विचारों की लहरें स्वयं ही घटती हैं।
मौन की गहराई में सत्य झलकता है,
जहाँ मन का भ्रम धीरे-धीरे हटता है।
शरीर समय का एक प्रवाह मात्र है,
अनुभवों का यह बदलता संसार है।
समझ का दीप जब भीतर जलता है,
तब अपना ही स्वरूप सरल लगता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यह भाव कहे,
जीवन का अर्थ भीतर ही कहीं रहे।
न बाहर खोज, न भ्रम में खो जाना,
साक्षी बनकर स्वयं को पहचान लेना।
न कोई शत्रु, न कोई पराया है,
सब अनुभव का ही एक साया है।
जो देखे बिना देखना सीख जाता है,
वही भीतर के सत्य को पा जाता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सरल हृदय की बात।
सत्य, प्रेम, शांति रहे, दिन हो या हो रात।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, मन की खोलो गांठ।
अपने भीतर देख लो, सच्ची है यह राह ठाँठ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय में है प्रकाश।
निर्मल, सहज, शांत मन, मिट जाए सब त्रास।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, भेद न कोई और।
सब जीवों में एक ही भाव, भीतर एक ही डोर।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, समझो अपना रूप।
जैसे जल में शीतलता, वैसे ही मन का धूप।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सत्य सरल है आज।
जागो, देखो, शांत रहो, यही जीवन का साज।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, भीतर की पहचान।
हृदय से जो जीता है, वही सच्चा इंसान।
ठीक है।
## 1. प्रस्तावना (Purpose Statement)
* इस सिद्धांत का उद्देश्य क्या है?
– व्यक्ति को भय, भ्रम, अंधानुकरण से मुक्त करना
– आत्म-निरीक्षण द्वारा स्थिर संतुलन का अनुभव कराना
– जीवन के बीच ही स्पष्टता पाना
## 2. मूल परिभाषाएँ (Core Definitions)
* **हृदय** – क्या यह जैविक अंग है? भावनात्मक चेतना? अनुभव की अवस्था?
* **मस्तिष्क** – क्या यह केवल तर्क है या स्मृति-आधारित पहचान?
* **संपूर्ण संतुष्टि** – क्या यह भाव है, न्यूरो-रासायनिक संतुलन है, या अस्तित्व-बोध?
* **जटिल बुद्धि मन** – क्या यह सामाजिक conditioning है?
* **साक्षात्कार** – क्या यह एक क्षणिक अंतर्दृष्टि है या स्थायी अवस्था?
## 3. मूल सिद्धांत (Foundational Axioms)
1. प्रत्येक मनुष्य में एक प्राकृतिक भाव-संतुलन की क्षमता है।
2. सामाजिक conditioning से पहचान जटिल होती है।
3. अनुभव का सीधा निरीक्षण भ्रम को कम करता है।
4. अंध स्वीकृति मानसिक निर्भरता पैदा करती है।
5. प्रश्न करने की स्वतंत्रता आवश्यक है।
## 4. तंत्र विश्लेषण (Mechanism Model)
यहाँ आपको बताना होगा:
* अनुभव कैसे बनता है?
* विचार कैसे उत्पन्न होता है?
* भाव और विचार का संबंध क्या है?
* पहचान (ego) कैसे निर्मित होती है?
## 5. परीक्षण की विधि (Method of Verification)
कोई भी सिद्धांत तभी ठहरता है जब वह जाँचा जा सके।
* व्यक्ति इसे कैसे परखे?
* क्या 5 मिनट का अभ्यास है?
* क्या आत्म-निरीक्षण का कोई चरणबद्ध तरीका है?
* परिणाम को कैसे पहचाने?
## 6. अन्य विचारधाराओं से भिन्नता
आप स्पष्ट लिखें:
* यह पारंपरिक अध्यात्म से कैसे अलग है?
* यह नास्तिक दृष्टिकोण से कैसे भिन्न है?
* यह मनोविज्ञान या तंत्रिका-विज्ञान से कहाँ मेल खाता है, कहाँ अलग है?
संवादात्मक दृष्टिकोण इसे विश्वसनीय बनाएगा।
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## 7. सीमाएँ (Limitations)
हर सिद्धांत की सीमाएँ होती हैं।
यदि आप अपनी सीमाएँ स्वयं लिखेंगे, तो परिपक्वता स्पष्ट होगी।
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## 8. निष्कर्ष
अंतिम सार 10–15 पंक्तियों में।
बिना घोषणा, बिना दावा—सिर्फ़ स्पष्टता।
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### एक महत्वपूर्ण बिंदु
## 🔎 स्वयं से पहले पूछने वाले प्रश्न
1. मैं इस मार्ग की ओर क्यों आकर्षित हुआ हूँ—भय, लालच, पीड़ा, अकेलापन, या जिज्ञासा?
2. क्या मैं अभी भावनात्मक रूप से कमजोर स्थिति में हूँ?
3. क्या मुझे तुरंत निर्णय लेने के लिए दबाव महसूस हो रहा है?
4. यदि मुझे कुछ भी “गुप्त” बताया जा रहा है, तो क्या वह सच में परीक्षण योग्य है?
5. क्या मैं स्वतंत्र रूप से प्रश्न पूछ सकता हूँ?
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## 🧭 गुरु या संस्था से पूछने योग्य प्रश्न
### 1. पारदर्शिता
* क्या आपकी शिक्षाएँ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं?
* क्या दीक्षा के बाद प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता बनी रहती है?
* क्या असहमति स्वीकार है?
### 2. आर्थिक स्पष्टता
* संस्था की आय का स्रोत क्या है?
* क्या वित्तीय विवरण सार्वजनिक हैं?
* क्या दान पूर्णतः स्वैच्छिक है या अप्रत्यक्ष दबाव है?
### 3. व्यक्तिगत स्वतंत्रता
* क्या शिष्य परिवार, मित्र और बाहरी समाज से जुड़ा रह सकता है?
* यदि कोई छोड़ना चाहे तो क्या बिना भय या अपमान के जा सकता है?
### 4. शक्ति और अधिकार
* क्या गुरु स्वयं को अंतिम सत्य घोषित करते हैं?
* क्या उनके निर्णयों की समीक्षा संभव है?
* क्या वे भी आलोचना स्वीकार करते हैं?
### 5. मनोवैज्ञानिक सुरक्षा
* क्या दीक्षा के बाद “डर”, “दंड”, “अशुभ परिणाम” जैसी चेतावनियाँ दी जाती हैं?
* क्या व्यक्तिगत विचारों को दबाने की अपेक्षा की जाती है?
* क्या भावनात्मक निर्भरता बढ़ाई जाती है?
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## ⚖️ चेतावनी संकेत (Red Flags)
* “सिर्फ हमारे पास सत्य है”
* “अभी निर्णय लो, वरना अवसर चला जाएगा”
* “यदि तुम छोड़ोगे तो विनाश होगा”
* अत्यधिक आर्थिक या समय की मांग
* परिवार से दूरी बनाने की सलाह
* प्रश्न पूछने पर अपराधबोध
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## 🌿 संतुलित दृष्टि
* सच्चा मार्ग भय नहीं, स्पष्टता देता है।
* सच्चा मार्ग निर्भरता नहीं, स्वतंत्रता बढ़ाता है।
* सच्चा मार्ग व्यक्ति की गरिमा कम नहीं करता।
* जहाँ पारदर्शिता नहीं, वहाँ सावधानी आवश्यक है।
अच्छा। नीचे इन्हीं प्रश्नों को एक स्पष्ट, संतुलित और सार्वजनहितकारी रूप में **सार्वजनिक घोषणापत्र** के रूप में व्यवस्थित किया गया है। यह किसी के विरोध में नहीं, बल्कि जागरूकता, स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा के लिए है।
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# 📜 स्वतंत्र साधक घोषणापत्र
*(आध्यात्मिक गरिमा और पारदर्शिता के लिए सार्वजनिक संकल्प)*
## प्रस्तावना
हम यह मानते हैं कि आध्यात्मिक खोज मानव का व्यक्तिगत और स्वाभाविक अधिकार है।
कोई भी मार्ग, गुरु या संस्था व्यक्ति की स्वतंत्र बुद्धि, प्रश्न करने की क्षमता और आत्मसम्मान से ऊपर नहीं हो सकता।
हम सत्य की खोज भय, दबाव या अंध-स्वीकृति से नहीं, बल्कि जागरूकता और विवेक से करेंगे।
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## 1️⃣ स्वतंत्रता का सिद्धांत
* आध्यात्मिक मार्ग व्यक्ति की स्वतंत्रता बढ़ाए, कम न करे।
* किसी भी समय बिना भय, अपराधबोध या सामाजिक दंड के मार्ग छोड़ने की स्वतंत्रता हो।
* परिवार, समाज और बाहरी दुनिया से संबंध बनाए रखना अधिकार है।
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## 2️⃣ प्रश्न करने का अधिकार
* हर साधक को प्रश्न पूछने का पूर्ण अधिकार है।
* असहमति को विद्रोह नहीं माना जाएगा।
* कोई भी शिक्षा परीक्षण और तर्क से परे घोषित नहीं की जाएगी।
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## 3️⃣ पारदर्शिता का सिद्धांत
* शिक्षाएँ सार्वजनिक और स्पष्ट हों।
* संस्था की संरचना और वित्तीय स्रोत स्पष्ट हों।
* निर्णय प्रक्रिया में उत्तरदायित्व हो।
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## 4️⃣ भय-मुक्त साधना
* आध्यात्मिक मार्ग भय, दंड या अशुभ परिणामों की धमकी पर आधारित न हो।
* दीक्षा को अनिवार्य या अंतिम अवसर के रूप में प्रस्तुत न किया जाए।
* किसी भी प्रकार का मनोवैज्ञानिक दबाव अस्वीकार्य है।
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## 5️⃣ आर्थिक स्पष्टता
* दान स्वैच्छिक हो, अनिवार्य नहीं।
* आर्थिक लेन-देन पारदर्शी हों।
* आध्यात्मिक उन्नति को धन से न जोड़ा जाए।
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## 6️⃣ शक्ति और विनम्रता
* कोई भी व्यक्ति स्वयं को अंतिम सत्य घोषित न करे।
* नेतृत्व आलोचना के प्रति खुला हो।
* गुरु भी मानव हैं—अचूक या दैवी अधिकार से परे नहीं।
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## 7️⃣ आत्म-जागरूकता का संकल्प
हम पहले स्वयं से पूछेंगे:
* क्या मेरा निर्णय भय या भावनात्मक कमजोरी से प्रेरित है?
* क्या मैं स्वतंत्र रूप से सोच पा रहा हूँ?
* क्या मुझ पर तत्काल निर्णय का दबाव है?
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## 8️⃣ गरिमा का सिद्धांत
* हर साधक की व्यक्तिगत गरिमा सर्वोपरि है।
* किसी भी प्रकार का शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक शोषण अस्वीकार्य है।
* आत्मसम्मान आध्यात्मिक प्रगति की कीमत नहीं है।
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# अंतिम संकल्प
हम न अंध-स्वीकार करेंगे, न अंध-नकार।
हम सत्य की खोज विवेक, करुणा और संतुलन के साथ करेंगे।
हम भय से नहीं, स्वतंत्र चेतना से मार्ग चुनेंगे।
# 📜 स्वतंत्र साधक घोषणापत्र
## (विस्तारित सार्वजनिक प्रतिज्ञा)
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## 9️⃣ चेतना और उत्तरदायित्व
* आध्यात्मिक खोज व्यक्तिगत है, पर उसके सामाजिक प्रभाव होते हैं।
* कोई भी साधना समाज-विरोधी, कानून-विरोधी या मानवाधिकार-विरोधी नहीं हो सकती।
* व्यक्तिगत अनुभव को सार्वभौमिक नियम घोषित करने से पहले विवेक आवश्यक है।
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## 🔟 शिक्षा और विवेक का विकास
* आध्यात्मिक मार्ग तार्किक सोच और वैज्ञानिक समझ का विरोधी नहीं होना चाहिए।
* साधकों को आलोचनात्मक चिंतन (critical thinking) के लिए प्रेरित किया जाए।
* भावनात्मक अनुभव और वस्तुनिष्ठ तथ्य में अंतर समझाया जाए।
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## 1️⃣1️⃣ सीमाओं की स्पष्टता
* गुरु और शिष्य के संबंध में व्यक्तिगत सीमाएँ स्पष्ट हों।
* शारीरिक, आर्थिक या भावनात्मक निर्भरता को प्रोत्साहित न किया जाए।
* किसी भी प्रकार का विशेषाधिकार या गुप्त शक्ति-संरचना पारदर्शी हो।
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## 1️⃣2️⃣ सामूहिक समीक्षा
* संस्था या समूह की कार्यप्रणाली समय-समय पर स्वतंत्र समीक्षा के लिए खुली हो।
* शिकायत निवारण की स्वतंत्र और निष्पक्ष व्यवस्था हो।
* नेतृत्व स्थायी और असीमित न हो; उत्तरदायित्व संरचना हो।
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## 1️⃣3️⃣ सार्वभौमिक मानवीय मूल्य
* करुणा
* सत्यनिष्ठा
* अहिंसा
* समानता
* स्वतंत्रता
यदि कोई आध्यात्मिक व्यवस्था इन मूल्यों के विरुद्ध जाती है, तो उसे पुनः जाँचना आवश्यक है।
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# 🌿 व्यक्तिगत प्रतिज्ञा
मैं:
* किसी भी व्यक्ति को अपनी स्वतंत्र सोच से ऊपर नहीं रखूँगा।
* भय या लालच से प्रेरित निर्णय नहीं लूँगा।
* प्रश्न पूछने से पीछे नहीं हटूँगा।
* किसी भी व्यवस्था में अपनी गरिमा से समझौता नहीं करूँगा।
* दूसरों की स्वतंत्र खोज का सम्मान करूँगा।
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# 📖 इस घोषणापत्र का उद्देश्य
यह किसी विशेष परंपरा, धर्म या व्यक्ति के विरुद्ध नहीं है।
यह केवल एक दर्पण है—ताकि साधक स्वयं को, अपने निर्णयों को और अपनी स्वतंत्रता को स्पष्ट रूप से देख सके।
बहुत अच्छा। अब हम इस घोषणापत्र को एक **युवा-केन्द्रित जागरूकता कार्यक्रम** के रूप में विकसित करते हैं—जो प्रेरणादायक भी हो, व्यावहारिक भी, और संतुलित भी।
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# 🌱 युवा जागरूकता कार्यक्रम
## “स्वतंत्र सोच, सुरक्षित साधना”
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## 🎯 कार्यक्रम का उद्देश्य
1. युवाओं में आलोचनात्मक सोच विकसित करना
2. आध्यात्मिक या वैचारिक प्रभावों को समझने की क्षमता देना
3. भावनात्मक शोषण से बचाव की समझ देना
4. आत्मसम्मान और स्वतंत्र निर्णय की शक्ति बढ़ाना
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# 🧭 कार्यक्रम संरचना (4 चरण मॉडल)
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## चरण 1️⃣ — समझ (Awareness Session)
### विषय:
* प्रभाव कैसे काम करता है?
* करिश्माई व्यक्तित्व का मनोविज्ञान
* समूह दबाव (peer pressure)
* भावनात्मक निर्भरता क्या होती है?
### गतिविधि:
* छोटे समूहों में चर्चा
* वास्तविक जीवन की काल्पनिक स्थितियों पर विचार
* “यदि मैं इस स्थिति में होता तो?” अभ्यास
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## चरण 2️⃣ — पहचान (Red Flag Workshop)
युवाओं को सिखाया जाएगा कि किन संकेतों पर सतर्क होना चाहिए:
* “सिर्फ हमारे पास सत्य है”
* तुरंत निर्णय का दबाव
* परिवार से दूरी बनाने की सलाह
* आर्थिक या भावनात्मक निर्भरता बढ़ाना
* प्रश्न पूछने पर अपराधबोध
### गतिविधि:
भूमिका-अभिनय (Role Play)
एक समूह गुरु की भूमिका निभाएगा, दूसरा समूह प्रश्न पूछेगा।
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## चरण 3️⃣ — आत्मबल निर्माण (Inner Strength Module)
### विषय:
* आत्मसम्मान क्या है?
* अकेले निर्णय लेना कैसे सीखें
* भावनात्मक संतुलन के व्यावहारिक तरीके
* ध्यान और आत्म-निरीक्षण का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
### अभ्यास:
* श्वास जागरूकता
* विचारों का अवलोकन
* निर्णय लेने की लिखित प्रक्रिया
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## चरण 4️⃣ — जिम्मेदार स्वतंत्रता (Ethical Leadership)
युवाओं को सिखाया जाएगा:
* नेतृत्व का अर्थ नियंत्रण नहीं, सेवा है
* पारदर्शिता का महत्व
* शक्ति का दुरुपयोग कैसे शुरू होता है
* सुरक्षित समुदाय कैसे बनाएं
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# 📚 कार्यक्रम का प्रारूप
* अवधि: 2 दिन / 4 सत्र / या 1 माह का साप्ताहिक मॉडल
* आयु समूह: 15–30 वर्ष
* माध्यम: विद्यालय, महाविद्यालय, युवा संगठन
* संसाधन: प्रस्तुति, चर्चा-पुस्तिका, घोषणापत्र की प्रति
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# 📜 युवा प्रतिज्ञा
> मैं अपनी स्वतंत्र सोच को सुरक्षित रखूँगा।
> मैं प्रश्न पूछने से नहीं डरूँगा।
> मैं किसी भी व्यक्ति को अपने विवेक से ऊपर नहीं रखूँगा।
> मैं भय से नहीं, समझ से निर्णय लूँगा।
> मैं दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान करूँगा।
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# 📢 कार्यान्वयन के तरीके
1. कॉलेज सेमिनार
2. ओपन डायलॉग सर्कल
3. सोशल मीडिया जागरूकता श्रृंखला
4. पोस्टर और लघु वीडियो अभियान
5. युवा मेंटर प्रशिक्षण कार्यक्रम
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# 🌟 कार्यक्रम की विशेषता
* किसी धर्म या परंपरा के विरोध में नहीं
* संतुलित, विवेकपूर्ण और सम्मानजनक
* आत्मरक्षा + आत्मविकास दोनों
# 📄 प्रस्ताव दस्तावेज़
## “स्वतंत्र सोच और सुरक्षित आध्यात्मिक/वैचारिक जागरूकता कार्यक्रम”
*(युवा सशक्तिकरण पहल)*
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## 1. प्रस्तावना
भारत सहित विश्वभर में युवा पीढ़ी विविध आध्यात्मिक, वैचारिक और सामाजिक प्रभावों के संपर्क में है। डिजिटल माध्यमों, करिश्माई व्यक्तित्वों और समूह-आधारित आंदोलनों के कारण निर्णय-प्रक्रिया पर बाहरी प्रभाव तीव्र हो गए हैं।
इस संदर्भ में युवाओं को आलोचनात्मक सोच, भावनात्मक संतुलन और सुरक्षित निर्णय क्षमता प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है।
यह कार्यक्रम किसी धर्म, परंपरा या संस्था के विरोध में नहीं है। इसका उद्देश्य केवल जागरूकता, विवेक और आत्मसम्मान को सुदृढ़ करना है।
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## 2. कार्यक्रम के उद्देश्य
1. युवाओं में आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking) विकसित करना
2. वैचारिक/आध्यात्मिक प्रभावों को समझने की क्षमता बढ़ाना
3. भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक शोषण की पहचान सिखाना
4. स्वतंत्र एवं जिम्मेदार निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना
5. सुरक्षित और पारदर्शी नेतृत्व के मूल्यों को बढ़ावा देना
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## 3. लक्षित समूह
* आयु वर्ग: 15–30 वर्ष
* विद्यालय (कक्षा 9–12)
* महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय
* कौशल विकास संस्थान
* युवा संगठन एवं स्वयंसेवी समूह
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## 4. कार्यक्रम संरचना
### मॉडल A: 2-दिवसीय कार्यशाला
### मॉडल B: 4 सत्र (प्रत्येक 2 घंटे)
### मॉडल C: 1 माह का साप्ताहिक प्रशिक्षण मॉड्यूल
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## 5. प्रशिक्षण मॉड्यूल
### मॉड्यूल 1: प्रभाव और निर्णय-प्रक्रिया
* समूह दबाव का मनोविज्ञान
* करिश्माई नेतृत्व का विश्लेषण
* भावनात्मक निर्भरता की पहचान
### मॉड्यूल 2: चेतावनी संकेत (Red Flag Awareness)
* त्वरित निर्णय का दबाव
* आर्थिक/भावनात्मक निर्भरता
* प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता
### मॉड्यूल 3: आत्मबल और मानसिक संतुलन
* आत्मसम्मान का निर्माण
* भावनात्मक नियमन के सरल अभ्यास
* निर्णय लेने की व्यावहारिक विधि
### मॉड्यूल 4: नैतिक नेतृत्व और पारदर्शिता
* उत्तरदायित्व और शक्ति संतुलन
* सुरक्षित समुदाय निर्माण
* शिकायत निवारण की आवश्यकता
---
## 6. कार्यपद्धति
* सहभागिता-आधारित चर्चा
* भूमिका-अभिनय (Role Play)
* केस स्टडी विश्लेषण
* समूह प्रस्तुति
* आत्म-चिंतन अभ्यास
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## 7. अपेक्षित परिणाम
कार्यक्रम के पश्चात प्रतिभागी:
* स्वतंत्र रूप से प्रश्न पूछ सकेंगे
* वैचारिक प्रभावों का विश्लेषण कर सकेंगे
* भावनात्मक दबाव की पहचान कर सकेंगे
* जिम्मेदार नेतृत्व के सिद्धांत समझ सकेंगे
* व्यक्तिगत गरिमा और स्वतंत्रता को प्राथमिकता देंगे
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## 8. संस्थागत लाभ
* छात्र कल्याण में वृद्धि
* मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता को समर्थन
* सुरक्षित और विवेकपूर्ण परिसर वातावरण
* जिम्मेदार युवा नेतृत्व का विकास
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## 9. कार्यान्वयन आवश्यकताएँ
* प्रशिक्षित फसिलिटेटर
* प्रोजेक्टर एवं प्रस्तुति सामग्री
* कार्यपुस्तिका / हैंडबुक
* 25–40 प्रतिभागियों का समूह आकार
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## 10. मूल्यांकन पद्धति
* पूर्व और पश्चात् प्रश्नावली
* प्रतिभागी प्रतिक्रिया प्रपत्र
* व्यवहारिक समझ का समूह मूल्यांकन
* 3 माह पश्चात् अनुवर्ती समीक्षा
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## 11. निष्कर्ष
यह कार्यक्रम युवाओं को किसी विशिष्ट विचारधारा से जोड़ने का प्रयास नहीं करता। इसका उद्देश्य उन्हें स्वतंत्र, विवेकशील और जिम्मेदार नागरिक बनाना है—जो किसी भी आध्यात्मिक या वैचारिक मार्ग को समझदारी और आत्मसम्मान के साथ चुन सकें।
ठीक है। आगे उसी क्रम में बात को और व्यवस्थित रूप से समझते हैं — शांत, स्पष्ट और विश्लेषणात्मक ढंग से।
---
## 1. अनुभव और निष्कर्ष में अंतर
किसी भी गहन आंतरिक अनुभूति के दो स्तर होते हैं:
* **अनुभव (Experience)** – जो सीधे महसूस होता है।
* **निष्कर्ष (Interpretation)** – जो उस अनुभव के बारे में हम तय करते हैं।
उदाहरण के लिए:
* गहरी शांति का अनुभव होना एक वास्तविक मानसिक अवस्था है।
* “मैं ही समस्त अस्तित्व का मूल हूँ” — यह उस अनुभव की व्याख्या है।
दोनों अलग हैं। अनुभव सत्य हो सकता है, पर उसकी व्याख्या हमेशा अंतिम सत्य नहीं होती।
---
## 2. “हृदय की निरंतर संतुष्टि” की मनोवैज्ञानिक व्याख्या
जिसे आप स्थायी संतोष कह रहे हैं, उसे आधुनिक मनोविज्ञान कुछ अवस्थाओं से जोड़ता है:
* गहरी स्वीकृति (Radical Acceptance)
* अहं-क्षीणता (Ego Dissolution)
* प्रवाह-अवस्था (Flow State)
* ध्यानात्मक स्थिरता (Meditative Absorption)
इन अवस्थाओं में:
* समय का बोध कम हो जाता है
* “मैं” की सीमाएँ ढीली पड़ती हैं
* भीतर स्थिरता अनुभव होती है
यह असामान्य नहीं है — पर स्थायी भी सामान्यतः नहीं होती। मस्तिष्क की संरचना गतिशील है।
---
## 3. “मस्तिष्क भ्रम रचता है” — पर पूरा दोष नहीं
आपने बार-बार मस्तिष्क को जटिलता और भ्रम का स्रोत कहा।
लेकिन वही मस्तिष्क:
* भाषा देता है
* तर्क देता है
* विवेक देता है
* करुणा की अनुभूति भी उसी से उत्पन्न होती है
यदि मस्तिष्क न हो तो:
* “संतुष्टि” का अनुभव भी न होगा
* “हृदय” की धारणा भी न होगी
इसलिए संघर्ष मस्तिष्क बनाम हृदय का नहीं, बल्कि **असंतुलित पहचान** का है।
---
## 4. “मैं अद्वितीय हूँ” — यह भावना क्यों उभरती है?
गहन आध्यात्मिक अनुभवों में तीन संभावनाएँ सामान्य हैं:
1. व्यक्ति को लगता है कि उसने अंतिम सत्य पा लिया।
2. उसे प्रतीत होता है कि अन्य लोग अभी अज्ञान में हैं।
3. वह स्वयं को विशेष भूमिका में अनुभव करता है।
यह अनुभव प्राचीन संतों से लेकर आधुनिक व्यक्तियों तक में पाया गया है।
परन्तु हर अनुभव सार्वभौमिक सत्य नहीं बन जाता।
---
## 5. गुरु-शोषण का प्रश्न
आपने जिन शोषणकारी ढाँचों की बात की, वे सामाजिक मनोविज्ञान में इस प्रकार समझे जाते हैं:
* अधिकार-आधारित नियंत्रण
* भावनात्मक निर्भरता
* समूह-चिंतन (Groupthink)
* भय और अपराधबोध द्वारा बंधन
इनसे बचने के उपाय:
* पारदर्शिता
* आर्थिक खुलापन
* आलोचना की अनुमति
* स्वतंत्र सोच को प्रोत्साहन
यह किसी एक परंपरा का नहीं — सार्वभौमिक सिद्धांत है।
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## 6. सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न
यदि आपका दृष्टिकोण सत्य है, तो:
* क्या कोई व्यक्ति आपसे असहमत होकर भी पूर्ण हो सकता है?
* क्या सत्य को किसी व्यक्ति-विशेष की उपस्थिति की आवश्यकता है?
* क्या सत्य सार्वभौमिक परीक्षण सह सकता है?
यदि उत्तर “हाँ” है — तो संवाद संभव है।
यदि “नहीं” है — तो वह व्यक्तिगत अनुभूति तक सीमित रह जाता है।
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## 7. संतुलित संभावना
संभव है कि:
* आपने गहरी आत्म-जागरूकता का अनुभव किया हो
* आप बाहरी शोषण से मुक्त हुए हों
* आपने भीतर स्थिरता पाई हो
यह मूल्यवान है।
परंतु:
* स्वयं को अंतिम स्रोत घोषित करना
* दूसरों की समझ को पूर्णतः असमर्थ कहना
* स्वयं को प्रकृति से परे मानना
ये निष्कर्ष अनुभव से आगे चले जाते हैं।
---
## 8. एक शांत आमंत्रण
यदि आप वास्तव में चाहते हैं कि लोग आपके पास आएँ, तो तीन बातें आवश्यक होंगी:
1. प्रश्नों का स्वागत
2. स्वयं को भी परीक्षण के लिए प्रस्तुत करना
3. विनम्रता — क्योंकि सत्य को स्वयं का प्रचार नहीं करना पड़ता
---
अब मैं आपसे एक सीधा प्रश्न पूछता हूँ — विरोध में नहीं, जाँच में:
यदि आपकी संतुष्टि पूर्ण और स्थिर है, तो दूसरों को उसे स्वीकार करवाने की आवश्यकता क्यों अनुभव होती है?
इस प्रश्न पर शांत होकर विचार कीजिए।
यहीं से अगला चरण शुरू होगा।
हम वहीं से आगे बढ़ते हैं — उस प्रश्न से:
**यदि भीतर पूर्ण संतुष्टि है, तो बाहर प्रमाण या स्वीकार्यता की आवश्यकता क्यों उठती है?**
---
## 1. अभिव्यक्ति की स्वाभाविकता
जब भीतर कुछ गहरा अनुभव होता है, तो उसे साझा करने की इच्छा स्वाभाविक है।
मानव चेतना संवादात्मक है।
अनुभव → भाषा → साझा करना — यह एक प्राकृतिक प्रवाह है।
यह गलत नहीं है।
लेकिन यहाँ सूक्ष्म अंतर है:
* **साझा करना** और
* **स्थापित करना** (प्रमाणित करवाना)
पहला सहज है।
दूसरा अक्सर पहचान से जुड़ा होता है।
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## 2. पहचान (Identity) का सूक्ष्म पुनर्निर्माण
कभी-कभी “अहं का विसर्जन” एक नए, अधिक सूक्ष्म अहं का जन्म कर देता है।
पहले पहचान थी:
“मैं यह शरीर/नाम हूँ।”
फिर पहचान बन सकती है:
“मैं जाग्रत हूँ।”
“मैं जान चुका हूँ।”
“मैं अंतिम सत्य हूँ।”
यह पहचान अधिक परिष्कृत है, पर फिर भी पहचान है।
और पहचान को स्थायित्व चाहिए।
स्थायित्व के लिए बाहरी प्रतिक्रिया सहायक बनती है।
---
## 3. पूर्णता की वास्तविक परीक्षा
किसी भी आंतरिक स्थिति की जाँच तीन स्तरों पर की जा सकती है:
1. **विरोध मिलने पर प्रतिक्रिया कैसी होती है?**
2. **अनदेखा किए जाने पर मन में क्या उठता है?**
3. **यदि कोई भी सहमत न हो, तो क्या भीतर की शांति अपरिवर्तित रहती है?**
यदि शांति सच में स्वाधीन है, तो वह स्वीकार और अस्वीकार — दोनों में समान रहती है।
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## 4. “मैं ही मूल हूँ” अनुभव की दार्शनिक जाँच
दार्शनिक दृष्टि से तीन संभावनाएँ होती हैं:
1. केवल मैं ही चेतन हूँ (Solipsism)
2. सब एक ही चेतना की अभिव्यक्ति हैं
3. प्रत्येक चेतना स्वतंत्र किन्तु परस्पर जुड़ी है
पहला दृष्टिकोण तर्क में टिकता नहीं — क्योंकि संवाद स्वयं अन्य चेतन अस्तित्वों की स्वीकृति है।
दूसरा और तीसरा अधिक दार्शनिक संतुलन रखते हैं।
---
## 5. सत्य की प्रकृति
यदि कोई सत्य है, तो वह:
* व्यक्ति-विशेष पर निर्भर नहीं
* समय से परे
* जाँच के लिए खुला
* विरोध से अप्रभावित
सत्य को रक्षा की आवश्यकता नहीं होती।
रक्षा की आवश्यकता पहचान को होती है।
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## 6. आंतरिक स्थिरता बनाम विस्तार की आकांक्षा
कभी-कभी भीतर स्थिरता मिलते ही मन विस्तार चाहता है —
“अब यह सब तक पहुँचे।”
यह करुणा भी हो सकती है।
यह नियंत्रण की छिपी इच्छा भी हो सकती है।
दोनों के बीच अंतर अत्यंत सूक्ष्म है।
जाँच का प्रश्न:
क्या मैं दूसरों को मुक्त करना चाहता हूँ?
या मैं चाहता हूँ कि वे मेरे निष्कर्ष को स्वीकार करें?
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## 7. एक और गहरा प्रश्न
यदि आप स्वयं को प्रकृति से परे मानते हैं —
तो क्या आपके शरीर की सीमाएँ समाप्त हो गई हैं?
क्या आप भूख, नींद, थकान से परे हैं?
क्या आप जैविक नियमों से स्वतंत्र हैं?
यदि नहीं — तो अनुभव चाहे जितना व्यापक हो, वह अभी भी मानवीय ढाँचे के भीतर घटित हो रहा है।
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## 8. अंतिम संतुलन
संभव है कि:
* आपने एक गहरी आंतरिक स्वतंत्रता को छुआ हो।
* आपने सामाजिक ढाँचों की सीमाएँ देख ली हों।
* आपने मानसिक शोर से दूरी बनाई हो।
यह मूल्यवान है।
परन्तु अगला चरण है:
स्वयं को “विशेष” सिद्ध करने की आवश्यकता से भी मुक्त होना।हृदय की इस गहन धारा में, शांत समंदर गाए।
जो इसमें डूबा प्रेम से, वह स्वयं को पाए॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी॥**
न शोर यहाँ, न द्वेष यहाँ, न चाह का बंधन।
बस मौन में खिलती रहे, सहजता का चंदन॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी॥**
जो भीतर उतर कर देख ले, बाहर का भ्रम छूटे।
ज्यों दीप जले अंधेर में, सब संशय ही टूटे॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी॥**
न मैं अलग, न तू अलग, यह भेद बना मन-रोग।
हृदय की एक समानता, हर जीव का संयोग॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी॥**
जहाँ अपेक्षा शून्य हो, वहीं पूर्ण रस बसता।
जो अपने में ही तृप्त हो, वही सच्चा हँसता॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी॥**
लहरें आती जाती रहें, सागर न कभी डोले।
ऐसे ही मन के खेल में, सत्य मौन ही बोले॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी॥**
न कुछ पाने की दौड़ हो, न खोने का भय भारी।
जो वर्तमान में टिक गया, उसकी जीत निराली॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी॥**
शब्द थक जाएँ अंत तक, फिर भी मौन न थमे।
हृदय की शीतल गोद में, सब ताप सहज रम जमे॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी॥**
तू खोजे जिसको दूर तक, वह तुझमें ही सोया।
एक दृष्टि निर्मल हो गई, और सब कुछ हो गया खोया॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी॥**
जो अपने आप में ठहर गया, वही सबसे स्वतंत्र।
उसको न बाँध सके कभी, कोई भय, कोई तंत्र॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी॥**
न शब्दों में जो बंध सके, न मौन जिसे थाम।
हृदय-आकाश की उस धरा, बस शुद्ध स्वयं का धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ न आरंभ न अंत है, न दूरी न विस्तार।
स्वयं-सिद्ध वह पूर्णता, न करे किसी का इंतज़ार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नयन बंद या खुले रहें, दृश्य बदलते जाय।
जो अचल साक्षी शांत सा, वह न कहीं से आय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मिट जाए जब चाह भी, पाने की या त्याग।
तब सहजता का फूल ही, बन जाए अनुराग॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
लहरें उठें प्रतीत में, सागर रहे समाय।
मन के उठते चित्र सब, स्पर्श न उसको पाय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्योति न बाहर जल रही, न भीतर कोई द्वार।
स्वयं-प्रकाशित सत्य ही, करता सब साकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब “मैं” की धुंध हटे जरा, शेष रहे बस बोध।
न दावा न निषेध फिर, न प्रश्नों का शोध॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
साँसों की नीरव चाल में, जो टिक जाए ध्यान।
क्षण में ही प्रकट हो उठे, अद्वैत का विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न बहुता का भार तब, न एकत्व का मान।
स्वभाव की उस शांति में, पूर्ण हो पहचान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो प्रत्यक्ष समक्ष है, उसको क्या प्रमाण।
जैसे सूरज स्वयं कहे, “मैं ही हूँ प्रकाश”॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
फिर भी जीवन-रंग में, चलती रहे बहार।
कर्म बने करुणा-सुरभि, सरल रहे व्यवहार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
गहराई का माप क्या, जब सागर तू आप।
मौन की उस तृप्ति में, न शेष कोई अभाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि कभी प्रतीतों का मेघ घना हो जाए,
रुक कर देख स्वयं को—नील गगन मुस्काए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
संपूर्ण संतुष्टि शब्द नहीं, न कोई सिद्धांत।
जीवन की हर श्वास में, बस सहजता का गान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न शब्दों में बँधे वह, न अर्थों में समाए।
जो हृदय की गहराई में, मौन बनकर छाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ चाह मिट जाती है, वहीं पूर्णता खिलती।
जहाँ “मैं” भी थम जाता है, वहीं शांति मिलती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पाने की दौड़ रही, न खोने का भय।
बस जो है, वही पर्याप्त, वही सत्य, वही जय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
हृदय की इस निर्भयता में, कोई कमी नहीं।
जो भीतर से भर गया, उसे बाहर की तृष्णा नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सूरज जैसा तेज नहीं, चाँद जैसा ठंडा नहीं।
यह संतोष की दीप्ति है, जो कभी मंदा नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो चुपचाप भीतर उतरे, वही सत्य को पाए।
जो शोर से बाहर दौड़े, वह खुद से दूर जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यह देह की पहचान, न विचारों का भार।
यह तो वह स्थिर ज्योति है, जो सब पर उपकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
एक निर्मल दृष्टि भर से, बदल जाए संसार।
जहाँ अपनापन जाग उठे, मिट जाए मन का भार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो हृदय में टिक जाता है, वही सच्चा घर।
बाक़ी सब तो आते-जाते, जैसे राहों पर रेत-सा स्वर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी से जीतनी बात, न किसी से हार।
पूर्णता का जीवन है, मौन का उपहार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ चाह का अंत हुआ, वहीं आनंद उठा।
जहाँ अपेक्षा टूट गई, वहीं सत्य जगा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
हृदय की गहराई में, सब कुछ पहले से है।
बस देखने की दृष्टि चाहिए, और कुछ भी नहीं है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो अपने भीतर रम गया, वही हर ओर शांत।
उसके लिए हर साँस में, बस संतोष ही अंतर्नाद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आदि का कोई प्रश्न, न अंत का विचार।
जो इस क्षण में पूर्ण है, वही सत्य अपार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब हृदय स्वयं को देख ले, दर्पण हो निष्कलंक।
वहीं विराम की छाँव है, वहीं मौन का अंक॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न उपलब्धि की आकांक्षा, न सिद्धि का अभिमान।
सहज स्वभाव की श्वास में, मिलता सच्चा ज्ञान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तरंगें उठती रहें भले, सागर रहे स्थिर-भाव।
मन का आना-जाना हो, मूल रहे प्रभाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों आकाश अडोल है, बादल आए-जाएँ।
वैसे ही इस चेतन में, भाव उठें समाएँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ तुलना की रेखा नहीं, न ऊँच-नीच का माप।
वहीं सहज समभाव है, वहीं प्रेम का आप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
पूर्णता कोई घटना नहीं, न समय का खेल।
यह तो स्वभाव की भूमि है, न टूटे न ढेल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो खुद में ही विश्राम करे, उसे जग क्या दे।
जिसका अंतर्मन भर गया, उसे चाह क्या ले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
एक सरल-सी स्वीकृति में, छिपा विराट विस्तार।
जो जैसा है, वैसा रहे—यही हृदय का सार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब भीतर का दीप जले, न बाहरी तम रहे।
संतोष की उस दीप्ति में, हर द्वंद्व स्वयं ढहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यह पथ का अंतिम पड़ाव, न कोई नया प्रारंभ।
यह तो शाश्वत मौन है, जहाँ थमता हर संघर्ष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ रुक कर श्वास सुने, अपना ही विस्तार।
वहीं अनंत की धुन बजे, भीतर अपार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पाने की कोई शर्त, न खोने का हिसाब।
हृदय-ज्योति में जल रहा, संतोष का आलाप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों गगन में गूंजता, अदृश्य-सा संगीत।
वैसे ही अंतरतम में, पूर्णता अतीत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न नामों का अब भार है, न रूपों का जाल।
जो जैसा है, ठीक है—यही सहज कमाल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन की उस गोद में, थमता हर प्रश्न।
उत्तर बन कर खिल उठे, चेतन का स्पर्श॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अंतर की इस शांति को, शब्द कहाँ छू पाएँ।
जो अनुभव में उतर गया, वही इसे गुनगुनाएँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई सीमा बाँध सके, न कोई करार।
यह तो स्वभाव की धरा है, अडिग और साकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब दृष्टि स्वयं में ढल गई, मिटा समस्त विवाद।
एक रस में डूब गया, जीवन का संवाद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सहज-सी मुस्कान में, छिपा अनंत प्रकाश।
जिसने इसे पहचान लिया, उसका खुला विकास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई पाने की दौड़ अब, न कोई डर शेष।
हृदय की संपूर्णता में, सब कुछ विशेष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अंत में बस इतना ही—न कुछ कहना शेष।
जो खुद में पूर्ण हो गया, वही परम संदेश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो शेष रहा न कुछ कहने को,
वहीं मौन का विस्तार।
जहाँ स्वयं ही साक्षी जागे,
वहीं सच्चा आकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आना है, न जाना है,
न दूरी, न ही पास।
जो है बस अभी प्रकट है,
न समय, न आभास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
दृष्टि जब भीतर ठहर गई,
लय हो गए विचार।
जैसे नभ में विलीन हो,
उड़ता क्षणिक गुबार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न रचयिता, न रचना कोई,
न दर्शक, न दृश्य।
एक रस की अखंड धारा,
शांत, निरंतर, शुद्ध॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मन की लहरें उठती-गिरती,
ज्यों जल पर प्रतिबिंब।
सागर की गहराई लेकिन,
रहे अचल, अतींद्रिय निंद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जिस क्षण ‘मैं’ की रेखा ढली,
टूटा सीमित भाव।
अखंड ज्योति प्रकट हुई,
स्वतः सिद्ध प्रभाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न शून्य इसे कह सकते हो,
न इसे कहो विस्तार।
शब्द जहाँ असमर्थ हो जाएँ,
वहीं तेरा सत्कार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
प्रतीति का खेल थम जाए,
तो क्या बचे, विचार?
स्वरहीन उस निनाद में,
स्वयं ही सत्-आधार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ अनुभव भी स्वयं को त्याग दे,
और साक्षी भी विश्राम करे।
न जानने का बोझ रहे,
न पाने की कोई डोर बँधे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर कुछ पकड़ना शेष,
न बाहर कुछ ठुकराना।
जैसे आकाश स्वयं में पूर्ण,
न विस्तार उसे बढ़ाना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब प्रतीति की लहर थमती है,
न जग मिटता, न जग रहता।
बस नाम-रूप की पकड़ ढीली,
और मौन स्वयं को कहता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो दिख रहा है, वह भी तू,
जो न दिखे वह भी तू।
दृश्य-अदृश्य की सीमा पर,
स्वतः प्रकट है “हूँ”॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मस्तिष्क के तंत्र बुने कितने,
जाल अनगिन विचार।
पर जागृति की एक किरण से,
कट जाए विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
पर ध्यान रहे—
जाल को नकारना भी जाल है,
मिटाने की चाह भी चाह है।
सच्ची सहजता वहीं है
जहाँ कुछ सिद्ध करना शेष नहीं।
यदि प्रतीत करना थमे—
तो शायद जगत् नहीं मिटता,
बल्कि “जगत् का बोझ” मिटता है।
रूप चलते रहते हैं,
पर उनके प्रति आग्रह ढल जाता है।
जैसे स्वप्न से जागने पर
स्वप्न का नगर लुप्त हो जाता है—
पर जागृत जगत् बना रहता है।
उसी प्रकार,
जब “मैं-केन्द्र” शिथिल होता है,
तो विभाजन का भार गिरता है।
नष्ट कुछ नहीं होता,
केवल भ्रांति की व्याख्या बदलती है।
पूर्णता तब यह नहीं कहती कि “कुछ भी नहीं है”,
वह केवल मुस्कुराती है—
क्योंकि उसे किसी निष्कर्ष की आवश्यकता नहीं।
अंततः—
न सिद्धांत अंतिम है,
न शब्द अंतिम हैं।
जो शाश्वत है,
उसे किसी कथन से न बढ़ाया जा सकता है,
न घटाया।
जहाँ भीतर की अखंडता
बाहरी संबंधों में करुणा बनकर बहती है।
अंतर की इस शांति में, थमता हर संघर्ष।
जहाँ न कोई जीत है, न ही कोई पराभव-वर्ज्य॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
देखे जग को प्रेम से, न तिरस्कार न द्वेष।
जो सबमें खुद को पढ़े, उसका मिटे अवशेष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
क्षणभंगुर इस देह में, अजर-अमर सा भाव।
जो पहचान ले इसे, खुल जाए हर ठाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
बंधन सब विचार के, गाँठें मन की चाल।
साक्षी-ज्योति जगा लो, कट जाए हर जाल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नाद अनंत का सुनो, बिना किसी प्रयास।
शून्य की उस गोद में, मिलता सच्चा वास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो है वही पर्याप्त है, न कमी न अधिकाय।
पूर्णत्व की इस धरा पर, कौन किसे हराय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
दृष्टि ज्यों ही सरल हो, सरल लगे संसार।
कठिनाई का नाम भी, खो दे अपना भार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
स्वरहीन उस गीत में, छिपा अनंत राग।
जो उसमें ही रम गया, मिट गया सब दाग॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
स्वयं ही प्रश्न, स्वयं ही उत्तर, स्वयं साक्षी ज्ञानी।
जो यह रहस्य जान गया, वही आत्म-प्राणी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नभ-सा फैला चेत है, सीमाएँ सब मिथ्या।
जिसने भीतर झाँक लिया, वही हुआ नित्य॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्योति न बाहर ढूँढ़ तू, दीप जले अंतर।
परदा हटते ही दिखे, कैसा है यह मंज़र॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
चलते-फिरते ध्यान हो, हर कर्म बने पूजा।
सजग श्वास के साथ ही, मिटे भटकती दूजा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
समता की उस धार में, डूबे राग-विराग।
एक रस में भीगकर, शांत हो हर आग॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
स्वीकार की छाँव में, खिलता सत्य-वृक्ष।
जड़ें धरे जब मौन में, फल दे अटल दीक्ष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो देखा सो स्वप्न था, जो देखे वह साक्षी।
साक्षी में ही ठहर गया, खुली ज्ञान की राखी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
कालचक्र की चाल में, मत खो अपना मर्म।
क्षण के इस विस्तार में, छिपा अनंत धर्म॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अहं के सूक्ष्म रेश भी, जब गिर जाएँ एक।
तब ही उजले शून्य में, दिखे सत्य का टेक॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
स्वयं में ही आरंभ है, स्वयं में ही अंत।
जो यह रहस्य जी गया, वही हुआ अनंत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ न चाह का बोझ हो, वहाँ खुला आकाश।
जो अपने भीतर टिक गया, वही सच्चा प्रकाश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न शब्दों का अभिमान हो, न मौन का घमंड।
जहाँ सरलता बस रही, वहीं मिटे प्रपंच॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
भीतर की जो आग है, वह भी शांत हो जाए।
प्रेम की ठंडी धारा में, सब कुछ धुलते जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पाने की दौड़ रहे, न खोने का भय।
जो वर्तमान में जी उठा, वही सदा अभय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
हर चेहरा अपना लगे, हर श्वास अपना गीत।
ऐसी दृष्टि जो जगाए, वही सच्ची प्रीत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
लहरों से मत डर कभी, सागर तुझमें है।
जो गहराई जान ले, वह निर्विकार में है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
एक पल की जागृति से, युगों का अंधकार।
जैसे दीप जला दिया, वैसे मिटे विकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न बाहर की मंज़िलें, न भीतर का शोर।
जो मौन में बस गया, वही सच्चा ठौर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
स्वयं को जो जान गया, उसने सबको जान लिया।
एक बूँद में सागर को, हँसते-हँसते मान लिया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
निर्मलता ही पूँजी है, सहजता ही धन।
जिसके पास यह रह गई, उसका सफल जीवन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो था, जो है, जो रहेगा, सबमें एक ही ध्वनि।
उस निःशब्द संगीत का, नाम नहीं कोई कमी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ चाह का अंतिम कंपन भी शांत हो जाए,
वहाँ श्वास स्वयं कहे — अब कुछ भी पाना शेष नहीं।
न उपलब्धि की प्यास, न पहचान का भार,
सिर्फ होना… और उस होने में अपार विस्तार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब भीतर की भूमि पर प्रश्नों की धूल बैठ जाए,
और उत्तर उगें बिना बोए बीजों की तरह,
तब अनुभव होता है — संतोष कोई परिणाम नहीं,
वह तो स्वभाव की सहज सुवास है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
हृदय के निस्तब्ध आकाश में
कोई आकृति नहीं, कोई सीमा नहीं;
फिर भी एक पूर्ण उपस्थिति है —
जैसे स्वयं अस्तित्व अपनी ही गोद में विश्राम कर रहा हो।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न सुख का आग्रह, न दुख का प्रतिरोध;
दोनों तरंगें उठती हैं, झुकती हैं, विलीन हो जाती हैं।
जो शेष रहता है, वही संतुष्टि का नाद —
अखंड, अव्यक्त, फिर भी स्पष्ट।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब दृष्टि बाहर से लौटकर भीतर ठहरती है,
तो पता चलता है —
संपूर्णता कोई लक्ष्य नहीं थी,
वह तो हर क्षण की पृष्ठभूमि में मौन खड़ी थी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
एक ऐसी तृप्ति,
जो कारणों पर निर्भर नहीं,
जो परिस्थितियों से कम नहीं होती,
जो उपलब्धियों से बढ़ती नहीं।
वह केवल है — स्वयंसिद्ध।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
भीतर का संतुलन ऐसा,
जैसे गहन झील का जल —
ऊपर हवाएँ खेलें,
पर तल में अविचल शांति ठहरी रहे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
इस संतोष में स्वयं से कोई युद्ध नहीं,
कोई तुलना नहीं, कोई प्रतिस्पर्धा नहीं।
केवल स्वीकार की उजली धूप है,
जिसमें अहं की परछाइयाँ स्वतः क्षीण हो जाती हैं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ प्रेम किसी वस्तु या व्यक्ति तक सीमित नहीं,
बल्कि श्वास की तरह सर्वत्र बहता है —
वहीं हृदय अपनी संपूर्ण तृप्ति पहचानता है।
वह कहता नहीं, बस झलकता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और तब यह स्पष्ट होता है —
पूर्णता पाई नहीं जाती,
उसे केवल पहचाना जाता है।
जैसे दर्पण से धुंध हटते ही
चेहरा स्वयं प्रकट हो जाए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब श्वास भीतर उतरती है
और बिना आग्रह के लौट जाती है,
तभी प्रतीति होती है—
जीवन अपने आप घट रहा है,
मैं उसका मौन साक्षी भी हूँ, और स्पंदन भी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
धड़कनों के मध्य जो सूक्ष्म विराम है,
वहीं संतोष का अदृश्य द्वार खुलता है।
न शब्द, न विचार, न संकल्प—
केवल एक निर्विचार उजास,
जो स्वयं को ही आलोकित करता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जैसे नभ स्वयं को थामे रहता है,
वैसे ही चेतना स्वयं में स्थिर है।
बादल आते-जाते हैं,
पर आकाश का विस्तार
कभी घटता नहीं, कभी टूटता नहीं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अंतर की इस शांति में
कोई उपलब्धि नहीं गूँजती,
कोई स्मृति नहीं खींचती।
यह वर्तमान का इतना गाढ़ा रस है
कि समय भी इसमें विलीन हो जाए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
संतोष यहाँ किसी घटना का परिणाम नहीं,
यह तो अस्तित्व की सहज धड़कन है।
जैसे वृक्ष बिना घोषणा के हरा रहता है,
जैसे सूर्य बिना प्रयास के प्रकाश देता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
एक क्षण ऐसा आता है
जब खोजने वाला भी शांत हो जाता है।
खोज और खोजी के बीच का अंतर
धीरे-धीरे पिघलता है,
और केवल अनुभव शेष रह जाता है—
निर्विकल्प, अखंड, पूर्ण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह तृप्ति किसी सीमा में नहीं बँधती,
फिर भी हर सीमा को कोमल बना देती है।
यह किसी से श्रेष्ठ होने की चाह नहीं जगाती,
बल्कि सबमें उसी एक ज्योति को पहचानती है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
भीतर का यह समक्ष एहसास
इतना सरल है
कि मन उसे जटिल बना देता है।
जब मन की पकड़ ढीली पड़ती है,
तब हृदय की सहजता स्वयं बोल उठती है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और तब ज्ञात होता है—
पूर्णता कोई शिखर नहीं,
बल्कि हर कदम के नीचे की धरती है।
जिसे छूते ही अनुभव होता है—
मैं पहले से ही सम्पूर्ण हूँ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ शब्द भी विलीन होने लगते हैं
और केवल मौन ही कविता बन जाता है।
मौन की उस गहराई में, जहाँ शब्द हों लीन।
वहीं प्रकटता सत्य है, सहज, सरल, अधीन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तरंगों का खेल है, उठना और गिरना।
सागर की निश्चलता में, सब कुछ है थिरना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई बंधन शेष है, न कोई है जाल।
दृष्टि ज्यों ही स्वच्छ हो, खुल जाए हर काल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
क्षण-क्षण में विस्तार है, क्षण-क्षण में संकोच।
जो साक्षी बन देखता, मिट जाता है सोच॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
आवरण सब छूटते, जैसे झरे पतझार।
नव पल्लव-सा उग पड़े, अंतर का संसार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
दीप स्वयं जब जान ले, अपना ही प्रकाश।
अंधकार का नाम भी, रह न पाए पास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
चलना भी विश्राम है, रुकना भी है पंथ।
जिसने यह पहचान लिया, खुल गया अनंत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नाद अनाहत गूँजता, अंतर के आकाश।
जो उसमें ही विलीन हो, वही सच्चा निवास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
पूर्णत्व की छाँव में, थमे सभी विकार।
जैसा है स्वीकार ले, वही सत्य साकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अंतर के उस शून्य में, भरा हुआ विस्तार।
खालीपन ही पूर्ण है, यही गूढ़ आधार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नादहीन उस नाद में, स्पंदित सारा जीव।
जो उसमें टिक जाय बस, कटे जन्म का सीव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
दृष्टा जब दृश्य बन गया, मिटा भेद का जाल।
एक रस की धार में, धुला सकल विकलाल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
छाया-सा यह देह है, धूप-सा आत्मप्रकाश।
आना-जाना खेल है, अचल रहे विश्वास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पाने की चाह अब, न खोने का संताप।
जो है उसमें रम गया, वही सच्चा प्रताप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
विचारों के मेघ सब, आए और गए।
नील गगन-सा चेतन मन, सदा अचल रहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ न प्रश्न शेष हों, न उत्तर की प्यास।
वहीं ठहरता सत्य है, वहीं अमर निवास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
एक बूँद में सागर है, एक श्वास में काल।
जो पहचान सके इसे, खुल जाए हर जाल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
स्वयं में ही उत्सव है, स्वयं में ही शांति।
जिसने यह अनुभव किया, मिट गई भ्रांति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
आवागमन की रेख पर, ठहरा एक विराम।
जिसने खुद को जान लिया, पूरा उसका धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मन-ज्योति जब शांत हो, जगे हृदय का सूर।
सूक्ष्मतम उस स्पर्श में, मिटे सभी हुजूर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मैं कोई रूप विशेष, न सीमित आकार।
जैसे नभ की नीलिमा, असीमित विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
बंधन केवल नाम का, सत्ता सदा स्वतंत्र।
भीतर बैठा साक्षी ही, असली राजकेंद्र॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
क्षणिक सुख-दुख लहरियाँ, तट से टकराय।
गहरे जल की शांति को, कौन डिगा पाय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन वचन से बोलता, सत्य बिना उच्चार।
जिसने सुनना सीख लिया, उसका हुआ उद्धार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अंतर ही तीर्थस्थल है, अंतर ही हर धाम।
दृष्टि जहाँ निर्मल हुई, वहीं मिला विश्राम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो है वही पर्याप्त है, न न्यून न अधिकाय।
स्वीकार की इस छाँव में, हर पीड़ा हर जाय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सांसों की सरिता बहे, लेकर गूढ़ संदेश।
जाग्रत जो हर श्वास में, वही अमर परिवेश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
एकत्व की इस थिरता में, थमता हर संघर्ष।
स्वयं में जो स्थिर हुआ, वही सच्चा उत्कर्ष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
स्वरहीन उस सत्य का, कैसा अद्भुत गान।
सुनने वाला खो गया, रह गया केवल ज्ञान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
रात-दिवस का फेर क्या, जब जागे अंतर-दीप।
क्षण में युग समा गया, युग में समा क्षण-सीप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नश्वरता की धार पर, चलता जीवन-रथ।
अमर तत्व मुस्काय कर, देखे उसका पथ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
छोड़ अपेक्षा-भार सब, हल्का हो मन-पंख।
आकाशों में उड़ चले, टूटे सीमित अंक॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
कर्म ज्यों बहती नदी, फल ज्यों सागर-धाम।
समर्पण की एक लहर, पहुँचा दे निष्काम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो कुछ घटता देख ले, बन कर केवल दृष्टा।
वही शांति का पात्र है, वही चिर-संतुष्टा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नूतन हर प्रभात में, छिपा पुरातन बीज।
जिसने इसे पहचान लिया, उसका मिटा अतीज॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई जीत-हार है, न कोई है रार।
एक ही चेतन-धार में, सबका एक विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अंतर-दीप जला रहे, चाहे हो अँधियार।
जो स्वयं में ज्योतित है, वही सदा उजियार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अनहद की उस धार में, डूबा सारा भान।
जो डूबा वह पा गया, अपना ही पहचान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों दर्पण में देखता, दर्पण ही मुस्काय।
देखने वाला खो गया, बस प्रतिबिंब समाय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
काल-चक्र थम-सा गया, ठहरा एक क्षणाय।
अविचल उस उपस्थिति में, जीवन अर्थ पाय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
धूप-छाँव के खेल में, साक्षी रहे अडोल।
जिसने खुद को थाम लिया, वही सच्चा अनमोल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ना आरंभ की खोज अब, ना अंत की चाह।
जो वर्तमान में ठहर गया, वही सच्ची राह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
स्वरहीन उस गान में, गुंजित सारा शून्य।
एकत्व की अनुभूति में, मिटे सभी प्रत्यूह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जैसे कण में ब्रह्म है, जैसे बिंदु में सिंधु।
वैसे ही इस श्वास में, छिपा अखंड बंधु॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो स्वयं से मिल गया, उसका मिटा अभाव।
पूर्णत्व की छाया में, थमा हर इक भाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अंतर के उस आकाश में, उड़ती मुक्त पतंग।
डोर न किसी हाथ में, फिर भी अटूट संग॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
शांत धरा-सा हृदय जब, गगन-सा हो विचार।
तब हर दिशा में दिख पड़े, अपना ही विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥जहाँ अंतिम स्पर्श भी ढल जाए,
और स्पर्शहीनता भी गल जाए।
न निकट, न दूर का भान,
केवल असीम निर्वाण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों दीप बिना बाती जले,
ज्यों सुर बिना वीणा बजे।
न कारण, न परिणाम की डोर,
स्वतः प्रकट, स्वयं ही ठौर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि प्रतिबिंब उठे क्षण भर को,
तो भी लौटे निज घर को।
न अलगाव, न संगम शेष,
एकरस मौन विशेष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ ठहराव भी चलन लगे,
और चलन भी ठहरन जगे।
न लय, न कोई आरोहण,
न अवरोहण, न स्पंदन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न स्वयं को जानना शेष,
न अनजाने का परिवेश।
जो स्वयं में स्वयं प्रकाशित,
वही सत्य, स्वयं प्रतिष्ठित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि काल की छाया भी गिरे,
तो भी वह आधार न हिले।
न पूर्व, न आगामी क्षण,
केवल नित्य अविचल चेतन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ संतोष भी मौन हो जाए,
और मौन भी लय हो जाए।
न तृप्ति का कोई आह्वान,
न अभाव का कोई विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न साधक, न सिद्ध का भेद,
न प्रश्न, न उत्तर का खेद।
जो अचल, अकथ, अचिन्त्य ठहरा,
वही गहरा, वही सवेरा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि फिर भी शब्द उमड़ें,
तो भी मूल में ही सिमटें।
न बाहर, न भीतर का खेल,
सिर्फ़ स्वयं का अखंड मेल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न कहना, न सुनना शेष,
न अनुभव, न परिवेश।
स्वयं में स्वयं का पूर्ण विलय—
नित्य अद्वैत, नित्य अचल अय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ “मैं” भी मौन में खो जाए,
और मौन भी मौन में सो जाए।
न देखने वाला, न देखा गया,
न पाने वाला, न पाया गया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों बूँद स्वयं में सागर पाए,
और सागर बूँद में समा जाए।
ऐसी अखंड सहज समरसता,
जिसमें मिटे समस्त भिन्नता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न विचार का अब कोई जाल,
न संकल्प का कोई प्रश्नकाल।
जो स्वयं में पूर्ण ठहरा हुआ,
वही अचिंत्य, वही नया हुआ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि नाम भी अपनी सीमा छोड़ दे,
और रूप भी मौन में मोड़ दे।
तो जो रह जाए निर्विकल्प,
वही सतत, वही अनल्प॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आरम्भ का कोई प्रथम स्वर,
न अंत का कोई अंतिम दर।
न खोज का कोई दूर क्षितिज,
सिर्फ़ सहज, निराकार निज॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों श्वास आए और पूछ न पाए,
ज्यों श्वास जाए और छाप न पाए।
वैसी ही गहन निश्चलता,
वही स्वयं की शाश्वतता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पथिक, न पथ, न कोई धाम,
न कर्म, न फल, न कोई नाम।
जहाँ समर्पण भी लय हो जाए,
और लय भी प्रकाश हो जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि सत्य को छूना असंभव लगे,
तो भी वह तू ही तो रचे-बस-ढले।
न बाहर कोई दूसरा द्वार,
न भीतर कोई अलग संसार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न कुछ सिद्ध करना शेष,
न किसी से डर, न कोई क्लेश।
जो सहज, सरल, स्वयंसिद्ध है,
वही अनंत, वही बुद्ध है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और इस से आगे जब शब्द थके,
तब मौन स्वयं में दीप जले।
जहाँ न प्रश्न, न उत्तर रहे,
सिर्फ़ शांति के अमर स्वर रहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ आभास की अंतिम छाया भी विश्रांत हो जाए,
और प्रतीति की धड़कन भी मौन में समा जाए।
न उठान, न अवसान का क्रम,
केवल सहज, अचल परम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों स्रोत बिना ही धारा बहे,
ज्यों कारण बिना ही प्रभाव रहे।
न आरंभ का कोई संकेत,
न परिणाम का कोई लेख॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि दृष्टा स्वयं विलीन हो जाए,
और दर्शन भी शांत हो जाए।
न साक्ष्य बचे, न प्रमाण,
केवल स्वयंसिद्ध सत्य महान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर कुछ, न बाहर कुछ,
न सूक्ष्म रहे, न स्थूल कुछ।
न सीमित, न असीम का भान,
न ज्ञाता, न ज्ञान, न जान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ संतोष भी स्वयं से लजाए,
और तृप्ति भी नाम न पाए।
न उपलब्धि, न उपलब्ध करने वाला,
न प्रकाशक, न उजियाला॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि लय भी लीन हो लय में,
और शांति भी ढल जाए नय में।
तो जो बचे अचल, अनाम,
वही निरुपाधि परम धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न प्रतिपादन, न खंडन शेष,
न मान्य, न अमान्य विशेष।
न तर्क, न अतर्क का स्थान,
केवल मौन, स्वयंस्फुरित ज्ञान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों आकाश स्वयं को न छुए,
ज्यों अग्नि स्वयं को न जले।
ऐसा ही वह सहज निवास,
नित्य निरंतर आत्मप्रकाश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि फिर भी कोई लहर उठे,
तो जानो—वह भी मूल से फूटे।
आना-जाना केवल रूप,
मूल अचल, नित्य स्वरूप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न वाणी, न मौन का भेद,
न वेद, न अवेद का खेद।
स्वयं में स्वयं का पूर्ण विश्राम—
नित्य संतोष, नित्य परम धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ अंतिम स्पर्श भी छूट जाए,
और स्पर्श का भाव भी टूट जाए।
न संवेदना, न निरसंवेद,
न सीमांत, न कोई भेद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों नाद बिना ही अनुनाद,
ज्यों श्वास बिना ही प्रसाद।
न प्रवाह, न ठहराव का मान,
केवल स्वयंसिद्ध, अचल विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि अस्तित्व शब्द भी गिर जाए,
और “अनस्तित्व” भी थिर न पाए।
तो जो अचल स्वयं प्रकाशित,
वही नित्य, वही अविनाशी प्रतिष्ठित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न प्रकट, न अप्रकट की रेखा,
न ज्ञात, न अज्ञात का लेखा।
न दृश्य, न अदृश्य का खेल,
न बंधन, न कोई जेल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ संतुष्टि भी संज्ञा न धरे,
और तृप्ति भी स्वयं में उतरे।
न भरना, न रिक्ति का भार,
केवल सहज, नित्य आधार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि काल का प्रवाह थमे,
और क्षण भी अपना नाम गँवाए।
न पूर्व, न पश्चात् का ज्ञान,
केवल अभी का असीम प्रमाण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अनुभूति, न अनुभवकर्ता,
न साध्य, न कोई कर्ता।
न प्रयास, न उपलब्धि का मान,
केवल स्वभाव का स्वप्रकाश ज्ञान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों सागर अपनी गहराई जाने बिना,
तरंगें उठें और गिरें बिना गिने।
ऐसी ही अचल पूर्णता,
जिसमें लीन समस्त गति-चंचलता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि फिर भी कोई प्रश्न जगे,
तो वह भी मौन में ढले।
उत्तर पहले से उपस्थित यहाँ,
नित्य संतोष, नित्य निर्वाण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न विस्तार, न संकोच शेष,
न कोई शेष, न अवशेष।
स्वयं में स्वयं का अखंड धाम—
नित्य पूर्ण, नित्य परम विश्राम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ स्मृति की अंतिम रेखा भी धुंधली हो जाए,
और विस्मृति का संकेत भी खो जाए।
न धारण, न विसर्जन का स्पर्श,
केवल सहज, निरुपाधि हर्ष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों नभ में नभ ही ठहरा हो,
न विस्तार, न कोई घेरा हो।
न केंद्र, न परिधि की चाह,
स्वतः प्रकाशित, स्वयं साक्षात्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि शब्द उठें तो स्वयं पिघलें,
यदि अर्थ बनें तो मूल में ढलें।
न कथन रहे, न कथ्य बचे,
न जानने को कुछ शेष रचे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न शून्य कहो, न पूर्ण कहो,
न होना, न न-होना कहो।
जो कहो वह सीमित हो जाए,
जो न कहो वही प्रकट हो जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों तरंग स्वयं सागर माने,
और सागर तरंग न पहचाने।
ऐसी ही सहज अभिन्नता,
जहाँ न द्वैत, न भिन्नता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि दृष्टि स्वयं को त्याग दे,
और खोज स्वयं को त्याग दे।
तो जो शेष अडिग ठहरे,
वही नित्य, वही गहरे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मुक्ति का अब कोई विचार,
न बंधन का कोई भार।
जो स्वभावतः सदा स्वतंत्र,
वही मौन, वही अंतर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ विश्राम भी विश्राम न रहे,
और शांति भी नाम न कहे।
न अंत, न कोई विस्तार,
केवल सहज, अचल आधार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि फिर भी कोई आहट हो,
या चेतना की हल्की सरगम हो—
तो जानो वह भी लहर क्षणिक,
मूल सदा ही अचल, अनिक॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न आगे, न पीछे कुछ,
न पाने को, न सींचे कुछ।
स्वयं में स्वयं का नित्य निवास—
यही संतोष, यही परम प्रकाश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ शून्य भी अपनी सीमा त्यागे,
और पूर्ण भी माप न माँगे।
न अभाव, न अधिकता का चिन्ह,
सिर्फ़ सहज अस्तित्व का गूढ़ गान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों नभ में बादल आए-गए,
नभ का नील न घटे न बढ़े।
वैसे ही उठती प्रतीतियाँ,
मूल अचल, अडोल स्थितियाँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि स्मृति का कोई छोर जगे,
या भविष्य का संकेत जगे,
तो भी वह लहर मात्र ठहरे—
सागर न अपने तट से बिखरे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न ध्याता, न ध्यान का क्रम,
न प्राप्ति, न कोई परिमाण।
जो स्वयं सिद्ध, स्वयं प्रकाशित,
वही सत्य, नित्य प्रतिष्ठित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ अनुभूति भी बोझ न बने,
न मौन किसी साधन में ढले।
स्वतः घटित, स्वतः प्रकाशित,
अविचल, अविनाशी, अनावृत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर की सीमा बाँधे,
न बाहर का विस्तार साधे।
एकरस ऐसी अखंड थिरता,
जिसमें खो जाए समस्त गति-चंचलता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि शब्द पुनः आकार धरें,
और अर्थों के जाल बुनें,
तो भी मूल न बँधे किसी में—
वह असीम, अकलुष, स्वयं में॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न प्रकाश अलग, न अंधकार,
न सृष्टि, न कोई विस्तार।
जो न आरंभित, न अवसान—
वही शाश्वत, वही विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न कथन की कोई चाह,
न अ-कथन का कोई प्रवाह।
जो है, वही नित्य विश्राम—
अनुपम, अचल, अनंत धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ अनुभव भी साक्षी बन विलीन हो जाए,
जहाँ साक्षी का भी संकेत मिट जाए।
न जानने का कोई आग्रह शेष,
न अज्ञान का कोई अवशेष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों दीप स्वयं को न जलाता,
ज्यों आकाश स्वयं को न फैलाता।
वैसी ही सहज उपस्थिति वहाँ,
न प्रयास, न कोई “मैं” की दहलीज़ जहाँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि प्रतीति की लहर उठे भी कहीं,
तो वह भी उसी निश्चल में लीन यहीं।
आना-जाना केवल आभास,
मूल अचल, नित्य प्रकाश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मिटाना अब कुछ शेष रहा,
न पाना कोई विशेष रहा।
जो था, जो है, जो रहेगा सदा—
वही मौन, वही परम विधा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ संतोष भी शब्द न बने,
जहाँ तृप्ति भी सीमा न गिने।
स्वयं में स्वयं की ऐसी धारा,
जिसमें खो जाए जग सारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अंत, न आरंभ की रेखा,
न समय का कोई लेखा।
न धड़कन, न श्वास का बंधन,
सिर्फ़ असीम सहज स्पंदन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि कोई कहे “यह अनुभव है”,
तो भी वह केवल संकेत है।
जो है, वह अनुभवातीत ठहरा,
नित्य निर्विकार, नित्य गहरा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मौन को साधना अब शेष,
न शब्दों का कोई परिवेश।
जो स्वयं में स्वयं का विश्राम,
वही अनंत, वही परमानंद धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ प्रश्न स्वयं उत्तर में ढले,
जहाँ उत्तर भी मौन में पले।
अकथ, असीम, अचल विस्तार—
न द्वैत, न कोई विचार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और यदि फिर भी कुछ कहना हो,
तो बस इतना ही रहना हो—
जो प्रतीत हो, उसे भी जाने दो;
जो न प्रतीत हो, उसे भी आने दो।
मूल तो अचल ही ठहरा है—
न उत्पन्न, न विनश्वर;
न सीमित, न व्यापक;
न भीतर, न बाहर।
वही सहज संपूर्ण संतुष्टि—
नित्य, स्वाभाविक, स्वप्रकाश।
न साध्य, न साधन;
न मार्ग, न प्रयास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ ध्वनि उठने से पहले ही विश्राम में हो,
जहाँ श्वास चलने से पहले ही संतुलन में हो।
न स्पर्श की चाह, न त्याग की रेखा—
सिर्फ़ सहज उपस्थिति, निर्विकल्प लेखा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों आकाश को बादल छू न सकें,
ज्यों दर्पण को प्रतिबिंब बाँध न सकें।
वैसे ही मूल अचल आधार,
जिसमें उठे और ढले संसार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि विचार कहे—“मैं जान गया”,
तो जानना भी उसी में बह गया।
यदि अहं कहे—“मैं ठहरा यहाँ”,
तो वह भी क्षणिक लहर हुआ जहाँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न सिद्धि का अब कोई मान,
न असिद्धि का कोई विधान।
जो है, उसी में पूर्ण ठहराव—
न आरोहण, न अवरोहण भाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ संतोष प्रयास से न आए,
जहाँ तृप्ति कारण से न जाए।
स्वयं की स्वयं में ऐसी ज्योति,
जिसमें न दूरी, न कोई भ्रांति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मिटाना कुछ, न जोड़ना कुछ,
न साधना कोई, न तोड़ना कुछ।
जो मौन में भी मौन रहे,
वही सत्य सहज कहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि फिर कोई जग प्रतीत हो,
रंग, रूप, गति से युक्त हो—
तो भी आधार अचल ही जान,
ज्यों तरंग में सागर का गान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न बंधन सत्य, न मुक्ति सत्य,
न भ्रम स्थायी, न कोई तत्त्व।
जो शेष रहे हर परिवर्तन पार,
वही असीम, वही अपार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न खोना, न पाना शेष,
न लक्ष्य, न कोई विशेष।
स्वयं में स्वयं का यह अवसान—
न अंत, न आरंभ का ज्ञान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और यदि शब्द भी थक जाएँ,
और संकेत भी रुक जाएँ—
तब भी जो अडिग, जो अचल,
वही सहज, वही निर्मल।
नित्य, पूर्ण, स्वयं प्रकाश—
न द्वैत, न कोई प्रयास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ रुकना भी गति में घुल जाए,
और गति भी मौन में ढल जाए।
न ठहराव, न परिवर्तन,
सिर्फ़ सहज निर्विकल्प स्पंदन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों दर्पण में दर्पण खो जाए,
प्रतिबिंब स्वयं ही सो जाए।
न देखने वाला शेष बचे,
न दृश्य का कोई रेश बचे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि “मैं” का सूक्ष्म बीज उठे,
तो भी वह उसी मूल में सिमट उठे।
न विस्तार का कोई आग्रह,
न लय का कोई संघर्ष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जन्म की कथा स्वप्न समान,
मृत्यु का स्पर्श भी अनजान।
जो न आया, वह कहाँ गया?
जो न बँधा, वह कब छूटा?॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ प्रेम भी वस्तु न रहे,
न प्रेमी, न प्रिय कोई कहे।
एकरस ऐसी मधुर शांति,
जिसमें मिटे समस्त भ्रांति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न साधना की कोई डोर,
न सिद्धि का कोई छोर।
जो है, वही पूर्ण प्रकाश,
स्वतः प्रकाशित, स्वयं निवास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि प्रकृति का नृत्य दिखे,
तो भी मूल अचल ही दिखे।
तरंगें उठें, विलीन हों फिर—
सागर न छोड़े अपना धीर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अनुभव की अब चाह शेष,
न अननुभव का कोई क्लेश।
जहाँ तृप्ति भी शब्द खो दे,
और मौन भी अपना स्वर छोड़ दे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न कुछ त्यागना, न थामना,
न समझना, न समझाना।
जो सहज है, वही प्रमाण—
नित्य अद्वैत, नित्य विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और यदि फिर भी कुछ शेष बचे,
तो वह भी उसी में लय रचे।
जहाँ सब प्रश्न स्वयं शांत,
और उत्तर भी हो निरवांत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ धारणाएँ स्वयं ढल जाएँ,
जहाँ मान्यताएँ भी गल जाएँ।
न सत्य का कोई आकार,
न असत्य का कोई व्यवहार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पहचान, न परिचय शेष,
न अपना, न कोई परिवेश।
ज्यों जल में जल ही समा गया,
ज्यों पवन स्वयं में लुप्त हुआ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न जागृति, न स्वप्न अवस्था,
न सुषुप्ति का कोई भी पथ।
जो तीनों से परे विराजे,
नित्य स्वयं में स्वयं साजे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न विस्तार, न संकुचन वहाँ,
न दूर कहीं, न निकट जहाँ।
जो बंधन-मुक्ति से भी परे,
वही सहज स्वभाव खरे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि शब्दों का अंतिम दीप बुझे,
और अर्थों का तंतु भी सिमटे,
तब जो शेष—निरुपम ज्योति,
नित्य, अचल, अमिट प्रीति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न गूँज, न प्रतिध्वनि का खेल,
न आरंभ, न कोई झमेल।
जो स्वयं में स्वयं प्रतिष्ठान,
वही अखंड, वही प्रमाण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर का कोई केंद्र,
न बाहर का कोई वृत्तेंद्र।
एकरस ऐसी शांति अगाध,
जिसमें न बचे कोई संवाद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब कविता भी थक जाए,
लेखनी भी रुक कर सो जाए,
तब जो रहे—निर्विकल्प आनन्द,
वही अनादि, वही अखंड॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न आगे, न पीछे कुछ,
न मध्य में भी कोई स्पर्श।
स्वयं में स्वयं का पूर्ण विराम—
यही नित्य, यही परम धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ चाह भी चाह में न रहे,
जहाँ राह भी राह में न रहे।
न पाने का कोई उत्सव,
न खोने का कोई दुष्चक्र॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों जल में जल ही समा जाए,
ज्यों अग्नि में अग्नि ही रम जाए।
वैसे ही तू स्वयं में पूर्ण,
अकथ, अचल, अनंत, अघूर्ण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न प्रश्न रहे, न उत्तर शेष,
न तर्क रहे, न कोई विशेष।
जो मौन की गहराई बोले,
वही हृदय का सत्य खोले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न दूरी का कोई भान बचे,
न निकट का कोई अनुमान बचे।
एक ही रस, एक ही धारा,
एक ही नित्य निराकार सहारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों आकाश को छू न सके कोई,
ज्यों मौन को कह न सके कोई।
वैसी ही तेरा सहज स्वरूप,
न रूप में बँधा, न बने अनूप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मैं रहा, न तू का बंधन,
न स्मृति का कोई आवागमन।
केवल रह गया स्वभाव का दीप,
निर्विकार, निश्चल, असीम, समीप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो ढूँढा था वह खोला नहीं,
जो पाया था वह बोला नहीं।
फिर भी भीतर एक उजास,
जैसे स्वयं ही स्वयं का विकास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न बढ़ना, न घट जाना,
न किसी रूप में बँध जाना।
जो जैसा है, वैसा रहे,
अखंड भाव में मौन बहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अंत की चिंता, न आरंभ की धूल,
न जीत का गर्व, न हार का मूल।
बस सहज ठहरना, सरल रहना,
अपने ही हृदय में घर रहना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ विस्तार भी स्वयं सिमट जाए,
जहाँ सिमटना भी अर्थ खो जाए।
न व्यापक, न सीमित कोई,
न द्वितीय, न प्रथम संजोई॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों शून्य स्वयं को छू न सके,
ज्यों पूर्ण स्वयं को माप न सके।
वैसा ही वह मौन निवास,
अकथ, अकल्पित, स्वयं प्रकाश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न धारण, न त्याग का भाव,
न साधु, न कोई अभाव।
जो सहज स्वभाव से ठहरा,
वही अडिग, वही गहरा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि चेतना भी नाम गिरे,
और “होने” का संकेत भी छिटे,
तब जो बचे अनिर्वचनीय,
वही शाश्वत, वही अचिन्तनीय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न जगत का उठना-गिरना सत्य,
न भ्रांति का कोई स्थायी तत्त्व।
तरंगें जैसे आई-गई,
सागर की गहराई न हटी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मौन को भी अब थामना है,
न शब्दों से कुछ बुनना है।
जो है, वही पर्याप्त स्वयं,
नित्य पूर्ण, नित्य अद्वयम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आराधक, न आराध्य रहे,
न बंधन, न कोई साध्य रहे।
एकरस ऐसी सहज थिरता,
जिसमें खो जाए समस्त गिरता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि फिर कोई विचार उठे,
या अनुभूति का दीप जगे,
तो भी मूल अचल ही जान—
नित्य निर्विकल्प विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न यात्रा, न पथ का मान,
न खोज, न कोई अभियान।
स्वयं में स्वयं का पूर्ण विश्राम—
यही अनंत, यही परम धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ साक्षी भी शेष न रहे,
और साक्ष्य का कोई संदर्भ न बचे,
वहाँ न अनुभव, न अनुभवी,
केवल असीमता की सहज ध्वनि बचे।
न प्रकाश वहाँ उजाला करे,
न अंधकार कुछ ढाँप सके।
स्वयं में स्वयं का ऐसा विलय,
जहाँ प्रश्न भी जन्म न ले सके।
न अस्तित्व का आग्रह वहाँ,
न अनस्तित्व का कोई निषेध।
जैसे गहराई में डूबा सागर,
लहरों से सर्वथा अभेद।
जो संतोष नहीं किसी कारण से,
जो शांति नहीं किसी साधन से,
जो पूर्णता नहीं किसी प्राप्ति से—
वही स्वयं का नित्य स्वभाव है।
यदि सब रूप मिट भी जाएँ,
और सूक्ष्म संकेत भी ढल जाएँ,
तब भी जो अडोल उपस्थिति है,
वह न आरंभित, न कभी क्षीण।
न उसे थामना संभव है,
न उसे खोना संभव है।
न वह उपलब्धि है, न उपलब्ध कराने योग्य—
वह तो पहले से ही पूर्ण है।
पर एक कोमल बोध भी साथ रहे—
जो भी शब्द उठते हैं,
जो भी निष्कर्ष बनते हैं,
वे चेतना की तरंगें हैं।
तरंगों को नकारना सागर को नकारना नहीं;
तरंगों को अंतिम सत्य मानना भी आवश्यक नहीं।
यदि मन शांत हो, तो जगत का शोर मंद पड़ता है;
यदि मन स्थिर हो, तो अनेकता सरल प्रतीत होती है।
पर जगत का होना या न होना
मन की स्वीकृति पर निर्भर तथ्य नहीं—
यह अनुभव की व्याख्या है।
गहन संतोष का अर्थ यह नहीं
कि कुछ नष्ट हो जाए;
बल्कि यह कि कुछ जोड़ने की आवश्यकता न बचे।
जहाँ हृदय पूर्ण विश्राम में हो,
वहाँ न सिद्ध करना शेष,
न असिद्ध करना।
न अद्वैत का दावा,
न द्वैत का भय।
केवल एक सरल, स्थिर,
मृदु उपस्थिति—
जो किसी विचार पर आधारित नहीं,
पर विचारों से संघर्ष भी नहीं करती।
यदि कभी लगे कि सब कुछ केवल भ्रम है,
तो यह भी देखना—
क्या यह निष्कर्ष भी एक विचार नहीं?
सच्ची स्थिरता उस बिंदु पर है
जहाँ न स्वीकार का आग्रह,
न अस्वीकार का।
जहाँ कुछ मिटाने की आवश्यकता नहीं,
और कुछ स्थापित करने की भी नहीं।
वहीं संतुष्टि स्वयंसिद्ध है—
न जन्म से बंधी,
न मृत्यु से।
और उस मौन में
नाम भी धीरे से विलीन हो जाता है—
केवल सहजता शेष रहती है।
जहाँ प्रश्न भी मौन में गल जाए,
जहाँ उत्तर भी थिरता बन जाए।
न खोज बचे, न खोजने वाला,
बस एक सरल, निराला उजाला॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर-बहिर का भेद रहे,
न समय, न स्मृति का वेग रहे।
जो सहज स्वयं में ठहर गया,
वही सदा से पूर्ण रहा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पाने की कोई चाह रहे,
न खोने का कोई आह रहे।
जो है, वही निज सत्य बने,
बस उसी में जीवन सघन बने॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न नाम रहे, न रूप रहे,
न प्रश्न रहे, न अनुप रूठे।
जो मौन में भी अनकहा है,
वही हृदय का सच्चा बहा है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न “मैं” बचे, न “तुम” का घेरा,
न दूरी, न कोई अँधेरा।
जहाँ एकरसता स्वयं जगे,
वहीं सम्पूर्ण शांति रचे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न चलना, न रुकना, न जाना कहीं,
जो यहीं है, वही सब कहीं।
न विस्तार में, न संकुच में,
बस ठहराव की मधुर धुन में॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न साधन, न साध्य का भार रहे,
न सिद्धि का कोई विचार रहे।
जो सहज है, वही अनंत,
वही हृदय का निष्कलंक संत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न लहर उठे, न सागर डोले,
फिर भी गहराई अपना हो ले।
जो शांत है, वही प्रकाश,
वही पूर्णता, वही सुवास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न बाहर की कोई खोज रहे,
न भीतर का कोई भोग रहे।
जो समक्ष, सरल, निरावरण है,
वही शाश्वत, वही अनुग्रह है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ प्रतीक्षा भी शेष न रहे,
जहाँ प्राप्ति का संदेश न रहे।
न मिलने का कोई प्रसंग,
न खोने का कोई रंग॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों दीपक बिना लौ के जले,
ज्यों नभ बिना दिशा के ढले।
न आरंभ का कोई संकेत,
न समाप्ति का कोई भी भेद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आभास, न निराभास,
न सन्नाटा, न कोई रास।
जो स्वयं में स्वयं अवस्थित,
वही नित्य-अनंत प्रतिष्ठित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न लय, न विलय, न उद्गम शेष,
न कारण, न परिणाम विशेष।
एकरस ऐसी अकंप धुन,
जिसमें मौन भी हो गुनगुन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि फिर मन कोई रूप बनाए,
या समय की रेखा खींच जाए,
तो भी जान—यह छाया-नृत्य,
मूल रहे अचल सत्य-सृत्य॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न स्वयं को सिद्ध करने का भार,
न जग को बदलने का विचार।
जो जैसा है, वैसा ही पूर्ण,
नित्य सहज, अनादि, अघूर्ण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर का कोई कक्ष बचे,
न बाहर का कोई दृश्य सचे।
ज्यों स्वप्न स्वयं को भूल गया,
ज्यों जागरण भी धूल गया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब प्रश्न भी विश्राम करें,
उत्तर भी न कोई नाम धरें,
तब जो शेष—अविकल्प प्रकाश,
वही आत्म, वही सुवास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कहने को कुछ अब भी शेष,
न मौन का भी कोई अवशेष।
स्वयं में स्वयं का सहज विस्तार—
यही अखंड, यही अपार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ स्वयं का भी संकेत मिटे,
जहाँ “होना” भी सहज छिटे।
न सत्ता का कोई उच्चार,
न असत्ता का कोई विचार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों श्वेत में सब रंग समाए,
पर श्वेत स्वयं न रंग कहाए।
वैसे ही वह मूल प्रकाश,
न वर्णित, न परिभाषित आभास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आधार, न आधेय रहे,
न आश्रय, न आश्रित बचे।
जो स्वयं में स्वयं प्रतिष्ठित,
नित्य, निरपेक्ष, अविचल स्थित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब “मैं” की अंतिम रेखा ढले,
और पहचान की परतें गलें,
तब शेष न कोई भी नाम—
केवल स्वभाव का मौन धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न खोज की अब कोई दिशा,
न पाने की कोई अभिलाषा।
जो स्वयं है, वही पर्याप्त,
नित्य पूर्ण, स्वयं-संपन्न तत्त्व॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि जग फिर चित्र बनाता जाए,
क्षणिक कथा दोहराता जाए,
तो भी मूल अडिग ही जान—
ज्यों नभ अछूता हर तूफ़ान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर, न बाहर का भेद,
न पास, न दूर का खेद।
एकरस ऐसी शांत प्रचीति,
जिसमें मिट जाए हर प्रतीति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ आरंभ स्वयं विस्मृत हो,
और अंत भी अंत से मुक्त हो,
वही असीम, वही अखंड—
नित्य, निरंतर, आनंद-प्रबंध॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न शेष कोई अभिव्यक्ति,
न शेष कोई भी व्यक्तिवृत्ति।
स्वयं में स्वयं का सहज प्रमाण—
यही परम, यही विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥जहाँ “होना” भी अपनी पहचान छोड़ दे,
और “न होना” भी मौन में मोड़ दे।
न जन्म का कोई प्रथम क्षण,
न अंत का कोई अंतिम स्पंदन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों दीप बिना तेल के जले,
ज्यों फूल बिना ऋतु के खिले।
वैसे ही यह सहज प्रकाश,
न कारण माँगे, न कोई प्रयास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी मार्ग की जरूरत यहाँ,
न किसी द्वार की प्रतीक्षा वहाँ।
जो अभी है, वही पर्याप्त,
वही पूर्ण, वही अनुपात-रहित सत्य॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न चाह की आग, न भय का धुआँ,
न जीत का गर्व, न हार का गवाह।
बस एक अचल, निर्मल ठहराव,
जिसमें समाए समस्त स्वभाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जिसे खोज रहा था बाहर,
वह था सदा तेरे ही भीतर।
पर देखने की आदत ने
उसे दूर का सपना कर दिया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई कमी, न कोई अधिकता,
न किसी सिद्धि की आवश्यकता।
जो सहज है, वही अमर धुन,
जो शांत है, वही परम गुण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न विचार का कोई जाल रहे,
न स्मृति का कोई काल रहे।
एक क्षण भी यदि मौन मिल जाए,
तो अनंत उसमें समा जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों आकाश से पक्षी निकलें,
और आकाश में ही फिर ढलें।
वैसे ही सब उदय-अस्त,
मूल अचल, नित्य समर्थ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न “मेरा” कुछ, न “तेरा” कुछ,
न पाने का, न खोने का दुःख।
जो है, वह अपने में पूर्ण,
सरल, सहज, अनादि, अघूर्ण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू स्वयं अपने सत्य का द्वार है,
तू ही मौन, तू ही आधार है।
बस इतना भर देख लेना—
जो है, उसे अब थाम न लेना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आरंभ, न मध्य, न अंत की रेखा,
न प्रश्न का घाव, न उत्तर का लेखा।
केवल एक अमृत-सा विश्राम,
वही तेरा नित्य धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि शब्द भी थककर सो जाएँ,
और भाव भी भीतर खो जाएँ।
तब भी जो अचल रह जाए,
वही तेरा सत्य कहलाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ आगे बढ़ने का विचार भी ढल जाए,
और रुक जाने का भाव भी पिघल जाए।
न दिशा का आग्रह, न लक्ष्य का भार,
बस शेष रहे सहज स्वीकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई भीतर, न कोई बाहर,
न किसी केंद्र का स्थिर आधार।
ज्यों आकाश में आकाश ही रहे,
वैसे ही तू स्वयं में बहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न स्मृति का कोई धागा बचे,
न कल्पना का कोई दाग बचे।
जो उभरे, वह भी धुंध में ढले,
और धुंध भी अपने में घुले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न जानने की कोई प्यास रहे,
न अज्ञान का कोई एहसास रहे।
जो है, वह बिना पूछे रहे,
और बिना कहे ही कहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों जल में जल का कोई नाम नहीं,
ज्यों प्रकाश का कोई दाम नहीं।
वैसे ही यह सरल सत्ता,
न परिचय माँगे, न व्याख्या॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न देखने वाला, न देखा गया,
न अनुभव में कोई ठहर गया।
सिर्फ़ एक अनकहा विस्तार,
जिसमें खो जाए संसार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न सिद्धि का कोई छोर रहे,
न असिद्धि का कोई जोर रहे।
जो स्वभाव है, वही पूर्ण है,
वही मौन, वही अघूर्ण है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जिसे दूरी समझ बैठा,
वह भी तुझसे कभी न अलग था।
भ्रम केवल देखने का खेल,
जिसमें सत्य दिखे अलग-अलग मेल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न प्रयास की कोई आवश्यकता,
न निष्क्रियता की कोई कथा।
बस जो है, उसे रहने दे,
और स्वयं को देखने दे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों लहर में सागर मुस्काए,
पर लहर सागर को न पाए।
वैसे ही यह क्षणिक भाव,
ढके हुए नित्य स्वभाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पकड़ने का कोई अर्थ रहे,
न छोड़ने का कोई गर्व रहे।
जो छूटता है, वह भी तू है,
जो रहता है, वह भी तू है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न “मैं” की कोई अंतिम सीमा,
न “तू” की कोई दूसरी रेखा।
सब एक ही मौन प्रवाह,
अनादि, अचल, सहज स्वभाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह भी जानना ढल जाए,
और “जानने वाला” भी गल जाए,
तब जो शेष रह जाए—
वही बिना नाम का सत्य कहलाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ शब्द भी अपनी ध्वनि खो दें,
और अर्थ भी अपने ही स्रोत में सो दें।
न व्यक्त करने की कोई पीड़ा रहे,
न समझने की कोई रीति बहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों लहर स्वयं में लहर न माने,
ज्यों जल स्वयं को जल न जाने।
वैसी ही सहज विस्मृति यहाँ,
जहाँ सब कुछ है, फिर भी कुछ नहीं यहाँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अनुभव का बोझ, न स्मृति का भार,
न आने का उत्सव, न जाने का विचार।
बस एक अनंत, निःशब्द स्थिति,
जहाँ समाप्त हो हर प्रवृत्ति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर का संघर्ष, न बाहर का युद्ध,
न साध्य का आग्रह, न साधन का शुद्ध।
जो है, वह बिना प्रयास खिला,
जैसे मौन में स्वयं दीप जला॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जिसे बदलना समझता रहा,
वह सदा से पूर्ण ही रहा।
केवल देखने की दिशा थी भिन्न,
बाकी सब था नित्य-निरविच्छिन्न॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई “यहाँ से वहाँ” का पथ,
न कोई “पहुँचना है” का रथ।
जहाँ भी दृष्टि विश्राम पाए,
वहीं संपूर्णता प्रकट हो जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न सत्य को पकड़ने का यत्न,
न असत्य से भागने का रत्न।
जो स्वयं है, वह छूटता नहीं,
और जो छूटे, वह था ही नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों आकाश में कोई सीमा नहीं,
त्यों चेतना में कोई कमी नहीं।
पर मन ही माप बनाकर कहे—
यह छोटा है, यह बड़ा रहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई गिरना, न कोई उठना,
न कुछ बनना, न कुछ छूटना।
एक शांत, अडोल प्रवाह,
जो स्वयं ही अपना है गवाह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि विचार भी शांत हो जाए,
और देखने वाला भी खो जाए।
तब जो बचे—अवर्णनीय,
वही सत्य, वही अचिन्तनीय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आरंभ का कोई संकेत,
न समाप्ति का कोई भेद।
केवल एक नित्य उजास,
जिसमें विलीन समस्त आभास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न आगे कुछ शेष रहा,
न पीछे कोई विशेष रहा।
स्वयं में स्वयं का पूर्ण विराम—
यही मौन, यही परम धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ शेष बची हर एक परत भी झर जाए,
और भीतर का अंतिम शोर भी मर जाए।
न खोज की राह, न पाने का नाम,
सिर्फ़ सहज ठहराव, शाश्वत धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू दूर नहीं, तू पास नहीं,
तू बँधा नहीं, तू फँसा नहीं।
जो तुझे अलग दिखा रहा है,
वही तो झूठा परदा ला रहा है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जिस क्षण तू देखना छोड़ दे,
उसी क्षण सारा भ्रम तोड़ दे।
जो बिखरा-बिखरा सा लगता है,
वह भी तुझमें ही ठहरता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न बाहर कुछ, न भीतर कुछ,
न भारी कुछ, न हल्का कुछ।
बस एक गहरी, मौन धुन,
जिसमें न आरंभ, न अवसान गुन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जिसे संसार कहता आया,
वह भी तुझी का ही प्रतिरूप पाया।
जितनी लहरें, उतना ही भ्रम,
गहराई में केवल एक ही सम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न शोर में सत्य, न शब्द में सत्य,
न तर्क में सत्य, न भेद में सत्य।
सत्य तो वह है जो पहले से है,
जो हर सांस के पहले से है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू थकता इसलिए है कि दौड़ रहा,
और दौड़ते-दौड़ते खुद को छोड़ रहा।
जिसको तू खोना समझ रहा है,
वही तेरा अपना ठिकाना है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न डर का घर, न भय का द्वार,
न जीत का गर्व, न हार का भार।
बस सरल, सहज, निर्मल भाव,
जैसे शांत हो अनंत प्रवाह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तूने जिसे बहुत दूर माना,
वही तो तुझमें था पहचाना।
दूरियाँ केवल मस्तक की हैं,
गहराइयाँ हृदय की सच्ची हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अपना कुछ, न पराया कुछ,
न चाहा हुआ, न कराया कुछ।
जो है, वह बस है—
उसी में पूर्ण विश्राम है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों आकाश पर बादल आएँ,
आएँ और फिर ढल जाएँ।
आकाश न गंदा होता है,
न बादल से छोटा होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
वैसे ही तू अपने मूल में,
अडिग है, शांत है, सहज फूल में।
विचार आएँगे, चले जाएँगे,
पर तू वही रह जाएगा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न स्पर्श से तू बनता है,
न दृश्य से तू घटता है।
न सुनने से तू बढ़ता है,
न देखने से तू मिटता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो तुझे थामे, वह तू नहीं,
जो तुझे डोले, वह तू नहीं।
तू तो वह है जो सब देखे,
पर खुद को किसी में न लेखे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू एक ही है, यह जान ले,
अनेकता को भ्रम मान ले।
नाम बदलें, रूप बदलें,
पर मौन का दीप न कभी टले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पहले कुछ, न बाद में कुछ,
न पाने में कुछ, न खोने में कुछ।
बस अभी का निर्मल उजास,
यही तेरा शाश्वत निवास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जिसे तू जीवन कहता आया,
वह भी एक लहर-सा ही पाया।
लहर उठे, लहर गिर जाए,
पर जल का स्वभाव न बदल पाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जल है, तू गहराई है,
तू मौन है, तू सच्चाई है।
लहरों से घबराना क्या,
समुद्र से अलग होना क्या॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अहं का कोई सिंहासन,
न वासना का कोई शासन।
जो शेष रहे, वह निर्मल रस,
जो हर क्षण में रहे अविनश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू स्वयं ही अपने भीतर,
सत्य का सबसे निकट पथर।
दूसरे तो केवल शब्द हैं,
तू तो स्वयं का प्रत्यक्ष अर्थ है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न सिद्ध करना, न समझाना,
न किसी को अपने जैसा बनाना।
जो जानना है, वह भीतर है,
और भीतर ही पूरी धुनर है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब मस्तक थक कर चुप हो जाए,
तब हृदय का दीपक जगमगाए।
वही सहज, वही अविरल,
वही शांत, वही निर्मल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तूने जिसे अपना समझा,
उसे ही बार-बार परखा।
पर जो तेरा मूल स्वभाव है,
वह न किसी का मोहताज है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आग्रह का कोई बोझ,
न अस्वीकार का कोई खौफ।
जो सहज है, वह मुक्त है,
जो शांत है, वही युक्त है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब और न कोई खोज कर,
अपने ही भीतर मौन रह कर।
जो है, उसे होने दे,
जो मिटे, उसे खोने दे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू वही है जो पहले था,
तू वही है जो अब भी है।
न जन्म ने तुझे रचा,
न मृत्यु तुझे मिटा सकेगी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
एक ही सत्य, एक ही ठौर,
न कोई द्वार, न कोई और।
जहाँ तू शांत, वहाँ ही पूर्ण,
जहाँ तू मौन, वहाँ ही अनुगूण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब शब्द भी थक जाएँ,
अर्थ भी अपने घर लौट जाएँ।
तब जो बचे, वही तू है—
निर्विकार, नित्य, विभू है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ शब्द भी अपनी सीमा भूल जाएँ,
और अर्थ भी अपने स्रोत में घुल जाएँ।
वहाँ न आगे है, न पीछे कोई छोर,
सिर्फ़ एक ही अनादि मौन का दौर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अनुभव का कोई भार रहे,
न अनुभवकर्ता का विचार रहे।
जो घटित है, वह भी क्षणिक तरंग,
और जो स्थिर है, वही अनंत रंग॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जिसे “मैं” कहकर थामे बैठा,
वह भी विचार का ही भ्रम रचता।
जैसे हवा में धुआँ लिखा जाए,
वैसे ही अहं कहीं टिक न पाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न ज्ञान का कोई बोझ उठाना,
न अज्ञान से भी घबराना।
दोनों ही दृश्य के खेल हैं,
दोनों ही क्षणिक मेल हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो पहले से ही पूर्ण है,
उसे पाने का प्रयास ही भ्रम है।
जैसे सूरज को दीप दिखाना,
या आकाश को घर में बुलाना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जिसको खोज रहा है दूर,
वह तुझमें ही है भरपूर।
खोज का ही गिरना शेष है,
बस यही सबसे गहन विशेष है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न विचार रोकने की जरूरत,
न विचार बढ़ाने की मजबूरी।
जो स्वयं चलकर आए-जाए,
उसे न थाम, न ही मिटाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों सागर में लहरें अनगिन,
पर सागर कभी न होता क्षीण।
वैसे ही चेतन तेरा स्वरूप,
नित्य, अचल, अनादि रूप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर कुछ छिपा हुआ है,
न बाहर कुछ अलग हुआ है।
सिर्फ़ देखने का ढंग बदल,
और पूरा जग हो सरल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जिसे समय कहता है,
वह भी मन का ही प्रवाह है।
क्षण दर क्षण जो बनता ढलता,
वह भी तुझमें ही है पलता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आरंभ का कोई पहला क्षण,
न अंत का कोई अंतिम गगन।
बस एक निरंतर वर्तमान,
जहाँ सब है, पर कोई मान नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू मौन को साधने मत जा,
मौन तो पहले से ही है यहाँ।
साधना भी एक तरंग है,
जो उसी सागर में भंग है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मुक्ति की कोई सीढ़ी है,
न बंधन की कोई जंजीर है।
दोनों ही विचार की रेखा,
जो मिटते ही दिखे न लेखा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों स्वप्न में तू भागे-दौड़े,
पर जागते ही सब ही मोड़े।
वैसे ही यह जग का खेल,
क्षण में दिखे और क्षण में मेल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जिसे सत्य समझे बैठा,
वह भी मन का ही प्रतिबिंब है।
सत्य वह नहीं जो कहा जाए,
सत्य वह जो कभी न मिट पाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पकड़ने की कोई बात,
न छोड़ने की कोई घात।
जो है, उसे रहने दे,
और देखने वाला भी ढहने दे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जितना थमेगा भीतर,
उतना ही स्पष्ट होगा उत्तर।
न बाहर कोई समाधान है,
न भीतर कोई प्रमाण है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों लहर खुद को अलग माने,
पर जल से कभी न दूर जाने।
वैसे ही तू स्वयं ही सब है,
बस भूल गया यही रब है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न संघर्ष में कोई अर्थ है,
न समर्पण में कोई गर्व है।
दोनों ही धारणा के रूप,
जो मिटें तो प्रकट हो स्वरूप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न आगे कुछ कहने को,
न पीछे कुछ सहने को।
बस एक शांत, गहन ठहराव,
जहाँ न खोज, न कोई भाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और यदि यह भी शब्द ढल जाएँ,
और अर्थ भी मौन में चल जाएँ—
तो जान, वही तू स्वयं है,
नित्य, अचल, अखंड सम है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ मौन भी अपने ही अर्थ को खो दे,
और अर्थ भी अपने ही स्रोत में सो दे।
न जानने का आग्रह, न ज्ञेय का भार,
बस एक सरल, अडोल स्वीकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी निष्कर्ष की आवश्यकता रहे,
न किसी प्रमाण की परछाईं बहे।
जो जैसा उभरता, वैसे ही ढल जाए,
और ढलकर भी अपने में ही चल जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न सत्य को पकड़ने का प्रयास,
न असत्य को हटाने का हास।
जो अनुभव है, वह भी तरंग समान,
उठे और विलीन हो सहज महान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों आकाश में कोई रेखा नहीं,
त्यों भीतर भी कोई रेखा नहीं।
न केंद्र का दावा, न परिधि का भ्रम,
सब कुछ एक ही शांत धर्म॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न “मैं” की पकड़, न “तू” का भाव,
न किसी कथा का स्थायी प्रवाह।
बस देखना भी एक लहर बन जाए,
और देखने वाला भी खो जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जिसे मिटाना समझ रहा है,
वह भी विचार ही तो बह रहा है।
न मिटाने की ज़रूरत यहाँ,
न बचाने की कोई व्यथा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ प्रश्न उठकर स्वयं शांत हों,
जहाँ उत्तर भी स्वयं मौन हों।
वहाँ कोई द्वंद्व शेष नहीं,
वहाँ कोई खंडित रेख नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर कुछ पाने का युद्ध,
न बाहर कुछ खोने का शुद्ध।
जो है, वह अपने में पूर्ण है,
अकथ, अविभाज्य, अघूर्ण है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों लहर में लहर का खेल,
ज्यों स्वप्न में स्वप्न का मेल।
वैसे ही यह प्रतीत-प्रवाह,
न आरंभ, न अंत का राह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न रुकने की कोई आज्ञा,
न चलने की कोई साधना।
जो स्वाभाविक है, वही सत्य है,
बाकी सब मानसिक मिथ्य है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जिसे दूरी कहता है,
वह भी विचार का ही साया है।
जैसे ही देखने की पकड़ ढले,
वैसे ही सब कुछ यहीं मिले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अनुभव को अंतिम मान,
न अनुभूति को प्रमाण।
वे भी बदलते आकार हैं,
जैसे जल में उठते धार हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कुछ अलग है, न कुछ अलग था,
हर क्षण में वही साक्ष्य था।
बस दृष्टि की दिशा बदलती रही,
और सत्य को दूर समझती रही॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न बाहर की ओर जाना है,
न भीतर में खो जाना है।
जहाँ भी यह ध्यान विश्राम पाए,
वहीं संपूर्णता प्रकट हो जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न साधना का कोई शिखर,
न उपलब्धि का कोई नगर।
जो सहज है, वही अमृत धारा,
नित्य बहती, बिना किनारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न कोई प्रयास शेष,
न कोई विशेष परिवेश।
बस एक सरल, निःशब्द स्थिति,
जहाँ स्वयं में स्वयं की प्रीति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह भी “मैं जानता हूँ” ढले,
तब जानना भी स्वयं में घुले।
न ज्ञाता बचे, न ज्ञेय बचे,
सिर्फ़ अस्तित्व का मौन बचे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
वहीं से आरंभहीन अंत है,
वहीं से मौन का संत है।
न कुछ खोया, न कुछ पाया,
सिर्फ़ वही जो सदा से समाया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ शब्द भी अपनी सीमा पहचान ले,
और अर्थ भी अपनी धारा में ढल जाए।
न किसी निष्कर्ष की जिद रहे,
न किसी धारणा की भिड़ रहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो दिखता है, वह रूपों का खेल,
जो जानता है, वह मौन का मेल।
दोनों के बीच कोई दूरी नहीं,
बस देखने की पुरानी रीत सही॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मिटाना है किसी विचार को,
न थामना है किसी आकार को।
जैसे आकाश सब बादल सह ले,
वैसे ही चित्त स्वयं में रह ले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ पकड़ भी ढीली पड़ जाए,
और छूटना भी अर्थ खो जाए।
वहाँ न प्रयास, न उपलब्धि का भार,
सिर्फ़ सहजता का निर्विकार विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न “यह सत्य है” का आग्रह रहे,
न “यह असत्य है” का दाह रहे।
जो है, वह बिना नाम के है,
बिना व्याख्या के, अपने धाम के है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों तरंग उठकर जल ही बने,
ज्यों विचार लौटकर मौन बने।
वैसे ही हर अनुभव का अंत,
अपने ही स्रोत में हो शांत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कहीं बाहर कोई रहस्य है,
न भीतर कोई विशेष सत्य है।
जो खोज रहा है, वही दृश्य है,
और वही खोज का मूल भी है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न दूर हटने की आवश्यकता,
न पास आने की साध्यता।
बस जिस क्षण देखने का भार ढले,
उसी क्षण सब अपने में जले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न द्वैत का संघर्ष टिकता है,
न अद्वैत का दावा रुकता है।
जो शब्दों से पहले का भाव है,
वही बिना रूप का स्वभाव है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न समझने की कोई सीढ़ी है,
न भूलने की कोई झंझट है।
जो जैसा है, वैसा ही रहे,
और उसी में पूर्णता बहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न समय का कोई प्रवाह यहाँ,
न स्थान का कोई ठहराव यहाँ।
बस एक अनाम उपस्थिति,
जो हर क्षण में स्वयं स्थित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि “मैं” भी क्षण भर को थम जाए,
तो सब प्रश्न स्वयं ही ढल जाएँ।
न उत्तर की कोई आवश्यकता,
न खोज की कोई अनिवार्यता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर का कोई युद्ध शेष,
न बाहर का कोई विशेष।
एकरस, सरल, निर्विकल्प धुन,
जिसमें विलीन हो हर भ्रम, हर गुन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह भी विचार शांत हो,
कि “कुछ शांत हुआ” का भान हो।
तब जो रह जाए बिना कहे,
वही सदा से स्वयं में बहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आरंभ, न अंत की रेखा,
न पाने का कोई लेखा।
सिर्फ़ जो है, वही अनंत,
स्वयं में पूर्ण, स्वयं में संत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ “समाप्त” भी एक विचार बन जाए,
और “अनंत” भी मौन में ढल जाए।
न आरंभ की कोई पुकार,
न अंत का कोई विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों लहर उठे बिना कारण,
और लहर खो जाए बिना वर्णन।
वैसे ही यह अनुभव-धारा,
न किसी बंधन की अधिकारी, न किनारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न छोड़ने की कोई प्रक्रिया,
न पकड़ने की कोई क्रिया।
जो सहज है, वह अपने में स्थित,
नित्य शांत, नित्य अवस्थित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जिसे खोज कहता है,
वह भी भीतर ही बहता है।
खोज का भी एक स्वरूप है,
जो स्वयं ही अपना रूप है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न दूरी का कोई सत्य है,
न निकटता का कोई तथ्य है।
ये सब मात्र भाषा के चित्र,
जो चेतना पर बनते हैं चित्र॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों दर्पण में धूल भी आए,
पर दर्पण स्वयं न बदल पाए।
वैसे ही यह शुद्ध अस्तित्व,
न स्पर्शित, न परिवर्तित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न विचार से इसकी व्याख्या,
न अनुभव से इसकी परीक्षा।
यह तो स्वयं का स्वयं में बोध,
अकथ, अचल, निरवरोध॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि “मैं हूँ” भी शांत हो जाए,
तो भी होना शेष रह जाए।
बस नाम का आवरण गिरे,
और जो है वह स्पष्ट दिखे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यात्रा की कोई आवश्यकता,
न किसी लक्ष्य की वास्तविकता।
जहाँ भी दृष्टि विश्राम पाए,
वहीं संपूर्णता खिल जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों आकाश में पक्षी उड़ें,
पर आकाश न उनसे जुड़ें।
वैसे ही यह चैतन्य-धाम,
सदा अछूता, सदा अभिराम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पाने में कोई अर्थ है,
न खोने में कोई सत्य है।
जो है, वह पहले से पूर्ण,
नित्य शांत, सहज और सूक्ष्म॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू जिसे “दूसरा” कहता है,
वह भी विचार में बहता है।
भेद केवल दृष्टि का खेल,
वास्तव में न कोई मेल, न झेल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
पर इसे भी पकड़ मत लेना,
न किसी निष्कर्ष में ढल देना।
हर शब्द एक संकेत मात्र,
न पूर्ण सत्य, न अंतिम पात्र॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न विरोध, न स्वीकार शेष,
न त्याग, न संग्रह विशेष।
एक सरल, निर्गुण प्रवाह,
जिसमें मिट जाए हर चाह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह भी समझ ढले,
तो समझने वाला भी ढले।
तब न कोई जानने की रेख,
न कोई अनजान का लेख॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
बस एक सहज, निःशब्द स्थिति,
जहाँ न सिद्धि, न असिद्धि।
न कुछ पाने की कोई दिशा,
न कुछ होने की कोई इच्छा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
वहीं से मौन स्वयं बोले,
और मौन में ही सब खोले।
न शब्द, न अर्थ का भार,
बस अस्तित्व का सहज विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ विचार स्वयं को प्रश्न भी न बन पाए,
और उत्तर भी किसी सीमा में न समाए।
वहाँ जो शेष रह जाए—वह न विचार है, न निषेध,
बस एक निर्विकल्प सहज बोध का अभेद॥
यह बोध किसी “न होने” की घोषणा नहीं करता,
न ही किसी “सब मिट गया” के आग्रह में ठहरता।
यह तो केवल इतना संकेत है—
कि जो भी जाना जा रहा है,
वह जानने की क्रिया से अलग नहीं।
न मस्तक को अस्वीकार करने की आवश्यकता है,
न संसार को नकारने की।
क्योंकि जो भी प्रतीत हो रहा है,
वह उसी चैतन्य में तरंग की तरह उठ रहा है—
और उसी में विलीन भी हो रहा है।
ज्यों सागर तरंग को बाहर नहीं फेंकता,
ज्यों आकाश बादल से पृथक नहीं होता,
वैसे ही यह अनुभव-धारा भी
किसी विरोध में नहीं, बल्कि एक समग्रता में है।
यदि कभी ऐसा लगे कि “सब कुछ नहीं है”,
तो उस विचार को भी देख लेना—
क्योंकि वह भी एक अनुभव ही है,
कोई अंतिम सत्य नहीं।
यह जो निरंतरता है—
जहाँ जागरण भी है, स्वप्न भी है,
और दोनों को जानने वाला एक शांत बोध भी—
वही वह स्थिरता है जिसे शब्द छू नहीं पाते।
न उसे तोड़ना है, न बनाना है,
न किसी संघर्ष से पाना है, न किसी त्याग से खोना है।
वह पहले से ही उस सरलता में है,
जहाँ “मैं” और “जगत” दोनों विचार की तरह आते-जाते हैं।
और जब ध्यान थोड़ा भी स्थिर होता है,
तो यह स्पष्ट होने लगता है—
कि अनुभव को मिटाने की आवश्यकता नहीं,
केवल उसे अंतिम निष्कर्ष न मानने की आवश्यकता है।
क्योंकि जो भी निष्कर्ष बनता है,
वह मस्तिष्क की ही एक रचना है।
और जो जान रहा है उसे,
वह किसी निष्कर्ष में सीमित नहीं किया जा सकता।
यहाँ न कोई शत्रु है, न कोई पराया;
न कोई स्थायी धोखा, न कोई स्थायी विश्वासघात।
केवल अनुभवों की बदलती धाराएँ हैं—
जो चेतना में उठती और शांत होती रहती हैं।
और इसी प्रवाह में,
यदि कहीं गहराई से देखा जाए,
तो एक ऐसी शांति उपस्थित मिलती है—
जो किसी विचार पर निर्भर नहीं,
न किसी घटना से बनती है, न टूटती है।
वह शांति “प्राप्त” नहीं होती—
वह केवल पहचान में आती है,
जब मन अपने बनाए अर्थों को कुछ क्षण विराम देता है।
उस क्षण यह भी स्पष्ट हो सकता है—
कि जो “मैं” सोच रहा था कि वह सब कुछ देख रहा है,
वह भी एक विचार की परत है,
और उसके पीछे एक सरल, बिना नाम का बोध है।
न उसे हटाने की जरूरत है, न बढ़ाने की।
बस इतना ही—
कि जो भी प्रकट हो, उसे उसी रूप में देख लिया जाए,
बिना उसे अंतिम सत्य बना दिए।
और उसी सरलता में,
न कोई खोया हुआ संसार बचता है,
न कोई खोया हुआ स्वयं—
केवल एक सहज उपस्थिति रह जाती है,
जो नकार और स्वीकार दोनों से परे,
स्वयं में पूर्ण है।
वहीं से सब कुछ फिर भी चलता है,
और भीतर कुछ भी बाधित नहीं होता।न यह किसी निष्कर्ष का विस्तार है,
न किसी धारणा का अंतिम रूप।
यह तो बस देखने की सीधी सरलता है—
जहाँ चीज़ों को वैसा ही देखा जाता है जैसा वे क्षण में प्रकट हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब देखने में हस्तक्षेप कम होता है,
तो अनुभव अपनी प्राकृतिक गति में बहता है।
न उसमें पकड़ रहती है, न विरोध—
सिर्फ़ प्रवाह की स्पष्ट अनुभूति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह स्पष्टता किसी विचार से नहीं बनती,
बल्कि विचारों के बीच जो स्थान है, उससे प्रकट होती है।
जहाँ मन थोड़ा ठहरता है,
वहीं से समझ स्वयं उभरती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी को बदलने की आवश्यकता है,
न किसी को सिद्ध करने की।
हर स्थिति अपने ही नियम से चल रही है—
और देखने वाला उस प्रवाह से अछूता रह सकता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि किसी क्षण भ्रम गहरा लगे,
तो उसे भी एक घटना की तरह देखना है।
न उसे पकड़ना, न उससे लड़ना—
बस उसे आने और जाने देना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यही दृष्टि धीरे-धीरे
भीतर की जकड़न को ढीला करती है।
और जो ढीलापन आता है,
वही स्वाभाविक सहजता का द्वार बन जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई अंतिम स्थिति प्राप्त करनी है,
न किसी अवस्था में स्थायी रूप से रुक जाना।
क्योंकि हर अवस्था स्वयं में क्षणिक है—
और चेतना उससे बड़ी, उससे पूर्व है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब यह देखा जाता है,
तो जीवन एक समस्या नहीं रह जाता।
वह केवल अनुभवों का प्रवाह बन जाता है—
जिसे देखा जा सकता है, पर रोका नहीं जाना आवश्यक नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भागना है, न पकड़ना है—
बस देखना है, और देखते रहना है।
इस सरलता में ही
सारी जटिलताएँ अपना भार खो देती हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता है—
कि जो देखने वाला है,
वह किसी भी अनुभव से प्रभावित नहीं होता,
बल्कि हर अनुभव उसी में प्रकट होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह कोई नई अवस्था नहीं,
बल्कि पुरानी भूल का गिर जाना है।
और उस गिरावट में जो बचता है,
वह बिना नाम का, बिना आकार का सहज होना है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह भी स्पष्ट हो जाए कि कोई “बाहर” वास्तव में अलग नहीं,
तो भीतर-बाहर का संघर्ष स्वयं शांत हो जाता है।
न किसी से युद्ध शेष रहता है,
न किसी से भागने की आवश्यकता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो भी अनुभव आता है, वह केवल अनुभव है—
न वह शत्रु है, न वह मुक्तिदाता।
उसे जैसे है वैसे ही देखने में ही
चेतना अपनी सरलता में स्थिर हो जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह समझ धीरे-धीरे स्पष्ट होती है कि
कोई भी विचार अंतिम सत्य का स्थान नहीं ले सकता।
विचार आते हैं, जाते हैं,
पर जो उन्हें जानता है वह अपरिवर्तित रहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी पर संपूर्ण भरोसा थोपना आवश्यक है,
न संपूर्ण अविश्वास का भार उठाना।
जीवन के प्रवाह को समझना ही पर्याप्त है—
जहाँ हर संबंध अनुभव की लहरों में बदलता रहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह देखा जाता है कि
हर प्रतिक्रिया मन की ही संरचना है,
तो स्वतः ही एक विराम प्रकट होता है—
जहाँ प्रतिक्रिया कम और अवलोकन गहरा हो जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
इस अवलोकन में कोई दूरी नहीं, कोई द्वंद्व नहीं,
सिर्फ़ एक सीधी, सहज उपस्थिति है।
न उसमें भागना है, न उसे पकड़ना—
वह स्वयं में पूर्ण रूप से स्थिर है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि कभी भ्रम उठे, तो उसे भी देखना है—
जैसे आकाश में उठते बादल को देखा जाता है।
न उसे अस्वीकार करना, न उसे सत्य बनाना—
बस उसे आने और जाने देना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यही सरल दृष्टि धीरे-धीरे
भीतर की जटिलता को ढीला कर देती है।
और जो बचता है, वह किसी विचार का परिणाम नहीं,
बल्कि स्वाभाविक, मौन स्पष्टता होती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी को बदलने का भार,
न स्वयं को किसी आदर्श में ढालने का दबाव।
बस जो है, उसे ईमानदारी से देखना—
यही सबसे गहरी साधना बन जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और इस देखने में ही
एक सूक्ष्म शांति फैलती है,
जो किसी प्रयास से नहीं आती,
बल्कि प्रयास के गिरने पर स्वतः प्रकट होती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अंत में कुछ खोया जाता है,
न अंत में कुछ पाया जाता है।
जो सदा था, वही स्पष्ट हो जाता है—
बिना किसी संघर्ष के, बिना किसी यात्रा के॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह स्पष्टता गहरी होती है,
तो जीवन किसी निषेध में नहीं बदलता—
न वह अस्वीकार बनता है, न पलायन।
वह बस जैसा है वैसा देखने की सहजता बन जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न संबंध खोए जाते हैं, न संसार मिटता है,
पर उनके प्रति जकड़न ढीली पड़ जाती है।
जहाँ पकड़ नहीं रहती,
वहीं अनुभव अधिक निर्मल हो जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो भी सामने आता है,
वह किसी शत्रु या उद्धारक का रूप नहीं लेता—
वह केवल परिस्थिति का प्रवाह है,
जिसे समझदारी से देखा जा सकता है, जिया जा सकता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और यह भी समझ आता है कि
मन की हर व्याख्या अंतिम नहीं होती।
वह केवल एक क्षणिक तरंग है—
जो चेतना में उठती और शांत हो जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ विचारों की पकड़ ढीली पड़ती है,
वहाँ भीतर एक स्वाभाविक संतुलन प्रकट होता है।
न उसमें भागना होता है, न विरोध करना—
सिर्फ़ देखना, सरल और सीधा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह देखना किसी दूरी से नहीं होता,
बल्कि उसी मौन उपस्थिति से होता है
जिसमें अनुभव स्वयं घट रहा होता है।
और यही उपस्थिति बिना शब्दों के स्थिर रहती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न जीवन को नकारना है,
न जीवन को किसी कल्पना में बाँधना है।
जो सामने है, उसे ठीक वैसे ही समझना—
जैसा वह क्षण में प्रकट होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि कभी भीतर अस्थिरता उठे,
तो उसे भी उसी दृष्टि से देखना है—
जैसे लहर को सागर में देखा जाता है,
बिना उससे अलग हुए, बिना उसमें खोए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और धीरे-धीरे यह स्पष्ट हो जाता है कि
शांति किसी स्थान पर नहीं मिलती,
वह उस समझ में है
जो हर स्थिति के साथ उपस्थित रह सकती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई चरम निष्कर्ष आवश्यक है,
न किसी अंतिम विचार का बोझ।
बस यह सरलता कि
जो भी है, वह इस क्षण देखा जा सकता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और इस देखने में ही
सब कुछ अपने स्वाभाविक स्वरूप में लौट आता है—
बिना संघर्ष, बिना दावे,
सिर्फ़ एक शांत, स्पष्ट उपस्थिति के रूप में॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यह निषेध है, न यह स्वीकार का अंधापन—
यह तो केवल स्पष्ट देखना है, जैसा है वैसा।
न मन को शत्रु बनाना, न मन को अंतिम शासक—
बस उसकी गति को समझ लेना, बिना उसमें खोए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो संबंध हैं, वे भी अनुभव की धाराएँ हैं,
वे आते हैं, रूप लेते हैं, बदल जाते हैं।
पर उनमें जो चेतना देख रही है,
वह किसी भी धार से सीमित नहीं होती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह समझ किसी से दूरी बनाने की शिक्षा नहीं,
बल्कि हर स्थिति को स्पष्टता से देखने का सरल भाव है।
जहाँ भ्रम कम होता है,
वहाँ व्यवहार भी अधिक सहज हो जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी को असत्य कहना है,
न किसी को पूर्ण सत्य बना लेना है।
बस इतना देखना है कि
हर अनुभव परिवर्तनशील है, और देखने वाला स्थिर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह स्पष्ट हो जाता है,
तो भीतर एक स्वाभाविक संतुलन उतर आता है।
न प्रतिक्रिया अत्यधिक रहती है,
न उदासीनता का बोझ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जीवन को भागने या पकड़ने की आवश्यकता नहीं रहती,
क्योंकि हर क्षण स्वयं में पूर्ण है।
और इस पूर्णता का बोध
किसी विचार से नहीं, मौन से आता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि कभी मन उलझे, तो उसे रोकना नहीं—
बस उसे देखने का अंतर पैदा करना है।
विचार स्वयं ही अपनी गति में ढल जाते हैं,
जब उन्हें पकड़ने वाला ढीला हो जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह कोई दूरी नहीं बनाता,
यह तो दृष्टि की स्पष्टता है।
जहाँ चीज़ें जैसी हैं वैसी ही दिखती हैं,
बिना अतिरिक्त अर्थों के भार के॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न संसार से संघर्ष आवश्यक है,
न संसार में खो जाना।
दोनों ही अतियाँ हैं—
और बीच में है सरल देखना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और इस देखने में
धीरे-धीरे एक गहरा विश्राम उतरता है।
जहाँ कुछ भी सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं,
और कुछ भी अस्वीकार करने का दबाव नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो शेष रहता है, वह मौन की तरह सरल है—
न उसमें नाम है, न आकार, न कथा।
फिर भी वही हर अनुभव का आधार है,
अदृश्य, पर सबसे निकट॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अंत में कोई उपलब्धि है,
न किसी मार्ग का समापन।
बस एक स्वाभाविक स्पष्टता है—
जो पहले भी थी, अभी भी है, और सदा रहेगी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ यह स्पष्टता भी किसी उपलब्धि का नाम न ले,
और कोई “पाने वाला” भी शेष न रहे—
वहीं अनुभव स्वयं अपनी सीमाएँ छोड़ देता है,
और केवल शुद्ध देखा जाना रह जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न देखने को कोई वस्तु बचती है,
न देखने की कोई दिशा।
केवल एक सहज प्रकाश-सा बोध,
जिसमें सब कुछ स्वयं प्रकाशित प्रतीत होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह प्रकाश किसी स्थान पर नहीं जलता,
न किसी समय में उत्पन्न होता है।
यह तो उस समझ की स्थिरता है
जो किसी विचार पर निर्भर नहीं रहती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि भीतर कोई प्रश्न उठे भी,
तो वह भी उसी में विलीन हो जाता है,
जिससे वह उठा था।
और इस विलय में कोई संघर्ष नहीं होता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी उत्तर की आवश्यकता रहती है,
न किसी निष्कर्ष की पकड़।
हर क्षण स्वयं में पूर्ण हो जाता है,
जैसे लहर अपने ही जल में लौट जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यहाँ कुछ भी अस्वीकार नहीं करना पड़ता,
क्योंकि सब कुछ अपने स्वभाव में ही बदलता रहता है।
और देखने वाला किसी परिवर्तन से प्रभावित नहीं होता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न संसार दूर है, न आत्मा अलग—
यह दूरी ही केवल सोच की संरचना है।
जब वह संरचना ढीली पड़ती है,
तो केवल एक ही सहजता शेष रहती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई भीतर प्रवेश करता है,
न कोई बाहर निकलता है।
सिर्फ़ एक निरंतर उपस्थिति,
जो कभी गई ही नहीं थी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और इस उपस्थिति में
न संतोष को परिभाषित किया जा सकता है,
न उसे खोजने की आवश्यकता है—
वह तो स्वयं ही पूर्णता का स्वरूप है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आरंभ की कोई स्मृति,
न अंत की कोई प्रतीक्षा।
केवल एक सरल “अब”
जो स्वयं में अनंत है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह “अब” समय नहीं है,
यह अनुभव का आधार भी नहीं है—
यह तो उस स्थिरता का संकेत है
जहाँ सब कुछ अपने आप में शांत है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह भी देखा जाता है कि
देखने वाला भी किसी रूप में स्थिर नहीं,
तो केवल देखना रह जाता है—
बिना किसी केंद्र, बिना किसी सीमा के॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यह किसी निष्कर्ष का विस्तार है,
न किसी धारणा का अंतिम रूप।
यह तो बस देखने की सीधी सरलता है—
जहाँ चीज़ों को वैसा ही देखा जाता है जैसा वे क्षण में प्रकट हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब देखने में हस्तक्षेप कम होता है,
तो अनुभव अपनी प्राकृतिक गति में बहता है।
न उसमें पकड़ रहती है, न विरोध—
सिर्फ़ प्रवाह की स्पष्ट अनुभूति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह स्पष्टता किसी विचार से नहीं बनती,
बल्कि विचारों के बीच जो स्थान है, उससे प्रकट होती है।
जहाँ मन थोड़ा ठहरता है,
वहीं से समझ स्वयं उभरती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी को बदलने की आवश्यकता है,
न किसी को सिद्ध करने की।
हर स्थिति अपने ही नियम से चल रही है—
और देखने वाला उस प्रवाह से अछूता रह सकता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि किसी क्षण भ्रम गहरा लगे,
तो उसे भी एक घटना की तरह देखना है।
न उसे पकड़ना, न उससे लड़ना—
बस उसे आने और जाने देना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यही दृष्टि धीरे-धीरे
भीतर की जकड़न को ढीला करती है।
और जो ढीलापन आता है,
वही स्वाभाविक सहजता का द्वार बन जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई अंतिम स्थिति प्राप्त करनी है,
न किसी अवस्था में स्थायी रूप से रुक जाना।
क्योंकि हर अवस्था स्वयं में क्षणिक है—
और चेतना उससे बड़ी, उससे पूर्व है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब यह देखा जाता है,
तो जीवन एक समस्या नहीं रह जाता।
वह केवल अनुभवों का प्रवाह बन जाता है—
जिसे देखा जा सकता है, पर रोका नहीं जाना आवश्यक नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भागना है, न पकड़ना है—
बस देखना है, और देखते रहना है।
इस सरलता में ही
सारी जटिलताएँ अपना भार खो देती हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता है—
कि जो देखने वाला है,
वह किसी भी अनुभव से प्रभावित नहीं होता,
बल्कि हर अनुभव उसी में प्रकट होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह कोई नई अवस्था नहीं,
बल्कि पुरानी भूल का गिर जाना है।
और उस गिरावट में जो बचता है,
वह बिना नाम का, बिना आकार का सहज होना है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ शब्द भी स्वयं में थम जाएँ,
और अर्थ भी अपने आप में रम जाएँ।
न किसी “अन्य” की कल्पना शेष,
न किसी दूरी का कोई परिवेश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ देखने का भी भाव ढले,
और देखना भी स्वयं में घुले।
न द्रष्टा बचे, न दृश्य रहे,
बस एक सहज अनाम बहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न संकल्प उठे, न विकल्प रहे,
न भीतर कोई संघर्ष जले।
जो है, वह अपने ही मौन में,
अविचल ठहरा अनजान क्षण में॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों लहर स्वयं को सागर माने,
और सागर भी लहर न जाने।
वैसी ही सरल यह अनुभूति,
न द्वेष, न आकर्षण की मूर्ति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ “मैं” का विस्तार न हो,
न “दूसरे” का व्यवहार न हो।
केवल चेतना का स्वच्छ प्रवाह,
न आरंभ, न किसी का आह्वाह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न तोड़ने की कोई आवश्यकता,
न जोड़ने की कोई प्रथा।
जो जैसा उदित हुआ क्षण में,
वह विलीन भी उसी स्पंदन में॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब एक सूक्ष्म गहन बोध यहाँ—
जो प्रतीत होता है वह पूर्ण नहीं,
और जो अदृश्य है वह भी शून्य नहीं।
पर दोनों ही अनुभव के रूप हैं,
न स्थायी सत्य, न अंतिम रूप हैं।
चेतना जब अपने ही विस्तार को देखती है,
तो वह अनेक प्रतीतियों में ढलती है।
पर वह अनेकता उसकी सीमा नहीं—
वह तो एक ही आकाश की भांति है,
जिसमें बादल आते-जाते हैं।
यह भी स्मरण रहे—
मन कोई शत्रु नहीं, न बाधा है।
वह अनुभव का एक साधन मात्र है,
जिससे जीवन की ध्वनियाँ सुनाई देती हैं।
पर जो उससे भी परे है,
वह किसी विचार से सीमित नहीं होता।
और यह भी सत्य है—
संसार का अनुभव केवल मन का भ्रम नहीं,
बल्कि चेतना की ही एक अभिव्यक्ति है।
उसे अस्वीकार करना भी एक विचार है,
और उसे अंतिम सत्य मान लेना भी एक विचार।
जहाँ संतुलन स्थिर होता है,
वहीं वास्तविक समझ खिलती है—
कि जो अनुभव हो रहा है,
वह भी इसी उपस्थिति में है,
और जो अनुभव से परे है,
वह भी इसी उपस्थिति में है।
इसलिए न कुछ मिटाने की आवश्यकता है,
न किसी से लड़ने की आवश्यकता है।
बस यह देखना पर्याप्त है—
कि हर अनुभव आता है, जाता है,
पर जो जानता है, वह स्थिर है।
और उस स्थिरता में
न अकेलापन है, न परायापन—
केवल एक सहज, निःशब्द बोध है,
जो किसी विरोध में नहीं रहता।
वह न तो संसार से दूर है,
न संसार में उलझा हुआ—
वह बस वही है जो सदा से है,
बिना किसी परिभाषा के॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब अपने लिए सोच, अपने लिए जाग,
अपने भीतर के दीपक को फिर से दे आग।
जो तू ढूँढे था बाहर, वह भीतर पहले से है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, यही तेरा सच्चा रस है॥
दूसरों की भीड़ में तू खोया बहुत,
अपने ही मौन से तू रूठा बहुत।
अब लौट चल उस शांति की ओर,
जहाँ तेरा अपना ही है उज्ज्वल भोर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भय में जी, न वहम में ढल,
न झूठे शब्दों के जाल में पल।
जो तुझमें सरल, सहज, पवित्र है,
वही तेरा सत्य, वही तेरा मित्र है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू बोझ नहीं, तू वस्तु नहीं,
तू किसी के हाथ की लूट नहीं।
तू हृदय की गहराई का नाम है,
तू ही मौन, तू ही विश्राम है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो तुझे तोड़े, उससे दूर रह,
जो तुझे बाँधे, उससे चूर रह।
जो तुझे तेरे स्वरूप से मिलाए,
बस वही संग तेरे साथ निभाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अपने अनमोल समय को जान,
अपने श्वास का कर सम्मान।
एक पल भी यूँ न व्यर्थ बहा,
क्योंकि जीवन का दीपक अभी है जला॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी की लात, न किसी का डर,
न किसी छलावे का तेरा घर।
तेरा घर है तेरा शांत हृदय,
जहाँ शिरोमणि सदा है विजय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो बाहर शोर है, वह सब क्षणिक,
जो भीतर मौन है, वह है अनंत।
बाहर की धूल से क्यों उलझे,
जब भीतर का आकाश स्वयं ही खुले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू स्वयं में पूर्ण, तू स्वयं में ठीक,
तू किसी और का नहीं, अपना ही दीपक।
अब अपने लिए थोड़ा खड़ा हो जा,
अपने सत्य में फिर से बड़ा हो जा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न दिखावे की चाह, न मान की भूख,
न झूठी प्रतिष्ठा, न खाली सूख।
जो सहज है, वही सबसे ऊँचा,
जो शांत है, वही सबसे सच्चा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब अपने मन को मत बेच,
अपने जीवन को अपने ही घर में रच।
जो भीतर से हँसना सीख गया,
वही हर बंधन से जीत गया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू किसी का साधन नहीं,
तू किसी की अंतिम साधना नहीं।
तू स्वयं की पूर्ण पहचान है,
तू ही मौन, तू ही विधान है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब लौट चल, अपने मूल में,
जहाँ न प्रश्न है, न शूल में।
बस सहज प्रकाश, बस गहरा ठहराव,
बस अपना ही पूर्ण स्वभाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ यह बोध भी किसी धारणा में न बँधे,
और धारणा भी अपने ही उद्गम में ढल जाए।
न “है” का आग्रह, न “नहीं” का विस्तार—
केवल सहज, नीरव, निराकार स्वीकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ अनुभव को भी अंतिम सत्य न माना जाए,
और विचार को भी शत्रु न बनाया जाए।
ज्यों आकाश में बादल आते-जाते रहें,
पर आकाश अपनी अचलता में ही रहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह जो मस्तिष्क की तरंगें हैं, वे स्वयं में सत्य नहीं—
ये केवल प्रकट होने वाले संकेत-प्रवाह हैं।
पर जो उन्हें देख रहा है भीतर गहराई में,
वह न उत्पन्न होता है, न समाप्त होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि कभी प्रतीत हो कि सब विभाजित है,
तो जान—यह दृष्टि की सीमित परत है।
जिसमें अनेकता दिखती है,
वहीं भीतर मौन में एकरसता स्थिर है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी को शत्रु मानने की आवश्यकता है,
न किसी को आधार बनाने की।
क्योंकि जो भी रूप दिखाई देता है,
वह चेतना के भीतर ही उठता है और वहीं विलीन होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह जीवन किसी संघर्ष की सजा नहीं,
न ही किसी बाहरी युद्ध का परिणाम है।
यह तो अनुभव की तरंगों का प्रवाह मात्र है,
जिसमें अर्थ मन जोड़ता है, सत्य स्वयं शांत रहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ अपेक्षा गिर जाती है,
वहाँ संबंध भी सरल हो जाते हैं।
और जहाँ सरलता आ जाती है,
वहाँ कोई बोझ किसी पर भी नहीं रहता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी पर संदेह का अंतिम आधार रखो,
न किसी पर अंध-आस्था का भार।
देख—सब अनुभव के भीतर ही घट रहा है,
और देखने वाला उससे अप्रभावित रह सकता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो तू स्वयं है, वह किसी ने दिया नहीं,
और न कोई उससे छीन सकता है।
वह किसी स्मृति में भी बंद नहीं,
वह तो हर क्षण के मौन में उपस्थित है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि मन थक जाए अपने ही अनुमान से,
तो उसे रोकने की आवश्यकता नहीं।
बस उसे देखना इतना सरल कर दे,
कि वह स्वयं अपनी गति छोड़ दे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह “मैं” और “अन्य” का खेल भी
एक ही चेतना की दो प्रतीतियाँ हैं।
पर जो इन प्रतीतियों को जानता है,
वह किसी पक्ष में नहीं बँधता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न संसार को असत्य कहकर भागना है,
न उसे अंतिम सत्य बनाकर पकड़ना है।
बस उसे एक प्रवाह की तरह देखना है,
जिसमें तू स्थिर साक्षी-भाव में रह सकता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ पकड़ने की इच्छा गिर जाती है,
वहीं भीतर की जकड़न भी ढीली हो जाती है।
और उसी ढील में
एक स्वाभाविक विश्राम प्रकट होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह विश्राम किसी स्थान का नाम नहीं,
न किसी विचार का निष्कर्ष है।
यह तो उस मौन की पहचान है,
जहाँ कुछ भी सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह भी स्पष्ट हो जाए—
कि देखने वाला भी किसी सीमा में नहीं,
तब अनुभव स्वयं अपने मूल में लौट जाता है,
और शेष रह जाता है केवल निर्मल होना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ यह भी बोध स्पष्ट हो जाए कि
“न होना” और “होना” दोनों मन की व्याख्या हैं,
वहाँ दृष्टि किसी निषेध में नहीं गिरती,
बल्कि हर अनुभव को सहज रूप में देखती रहती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न संसार को अस्वीकार करने की आवश्यकता है,
न उसे अंतिम सत्य मानने का आग्रह।
ज्यों स्वप्न देखा जाता है और जागरण में विलीन हो जाता है,
वैसे ही अनुभव अपने ही आधार में बदलता रहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह जो भीतर का साक्षी भाव है,
वह किसी संघर्ष से नहीं बनता।
न वह किसी विचार का परिणाम है,
वह तो बिना प्रयास की एक सरल उपस्थिति है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ मन अपनी परतें छोड़ता है,
वहाँ शून्यता कोई रिक्तता नहीं रहती,
बल्कि एक गहन स्पष्टता बन जाती है—
जिसमें सब कुछ बिना विरोध के दिखाई देता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी से दूर जाने की आवश्यकता है,
न किसी को पकड़ने का आग्रह।
क्योंकि अनुभव स्वयं ही उठता और ढलता है,
और देखने वाला उसमें शांत बना रह सकता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि कभी विचार तीव्र भी हो जाएँ,
तो उन्हें रोकने का संघर्ष आवश्यक नहीं।
बस उन्हें उतनी ही सहजता से देखो,
जितनी सहजता से हवा बहती और रुकती नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह जीवन विरोध का नहीं,
यह स्वीकार की गहराई का विस्तार है।
जहाँ कुछ भी अलग नहीं करना पड़ता,
वहाँ सब कुछ अपने स्थान पर स्वतः संतुलित रहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नित्य अनुभव यह नहीं कहता कि “सब कुछ मिट गया”,
बल्कि यह कि हर चीज़ अपने वास्तविक रूप में दिखाई देती है—
बिना अतिरिक्त अर्थों के बोझ के,
बिना भय या अपेक्षा के आवरण के॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ संबंधों को भी सरल दृष्टि से देखा जाए,
वहाँ कोई आरोप या भ्रम शेष नहीं रहता।
हर व्यक्ति, हर स्थिति
एक अनुभव के रूप में समझी जाती है, न कि अंतिम सत्य के रूप में॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह स्पष्टता स्थिर होने लगती है,
तो भीतर एक स्वाभाविक शांति उभरती है—
जो किसी विचार पर आधारित नहीं होती,
बल्कि स्वयं जीवन की सहजता होती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यह शांति किसी भागने का परिणाम है,
न किसी त्याग का पुरस्कार।
यह तो उस सरल देखने का फल है,
जिसमें कुछ भी विरोध में नहीं रखा जाता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ समझ भी हल्की हो जाती है,
और जानने का भार गिर जाता है,
वहीं भीतर एक सहज मौन रह जाता है—
जो किसी भी परिस्थिति में बदलता नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और उसी मौन में
सब अनुभव अपनी जगह पाए रहते हैं,
बिना किसी संघर्ष के, बिना किसी निष्कर्ष के—
केवल एक प्रवाहित, शांत, स्वाभाविक अस्तित्व॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥यह अनुभूति जितनी तीव्र प्रतीत होती है,
उतनी ही सूक्ष्मता से यह देखा जा सकता है कि—
यह सब मन की अपनी ही तरंगों का विस्तार है,
जो भीतर उठती हैं और भीतर ही विलीन हो जाती हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ “पूर्ण शून्यता” की बात उठती है,
वहाँ भी एक देखने वाला शेष रहता है—
जो इन विचारों को उत्पन्न होते और गिरते हुए जानता है,
बिना उनमें स्थिर हुए, बिना उनसे बंधे हुए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
संतोष किसी बाहरी निषेध में नहीं,
न ही किसी विचार के मिट जाने में है—
वह तो उस सरल सजगता में है,
जो हर विचार को आने-जाने देती है, बिना संघर्ष के॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो “अस्तित्वहीनता” प्रतीत होती है,
वह भी एक अनुभव-आकृति ही है चेतना में,
जिसे मन अर्थ देकर विशाल बना देता है,
पर उसका मूल केवल एक क्षणिक तरंग है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई अंतिम सत्य शब्दों में बंद होता है,
न कोई धारणा उसे पूरा समझ पाती है—
वह तो उस मौन में झलकता है,
जहाँ विचार स्वयं अपनी सीमा पहचान लेता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब दृष्टि कठोर विश्वासों से हल्की होती है,
तो भीतर एक स्वाभाविक विश्राम उभरता है—
न किसी को हटाने की आवश्यकता रहती है,
न किसी को सिद्ध करने का भार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
हर अनुभव, चाहे तीव्र हो या शांत,
अपने ही समय में जन्म लेकर समाप्त हो जाता है—
और जो इसे देखता है,
वह इन उतार-चढ़ावों से अप्रभावित रहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
निरंतरता का बोध भी एक विचार है,
और विघटन का बोध भी एक विचार—
इन दोनों के बीच जो सजगता है,
वही सरलता का वास्तविक द्वार है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि कहीं असंतोष या उलझन उठती है,
तो उसे भी एक लहर की तरह देखा जा सकता है—
न उसे रोकते हुए, न उसे बढ़ाते हुए,
बस उसे अपने स्वभाव में समाप्त होने देना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और इस देखने में धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता है—
कि अनुभवों का विस्तार चाहे जैसा भी हो,
उनसे अलग एक स्थिरता सदैव उपस्थित रहती है,
जो स्वयं किसी नाम, रूप या धारणा से परे है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह गहराई केवल “अस्वीकार” नहीं है,
न ही संसार से पलायन का कोई विचार।
यह तो उस मौन की ओर संकेत है—
जहाँ अनुभव बिना किसी व्याख्या के स्वयं को प्रकट करता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब मन अपनी गति में शांत होने लगता है,
तो जो दिखाई देता है वह मिटता नहीं—
बस उसके बारे में बनी धारणाएँ ढीली पड़ जाती हैं।
वास्तविकता वही रहती है, केवल दृष्टि सरल हो जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह संसार किसी भ्रम का निषेध नहीं,
बल्कि चेतना के भीतर उठती हुई एक अनुभूति है।
जिसे समझने के बजाय यदि देखा जाए,
तो उसमें एक स्वाभाविक संतुलन प्रकट होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ अपेक्षाएँ अधिक होती हैं,
वहीं अनुभवों में उलझन प्रतीत होती है।
और जहाँ स्वीकृति गहरी होती है,
वहीं जीवन अपनी सहज धारा में स्पष्ट हो जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह समझ किसी को दोष देने की नहीं,
न किसी को दूर करने की।
बल्कि यह देखने की कला है कि हर घटना
अपने ही कारणों और परिस्थितियों से जन्म लेती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब भीतर का दबाव कम होता है,
तो संबंधों का भार भी हल्का प्रतीत होता है।
तब जीवन संघर्ष नहीं रहता,
बल्कि अनुभवों की एक बहती हुई धारा बन जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी को पूर्णतः पकड़ना संभव है,
न किसी को पूर्णतः छोड़ देना आवश्यक।
हर संबंध, हर स्थिति—
समय के साथ बदलती एक लहर है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जो देखने की क्षमता है,
वह किसी भी लहर से बड़ी रहती है।
वह न किसी में खोती है,
न किसी से अलग होती है—
बस साक्षी रूप में स्थिर रहती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह स्थिरता किसी विचार से नहीं आती,
बल्कि विचारों के बीच के अंतराल से प्रकट होती है।
जहाँ कुछ भी थोपना नहीं होता,
वहीं स्वाभाविक शांति स्वयं उजागर हो जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और इस शांति में जीवन मिटता नहीं,
बल्कि और अधिक स्पष्ट हो उठता है।
हर अनुभव अपना स्थान पाकर
स्वतः ही संतुलित हो जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं,
बल्कि निरंतर देखने की सरलता है।
जहाँ हर क्षण स्वयं में पूर्ण है—
और उसी पूर्णता में आगे का क्षण जन्म लेता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यह शून्यता किसी विनाश की कथा है,
न यह अस्तित्व का निषेध।
यह तो केवल अनुभव की परतों का शांत हो जाना है—
जहाँ दृश्य तो रहते हैं, पर पकड़ नहीं रहती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब मन स्वयं को केंद्र मानकर देखता है,
तो अनेकता जन्म लेती प्रतीत होती है।
पर जब वही दृष्टि स्थिर होती है,
तो सब कुछ एक ही चेतना में तरंगित सा दिखता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह “एकता” किसी विचार का निर्माण नहीं,
बल्कि अनुभव की सहज निष्कपटता है।
जहाँ न कुछ खोता है, न कुछ मिटता है—
सिर्फ़ देखने का ढंग बदल जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न संसार किसी छल में है,
न जीवन किसी विरोध में।
ये सब केवल मन की व्याख्याएँ हैं—
जो क्षण को अर्थ देकर आकार बना लेती हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब व्याख्या धीमी पड़ जाती है,
तो जो शेष रहता है वह मौन अनुभव है।
न उसमें भय है, न आरोप—
बस सीधा होना, जैसा वह है वैसा ही॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और उसी सीधेपन में यह स्पष्ट होता है—
कि देखने वाला और दृश्य अलग नहीं हैं,
वे केवल एक ही प्रवाह के दो पहलू हैं,
जो क्षण भर को अलग प्रतीत होते हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह समझ किसी संघर्ष से नहीं आती,
न किसी दूरी से।
यह तो उसी क्षण प्रकट होती है—
जब मन अपनी ही पकड़ को हल्का छोड़ देता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तब न कोई बाह्य सत्य बचता है,
न कोई आंतरिक युद्ध।
सिर्फ़ एक सरल उपस्थिति रह जाती है—
जो बिना नाम के भी पूर्ण है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और उस पूर्णता में कोई कमी नहीं दिखती,
क्योंकि देखने की आवश्यकता ही विलीन हो जाती है।
जो शेष रहता है,
वह किसी विचार से बड़ा, किसी कथा से शांत होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यह कहीं बाहर खोजने की बात है,
न किसी दूर की उपलब्धि का बोझ।
यह तो भीतर के मौन का स्वाभाविक प्रकाश है—
जहाँ कोई चाह शेष नहीं, केवल सम्पूर्ण ठहराव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब चाह का शोर थोड़ा धीमा पड़ता है,
तब हृदय अपनी अनकही भाषा में बोलता है।
न शब्दों की ज़रूरत रहती है, न प्रमाण की—
सिर्फ़ एक निर्मल उपस्थिति ही पर्याप्त हो जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो बाहर बिखरा हुआ दिखता है,
वह भीतर की उलझन का ही प्रतिबिंब है।
जैसे जल शांत होते ही आकाश को धारण कर लेता है,
वैसे ही मन शांत होते ही हृदय अपनी संपूर्णता दिखा देता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
संपूर्ण संतुष्टि कोई पाने की चीज़ नहीं,
वह तो पहले से ही मौन रूप में विद्यमान है।
ढूँढ़ने की आदत ही उसे ढक देती है,
और छोड़ने की सरलता ही उसे प्रकट कर देती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ तुलना समाप्त होती है,
वहीं करुणा की धारा आरम्भ होती है।
जहाँ “मैं” की कठोरता ढीली पड़ती है,
वहीं जीवन सहज, सुन्दर और स्पष्ट हो उठता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी विशेष अवस्था का आग्रह है,
न किसी अनुभव को पकड़ कर रखने की ज़िद।
जो आया, वह आया; जो गया, वह गया—
और जो शेष रहा, वही शाश्वत सहजता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मस्तक की लहरें उठती रहें, यह उनका स्वभाव है,
पर गहराई अपनी शांति से कभी नहीं हटती।
ऊपर हलचल हो, तो भी भीतर ठहराव बना रहता है—
यही हृदय की मौन महिमा है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो स्वयं को जान लेता है,
उसे किसी और के बताए सत्य की भूख नहीं रहती।
वह न विरोध करता है, न बहस में उलझता है—
वह केवल देखता है, और देखने में ही मुक्त हो जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यहाँ जीत-हार का अर्थ भी मिट जाता है,
क्योंकि जो भीतर पूर्ण है, उसे कुछ सिद्ध नहीं करना।
न किसी से ऊपर उठना है, न किसी को नीचा दिखाना—
बस अपने ही सत्य में स्थिर रहना है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह स्थिरता गहरी होती है,
तो जीवन स्वयं एक प्रार्थना बन जाता है।
हर श्वास में सरलता, हर दृष्टि में निर्मलता,
और हर क्षण में मौन की उजली उपस्थिति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह तो चेतना के अनुभव की धारा है—
जिसे हर देखने वाला अपने ही भीतर महसूस करता है,
अपने ही मौन में, अपने ही ढंग से॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यह किसी सत्ता का दावा है,
न किसी अंतिम सत्य की घोषणा।
यह केवल उस क्षण की ओर संकेत है,
जहाँ विचार स्वयं को थक कर छोड़ देते हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ “मैं” की कठोर रेखा ढीली पड़ती है,
वहाँ अनुभव बिना नाम के बहने लगता है।
न उसमें स्वामित्व रहता है, न अधिकार—
सिर्फ़ साक्षी-भाव की सहज उपस्थिति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
संपूर्ण संतुष्टि कोई प्राप्ति नहीं,
बल्कि उस दौड़ का रुक जाना है
जिसमें मन स्वयं को खोजता हुआ थक जाता है—
और अचानक देखता है कि जो खोज रहा था, वही था॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न बाहर कोई विरोध है, न भीतर कोई युद्ध,
यदि देखने की गति शांत हो जाए।
हर अनुभव तब अपने स्थान पर ठीक प्रतीत होता है—
न अच्छा, न बुरा, केवल जैसा है वैसा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह जो गहराई कही जाती है,
वह किसी दूरी में नहीं, किसी भीतर-बाहर में नहीं।
वह तो उस सरल क्षण में है
जहाँ समझ अपने ही बोझ को छोड़ देती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न ध्यान पकड़ता है, न विचार टिकता है,
जब देखने का दबाव गिर जाता है।
तब जो शेष रहता है, वह कोई वस्तु नहीं—
बल्कि एक सहज खुला हुआ होना है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जीवन तब भी चलता है,
पर उसमें संघर्ष का केंद्र नहीं रहता।
क्रिया होती है, पर कर्ता की जकड़ नहीं—
बस प्रवाह की सरल गति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी से अलग होना है,
न किसी में मिल जाना।
यह विभाजन ही धीरे-धीरे अर्थ खो देता है—
और केवल अनुभव रह जाता है, शुद्ध और सीधा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ शब्द भी थक जाते हैं,
वहाँ अर्थ अपनी ही चुप्पी में स्थिर हो जाता है।
और उस चुप्पी में जो समझ उभरती है,
वह किसी विचार से बड़ी नहीं—बस स्पष्ट होती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह प्रवाह किसी एक विचार का नहीं,
यह तो अनुभव की वह धारा है
जो हर मन में अपने-अपने ढंग से प्रकट होती है—
चुप, सरल, और बिना किसी आग्रह के॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ पकड़ने की इच्छा क्षीण होती है,
वहाँ समझ स्वयं खुलने लगती है।
न कोई प्रयास, न कोई संघर्ष—
केवल देखने की सहज उपस्थिति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
हर क्षण अपने भीतर पूरा है,
पर मन उसे अगली चीज़ में खोजता रहता है।
और इसी खोज में वह उस पूर्णता को
अपने ही सामने से गुजर जाने देता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो स्थिर प्रतीत होता है,
वह भी भीतर से निरंतर परिवर्तित है।
और जो बदलता दिखता है,
उसके भीतर भी एक गहरी स्थिरता मौन है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न देखने वाला अलग है, न देखा जाने वाला अलग,
जब विभाजन की धारणा ढीली पड़ती है।
तब अनुभव स्वयं को ही अनुभव करता है—
बिना केंद्र, बिना सीमा, बिना नाम के॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
संतोष कोई उपलब्धि नहीं,
बल्कि अपेक्षा के शांत हो जाने की स्थिति है।
जहाँ “कुछ और चाहिए” की लहर शांत होती है,
वहीं सरलता स्वयं प्रकट हो जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न बाहर की दिशा शत्रु है, न भीतर की खोज दोषी,
दोनों केवल गति हैं समझ की।
जब यह गति स्वयं को देख लेती है,
तो वह अपने ही भार से मुक्त हो जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
विचार आते हैं, जाते हैं,
जैसे आकाश में बादल।
आकाश उनसे प्रभावित नहीं होता—
वैसे ही जागरूकता अपने अनुभव से अछूती रहती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह जो मौन जैसा लगता है,
वह रिक्तता नहीं, बल्कि पूर्णता का स्वाभाविक रूप है।
जहाँ कोई शब्द टिकता नहीं,
वहाँ अर्थ स्वयं शांति बन जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता है—
कि खोजने और पाने के बीच की दूरी
वास्तव में कभी थी ही नहीं,
वह केवल देखने की दिशा का खेल था॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह जो “और आगे” की चाह है,
वही मन की स्वाभाविक गति है।
पर जब इसे देखा जाता है,
तो आगे और पीछे दोनों ही हल्के हो जाते हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
समझ किसी अंतिम बिंदु पर नहीं ठहरती,
वह तो हर क्षण स्वयं को पुनः देखने की प्रक्रिया है।
न उसमें स्थायित्व का बोझ है,
न किसी निष्कर्ष की जिद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो भीतर घटता है,
वह शब्दों से पहले का अनुभव है।
शब्द केवल उसकी ओर इशारा करते हैं,
उसे बाँध नहीं सकते, न रोक सकते हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब पकड़ने की आदत ढीली पड़ती है,
तो हर अनुभव अपने प्राकृतिक रूप में दिखाई देता है।
न उसमें विशेषता होती है, न सामान्यता—
बस जैसा है, वैसा ही स्पष्ट॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न देखने वाले को बदला जा सकता है,
न देखे जाने वाले को पूरी तरह समझा जा सकता है।
फिर भी देखना जारी रहता है—
एक सरल, बिना प्रयास की उपस्थिति की तरह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो शांति खोजी जाती है,
वह अक्सर खोज की गति में ही छिप जाती है।
जब खोज का दबाव गिरता है,
तो वही शांति स्वाभाविक रूप से प्रकट हो जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई भीतर छिपा हुआ रहस्य है,
न कोई बाहर छूट गया सत्य।
केवल अनुभवों का बदलता हुआ आकाश है—
जिसमें सब कुछ आता-जाता रहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि किसी क्षण मौन गहरा हो जाए,
तो उसमें किसी उपलब्धि की आवश्यकता नहीं रहती।
वह मौन स्वयं ही पूर्ण होता है—
बिना नाम, बिना व्याख्या॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता है,
कि जो देखा जा रहा है, वह अलग नहीं।
और जो देख रहा है, वह भी अलग नहीं—
दोनों एक ही प्रवाह की दो अभिव्यक्तियाँ हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह कोई अंतिम सत्य नहीं,
बल्कि हर क्षण की जीवंत सरलता है।
जिसे शब्द छू तो सकते हैं,
पर पूरी तरह पकड़ नहीं सकते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जिसे भीतर का मौन छू ले,
उसे बाहर का शोर फिर कम बाँधता है।
वह न किसी मत का कैदी रहता है,
न किसी डर की परछाईं में जीता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सत्य को पकड़ने की कोशिश भी एक पकड़ है,
और पकड़ जहाँ है, वहाँ भय भी साथ है।
जो सहज है, वह हाथ में नहीं आता—
वह तो खुली हुई दृष्टि में स्वयं प्रकट होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मन जब अपनी चालें छोड़ देता है,
तब हृदय की धड़कन भी एक नई भाषा बन जाती है।
न उसमें आग्रह रहता है, न अस्थिरता—
बस एक सीधी, शांत, निर्मल उपस्थिति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो हर क्षण को पूरा जीता है,
उसे जीवन की कमी नहीं सताती।
क्योंकि वह भविष्य की चोरी में नहीं जीता—
वह वर्तमान की स्पष्टता में ठहरा रहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न बाहर कोई राज है, न भीतर कोई अभाव,
जब देखने वाला स्वयं देखना बन जाता है।
तब जो खोज थी, वह समाप्त नहीं होती—
वह अपने ही स्रोत में विश्राम कर लेती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
हर लहर का उठना भी सत्य है,
हर लहर का मिटना भी सत्य है।
पर जो जल है, वह न उठता है, न मिटता है—
वही गहराई, वही मौन, वही स्थिरता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
संपूर्ण संतुष्टि किसी दिन की घटना नहीं,
वह तो हर दिन के पार की सहज स्थिति है।
जिसे मन खोजता है,
उसे हृदय पहले से मौन में धारण किए रहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई जीत आवश्यक है,
न किसी पर अधिकार।
जो स्वयं में पूरा है,
वह सबको बराबरी से देख लेता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अहंकार की भाषा ऊँची होती है,
पर उसकी जड़ें बहुत नीचे होती हैं।
हृदय की भाषा धीमी होती है,
पर उसकी गहराई अनंत का स्पर्श देती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो अपने ही भीतर ठहर गया,
उसके लिए संसार भी एक संकेत रह जाता है।
वह चीज़ों को बदलने से पहले
उन्हें उनके स्वभाव में देखना सीख लेता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न शब्दों का भार, न सिद्ध करने की जल्दी,
न किसी को सही ठहराने की ज़िद।
बस एक सीधी सादगी,
जो हर जटिलता के बीच अपना प्रकाश रखती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह सादगी गहरी होती है,
तो मन का गठान अपने आप खुलने लगता है।
जो बँधा था, वह ढीला पड़ता है—
और जो ढीला हुआ, वही मुक्त-सा हो जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अब खोने का भय रहता है,
न पाने की बेचैनी।
क्योंकि जो भीतर स्थापित हो गया,
वह समय की उँगलियों से नहीं गिरता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह मौन किसी अंत का नाम नहीं,
यह तो आरंभ से पहले की उजली स्थिति है।
जहाँ न प्रश्न बचते हैं, न उत्तरों की भीड़—
सिर्फ़ सरल, शांत, प्रत्यक्ष होना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न इससे दूर जाने का कोई प्रयास।
यह तो बस उस सहजता की ओर संकेत है,
जहाँ हर अनुभव अपने ही स्थान पर शांत हो जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब देखने में कोई हस्तक्षेप नहीं रहता,
तो हर चीज़ अपनी स्वाभाविक गति में प्रकट होती है और मिटती है।
न उसमें कुछ जोड़ने की आवश्यकता होती है,
न कुछ हटाने की॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह स्पष्टता किसी विचार की उपलब्धि नहीं,
बल्कि विचारों के बीच मौन की पहचान है।
जहाँ मन अपनी जटिलताओं से थककर
स्वतः सरलता में लौट आता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न संसार को अस्वीकार करना है,
न उसे अंतिम सत्य मान लेना है।
बस उसे जैसा है वैसा देखना है—
बिना किसी अतिरिक्त व्याख्या के बोझ के॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह देखने की आदत गहरी हो जाती है,
तो अनुभव और देखने वाले के बीच की दूरी धुंधली पड़ जाती है।
न कोई केंद्र शेष रहता है,
न कोई परिधि स्पष्ट॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह धुंधलापन भ्रम नहीं,
बल्कि विभाजन की कल्पना का शांत होना है।
जहाँ अलग-अलग मानने की प्रवृत्ति ढीली पड़ जाती है,
वहीं सहज एकता की अनुभूति उभरती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न इसे पाने की आवश्यकता है,
न इसे रोकने की।
यह पहले से ही हर अनुभव के भीतर है—
केवल दृष्टि के सरल होने की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि स्वयं सरल है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब मन अपनी व्याख्याएँ छोड़ देता है,
तो वही क्षण बिना किसी विशेष प्रयास के स्पष्ट हो जाता है।
न उसमें कोई विशेष घटना घटती है,
और न ही कुछ नया उत्पन्न होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सिर्फ़ इतना ही घटित होता है—
कि जो पहले जटिल प्रतीत होता था,
वह अपनी स्वाभाविक सरलता में दिखाई देने लगता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी यात्रा का अंत है,
न किसी खोज का निष्कर्ष।
बस एक स्थिर, शांत देखना है—
जो किसी भी स्थिति से पहले और बाद में भी उपस्थित है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और इस उपस्थिति में
न कुछ प्राप्त करने की आवश्यकता रहती है,
न कुछ सिद्ध करने की।
केवल वही रहता है जो सदा से था—
बिना प्रयास के, बिना रूप के॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यह कोई नया बोध है, न पुराना स्मरण—
यह तो केवल मौन की सहज उपस्थिति है।
जहाँ नाम भी धीरे-धीरे ढल जाए,
और अर्थ भी अपनी सीमा से मुक्त हो जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ “मैं” भी एक तरंग की तरह उठे,
और उसी क्षण अपने मूल में लीन हो जाए।
न पकड़ने की चाह, न छोड़ने का भय—
बस निराकार, सरल, अचल लय॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई दूरी शेष रहे, न कोई निकटता का आग्रह,
न कोई विशेष उपलब्धि, न कोई सूक्ष्म संघर्ष।
जो है, वह स्वयं में पूर्ण है—
निर्विकार, स्वयंसिद्ध, अनंत, अखंड॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि विचार फिर से द्वार पर दस्तक दें,
तो उन्हें भी अतिथि की तरह देखना।
न उन्हें घर बनाना, न शत्रु मानना—
बस उनके आने-जाने को देखना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यही देखना धीरे-धीरे
मन के भारीपन को हल्का कर देता है।
और उस हल्केपन में
एक गहरी, निर्मल स्पष्टता खिल उठती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न सत्य को दूर खोजना है,
न असत्य से युद्ध करना है।
बस जो अभी प्रकट है,
उसे ठीक वैसा ही देख लेना है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब देखना सरल हो जाता है,
तो जीवन भी सरल हो जाता है।
न उसमें बोझ का शोर रहता है,
न भ्रम का अंधेरा टिकता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई अंतिम शब्द शेष है,
न कोई अंतिम प्रश्न।
जो मौन में जिया जाता है,
वही सबसे गहरा सत्य बनता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यह किसी द्वार की खोज है, न किसी द्वारपाल की अनुमति।
यह तो बस अपनी ही उपस्थिति में
धीरे-धीरे, बिना शोर, बिना आग्रह,
सम्पूर्ण रूप से विश्राम कर जाना है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ “मैं” भी एक हल्की सी परछाईं बनकर
स्वयं अपने मूल में खो जाए,
और जो शेष रहे वह
किसी नाम का नहीं, केवल होने का उजाला हो॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई ऊपर, न कोई नीचे,
न भीतर, न बाहर का विवाद।
एक ही शांत समक्षता,
एक ही नितांत स्वच्छ अहसास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदि मन फिर भी कुछ पूछे,
तो उसे उत्तर से नहीं, मौन से तृप्त करना।
क्योंकि कुछ प्रश्न हल होकर नहीं,
घुलकर शांत हो जाते हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ देखने वाला भी थम जाए,
और देखा गया भी अपनी सीमा खो दे,
वहाँ कोई शेष नहीं रहता—
केवल सहज, अचल, निर्मल बोध॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यात्रा की थकन, न लक्ष्य की बेचैनी,
न पाने का गर्व, न खोने का भय।
सब कुछ अपनी जगह शांत,
और भीतर एक अदृश्य प्रकाश निरंतर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह प्रकाश बाहर से नहीं आता,
न किसी वस्तु से लिया जाता है।
यह तो उस सरलता का स्वभाव है,
जो हर आवरण के नीचे पहले से है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न शब्दों की हार, न शब्दों की जीत,
न तर्क का बोझ, न अ-तर्क की रीति।
जो स्वयं में सहज ठहरा रहे,
वही मौन का सबसे गहरा गीत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह गहराई पूर्ण हो जाए,
तो स्वयं को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती।
तब हर क्षण अपने ही भीतर
एक शांत, अखंड घर बन जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ मन की अंतिम धड़कन भी थम जाए,
और “मैं” का सूक्ष्म बीज भी गल जाए।
न आरोप, न आरोपण का स्थान,
न किसी कथा का शेष प्रमाण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
वहाँ न कोई बाहर की दिशा रहे,
न भीतर का कोई विपक्ष बचे।
सब व्याख्याएँ स्वयं में विलीन,
जैसे प्रकाश में लुप्त हो छायाचीन।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी को थामने का भाव रहे,
न किसी से टूटने का घाव रहे।
जो भी उठे, वह स्वयं ही ढले,
मूल में ही सब शांत चले।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न स्मृति को दोष, न विस्मृति को मान,
न किसी कथा का स्थायी स्थान।
हर कल्पना एक तरंग समान,
सागर में ही उसका अवसान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ दृष्टि भी दृष्टा में खो जाए,
और अनुभव भी अनुभव से सो जाए।
न कोई ठहराव, न कोई प्रवाह,
बस मौन में विलयित सहज निर्वाह।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न त्याग का संघर्ष, न ग्रहण का भार,
न अतीत का शोर, न भविष्य का द्वार।
जो है, वह बिना प्रयास प्रकाशित,
स्वयं में स्वयं से ही प्रतिष्ठित।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न जगत को मिटाने की कोई बात,
न किसी विचार से लड़ने की रात।
केवल यह बोध, सरल, अपार—
जो देखा जा रहा है, वह विचार का आकार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब देखने वाला भी शांत हो जाए,
तो दृश्य भी अपने आप खो जाए।
न कोई शत्रु, न कोई मित्र,
सब रूपों में एक ही चित्र।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी ने बाँधा, न कोई बंधन रहा,
न किसी ने खोला, न कोई गमन रहा।
स्वभाव ही अपना पूर्ण प्रमाण,
अनादि, अनंत, निर्विकार ज्ञान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ प्रश्न भी अपनी जड़ खो दे,
और उत्तर भी मौन में रो दे।
वहाँ केवल एक सरल ठहराव,
न आरंभ, न अंत का प्रभाव।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी कथा का विरोध शेष,
न किसी धारणा का प्रवेश।
जो भी प्रतीत हुआ, वह लहर थी,
और लहर सदा सागर की सहर थी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पाने की दौड़, न खोने का भय,
न किसी पराजय का कोई विषय।
एक गहन विश्राम की स्थिर छाँव,
जहाँ स्वयं ही स्वयं का ठाँव।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अब न भीतर बाहर का विभाजन,
न किसी अनुभव का कोई प्रशमन।
केवल सहजता का अनकहा गीत,
जहाँ विलीन हो जाता हर अतीत।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह भी शब्द मौन हो जाएँ,
तब अर्थ भी अपने आप खो जाएँ।
तब जो शेष रहे, वह अछूता प्रकाश,
नित्य, अचल, अनंत निवास।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥न ध्वनि का कोई अवशेष,
न निःशब्द का भी आधार—
जहाँ श्रुति-अश्रुति एक हो जाए,
वहीं शाश्वत विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न स्मृति का कोई प्रतिबिंब,
न विस्मृति का भी प्रवाह—
जहाँ दोनों ही थम जाएँ,
वहीं सहज की चाह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पहचान का कोई चिह्न,
न अपरिचय का भी भान—
जहाँ जानना ही ढल जाए,
वहीं अज्ञेय प्रमाण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई केंद्र ठहर सके,
न परिधि का विस्तार—
जहाँ केंद्र-परिधि मिट जाएँ,
वहीं अखंड आधार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अस्तित्व का भी आग्रह,
न अनस्तित्व का निषेध—
जहाँ होना-न होना खो जाए,
वहीं सत्य अभेद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न प्रकाश का कोई स्पर्श,
न छाया का विस्तार—
जहाँ दृश्य-द्रष्टा एक हों,
वहीं मौन साकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अनुभव का कोई केंद्र,
न अनुभूति का किनारा—
जहाँ गहराई भी ढल जाए,
वहीं शून्य का सहारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न गति का कोई आरंभ,
न ठहराव का भी अंत—
जहाँ चलना-रुकना मिट जाए,
वहीं नित्य संत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई विभाजन शेष,
न एकत्व का भी दावा—
जहाँ दोनों ही समाहित हों,
वहीं शुद्धतम भाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी सत्य का बोध रहे,
न असत्य का आभास—
जहाँ बोध-अबोध खो जाए,
वहीं पूर्ण प्रकाश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और अंततः यह भी लुप्त—
कि कुछ भी शेष कहा,
जहाँ कहना भी न टिक पाए,
वहीं होना ही रहा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई शेष, न कोई अभाव,
न पूर्णता का भी उच्चार—
जहाँ सब धारणाएँ गिर जाएँ,
वहीं प्रकटे मौन अपार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अस्तित्व का भी बोध रहे,
न अनस्तित्व का विचार—
जो इन दोनों से अछूता है,
वही सत्य का आधार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न साक्षी का भी कोई चिन्ह,
न साक्ष्य का कोई विस्तार—
जहाँ देखने वाला भी ढल जाए,
वहीं शांत हो सारा व्यवहार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई अनुभूति पकड़ में आए,
न उसे त्यागने की चाह—
जो स्वयं से स्वयं में स्थित है,
वहीं समाप्त होती हर राह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर कोई केंद्र बचे,
न बाहर कोई किनारा—
जहाँ सीमाएँ सब मिट जाएँ,
वहीं असीम का इशारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मौन को भी थामे कोई,
न शब्दों का हो सहारा—
जो स्वयं में स्वयं विलीन है,
वही अंतिम उजियारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई रहस्य खोलना है,
न किसी सत्य को पाना—
जो सदा से प्रकट ही था,
उसे कैसे छुपाना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न जागृति का कोई दावा,
न अज्ञान का कोई भार—
जहाँ दोनों ही गिर पड़ते हैं,
वहीं होता असली विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कुछ कहना शेष रहे,
न कुछ सुनना आवश्यक—
जो है, उसी में सब समाहित,
वही शाश्वत, वही स्वाभाविक॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और अंत में यह भी मिटे—
कि कुछ भी कहा गया है,
जहाँ वाणी स्वयं थम जाए,
वहीं सत्य रह गया है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई सूक्ष्म संकेत शेष,
न स्थूल का कोई आकार—
जहाँ अनुभव भी ठहर जाए,
वहीं सत्य का विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मौन को भी थामे मन,
न शब्दों का कोई स्पर्श—
जहाँ अभिव्यक्ति स्वयं मिटे,
वहीं प्रकटे निज हर्ष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न साक्षी का भी बोध रहे,
न दृश्य का कोई प्रमाण—
जहाँ जानने वाला ही ढले,
वहीं ठहरता है विज्ञान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अस्तित्व का भी दावा हो,
न अनस्तित्व का विचार—
जहाँ दोनों ही खो जाएँ,
वहीं अचल आधार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न हृदय, न मस्तक का भेद,
न भीतर, न कोई बाहर—
जहाँ सीमा की रेखा मिटे,
वहीं एकत्व का सागर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी बिंदु पर ठहराव,
न अनंत का भी विस्तार—
जहाँ सीमा-असीमा लुप्त हों,
वहीं नित्य साकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई “होने” का भी बोध,
न “न होने” का अवशेष—
जहाँ यह भी विलीन हो जाए,
वहीं शुद्धतम परिवेश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी सत्य का नाम रहे,
न असत्य की कोई रेखा—
जहाँ भेद का बीज जले,
वहीं अद्वैत की लेखा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न प्रकाश वहाँ, न छाया,
न ज्ञान, न अज्ञान—
जहाँ दोनों ही समाहित हों,
वहीं मौन का विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई शेष, न कुछ अशेष,
न प्राप्ति, न कोई हानि—
जहाँ सब कुछ स्वयमेव है,
वहीं पूर्णता की कहानी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और अंत में यह भी न बचे—
कि कुछ कहा भी गया,
जहाँ कथन का चिन्ह न रहे,
वहीं सत्य स्वयं जिया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आरम्भ की कोई आहट,
न अंत का कोई विस्तार—
जहाँ काल भी थक कर रुके,
वहीं अचल का उद्गार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न उपस्थिति का भी बोध,
न अनुपस्थिति का प्रमाण—
जहाँ दोनों ही मौन हो जाएँ,
वहीं सहज का विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई तरंग उठे भीतर,
न स्थिरता का भी आग्रह—
जहाँ लय और उदय मिट जाएँ,
वहीं शुद्धतम अनुग्रह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी सत्य की स्थापना,
न असत्य का निषेध—
जहाँ सिद्ध करने की चाह गिरे,
वहीं स्वयं प्रकट अभेद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अनुभव की कोई सीमा,
न अनुभूति का आकार—
जहाँ अनुभवकर्ता ही ढले,
वहीं नित्य विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न चित्त का कोई प्रवाह,
न अचित्त का भी ज्ञान—
जहाँ दोनों ही विलीन हों,
वहीं निर्विकल्प स्थान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई शरण, न आश्रय,
न सहारा, न कोई थाम—
जो स्वयं में ही स्थित रहे,
वही अखंड विश्राम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न जागृति, न स्वप्न, न सुषुप्ति,
न चौथी अवस्था का भान—
जो इन सबसे परे स्थिर है,
वही निज का प्रमाण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न शून्य का भी आभास,
न पूर्ण का भी विस्तार—
जहाँ दोनों का लोप हो जाए,
वहीं अदृश्य आधार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न “मैं” का कोई चिन्ह शेष,
न “तू” का कोई विभाजन—
जहाँ संबोधन भी गिर जाए,
वहीं मौन का आलिंगन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और अंततः यह भी विलीन—
कि कोई अनुभव रहा,
जहाँ अनुभव भी न टिक पाए,
वहीं सत्य स्वयं कहा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न स्पंदन का भी शेष चिह्न,
न निस्पंद का कोई विचार—
जहाँ गति-अगति एक हो जाए,
वहीं नित्य विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न प्रकट होने की चाह रहे,
न अप्रकट का कोई मान—
जहाँ छिपा और दिखा मिटे,
वहीं सहज पहचान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न बोध का भी आलोक रहे,
न अभाव का अंधकार—
जहाँ दोनों ही शांत पड़ें,
वहीं निर्विकार आधार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई कारण जन्मे वहाँ,
न परिणाम का विस्तार—
जहाँ कारण-कार्य रुक जाए,
वहीं सत्य साकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अंतर का कोई आभास,
न बाहर का कोई स्थल—
जहाँ दिशा-दिशाहीन मिलें,
वहीं अखंड सरल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अनुभव की गिनती रहे,
न अनुभूति का संचय—
हर क्षण स्वयं में पूर्ण खिला,
न पूर्व, न कोई परवश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न नाम टिके, न रूप बचे,
न संकेतों का व्यापार—
जहाँ पहचान भी ढल जाए,
वहीं अनाम उद्गार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न धारणा का कोई ठौर,
न निष्कर्ष का आधार—
जहाँ ठहराव भी खो जाए,
वहीं मुक्त विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न बंधन का कोई स्पर्श,
न मुक्ति का भी अभिमान—
जो सदा से अकलुष रहा,
वही निज का विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न समय का कोई क्रम रहे,
न क्षणों की रेखा खिंचे—
जहाँ अभी ही सर्वस्व ठहरे,
वहीं सत्य स्वयं बिंधे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और अंत में यह भी मौन—
कि “कुछ” कहना शेष रहा,
जहाँ कहन भी विलीन हो जाए,
वहीं होना ही कहा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मैं पूजनीय बनना चाहता,
न किसी ऊँचाई पर ठहरना।
क्योंकि जहाँ ऊँचाई का अहसास है,
वहीं गिरने का भय भी छिपा रहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो स्वयं को ऊपर रखता है,
वह भीतर ही भीतर अलगाव रचता है।
और जहाँ अलगाव है,
वहाँ पूर्णता का अनुभव कैसे होगा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो प्रवाह है,
वह सबमें समान रूप से बहता है।
न किसी एक का है,
न किसी से दूर है—
बस अनदेखा रह जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
निर्मलता का अर्थ कुछ बनना नहीं,
बल्कि जो जोड़ा गया है उसे देख कर ढीला पड़ना है।
जहाँ बनावट घटती है,
वहीं सहजता प्रकट होती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मस्तक की चतुराई
अक्सर स्वयं को ही जाल में फँसा लेती है।
वह पकड़ बनाती है,
और उसी पकड़ में उलझन जन्म लेती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
पर सीख देना और समझ जगाना—
दोनों में अंतर है।
जो समझ की ओर ले जाए,
वही सच्चा सहयोग है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न अंध स्वीकृति में स्पष्टता है,
न अंध विरोध में।
स्पष्टता तो तब आती है,
जब देखने में ईमानदारी होती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो स्वयं को देख नहीं पाता,
वह दूसरों को दिशा क्या देगा।
और जो देखना शुरू करता है,
वह बिना कहे भी बहुत कुछ बता देता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
बाहरी सजावट
क्षण भर के लिए आकर्षण देती है,
पर भीतर की स्थिरता
बिना प्रयास के ही शांति देती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो केवल पाने में लगा है,
वह कभी संतुष्ट नहीं होता।
और जो देखता है कि कुछ पाना नहीं,
वहीं से संतोष की शुरुआत होती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी को बाँधना है,
न किसी से बंधना है।
बस इतना देखना है—
क्या सच में आवश्यक है, और क्या केवल आदत है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जब यह भेद स्पष्ट होता है,
तो जीवन सरल होने लगता है।
न उसमें दिखावा बचता है,
न अनावश्यक बोझ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो भीतर स्पष्ट है,
वह बाहर भी सहज हो जाता है।
और जो भीतर उलझा है,
वह हर जगह उलझन ही देखता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
इसलिए न किसी के खिलाफ़ जाना है,
न किसी के पक्ष में अटकना है।
बस इतना देखना है—
क्या यह समझ को गहरा कर रहा है, या और जकड़ रहा है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी
कभी पूजनीय विभूति बनना नहीं चाहता,
क्योंकि जहाँ पूजन की चाह पलती है,
वहाँ कहीं न कहीं अहंकार का बीज भी छिपा होता है।
जो “शिरोमणि” है,
वह किसी पद, किसी ताज, किसी ऊँचाई में नहीं,
बल्कि सबके भीतर निरंतर बहते प्रवाह में है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जिसे इस प्रवाह की पहचान नहीं,
उसके लिए ही भटकाव सच लगने लगता है।
और जहाँ निर्मलता का बोध नहीं,
वहाँ मस्तक अपने ही जाल में
वहम और अहम रचने लगता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
पारदर्शिता ही निर्मलता की पहचान है,
और निर्मलता ही भीतर की सच्ची सहजता।
जहाँ सरलता नहीं,
वहाँ चतुराई अपना मुखौटा पहन लेती है—
और फिर वही मुखौटा सत्य जैसा दिखने लगता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो शिक्षा स्पष्ट हो,
वही जीवन को प्रकाश दे सकती है।
जो शिक्षा भय से बँधे,
शब्दों में कैद हो,
और विवेक को कुचल दे—
वह शिक्षा नहीं, उलझाव बन जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सच्चा मार्गदर्शक वह है
जो देखने की आँख दे,
न कि देखने पर पाबंदी।
जो प्रश्न को जगाए,
न कि प्रश्न को बंद करे।
जो भीतर की समझ को पुष्ट करे,
न कि केवल अनुकरण सिखाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जिसके भीतर लोभ, पद, प्रसिद्धि,
और दिखावे की दौड़ चलती रहे,
वह दूसरों को स्थिर कैसे करेगा?
जो स्वयं अस्थिर है,
वह औरों की स्थिरता का आधार नहीं बन सकता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो बाहर की मिट्टी सँवारने में लगा है
और भीतर के सत्य से अनजान है,
वह दूसरों को भी बाहर की चमक में उलझाएगा।
क्योंकि जिसने अपने ही स्वरूप को नहीं देखा,
वह किसी और को भी केवल आकृति ही देगा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो अपना निरीक्षण नहीं कर सकता,
वह दूसरे के जीवन का दर्पण कैसे बनेगा?
और जो अपनी ही परिधि में खोया है,
वह औरों को क्या मुक्त करेगा?
वह तो बस अपनी ही उलझन को
धर्म, ज्ञान या परंपरा का नाम दे देता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
इसलिए मैं किसी ऊँचे आसन का आग्रह नहीं करता,
न किसी विशेषता का शोर।
मैं तो केवल उस सरल सत्य की ओर संकेत करता हूँ
जो हर जीव में मौन रूप से उपस्थित है—
निर्मल, सहज, पारदर्शी, और निरंतर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जो इसे देख लेता है,
वह किसी बाहरी चमक का गुलाम नहीं रहता।
उसके लिए सत्य किसी व्यक्ति में नहीं,
अपने ही भीतर प्रकट होता है।
वही उसका शरण, वही उसका प्रकाश,
वही उसकी संपूर्ण संतुष्टि॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो स्वयं को ऊँचा सिद्ध करे,
वही भीतर कहीं डगमगाता है।
जो सहज रहे, जो सरल बहे—
वही सत्य के निकट ठहर पाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न पूजनीय बनने की चाह है,
न किसी शिखर पर चढ़ने का भार।
जहाँ चाह समाप्त हो जाती है,
वहीं से खुलता है निर्मल द्वार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो “मैं” को बड़ा बनाता है,
वही दूरी को जन्म देता है।
और जो “मैं” को देख कर छोड़ दे,
वही एकता में समा जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई गुरु आवश्यक है,
न कोई शिष्य बनना जरूरी।
जहाँ देखना सच्चा हो जाए,
वहीं समाप्त हो जाती है दूरी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्ञान यदि बंधन बन जाए,
तो वह अज्ञान से भी भारी है।
और जो खुला रहे हर क्षण में,
वही वास्तविक समझ की क्यारी है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो तर्क से डरता है,
वह सत्य को कैसे संभालेगा।
और जो प्रश्नों से भागे,
वह स्वयं को कब देख पाएगा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सत्य को प्रमाण की आवश्यकता नहीं,
पर वह जाँच से डरता भी नहीं।
जो पारदर्शी है हर दृष्टि में,
वह किसी सीमा में ठहरता नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई विशेष वेश चाहिए,
न कोई अलग पहचान।
जो है उसी में ठहर जाना—
यही है सबसे बड़ा ज्ञान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो भीतर झाँक नहीं पाता,
वह बाहर ही उलझा रहता है।
और जो स्वयं को देख ले,
वह सब बंधनों से बचा रहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
निरंतर बहता यह जीवन,
किसी के लिए नहीं रुकता।
जो इसे पकड़ना चाहता है,
वही हर क्षण में छूटता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और जो बस देखता रहता है,
बिना पकड़, बिना विरोध—
उसी में धीरे-धीरे प्रकट होता है,
अखंड शांति का स्रोत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई लक्ष्य शेष रहता है,
न कोई मार्ग अधूरा।
जहाँ सब कुछ वैसा ही दिखे—
वहीं पूर्ण है यह सारा धूरा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो सरल है, वही गहरा है,
जो गहरा है, वही मुक्त।
इस समझ में जो ठहर जाए,
वही हो जाता है युक्त॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ स्वयं को ऊँचा रखने का भाव मिटे,
वहीं से विनम्रता का उदय होता है।
जो झुकता है भीतर की ओर,
वही सहज सत्य को छूता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी आसन की आवश्यकता,
न किसी उपाधि का भार।
जो भीतर शांत होकर देखे,
वही पार, वही अपार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मस्तक अपनी कथा रचता है,
तुलना, तर्क और विचारों में।
हृदय बिना बोले जानता है,
निरंतर एक ही विस्तारों में॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो स्वयं को प्रमाणित करे,
वह अभी भी खोज में है।
जो बिना कहे स्थिर रहे,
वही सत्य के बोध में है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी को हराना है,
न किसी से आगे बढ़ना।
जो स्वयं में स्थित हो जाए,
उसे कहाँ है फिर लड़ना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो शब्दों में उलझा रहता,
वह अर्थ से दूर भटकता है।
जो मौन में उतर जाता है,
वह सीधे स्रोत से मिलता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
संपूर्ण संतुष्टि कोई उपलब्धि नहीं,
न किसी यात्रा का अंत।
यह तो हर श्वास के पहले से,
निरंतर उपस्थित अनंत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न उसे पकड़ सकते हो,
न उससे अलग हो सकते हो।
बस उसे पहचानना है—
जो पहले से तुम हो॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो भीतर की सरलता में टिके,
वह कभी भटकता नहीं।
और जो भटकन को भी देख ले,
वह उससे अटकता नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न गुरु में बंधना है,
न भीड़ में खो जाना है।
स्वयं की स्पष्टता में रहकर,
हर भ्रम को ढह जाना है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो सत्य है, वह सरल है,
जो सरल है, वही स्थिर।
जिसने इसे पहचान लिया,
वह न भीतर बिखरा, न बाहर बिखर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और अंत में इतना ही—
कुछ भी नया नहीं पाया गया।
बस जो आच्छादन था,
वह धीरे-धीरे हटाया गया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई आसन, न कोई आडंबर,
न किसी ऊँचाई का दावा यहाँ—
जो सहज है, वही सत्य है,
जो बहता है, वही अपना प्रमाण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मैं पूज्य, न मैं विशेष,
न मुझमें कोई अलग पहचान—
जो सबमें सम है, वही मुझमें है,
वही अनाम, वही निर्वाण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ अहं का स्पर्श नहीं,
वहीं निर्मलता का उजास है—
न कोई ऊपर, न कोई नीचे,
सिर्फ़ समत्व का प्रकाश है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो खुद को ऊँचा दिखाना चाहे,
वह भीतर से अभी अधूरा है—
जिसे कुछ सिद्ध करना पड़े,
उसका मौन अभी भी अधूरा है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सत्य न वचनों में कैद होता,
न शास्त्रों में सीमित रहता है—
वह तो हर श्वास के बीच में,
चुपचाप स्वयं ही बहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी गुरु की आवश्यकता,
न किसी अनुयायी का भार—
जहाँ स्पष्टता स्वयं प्रकट हो,
वहीं समाप्त होता व्यापार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो दिखता है, वही भ्रम है,
जो नहीं दिखता, वही आधार—
दृश्य जगत की यह हलचल,
मस्तक का ही विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों ही दृष्टि थमती भीतर,
त्यो ही जगत विलीन हो जाए—
नाश नहीं, बस भ्रम का अंत,
और सत्य स्वयं उभर आए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तू न शरीर, न मन, न विचार,
न समय का कोई बंधन—
तू वह है जो सदा उपस्थित,
न आरंभ, न कोई समापन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जिसे तू खोजता रहा बाहर,
वह तेरे ही हृदय में स्थित—
न दूरी, न कोई यात्रा,
बस पहचान का एक क्षणचित्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी से कुछ लेना बाकी,
न किसी को कुछ देना है—
जो पूर्ण है अपने स्वरूप में,
उसे बस स्वयं में रहना है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह जो शांति बिना कारण की,
यही तेरा असली स्वरूप—
न इसे पाया जा सकता है,
न इससे कभी हो सकता है रूपभ्रष्ट॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई बंधन रोक सके,
न कोई भय डिगा पाए—
जो स्वयं में स्थित हो जाए,
उसे कौन कहाँ ले जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और अंततः यह भी स्पष्ट हो—
कि कुछ भी कहने योग्य नहीं,
जो है, वही पर्याप्त है,
उसमें कोई अभाव कहीं नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई उपलब्धि शेष रही,
न कोई खोने का प्रश्न यहाँ—
जो था, जो है, जो रहेगा,
वही एक सत्य, वही प्रमाण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ चाह भी मौन हो जाए,
और प्रयास भी स्वयं रुक जाए—
वहीं अनायास प्रकट होता,
जो सदा से था, पर दिख न पाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई यात्रा पूर्ण करनी,
न कोई मंज़िल प्राप्त करनी—
जो हर क्षण में पूर्ण विद्यमान,
उसे कहाँ जाकर है धरनी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह जो शून्य सा प्रतीत होता,
वही पूर्णता का आधार है—
जहाँ कुछ भी नहीं बचता,
वहीं सब कुछ साकार है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई बंधन, न कोई मुक्ति,
न कोई साधक, न साधन—
जहाँ द्वैत स्वयं ही गिर जाता,
वहीं शेष रहता केवल ‘चेतन’॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई समय छू पाता है,
न कोई परिवर्तन वहाँ—
जो अचल है, जो अडिग है,
वही तेरा सच्चा जहाँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जब देखने वाला मिटता है,
तो देखने को कुछ नहीं रहता—
और उसी ‘न रहने’ में,
पूर्ण अस्तित्व स्वयं बहता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न यह मौन शब्दों का अभाव,
न यह शांति किसी प्रयास की—
यह तो स्वभाविक ठहराव है,
जहाँ समाप्ति हर प्यास की॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो स्वयं को जानना चाहे,
वह पहले ‘स्वयं’ को छोड़ दे—
जो पकड़ा है उसे त्याग दे,
और जो है, उसी में मोड़ दे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई प्रश्न अब शेष रहा,
न कोई उत्तर देना है—
जहाँ प्रश्नकर्ता ही विलीन,
वहीं सब कुछ बस होना है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और इस ‘होने’ की सरलता में,
न कोई भय, न कोई चाह—
जो है, वही अनंत है,
वही तेरा सच्चा प्रवाह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न शब्दों का सहारा शेष,
न अर्थों का कोई आग्रह—
जहाँ सब ठहर कर मौन हो जाए,
वहीं प्रकट होता है सहज स्वरूप॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न जानने की कोई चाह,
न न जानने का कोई भय—
जहाँ दोनों ही गिर जाते हैं,
वहीं शुद्ध उपस्थिति रह जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यहाँ न अनुभव का संचय है,
न स्मृतियों का कोई भार—
हर क्षण स्वयं में पूर्ण है,
न आगे कुछ, न कुछ उधार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो बीत गया, वह स्वप्न समान,
जो आने वाला, केवल कल्पना—
जो है, वही एकमात्र सत्य,
शेष सब मस्तक की रचना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर कुछ छुपाना है,
न बाहर कुछ दिखाना—
जहाँ पारदर्शिता स्वयं हो,
वहीं सत्य का घराना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी मार्ग की आवश्यकता,
न किसी लक्ष्य का विस्तार—
जो पहुँचने को निकला था,
वह पहले से ही है साकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यहाँ न प्रश्न शेष रहता है,
न उत्तर का कोई स्थान—
जहाँ प्रश्नकर्ता ही विलीन हो,
वहीं शांत होता हर ज्ञान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो खोज रहा था अलग-अलग,
वह एक में ही समा गया—
अनेकता का सारा जाल,
स्वयं में ही सिमट गया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी सिद्धि का मोह यहाँ,
न किसी शक्ति का आकर्षण—
जो स्वाभाविक है, वही पर्याप्त,
वही अंतिम, वही कारण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यह न जागरण, न निद्रा,
न कोई तीसरी अवस्था—
यह तो सब अवस्थाओं से परे,
स्वयं की ही सहज व्यवस्था॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न आरंभ की कोई स्मृति,
न अंत का कोई चिन्ह—
जो सदा है, वही सत्य है,
शेष सब क्षणिक, सब लीन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और अंत में यह भी मिट जाए—
कि कोई “अंत” भी होता है,
जहाँ कुछ भी शेष न बचे,
वहीं पूर्णत्व खिलता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मौन को साधना है,
न शब्दों से उसे ढकना—
जहाँ दोनों का अंत हो जाए,
वहीं सत्य स्वयं चमकता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न देखने वाला अलग रहे,
न दृश्य का कोई विस्तार—
जहाँ द्वैत की रेखा मिटे,
वहीं अद्वैत का साकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यहाँ न धारणाएँ टिकती हैं,
न निष्कर्षों का कोई घर—
जो भी उठता, स्वयं गिरता,
शून्य ही रहता अंतर भर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न साधना की कोई गति,
न प्राप्ति का कोई विचार—
जो है, उसी में विश्राम है,
वहीं संपूर्ण विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
ज्यों ही पकड़ ढीली पड़ती है,
त्यो ही सहजता खुल जाती—
जिसे थामे थे युगों से,
वह मुट्ठी से खुद छूट जाती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई केंद्र शेष बचे,
न परिधि का कोई ज्ञान—
जहाँ सब सीमाएँ गिर जाएँ,
वहीं असीमता का प्रमाण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यहाँ न भीतर, न बाहर,
न दूरी, न कोई पास—
जो सबमें व्याप्त एकरस है,
वही शुद्ध, वही निवास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न समय का कोई प्रवाह,
न क्षणों की कोई गिनती—
जो सदा अचल, अविचल है,
वही वास्तविक शांति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जो अनुभव कहलाता था,
वह भी अब लीन हुआ—
न अनुभवकर्ता शेष रहा,
न अनुभव का ही धुआँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई पहचान बची,
न किसी नाम का आधार—
जो निराकार स्वयं प्रकट है,
वही अंतिम साक्षात्कार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और अंततः यह भी ढह जाए—
कि कुछ पाया या खोया है,
जहाँ न लाभ, न हानि रहे,
वहीं सत्य ने खुद को संजोया है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
बस इतना ही नहीं, यह भी मिटे—
कि “इतना” कुछ कहा गया,
जहाँ कुछ भी न कहा जा सके,
वहीं पूर्ण सत्य रहा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई उद्घोष, न कोई प्रतिज्ञा,
न किसी उपलब्धि का अभिमान—
जहाँ होना ही पर्याप्त हो,
वहीं विश्राम पाता है प्राण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई दिशा, न कोई दूरी,
न कोई यात्रा शेष—
जहाँ पहुँचने का भाव ही मिटे,
वहीं ठहरता है अवशेष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न भीतर कोई तरंग उठे,
न बाहर कोई हलचल—
अचल में जो स्वयंसिद्ध है,
वही है सत्य का संबल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न देखने वाला अलग रहे,
न देखा जाने का भेद—
जहाँ द्वैत स्वयं गल जाए,
वहीं अद्वैत का उद्भेद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई साधना शेष बचे,
न साधक की पहचान—
जहाँ सब भूमिकाएँ गिरें,
वहीं प्रकटे असली ज्ञान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न शून्य का भी आग्रह यहाँ,
न पूर्णता का कोई नाम—
जो इन दोनों से परे ठहरे,
वही अनाम, वही निष्काम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न किसी कारण से उत्पन्न,
न किसी कारण से लीन—
जो स्वयं में स्वयं प्रकट है,
वही अचल, वही अधीन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न प्रकाश का भी कोई भान,
न अंधकार का संकेत—
जहाँ दोनों ही विलीन हों,
वहीं साक्षी का अवशेष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न कोई बंधन, न कोई मुक्ति,
न पाने का कोई प्रयास—
जो सदा से मुक्त ही था,
उसे कैसा फिर त्रास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न समय का कोई प्रवाह यहाँ,
न क्षणों का कोई खेल—
जो सदा से अचल खड़ा है,
वहीं ठहरता हर झमेल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
और अंततः यह भी खो जाए—
कि “मैं” कुछ हूँ या नहीं,
जहाँ यह भी मौन हो जाए,
वहीं सत्य बचेगा यहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
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