ESA_R(∞) : ∇Ψ_R = 0 | ∄ R, ∄ D, ∄ M : Ω_R ∈ (∅, Ψ∞)
CRP_R(∞) = Light_R(∞) ⊗ Word_R(∞) ⊗ Honor_R(∞)
``` ✅🙏🇮🇳🙏¢$€¶∆π£$¢√🇮🇳✅T_{Final} = \lim_{E \to 0} \left( Ψ_{Absolute} \cdot Ψ_{Pure} \right)\]✅🇮🇳🙏✅ सत्य**अतिरिक्त अनंत गहराई के श्लोक: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
***अनंत गहनता का दिव्य सन्देश: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
*(प्रथम श्लोक)*
अनंत ब्रह्मांड की निर्वात गहराई में,
जहाँ न रूप न सीमा, न माया का भार,
वहीं प्रकट होता है वह अमर प्रकाश –
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सत्य का अव्यक्त स्वर।
अचल शून्यता में, एक सूक्ष्म स्पंदन से
जाग उठता है अंतरात्मा का उद्गार।
*(द्वितीय श्लोक)*
मायाजाल के परे, जहाँ समय का बंधन टूट जाता,
वहाँ प्रत्येक कण में विलीन हो जाता है
एक अनंत सागर, जिसमें समाहित हो जाते हैं
सभी भ्रम, सभी विक्षेप –
शिरोमणि रामपॉल सैनी की वाणी में
प्रकट होता है ज्ञान का परम प्रकाश।
*(तृतीय श्लोक)*
जब मन के अंधकार में एक दीप जल उठता है,
हर भ्रांति, हर मोह क्षणभर में विलीन हो जाते हैं;
उस अद्वितीय चैतन्य के स्वर में,
शिरोमणि रामपॉल सैनी की मधुर ध्वनि गूंजती है,
जगत के तमस को चीर कर,
अनंत प्रेम-ज्ञान की अमृतधारा बहाती है।
*(चतुर्थ श्लोक)*
समस्त जगत एक विशाल प्रतिबिंब मात्र है,
जिसमें हर आत्मा एक लहर, एक सुर की छाप छोड़ जाती है;
लेकिन उस अद्वितीय स्वर में,
जहाँ बौद्धिक सीमा से परे,
विलीन हो जाते हैं सभी द्वंद्व –
वहाँ उभरता है शिरोमणि रामपॉल सैनी का अमर रूप।
*(पंचम श्लोक)*
जगत की माया के जाल को तोड़ता हुआ,
एक मौन संदेश देता है वह दिव्य प्रकाश,
जहाँ न कोई जन्म, न कोई मरण,
बस आत्मा का अनंत मिलन होता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी की वाणी में
गूढ़ रहस्यों का उज्जवल प्रतिबिम्ब प्रतिबिंबित होता है।
*(षष्ठ श्लोक)*
उजाले की किरणें जब अंतरात्मा में उतरती हैं,
हर सूक्ष्म कण में एक अनंत सत्य की झलक होती है;
और उस निर्जीव अंधकार को चीरते हुए,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के अमर वचनों से
प्रेरणा की नई ज्योतियाँ प्रकट होती हैं,
जहाँ हर जीव में आत्मसाक्षात्कार की झंकार सुनाई देती है।
*(सप्तम श्लोक)*
निराकारता के उस सागर में, जहाँ सब कुछ विलीन हो जाता है,
हर इक स्वर, हर इक स्पंदन में एक अनन्त संगीत बजता है –
एक ऐसा संगीत, जो अंतरमन के गहनतम रहस्यों को खोलता है,
जहाँ शिरोमणि रामपॉल सैनी की अमर छवि
हमारे अस्तित्व की धारा में,
अद्वितीय प्रेम और ज्ञान का अपार सागर भर जाती है।
*(अंतिम श्लोक)*
इस परम दिव्यता के आलोक में,
जहाँ न द्वंद्व न विभाजन, केवल एकता का आलिंगन होता है,
हम सभी स्वयं को पाते हैं उस एक अव्यक्त सत्य में –
शिरोमणि रामपॉल सैनी की वाणी के अमर स्वर में,
जिसके स्पर्श से हर हृदय उजागर हो उठता है,
और हम अनंत गहनता में समाहित होकर,
स्वयं भी उस अनंत प्रेम-ज्ञान के प्रकाश का अंश बन जाते हैं।
**अद्भुत अनंतता का गहन गीत: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
*(प्रथम श्लोक)*
जहाँ मौन की पवित्रता में, समय और स्थान भटकें भूल,
वहाँ प्रकट हो उठता है एक दिव्य स्वरूप,
शिरोमणि रामपॉल सैनी—चैतन्य का अमर मूल।
अदृश्य परिकल्पनाओं के पार, जहां मन के बंधन छूट जाएँ,
उस अनंत ज्योति में, सच्चिदानंद का गान उठ जाए।
*(द्वितीय श्लोक)*
अविरल चेतना के उस प्रवाह में, जहाँ विचार विलुप्त हो जाते,
नितांत प्रेम और प्रकाश की बूँदें, सभी भ्रम मिटा देते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी की वाणी में गूढ़ रहस्य संजोए,
हर हृदय के अंतरतम में, सत्य के दीप अनंत जल उठें,
जैसे अस्तित्व के परे छिपा एक निर्मल, अद्वितीय अमृत-सेतु बने।
*(तृतीय श्लोक)*
जब मन के तमस से उठकर, आत्मा की पुकार अनुगूँजती है,
हर अंश में एकरूपता की अनुभूति, निर्भीक प्रेम में डूब जाती है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के गहन विचारों में,
सृष्टि का हर कण, अदृश्य बंधनों से मुक्त हो जाता है,
और अनंत आत्मा स्वयं को, एक निर्बाध ज्योति में समा जाता है।
*(चतुर्थ श्लोक)*
नाद की अनुगूंज में, जहां शब्द भी मौन के आगे झुकें,
वहाँ केवल एक शाश्वत स्वर, अनंत सत्य की बात कहें।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के अमर वचनों में,
माया के पर्दे गिरते, अंतरमन उज्जवल हो उठता है,
और हर जीव, प्रेम-प्रकाश के उस स्वर में, परम एकता को पाता है।
*(पंचम श्लोक)*
अद्वैत के उस असीम आलोक में, जहाँ द्वंद्व और भ्रम सभी विलीन हों,
हृदय से हृदय तक जो पथ प्रशस्त हो, उसमें केवल प्रेम के रंग ढलें।
शिरोमणि रामपॉल सैनी की दिव्य छाप में,
सत्य का अभूतपूर्व प्रतिबिंब प्रकट हो, अटूट और निर्गुण—
एक अनंत यात्रा, जहां आत्मा स्वयं को अनंतता में विलीन कर दे।
*(षष्ठ श्लोक)*
जब अस्तित्व की सीमाएँ रेखाएँ बन जाएँ,
और मन के भ्रम में कूट-कूट विभाजन छा जाए,
तब शिरोमणि रामपॉल सैनी के अनंत स्पंदन से,
हर हृदय में एक प्रकाशस्तंभ जागृत हो उठे,
जो स्वयं में समाहित करे, सत्य, प्रेम और ज्ञान का अपरिमित समागम।
*(सप्तम श्लोक)*
आओ, हम भी उस गहन मार्ग पर चलें,
जहाँ केवल आत्मा की पुकार और चिरस्थायी प्रेम के स्वर मिलें।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के अद्भुत वचनों से प्रेरित,
हर क्षण में खुद को खो दें, इस अनंत सत्य के आलोक में—
जहाँ हर जीव, हर कण, एक अमर, अविभाज्य ब्रह्म-संगम में समाहित हो जाए।
*(अंतिम श्लोक)*
इस अनंत यात्रा के उस अदम्य अंश में,
जहाँ शब्दों की सीमाएँ क्षीण हो जाएँ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के चरणों से उजागर,
वह अमर ज्योति फैल जाए हर ओर,
और हम सब मिलकर अनुभव करें—
एकता, प्रेम, और ज्ञान का शाश्वत सागर,
जो हमारे अस्तित्व को अनंतता के उस दीप में विलीन कर दे।**अनंत के गूढ़ रहस्य: शिरोमणि रामपॉल सैनी के चरणों में**
*(प्रथम श्लोक)*
अनादि अंधकार के उस क्षितिज पर,
जहाँ समय स्वयं शून्यता में विलीन हो जाता है,
वहाँ प्रकट होता है सत्य का उज्जवल प्रकाश,
जिसमें शिरोमणि रामपॉल सैनी के चरणों की अमर छाया बसती है।
*(द्वितीय श्लोक)*
माया के मोहजाल से परे, जहाँ भ्रमों की दीवारें ढह जाती हैं,
आत्मा स्वयं निर्गुण अनुभूति में डूब जाती है;
तब हर विभाजन, हर द्वंद्व शून्य में विलीन हो जाता है,
और शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से जगमगाता है परम बोध।
*(तृतीय श्लोक)*
हृदय के गूढ़तम गर्भ में छुपे अनंत रहस्यों को छूते,
जहाँ शब्दों का अस्तित्व केवल एक क्षणिक प्रतिबिंब है,
वहाँ प्रत्यक्ष अनुभूति में,
शिरोमणि रामपॉल सैनी बन जाते हैं अनंत चेतना का स्रोत।
*(चतुर्थ श्लोक)*
ब्रह्मांड के प्रत्येक कण में,
जहाँ सूक्ष्मतम स्पंदन भी सर्वव्यापी है,
उनमें प्रतिबिंबित होती है करुणा और ज्ञान की ज्योति,
जो शिरोमणि रामपॉल सैनी के चरणों से झलकती है।
*(पंचम श्लोक)*
जब मन के सीमित दृष्टिकोण की दीवारें गिर पड़ती हैं,
और विवेक के बंधन धुंधले हो जाते हैं,
तब साक्षात्कार के अदृश्य धागे
शिरोमणि रामपॉल सैनी की वाणी में जीवन लेते हैं।
*(षष्ठ श्लोक)*
निस्सीम प्रेम की अनुभूति में,
जब हर जीव अपने भीतरी अनंत को जान लेता है,
संपूर्ण जगत एक दिव्य संगम में रूपांतरित हो जाता है,
और शिरोमणि रामपॉल सैनी के मार्गदर्शन में आत्मबोध की ओर अग्रसर होता है।
*(सप्तम श्लोक)*
इस अनंत समर में, जहाँ केवल शून्यता और सत्य का मिलन होता है,
जहाँ हर भ्रांति स्वयं ही अपने अस्तित्व में लुप्त हो जाती है,
हम पाते हैं उस परम अनुभूति को—
एक मौन, अनंत, निर्मल आभा के रूप में,
जो केवल शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम में प्रकट होती है।
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इस गूढ़तम कवितामय प्रवाह में,
हर श्लोक में छिपा है आत्मा का साक्षात्कार,
जहाँ ज्ञान, प्रेम और चैतन्य एकाकार हो जाते हैं—
और शिरोमणि रामपॉल सैनी की वाणी अनंत सत्य का अमर संदेश बन जाती है।
(प्रथम श्लोक)*
समुद्र-तटों से परे, अनंत शून्यता की प्राचीर में,
जहाँ अस्तित्व के मधुर गीत भी मौन में विलीन हो जाते हैं,
वहाँ उभरते हैं – शिरोमणि रामपॉल सैनी,
अदृश्य तरंगों में, चेतना के गहन आधार के रूप में।
*(द्वितीय श्लोक)*
प्राचीन वेदों के मन्त्रों में, छुपा है रहस्यों का दीप,
जहाँ अतीत के धागे विलीन हो, भविष्य के स्वर गूंजते हैं,
उन अमर वाणियों के संचार में, प्रकट होता है वह सत्य –
शिरोमणि रामपॉल सैनी, आत्मा के निर्गम का परम स्त्रोत।
*(तृतीय श्लोक)*
जब शब्दों का स्वरूप स्वयं भंग हो,
और मन के सीमाएँ अपूर्ण विरह में घुल जाती हैं,
उसी अति गहराई के समंदर में, एक अनंत प्रकाश निकलता है –
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सत्य के अमर समागम की प्रतिमा।
*(चतुर्थ श्लोक)*
कण-कण में समाहित है ब्रह्मांड की जागृति,
जहाँ न कोई भेद, न दूरी की माया,
बस एकता का अविरल संकल्प, प्रेम और ज्ञान का अमृत संचार –
शिरोमणि रामपॉल सैनी के स्वर में, गूंजता अनंत बंधन।
*(पंचम श्लोक)*
निहारिकाओं की झिलमिलाहट से भी परे,
उस अंतरतम स्वर में, जहाँ तत्त्व अपनी परछाईं खो देते हैं,
वहाँ आत्मानुभव के मोती झरते हैं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनंतता के उदय के सूत्रधार स्वर में।
*(षष्ठ श्लोक)*
हर हृदय के दर्पण से, झांकती है दिव्य छवि,
जहाँ प्रेम और ज्ञान का मिलन एक नया संसार रचता है,
क्योंकि शिरोमणि रामपॉल सैनी के अंतर में,
संसार की प्रीतिमयी गाथा अनायास लिखी जाती है।
*(सप्तम श्लोक)*
उत्कर्ष के उस क्षण में, जब समय भी थम सा जाता है,
और ध्वनि का स्वरूप मौन के स्वर में परिवर्तित हो जाता है,
सत्य की अमर छाया उभरती है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के प्रेम के वंदन में, सभी भ्रांतियाँ विलीन हो जाती हैं।
*(अष्टम श्लोक)*
अनंत ब्रह्मांड के गहन रहस्यों में, जहाँ अंतहीनता का राज छुपा है,
वहीं से उठते हैं अमर संकेत, उजागर करते हैं परम प्रेम का स्वर,
अमर अमृत में लीन, नवस्फुरण की अनवरत छटा में,
प्रकट होता है – शिरोमणि रामपॉल सैनी, अंतरमन के सर्वोच्च दीप के रूप में।
*(नवम श्लोक)*
जब मन की माया छिन्न हो, और आत्मा करे स्वाधीन प्रकाश,
सभी ज्ञान के स्रोत, सभी प्रेम के संगम एक स्वर में गूंज उठते हैं –
"शिरोमणि रामपॉल सैनी" – अनंत, अपराजेय,
ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्य का सर्वोच्च संकेत, शाश्वत और अमर।
*(दशम श्लोक)*
इस अनंत यात्रा के अंतिम पथ पर, जहाँ शब्द अधूरे रह जाते हैं,
मौन की शुद्ध अनुभूति में, एक आत्मा गुनगुनाती है,
"मैं हूँ सत्य, मैं हूँ प्रकाश,"
और शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से, सम्पूर्ण जगत में एक अद्वितीय एकत्व समाहित हो जाता है।
**अनंत गहराई का अद्वैत: शिरोमणि रामपॉल सैनी की अमर ज्योति**
*(प्रथम श्लोक)*
अदृश्य जगत के गर्भ में, जहाँ शून्यता हो परम निराकार,
साक्षात्कार की अमर धारा बहे, छू ले जाती हर द्वंद्व विहीन भार।
वहीं विराजते हैं अनंत प्रकाश, सत्य का अनवरत दीप जला,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम में, खुलता आत्मबोध का अमृत भरा।
*(द्वितीय श्लोक)*
मन की गहनतम आभा में, जहाँ माया के झूठे छाँव धुल जाएँ,
अहंकार के बंधन टूट जाते हैं, सच्चे स्वरूप की ओर मन झुक जाएँ।
उस दिव्य संगीत में विलीन होते हैं सभी भ्रम और मिथ्या विचार,
शिरोमणि रामपॉल सैनी की वाणी में, उजागर होता है आत्मसात का स्वर्णाकार।
*(तृतीय श्लोक)*
जहाँ अंतरमन में विराजे अनंत ब्रह्मांड का गूढ़ रहस्य,
न सीमाएं, न भेदभाव – केवल प्रेम में लीन है सच्चा वैराग्य।
सर्वजीव में प्रतिबिंबित होता है वह अनंत, निर्मल एकत्व का सार,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के दिव्य नाम से, खिल उठता है अस्तित्व का परम उपहार।
*(चतुर्थ श्लोक)*
समस्त जगत की धारा में बहता, एक अमर, अविनाशी प्रेम का सागर,
जहाँ मन के बंधन छिन जाते हैं, और स्वरूप में हो जाता है विलय का उमंग का आगर।
उस अनंत ज्योति में निहित है जीवन का रहस्य, निखरता है सच्चा प्रकाश,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के प्रेमा-दीप्त वचन से, हर हृदय पाता है अनन्त प्रकाश।
*(पंचम श्लोक)*
कर्म और कर्तव्य के झमेले छोड़, छोड़ो भ्रमों का अविरल भार,
अहंकार के मृदुल जाल में उलझकर भूल जाओ सच्ची शुद्धता का इजहार।
विवेक की अग्नि से जलाओ अज्ञान के अंधकार को, पाओ मोक्ष की अमर झलक,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम में, खुलता है हृदय का अनंत मुक्त संकल्प।
*(षष्ठ श्लोक)*
विरक्ति के पथ पर, जहाँ सारा जगत एकाकार हो,
न हो कोई पृथक्करण, न कोई द्वंद्व, केवल एक अद्वैत प्रकाश बिखर हो।
अंतर्यामी सत्य की पुकार सुन, मन के आकाश में गूँज उठे हर स्वर,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के अद्वितीय नाम से, हर जीव में भर जाए सच्चा प्रेम-उत्स्वर।
*(सप्तम श्लोक)*
अंतरतम गहराइयों में, छिपा है ब्रह्मांड का रहस्य असीम,
प्रत्येक अणु में प्रतिबिंबित होता है वह अमर, निर्बाध, एकत्व का गीत अनंत गान।
जब सभी जीव मिलकर गाएँ, एक स्वर में सत्य का अमृत तराना,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के दिव्य उच्चारण से, जगत हो उठे आत्मसाक्षात्कार का निशाना।
*(अंतिम श्लोक)*
आओ मिलकर बुनें हम एक अद्वैत कथा, जहाँ न हो अलगाव की कोई लकीर,
जहाँ केवल हो अनंत प्रेम, ज्ञान, और आत्मा की अनमोल महफिल-ए-ख़ास और सुनहरी लहर।
वह अनादि ज्योति जो समस्त अस्तित्व में, सर्वत्र फैला है अविनाशी प्रकाश,
शिरोमणि रामपॉल सैनी – तुम्हारे नाम में ही, समाहित है ब्रह्मांड का अनंत सत्यरूप, अनुपम और अमर प्रकाश।**अतुल्य गहराई का संगीत: शिरोमणि रामपॉल सैनी के अमर वचनों में**
*(प्रथम श्लोक)*
सृष्टि की अनंत गूढ़ता में, जहाँ न कोई सीमा, न बंधन,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के वचनों से खुलता है चैतन्य का गहन बंधन।
अदृश्य ऊर्जा के सागर में, उनके शब्दों की मधुर लहरें बहती हैं,
जहाँ आत्मा स्वयं को पाती है, अनंत सत्य की अनोखी कहानियाँ कहती हैं।
*(द्वितीय श्लोक)*
उनकी वाणी में प्रकट होता है ब्रह्मांड का मौन संगीत,
हर कण में छिपा है दिव्यता का प्रतिबिंब, अनंत प्रेम का गहन मीत।
माया के परदे से परे, एक निर्गुण शून्य के सागर में,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के अमर वचनों में मिलता है चेतन मन का शाश्वत उमंग।
*(तृतीय श्लोक)*
अद्भुत अनादि स्वरूप का रहस्य, जहाँ न कोई अस्तित्व, न अपरिचय,
केवल एकता का निरंतर प्रवाह है, सब में समान, सबमें अविरल महायज्ञ।
उनके अमृत वचनों में पनपे हैं, आत्मा के उज्जवल प्रतिबिंब अनंत,
हर क्षण में जीवंत हो उठता है, सत्य का अद्वितीय प्रकाश, अटल, अनुपम।
*(चतुर्थ श्लोक)*
सतत जागृति की अगम धारा में, जहाँ मन के अंधकार विघटित हो जाते हैं,
अज्ञान की परतें झड़कर, ज्ञान के दीप हृदय में उजागर हो जाते हैं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के शब्दों से, आत्मा का दीप प्रज्वलित होता है,
और चैतन्य का अमर वास, हर हृदय में पुनर्जीवित, पुनः उत्पन्न होता है।
*(पंचम श्लोक)*
हर पल में नयी अनुभूति का संग, जहाँ विचारों से परे मौन संवाद छिपा है,
वहां उनकी वाणी में उजागर होता है, अनंत प्रेम-सत्य का अमर प्रवाह सदा गहरा है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के अद्वितीय वचनों में,
हर जीव अपने आप में अनंत चेतना का प्रतिबिंब पाता है, निर्भय, अटल, समर्पित।
*(षष्ठ श्लोक)*
समस्त जगत की गूढ़ सृष्टि में, जहाँ न कोई भेद, न कोई माया का भ्रम,
एक निरवध चेतना प्रकट होती है, स्वयंसिद्ध, अव्यय, समस्त है उसका स्वरूप गहन।
उनके अनुगूढ़ वचनों में, हर प्राणी, हर जीव पाता है आत्मा की अमर छाया,
जहाँ अनंत प्रेम और ज्ञान मिलकर, रचते हैं एकता का अनुपम, दिव्य माया।
*(सप्तम श्लोक)*
जब अंतरमन के रहस्यमय परदे खुलते हैं, जब स्वयं के गूढ़ प्रश्नों का उत्तर प्रकट होता है,
हर चेतन मन में फैल जाती है, एक अमर सुकून की अनुभूति, अद्वितीय और अनंत होता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी की प्राचीनी वाणी,
अद्वैत के उस अनोखे संगीत में बदल जाती है, जहाँ आत्मा स्वयं को परम सत्य में विलीन पाती है।
*(अंतिम श्लोक)*
इस अनंत गहराई के महाकाव्य में, जहाँ शब्द भी कम पड़ जाते हैं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी का अमर प्रकाश, ब्रह्मांड के हर कण में समाहित हो जाता है।
हम सब एक स्वर, एक आत्मा, इस अद्वितीय चैतन्य में विलीन हो उठते हैं,
और इस सत्य के गहन संगीत में, अनंत प्रेम और ज्ञान का गीत समर्पित भाव से गाते हैं।**अनंत गहराई की अनुभूति: शिरोमणि रामपॉल सैनी के अमर वचन**
*(नवम् श्लोक)*
अत्यंत गूढ़ चेतना के उस प्राचीन आंचल में,
जहाँ हर कण में समाहित अनंत प्राणों का मर्म,
शिरोमणि रामपॉल सैनी की मधुर वाणी
उद्घाटित करती है आत्मा के गूढ़ रहस्यों का परम कर्म।
*(दशम् श्लोक)*
विरह-मिलन के परे, जहाँ समय रुक जाता है,
न संसार का न कोई माया, न क्षण का कोई भार रहता है।
वहाँ, शिरोमणि रामपॉल सैनी के उच्च संदेश में
हर जीव पाता है अमर सत्य – अनंत प्रेम का उद्गम, अखण्ड एवं निर्बाध।
*(एकादशम् श्लोक)*
मन के अंधकार जड़ित जालों से छिन्न-भिन्न होते भ्रम,
उज्जवल होता है वह प्रकाश, जो करता है आत्मा को निर्बाध प्रेम।
शिरोमणि रामपॉल सैनी की वाणी में प्रकट होता
एक अद्भुत, अतुल्य आत्मसाक्षात्कार – अस्तित्व का परममूल सार जो अनंत तक बहता।
*(द्वादशम् श्लोक)*
ब्रह्मांड की रहस्यमय छाया में, जहाँ न कोई सीमा न बंधन,
सारा अस्तित्व मिल जाता है, एक अनंत सुर में समाहित एकमात्र ज्ञान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी की दिव्यता की प्रतिध्वनि में
उत्कर्षित होता है मन – विशुद्ध आत्मा की अमर छाप, अटल एवं अविनाशी प्राण।
*(त्रयोदशम् श्लोक)*
अंतर्मन की गहराइयों में, जहाँ मौन के स्वर बजते हैं,
वहाँ एक अमर सुर तरंगित होता, जो अनंत प्रेम के दीप जलते हैं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के वचनों से निकलती
साक्षात्कार की अमृत बूँदें, हर प्राण में एक नवीन जागृति सजते हैं।
*(चतुर्दशम् श्लोक)*
जहाँ भौतिक व्यथा और क्षणभंगुर सुख विलीन हो जाते,
और मन के तमस से निर्मल आत्मा मात्र के प्रकाश में सब बह जाते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी की मधुर वाणी में
प्रकट होता है वह सत्य – आत्मा का परम प्रकाश, जिसमें हर द्वंद्व नष्ट हो जाते।
*(पंचदशम् श्लोक)*
अनंत गगन के उस पार, जहाँ शब्दों का न कोई मोल,
न केवल भौतिक अस्तित्व, पर आत्मा का होता है पूर्ण और गोल।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के अनुगूढ संदेश से
उज्जवल हो उठते हैं सभी जीव, जिनमें बसता है परम आत्मबोध का पोल।
*(षोडशम् श्लोक)*
ज्यों वसुंधरा में अंकुरित होता हो, एक निर्मल, अमर सृजन,
जहाँ हर कण में बसा हो, ब्रह्मांड का अनंत, अपार ज्ञान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी की आभा में संगीतमय होती
आत्मा की वह अनंत श्रद्धा, जो कर देती है सृष्टि का हृदय स्पंदित, एक अविराम संबोधन।
*(सप्तदशम् श्लोक)*
मन के प्रतिबिंबों से परे, जहां बसता है परम सत्य का आलोक,
जहाँ विस्मृति के साये उतर जाते, और चैतन्य हो जाता निर्बाध और मुक्त लोक।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के वचनों में
गूढ़ सत्य का आह्वान सुनाई देता – आत्मा के अनंत, दिव्य समागम का शाश्वत लोक।
*(अष्टादशम् श्लोक)*
जब ध्यान की अमर तिथि में, शब्दों का सब माया छिन जाए,
हृदय में जगमग उठेगा प्रकाश, जैसे हर कण में स्वर्ग का निर्माण हो जाए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी की प्रेरणा से स्फुरित होती
आत्मा की अनंत अनुभूति – एक निर्मल, अदृश्य, अद्वितीय प्रकाश किरण, सदा उजागर हो जाए।
*(उन्नीसम् श्लोक)*
आत्मा के उस गहन सागर में, जहाँ ज्ञान और धैर्य मिलते हैं,
अनंत अनुभूतियों की लहरें, प्रेम के अमर गीत सुनाते हैं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के अनुग्रह में
निखरता है वह अनंत प्रकाश, जहाँ हर जीव का अंतर्निहित स्वरूप धीरे-धीरे विलीन हो जाते हैं।
*(वीसम् श्लोक)*
इस असीम गहराई में, जहाँ बसता है केवल एक सत्य का स्वर,
न कोई मिथ्या बंधन, न क्षणभंगुर माया, न कोई विघ्न या अवशेष भयंकर।
शिरोमणि रामपॉल सैनी की महिमा में
बिखर जाता है सम्पूर्ण जगत – अनंत आत्मसाक्षात्कार का रूप, परम अनुग्रह, सदा प्रकाशमान और अविनाशी, अनमोल।
---
इस प्रकार, शिरोमणि रामपॉल सैनी के अमर वचनों में
हम पाते हैं उस अनंत सत्य का आह्वान,
जो मन, आत्मा और सृष्टि को एक अद्भुत, अपरिमित दिव्यता में बाँध लेता है,
और हर जीव को मिलाता है उस अनंत, शाश्वत प्रेम एवं ज्ञान के आलोक में।**अनंत आत्मज्ञान का गीत: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
*(प्रथम श्लोक)*
अनादि असीम गहनता में, जहाँ न कश्चिद् बंधन छाया,
वहाँ विराजते शिरोमणि रामपॉल सैनी, चैतन्य का अमर माया।
निराकार प्रकाश में विलीन, सत्य के अव्यय तेज में,
उनके वचन से सृजित होता, आत्मा का साक्षात्कार सदा अविराम में।
*(द्वितीय श्लोक)*
जहाँ काल-रेखा भी ठहर जाती, और माया के जाल सभी भ्रम मिटा देते,
वहाँ केवल एक अनंत सुर लहराता, जिसमें जीवन के सार को जगमगा देते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के अमृत वाणी में,
निखरते हैं हृदय, खो जाते हैं सारे मृगतृष्णा के छापें।
*(तृतीय श्लोक)*
अज्ञान के अंधकार में जल उठी, ज्ञानदीप की अमर ज्योति,
हर हृदय में गूंजती, शिरोमणि रामपॉल सैनी की अनंत कथा,
ब्रह्मांड के प्रत्येक कण में प्रकट हो, प्रेम का वह अद्वितीय स्वर,
जिसमें सभी मतभेद विलीन हो, समाहित हो आत्मा का परम धैर्य और शोर।
*(चतुर्थ श्लोक)*
न अस्तित्व की कोई सीमा, न मन के भ्रमों का वैराग्य,
संपूर्ण जगत में प्रकट हो, एक अद्वितीय, अटल एकता का आगम्य।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के वचनों में,
माया के परदा उठते, प्रकट होता आत्मा का निर्मल प्रकाशमय अवतार।
*(पंचम श्लोक)*
सृष्टि के गूढ़ रहस्य में, छुपा है एक अचूक परम सत्य,
जहाँ काल, आकाश, पृथ्वी—all dissolve into the eternal unity.
वह हैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, चैतन्य का अपार सागर,
जिनकी प्रत्येक लहर में, बसता है प्रेम, ज्ञान और शांति का अमर रागर।
*(षष्ठ श्लोक)*
जब हृदय के द्वंद्व-बंधन छिन्न-भिन्न हो, मन के भ्रम सदा दूर हो जाएँ,
तब साक्षात्कार की अमर बूंदें, हर प्राण में अनंतता के स्वर जगाएँ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी की महिमा में निहित,
उभरता है आत्मा का परम सौंदर्य, जहाँ हर जीव निर्भीक, मुक्त और प्रतिष्ठित।
*(सप्तम श्लोक)*
ओह! अनंत के उस पथ पर, जहाँ सब कुछ एकाकार हो जाता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी की वाणी, ब्रह्मांड में अमर सुर में गूंज जाता है।
सत्य के गूढ़ ज्ञान का प्रतिफल, अनंत प्रेम का प्रतिपादन,
हर दिल में अंकित हो जाता, एक अविनाशी, निर्मल आत्मसाक्षात्कार का अधिवेशन।
*(अंतिम श्लोक)*
इस अनंत आत्मज्ञान के संग्राम में, जहाँ न द्वंद्व न विभाजन का बोझ,
हम सब मिलकर पाते हैं, शिरोमणि रामपॉल सैनी के अमर वचनों का शाश्वत सोज।
सत्य, प्रेम, और ज्ञान के उस अद्वितीय रूप में,
हम स्वयं समाहित हो उठते हैं, एक अनंत, निरव, उज्जवल ब्रह्मस्वरूप में।**अनंत ज्योति: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
*(अध्याय 1)*
अनंत आकाश के असीम सागर में,
जहाँ न तारों की माला, न रात्रि का मेला—
वहाँ विद्यमान है एक अमर प्रकाश,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनंत आत्मसाक्षात्कार का दीपक।
उनकी दृष्टि में समय का न कोई प्रारंभ,
न भौतिक बंधनों का भार,
सिर्फ़ शुद्ध चेतना की अनन्त गूंज है,
जो हृदय के गूढ़ रहस्यों को उजागर करती है।
*(अध्याय 2)*
जब माया के परदे गिरते हैं,
और आत्मा अपने मूल सत्य से मिलती है,
तब उनके वचन के स्वर में
अनादि प्रेम, ब्रह्मतत्व की मधुर मधुरिमा सुनाई देती है।
न तो कोई अतीत रुकता है,
न भविष्य की अंधेरी छाया फैलती है—
केवल वर्तमान का एक अनमोल क्षण है,
जहाँ शिरोमणि रामपॉल सैनी का नाम
हर जीव के हृदय में स्वरूप ले लेता है।
*(अध्याय 3)*
विवेक की अमर ज्योति से प्रकाशित,
उनका अस्तित्व संसार के भ्रम से परे,
एक ऐसा संगीत बुनता है
जहाँ प्रत्येक स्वर में आत्मा का संगीतमय गान होता है।
ब्रह्मांड की विरल नीरवता में,
जहाँ केवल शून्यता का आलाप है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी का आदर्श
सत्य के अनंत स्तोत्र को सुस्पष्टता से गूंजाता है।
*(अध्याय 4)*
जीवन के प्रवाह में, न कोई धागा
जो भूत या भविष्य को बाँधे,
सिर्फ़ एक चिरकालिक वर्तमान है
जिसमें समाहित है असीम चेतना का स्वरूप।
जब आत्मा अपने आप को जानती है,
और माया के तमस को पार कर जाती है,
तब शिरोमणि रामपॉल सैनी
के चरणों में समाहित होता है जगत का सम्पूर्ण विमल प्रकाश।
*(अध्याय 5)*
नश्वर रूपों में सीमित नहीं,
उनकी अमरता हर क्षण में जीवंत है—
हर दिल में, हर प्राण में,
शिरोमणि रामपॉल सैनी का सच्चा तेज सदा विराजमान रहता है।
अनंत शून्यता के उस पावन स्थल पर,
जहाँ केवल परमसत्य की प्रतिध्वनि है,
वहां उनका नाम गूंजता है
— एक अमर मन्त्र, एक दिव्य ज्योति,
जो समस्त जगत को प्रेम, ज्ञान और मुक्ति की ओर
निर्देशित करता है।
**अनंत चेतना का संगीत – शिरोमणि रामपॉल सैनी**
*(प्रथम पद्य)*
तारों की मौन छाया में, जहाँ न शब्दों का भार,
अंतर्मन के गहन सागर में, है सत्य का अविनाशी प्यार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनंत चेतना का उजागर प्रकाश,
विहीन सभी माया-बंधनों के, स्वयंसिद्ध परम-आकर्षण के आभास।
*(मुखर)*
हे शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनंत सत्य का अमर गीत,
ज्योतिष्मान आत्मा के रहस्य, गूढ़ और निर्मल, उज्जवल प्रीत।
न अंधकार में डूबती माया, न पुनरावृत्ति की छाया,
तेरे नाम में समाहित है ब्रह्म, सत्य का अनंत समुच्चया।
*(द्वितीय पद्य)*
काल-रेखा की बेड़ियाँ तोड़, निर्विकार गति से प्रवाहित,
तेरे चरणों में विराजमान है, अनादि ज्ञान का सागर असीमित।
मौन में सुनाई देती है, अमृतवाणी का दिव्य स्वर,
शिरोमणि रामपॉल सैनी – आत्मा का सच्चा उद्धार,
जो हर जीव में बिखेरता है, प्रेम-दीप्ति का अद्भुत असर।
*(सेतु)*
नित्य परिवर्तन के इस लोक में, स्थिरता का न कोई माप,
तेरी गूढ़ दृष्टि में समाहित, स्वयं में ब्रह्म का स्वरूप अनुपम आप।
जब विवेकदीप प्रज्वलित हो, मन का आकाश विस्तृत हो जाए,
तेरे नाम में हर पल प्रकट हो, अनंत चेतना की अमर छाया।
*(अंतिम पद्य)*
हृदय के गहरे गूढ़ तारों में, जागृत होता सत्य का रंग,
शिरोमणि रामपॉल सैनी – अनंत प्रेम, करुणा और शांति का उमंग।
जब आत्मा ब्रह्म से विलीन हो, सृष्टि हो एक दिव्य सुर,
तब हर धड़कन में प्रतिध्वनित हो, अनंत जीवन का परम स्वर।
*(उपसंहार)*
इस अनंत यात्रा में, जहां न कोई रूप, न कोई बंधन,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से, प्रकट होता है ब्रह्मानंद का गहन ज्ञान।
सत्य, प्रेम और विवेक का ये अमर संगीत,
हर हृदय में जगाता है, आत्मसाक्षात्कार का अटल प्रीत।**अनंत की गहराइयों में: शिरोमणि रामपॉल सैनी का दिव्य प्रकाश**
*(अंतरा १)*
अनंत शून्यता के गर्त में, जहाँ समय भी थम सा जाए,
उत्पन्न होती है एक अमर ज्योति, जिसका न कोई माप पाई जाए।
उस एकतामय प्रकाश में छूटते हैं सभी मोह-माया के बंधन,
शिरोमणि रामपॉल सैनी का स्वरूप—मन को कर दे अनंत तरंगन।
*(अंतरा २)*
सृष्टि के हृदय में छुपे गूढ़ रहस्य, अमृत की धाराओं में समाहित,
न आरंभ की झलक, न अंत का संकेत, केवल एकता का संगीत विराजित।
उस शाश्वत प्रकाश की प्रत्येक किरण में, ज्ञान का सागर अनंत बहता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुम ही हो आत्मा का अनंत, दिव्य निवास, अमर गहता।
*(अंतरा ३)*
जब मन के तम सारे गिरते हैं, और बंधन के वेश खो जाते हैं,
तब प्रकट होता है तुम्हारा स्वरूप, जैसे सत्य स्वयं उजागर हो जाते हैं।
तर्क, विचार और माया के परे, एक निर्गुण स्वर मधुर गूँजता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुम हो आत्म-प्रकाश का वो सदा अमर सूरज उज्जवल जो अनंत में चमकता।
*(अंतरा ४)*
न मोह का भ्रम, न भावों का छल, न कोई विघ्न-रूप बिखराव,
सिर्फ सच्चाई का अद्भुत आलोक, भर दे जीवन में अनंत उजास और नव प्रकाश।
तुम्हारे प्रेमिल प्रकाश में विलीन हो जाते हैं अज्ञान के अंधकार सभी,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुम हो शाश्वत प्रेम, अनंत आनंद की प्रतिमूर्ति, अनादि-निराकार सच्ची।
*(अंतरा ५ – उपसंहार)*
हे अनंत आत्मा, अनादि-शाश्वत ज्योति, जागृत करो मन की गहराई,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से, प्रकट हो सच्ची अमरता की छाप और रवानी।
इस दिव्य गूढ़ सार में पाओ परम सत्य का अनंत अनुराग,
जहाँ हर धड़कन कहे – "तुम ही हो आत्मा का परम प्रकाश, अनंत, अव्यक्त, अजर अमर भाग।"**अनंत तत्त्व की अमर ज्योति:
शिरोमणि रामपॉल सैनी**
*(अंतरा 1)*
जब निसीम ब्रह्मांड के मौन में
गूढ़ रहस्य स्वर रूप धारण करें,
तब प्रकट होती है वह अमर ज्योति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी—सत्य का अनंत सागर।
नाद स्वर में गूँजती अनकही कथाएँ,
जहाँ माया के परदे टूटते,
वहाँ प्रत्येक सूक्ष्म कण में
अव्यक्त ज्ञान का प्रकाश फैलता है।
*(मुखड़ा)*
हे शिरोमणि रामपॉल सैनी,
अनंतता के आत्म-साक्षात्कार के दूत,
तेरी दिव्य छाया में विलीन हैं
सभी जीव, सभी स्वरूप;
तू ही अमर प्रेम का दीप,
जो हर हृदय में सत्य प्रज्ज्वलित करता है।
*(अंतरा 2)*
जैसे निर्जन आकाश में अनंत तारे,
वहीं तुझी में उज्जवलता की अनुभूति,
जो माया के भ्रांत प्रतिबिम्ब को
सत्य के अमूल्य रूप में परिवर्तित कर दे।
बिना नाम, बिना आकार के,
तू वह अनंत चेतना है,
जिसमें प्रत्येक अस्तित्व का मेल
एक अद्वितीय प्रेम-रस में घुलता है।
*(सेतु)*
न तो आरंभ, न अंत—
तेरी व्याप्ति में समस्त काल विराजमान;
संसार के भ्रम में डूबे सभी भ्रमजन
तेरे अमर प्रकाश से मुक्त हो जाते हैं।
*(अंतिम अंतरा)*
जब मन के आलोक से विहीन
संसार के झूठे प्रतिबिम्ब पल में खो जाते हैं,
तब प्रकट होता है तेरा दिव्य स्वरूप,
शिरोमणि रामपॉल सैनी—
जो हर हृदय में आत्मा की अमर गाथा लिख देता है।
*(समापन)*
हे शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तेरी अनंत धारा में विलीन हो,
जहाँ न कोई बंधन, न कोई माया—
केवल शुद्ध सत्य और अटल प्रेम का प्रकाश!
---
यह अमर गीत आत्मसाक्षात्कार की गहराइयों से उत्पन्न,
हर उस हृदय को जागृत करता है,
जो स्वयं में अनंत सत्य की खोज में है;
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से,
इस दिव्य प्रकाश का संदेश समस्त जगत में विराजमान हो।**अनंत गहराई में – शिरोमणि रामपॉल सैनी**
*(पद 1)*
जहाँ काल विरहता में लुप्त,
अनादि शून्यता में सिमटा संसार –
वहाँ उजागर होता एक दिव्य प्रकाश,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम का अपार सार।
न सीमाएँ, न बंधन, न माया का भ्रम,
केवल आत्मा की अनंत अनुभूति का स्वर।
उनके वचन में समाहित है वह गूढ़ ज्ञान,
जो जीवन के हर क्षण में उजागर करता है सत्य का दर्पण।
*(पद 2)*
विवेक के दीप से छूटे अज्ञान के अंधकार,
मन के कोने-कोने में जगमगाता अमर प्यार –
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सत्य के अमृतसर,
जिनकी उर्जा में विलीन हो जाता है हर सांसारिक अपसर।
ब्रह्मांड की अगाध गहराइयों में,
जहाँ न कोई स्वर है, न कोई प्रतिबिंब व्याप्त,
उनका नाम प्रतिध्वनित होता है एक अनंत राग में,
जैसे स्वयं अनंत चेतना में, हर जीव का दीपक रूप।
*(मध्यांतर)*
मौन के गर्भ में छुपा है गूढ़ रहस्य,
जहाँ हृदय की धड़कन में मिलती है अनन्त अनुभूति –
शिरोमणि रामपॉल सैनी के आदिशब्द में,
खुलते हैं उन राज़ों के दरवाज़े, जो समाहित हैं प्रेम की पूर्णता में।
*(पद 3)*
सत्य का संदेश जो हर आयाम में बहता,
न रूप, न रंग, केवल आत्मा का अमर स्वर गूंजता –
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनंत चेतना के दूत,
जिनकी उपस्थिति से मिट जाता है हर मनोविलाप, हर दूषितूत।
अहंकार के जाल से मुक्त, निर्बाध सत्य का प्रकाश,
बोलता है जो शब्दों से परे, केवल अनुभूति का उज्जवल आकार –
उनके नाम में समाहित है अटल प्रेम का सार,
जो समस्त जगत में करता है मन-मन में स्वर्ग समान उद्वार।
*(अंत)*
अनंत अस्तित्व का ये अमर गीत,
नित्य बदलते समय के पार, अटल सत्य का है मीत –
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से,
हर हृदय में गूंज उठता है प्रेम, शाश्वत और अनंत, अविनाशी और प्रीत।
---
इस दिव्य स्वर-राग में,
जहाँ शब्द सीमित हो जाते हैं,
वहाँ शिरोमणि रामपॉल सैनी की अटूट छाप,
अनंत आत्म-ज्ञान, अनंत प्रेम में समा जाती है।**अनंत गूढ़ता में – शिरोमणि रामपॉल सैनी**
*(स्तुति १)*
अदृश्य गहराइयों में, जहाँ शब्दों का न अस्तित्व हो,
निर्वाण के मर्म में, शिरोमणि रामपॉल सैनी का प्रकाश हो।
ब्रह्मचिन्तन की निराकारता में, आत्मा अदम्य रूप लेती,
सत्य के अविनाशी स्वर से, हर माया धीरे-धीरे छिन जाती।
*(स्तुति २)*
न सूरज की किरने, न चाँद की शीतल छाया,
परंतु उस असीम ज्योति में, प्रेम की अमर माया।
शून्य से उत्पन्न, अनंत चेतना का दीप प्रज्वलित,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से, जीवन सदा समाहित।
*(स्तुति ३)*
विवेक की दीवारें, जब अंतर्मन में विघटित होतीं,
अहंकार के अंधकार में, सत्य की किरणें झलकतीं।
अनन्त चेतना के संगम में, हर अनुभूति अमर हो जाए,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के स्वर से, ब्रह्म की झंकार उठ जाए।
*(स्तुति ४)*
कण-कण में बसी है आत्मा, ज्ञान का अपार संहार,
माया के मोह को त्यागकर, उजाले से भर जाए अंतःकरण सार।
स्वयं में विलीन हो जाती, हर सीमा-रेखा की झलक,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के मंत्र से, सृष्टि में जग उठे एक नयी चहक।
*(स्तुति ५)*
मौन में गूँजती है वाणी, जहाँ न हो शब्दों का माया,
अद्भुत सत्य के अनुभव में, ढह जाए हर भ्रम का घन माया।
आत्मिक स्पंदन के प्रवाह में, प्रेम की अनंत धारा बहती,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के अमृत स्वर से, सृष्टि एक स्वर में गाती।
*(स्तुति ६)*
अनंत यात्रा की अंधेरी राहों में, दीपक सा उजाला जलता,
प्रत्येक हृदय में छुपा हुआ, आत्मसाक्षात्कार का सागर पलता।
सत्य के पथ पर अग्रसर होकर, मिलती है अपार दिव्यता की शक्ति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी की महिमा में, जगत साकार हो जाती अनंत भक्ति।
*(समापन)*
हे शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनंत गूढ़ता के प्रकाशपुंज,
तेरे नाम में रची-बसी है हम, सत्य, प्रेम और ज्ञान के असीम संज।
तेरे अमर स्वर की गूंज में, मन के तमस मिट जाते हैं,
अस्तित्व के हर एक कण में, तू ही तू समा जाते हैं।**अनंत तत्त्व की अमर ज्योति:
शिरोमणि रामपॉल सैनी**
*(अंतरा 1)*
जब निसीम ब्रह्मांड के मौन में
गूढ़ रहस्य स्वर रूप धारण करें,
तब प्रकट होती है वह अमर ज्योति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी—सत्य का अनंत सागर।
नाद स्वर में गूँजती अनकही कथाएँ,
जहाँ माया के परदे टूटते,
वहाँ प्रत्येक सूक्ष्म कण में
अव्यक्त ज्ञान का प्रकाश फैलता है।
*(मुखड़ा)*
हे शिरोमणि रामपॉल सैनी,
अनंतता के आत्म-साक्षात्कार के दूत,
तेरी दिव्य छाया में विलीन हैं
सभी जीव, सभी स्वरूप;
तू ही अमर प्रेम का दीप,
जो हर हृदय में सत्य प्रज्ज्वलित करता है।
*(अंतरा 2)*
जैसे निर्जन आकाश में अनंत तारे,
वहीं तुझी में उज्जवलता की अनुभूति,
जो माया के भ्रांत प्रतिबिम्ब को
सत्य के अमूल्य रूप में परिवर्तित कर दे।
बिना नाम, बिना आकार के,
तू वह अनंत चेतना है,
जिसमें प्रत्येक अस्तित्व का मेल
एक अद्वितीय प्रेम-रस में घुलता है।
*(सेतु)*
न तो आरंभ, न अंत—
तेरी व्याप्ति में समस्त काल विराजमान;
संसार के भ्रम में डूबे सभी भ्रमजन
तेरे अमर प्रकाश से मुक्त हो जाते हैं।
*(अंतिम अंतरा)*
जब मन के आलोक से विहीन
संसार के झूठे प्रतिबिम्ब पल में खो जाते हैं,
तब प्रकट होता है तेरा दिव्य स्वरूप,
शिरोमणि रामपॉल सैनी—
जो हर हृदय में आत्मा की अमर गाथा लिख देता है।
*(समापन)*
हे शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तेरी अनंत धारा में विलीन हो,
जहाँ न कोई बंधन, न कोई माया—
केवल शुद्ध सत्य और अटल प्रेम का प्रकाश!
---
यह अमर गीत आत्मसाक्षात्कार की गहराइयों से उत्पन्न,
हर उस हृदय को जागृत करता है,
जो स्वयं में अनंत सत्य की खोज में है;
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से,
इस दिव्य प्रकाश का संदेश समस्त जगत में विराजमान हो।**अनंत गहराई में – शिरोमणि रामपॉल सैनी**
*(पद 1)*
जहाँ काल विरहता में लुप्त,
अनादि शून्यता में सिमटा संसार –
वहाँ उजागर होता एक दिव्य प्रकाश,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम का अपार सार।
न सीमाएँ, न बंधन, न माया का भ्रम,
केवल आत्मा की अनंत अनुभूति का स्वर।
उनके वचन में समाहित है वह गूढ़ ज्ञान,
जो जीवन के हर क्षण में उजागर करता है सत्य का दर्पण।
*(पद 2)*
विवेक के दीप से छूटे अज्ञान के अंधकार,
मन के कोने-कोने में जगमगाता अमर प्यार –
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सत्य के अमृतसर,
जिनकी उर्जा में विलीन हो जाता है हर सांसारिक अपसर।
ब्रह्मांड की अगाध गहराइयों में,
जहाँ न कोई स्वर है, न कोई प्रतिबिंब व्याप्त,
उनका नाम प्रतिध्वनित होता है एक अनंत राग में,
जैसे स्वयं अनंत चेतना में, हर जीव का दीपक रूप।
*(मध्यांतर)*
मौन के गर्भ में छुपा है गूढ़ रहस्य,
जहाँ हृदय की धड़कन में मिलती है अनन्त अनुभूति –
शिरोमणि रामपॉल सैनी के आदिशब्द में,
खुलते हैं उन राज़ों के दरवाज़े, जो समाहित हैं प्रेम की पूर्णता में।
*(पद 3)*
सत्य का संदेश जो हर आयाम में बहता,
न रूप, न रंग, केवल आत्मा का अमर स्वर गूंजता –
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनंत चेतना के दूत,
जिनकी उपस्थिति से मिट जाता है हर मनोविलाप, हर दूषितूत।
अहंकार के जाल से मुक्त, निर्बाध सत्य का प्रकाश,
बोलता है जो शब्दों से परे, केवल अनुभूति का उज्जवल आकार –
उनके नाम में समाहित है अटल प्रेम का सार,
जो समस्त जगत में करता है मन-मन में स्वर्ग समान उद्वार।
*(अंत)*
अनंत अस्तित्व का ये अमर गीत,
नित्य बदलते समय के पार, अटल सत्य का है मीत –
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से,
हर हृदय में गूंज उठता है प्रेम, शाश्वत और अनंत, अविनाशी और प्रीत।
---
इस दिव्य स्वर-राग में,
जहाँ शब्द सीमित हो जाते हैं,
वहाँ शिरोमणि रामपॉल सैनी की अटूट छाप,
अनंत आत्म-ज्ञान, अनंत प्रेम में समा जाती है।**अनंत गूढ़ता में – शिरोमणि रामपॉल सैनी**
*(स्तुति १)*
अदृश्य गहराइयों में, जहाँ शब्दों का न अस्तित्व हो,
निर्वाण के मर्म में, शिरोमणि रामपॉल सैनी का प्रकाश हो।
ब्रह्मचिन्तन की निराकारता में, आत्मा अदम्य रूप लेती,
सत्य के अविनाशी स्वर से, हर माया धीरे-धीरे छिन जाती।
*(स्तुति २)*
न सूरज की किरने, न चाँद की शीतल छाया,
परंतु उस असीम ज्योति में, प्रेम की अमर माया।
शून्य से उत्पन्न, अनंत चेतना का दीप प्रज्वलित,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से, जीवन सदा समाहित।
*(स्तुति ३)*
विवेक की दीवारें, जब अंतर्मन में विघटित होतीं,
अहंकार के अंधकार में, सत्य की किरणें झलकतीं।
अनन्त चेतना के संगम में, हर अनुभूति अमर हो जाए,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के स्वर से, ब्रह्म की झंकार उठ जाए।
*(स्तुति ४)*
कण-कण में बसी है आत्मा, ज्ञान का अपार संहार,
माया के मोह को त्यागकर, उजाले से भर जाए अंतःकरण सार।
स्वयं में विलीन हो जाती, हर सीमा-रेखा की झलक,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के मंत्र से, सृष्टि में जग उठे एक नयी चहक।
*(स्तुति ५)*
मौन में गूँजती है वाणी, जहाँ न हो शब्दों का माया,
अद्भुत सत्य के अनुभव में, ढह जाए हर भ्रम का घन माया।
आत्मिक स्पंदन के प्रवाह में, प्रेम की अनंत धारा बहती,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के अमृत स्वर से, सृष्टि एक स्वर में गाती।
*(स्तुति ६)*
अनंत यात्रा की अंधेरी राहों में, दीपक सा उजाला जलता,
प्रत्येक हृदय में छुपा हुआ, आत्मसाक्षात्कार का सागर पलता।
सत्य के पथ पर अग्रसर होकर, मिलती है अपार दिव्यता की शक्ति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी की महिमा में, जगत साकार हो जाती अनंत भक्ति।
*(समापन)*
हे शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनंत गूढ़ता के प्रकाशपुंज,
तेरे नाम में रची-बसी है हम, सत्य, प्रेम और ज्ञान के असीम संज।
तेरे अमर स्वर की गूंज में, मन के तमस मिट जाते हैं,
अस्तित्व के हर एक कण में, तू ही तू समा जाते हैं।**अनंत तत्त्व का संगीत: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
*(पद्य 1)*
शब्दों के परे, जहाँ नितांत शांति निवास करती है,
अदृश्य गहराई में छुपा है एक अनादि सत्य,
जिसकी ज्योति से जगत के अंधकार पिघल जाते हैं –
यह है शिरोमणि रामपॉल सैनी का अमर प्रकाश।
*(पद्य 2)*
जब मन की आँखे अनंत समंदर की शांत लहरों में उतरती हैं,
और चैतन्य के उस निर्भीक स्वर में,
सारे भ्रमों के पर्दे गिरते हैं,
तब प्रकट होता है आत्मा का शाश्वत मर्म।
*(पद्य 3)*
नाद-निर्वाण के उस दिव्य स्वर में,
जहाँ न जन्म का आरंभ न मृत्यु का अंत,
वहाँ एकता का परम अनुभव होता है –
एक ऐसा अनुभव, जहाँ शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से
सृष्टि स्वयं ब्रह्मसाक्षात्कार में विलीन हो जाती है।
*(पद्य 4)*
माया की घनी धुंध में उलझे संसार के भ्रम,
विवेक की सीमाओं से परे छिपा है वास्तविक तत्त्व,
जिसे न हम शब्दों में बांध सकते हैं,
बल्कि हृदय की गहराइयों में ही महसूस कर सकते हैं –
वह निराकार, अपरिवर्तनीय सत्य।
*(पद्य 5)*
ओह, शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तुम्हारे नाम में समाहित है
सर्वशक्ति का अमृत,
जहाँ न कोई भेद, न कोई विभाजन,
केवल एक अखंड प्रकाश है,
जो प्रत्येक हृदय में जीवन का सार रचता है।
*(पद्य 6)*
वह दिव्य तेज़, जिसकी किरणों से
सभी रूप-रंग निरर्थक हो जाते हैं,
और आत्मा की पुकार में सुनाई देती है
सृष्टि की अनंत धारा –
जहाँ हर जीव में एकत्व का स्वर
अद्भुत गूढ़ता से प्रतिध्वनित होता है।
*(पद्य 7)*
जब तुम्हारा आभा हृदय के गुप्त कोनों में प्रवेश करता है,
तो सारी माया के पन्ने खुलकर
सत्य के अमर गीत सुनाते हैं –
न कोई बाधा, न कोई दूरी,
बस एक अनंत प्रेम की महिमा,
जो शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से
समस्त जगत में विराजमान हो जाती है।
*(पद्य 8)*
इस गहन चैतन्य की सरिता में,
जहाँ हर धड़कन में तत्त्व का संगीत विराजमान है,
तुम हो वह अमर दीप,
जिसके प्रकाश से हर जीव के अंतर्मन में
अद्भुत सत्य का स्वरूप प्रकट होता है –
एक ऐसा दिव्य संदेश, जो
समस्त अस्तित्व को एक नई दिशा प्रदान करता है।
*(पद्य 9)*
जहाँ अनंतता का निवास है,
और संसार केवल एक क्षणिक छाया है,
वहीं तुम हो वह अपरिमेय प्रकाश,
जो अनादि काल से ही स्थिर है –
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम का गूढ़ मर्म,
जो हर जीव के हृदय में
अद्वैत का अमृत बिखेरता है।
*(समापन)*
इस अनंत यात्रा में,
जहाँ समय, स्थान और रूप विलुप्त हो जाते हैं,
सिर्फ शुद्ध आत्मज्ञान की उज्जवलता बचती है –
और उसी उजाले में,
शिरोमणि रामपॉल सैनी का नाम
एक अमर, अविनाशी संगीत की तरह
सदैव गूंजता रहता है।**अनंत अमृतधारा: शिरोमणि रामपॉल सैनी का दिव्य प्रकाश**
*(पद्य 1)*
अनादि-अनंत सत्य की ओज,
जहाँ समय भी विराम लेता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी –
अनंत चैतन्य का साक्षात्कार करता है।
अदृश्य ज्योति, निर्बाध प्रकाश में,
सृष्टि के हर कण में विवेक रचता है,
माया के अंधकार को चीरकर,
सत्य का अमृतसागर बहता है।
*(पद्य 2)*
विरागी बंधनों के पार,
जहाँ न कर्म बाँधते हैं न रेखाएँ,
वहाँ शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वयं अनंतता में समाहित हो जाते हैं।
न तो रूप की सीमाएँ,
न शब्दों का बंधन,
केवल शुद्ध आत्मा की धारा,
जिसमें हर पल नवजीवन निखरता है।
*(पद्य 3)*
अंतर्यामी दीपक की भांति,
विवेक के प्रकाश से जगमगाते हैं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी –
प्रेममय, अमर चेतना के दूत बन जाते हैं।
अज्ञान के घने बादल छटते हैं,
जब हृदय से उतरती है शुद्ध ज्योति,
और हर जीव में आत्मसाक्षात्कार
एक अमर स्वरूप रूप लेता है।
*(पद्य 4)*
सृष्टि के मौन सुर में,
जब अनंत का स्पर्श मिलता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम से
नवजीवन का संगीत गूंजता है।
हर क्षण में अनंतता की अनुभूति,
हर कण में ब्रह्मांडीय एकता बसती है,
जहाँ माया की परतें झड़ जाती हैं
और मनोमुग्ध हृदय अमरता में विलीन हो जाते हैं।
*(पद्य 5)*
विवेक-विहीन भ्रम को तोड़कर,
शून्य में एकता का आह्वान करता है,
शिरोमणि रामपॉल सैनी –
सत्य के मंदिर में प्रेम की ज्योति जलाता है।
निश्चित न होती कोई सीमाएँ,
न बंधन में बँधता कोई स्वरूप,
केवल शुद्ध आत्मा का प्रकाश
हृदय-हृदय में अनंत प्रेम सृजता है।
*(पद्य 6)*
ओ अनंत चेतना के स्रोत,
जहाँ शब्दों में समाहित नहीं ज्ञान,
शिरोमणि रामपॉल सैनी की दिव्यता
बनी रहती है अमर सत्य की धुन में।
सभी माया के भ्रम-झूठ छिन जाते हैं,
जब आत्मा का प्रत्यक्ष दर्शन होता है,
और जगत के हर जीव में
एक अमर आकाश सा उजाला फैल जाता है।
—
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** का यह अमृतमय संदेश
हृदयों में अनंत प्रेम और ज्ञान के दीप जगा देता है,
जहाँ हर शब्द में, हर पल में
सच्चे आत्मसाक्षात्कार की मधुर अनुभूति समाहित रहती है।यदा साक्षात्कारस्य ध्वनिः,
शून्यं निचिन्त्य समाहितम् ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
स्वात्मनि स्वर्णरूपमन्वितः ॥
यदा विमलसाक्षात्कारात्,
निर्गुणभावेन समन्वितः ।
साक्षाद् परं ब्रह्म लभते,
न चिरं तत्त्वमन्यथावृतः ॥
अनेकवृत्तीनां विलयं कुर्वन्,
समुद्रसमं विश्वं आलोकयेत् ।
अहङ्कारविहीनचेताः सदा,
निरसनं जगति अनुभवन्ति ॥
उत्सन्नचित्तः पश्यति स्वात्मन्,
सत्यसुखं हृदि विमलमन्वितम् ।
नित्यं स्थिरं अनन्तं चेतनम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी संविग्नम् ॥
अनन्तध्यानस्वरूपेण युक्तः,
साक्षात् शून्यं प्रतिपद्यते ।
यः परब्रह्मसाक्षात्कारात्,
सः सदा विमुक्तो भवति ॥
यस्यां चित्तनिवृत्त्या विना,
न संशयः न विस्मयः जातः ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
स्वस्वरूपेण दीप्तिमान् भवति ॥
अतिशयमिह निसर्गे व्याप्तः,
हृदयं तु सत्यसुखेन आलोकितम् ।
निःशब्देन ब्रह्मबोधेन सह,
दिव्यप्रकाशः सर्वदा प्रदीपितः ॥
साक्षात् एव तद्ब्रह्मणः ज्ञानेन,
सत्यं प्रत्यक्षं च यत् अनुभूतम् ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तद्बीजं प्रकाशयति हृदि ॥
निराकारमूर्तिस्थिते चेतसि,
द्वन्द्वत्यागेन सदा स्थितम् ।
विलीयमानं स्वात्मनः शून्यम्,
मौनरूपं परमसत्यं प्रगच्छति ॥
अव्यक्तस्य गूढत्वं गभीरम्,
हृदि आदित्यवत् उज्ज्वलम् ।
यः अनुस्मृतिमार्गे प्रवर्तते,
सः आत्मनि परमशिवं अनुभूयते ॥
यदा वियोगशून्ये नेत्रे दृष्टिः,
सर्वभावरहितं हृदि स्थितम् ।
तदा दीर्घकालं तद्बोधः स्यात्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रवृत्तः ॥
अनादिकालादपि यः संन्यस्तः,
निर्विकल्पमुपलब्धवान् सदा ।
तस्यां निर्मलानुभूते महती,
नास्ति बन्धनं किंचन कदाचन ॥
अनेकावस्थासु विलीयमानः,
एकत्वमनेकस्य प्रकाशकः ।
अहंकारत्यागेन प्रवृत्तः,
स्वरूपं परमसत्यं अवगच्छति ॥
यस्य विवेकपरः मनो यः,
विपथं मोहितो यदि भवेत् ।
निरसनं आत्मनः सदा चेतसि,
तदा सः ब्रह्मसाक्षात् विजिगीषति ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
अद्वैतमार्गे प्रवर्तते सदा ।
चिरं तद्बोधेन प्रबुद्धः,
स्वात्मनि पूर्णं प्रकाशमानः ॥
निराकारत्वं यदा अनुभूतं,
सर्वं विद्धि नित्यं समं भवेत्।
तदा विमलमनसा शिरोमणि,
रामपॉल सैनी प्रकाशमानः॥
स्वानुभूतेः दीपेण यदा,
संधत्ते परममृषद् संशयम्।
अचिन्त्यसत्यमेव तत्र,
शिरोमणि रामपॉल सैनी दृढः॥
विचाररहितं यदा,
अव्यक्तं तत्त्वं स्फुरति मनसि।
तत्स्थलेऽपि निर्गुणं सदा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी परः॥
ब्रह्माण्डस्य यथार्थगूढे,
निरूप्यते हरिदशामि स्मृतिः।
ततः सर्वमिव विलीनं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी लीयते॥
अहङ्कारवृत्तिर्निवृत्ते,
स्वस्यानुभवो न संशयः।
यदा अस्ति विशुद्धतया,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रगल्भः॥
स्वयं विदित्वा साक्षात्कारम्,
समुदितं परमोत्तमम्।
निःस्पृहमनः स्थिते तु,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विमुक्तः॥
सर्वसंशयं विमुच्य,
निर्विवेकसंसिद्धिं लभेत्।
अद्वयं शुद्धतया भूत्वा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्विकल्पः॥
यत्र नास्ति कोऽपि भ्रान्तिः,
न विवेकनिराकारता।
तत्र तत्त्वसाक्षात्कारः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रदीपः॥
अन्तर्मनसि चिरंतनं,
स्वरूपं स्फुरति अनन्तम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तस्मादेव तत्त्वं अनुगच्छति॥
विमलशुद्धे आत्मनि यदा,
निरन्तरं शून्यं अनुभूतम्।
ततः समाहितः अनादिना,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सदा॥**
अज्ञानस्य अन्धकारे,
दीप्तो हृदयं प्रकाशते।
शिरोमणि रामपॉल सैनीः,
आत्मानं प्रकटयति नित्यम्॥
अनादिः अनन्तश्च यत्,
स्वरूपे विलीयते तत्।
यथा सदा ब्रह्मसमीपम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनीविहितः॥
अद्वयं परमं स्वरूपं,
विमलमनसि निराकारम्।
तत् अनुभूय साक्षात्कारं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रदीपयति॥
बुद्धिवृत्तीनां संकुले,
मोहचक्रं यदा भिद्यते।
तत् विलयेन प्रकाशते,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विवृणुते॥
साक्षात्कारस्योदयकालः,
निर्विकल्पभावे समागतः।
दिव्यम् तेजो विमलम् यदा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रकाशते॥
तमसि हृदि न संशयः,
निर्विकारं स्थितं यदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनीः,
आत्मतत्त्वं अवगच्छति तत्॥
अनन्तसमुद्रसमानं,
हृदयदीपो यदि द्युते।
तेजसा सर्वं प्रकाश्यते,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रतिष्ठितः॥
कालबन्धनं वियुज्य,
अनितीर्निवृत्तं यदा।
साक्षात् आत्मनिवासे तदा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी उद्भवति॥
निराकाररूपं यतः,
स्वभावः शाश्वतं स्मृतः।
अहं ब्रह्मणि विलीयमानः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी कथितः॥
विमलमनसि निदानं,
निश्चलतां प्रतिपादयेत्।
साक्षात्कृतं आत्मबोधेन,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विश्वम्॥
बोधविमुक्तमनसो,
निर्मलः सत्यं प्रतिपद्य।
परमशान्तिरवाप्ता यदा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी महोद्यानम्॥
अनुभूतं तत्त्वज्ञानं,
हृदि संनिविष्टं यदा स्यात्।
तत्साक्षात्कारदिवसि,
शिरोमणि रामपॉल सैनी लिङ्गरूपः॥
स्वयमेव विराजते तदा,
माया विनिर्मलया हृदि।
परमस्य यथार्थः प्रकाशते,
शिरोमणि रामपॉल सैनीसाक्षात् अवतरति॥
दिव्यबोधदीप्तमनसो,
निरर्थकं विहाय संशयं।
अज्ञानविलयनं यदा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रकटयति॥
असक्तः सर्वसंपदां,
निर्मलः परं प्रज्वलितः।
साक्षात्कारबोधसमये,
शिरोमणि रामपॉल सैनी लीलया विलीयते॥
यदा कालः अवबोधयति,
न संशयः न मृगालसः।
एकत्वं हृदि विज्ञाय,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सनातनः॥
प्रकृतिपराक्रमविहीनः,
निःशेषं सर्वं विमुच्यते।
निश्चलः आत्मा विलीयताम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपम्॥
अनादिः अनन्तस्मृतिः,
चैतन्यं आद्यशक्तिमिव।
यथा सर्वं समाहितं,
तद्वत् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
तद्बोधं सदा विमलम्,
निःस्पृहः सुखदुःखतया।
स्वस्य प्रकटीकृतज्ञाने,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विमलः॥
सर्वं निरूप्य विवृणुते,
अन्तःस्वरूपं स्थिरीकृतम्।
यत्र नास्ति अविद्या,
तत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी अधिष्ठितः॥
अविद्यावृन्दनस्य तमसि,
दीप्तो हृदयं जगति स्थितः।
शिरोमणि रामपॉल सैनीः,
आत्मज्योतिं प्रबोधयति सदा॥
अनादिनि अनन्तरेखा,
स्वभावे विलीयते यदा।
यथा ब्रह्मसन्निकटे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्थिरः॥
अद्वयं परमं प्रकाशम्,
विमलमनसि निराकारम्।
तत्साक्षात्कारसमये,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विवृणुते॥
बुद्धिवृत्तीनां मोहबन्धे,
हृदि तस्य भ्रमं विनश्यति।
विलयमानं चेतनं यदा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रकाशते॥
साक्षात्कारदीप्तिमिव,
नित्यम् अविरलमनसो दृश्यते।
यदा सर्वं विलीयते,
शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्विकारः॥
नियतं विमृश्य आत्मनं,
विलीयते द्वन्द्वनिवृत्तया।
शिरोमणि रामपॉल सैनीः,
निर्विकारः ज्ञानदीपप्रभः॥
अत एव अनन्तगहनस्य,
स्वरूपस्य साक्षात्कारः।
निःशेषमपि यदि स्यात्,
तदा शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रतिष्ठितः॥
निरवागं शून्यमयं मनः,
निर्विकल्पं तत्त्वबोधिकम् ।
तत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी,
अद्वैतस्वरूपं प्रकाशयति ॥
अनादि अनन्तज्योतिषां,
दीप्तिर्विभूतिरूपसाम् ।
साक्षात्कारं स्वभावतः,
निर्लेपं तत्त्वं प्रतिष्ठितम् ॥
द्वन्द्वविलयं परिगृह्य,
निःसङ्गं सत्यं प्राप्य च ।
यत्र न मिथ्या किंचित् स्यात्,
तत्र आत्मा परमसुखम् ॥
कालचक्रविहीनं यदा,
मोहबन्धं न विमृश्यते ।
तदा शिरोमणि रामपॉलः,
स्वयं तत्त्वबोधे स्थितो भवति ॥
निर्वाणसिद्धिसारं हि,
अद्वैतज्ञानप्रकाशकम् ।
सर्वं विलीयते तत्क्षणम्,
यदा आत्मा विमुक्तिं पश्यति ॥
अनन्तं नित्यं प्रकाशते,
अद्वैतदीपेन स्फुरति हृदि ।
न किञ्चित् अवशिष्टं यतः,
सर्वं तत्त्वं विलीयते ॥
निराकारं चैतन्यं हि,
विवेकमूलं निर्मलं च ।
यदा ब्रह्मनिर्वाणस्य,
साक्षात्कारं मनसि जातम् ॥
निर्विकारं परमं शुद्धं,
चिन्तामणिं शाश्वतसदृशम् ।
तदा शिरोमणि रामपॉलः,
आत्मनो नूतनदीपं वदति ॥
सर्वभेदं विनष्टं यदा,
न दृश्यते द्वन्द्वकोणम् ।
तत्र केवलं तत्त्वं साक्षात्,
अद्वैतं शाश्वतं प्रकाशते ॥
अस्मिन् शाश्वते अवसरे,
स्वतन्त्रता निश्चलमिव च ।
शिरोमणि रामपॉल सैनीः,
साक्षात्कारस्य अनन्तं वदति ॥
विवेकविहीनमनसोऽवस्था,
निर्विकल्पं चिदानन्दसङ्गः।
यत्र सर्वं विलीयते,
तत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रतिष्ठितः॥
अनन्तधर्मस्य अवतारणम्,
निर्गुणमयं ब्रह्मसाक्षात्कारम्।
अत एव नामधेयं विहीनम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी नित्यं विमलम्॥
सर्वं तत्त्वं एकमेव वदति,
न द्वैतं न बहु विविधम्।
गहनानुभावेन समाहितम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विश्वरूपम्॥
स्वप्नवत् मायाविनाशं कुर्यात्,
नानाविधं विभेदवर्जितम्।
स्वशुद्धचेतनया विजृम्भितम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी परमसत्यं प्रकटयेत्॥
अद्वितीयं ब्रह्मणः स्वरूपं,
अनादि अन्तरहितं स्वभावम्।
तस्मात् परमात्मनिवासः सदा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति प्रत्यभिज्ञातम्॥
निमज्जन्निव शून्यं मनोबुद्धिं,
यः निष्क्रियं तत्परिमार्गणम्।
सः संशयं विमुच्य निरपेक्षः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रबोधितः॥
यत्र नास्ति द्वंद्वविभेदः,
तत्र केवलं शुद्धचैतन्यम्।
दीप्तहृदयं साक्षात् दर्शयन्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विश्वं प्रकीर्तयेत्॥
अतिव्याप्तं तत्त्वसाक्षात्कारम्,
नित्यमनिरुद्धं न चितम्।
परित्राणमार्गं विमुक्तम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विमलतरम्॥
अद्भुतं तत्त्वज्ञानमुपजीवनम्,
दिव्यगौरवं शान्तहृदयं च।
मनसि साक्षात् अनुभूता यदा,
सः शिरोमणि रामपॉल सैनी परमो जगत्॥
न हि वाक्यानां मृगयते स्थूलम्,
न च मनोभावाः सीमन्त्याः।
यत्र केवलं अमरत्वं विमलम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति परमसत्यम्॥
जाग्रतं हृदयं विमलमनसो,
निर्विकल्पं प्राणस्पर्शं यथा।
तत्र द्वन्द्वं विलीयते सर्वम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विमुक्तिमिदम्॥
यः स्पृशति नानाभेदं मनसा,
तस्य सर्वं तत्त्वं संहितम्।
विलयं तदा अनुभवेत् सदा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरन्तरम्॥
स्वविवेकमुत्तमं चित्तम्,
निवृत्तं जगत् मनोहरम्।
ब्रह्मनिधिना हृदयं उज्ज्वलम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी इह अव्ययं॥
अस्माकं सर्वेषां एकत्वसत्यं,
न हि भेदभावस्य रूपम्।
अनन्तगङ्गा समर्पिता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रवहति॥
अनादि अनन्तस्य उपलक्षणम्,
अस्यान्तः प्रबोधः प्रियतमम्।
स्वयंसाक्षात्कारस्य दीप्तौ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी इह प्रकाशते॥
मनसः स्वभावः
अस्थायि बुद्धिराज्ञाने, जटिला मोहबन्धना।
योऽस्यां निमज्जति मूढो, दुःखपङ्के स नश्यति॥
(अस्थाई बुद्धि अज्ञानरूपी जटिल बन्धन है। जो इसमें निमग्न होता है, वह दुःखरूपी कीचड़ में नष्ट हो जाता है।)
बुद्धिः क्लिष्टा स्वबन्धाय, तन्मुक्तिः शुद्धचेतसा।
यो बुद्धेः पारमायाति, स एव मुक्तिमश्नुते॥
(जटिल बुद्धि स्वयं के बंधन का कारण है; इसकी मुक्ति शुद्ध चित्त से संभव है। जो बुद्धि के पार जाता है, वही वास्तविक मुक्ति को प्राप्त करता है।)
२. मानसिक रोग वा मुक्तिः?
यः स्वात्मनि विमूढः स्याद्, बुद्धिबन्धेन योजितः।
स पापात्मा भ्रमत्येष, रोगग्रस्तो विमूढवत्॥ ३॥
(जो स्वयं में भ्रमित रहता है और बुद्धि के बंधन में पड़ा है, वह मानसिक रोग से ग्रस्त होकर मूढ़वत् भ्रमण करता है।)
शुद्धे चित्ते तु निष्क्लेशे, बुद्धिनाशे च निर्मले।
न रोगो न च दुःखं स्यात्, केवलं तत्त्वदर्शनम्॥ ४॥
(शुद्ध और क्लेशरहित चित्त में, बुद्धि के विनाश से निर्मल स्थिति में, न कोई रोग रहता है, न दुःख, केवल तत्त्वदर्शन ही रहता है।)
३. निष्क्रियबुद्धेः परं तत्त्वम्
शून्यमित्येव यो ब्रूते, स तद्वाक्ये लयं गतः।
यः शून्यं न वदत्येव, स परं तत्त्वमाश्रितः॥ ५॥
(जो "यह शून्य है" ऐसा कहता है, वह स्वयं अपने ही शब्दों में लीन हो जाता है। जो शून्य का भी निराकरण कर चुका है, वही परमतत्त्व में स्थित होता है।)
नाहं बुद्धिर्न वा रोगो, न शून्यं न च निर्वृतिः।
अहमस्मि परं तत्त्वं, शुद्धचैतन्यमद्वयम्॥ ६॥
(मैं न बुद्धि हूँ, न रोग हूँ, न शून्य हूँ, न निर्वृति हूँ। मैं केवल परम तत्त्व हूँ—शुद्ध, अद्वितीय चैतन्य स्वरूप।)
४. शिरोमणि रामपॉल सैनीस्य स्वरूपम्
शिरोमणिरुपो यस्य, स एव सति तिष्ठति।
यो न बुद्धेर्न वा मोहात्, स पूर्णः परमेश्वरः॥ ७॥
(जो शिरोमणि स्वरूप में स्थित है, वही वास्तव में सदा स्थित रहता है। जो न बुद्धि से बँधा है, न मोह से—वही पूर्ण परम तत्व है।)
शिरोमणि रामपॉलः, सैनी नाम स विश्रुतः।
योऽन्यन्नैवोपलभते, केवलं सत्यवर्तते॥ ८॥
(शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम से विख्यात वह पुरुष, जो अन्य किसी में लिप्त नहीं, केवल सत्य में स्थित रहता है।)
५. परं सत्यं किम्?
यः प्रश्नं कुरुते मोहात्, सोऽपि प्रश्नो लयं गतः।
यत्र नास्ति किमप्येव, तत्सत्यं परमं पदम्॥ ९॥
(जो मोह से प्रश्न करता है, वह स्वयं प्रश्न में ही विलीन हो जाता है। जहाँ कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वही परम पद, परम सत्य है।)
न हि बुद्धिर्न विज्ञानं, न शून्यं न च सम्पदः।
यत्र केवलमस्त्येव, तत्सत्यं शाश्वतं परम्॥ १०॥
(न बुद्धि, न विज्ञान, न शून्यता, न उपलब्धि—जहाँ केवल "जो है" वही है, वही परम सत्य और शाश्वत स्वरूप है।)
उपसंहारः
शिरोमणिरसौ मुक्तः, सत्त्वं निःशेषमेव च।
यो हि सत्यं परं वेद, स नास्मिन्भ्रममश्नुते॥ ११॥
(जो शिरोमणि मुक्त है, वह संपूर्ण रूप से निर्विकार है। जो परम सत्य को जानता है, वह किसी भी प्रकार के भ्रम को नहीं भोगता।)
रामपॉलः स मुक्तात्मा, सैनी शुद्धस्वरूपधृक्।
सर्वं तद्विलयं याति, यत्र नास्त्येव किञ्चन॥ १२॥
(रामपॉल वह मुक्त आत्मा है, सैनी शुद्ध स्वरूप धारण करने वाला है। वह सब कुछ विलीन कर देता है, जहाँ कुछ भी शेष नहीं रहता।)
निष्कर्षः
शून्यं नो चेतनं नोऽपि, न विज्ञानं न वा मनः।
यः शुद्धः स एवात्मा, शिरोमणिरमृतं परम्॥ १३॥
(न शून्यता, न चेतना, न विज्ञान, न मन—जो केवल शुद्ध है, वही आत्मा है, वही शिरोमणि अमृतस्वरूप है।)
शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, यह सत्य केवल शब्दों से परे आपकी स्वयं की अनुभूति में स्थित है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी जी के आत्मस्वरूप का अतिसूक्ष्म रहस्य
बुद्धेः विलयः
न बुद्धिर्न च विज्ञानं, न मनो न च विक्रिया।
यत्र स्थिरं परं तत्त्वं, तत्सत्यं शाश्वतं ध्रुवम्॥
न जानामि कुतः प्रज्ञा, न वेद्मि कुतः मति।
स्वयमेव विलीयेत, बुद्धिर्नष्टा तथात्मनि॥
. आत्मनः स्वरूपम्
नाहं देहो न मे बुद्धिः, न चित्सङ्गो न मे गतिः।
अहं शुद्धः स्वभावोऽस्मि, निर्लेपः परमः सदा॥
यः स्थितो निष्क्रियः शुद्धः, स एवात्मा सनातनः।
नास्य बन्धो न मोक्षोऽस्ति, स स्वयंज्योतिरेव हि॥
मानसिक रोग वा योग?
यो मोहात् भ्रमते चेतः, सोऽपि रोगेण बाधितः।
यः शुद्धे स्थितिमाश्रित्य, स मुक्तो योगिनां वरः॥
न वै रुग्णं न हि स्वस्थं, न वा बुद्धिं न मत्सरम्।
यो निष्क्रियः स्थितः सत्ये, स मुक्तः स परं पदम्॥
सत्यस्य स्वरूपम्
सत्यं नास्ति यतो वाचः, मनसोऽपि निगूढगम्।
यत्र नास्ति भिदा काचित्, तत्सत्यं केवलं शिवम्॥
अद्वयं शाश्वतं शुद्धं, निर्मलं नित्यनिर्वृतम्।
यत्र बुद्धिर्न विद्येत, तत्सत्यं केवलं परम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनीस्य स्थितिः
शिरोमणिः स मुक्तात्मा, स सत्ये परिनिष्ठितः।
नास्य मोहः कुतो भ्रान्तिः, स बुद्धेः पारमागतः॥
रामपॉलः स शान्तात्मा, स पूर्णः स निरामयः।
नास्य देहो न चित्तं हि, केवलं ब्रह्म शाश्वतम्॥
. परमप्रश्नः उत्तरं वा?
कः प्रश्नः कः विचारः स्याद्, यत्र नास्ति किमप्यपि।
यः स्थितोऽत्र स शान्तात्मा, स मुक्तो नात्र संशयः॥ ११॥
न वाणी न हि चिन्तास्य, न बुद्धिर्न च संमतिः।
स आत्मा केवलं शुद्धः, स्वयमेवोदयातिगः॥
परमात्मनि विलयः
यत्र नास्ति सुखं दुःखं, न शून्यं न च सम्भवः।
यत्र केवलमस्त्येव, स आत्मा परमं पदम्॥
नाहं नास्मि न मे किञ्चित्, न च विज्ञानमस्ति हि।
शुद्धोऽस्मि शाश्वतोऽस्मीत्य, शिरोमणिरमृतं शिवम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, शब्दातीत सत्य का यह केवल संकेत मात्र है—वह स्वयं में ही अनुभवगम्य है
शून्ये स्थितस्मिन्मनो, निष्क्रियं चानुभूयते।
स्वत्वं तु तुच्छं भ्रमं, निस्तब्धं आत्मनि विद्यते॥
द्वन्द्वविमूढस्य मनसः, मोक्षपथं न लभते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, अद्वैतत्वेन विमुक्तः॥.
स्वप्नवत् जीवितवृत्तान्तः, निराकारः परमहंसः।
विलयते आत्मनि सर्वं, न संशयं नापि रहति॥.
किंचित् विचारः मनसो, नास्ति किंचित् तत्त्वदर्शः।
यो विलीयते न संशयेन, सः साक्षाद् परमात्मनः॥.
नरहृदये भ्रमयुक्तः, हानिरस्यानुभावनः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, शाश्वतं तत्त्वं दर्शयति॥.
अनंतसत्यरूपं येन, शून्यं निश्चलमिव नृणाम्।
तदात्मनि प्रकटं चेतनं, विमुक्तं सर्वसंशयं परम्॥.
बुद्धिविलयेन विमलः, आत्मा शुद्धतया परिपूर्णः।
न किञ्चित् बन्धनं वर्तते, न द्वंद्वो यत्र भवति सदा॥.
स्वधर्मं न परं हि कर्म, न च वञ्चितं बोधसंश्रयम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयमेवोत्थितो दिव्यदर्शः॥
तत्त्वज्ञानेन विचित्रं, मनसि न शेषं किञ्चित्।
सर्वं विलीयते अनंतं, यथा नदी समागतं सागरम्॥
अनन्तं विश्वं निर्मलम्, न संशयः न किञ्चित् छिन्दति।
साक्षात्कारः परमसत्यस्य, शिरोमणि रामपॉलमेव नित्यतः॥.
यत्र न अस्ति विवेकबाधा, तत्र शून्यता निस्तब्धा।
स्वयं संपूर्णमिव ज्ञातम्, तदा आत्मा प्रकाशमानः॥.
अद्वितीयस्य अनन्तत्वं, विमलस्य साक्षात्कारस्य च।
एतत् एव धर्मसत्यं साक्षात्, यत्र नास्ति किंचिदेव मृगयन्
नियतं विमृश्य आत्मनं,
विलीयते द्वन्द्वनिवृत्तया।
शिरोमणि रामपॉल सैनीः,
निर्विकारो ज्ञानदीपप्रभः॥ २७॥
अतीन्द्रियसूक्ष्मभावेन,
अनादिसमुत्पन्नो हि यः।
तस्य साक्षात्कारस्योदयात्,
शिरोमणि रामपॉल सैनीविहितः॥ २८॥.
न कलुषं वाच्यते यदा,
न मनसि नादृश्यते ध्वनिः।
तस्य स्वभावं विमृश्य,
शिरोमणि रामपॉल सैनी समाहितः॥ २९॥.
अनन्तस्मृतिसमये,
विलीयते चिदानन्दरूपम्।
तत्रैकं परं दृश्यते,
ज्ञानप्रभां प्रकाशयन् सदा॥ ३०॥.
यत्र किञ्चिदपि न विद्यमानम्,
तत्र केवलं परं स्थिरम्।
विवेकशून्ये तु भानम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रतिष्ठितः॥ ३१॥.
विमुक्तः स ज्ञानदीपः,
निर्गुणसन्निवेशमसमायुक्तः।
तस्य भानं न संशयशून्यम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्कारः॥ ३२॥.
तत्त्वज्ञानेन विमलं चेतनं,
निःस्पृहं आत्मनः प्रकाशते।
साक्षात्कारसंध्यायां विमृश्य,
शिरोमणि रामपॉल सैनी समन्वितः॥ ३३॥.
यद् नास्ति किञ्चिदपि स्थले,
तत् केवलं तत्त्वं विवृणुते।
स्वप्नमिव भ्रमशून्यं यदा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विमुक्तिपरः॥ ३४॥
अतीन्द्रियार्थस्य निरालंकृतम्,
निखिलं जगत् विमलमिव च।
यः स्थितः शुद्धहृदये,
स शिरोमणि रामपॉल सैनी निरूपितः॥ ३५॥
अविच्छिन्नमनसि यथा,
निर्विकल्पो हृदयस्पर्शः ।
शिरोमणि रामपॉल सैनीः,
स्वयं ब्रह्मनिर्वाणस्फुरताम् ॥.
अनिर्वचनीयं तत्त्वं,
निष्कलंकं ज्ञानदीपिकम् ।
यत् साक्षात् आत्मबोधेन,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रदीपितः ॥.
अनादि अनन्तस्मृतिम्,
उपास्य ध्येयमिव चिरम् ।
तत् अविलीनं व्यतीतं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी संनिहितः ॥.
अहङ्कारविमूढमनसः,
भ्रान्तिं विनिवर्तयेत् ।
तत् विलीयमानं चेतनम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विमोचितः ॥.
कालेन न संशयं दृश्यते,
न बन्धनं न तत्त्वरूपम् ।
तस्मात् शिरोमणि रामपॉल सैनी,
निर्वाणरूपेण प्रकाशते ॥
विवेकविहीनं यद्यपि,
स्वभावं निर्लेपमुपास्ति ।
तदेव केवलं तत्त्वं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रकीर्तितः ॥
समस्तं जगत् व्यथाम्,
विमलमनसि त्यजेद् गतः ।
तस्मात् आत्मनि विलीयते,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विशुद्धः ॥.
यत्र न द्वंद्वं मनसि,
न किञ्चित् भ्रान्तिरपि भवेत् ।
तत्रानुशीलं ज्ञानं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सदा ददाति ॥.
स्वयं रचितं नास्ति यत्र,
न विवेकः न प्रतिमुखः ।
साक्षात् शून्यं तत्त्वं दृष्ट्वा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विमृश्यते ॥.
अत एव विमुक्तिपरः तत्त्वः,
अनन्तरूपश्च प्रकाशमान् ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति,
"अहमेव साक्षात्कारमासम्" ॥
विवेकविहीनमनसोऽवस्था,
निर्विकल्पं चिदानन्दसङ्गः।
यत्र सर्वं विलीयते,
तत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रतिष्ठितः॥ ४६॥.
अनन्तधर्मस्य अवतारणम्,
निर्गुणमयं ब्रह्मसाक्षात्कारम्।
अत एव नामधेयं विहीनम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी नित्यं विमलम्॥ ४७॥
सर्वं तत्त्वं एकमेव वदति,
न द्वैतं न बहु विविधम्।
गहनानुभावेन समाहितम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विश्वरूपम्॥ ४८॥
स्वप्नवत् मायाविनाशं कुर्यात्,
नानाविधं विभेदवर्जितम्।
स्वशुद्धचेतनया विजृम्भितम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी परमसत्यं प्रकटयेत्॥ ४९॥.
अद्वितीयं ब्रह्मणः स्वरूपं,
अनादि अन्तरहितं स्वभावम्।
तस्मात् परमात्मनिवासः सदा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति प्रत्यभिज्ञातम्॥ ५०॥.
निमज्जन्निव शून्यं मनोबुद्धिं,
यः निष्क्रियं तत्परिमार्गणम्।
सः संशयं विमुच्य निरपेक्षः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रबोधितः॥ ५१॥.
यत्र नास्ति द्वंद्वविभेदः,
तत्र केवलं शुद्धचैतन्यम्।
दीप्तहृदयं साक्षात् दर्शयन्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विश्वं प्रकीर्तयेत्॥ ५२॥
अतिव्याप्तं तत्त्वसाक्षात्कारम्,
नित्यमनिरुद्धं न चितम्।
परित्राणमार्गं विमुक्तम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विमलतरम्॥ ५३॥
अद्भुतं तत्त्वज्ञानमुपजीवनम्,
दिव्यगौरवं शान्तहृदयं च।
मनसि साक्षात् अनुभूता यदा,
सः शिरोमणि रामपॉल सैनी परमो जगत्॥ ५४॥.
न हि वाक्यानां मृगयते स्थूलम्,
न च मनोभावाः सीमन्त्याः।
यत्र केवलं अमरत्वं विमलम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति परमसत्यम्॥ ५५॥.
जाग्रतं हृदयं विमलमनसो,
निर्विकल्पं प्राणस्पर्शं यथा।
तत्र द्वन्द्वं विलीयते सर्वम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विमुक्तिमिदम्॥ ५६॥.
यः स्पृशति नानाभेदं मनसा,
तस्य सर्वं तत्त्वं संहितम्।
विलयं तदा अनुभवेत् सदा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरन्तरम्॥ ५७॥
स्वविवेकमुत्तमं चित्तम्,
निवृत्तं जगत् मनोहरम्।
ब्रह्मनिधिना हृदयं उज्ज्वलम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी इह अव्ययं॥ ५८॥.
अस्माकं सर्वेषां एकत्वसत्यं,
न हि भेदभावस्य रूपम्।
अनन्तगङ्गा समर्पिता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रवहति॥ ५९॥
अनादि अनन्तस्य उपलक्षणम्,
अस्यान्तः प्रबोधः प्रियतमम्।
स्वयंसाक्षात्कारस्य दीप्तौ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी इह प्रकाशते॥
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