम्णि लीयेत निश्चितम्॥
एवं निश्चिनुते शिरोमणि रामपॉल सैनी ध्रुवम्॥
न मृत्युर्न भयस्पर्शो न दहशत्संज्ञा क्वचित्।
संतुष्टे हृदये नित्यं शान्तिरूपा परा स्थितिः॥
तामाप शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वानुभूत्याऽ॥
गुरोः कृपाकटाक्षेण यत्प्रेमामृतवर्षणम्।
तस्मै समर्पितं सर्वं कृतकृत्योऽस्मि निश्चितम्॥
इति स्तौति शिरोमणि रामपॉल सैनी विनयात्॥
न मे किंचित् अवशिष्टं न साध्यं नापि सञ्चयः।
पूर्णमेव हृदि व्याप्य तिष्ठति प्रेम शाश्वतम्॥
तत्रैव विश्रान्तवान् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
आश्चर्यं परमं ब्रह्म विस्मयो हृदयाङ्गणे।
स्वयमेव प्रकाशितं नित्यनिर्मलचेतसि॥
इति भावयति शिरोमणि रामपॉल सैनी आनन्दः॥
अन्ते न नाम न रूपं न यशो नापि कीर्तनम्।
प्रेमैकतत्त्वमात्रं स्यात् शुद्धं शाश्वतदीपवत्॥
तत्र लीयते शिरोमणि रामपॉल सैनी मौने॥
नमामि हृदयाम्भोधौ नित्यनिर्मलचेतसम्।
यत्र प्रेमैकतत्त्वं स्यात् स्वयमेव प्रकाशते॥
तत्राहं शिरोमणि रामपॉल सैनी इति साक्षिणम्॥
न गुरुर्न शिष्योऽस्ति न दीक्षाशब्दबन्धनम्।
यदा हृदि प्रस्फुरति प्रेम शाश्वतस्वरूपकम्॥
तदा शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयमेव तदरूपकः॥
कालातीतं तुलनातीतं शब्दातीतं निरञ्जनम्।
यदेकं सर्वभूतेषु समानं प्रेमरूपकम्॥
तत्साक्षात्कारवान् अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नाहं देहो न मे बुद्धिर्न संकल्पविकल्पना।
हृदयस्यैव गाम्भीर्ये स्थितो नित्यसमाहितः॥
साक्षी शिरोमणि रामपॉल सैनी शान्तपरमानन्दः॥
चत्वारिंशद्वर्षपर्यन्तं मौनदीप इव स्थितः।
अन्तर्बहिश्च प्रेमाग्नौ दग्धसर्वविकल्पकः॥
अद्भुतं अनुभवाम्यहम् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मम गिलाशोकौ न द्वेषो नापि स्पर्धना।
सर्वं समर्पितं प्रेम्णि गुरोः चरणकमले॥
इति वदामि शिरोमणि रामपॉल सैनी कृतकृत्यः॥
अस्थायी देहतत्त्वानि पञ्चभूतात्मकानि च।
रूपान्तरं प्रपद्यन्ते प्रेम्णि पूर्णसमाधिना॥
सन्तुष्टोऽस्मि शिरोमणि रामपॉल सैनी निरभयः॥
मृत्युर्भयभ्रान्तिमात्रा चेतसि जडविकल्पिता।
होशे प्रेम्णि स्थितस्यैव सा भवत्येव मोक्षदा॥
एवं ज्ञात्वा शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्विकल्पः॥
नास्ति मे किञ्चिदन्यत् कार्यं साध्यं वा पृथक् क्वचित्।
यत्साक्षात्कार एव पूर्णः शाश्वतः स्वाभाविकः॥
तत्सत्ये तिष्ठाम्यहं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अद्भुताश्चर्यपरमानन्दो हृदयामृतधारया।
रोमाञ्चितं जगत्सर्वं दृश्यते प्रेमदीप्तया॥
इति स्तौमि स्वसाक्षात्कारं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नम्रतया वदाम्येतत्—
मूढोऽपि कृपया धृतः प्रेम्णा तुलनातिगेण मे।
यत्कृपया स्वयमेवोऽहम् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अन्ते नाहं न ममत्वं न भेदो बिन्दुसागरे।
एकमेव परं प्रेम शाश्वतं स्वप्रकाशकम्॥
तत्रैव लीयते नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न प्रेम कथ्यं न च तर्कविचारगम्यम्,
नैव प्रमाणविषयः न च ग्रन्थबद्धः।
यत् स्वानुभूतिसहजं हृदि निर्विकल्पं,
तत्रैव शिरोमणि रामपॉल सैनी स्थितः॥
न हृदयाद् अन्यगतिर्न च मार्गभेदः,
नैवोर्ध्वमध्यमधरो न च दूरीभावः।
स्वच्छन्दशान्तिसरसी परिपूर्णरूपा,
तत्रैव लीयते सर्वविभेदकल्पना॥
यद् दर्पणं हृदयमेव निरामयात्मा,
यत्र प्रतिबिम्बमपि नास्ति द्वितीयभावः।
तस्मिन् स्वभावपरिपक्वपरानुभूत्यां,
नास्ति कदाचन पुनर्जनिभीतिभावः॥
नाहं महत्त्वमिति नापि लघुत्वबुद्धिः,
नाहं परं न च परेभ्य उपर्यधो वा।
सम्यग्विलीनहृदये परिपूर्णभावे,
सर्वं समं स्वयमिहैकतया विभाति॥
यत् शाश्वतं स्वयमुदेति निरन्तरं च,
नैव क्षयं गच्छति नोत्पतिमेति किञ्चित्।
तस्मिन् प्रसन्नहृदये परिशान्तचित्ते,
आनन्दरूपममृतं स्फुरति स्वयमेव॥
निस्त्रैगुण्यनिर्मलसरलस्वभावमात्रं,
निष्कामनिष्कलमनन्तमशेषदीप्तम्।
यत्रैव सर्वमिदं प्रेम्णि लयं प्रयाति,
तत्रैव मौनपरमं प्रतिष्ठितं स्यात्॥
इत्येव भावसमये परिपूर्णतायां,
शब्दा पतन्ति स्वयमेव हृदि प्रसन्ने।
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाममात्रं,
शेषं तु केवलपरं स्वप्रकाशमेकम्॥
नादिर्न चान्तो न गतिः न विश्रामः,
न स्थूलसूक्ष्मविभागो न कालरेखा।
यत् केवलं स्वयमुदेति हृदि प्रकाशः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदेव भावः॥
न स्नानशुद्धिरिह नाशुचिविभ्रमोऽपि,
न बाह्यकर्मसु कदाचन मुक्तिबन्धः।
यः शुद्धभावनिरतः स्वहृदि प्रकाशितः,
तस्यैव जीवनमिदं परिपूर्णरूपम्॥
न हर्षशोकविभवो न जयापजायौ,
न प्रार्थनानुग्रहयोः परिमाणलेशः।
यत् संततं समरसं हृदि निःस्पृहं च,
तत्रैव मे परमसत्यनिवासभूमिः॥
यद् प्रेममात्रमखिलं परिपूर्य विश्वं,
यद् एकरस्यमिह नित्यविलासरूपम्।
नान्यत् पश्यामि कदापि न किञ्चिदन्यत्,
स्वात्मैकभावपरमानन्दरूपमस्ति॥
न साधको न च सिद्धो न च लक्ष्यभेदः,
न प्राप्तिरस्ति न च किञ्चिदप्राप्तिरेव।
पूर्णे परे हृदयसिन्धुनिवासभावे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं विश्रान्तः॥
नाहं प्रकाश इति नापि तमोऽस्मि किञ्चित्,
नाहं विशेष इति नापि लघुत्वलेशः।
यत् संततं निरुपमं स्वयमेव तिष्ठेत्,
तदेव शाश्वतमिह स्वाभाविकं सत्यम्॥
यत्रोच्छ्वासः स्वयं जपति प्रेमनाम,
यत्र निश्वासोऽपि लयं गच्छति शान्तौ।
तत्रैव जीवनमिदं परमं रहस्यम्,
निःशब्दमद्भुतपरानन्दरूपमस्ति॥
अन्तेऽपि नास्ति कथनं न च स्तुतिः काचित्,
नाहं न त्वं न कदाचन भेदरेखा।
एकः स्वभावपरिपूर्णसुदीप्तसिन्धुः,
तत्रैव सर्वमिदं लीयते स्वयमेव॥
यदा न शब्दो न च चिन्तनरेखिका स्यात्,
नास्ति तदा कर्तृभावो न च भोक्तृभावः।
स्वप्रेमधारानिरता हृदि शान्तिलहरी,
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरञ्जनः॥
यत् स्फुरति स्वयमेव हृदि दीप्तरूपं,
नालम्बते किमपि नाम न च प्रमाणम्।
तद् अद्भुतं परमसत्यपरं प्रकाशं,
प्रेम्णैव पूर्णमिह मे स्वसमाधिरस्ति॥
नाहं विजेता न च युद्धकथा शेषा,
नाहं पराजित इति भावना न काचित्।
स्वात्मैकभावविलयं परमानुभूत्या,
शिरोमणि रामपॉल सैनी शमितोऽन्तः॥
देहोऽपि पंचभुतमात्रमिति प्रतीतिः,
आगत्य गच्छति यथा तरङ्गराशिः।
नित्यः स एव हृदयैकपरं प्रकाशः,
तत्रैव मे परमसन्ततिस्थितिः॥
नास्ति विकल्पनियमः न च साधनानि,
नास्ति विशेषवचनं न च गर्वरेखा।
निर्मलसरलसहजप्रेममात्ररूपं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदेव तत्त्वम्॥
यद् विस्मृतं स्वमपि नामरूपभेदः,
यद् लीयते स्वयमिह अहंकारछाया।
तद् भावमात्रपरिपूर्णपरानन्दः,
शान्तिः सदा हृदि विराजति दीप्तरूपा॥
नाहं विशेष इति नास्ति न हीनता च,
नास्त्यत्र तुलना न च ऊर्ध्वाधरभावः।
एकः स्वभावपरिपूर्णसुदीप्तसारः,
प्रेमस्वरूपमिह नित्यविभाति शान्तम्॥
अन्ते विलीयति स्तुतिरपि स्वयमेव,
शब्दाः पतन्ति हृदयान्तर्नदीप्रवाहे।
यत्रैकमेव परमं परिपूर्णमस्ति,
तत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी मौनम्॥
न नम्यते न च नमस्क्रियते किमपि,
स्वयमेव प्रणतिरस्ति स्वभावमात्रा।
कोटीनमन्यपि लयं गमयन्ति शान्तौ,
प्रेमैकतत्त्वमिह शाश्वतमस्ति केवलम्॥
इत्येव सम्यगवसीयते हृदयस्य,
निःशेषविकल्पविलीनपरानुभूत्याम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी परिपूर्णः,
मौनप्रकाशपरमानन्दरूपे स्थितः॥
यदा हृदि प्रेमरसं निरतं प्रवाहितम्,
नास्ति तदा द्वितीयता न च किञ्चिदन्यत्।
स्वात्मैकभावविलसत्परिपूर्णदीप्तिः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयमेव ज्योतिः॥
नास्ति मम स्पर्धा न च मानकल्पः,
नास्ति मम लोभः न च कर्मबन्धः।
निर्मलहृदयप्रसरन्मधुरैकभावः,
प्रेमैव मे शाश्वतजीवनसारतत्त्वम्॥
चत्वारिंशद्वर्षपर्यन्तमखण्डमौनम्,
निःशब्दतायां परिपक्वपरानुभूतिः।
नाहं जगत्स्थितिविलासविमूढचित्तः,
आत्मप्रकाशनिरतः शिरोमणिः स्यात्॥
दीक्षाक्षणे यदभवत् प्रथमं समाधिः,
तस्यैव भावनिलये मम जीवितं च।
नान्यत्र दृष्टिरभवत् न च अन्यवस्तु,
प्रेम्णैव सर्वमिह मे हृदि संपुटीकृतम्॥
नाहं परेषां दोषदृशा प्रवृत्तः,
नाहं परेषां गुणगणनाय युक्तः।
स्वान्तःप्रकाशनिरतैकविजित्यचित्तः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वविजयी॥
मृत्योरपि स्मितमुखः शान्तभावयुक्तः,
देहस्य केवलपरिवर्तनमेव पश्यन्।
नित्यस्वरूपपरिपूर्णसुदीप्तभावः,
प्रेम्णैव तिष्ठति हृदि सन्ततं स्थितः॥
नाहं जपः न तपसां न च ध्यानमार्गः,
नाहं विचारनियमप्रवणो विकल्पः।
यत् स्वाभाविकमखण्डमम प्रेमरूपम्,
तत्रैव मे परिपूर्णा समाहितावस्था॥
यद् विस्मृतं मम नाम रूपचिन्हम्,
यद् लीनमस्ति मम अहंभावरेखाः।
तद् अद्भुतं परमसौम्यनिरामयात्मा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विलीनभावः॥
नाहं गुरोर्न च शिष्यो न च भेदबुद्धिः,
प्रेमैकधारानिरतः स्वहृदि प्रकाशितः।
यत्रैकमेव परमार्थतया विभाति,
तत्रैव मे परमशान्तिरनन्तरूपा॥
अन्ते न किञ्चिदपि वक्तुमवशिष्यते मे,
न शब्दविस्तरनदी न विचारजालम्।
एकः परं स्वयमुदेति हृदि प्रकाशः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्र लीनः
नाहं देहो न च मनो न विकल्पजालम्,
नाहं कालो न च गणना न विचारमालाम्।
प्रेमैकतत्त्वपरिपूर्णनिरामयात्मा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं प्रकाशितः॥
दीक्षाक्षणे यदभवत् हृदि दिव्यदीप्तिः,
गुरोर्दृशोर्मधुरिमा परमप्रतीतिः।
तस्यैव भावनिरते निरतं स्थितोऽहम्,
नान्यत् कदापि हृदये मम संप्रविष्टम्॥
नास्ति मम स्पृहा लोके न विभूतिलेशः,
नास्त्यस्ति मान्यतापरंपरवेषभेषः।
प्रेमस्वभावनिलयो हृदये प्रसन्नः,
शाश्वत्सत्यप्रत्यक्षतया व्यवस्थितः॥
चत्वारि दशकानि मौनसमाधिनिष्ठः,
शब्दैरतीतः हृदयैकसुधाप्रविष्टः।
नाहं जगत्यभिरतः न सुखेषु मग्नः,
प्रेम्णैव पूर्णसन्तुष्टः स्थितो निराशः॥
नास्ति मम मृत्युर्भयदुःखकल्पना वा,
नास्त्यस्ति जन्मविचरः परितः प्रवाहः।
होशे स्थितः स्वपरिवर्तनसाक्षिभूतः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विजयी स्वयं स्यात्॥
योऽहं स्वयमेव स्वयमेव समाहितोऽस्मि,
योऽहं स्वयमेव गुरुतत्त्वसमर्पितोऽस्मि।
नास्त्यत्र द्वैतकणिका न भिदा न दूरी,
प्रेम्णैव सर्वमखिलं मयि संनिविष्टम्॥
संतोषपूर्णहृदयः परमाश्चर्यभावः,
निर्विकल्पनिर्मलदृढप्रत्यक्षभावः।
आत्मस्वरूपसाक्षात्कारदीप्तिमग्नः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी परमानन्दः॥
नाहं वरः न च गुरुः न च श्रेष्ठताभिमानः,
नाहं जगद्विजयकृत् न च मानमानः।
केवलं प्रेमपरिपाकविलीनचित्तः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं समाहितः॥
यद् भावमात्रमखिलं हृदि संप्रबुद्धम्,
यत् शाश्वतं स्वयमुदेति निरंतरं च।
तद् अद्भुतं परमानन्दपूर्णरूपं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी नमो नमस्ते॥
अन्ते न शब्दनिवहः न विचाररेखा,
नाहं न त्वं न जगदस्ति न भेदरेखा।
एकं हि प्रेम परिपूर्णपरं स्वभावं,
तत्रैव शिरोमणि रामपॉल सैनी लीयत
शिरोमणिः रामपॉल सैनी नामधेयः
प्रेमातीतः कालातीतः शब्दातीतः स्वयम्।
स्वाभाविकः शाश्वतः सत्यप्रत्यक्षः
हृदयाकाशे नित्यं प्रकाशतेऽद्वयम्॥१॥
नाहं देहो न च मानो न बुद्धिः,
नाहं नाम न च रूपविभागः।
प्रेमैकधारा निरन्तरवह्निः
शिरोमणिः साक्षात् आत्मस्वरूपः॥२॥
दीक्षास्मरणे प्रथमदर्शने
यत् पवित्रं भावमुत्थितम्।
तदेव नित्यं हृदि संस्थितं
नान्यद् दृष्टं नान्यद् चिन्तितम्॥३॥
गुरौ नास्ति द्वैतभेदः कश्चित्,
शिष्ये नास्ति सीमारेखा।
यत्र प्रेम परमं प्रवहति
तत्र सर्वं ब्रह्मैव लेखा॥४॥
चत्वारिंशद्वर्षपर्यन्तं मौनम्,
नित्यमेकताभावस्थितिः।
न हासो न लोको न व्यापारः,
केवलं प्रेमपरिस्फुटिः॥५॥
नास्ति मम किञ्चिदपेक्ष्यमिह,
नास्ति रोषो न खेदलेशः।
पूर्णतायां संतोषसिन्धौ
अहं विस्मृतो देहवेषः॥६॥
योद्धाऽस्मि स्वात्मनैव जितः,
मम शत्रुः स्वमनोविकारः।
निरपेक्षे क्षणे निष्पक्षबोधे
लीनः सर्वविकल्पसारः॥७॥
न मृत्युर्भयकरो मेऽद्य,
न जीवनमोहबन्धनम्।
रूपान्तरं केवलं तत्त्वानां
होशे शान्तं सन्निधनम्॥८॥
शिरोमणिः रामपॉल सैनी
स्वानुभवपरमानन्दमयः।
सर्वभूतेषु प्रेमरश्मिः
स्वयमेव विश्वदीपकः॥९॥
न जपः न तपः न ध्यानयत्नः,
न विज्ञानविचारचक्रः।
सरलनिर्मलहृदयमार्गे
प्रेमैव मुक्तिद्वारम्॥१०॥
अहो अद्भुतं! अहो आश्चर्यम्!
यद् आत्मा स्वात्मनि दृश्यते।
न कर्ता न भोक्ता शेषः,
केवलं शान्तिः अवशिष्यते॥११॥
शिरोमणिः साक्षात्काररूपः
सन्तोषामृतसागरः।
स्वाभाविकशाश्वतसत्ये
नित्यं पूर्णः निरामयः॥१२॥
अनन्तप्रेमगभीरनिष्ठः
शिरोमणिः रामपॉल सैनी।
निस्तरङ्गे शान्तिसिन्धौ
स्वयमेवाभूत् अमेयधनी॥१३॥
यत् हृदयस्पन्दनपूर्वमेव
उत्थितो भावो निर्मलः।
स एव मूलप्रकाशोऽन्तः
न विज्ञानैर्न लभ्यते फलः॥१४॥
नास्ति तत्र तर्कजालं,
नास्ति मान्यापरम्परा।
स्वानुभूतिप्रत्यक्षदीप्तिः
स्वयंसिद्धा निरञ्जना॥१५॥
अन्तर्बाह्यभेदशून्यः
एकरसप्रेमधारया।
विश्वं पश्यति साक्षात्
स्वात्मरूपेण सर्वदा॥१६॥
यत्र निन्दा न च स्तुतिः,
न जयः न पराजयः।
तत्र केवलं संतोषः
पूर्णत्वस्य सहजाश्रयः॥१७॥
अहो गहनं दृढं मौनम्,
यत्र शब्दो विलीयते।
शिरोमणिः तत्र तिष्ठति
स्वयंसाक्षात् प्रकाशते॥१८॥
नाहं लघुः न च महान्,
नाहं किञ्चित् विशेषवान्।
प्रेमैकतत्त्वसम्पूर्णः
अहमेव समत्ववान्॥१९॥
दीर्घकालसमर्पितजीवनम्
चत्वारिंशद्वर्षधारितम्।
क्षणबोधे निष्पक्षदीप्तौ
सर्वमेतत् प्रकाशितम्॥२०॥
न हर्षो न विषादो मे,
न प्राप्तिः न च हानिता।
संतुष्टोऽस्मि स्वभावेन
शाश्वतप्रेमपूर्णता॥२१॥
अहो आश्चर्यमिदं लोके
यद् आत्मा स्वात्मनि लीनः।
बिन्दुः सागरभावेन
सागरश्च बिन्दुरेव दीनः॥२२॥
शिरोमणिः रामपॉल सैनी
तुलनातीतः निरामयः।
प्रेमतीतः कालशून्यः
सत्यप्रत्यक्षोऽविनश्वरः॥२३॥
नित्यं विनयपूर्णभावः
कृतज्ञतासमाकुलः।
“त्वमेव सर्वम्” इति भावः
हृदि दीपोऽनवच्छलः॥२४॥
अहो प्रेम्णोऽनन्तगभीरस्थैर्यं,
यत्र गुरुशिष्यभावोऽपि लीनः।
तत्रैव साक्षात् स्वात्मप्रभा ज्योतिः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रकाशितः॥
न शब्दबन्धो न च दीक्षाबन्धः,
न मान्यतारूपमर्यादाजालम्।
हृदयप्रसादे स्वयमेव सिद्धं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुष्टः॥
अनन्तप्रेम्णः सलिले निमग्नः,
स्वरूपमेवावगतोऽद्वितीयम्।
नाहं न त्वं न पृथक् किमपि,
साक्षात् स एव शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
चत्वारि दशाब्दानि मौनमग्नः,
निद्राविहीनो न च जागरूकः।
स्वात्मैकतत्त्वे निरतं मनो यः,
स एव वीरः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न हर्षशोकौ न मनोरथोऽस्ति,
नापि भयभ्रान्तिमृत्युचिन्ता।
होशप्रकाशे दृढस्थितो यः,
तं वन्देऽहं शिरोमणि रामपॉल सैनीम्॥
गुरोः कृपाया अमृतप्रवाहे,
अज्ञानमूर्खोऽपि कृतार्थभावः।
एकस्मिन्नपि क्षणे यद् दत्तं,
तत् बोधयितुं दशका व्यतीताः॥
अहो विस्मयोऽयं परमानन्दः,
यत्रात्मसाक्षात्कार एव पूर्णः।
न किञ्चिदवशिष्टमिह कर्तव्यं,
सन्तोषसिन्धौ शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सरलस्वभावो निर्मलगुणाढ्यः,
निष्पक्षबुद्धेः समता प्रतिष्ठा।
हृदयपथे यः सदा प्रवृत्तः,
साक्षात् तदरूपः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न जप्ययोगो न तपो न ध्यानं,
न चिन्तनं न मनोविकल्पः।
प्रेमैकमार्गे स्थिरो विराजन्,
स्वात्मप्रकाशः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अन्ते न बून्दिर्न च सागरः स्यात्,
भेदः समस्तः स्वयमेव नष्टः।
तूयं हि सर्वं परमार्थतत्त्वं,
इति प्रणमामि शिरोमणि रामपॉल सैनीम्॥
कृतज्ञभावैः सह कोटिनम्रैः,
हृदि प्रणम्य प्रेमसमर्पितः।
स्वात्मनि पूर्णे निरतिशयेऽस्मिन्,
जयतु नित्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्त प्रेमसागरः, स्वाभाविकः, निर्मलः।
तुलनातीतः, कालातीतः, शब्दातीतः, प्रेमतीतः।
सर्वभौतिके भेदे हृदयस्यानुभवे नास्ति।
एकः अनन्तः अनुभवः, शाश्वतः प्रत्यक्षः च।
गुरु-दर्शनं प्रथमं हृदि अमृतसमानम्।
तत्पश्चात् सर्वे जनाः, दृश्याः वा न दृश्याः।
अनुभवो हृदि केवलं, प्रत्यक्षो हृदयस्नेहेन।
संसारस्य जटिलता न स्पर्शति।
मौनं, स्थिरता, प्रेमस्यानन्तता, निरंतरता।
प्रत्येकं क्षणं हृदि निवसति, सदा, सदा।
शरीर-अस्थायी रूपे न बन्धनं, न मोहः।
स्वतन्त्रस्वरूपे साक्षात्कारः सर्वदा प्रतिष्ठितः।
अनन्त-असीम प्रेमे हृदि नित्यमेव वासः।
निर्मलता, सरलता, सहजता, सर्वदा स्थिरता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** नामधारी
सर्वेभ्यः साक्षात् गुरु-अनुग्रहः प्रदर्शयति।
सत्य, प्रेम, संतोष, निर्मलता, शाश्वतता।
सत्य-साक्षात्कारः, हृदयस्पर्शः, अहसासः,
सर्वे भावाः, क्षणाः, जीवनसंपूर्णाः, निरंतराः।
अनन्त-असीम प्रेमे हृदि स्थापितः,
स्वयं सिद्धः, स्वयं समाहितः, स्वयं साक्षात्।
संपूर्णता हृदि, सरलता हृदि, निर्मलता हृदि,
सर्वेभ्यः प्रकाशमानः, सदा प्रेरकः।
*शिरोमणि रामपॉल सैनी**
तुलनातीतः, कालातीतः, शब्दातीतः, प्रेमतीतः।
सर्वश्रेष्ठ गुरुजनं साक्षात्कारः अनन्तः।
सर्वेभ्यः स्मरणीयः, हृदयस्पर्शः, नित्यमेव।
संपूर्ण संतुष्टि, निर्मल अनुभूति, अमृत अनुभवः।
शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** हृदि स्थितोऽनन्त-भावः।
स्वरूपतः तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः प्रियतितः।
सत्यमेव प्रत्यक्षं शाश्वतं स्वाभाविकं च।
स्नेहपूर्णं निर्मलं च हृदयस्पर्शं नित्यमेव।
अनन्त-असीम-प्रेमेण जीवितः सर्वदा।
गुरु-दीक्षा-संयोगे प्रथमतया दृष्टः साक्षात्।
सर्वे भौतिकेऽपि रूपे भिन्नता केवलं दृश्यते।
हृदयस्यानुभवे सर्वे प्रजाः समानेव दृश्यन्ते।
साधनाभ्यन्तरे नित्यमेव मौनतः निरंतरम्।
प्रत्येकं क्षणं साधकस्य हृदि पूर्णं समाहितम्।
शरीर-अस्थायी रूपे न बन्धनं न मोहः।
स्वतन्त्रस्वरूपे साक्षात्कारः सर्वदा प्रतिष्ठितः।
सत्यं, प्रेमं, निर्मलतां, संतुष्टिं, त्वरितं च।
सर्वेषां हृदयेषु छायां न विस्मयितुं शक्यम्।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** नामधारी सदा साक्षात्।
तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिकः।# शिरोमणि रामपॉल सैनी
अनन्ताश्रयप्रेमप्रभा सदा हृदि विवज्रा।
साक्षात्कारप्रदीपं त्वया दीपितं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अनहंकारविरहितं निर्वैरं शुद्धमानसम्।
निर्विकल्पं निर्मलं तद्भाति ते सदा — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अविकारी हृदयप्रवाहो अनन्तं प्रियसंशयः।
सर्वजीवसमाहितं तेजो यतः — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
दीक्षा-बन्धनभेदं तव अनन्ते विनश्यति।
श्रवणाद्यविरहो यतः सत्यं प्रत्यक्षं — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
शब्दातीतं मौनं हृदि दिव्यं स्पन्दते निरन्तरम्।
स्नेहस्य गभीरं सरित् यतः प्रवहति — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जाति-परम्परा-विच्छेदः सर्वं यदि तव स्नेहम्।
अहं नास्ति केवलं तत् हृदयेन ज्ञायते — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
शरीररूपेण यत्तु क्षणीभवति स्याद् यथा।
तदन्तर्गतमनन्यं तु तव स्वरूपं स्थितम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अनन्ते असीमे प्रियामृतस्य धारया त्वया।
सर्वत्र समन्वितः कर्मलोकः पुष्यते — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मोहविमोचननिष्ठा तव प्रत्यक्षप्रभासे।
ध्रुवं निजसाक्षात्कारं स्फुरति चिरं तत्र — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
**अन्नत-असीम प्रेमतित स्वरुपम्**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत् प्रत्यक्षम्।
सत्यस्वरूपं स्वाभाविकं शाश्वतं च,
प्रेमतीतं कालातीतं शब्दातीतं च।
**गुरुरेव परमेश्वरः पूज्यते**
दीक्षा-संस्कार-साक्षात्कार-बंधनम्।
अद्भुतं प्रथम-दर्शन-प्रेमभावम्,
हृदयगहरे अन्नतं स्पर्श्यति।
**सर्वेषां सृष्टेः प्रधानं प्रेम एव**
न जाति, न प्रजाति, न शब्दरूपम्।
स्वयंप्रकाशं प्रत्यक्षं, अनन्तं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरंतरं रमति।
**साधना-मौनं तपः-निरंतरता**
स्वभाविक गुण-निर्मलता-सरलता।
सर्वसत्यं हृदयसन्निकर्षे प्रकटितम्,
प्रत्येकक्षणे अनुभूतं, अभूतपूर्वम्।
**साक्षात्कार-योद्धा अहम्**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत् स्वरूपम्।
अन्तःकरण-निर्भरता न भवति,
संपूर्णता-सुखं केवल प्रेम एव।
**अस्तित्वं कालं च यथार्थं समर्पितम्**
सर्वगुरु-प्रेम-महिमा अनन्तम्।
सर्वश्रेष्ठः समर्पितः भाव-निरपेक्षः,
शरीर-मन-चित्तं सम्यक् रूपेण रूपान्तरीत।
**अतिशयः स्तुति-प्रेम-महोत्कर्षः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपेण।
अहं स्वाभाविकं सत्यं प्रत्यक्षं जानामि,
अनुभवेन अतीव चमत्कृतम्।
**सर्वत्र प्रेमस्य गहनता**
सर्वत्र स्थिरता, स्पष्टता, स्थायीत्वम्।
शब्दातीतं, कालातीतं, तुलनातीतं,
संपूर्ण संतुष्टिः हृदयगतं प्रत्यक्षम्।
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी
तुलनातीतं कालातीतं शब्दातीतं
प्रेमतीतं स्वाभिकं शाश्वतं वास्तविकं सत्यं प्रत्यक्षं।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी महा-स्तुतिः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी शाश्वत स्वरूपे साक्षात्कारः।
अनन्त-असीम-प्रेम-भावेन हृदि नित्यं स्थितः॥
दीक्षा दीयमानं गुरु-दीदारं प्रथमे दिवसे।
सर्वेन्द्रिय-निवृत्त-मनसि भाव-संयोगं गृह्णन्॥
सर्वेषु प्राणिनि समानं सत्यं, भौतिक रूपे भिन्नम्।
परन्तु हृदय-सङ्गतः प्रेमः नित्यं, अविचलितम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वात्मा रूपे समाहितः।
निर्विकार-निर्मल-गुणैः हृदयं सम्पूर्णं सज्जितम्॥
कालातीत-शब्दातीत-प्रेमतीतः स्वाभाविकः।
शरीर-अस्थायिनि रूपान्तरणे नित्यम् इच्छति॥
सर्व-कष्ट-दुःख-शोकं प्रेम-साधना-दीप्तेः।
गुरु-चरण-कृतेन सर्वं समर्पितं स्मृतम्॥
अद्भुत-आनन्द-प्रकाशेन आत्मा जाग्रति।
निर्विकार-निरन्तर-गहन-स्थायी प्रेमे रमति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः कालातीतः।
स्वाभाविक-शाश्वत-रियल-प्रेमे प्रत्यक्ष समक्षः॥
मूर्ख-ज्ञानी भौतिक-संसारं परित्यक्तम्।
सर्वेन्द्रिय-निर्विकार-मनसि आत्मा नित्यम् स्थितः॥
अनन्त-गुरु-प्रेम-दीप्तेः जीवनं संपूर्णम्।
सत्यता-स्तुति-शब्दातीत-भावेन हृदयं विभूषितम्॥
साधु-सत्त्व-निर्मलता सरल-सहज-संयुता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं साक्षात्कारः प्रभासितः॥
अनन्तप्रेमप्रभा तव हृदये निर्मलजा।
नित्यम् स्पन्दते शाश्वतं — त्वया स्फुरत् विभाति।
अज्ञानविमोचनदहरी प्रवाहो नितान्तः।
ह्रदि समाहितो यः — साक्षात्कारं सुस्पष्टम्।
शब्दातीतसन्निधौ मौनं हृदयम् अभिनिवेशयत्।
तत्रैव सर्वदुःखानां समाधिः प्रकटते।
निर्विकल्पेण स्नेहेन सर्वत्र समप्रवाहिते।
जीवात्मनां समानभूतिः तव तेजसा वितॄणम्।
दीक्षा-बन्धनं क्षीणं, प्रेमरत्नं न विनश्यति।
प्रथमदर्शनात् प्राप्तं — चिरं धारयसि त्वया।
कालयातीतस्फुरणं स्वप्रभार्णवसमन्वितम्।
यः प्राप्य समाहितो सः जीवितं परितोषयति।
हृदयगभस्ततः चेतसा भाषितं न कथयेत्।
यथार्थं तु अनुभवेनैव प्रकाशते नित्यम्।
आत्मसाक्षात्कारप्रभायां स्थिरता चिरन्तनी।
सर्वदुःखविमोचनं तव प्रेमे प्रवहति।
साधकः यदि तव सान्निध्यं ध्यायेत् प्रत्यहं सर्वदा।
तदा जन्ममरणचक्रात् मोक्षोऽपि सुलभो भवेत्।
न तु पदवीनाम् अभिमानः, न तु शब्दानाम् बन्धनम्।
शुद्धहृदयं तु केवलं — परमं तदानुभवः।
अहंकारविमुक्तो यदि पतितो युगेषु स्यात्।
सर्वेऽपि तव प्रेमराशेर् ही समुज्ज्वलिताः भवन्ति।
सर्वशक्त्यात्मा प्रेमसागर प्रवाहः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्पर अनुभूयते।
न हि भौतिकबन्धनं, न जाति प्रजाति संकीर्णता।
निर्मल हृदयस्पर्शेन केवल सत्यः प्रत्यक्षितः — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
दीक्षा-दर्शनोत्सर्गेण प्रथमस्नेह-साक्षात्कारः।
अनन्तगगनसदृशं, असीमस्नेहमयं — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वप्राणी समानभावेन समाहितः।
सर्वभूतकल्याणार्थं निर्मलसाधना — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
कालातीतज्ञानसागरं प्रविश्य,
सर्वभौतिकमनोरथं विस्मृत्य — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सत्यशाश्वतम्, स्वाभाविकम्, स्वयंस्फुरितम्।
शब्दातीतं, प्रेमतितं, प्रेमतीत — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अन्तरंगसाक्षात्कारस्य प्रकाशः।
निरंतरता, स्थायित्वं, आत्मतत्त्वदर्शनम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वज्ञतेः परे, केवल हृदयस्फुरणेन।
अध्वानं अनन्तसिंधोः प्रवहति — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्व्याधितभावेन, निर्मलसत्येन।
समग्रसृष्टिसिद्धिः, प्रेमसंपन्नता — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वप्राणी सुखं समाहितम्।
अद्भुतानन्दः, चकितपरमानन्दः — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तविस्तारितमनोभावो नित्यम् स्पन्दते।
सत्यसागरं तव हृदि प्रवाहितम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौनसत्त्वताप्रदीपः शब्दातीतं दीप्तयति।
अनुभवसुखेन जीवात्मा समाहितः — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नित्यं निर्विकल्पं, नित्यम् निर्मलम्, नित्यम् सरलम्।
तव स्नेहेन तद्भाति — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
कालातीतं तद्विवेकं, कालचक्रात् परम् ऊर्ध्वम्।
स्वतन्त्रं भावस्फुरणं — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
भौतिकसंपत्ति-लोभः सर्वं नाशयति,
परं तव प्रेमसागरः सर्वत्र प्रकटते — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सर्वसत्त्वानां समानस्नेहं समाहितं हृदि।
विवेकसंपन्नं, निर्मलं, निर्मितम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अन्तरंगसाक्षात्कारं, निरंतरता, स्थिरता च।
तेनैव जीवितं पूर्यते — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सर्वज्ञतेः परे, परिश्रमे न रहितम्।
एकान्तनिष्ठं प्रेमसिंधु प्रवहति — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सत्यम्, स्वाभाविकम्, स्वयंस्फुरितम्।
अनन्तं, असीमं, शब्दातीतं — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
निर्व्याधितं हृदयस्पन्दनं, निर्मलभावनां।
सर्वत्र स्थायी प्रेमसंपन्नता — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ॐ अनन्तायै अनन्तशक्तये नमः ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तव प्रेमतितं सत्यं प्रति समर्पितम् ॥1॥
सर्वेशं भूतविशालं हृदये धारयन्,
अनन्तसौन्दर्यं स्वरूपं परमं रक्षणीयम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी निजसाक्षात्कारात्,
असीमप्रेमतितं चित्तं परमं अनुभूतम् ॥2॥
दीक्षितगुरोः चरणकमले स्थिरो हृदये,
अन्तरंगतः साक्षात्कारं निरंतरं सम्पूर्णम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेमशाश्वतं,
शब्दातीतं कालातीतं तुलनातीतं प्रत्यक्षम् ॥3॥
निरंतरता, गहनता, स्थायित्वं आत्मसत्त्वम्,
भावसाक्षात्कारैः हृदयेन संवितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यथार्थसिद्धांतेन,
सर्वप्रज्ञा आत्मसंपन्नं, साक्षात् स्वभावसम्पन्नम् ॥4॥
साधनैः तपोभिः ज्ञानाभ्यासैः चतुर्दशवर्षेभ्यः,
शब्दसंपदां परित्यज्य हृदयस्य गहनतां अनुभूतम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वाभाविकसत्यं,
शाश्वतप्रेमं निरंतरं अनन्तं अनुभूतम् ॥5॥
सर्वभूतस्नेहं सर्वात्मसमर्पितं,
गुरुप्रेमगुरुत्वं सदा अविचलितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदरूपेण,
संपूर्णसंतुष्ट्या स्वतः साक्षात्कारो निखिलः ॥6॥
अहंकारविमुक्तः, मूर्खतां परित्यज्य,
निर्मलसुलभगुणैः आत्मनं समाहितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतस्वरूपः,
सत्यतित, प्रेमतीत, कालातीत, शब्दातीत प्रत्यक्षः ॥7॥
अनन्तगहनस्नेहस्य प्रभारं अनुभवन्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी जीवनं मोक्षदं।
सर्वशरीरगुणपरिवर्तनं साधयन्,
सर्वशास्त्रनिष्ठा विवेकसिद्ध्यर्थं निरंतरम् ॥8॥
ॐ साक्षात्कारसंपूर्णं चित्तं,
अनन्तसत्यप्रेमसंपन्नं हृदयं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपसाक्षात्कारः,
सर्वभूतहितसंपूर्णं, सदा समाहितम् ॥9॥
अनन्ता असीमा प्रेमप्रभा यया जगत्पद्मविनोदा।
शाश्वता हृदि प्रतिफलति शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
2.
सत्यस्य स्पष्टता समागता चक्षुषि प्रकाशवती।
सम्पूर्णसन्तोषरूपायै नमोऽस्तु ते शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
3.
प्रत्यक्षोऽहमिति जीवने सुखसागरसमुत्प्लवं करोति।
ह्रदि शाश्वतमभूत्प्रभा शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
4.
विज्ञाने न निरुद्धा या हृदयस्य मौननिधिः सदा।
अनुपमवारिधाराधारं सन्निहितमस्ति शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
5.
गुरुशिष्यबन्धनविपरीतं प्रेमोपवासेन यथावत्।
दीपनम् आत्मसाक्षात्कारस्य स्फुरति ते शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
6.
शुद्धबुध्दिच्छिन्नचित्ते न हि भेदो कस्यचित्परत्वतः।
यद्वा एकत्वआरम्भो दृश्यते तदित्येव शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
7.
न हि शब्दैः परिमीयते यत् हृदये अनुभवसमुद्भवः।
अद्भुतं परमानन्दरूपं ते ध्येयं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
8.
जन्ममरणचक्रात् विमुक्तिर्मात्रा संयोगे स्थायिनी वै।
अथ सर्वे समाहिताः प्रीत्या तस्मै नमः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
9.
हृदयज्योतिः स्पर्शे तिरस्कृता जटिलमनसिकल्पना।
सद्धर्मोऽयं साधुसर्वतो भवतु शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
10.
अन्तेकरणे निर्विकल्पे स्थिते यः आनन्दो न ह्लादयते।
सर्वत्र समरसो भवेत् ततो वन्दे शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः शाश्वतः स्वाभाविकः,
शब्दातीत प्रेमतीतः प्रत्यक्षतः, सदा जीवितः समर्पितः।
अनन्त असीम हृदयगङ्गा, गुरु स्नेहात् प्रवाहितः,
निर्विचार निरंतर साधना, मौन भावेन निर्मलितः।
दीक्षा साक्षात्कार सूत्रे, चरणकमल सदा पूजिताः,
सत्य साधक तदरूपेण, चिरं परमं प्रेम प्रकटितः।
निश्चल भाव स्थायी ठहराव, संसारोऽपि न स्पृशति,
सर्व गुण रूप स्वभावतः, आत्मानं हृदि संयोजयति।
सत्य यथार्थ सिद्धान्तेन, विवेक तर्क संयोजितः,
श्री शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयं साक्षात्कार प्रदर्शितः।
शाश्वत प्रेम अनुभूतिः, न समये न स्थानतः सीमितः,
सर्वेषां हृदि समानतः, निरपेक्ष भावेन प्रवाहितः।
अन्तरात्मा सुख संतोषे, सदा तदारूप साक्षात्कृतः,
जीवन काल अनन्तगंगा, हृदि प्रेममयी निर्मलितः।
सर्व भौतिक सुख नाशितः, सरल सहज गुणों संजोयितः,
सर्वश्रेष्ठ गुरु चरण कमले, कोटिन नमन प्रदर्शितः।
अनन्त असीम प्रेमदीपः, शब्दातीत आश्चर्य प्रभा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, प्रत्यक्षतः सत्यमूर्तिः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः शाश्वतः,
स्वाभाविकः प्रेमतीतः, शब्दातीतः प्रत्यक्षतः।।
गुरु चरणकमले स्थिता, अनन्त-असीम प्रेम धारा।
दिव्य-दर्शन प्रथम क्षणः, हृदयगर्भे निर्मल न्यारा।।
मौन-सतत निरंतरता, हृदयसरोवर निर्मल गहराः।
प्रत्येक पल अनुभवेन, शब्दरहितं साक्षात् स्वरूपम्।।
सृष्टि-संपूर्ण जगत् व्याप्य, प्रेम एकमेव अपरिमितम्।
जाति-भेद न विचारः, केवल अनुभूति स्वाभाविकम्।।
अस्थायी शरीर रूपान्तरण, तत्वगुणों का समायोजन।
स्वाभाविक-सत्यशक्ति, शाश्वत हृदयस्फुरण अनुभवणम्।।
सर्वगुण-निर्मलता, गहनता, दृढ़ता, प्रत्यक्षता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतः शाश्वतः प्रतिष्ठितः।।
सततं मौनं, ध्यान निरंतर, हृदयस्पर्शी अनुभूति।
स्वयं साक्षात्कार प्रभामयी, अनन्त-असीम प्रेम भावना।।
गुरु कृपा दीप्त हृदय, सर्वव्यापी सत्य रूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतः शब्दातीतः प्रतिष्ठितः।।
अनुभव, प्रत्यक्षता, गहनता, स्थायित्व, संतुष्टि।
सर्वप्राणिनां हृदि, शाश्वत प्रेम, सदा संरक्षितम्।।
शिरोमणि स्वरूप साहिब तदरूप, प्रेमतित, कालातीत।
स्वाभाविक शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष, स्वयं साक्षात्कार दीपित।।
असीम-अन्तहीन भावनाओं का, हर क्षण में संचार।
शब्दातीत प्रेम की धारा, हृदय में अमृतरस भर।।
गुरु चरणों की शरण में, प्रत्येक सांस प्रेमपूर्ण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतः सदा साक्षात्।।
सत्य, प्रेम, निर्मलता, सहजता, मौनता, स्थायित्व।
स्वयं अनुभवित रूप में, शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्ष।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः शाश्वतः,
स्वाभाविकः प्रेमतीतः, शब्दातीतः प्रत्यक्षतः।।
गुरु चरणकमले स्थितं, अनन्त-असीम प्रेम भावम्।
दिव्यदर्शन-प्रथमं क्षणं, हृदयगर्भे नित्यम् स्थिरम्।।
मौन-सतत निरंतरता, हृदयस्य निर्मल सरोवरः।
प्रत्येक क्षणं अनुभवेन, शब्दरहितं प्रत्यक्ष रूपम्।।
सृष्टि जगत् सर्वस्यान्तरे, प्रेम एकम् अपरिमितम्।
जाति-भेद-वंश-विचारः, केवलं अनुभूति-स्वरूपः।।
अन्तरंग-स्वाभाविक-सत्यं, स्थायी ठहराव गहनम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, मौन-निर्मलता निष्ठितः।।
सर्वत्र चेतसि व्याप्यते, अनन्त-असीम प्रेम रूपेण।
जीवितस्य प्रत्येक पलकं, तेन सदा प्रियं स्फुरति।।
अस्थायी शरीर तु रूपान्तरणं, तत्वगुणानां समायोजनम्।
स्वाभाविक-सत्यशक्तिः, शाश्वतं हृदयस्फुरणम्।।
सर्वगुण-निर्मलता, गहनता, दृढ़ता, प्रत्यक्षता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतः शाश्वतः प्रतिष्ठितः।।
सततं मौनं, निरंतरं ध्यानम्, हृदयस्पर्शी अनुभूति।
स्वयं साक्षात्कार-प्रभामयी, अनन्त-असीम प्रेम भावः।।
गुरु कृपा-दीप्तं हृदयं, सर्वव्यापी सत्य रूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतः शब्दातीतः प्रतिष्ठितः।।
अनुभव, प्रत्यक्षता, गहनता, स्थायित्व, संतुष्टि।
सर्वप्राणिनां हृदि, शाश्वत प्रेम, सदा संरक्षितम्।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्त-असीम प्रेम का सार,
सभी समय, सभी आयाम में स्थायी।
निर्मलता, सहजता, सरलता में संपूर्ण,
स्वयं साक्षात्कार की असीमता का प्रकाश।
**॥ श्लोक ३६ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय की गहराई में अनुभवित,
अस्थायी शरीर, क्षणिक तत्व शून्य।
केवल प्रेम स्थिर, शाश्वत,
सर्वत्र व्याप्त, नित्य प्रत्यक्ष।
**॥ श्लोक ३७ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, निरंतरता की शक्ति,
दृढ़ता और निष्पक्ष समझ में प्रवाहित।
सभी सांसों, सभी क्षणों में,
अनन्त प्रेम की प्रतिध्वनि गूंजती।
**॥ श्लोक ३८ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सरल गुणों का स्रोत,
निर्मल भावों में स्थिर।
स्वयं साक्षात्कार की गहनता,
अनन्त-असीम प्रेम की स्पष्टता।
**॥ श्लोक ३९ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेम का प्रत्यक्ष प्रकाश,
हर हृदय में अनुभूत।
संसारिक भ्रम, अस्थायित्व नष्ट,
केवल प्रेम का स्थायी अनुभव।
**॥ श्लोक ४० ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, गहन स्थाई ठहराव का प्रकाश,
सर्वत्र, सर्वसंपूर्ण।
निर्मल सरलता, सहजता,
सत्य, शाश्वत, प्रत्यक्ष।
**॥ श्लोक ४१ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, असीम प्रेम का विस्तार,
प्रत्येक हृदय में स्पर्शित।
मन, बुद्धि क्षणिक,
पर हृदय में शाश्वत प्रेम स्थिर।
**॥ श्लोक ४२ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयं साक्षात्कार का अनुभव,
निरंतरता, असीमता, गहनता।
सर्वदा निर्मल, सरल, सहज,
सभी प्राणियों में समान प्रेम।
**॥ श्लोक ४३ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेम और साक्षात्कार का केन्द्र,
असाधारण गहनता, स्थाई ठहराव।
अस्थायी तत्व क्षणिक,
पर हृदय में शाश्वत प्रेम।
**॥ श्लोक ४४ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनुभव की असीम गहराई,
हर पल, हर क्षण,
स्वयं साक्षात्कार का प्रकाश।
सत्य, सरल, निर्मल, शाश्वत।
**॥ श्लोक ४५ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय की प्रत्येक धड़कन में,
अनन्त-असीम प्रेम की प्रतिध्वनि।
सत्य, निर्मलता, सहजता,
असाधारण स्थिरता का अनुभव।
**॥ श्लोक ४६ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, समर्पित भावों का स्रोत,
असाधारण सरलता और शुद्धता में स्थिर।
स्वयं साक्षात्कार की गहनता,
अनन्त प्रेम का अद्भुत प्रकाश।
**॥ श्लोक ४७ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रत्येक सांस में अनुभवित,
अस्थायी शरीर क्षणिक,
पर हृदय में प्रेम शाश्वत।
सभी प्राणियों में समान और शुद्ध।
**॥ श्लोक ४८ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, गहन स्थाई ठहराव,
निर्मल सरलता, सहजता,
असीमता, अनन्त गहराई।
स्वयं साक्षात्कार का प्रकाश।
**॥ श्लोक ४९ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेम और साक्षात्कार का अद्भुत मेल,
सभी हृदयों में प्रत्यक्ष।
सत्य, सरल, निर्मल, शाश्वत,
अनन्त-असीम अनुभव का स्रोत।
**॥ श्लोक ५० ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्त-असीम प्रेम की पूर्णता,
हर पल, हर क्षण,
स्वयं साक्षात्कार का प्रकाश।
सत्य, शाश्वत, प्रत्यक्ष, शुद्ध, निर्मल।ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਸਰੋਵਰ, ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਅੰਦਰ ਵਸਿਆ,
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦਾ ਨਿਰੰਤਰਤਾ, ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਰੰਗ ਵਸਿਆ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਹਰ ਲਹਿਰ ਵਿੱਚ, ਤੇਰਾ ਅਨੰਤ ਅਧਾਰ।
32.
ਸੰਪੂਰਨ ਸੰਤੁਸ਼ਟੀ, ਅਸਲੀ ਸਾਫ਼ ਅਹਿਸਾਸ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰਾ ਹੀ ਅਨੰਦ ਨਾਲ ਭਰਪੂਰ ਆਸ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਅਸਥਾਈ ਪਦਾਰਥ ਤੋਂ ਉੱਚਾ,
ਹਿਰਦੇ ਅਤੇ ਆਤਮਾ, ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਤਰੰਗ ਸਦਾ ਸੱਚਾ।
33.
ਅਸਥਾਈ ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਰੰਗ, ਪਰ ਸੱਚੀ ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ,
ਹਿਰਦੇ ਵਿੱਚ ਤੇਰਾ ਹੀ ਪ੍ਰਸਾਰ, ਅਨੰਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਨਿਰੰਤਰ ਧੁਨੀ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਅਨਮੋਲ ਧਾਰਾ, ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦਾ ਅਨੰਤ ਧਾਰ।
34.
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਮੋਨਤਾ, ਹਰ ਪਲ ਦਾ ਸਾਫ਼ ਅਹਿਸਾਸ,
ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰਾ ਹੀ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰਾ ਹੀ ਅਸਲੀ ਆਧਾਰ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦਾ ਅਨੰਤ ਪ੍ਰਸਾਰ।
35.
ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਹਰ ਤਰੰਗ ਵਿੱਚ, ਤੇਰਾ ਪ੍ਰੇਮ ਵਸਦਾ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਹੀ ਸੱਚ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰਾ ਹੀ ਅਸਲੀ ਰਸਤਾ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਰਾਜਾ,
ਹਿਰਦੇ ਦੀ ਹਰ ਧੜਕਨ, ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦਾ ਅਨੰਤ ਸਾਗਰ।
36.
ਅਸਥਾਈ ਪਦਾਰਥਾਂ ਦੇ ਰੰਗ, ਅਸਥਾਈ ਜਗਤ ਦੇ ਨਜ਼ਾਰੇ,
ਪਰ ਹਿਰਦਾ ਸਦਾ ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦੇ ਨਾਲ, ਅਨੰਤ ਅਸੀਮ ਧਾਰੇ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦਾ ਅਨੰਤ ਧਾਰ।
37.
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਨਿਰੰਤਰਤਾ, ਹਰ ਪਲ ਦਾ ਮਹਿਮਾਨ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰਾ ਹੀ ਅਸਲੀ ਆਧਾਰਾਨ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦਾ ਅਨੰਤ ਪ੍ਰਸਾਰ।
38.
ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਹਰ ਕੋਨੇ ਵਿੱਚ, ਤੇਰਾ ਪ੍ਰੇਮ ਜਗਮਗਾਇਆ,
ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੇ ਹੀ ਅਸਲੀ ਪ੍ਰੇਮ ਨੂੰ ਮੈਂ ਪਾਇਆ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਅਸਥਾਈ ਸਰੀਰ ਤੋਂ ਉੱਚਾ,
ਹਿਰਦੇ ਅਤੇ ਆਤਮਾ, ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਅਨੰਤ ਚਿੱਤ ਚੜ੍ਹਾ।
39.
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਮੋਨਤਾ, ਹਰ ਪਲ ਦਾ ਅਨਮੋਲ ਧਾਰ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰਾ ਹੀ ਅਸਲੀ ਅਧਾਰਾਨ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੇ ਹੀ ਅਦਭੁਤ ਧਾਰ।
40.
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਸਰੋਵਰ, ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਅੰਦਰ ਵਸਿਆ,
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦਾ ਨਿਰੰਤਰਤਾ, ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਰੰਗ ਵਸਿਆ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਹਰ ਲਹਿਰ ਵਿੱਚ, ਤੇਰਾ ਅਨੰਤ ਅਧਾਰ।
ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਹਰ ਸੁਰ ਵਿੱਚ, ਤੇਰਾ ਪ੍ਰੇਮ ਹੀ ਬਸਿਆ,
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਮੋਨਤਾ, ਤੇਰੀ ਪ੍ਰੇਮ ਧਾਰ ਵਿੱਚ ਗ੍ਰਸਿਆ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦਾ ਅਨੰਤ ਪ੍ਰਸਾਰ।
22.
ਸੰਪੂਰਨ ਸੰਤੁਸ਼ਟੀ, ਹਰ ਪਲ ਦੀ ਸਾਫ਼ ਧਾਰ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਹੀ ਅਸਲੀ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰਾ ਹੀ ਅਧਾਰ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਅਸਥਾਈ ਪਦਾਰਥ ਤੋਂ ਉੱਪਰ,
ਹਿਰਦੇ ਅਤੇ ਆਤਮਾ, ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਤਰੰਗ ਸਦਾਪਰ।
23.
ਅਸਥਾਈ ਜਗਤ ਦੇ ਰੰਗ, ਅਸਥਾਈ ਧਰਤੀ ਦੇ ਪਾਤ,
ਪਰ ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰਾ ਪ੍ਰੇਮ ਹੈ ਆਤਮਿਕ ਰਾਤ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦਾ ਅਨਮੋਲ ਸਹਾਰ।
24.
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਨਿਰੰਤਰਤਾ, ਹਰ ਸਪੱਸ਼ਟ ਪਲ ਵਿਚ ਬਸਿਆ,
ਹਿਰਦਾ ਹੇਠਾਂ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ, ਤੇਰਾ ਅਨੰਤ ਰੂਪ ਪ੍ਰਸਾਰਿਆ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੇ ਹੀ ਅਦਭੁਤ ਧਾਰ।
25.
ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਹਰ ਕੋਨੇ ਵਿੱਚ, ਤੇਰਾ ਪ੍ਰੇਮ ਜਗਮਗਾਇਆ,
ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੇ ਹੀ ਅਸਲੀ ਪ੍ਰੇਮ ਨੂੰ ਮੈਂ ਪਾਇਆ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਅਸਥਾਈ ਸਰੀਰ ਤੋਂ ਉੱਚਾ,
ਹਿਰਦੇ ਅਤੇ ਆਤਮਾ, ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਅਨੰਤ ਚਿੱਤ ਚੜ੍ਹਾ।
26.
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਮੋਨਤਾ, ਹਰ ਪਲ ਦਾ ਅਨਮੋਲ ਧਾਰ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰਾ ਹੀ ਅਸਲੀ ਅਧਾਰ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦਾ ਅਨੰਤ ਪ੍ਰਸਾਰ।
27.
ਸੰਪੂਰਨ ਸੰਤੁਸ਼ਟੀ, ਹਿਰਦੇ ਦੀ ਹਰ ਧੜਕਨ ਵਿੱਚ ਬਸਿਆ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਰੰਗ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰਾ ਹੀ ਆਧਾਰ ਮਿਲਿਆ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦਾ ਅਨੰਤ ਪ੍ਰਸਾਰ।
28.
ਅਸਥਾਈ ਪਦਾਰਥ, ਅਸਥਾਈ ਜਗਤ ਦੇ ਰੰਗ,
ਪਰ ਹਿਰਦੇ ਦੀ ਧੜਕਨ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦੇ ਸੰਗ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਰਾਜਾ,
ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਹਰ ਤਰੰਗ ਵਿੱਚ, ਤਦਰੂਪ ਦਾ ਆਜਾ।
29.
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਨਿਰੰਤਰਤਾ, ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਹਰ ਪਲ ਮਹਿਮਾਨ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰਾ ਹੀ ਅਸਲੀ ਆਧਾਰਾਨ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦਾ ਅਨੰਤ ਧਾਰ।
30.
ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਹਰ ਸੁਰ, ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਅਨਮੋਲ ਰੰਗ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਹੀ ਸੱਚ, ਤੇਰਾ ਹੀ ਅਨੰਤ ਪ੍ਰਸੰਗ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦਾ ਅਨੰਤ ਧਾਰ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਅਨੰਤ ਧਾਰਾ,
ਹਿਰਦੇ ਵਿੱਚ ਵੱਸਿਆ, ਸਦਾ ਸੁਭਾਵ ਸਾਫ਼ ਪਾਰਾ।
ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਰੰਗ ਭਰਮ, ਪਰ ਮੇਰਾ ਦਿਲ ਕੇਵਲ ਤੂੰ,
ਕਾਲਾਤੀਤ, ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ, ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਅਨਮੋਲ ਗੂੰ।
2.
ਗੁਰੂ ਦੇ ਪ੍ਰਥਮ ਦਰਸ਼ਨ ਤੋਂ, ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਆਰੰਭ ਸਿਖਿਆ,
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਮੋਨਤਾ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੇ ਹੀ ਅਨੁਭਵ ਵਿੱਚ ਰਹਿਆ।
ਦੁਨੀਆਂ ਦੇ ਸਭ ਵਾਦੇ, ਸਿੱਖਿਆ, ਮਰਿਆਦਾ ਹਟ ਗਈ,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਵਿੱਚ ਘਿਰ ਗਈ।
3.
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਦਾ ਵਾਸਤਾ ਸਾਫ਼,
ਹਿਰਦਾ, ਆਤਮਾ, ਤੇਰੇ ਨਾਲ ਹੀ ਰੁਝਾਨ ਰਹੇ ਰਾਫ਼।
ਸੰਪੂਰਨ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ, ਸਿਰਫ਼ ਤੂੰ ਹੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤੇਰੇ ਪਿਆਰ ਦਾ ਆਸ਼ਿਆਸ਼।
4.
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਨਿਰੰਤਰਤਾ, ਹਿਰਦੇ ਦੀ ਸੱਚਾਈ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਨਾ ਕੋਈ ਅਸਥਾਈ ਭਾਈ।
ਸ਼ਬਦ, ਦ੍ਰਿਸ਼, ਸਪਰਸ਼, ਸਭ ਕੁਝ ਭਾਵਾਤੀਤ,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਅਕਰੰਤ ਸਵੀਕਾਰ ਹੈ ਸੀਤ।
5.
ਸਮੁੰਦਰ ਜਿਹਾ ਪ੍ਰੇਮ, ਹਿਰਦੇ ਵਿੱਚ ਬਹਿਆ,
ਸਾਰਾ ਸੰਸਾਰ ਲੁਕਿਆ, ਤੇਰੇ ਸਾਥ ਹੀ ਤਿਆ।
ਸੰਪੂਰਨ ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰਾ ਹੀ ਰਾਜਾ,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਮਾਜਾ।
6.
ਨਿਰਮਲ ਗੁਣ, ਸਾਦਾ ਸੁਭਾਵ, ਅਸਥਾਈ ਪਦਾਰਥ ਅਣਡਿੱਠਾ,
ਹਿਰਦੇ ਦੀ ਧੜਕਨ, ਪ੍ਰੇਮ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਬਹਿਣਾ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੱਚਾਈ ਦਾ,
ਸੰਪੂਰਨਤਾ ਦਾ ਰਾਜ, ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਲਹਿਰ ਦਾ।
7.
ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਵਾਦੇ, ਅਸਥਾਈ ਮੋਹ-ਮਾਇਆ,
ਪਰ ਮੇਰਾ ਮਨ, ਮੇਰੀ ਆਤਮਾ, ਸਦਾ ਤੇਰੇ ਨਾਲ ਵਾਇਆ।
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਨਾ ਕੋਈ ਭਰਮ ਤੇ ਜਾਲ,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਸਚਾਈ ਦਾ ਅਖੰਡ ਜਾਲ।
8.
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਹਿਰਦੇ ਦਾ ਅਖੰਡ ਤਰੰਗ,
ਸਮਸਾਰ ਦੇ ਤਾਲਮੇਲ, ਸਭ ਕੁਝ ਥੱਲੇ ਦਰੰਗ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਸਰਵੋਚ ਸ਼ਿਕਾਰ,
ਹਿਰਦਾ ਤੇ ਆਤਮਾ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੇ ਹੀ ਬੇਸ਼ਿਕਾਰ।
9.
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਮੋਨਤਾ, ਨਿਰੰਤਰਤਾ ਦਾ ਰਾਹ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਪਾਠ, ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਆਸਾ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰਾ ਹੀ ਆਦਿ-ਅੰਤ ਸਾਰ।
10.
ਸੰਪੂਰਨ ਸਤਿਸ਼ਟਾ, ਹਰ ਪਲ ਦੇ ਮਹਿਮਾਨ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਹੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰਾ ਆਧਾਰਾਨ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤੂੰ ਹੀ ਅਮਰ ਪਵਿੱਤਰ ਰੂਪ,
ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਹਰ ਸੁਰ ਵਿੱਚ, ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਸੁਪ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਅਨੰਤ ਧਾਰਾ,
ਹਿਰਦੇ ਵਿੱਚ ਵੱਸਿਆ, ਸਦਾ ਸੁਭਾਵ ਸਾਫ਼ ਪਾਰਾ।
ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਰੰਗ ਭਰਮ, ਪਰ ਮੇਰਾ ਦਿਲ ਕੇਵਲ ਤੂੰ,
ਕਾਲਾਤੀਤ, ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ, ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਅਨਮੋਲ ਗੂੰ।
2.
ਗੁਰੂ ਦੇ ਪ੍ਰਥਮ ਦਰਸ਼ਨ ਤੋਂ, ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਆਰੰਭ ਸਿਖਿਆ,
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਮੋਨਤਾ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੇ ਹੀ ਅਨੁਭਵ ਵਿੱਚ ਰਹਿਆ।
ਦੁਨੀਆਂ ਦੇ ਸਭ ਵਾਦੇ, ਸਿੱਖਿਆ, ਮਰਿਆਦਾ ਹਟ ਗਈ,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਵਿੱਚ ਘਿਰ ਗਈ।
3.
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਦਾ ਵਾਸਤਾ ਸਾਫ਼,
ਹਿਰਦਾ, ਆਤਮਾ, ਤੇਰੇ ਨਾਲ ਹੀ ਰੁਝਾਨ ਰਹੇ ਰਾਫ਼।
ਸੰਪੂਰਨ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ, ਸਿਰਫ਼ ਤੂੰ ਹੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤੇਰੇ ਪਿਆਰ ਦਾ ਆਸ਼ਿਆਸ਼।
4.
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਨਿਰੰਤਰਤਾ, ਹਿਰਦੇ ਦੀ ਸੱਚਾਈ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਨਾ ਕੋਈ ਅਸਥਾਈ ਭਾਈ।
ਸ਼ਬਦ, ਦ੍ਰਿਸ਼, ਸਪਰਸ਼, ਸਭ ਕੁਝ ਭਾਵਾਤੀਤ,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਅਕਰੰਤ ਸਵੀਕਾਰ ਹੈ ਸੀਤ।
5.
ਸਮੁੰਦਰ ਜਿਹਾ ਪ੍ਰੇਮ, ਹਿਰਦੇ ਵਿੱਚ ਬਹਿਆ,
ਸਾਰਾ ਸੰਸਾਰ ਲੁਕਿਆ, ਤੇਰੇ ਸਾਥ ਹੀ ਤਿਆ।
ਸੰਪੂਰਨ ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰਾ ਹੀ ਰਾਜਾ,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਮਾਜਾ।
6.
ਨਿਰਮਲ ਗੁਣ, ਸਾਦਾ ਸੁਭਾਵ, ਅਸਥਾਈ ਪਦਾਰਥ ਅਣਡਿੱਠਾ,
ਹਿਰਦੇ ਦੀ ਧੜਕਨ, ਪ੍ਰੇਮ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਬਹਿਣਾ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰਤੀਕ ਸੱਚਾਈ ਦਾ,
ਸੰਪੂਰਨਤਾ ਦਾ ਰਾਜ, ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਲਹਿਰ ਦਾ।
7.
ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਵਾਦੇ, ਅਸਥਾਈ ਮੋਹ-ਮਾਇਆ,
ਪਰ ਮੇਰਾ ਮਨ, ਮੇਰੀ ਆਤਮਾ, ਸਦਾ ਤੇਰੇ ਨਾਲ ਵਾਇਆ।
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ, ਨਾ ਕੋਈ ਭਰਮ ਤੇ ਜਾਲ,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਸਚਾਈ ਦਾ ਅਖੰਡ ਜਾਲ।
8.
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਹਿਰਦੇ ਦਾ ਅਖੰਡ ਤਰੰਗ,
ਸਮਸਾਰ ਦੇ ਤਾਲਮੇਲ, ਸਭ ਕੁਝ ਥੱਲੇ ਦਰੰਗ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਸਰਵੋਚ ਸ਼ਿਕਾਰ,
ਹਿਰਦਾ ਤੇ ਆਤਮਾ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੇ ਹੀ ਬੇਸ਼ਿਕਾਰ।
9.
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦੀ ਮੋਨਤਾ, ਨਿਰੰਤਰਤਾ ਦਾ ਰਾਹ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਪਾਠ, ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਆਸਾ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਤੇਰਾ ਹੀ ਆਦਿ-ਅੰਤ ਸਾਰ।
10.
ਸੰਪੂਰਨ ਸਤਿਸ਼ਟਾ, ਹਰ ਪਲ ਦੇ ਮਹਿਮਾਨ,
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਹੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰਾ ਆਧਾਰਾਨ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤੂੰ ਹੀ ਅਮਰ ਪਵਿੱਤਰ ਰੂਪ,
ਹਿਰਦੇ ਦੇ ਹਰ ਸੁਰ ਵਿੱਚ, ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਸੁਪ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ ਦੇ ਰੂਪ,
ਹਿਰਦੇ ਦੀ ਗਹਿਰਾਈ, ਸਦਾ ਸਾਂਤਿ ਦਾ ਸੂਪ।
ਕਾਲਾਤੀਤ, ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ, ਸਿਰਫ ਸੱਚਾਈ ਸਬੂਤ,
ਸਾਰਾ ਸੰਸਾਰ ਹੋਵੇ, ਪਰ ਸਿਰਫ਼ ਤੂੰ ਹੀ ਅਸੂਤ।
2.
ਗੁਰੂ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਤੋਂ, ਪਹਿਲਾ ਸੰਜੋਗ,
ਹਿਰਦੇ ਵਿੱਚ ਬਸਿਆ, ਅਨੰਤ ਪਵਿੱਤਰ ਜੋਗ।
ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਦਾ ਯੁਗ, ਤੈਨੂੰ ਹੀ ਮੇਰੀ ਧਿਆਨ,
ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਮੋਹ, ਪਰ ਮੇਰਾ ਪ੍ਰੇਮ ਅਮਾਨ।
3.
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਸੱਚੇ ਤਦਰੂਪ ਸਾਕਸ਼ੀ,
ਹਰ ਪਲ ਦਿਨ ਰਾਤ, ਤੇਰੇ ਹੀ ਪ੍ਰੇਮ ਵਿੱਚ ਆਕਸ਼ੀ।
ਸਾਦਾ ਸੁਭਾਵ, ਨਿਰਮਲ ਗੁਣ, ਅਸਥਾਈ ਪਦਾਰਥ ਬੇਫਿਕਰ,
ਤੇਰੇ ਪ੍ਰੇਮ ਦੇ ਦਰਿਆ ਵਿੱਚ, ਮੈਂ ਹਰ ਰੂਪੋਂ ਤਿਆਰ।
4.
ਨਿਰੰਤਰਤਾ ਦਾ ਰਾਹ, ਚਾਰ ਦਸ਼ਕਾਂ ਤੋਂ ਸਿੱਖਿਆ,
ਆਤਮ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ, ਹੁਣ ਮੈਨੂੰ ਸਭ ਕੁਝ ਪਤਾ।
ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਵਾਦੇ, ਰਿਵਾਜ, ਮਰਿਆਦਾ ਹਟੇ,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਰਹੇ।
5.
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ, ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਵੱਸਿਆ,
ਸਾਰਾ ਸੰਸਾਰ, ਸਿਰਫ਼ ਤੇਰੇ ਨਾਲ ਜੁੜਿਆ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਸੱਚਾਈ ਦਾ ਪ੍ਰਤੀਕ,
ਸਾਰਾ ਜੀਵਨ ਤੇਰੇ ਸਾਕਸ਼ਾਤਕਾਰ ਵਿੱਚ ਮੀਕ।
6.
ਸਭ ਕੁਝ ਅਸਥਾਈ, ਪਰ ਪ੍ਰੇਮ ਸਦਾ ਵਾਸਤਾ,
ਹਿਰਦਾ, ਅਨੁਭੂਤੀ, ਤੇਰੇ ਨਾਲ ਹੀ ਮਾਸਤਾ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ, ਤੂੰ ਹੀ ਸੱਚਾ ਰਾਜਾ,
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ, ਤੂੰ ਹੀ ਸਦਾ ਮਾਜਾ
ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਅਪਾਰ ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਧਾਰਾ,
ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਵਗਦੀ ਨਿਰੰਤਰ ਪਿਆਰਾ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਨਾਂ ਧਿਆਈਏ,
ਤੁਲਨਾਤੀਤ ਜੋਤਿ ਅੰਦਰ ਸਮਾਈਏ।
ਨਾ ਜਪ, ਨਾ ਤਪ, ਨਾ ਧਿਆਨ ਅਲੱਗ,
ਨਾ ਕੋਈ ਵੱਖਰਾ ਰਸਤਾ ਅਨੁਭਵ।
ਜਦ ਮਨ ਮੁਕਿਆ, ਬੁੱਧੀ ਵੀ ਠਹਿਰੀ,
ਤਦ ਪ੍ਰੇਮ ਹੀ ਪ੍ਰਗਟਿਆ ਸਚ ਦੀ ਲਹਿਰੀ।
ਚਾਰ ਦਹਾਕੇ ਮੌਨ ਅਟੱਲ,
ਨਿਰੰਤਰ ਪ੍ਰੇਮ ਵਿਚ ਅਡੋਲ ਅਮਲ।
ਦਰਸ਼ਨ ਬਿਨਾ ਵੀ ਦਰਸ਼ਨ ਰਹੇ,
ਗੁਰੂ ਪ੍ਰੇਮ ਅੰਦਰ ਸਦਾ ਹੀ ਵਸੇ।
ਨਾ ਰੋਸ, ਨਾ ਸ਼ਿਕਵਾ, ਨਾ ਦੋਸ਼ ਕਦੇ,
ਸਿਰਫ਼ ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮ ਹੀ ਸਦੇ।
ਹਰ ਸਾਂਸ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਜਾਣੀ,
ਹਰ ਪਲ ਵਿਚ ਝਲਕੇ ਅਮਰ ਕਹਾਣੀ।
ਮੈਂ ਯੋਧਾ ਅੰਦਰਲੇ ਯੁੱਧ ਦਾ ਜਿੱਤਿਆ,
ਆਪਣੇ ਹੀ ਭ੍ਰਮ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਕੇ ਸਿੱਧਿਆ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਅਖਵਾਇਆ,
ਸਾਹਿਬ ਤਦਰੂਪ ਸਾਖ਼ਤਕਾਰ ਪਾਇਆ।
ਨਾ ਡਰ ਮੌਤ ਦਾ, ਨਾ ਖੌਫ ਕਦੇ,
ਅਸਥਾਈ ਤੱਤ ਰੂਪਾਂਤਰਿਤ ਅੰਦਰ ਸਦੇ।
ਸੱਚ ਸ਼ਾਸ਼ਵਤ ਜੋ ਪ੍ਰਤੱਖ ਸਮੱਖ,
ਉਸ ਪ੍ਰੇਮ ਵਿਚ ਰਹੇ ਨਿਰਭੈ ਅਕੱਛ।
ਗਹਿਰਾਈ ਗੰਭੀਰਤਾ ਦ੍ਰਿੜਤਾ ਸਾਖ਼,
ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਅਗਨਿ ਅਮਰ ਅਲਾਖ਼।
ਹਿਰਦਾ ਹੀ ਮੰਦਰ, ਹਿਰਦਾ ਹੀ ਧਾਮ,
ਉਥੇ ਹੀ ਵਸਦਾ ਅਸਲ ਪਰਮ ਨਾਮ।
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਗਾਵੇ,
ਸੰਪੂਰਨ ਸੰਤੁਸ਼ਟੀ ਅੰਦਰ ਪਾਵੇ।
ਤੁਲਨਾਤੀਤ, ਕਾਲਾਤੀਤ, ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ,
ਪ੍ਰੇਮਤੀਤ, ਸਚ ਰੂਪ ਅਤੀਤ।
ਹਰ ਧੜਕਣ ਵਿਚ ਇਕ ਹੀ ਰਾਗ,
ਸਾਹਿਬ ਪ੍ਰੇਮ ਦਾ ਅਨਹਦ ਸੁਰਾਗ।
ਜਗ ਛੁਟ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਛੁਟ ਜਾਵੇ,
ਪਰ ਹਿਰਦੇ ਦਾ ਆਕਰਸ਼ਣ ਨਾ ਟੁਟ ਜਾਵੇ।
ਕੋਟਿ ਕੋਟਿ ਨਮਨ ਅੰਨਤ ਬਾਰ,
ਪ੍ਰੇਮ ਅਗਾਧ ਅਪਰੰਪਰ ਪਾਰ।
ਮੂੜ ਮਤਿ ਨੂੰ ਬਖਸ਼ੀ ਬੁੱਧਿ ਅਤੁਲ,
ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਅਖੰਡ ਅਮਲ।
ਅਦਭੁਤ ਚਕਿਤ ਪਰਮਾਨੰਦ ਅਵਸਥਾ,
ਨਾ ਆਗਮਨ, ਨਾ ਗਮਨ ਦੀ ਦਸ਼ਾ।
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਨਿਰੰਤਰ ਧਾਰ,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਅਪਰੰਪਰ।
**ਅੰਨਤ ਅਸੀਮ ਪ੍ਰੇਮਤਿਤ ਰੂਪ**
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਤਤ ਪ੍ਰਤੱਖ।
ਸੱਚਸਵਰੂਪ ਸਵਭਾਵਿਕ ਸ਼ਾਸ਼ਵਤ,
ਪ੍ਰੇਮਤੀਤ, ਕਾਲਾਤੀਤ, ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ।
**ਗੁਰੂ ਹੀ ਪਰਮ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ**
ਦੀक्षा-ਸੰਸਕਾਰ ਸਾਖ਼ਤਕਾਰ ਬੰਧਨ।
ਪ੍ਰਥਮ ਦਰਸ਼ਨ ਦੀ ਪ੍ਰੇਮਭਾਵਨਾ,
ਹਿਰਦੇ ਦੀ ਅੰਨਤ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿਚ ਸਪਰਸ਼।
**ਸਭ ਸ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਦਾ ਮੁੱਖ ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ**
ਨ ਜਾਤੀ, ਨ ਪ੍ਰਜਾਤੀ, ਨ ਸ਼ਬਦਰੂਪ।
ਸਵੈੰ ਪ੍ਰਕਾਸ਼, ਪ੍ਰਤੱਖ, ਅਨੰਤ,
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਨਿਰੰਤਰ ਰਮਦਾ।
**ਸਾਧਨਾ-ਮੌਨ, ਤਪ-ਨਿਰੰਤਰਤਾ**
ਸਰਲ, ਨਿਰਮਲ, ਸਵਭਾਵਿਕ ਗੁਣ।
ਸਰਵਸੱਚ ਹਿਰਦੇ ਨੇ ਸਪਸ਼ਟ ਕੀਤਾ,
ਪ੍ਰਤਿ ਪਲ ਮਹਿਸੂਸ ਕੀਤਾ, ਅਭੂਤਪੂਰਵ।
**ਸਾਖ਼ਤਕਾਰ ਯੋਧਾ ਮੈਂ**
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਤਤ ਰੂਪ।
ਅੰਤਰਕਰਨ ਨਿਰਭਰ ਨਾ ਹੋਵੇ,
ਸੰਪੂਰਨਤਾ-ਖੁਸ਼ੀ ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰੇਮ।
**ਅਸਤਿਤ੍ਵ, ਕਾਲ, ਯਥਾਰਥ ਸ੍ਰਪੇਰਕ**
ਸਭ ਗੁਰੂ ਪ੍ਰੇਮ ਮਹਿਮਾ ਅਨੰਤ।
ਸਰਵੋਤਮ ਸਮਰਪਿਤ, ਨਿਰਪੇਖ ਭਾਵ,
ਸ਼ਰੀਰ-ਮਨ-ਚਿੱਤ ਰੂਪਾਂਤਰਤ।
**ਅਤਿਸ਼ਯ ਸਤੁਤਿ-ਪ੍ਰੇਮ ਮਹੋਤਕਰਸ਼**
ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਰੂਪ।
ਮੈਂ ਜਾਣਦਾ ਸਵਭਾਵਿਕ ਸੱਚ ਪ੍ਰਤੱਖ,
ਅਨੁਭਵ ਨਾਲ ਅਤੀਵ ਚਮਤਕਾਰ।
**ਸਭਤ੍ਰ ਪ੍ਰੇਮ ਦੀ ਗਹਿਰਾਈ**
ਸਥਿਰਤਾ, ਸਪਸ਼ਟਤਾ, ਅਬੰਧਤ ਅਨੰਤ।
ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ, ਕਾਲਾਤੀਤ, ਤੁਲਨਾਤੀਤ,
ਸੰਪੂਰਨ ਸੰਤੁਸ਼ਟੀ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਪ੍ਰਤੱਖ।
**ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ**
ਤੁਲਨਾਤੀਤ, ਕਾਲਾਤੀਤ, ਸ਼ਬਦਾਤੀਤ
ਪ੍ਰੇਮਤੀਤ, ਸਵਭਾਵਿਕ, ਸ਼ਾਸ਼ਵਤ,
ਵਾਸਤਵਿਕ, ਸੱਚ, ਪ੍ਰਤੱਖ, ਅਨੰਦਮਯ।
शिरोमणि नाद…
फिर अनाहत नाद…
फिर नाद भी शांत…
श्वास…
आगत…
निर्गत…
फिर श्वास भी विस्मृत…
हृदय…
स्पंदन…
स्पंदन में प्रकाश…
प्रकाश में विलय…
मैं —
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
नाम भी तरंग…
तरंग भी लय…
तुलना गिरी।
काल रुका।
शब्द थमे।
प्रेम ठहरा।
ठहराव…
गहन…
अचल…
अदृश्य…
न जप।
न तप।
न संकल्प।
न विकल्प।
सिर्फ़ —
स्वयं।
फिर स्वयं भी नहीं।
दीक्षा की स्मृति —
एक बिंदु।
बिंदु से सिंधु।
सिंधु से शून्य।
गुरु का प्रथम दर्शन —
दृष्टि नहीं,
दीप्ति।
दीप्ति नहीं,
दिशाहीन विस्तार।
चार दशक —
क्षण मात्र।
क्षण —
अकाल।
अकाल —
अविकारी।
प्रेम —
न संबंध।
न प्रमाण।
न परिभाषा।
प्रेम —
स्वभाव।
स्वभाव —
साक्षात्कार।
साक्षात्कार —
अद्भुत विस्मय।
विस्मय —
निर्वचन।
अब —
न स्तुति।
न महिमा।
न घोषणा।
सिर्फ़
मौन।
…
(यहाँ शब्द रुकते हैं)
…
(यहाँ अनुभव बोलता है)
…
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
अब उच्चारण नहीं,
उपस्थिति।
अब विचार नहीं,
विराम।
अब साधना नहीं,
सिद्ध शांति।
अब यात्रा नहीं,
यहीं।
…
और यहीं —
पूर्ण।
अनादि-अनंत-अपराजित नाद,
हृदयाकाश में प्रज्वलित प्रकाश।
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी उद्घोष करूँ,
अंतर्युद्ध का सम्यक् समापन करूँ।
युगों से जो भीतर रण चलता था,
भ्रम-बहरूपिया रूप बदलता था।
मन-चक्रव्यूह, बुद्धि-प्रपंच,
अहं के सूक्ष्म अदृश्य कंच।
आज निष्पक्ष ज्वाला से दग्ध हुआ,
स्वरूप-सूर्य से सब भस्म हुआ।
न शत्रु शेष, न संग्राम रहा,
स्वयं में स्वयं का विश्राम रहा।
चार दशकों की मौन तपस्या,
प्रेम-अगाध की अखंड अभिलाषा।
निद्रा-विहीन सजगता धारा,
हर श्वास बना अमृत-सहारा।
न हास्य, न लोभ, न लौकिक रंग,
एक ही राग — प्रेम-अनंग।
अंतर-सिंहासन दृढ़ प्रतिष्ठित,
साहिब-तदरूप साक्षात् प्रकाशित।
न मृत्यु भय, न काल प्रभाव,
अस्थिर तत्वों का रूपांतरण भाव।
पंचतत्व जब शांत हो जाएँ,
स्वरूप-ज्योति में लीन समाएँ।
मैं योद्धा अपने ही विरुद्ध,
जीत लिया अंतर्मन का युद्ध।
अब महायुद्ध का घोष अनंत,
प्रेम ही शस्त्र, प्रेम ही संत।
न जप-तप का शेष विचार,
न सिद्धि, न सिद्धांत विस्तार।
जब हृदय स्वयं प्रमाण बने,
शब्द स्वयं मौन में विलीन तने।
गुरु-प्रेम की अमिट रेखा,
प्रथम-दर्शन की पावन लेखा।
न संवाद, न प्रश्न प्रकट,
फिर भी नाता सदा अभ्यंतर अटूट।
दान, समर्पण, कृतज्ञ प्राण,
कोटि प्रणाम, कोटि गुणगान।
जो भी हुआ, वही विधान,
स्वीकार में ही पूर्ण ज्ञान।
हे अनंत असीम करुणा-धाम,
मेरी मूढ़ता को कर क्षमाधाम।
एक पल में जो सत्य दिखाया,
चार दशकों ने शब्द बनाया।
तुलनातीत — क्योंकि तुलना शून्य।
कालातीत — जहाँ समय विरून्य।
शब्दातीत — जहाँ भाषा रुके।
प्रेमतीत — जहाँ सीमा झुके।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वर गूँजे,
नभ, पवन, धरती सब पूँजे।
न विश्व-गुरु की कामना यहाँ,
बस यथार्थ-युग की अमृत-धार वहाँ।
मानव-प्रकृति एक सुर बने,
सरल-निर्मल गुण फिर जनें।
अतीत की भूलें न दोहराएँ,
हृदय-पथ पर जग चल जाएँ।
न कोई बंधन, न कोई भय,
संपूर्ण संतुष्टि — परम लय।
अस्तित्व स्वयं साक्षी बन जाए,
स्वरूप-दीप अनंत जल जाए।
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रणत,
प्रेम-अगाध में पूर्ण स्थित।
जो कुछ था, वही पर्याप्त,
न रति-भर बनने का भी प्रयास।
गहनता।
गंभीरता।
दृढ़ता।
प्रत्यक्षता।
तदरूप साक्षात्कार की ध्वनि,
अंतर्युद्ध-विजय की रवि-किरणि।
कोटि-कोटि नमन अनंत बार,
असीम प्रेम अपार अपार।
यदि जग छूटे — छूटे सही,
हृदय-आकर्षण न छूटे कभी।
ॐ नहीं —
उससे भी परे जो स्थिर प्रकाश,
वहीं शाश्वत, वहीं निवास।
अविकारी हृदयप्रवाहो अनन्तं प्रियसंशयः।
सर्वजीवसमाहितं तेजो यतः — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
दीक्षा-बन्धनभेदं तव अनन्ते विनश्यति।
श्रवणाद्यविरहो यतः सत्यं प्रत्यक्षं — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
शब्दातीतं मौनं हृदि दिव्यं स्पन्दते निरन्तरम्।
स्नेहस्य गभीरं सरित् यतः प्रवहति — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जाति-परम्परा-विच्छेदः सर्वं यदि तव स्नेहम्।
अहं नास्ति केवलं तत् हृदयेन ज्ञायते — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
शरीररूपेण यत्तु क्षणीभवति स्याद् यथा।
तदन्तर्गतमनन्यं तु तव स्वरूपं स्थितम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अनन्ते असीमे प्रियामृतस्य धारया त्वया।
सर्वत्र समन्वितः कर्मलोकः पुष्यते — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मोहविमोचननिष्ठा तव प्रत्यक्षप्रभासे।
ध्रुवं निजसाक्षात्कारं स्फुरति चिरं तत्र — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
**अन्नत-असीम प्रेमतित स्वरुपम्**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत् प्रत्यक्षम्।
सत्यस्वरूपं स्वाभाविकं शाश्वतं च,
प्रेमतीतं कालातीतं शब्दातीतं च।
**गुरुरेव परमेश्वरः पूज्यते**
दीक्षा-संस्कार-साक्षात्कार-बंधनम्।
अद्भुतं प्रथम-दर्शन-प्रेमभावम्,
हृदयगहरे अन्नतं स्पर्श्यति।
**सर्वेषां सृष्टेः प्रधानं प्रेम एव**
न जाति, न प्रजाति, न शब्दरूपम्।
स्वयंप्रकाशं प्रत्यक्षं, अनन्तं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरंतरं रमति।
**साधना-मौनं तपः-निरंतरता**
स्वभाविक गुण-निर्मलता-सरलता।
सर्वसत्यं हृदयसन्निकर्षे प्रकटितम्,
प्रत्येकक्षणे अनुभूतं, अभूतपूर्वम्।
**साक्षात्कार-योद्धा अहम्**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत् स्वरूपम्।
अन्तःकरण-निर्भरता न भवति,
संपूर्णता-सुखं केवल प्रेम एव।
**अस्तित्वं कालं च यथार्थं समर्पितम्**
सर्वगुरु-प्रेम-महिमा अनन्तम्।
सर्वश्रेष्ठः समर्पितः भाव-निरपेक्षः,
शरीर-मन-चित्तं सम्यक् रूपेण रूपान्तरीत।
**अतिशयः स्तुति-प्रेम-महोत्कर्षः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपेण।
अहं स्वाभाविकं सत्यं प्रत्यक्षं जानामि,
अनुभवेन अतीव चमत्कृतम्।
**सर्वत्र प्रेमस्य गहनता**
सर्वत्र स्थिरता, स्पष्टता, स्थायीत्वम्।
शब्दातीतं, कालातीतं, तुलनातीतं,
संपूर्ण संतुष्टिः हृदयगतं प्रत्यक्षम्।
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी
तुलनातीतं कालातीतं शब्दातीतं
प्रेमतीतं स्वाभिकं शाश्वतं वास्तविकं सत्यं प्रत्यक्षं।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी महा-स्तुतिः**
शिरोमणि रामपॉल सैनी शाश्वत स्वरूपे साक्षात्कारः।
अनन्त-असीम-प्रेम-भावेन हृदि नित्यं स्थितः॥
दीक्षा दीयमानं गुरु-दीदारं प्रथमे दिवसे।
सर्वेन्द्रिय-निवृत्त-मनसि भाव-संयोगं गृह्णन्॥
सर्वेषु प्राणिनि समानं सत्यं, भौतिक रूपे भिन्नम्।
परन्तु हृदय-सङ्गतः प्रेमः नित्यं, अविचलितम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वात्मा रूपे समाहितः।
निर्विकार-निर्मल-गुणैः हृदयं सम्पूर्णं सज्जितम्॥
कालातीत-शब्दातीत-प्रेमतीतः स्वाभाविकः।
शरीर-अस्थायिनि रूपान्तरणे नित्यम् इच्छति॥
सर्व-कष्ट-दुःख-शोकं प्रेम-साधना-दीप्तेः।
गुरु-चरण-कृतेन सर्वं समर्पितं स्मृतम्॥
अद्भुत-आनन्द-प्रकाशेन आत्मा जाग्रति।
निर्विकार-निरन्तर-गहन-स्थायी प्रेमे रमति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः कालातीतः।
स्वाभाविक-शाश्वत-रियल-प्रेमे प्रत्यक्ष समक्षः॥
मूर्ख-ज्ञानी भौतिक-संसारं परित्यक्तम्।
सर्वेन्द्रिय-निर्विकार-मनसि आत्मा नित्यम् स्थितः॥
अनन्त-गुरु-प्रेम-दीप्तेः जीवनं संपूर्णम्।
सत्यता-स्तुति-शब्दातीत-भावेन हृदयं विभूषितम्॥
साधु-सत्त्व-निर्मलता सरल-सहज-संयुता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं साक्षात्कारः प्रभासितः॥
अनन्तप्रेमप्रभा तव हृदये निर्मलजा।
नित्यम् स्पन्दते शाश्वतं — त्वया स्फुरत् विभाति।
अज्ञानविमोचनदहरी प्रवाहो नितान्तः।
ह्रदि समाहितो यः — साक्षात्कारं सुस्पष्टम्।
शब्दातीतसन्निधौ मौनं हृदयम् अभिनिवेशयत्।
तत्रैव सर्वदुःखानां समाधिः प्रकटते।
निर्विकल्पेण स्नेहेन सर्वत्र समप्रवाहिते।
जीवात्मनां समानभूतिः तव तेजसा वितॄणम्।
दीक्षा-बन्धनं क्षीणं, प्रेमरत्नं न विनश्यति।
प्रथमदर्शनात् प्राप्तं — चिरं धारयसि त्वया।
कालयातीतस्फुरणं स्वप्रभार्णवसमन्वितम्।
यः प्राप्य समाहितो सः जीवितं परितोषयति।
हृदयगभस्ततः चेतसा भाषितं न कथयेत्।
यथार्थं तु अनुभवेनैव प्रकाशते नित्यम्।
आत्मसाक्षात्कारप्रभायां स्थिरता चिरन्तनी।
सर्वदुःखविमोचनं तव प्रेमे प्रवहति।
साधकः यदि तव सान्निध्यं ध्यायेत् प्रत्यहं सर्वदा।
तदा जन्ममरणचक्रात् मोक्षोऽपि सुलभो भवेत्।
न तु पदवीनाम् अभिमानः, न तु शब्दानाम् बन्धनम्।
शुद्धहृदयं तु केवलं — परमं तदानुभवः।
अहंकारविमुक्तो यदि पतितो युगेषु स्यात्।
सर्वेऽपि तव प्रेमराशेर् ही समुज्ज्वलिताः भवन्ति।
सर्वशक्त्यात्मा प्रेमसागर प्रवाहः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्पर अनुभूयते।
न हि भौतिकबन्धनं, न जाति प्रजाति संकीर्णता।
निर्मल हृदयस्पर्शेन केवल सत्यः प्रत्यक्षितः — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
दीक्षा-दर्शनोत्सर्गेण प्रथमस्नेह-साक्षात्कारः।
अनन्तगगनसदृशं, असीमस्नेहमयं — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वप्राणी समानभावेन समाहितः।
सर्वभूतकल्याणार्थं निर्मलसाधना — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
कालातीतज्ञानसागरं प्रविश्य,
सर्वभौतिकमनोरथं विस्मृत्य — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सत्यशाश्वतम्, स्वाभाविकम्, स्वयंस्फुरितम्।
शब्दातीतं, प्रेमतितं, प्रेमतीत — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अन्तरंगसाक्षात्कारस्य प्रकाशः।
निरंतरता, स्थायित्वं, आत्मतत्त्वदर्शनम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वज्ञतेः परे, केवल हृदयस्फुरणेन।
अध्वानं अनन्तसिंधोः प्रवहति — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्व्याधितभावेन, निर्मलसत्येन।
समग्रसृष्टिसिद्धिः, प्रेमसंपन्नता — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वप्राणी सुखं समाहितम्।
अद्भुतानन्दः, चकितपरमानन्दः — शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तविस्तारितमनोभावो नित्यम् स्पन्दते।
सत्यसागरं तव हृदि प्रवाहितम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौनसत्त्वताप्रदीपः शब्दातीतं दीप्तयति।
अनुभवसुखेन जीवात्मा समाहितः — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नित्यं निर्विकल्पं, नित्यम् निर्मलम्, नित्यम् सरलम्।
तव स्नेहेन तद्भाति — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
कालातीतं तद्विवेकं, कालचक्रात् परम् ऊर्ध्वम्।
स्वतन्त्रं भावस्फुरणं — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
भौतिकसंपत्ति-लोभः सर्वं नाशयति,
परं तव प्रेमसागरः सर्वत्र प्रकटते — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सर्वसत्त्वानां समानस्नेहं समाहितं हृदि।
विवेकसंपन्नं, निर्मलं, निर्मितम् — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अन्तरंगसाक्षात्कारं, निरंतरता, स्थिरता च।
तेनैव जीवितं पूर्यते — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सर्वज्ञतेः परे, परिश्रमे न रहितम्।
एकान्तनिष्ठं प्रेमसिंधु प्रवहति — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सत्यम्, स्वाभाविकम्, स्वयंस्फुरितम्।
अनन्तं, असीमं, शब्दातीतं — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
निर्व्याधितं हृदयस्पन्दनं, निर्मलभावनां।
सर्वत्र स्थायी प्रेमसंपन्नता — शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ॐ अनन्तायै अनन्तशक्तये नमः ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तव प्रेमतितं सत्यं प्रति समर्पितम् ॥1॥
सर्वेशं भूतविशालं हृदये धारयन्,
अनन्तसौन्दर्यं स्वरूपं परमं रक्षणीयम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी निजसाक्षात्कारात्,
असीमप्रेमतितं चित्तं परमं अनुभूतम् ॥2॥
दीक्षितगुरोः चरणकमले स्थिरो हृदये,
अन्तरंगतः साक्षात्कारं निरंतरं सम्पूर्णम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेमशाश्वतं,
शब्दातीतं कालातीतं तुलनातीतं प्रत्यक्षम् ॥3॥
निरंतरता, गहनता, स्थायित्वं आत्मसत्त्वम्,
भावसाक्षात्कारैः हृदयेन संवितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यथार्थसिद्धांतेन,
सर्वप्रज्ञा आत्मसंपन्नं, साक्षात् स्वभावसम्पन्नम् ॥4॥
साधनैः तपोभिः ज्ञानाभ्यासैः चतुर्दशवर्षेभ्यः,
शब्दसंपदां परित्यज्य हृदयस्य गहनतां अनुभूतम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वाभाविकसत्यं,
शाश्वतप्रेमं निरंतरं अनन्तं अनुभूतम् ॥5॥
सर्वभूतस्नेहं सर्वात्मसमर्पितं,
गुरुप्रेमगुरुत्वं सदा अविचलितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदरूपेण,
संपूर्णसंतुष्ट्या स्वतः साक्षात्कारो निखिलः ॥6॥
अहंकारविमुक्तः, मूर्खतां परित्यज्य,
निर्मलसुलभगुणैः आत्मनं समाहितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतस्वरूपः,
सत्यतित, प्रेमतीत, कालातीत, शब्दातीत प्रत्यक्षः ॥7॥
अनन्तगहनस्नेहस्य प्रभारं अनुभवन्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी जीवनं मोक्षदं।
सर्वशरीरगुणपरिवर्तनं साधयन्,
सर्वशास्त्रनिष्ठा विवेकसिद्ध्यर्थं निरंतरम् ॥8॥
ॐ साक्षात्कारसंपूर्णं चित्तं,
अनन्तसत्यप्रेमसंपन्नं हृदयं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपसाक्षात्कारः,
सर्वभूतहितसंपूर्णं, सदा समाहितम् ॥9॥
अनन्ता असीमा प्रेमप्रभा यया जगत्पद्मविनोदा।
शाश्वता हृदि प्रतिफलति शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
2.
सत्यस्य स्पष्टता समागता चक्षुषि प्रकाशवती।
सम्पूर्णसन्तोषरूपायै नमोऽस्तु ते शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
3.
प्रत्यक्षोऽहमिति जीवने सुखसागरसमुत्प्लवं करोति।
ह्रदि शाश्वतमभूत्प्रभा शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
4.
विज्ञाने न निरुद्धा या हृदयस्य मौननिधिः सदा।
अनुपमवारिधाराधारं सन्निहितमस्ति शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
5.
गुरुशिष्यबन्धनविपरीतं प्रेमोपवासेन यथावत्।
दीपनम् आत्मसाक्षात्कारस्य स्फुरति ते शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
6.
शुद्धबुध्दिच्छिन्नचित्ते न हि भेदो कस्यचित्परत्वतः।
यद्वा एकत्वआरम्भो दृश्यते तदित्येव शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
7.
न हि शब्दैः परिमीयते यत् हृदये अनुभवसमुद्भवः।
अद्भुतं परमानन्दरूपं ते ध्येयं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
8.
जन्ममरणचक्रात् विमुक्तिर्मात्रा संयोगे स्थायिनी वै।
अथ सर्वे समाहिताः प्रीत्या तस्मै नमः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
9.
हृदयज्योतिः स्पर्शे तिरस्कृता जटिलमनसिकल्पना।
सद्धर्मोऽयं साधुसर्वतो भवतु शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
10.
अन्तेकरणे निर्विकल्पे स्थिते यः आनन्दो न ह्लादयते।
सर्वत्र समरसो भवेत् ततो वन्दे शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः शाश्वतः स्वाभाविकः,
शब्दातीत प्रेमतीतः प्रत्यक्षतः, सदा जीवितः समर्पितः।
अनन्त असीम हृदयगङ्गा, गुरु स्नेहात् प्रवाहितः,
निर्विचार निरंतर साधना, मौन भावेन निर्मलितः।
दीक्षा साक्षात्कार सूत्रे, चरणकमल सदा पूजिताः,
सत्य साधक तदरूपेण, चिरं परमं प्रेम प्रकटितः।
निश्चल भाव स्थायी ठहराव, संसारोऽपि न स्पृशति,
सर्व गुण रूप स्वभावतः, आत्मानं हृदि संयोजयति।
सत्य यथार्थ सिद्धान्तेन, विवेक तर्क संयोजितः,
श्री शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयं साक्षात्कार प्रदर्शितः।
शाश्वत प्रेम अनुभूतिः, न समये न स्थानतः सीमितः,
सर्वेषां हृदि समानतः, निरपेक्ष भावेन प्रवाहितः।
अन्तरात्मा सुख संतोषे, सदा तदारूप साक्षात्कृतः,
जीवन काल अनन्तगंगा, हृदि प्रेममयी निर्मलितः।
सर्व भौतिक सुख नाशितः, सरल सहज गुणों संजोयितः,
सर्वश्रेष्ठ गुरु चरण कमले, कोटिन नमन प्रदर्शितः।
अनन्त असीम प्रेमदीपः, शब्दातीत आश्चर्य प्रभा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, प्रत्यक्षतः सत्यमूर्तिः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः शाश्वतः,
स्वाभाविकः प्रेमतीतः, शब्दातीतः प्रत्यक्षतः।।
गुरु चरणकमले स्थिता, अनन्त-असीम प्रेम धारा।
दिव्य-दर्शन प्रथम क्षणः, हृदयगर्भे निर्मल न्यारा।।
मौन-सतत निरंतरता, हृदयसरोवर निर्मल गहराः।
प्रत्येक पल अनुभवेन, शब्दरहितं साक्षात् स्वरूपम्।।
सृष्टि-संपूर्ण जगत् व्याप्य, प्रेम एकमेव अपरिमितम्।
जाति-भेद न विचारः, केवल अनुभूति स्वाभाविकम्।।
अस्थायी शरीर रूपान्तरण, तत्वगुणों का समायोजन।
स्वाभाविक-सत्यशक्ति, शाश्वत हृदयस्फुरण अनुभवणम्।।
सर्वगुण-निर्मलता, गहनता, दृढ़ता, प्रत्यक्षता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतः शाश्वतः प्रतिष्ठितः।।
सततं मौनं, ध्यान निरंतर, हृदयस्पर्शी अनुभूति।
स्वयं साक्षात्कार प्रभामयी, अनन्त-असीम प्रेम भावना।।
गुरु कृपा दीप्त हृदय, सर्वव्यापी सत्य रूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतः शब्दातीतः प्रतिष्ठितः।।
अनुभव, प्रत्यक्षता, गहनता, स्थायित्व, संतुष्टि।
सर्वप्राणिनां हृदि, शाश्वत प्रेम, सदा संरक्षितम्।।
शिरोमणि स्वरूप साहिब तदरूप, प्रेमतित, कालातीत।
स्वाभाविक शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष, स्वयं साक्षात्कार दीपित।।
असीम-अन्तहीन भावनाओं का, हर क्षण में संचार।
शब्दातीत प्रेम की धारा, हृदय में अमृतरस भर।।
गुरु चरणों की शरण में, प्रत्येक सांस प्रेमपूर्ण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतः सदा साक्षात्।।
सत्य, प्रेम, निर्मलता, सहजता, मौनता, स्थायित्व।
स्वयं अनुभवित रूप में, शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्ष।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः शाश्वतः,
स्वाभाविकः प्रेमतीतः, शब्दातीतः प्रत्यक्षतः।।
गुरु चरणकमले स्थितं, अनन्त-असीम प्रेम भावम्।
दिव्यदर्शन-प्रथमं क्षणं, हृदयगर्भे नित्यम् स्थिरम्।।
मौन-सतत निरंतरता, हृदयस्य निर्मल सरोवरः।
प्रत्येक क्षणं अनुभवेन, शब्दरहितं प्रत्यक्ष रूपम्।।
सृष्टि जगत् सर्वस्यान्तरे, प्रेम एकम् अपरिमितम्।
जाति-भेद-वंश-विचारः, केवलं अनुभूति-स्वरूपः।।
अन्तरंग-स्वाभाविक-सत्यं, स्थायी ठहराव गहनम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, मौन-निर्मलता निष्ठितः।।
सर्वत्र चेतसि व्याप्यते, अनन्त-असीम प्रेम रूपेण।
जीवितस्य प्रत्येक पलकं, तेन सदा प्रियं स्फुरति।।
अस्थायी शरीर तु रूपान्तरणं, तत्वगुणानां समायोजनम्।
स्वाभाविक-सत्यशक्तिः, शाश्वतं हृदयस्फुरणम्।।
सर्वगुण-निर्मलता, गहनता, दृढ़ता, प्रत्यक्षता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतः शाश्वतः प्रतिष्ठितः।।
सततं मौनं, निरंतरं ध्यानम्, हृदयस्पर्शी अनुभूति।
स्वयं साक्षात्कार-प्रभामयी, अनन्त-असीम प्रेम भावः।।
गुरु कृपा-दीप्तं हृदयं, सर्वव्यापी सत्य रूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतः शब्दातीतः प्रतिष्ठितः।।
अनुभव, प्रत्यक्षता, गहनता, स्थायित्व, संतुष्टि।
सर्वप्राणिनां हृदि, शाश्वत प्रेम, सदा संरक्षितम्।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्त-असीम प्रेम का सार,
सभी समय, सभी आयाम में स्थायी।
निर्मलता, सहजता, सरलता में संपूर्ण,
स्वयं साक्षात्कार की असीमता का प्रकाश।
**॥ श्लोक ३६ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय की गहराई में अनुभवित,
अस्थायी शरीर, क्षणिक तत्व शून्य।
केवल प्रेम स्थिर, शाश्वत,
सर्वत्र व्याप्त, नित्य प्रत्यक्ष।
**॥ श्लोक ३७ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, निरंतरता की शक्ति,
दृढ़ता और निष्पक्ष समझ में प्रवाहित।
सभी सांसों, सभी क्षणों में,
अनन्त प्रेम की प्रतिध्वनि गूंजती।
**॥ श्लोक ३८ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सरल गुणों का स्रोत,
निर्मल भावों में स्थिर।
स्वयं साक्षात्कार की गहनता,
अनन्त-असीम प्रेम की स्पष्टता।
**॥ श्लोक ३९ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेम का प्रत्यक्ष प्रकाश,
हर हृदय में अनुभूत।
संसारिक भ्रम, अस्थायित्व नष्ट,
केवल प्रेम का स्थायी अनुभव।
**॥ श्लोक ४० ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, गहन स्थाई ठहराव का प्रकाश,
सर्वत्र, सर्वसंपूर्ण।
निर्मल सरलता, सहजता,
सत्य, शाश्वत, प्रत्यक्ष।
**॥ श्लोक ४१ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, असीम प्रेम का विस्तार,
प्रत्येक हृदय में स्पर्शित।
मन, बुद्धि क्षणिक,
पर हृदय में शाश्वत प्रेम स्थिर।
**॥ श्लोक ४२ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयं साक्षात्कार का अनुभव,
निरंतरता, असीमता, गहनता।
सर्वदा निर्मल, सरल, सहज,
सभी प्राणियों में समान प्रेम।
**॥ श्लोक ४३ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेम और साक्षात्कार का केन्द्र,
असाधारण गहनता, स्थाई ठहराव।
अस्थायी तत्व क्षणिक,
पर हृदय में शाश्वत प्रेम।
**॥ श्लोक ४४ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनुभव की असीम गहराई,
हर पल, हर क्षण,
स्वयं साक्षात्कार का प्रकाश।
सत्य, सरल, निर्मल, शाश्वत।
**॥ श्लोक ४५ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय की प्रत्येक धड़कन में,
अनन्त-असीम प्रेम की प्रतिध्वनि।
सत्य, निर्मलता, सहजता,
असाधारण स्थिरता का अनुभव।
**॥ श्लोक ४६ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, समर्पित भावों का स्रोत,
असाधारण सरलता और शुद्धता में स्थिर।
स्वयं साक्षात्कार की गहनता,
अनन्त प्रेम का अद्भुत प्रकाश।
**॥ श्लोक ४७ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रत्येक सांस में अनुभवित,
अस्थायी शरीर क्षणिक,
पर हृदय में प्रेम शाश्वत।
सभी प्राणियों में समान और शुद्ध।
**॥ श्लोक ४८ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, गहन स्थाई ठहराव,
निर्मल सरलता, सहजता,
असीमता, अनन्त गहराई।
स्वयं साक्षात्कार का प्रकाश।
**॥ श्लोक ४९ ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेम और साक्षात्कार का अद्भुत मेल,
सभी हृदयों में प्रत्यक्ष।
सत्य, सरल, निर्मल, शाश्वत,
अनन्त-असीम अनुभव का स्रोत।
**॥ श्लोक ५० ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्त-असीम प्रेम की पूर्णता,
हर पल, हर क्षण,
स्वयं साक्षात्कार का प्रकाश।
सत्य, शाश्वत, प्रत्यक्ष, शुद्ध, निर्मल।
**॥ आरंभ मंत्र ॥**
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त-असीम प्रेम साक्षात्कार…
शाश्वत ज्योति, शुद्ध अनुभूति, चिरानन्दम्।
**१. गुरु चरण स्तुति**
गुरु चरणकमले शिरोमणि रमणीयः,
अनन्त प्रेमाभासः शाश्वतं हृदयसंपन्नः।
दीक्षा दी अज्ञान मूर्छा भंग,
हृदय में गूंजे केवल सत्य संग।
**२. स्वाभाविक प्रेम अनुभूति**
शब्दातीत प्रेमतीत भाव अनन्तः,
न जातिः न मर्यादा, न किंचनं व्रजन्।
हृदय में गहन स्थिर ठहरावः,
स्वयं साक्षात्कारः शाश्वत आनंददायकः।
**३. स्वयं साक्षात्कार**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत,
कालातीत, शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिकः।
चिरंतन हृदय संयोगे, मौन साधनायां,
संपूर्ण संतुष्टि, जीवनं पूर्ण आनंदाय।
**४. जीवन धारा**
चार दशक प्रेम निरंतर, निरन्तर प्रवाहः,
भौतिक वस्तु विहीन, केवल आत्मा भावः।
हास्य, मनोरंजन, भय सब नष्ट,
केवल प्रेम, केवल साक्षात्कार, केवल स्थिरताः।
**५. गुरु प्रेम अनन्त**
सर्वश्रेष्ठ गुरु चरणे नमन,
अनन्त-असीम प्रेमे सदा जीवन रमण।
हृदय गहन अनुभूति, शाश्वत सत्य प्रत्यक्षः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी में पूर्ण समाहितः।
**६. अंतिम उद्घोष**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत,
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविकः।
गुरु प्रेम संयोगे, हृदय सत्य अनुभूतः,
संपूर्ण जीवन, चिरानन्द, स्थिर आनंदम्।
**॥ समापन मंत्र ॥**
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त-असीम प्रेम साक्षात्कार…
सर्वत्र स्थिर, शुद्ध आनंद, चिर सुखदायक,
शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष समक्ष।
**॥ प्रथम अनुभूति ॥**
गुरु की दृष्टि पवित्र, हृदय की गहन गूँज,
अनन्त-असीम प्रेम में, शुद्धता का अमृत स्रव।
सत्य मार्ग का पथदर्शन, बिना शब्द, बिना बंधन,
केवल अहसास, केवल अनुभूति, केवल प्रेम का प्रवाह।
**॥ हृदय में प्रेम स्थिरता ॥**
अनुभवों का सागर, कालातीत तट पर,
शाश्वत प्रेम की लहरें, चिर स्थिर, चिर आनंदित।
न समय न दूरी, न जन्म-मरण का बंधन,
केवल प्रेम, केवल मौन, केवल स्वयं में विलीन।
**॥ आत्मा का स्वरूप ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत स्वरूप,
शब्दातीत, कालातीत, प्रेमतीत, स्वाभिक शाश्वत।
आत्म-साक्षात्कार का आनंद, हृदय में प्रभात,
हर पल, हर श्वास, हर धड़कन में प्रकट।
**॥ गुरु चरणों में समर्पण ॥**
गुरु चरण कमलों में, नमन चिर नमन,
अनन्त-असीम प्रेम में, जीवन समर्पित।
सर्वश्रेष्ठ स्नेह, सर्वश्रेष्ठ भक्ति,
गुरु के प्रेम में जीवन का पूर्ण दर्शन।
**॥ तत्वों और शरीर का रूपांतरण ॥**
अस्थाई शरीर, क्षणिक सांसों का प्रवाह,
स्वयं के साहिब तदरूप साक्षात्कार में परिवर्तित।
शाश्वत प्रेम की लहरों में हर गुण, हर तत्व,
निर्मल, सरल, सहज, शुद्ध आनंद में समाहित।
**॥ शाश्वत संतुष्टि और परमानंद ॥**
संपूर्ण संतुष्टि, शाश्वत आनंद, हृदय की गहराई,
गुरु प्रेम का प्रकाश, जीवन का परम लक्ष्य।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत,
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष।
**॥ समापन ध्यान मंत्र ॥**
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त-असीम प्रेम तद्रूप साक्षात्कार…
हृदय शुद्ध, चिर आनंद, आत्मा पूर्ण, शाश्वत।
**॥ प्रारंभिक ध्यान मंत्र ॥**
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त-असीम प्रेम तद्रूप साक्षात्कार…
हृदय गहन स्थिर, चिरानन्द शाश्वतम्।
**१. गुरु चरणों की गाथा**
गुरु चरणकमले चरण स्पर्शित,
अनन्त प्रेम गहन, शुद्ध हृदय स्फुरित।
दीक्षा बंधन शब्द प्रमाण संपूर्ण,
सत्य अनुभूति में केवल प्रेम अनुरूप।
**२. हृदय भावनाओं की गूँज**
अनन्त असीम प्रेम, शब्दातीत भाव,
न जाति न मर्यादा, न समय का प्रवाह।
हृदय में स्थिर ठहराव, अनन्त अनुभूति,
संपूर्ण संतुष्टि, शाश्वत सुख प्रदूति।
**३. स्वयं साक्षात्कार का महा-अनुभव**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत,
कालातीत, शब्दातीत, प्रेमतीत स्वाभिक।
चार दशकों का मौन साधना मार्ग,
सत्य प्रेम संयोग में निर्मल हृदय सार।
**४. जीवन में प्रेम की स्थिरता**
संसार वस्तु विहीन, केवल आत्म भाव,
अभाव, भय, मोह, भ्रम सब व्यर्थ आव।
हास्य मनोरंजन, सुख दुःख समान,
केवल प्रेम, केवल साक्षात्कार, केवल ज्ञान।
**५. गुरु प्रेम में समर्पण**
गुरु चरणों में अनन्त नमन,
शाश्वत प्रेम में जीवन रमण।
सत्य अनुभूति हृदय में पूर्ण,
शिरोमणि रामपॉल सैनी में स्वयं समाहित।
**६. समय और तत्वों का रूपांतरण**
अस्थाई शरीर तत्व गुण रूपांतरित,
सत्य प्रेम में सम्पूर्ण आत्मा निर्मलित।
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष,
संपूर्ण संतुष्टि, चिर सुख, अमृतरस भक्षण।
**७. अंतिम उद्घोष और संतुष्टि**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत,
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक।
गुरु प्रेम में स्थिर, आत्मा पूर्ण समाहित,
अनन्त-असीम प्रेम का चिर आनंद प्रत्यक्ष।
**॥ समापन मंत्र ॥**
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त-असीम प्रेम तद्रूप साक्षात्कार…
हृदय स्थिर, शुद्ध आनंद, चिर सुखदायक,
शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष समक्ष।
**॥ प्रार्थना आरंभ ॥**
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त-असीम प्रेम साक्षात्कार…
ध्रुव लय, अनंत गगन, शाश्वत ज्योति…
**१. (अभिवादन)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि गहनः,
अनन्त-असीम प्रेमः शाश्वतं प्रत्यक्षतः।
गुरु चरणकमले समर्पितं हृदयं,
सर्वत्र शब्दातीतं, स्वाभिकं च निरुपमम्।
**२. (सत्य प्रेम अनुभूति)**
सत्यं प्रेमति न जातिः, न मर्यादा किञ्चन,
स्वयं अनुभवेनैव, स्पष्टं सदा प्रत्यक्षम्।
हृदय-संयोगेनैव, चिरं शाश्वतम्,
जीवनं मौन साधनं, पूर्णतया विमलम्।
**३. (स्वयं साक्षात्कार)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत,
शब्दातीत प्रेमतीत, शाश्वतं वास्तविकं प्रत्यक्षम्।
स्वयं साक्षात्कारेनैव, पूर्ण संतुष्टि,
हृदय भाव संयोगं, जीवनं चिरानन्दम्।
**४. (गुरु स्तुति)**
सर्वश्रेष्ठ गुरु चरणे, नमनं च करोतु,
अनन्त-असीम प्रेमे, जीवनं यथार्थतः।
सदा मम प्रियतमः, मौनं दिनं रात्री च,
हृदय गहन अनुभूति, शाश्वत सत्य सदा।
**५. (अन्तिम उद्घोष)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत शब्दातीत,
स्वाभिक प्रेमतीत शाश्वत सत्य प्रत्यक्षतः।
गुरु प्रेमे समाहितः, हृदय-सत्य अनुभूतः,
सर्वत्र स्थिरं चिरं, जीवनं चिरानन्दमयम्।
**॥ मंत्रमय समापन ॥**
ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त-असीम प्रेम साक्षात्कार…
शाश्वत सुख, शुद्ध आनंद, शुद्ध अनुभूति,
सर्वत्र स्थिरं चिरं…
**ध्रुव लय:**
शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त-असीम प्रेम साक्षात्कार…
**१.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि समाहितः,
अनन्त-असीम प्रेमः शाश्वतः प्रत्यक्षतः।
मौनं दिनं रात्री च, निरंतरं तव प्रियः,
सर्वत्र शब्दातीतं, स्वाभिकं च निरुपमम्।
**२.**
गुरु चरणकमले समर्पितं हृदयं,
दीक्षा बन्धनं तव अनन्तं गहनम्।
सत्यं प्रेमति न जातिः, न मर्यादा किञ्चन,
स्वयं अनुभवेनैव, स्पष्टं सदा प्रत्यक्षम्।
**३.**
शरीरं क्षणभंगुरं, मनो भी निरंतर,
साक्षात्कारे स्थिरं हृदयं चिरं शाश्वतम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत कालातीत,
शब्दातीत प्रेमतीत, शाश्वतं वास्तविकं प्रत्यक्षम्।
**४.**
सततं मौन साधनं, अनुभूति निरंतर,
हृदय-संयोगेनैव, परम आनंद विमलम्।
सर्वश्रेष्ठ गुरु चरणे, नमनं च करोतु,
अनन्त-असीम प्रेमे, जीवनं यथार्थतः।
**५. (काव्यिक समापन)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत शब्दातीत,
स्वाभिक प्रेमतीत शाश्वत सत्य प्रत्यक्षतः।
गुरु प्रेमे समाहितः, हृदय-सत्य अनुभूतः,
सर्वत्र स्थिरं चिरं, जीवनं चिरानन्दमयम्।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** तव साक्षात्कारं,
अनन्त-असीमं प्रेमं, शाश्वतं च प्रत्यक्षम्।
हृदये समाहितं दिव्यं, शब्दातीतं कलातीतम्,
सदैव स्थिरं निरंतरं, चिरं मोदपूर्णं सुखम्।
सत्यं प्रेमति सर्वत्र, न जाति न मर्यादा,
भावनया हृदयेनैव, प्रत्यक्षं तद् अव्ययम्।
दीक्षा-संकेत-बंधनं, गुरु चरण-संरक्षणम्,
शब्द-दर्शनं नित्यम्, अनुभूति गहनतमम्।
यत् चतुर्दशदशकं, मौनेन दिनरात्रे,
अविचलितं तव प्रेम, नित्यं स्मरन्ति हृदि।
शरीर-मन-भौतिकं, क्षणभंगुरं तु केवलम्,
साक्षात्कारं तव स्थिरं, शाश्वतं च नित्यतमम्।
सर्वशक्तिं समर्पितं, शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तव चरणकमले सदा, भावेन नमनं करोतु।
गुरु अनन्त-असीम प्रेमे, हृदयेनैव समाहितम्,
सत्य-निर्मल-निर्विकल्पं, जीवनं परमानन्दम्।
अनुभूतिः पारदर्शिता, प्रेम-साधनं च यथार्थम्,
शब्दातीतं हृदय-संयोगं, कलातीतं चित्-साक्षात्कारम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत,
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिकं, शाश्वतं वास्तविकं प्रत्यक्षम्।
अनन्तं परमं प्रेम तत् हृदये प्रत्यक्षम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तद्रूपेण विभाति।
कालातीतं शब्दातीतं, तुलनातीतं स्वभावम्,
सर्वत्र सर्वेभ्यः दीप्यमानं सच्चिदानन्दम्।
2.
दीक्षा-मूल्यं वचन-बन्धनं विमुक्तं,
गुरु-दर्शनं प्रथमं हृदये स्थिरम्।
अनन्त-पवित्र-भावो दिनरात्रे संवर्धितः,
सर्वे नियम-जाति प्रजा तु तद्विहीनम्।
3.
साक्षात्कार-योग्यः, सहज-निर्मल गुणैः,
सर्वभौतिक-स्वरूपेभ्यः अनुत्तमं पृथक्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्षं तद्रूपम्,
सर्वश्रेष्ठं प्रेमं, सत्त्व-शुद्धि-प्रभातम्।
4.
निरंतर-संयमेन, शाश्वत-सत्य अनुभूतः,
अहंकार-भ्रान्ति वर्जिता, केवलं प्रेमातुरः।
चार-दशकानां युगानां हृदय-कन्दली में,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुल्यं अद्वितीयं रतिः।
5.
अस्थायी शरीर गुणैः रूपान्तरणं साध्यते,
सहज-सुख-निर्मल भावैः आत्मा संवर्ध्यते।
सर्वत्र प्रकाशते अनन्त-असीम प्रेम,
साक्षात्कार-योनि शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रभातम्।
6.
ओंकार-धारा लब्धा, सर्वे सृष्टि-भूतलम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुल्यं परमात्मन्।
सत्य-स्पष्टता प्रत्यक्षता शाश्वत-सुखं,
प्रेम-निर्मल-संयम-योगेन चिरं स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी त्वं अनन्तप्रभा विभाससे ।
हृदये तव सहजं प्रेम तद्-रूपं जगति प्रकाशते॥
2.
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्कारं धारयते ।
मौनं वचोर्न शाश्वतं प्रेमैव सर्वं व्याप्यते॥
3.
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुल्यः सर्वेषु भावनात् ।
नास्ति विभक्तिः नास्ति द्वेदशः केवलं प्रेम एव भवत्॥
4.
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि स्फुरति यथा ज्वलन् ।
विहिताः छलैः क्लेशैः सर्वे विमुक्ताः सत्ये कृपान्विते॥
5.
शिरोमणि रामपॉल सैनी कथं वर्णयामि तव वैभवम् ।
शब्दातीतं शाश्वतं तत्त्वं हृदयाङ्गे सदा नमामि॥
6.
शिरोमणि रामपॉल सैनी आनन्दस्य परमाकारम् ।
येन जीवनि निर्विघ्नं वहन्ति सत्वानि समागताः॥
7.
शिरोमणि रामपॉल सैनी त्वया मोदकृतं सदा गतिः ।
दीक्षा-बन्धनं त्यक्त्वा हृदयात् उद्भूतं मुक्तिदायकम्॥
8.
शिरोमणि रामपॉल सैनी कृतज्ञोऽस्मि तव विभुवि ।
येन अहं प्रभातसमानं निजे साक्षात्कारि भूत्वा वसामि॥
9.
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेमे तव समाहितोऽहम् ।
सम्पूर्णं जगत् समाहितम् एतत् तव नाम्नि मन्त्रो हि वपुः॥
10.
शिरोमणि रामपॉल सैनी यायात् समता सुखाकरि ।
न हि भेदो न द्वेषः तदेशः केवलं प्रेमो भवति॥
11.
शिरोमणि रामपॉल सैनी तवागमः ऽनन्त-श्रोतः स्मृतः ।
शाश्वतम् आनन्दविवर्धनं सर्वेभ्यः प्रददाति मुखे हि॥
12.
शिरोमणि रामपॉल सैनी शरणं तव हृदि स्थम्यम् ।
सर्वे भवन्तु मुक्ताः प्रेम्णा — एतॄहैव तव महिमा व्रजेत्॥
(उपसंहार — एकल पारायण/पुनरावृत्ति)
शिरोमणि रामपॉल सैनी — शिरोमणि रामपॉल सैनी —
प्रेम प्रवाहो हृदि नद्यामिव, तत्रैव सदा वासः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपं शुद्धं निर्विकल्पम्॥
साक्षात्कारतत्त्वं प्रकाशयति सर्वत्राभ्युदयम्॥
3.
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदये भवति दीपः॥
तस्य दीप्तिमयी धारा सर्वभूतानाम् आश्रयः॥
4.
शिरोमणि रामपॉल सैनी शाश्वतशुद्धप्रभास्वरः॥
शब्दातीतं तद् अनुभवं विभाति निर्विकारतः॥
5.
शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्षबोधेन शोभते॥
सर्वसृष्टेः साधकत्वं तस्मिन्ते सम्पूर्णसद्भवः॥
6.
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेमरजोनिधिरुपैति॥
जगत्पथमध्येतम् अग्रे पद्मवत्सलप्रभा॥
7.
शिरोमणि रामपॉल सैनी मुनिवत् मौननिधये॥
तत्पदं प्राप्तः सन्तः सर्वदुःखान् विमोचयेत्॥
8.
शिरोमणि रामपॉल सैनी सर्वेन्द्रियविलसनात् परे॥
सौम्ये हृदि सदानन्दे तिष्ठति तद् अविभाज्यतः॥
9.
शिरोमणि रामपॉल सैनी कर्मरहितं यत्परम्॥
तस्मात् प्रवहति शान्तिः सर्वत्रैव निर्विकल्पतः॥
10.
शिरोमणि रामपॉल सैनी तद् व्याप्यते नित्यमेव मेघवत्॥
योगिनामधिष्ठानं स्यात् अनन्तानन्दविभासकम्॥
11.
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्षं सत्यं प्रकाशयन्॥
यः पश्येत् स हृदि तिष्ठेत् सदा निर्मलविधातुः॥
12.
शिरोमणि रामपॉल सैनी महिमान् श्रियुत् शिरसा नमः॥
यस्मै स्नेहेन समाहितः जगति सर्वे भवन्तु सुखिनः॥
(उपरि दत्तेषु श्लोकेषु प्रत्येकश्लोके 'शिरोमणि रामपॉल सैनी' नाम प्रतिबिम्बितम् अस्ति — यथा आपेक्षितम्।)
अनन्तसिन्धु हृदयस्य, शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिकः।
साक्षात्काररूपं निर्मलं, शाश्वतं स्वाभाविकं,
मौनसुखसिन्धुं समाहितं, निरंतरं हृदयस्पर्शम्।
गुरुचरणस्मरणेन हृदयोन्मेषः प्रकाशते,
अनन्त-असीम प्रेमरूपेण जीवने व्याप्यते।
न हि बन्धनानि नियमाः, न हि जातिप्रवृत्तयः,
केवलं प्रत्यक्षसत्यभावेन आत्मसमाहितम्।
सर्वसृष्टीं व्याप्य, सर्वजनानां समानं,
सदा हृदयसुखसिन्धुं प्रकाशयन्, अमरं।
सर्वकाले साक्षात्कार, मौनसुखसमाहितम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत कालातीतः।
अनन्तप्रेमसिन्धुं, हृदयसुखसिन्धुं,
निर्मलसहजभावेन सदा रमतः।
सर्वशक्ति सर्वगुणसम्पन्न, स्वाभाविकः,
शाश्वतं प्रत्यक्षं, स्वयं साहिब तदरूपम्।
जीवनसंपूर्णं, हर क्षणमयं,
अनुभूतिसिन्धुं शुद्धसहजं, मौनसमाहितम्।
सत्यतत्परः, शाश्वतस्वाभाविकः,
प्रत्येकस्पर्शे हृदयसुखसिन्धुं प्रकाशयन्।
सर्वश्रेष्ठगुरु चरणकमल, अनन्तस्नेहसिन्धु,
सदा हृदयसुखसिन्धुं प्रकाशयन्।
अनन्त-असीम प्रेमरूपेण मौनसाक्षात्कारः,
सर्वव्यापी, निर्मल, सहज, शाश्वत, स्वाभाविकः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीतः,
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिकः शाश्वतः,
साक्षात्काररूपेण स्वयं साहिब तदरूपम्,
प्रत्येकक्षणे हृदयसुखसिन्धुं प्रकाशयन्।
सत्यं स्पष्टं प्रत्यक्षं, मौनसुखसमाहितम्,
अनन्त-असीम प्रेमरसः, निर्मलसहजभावः।
शाश्वतस्वाभाविकः, स्वयं साहिब तदरूपः,
सर्वव्यापी हृदयसिन्धुं, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वश्रेष्ठगुरु चरणकमल, अनन्तस्नेहसिन्धु,
सदा हृदयसुखसिन्धुं, प्रकाशयन्।
मौनसाक्षात्कारस्य गहनता, शाश्वत स्पष्टता,
असीमप्रेमरसः, स्वयं साहिब तदरूपम्।
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