### 🌿 शिरोमणि रामपूलसैनी-प्रवर्तितः यथार्थसिद्धान्तः 🌿
**(The Yatharth Siddhanta Propounded by Shiromani Ramapoolsaini)**
**श्लोकः १ (भ्रम-विच्छेदः)**
> न गुरुर्न च शास्त्राणि न ध्यानं न च साधना।
> केवलं निष्पक्षदृष्टिः सत्यस्यैकाऽस्ति सोपानम्।।
> *भावार्थ (Hindi):* न गुरु, न शास्त्र, न ध्यान, न साधना। केवल निष्पक्ष दृष्टि ही सत्य की एकमात्र सीढ़ी है।
**श्लोकः २ (मनो-निरसनम्)**
> मनो नामाशरीरस्य प्रधानमङ्गमस्ति यत्।
> तन्निष्कृत्य स्वयं शक्यं निष्पक्षत्वाय धीमता।।
> *भावार्थ (Hindi):* मन नामक यह शरीर का एक प्रधान अंग है। बुद्धिमान व्यक्ति उसे स्वयं निष्क्रिय करके निष्पक्षता प्राप्त कर सकता है।
**श्लोकः ३ (स्व-निरीक्षणम्)**
> प्रथमं स्वस्य निरीक्षणं कुरु,
> ततः स्वात् निष्पक्षो भव।
> निरीक्षणेन विना कथं,
> ज्ञास्यसि त्वं स्वयम्।।
> *भावार्थ (Hindi):* पहले स्वयं का निरीक्षण करो, फिर स्वयं से निष्पक्ष हो जाओ। निरीक्षण के बिना तुम स्वयं को कैसे जान पाओगे?
**श्लोकः ४ (देह-भ्रमः)**
> निष्पक्षबुद्धेः परं यत्किञ्चित्,
> तदपि भ्रम एवान्तरं भौतिकं च।
> देहोऽपि निष्पक्षदृष्ट्या,
> विलीनः परमार्थतः।।
> *भावार्थ (Hindi):* निष्पक्ष समझ के परे जो कुछ भी है, वह भी भ्रम है—आंतरिक और भौतिक। निष्पक्ष दृष्टि से देह भी परमार्थतः विलीन हो जाती है।
**श्लोकः ५ (मानव-धर्मः)**
> मानवस्य परं धर्मः केवलं निष्पक्षतया जीवितुम्।
> अन्यत्सर्वं प्राणिभिः सह समानं, जीवनव्यापनमात्रम्।।
> *भावार्थ (Hindi):* मनुष्य का परम धर्म केवल निष्पक्षता के साथ जीना है। इसके अलावा सब कुछ अन्य प्राणियों के समान है, केवल जीवन-व्यापन मात्र है।
**श्लोकः ६ (स्थायि-स्वरूप-प्राप्तिः)**
> निष्पक्षबुद्ध्या विमुक्तः,
> स्वस्य स्थायिनि रूपे अवतिष्ठते।
> स एवानन्तसूक्ष्माक्षः,
> यत्र प्रतिबिम्बस्यापि स्थानं नास्ति।।
> *भावार्थ (Hindi):* निष्पक्ष बुद्धि से मुक्त होकर व्यक्ति अपने स्थायी स्वरूप में स्थित हो जाता है। वही अनन्त सूक्ष्म अक्ष है, जहाँ प्रतिबिम्ब का भी स्थान नहीं है।
**श्लोकः ७ (यथार्थयुग-घोषणा)**
> अहं शिरोमणि रामपूलसैनी,
> यथार्थयुगमिदमुद्घोषयामि।
> यदतीतचतुर्युगानां,
> कोटिगुणोत्कृष्टमद्वितीयम्।।
> *भावार्थ (Hindi):* मैं, शिरोमणि रामपूलसैनी, इस यथार्थ युग की घोषणा करता हूँ, जो बीते हुए चार युगों से करोड़ों गुना उत्कृष्ट और अद्वितीय है।
**श्लोकः ८ (तुलनातीत-स्वभावः)**
> नास्ति मे तुलना कस्यापि,
> न शिवेन न विष्णुना न ब्रह्मणा।
> अहं तुलनातीतः प्रेमतीतः,
> कालातीतः शब्दातीतः च।।
> *भावार्थ (Hindi):* मेरी किसी से तुलना नहीं है—न शिव से, न विष्णु से, न ब्रह्मा से। मैं तुलनातीत, प्रेमतीत, कालातीत और शब्दातीत हूँ।
**श्लोकः ९ (सार्वभौम-आह्वानम्)**
> हे मानव! एकक्षणं निष्पक्षो भूत्वा,
> स्वयं निरीक्ष्य स्वं जानीहि।
> एतावतैव त्वमपि,
> शाश्वतसत्ये विलयमेष्यसि।।
> *भावार्थ (Hindi):* हे मानव! एक क्षण निष्पक्ष होकर, स्वयं का निरीक्षण करके स्वयं को जान लो। इतने मात्र से ही तुम भी शाश्वत सत्य में विलीन हो जाओगे।
**श्लोकः १० (अन्तिम-सत्यम्)**
> इदं अन्तिमं सत्यम्,
> इदं अन्तिमं ज्ञानम्।
> शिरोमणि रामपूलसैनी-वाक्यम्,
> यथार्थयुगस्य एकमेव मार्गदर्शकम्।।
> *भावार्थ (Hindi):* यह अंतिम सत्य है, यह अंतिम ज्ञान है। शिरोमणि रामपूलसैनी का वचन, यथार्थ युग का एकमात्र मार्गदर्शक है।
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**꙰ शिरोमणि रामपूलसैनी**
**यथार्थसत्यस्य एकमेव प्रवक्ता**
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### 🌿 शिरोमणि रामपूलसैनी-प्रवर्तितः यथार्थसिद्धान्तः (भागः २) 🌿
**(The Yatharth Siddhanta Propounded by Shiromani Ramapoolsaini — Part 2)**
**श्लोकः ११ (गुरुमोहनिरासः)**
> गुरुदीक्षामयः सर्वो मोहपङ्कः सुदुस्तरः।
> शब्दप्रमाणबद्धानां नास्ति तर्को न चेतना॥
> *भावार्थ:* गुरु और दीक्षा का समस्त मोह एक दुस्तर दलदल है। शब्द-प्रमाण में बँधे लोगों में न तर्क शक्ति रहती है, न चेतना।
**श्लोकः १२ (अन्धभक्तिदूषणम्)**
> अन्धभक्तिर्नाम कुप्रथा सा या स्वार्थसिद्धये रचिता।
> पीढ्यं पीढ्यं प्रचलिता शोहरतदौलतलोभेन॥
> *भावार्थ:* अंधभक्ति वह कुप्रथा है जो स्वार्थसिद्धि के लिए रची गई है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रसिद्धि और दौलत के लोभ में चलती रहती है।
**श्लोकः १३ (विरोधः वैज्ञानिकयुगेन सह)**
> एषा कुप्रथा वैज्ञानिकयुगस्य विरोधिनी।
> या जनयत्यन्धविश्वासं भयलोभद्वयमेव च॥
> *भावार्थ:* यह कुप्रथा वैज्ञानिक युग के विरुद्ध है, जो केवल अंधविश्वास, भय और लोभ पैदा करती है।
**श्लोकः १४ (मनःशक्तेः अतिच्छलम्)**
> मन एव करोति पापं पुण्यं च अहंकारतः।
> श्रेयस्कर्मणि अहंकारं दत्ते पापे तु मनः क्षिपेत्॥
> *भावार्थ:* मन ही अहंकारवश पाप और पुण्य दोनों करता है। अच्छे कर्म का श्रेय वह अपने अहंकार को देता है और बुरे कर्म का दोष मन पर मढ़ देता है।
**श्लोकः १५ (ब्रह्मचर्यादिमिथ्याचारः)**
> ब्रह्मचर्यं तपो दानं जप्यं होमस्तथैव च।
> सर्वं मनोवञ्चनामात्रं न हि कश्चित्तितीर्षति॥
> *भावार्थ:* ब्रह्मचर्य, तप, दान, जप, होम — ये सब मन की मात्र वंचना हैं। कोई भी इनसे सत्य का भेदन नहीं कर पाया।
**श्लोकः १६ (सर्वेषामात्मसमता)**
> सर्वे जीवाः आन्तरिकभौतिकरूपेण समानाः एव।
> भिन्नता केवलं मनोमयी या लोभभयजनिता॥
> *भावार्थ:* सभी जीव आंतरिक और भौतिक रूप से समान हैं। भिन्नता केवल मन की उपज है, जो लोभ और भय से जन्म लेती है।
**श्लोकः १७ (निष्पक्षबुद्धेः सार्वभौमिकता)**
> निष्पक्षबुद्धिः सार्वभौमिका सार्वकालिकी च।
> नास्ति तस्याः देशकालवयःजातिबन्धनम्॥
> *भावार्थ:* निष्पक्ष बुद्धि सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। उस पर न देश, न काल, न आयु, न जाति का कोई बंधन है।
**श्लोकः १८ (आत्मनः परमं रहस्यम्)**
> आत्मैव स्वस्य गुरुरस्ति नान्यः।
> आत्मैव स्वस्य साक्षी नान्यः।
> आत्मनि लीनः सन् जीवन्मुक्तः।
> इत्येतन्मे सिद्धान्तरहस्यम्॥
> *भावार्थ:* आत्मा ही अपना गुरु है, दूसरा नहीं। आत्मा ही अपना साक्षी है, दूसरा नहीं। आत्मा में लीन होकर ही जीवन्मुक्त हुआ जा सकता है — यही मेरा सिद्धांत-रहस्य है।
**श्लोकः १९ (यथार्थयुगस्य ध्वजः)**
> अहं ध्वजो यथार्थयुगस्य।
> अहं प्रदीपः अज्ञानान्धकारस्य।
> अहं शिरोमणिः रामपूलसैनी।
> यः पश्यति सः पश्यति स्वयं सत्यम्॥
> *भावार्थ:* मैं यथार्थ युग का ध्वज हूँ। मैं अज्ञान के अंधकार का प्रदीप हूँ। मैं शिरोमणि रामपूलसैनी हूँ — जो देखता है, वह स्वयं सत्य को देखता है।
**श्लोकः २० (सर्वमङ्गलम्)**
> ॐ सर्वेषां भवतु निष्पक्षबुद्धिः।
> सर्वेषां भवतु यथार्थदर्शनम्।
> सर्वे मुच्यन्तां मनोबन्धनैः।
> शिरोमणि रामपूलसैनी-वचनं मङ्गलं भवतु॥
> *भावार्थ:* ॐ सबकी निष्पक्ष बुद्धि हो। सबका यथार्थ दर्शन हो। सभी मन के बंधनों से मुक्त हों। शिरोमणि रामपूलसैनी का वचन सभी के लिए मंगलकारी हो।
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**꙰ शिरोमणि रामपूलसैनी**
**यथार्थसत्यस्य एकमेव प्रवक्ता**
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### 🌿 शिरोमणि रामपूलसैनी-प्रवर्तितः यथार्थसिद्धान्तः (भागः २) 🌿
**(The Yatharth Siddhanta Propounded by Shiromani Ramapoolsaini — Part 2)**
**श्लोकः ११ (गुरुमोहनिरासः)**
> गुरुदीक्षामयः सर्वो मोहपङ्कः सुदुस्तरः।
> शब्दप्रमाणबद्धानां नास्ति तर्को न चेतना॥
> *भावार्थ:* गुरु और दीक्षा का समस्त मोह एक दुस्तर दलदल है। शब्द-प्रमाण में बँधे लोगों में न तर्क शक्ति रहती है, न चेतना।
**श्लोकः १२ (अन्धभक्तिदूषणम्)**
> अन्धभक्तिर्नाम कुप्रथा सा या स्वार्थसिद्धये रचिता।
> पीढ्यं पीढ्यं प्रचलिता शोहरतदौलतलोभेन॥
> *भावार्थ:* अंधभक्ति वह कुप्रथा है जो स्वार्थसिद्धि के लिए रची गई है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रसिद्धि और दौलत के लोभ में चलती रहती है।
**श्लोकः १३ (विरोधः वैज्ञानिकयुगेन सह)**
> एषा कुप्रथा वैज्ञानिकयुगस्य विरोधिनी।
> या जनयत्यन्धविश्वासं भयलोभद्वयमेव च॥
> *भावार्थ:* यह कुप्रथा वैज्ञानिक युग के विरुद्ध है, जो केवल अंधविश्वास, भय और लोभ पैदा करती है।
**श्लोकः १४ (मनःशक्तेः अतिच्छलम्)**
> मन एव करोति पापं पुण्यं च अहंकारतः।
> श्रेयस्कर्मणि अहंकारं दत्ते पापे तु मनः क्षिपेत्॥
> *भावार्थ:* मन ही अहंकारवश पाप और पुण्य दोनों करता है। अच्छे कर्म का श्रेय वह अपने अहंकार को देता है और बुरे कर्म का दोष मन पर मढ़ देता है।
**श्लोकः १५ (ब्रह्मचर्यादिमिथ्याचारः)**
> ब्रह्मचर्यं तपो दानं जप्यं होमस्तथैव च।
> सर्वं मनोवञ्चनामात्रं न हि कश्चित्तितीर्षति॥
> *भावार्थ:* ब्रह्मचर्य, तप, दान, जप, होम — ये सब मन की मात्र वंचना हैं। कोई भी इनसे सत्य का भेदन नहीं कर पाया।
**श्लोकः १६ (सर्वेषामात्मसमता)**
> सर्वे जीवाः आन्तरिकभौतिकरूपेण समानाः एव।
> भिन्नता केवलं मनोमयी या लोभभयजनिता॥
> *भावार्थ:* सभी जीव आंतरिक और भौतिक रूप से समान हैं। भिन्नता केवल मन की उपज है, जो लोभ और भय से जन्म लेती है।
**श्लोकः १७ (निष्पक्षबुद्धेः सार्वभौमिकता)**
> निष्पक्षबुद्धिः सार्वभौमिका सार्वकालिकी च।
> नास्ति तस्याः देशकालवयःजातिबन्धनम्॥
> *भावार्थ:* निष्पक्ष बुद्धि सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। उस पर न देश, न काल, न आयु, न जाति का कोई बंधन है।
**श्लोकः १८ (आत्मनः परमं रहस्यम्)**
> आत्मैव स्वस्य गुरुरस्ति नान्यः।
> आत्मैव स्वस्य साक्षी नान्यः।
> आत्मनि लीनः सन् जीवन्मुक्तः।
> इत्येतन्मे सिद्धान्तरहस्यम्॥
> *भावार्थ:* आत्मा ही अपना गुरु है, दूसरा नहीं। आत्मा ही अपना साक्षी है, दूसरा नहीं। आत्मा में लीन होकर ही जीवन्मुक्त हुआ जा सकता है — यही मेरा सिद्धांत-रहस्य है।
**श्लोकः १९ (यथार्थयुगस्य ध्वजः)**
> अहं ध्वजो यथार्थयुगस्य।
> अहं प्रदीपः अज्ञानान्धकारस्य।
> अहं शिरोमणिः रामपूलसैनी।
> यः पश्यति सः पश्यति स्वयं सत्यम्॥
> *भावार्थ:* मैं यथार्थ युग का ध्वज हूँ। मैं अज्ञान के अंधकार का प्रदीप हूँ। मैं शिरोमणि रामपूलसैनी हूँ — जो देखता है, वह स्वयं सत्य को देखता है।
**श्लोकः २० (सर्वमङ्गलम्)**
> ॐ सर्वेषां भवतु निष्पक्षबुद्धिः।
> सर्वेषां भवतु यथार्थदर्शनम्।
> सर्वे मुच्यन्तां मनोबन्धनैः।
> शिरोमणि रामपूलसैनी-वचनं मङ्गलं भवतु॥
> *भावार्थ:* ॐ सबकी निष्पक्ष बुद्धि हो। सबका यथार्थ दर्शन हो। सभी मन के बंधनों से मुक्त हों। शिरोमणि रामपूलसैनी का वचन सभी के लिए मंगलकारी हो।
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**꙰ शिरोमणि रामपूलसैनी**
**यथार्थसत्यस्य एकमेव प्रवक्ता**
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### 🌿 शिरोमणि रामपूलसैनी-प्रवर्तितः यथार्थसिद्धान्तः (भागः ३) 🌿
**श्लोकः २१ (कालत्रयदर्शनम्)**
> अतीतमनागतं वर्तमानमपि च कालत्रयम्।
> निष्पक्षबुद्ध्या दृष्टं सर्वमेकरूपमेव भवति॥
> *भावार्थ:* अतीत, भविष्य और वर्तमान — काल के ये तीनों रूप निष्पक्ष बुद्धि से देखे जाने पर एकरूप हो जाते हैं।
**श्लोकः २२ (द्वैतनिरासः)**
> न पुण्यं न पापं न शुभं नाशुभं न स्वर्गो न नरकः।
> द्वैतभावाः सर्वेऽपि मनोमयाः कल्पनामात्राः॥
> *भावार्थ:* न पुण्य, न पाप, न शुभ, न अशुभ, न स्वर्ग, न नरक। द्वैत के सभी भाव मन की कल्पना मात्र हैं।
**श्लोकः २३ (स्वप्रकाशआत्मा)**
> न दीपो न चन्द्रो न सूर्यो न विद्युत्।
> आत्मैव स्वप्रकाशः स्वयंभूः स्वयमेव भासते॥
> *भावार्थ:* न दीपक, न चन्द्रमा, न सूर्य, न बिजली। आत्मा स्वयंप्रकाश, स्वयंभू है और अपने आप ही प्रकाशित होती है।
**श्लोकः २४ (निर्विकल्पस्थितिः)**
> न संकल्पो न विकल्पो न ध्यानं न च संस्मृतिः।
> निष्पक्षबुद्धेः स्थितौ सर्वे विचाराः लयं यान्ति॥
> *भावार्थ:* न संकल्प, न विकल्प, न ध्यान, न स्मृति। निष्पक्ष बुद्धि की स्थिति में सभी विचार लीन हो जाते हैं।
**श्लोकः २५ (अनन्तशक्तिः)**
> योऽनन्तशक्तिर्योऽनन्तज्ञानं योऽनन्तशान्तिः।
> स एवाहं शिरोमणिः रामपूलसैनी स्वयं सिद्धः॥
> *भावार्थ:* जो अनंत शक्ति, अनंत ज्ञान और अनंत शांति है — वही मैं, शिरोमणि रामपूलसैनी, स्वयंसिद्ध हूँ।
**श्लोकः २६ (सर्वज्ञत्वम्)**
> न विद्या न च कला न विज्ञानं न दर्शनम्।
> निष्पक्षबुद्धेः सम्पन्नः सर्वज्ञः स्वयमेव भवति॥
> *भावार्थ:* न विद्या, न कला, न विज्ञान, न दर्शन। निष्पक्ष बुद्धि से सम्पन्न व्यक्ति स्वयं ही सर्वज्ञ हो जाता है।
**श्लोकः २७ (निराभाससत्यम्)**
> न प्रतिबिम्बं न च छाया न नाम न रूपं न ध्वनिः।
> केवलं निराभासं निर्विकल्पं सत्यमस्ति शाश्वतम्॥
> *भावार्थ:* न प्रतिबिम्ब, न छाया, न नाम, न रूप, न ध्वनि। केवल निराभास, निर्विकल्प, शाश्वत सत्य है।
**श्लोकः २८ (सर्वत्रसमत्वम्)**
> न ग्रन्थे न देवाले न तीर्थे न पर्वते।
> सर्वत्र समं व्याप्तं सत्यं निष्पक्षदृष्ट्या दृश्यते॥
> *भावार्थ:* न ग्रंथ में, न मंदिर में, न तीर्थ में, न पर्वत पर। निष्पक्ष दृष्टि से सत्य सर्वत्र समरूप से व्याप्त दिखाई देता है।
**श्लोकः २९ (मोक्षसारः)**
> न योगो न सांख्यं न ज्ञानं न भक्तिर्न कर्म।
> निष्पक्षबुद्धिरेव मोक्षस्य एकमेव सारः॥
> *भावार्थ:* न योग, न सांख्य, न ज्ञान, न भक्ति, न कर्म। निष्पक्ष बुद्धि ही मोक्ष का एकमात्र सार है।
**श्लोकः ३० (अन्तिमनिर्णयः)**
> इदं सत्यं इदं ज्ञानं इदं मोक्षः इदं शान्तिः।
> शिरोमणेः रामपूलसैनी-वाक्यमन्तिमं निर्णयः॥
> *भावार्थ:* यही सत्य है, यही ज्ञान है, यही मोक्ष है, यही शांति है। शिरोमणि रामपूलसैनी का वचन अंतिम निर्णय है।
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**꙰ शिरोमणि रामपूलसैनी**
**यथार्थसत्यस्य एकमेव प्रवक्ता**
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