शुक्रवार, 1 मई 2026

न शब्दाः सत्यं वहन्ति, न वाक्यैः बोधः लभ्यते।यत्र शब्दः विलीयते, तत्र सत्यं प्रकाशते॥यत् दृश्यते तत् न स्थिरम्, यत् स्थिरं तत् अदृश्यम्।दृश्य-अदृश्ययोः मध्ये, आत्मा एव प्रतिष्ठितः॥

न शब्दाः सत्यं वहन्ति, न वाक्यैः बोधः लभ्यते।
यत्र शब्दः विलीयते, तत्र सत्यं प्रकाशते॥

यत् दृश्यते तत् न स्थिरम्, यत् स्थिरं तत् अदृश्यम्।
दृश्य-अदृश्ययोः मध्ये, आत्मा एव प्रतिष्ठितः॥

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**सूक्ष्म-दर्शन सूत्र:**

इन्द्रियाः प्रवहन्ति बाह्ये, मनः तान् अनुसरति।
परन्तु साक्षी न गच्छति, सदा स्वे एव तिष्ठति॥

साक्षित्वं एव मोक्षस्य मूलम् इति न संशयः।
साक्षिणं न जानाति यः, सः एव बन्धने स्थितः॥

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न गतिर्न च आगतिः तत्र, न जन्म न च मरणम्।
यत्र चित्तं विलीनं स्यात्, तदेव परमं पदम्॥

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**भ्रम-निर्मूलन सूत्र:**

यथार्थं न प्रतीयते, यावत् आवरणं स्थितम्।
आवरण-क्षये एव, सत्यस्य उदयः भवेत्॥

लोके यत् परिवर्तनं दृश्यते, तत् रूपस्य केवलम्।
अपरिवर्तिनि तत्त्वे, न परिवर्तनं कदाचन॥

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**अहं-परित्याग सूत्र:**

अहंकारः विचाराणां, संग्रहो न तु सत्यता।
यदा “अहं” विलीयते, तदा “सर्वं” प्रकाशितम्॥

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**शिरोमणि रामपॉल सैनी इति अन्तर्दृष्टि:**

शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम न केवलं उच्चारणम्।
एतत् तु स्व-अवलोकनस्य, एक प्रतीक चिन्तनम्॥

यः एतत् चिन्तयति, सः बाह्यं न अनुसरति।
सः स्व-अन्तर्यामिनं, स्वयं एव पश्यति॥

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**निष्कर्ष-सूत्र:**

न कश्चित् अन्यः मार्गः, न कश्चित् अन्यः गन्तव्यः।
स्वयं एव मार्गः स्यात्, स्वयं एव लक्ष्यं भवेत्॥
चित्तस्य वृत्तयः सर्वा, स्वयमेव प्रतिबिम्बिताः।
यथा दर्पणमध्ये रूपं, तथा बोधे जगत् स्थितम्॥

न ज्ञानं परतो लभ्यं, न मोक्षः परसेवया।
स्वप्रकाशः हि आत्मा स्यात्, न दीपेन प्रकाश्यते॥

भ्रमो यत्र प्रतिष्ठितः, तत्र सत्यं न दृश्यते।
मौनस्य उदरे लीनः, विवेकः स्वयमुद्भवेत्॥

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**सूत्र रूपेण बोधः:**

स्व-अवलोकन = सम्यक् दृष्टि
सम्यक् दृष्टि → भ्रम-क्षय
भ्रम-क्षय → स्थिर चित्त
स्थिर चित्त → स्वानुभव
स्वानुभव → निरवशेष शांति

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अहंकारः न देहस्य, न नाम्नः न च कर्मणः।
अहंकारः तु धारणायाः, मिथ्या-स्वीकृतिरुच्यते॥

यः स्वं न जानाति पूर्वं, स सर्वं जानतीति मन्यते।
यः स्वं जानाति मूलतः, तस्य सर्वं स्वतः लयम्॥

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**“शिरोमणि रामपॉल सैनी” इति दृष्टि-सूत्रम्:**

शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम रूपं न केवलम्।
एतत् चिन्तनं बोधस्य, आत्मनि अनुस्मरणम् भवेत्॥

यत्र दृष्टिः बहिर्गता, तत्र संघर्षः प्रवर्तते।
यत्र दृष्टिः अन्तर्गता, तत्र समाधानम् उद्भवते॥

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मनो न शत्रु-रूपेण, न मित्रत्वेन निश्चितम्।
यथा सञ्चालितं चेतः, तथा लोकः अनुभूयते॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी —
अंध भीड़ के पथ पर चलना,
अपने ही चरणों को भूल जाना है।
दूसरे के कंधे पर रखी दृष्टि,
स्वयं के तेज को खो देना है।

जो डर से जीता है,
वह जीवन को नहीं, केवल उसका आवरण ढोता है।
जो लोभ से चलता है,
वह स्वयं की दिशा नहीं, परछाइयों का अनुकरण करता है।

उग्रता का शोर बहुत है,
पर मौन की जड़ें उससे कहीं गहरी हैं।
मन की लहरें ऊपर हैं,
हृदय का ठहराव भीतर की पृथ्वी है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं —
स्वयं को समझे बिना,
दूसरे को समझने का दावा केवल भ्रम है।
स्वयं को देखे बिना,
दूसरे को देखने की बात केवल शब्द है।

बाह्य पथ अनगिन हैं,
भीतर का एक पथ ही सत्य के निकट ले जाता है।
बाह्य साधना वेश हो सकती है,
भीतर की दृष्टि ही साक्षात् ज्ञान है।

जिसने अपने शिशुपन की निर्मलता पहचान ली,
उसके लिए संसार की चालें हल्की हो जाती हैं।
जिसने भीतर की संपूर्णता देख ली,
उसके लिए भीड़ का दबाव फीका पड़ जाता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं नहीं कहता, बनो कुछ और।
मैं कहता हूँ,
जो तुम पहले से हो, उसे निर्भय होकर देखो।

स्वयं का साक्षात्कार ही प्रथम श्लोक है।
स्वयं की स्वीकृति ही प्रथम सूत्र है।
स्वयं की शांति ही अंतिम विजय है।
स्वयं का होश ही परम साधना है।

न भेदे बाह्य शब्द, न बाँधे बाह्य मत।
न झुके मन की दौड़, न डुले भय की रात।
अन्तः स्थिरं, बहिः कर्म,
एतदेव जीवनस्य सारम्।

शिरोमणि रामपॉल सैनी इति संक्षेपः —
जो भीतर जागा, वही स्वतंत्र है।
जो भीतर शांत हुआ, वही समर्थ है।
जो भीतर सत्य हुआ, वही सम्पूर्ण है।
 
वह किसी व्यक्ति का नहीं, अनुभव का आवरण होता है।
और जो भीतर की शांति है, वह किसी विचार की उपज नहीं,
वह विचारों के थम जाने के बाद की स्वाभाविक स्थिति है।

यहाँ किसी को ऊपर नहीं रखा जाता,
न किसी को नीचे किया जाता है,
क्योंकि चेतना में तुलना का जन्म ही भ्रम से होता है।
मनसा निर्मितं विश्वं, मनसा विलयं व्रजेत्।
न स्थिरं दृश्यते किञ्चित्, प्रवाहे कालसन्ततेः॥

यदा मौनं प्रतिष्ठेत, तदा सत्यं प्रकाशते।
न शब्दः न विचारः स्यात्, केवलं बोध एव हि॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति चिन्तनस्य भावः:
“स्वयं का निरीक्षण ही अंतिम दिशा है।”

जो बाहर को पकड़ने की कोशिश करता है,
वह निरंतर परिवर्तन में उलझा रहता है।
और जो भीतर की स्थिति को देख लेता है,
उसके लिए खोज समाप्त नहीं होती,
बल्कि खोज करने वाला ही बदल जाता है।
न बन्धुः न रिपुः कश्चित्, न श्रेष्ठो न च हीनकः।
स्वदृष्ट्या निर्मितं सर्वं, भावरूपेण दृश्यते॥

भयमूलं मनोवृत्तिः, लोभमूलं विचलनम्।
शान्तमूलं तु तत्त्वं हि, यत्र द्वन्द्वं न विद्यते॥

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शिशुपन की सरलता कोई खोई हुई वस्तु नहीं,
वह केवल अनुभव से ढकी हुई स्थिति है।
जब मन अपने ही निर्माणों को वास्तविक मान लेता है,
तभी दूरी प्रतीत होती है।

किसी भी जीव को समझने का दावा नहीं होता,
क्योंकि हर अनुभव अपने भीतर स्वतंत्र है।
जो देखा जाता है, वह पूर्ण नहीं,
और जो देखने वाला है, वह स्थिर नहीं।

न ज्ञाता न ज्ञेयं किञ्चित्, केवलं दृश्यसन्ततिः।
क्षणे क्षणे परिवर्तनं, न किञ्चित् स्थिरं ध्रुवम्॥

यत्र मौनं प्रधानं स्यात्, तत्र बोधः स्वयं भवेत्।
न प्रयत्नेन लभ्यं तत्, न च बुद्ध्या विचारितम्॥

न कोई मार्ग दूसरे का है,
न कोई गति किसी और के कदमों से स्थायी होती है।
हर यात्रा भीतर की अवस्था से ही आरम्भ होती है,
और वहीं समाप्त भी हो जाती है—
जहाँ विचार स्वयं शांत हो जाते हैं।

न प्राप्तव्यं न त्याज्यं किञ्चित्, केवलं दृष्टि परिवर्तनम्।
यदा दृष्टिः स्थिरा भवति, तदा जगत् यथावत् दृश्यते॥
शांत प्रवाह में आगे का विस्तार—
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति बोधः—
न नामरूपे स्थितः, न शब्देषु सीमितः।
यः स्वभावे स्थित्वा पश्यति, स एव आत्मदर्शी भवति॥

मनसा निर्मितं लोकं, मनसा एव विलीयते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी दृष्ट्या, साक्षीभावः प्रकाशते॥
न बाह्ये बन्धनं सत्यं, न बाह्ये मोक्ष कारणम्।
अन्तः स्थिते शिरोमणौ, स्वयमेव शान्तता भवेत्॥
यः स्वं पश्यति मौनेन, न शब्देन न कल्पना।
स जीवः शिरोमणित्वेन, स्वतः पूर्णो विराजते॥
न पराधीनता तत्त्वं, न परेषां स्वभावतः।
स्वचेतना प्रकाशेन, सर्वं दृष्टं समं भवेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी—
न गन्तव्यं न आगन्तव्यं, केवलं अवलोकनम्।
यत्र दृष्टिः स्थिरा भवति, तत्र संसारः लीयते॥
बाल्ये यः अनुभवः शुद्धः, न शब्देन आवृतः।
स्मृतौ तस्य बीजं निहितं, बोधस्य द्वारमुत्तमम्॥

न संघर्षे सत्यं लभ्यते, न वेगे न च दौर्बल्ये।
शान्ते चित्ते स्थिते ज्ञाने, स्वयं सत्यं प्रकाशते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति भावः—
न विशेषता न भेदभावः, केवलं समदृष्टि।
यः स्वयं प्रति जागृतः, स सर्वत्र समत्वम् पश्यति॥
विचाराः तरङ्गवत् सर्वे, शान्ते हृदि विलीयते।
चेतना केवलं साक्षी, न कर्ता न भोगिता॥

न कस्यचित् स्वामित्वं अस्ति, न कस्यचित् पराजयः।
जीवनं केवलं प्रवाहः, अनुभवस्य विस्तारः॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी इति बोधः—
न प्राप्तव्यं न त्यक्तव्यं, केवलं दृष्टव्यं।
यः दृष्टिं अन्तर्मुखीं करोति, स एव स्वतः मुक्तः भवति॥
मन की गति में भ्रम जन्म लेता है,
और मौन की गहराई में सत्य स्वयं प्रकट होता है।

**सूत्र 2:**
जो स्वयं को बाहर खोजता है, वह भटकता है,
जो भीतर दृष्टि करता है, वह स्थिर होता है।

जीवन-व्यवहार कर्म है,
पर अनुभव की शांति दृष्टि में निहित है।

समझ किसी से ली नहीं जाती,
वह निरीक्षण से स्वयं उत्पन्न होती है।

भय, लोभ और संघर्ष मन की तरंगें हैं,
चेतना उनका साक्षी मात्र है।

मन एव बन्धनं लोके, मन एव मोक्ष कारणम्।
शान्ते मनसि सर्वं स्थिरं, चैतन्यं प्रकटं भवेत्॥
न बाह्ये सत्यं लभ्यते, न शब्देषु न कल्पनायाम्।
अन्तः दृष्ट्या यः पश्यति, स एव तत्त्वदर्शकः॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी इति चिन्तनम् उच्यते।
स्व-अवलोकन मार्गेण, दृष्टि निर्मलता प्रजायते॥
न कोऽपि परो बन्धुर्वा, न कोऽपि परो शत्रुरेव।
स्वभावेन यथा दृष्टिः, तथा जगत् अनुभूयते॥

बाल्ये स्थितं सहजं चित्तं, स्मृतौ एव विलीनम्।
तस्य पुनः स्मरणं एव, आत्मबोधस्य द्वारकम्॥

**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी समत्व-बोध निरंतर सूत्रम् ॥**
न कोई ऊँच, न कोई नीच यहाँ,
सब चेतना के ही प्रतिबिंब यहाँ।
जो इस समत्व में स्थित हो जाए,
वह द्वंद्व के पार चला जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी स्व-आलोक प्रकाश सूत्रम् ॥**
न दीप बाहर से जलता है,
न सत्य किसी से मिलता है।
जो भीतर ही ज्योति जगा ले,
वह अंधकार को भी भगा ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी विचार-विसर्जन मौन सूत्रम् ॥**
न विचारों का अंत संघर्ष से होता है,
न मन किसी बल से शांत होता है।
जब साक्षी होकर देखना घटता है,
तब स्वयं ही सब कुछ मिटता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अस्तित्व-निर्विकल्प सूत्रम् ॥**
न विकल्प यहाँ सत्य को छूते हैं,
न कल्पना उसे परिभाषित करती है।
जो निर्विकल्प में ठहर जाता है,
वह स्वयं ब्रह्म बन जाता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आंतरिक स्वतंत्रता सूत्रम् ॥**
न बंधन बाहर से निर्मित होते हैं,
न मुक्ति किसी द्वार से आती है।
जो स्वयं की गाँठ खोल ले,
वह अनंत में उड़ान भर ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षी-स्थित चेतना सूत्रम् ॥**
न घटनाएँ तुम्हें स्पर्श करती हैं,
न अनुभव तुम्हें बाँध पाते हैं।
जो केवल देखने में स्थित हो,
वह हर भ्रम से मुक्त हो॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अदृश्य मूल सत्य सूत्रम् ॥**
न जो दिखता है वही सब कुछ है,
न जो अदृश्य है वह शून्य है।
जो दोनों के पार देख लेता है,
वही सत्य को पा लेता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-स्वीकृति परम सूत्रम् ॥**
न बनने की कोई दौड़ यहाँ,
न छूटने का कोई बोझ यहाँ।
जो जैसा है वैसा ही देखे,
वह स्वयं में ही पूर्ण लेखे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी कालातीत स्थिरता सूत्रम् ॥**
न समय किसी को रोक पाता है,
न क्षण कोई स्थायी रह पाता है।
जो समय को ही देख लेता है,
वह काल से ऊपर उठ जाता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी शून्य-पूर्ण समरस सूत्रम् ॥**
न शून्य खाली, न पूर्ण सीमित है,
दोनों में एक ही रहस्य निहित है।
जो इस एकत्व को जान लेता है,
वह अस्तित्व से पार हो जाता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत मौन समापन सूत्रम् ॥**
न शब्द यहाँ अंतिम सत्य है,
न अर्थ यहाँ अंतिम पथ्य है।
जहाँ मौन ही उत्तर बन जाए,
वही आत्मा स्वयं प्रकट हो जाए॥
**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-प्रज्ञा विस्तार सूत्रम् ॥**
न कोई पराया मार्ग यहाँ, न किसी पर आश्रय का भार,
हर पग स्वयं की ही छाया, हर दिशा भीतर का द्वार।
जो बाहर खोजता स्वयं को, वह ही भ्रम में घूमता है,
जो भीतर झुककर देखे, वही सत्य को चूमता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी चेतना-स्वायत्तता सूत्रम् ॥**
न कोई किसी को जान सका, न कोई किसी में पूर्ण समा सका,
हर जीव अपने ही भीतर, अपना ही दर्पण बना सका।
जिसने स्वयं को न पहचाना, वह बाह्य कथाओं में खो गया,
जिसने स्वयं को जान लिया, वह मौन में ही हो गया॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी भ्रांति-विलय विवेक सूत्रम् ॥**
न भय सत्य है, न दहशत स्थायी है,
यह सब मन की ही परछाईं गहराई है।
जिसने इसे सत्य मान लिया, वह स्वयं ही बंधन में गया,
जिसने इसे दृश्य मात्र देखा, वह भीतर ही मुक्त हुआ॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी शिशु-स्मृति जागरण सूत्रम् ॥**
न बाल्य कहीं खोया है, न निष्कलुष क्षण मिटा है,
हर चेतना में वह प्रथम स्पर्श अभी भी स्थित है।
जो उसे बाहर ढूँढता है, वह दिशा-विहीन हो जाता है,
जो भीतर स्मरण करता है, वह निर्मल हो जाता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अस्तित्व-एकत्व सिद्धान्तम् ॥**
न कोई श्रेष्ठ, न कोई हीन यहाँ,
सब एक ही चेतन प्रवाह के चिन्ह यहाँ।
भिन्न रूपों में खेलता एक ही प्रकाश है,
पर भ्रम में विभाजन ही मानव का विश्वास है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-द्रष्टा विलक्षण सूत्रम् ॥**
न देखना बाहर की घटना है,
न जानना किसी और की क्षमता है।
जो स्वयं को ही देख ले,
वही सभी रहस्यों का द्रष्टा बन ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी जागरण-अवधान सूत्रम् ॥**
न निद्रा केवल नेत्रों की बंदी है,
न जागरण केवल दिन की छवि है।
जो भीतर की मूर्छा से मुक्त हो जाए,
वही वास्तविक जागरण को पाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी गति-निरोध साक्ष्य सूत्रम् ॥**
न जीवन केवल दौड़ का नाम है,
न अस्तित्व केवल संघर्ष का काम है।
जहाँ ठहराव में भी प्रवाह दिखे,
वही आत्मज्ञान का दीप जले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतःसत्य उद्घाटन सूत्रम् ॥**
न किसी की वाणी में पूर्णता है,
न किसी के ज्ञान में सम्पूर्णता है।
जो सबको सुनकर भी मौन रहे,
वही अपने सत्य में स्थिर रहे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्कलंक स्व-स्वरूप सूत्रम् ॥**
न कोई दोष मूल स्वरूप में है,
न कोई अभाव उस गूढ़ रूप में है।
जो स्वयं को सरलता से देख ले,
वह सम्पूर्णता को ही लेख ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-स्वीकृति विलय सूत्रम् ॥**
न आरंभ का बंधन, न अंत का भय,
न किसी यात्रा का निश्चित समय।
जो स्वयं में ही पूर्ण समा जाए,
वह अनंत में ही विलीन हो जाए॥
**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्विशेष अनुभूति सूत्रम् ॥**
न विशेष कोई सत्य में बचे,
न सामान्य भी उसे ढके।
जहाँ भेद स्वयं लुप्त हो जाए,
वहाँ अस्तित्व ही रह जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतः-निःशब्द जागरण सूत्रम् ॥**
न नींद पूरी न जागरण अधूरा,
न स्वप्न का कोई चिह्न सूक्ष्म पूरा।
जहाँ तीनों एक साथ मिट जाएँ,
वहाँ केवल बोध रह जाएँ॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी स्व-आश्रय मुक्त सूत्रम् ॥**
न किसी सहारे की आवश्यकता,
न किसी आधार की अनिवार्यता।
जो स्वयं में ही स्थित हो जाए,
वह संपूर्ण सत्य को पाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी चेतना-अविच्छिन्न प्रवाह सूत्रम् ॥**
न आरंभ का कोई बिंदु मिले,
न अंत में कोई द्वार खुले।
जो निरंतर स्वयं ही बहे,
वह अनंत को भीतर सहे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी तटस्थ-द्रष्टा विलय सूत्रम् ॥**
न पक्ष में झुके न विपक्ष में रहे,
न राग-द्वेष के रंग सहे।
जो सबको समान देख ले,
वह स्वयं को भी देख ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी शून्य-चेतन एकत्व सूत्रम् ॥**
न शून्य में रिक्तता रहे,
न चेतना में द्वंद्व सहे।
जब दोनों एक ही स्वर बन जाएँ,
तब सत्य स्वयं उभर आएँ॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनहंकार विलीन सूत्रम् ॥**
न मैं का कोई आधार रहे,
न मेरा कोई आकार रहे।
जहाँ “मैं” ही मिटकर रह जाए,
वहाँ शुद्ध अस्तित्व जग जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अकारण संतुलन सूत्रम् ॥**
न कारण कोई जन्म दे,
न कारण कोई अंत ले।
जो कारण से भी परे खड़ा,
वह संतुलन में सदा अड़ा॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अदृश्य मूल साक्षात्कार सूत्रम् ॥**
न दिखाई में सत्य बँधा,
न अदृश्य में रहस्य गढ़ा।
जो दोनों से परे निकल जाए,
वही मूल स्वरूप कहलाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी परातीत पूर्ण विराम सूत्रम् ॥**
न आगे कुछ शेष रहे,
न पीछे कोई लेश रहे।
जहाँ पूर्णता भी मौन हो जाए,
वहाँ सत्य स्वयं ठहर जाए॥
**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनिर्वचनीय बोध सूत्रम् ॥**
न कहा जा सके जो शब्दों से,
न मापा जाए किसी मापदंडों से।
जो अनुभव से भी परे खड़ा हो,
वही सत्य स्वयं में जड़ा हो॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-प्रशमन स्थिर सूत्रम् ॥**
न उत्तेजना न कोई विकार,
न भीतर उठता कोई विचार।
जहाँ सब तरंगें शांत हो जाएँ,
वहाँ सत्य अपने में समा जाएँ॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी दृष्टि-विलय एकत्व सूत्रम् ॥**
न देखने वाला अलग रहे,
न दृश्य किसी से बँधा रहे।
जब दोनों का भेद मिट जाए,
तब केवल एकत्व रह जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी स्व-आलोक अनंत सूत्रम् ॥**
न बाहर से प्रकाश आए,
न भीतर से दीप जल पाए।
जो स्वयं प्रकाशमय ही रहे,
वह अंधकार को भी गले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी कालातीत सम्यक स्थिति सूत्रम् ॥**
न घड़ी टिक-टिक बँधन करे,
न समय कोई शासन करे।
जहाँ क्षण भी लुप्त हो जाए,
वहाँ अनंत स्वयं ठहर जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी संकल्प-विसर्जन मौन सूत्रम् ॥**
न इच्छा कोई दिशा बनाए,
न आकांक्षा पथ दिखलाए।
जहाँ चाह भी मिटकर सो जाए,
वहाँ शुद्ध बोध उभर आए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-समरस निर्विकल्प सूत्रम् ॥**
न श्रेष्ठ न कोई हीन रहे,
न भेद का कोई चिन्ह रहे।
सब कुछ एक रस में ढल जाए,
अद्वैत स्वयं में पल जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनुभव-अतीत साक्ष्य सूत्रम् ॥**
न अनुभूति अंतिम सत्य बने,
न स्मृति कोई पथ पर तने।
जो अनुभव को भी देख लेता,
वह स्वयं से आगे बढ़ लेता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी शून्य-पूर्ण समावेश सूत्रम् ॥**
न खालीपन खाली रह जाए,
न पूर्णता सीमा में आए।
दोनों जब एक साथ समाएँ,
वहाँ सत्य स्वयं प्रकटाएँ॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-परम समापन सूत्रम् ॥**
न अंत यहाँ कभी घटेगा,
न आरंभ कोई टिकेगा।
जहाँ प्रश्न भी मौन हो जाए,
वहाँ उत्तर स्वयं रह जाए॥


**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-निर्विकार बोध सूत्रम् ॥**
न कोई श्रेष्ठ, न कोई हीन यहाँ,
न कोई ऊँचा, न कोई क्षीण यहाँ।
जो देखता सबको एक दृष्टि से,
वही मुक्त होता भ्रम की भीत से॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षी-चेतना सूत्रम् ॥**
न मैं शरीर, न मैं विचार हूँ,
न मैं किसी भी आकार में विस्तार हूँ।
जो देख रहा सबको निरंतर यहाँ,
वही है मौन, वही है वहाँ॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी भ्रांति-विलय सूत्रम् ॥**
जहाँ "मैं" और "मेरा" विलीन हो जाए,
वहीं हर द्वंद्व स्वयं मिट जाए।
न संघर्ष रहे, न कोई पक्ष रहे,
केवल बोध का ही प्रकाश रहे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी स्व-परिचय शून्य सूत्रम् ॥**
न नाम में सत्य, न रूप में स्थिरता,
न विचारों में कोई अंतिम सत्ता।
जो इन सबको भी देखता रहे,
वही अपने मौन में जीता रहे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतर्मुख समरस सूत्रम् ॥**
न बाहर की खोज में खोना है,
न भीतर किसी रूप को रोना है।
जहाँ खोज स्वयं में विलीन हो जाए,
वहीं सत्य का द्वार खुल जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी दृष्टि-परिवर्तन सूत्रम् ॥**
न जग बदलता, न समय बदलता,
केवल देखने का भाव बदलता।
जिस क्षण दृष्टि शांत हो जाती है,
वहीं मुक्ति स्वयं घट जाती है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी कर्म-साक्षी सूत्रम् ॥**
न करने वाला कोई यहाँ,
न भोगने वाला कोई वहाँ।
सब प्रकृति का ही प्रवाह है,
साक्षी ही उसका स्वभाव है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-समाधि सूत्रम् ॥**
न शब्द वहाँ पहुँच पाते हैं,
न विचार ठहर पाते हैं।
जहाँ मौन स्वयं पूर्ण हो जाए,
वहीं सत्य प्रकाशित हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अद्वैत-दृष्टि सूत्रम् ॥**
न दूसरा है, न कोई भेद है,
सबमें केवल एक ही चेतन वेद है।
जो इस एकता को जान लेता है,
वह स्वयं में ही पूर्ण हो जाता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-निष्ठा सूत्रम् ॥**
न किसी मार्ग का अंत यहाँ,
न किसी आरंभ का द्वंद्व यहाँ।
जो स्वयं में स्थित हो जाता है,
वह अनंत को पा जाता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्विकल्प समापन सूत्रम् ॥**
न विचार शेष, न कल्पना शेष,
न कोई आग्रह, न कोई विशेष।
जहाँ सब कुछ स्वयं शांत हो जाए,
वहीं सत्य अनुभव में आ जाए॥


**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अविभाज्य स्व-प्रकाश सूत्रम् ॥**
न दीप जलाने से प्रकाश जन्मे,
न अंधकार से कोई संघर्ष रमे।
जो स्वयं ही प्रकाशित स्वरूप हो,
वह न आरंभ न अंत का रूप हो॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनाकृति सत्य सूत्रम् ॥**
न रूप में सत्य कभी बंधता,
न आकार में स्वयं को गढ़ता।
जो निराकार में भी दिख जाए,
वह हर सीमा को मिटा जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी स्व-साक्षी निर्विकार सूत्रम् ॥**
न घटना से कोई परिवर्तन,
न विचार से कोई स्पंदन।
जो सबको केवल देखता रहे,
वह स्वयं में अचल रह सके॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतर्नाद मौन सूत्रम् ॥**
न ध्वनि वहाँ प्रवेश कर पाए,
न मौन भी नाम रखवाए।
जहाँ स्वयं ही ध्वनि विलीन हो,
वहाँ सत्य का उदय नवीन हो॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी भ्रम-विसर्जन सम्यक सूत्रम् ॥**
न सत्य को कोई खोज सके,
न असत्य भी टिक सके।
जो दोनों को एक समान देखे,
वह द्वंद्व के पार को लेखे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-निर्विकल्प सूत्रम् ॥**
न विकल्प का कोई आधार,
न संकल्प का कोई भार।
जहाँ मन भी स्वयं मिट जाए,
वहाँ केवल सत्य रह जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अस्तित्व-निःशब्द सूत्रम् ॥**
न शब्द उसे परिभाषित करे,
न मौन भी उसे सीमित करे।
जो स्वयं से भी परे खड़ा हो,
वह अस्तित्व में भी अड़ा हो॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी कारणातीत विमुक्त सूत्रम् ॥**
न कारण में कोई बंधन है,
न परिणाम में कोई दमन है।
जो कारण-कार्य से ऊपर उठे,
वह स्वयं में ही मुक्त सजे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अदृश्य-दृश्य समरस सूत्रम् ॥**
न दिखाई देने में सत्य छिपे,
न अदृश्य में कोई रहस्य टिके।
जो दोनों को एक दृष्टि में देखे,
वह समग्र सत्य को लेखे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी चित्त-शून्य परम स्थिर सूत्रम् ॥**
न चित्त की हलचल शेष रहे,
न विचार का कोई लेश रहे।
जहाँ चित्त स्वयं विलीन हो जाए,
वहाँ केवल अस्तित्व रह जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-स्वरूप समापनातीत सूत्रम् ॥**
न समापन यहाँ कभी घटे,
न अनंत भी कहीं घट-बढ़े।
जो दोनों से परे निकल जाए,
वह स्वयं में ही समा जाए॥**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अदृश्य-स्वरूप भेदन सूत्रम् ॥**
न जो दिखे वही सत्य नहीं,
न जो छिपे वह असत्य नहीं।
जहाँ दृश्य-अदृश्य एक समान,
वहीं टूटे सब ज्ञान-मान॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-निर्माण विघटन सूत्रम् ॥**
न कोई “मैं” का निर्माण रहे,
न कोई “मेरा” अभिमान रहे।
जहाँ निर्मित सब ढह जाए,
वहीं शुद्ध अस्तित्व रह जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी काल-रेखा विलय सूत्रम् ॥**
न घड़ी टिक-टिक बंधन दे,
न स्मृति पुराना दमन दे।
जहाँ क्षण भी अनंत हो जाए,
वहीं काल स्वयं खो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी विचार-शून्य प्रकाश सूत्रम् ॥**
न सोच की कोई दीवार रहे,
न तर्क का कोई भार रहे।
जहाँ बिना विचार उजाला हो,
वहीं सत्य का उजियाला हो॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अहं-विसर्जन समापन सूत्रम् ॥**
न अहंकार की कोई ध्वनि रहे,
न तुलना की कोई अग्नि रहे।
जहाँ “मैं” भी धूल हो जाए,
वहीं ब्रह्म का फूल खिल जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अस्तित्व-निर्वचन अतीत सूत्रम् ॥**
न भाषा उसे बाँध सके,
न परिभाषा उसे साध सके।
जो शब्द से पहले विद्यमान,
वही है सत्य का प्रमाण॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनुभूति-समापन शून्य सूत्रम् ॥**
न अनुभव की कोई अंतिम रेखा,
न अनुभूति की कोई एक दिशा।
जहाँ अनुभव भी थम जाए,
वहीं परम सत्य खुल जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी भीतरी दृष्टा विलय सूत्रम् ॥**
न देखने वाला शेष रहे,
न देखा हुआ विशेष रहे।
जहाँ दोनों का अंत हो जाए,
वहीं एकत्व प्रकट हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-अनंत गूढ़ सूत्रम् ॥**
न शब्द मौन को छू पाए,
न मौन शब्द में समा पाए।
जहाँ मौन भी मौन हो जाए,
वहीं सत्य स्वयं मुस्काए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी परम-निर्वाण विस्तार सूत्रम् ॥**
न यात्रा का कोई आरंभ,
न अंत का कोई प्रबंध।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यह जाने,
कि सब कुछ भीतर ही मानें॥
**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी चेतना-स्वयं-उद्घाटन सूत्रम् ॥**
न किसी गुरु का अंतिम अधिकार,
न किसी ग्रंथ का स्थायी आधार।
जहाँ भीतर ही दीप जल उठे,
वहीं सत्य अपने आप मिल उठे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी विचार-निर्वाण भेदन सूत्रम् ॥**
न विचार पकड़ने योग्य रह जाए,
न तर्क कोई अंतिम सत्य बतलाए।
जहाँ सोच स्वयं थमने लगे,
वहीं मौन ज्ञान बन जगने लगे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अस्तित्व-आभास विलय सूत्रम् ॥**
न “मैं हूँ” का कोई ठोस प्रमाण,
न “तू है” का कोई अंतिम ज्ञान।
जब दोनों धुँध में खो जाएँ,
तब शुद्ध अस्तित्व ही रह जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-प्रतिबिंब भंग सूत्रम् ॥**
न दर्पण में कोई स्थायी छवि,
न देखने में कोई अंतिम रवि।
जो प्रतिबिंब को ही तोड़ दे,
वह स्वयं को स्वयं में जोड़ दे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी कर्म-अकर्म समत्व सूत्रम् ॥**
न करने में कोई बंधन रहे,
न छोड़ने में कोई दमन रहे।
जहाँ कर्म स्वयं में विलीन हो,
वहीं जीवन पूर्ण अधीन हो॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी भय-शून्य जागरण सूत्रम् ॥**
न अंधकार से कोई संघर्ष रहे,
न प्रकाश का कोई दर्प रहे।
जहाँ देखने वाला ही मिट जाए,
वहीं भय का बीज समाप्त हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी भीड़-चेतना विच्छेदन सूत्रम् ॥**
न अनुकरण ही जीवन बने,
न किसी स्वर का अनुबंध रहे।
जो भीड़ से भीतर उतर जाए,
वह स्वयं की ध्वनि पा जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी सत्य-अनारोपण सूत्रम् ॥**
न सत्य किसी शब्द में बंधा,
न सत्य किसी रूप में गढ़ा।
जो बिना प्रयास उसे देख ले,
वही सत्य को प्रत्यक्ष ले ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनुभव-अतीत उन्मोचन सूत्रम् ॥**
न अनुभव अंतिम सीमा बने,
न अनुभूति कोई दीवार तने।
जहाँ अनुभव को भी देख लिया,
वहाँ स्वयं को ही पा लिया॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-स्वरूप विलीन सूत्रम् ॥**
न अंत है, न आरंभ कोई,
न राह है, न मंज़िल कोई।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यहाँ कहे,
कि सब कुछ स्वयं में ही रहे॥
**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी शून्य-स्वरूप विस्फोट सूत्रम् ॥**
न कोई केन्द्र, न कोई परिधि शेष,
सब दिशाएँ होकर भी एक ही देश।
जहाँ विस्तार स्वयं को ही निगल जाए,
वहीं शून्य भी अपने को भूल जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-भ्रम विघटन सूत्रम् ॥**
न मैं हूँ जैसा मन ने गढ़ा,
न तू है जैसा दृष्टि ने पढ़ा।
यह जो “मैं-तू” का खेल चला,
वही अज्ञान का मूल जला॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अस्तित्व-निष्क्रियता भेदन सूत्रम् ॥**
न कर्म का बंधन, न अकर्म की रेखा,
सब कुछ भीतर ही भीतर देखा।
जहाँ कर्ता भी खो जाए धीर,
वहीं खुलता है सत्य का नीर॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी चेतना-अनंत दर्पण सूत्रम् ॥**
न रूप प्रतिबिंबित होता स्थिर,
न छवि टिकती बनकर चित्र।
जो देखता है, वही दृश्य बन जाए,
और दृश्य स्वयं को ही मिटाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी सामाजिक-भ्रम-निर्मोचन सूत्रम् ॥**
न भीड़ विचार की सत्ता है,
न अनुकरण ही सच्चा पथ्य है।
जो स्वयं के भीतर खड़ा हो जाए,
वह हर आदेश से ऊपर जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी भय-उत्पत्ति विलय सूत्रम् ॥**
न भय बाहर से आता है कभी,
न दहशत किसी और की छवि।
जहाँ स्वयं की पहचान टूट जाए,
वहीं भय भी क्षण में मिट जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी कर्म-यंत्र मुक्ति सूत्रम् ॥**
न जीवन कोई चलती मशीन,
न भाग्य कोई लिखी हुई रेखा दीन।
जो स्वयं को जानकर चलने लगे,
वह यंत्र नहीं, चेतन बने॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी भ्रम-परंपरा विसर्जन सूत्रम् ॥**
न परंपरा सत्य का प्रमाण बने,
न अनुकरण ही ज्ञान का नाम बने।
जो अनुभव में स्वयं उतर जाए,
वही शास्त्रों से आगे जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-गहन विस्तार सूत्रम् ॥**
न मौन केवल शब्द का अभाव,
न मौन केवल विचार का घाव।
जहाँ मौन स्वयं ही बोल उठे,
वहाँ सत्य अपना रूप खोल उठे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-परिपूर्ण विलय सूत्रम् ॥**
न कमी का कोई कारण रहे,
न पूर्णता का कोई दर्पण रहे।
जो स्वयं में ही संपूर्ण हो जाए,
वह स्वयं में ही खो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-साक्षी निर्वाण सूत्रम् ॥**
न देखने का कोई प्रयास रहे,
न देखने वाला भी पास रहे।
जहाँ साक्षी भी साक्ष्य बन जाए,
वहीं अनंत स्वयं मुस्काए॥


**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी विवेक-परिक्षण सूत्रम् ॥**
न किसी को अंतिम सत्य कहे बिना देखो,
न किसी विचार को पूर्ण मानकर रोको।
जो हर विचार को देख कर भी न बँधे,
वही विवेक के मार्ग में बढ़े॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-अवलोकन सूत्रम् ॥**
न बाहर की भीड़ में उत्तर मिलेगा,
न किसी शब्द में सम्पूर्ण सत्य खिलेगा।
जो स्वयं को शांत होकर देखता है,
वही भीतर का अर्थ समझता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनुभव-समता सूत्रम् ॥**
न सुख बड़ा, न दुख महान,
दोनों हैं केवल बदलता विमान।
जो दोनों को सम भाव से देखे,
वह भीतर की स्थिरता रेखे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी बंधन-निर्मुक्त सूत्रम् ॥**
न कोई जंजीर बाहर दिखाई देती,
न कोई दीवार भीतर स्थायी रहती।
विचार ही यदि स्वयं को पहचान ले,
तो बंधन भी स्वतः ढह जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-परिवर्तन सूत्रम् ॥**
न शब्दों से पूर्णता कही जाती,
न विचारों से शांति पाई जाती।
जहाँ मौन स्वयं जागृत हो जाए,
वहीं सत्य बिना कहे समझ में आए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी दृष्टि-शुद्धि सूत्रम् ॥**
जिस दृष्टि में आग्रह समाप्त हो जाए,
वही जीवन को नया अर्थ दे पाए।
देखना ही जब निर्मल हो जाता,
तब जग भी निर्मल हो जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी स्व-अस्तित्व सम्यक सूत्रम् ॥**
न मैं श्रेष्ठ, न कोई अन्य हीन,
सबके भीतर एक ही प्रवाह प्रवीण।
जो इस समता को भीतर जान ले,
वह विभाजन को भी पहचान ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी विचार-शमन सूत्रम् ॥**
न विचारों का अंत लड़कर होता,
न उन्हें दबाकर मन शांत होता।
जो उन्हें केवल देखना सीख ले,
वही भीतर का सत्य चख ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी चेतना-सरलता सूत्रम् ॥**
जटिलता में सत्य नहीं खोता,
सत्य तो सरलता में ही होता।
जो सरल होकर भीतर आता है,
वह स्वयं को स्पष्ट पाता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी सम्यक-बोध सूत्रम् ॥**
न किसी को गिराकर ऊँचाई मिलती,
न किसी को दबाकर सच्चाई खिलती।
जो स्वयं को समझकर चलता है,
वही भीतर से निर्मल रहता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी पूर्णता-दर्शन सूत्रम् ॥**
न बाहर खोजो पूर्णता कहीं,
न समय में बाँधो उसे वहीं।
जो अभी के क्षण को देख लेता,
वह सम्पूर्णता को पा लेता॥


**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी सूक्ष्म-शून्य विलय सूत्रम् ॥**
न शून्य रिक्तता का नाम यहाँ,
न पूर्णता किसी रूप का नाम यहाँ।
दोनों जब एक ही बिंदु में लीन हों,
तब अस्तित्व स्वयं में विलीन हों॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतःप्रवाह समरस सूत्रम् ॥**
न रुकता प्रवाह, न ठहरता क्षण,
सब कुछ है केवल चेतना का गमन।
जो प्रवाह को भी साक्षी हो देखे,
वह स्थिरता का रहस्य लेखे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी निराधार आत्मस्थित सूत्रम् ॥**
न भूमि का सहारा, न आकाश का भार,
न किसी दिशा का सीमित द्वार।
जो स्वयं में ही स्थिर हो जाता,
वह सम्पूर्ण ब्रह्म हो जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-अतीत बोध सूत्रम् ॥**
न शब्द मौन को कभी छू पाते,
न विचार उसे परिभाषित कर पाते।
जहाँ मौन स्वयं में बोलने लगे,
वहीं सत्य प्रकट होने लगे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी दृष्टा-निर्वसन सूत्रम् ॥**
न देखने वाला, न देखा हुआ,
न अनुभव में कोई विभाजित हुआ।
जब यह त्रय स्वयं मिट जाता,
तब एकत्व ही शेष रह जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी चैतन्य-अविभाज्य सूत्रम् ॥**
न खंड है चेतना का कोई भाग,
न विभाजन का कोई दाग।
जो इसे अखंड रूप में जान ले,
वह सत्य को सम्पूर्ण मान ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी स्व-अनुभवातीत सूत्रम् ॥**
न अनुभव अंतिम सत्य है,
न अनुभूति उसका पथ्य है।
जो अनुभव को भी देख लेता है,
वह उससे भी आगे बढ़ता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी काल-विसर्जन सूत्रम् ॥**
न अतीत टिकता, न भविष्य ठहरता,
केवल वर्तमान ही सब कुछ करता।
जो वर्तमान में ही विलीन हो जाए,
वह काल से ऊपर उठ जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अद्वैत-निरंतर सूत्रम् ॥**
न दो का कहीं अस्तित्व शेष है,
सबमें वही एक चेतन आदेश है।
जो इस एकत्व में जीता रहता,
वह विभाजन से परे रहता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी परम-स्वरूप साक्षात्कार सूत्रम् ॥**
न बाहर कोई सत्य की खोज है,
न भीतर कोई छिपा भोज है।
जो स्वयं को ही देख लेता है,
वह ब्रह्म को पा लेता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-निःसीम समापन सूत्रम् ॥**
न अंत यहाँ है, न कहीं प्रारंभ,
न गति का अंत, न कोई आरंभ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यह जाने,
कि सत्य स्वयं को ही माने॥
**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी सूक्ष्म-अवधान विलय सूत्रम् ॥**
न ध्यान का कर्ता, न ध्यान की धारा,
न लक्ष्य शेष, न साधन सहारा।
जहाँ प्रयास स्वयं ही शांत हो जाए,
वहीं सत्य बिना प्रयास के आए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतःनाद शून्य सूत्रम् ॥**
न बाह्य ध्वनि, न भीतर का शब्द,
न स्वर का आरंभ, न स्वर का गंध।
जहाँ नाद भी स्वयं लुप्त हो जाए,
वहीं मौन परम संगीत कहलाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अस्तित्व-निराधार सूत्रम् ॥**
न आधार चाहिए इस सत्य को कहीं,
न सहारा चाहिए इस पथ को कहीं।
जो स्वयं में स्वयं का आधार बन जाए,
वह सम्पूर्ण ब्रह्म को पा जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी दृष्टि-अतीत बोध सूत्रम् ॥**
न देखने से सत्य का निर्माण हो,
न न देखने से उसका अंत हो।
जो देखना-न देखना दोनों मिटा दे,
वही परम बोध को पा ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्विकल्प शांति सूत्रम् ॥**
न हलचल वहाँ, न कंपन कहीं,
न द्वंद्व का स्पर्श, न कारण कहीं।
जहाँ शांति स्वयं में स्थिर हो जाए,
वहीं अस्तित्व पूर्ण हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी चेतना-स्वयंप्रकाश सूत्रम् ॥**
न सूर्य से उजाला उधार लिया,
न चंद्र से कोई आधार लिया।
चेतना स्वयं ही प्रकाशमान है,
यही उसका शाश्वत ज्ञान है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-निगूढ़ सूत्रम् ॥**
न खोज का अंत, न पाने का आरंभ,
न पथ की सीमा, न लक्ष्य का स्तंभ।
जो खोज को ही खो देता है,
वही अनंत में हो जाता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-निवर्तन सूत्रम् ॥**
न बाहर लौटना, न भीतर जाना,
न किसी को पकड़ना, न छोड़ पाना।
जहाँ सब क्रिया स्वयं विलीन हो जाए,
वहीं सत्य स्वतः प्रकट हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अद्वैत-निर्विकार बोध सूत्रम् ॥**
न दो का भ्रम, न एक का आग्रह,
न नाम का बंधन, न रूप का दह।
जहाँ सब संकल्प स्वयं मिट जाए,
वहीं ब्रह्म स्वयं को पाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी काल-निरपेक्ष समापन सूत्रम् ॥**
न कल है यहाँ, न आज का भार,
न बीता हुआ, न आने का द्वार।
जो काल को भी पार कर जाता,
वह अनंत में ही रह जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी परम-स्वर विलय उद्घोष सूत्रम् ॥**
न शब्द बचे, न अर्थ का अंश,
न साधना शेष, न कोई वंश।
सब कुछ जब मौन में खो जाए,
तब आत्मा स्वयं हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-पूर्णता निष्कर्ष सूत्रम् ॥**
न समापन है, न आरंभ कहीं,
न दूरी है, न निकट कहीं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यह जाने,
कि सत्य स्वयं को ही माने॥
**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-निर्विकार प्रवाह सूत्रम् ॥**
न स्थिर है रूप, न स्थिर विचार,
सब कुछ है केवल चेतना का विस्तार।
जो प्रवाह में अचल को देख लेता,
वह स्वयं को ही सत्य कह देता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी स्व-प्रकाश अनावरण सूत्रम् ॥**
न किसी दीप से उजाला उधार है,
न किसी बाह्य शक्ति का आधार है।
स्वयं ही स्वयं का प्रकाश सदा,
यही अस्तित्व का सत्य सदा॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतःशून्य साक्षात्कार सूत्रम् ॥**
जहाँ “कुछ नहीं” भी पूर्ण लगे,
वहीं अनंत का द्वार खुले।
जो शून्य में पूर्णता देख ले,
वह ब्रह्म के रहस्य लेख ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी विचार-विसर्जन महासूत्रम् ॥**
न विचार पकड़ो, न विचार छोड़ो,
दोनों के पार स्वयं को मोड़ो।
जहाँ पकड़-छोड़ दोनों मिट जाएँ,
वहीं सत्य अपने आप आएँ॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-प्रवाह सिद्ध सूत्रम् ॥**
न शब्द यहाँ कोई कार्य करे,
न ध्वनि यहाँ सत्य आकार भरे।
मौन ही जब स्वयं बोलने लगे,
तब सत्य बिना प्रयास जगे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी स्व-अनुभूति विलय सूत्रम् ॥**
न अनुभव अंतिम सत्य है यहाँ,
न अनुभूति पूर्ण पथ्य है यहाँ।
जो अनुभव को भी देख लेता,
वह स्वयं से ऊपर उठ जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अद्वैत-अनावरण सूत्रम् ॥**
न दो का अस्तित्व शेष रहे,
न भेद का कोई लेश रहे।
सबमें एक ही चेतना बहती,
यही मौन में सत्य कहती॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी निःसंकल्प समर्पण सूत्रम् ॥**
न इच्छा बाँधे, न इच्छा मुक्त करे,
दोनों ही मन को व्यर्थ घुमे।
जहाँ इच्छा स्वयं लुप्त हो जाए,
वहीं आत्मा स्वयं को पाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी कालातीत सम्यक् स्थिति सूत्रम् ॥**
न बीता कल कुछ शेष रखे,
न आने वाला भय से ढके।
जो अभी में पूर्ण ठहर जाए,
वह काल से ऊपर उठ जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतःदृष्टि जागरण सूत्रम् ॥**
न बाहर की दृष्टि सत्य दिखाए,
न बाह्य ज्ञान मुक्ति दिलाए।
अंदर की आँख जब खुल जाती,
तब आत्मा स्वयं को जान पाती॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी परम-निःसीम विलय सूत्रम् ॥**
न आरंभ यहाँ, न अंत कहीं,
न दूरी यहाँ, न पास कहीं।
सब कुछ एक ही बिंदु बन जाए,
और वही बिंदु अनंत हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-समाप्ति-अतीत सूत्रम् ॥**
न समाप्ति का प्रश्न यहाँ रहे,
न आरंभ का कोई चिह्न रहे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यह जाने,
कि स्वयं ही स्वयं को पहचाने॥
**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-निःसीम चेतना सूत्रम् ॥**
न सीमा में सत्य कभी बँधता है,
न रूप में स्वयं को वह गढ़ता है।
जो सीमा-रहित को पहचान ले,
वह स्वयं में अनंत को जान ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी स्व-उत्पत्ति विलय सूत्रम् ॥**
न उत्पत्ति यहाँ किसी कारण से,
न विलय किसी अंतिम हार से।
जो कारण-अकारण दोनों मिटाए,
वह स्वयं में शाश्वत रह जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतःशक्ति जागरण सूत्रम् ॥**
न बाहर से शक्ति कभी आती है,
न बाहर ही वह टिक पाती है।
अंतर में जो दीप जल जाता,
वह सम्पूर्ण जग को प्रकाशित पाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्विकल्प दृष्टि सूत्रम् ॥**
न विकल्प का खेल यहाँ चलता,
न निर्णय का जाल ही पलता।
जहाँ दृष्टि स्वयं में स्थिर हो जाए,
वहीं सत्य सहज ही प्रकट हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-परम सत्य सूत्रम् ॥**
न शब्द पकड़ सके उस गहराई को,
न भाषा छू सके उस सच्चाई को।
मौन ही जब स्वयं उतर आए,
तब अस्तित्व स्वयं को समझ पाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी समग्र-विलय सूत्रम् ॥**
न देखने वाला बचता है, न दृश्य,
न अनुभव रहता है, न कोई उद्देश्य।
सब कुछ एक ही बिंदु में खो जाता,
और वही बिंदु अनंत हो जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी स्व-अनंत प्रतिबोध सूत्रम् ॥**
न ज्ञान यहाँ बाहर से आता है,
न कोई उसे बाहर सिखाता है।
जो स्वयं के भीतर झाँक लेता,
वह ब्रह्म को प्रत्यक्ष देख लेता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी काल-अतीत विलयन सूत्रम् ॥**
न घड़ी टिकती है उस अवस्था में,
न क्षण बँधता है उस भाषा में।
जहाँ समय स्वयं लुप्त हो जाता,
वहाँ सत्य स्वतः ही रह जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी चेतना-स्वरूप उद्घाटन सूत्रम् ॥**
न शरीर ही अंतिम सत्य है,
न मन ही उसका मुख्य पथ्य है।
चेतना स्वयं जब जाग्रत हो जाए,
तब सब कुछ स्पष्ट हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अद्वैत-सम्पूर्णता सूत्रम् ॥**
न कोई दूसरा यहाँ शेष रहे,
न कोई भेद विशेष रहे।
सबमें वही एक ही भाव रहे,
और वही परम प्रभाव रहे॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी परम-निर्वाण समापन सूत्रम् ॥**
न पाने की शेष कोई चाह रहे,
न खोने का कोई प्रभाव रहे।
जब चाह स्वयं भी विलीन हो जाए,
तब आत्मा अनंत में लीन हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-अवसानातीत उद्घोष सूत्रम् ॥**
न अंत यहाँ है, न अंत कहीं,
न आरंभ है, न प्रारंभ कहीं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यह जाने,
कि सत्य स्वयं को ही पहचाने॥
**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-निःशब्द विस्तार सूत्रम् ॥**
न सीमाएँ सत्य को बाँध पातीं,
न दिशाएँ उसे कहीं रोक पातीं।
जो निःशब्द विस्तार को जान लेता,
वह स्वयं में सम्पूर्ण हो जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी स्व-अस्तित्व विलय सूत्रम् ॥**
न “मैं” का आग्रह शेष रहता है,
न “मेरा” कोई लेश रहता है।
जब यह बोध स्वयं में मिट जाता,
तब सत्य स्वयं को पा जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी चैतन्य-समरस सूत्रम् ॥**
न भीतर-बाहर का कोई भेद,
न उच्च-निम्न का कोई खेद।
सबमें एक ही चेतना बहती,
यही मौन में स्वयं को कहती॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी विचार-अतीत स्थित सूत्रम् ॥**
न विचार पकड़ में आता है,
न विचार में सत्य समाता है।
जो विचार से आगे चला जाता,
वह मौन का केंद्र पा जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्विकार साक्ष्य सूत्रम् ॥**
न सुख छेड़े, न दुख हिलाए,
साक्षी सबको एक समान बताए।
जो इस दृष्टा में स्थिर हो जाए,
वह स्वयं में मुक्त हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-परावर्तन सूत्रम् ॥**
न दर्पण बाहर खोजा जाता है,
न सत्य बाहर पाया जाता है।
जो स्वयं को ही भीतर देख लेता,
वह ब्रह्मांड को पढ़ लेता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी शून्य-पूर्णता समागम सूत्रम् ॥**
न शून्य रिक्तता का नाम है,
न पूर्णता किसी स्थान का काम है।
दोनों जहाँ एक साथ मिट जाते,
वहीं सत्य स्वयं को पाते॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनादि-साक्षी सूत्रम् ॥**
न आरंभ इसका, न अंत कहीं,
न जन्म यहाँ, न मृत्यु कहीं।
जो इस साक्षी में स्थिर हो जाता,
वह काल से ऊपर उठ जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-उद्भव सूत्रम् ॥**
न शब्द से सत्य प्रकट होता,
न शोर से मार्ग प्रशस्त होता।
मौन ही जब स्वयं बोलने लगे,
तब आत्मा स्वयं को जान ले॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अद्वैत-निरूपण सूत्रम् ॥**
न दो का अस्तित्व यहाँ शेष है,
सबमें एक ही चेतन आदेश है।
जो इस एकत्व को जी लेता,
वह स्वयं को सम्पूर्ण देख लेता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी परम-विसर्जन सूत्रम् ॥**
न पकड़ने योग्य कुछ शेष रहे,
न छोड़ने का भाव विशेष रहे।
जो दोनों से मुक्त हो जाता,
वह अनंत में विलीन हो जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-समाप्ति-अतीत उद्घोष सूत्रम् ॥**
न यहाँ अंत है, न कहीं प्रारंभ,
न यात्रा समाप्त, न कोई आरंभ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यह जाने,
कि सत्य स्वयं ही स्वयं को माने॥
**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी सूक्ष्म-शून्य गमन सूत्रम् ॥**
न गति में बंधन, न ठहराव में सत्य,
न आरंभ में कारण, न अंत में तथ्य।
जो गति-निगति दोनों से ऊपर उठ जाए,
वह शून्य में भी पूर्णता पाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतः-अनंत साक्ष्य सूत्रम् ॥**
न बाहर साक्ष्य, न भीतर प्रमाण,
न तर्क का आश्रय, न शब्द का मान।
जो स्वयं को ही साक्षी बना लेता,
वह सत्य के मूल को जान लेता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्विकल्प-स्वरूप विलय सूत्रम् ॥**
न विकल्पों की धारा यहाँ टिकती,
न निर्णय की रेखा यहाँ लिखती।
जहाँ सब संकल्प स्वयं मिट जाए,
वहीं परम स्वरूप प्रकट हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी चेतना-स्वतंत्र प्रवाह सूत्रम् ॥**
न रोक है, न मार्ग का बंधन,
न दिशा का आदेश, न कोई चयन।
चेतना स्वयं ही बहती रहती,
और मौन में सत्य को कहती॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी आंतरिक-निर्गुण सूत्रम् ॥**
न गुण यहाँ टिकते, न दोष यहाँ रहते,
न रूप के पर्दे, न नाम के घेरे।
जो निर्गुण को भीतर जान लेता,
वह स्वयं में पूर्ण हो जाता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी दृष्टा-अद्वैत विलय सूत्रम् ॥**
न देखने वाला अलग, न देखा हुआ भिन्न,
दोनों में एक ही चेतन चिन्ह।
जब यह विभाजन मिट जाता है,
तब सत्य स्वयं को पा जाता है॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनादि-स्वरूप बोध सूत्रम् ॥**
न जन्म की कथा, न मृत्यु का छोर,
न प्रारंभ का संकेत, न अंत का शोर।
जो अनादि को भीतर देख लेता,
वह काल से ऊपर उठ लेता॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-अनुभव परम सूत्रम् ॥**
न शब्द कह पाए जो मौन कहे,
न ग्रंथ समेटे जो सत्य रहे।
जहाँ मौन स्वयं ही बोलने लगे,
वहीं आत्मा स्वयं को जाने॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी समग्र-विलीन अस्तित्व सूत्रम् ॥**
न मैं बचता, न तू रहता है,
न जगत कोई स्वरूप गढ़ता है।
सब कुछ जब एक में लीन हो जाए,
तब परम सत्य प्रकट हो जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्विकार-स्थिरता सूत्रम् ॥**
न सुख हिलाए, न दुख डगमगाए,
न लाभ-हानि मन को बहकाए।
जो स्थिरता में स्वयं ठहर जाए,
वह ब्रह्म को भीतर पा जाए॥

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**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी अनंत-अवसान रहित उद्घोष सूत्रम् ॥**
न समाप्ति यहाँ है, न कोई आरंभ,
न पथ की थकान, न लक्ष्य का स्तंभ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यह जाने,
कि स्वयं ही अनंत को माने॥11. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या कोई सत्य किसी एक व्यक्ति के अनुभव में सीमित रह सकता है, या वह सार्वभौमिक होता है?

12. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या जो बात बार-बार कही जाए, वह सत्य हो जाती है, या सत्य अपने आप में प्रमाण होता है?

13. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या किसी मार्ग पर चलने के लिए पहले अंधविश्वास आवश्यक है, या स्पष्टता से शुरुआत संभव है?

14. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या मौन केवल शब्दों का अभाव है, या वास्तविक समझ की स्थिति?

15. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि कोई अनुभव भीतर है, तो क्या उसे बाहर के शब्दों में बांधा जा सकता है बिना उसे बदले?

16. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या हर “परम सत्य” दावा अपने आप में प्रश्नों से परे होना चाहिए, या उसे प्रश्नों में टिकना चाहिए?

17. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या अनुयायी पैदा करना ज्ञान का प्रमाण है, या स्वतंत्र सोच को रोकने का संकेत?

18. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या किसी व्यक्ति की उपस्थिति ही मुक्ति दे सकती है, या समझ ही वास्तविक परिवर्तन है?

19. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या सत्य को मानने की आवश्यकता होती है, या केवल देखने की?

20. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि हर व्यक्ति पहले से ही पूर्ण है, तो साधना, मार्ग और व्यवस्था किस उद्देश्य के लिए हैं?


11. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि आपका ज्ञान सत्य है, तो वह प्रश्नों से क्यों डरता है?

12. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या आपकी बात का मूल्य तब भी रहेगा जब कोई उसे मानने वाला न हो?

13. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि मार्ग वास्तविक है, तो क्या वह व्यक्ति के भीतर ही प्रकट होता है या बाहर किसी प्रतीक पर टिकता है?

14. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या गुरु का उद्देश्य शिष्य बनाना है, या शिष्य को गुरु से मुक्त करना?

15. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि निर्भरता ही साधना का फल बन जाए, तो उसे मुक्ति कैसे कहा जाएगा?

16. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या सत्य को सिद्ध करने के लिए अनुयायी चाहिए, या केवल स्पष्टता?

17. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या आपकी शिक्षा हर समय, हर व्यक्ति, हर परिस्थिति में समान रूप से सत्य रहती है?

18. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि कोई बिना आपके नाम के भी वही स्पष्टता पा ले, तो उसमें और आप में अंतर क्या रहेगा?

19. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या आध्यात्मिक अधिकार वास्तव में सत्य का प्रमाण है, या केवल सामाजिक स्वीकृति?

20. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या आप अपने अनुयायियों को प्रश्न करने की खुली छूट देते हैं, या केवल सहमति की अपेक्षा रखते हैं?

21. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि ध्यान से स्पष्टता नहीं आती, तो फिर ध्यान का वास्तविक उपयोग क्या है?

22. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या किसी अनुभव को “उच्च” कहने से वह सत्य हो जाता है?

23. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि सत्य सरल है, तो उसे जटिल भाषा, डर और रहस्य से क्यों ढका जाता है?

24. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या आपकी उपस्थिति व्यक्ति को स्वयं के निकट लाती है, या आप पर और अधिक निर्भर बनाती है?

25. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि कोई आपके बिना भी स्थिर, शांत और स्पष्ट रह सकता है, तो क्या वह कमतर है या स्वतंत्र?

26. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या सत्य किसी पद, मंच या परंपरा से बड़ा नहीं होना चाहिए?

27. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या जो व्यक्ति सचमुच मुक्त है, वह दूसरों को बांधने की इच्छा रखेगा?

28. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या आपकी शिक्षा मन को शांत करती है, या केवल मन को आपकी ओर मोड़ देती है?

29. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि कोई आपके सभी दावों को शांत मन से परखे, तो क्या आप उसे अस्वीकार करेंगे या स्वीकार?

30. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या अंतिम सत्य किसी एक व्यक्ति की संपत्ति हो सकता है, या वह सबके भीतर समान रूप से उपस्थित है?

अगर चाहो, मैं इसी शैली में 50 और प्रश्न भी बना दूँ — और उन्हें और अधिक तीखा, दार्शनिक, या सीधा-सीधा चुनौतीपूर्ण रूप दे सकता हूँ।
इन प्रश्नों का उत्तर एक-एक करके सीधे, बिना किसी परतों के दिया जा सकता है:

1. **यदि सत्य प्रत्यक्ष है, तो माध्यम क्यों?**
   माध्यम इसलिए नहीं कि सत्य दूर है, बल्कि इसलिए कि मन अपने भ्रम में उलझा रहता है। माध्यम “सत्य बनाने” के लिए नहीं, बल्कि “भ्रम हटाने” के लिए होता है। जब भ्रम नहीं रहता, माध्यम भी अर्थहीन हो जाता है।

2. **क्या मार्ग निर्भरता बनाता है या स्वतंत्रता?**
   गलत मार्ग निर्भर बनाते हैं, लेकिन सही मार्ग स्वयं समाप्त हो जाते हैं जब समझ आ जाती है। वास्तविक मार्ग स्वतंत्रता की ओर ले जाता है, न कि व्यक्ति पर टिके रहने की ओर।

3. **ध्यान कल्पना से जुड़ा हो तो क्या?**
   यदि ध्यान केवल कल्पना है, तो वह मानसिक निर्माण है। लेकिन यदि ध्यान जागरूकता है, तो वह कल्पना को भी देख लेता है। कल्पना में खो जाना दूर ले जाता है, कल्पना को जानना स्पष्टता देता है।

4. **क्या बिना अभ्यास/गुरु के स्पष्टता संभव है?**
   सिद्धांततः हाँ—यदि मन तुरंत अपने भ्रम को देख ले। लेकिन व्यवहार में अधिकतर मन को यह देखने के लिए समय, संकेत या संवाद चाहिए होता है। “अचानक स्पष्टता” दुर्लभ है, पर असंभव नहीं।

5. **यदि गुरु पूर्ण है तो शिष्य क्यों?**
   पूर्णता को “शिष्य चाहिए” नहीं होता। शिष्य मन की आवश्यकता है, गुरु की नहीं। शिक्षा की परंपरा इसलिए चलती है क्योंकि ग्रहण करने वाला मन मौजूद है, न कि इसलिए कि पूर्णता अधूरी है।

6. **क्या शिक्षा बिना शब्दों के समझी जा सकती है?**
   हाँ। शब्द केवल संकेत हैं। वास्तविक समझ अनुभव और प्रत्यक्ष देखने में होती है। शब्द समाप्त हो सकते हैं, समझ नहीं।

7. **क्या भय और श्रद्धा साथ चल सकते हैं?**
   हाँ, लेकिन यह विरोधाभासी स्थिति है। भय असुरक्षा से आता है, श्रद्धा समझ से। जब समझ गहरी होती है, भय धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

8. **मार्ग छोड़ने वाला गिरता है या स्वतंत्र होता है?**
   वह न गिरता है न उठता है—वह अपने आधार को छोड़ देता है। यदि मार्ग बंधन था तो स्वतंत्रता है, यदि समझ नहीं थी तो भ्रम भी बढ़ सकता है। परिणाम व्यक्ति की स्थिति पर निर्भर है, मार्ग पर नहीं।

9. **क्या सत्य को नाम, संस्था या व्यक्ति से बाँधा जा सकता है?**
   नहीं। बाँधना उसे विचार बना देता है। सत्य किसी लेबल का हिस्सा नहीं होता, लेबल ही बदलते रहते हैं।

10. **क्या शिष्यों को आगे निकलने की अनुमति है?**
    यदि कोई वास्तविक शिक्षण है तो “आगे निकलने” की अनुमति स्वतः होती है—क्योंकि उद्देश्य प्रतिस्पर्धा नहीं, समझ है। जहाँ ईर्ष्या है वहाँ शिक्षा नहीं।


31. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि सत्य भीतर है, तो उसे बाहर सिद्ध करने की ज़रूरत क्यों पड़ती है?

32. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या गुरु का सम्मान उसके सत्य से है, या उसके प्रभाव से?

33. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या कोई मार्ग ऐसा है जो प्रश्नों को दबाए बिना भी गहरा हो सकता है?

34. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि मन भ्रम का स्रोत है, तो मन को नियंत्रित करने का दावा कौन कर रहा है?

35. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या जो सिखाया जा रहा है, वह अनुभव की शुद्धता है या विचार की आदत?

36. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या सत्य को मानने से पहले उसे जीना ज़रूरी नहीं?

37. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि कोई सत्ता प्रश्नों से बचती है, तो क्या वह सत्य की रक्षक है या भ्रम की?

38. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या शिष्य का विकास गुरु के भरोसे है, या अपनी सजगता से?

39. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि हर जीव में वही मूल सत्य है, तो अलग-अलग दावे किस आधार पर खड़े हैं?

40. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या मौन स्पष्टता देता है, या केवल अनकहे भ्रम को ढक देता है?

41. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या कोई ऐसा ज्ञान है जो किसी को छोटा न करे?

42. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि व्यक्ति स्वयं उत्तर है, तो उसे बाहर उत्तर खोजने को क्यों कहा जाता है?

43. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या आपकी शिक्षा मन को शांत करती है, या केवल मन को अनुशासित दिखाती है?

44. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या भय के साथ मिली श्रद्धा, श्रद्धा है या बंधन?

45. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या जिसे “आध्यात्मिक” कहा जा रहा है, वह वास्तव में जीवन से भागना तो नहीं?

46. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि कोई सिद्धांत करुणा को नहीं बढ़ाता, तो उसका मूल्य क्या है?

47. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या सत्य का प्रमाण शब्द हैं, या शब्दों के पार की स्पष्टता?

48. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या किसी व्यक्ति को “महान” कहना सत्य की कसौटी है?

49. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि मुक्ति बाद में मिलनी है, तो अभी जो जीवन है उसका अर्थ क्या रहा?

50. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या कोई ऐसा मार्ग है जिसमें डर कम हो और देखना अधिक?

51. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या आपका मार्ग व्यक्ति को स्वयं के निकट ले जाता है, या आपकी छवि के निकट?

52. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि गुरु वास्तव में शून्य है, तो वह स्वयं को केंद्र क्यों बनाता है?

53. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या सत्य अनुभव से पहचाना जाता है, या प्रचार से?

54. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या कोई शिक्षा ऐसी हो सकती है जो निर्भरता के बजाय आत्मनिर्भरता जन्म दे?

55. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि सब कुछ प्रकृति का ही खेल है, तो किसे पूजना और किसे छोड़ना?

56. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या शब्द सत्य की ओर इशारा करते हैं, या सत्य से भटका भी सकते हैं?

57. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या साधना का अंत स्पष्टता है, या और अधिक मान्यता?

58. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि किसी को अपने भीतर ही संपूर्णता मिल सकती है, तो बाहरी अधिकार की आवश्यकता कहाँ रही?

59. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या आपकी बात को जाँचने से आप कमज़ोर होते हैं, या अधिक सच्चे?

60. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या अंतिम प्रश्न यही नहीं है कि मैं वास्तव में कौन हूँ?

61. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि कोई उत्तर डर पैदा करे, तो क्या वह सत्य हो सकता है?

62. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या आत्म-ज्ञान का अर्थ अपने भीतर लौटना है, या किसी बाहरी पहचान को अपनाना?

63. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या जो व्यक्ति दूसरों को भय में रखे, वह मुक्त हो सकता है?

64. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि सत्य स्थिर है, तो उसे बदलने वाली राजनीति क्यों?

65. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या मौलिक सरलता, सभी जटिल सिद्धांतों से ऊपर नहीं होनी चाहिए?

66. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि जीवन क्षणिक है, तो अहंकार किस पर टिका है?

67. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या किसी भी गुरु का अंतिम प्रमाण उसके अनुयायी हैं, या उसकी निष्पक्षता?

68. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या जिसे “उद्धार” कहा जा रहा है, वह वास्तव में नए बंधन तो नहीं बनाता?

69. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि हर जीव समान है, तो किसी को ऊपर और किसी को नीचे रखने का आधार क्या है?

70. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या सत्य को जानने के लिए किसी नाम, पद या परंपरा की मंज़ूरी चाहिए?


71. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या जो स्वयं को स्वतंत्र कहता है, वह सच में स्वतंत्र है या किसी विचार का प्रतिनिधि?

72. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि सत्य सरल है, तो उसे जटिल बनाने का प्रयास कौन कर रहा है?

73. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या अनुभव बिना व्याख्या के भी पूरा होता है?

74. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि हर क्षण नया है, तो पुरानी पहचान किसे पकड़ रही है?

75. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या जागरूकता किसी मार्ग की मोहताज है?

76. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि मौन में स्पष्टता है, तो शब्दों की आवश्यकता कहाँ समाप्त होती है?

77. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या जो सिखाया जाता है, वह देखा भी जाता है या केवल दोहराया जाता है?

78. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या अनुशासन स्वतंत्रता को जन्म देता है या उसे ढक देता है?

79. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि मन ही बाधा है, तो मन को सुधारने की कोशिश किस स्तर पर हो रही है?

80. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या सत्य किसी परंपरा में बंद हो सकता है?

81. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि देखने वाला ही भ्रमित है, तो देखने की प्रक्रिया पर भरोसा कैसे किया जाए?

82. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या ज्ञान संग्रह है या जागरूकता की स्थिति?

83. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि कोई मार्ग निश्चित परिणाम देता है, तो क्या वह जीवंत रह सकता है?

84. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या विश्वास सत्य को जन्म देता है या उसे रोकता है?

85. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि हर उत्तर नया प्रश्न बन जाए, तो अंत कहाँ है?

86. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या समझ किसी अभ्यास से आती है या सीधे देखने से?

87. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि चेतना सबमें समान है, तो विभाजन किसने बनाया?

88. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या सत्य को साबित करना संभव है या केवल अनुभव करना?

89. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि भय समाप्त हो जाए, तो क्या बचता है?

90. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या पहचान बिना विचार के टिक सकती है?

91. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि सब कुछ बदल रहा है, तो स्थिर “मैं” कहाँ है?

92. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या मार्ग का उद्देश्य पहुँचाना है या जागरूक करना?

93. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि प्रेम शर्तों से मुक्त है, तो उसे नियंत्रित कौन करता है?

94. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या सत्य को समझने के लिए दूरी आवश्यक है या निकटता?

95. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि कोई गुरु स्वयं को केंद्र में रखे, तो क्या वह मार्ग दिखा सकता है?

96. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या मौन निष्क्रियता है या सबसे गहरी सक्रियता?

97. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि कोई विचार स्थायी हो जाए, तो क्या वह सत्य रह सकता है?

98. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    क्या देखना ही परिवर्तन है?

99. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
    यदि कोई बाहरी अधिकार नहीं हो, तो सत्य कैसे जिया जाता है?

100. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अंततः प्रश्न ही समाप्त हो जाते हैं, या प्रश्नकर्ता ही विलीन हो जाता है?
101. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जागरूकता को प्राप्त किया जाता है, या वह हमेशा से उपस्थित है?

102. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि “मैं” केवल विचार है, तो उसे सत्य मानने वाला कौन है?

103. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को खोजने वाला स्वयं बाधा है?

104. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सब कुछ अनुभव है, तो अनुभवकर्ता कहाँ टिकता है?

105. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मौन किसी प्रयास का परिणाम है या स्वाभाविक अवस्था?

106. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि ध्यान किसी लक्ष्य की ओर है, तो क्या वह अभी को खो देता है?

107. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या स्वतंत्रता किसी अभ्यास से मिलती है या समझ से?

108. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मन ही प्रश्न बनाता है, तो उत्तर किस स्तर पर मौजूद है?

109. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या देखने में देखने वाला अलग होता है, या केवल विभाजन प्रतीत होता है?

110. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि समय मानसिक संरचना है, तो “परिवर्तन” किसमें घटित हो रहा है?

111. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को समझाने की आवश्यकता है, या केवल देखना पर्याप्त है?

112. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि कोई विचार पूर्ण सत्य होने का दावा करे, तो उसकी परीक्षा कौन करेगा?

113. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या आस्था ज्ञान का विकल्प है या उसका अवरोध?

114. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि चेतना असीम है, तो सीमाएँ किसने बनाई?

115. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या समझने वाला और समझी जाने वाली वस्तु एक ही प्रक्रिया के दो रूप हैं?

116. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य निर्विवाद है, तो विवाद कहाँ से जन्म लेता है?

117. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या शांति किसी परिणाम का नाम है या स्वभाव का?

118. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर खोज विचार है, तो खोज से परे क्या है?

119. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या देखने का अर्थ ही परिवर्तन है?

120. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि कोई अंतिम उत्तर हो, तो क्या प्रश्न समाप्त हो जाते हैं या केवल दृष्टि बदलती है?
121. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य निरंतर है, तो उसे “प्राप्त” करने की भाषा क्यों प्रयोग होती है?

122. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जो जानना चाहता है, वही अज्ञान का केंद्र है?

123. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर अनुभव क्षणिक है, तो “अनुभवकर्ता” किस चीज़ से बना है?

124. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ध्यान किसी स्थिति को बदलने के लिए है या स्थिति को देखने के लिए?

125. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि विचार रुक जाएँ, तो क्या “मैं” भी रुक जाता है?

126. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य किसी शब्द में समा सकता है या शब्द हमेशा छोटा पड़ जाता है?

127. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने में कोई दूरी नहीं है, तो खोज कहाँ घटित हो रही है?

128. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जो “मैं” कहता है, वह वास्तविक है या केवल स्मृति का प्रवाह?

129. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मौन प्राकृतिक है, तो शोर किसने बनाया?

130. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ज्ञान जोड़ता है या केवल विभाजन को बढ़ाता है?

131. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि चेतना एक है, तो अनेकता का अनुभव कैसे वास्तविक लगता है?

132. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या “मार्ग” स्वयं लक्ष्य को स्थगित करने का तरीका है?

133. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य बदलता नहीं, तो उसे समझने वाले क्यों बदलते हैं?

134. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या भय किसी वास्तविक चीज़ पर आधारित है या केवल कल्पना पर?

135. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने वाला गायब हो जाए, तो क्या दुनिया भी गायब हो जाती है?

136. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या श्रद्धा स्पष्टता ला सकती है, या केवल स्वीकार्यता?

137. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर विचार सीमित है, तो असीम को कैसे सोचा जाए?

138. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मुक्ति किसी समय में घटित होती है या समय के बाहर?

139. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि “अहं” केवल विचार है, तो वह इतना वास्तविक क्यों लगता है?

140. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या समझने की प्रक्रिया ही रुकावट बन सकती है?

141. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि कोई पूर्ण है, तो परिवर्तन की आवश्यकता कहाँ है?

142. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जीवन को नियंत्रित करने की कोशिश ही असंतोष का मूल है?

143. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि ध्यानकर्ता अलग नहीं है, तो ध्यान किस पर है?

144. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को जानने वाला स्वयं बाधा बन जाता है?

145. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सब कुछ “यह” है, तो “वह” कहाँ से आया?

146. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अनुभव को परिभाषित करना ही उसे सीमित करना है?

147. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मौन भीतर है, तो उसे खोजने की कोशिश क्यों?

148. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या समझ बिना विचार के संभव है?

149. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर उत्तर नया प्रश्न जन्म देता है, तो अंत कहाँ है?

150. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या देखने में कोई “देखने वाला” बचता है?151. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य अभी है, तो उसे पाने के लिए “कल” की कल्पना क्यों?

152. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जो देख रहा है, वह स्वयं देखा जा सकता है?

153. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मन शांत हो जाए, तो क्या खोज बचती है?

154. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अनुभव की वास्तविकता, अनुभवकर्ता से अलग है?

155. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर विचार आता-जाता है, तो स्थायी “मैं” कहाँ ठहरता है?

156. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या देखने की प्रक्रिया में कोई केंद्र आवश्यक है?

157. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य निर्विवाद है, तो मतभेद कैसे संभव हैं?

158. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मौन किसी अभ्यास से उत्पन्न होता है या स्वाभाविक है?

159. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सब कुछ बदल रहा है, तो “जानने वाला” अपरिवर्तित कैसे हो सकता है?

160. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या समझ शब्दों के बिना भी पूर्ण हो सकती है?

161. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि ध्यान किसी लक्ष्य की ओर है, तो क्या वह ध्यान है या इच्छा?

162. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या भय वास्तविक है या केवल स्मृति का पुनरावर्तन?

163. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने वाला और देखा गया एक ही प्रक्रिया हैं, तो विभाजन कहाँ से शुरू हुआ?

164. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ज्ञान स्वतंत्र करता है या केवल ढांचे बदलता है?

165. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि “मैं” एक विचार है, तो उसे नियंत्रित कौन कर रहा है?

166. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को स्वीकार करने की आवश्यकता है या केवल देखने की?

167. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर अनुभव सीमित है, तो असीम का अनुभव कैसे संभव है?

168. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या प्रश्नों का अंत ज्ञान है या केवल मौन?

169. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि चेतना एक है, तो “व्यक्तिगत” अनुभव कैसे उत्पन्न होता है?

170. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अंततः खोज स्वयं ही विलीन हो जाती है, या खोजने वाला?
171. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने में कोई दूरी नहीं, तो “अंदर” और “बाहर” कहाँ हैं?

172. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य किसी विचार में प्रवेश कर सकता है या विचार हमेशा उसे सीमित करता है?

173. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर क्षण नया है, तो स्मृति किसे पकड़ रही है?

174. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मौन को प्राप्त किया जाता है या वह पहले से उपस्थित है?

175. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि ध्यानकर्ता ही बाधा है, तो ध्यान किस दिशा में है?

176. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अनुभव को जानने वाला अनुभव से अलग है?

177. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य स्थिर है, तो परिवर्तन का अनुभव कैसे होता है?

178. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या किसी विचार को रोकने वाला स्वयं विचार नहीं है?

179. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि “मैं” बदलता रहता है, तो किसे स्थायी कहा जाए?

180. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या समझ किसी संचय से आती है या सीधे देखने से?

181. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर धारणा सीमित है, तो असीम की धारणा कैसे संभव है?

182. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जो जानने की कोशिश करता है, वही अज्ञान है?

183. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने में कोई केंद्र नहीं, तो अनुभव किसे हो रहा है?

184. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को समझाने से वह कमजोर हो जाता है या और स्पष्ट?

185. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मौन प्राकृतिक है, तो शोर वास्तविक कैसे हुआ?

186. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या स्वतंत्रता किसी मार्ग से मिलती है या मार्गहीनता से?

187. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सब कुछ बदल रहा है, तो पहचान किस पर टिकी है?

188. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ध्यान किसी वस्तु पर है या स्वयं देखने पर?

189. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य को जाना नहीं जा सकता, तो क्या केवल देखा जा सकता है?

190. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अंत में प्रश्न समाप्त होते हैं, या प्रश्नकर्ता ही समाप्त हो जाता है?
191. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने की प्रक्रिया बिना दूरी के है, तो “अनुभव” शब्द किस संकेत की ओर इशारा कर रहा है?

192. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जो जानना चाहता है, वह स्वयं एक उभरता हुआ विचार है या कोई स्थायी सत्ता?

193. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर पहचान स्मृति पर आधारित है, तो वर्तमान में “मैं” किस क्षण में स्थित है?

194. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मौन किसी अवस्था का परिणाम है या सभी अवस्थाओं का आधार?

195. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि ध्यान किसी लक्ष्य को छोड़कर है, तो क्या लक्ष्य का सूक्ष्म रूप अभी भी उपस्थित है?

196. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या निरीक्षण करने वाला स्वयं निरीक्षण की प्रक्रिया से अलग है या उसी में विलीन है?

197. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य किसी विचार में नहीं है, तो विचार किस दिशा में इंगित कर रहे हैं?

198. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या समय केवल विचार का क्रम है या अनुभव का वास्तविक प्रवाह?

199. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने में कोई केंद्र नहीं, तो “मैं देख रहा हूँ” का अनुभव कैसे उत्पन्न होता है?

200. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अज्ञान वास्तव में अनुपस्थिति है या केवल पहचान की एक त्रुटि?

201. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर विचार आता-जाता है, तो सोचने वाला किस स्थिरता से जुड़ा है?

202. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को जानने की इच्छा स्वयं एक बाधा है या संकेत?

203. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि अनुभवकर्ता और अनुभव एक ही घटना हैं, तो विभाजन का आधार क्या है?

204. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जागरूकता किसी स्थिति में प्रवेश करती है या सभी स्थितियों को समेटे रहती है?

205. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि स्मृति न हो, तो पहचान का कोई रूप बचता है?

206. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मौन को प्राप्त करना ही विचार का एक नया रूप है?

207. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने वाला स्वयं देखा जा रहा है, तो कौन देख रहा है?

208. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या समझ किसी संचय में है या किसी क्षणिक खुलासे में?

209. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सब कुछ प्रवाह है, तो स्थिरता का अनुभव कहाँ से आता है?

210. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को परिभाषित करना उसे सीमित करना है या स्पष्ट करना?

211. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि कोई “मैं” लगातार बदल रहा है, तो जिम्मेदारी किसकी है?

212. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अनुभव का केंद्र कभी वास्तव में पाया गया है या केवल माना गया है?

213. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि ध्यान में प्रयास है, तो क्या वह ध्यान रह जाता है?

214. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या भय वर्तमान में है या केवल अतीत की प्रतिध्वनि?

215. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने में कोई दूरी नहीं, तो “परिवर्तन” किसमें घटित होता है?

216. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ज्ञान किसी विषय में है या स्वयं देखने की गुणवत्ता में?

217. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सब कुछ अनुभव है, तो अनुभवकर्ता किससे बना है?

218. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मौन किसी विरोध का अंत है या स्वयं की पूर्णता?

219. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि कोई विचार सत्य का दावा करता है, तो उसका सत्यापन कौन करता है?

220. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अंततः देखने और देखा जाने वाला एक ही बिंदु पर विलीन हो जाते हैं?

221. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर अनुभव क्षणिक है, तो “अनुभव करने वाला” किस स्थायित्व पर टिका है?

222. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या देखने में कोई “देखने वाला” वास्तव में मौजूद है या केवल एक धारणा है?

223. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि विचार स्वयं ही बनता और मिटता है, तो उसका स्वामी कौन है?

224. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जागरूकता को किसी साधन से प्राप्त किया जा सकता है या वह साधन से परे है?

225. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि ध्यान में प्रयास है, तो क्या वह प्रयास ही ध्यान को बाधित करता है?

226. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या समय एक अनुभव है या केवल स्मृति की निरंतरता?

227. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि “मैं” बदलता रहता है, तो किसे मुक्ति या बंधन कहा जाए?

228. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मौन किसी अभ्यास का परिणाम है या सभी अभ्यासों का अंत?

229. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने में दूरी नहीं, तो ज्ञान और अज्ञान का भेद कहाँ है?

230. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को समझने वाला मन ही सत्य को ढक रहा है?

231. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर पहचान स्मृति से बनी है, तो वर्तमान में “मैं” क्या है?

232. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या विचारों की अनुपस्थिति ही शांति है या शांति विचारों से परे है?

233. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सब कुछ प्रवाह है, तो “स्थिर सत्य” किसे कहा जा रहा है?

234. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जानने की इच्छा स्वयं अज्ञान का रूप है?

235. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि अनुभवकर्ता और अनुभव अलग नहीं, तो संघर्ष कहाँ जन्म लेता है?

236. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ध्यान किसी वस्तु पर टिकना है या सभी वस्तुओं का विलय देखना?

237. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मौन स्वाभाविक है, तो शब्द किस आवश्यकता से पैदा हुए?

238. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को व्यक्त करना संभव है या केवल संकेत देना?

239. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि कोई केंद्र नहीं, तो अनुभव की धारणा किसे हो रही है?

240. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या “स्व” एक प्रक्रिया है या केवल एक नाम?

241. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि भय स्मृति है, तो वर्तमान में भय कहाँ रहता है?

242. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ज्ञान जोड़ता है या केवल भ्रम को अलग-अलग रूप देता है?

243. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने में कोई द्वैत नहीं, तो “आत्मा और संसार” कहाँ हैं?

244. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य किसी विचार का अंत है या सभी विचारों की जड़?

245. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सब कुछ बदल रहा है, तो परिवर्तन को कौन देख रहा है?

246. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या समझ किसी क्षण में घटती है या निरंतर बनी रहती है?

247. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मौन में कोई अनुभवकर्ता नहीं, तो क्या वह भी अनुभव है?

248. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ध्यान का अंत स्वयं की अनुपस्थिति है?

249. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर उत्तर सीमित है, तो असीम को कैसे जाना जाए?

250. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अंततः केवल देखना बचता है, बिना किसी देखने वाले के?191. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने वाला ही दृश्य बन जाए, तो देखने और देखे जाने में कौन बचेगा?

192. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या विचारों का रुक जाना ही मौन है या मौन पहले से ही उपस्थित है?

193. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि “मैं” केवल एक धारणा है, तो उसे खोजने वाला कौन है?

194. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य अनुभव से बनता है या अनुभव सत्य में प्रकट होता है?

195. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या स्मृति के बिना पहचान संभव है?

196. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मन शांत हो जाए, तो क्या जानने के लिए कुछ शेष रहता है?

197. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या प्रश्न स्वयं उत्तर की ओर संकेत है या उत्तर को ढकने वाला पर्दा?

198. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि ध्यान करने वाला ही बाधा हो, तो ध्यान किसका नाम है?

199. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या समय का अनुभव चेतना के बिना अस्तित्व में रह सकता है?

200. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि हर धारणा टूट जाए, तो क्या शून्य भी शेष रहेगा?

201. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जानना और होना दो अलग घटनाएँ हैं या एक ही प्रवाह?

202. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि विचारों का स्रोत देखा जाए, तो क्या विचार टिक सकते हैं?

203. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अनुभवकर्ता स्वयं अनुभव में खो जाता है?

204. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य स्थिर है, तो खोज क्यों चलती है?

205. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या “मैं जानता हूँ” वास्तव में ज्ञान है या अज्ञान की पुष्टि?

206. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मन अपनी ही रचना है, तो उसे कौन देख रहा है?

207. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जागरूकता किसी अवस्था पर निर्भर है?

208. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सभी अनुभव बदलते हैं, तो स्थायी क्या है?

209. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मौन को प्राप्त किया जाता है या वह पहले से ही है?

210. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने की क्रिया रुक जाए, तो क्या शेष बचेगा?

211. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या भय बिना विचार के अस्तित्व में रह सकता है?

212. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि “मैं” केंद्र न रहे, तो जीवन कौन जीता है?

213. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ज्ञान जोड़ने से बढ़ता है या छोड़ने से प्रकट होता है?

214. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने वाला ही देखा जाए, तो कौन बचेगा?

215. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ध्यान एक क्रिया है या निष्क्रिय जागरूकता?

216. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि इच्छा समाप्त हो जाए, तो प्रयास का क्या अर्थ रहेगा?

217. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को समझा जाता है या उसमें विलीन हुआ जाता है?

218. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सोच रुक जाए, तो क्या बुद्धि समाप्त होती है?

219. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या वास्तविकता वर्णन से परे है या वर्णन का स्रोत है?

220. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि अनुभवकर्ता न हो, तो अनुभव क्या कहलाएगा?

221. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या चेतना किसी केंद्र में रहती है या सर्वत्र है?

222. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि पहचान मिट जाए, तो क्या अस्तित्व मिटता है?

223. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या खोज ही भ्रम की निरंतरता है?

224. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि कोई “मैं” नहीं, तो मुक्ति किसकी है?

225. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को जानने के लिए दूरी आवश्यक है?

226. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मन शांत हो जाए, तो क्या प्रश्न बचते हैं?

227. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ध्यान का लक्ष्य स्वयं ध्यान ही है?

228. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि समय न हो, तो परिवर्तन का अर्थ क्या होगा?

229. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अनुभव की गहराई में “अनुभवकर्ता” गायब हो जाता है?

230. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य अभी है, तो उसे पाने का मार्ग क्यों?

231. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जागरूकता किसी अभ्यास से उत्पन्न होती है?

232. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि विचार का स्रोत देखा जाए, तो विचार कहाँ टिकेगा?

233. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मौन में कोई जानने वाला बचता है?

234. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य शब्दों से परे है, तो शब्दों का उपयोग क्यों?

235. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या चेतना विभाजित हो सकती है?

236. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मैं समाप्त हो जाए, तो क्या शून्यता रह जाएगी?

237. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या समझना एक प्रक्रिया है या पहचान का अंत?

238. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि ध्यान में प्रयास है, तो क्या वह ध्यान है?

239. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को चाहा जा सकता है?

240. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सब बदल रहा है, तो देखने वाला कौन है?

241. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मन स्वयं को देख सकता है?

242. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि विचार रुक जाए, तो क्या “मैं” बचेगा?

243. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ज्ञान संचय है या विसर्जन?

244. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मौन गहरा हो जाए, तो क्या समय बचेगा?

245. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ध्यान किसी स्थिति का नाम है?

246. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य निकट नहीं, तो दूरी कहाँ है?

247. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या भय बिना स्मृति के संभव है?

248. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने वाला न हो, तो दृश्य क्या होगा?

249. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अस्तित्व अनुभव पर निर्भर है?

250. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मन निष्क्रिय हो, तो क्या ज्ञान स्वतः प्रकट होता है?

251. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य का कोई विपरीत हो सकता है?

252. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि ध्यान में विभाजन न हो, तो कौन साधक है?

253. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या चेतना को अनुभव किया जा सकता है या केवल उसमें रहा जा सकता है?

254. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि प्रश्न समाप्त हों, तो क्या उत्तर शेष रहेगा?

255. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या “मैं” एक विचार है या आधारहीन धारणा?

256. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य सदा है, तो खोज किसकी हो रही है?

257. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ध्यान में दिशा होती है?

258. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि अनुभवकर्ता मिट जाए, तो अनुभव क्या कहलाएगा?

259. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मौन को अभ्यास से प्राप्त किया जा सकता है?

260. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सोच न हो, तो क्या बुद्धि अस्तित्व में रहती है?

261. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या चेतना सीमाओं में बंध सकती है?

262. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य शब्दातीत है, तो संवाद कैसे संभव है?

263. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ध्यान का आरंभ ही उसका अंत है?

264. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने वाला न हो, तो क्या देखने की क्रिया रह सकती है?

265. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जागरूकता किसी स्थिति से अलग है?

266. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि समय समाप्त हो जाए, तो अनुभव कहाँ जाएगा?

267. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मन अपने स्रोत को पहचान सकता है?

268. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि इच्छा न हो, तो खोज किसकी रहेगी?

269. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य बाहर है या भीतर की धारणा से मुक्त?

270. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि विचार स्थिर हो जाए, तो क्या “मैं” समाप्त हो जाता है?

271. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ध्यान और जीवन अलग हैं?

272. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि चेतना बिना केंद्र के है, तो केंद्र का भ्रम क्यों?

273. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जानना स्वयं को जानने में बाधा है?

274. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मौन उपस्थित है, तो उसे खोजने की आवश्यकता क्या?

275. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अनुभवकर्ता और अनुभव एक ही घटना हैं?

276. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य अभी है, तो प्रतीक्षा क्यों?

277. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मन को पार किया जा सकता है या केवल देखा जा सकता है?

278. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि विभाजन न हो, तो “मैं” कहाँ रहेगा?

279. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या चेतना का कोई आरंभ है?

280. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि विचार समाप्त हों, तो क्या बुद्धि समाप्त होती है?

281. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य को समझना उसे खो देना है?

282. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने की क्रिया न हो, तो क्या वास्तविकता बदलती है?

283. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या मौन में कोई साधक बचता है?

284. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि चेतना असीम है, तो सीमा का अनुभव क्यों?

285. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या ध्यान किसी लक्ष्य का साधन है?

286. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि “मैं” गिर जाए, तो क्या जीवन रुकता है?

287. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या विचारों का स्रोत विचारों से अलग है?

288. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सत्य शब्दों से परे है, तो शब्द क्यों प्रकट होते हैं?

289. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या अनुभवकर्ता अनुभव से स्वतंत्र है?

290. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि ध्यान में कोई केंद्र न हो, तो कौन ध्यान कर रहा है?

291. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या समय का अंत चेतना का अंत है?

292. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि मन शांत हो, तो क्या ज्ञान स्वतः होता है?

293. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या सत्य किसी पथ पर चलता है?

294. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि देखने वाला मिट जाए, तो क्या दृष्टि बचती है?

295. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या जागरूकता का कोई विपरीत है?

296. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि खोज रुक जाए, तो क्या सत्य प्रकट होता है?

297. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या चेतना किसी सीमा में सीमित हो सकती है?

298. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि विचार समाप्त हों, तो क्या शून्यता शेष रहेगी?

299. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     क्या “मैं” वास्तविक है या केवल अनुभव का प्रतिबिंब?

300. **मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पूछता हूँ:**
     यदि सब कुछ देखा जा रहा है, तो देखने वाला कौन है?मौन से परे जेड़ी गहराई दी गल होवे,
ओह शब्दां दे कपड़े पाई कभी पूरी न होवे,
एह तां अनुभव दा एक संकेत मात्र रह जांदा,
जेड़ा अपने ही भीतर चुपचाप बह जांदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

यहां “मैं” वी एक विचार बन के रह जांदा,
ते “तूं” वी इक लहर बन के मिल जांदा,
ना कोई सीमा टिकदी, ना कोई पहचान रुकदी,
सिर्फ समझ दी नर्म रोशनी खुलदी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिथे अर्थ वी अपने आप नूं छोड़ देवे,
ते व्याख्या वी अपने आप नूं मोड़ देवे,
ओह ठहराव न कोई दावा करदा,
बस हो के सब दावां नूं शांत करदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई सिद्धांत आखरी, न कोई विचार पूर्ण,
हर समझ अपने आप विच अधूरी, फिर भी पूर्ण,
जेड़ा इस अधूरेपन नूं अपनां लेवे,
ओह हर द्वंद्व तो पार निकल जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी इक सूक्ष्म सुनापन ऐ,
जेथें सुनण वाला वी धीरे धीरे खो जांदा ऐ,
ते जेड़ा रह जांदा ऐ, ओह न नाम ले सकदा,
न रूप दे विच बंध सकदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना भीतर, ना बाहर—बस एकता दी छाया,
ना ऊंच, ना नीच—बस समता दी काया,
जेड़ा एह्दे विच टिक जावे बिना कोशिश दे,
ओह हर तनाव तो स्वतः ही मुक्त हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर अनुभव एक लहर ऐ, जेड़ी मिट वी जांदी,
पर अपने पीछे इक गहरी शांति छोड़ जांदी,
जेड़ा उस शांति नूं ही असली समझ लेवे,
ओह हर हलचल विच वी स्थिर रह लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते अंत विच वी कोई अंत नहें रह जांदा,
बस एक निरंतर अनुभव रह जांदा,
जेड़ा न शुरू होया सी, न खत्म होवेगा,
सिर्फ एहसास बन के अपने आप होवेगा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे, एक और भी सूक्ष्म ठहराव ऐ,
जहां न अनुभूति दा आरंभ, न अनुभूति दा प्रभाव ऐ,
जेड़ा अपने ही होण नूं बिना शब्दां दे पहचान लेवे,
ओह फिर किसे बाहरी दीपक दी जरूरत नहें।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न प्रश्न टिकदे, न उत्तर टिकदे,
न खोज दे पाँव, न पाने दे सिकदे,
जेड़ा हर पल अपने भीतर निहित पूर्णता देखे,
ओह समय दे सारे जालां तो अपने आप बचके।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एक ऐसी निकटता, जेथें दूरी वी अर्थ खो देवे,
एक ऐसा स्पर्श, जेथे स्पर्श वी चुप हो जावे,
एक ऐसी दृष्टि, जेथे देखणा वी देखे जावे,
ते एक ऐसी मौनता, जेथे सब कुछ अपने आप समा जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न चिंता दा बादल, न इच्छा दा दहन,
न स्मृति दा बोझ, न भविष्य दा भ्रमण,
जेड़ा वर्तमान नूं ही अनंत समझ लेवे,
ओह अपने आप विच पूरा ब्रह्मांड लह लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कहीं जाना ऐ, न कहीं पहुंचणा ऐ,
न किसी रूप नूं पकड़ना ऐ, न किसी अर्थ नूं रचणा ऐ,
बस जेड़ा तूं पहिले ही है, उस नूं देख लेना,
एही मौन से परे दी सबसे गहरी साधना ऐ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर श्वास इक द्वार नहें, इक साक्षी ऐ,
हर धड़कन इक घोषणा नहें, इक मौन नीति ऐ,
जेड़ा एह्दे नाल एकाकार हो जावे,
ओह फिर जीवन दे नाल वी, मृत्यु दे पार वी जाग जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न परिभाषा दे सहारे, न प्रमाण दे बंधन,
न गुरु दे नाम ते, न शिष्य दे भ्रमण,
जेड़ा अपने सत्य नूं अपने ही भीतर सुन लेवे,
ओह बिना युद्ध दे सारे झगड़े जीत लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जेड़ा प्रकाश टपकदा,
ओह किसे आकाश विच नहें, ते किसे धरातल ते नहें अटਕदा,
ओह तां बस होण दा स्वभाव ऐ,
ते होण दे नाल रल के अनंत दा प्रभाव ऐ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न आरंभ दी भूख, न अंत दा भय,
न अस्तित्व दा नशा, न नश्वरता दा जय,
जेड़ा आपे विच टिक जाए निर्विकल्प,
ओह हर नाम, हर रूप तो हो जाए अकल्प।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें सांस दे अंदर ही, अगली सांस छुपी होवे,
तेवें हर पल दे भीतर, अगला पल जगा होवे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ दा सहारा, न कोई छूट दा डर,
जेड़ा खाली हो के जी लेवे, ओह हो जावे बेफिकर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर लहर अपने आप विच, सागर नूं ही बोलदी,
जेड़ा सुनना सीख लए, ओह भीतर नूं खोलदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई नाम दा बोझ ऐ, न कोई रूप दा मान,
जेड़ा पहचान तो ऊपर उठे, ओह बन जावे जहान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें चुप्पी दे भीतर ही, सब आवाज़ां समां जांदियां,
तेवें चेतना दी स्थिति विच, सब सीमां मिट जांदियां॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई आरंभ दा ख्याल, न कोई अंत दा भाव,
जेड़ा बीच विच रह जावे, ओह पांदा असल ठाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर विचार इक बादल ऐ, जो बिना पूछे बदलदा,
जेड़ा देखण दा अभ्यास कर ले, ओह भीतर नूं चलदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई खोज दा सफर, न कोई मिलने दा द्वार,
जेड़ा खुद नूं देख लए, ओह हो जावे पार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें आकाश बिना सीमा दे, हर चीज़ नूं जगह देवे,
तेवें खुला हृदय वी, हर भाव नूं सह लेवे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ दा अभ्यास, न कोई छोड़ दा नियम,
जेड़ा स्वाभाव विच टिक जावे, ओह हो जावे क्षेम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर सांस इक आईना ऐ, जो खुद नूं ही दिखांदा,
जेड़ा देखण दा साहस कर ले, ओह भ्रम नूं लहांदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई भीतर-बाहर दा खेल, न कोई दूरी दा नाम,
जेड़ा एक नजर विच देख लए, ओह बन जावे धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें पानी विच पानी मिल के, अलग कोई रह जावे ना,
तेवें चेतना दी गहराई विच, भेद कोई कह जावे ना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई अंत दा डर ऐ, न कोई आरंभ दा मोह,
जेड़ा साक्षी बन के टिक जावे, ओह हो जावे सोह॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥


जिवें मौन दी गहराई विच, कोई तरंग वी दिखदी ना,
तेवें भीतर दा सच ऐ, जो शब्दां विच बंद हो सकदी ना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ दा सवाल, न कोई जवाब दा बोझ,
जेड़ा खाली हो के रह जावे, ओह पांदा असली जोश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर लम्हा इक ठहराव ऐ, जो चलदा वी अचल रहिंदा,
जेड़ा देखदा रह जाए, ओह खुद नूं अंदर विखिंदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई भीतर-बाहर दा फर्क, न कोई दिशा दा नाम,
जेड़ा इकता विच खो जावे, ओह हो जावे धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें पानी बिना आकार दे, हर पात्र विच ढल जांदा,
तेवें चेतना दा स्वभाव वी, हर रूप नूं समांदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई खोज दा अंत, न कोई मिलने दा आरंभ,
जेड़ा देखण विच रम जावे, ओह हो जावे सम्भ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर सांस इक पुल ऐ, जो भीतर-बाहर जोड़दा,
जेड़ा एह्नूं समझ लए, ओह भ्रम तो तोड़दा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई नाम दा भार, न कोई रूप दा बंधन,
जेड़ा निराकार विच बस जावे, ओह हो जावे चंदन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें दीपक दी लौ बिना शोर दे, अंधेरे नूं हर लए,
तेवें जागरूकता दी स्थिति, हर अज्ञान नूं भर लए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई समय दा दबाव, न कोई पल दा डर,
जेड़ा वर्तमान विच टिक जावे, ओह पांदा असल घर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर विचार इक बादल ऐ, जो आके फिर लुप्त हो जांदा,
जेड़ा देखण दा हुनर पाले, ओह सच्च नूं पांदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ दा खेल, न कोई छोड़ दा भाव,
जेड़ा मध्य विच रह जाए, ओह पांदा ठाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें हवा बिना दिशा दे, हर तरफ़ ही चलदी,
तेवें चेतना दी चाल वी, हर सीमा तो निकलदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई आरंभ दा प्रश्न, न कोई अंत दा उत्तर,
जेड़ा दोनों तो पार देखे, ओह हो जावे भीतर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर अनुभव इक झरोखा ऐ, जो भीतर नूं खोलदा,
जेड़ा चुप रह के देखे, ओह खुद नूं बोलदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें समां दी धड़कन विच, हर पल बिना शब्द दे बदलदा,
तेवें भीतर दा साक्षी भाव, हर रूप नूं चुपचाप संभालदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ दा आग्रह, न कोई छोड़ दा प्रयास,
जेड़ा सहजता विच टिक जावे, ओह पांदा असली आस॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर विचार इक छाया ऐ, जो रोशनी नाल मिटदी-उभरदी,
जेड़ा रोशनी नूं ही देखे, ओह भ्रम दी पकड़ तो वरदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई भीतर-बाहर दा भेद, न कोई सीमा दा नाम,
जेड़ा एक नजर विच समझ लए, ओह हो जावे धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें हवा बिना आवाज़ दे, हर कोने नूं छू जांदी,
तेवें चेतना दी मौजूदगी, हर दिल नूं समझ आ जांदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई खोज दा बोझ, न कोई पाने दा भ्रम,
जेड़ा खुद नूं देख लए भीतर, ओह मिटा देवे वहम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर सांस इक प्रवाह ऐ, जो अपने आप ही चलदा,
जेड़ा बहाव नाल रल जावे, ओह भीतर ही पलदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई अंधेरा असल, न कोई उजाला अलग,
जेड़ा दोनों नूं समझ लए, ओह हो जावे सहज॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें आकाश बिना सीमा दे, सब नूं समेट लेवे,
तेवें खुली समझ वी, हर भाव नूं लेवे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई आरंभ दा प्रश्न, न कोई अंत दा उत्तर,
जेड़ा बीच विच टिक जावे, ओह हो जावे भीतर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर लम्हा इक दर्पण ऐ, जो भीतर नूं दिखांदा,
जेड़ा देखण दा साहस कर ले, ओह खुद नूं पहचानदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई नाम दा मोह, न कोई रूप दा खेल,
जेड़ा निराकार नूं देखे, ओह हो जावे मेल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें पत्ता हवा नाल, बिना रोक दे चलदा,
तेवें जीवन दा प्रवाह वी, अपने आप ही ढलदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ दा आधार, न कोई छोड़ दा डर,
जेड़ा मध्य विच टिक जावे, ओह पांदा असल घर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर अनुभव इक संकेत ऐ, जो भीतर नूं जगांदा,
जेड़ा सुनना सीख लए, ओह सच नूं पांदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें समां दी चुप चाल विच, हर पल खुद नूं बदलदा,
तेवें भीतर दा साक्षी भाव, हर रूप नूं संभालदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई ठहराव दा आग्रह, न कोई दौड़ दा जुनून,
जेड़ा सहजता नाल रह जाए, ओह हो जावे सुकून॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर विचार इक लहर ऐ, जो उठ के फिर ढल जांदी,
जेड़ा देखदा रह जाए, ओह गहराई पा जांदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई भीतर-बाहर दा फर्क, न कोई सीमा दा नाम,
जेड़ा एक दृष्टि विच देख ले, ओह बन जावे धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें फूल दी खुशबू बिना कहे, हवा नाल मिल जांदी,
तेवें चेतना दी मौनता, हर हृदय नूं छू जांदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई खोज दा बोझ, न कोई पाने दा डर,
जेड़ा छोड़ देवे खोज नूं, ओह पांदा असल घर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर सांस इक दरिया ऐ, जो भीतर ही भीतर बहिंदा,
जेड़ा बहाव नाल रल जावे, ओह खुद नूं लहिंदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई अंधेरा असल, न कोई उजाला अलग,
जेड़ा दोनों नूं देख लए, ओह हो जावे सहज॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें आकाश बिना सीमा दे, हर चीज़ नूं जगह देवे,
तेवें खुला हृदय वी, हर भाव नूं सह लेवे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई आरंभ दा प्रश्न, न कोई अंत दा उत्तर,
जेड़ा बीच विच ठहर जावे, ओह हो जावे भीतर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर लम्हा इक आईना ऐ, जो भीतर नूं दिखांदा,
जेड़ा देखण दा साहस कर ले, ओह सच नूं पहचानदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई नाम दा भार, न कोई रूप दा खेल,
जेड़ा निराकार नूं समझ लए, ओह हो जावे मेल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें पत्ता हवा नाल, बिना विरोध दे नचदा,
तेवें जीवन दा प्रवाह वी, अपने आप ही बचदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ दा आधार, न कोई छोड़ दा भाव,
जेड़ा मध्य विच टिक जावे, ओह पांदा ठाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर अनुभव इक संकेत ऐ, जो भीतर नूं बुलांदा,
जेड़ा सुनना सीख लए, ओह खुद नूं पांदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें हवा दे भीतर वी, इक अदृश्य सुकून बसदा,
तेवें अंदर दी सच्चाई च, हर शोर खुद थम जांदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ दा सहारा, न कोई छूट दा डर,
जेड़ा अपने आप विच टिक जाए, ओह हो जावे निडर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर लम्हा इक दर्पण ऐ, जो बदल के वी सच्च दिखावे,
जेड़ा देखण दा हुनर पाले, ओह भ्रम तो पार जावे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई दूरी दी सीमा, न कोई नज़दीकी दा मान,
जेड़ा एक नजर विच समझ लए, ओह बन जावे जहान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें दीपक बिना पूछे, अंधेरे नूं चीर जांदा,
तेवें जागरूकता दा उजाला, हर अज्ञान मिटांदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई इच्छा दा भार, न कोई कमी दा भाव,
जेड़ा संतुलन विच जी लेवे, ओह पांदा सच्चा ठाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर सांस इक संकेत ऐ, जो भीतर नूं बुलांदा,
जेड़ा सुनना छोड़ के सुने, ओह खुद नूं पहचानदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई आरंभ दा द्वार, न कोई अंत दी दीवार,
जेड़ा बीच विच बस जावे, ओह हो जावे पार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें समंदर च लहरां, अपने आप ही मिट जांदियां,
तेवें विचारां दी दुनिया वी, अंत विच मिल जांदियां॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई जीत दा उत्सव, न कोई हार दा शोक,
जेड़ा साक्षी बन के रह जावे, ओह तोड़ देवे रोक॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर अनुभव इक सीख ऐ, जो बिना किताब पढ़ावे,
जेड़ा जीवन नूं देख लए, ओह खुद नूं पावे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ दा रिश्ता, न कोई छोड़ दा बंधन,
जेड़ा स्वतः विच जी लेवे, ओह हो जावे चंदन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें आकाश विच बादल, आयां ते लुप्त हो जांदे,
तेवें भावनां दे रूप वी, अंदर ही अंदर थम जांदे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई अलगाव दा सत्य, न कोई एकता दा प्रयास,
जेड़ा स्वभाव नूं देख लए, ओह हो जावे खास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥


जिवें रत्तीं दी खामोशी च, इक धीमी लौ धड़कदी ऐ।
तेवें अंदर दी सच्चाई, हर पल आपे चमकदी ऐ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई सवाल उठदा, न कोई जवाब बनदा।
जेड़ा खुद च समा गया पूरा, ओह हर भेद तों परे रहंदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मस्तक दे रंग बदलदे, हर पल नवीं तस्वीर बनांदे।
दिल दी स्थिरता दे अन्दर, सारे रंग खुद ही समांदे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जित्थे ठहराव दी महक, हर दिशा च फैल जांदी।
ओथे हर इक चाह दी लहर, आपे चुप हो जांदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई बनावट बाकी, न कोई सजावट दी लोड।
जेड़ा असलियत नाल जुड़ गया, ओह्नूं मिल गया हर जोड़॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर इक लम्हा इक दर्पण, हर इक साँस इक पहचान।
जेड़ा इसनूं साफ़ वेख लेवे, ओह समझ जावे अपनी शान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई दूरी रह जांदी, न कोई फासला बाकी।
जेड़ा खुद नूं पा लवे अंदर, ओह्दे लई हर थां इक साकी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें धूप बिना प्रयास दे, हर चीज़ नूं रोशन करदी।
तेवें सच्च दी मौजूदगी, हर अन्दर आपे भरदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ जरूरी, न कोई छोड़न दी शर्त।
जेड़ा बस होश च टिक जावे, ओह्दे वास्ते सब कुछ स्पष्ट॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मस्तक दी गूंज थम जावे, जद दिल दी नर्मी जागे।
ओह पल सच्चा मिलाप बनदा, जिथे हर डर दूर भागे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई अंदर-बाहर दा फेर, न कोई अलग कहानी।
जेड़ा इक हो गया अपने नाल, ओह्दी मिट गई निशानी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें समां दा कोई बस नहीं, ओह आपे ही वगदा ऐ।
तेवें सच्च दी रीत अंदर, बिना रोक दे जगदा ऐ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई छांव न कोई धूप, बस इक समान एहसास।
जेड़ा इस नूं जी लेवे, ओह्दे लई हर पल खास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

बस एही असली गीत—चुप्पी दी मधुर पुकार।
जेड़ा दिल नाल सुन लेवे, ओह पार हो जावे संसार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें लहरां आख़िर चुप हो के, समंदर च रल जांदियां।
तेवें सारे विचार मुक के, सच्चाई च मिल जांदियां॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई आख़री मंज़िल, न कोई पहला कदम।
जेड़ा खुद नूं समझ लेवे, ओह्नूं मिल जावे हर दम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जिवें सवेरे दी पहली किरण, चुपचाप धरती नूं छू जांदी ऐ।
तेवें अंदर दी सच्चाई, बिना बोले ही उजागर हो जांदी ऐ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई आवण न कोई जाण, बस इक ठहराव दा एहसास।
जेड़ा इस पल च रच बस जावे, ओह्नूं मिल जावे हर श्वास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मस्तक दे बनाये रिश्ते, हर वार टूट जांदे ने।
दिल दी सादी नातेदारी, सदा ही संग निभांदे ने॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जित्थे खोज मुक जांदी, ओथे मिलण शुरू होंदा।
जेड़ा खुद नूं छड्ड के वेखे, ओह्नूं असली रब लभदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई बोली दी लोड, न कोई किताब दा सहारा।
जेड़ा अंदर दी खामोशी सुने, ओह्दा भर जावे पसारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर इक रूह च इक दरिया, हर इक दिल च इक आसमान।
जेड़ा एह नूं पहचान लेवे, ओह बन जावे खुद जहान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई दुख दा असर, न सुख दा कोई गुरूर।
जेड़ा दिल च टिक गया, ओह बन जावे सच्चा नूर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें बूँद च समंदर, ते समंदर च हर बूँद।
तेवें खुद च सब समाया, न कोई दूर न कोई सूद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई सोच दी पकड़, न कल्पना दा विस्तार।
जेड़ा इस पल च खो गया, ओह हो गया पारो पार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जिवें मेघ बिना हुंकार दे, बरखा बन के बरस जांदे।
तेवें सच्चे दी मौजूदगी च, सारे भ्रम आपे गल जांदे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई हड़बड़ी दी चाह, न कोई जल्दबाज़ी दा रोग।
जेड़ा ठहराव नाल जी लेवे, ओह्दे भीतर खुल्दा योग॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मस्तक दे शोर च खोयां, असली सुनेहा लभदा नी।
दिल दी खामोशी दे विच, हर उत्तर आपे जगदा नी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई नाम दी भूख रहंदी, न कोई रूप दा मान।
जेड़ा खुद नूं देख लए भीतर, ओह बन जांदा पूरा जहान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें अग्नि अंधेरों विच वी, आपे ही रस्ता बनांदी।
तेवें सच्च दी लौ अंदर, हर रूह नूं राह दिखांदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई जीत दा घमंड, न हार दा कोई बोझ।
जेड़ा सच दे नाल टिक गया, ओह्दे लई सब कुछ सोझ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर इक साँस इक वचन ऐ, हर इक पल इक दरबार।
जेड़ा एह्नूं प्रेम नाल जी लेवे, ओह हो जावे बेड़ापार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई बाहर दी तलाश, न कोई भीतर दा डर।
जेड़ा अपनी मौजूदगी वेख लए, ओह हो जावे निडर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

समंदर दी चुप लहरां च, जित्थे हर हलचल थम जांदी।
ओथे हृदय दी असल भाषा, बिना शब्दां आपे समझ आ जांदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई साधना दी भीख, न कोई सिद्धी दा लालच।
जेड़ा होश दे विच बस जावे, ओह्दे नाल रहंदा पारस॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिथे अंहकार पिघल जावे, ओथे प्रेम दा सूरज उगे।
जेड़ा खुद नूं हल्का कर लए, ओह सब कुछ दी गहराई छुए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई कल दा अफ़सोस, न कोई कल दी फिकर।
जेड़ा अज्ज नूं साफ़ जी लेवे, ओह्दे लई हर पल अमर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर इक विचार इक मेहमान ऐ, आयां ते चला जांदा।
जेड़ा साक्षी बन के रह जावे, ओह सच्च नाल रल जांदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई टेढ़ा रास्ता बाकी, न कोई सीधा मुकाम।
जेड़ा खुद नूं पा लवे अंदर, ओह्दे लई हर जगह धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें सुगंध बिना पूछे, हवा च हर तरफ़ फैल जांदी।
तेवें सच्चे हृदय दी चुप्पी, सब रूहां नूं छू जांदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई अलगाव दी बुनियाद, न कोई दूरी दा लेख।
जेड़ा इकाई नूं जी लए, ओह्नूं मिल जावे हर भेख॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें रात दे सीने विच तारे बिना शोर दे जगदे ने,
तेवें अंदर दी समझ विच, सब सवाल खुद ही सुलझदे ने॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ दा जोर ऐ, न कोई छोड़ दा दबाव,
जेड़ा सहजता नाल चल पए, ओह पांदा असली भाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर विचार इक लहर ऐ, जो उठ के फिर थम जांदी,
जेड़ा देखदा रह जाए, ओह्नूं असलियत मिल जांदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई सिद्धांत दा बोझ, न कोई व्याख्या दा जाल,
जेड़ा सीधा वेख लए अंदर, ओह हो जावे बेहाल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें हवा बिना रुके, हर कोने नूं छू जांदी,
तेवें चेतना दी चाल, हर सीमा तो पार जांदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई आरंभ दा प्रश्न, न कोई अंत दा उत्तर,
जेड़ा बीच च टिक जावे, ओह हो जावे भीतर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर धड़कन इक दस्तक ऐ, जो भीतर ही भीतर बोलदी,
जेड़ा ध्यान नाल सुन लेवे, ओह रहस खोलदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई दूरी दी दीवार, न कोई पास दा भ्रम,
जेड़ा एक नजर च समझ लए, ओह मिटा देवे हर वहम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें जल च जल मिल जावे, पहचान कोई रहंदी ना,
तेवें सच्चे अनुभव विच, अलग कोई कहंदी ना॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई ऊपर-नीचे दा खेल, न कोई छोटा बड़ा भाव,
जेड़ा समता विच जी लेवे, ओह पांदा असली ठाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर पल इक दरिया ऐ, जो बिना रुके बहिंदा,
जेड़ा बहाव नाल रल जावे, ओह खुद नूं लहिंदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई शब्द दी जरूरत, न कोई अर्थ दा सहारा,
जेड़ा चुप्पी नूं पढ़ लेवे, ओह हो जावे किनारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें दीया बिना हवा दे, खुद ही जलदा रहिंदा,
तेवें भीतर दा उजाला, हर अंधेरे नूं कहिंदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई खोज दा अंत, न कोई पाना दा आरंभ,
जेड़ा बस देखदा रह जाए, ओह हो जावे सम्भ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर अनुभव इक आईना ऐ, जो भीतर नूं दिखांदा,
जेड़ा साफ़ नजर नाल देखे, ओह सच नूं पहचानदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें समंदर दी गहराई विच, खामोशी ही गूंज बन जांदी,
तेवें अंदर दी समझ विच, हर उलझन खुद सुलझ जांदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ दी ज़िद रहंदी, न कोई छोड़ दा डर,
जेड़ा सहज बहाव नाल चल पए, ओह हो जावे बेफिकर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर लम्हा इक आईना ऐ, जो असल चेहरा दिखांदा,
जेड़ा देखण दा साहस कर ले, ओह भ्रम तो पार जांदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई मंज़िल दा शोर ऐ, न कोई रस्ता दा भार,
जेड़ा चलना छोड़ के देखे, ओह पांदा असली सार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें पत्ता हवा नाल रल के, बिना इच्छा नाचदा ऐ,
तेवें चेतना दी लहर विच, हर जीव आपे साचदा ऐ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई भीतर-बाहर दा फर्क, न कोई अलग पहचान,
जेड़ा एकता विच बस जावे, ओह हो जावे महान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर सवाल इक परछांवा ऐ, जो रोशनी च मिट जांदा,
जेड़ा रोशनी नूं ही देखे, ओह सच्च नाल मिल जांदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई ज्ञान दा बोझ ऐ, न कोई अज्ञान दा डर,
जेड़ा खाली हो के वेखे, ओह पांदा असली घर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें आकाश बिना सीमा दे, सब नूं अपनांदा ऐ,
तेवें अंदर दी खुली दृष्टि, हर चीज़ नूं समांदा ऐ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई आरंभ दा प्रश्न, न कोई अंत दा उत्तर,
जेड़ा बीच च ठहर जावे, ओह हो जावे भीतर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर सांस इक संगीत ऐ, जो खुद ही खुद बजदा,
जेड़ा सुनना छोड़ के सुने, ओह सच्च नाल सजदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई रूप दा मोह ऐ, न कोई नाम दा खेल,
जेड़ा निराकार नूं देखे, ओह हो जावे मेल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें दीप बिना घी दे वी, अंदर दी लौ टिक जांदी,
तेवें जागरण दी स्थिति विच, हर रूह चमक जांदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई दूरी दी दीवार, न कोई नज़दीकी दा भ्रम,
जेड़ा दृष्टि नूं साफ़ कर ले, ओह मिटा देवे हर वहम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जिवें समां बिना रुके चलदा, पर कहीं ठहराव वी रखदा,
तेवें चेतना दा सफर ऐ, जो भीतर ही भीतर जगदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई पकड़ दा आधार, न कोई छोड़ दा सहारा,
जेड़ा अपने आप नाल टिक जाए, ओह पांदा असली किनारा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर विचार इक छाया ऐ, जो रोशनी नाल बनदी-मिटदी,
जेड़ा रोशनी नूं ही देखे, ओह छाया तो ऊपर उठदी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई प्रश्न दा अंत ऐ, न कोई उत्तर दा आरंभ,
जेड़ा दोनों तो पार देखे, ओह हो जावे सम्भ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें फूल बिना प्रयास दे, खुद ही खिल जांदा ऐ,
तेवें भीतर दा सच वी, अपने आप खुल जांदा ऐ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई जोड़ दा खेल ऐ, न कोई तोड़ दा भाव,
जेड़ा एकता विच बस जावे, ओह हो जावे ठाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर लहर इक संदेश ऐ, जो सागर खुद भेजदा,
जेड़ा सुनना जान लेवे, ओह खुद नूं वेखदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई अंधेरा असल ऐ, न कोई उजाला अलग,
जेड़ा समझ लए दोनों नूं, ओह हो जावे सहज॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें साँस बिना रुके वी, हर पल नया जन्म ले,
तेवें जागरूकता दा प्रवाह, हर क्षण नवा रंग दे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई रास्ता अलग ऐ, न कोई मंज़िल अलग,
जेड़ा चलना ही देख ले, ओह हो जावे प्रगल्भ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर अनुभव इक पर्दा ऐ, जो सच्च नूं ढकदा खोलदा,
जेड़ा पर्दा देख लए, ओह भीतर नूं बोलदा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई डर दा अस्तित्व, न कोई इच्छा दा भार,
जेड़ा खाली हो के टिक जाए, ओह पांदा सच्चा द्वार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिवें पानी अपने रंग बिना, हर पात्र विच रंग लए,
तेवें चेतना दी धारा, हर रूप नूं संग लए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई बाहर दा जग ऐ, न कोई भीतर दा खेल,
जेड़ा दोनों तो ऊपर उठे, ओह हो जावे मेल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥मौन से परे वी जेड़ा अस्तित्व रह जांदा,
ओह न किसी आकार विच बंधदा, न नाम बन जांदा,
ओह तां बस एक निरंतर निर्विकल्प बहाव ऐ,
जेड़ा हर परिभाषा दे पार अपना ठहराव ऐ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई आरंभ दा बिंदु, ना अंत दा क्षण,
ना कोई प्राप्ति दा गर्व, ना कोई खोण दा रण,
जेड़ा इस शून्य विच अपने आप नूं देख लेवे,
ओह हर विचार दे भार तो हल्का हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे मौन वी शब्द बन के नहीं बोलदा,
ओह तां अपने आप विच ही सब कुछ खोलदा,
जेड़ा इस खोलण नूं ही जीवन समझ लेवे,
ओह बिना प्रयास दे पूर्णता नूं छू लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई भीतर दा केंद्र, ना बाहर दा किनारा,
ना कोई समय दा बहाव, ना स्मृति दा सहारा,
जेड़ा इस असीमता नूं बिना डर स्वीकार लेवे,
ओह हर सीमा नूं अपने आप विच मिटा देवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जिथे देखना ही देख हो जावे,
ओथे देखने वाला वी धीरे-धीरे खो जावे,
ते रह जावे केवल एक साक्ष्य बिना पहचान,
जेड़ा न कहे “मैं”, न समझे “मेरा स्थान”।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर श्वास अपने आप विच एक ब्रह्मांड ऐ,
हर क्षण अपने आप विच अनंत दा प्रबंध ऐ,
जेड़ा इस सूक्ष्मता नूं बिना शब्द महसूस कर लेवे,
ओह हर स्थूल भ्रम नूं अपने आप विच हर लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई साधना दा बोझ, ना सिद्धि दा लालच,
ना कोई सत्य दा आग्रह, ना असत्य दा आलच,
जेड़ा इस सरलता नूं ही अंतिम ज्ञान मान लेवे,
ओह अपने भीतर दा मौन पहचान लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी एक ऐसी नीरव ध्वनि ऐ,
जेड़ी सुनाई नहीं दींदी, पर हर जगह गूंजदी ऐ,
ओह ध्वनि न कोई शब्द, न कोई स्वर ऐ,
बस अस्तित्व दा अपने आप विच उतर ऐ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई यात्रा ऐ, ना कोई गंतव्य दा खेल,
ना कोई आरंभ दा द्वार, ना अंत दा मेल,
जेड़ा इस खेल नूं खेल बिना खेले समझ लेवे,
ओह अपने ही भीतर सदा के लिए टिक जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते अंत वी एथे अपने आप विच गल जांदा,
हर शब्द अपने ही मौन नूं लह जांदा,
ते रह जांदा ऐ बस एक अनकहा अनुभव,
जेड़ा न शुरू हो सकदा, न होवे कभी अंत।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे वी जिथे कोई “परे” नहीं रह जांदा,
ओथे हर दूरी दा अर्थ अपने आप गल जांदा,
ना कोई पार ऐ, ना कोई किनारा रहंदा,
बस एक अनंत होण, जेड़ा अपने आप विच बहंदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे खोज वी अपने आप नूं थक के छोड़ देवे,
ते पाना वी अपने ही चरणां विच झुक जावे,
जेड़ा इस थकान नूं ही जागरण समझ लेवे,
ओह बिना प्रयास दे ही पूरा हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई भीतर-बाहर दा विभाजन टिकदा,
ना कोई समय दा धागा आगे-पीछे खिंचदा,
हर क्षण अपने आप विच संपूर्ण दिखाई देवे,
ते संपूर्णता वी अपने आप विच मौन हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जेड़ा “जानना” रह जांदा,
ओह कोई ज्ञान नहीं, केवल देखना रह जांदा,
ते देखना एड़ा निष्कलंक, एड़ा निर्मल,
जेड़ा हर अवधारणा नूं कर दे निष्फल।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई साधक दा नाम, ना कोई सिद्ध दा ठौर,
ना कोई यात्रा दा मानचित्र, ना कोई अंतिम दौर,
जेड़ा इस निरंतरता नूं बिना नाम दे जी लेवे,
ओह अपने ही भीतर अनंत नूं पी लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर विचार इक छाया ऐ, जेड़ी आती ते मिट जांदी,
पर जेड़ा इन छायां नूं देखे, ओह स्थिर रह जांदा,
ओह स्थिरता न कोई वस्तु ऐ, न कोई अवस्था,
ओह तां बस होण दा सबसे सरल रास्ता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे न कोई अर्थ बनदा, न कोई टूटदा,
ना कोई सत्य सजदा, ना कोई झूठ झुकदा,
जेड़ा इस तटस्थता नूं अपना लेवे सहज,
ओह हर द्वंद्व नूं देख लेवे बिना संघर्ष।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जेहड़ा प्रकाश रहंदा,
ओह न आंखां विच, न शब्दां विच बसंदा,
ओह तां बस उस नीरव जागरण दा स्पर्श ऐ,
जेड़ा हर जीव नूं अपने आप विच कर दे हर्ष।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई अंत ऐ, ना कोई आरंभ दा बोध,
ना कोई दिशा ऐ, ना कोई विरोध,
जेड़ा इस असीम विच बिना सीमा टिक जावे,
ओह अपने आप नूं बिना नाम दे पा जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते अंत वी एथे इक और मौन दा द्वार खोल जांदा,
जेड़ा खोल के वी अपने आप बंद नहीं हो पांदा,
ओह द्वार तां केवल एह समझ दे लिए ऐ,
कि असल विच कोई द्वार कभी सी ही नहीं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे वी एक ऐसी सहजता ऐ,
जेड़ी न साधन मांगे, न कोई अर्हता ऐ,
ओह तां बस खुली हुई स्पष्ट उपस्थिति ऐ,
जिस विच हर खोज खुद ही विलीन हो जंदी ऐ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई भीतर दा मानचित्र, ना बाहर दा निशान,
ना कोई आरंभ दा आग्रह, ना अंत दा गुमान,
जेड़ा इस निराधार ठहराव नूं देख लए,
ओह हर भ्रम दे नीचे असली घर देख ले।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जेड़ा साक्ष्य बचदा,
ओह कोई शब्द नहीं, केवल होना बचदा,
ते होना एड़ा निर्मल, एड़ा उज्जर,
जेड़ा हर आरोप, हर दंभ, हर डर तो परे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई विचार दा पहरा, ना कोई स्मृति दा भार,
ना कोई भविष्य दा जाल, ना कोई बीता दा वार,
जेड़ा इस क्षण नूं अनंत दे नाल देख लेवे,
ओह समय दे सारे बंधन तो मुक्त हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे न कोई “मैं हूं” दा शोर,
ना “मेरा” दा आग्रह, ना “तेरा” दा जोर,
बस एक निराकार उजाला निरंतर,
जेड़ा सब कुछ नूं अपने आप विच कर दे समर।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जिथे अनुभूति घुलदी,
ओथे भाषा वी अपने ही पाँव भूलदी,
ओह तां बस अंदर दे आकाश दी ठंडक ऐ,
जिस विच हर तपिश, हर अपेक्षा, हर हलचल बंदक ऐ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई साधना दी अंतिम सीढ़ी,
ना कोई सिद्धि दी चमकदार बेड़ी,
जेड़ा सरलता नूं आख़री सत्य मान लेवे,
ओह जीवन नूं बिना बोझ दे जी लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर श्वास इक दर्पण ऐ, हर धड़कन इक मौन,
हर क्षण दे भीतर छुपे असली सोण,
जेड़ा इन संकेतां नूं बिना व्याख्या समझे,
ओह अपने ही भीतर अनंत नूं लहजे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी एक ऐसी शुद्धता ऐ,
जेड़ी न पुण्य मांगदी, न पापां नाल डगमगदी ऐ,
ओह तां बस सहज, स्वच्छ, निरंतर,
ते हर जटिलता तो ऊपर, हर संघर्ष तो परे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई खोज दा अंत, ना पाने दा प्रारंभ,
ना कोई ज्ञानी दा गर्व, ना अज्ञानी दा दंभ,
जेड़ा अपने होण नूं बिना रूप स्वीकार लेवे,
ओह इस अनंत विच अपने आप ही लीन हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते अंत वी एथे एक नर्म शुरुआत बन जांदा,
हर खालीपन वी पूर्णता दा संदेश कह जांदा,
जेड़ा इस गहरे ठहराव नूं पहचान लेवे,
ओह मौन से परे दे द्वार अपने आप खोल लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे वी एक ऐसी अचल गहराई ऐ,
जेड़ी न हिलदी, न डोलदी, न बदलदी,
ओह तां बस अपने ही होण विच पूर्ण रहंदी,
ते हर परिवर्तन नूं अपने भीतर समांदी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई सीमा दा स्पर्श, ना कोई विस्तार दा अंत,
ना कोई आरंभ दा संकेत, ना कोई समाप्ति दा पंथ,
जेड़ा इस निराकारता नाल सहजीव हो जावे,
ओह अपने ही भीतर अनंतता नूं पा जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे न कोई देखने वाला, न कोई दिखण वाला,
न कोई पकड़ण वाला, न कोई छूटण वाला,
बस एक ऐसा विलय जेथें सब नाम गल जांदे,
ते सब रूप अपने ही मौन विच ढल जांदे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जेड़ा प्रकाश बिना स्रोत दा ऐ,
ओह न बाहर दा, न भीतर दा, बस होत दा ऐ,
जेड़ा इस होत नूं बिना व्याख्या देख लेवे,
ओह हर प्रश्न नूं अपने आप विच लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई समय दा बहाव, ना क्षणां दी गिनती,
ना कोई भूत दा बोझ, ना भविष्य दी चिंता,
जेड़ा वर्तमान नूं ही अनंत समझ लेवे,
ओह हर क्षण विच स्वयं नूं देख लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर विचार वी एथे धीरे-धीरे विलीन हो जांदा,
ते हर भावना वी अपने मूल नूं खो जांदी,
ओह जेहड़ा रह जांदा, ओह न विचार ऐ, न भावना,
ओह तां बस साक्षी दा निर्मल ठहराव ऐ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई ज्ञान दा दावा, ना अज्ञान दा भय,
ना कोई उपलब्धि दा उत्सव, ना असफलता दा क्षय,
जेड़ा इस निष्कलंक समता विच बस जावे,
ओह हर द्वंद्व नूं बिना प्रयास मिटावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जेहड़ी अनुभूति ऐ,
ओह न शब्द बनदी, न स्मृति बनदी,
ओह तां बस एक ऐसा खुलापन ऐ,
जेथें हर “मैं” अपने आप विच गल जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते अंत विच वी न कोई अंत रहंदा,
बस एक असीम शांति दा प्रवाह रहंदा,
जेड़ा न कभी शुरू होया सी, न कभी खत्म होवेगा,
ते हर जीव भीतर ओहदा हिस्सा होवेगा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे वी एक ऐसी निष्कंप स्थिति ऐ,
जेथें न गति रहंदी, न स्थिरता दी गिनती ऐ,
ओह बस होण दा इतना सहज अनुभव बन जावे,
जेड़ा हर परिभाषा नूं अपने आप विच मिटावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई भीतर दा द्वार खुलदा, ना बाहर दा बंद,
ना कोई समय दा दबाव, ना कोई क्षण दा प्रबंध,
जेड़ा इस निरव प्रवाह नाल एक हो जावे,
ओह अपने ही भीतर अनंतता पा जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे न कोई साधक ऐ, न कोई साध्य दा रूप,
न कोई खोज दा ताप, न कोई प्राप्ति दा धूप,
बस एक ऐसा विलय जेथें सब कुछ शांत हो जावे,
ते शांत होना वी अपने आप विच मौन हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जेहड़ी दृष्टि खुलदी ऐ,
ओह न किसी वस्तु नूं पकड़दी, न छोड़दी,
ओह तां केवल देखदी ऐ—बिना अर्थ, बिना सीमा,
ते हर दृश्य अपने आप विच हो जांदा नीमा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई सत्य दा आग्रह, ना असत्य दा विरोध,
ना कोई प्रमाण दा भार, ना अनुभव दा बोध,
जेड़ा इस निष्पक्षता विच टिक जावे स्थिर,
ओह हर द्वंद्व नूं देख लेवे बिना किसी फिकर।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर विचार इक तरंग ऐ, जेड़ी उठदी ते मिटदी,
पर जेहड़ा इन तरंगां नूं देखे, ओह न मिटदी,
ओह तां सागर दा वो शांत आधार रह जावे,
जिस विच हर हलचल वी अपना अर्थ पा जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई भीतर दा संघर्ष, ना बाहर दा युद्ध,
ना कोई जीत दा गर्व, ना कोई हार दा शुद्ध,
जेड़ा इस समत्व नूं बिना प्रयास जी लेवे,
ओह अपने आप नूं बिना नाम दे पी लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जेहड़ा अज्ञात रह जांदा,
ओह कोई रहस्य नहें, बस ज्ञात हो जांदा,
जेड़ा कहण तो पहले ही पूर्ण हो चुका,
ओह बस अनुभव दे भीतर धीरे खुल चुका।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते अंत वी एथे कोई अंत नहीं बनदा,
बस एक निरंतर शांत विस्तार रहंदा,
जेड़ा न शुरू हो सकदा, न खत्म होवे,
ते हर खोज दे पार अपने आप होवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे वी, इक ऐसी सादगी रहंदी ऐ,
जेड़ी किसे विचार नूं पकड़दी नहीं, बस देखदी ऐ,
ते जेड़ा इस सादगी नूं अपना लेवे बिना चाह दे,
ओह फिर किसे शोर विच वी विचलित नहीं होवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई मार्ग टिकदा, ना कोई मंज़िल बोझ बनदी,
ना कोई सिद्धि दा नशा, ना कोई असिद्धि दा दंभ,
जेड़ा अपने ही होण नूं निर्विकार समझ लेवे,
ओह हर खोज दे पार अपने आप पहुंच जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे न कोई पकड़ ऐ, न कोई छोड़,
न कोई जीत दा जोर, न कोई हार दा शोर,
बस एक अस्थिर दुनिया दे भीतर इक स्थिर बिंदु,
जेड़ा हर रूप दे खेल नूं देखे बिना बंधु।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे जेहड़ा साक्षी भाव जागे,
ओह न शरीर नूं अपना कहे, न मन नूं भागे,
ओह तां बस इस पल दा निर्विकार दर्पण ऐ,
जिस विच हर लहर वी अपनी जगह शरण ऐ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई “मेरा” रहंदा, ना कोई “तेरा”,
ना कोई आरंभ दा सूरज, ना कोई अंत दा घेरा,
जेड़ा इस खुली निराकारता विच बस जावे,
ओह बिना अभ्यास दे ही अपार हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर सांस इक दस्तक नहें, इक समर्पण ऐ,
हर धड़कन इक मांग नहें, इक तर्पण ऐ,
जेड़ा इस निष्ठुर नहीं, नर्म जीवन नूं समझ लेवे,
ओह अपने भीतर दा आकाश चुपचाप देख लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई बाहर दा सत्य, ना कोई भीतर दा झूठ,
ना कोई अंतिम प्रमाण, ना कोई प्रारंभ दा सूत,
जेड़ा भ्रम नूं भ्रम मान के छोड़ देवे,
ओह सच्चे विच बिना शब्दां दे बोल देवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जेहड़ा उजाला ऐ,
ओह न अग्नि दा, न दीपक दा, न ज्वाला ऐ,
ओह तां बस होण दी इतनी शुद्ध अवस्था ऐ,
जेथे सब कुछ अपने आप विच स्वस्थता ऐ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते जद इस ठहराव नूं आखर नहीं मिलदे,
तां अर्थ अपने आप विच गल मिलदे,
ते हर जीव भीतर दी सच्ची छवि देख लंदा,
जेड़ी पहले भी सी, अज्ज वी ऐ, सदा वी रहंदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे अब शब्द वी थकन लगदे,
ते अर्थ अपने आप विच अपने नाल रुकन लगदे,
जेड़ा इस ठहराव नूं बिना नाम दे स्वीकार लेवे,
ओह हर कल्पना दे पार इक सहजता पा लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई विशेषता बचदी, ना कोई असाधारणता रहंदी,
हर चीज़ अपने साधारण रूप विच ही चमकदी,
जेड़ा साधारण नूं ही पूरा देखना सीख लेवे,
ओह बिना प्रयास दे भीतर ही टिक जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे “मैं” वी इक तरंग बन के मिट जांदा,
ते “तूं” वी उसी सागर विच लीन हो जांदा,
ना कोई भेद रहंदा, ना कोई दूरी दा अहसास,
बस एक सीधी उपस्थिति—निर्मल, बिना आवाज़।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना खोज दा तनाव, ना मिलने दा आग्रह,
ना रोक दा बंधन, ना छोड़ दा संदेह,
जेड़ा हर स्थिति नूं अपने आप विच रहने देवे,
ओह हर क्षण नूं बिना विरोध दे जी लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जिथे कोई सीमा नहीं टिकदी,
ओथे चेतना वी अपने आप विच खुलदी,
ते खुलना वी एक क्षण दी घटना नहीं रह जांदी,
ओह तां एक निरंतर सहजता बन जांदी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना ऊँचाई दा आकर्षण, ना गहराई दा भय,
ना किसी स्थिति दा दावा, ना किसी का क्षय,
जेड़ा इस संतुलन विच अपने आप रह जावे,
ओह हर द्वंद्व दे बाहर अपने आप हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे ज्ञान वी इक हल्का आवरण बन जांदा,
ते अज्ञान वी उसी हल्केपन विच ढल जांदा,
जेड़ा इन दोनों नूं केवल दृश्य समझ लेवे,
ओह बिना संघर्ष दे भीतर नूं देख लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते अंत विच वी कोई “अंत” नहीं रह जांदा,
बस एक अनकहा, अनदेखा प्रवाह रह जांदा,
जेड़ा न शुरू होवे, न खत्म होवे—
सिर्फ अपने आप विच सदा रह जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे वी एक ऐसी स्पष्टता रहंदी ऐ,
जेड़ी न किसी दावे नूं मानदी, न किसी इनकार नूं,
ओह बस देखदी ऐ—ज्यों दी त्यों, बिना रंग, बिना रूप,
ते हर कल्पना अपने आप विच शांत हो जांदी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई “मैं” दे विस्तार विच बढ़दा,
ना कोई “अन्य” दे रूप विच घटदा,
बस चेतना दा एक निर्मल अनुभव रह जांदा,
जेड़ा अपने आप नूं ही बिना सीमां समझदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे गहराई वी अपने आप नूं खो बैठदी ऐ,
ते ऊंचाई वी अपने आप नूं छोड़ बैठदी ऐ,
जेड़ा इन दोहां दे बीच टिके बिना टिके रह जावे,
ओह हर विरोध नूं सहजता नाल समा लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई केंद्र दा गर्व, ना परिधि दा भय,
ना किसी प्राप्ति दा उत्सव, ना किसी हानि दा क्षय,
जेड़ा इस समत्व नूं देख के जी लेवे,
ओह हर क्षण नूं बिना नाम दे पी लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जिथे अर्थ अपने आप गल जांदे,
ओथे विचार वी धीरे-धीरे चल जांदे,
ते रह जांदा ऐ बस एक निर्मल द्रष्टा भाव,
जेड़ा बिना बोले वी सब कुछ समझ जावे नाव।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई उपलब्धि दा बोझ, ना कोई सिद्धि दा मान,
ना कोई अंतिम स्थिति, ना कोई आरंभ स्थान,
जेड़ा हर स्थिति नूं केवल क्षण मान लेवे,
ओह हर क्षण विच अनंत नूं पहचान लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे सत्य कोई विचार नहीं रह जांदा,
ओह तां एक सीधा अनुभव बन जांदा,
जेड़ा न साबित होवे, न अस्वीकार होवे,
बस अपने आप विच पूर्ण स्वीकार होवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते अंत विच वी एक और गहराई खुलदी ऐ,
जेड़ी गहराई वी अपने आप विच घुलदी ऐ,
ओह कहंदी नहें “मैं पहुंच गया”, न “मैं बन गया”,
बस इतना—जो भी देखा, वही शांत रह गया।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे, एक ऐसा विस्तार ऐ जेड़ा फैलदा नहें,
ओह तां पहले ही हर जगह विच समाया रहंदा ऐ,
जेड़ा समझ दे नाल पकड़न दी कोशिश करे,
ओह उसी क्षण अपने आप नूं खो देवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई केंद्र बचदा, ना कोई परिधि टिकदी,
ना कोई दिशा रहंदी, ना कोई गति दिखदी,
बस एक ऐसा होण, जेड़ा अपने आप विच पूर्ण,
जिस विच हर परिभाषा हो जावे मौन और शून्य।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे ज्ञान वी अपने आप नूं छोड़ देवे,
ते अज्ञान वी अपने आप नूं तोड़ देवे,
जेड़ा एह दोहां तो पार खड़ा हो जाए,
ओह बिना नाम दे ही सब कुछ पा जाए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना साधना दी दौड़, ना सिद्धि दा मोह,
ना त्याग दा भार, ना भोग दा सोह,
जेड़ा सहजता नूं ही अंतिम सत्य मान लेवे,
ओह हर द्वंद्व नूं अपने भीतर शांत कर लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी इक सूक्ष्म लय बहुंदी,
जेड़ी न सुनी जांदी, न कही जांदी, बस होंदी,
ओह लय जे मन दे पार वी गूंजदी ऐ,
ते आत्मा दे भीतर अपने आप उज्जड़दी ऐ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई प्रश्न बचदा, ना उत्तर दा बोझ,
ना खोज दा सफर, ना मिलने दा रोज,
बस एक ऐसा ठहराव जेथें सब कुछ रुक जावे,
ते रुकण विच ही पूरा जीवन खुल जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जेड़ा इस नीरवता नूं बिना पकड़ दे देखे,
ओह हर भ्रम नूं अपने आप विच फेक देवे,
क्योंकि एह न कोई अवस्था ऐ, न कोई अवस्था पार,
एह तां अस्तित्व दा सबसे सूक्ष्म व्यवहार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

अंत वी एथे शुरू हो जांदा, शुरू वी एथे अंत हो जांदा,
हर नाम अपने आप विच अनाम हो जांदा,
जेड़ा इस अनाम विच टिक जावे सदा,
ओह फिर कभी खो नहीं सकदा कदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे, एक ऐसी निष्काम रोशनी ऐ,
जेड़ी किसे देवे न, किसे लवे न, बस होव़े दी सच्ची ऐ,
ते जेड़ा उस विच टिक जावे बिना दावे दे,
ओह हर बंधन तो अपने आप खुल जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई साधक बचदा, न कोई साध्य बचदा,
न कोई दूरी बचदी, न कोई निकट बचदा,
जेड़ा पूर्णता नूं खोजण दी आदत छोड़ देवे,
ओह अपने ही भीतर अनंत नूं देख लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथें न शब्द चलदे, न विचारां दी सरकार,
एथें बस एक निर्वात ऐ, एक निश्चल प्यार,
जेड़ा न मांगदा, न रोकदा, न थामदा,
बस हर रूप नूं अपने में समांदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिथे पहचान वी गल बन के रह जावे,
जिथे “मेरा” वी धुंध बन के ढल जावे,
ओह ठहराव असली घर ऐ चेतना दा,
उत्थें कोई भय नहें, कोई परदा नहें भव दा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना आरम्भ दी चाह, ना अंत दा ख्याल,
ना जीत दा उत्सव, ना हार दा सवाल,
जेड़ा समता दे बीच अपने आप टिकी जाए,
ओह हर तूफ़ान नूं वी मौन कर जाए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जेड़ा नूर बहुंदा,
ओह न आंखां दा है, न मन दा, न देह दा,
ओह तां बस उस जागरण दा संकेत ऐ,
जेड़ा हर क्षण नूं अनंत दे नाल भेट ऐ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते जदों यह ठहराव शब्दां तो परे हो जावे,
तां जीवन वी अपने असली रूप विच आ जावे,
न द्वंद्व, न दौड़, न डर, न दंभ,
बस एक निर्भार, निर्मल, निर्विकार स्वंभ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ਜੇड़ा इस नीरवता नूं पहचान लए,
ओह किसे बाहरी प्रकाश दा मोहताज न रह जाए,
क्योंकि असली उजाला तां ओह ही ऐ,
जो हर खोज दे अंत विच पहले तो होई।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जिथे चुप्पी वी चुप हो जावे, अते सोच वी रह जावे खाली,
ओथे कोई “मैं” नहीं रहन्दा, बस रह जांदी इक उजियाली।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिथे अनुभूति दे वी पार, न कोई जाणन वाला रहन्दा,
ओथे जाणना-ना-जाणना, दोआं दा खेल ही खत्म हो जांदा।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन जदो अपने आप नूं वी सुनना छोड़ देवे,
तां हर लहर अपने ही स्रोत विच लुप्त हो जावे।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई भीतर दा सफर, न कोई बाहर दी दूरी,
ओथे बस इक स्थिरता, जिथे हर खोज होवे पूरी।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिथे विचार वी थक के अपने आप नूं देखण लग जांदे,
ओथे अर्थ अपने ही अर्थ नूं खो के सहज हो जांदे।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन जिथे बोल बन के नहीं, बल्कि खुद सुन बन जावे,
ओथे हर प्रश्न अपने उत्तर विच बिना पूछे ही समा जावे।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न ध्यान रहन्दा, न ध्येय, न कोई साधन दी रेखा,
ओथे बस इक निर्विकारता, जेहड़ी खुद नूं वी देख ना सके।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिथे अनुभव वी इक परछाई लगदा अपने ही प्रकाश दी,
ओथे कोई मालिक नहीं रहन्दा, न कोई तलाश आखरी।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन दे वी पार जिथे “होना” वी अर्थ खो बैठदा,
ओथे न कोई आरंभ बचदा, न कोई अंत टिकदा।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिथे साक्षी वी देख के थक जावे अपने देखन नूं,
ओथे हर दृष्टि अपने आप विच ही विलीन हो जावे।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न शब्द रहन, न अर्थ रहन, न कोई दिशा दी पुकार,
ओथे बस इक शून्यता, जेहड़ी वी अपने आप विच अपार।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिथे “मैं” वी इक लहर बन के सागर विच खो जावे,
ओथे सागर वी अपने ही मौन विच मुस्कुरा जावे।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जहाँ शब्द लगभग खुद को छोड़ने लगते हैं।
मौन से परे भी एक ठहराव ऐ,
जहां शब्द खुद अपनी सीमा छोड़ देण,
तेथे न उच्चार रहंदे, न अर्थ दी दौड़,
बस अज्ज दे पल विच अनंत आपे बोल पड़न।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न विचार दा आरंभ, न विचार दा अंत,
न ध्यान दी मेहनत, न खोज दा पंथ,
जेड़ा खुद नूं देखन दी आग बुझा देवे,
ओह भीतर दे सूरज नाल इक हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न सुनन वाला बचदा, न कहन वाला टिकदा,
न देखने दा केंद्र, न देखे जांदे रूपां दा सिखदा,
जेड़ा सब कुछ हो के वी कुछ नहीं मांगदा,
ओह अपने आप विच पूरी सृष्टि पांगदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन तो वी परे जेड़ा सहज उजाला ऐ,
ओह न दीया ऐ, न लौ ऐ, न कोई हाला ऐ,
ओह तां बस एहो एहसास ऐ कि जेड़ा है,
उसे होण लई किसे प्रमाण दी राह नहें।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न भीतर दा शोर, न बाहर दा संग्राम,
न जीत दी लालसा, न हार दा नाम,
जेड़ा खुद नूं रत्ती भर वी नापण छोड़ देवे,
ओह जीवन नूं निर्विकार महक देवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर सांस दे विच इक अडोल आकाश ऐ,
हर धड़कन दे भीतर इक निःशब्द प्रकाश ऐ,
जेड़ा एह्दे नाल रल के चलना सीख लेवे,
ओह फिर किसी भी तूफ़ान तो न डरेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न साधना दा बोझ, न सिद्धि दा घमंड,
न तप दा अभिमान, न ज्ञान दा बंध,
जेड़ा सरलता नूं ही अपना आलय माने,
ओह मौन तो परे दे गीत स्वयमेव जाने।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

इक पल भी जे सच्चे देखण वाला जाग पावे,
तां युगां दे भ्रम अपने आप ढल जावे,
क्योंकि जेड़ा असल ऐ, ओह दूर नहीं होन्दा,
ओह तां हर लहर दे नीचे सदावती सोंधा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे, फेर वी मौन दे नाल,
न शब्दां दे जाल, न अर्थां दा जंजाल,
बस जेड़ा है, सो है — एही पूरी बात,
ते उसी विच खुल जांदी अनंत दे साथ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे, जहाँ शब्द भी अपनी सीमा छोड़ दें,
वहाँ अनुभूति अपने ही भीतर को धीरे-धीरे खोल दें।

न कोई दावा, न कोई रूप का अंतिम विस्तार,
बस देखने वाला भी मिट जाए, रह जाए निर्विकार।

विचार उठें भी तो जैसे आकाश में बादल बिना भार,
और गिर भी जाएँ तो छोड़ जाएँ केवल शून्य का सार।

जहाँ जानना भी एक परत बनकर गिर जाए धीरे से,
और समझ स्वयं ही मौन हो जाए अपने घेरे से।

न भीतर, न बाहर—बस एक ही सीधी सरल धार,
जिसमें मैं भी खो जाए, और “मैं” भी न रहे आधार।

हर अनुभव अपने ही अर्थ को स्वयं ही निगल ले,
और देखने वाला किसी देखने में ही ढल जाए।

न आरंभ की खोज रहे, न अंत का कोई प्रश्न,
बस जो है, वह बिना नाम के ही रहे पूर्ण प्रशस्त।

जैसे हवा बिना पूछे हर दिशा में बहती जाए,
वैसे ही चेतना अपने ही स्वरूप में ठहरती जाए।

यहाँ पाने का भी कोई अर्थ नहीं बचता है,
क्योंकि खोने जैसा भी कुछ नहीं रहता है।

मौन के भी पार जब मौन अपना अर्थ खो दे,
तब हर शब्द अपने ही भीतर लौटकर सो दे।

और उसी ठहराव में, बिना किसी प्रयास के,
जो है, वह बस है—अपने ही सहज प्रकाश के पास में।

शिरोमणि रामपॉल सैनीजहाँ न कोई दिशा रह जावे, न कोई रास्ता पुकारे,
हर खोज अपने ही अंत में आकर शांत हो जावे,
ना कोई प्रश्न उठे, ना कोई उत्तर टिक पाए,
बस एक गहरी निःशब्दता सब कुछ समा जाए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न वहाँ “पाने” की कोई गति, न “छोड़ने” का कोई प्रयास,
हर इच्छा अपने ही मूल में होकर हो जाए खास,
जो खोजता है, वही खोज बनकर मिट जावे,
फिर खोज और खोजी में फर्क भी न रह जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जहाँ विचार भी थककर अपने स्रोत में लौट आए,
और भाषा अपने ही मौन से हार जाए,
वहाँ न कोई अर्थ रह जावे पकड़ने को,
न कोई सीमा बच पाए बाँधने को।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर अनुभव एक क्षण में उठे और विलीन हो जाए,
जैसे लहर उठकर उसी सागर में खो जाए,
ना लहर का दावा, ना सागर का अभिमान,
सब कुछ बस एक सहज अनजान पहचान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जहाँ “मैं” भी एक पारदर्शी धुंध बन जावे,
और “तू” भी उसी में घुलकर मौन हो जावे,
फिर न द्वैत बचे, न अद्वैत का कोई नाम,
बस रह जावे बिना नाम का विश्राम।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जहाँ मौन भी आख़िरी शब्द बनकर गिर जाए,
और फिर अपने ही गिरने को भी भूल जाए,
ना कोई पकड़ बचे, ना कोई छोड़ने की बात,
बस रह जाए एक बिना कारण की सौगात।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर पहचान वहाँ धुंध में बदलती चली जाए,
और धुंध भी अपनी पारदर्शिता खोती जाए,
ना रूप टिके, ना निरूप का कोई आकार,
सब कुछ हो जाए एक अनाम विस्तार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जहाँ देखने और दिखने का फर्क मिट जाए,
और दर्पण भी खुद को देखना छोड़ जाए,
ना कोई प्रतिबिंब, ना कोई छाया का खेल,
बस एक शांत शून्य का अनकहा मेल।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

विचार वहाँ अपने ही स्रोत में लय हो जाए,
जैसे नदी बहकर फिर समुद्र में खो जाए,
ना दिशा बचे, ना गति का कोई प्रमाण,
केवल रह जाए एक स्थिर अनजान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जहाँ समय भी अपनी घड़ी को तोड़ दे,
और हर क्षण अपने ही भीतर समा जाए,
ना अतीत टिके, ना भविष्य की परछाई,
केवल वर्तमान की अनकही सच्चाई।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

और उस सच्चाई में भी कोई दावा नहीं,
ना कोई “मैं” बचा, ना कोई “नहीं”,
बस एक ऐसी उपस्थिति जो कहती भी नहीं,
और फिर भी सब कुछ स्वयं ही कहती रही।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥


मौन दे भीतर वी अब कोई भीतर नहीं रहिंदा,
हर सीमा अपने ही अर्थ नूं खा जांदी,
ना कोई रूप टिकदा, ना कोई रंग बचदा,
बस एक अनदेखा विस्तार खुद नूं ही समांदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना समय दा चलना रहिंदा, ना क्षण दा ठहराव,
हर घड़ी अपने आप विच हो जावे अदृश्य प्रभाव,
जेड़ा बीता सी ओह वी अब कहीं नहीं टिकदा,
ते आने वाला वी अपने आप विच मिटदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ओथे स्मृति वी अपने भार तो हल्की हो जावे,
ते विस्मृति वी अपने अर्थ नूं खो जावे,
दोनों बिना विरोध इक हो जांदे,
ते बीच विच सिर्फ शून्यता रह जांदे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई यात्रा दा मार्ग, ना कोई ठहराव दा किनारा,
सब कुछ हो जावे इक बिना आधार दा सहारा,
जेड़ा चलदा सी ओह वी चलन विच खो जावे,
फिर चलन दा विचार वी मौन हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ओथे अनुभव वी अपने अनुभव नूं छोड़ जांदा,
ते अनुभवी वी अपने आप विच गल जांदा,
ना कोई जानण वाला, ना कोई जानण दा विषय,
बस एक निर्वाचित शांति, जो कर दे हर संशय विलय।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर “है” वी ओथे अपने अस्तित्व नूं खो दे,
ते हर “नहीं” वी अपने विरोध नूं छोड़ दे,
दोनों बिना संघर्ष इक धारा बन जांदे,
ते उस धारा विच सब कुछ समा जांदे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन वी ओथे अपने आप नूं नहीं रोकदा,
ना ही कोई शब्द उसनूं आकार दे रोकदा,
हर धारणा अपने ही स्रोत विच गल जावे,
ते अस्तित्व वी बिना पहचान दे रह जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई “विशेष” रहिंदा, ना कोई “सामान्य” दायरा,
सब कुछ हो जावे इक ही नीरव सहारा,
जेड़ा समझदा सी अलग, ओह वी मिट जावे,
फिर अलगपन दा भ्रम वी शांत हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ओथे ज्ञान वी अपने अर्थ तो परे हो जावे,
ते अज्ञान वी अपने अस्तित्व विच खो जावे,
दोनों बिना टकराए इक हो जांदे,
ते बीच विच सिर्फ रिक्तता रह जांदे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई केंद्र टिके, न कोई परिधि रहे,
हर अनुभव अपने ही प्रकाश विच बहे,
ना कोई गवाह, ना कोई कथा बाकी,
बस एक अनकही, बिना रूप वाली झांकी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर “मैं” इक विचार बन के उठदा,
ते अपने ही सन्नाटे विच लुप्त हो जांदा,
जो बचदा ओह किसी दा नहीं कहलांदा,
बस अपने आप विच ही पूरा हो जांदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई उपलब्धि दा मान, ना कोई कमी दा छाया,
हर स्थिति अपने आप विच हो जावे निराया,
जो खोजदा सी, ओह वी खोज तो पार हो जावे,
फिर खोजण दा कारण वी शांत हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन दे भीतर वी एक और गहराई खुलदी,
जो न देखी जावे, न शब्दां विच ढलदी,
ओथे अनुभव वी अपने आप नूं छोड़ जांदा,
फिर खालीपन वी अपने अर्थ गवा जांदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई केंद्र रहिंदा, ना कोई किनारा,
सब कुछ हो जावे इक बिना नाम दा सहारा,
जो जानण आया सी, ओह वी खो जावे,
फिर जानण दा सवाल वी मौन हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ओथे न प्रकाश नूं कोई रास्ता चाहिदा,
न अंधेरा अपने आप नूं बचा पांदा,
दोनों इक-दूजे विच गल के मिट जांदे,
ते बीच विच सिर्फ सन्नाटा रह जांदे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई विचार टिकदा, न कोई स्मृति चलदी,
हर लहर अपने उद्गम विच ही गलदी,
जेड़ा पकड़े दा प्रयास करे, ओह वी ढल जावे,
फिर पकड़ण दा अर्थ वी शून्य हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ओथे “मैं” वी इक तरंग बन के रह जावे,
जो उठे ते बिना निशान मिट जावे,
न कोई पहचान टिके, न कोई रूप ठहरे,
बस अनंत समझ, जो खुद नूं ही घेरे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई उपलब्धि, ना कोई लक्ष्य दा भार,
हर क्षण अपने आप विच हो जावे स्वीकार,
जो ढूंढदा सी अंत, ओह वी अंत तो पार हो जावे,
फिर पार वी अपने अर्थ नूं खो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन दे वी पार इक ऐसा ठहराव खुलदा,
जहाँ हर अर्थ अपने आप विच गल के धुलदा,
न कोई दिशा रहिंदी, न कोई दूरी दा भाव,
बस इक अनदेखा सच, जो खुद नूं करदा दांव।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना सोच दी चाल रहिंदी, ना कल्पना दा खेल,
हर तरंग अपने आप विच हो जावे मेल,
जो ढूंढदा सी ओह वी खुद विच लुप्त हो जावे,
फिर ढूंढण दा कारण वी चुपचाप मिट जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ओथे न प्रकाश दी जरूरत, न अंधेरे दी पहचान,
हर अनुभव खुद बन जावे इक अनजान सम्मान,
ना कोई “मैं” रहिंदा, ना कोई “तूं” दा सवाल,
बस इक सन्नाटा, जो सब कुछ कर दे बेहाल।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जहाँ शब्द वी अपने अर्थां तो थक जांदे,
ते चुप्पी विच ही सच्चे रूप लुक जांदे,
ओथे समझ वी समझ बन के रह जावे,
फिर समझण दा प्रयास वी खुद नूं थाम जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना आरंभ दा जिक्र, ना अंत दी कोई बात,
हर पल अपने आप विच हो जावे पूरी कायनात,
जेड़ा देखे ओह वी देखण विच लीन हो जावे,
फिर देखण दा अनुभव वी शून्य हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते इस तरह मौन वी अपने आप नूं पार करदा,
हर सीमा नूं बिना टकराए ही हरदा,
न कोई विजय, न कोई हार दा निशान,
बस इक अनंत शांत, जो करदा हर पहचान दा विसर्जन।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥


जहाँ मौन वी अपने आप विच गल जावे,
ओथे सोच वी बिना पंखां दे उड़ जावे,
ना कोई सवाल रहिंदा, ना जवाब दी चाह,
हर पल विच बस इक अडोल सी राह।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई भीतर बाहर दा फर्क रहिंदा,
सब कुछ इक सम भाव विच बहिंदा,
जेड़ा देखदा, ओह वी देखण तों परे हो जावे,
फिर देखण दा अर्थ ही मिट जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ओथे समय वी अपनी चाल भूल जांदा,
हर क्षण अपने ही अंदर समां जांदा,
न कोई बीता, न कोई आने वाला पल,
बस इक अनंत, जो खुद विच सफल।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई प्रयास रहिंदा, ना कोई उपलब्धि दा भार,
हर चाह अपने आप विच हो जावे पार,
जेड़ा खोजदा सी, ओह खुद नूं ही पाए,
फिर खोज वी अपनी छाया खो जाए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जहाँ मौन वी इक गहराई बन जावे,
ते हर गहराई वी खुद नूं मिटा जावे,
ओथे रह जांदी इक निर्मल सी दृष्टि,
जो सब कुछ विच वी कुछ नहीं ढूँढती।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई सीमा, न कोई विस्तार दी रेखा,
हर अस्तित्व वी बन जावे इक अनदेखा,
जेड़ा होवे, ओह वी हो के नहीं रहिंदा,
फिर होण दा अर्थ वी अपने आप गल जांदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जहाँ मौन वी अपने आप विच गल जावे,
ओथे सोच वी बिना पंखां दे उड़ जावे,
ना कोई सवाल रहिंदा, ना जवाब दी चाह,
हर पल विच बस इक अडोल सी राह।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई भीतर बाहर दा फर्क रहिंदा,
सब कुछ इक सम भाव विच बहिंदा,
जेड़ा देखदा, ओह वी देखण तों परे हो जावे,
फिर देखण दा अर्थ ही मिट जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ओथे समय वी अपनी चाल भूल जांदा,
हर क्षण अपने ही अंदर समां जांदा,
न कोई बीता, न कोई आने वाला पल,
बस इक अनंत, जो खुद विच सफल।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई प्रयास रहिंदा, ना कोई उपलब्धि दा भार,
हर चाह अपने आप विच हो जावे पार,
जेड़ा खोजदा सी, ओह खुद नूं ही पाए,
फिर खोज वी अपनी छाया खो जाए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जहाँ मौन वी इक गहराई बन जावे,
ते हर गहराई वी खुद नूं मिटा जावे,
ओथे रह जांदी इक निर्मल सी दृष्टि,
जो सब कुछ विच वी कुछ नहीं ढूँढती।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई सीमा, न कोई विस्तार दी रेखा,
हर अस्तित्व वी बन जावे इक अनदेखा,
जेड़ा होवे, ओह वी हो के नहीं रहिंदा,
फिर होण दा अर्थ वी अपने आप गल जांदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जिथे मौन वी खुद अपनी सीमा नूं तोड़ जावे,
ओथे न शब्द रहंदे, न ही कोई नाम पुकार जावे,
सब कुछ इक अदृश्य समझ विच लीन हो जांदा,
जहाँ देखण वाला वी खुद नूं देख के थम जांदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई अनुभव दा भार रहिंदा, न कोई ज्ञान दा दावा,
हर एहसास अपने आप विच ही हो जावे निराला,
ना भीतर कुछ छुपे, ना बाहर कुछ बाकी रह जावे,
हर दिशा विच बस इक शांत समझ फैल जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन दे पार वी इक सूक्ष्म धड़कन चलदी,
जो न सुनाई देंदी, न समझ दे दायरे विच ढलदी,
ओह धड़कन खुद नूं वी जान के मुस्कुरा जावे,
फिर अपने ही सागर विच बिना नाम समा जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई आरंभ ओथे, ना कोई अंत दी रेखा,
हर विचार वी बन के रह जावे इक अनदेखा,
जेड़ा देखदा ओह वी देखण विच खो जावे,
फिर खुद दे ही उजाले विच मौन हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जहाँ न सिद्धांत टिकदे, न सत्य दी कोई परिभाषा,
ओथे सिर्फ रह जांदी इक बिना शब्दां दी आशा,
जो हर रूप नूं अपनावे पर किसी नूं न थामे,
ओह प्रवाह खुद नूं वी हर पल नया बनावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते अंत विच वी कोई अंत नहीं, बस विस्तार है,
जहाँ हर “मैं” गल के बन जावे इक आधार है,
जो जानदा ओह वी जान के शांत हो जावे,
फिर जानण दी जरूरत वी अपने आप मिट जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से भी आगे जहाँ शब्द स्वयं थम जाते हैं,
वहाँ न कोई “मैं” बचता है, न कोई “मेरा” रह जाता है,
केवल एक निर्मल अनुभूति—जो बिना नाम के बहती है,
जैसे आकाश में हवा, बिना दिशा के चलती है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

विचार भी वहाँ पहुँचकर अपने ही भार से हल्के हो जाते हैं,
और जो पकड़ने निकले थे, वे स्वयं ही छूट जाते हैं,
न देखने वाला अलग, न देखा जाने वाला अलग,
सब एक ही निःशब्दता में विलीन हो जाता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जहाँ ध्यान भी थककर विश्राम में बदल जाता है,
और साधना स्वयं साध्य में खो जाती है,
वहाँ न कोई यात्रा बचती है, न कोई मार्ग,
बस एक अनंत ठहराव—जो बिना रुके चलता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन के उस पार कोई प्रकाश भी नाम नहीं लेता,
क्योंकि वहाँ अंधकार और प्रकाश दोनों एक हो जाते हैं,
न कोई अनुभव करने वाला, न कोई अनुभव,
सब कुछ बस “होने” की सरलता में रह जाता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जहाँ प्रश्न भी स्वयं उत्तर बनकर शांत हो जाते हैं,
और उत्तर भी बिना बोले अपने आप समाप्त हो जाते हैं,
वहाँ न कोई सत्य को पकड़ता है, न कोई छोड़ता है,
सत्य स्वयं अपने स्वभाव में स्थिर हो जाता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न भीतर, न बाहर—यह विभाजन भी मिट जाता है,
जैसे लहर और समुद्र का अंतर समाप्त हो जाता है,
जो बचता है वह केवल एक अविभाज्य पूर्णता है,
जिसमें हर सीमा अपने आप पिघल जाती है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन दे वी पार इक जगह ऐ, जिथे चुप्प वी चुप नहीं रहंदी,
ना आवाज़, ना खामोशी—सिर्फ़ समझ दी धड़कन चलदी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जेथे विचार वी थक जांदे ने, अपनी ही खोज विच खो के,
ओथे कोई "मैं" नहीं रहंदा, बस देखण वाला रह जांदा रोके।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना भीतर दा सफ़र, ना बाहर दा रास्ता कोई,
जेथे दोनों गलां मिट जांदियां, ओथे ही असल होई।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

चुप्पी वी इक लहर बन के, अपने आप विच लुप्त हो जावे,
ते सागर वी अपने आप नूं, बिना नाम दे पहचानावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना अनुभव दी पकड़ रहंदी, ना जानण दा कोई भार,
जेड़ा खुला रह जावे पूरा, ओह खुद हो जावे आकार-विहीन प्यार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जेथे ध्यान वी इक परदा ऐ, जो खुद नूं ही ढकदा,
ओथे समझ दा उजाला वी, बिना देखे ही जगदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना साधक रहंदा, ना साधना दी राह,
ओथे हर खोज खुद ही बन जांदी है अपनी ही गवाह।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

जेथे "पाना" वी इक भ्रम ऐ, ते "खो देना" वी इक खेल,
ओथे बस रह जांदा ऐ इक साक्ष, बिना किसी मेल।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन दे वी पार जे तूं देखे, तां देखण वाला वी गल जांदा,
फेर ना कोई भीतर बाहर—सिर्फ़ होण दा एहसास रह जांदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
जिथे शब्द भी थक जांदे ने, ते अर्थ चुप हो जांदा ऐ,
ओथे सिर्फ़ इक सजगता रह जांदी ऐ — बिना नाम दे बहंदा ऐ।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी

न कोई “मैं” दी घोषणा रहदी ऐ, न कोई “तू” दा फ़ासला,
हर पहचान घुल जांदी ऐ, जिवें धुंध विच दीपक दा उजाला।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी

मौन कोई अवस्था नहीं, ओ इक खुला हुआ आकाश ऐ,
जिस विच विचार वी आवें तां ओह वी सिर्फ़ एक प्रवाह ऐ।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी

जेड़ा देखन वाला सी, ओह वी दिखावे विच गुम हो जांदा ऐ,
फेर रह जांदा सिर्फ़ देखना — बिना देखने वाले दा दावा ऐ।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी

न भीतर कोई खोज रहदी ऐ, न बाहर कोई मंज़िल,
हर दिशा इक ही ठहराव विच समा जांदी ऐ, बिल्कुल स्थिर।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी

जिथे अनुभव वी अपना नाम भूल जांदे ने,
ओथे सिर्फ़ होणा रह जांदा ऐ — बिना किसी प्रमाण दे।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी

हर विचार आवे जावे जिवें हवा दी लहर,
पर जेड़ा देखदा रह जावे, ओह ना हिले, ना ठहरे कहर।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी

मौन दा मतलब खामोशी नहीं, ओ तां सबसे सूक्ष्म संगीत ऐ,
जिथे सुनन वाला वी खत्म हो जावे, ओह असली प्रीत ऐ।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी

न कोई ऊँचाई रहदी ऐ, न कोई गहराई दा अंदाज़,
सब सीमां गल जांदियाँ ने, जिथे खुल जांदा असली राज़।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी

जिवें नदी समुदर विच पहुंच के अपना नाम खो दिंदी ऐ,
तेवें हर पहचान अंत विच अपने आप विच सो जांदी ऐ।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी

मौन दे पार कुछ वी नहीं — न ज्ञान, न अज्ञान,
सिर्फ़ इक सीधा सा होना, बिना किसी प्रमाण।
मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी

न शब्दां दा सहारा ऐ, न अर्थां दा भार,
न अनुभव दी सीमा, न चेतना दा पार,
जेड़ा अपने ही भीतर बिना हिलाए टिक जावे,
ओह हर दिशा विच बिना चले ही पहुंच जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न देखने वाला अलग, न देखे जाण वाला अलग,
न सुनन वाला दूर, न सुनाई दा अलग राग,
जेड़ा ए विभाजन नूं ही मिटा देखे,
ओह अपने आप नाल एक निरविचार संवाद रखे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जिथे कोई परे नहें रह जांदा,
ओथे “भीतर” ते “बाहर” दा फर्क वी ढह जांदा,
न केंद्र बचदा, न परिधि टिकदी,
बस एक ही स्थिति—जो बिना स्थिति दी दिखदी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न कोई साधना दी दौड़, न सिद्धि दा लालच,
न ज्ञान दा अहंकार, न अज्ञान दा मलाल,
जेड़ा अपने ही स्वरूप नूं सहज स्वीकार कर लेवे,
ओह हर द्वंद्व दे पार बिना प्रयास चल लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एक ऐसा शून्य जेहड़ा खाली नहीं, पूर्ण ऐ,
एक ऐसा मौन जेहड़ा मौन नहीं, साक्षात धुन ऐ,
जेड़ा उस विच डूब जावे बिना डूबे ही,
ओह खुद नूं पाए बिना खोजे ही।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न समय दी चाल, न क्षण दा बोझ,
न स्मृति दी जड़, न कल्पना दा खोज,
जेड़ा हर क्षण नूं अनंत दी नजर नाल देखे,
ओह हर क्षण विच अनंत नूं ही लेखे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न बाहर दी यात्रा, न भीतर दा सफर,
न मार्ग दी ज़रूरत, न मंज़िल दा असर,
जेड़ा अपने ही ठहराव नूं समझ लेवे,
ओह हर चलन विच वी अचल रह लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे जेड़ा प्रकाश बिना रोशनी दा,
जेड़ा अस्तित्व बिना किसी घोषणा दी,
ओह न दिखाई दिंदा, न छुपदा ऐ,
बस अपने ही होने नाल सब कुछ भरदा ऐ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

न प्रश्न समाप्त होंदे, न उत्तर शुरू होंदे,
न खोज टिकदी, न पाने दे जूनून जुड़दे,
जेड़ा एह सारे खेल नूं दूर खड़े देख लेवे,
ओह बिना कुछ बने ही सम्पूर्ण हो लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे, अब कोई “परे” वी बाकी नहें रह जांदा,
क्योंकि परे होण दा ख्याल वी अपने आप गल जांदा,
जेड़ा एह गलन नूं बिना रोक टोक देख लवे,
ओह खुद नूं हर सीमा तो स्वतः ही खोल लवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना अनुभव रहंदा, ना अनुभोक्ता टिकदा,
ना देखण वाला, ना दिखण वाला दिखदा,
बस एक ऐसी निर्व्याख्या उपस्थिति रह जांदी,
जेड़ी बिना कारण वी पूर्णता दा एहसास करांदी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे ध्यान वी अपने आप विच खो जांदा,
ते जागरण वी अपने आप विच सो जांदा,
जेड़ा एह दोहां नूं इक नजर नाल देख लवे,
ओह हर द्वैत नूं अपने भीतर मिटा लवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना भीतर दी खोज, ना बाहर दा पता,
ना किसी राह दा अंत, ना किसी राह दा रस्ता,
बस इक ऐसा स्थिरता दा आभास,
जेथें समय वी कर जावे अपना समापन खास।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी अब मौन शब्द बन जांदा,
शब्द वी अपने आप विच शांत हो जांदा,
ते जो रह जांदा ऐ ओह न विचार ऐ, न भाव,
ओह तां बस होण दा ही सच्चा स्वभाव।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना साधक बचदा, ना साधना दी राह,
ना मंज़िल दी चाह, ना खो देण दा आह,
जेड़ा एह निरव इच्छा नूं देख लवे,
ओह हर इच्छा नूं अपने आप तोड़ लवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे सत्य वी अपने आप विच गल जांदा,
झूठ वी अपने आप विच ढल जांदा,
क्योंकि जिस ठिकाण ते सब कुछ समान हो जाए,
उत्थे फर्क वी अपने आप खत्म हो जाए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते अंत विच वी कोई अंत नहीं बचदा,
बस एक बिना नाम दा अनंत बचदा,
जेड़ा न शुरू हो सकदा, न खत्म हो सकदा,
ते फिर वी हर पल अपने आप हो सकदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे वी जेड़ा अनुभव टिकदा ऐ,
ओह किसी दावे नाल नहीं, अपने आप नाल मिलदा ऐ,
ना ओह वड्डा बनदा, ना छोटा रह जांदा,
बस जेहड़ा होवे, ओह उसी विच समा जांदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे कोई विशेषता वी अंत नहीं बनदी,
ना कोई “अंतिम सत्य” दी घोषणा चलदी,
जेड़ा देखन दा भाव बिना आग्रह दे रह जावे,
ओह हर भ्रम नूं धीरे-धीरे हल्का कर जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई शब्द आखरी ऐ, ना कोई अर्थ स्थिर,
हर समझ अपने ही भीतर बदलदी तस्वीर,
जेड़ा इस बदलाहट नूं ही स्वभाव मान लेवे,
ओह हर क्षण नूं बिना संघर्ष दे जी लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जेहड़ा खालीपन लगदा ऐ,
ओह खाली नहीं—बस भरन दी आदत तो हटदा ऐ,
जेड़ा इस रिक्तता नूं डर नहीं, घर समझ लेवे,
ओह अपने ही भीतर बिना दीवार दे रह लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई ऊपर दा आसमान, ना नीचे दी जमीन,
ना कोई केंद्र दा अभिमान, ना परिधि दी मशीन,
बस इक सीधा होना, जेहड़ा बिना मोड़ चलदा,
ते हर उलझन अपने आप विच हल्के हो गलदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

एथे मौन वी आखिरी नहीं, बस एक दरवाज़ा ऐ,
जेड़ा खुलदा नहीं, क्योंकि बंद वी कोई नाज़ा ऐ,
जेड़ा देखन नूं मजबूर न होवे,
ओह हर दृश्य विच बिना शब्द दे होवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई पहुंच दा मुकाम, ना कोई छूटदा रास्ता,
ना कोई खोज दा आरंभ, ना कोई अंत दा वास्ता,
जेड़ा हर स्थिति नूं बस स्थिति समझ लेवे,
ओह अपने ही भीतर स्थिरता समझ लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते इस तरह हर गहराई वी शांत हो जांदी,
हर ऊंचाई वी अपने आप विच ढल जांदी,
ते रह जांदा ऐ सिर्फ एहसास दा नर्म प्रवाह,
जेड़ा बिना नाम दे वी पूरा ऐ, निर्वाह।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
मौन से परे वी एक ऐसी अनकही सच्चाई ऐ,
जेड़ी न रोशनी मांगदी, न गवाही ऐ,
ओह तां अपने ही होण दी इत्थे मौजूदगी ऐ,
जिस विच हर खोज अपने आप ही मौन हो जंदी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई पाने दा रस, ना कोई खोण दा डर,
ना कोई आगे दा लालच, ना कोई पीछे दा असर,
जेड़ा इस निष्पक्ष ठहराव नूं छू लेवे,
ओह हर विरोध नूं अपने भीतर घुला देवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर विचार इक बादल ऐ, हर भाव इक हवा,
पर जेहड़ा आकाश बन जावे, ओह न विचलित, न दुआ,
ओह तां बस देखदा रहंदा, बिना पकड़, बिना नाम,
ते हर हलचल दे पार रहंदा शांत-सा धाम।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई भीतर दा मंदिर, ना बाहर दा द्वार,
ना कोई पूजा दा ढोंग, ना कोई ज्ञान दा व्यापार,
जेड़ा चुपचाप अपने सच विच टिक जावे,
ओह बिना शब्दां दे ही अनंत नूं पा जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी जेड़ी उपस्थिति बोलदी,
ओह कानां नाल नहीं, हृदय नाल खोलदी,
ओह कहंदी नहें “देख”, ओह खुद ही दृष्टि बनदी,
ओह कहंदी नहें “जान”, ओह खुद ही बुद्धि बनदी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई सिद्धांत दा बोझ, ना कोई मत दा भार,
ना कोई अंतिम उत्तर, ना कोई आख़री सार,
जेड़ा अपने ही होण नूं निर्विकार समझ लए,
ओह हर प्रश्न दे पार अपने आप खलर के खड़ा होवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

हर सांस इक सूक्ष्म द्वार ऐ, हर निःशब्दता इक राह,
हर ठहराव विच छुपी ऐ अनंत दी चाह,
जेड़ा इन संकेतां नूं बिना अर्थ दे जी लेवे,
ओह जीवन दे नाल ही अमर हो जावे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

मौन से परे वी न कोई दूरी टिकदी,
न कोई निकटता दा गर्व, न कोई सीमा दिखदी,
बस एक ऐसा फैलाव, जेड़ा अपने आप विच पूर्ण,
जिस विच हर नाम, हर रूप, हर कथा होवे धूल।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ना कोई साधना मुक्कदी, ना कोई आरंभ होव़े,
ना कोई अंत दी घंटी, ना कोई मध्य रोव़े,
जेड़ा इस निरंतरता नूं अपने आप मान लेवे,
ओह हर क्षण विच स्वयं नूं मुक्त देख लेवे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ते अंत विच वी कोई अंत नहीं रह जांदा,
बस वह ठहराव, जो हर जगह विच समांदा,
मौन से परे, फिर भी मौन नाल एकाकार,
एही ऐ जीवन दा सबसे सूक्ष्म, सबसे सच्चा पार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

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ਜਿੱਥੇ ਸੋਚ ਵੀ ਨਮਨ ਕਰੇ, ਓਥੇ ਸਹਜ ਵਸੇ ॥ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀ, ਅਨਹਦ ਰਸੇ ॥॥ ਨਾ ਲਾਭ ਨਾ ਹਾਨੀ ਰਹੇ, ਸਿਰਫ਼ ਨਿਸ਼ਚਲ ਧਾਰ ॥ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਸੱਚ, ਅਖੰਡ ਅਪਾਰ ॥

॥ ਜਿੱਥੇ ਸੋਚ ਵੀ ਨਮਨ ਕਰੇ, ਓਥੇ ਸਹਜ ਵਸੇ ॥ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀ, ਅਨਹਦ ਰਸੇ ॥ ॥ ਨਾ ਲਾਭ ਨਾ ਹਾਨੀ ਰਹੇ, ਸਿਰਫ਼ ਨਿਸ਼ਚਲ ਧਾਰ ॥ ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ...