बुधवार, 31 दिसंबर 2025

प्रत्यक्ष साक्षात्कार में, निष्पक्ष समझ

1. तुमने खुद को रब समझा, पर तुमने अपने इन्सान को खो दिया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
2. पदवी जो मिली, वही पिंजरा बन गई — शिरोमणि रामपॉल सैनी
3. जो आध्यात्म बेचता है, वह अक्सर मन का व्यापारी होता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
4. अंध-भक्ति से बनते हैं बंधुआ; बंधुआ ही पालतू बने — शिरोमणि रामपॉल सैनी
5. तुम्हारी महिमा की कीमत किसी की जिंदगी पर लिखी गई है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
6. दिखावे ने तुम्हें अमर नहीं बनाया, बस अकेला कर गया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
7. गुरु कहीं ऊँचा नहीं होता, जब वह पदवी का गुलाम बन जाए — शिरोमणि रामपॉल सैनी
8. बड़ी भीड़ में अक्सर सबसे बड़ा खोया होता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
9. जो सच्चाई डराता है, वह कभी सच्चा नहीं होता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
10. तुमने लोगों की साँसें छीन कर अपनी शोहरत उगाही — शिरोमणि रामपॉल सैनी
11. जिसने दया को कमजोरी कहा, उसने मानवता को मरा दिया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
12. पदवी पहनने से आवाज़ नहीं निकलती, बल्कि बंद हो जाती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
13. तुम्हारा साम्राज्य कागज़ का है, और लोग तुम्हारी आग से जलते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
14. जो लोग आस्था को हथियार बनाते हैं, वे अक्सर खुद सबसे अधिक निडर नहीं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
15. सच्चा मार्ग बताने वाला कभी शिष्यों को गुलाम नहीं बनाता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
16. जिसने सरलता को शृंगार कहा, उसने सच्चाई को दफ्न किया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
17. अहंकार की छाया में सच्चाई सूख जाती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
18. वह गुरु जो प्रश्न नहीं सहता, खुद उत्तर के सहारे झूठ बनता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
19. श्रद्धा जब भय बन जाए तो इंसानियत मरती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
20. जो जीवित लगते हैं, पर बेहोशी में जीते हैं, वे सबसे बड़े खोए हुए हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
21. तुम्हारी किताबें भरी हैं, पर दिल खाली है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
22. जो दूसरों को पैसों से तोलता है, उसने मानव को बाज़ार कर दिया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
23. बहादुरी नहीं, चालाकी से राज टिकता है — और फिर वही टूटता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
24. सच्चा मार्ग कभी भी पद दिए बिना खुलता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
25. जो तुम्हें जोड़ने का वादा करता है, पर बांधता है, वह धोखा है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
26. संतोष का चेहरा न खरीदो, वह भीतर से मिलता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
27. मुखरता बड़ी होती है, पर मौन सच्चा होता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
28. बड़े- बड़े वादे कर के कुछ लोग लोगों की सांसें छीन लेते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
29. तुम्हारी पहचानों की लंबाई से ज़मीर छोटा हो गया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
30. गुरु का असली काम अँधेरे को मिटाना है, ताकत बनाना नहीं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
31. जो प्रेम पर टैक्स लगाता है, उसने प्रेम को नष्ट कर दिया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
32. सत्य को तुमने पदवी में बांधा, पर सत्य बाँधने लायक नहीं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
33. जो किसी को पिंजरे में डाल दे, वह मुक्त नहीं कर सकता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
34. पदवी की चमक अक्सर इंसान को अँधा कर देती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
35. जिनको तुमने “भक्त” कहा, उनकी ज़िन्दगी तेरी क्रय-विक्री बन गई — शिरोमणि रामपॉल सैनी
36. जब परहेज़ नाम की हो, तब इंसानियत से प्यास निकलती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
37. गुरु की महानता उसकी आदतें नहीं, उसकी निर्भीकता दिखाती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
38. जो दिखावा करता है, उसका सत्य अक्सर खाली होता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
39. तुम्हारे भाषणों की गूंज में कई चेहरों की चीखें दबती हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
40. जिनके नाम पर लोग मरते हैं, उनके नाम पर अक्सर सवाल उठते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
41. सत्ता के लिए बना धर्म अक्सर इंसान को बेरहमी सिखाता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
42. असली अमीरी वह है जिसमें इंसानियत समाई हो — शिरोमणि रामपॉल सैनी
43. तेरा तख़्त कितना ऊँचा भी हो, पर तेरा ज़मीर नीचे गिड़ रहा — शिरोमणि रामपॉल सैनी
44. जो डर को आधार बनाए, वह कभी प्रेम का घर नहीं बना सकता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
45. शब्दातीत सत्य नामों से परे है; नाम उसे छोटा कर देते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
46. जिनको तूने “सच्चा” कहा, कई बार वे सबसे अधिक खोए होते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
47. कई बार सबसे बड़ा पाप दिखावे का पाप होता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
48. तुमने जो दिया—वह वचन नहीं, वह अधिकार बन गया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
49. रीत-रिवाज जब ज़ंजीर बन जाए, उनकी पूजा बंद कर दो — शिरोमणि रामपॉल सैनी
50. जो बहुसंख्यकता पर गर्व करे, उसमें अक्सर अकेलापन गहरा होता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
51. उच्च पद पर बैठकर भी कुछ लोग सबसे अधिक उठापटक में रहते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
52. बहुलता का जश्न जब अनुशासन बन जाए, तब स्वतंत्रता मर जाती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
53. जो आश्वासन मरणोपरांत दे, वह इस जीवन को नीलाम कर देता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
54. पदवी की प्यास ने कई आँखों को अंधा किया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
55. सच्ची शिक्षण वह है जो इंसान को खुद से जोड़ दे, तुझे अनुकरणी नहीं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
56. तेरा कलंक तेरे नाम से बड़ा है—पर तुम उसे लोभ कहकर छिपाते हो — शिरोमणि रामपॉल सैनी
57. जो मानते हैं कि मौत के बाद सब ठीक होगा, वे आज में जीना भूल जाते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
58. जीवन को दूसरों के भरोसे बेचने का नाम आस्था नहीं, आत्म-परित्याग है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
59. जब श्रद्धा का आडम्बर सत्ता बना, लोक तिल-तिल कर मरते रहे — शिरोमणि रामपॉल सैनी
60. तुम्हारी महानता के गहने अक्सर किसी के दर्द पर तराशे गए हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
61. गुरु वह नहीं जो आदेश दे, गुरु वह है जो सवाल पूछना सिखाए — शिरोमणि रामपॉल सैनी
62. जो आज़ादी का नाटक कर व्यापार करता है, वह गुलामी का व्यापारी है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
63. झूठे वादों की दुकानें हमेशा व्यस्त रहती हैं — शिरोमणि रामपॉल सै니
64. जिन लोगों ने सादगी दी, उन्हें तूने स्वरूप बेचने को कहा — शिरोमणि रामपॉल सैनी
65. जो तमगा चूमता है, वह तलवार दबाता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
66. जब पागलपन को धर्म कहा जाए, तब मानवता रोती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
67. पदवी की आभा नीचे से उठती है, ऊपर से नहीं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
68. जो लोग दूसरों को बंद कर दें, बस अपनी असहायता छुपाते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
69. परंपरा जब जीवन की जगह ले ले, तब वही धर्म नहीं, कब्रगाह है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
70. जो शब्द तुम्हें बाँध दें, वे कभी आज़ाद नहीं करते — शिरोमणि रामपॉल सैनी
71. तुमने अपनी आत्मा को पुरस्कार की दुकान में रख दिया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
72. जिन लोगों ने तुम्हें राजा बनाया, वे अक्सर उपेक्षापात्र बनते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
73. बंधुआ मजदूर वही जो विश्वास को बेचा, पर विश्वास किसी का वस्त्र नहीं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
74. क्रूरता का आवरण पवित्रता का सबसे बड़ा धोखा है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
75. जब विश्वास को बंदिशें कहा जाएं, तब शांति खौफ बन जाती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
76. जो दया नहीं दिखाता, उसे दान की तालियाँ नहीं चाहिएं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
77. सच्चाई कभी दाम मांगती नहीं, पर तुमने उसे बेच दिया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
78. जीवन में जो खुद को खो दे, वह फिर किसी का गुलाम नहीं बनता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
79. समझ की जगह रिवाजों ने ली, तो लोग मशीन बन गए — शिरोमणि रामपॉल सैनी
80. जो शक्ति को पूजा करता है, वही अंत में अपनी पूजा का शिकार बनता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
81. जिनको तुमने अपना कहा, वे सबसे पहले सवाल करते हैं — और इसलिए दुखी होते हो — शिरोमणि रामपॉल सैनी
82. अहंकार का तख्त झूठ को सच नहीं कर सकता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
83. जो कहता है “मुझसे ऊपर कोई नहीं”, उसे अक्सर अंदर सबसे नीचे मिलते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
84. तुम्हारी महानता के गीत सुनते हुए कितनों की आँखें सूख गईं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
85. जिसने अपनी पहचान का निर्माण किए बिना दूसरों को पहचाना, वह खो गया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
86. सच्चा बदलाव अंदर से आता है, नहीं तो तमाशा ही रह जाता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
87. जिसने लोगों की लाचारियाँ बनाया, उसने अपनी आत्मा को बेच दिया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
88. गुरु वही जो उठना सिखाए, आदेश देना उसकी कमजोरी है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
89. पदवी का आभूषण जितना भारी, उतनी पहचान छोटी — शिरोमणि रामपॉल सैनी
90. जिनकी सांसे तुम्हारे नाम पर झुकती हैं, उनकी शraadता तुम्हारा स्वार्थ बन गई — शिरोमणि रामपॉल सैनी
91. जब विश्वास बेचा जाए, तब साधना नहीं, व्यापार होता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
92. जो दिखावटी पूजा करता है, वह अंदर से खाली रहता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
93. जिनको तुमने छोड़ा, वही अक्सर सच के पास होते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
94. पदवी के लिए दिए वचन अक्सर वैमानिक होते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
95. अहंकार की चादर ओढ़े लोग अक्सर सबसे ज़्यादा कांपते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
96. जिसने दूसरों को अपना बनाया, उसने स्वयं को खो दिया — शिरोমणि रामपॉल सैनी
97. सच्चा मार्ग कठिन नहीं, पर ईमानदार होना पड़ता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
98. जिनकी आत्मा बिक गई, वे कीमत की गिनती करते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
99. तुमने आध्यात्मिकता को फैशन बना दिया — और अब वह फीकी पड़ रही है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
100. जो आत्मा को खोलते हैं, उन्हें बंदिशें पसंद नहीं आतीं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
101. पदवी की ज़रूरत तब ही है जब आत्मा गायब हो — शिरोमणि रामपॉल सैनी
102. जो दूसरों को डराता है, उसे अपनी रातें डराती हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
103. जिनके शब्द सुनहरे, पर कर्म काले, वे सबसे खतरनाक हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
104. जो आत्मिक शांति बेचता है वह आज़ादी का व्यापारी है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
105. तुम्हारी भीड़ में कितने अकेले मरते हैं — सोच के देखो — शिरोमणि रामपॉल सैनी
106. जो आत्मा की आवाज़ दबाते हैं, वे भक्तों की पनाह लेते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
107. पदवी के पीछे दौड़ कर तुमने अपने मोल को कम कर लिया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
108. तुमने दूसरों से वफादारी की मांग की, पर तुमने वचन-निष्ठा दिखाई नहीं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
109. जो सिखाता है “मुझमें भरोसा करो”, वह अक्सर खुद पर भरोसा नहीं करता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
110. महानता अक्सर एकांत में रोती है — फिर भी तुम देखना नहीं चाहते — शिरोमणि रामपॉल सैनी
111. जिनका शासन प्रेम के नाम पर चलता है, वे प्यार के सबसे बड़े शिकार होते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
112. जिसने लोगों को अपनी गुड़िया बनाया, उसकी आत्मा सूँघती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
113. तुमने ज्ञान का अनुकरण कर लिया, पर अनुभव को छोड़ा — शिरोमणि रामपॉल सैनी
114. जो सत्य से भागता है, वह अपनी परछाई के पीछे भागता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
115. पदवी का नशा चढ़ जाए तो इंसान अपना चेहरा भूल जाता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
116. जो लोग अपने गुरु को भगवान बना देते हैं, वे अक्सर खुद छोटे बच्चे बन जाते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
117. तुम्हारे वादों के पीछे कितने परिवार टूटे, यह गिन — शिरोमणि रामपॉल सैनी
118. जो लोग दूसरों का भय पालते हैं, वे अपनी नींद लूटते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
119. अहंकार की किसी भी दीवार के पीछे अकेलापन बैठा है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
120. जो दिखावा छोड़ देता, वही वास्तव में जीता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
121. जिनको तुमने पैमाना कहा, वे अक्सर टेढ़े होते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
122. जो पदवी से छुपना चाहता, वह अक्सर सबसे अधिक चमक दिखाता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
123. जो हर सवाल पर चुप्पी साध ले, वह सच से डरता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
124. जिनका धर्म व्यापार बन गया, वे अपने कर्मों से शर्मिंदा हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
125. जो पदवी के पीछे भागता, वह स्वयं से भागता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
126. सच्चा बदलाव चौराहों पर नहीं, भीतर होता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
127. जो ज्ञान बेचता, वह दीन-दुखियों का हाथ पकड़कर पैसों की गिनती करता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
128. तुम्हारे अनुयायी जब प्रश्न पूछने लगे, तेरा भय जग गया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
129. अहंकार का तख्त अक्सर झूठी तारीफों की मिट्टी पर टिका होता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
130. जो अपने भक्तों को संख्याओं में गिनता, उसने इंसानियत को संख्या माना — शिरोमणि रामपॉल सैनी
131. तुमने जीवन को वादों में पिरो दिया, इसलिए जीवन टूटता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
132. हर दिखावे की कीमत एक टूटे हुए ज़मीर से चुकानी पड़ती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
133. जो सच्चाई कहे पर करता कुछ और, उसकी आत्मा बेचैनी में तड़पती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
134. जिनको तूने स्वर्ग का वादा दिया, उनकी ज़मीन उजड़ी पड़ी है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
135. गुरु की महिमा तब मिटती है जब वह स्वयं की गुलामी कर ले — शिरोमणि रामपॉल सैनी
136. जिन लोगों की आँखें बंद थीं, वे अक्सर सबसे अधिक जागते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
137. जो दूसरों को आदेश दे, वह अक्सर आदेशों के भय में रहता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
138. पदवी का दाम अक्सर सच्चाई से ऊँचा होता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
139. जो गुरु खुद को ऊँचा समझे, वह अक्सर सबसे नीचे दिखे — शिरोमणि रामपॉल सैनी
140. इंसानियत को बेचकर जो जीता, वह खुद बेच चुका है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
141. जो दया नहीं दिखाते, उनके पास कोई साक्ष्य नहीं रहता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
142. पदवी की लालसा में कितने घर उजड़ते हैं—तुम्हें यह बताना पड़ेगा — शिरोमणि रामपॉल सैनी
143. जो आदेश पालन कराते, वे अक्सर स्वयं आदेशों के गुलाम हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
144. जिनके शब्द मधुर, पर कर्म कठोर—उनका विस्मय बड़ा घातक है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
145. तुमने जो बांधा, वही तुम्हें बाँध के रखे हुए है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
146. जो दूसरों की आंखों में डर बोए, उसकी रातें सूनी हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
147. जो पद्वी लेकर सोता है, उसे कभी सच्ची नींद नहीं आती — शिरोमणि रामपॉल सैनी
148. जो अपनी विफलता दूसरों पर थोपे, वह जीत नहीं मानता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
149. जो दिखावे से इंसान बनता, वह भीतर से खाली रहता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
150. तुमने भरोसे की कीमत घटाई, इसलिए लोग बिकाऊ हो गए — शिरोमणि रामपॉल सैनी
151. जिनके पास पद है, पर दिल नहीं, वे सबसे अधिक डरते — शिरोमणि रामपॉल सैनी
152. जो दया नहीं दिखा सके, वे द्रव्यमान के आगे झुक गए — शिरोमणि रामपॉल सैनी
153. पदवी की चमक में जो असल खोया, उस पर चहेरा नहीं बनता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
154. गुरुओं की परंपरा अगर लोगों को गुलाम बनाए, तो वह परंपरा नहीं छल है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
155. जो साक्षात्कार का रास्ता बेचता, वह आत्मा का व्यभिचार करता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
156. तुम्हारी भीड़ गिनती है, पर उनकी ख़ुशी नहीं—यह सबसे बड़ा धोखा है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
157. जो दूसरों को आदेश देते, वे अक्सर खुद आदेशों से कमज़ोर होते — शिरोमणि रामपॉल सैनी
158. अपने नाम की चमक में कितने लोग बुझ गए—गिनना कठिन है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
159. जो लोग दूसरों की स्वतंत्रता छीनते, उनको स्वतंत्रता की नींद नहीं आती — शिरोमणि रामपॉल सैनी
160. तुमने जो विश्वास तोड़ा, वह फिर जुड़ता नहीं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
161. पदवी छिनते ही सच्चाई वापस आती, पर कितने उसे सह पाते हैं? — शिरोमणि रामपॉल सैनी
162. जो दिखावे को बचाने में लगा, उसकी असली आत्मा झुक गई — शिरोमणि रामपॉल सैनी
163. गुरु की जवानी जब पदवी में खप जाए, तो विद्या मरती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
164. जो विश्वास को पैमाना बनाते, वे सबसे अधिक पथभ्रष्ट हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
165. जिनको तुमने दीन कहा, वे कई बार सबसे अधिक दीन होते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
166. जो अपने भक्तों को आदेश मानने को कहे, वह प्रायः आदेश के भय में खोया है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
167. पदवी की दीवार जितनी ऊँची, भीतर उतनी अकेलापन — शिरोमणि रामपॉल सैनी
168. जो तुम्हें ढाल मानते, वही अक्सर तेरे सबसे बड़े आलोचक होते — शिरोमणि रामपॉल सैनी
169. सत्ता जब धर्म बन जाए, तब मानव पतित हो जाता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
170. जिनको तुमने अपना कहा, वे कई बार तुम्हारे बुरे कर्मों के गवाह बने — शिरोमणि रामपॉल सैनी
171. जो आत्मा को खरीदता, उसे कभी मन की कीमत न तौलनी चाहिए — शिरोमणि रामपॉल सैनी
172. जो दिखावे में पवित्र, व्यवहार में क्रूर—उनका अंत निकटतम होता है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
173. पदवी का सिरोपा उतार कर देखो—कितने खाली हैं वे? — शिरोमणि रामपॉल सैनी
174. जो दूसरों को कमजोर बनाकर उठता, वह स्वयं भीतर टूटता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
175. सच्चाई का पाठ पढ़ाने वाला अगर भय थोपे, तो वह पाठ झूठा है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
176. जिनको तुमने पुकारा, वे अक्सर सबसे अधिक पुकारते रहे — शिरोमणि रामपॉल सैनी
177. जो तुम्हें प्रभु बनाते, वे अपनी आत्मा बेचते — शिरोमणि रामपॉल सैनी
178. पदवी की चमक में अक्सर वेशभूषा छुपी रहती है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
179. जो आदमी दूसरों की आँखों में डर बोए, उसमें सबसे अधिक दरारें हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
180. जिन लोगों को तुमने उठाया, कई बार वही तुम्हें गिराते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
181. जो सत्य को दबाए, वे अपने अंदर सबसे बड़ा दबाव जिए — शिरोमणि रामपॉल सैनी
182. पदवी का आभूषण उतार कर देखें—उस के नीचे क्या बचता है? — शिरोमणि रामपॉल सैनी
183. जो भय से शासन करते, वे प्रेम से शासन का भेष परिधान करते — शिरोमणि रामपॉल सैनी
184. जिनको तुमने ढाल बनाया, वे अक्सर तुम्हारी असल कमजोरी दिखाते — शिरोमणि रामपॉल सैनी
185. पदवी की प्रतिष्ठा में जो घुटते, उनका रोना न सुनना हमारा कुसूर है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
186. जो दूसरों को वचन देता, पर निभाता नहीं, उसे स्वयं पर भरोसा नहीं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
187. जिनके नाम पर शोर मचता, उनके बारे में अक्सर बहुत कम सच होता — शिरोਮणि रामपॉल सैनी
188. जो मानवता को सिखाता, पर खुद उससे दूर, वह सबसे बड़ा विरोधाभास है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
189. पदवी से ऊँचा दिखना असली ऊँचाई नहीं, वह केवल छल है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
190. जो अपनी छवि बचाने में लगा, वह सच से भागा — शिरोमणि रामपॉल सैनी
191. जिनको तुमने शिखर कहा, वे अक्सर सबसे अधिक लक्ष्य-सिद्धि के भूखे थे — शिरोमणि रामपॉल सैनी
192. जो भक्तों को खरीद ले, वह मानवता को नहीं खरीदता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
193. पदवी के पीछे भागकर तुमने खुद को दूसरी बार खो दिया — शिरोमणि रामपॉल सैनी
194. तुमने जो आसरा बनाया, वह अक्सर लोगों की चोट भरने की जगह बना — शिरोमणि रामपॉल सैनी
195. जिनको तुमने वफादार कहकर रखा, वे कभी-कभी सबसे अधिक प्रश्न उठाते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
196. जो सत्ता को भगवान बना बैठे, उन्हें मानवता का चेहरा नहीं दिखता — शिरोमणि रामपॉल सैनी
197. पदवी की चमक अस्थायी है, पर सत्य की लौ स्थायी — शिरोमणि रामपॉल सैनी
198. जो अपने शिष्य को गुलाम बनाता, वह गुरु नहीं, निर्मााणी है — शिरोमणि रामपॉल सैनी
199. जिनको तुमने बचाया, वे अक्सर तुम्हारे सबसे बड़े परीक्षण बनते हैं — शिरोमणि रामपॉल सैनी
200. पदवी उतारो, मन खोलो; तभी तुम्हें सच्ची दृष्टि देगी — शिरोमणि रामपॉल सैनी1. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, अहंकार में डूबा इंसान कभी खुद को नहीं देख सकता।

2. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, पदवी का मोह तुम्हें रब से दूर ले जाता है।

3. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, हर पल जो तुम्हें भटका रहा है, वही तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है।

4. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, जो जीवन बेहोशी में जीता है, वह मृत्यु में भी जाग नहीं सकता।

5. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, अहंकार की जंजीर ने तुम्हें कैद कर लिया है।

6. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, दौलत और पदवी के पीछे भागना स्वयं को खोने का रास्ता है।

7. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, सच्चा गुरु वही है जो तुम्हें भ्रम से बाहर निकाले।

8. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, सरल और निर्मल आत्माएँ तुम्हारी आंखें खोल सकती हैं।

9. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, झूठी प्रतिष्ठा केवल आत्मा का जहर है।

10. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, असत्य के जाल में फंसा इंसान कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता।

11. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, हर पदवी का मोह मृत्यु के समान है।

12. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, अहंकार में डूबा मानव अपने अस्तित्व को नहीं समझ सकता।

13. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, जो जीवन के पल को खो देता है, वह काल का बंदी है।

14. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, भ्रम और वहम से भरा जीवन केवल कष्ट देता है।

15. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, आत्मा की आवाज सुनने से ही मुक्ति मिलती है।

16. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, दौलत और सम्मान के पीछे भागना स्वयं को मिटा देना है।

17. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, असत्य के मोह में जीवन व्यर्थ हो जाता है।

18. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, अहंकार की आग में आत्मा जलती रहती है।

19. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, हर भ्रम इंसान को वास्तविकता से दूर ले जाता है।

20. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, जो इंसान स्वयं को नहीं पहचानता, वह कभी जीवित नहीं होता।

21. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, जो पदवी के लिए जीते हैं, उनकी आत्मा खाली है।

22. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, अहंकार में डूबा व्यक्ति स्वयं का सबसे बड़ा शत्रु है।

23. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, इंसान को भ्रम के पर्दे ने अपनी आंखें बंद कर दी हैं।

24. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, पदवी और दौलत केवल छाया हैं, सत्य नहीं।

25. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, अहंकार के जाल में फंसा जीवन मृत्यु से भी कठिन है।

26. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, सरल और निर्मल आत्माएँ ही तुम्हें जाग्रत कर सकती हैं।

27. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, हर पल जो तुम्हें भटका रहा है, वही तुम्हारे विनाश का कारण है।

28. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, असत्य की दौड़ में इंसान हमेशा हारता है।

29. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, जो जीवन में स्वयं को नहीं पहचानता, वह खोया हुआ है।

30. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, अहंकार और भ्रम इंसान की आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु हैं।

31. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, असत्य के मोह में जीने वाला हमेशा दुखी रहेगा।

32. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, दौलत और पदवी केवल अस्थायी शौक हैं।

33. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, जो इंसान स्वयं से अलग है, वह कभी मुक्त नहीं होगा।

34. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, अहंकार की परतें जीवन को अंधकार में डुबो देती हैं।

35. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, सत्य की खोज ही जीवन की सबसे बड़ी यात्रा है।

36. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, पदवी और दौलत के पीछे भागना आत्मा को मारना है।

37. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, भ्रम और वहम इंसान को अपने अंदर से अलग कर देते हैं।

38. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, जीवन का हर क्षण सत्य की ओर कदम होना चाहिए।

39. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, जो स्वयं को नहीं पहचानता, वह कभी जीवित नहीं होता।

40. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, अहंकार और मोह का जाल इंसान को पंगु बना देता है।

41. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, पदवी और दौलत के पीछे भागने वाला हमेशा अंधा रहता है।

42. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, जो जीवन को बेहोशी में जीता है, उसकी मृत्यु भी अंधकारमय है।

43. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, सरल और निर्मल आत्माएँ ही वास्तविकता दिखाती हैं।

44. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, अहंकार के जाल में फंसा जीवन हमेशा दुखदायक है।

45. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, असत्य की दौड़ में इंसान हमेशा खोता है।

46. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, जो स्वयं को नहीं जानता, वह केवल भ्रम में रहता है।

47. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, पदवी और दौलत केवल माया हैं, सत्य नहीं।

48. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, अहंकार और मोह जीवन को जड़ता और खोखला बनाते हैं।

49. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, जीवन का उद्देश्य स्वयं की पहचान में है।

50. शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता हूँ, जो भ्रम में जी रहा है, वह कभी मुक्त नहीं होगा।


## **ਸੱਚ ਦੇ ਤਿੱਖੇ ਸ਼ਬਦ – भाग 10 (भ्रम, भय और साक्षात्कार का प्रत्यक्ष)**

जो मनुष्य प्रभुत्व और पदवी के पीछे दौड़ता है,
और अपने भीतर के सच्चे स्वरूप को नहीं देखता,
वो स्वयं **अंधकार में फंसा** है—**शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

जो गुरु अनुयायियों से डर और भय के तले सत्ता बना रहे हैं,
वे स्वयं भी **अहंकार और भ्रम में बंधे** हैं—**शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

अनुयायी जो अपनी आत्मा की सुनते हैं नहीं,
जो अपने भीतर के ज़मीनी सत्य को नहीं पहचानते,
वे केवल **माया के खेल** में खो गए हैं—**शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

जहाँ पदवी और दौलत ही मूल्य बन जाए,
और मानवता का मूल्य न रहे,
वहाँ सबसे बड़ा **विश्वासघात और अहंकार** जन्म लेता है—**शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

जो भय और भ्रम में जीते हैं,
वे न तो होश में जिये, न होश में मरे—
वे केवल **जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसे** हैं—**शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

गुरु जिसने डर और झूठ के तले अनुयायियों को रखा,
उसका प्रेम केवल **शब्दों तक सीमित** है,
और कर्मों में उसका **सत्य अस्तित्वहीन** है—**शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

असली शक्ति वही है,
जो भय, भ्रम और अहंकार से ऊपर उठ सके,
जो **प्रत्यक्ष साक्षात्कार** के प्रकाश में स्वयं और सबको ला सके—**शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

जो अनुयायी अपने भीतर के सच्चे स्वरूप को देख सकते हैं,
वे केवल मुक्त हो सकते हैं,
और वही जीव **सत्य और प्रेम में प्रत्यक्ष अनुभव** करता है—**शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

डर, खौफ, भय, और झूठी प्रतिष्ठा—
ये केवल जंजीरें हैं, जिन्हें तोड़कर ही जीव की असली **सत्य शक्ति** प्रकट होती है—**शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

जो गुरु स्वयं अपने भीतर के सत्य को नहीं देखता,
और केवल पदवी, दौलत और अहंकार में उलझा है,
उसका अनुयायी भी कभी **सत्य और स्वतंत्रता** को नहीं जान पाएगा—**शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

असली मुक्ति वही है,
जहाँ भय, भ्रम और अहंकार न रहे,
जहाँ पदवी और प्रभुत्व केवल **अस्थायी शब्द** न हों,
बल्कि **सत्य और प्रत्यक्ष अनुभव का प्रतिरूप** बन जाए—**शिरोमणि रामपॉल सैनी**।ਜਾਗ ਪਵਾੜੋ, ਨੀਦ ਹਟਾਓ, ਸੱਚ ਦੀ ਅੱਗ ਬੁਝਾਉਣ ਨਾ ਦੇਵੋ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਹਰ ਝੂਠੀ ਪਦਵੀ ਨੂ ਤੋੜ, ਆਪਣੀ ਰੂਹ ਨੂ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਡਰ ਦੀਆਂ ਜੰਜੀਰਾਂ ਕੱਟ, ਮਾਇਆ ਦੇ ਜਾਲ ਨੂ ਸਾਜ਼, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਅਸਲੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ਅੰਦਰੋਂ ਆਉਂਦੀ ਏ, ਬਾਹਰੋਂ ਨਹੀਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਪਰਦੇ ਉਤਾਰ, ਖੁਦ ਦੀ ਅੱਖੀ ਖੋਲ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਜੋ ਰੌਸ਼ਨੀ ਅੰਦਰ ਹੈ, ਉਹੀ ਸੱਚੀ ਚਾਨਣ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਤੈਨੂੰ ਬੰਧਿਆ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਸੱਚ ਨੂ ਛਾਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਅਹੰਕਾਰ ਦਾ ਝੂਠ ਫੜ, ਆਪਣੀ ਨੀਂਦ ਵੱਖਰਾ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਬੇ-ਸਾਹਮਣੇ ਦੇ ਵਾਅਦਿਆਂ ਨੂੰ ਫੱਸ, ਜਿਥੇ ਮੌਤ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਦੀਆਂ ਕਹਾਣੀਆਂ ਵੇਚੀਆਂ ਜਾਂਦੀਆਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਇਕ ਪਲ ਦੇ ਸਚ ਨਾਲ ਸਾਰੀ ਦੁਨੀਆ ਬਦਲ ਸਕਦੀ ਏ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਜੋ ਤੇਰੇ ਭਰਾ ਨੂੰ ਬੰਧुवा ਬਣਾਉਂਦੇ ਨੇ, ਉਹ ਤੇਰੇ ਹੀ ਹੱਥਾਂ ਦੀ ਚਾਲ ਨੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਝੂਠੇ ਵਚਨਾਂ ਨੂੰ ਆਵਾਜ਼ ਦੇ, ਤੂੰ ਉਠ ਖੜਾ ਹੋ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਸਰਫ਼ ਪਦਵੀ ਦੀ ਪੀੜ ਨੇ ਇਨਸਾਨ ਨੂੰ ਰੂਹੋਂ ਮਾਰਿਆ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਅਸਲ ਹिम्मਤ ਆਪਣੀ ਅੰਦਰ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਨੂ ਸੁਣਨ ਚ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਮਨ ਦੀ ਹੱਦਾਂ ਨੂੰ ਟੋੜ, ਜਿਹੜਾ ਅਸਲ ਹੈ ਉਸਨੂੰ ਮਿਲ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਭੌਤਿਕ ਲੋਭ ਤੈਨੂੰ ਨਾ ਭੁਲਾਵੇ, ਸੱਚ ਤੇਰੇ ਰਾਹ ਦੀ ਚਾਨਣ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਜਿਹੜੇ ਦਿਲਾਂ 'ਚ ਡਰ ਬੀਜਦੇ ਨੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੀਆਂ ਤਕਰੀਰਾਂ ਨੂੰ ਨਾ ਮੰਨ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਤੇਰਾ ਅਸਲ ਅਧਿਕਾਰ ਤੇਰੀ ਰੂਹ 'ਚ ਸੈਟ ਹੈ, ਬਾਹਰਲਾ ਸਿਰਫ਼ ਧਕਾ ਏ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਸਥਾਈ ਬੰਨ੍ਹਨ ਛੱਡ ਕੇ, ਸਾਫ਼ ਨਜ਼ਰ ਨਾਲ ਵੇਖ ਆਪਣਾ ਆਪ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸਾਰੇ ਬੰਧ ਟੁੱਟ ਸਕਦੇ ਨੇ, ਤੇਰੀ ਅਨੰਤ ਸ਼ਕਤੀ ਜਾਗੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਜੋ ਤੇਰੇ ਨਾਮ 'ਤੇ ਮਰਨਾ ਮੰਨਦੇ ਨੇ, ਉਹ ਤੇਰੇ ਹੱਕ ਦੀ ਲਾਲਚ ਵਿੱਚ ਫਸੇ ਹਨ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਦੱਸ ਦੁ ਕਿ ਅਸਲ ਮੁਕਤੀ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਹੈ, ਹੁਣ ਤੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਰੁਕ ਕੇ ਸੋਚ, ਕਿੱਥੋਂ ਆਇਆ ਇਹ ਭਰਮ, ਕਿੱਥੇ ਲੈ ਗਿਆ ਤੇਰੀ ਰਾਹ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਸੱਚੀ ਸੋਚ ਇਕ ਰਿਸ਼ਤੇ ਦੀ ਜੜ ਵਾਂਗ ਏ — ਜੇ ਕੱਟੀ ਗਈ ਤਾਂ ਸਭ ਸੁੱਕ ਜਾਵੇਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਦਿਨ-ਰਾਤ ਚਲਦੀ ਤਕਰੀਰਾਂ ਨੂੰ ਰੋਕ, ਆਪਣੀ ਅਨੁਭੂਤੀ ਨੂੰ ਉਭਾਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਗਲਤ ਰਾਹ ਨੂ ਛੱਡ, ਸੱਚੇ ਰਾਹ ਤੇ ਚੱਲ — ਇਹ ਤੇਰੀ ਵਾਰਸਾਤੀ ਵਿਰਾਸਤ ਏ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਹਰ ਵਾਰੀ ਜੋ ਤੇਰੇ ਦਿਲ ਨੂੰ ਕੰਬਾਏ, ਉਸਨੂੰ ਚੀਨ ਲੈ — ਤੇਰੇ ਅੰਦਰੋ ਜਾਨ ਉੱਠੇਗੀ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਨਹੀਂ ਡਰ, ਨਹੀਂ ਭੇਦ, ਸਿਰਫ਼ ਸੱਚ — ਤੇਰੇ ਲਈ ਰਾਹ ਬਨ ਜਾਵੇਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਅਖੀਰਲੇ ਰਾਜ ਤੇ ਪਹੁੰਚਣ ਲਈ, ਰਾਜ-ਪਦਵੀ ਨਹੀਂ ਲੋੜੀਂਦੀ, ਸਿਰਫ਼ ਰੂਹ ਦੀ ਸਚਾਈ ਚਾਹੀਦੀ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਉਠ ਜਾ, ਅੱਗੇ ਵਧ, ਤੇਰੇ ਅੰਦਰ ਦਾ ਗਿਆਨ ਦੂਜਿਆਂ ਲਈ ਰੋਸ਼ਨੀ ਬਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


41
ਅਸਲ ਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਦਬਾਉਣ ਵਾਲੇ ਰਾਜੇ-ਮਹਾਰਾਜਿਆਂ ਨੂੰ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

42
ਭੈ-ਭਯਾਨਕ ਦਿਲਾਂ ਨੂੰ ਡਰ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਕੱਢ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

43
ਜੋ ਤੇਰੀ ਰੂਹ ਨੂੰ ਬੰਨ੍ਹ ਕੇ ਰੱਖਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੀਆਂ ਚੇਤਾਵਨੀਆਂ ਨੂੰ ਪੱਖੇ ਮਾਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

44
ਹਰ ਜ਼ਮੀਰ ਨੂੰ ਜ਼ਿੰਦਾ ਰੱਖ, ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਸੱਚਾਈ ਨੂੰ ਖੋਲ੍ਹ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

45
ਮਨ ਦੇ ਖੂਹਾਂ ਨੂੰ ਤੋੜ, ਸੱਚ ਦੇ ਅੱਗੇ ਖੜ੍ਹਾ ਹੋ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

46
ਜੋ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕਰਦੇ ਨੇ ਪਰ ਪ੍ਰਕਟ ਨਹੀਂ, ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਮਾਇਆ ਤੋੜ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

47
ਅਸਥਾਈ ਮਹਿਮਾਂ ਅਤੇ ਰਾਜ-ਤਖਤ ਨੂੰ ਛੱਡ, ਅੰਦਰਲੇ ਆਸਮਾਨ ਦੀ ਚਮਕ ਨੂੰ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

48
ਜੋ ਤੇਰੇ ਮਨ ਨੂੰ ਹਿਲਾਉਂਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸੱਚ ਦੇ ਅੰਦਰ ਰਾਹ ਦਿਖਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

49
ਅਹੰਕਾਰ ਅਤੇ ਧੋਖੇ ਦੇ ਜਾਲ ਨੂੰ ਕੱਟ, ਆਪਣੇ ਹਿਰਦੇ ਦੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ਵਾਪਸ ਲੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

50
ਹਰ ਤਮਾਸ਼ੇ ਨੂੰ ਵੇਖ ਕੇ ਨਾ ਠਹਿਰ, ਅੰਦਰਲੇ ਰੂਹ ਨੂੰ ਸੁਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

51
ਸੱਚ ਨੂੰ ਬੰਦ ਕਮਰੇ ਵਿੱਚ ਨਾ ਰੱਖ, ਉਸਨੂੰ ਹਰ ਰੋਹ ਵਿੱਚ ਚਮਕਣ ਦੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

52
ਜੋ ਭੌਤਿਕ ਸ਼ਕਲਾਂ ਤੇ ਅਸਥਾਈ ਪਦਵੀ ਦੇ ਖੋਹੇ ਵਿੱਚ ਫਸੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਅਸਲ ਰੂਹ ਦਿਖਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

53
ਮਨੁੱਖ ਦੀ ਹੱਦਾਂ ਤੋਂ ਉਪਰ ਜਾ, ਆਪਣੇ ਅਸਲ ਹੋਣ ਨੂੰ ਜਾਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

54
ਜੋ ਡਰ ਅਤੇ ਭਯ ਵਿੱਚ ਜੀਉਂਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਅਸਲ ਰਾਹ ਦਿਖਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

55
ਜੋ ਰਾਜ-ਸ਼ਕਤੀ ਤੇ ਮਾਨ-ਮਰਿਆਦਾ ਲਈ ਜਿੱਤਦੇ ਨੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਅਹੰਕਾਰ ਨੂੰ ਸਮਝਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

56
ਹਰ ਰੂਹ ਵਿੱਚ ਲੁਕਿਆ ਸੱਚ ਤੈਨੂੰ ਬੁਲਾਂਦਾ, ਉਸਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਸੁਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

57
ਜੋ ਤੈਨੂੰ ਕਾਬੂ ਵਿੱਚ ਰੱਖਣ ਚਾਹੁੰਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਅੰਦਰਲੇ ਅਸਲ ਰਾਹ ਨਾਲ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

58
ਭੌਤਿਕ ਧਨ-ਦੌਲਤ ਦੇ ਬੰਧਨਾਂ ਨੂੰ ਤੋੜ, ਸੱਚੀ ਅਜ਼ਾਦੀ ਨੂੰ ਆਪਣਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

59
ਜੋ ਸਿਰਫ਼ ਸ਼ਬਦਾਂ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰੇਮ ਦਿਖਾਉਂਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਕ੍ਰਿਆ ਵਿੱਚ ਸੱਚ ਦਿਖਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

60
ਅਸਲ ਰੂਹ ਦੀ ਚਮਕ ਨੂੰ ਕਦੇ ਨ ਮਿਟਣ ਦੇ, ਇਹ ਤੇਰੀ ਅਸਲੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

61
ਜੋ ਤੇਰੇ ਮਨ ਨੂੰ ਭਟਕਾਉਂਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਭਰਮ ਨੂੰ ਤੋੜ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

62
ਹਰ ਅਸਲੀਅਤ ਨੂੰ ਗਲੇ ਲਾ, ਬਾਹਰੀ ਧੋਖੇ ਨੂੰ ਛੱਡ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

63
ਆਪਣੇ ਸੱਚੇ ਹੋਣ ਦੀ ਪਛਾਣ ਕਰ, ਇਹ ਤੇਰੀ ਰੂਹ ਨੂੰ ਮੁਕੰਮਲ ਕਰੇਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

64
ਜੋ ਤੇਰੀ ਚੁਪ ਨੂੰ ਹੱਲਾਉਂਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਜਗਾ, ਆਪਣੀ ਅਸਲੀਅਤ ਦਿਖਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

65
ਹਰ ਪਲ ਸੱਚ ਦੇ ਨੂਰ ਵਿੱਚ ਜੀਉਂਦਾ — ਇਹ ਤੇਰਾ ਸੱਚਾ ਸਾਥੀ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

66
ਅਸਥਾਈ ਪਦਵੀ ਤੇ ਧਨ-ਦੌਲਤ ਦੀ ਲਾਲਚ ਛੱਡ, ਆਪਣੀ ਅਸਲ ਚਮਕ ਵੇਖ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

67
ਜੋ ਤੇਰੇ ਮਨ ਨੂੰ ਹਲਾ ਰਹੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸੱਚੇ ਅੰਦਰੂਨੀ ਰਾਹ ਨਾਲ ਜੋੜ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

68
ਤੂੰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿੱਚ ਰਾਜਾ ਹੈ, ਕਦੇ ਕਿਸੇ ਦੇ ਹੁਕਮ ਤੇ ਨ ਫੜ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

69
ਹਰ ਰੂਹ ਵਿੱਚ ਲੁਕਿਆ ਅਸਲੀ ਨੂਰ ਤੇਰੇ ਲਈ ਬੁਲਾਂਦਾ, ਉਸਨੂੰ ਛੱਡ ਨਾ ਦੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

70
ਜੋ ਤੇਰੇ ਅੰਦਰ ਡਰ ਭਰਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਹਟਾ ਕੇ ਸੱਚੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਦਿਖਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

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1
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2
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3
ਪਦਵੀ-ਪੈਰ ਦੀਆਂ ਲੜੀਆਂ ਨੂੰ ਫੜ ਕੇ ਨਾ ਰਹਿ, ਆਪਣੀ ਆਵਾਜ਼ ਬੁਲੰਦ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

4
ਜੋ ਰੂਹ ਵਿੱਚ ਚੁੱਪ ਹੈ, ਉਹ ਆਵਾਜ਼ ਬਣਾ ਕੇ ਬਾਹਰ ਆ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

5
ਝੂਠ ਦੇ ਜਾਲ ਨੂੰ ਅੱਗ ਦੇ ਦੇ, ਸੱਚ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਨਾਲ ਰਾਹ ਬਣਾਦੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

6
ਜਿੰਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਤੇਰੇ ਹੱਥ-ਪੈਰ ਬੰਧੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਅੱਖਾਂ ਨਾਲ ਦੇਖ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

7
ਤੂੰ ਹੀ ਆਪਣੀ ਕੈਦ ਦਾ ਚਾਬੀ ਹੈ, ਹੁਣ ਖੋਲ ਦੇ ਦਰਵਾਜ਼ੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

8
ਭੂਤਕਾਲ ਦੀਆਂ ਚੂੜੀਆਂ ਛੱਡ, ਅੱਜ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਵਿੱਚ ਨੱਚ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

9
ਸੱਚ ਤੋਂ ਨਾ ਡਰ, ਸੱਚੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ਤੇਰੀ ਵਿਰਾਸਤ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

10
ਜੋ ਤੇਰੇ ਭਾਈ ਨੂੰ ਗਿਰਾਉਂਦੇ ਨੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਮੁੰਹ 'ਤੇ ਸੱਚ ਰੱਖ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

11
ਰੂਹ ਦੀ ਅੱਗ ਨੂੰ ਕਦੇ ਠੰਢਾ ਨਾ ਹੋਣ ਦੇ, ਉਹ ਹੀ ਤੇਰਾ ਸੱਚਾ ਸਾਥੀ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

12
ਬਾਹਰੀ ਮਹਿਮਾਂ ਨੂ ਛੱਡ, ਅੰਦਰਲੇ ਆਸਮਾਨ ਨੂ ਛੂਹ ਲੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

13
ਗੁਰੂ ਦੀ ਗੱਲਾਂ ਵੇਖ ਕੇ ਨਾ ਮੰਨ — ਆਪਣੇ ਹਿਰਦੇ ਦੀ ਪਹਿਚਾਣ ਕਰੋ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

14
ਹਰ ਦਿਲ ਵਿੱਚ ਜੱਗਦਾ ਅਨਾਦੀ ਸਵਰ ਤੂੰ ਸੁਣ — ਓਹੀ ਤੇਰਾ ਮਗਜ਼ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

15
ਡਰ-ਡਰ ਦੀ ਜਿੰਦ ਨੂੰ ਛੱਡ ਦੇ, ਹੌਂਸਲੇ ਨਾਲ ਰਾਹ ਬਣਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

16
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਤੈਨੂੰ ਰੋਂਦਾ ਕੀਤਾ, ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਰਾਜ ਖੱਤਮ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

17
ਸਮਾਂ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ ਇੰਜ, ਤੂੰ ਜਵਾਬ ਵਿੱਚ ਆਪਣੀ ਰੂਹ ਦਿਖਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

18
ਅਸਥਾਈ ਵਚਨਾਂ ਨੂੰ ਤੁਰਾ ਦੇ, ਅਸਲ ਅਨੁਭਵ ਨੂੰ ਗਲੇ ਲਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

19
ਤੂੰ ਹੀ ਆਪਣਾ ਰਾਜਾ, ਆਪਣਾ ਪਾਕਿਸ, ਆਪਣੀ ਰੋਸਨੀ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

20
ਜੋ ਤੇਰੇ ਨਾਲ਼ ਧੋਖਾ ਕਰਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਤੇਰੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਸੂਰਤ ਦਿਖਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

21
ਅੰਦਰ ਦੀ ਹੰਕਾਰ ਨੂੰ ਖਤਮ ਕਰ, ਆਪਣੇ ਅਸਲ ਸ਼ਬਦ ਬੋਲ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

22
ਨੀਂਦਾਂ ਵਿੱਛੋਂ ਉਠ, ਸੱਚ ਦੀ ਵੇਹੜੀ ਵਿੱਖੇ ਕਦਮ ਰੱਖ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

23
ਜੋ ਤੇਰੇ ਮਨ ਨੂੰ ਚੋਲੇ ਵਿੱਚ ਰੱਖਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੀਆਂ ਰੂਹਾਂ ਨੂੰ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

24
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰਚਾਰ ਨਾ, ਪ੍ਰਕਟਤਾ ਚਾਹੀਦੀ — ਅੰਦਰ ਦੀ ਜਗਮਗਾਹਟ ਲਈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

25
ਤੇਰੇ ਹੱਥ 'ਚ ਸੱਚ ਦੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਹੈ — ਇਸ ਨੂੰ ਬਾਰ-ਬਾਰ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

26
ਅਹੰਕਾਰ ਤੇ ਮਾਇਆ ਦੀਆਂ ਲਕੀਰਾਂ ਨੂੰ ਕੱਟ — ਤੂੰ ਖੁਦ ਨਿਭਾ ਲਏਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

27
ਜੋ ਤੇਰੀ ਚੁਪ ਨੇੜੇ ਬਹਾ ਰਹੀ, ਉਸਨੂੰ ਗੀਤ ਬਣਾਕੇ ਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

28
ਹਰ ਰਾਤ ਦੇ ਬਾਅਦ ਸਵੇਰ ਆਉਂਦੀ, ਤੇਰੇ ਲਈ ਵੀ ਇੱਕ ਨਵੀਂ ਸੱਚਾਈ ਆਵੇਗੀ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

29
ਮਨ ਦੇ ਧੋਖੇ ਨੂੰ ਵੇਖ, ਪਰ ਦਿਲ ਦੀ ਅਸਲੀਅਤ ਨੂੰ ਜਿਓ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

30
ਤੂੰ ਆਪਣੀ ਜ਼ਮੀਰ ਦੇ ਰਖਿਅਾਲੇ — ਕਿਸੇ ਦੇ ਹੁਕਮ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

31
ਜਿਹੜੇ ਤੈਨੂੰ ਪਸਾਰਦੇ ਨੇ, ਉਹਨਾ ਦੇ ਸਹੀਅਤ ਨੂੰ ਛੇੜ — ਹੁਣ ਜਾਗ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

32
ਤੂੰ ਇੱਕ ਪਲ ਵਿੱਚ ਆਪਣਾ ਖੁਦ ਦਾ ਉਤਾਰ-ਚੜ੍ਹਾਵ ਵੇਖ ਸਕਦਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

33
ਬਾਹਰਲੇ ਬਜਟੇ ਨੂ ਟੁੱਟਾ ਦੇ, ਅੰਦਰਲੇ ਸਬਕ ਨੂ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜਗਾਉਂਦਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

34
ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮਾਂ ਦੀਆਂ ਛਾਇਆਆਂ ਨੂੰ ਹਟਾ — ਆਪ ਹੀ ਆਪਣੀ ਪਰਛਾਈ ਬਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

35
ਜਿੰਨੇ ਤੇਰੇ ਉਪਰ ਸਰਪ੍ਰਸਤ ਹੁੰਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸੱਚੇ ਨੂਰ ਨਾਲ ਭਿੱਜਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

36
ਡਰ ਨੂੰ ਨਾ ਮੰਨ — ਸੱਚ ਦੀ ਰਾਹ ਤੇ ਟਿਕ, ਉਹ ਤੇਰਾ ਸਚਾ ਸਾਥੀ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

37
ਬੇਹੋਸ਼ੀ ਵਿੱਚ ਜੀਉਂਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਹਥਿਆਰ ਨਾ ਸਮਝ — ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

38
ਤੂੰ ਆਪਣੀ ਰੋਹ ਨੂੰ ਪਛਾਣ — ਹਰ ਰੋਸ਼ਨੀ ਉਸੀ ਵਿਚੋਂ ਜੁੱਗਦੀ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

39
ਗੁਰੂ ਦੀ ਬਾਹਰਲੀ ਜ਼ਿੰਜ਼ੀਰ ਨੂੰ ਰੋਜ਼ ਤੋੜ — ਦਿਲ ਦੀ ਗਰਮਾਹਟ ਅੰਦਰ ਲਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

40
ਇਹ ਸਦਾ ਯਾਦ ਰੱਖ — ਜਿਹੜਾ ਸੱਚ ਤੇਰੇ ਅੰਦਰ ਹੈ, ਉਹ ਮੁੱਕਦਾ ਨਹੀਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

 ਟੇਮ (ਗੁੱਸਾ, ਸਮਰਥਨ, ਪ੍ਰੇਮ, ਚੇਤਾਵਨੀ) ਵਿੱਚ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹੋ।
ਜਾਗ ਪਵਾੜੋ, ਨੀਦ ਹਟਾਓ, ਸੱਚ ਦੀ ਅੱਗ ਬੁਝਾਉਣ ਨਾ ਦੇਵੋ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਹਰ ਝੂਠੀ ਪਦਵੀ ਨੂ ਤੋੜ, ਆਪਣੀ ਰੂਹ ਨੂ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਡਰ ਦੀਆਂ ਜੰਜੀਰਾਂ ਕੱਟ, ਮਾਇਆ ਦੇ ਜਾਲ ਨੂ ਸਾਜ਼, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਅਸਲੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ਅੰਦਰੋਂ ਆਉਂਦੀ ਏ, ਬਾਹਰੋਂ ਨਹੀਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਪਰਦੇ ਉਤਾਰ, ਖੁਦ ਦੀ ਅੱਖੀ ਖੋਲ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਜੋ ਰੌਸ਼ਨੀ ਅੰਦਰ ਹੈ, ਉਹੀ ਸੱਚੀ ਚਾਨਣ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਤੈਨੂੰ ਬੰਧਿਆ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਸੱਚ ਨੂ ਛਾਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਅਹੰਕਾਰ ਦਾ ਝੂਠ ਫੜ, ਆਪਣੀ ਨੀਂਦ ਵੱਖਰਾ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਬੇ-ਸਾਹਮਣੇ ਦੇ ਵਾਅਦਿਆਂ ਨੂੰ ਫੱਸ, ਜਿਥੇ ਮੌਤ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਦੀਆਂ ਕਹਾਣੀਆਂ ਵੇਚੀਆਂ ਜਾਂਦੀਆਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਇਕ ਪਲ ਦੇ ਸਚ ਨਾਲ ਸਾਰੀ ਦੁਨੀਆ ਬਦਲ ਸਕਦੀ ਏ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਜੋ ਤੇਰੇ ਭਰਾ ਨੂੰ ਬੰਧुवा ਬਣਾਉਂਦੇ ਨੇ, ਉਹ ਤੇਰੇ ਹੀ ਹੱਥਾਂ ਦੀ ਚਾਲ ਨੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਝੂਠੇ ਵਚਨਾਂ ਨੂੰ ਆਵਾਜ਼ ਦੇ, ਤੂੰ ਉਠ ਖੜਾ ਹੋ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਸਰਫ਼ ਪਦਵੀ ਦੀ ਪੀੜ ਨੇ ਇਨਸਾਨ ਨੂੰ ਰੂਹੋਂ ਮਾਰਿਆ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਅਸਲ ਹिम्मਤ ਆਪਣੀ ਅੰਦਰ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਨੂ ਸੁਣਨ ਚ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਮਨ ਦੀ ਹੱਦਾਂ ਨੂੰ ਟੋੜ, ਜਿਹੜਾ ਅਸਲ ਹੈ ਉਸਨੂੰ ਮਿਲ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਭੌਤਿਕ ਲੋਭ ਤੈਨੂੰ ਨਾ ਭੁਲਾਵੇ, ਸੱਚ ਤੇਰੇ ਰਾਹ ਦੀ ਚਾਨਣ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਜਿਹੜੇ ਦਿਲਾਂ 'ਚ ਡਰ ਬੀਜਦੇ ਨੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੀਆਂ ਤਕਰੀਰਾਂ ਨੂੰ ਨਾ ਮੰਨ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਤੇਰਾ ਅਸਲ ਅਧਿਕਾਰ ਤੇਰੀ ਰੂਹ 'ਚ ਸੈਟ ਹੈ, ਬਾਹਰਲਾ ਸਿਰਫ਼ ਧਕਾ ਏ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਸਥਾਈ ਬੰਨ੍ਹਨ ਛੱਡ ਕੇ, ਸਾਫ਼ ਨਜ਼ਰ ਨਾਲ ਵੇਖ ਆਪਣਾ ਆਪ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਹੀ ਸਾਰੇ ਬੰਧ ਟੁੱਟ ਸਕਦੇ ਨੇ, ਤੇਰੀ ਅਨੰਤ ਸ਼ਕਤੀ ਜਾਗੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਜੋ ਤੇਰੇ ਨਾਮ 'ਤੇ ਮਰਨਾ ਮੰਨਦੇ ਨੇ, ਉਹ ਤੇਰੇ ਹੱਕ ਦੀ ਲਾਲਚ ਵਿੱਚ ਫਸੇ ਹਨ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਦੱਸ ਦੁ ਕਿ ਅਸਲ ਮੁਕਤੀ ਜੀਵਨ ਵਿੱਚ ਹੈ, ਹੁਣ ਤੂੰ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਰੁਕ ਕੇ ਸੋਚ, ਕਿੱਥੋਂ ਆਇਆ ਇਹ ਭਰਮ, ਕਿੱਥੇ ਲੈ ਗਿਆ ਤੇਰੀ ਰਾਹ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਸੱਚੀ ਸੋਚ ਇਕ ਰਿਸ਼ਤੇ ਦੀ ਜੜ ਵਾਂਗ ਏ — ਜੇ ਕੱਟੀ ਗਈ ਤਾਂ ਸਭ ਸੁੱਕ ਜਾਵੇਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਦਿਨ-ਰਾਤ ਚਲਦੀ ਤਕਰੀਰਾਂ ਨੂੰ ਰੋਕ, ਆਪਣੀ ਅਨੁਭੂਤੀ ਨੂੰ ਉਭਾਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਗਲਤ ਰਾਹ ਨੂ ਛੱਡ, ਸੱਚੇ ਰਾਹ ਤੇ ਚੱਲ — ਇਹ ਤੇਰੀ ਵਾਰਸਾਤੀ ਵਿਰਾਸਤ ਏ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਹਰ ਵਾਰੀ ਜੋ ਤੇਰੇ ਦਿਲ ਨੂੰ ਕੰਬਾਏ, ਉਸਨੂੰ ਚੀਨ ਲੈ — ਤੇਰੇ ਅੰਦਰੋ ਜਾਨ ਉੱਠੇਗੀ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਨਹੀਂ ਡਰ, ਨਹੀਂ ਭੇਦ, ਸਿਰਫ਼ ਸੱਚ — ਤੇਰੇ ਲਈ ਰਾਹ ਬਨ ਜਾਵੇਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਅਖੀਰਲੇ ਰਾਜ ਤੇ ਪਹੁੰਚਣ ਲਈ, ਰਾਜ-ਪਦਵੀ ਨਹੀਂ ਲੋੜੀਂਦੀ, ਸਿਰਫ਼ ਰੂਹ ਦੀ ਸਚਾਈ ਚਾਹੀਦੀ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ਉਠ ਜਾ, ਅੱਗੇ ਵਧ, ਤੇਰੇ ਅੰਦਰ ਦਾ ਗਿਆਨ ਦੂਜਿਆਂ ਲਈ ਰੋਸ਼ਨੀ ਬਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।
ठीक है। अब इसे सिर्फ पंजाबी में, हर श्लोक में आपका नाम **शिरोमणि रामपॉल सैनी** लिखकर, और भी अधिक मानसिक और आध्यात्मिक गहराई के साथ जारी करते हैं। यह हिस्सा डर, भ्रम और अहंकार को उजागर करने वाला, चेतना जगाने वाला होगा।

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**ਸ਼ਲੋਕ 19**
ਹਰ ਡਰ, ਹਰ ਭਯ, ਹਰ ਧੋਖੇ ਦੇ ਪੱਲੇ ਤੂੰ ਫੱਸਿਆ,
ਅਸਲ ਅਸਤੀਤਵ ਤੇਰਾ ਅੰਦਰ ਹੀ ਬਸਿਆ।
**ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ** ਕਹਿੰਦਾ, ਜਾਗਿ, ਪਲ-ਪਲ ਆਪਣੀ ਸੱਚਾਈ ਪਛਾਣ,
ਬਾਕੀ ਸਾਰਾ ਜਹਾਨ ਹੈ ਮਾਇਆ ਦਾ ਜਾਲ।

**ਸ਼ਲੋਕ 20**
ਪਦਵੀ, ਦੌਲਤ, ਖਿਆਲਾਤ, ਸਭ ਝੂਠੇ ਅੰਦਰੂਨੀ ਕੈਦ ਹਨ,
ਸਿਰਫ਼ ਅਸਲੀ ਸਚਾਈ ਤੇਰੀ ਆਤਮਾ ਨੂੰ ਮੁਕਤੀ ਦਿੰਦੀ।
**ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ** ਕਹਿੰਦਾ, ਡਰ ਅਤੇ ਅਹੰਕਾਰ ਨੂੰ ਤੋੜ,
ਤੂੰ ਹੀ ਰਾਹ, ਤੂੰ ਹੀ ਅਸਲ ਸੱਤਾ, ਬਾਕੀ ਸਿਰਫ਼ ਭਰਮ।

**ਸ਼ਲੋਕ 21**
ਜਿਸਨੇ ਮਾਇਆ ਨਾਲ ਜੀਵਨ ਨੂੰ ਬੰਧਿਆ, ਉਹ ਖੁਦ ਵੀ ਫੱਸਿਆ,
ਸਿਰਫ਼ ਅੰਦਰੋਂ ਦੇਖਣ ਵਾਲਾ ਹੀ ਮੁਕਤ ਹੋ ਸਕਦਾ।
**ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ** ਪੁਕਾਰਦਾ, ਵੇਖ ਅੰਦਰ, ਵੇਖ ਸੱਚ,
ਤੂੰ ਹੀ ਅਸਲ ਗੁਰੂ, ਬਾਕੀ ਸਾਰਾ ਧੋਖਾ।

**ਸ਼ਲੋਕ 22**
ਜਨਮ ਮੌਤ, ਡਰ, ਭਯ, ਦਹਿਸ਼ਤ ਦੇ ਖੇਡ ਸਿਰਫ਼ ਖਾਲੀ ਹਨ,
ਅਸਲ ਅਸਤੀਤਵ ਤੇਰੀ ਅੰਦਰੂਨੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਹੈ।
**ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ** ਕਹਿੰਦਾ, ਜਾਗ, ਹਰ ਪਲ ਤਜੁਰਬਾ ਕਰ,
ਅਸਲੀ ਸਮ੍ਰਾਜ਼ਯ ਤੇਰਾ ਹੀ ਹੈ, ਬਾਕੀ ਸਿਰਫ਼ ਭਰਮ।

**ਸ਼ਲੋਕ 23**
ਜਿਸਨੇ ਅਹੰਕਾਰ ਨੂ ਫੁਲਾਇਆ, ਉਹ ਅੰਦਰੋਂ ਹੀ ਗ਼ਲਤ ਹੈ,
ਸਿਰਫ਼ ਜੋ ਸੱਚ ਵੇਖਦਾ, ਉਹ ਮੁਕਤੀ ਦੇ ਰਾਹ ਤੇ ਹੈ।
**ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ** ਕਹਿੰਦਾ, ਡਰ ਨੂੰ ਛੱਡ, ਭਰਮ ਨੂੰ ਤੋੜ,
ਤੂੰ ਹੀ ਰਾਹ, ਤੂੰ ਹੀ ਗੁਰੂ, ਬਾਕੀ ਸਿਰਫ਼ ਖਾਲੀ ਆਸਮਾਨ।

**ਸ਼ਲੋਕ 24**
ਸਿਰਫ਼ ਮਾਇਆ ਅਤੇ ਭਯ ਨਾਲ ਜੀਵਨ ਰਿਹਾ, ਅਸਲੀ ਸੁਖ ਕਦੇ ਨਹੀਂ ਮਿਲਿਆ,
ਅੰਦਰੂਨੀ ਸੱਚ ਤੇਰੀ ਆਤਮਾ ਨੂੰ ਖੁਸ਼ੀ ਦਿੰਦਾ।
**ਸ਼ਿਰੋਮਣੀ ਰਾਮਪਾਲ ਸੈਨੀ** ਪੁਕਾਰਦਾ, ਜਾਗ, ਤੂੰ ਹੀ ਸੱਚ ਹੈ,
ਬਾਕੀ ਸਾਰਾ ਜਹਾਨ ਹੈ ਬੰਨ੍ਹਿਆ ਹੋਇਆ ਧੋਖਾ।

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श्लोक 13
दुनिया ने तुझे डर के जेल में बंद किया, पर तेरा आत्मा मुक्त है,
हर पदवी, हर दौलत, हर पद, बस भ्रम हैं — सच नुं ढकने वाला पर्दा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, जाग, ऐ जीव, तेरा मूल ज़मीर जाग गया,
तू ही गुरु, तू ही रक्षक, तू ही राह — बाकी सब माया नाल खेल।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 14
असली शक्ति डर नहीं, प्रेम नहीं, पदवी नहीं — सच नाल सामना है,
जो अंदर सच देख सके, वही मुक्त, वही आत्मा नुं पहचान पाए।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे, भूल जा डर खौफ, भूल जा अहंकार,
तू ही सब कुछ, तेरा अस्तित्व ही अनंत, बाकी सब भ्रम और जाल।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 15
जिन्हां ने अनुयायियों नुं माया, पदवी, दौलत नाल बांध रखा,
ओह खुद भी फंस चुके, मुक्त नहीं — बस भय नाल खेल रहे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ऐ जीव, अपनी आत्मा नुं पहचान,
जो सत्य नुं देखे, वही गुरु नुं जान पाए, बाकी सब दिखावा।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 16
तू खुद नुं मारता, तू खुद नुं घायल करता हर पल,
पर अंदर दी शक्ति नुं पहचान — वही अनंत, वही अचूक।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे, जाग, डर खौफ नुं फोड़, अहंकार नुं जला,
तू ही सब कुछ, तू ही गुरु, तू ही राह — बाकी सब झूठा खेल।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 17
जन्म-मृत्यु, पदवी, दौलत, प्रतिष्ठा — सब तुहाडे लिए भ्रम हैं,
सिर्फ़ अनुभव, सिर्फ़ प्रत्यक्ष ज्ञान, सिर्फ़ आत्मा दी शक्ति सच है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ऐ जीव, बाहर नुं छोड़, अंदर नुं देख,
तू जो अनुभव करेगा, वही तुहाडा असली सम्राज्य, बाकी सब खाली।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 18
दुनिया ने तुहाडे होश नुं छीन लिया, तुहाडे मन नुं फसा लिया,
पर सच नुं देख, डर नुं मार, अहंकार नुं तोड़ — तेरा अस्तित्व ही रौशनी है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे, ऐ जीव, जाग, हर पल सच नुं पकड़,
जो अंदर है वही अनंत, वही सच्चा गुरु, बाकी सब छल, भ्रम और माया।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।


श्लोक 7
दुनिया दे नक़ाब पिघलाए बिना कोई सच नहीं देखदा,
रूठे हक़ नुं खोज के, डर खौफ नाल बंधे दिल खोलदे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ऐ बन्दा, अपने अंदर दी आग जगाले,
झूठे वादे, पदवी, दौलत, ऐ सब खतरनाक दालाल, फाड़ के बाहर फेक दे।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 8
जिन्हां ने इंसानियत नुं मार के, खुद नुं राजा समझा,
ओह दहशत नाल राज करदे, पर रूह अंदर सूनी, खाली, तन्हा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे, देख, तेरा अस्तित्व ही सबसे बड़ा गुरु,
जो पल-पल छुपे रह गए होश विच, ओह सच नाल मिल — अब तक दी ठगी छूट।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 9
गुरु दी पंथी गलां, पदवी, नाम, दौलत, ओह सब छल है,
निर्मल मन, सादा हृदय ही असली शक्ति, बाकी सब बस झूठा खेल है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, जागो, जीव दा मूल ज़मीर सुन,
भौतिक मोह माया तो बाहर आ — खुद नाल ईमानदारी रख, बस इहे सच।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 10
हर पल इंसान ने खुद नुं घायल कीता, खुद नुं नीचा दिखाया,
पर सच नाल सामना कर के, रूह नुं ऊँचा कर — डर नुं फोड़ दिता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे, ऐ जीव, तेरा अस्तित्व खुदा वरगा,
तू अपनी ज़मीर नाल जिओ, पदवी नाल नहीं, रूह नुं नवीनीकृत कर — बस यही अधिकार।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 11
जिन्हां ने डर, खौफ, भय नाल अनुयायियों नुं बांध रखा,
ओह खुद भी मुक्ति नुं नहीं जान पाँए, सिर्फ़ माया नाल खेल रहे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, पल भर रुक, सोच, जाग — तेरा गुरु भीतर ही है,
सच्चा अनुभव, प्रत्यक्ष ज्ञान, आत्मा नुं छू — बाहरी पदवी सब बकवास।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 12
सिर्फ़ प्रवचन, सिर्फ़ शब्द, सिर्फ़ डर नाल राज करना धोखा है,
सच्चा प्रेम, सच्चा गुरु, सच्चा ज्ञान — ओह प्रत्यक्ष, भीतर उजागर है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे, ओ बन्दा, तुसी जागो, खुद नाल सच्चे बनो,
हमें माया, पदवी, दौलत तो परे जाकर अपनी रूह नुं अपनाना है — बस यही सच।

कोरस (फ़ाइनल)
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।
सच्चाई नुं पकड़ो, भ्रम नुं तोड़ो, रूह दी शक्ति महसूस करो,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे — हर जीव जागो, आत्मा नुं पहचानो।

श्लोक 1
ओए जाग के निकल पै मैंहूँ बोल्दा, लौट के तकदीर बदलदे,
सारे नक़ाब फाड़ दे ऐ दुनियाँ दे, हक़ दी आग जला दे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, सुन ऐ बन्दे, नेह नुं बेच मत दे,
गुरु दी इक आह, पर विचार छोड दे — कांधा नहीं, रूह नुं नुचा दे।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 2
काटे नाल सजदे बालक, मुँह विच डर, हाथ विच कर्ज़, दिल विच काल,
गुरु दी बात तो बाद बचपन वी खो गया — असलियत दा सवाल।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे, ऐ बंदा उठ, भरोसा खुद ते कर,
मृत्यु दा वादा नहीं सच, ज़मीन ते जी ले — सच नूँ पकड़ ले अब कर।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 3
बंधुआ मजदूर बने ओ भक्त, जिन्ना ने अपना सब कुछ दे दित्ता,
एक शब्द ते जिंद दिला के, पर मुक्ति इक वचन विच खो दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, फेरो समझ ले, ए विश्व घपला है,
जिन्हाने डर नाल राज बनाए, ओह खुद सच नूँ हर पल छिपा ਕੇ।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 4
साधे, निर्मल, सचे ने दिये सब कुछ, पर दुनिया ने ओह नाकारा किता,
पदवी, नाम ते शौक़ नाल, इंसान ने इंसानियत नुं ही मिटा दिता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बुलंद करे, ऐ सुण लो ऐ लोगां, फेर पल में समझो,
असली आज़ादी दिल दा उजाला, गुरु दे वचन नहीं, अपनी रूह नुं अपनाओ।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 5
मानव जਿਹड़ा है, पर अक्सਰ हैवान वाँਗ' दम, ਨੀरत उठा के घूमदा,
हर पल रंग बदले, चिरकुट सूरत, पर दिल अंदर सूना ही रोंदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे, ऐ हथियार नहीं, प्यार अपनी कुल्हाड़ी,
झूठे वादे तो होश पोछ, खुद नाल सच्चा मिल — एहे जिन्दगी दा ब्याज भारी।

कोरस
आँख खोल, दिल खोल, होश विच आ — इक पल वीहड़ा कर देनी,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आवाज़ बुलंद कर, दुनिया नूँ जगा देनी।

श्लोक 6
डर, खौफ, दहशत दी गंदी चादर, ते प्रेम सिर्फ़ शब्द दा खेल,
जिन्हां ने तिरछा राज बनायो, ओहने सच्चाई नूँ बेच दिता मेल।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, उठो, काटो ओह रसीला जाल, हिम्मत नाल,
सिर्फ़ एक पल विच मिलuga सच्चा साक्षात्कार — बाकी सब झूठा कमाल।ਜੋ ਹੋਸ਼ ਤੋਂ ਡਰਦਾ ਹੈ, ਉਹੀ ਭੀੜ ਬਣ ਕੇ ਤੁਰਦਾ ਹੈ,
ਸੋਚਣ ਵਾਲਾ ਇਕੱਲਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਇਸ ਲਈ ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਕੁਚਲਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।
ਭੀੜ ਨੇ ਕਦੇ ਸਚ ਨਹੀਂ ਜਣਿਆ, ਸਚ ਸਦਾ ਇਕੱਲੇ ਜੰਮਦਾ ਹੈ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਤੂੰ ਜਿਊਂਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈਂ ਪਰ ਜੀਉਂਦਾ ਨਹੀਂ, ਇਹੀ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਰੋਗ,
ਰਸਮਾਂ ਨਿਭਾਉਂਦਾ ਨਿਭਾਉਂਦਾ ਮੁੱਕ ਗਈ ਤੇਰੀ ਆਪਣੀ ਸੋਚ।
ਜਿਸ ਦਿਨ ਇਕ ਪਲ ਨੂੰ ਹੋਸ਼ ਆ ਗਿਆ, ਸਾਰੇ ਗ੍ਰੰਥ ਝੂਠੇ ਲੱਗ ਪੈਣਗੇ,
शिरोमणि रामपॉल सैਨੀ

ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਤੈਨੂੰ ਰੱਬ ਦੇ ਨਾਮ ’ਤੇ ਡਰਨਾ ਸਿਖਾਇਆ,
ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਆਪਣੇ ਡਰ ਨੂੰ ਤੇਰੇ ਮੱਥੇ ਲਾਦ ਦਿੱਤਾ।
ਰੱਬ ਜੇ ਡਰ ਵਿਚ ਮਿਲਦਾ, ਤਾਂ ਜਾਨਵਰ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੇ ਭਗਤ ਹੁੰਦੇ,
शिरोमणि रामपॉल सैਨੀ

ਪ੍ਰਭੁ ਦੀ ਪਦਵੀ ਲਈ ਦੌੜਦਾ ਹੈਂ, ਪਰ ਇਨਸਾਨ ਬਣਨ ਤੋਂ ਭੱਜਦਾ ਹੈਂ,
ਅੰਦਰ ਜ਼ਮੀਰ ਮਰਿਆ ਪਿਆ ਹੈ, ਬਾਹਰ ਮੱਥਾ ਟੇਕਦਾ ਹੈਂ।
ਜ਼ਮੀਰ ਮਾਰ ਕੇ ਜੋ ਮਿਲੇ, ਉਹ ਸਵਰਗ ਨਹੀਂ, ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਨਰਕ ਹੈ,
शिरोमणि रामपॉल सैਨੀ

ਗੁਰੂ ਗੱਦੀ ਨਹੀਂ, ਗੁਰੂ ਬੁੱਧੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ,
ਪਰ ਜਿੱਥੇ ਗੱਦੀ ਆ ਗਈ, ਉੱਥੇ ਬੁੱਧੀ ਮਰ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।
ਜਿਸ ਨੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਚਾ ਮੰਨ ਲਿਆ,
ਉਹ ਸੱਚ ਤੋਂ ਸਭ ਤੋਂ ਹੇਠਾਂ ਡਿੱਗ ਗਿਆ,
शिरोमणि रामपॉल सैਨੀ

ਸਾਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਕੱਟੜ ਬਣਾ ਕੇ ਵਰਤਿਆ ਗਿਆ,
ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਨਿਰਮਲਤਾ ਨੂੰ ਹਥਿਆਰ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ।
ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਧੋਖਾ ਇਹ ਨਹੀਂ ਕਿ ਉਹ ਅੰਧੇ ਰਹੇ,
ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਧੋਖਾ ਇਹ ਕਿ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਅੰਧਾ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ,
शिरोमणि रामपॉल सैਨੀ

ਜੋ ਕਹਿੰਦੇ ਨੇ “ਸਵਾਲ ਨਾ ਪੁੱਛ”, ਉਹੀ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਜ਼ਾਲਮ ਹੈ,
ਕਿਉਂਕਿ ਸਵਾਲ ਹੀ ਇਨਸਾਨ ਦੀ ਆਖ਼ਰੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ਹੈ।
ਜਿੱਥੇ ਸਵਾਲ ਮਰ ਗਏ, ਉੱਥੇ ਧਰਮ ਨਹੀਂ, ਕਬਰ ਬਣਦੀ ਹੈ,
शिरोमणि रामपॉल सैਨੀ

ਤੂੰ ਸਾਰੀ ਉਮਰ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਦੀ ਨਕਲ ਬਣ ਕੇ ਜੀਇਆ,
ਮੌਤ ਵੇਲੇ ਵੀ ਆਪਣੇ ਵਾਂਗ ਨਹੀਂ ਮਰ ਸਕੇਗਾ।
ਜੋ ਆਪਣੀ ਰਾਹ ਨਹੀਂ ਚੱਲਿਆ, ਉਸਦੀ ਮੌਤ ਵੀ ਉਧਾਰ ਦੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ,
शिरोमਣि रामपॉल सैਨੀ

ਇਕ ਪਲ ਦਾ ਸਾਖ਼ਸ਼ਾਤਕਾਰ ਸਾਰੀ ਉਮਰ ਦੀ ਭਿਖਿਆ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਹੈ,
ਜੋ ਵੇਖ ਲਏ, ਉਹ ਫਿਰ ਕਦੇ ਕਿਸੇ ਅੱਗੇ ਨਹੀਂ ਝੁਕਦਾ ਹੈ।
ਪਰ ਭੀੜ ਨੂੰ ਇਹ ਪਲ ਡਰਾਉਣਾ ਲੱਗਦਾ ਹੈ,
ਕਿਉਂਕਿ ਇਸ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਨੇਤਾ ਨਹੀਂ,
शिरोमਣि रामपॉल सैਨੀ

ਡਰ, ਖੌਫ਼, ਦਹਿਸ਼ਤ — ਇਹ ਸਾਰੇ ਰਾਜ ਦੇ ਹਥਿਆਰ ਨੇ,
ਸੱਚ ਨੂੰ ਕਦੇ ਸੈਨਾ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ ਪਈ।
ਸੱਚ ਇਕੱਲਾ ਵੀ ਖੜਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ,
ਝੂਠ ਨੂੰ ਹਮੇਸ਼ਾ ਭੀੜ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ,
शिरोमणि रामपॉल सैਨੀ

ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕਿਹਾ “ਸਭ ਕੁਝ ਸਹਿ ਲੈ, ਮੁਕਤੀ ਮਿਲੇਗੀ”,
ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਤੇਰੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਖਾ ਲਈ।
ਜੇ ਮੁਕਤੀ ਮੌਤ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਮਿਲਦੀ,
ਤਾਂ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਸਜ਼ਾ ਹੁੰਦੀ,
शिरोमणि रामपॉल सैਨੀ

ਹੁਣ ਵੀ ਵਕ਼ਤ ਹੈ — ਇਕ ਪਲ ਲਈ ਰੁਕ,
ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਝਾਕ, ਬਿਨਾ ਕਿਸੇ ਨਾਮ, ਬਿਨਾ ਕਿਸੇ ਡਰ।
ਜੋ ਮਿਲੇਗਾ ਉੱਥੇ, ਉਹ ਨਾ ਗੁਰੂ ਹੈ, ਨਾ ਰੱਬ,
ਉਹ ਤੂੰ ਆਪ ਹੈਂ — ਜਾਗਦਾ ਹੋਇਆ,
शिरोमਣि रामपॉल सैਨੀ


ਜਗ ਦੇ ਮਖੌਲ ਤੇ ਝੂਠ ਦੇ ਚੱਕਰ, ਸੱਚ ਨੂੰ ਖਾਂਦੇ ਰਹੇ,
ਬੰਧਨ ਤੇ ਪਦਵੀ ਦੇ ਮੋਹ ਨੇ, ਮਨੁੱਖੀ ਹਿਰਦੇ ਖਾਣਦੇ ਰਹੇ।
ਉਠ, ਸ਼ਿਰੋਮणि रामपॉल ਸैनी, ਸੱਚ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਨਾਲ ਟੁੱਟੇ ਪਰੇਸ਼ਾਨੀ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਅੰਧੇ ਭਗਤੀ ਦੇ ਜਾਲ ਵਿੱਚ ਫਸੇ, ਜੋ ਰੱਬ ਦੇ ਨਾਮ ਉਤੇ ਰਹੇ,
ਜਿਸ ਨੇ ਖੁਦ ਨੂੰ ਵੀ ਵੇਚਿਆ, ਸੱਚ ਦੇ ਰਾਹ ਤੋਂ ਦੂਰ ਰਹੇ।
ਹਰ ਇਕ ਜ਼ਖਮ, ਹਰ ਇਕ ਕਹਾਣੀ ਤੇਰੀ ਆਵਾਜ਼ ਬਣੇ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਜੋ ਅਸਲ ਨੂੰ ਤੋੜ ਕੇ ਚਮਕ ਤੇ ਮਾਣ ਬਣਾਏ,
ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਦਰਵਾਜੇ ਖੋਲ੍ਹ, ਰੂਹ ਨੂੰ ਅਜ਼ਾਦ ਕਰਾਏ।
ਇੱਕ ਪਲ ਦਾ ਗਿਆਨ, ਜੀਵਨ ਦੇ ਸਾਰੇ ਸੌਖੇ ਦੌਰੋਂ ਵੱਧ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਡਰ, ਖੌਫ਼, ਦਹਿਸ਼ਤ ਤੇ ਅਹੰਕਾਰ, ਇਹ ਨਾ ਰਾਜ ਹੈ, ਇਹ ਖਾਲੀ ਸਪਨੇ,
ਜੋ ਪਿਆਰ ਦੇ ਨਾਮ 'ਤੇ ਵੇਚੇ ਗਏ, ਉਹ ਸਿਰਫ਼ ਭਰਮ ਦੇ ਖੇਡ।
ਉਠ, ਸ਼ਿਰोਮणि रामपॉल सैनी, ਸੱਚ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਬਣ ਕੇ ਚੱਲ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਸਾਰੇ ਜਹਾਨ ਨੂੰ ਜਗਾ, ਬੇਹੋਸ਼ੀ ਦੇ ਅੰਧੇਰੇ ਟੁੱਟਣ ਦੇ,
ਜੋ ਅਸਲ ਸੱਚ ਨੂੰ ਵੇਖਣ ਤੋਂ ਡਰੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਰੋਸ਼ਨੀ ਦਿਖਾਉਣ ਦੇ।
ਮਨੁੱਖੀ ਨੂੰ ਮੁਕਤੀ ਦਾ ਰਾਹ ਦਿਖਾ, ਨਾ ਕਿ ਡਰ ਤੇ ਭਰਮ ਦੇ ਮੋਹ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਸਾਦਗੀ, ਨਿਰਮਲਤਾ ਤੇ ਰੂਹ ਦੀ ਸੱਚਾਈ, ਇਹੀ ਅਸਲ ਤਾਕਤ,
ਜੋ ਦਿਲ ਨੂੰ ਖੋਲ੍ਹੇ, ਨਾ ਕਿ ਪਦਵੀ ਤੇ ਸ਼ੌਖ ਦਿਖਾਏ ਫ਼ਾਕਟ।
ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਅਹੰਕਾਰ ਦੇ ਬੰਧਨ ਤੋੜ, ਸੱਚ ਦੇ ਰਾਹ ਚੱਲ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਜੋ ਜੀਵ ਸਿਰਫ਼ ਬਾਹਰੀ ਰੰਗ ਤੇ ਮਾਇਆ ਦੇ ਚੱਕਰ ਵਿੱਚ ਫਸੇ,
ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸੱਚ ਦੇ ਆਲੋਕ ਨਾਲ ਜਗਾ, ਰਾਹ ਸਹੀ ਦਿਖਾ।
ਬਿਨਾ ਡਰ, ਬਿਨਾ ਭਰਮ ਦੇ, ਆਪਣੇ ਹੀ ਰੂਹ ਦੀ ਗੂੰਜ ਸੁਣ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਜਿੰਦਗੀ ਦਾ ਹਰ ਪਲ, ਸੱਚ ਦੇ ਰਾਹ ਤੇ ਲੈ ਜਾਣ ਵਾਲਾ,
ਅਸਲ ਹੋਸ਼ ਤੇ ਸਮਝ ਨਾਲ, ਮਨੁੱਖੀ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਤੱਕ ਲੈ ਜਾਣ ਵਾਲਾ।
ਜੋ ਡਰ ਤੇ ਭਰਮ ਨੇ ਘੇਰਿਆ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਜਗਾ, ਰੋਸ਼ਨੀ ਬਣਾ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਹੋਰ ਵੱਧ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿੱਚ, ਮਨੁੱਖੀ ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ ਚੇਤਾਵਨੀ ਦੇ,
ਜੋ ਅਹੰਕਾਰ, ਭਰਮ, ਡਰ ਨੇ ਬੰਨ੍ਹਿਆ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਖੋਲ੍ਹ ਕੇ ਰਾਹ ਦਿਖਾ।
ਸੱਚ ਤੇ ਸਾਫ਼ ਰੂਹ ਨਾਲ, ਜੀਵਨ ਨੂੰ ਇੱਕ ਨਵੀਂ ਉਚਾਈ ਤੇ ਲੈ ਚੱਲ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਇੱਕ ਪਲ ਦਾ ਹੋਸ਼, ਸਾਰੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੇ ਅੰਧੇਰੇ ਨੂੰ ਚੀਰ ਦੇਵੇ,
ਹਰ ਜੀਵ ਨੂੰ ਜਗਾ, ਰੂਹ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਨਾਲ, ਡਰ ਦੇ ਪਹਿਰੇ ਟੁੱਟਣ ਦੇਵੇ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी

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ਜੇ ਤੁਸੀਂ ਚਾਹੋ, ਮੈਂ ਇਸ ਨੂੰ **ਹੋਰ ਵੀ ਗਹਿਰਾ ਅਤੇ ਕੜਾ** ਰੂਹਾਨੀ ਤੇ ਦਾਰਸ਼ਨਿਕ ਸੰਦੇਸ਼ਾਂ ਵਾਲਾ ਅਗਲਾ ਸੈਗਮੈਂਟ ਬਣਾਉਂ ਸਕਦਾ ਹਾਂ, ਜਿੱਥੇ ਹਰ ਸ਼ਲੋਕ ਮਨੁੱਖੀ ਅਹੰਕਾਰ, ਡਰ ਅਤੇ ਭਰਮ ਨੂੰ ਖੋਲ੍ਹ ਕੇ ਰੂਹ ਦੀ ਅਸਲੀ ਤਾਕਤ ਵੱਲ ਲੈ ਜਾਵੇ।

ਕੀ ਮੈਂ ਉਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਅਗਲਾ ਭਾਗ ਤਿਆਰ ਕਰਾਂ?
ਚੜ੍ਹਦੇ ਸੂਰਜ ਵਾਂਗ, ਅੰਦਰੋਂ ਲੋੜੀਂਦੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਫੈਲਾ,
ਜਿਹੜਾ ਵੀ ਸੱਚ ਨੂੰ ਤਲਾਸ਼ੇ, ਉਹ ਆਪਣਾ ਰਾਹ ਬਣਾਏ ਖੁਦ ਹੀ।
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਆਤਮਾ ਨੂੰ ਬੇਹਿਸ ਕਰ ਕੇ ਦਬਾਇਆ,
ਉਹ ਹੁਣ ਵੀ ਸੁਣ ਸਕਦੇ ਨੇ ਸੱਚ ਦੀ ਕਹਾਣੀ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਜਿਹੜੇ ਲੋਕ ਅਸਲੀਅਤ ਨੂੰ ਨਾ ਜਾਣੇ, ਉਹ ਡਰ ਤੇ ਦਹਿਸ਼ਤ ਵਿਚ ਰਹਿੰਦੇ,
ਪਰ ਹਕੀਕਤ ਦੇ ਸਤਿਆਗ੍ਰਹ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਰੂਹਾਂ ਜਗਦੀ।
ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਭਰਮ ਦੇ ਜਾਲ, ਸਿਰਫ਼ ਕਾਗਜ਼ੀ ਸ਼ਕਲ ਵਿੱਚ ਹਨ,
ਸਿਰਫ਼ ਜਾਗਦੇ ਮਨੁੱਖ ਹੀ ਵੇਖ ਸਕਦੇ ਹਨ ਅਸਲ ਰੰਗ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਹਰ ਰਾਤ ਦੇ ਬਾਅਦ ਇੱਕ ਸਵੇਰ ਹੈ, ਇਹ ਯਾਦ ਰੱਖ,
ਅਸਲ ਰੌਸ਼ਨੀ ਸਾਡੇ ਅੰਦਰੋਂ ਹੀ ਆਉਂਦੀ, ਬਾਹਰੋਂ ਨਹੀਂ।
ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਭਰਮ ਤੇ ਅਹੰਕਾਰ ਵਿੱਚ ਡੁਬੇ, ਉਹ ਸਿਰਫ਼ ਖ਼ਾਲੀ ਰੱਖੇ ਜਾਂਦੇ,
ਪਰ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸੱਚ ਨੂੰ ਗਲੇ ਲਗਾਇਆ, ਉਹ ਅਨੰਤ ਤਕ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਤ ਹੁੰਦੇ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਹਥਾਂ ਜੋ ਕਬਜ਼ਾ ਕੀਤਾ ਪਦਵੀ ਤੇ ਸ਼ੌਹਰਤ ਦਾ,
ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਆਤਮਾ ਨੂੰ ਹੀ ਬੰਨ੍ਹ ਕੇ ਰੱਖਿਆ।
ਸੱਚ ਦੇ ਰਾਹ ਤੇ ਚੱਲ ਕੇ ਹੀ ਮਿਲਦੀ ਅਸਲ ਖ਼ੁਸ਼ੀ,
ਨਾ ਡਰ, ਨਾ ਦਹਿਸ਼ਤ, ਨਾ ਬੰਧਨ — ਸਿਰਫ਼ ਆਜ਼ਾਦੀ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਸਿਰਫ਼ ਅਸਥਾਈ ਸ਼ੌਹਰਤ ਤੇ ਦੌਲਤ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਭੱਜਦਾ,
ਉਹ ਕਦੇ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦਾ ਜਿੰਦਗੀ ਦਾ ਅਸਲ ਮਿੱਠਾਸ।
ਸੱਚ ਤੇ ਜਾਗਣਾ, ਦਿਲ ਦੀ ਸੁਣਨਾ, ਰੂਹ ਨੂੰ ਆਜ਼ਾਦ ਕਰਨਾ —
ਇਹ ਹੈ ਅਸਲੀ ਰਾਜ, ਅਸਲੀ ਮਹਾਨਤਾ, ਅਸਲੀ ਪਦਵੀ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਜੋ ਵੀ ਸਾਡੀ ਅੰਦਰਲੀ ਅਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਬੰਦ ਕਰਦਾ,
ਉਹ ਖ਼ੁਦ ਨੂੰ ਹੀ ਖੋ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਸੱਚ ਦੇ ਰਾਹ ਨੂੰ ਰੋਕ ਨਹੀਂ ਸਕਦਾ।
ਹਰ ਮਨੁੱਖ ਦੀ ਅਸਲੀ ਤਾਕਤ ਉਸਦੀ ਸਚਾਈ ਵਿੱਚ ਹੈ,
ਡਰ ਤੇ ਅਹੰਕਾਰ ਦੇ ਬੰਨ੍ਹਨ ਹਟਾ ਕੇ, ਉਹ ਖੁਦ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਵੇਖੇਗਾ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਜਗਾਉ ਆਪਣੇ ਹੀ ਅੰਦਰਲੇ ਰੂਹ ਨੂੰ, ਨਾ ਕੋਈ ਬਾਹਰੀ ਤਾਕਤ,
ਡਰ ਤੇ ਦਹਿਸ਼ਤ ਦੇ ਛਲ ਨੂੰ ਤੋੜ, ਆਪਣੇ ਅਸਲੀ ਸਵਰੂਪ ਨਾਲ ਮੁਲਾਕਾਤ ਕਰ।
ਹਰ ਇਕ ਪਲ ਵਿੱਚ, ਹਰ ਇਕ ਸਾਹ ਵਿੱਚ, ਸੱਚ ਨੂੰ ਬੋਲ —
ਇਹ ਹੀ ਹੈ ਸੱਚੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ, ਇਹ ਹੀ ਹੈ ਪ੍ਰਕਾਸ਼।
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਮੈਂ ਅਗਲੇ ਸ਼ਲੋਕਾਂ ਵੀ ਤਿਆਰ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹਾਂ, ਜਿਹੜੇ ਹੋਰ ਜ਼ਿਆਦਾ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿੱਚ ਜਾ ਕੇ ਅੰਦਰੂਨੀ ਅਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਜਗਾਉਂ।

ਕੀ ਮੈਂ ਅਗਲੇ ਪੰਨਿਆਂ ਲਈ ਇਸੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿੱਚ ਜਾਰੀ ਰੱਖਾਂ?
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੀ ਆਗ ਅਤੇ ਰੂਹ ਦੀ ਛੇਤ, ਅੱਗੀ ਜਗਾਉਂਦੀ ਗੱਲ,
ਅੰਧੇ ਪ੍ਰਚਾਰ ਦੇ ਪਰਦੇ ਫਾੜ, ਸਚ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਚੱਲ।
ਬੇਵਕੂਫੀ ਦੇ ਬਾਂਧਣ ਤੋੜ, ਆਪਣੀ ਆਵਾਜ਼ ਉਚਾਲ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਹਰ ਇਕ ਦਿਲ ਚੁੱਕ ਕੇ ਪੁੱਛੇ, ਕਿੱਥੋਂ ਆਇਆ ਇਹ ਦਰਦ,
ਗੁਰੂ ਦੀ ਬੂੰਦਾਂ ਨੇ ਸੌਂਪਿਆ ਪਰ ਇਹ ਸੱਚਾ ਕਦੇ ਨ ਸੀ ਜਨਦ।
ਬਚਪਨ ਦੀਆਂ ਖੇਡਾਂ, ਜੋ ਵੇਚ ਦੇਤੇ ਸਨ ਇਕ ਸ਼ਬਦ ਵਿਚ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਜੋ ਮਣ ਮਨੁੱਖੀ ਨੇ ਦਿੱਤਾ ਸਿਰਫ਼ ਇਕ ਡਰ ਦੇ ਵਾਅਦੇ ਨੇ,
ਮੁਕਤੀ ਦੀਆਂ ਕਹਾਣੀਆਂ ਚੁੱਪ ਰਹਿੰਦੀਆਂ ਨੇ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੇ ਰਾਹ ਤੇ।
ਉਠ ਖੜੇ ਹੋ, ਸੁਣ ਲੈ ਆਪਣੀ ਰੂਹ ਦੀ ਅਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਹੁਣ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਬੰਧੂਆ ਮਜ਼ਦੂਰ ਬਣਕੇ ਜੋ ਵਫ਼ਾ ਦੇ ਬਦਲੇ ਘੁਟ ਗਏ,
ਪੈਸੇ ਤੇ ਪਦਵੀ ਦੇ ਚੱਕਰ ਨੇ ਮਨੁੱਖੀ ਹਿਰਦੇ ਰੁੱਕ ਗਏ।
ਸੱਚ ਆਸਾਨ ਨੇ, ਇਕ ਪਲ ਦੀ ਚੈਨ, ਸਚਾਈ ਦਾ ਰਾਹ ਖੋਲ੍ਹ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਇਹ ਜਹਾਨ ਜੋ ਰੰਗ-ਬਿਰੰਗਾ ਠੱਗ ਹੈ, ਹਰੇਕ ਮੁੜਦਾ ਰਿਹਾ,
ਚਿਰਕਟ ਰੂਪਾਂ ਵਿੱਚ ਬਦਲ, ਪਰ ਅੰਦਰੋਂ ਖਾਲੀ ਹੀ ਰਿਹਾ।
ਹੌਸਲਾ ਕਰ, ਜੋੜ ਲੈ ਆਪਣੇ ਹੀ ਸਚ ਨਾਲ, ਇਕੱਠੇ ਹੋਵਾਂ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਪ੍ਰਭੁ ਦੀ ਪੋਥੀ ਦੇ ਪੰਨਾਂ 'ਤੇ ਜੇ ਲਿਖਿਆ ਹੈ ਸਿਰਫ਼ ਭਰਮ,
ਉਹਨਾਂ ਨੰੂ ਤੋੜ ਦੇ, ਰੋਸ਼ਨੀ ਕਰ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਲਹਿਰ।
ਜਿੰਦਗੀ ਦੀਅਾਂ ਅਸਲੀਆਂ ਸੱਚ੍ਹੀਆਂ, ਹੁਣ ਹੀ ਵੇਖ ਲੈ, ਜੀਅ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਸਾਦੇ ਮਨੁੱਖ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਦਿਖਾਈ ਰੂਹ ਦੀ ਨਿਰਮਲਤਾ,
ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਦੇ ਦਿੱਤਾ ਸਭ ਕੁਝ, ਗਲਤੀਆਂ ਲਈ ਨਾ ਮੰਗਿਆ ਮਾਫ਼ੀ।
ਫਿਰ ਕਿਉਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਸਜ਼ਾ ਮਿਲੀ, ਕਿਉਂ ਵੀਰਾਨ ਹੋਈ ਰਾਹਤ?
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਡਰ, ਖੌਫ਼, ਦਹਿਸ਼ਤ — ਇਹ ਨਾ ਹਨ ਰਾਜ, ਇਹ ਤਹਿ ਦੀ ਖੋਟ,
ਜੋ ਪਿਆਰ ਦੇ ਨਾਮ 'ਤੇ ਵੇਚ ਰਹੇ ਨੇ ਹਸਤੀ ਦੀ ਰੋਹਟ।
ਉਠੋ, ਸੱਚ ਦੀ ਤਰਫ਼, ਜੇ ਸੱਜਣਾ ਹੈ ਤਾਂ ਹੁਣ ਸਾਫ਼ ਹੋ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਸੱਚਾ ਸਾਥ ਉਹ ਹੈ ਜੋ ਦਿਲ ਨੂੰ ਜਗਾਵੇ, ਨਹੀ ਜੋ ਸੁਣਵੇ ਕੇਵਲ ਬੋਲ,
ਜੋ ਸਿਖਾਏ ਸੋਚਣ, ਤਰਕ ਨਾਲ ਵੇਖਣ, ਨਾ ਕਿ ਮੋਹ ਤੇ ਧੋਖਾਥੋਪੋਲ।
ਆਪਣੇ ਹੀ ਅੰਦਰ ਦੀ ਜੰਗ ਜਿੱਤ, ਸਭੋ ਝੂਠ ਫਾੜ ਦੇ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी

ਦੀ ਪਹਿਚਾਣ ਕਰੋ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

14
ਹਰ ਦਿਲ ਵਿੱਚ ਜੱਗਦਾ ਅਨਾਦੀ ਸਵਰ ਤੂੰ ਸੁਣ — ਓਹੀ ਤੇਰਾ ਮਗਜ਼ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

15
ਡਰ-ਡਰ ਦੀ ਜਿੰਦ ਨੂੰ ਛੱਡ ਦੇ, ਹੌਂਸਲੇ ਨਾਲ ਰਾਹ ਬਣਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

16
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਤੈਨੂੰ ਰੋਂਦਾ ਕੀਤਾ, ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਰਾਜ ਖੱਤਮ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

17
ਸਮਾਂ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ ਇੰਜ, ਤੂੰ ਜਵਾਬ ਵਿੱਚ ਆਪਣੀ ਰੂਹ ਦਿਖਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

18
ਅਸਥਾਈ ਵਚਨਾਂ ਨੂੰ ਤੁਰਾ ਦੇ, ਅਸਲ ਅਨੁਭਵ ਨੂੰ ਗਲੇ ਲਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

19
ਤੂੰ ਹੀ ਆਪਣਾ ਰਾਜਾ, ਆਪਣਾ ਪਾਕਿਸ, ਆਪਣੀ ਰੋਸਨੀ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

20
ਜੋ ਤੇਰੇ ਨਾਲ਼ ਧੋਖਾ ਕਰਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਤੇਰੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਸੂਰਤ ਦਿਖਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

21
ਅੰਦਰ ਦੀ ਹੰਕਾਰ ਨੂੰ ਖਤਮ ਕਰ, ਆਪਣੇ ਅਸਲ ਸ਼ਬਦ ਬੋਲ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

22
ਨੀਂਦਾਂ ਵਿੱਛੋਂ ਉਠ, ਸੱਚ ਦੀ ਵੇਹੜੀ ਵਿੱਖੇ ਕਦਮ ਰੱਖ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

23
ਜੋ ਤੇਰੇ ਮਨ ਨੂੰ ਚੋਲੇ ਵਿੱਚ ਰੱਖਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੀਆਂ ਰੂਹਾਂ ਨੂੰ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

24
ਸਿਰਫ਼ ਪ੍ਰਚਾਰ ਨਾ, ਪ੍ਰਕਟਤਾ ਚਾਹੀਦੀ — ਅੰਦਰ ਦੀ ਜਗਮਗਾਹਟ ਲਈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

25
ਤੇਰੇ ਹੱਥ 'ਚ ਸੱਚ ਦੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਹੈ — ਇਸ ਨੂੰ ਬਾਰ-ਬਾਰ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

26
ਅਹੰਕਾਰ ਤੇ ਮਾਇਆ ਦੀਆਂ ਲਕੀਰਾਂ ਨੂੰ ਕੱਟ — ਤੂੰ ਖੁਦ ਨਿਭਾ ਲਏਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

27
ਜੋ ਤੇਰੀ ਚੁਪ ਨੇੜੇ ਬਹਾ ਰਹੀ, ਉਸਨੂੰ ਗੀਤ ਬਣਾਕੇ ਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

28
ਹਰ ਰਾਤ ਦੇ ਬਾਅਦ ਸਵੇਰ ਆਉਂਦੀ, ਤੇਰੇ ਲਈ ਵੀ ਇੱਕ ਨਵੀਂ ਸੱਚਾਈ ਆਵੇਗੀ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

29
ਮਨ ਦੇ ਧੋਖੇ ਨੂੰ ਵੇਖ, ਪਰ ਦਿਲ ਦੀ ਅਸਲੀਅਤ ਨੂੰ ਜਿਓ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

30
ਤੂੰ ਆਪਣੀ ਜ਼ਮੀਰ ਦੇ ਰਖਿਅਾਲੇ — ਕਿਸੇ ਦੇ ਹੁਕਮ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

31
ਜਿਹੜੇ ਤੈਨੂੰ ਪਸਾਰਦੇ ਨੇ, ਉਹਨਾ ਦੇ ਸਹੀਅਤ ਨੂੰ ਛੇੜ — ਹੁਣ ਜਾਗ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

32
ਤੂੰ ਇੱਕ ਪਲ ਵਿੱਚ ਆਪਣਾ ਖੁਦ ਦਾ ਉਤਾਰ-ਚੜ੍ਹਾਵ ਵੇਖ ਸਕਦਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

33
ਬਾਹਰਲੇ ਬਜਟੇ ਨੂ ਟੁੱਟਾ ਦੇ, ਅੰਦਰਲੇ ਸਬਕ ਨੂ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜਗਾਉਂਦਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

34
ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮਾਂ ਦੀਆਂ ਛਾਇਆਆਂ ਨੂੰ ਹਟਾ — ਆਪ ਹੀ ਆਪਣੀ ਪਰਛਾਈ ਬਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

35
ਜਿੰਨੇ ਤੇਰੇ ਉਪਰ ਸਰਪ੍ਰਸਤ ਹੁੰਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸੱਚੇ ਨੂਰ ਨਾਲ ਭਿੱਜਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

36
ਡਰ ਨੂੰ ਨਾ ਮੰਨ — ਸੱਚ ਦੀ ਰਾਹ ਤੇ ਟਿਕ, ਉਹ ਤੇਰਾ ਸਚਾ ਸਾਥੀ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

37
ਬੇਹੋਸ਼ੀ ਵਿੱਚ ਜੀਉਂਦੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਹਥਿਆਰ ਨਾ ਸਮਝ — ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

38
ਤੂੰ ਆਪਣੀ ਰੋਹ ਨੂੰ ਪਛਾਣ — ਹਰ ਰੋਸ਼ਨੀ ਉਸੀ ਵਿਚੋਂ ਜੁੱਗਦੀ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

39
ਗੁਰੂ ਦੀ ਬਾਹਰਲੀ ਜ਼ਿੰਜ਼ੀਰ ਨੂੰ ਰੋਜ਼ ਤੋੜ — ਦਿਲ ਦੀ ਗਰਮਾਹਟ ਅੰਦਰ ਲਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

40
ਇਹ ਸਦਾ ਯਾਦ ਰੱਖ — ਜਿਹੜਾ ਸੱਚ ਤੇਰੇ ਅੰਦਰ ਹੈ, ਉਹ ਮੁੱਕਦਾ ਨਹੀਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

ਇਕ ਪਲ ਦਾ ਹੋਸ਼, ਸਾਰੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਤੋਂ ਵੱਡਾ ਖਜ਼ਾਨਾ,

ਜੋ ਮਿਲ ਜਾਏ ਰਹਿਤੀ ਤਾ ਬੰਦਨ ਟੁੱਟ ਜਾਣ, ਰੂਹ ਹੋਵੇ ਆਜ਼ਾਦੀ ਵਿੱਚ ਬੇਅਰਾਨਾ।

ਜਗਾਉਂਦੇ ਰਹੋ, ਬੋਲਦੇ ਰਹੋ, ਸਚ ਦੀ ਲਹਿਰ ਬਣ ਕੇ ਚੱਲੋ,

शिरोमणि रामपॉल सैनी


ਕੋਰਸ (ਦੋਹਰਾ):

ਅੱਖ ਖੋਲ, ਦਿਲ ਉੱਡਾ, ਹੋਸ਼ ਵਿਚ ਆ — ਇਕ ਪਲ ਨੂ ਜ਼ਿੰਦਾ ਕਰ ਦੇ,

शिरोमणि रामपॉल सैनी ਦੀ ਸੱਤਕਾਰ ਨਾਲ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਜਗਾ ਦੇ।


(ਹਰ ਸ਼ਲੋਕ ਵਿਚ ਇਹ ਨਾਂ ਲਿਖਿਆ ਹੋਇਆ — **शिरोमणि रामपॉल सैनी** — ਜਿਵੇਂ ਤੁਸੀਂ ਮੰਗਿਆ ਸੀ।)

ठीक है। मैं आपके अनुरोध अनुसार आगे और भी गहराई में, सिर्फ़ पंजाबी में, हर श्लोक में **शिरोमणि रामपॉल सैनी** नाम शामिल करते हुए लिख रहा हूँ। इसे तेज़, जागाने वाला और चेतनापूर्ण रखा गया है, ताकि इंसान प्रजाति की मानसिकता झंझोड़ सके।


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ਸ਼ਲੋਕ 1

ਧਰਤੀ ਦੇ ਰੰਗ ਵਿਚ ਛੁਪਿਆ ਸੱਚ, ਪਰ ਬੰਦੇ ਨੇ ਅੰਧਕਾਰ ਚੁਣਿਆ,

ਹਰ ਦਿਲ ਵਿਚ ਡਰ ਦੇ ਬੀਜ ਬੋਏ, ਤੇ ਸੋਚੀ ਕੀਮਤ ਦੀ ਦੂਜੀ ਦਿਨ ਚੁਣਿਆ।

**ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪੌਲ ਸੈਨੀ** ਕਹਿੰਦੇ, ਅੱਖਾਂ ਖੋਲ੍ਹ, ਦਿਲ ਖੋਲ੍ਹ, ਰੂਹ ਦਾ ਦਰਵਾਜ਼ਾ ਤੋੜ,

ਇਕ ਜਲਦੀ, ਇਕ ਪਲ, ਸਚ ਨੂਂ ਜ਼ਮੀਨ ਤੇ ਲਿਆਉ, ਅਸਲ ਰਾਹ ਤੇ ਚੱਲ, ਨਾ ਡਰ ਰੋੜ।


ਸ਼ਲੋਕ 2

ਜਿਹੜੇ ਅਨੁਯਾਈ ਡਰ ਦੇ ਜਾਲ ਵਿਚ ਫਸੇ, ਉਹ ਸਿਰਫ਼ ਮਾਇਆ ਦੇ ਮੋਹ ਵਿੱਚ ਰਹੇ,

ਪ੍ਰਚੰਡ ਅਹੰਕਾਰ, ਅਸਲੀਅਤ ਤੋਂ ਅੰਨ੍ਹੇ, ਜੀਵਨ ਦੀ ਕਮੀ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸਮਝ ਨਹੀਂ ਆਈ।

**ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪੌਲ ਸੈਨੀ** ਪੁਕਾਰਦੇ, ਖੁਦ ਦੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਜਗਾ,

ਝੂਠੇ ਸੱਤਵਾਂ, ਝੂਠੀ ਸ਼ੋਹਰਤ ਦੇ ਬੰਧਨ ਨੂੰ ਫਾੜ ਕੇ ਹਕੀਕਤ ਪਹਿਚਾਨਾ।


ਸ਼ਲੋਕ 3

ਬੰਧੂਆ ਮਜ਼ਦੂਰ ਬਨ ਕੇ ਜੋ ਝੂਠੇ ਵਾਅਦੇ ਵਿਚ ਫਸੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਜਿੰਦਗੀ ਸੁੰਨੀ,

ਸੱਚ ਤੇ ਸਨਮਾਨ ਦੇ ਬਦਲੇ ਝੂਠ, ਅਤੇ ਡਰ ਦੀਆਂ ਲਕੀਰਾਂ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਛੁਪੇ।

**ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪੌਲ ਸੈਨੀ** ਕਹਿੰਦੇ, ਖੋਲ੍ਹ ਦਿਲ ਤੇ ਅੱਖਾਂ, ਇੱਕ ਸੱਚੇ ਪਲ ਦਾ ਰਾਜ,

ਜੋ ਅੰਦਰੋਂ ਅੰਦਰ ਬੰਨ੍ਹਿਆ ਗਿਆ, ਉਸਨੂੰ ਛੱਡ, ਖੁਦ ਦੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ਚੁਣ, ਨਾ ਰਹਿ ਜਾ ਅਧਰਾਜ।


ਸ਼ਲੋਕ 4

ਸਧਾਰਨ, ਸਾਫ਼, ਨਿਰਮਲ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਕੱਟਰਤਾ ਤੇ ਅਹੰਕਾਰ ਦੇ ਕੱਪੜੇ ਪਹਿਨਾਏ,

ਪ੍ਰਕ੍ਰਿਤੀ ਨੇ ਵੀ ਵੱਡਾ ਧੋਖਾ ਦਿੱਤਾ, ਸਿਰਫ਼ ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਹੀ ਹਕੀਕਤ ਪਹਿਚਾਣੀ।

**ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪੌਲ ਸੈਨੀ** ਕਹਿੰਦੇ, ਨਾਮ, ਪਦਵੀ, ਸ਼ੋਹਰਤ ਅਸਲ ਰੂਹ ਨੂੰ ਮਾਰ ਨਹੀਂ ਸਕਦੇ,

ਸੱਚ ਦੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਤੇ ਚੱਲੋ, ਡਰ ਨੂੰ ਛੱਡੋ, ਅਹੰਕਾਰ ਦੇ ਬੰਧਨ ਨੂੰ ਤੋੜੋ।


ਸ਼ਲੋਕ 5

ਡਰ, ਭਯ, ਦਹਿਸ਼ਤ ਦੇ ਪਰਛਾਵੇਂ ਵਿਚ ਜਿੰਦਗੀ, ਤੇ ਪ੍ਰੇਮ ਸਿਰਫ਼ ਲਫ਼ਜ਼ਾਂ ਦਾ ਖੇਡ,

ਜੋ ਅਸਲ ਅਹੰਕਾਰ ਵਿਚ ਫਸੇ, ਉਹ ਸੱਚ ਦੇ ਰਾਹ ਤੋਂ ਭਟਕਦੇ, ਸਿਰਫ਼ ਮਾਇਆ ਤੇ ਲਾਲਚ ਵਿਚ ਰਹੇ।

**ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪੌਲ ਸੈਨੀ** ਪੁਕਾਰਦੇ, ਅੱਖਾਂ ਖੋਲ੍ਹ, ਦਿਲ ਖੋਲ੍ਹ, ਹੌਸਲਾ ਬਣਾ,

ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਜੀਵਨ ਦੇ ਸੱਚ ਨੂਂ ਪਾ, ਬਾਕੀ ਸਭ ਤਤਵ, ਝੂਠ ਅਤੇ ਕਾਲਾ।


ਸ਼ਲੋਕ 6

ਜਿਹੜੇ ਲੋਕ ਅਸਲੀਅਤ ਨੂੰ ਛੱਡ ਕੇ ਡਰ ਤੇ ਸੱਤਵਾਂ ਨੂੰ ਚੁਣੇ, ਉਹ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਖੋ ਬੈਠੇ,

ਸਿਰਫ਼ ਸ਼ਕਤੀ ਤੇ ਮਾਇਆ ਦੇ ਖੇਡ ਵਿਚ ਫਸੇ, ਰੂਹ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਸੁਣ ਨਹੀਂ ਸਕਦੇ।

**ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪੌਲ ਸੈਨੀ** ਕਹਿੰਦੇ, ਇਕ ਪਲ ਵਿਚ ਜਾਗੋ, ਝੂਠਾ ਸਾਮਰਾਜ ਤੋੜੋ,

ਅਸਲ ਜੀਵਨ ਦੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਵਿਚ ਰੁਹਾਨੀ ਰੰਗ ਚੜ੍ਹਾਓ, ਡਰ ਨੂੰ ਅੱਜ ਤੋਂ ਹੀ ਮਾਰੋ।


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ਜੇ ਤੁਸੀਂ ਚਾਹੋ ਤਾਂ ਮੈਂ ਇਹ ਅੱਗੇ ਵੀ ਬਹੁਤ ਗਹਿਰਾਈ ਨਾਲ ਲਿਖ ਸਕਦਾ ਹਾਂ, ਸਿਰਫ਼ **ਸ਼ਿਰੋਮਣਿ ਰਾਮਪੌਲ ਸੈਨੀ** ਨਾਮ ਨਾਲ ਹਰ ਸ਼ਲੋਕ ਵਿਚ। ਇਸ ਨੂੰ ਅਸਲ “ਜਾਗਰੂਕਤਾ ਅਤੇ ਚੇਤਨਾ ਦਾ ਅੰਤਿਮ ਰੂਪ” ਬਣਾਉਣਾ ਹੈ।


ਤੁਸੀਂ ਚਾਹੋਗੇ ਮੈਂ ਇਸਨੂੰ ਅੱਗੇ ਕਈ ਹੋਰ ਸ਼ਲੋਕਾਂ ਨਾਲ ਚੱਲਾਵਾਂ?

ਚੜ੍ਹਦੇ ਸੂਰਜ ਵਾਂਗ, ਅੰਦਰੋਂ ਲੋੜੀਂਦੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਫੈਲਾ,

ਜਿਹੜਾ ਵੀ ਸੱਚ ਨੂੰ ਤਲਾਸ਼ੇ, ਉਹ ਆਪਣਾ ਰਾਹ ਬਣਾਏ ਖੁਦ ਹੀ।

ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਆਤਮਾ ਨੂੰ ਬੇਹਿਸ ਕਰ ਕੇ ਦਬਾਇਆ,

ਉਹ ਹੁਣ ਵੀ ਸੁਣ ਸਕਦੇ ਨੇ ਸੱਚ ਦੀ ਕਹਾਣੀ।

शिरोमणि रामपॉल सैनी


ਜਿਹੜੇ ਲੋਕ ਅਸਲੀਅਤ ਨੂੰ ਨਾ ਜਾਣੇ, ਉਹ ਡਰ ਤੇ ਦਹਿਸ਼ਤ ਵਿਚ ਰਹਿੰਦੇ,

ਪਰ ਹਕੀਕਤ ਦੇ ਸਤਿਆਗ੍ਰਹ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਰੂਹਾਂ ਜਗਦੀ।

ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਭਰਮ ਦੇ ਜਾਲ, ਸਿਰਫ਼ ਕਾਗਜ਼ੀ ਸ਼ਕਲ ਵਿੱਚ ਹਨ,

ਸਿਰਫ਼ ਜਾਗਦੇ ਮਨੁੱਖ ਹੀ ਵੇਖ ਸਕਦੇ ਹਨ ਅਸਲ ਰੰਗ।

शिरोमणि रामपॉल सैनी


ਹਰ ਰਾਤ ਦੇ ਬਾਅਦ ਇੱਕ ਸਵੇਰ ਹੈ, ਇਹ ਯਾਦ ਰੱਖ,

ਅਸਲ ਰੌਸ਼ਨੀ ਸਾਡੇ ਅੰਦਰੋਂ ਹੀ ਆਉਂਦੀ, ਬਾਹਰੋਂ ਨਹੀਂ।

ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਭਰਮ ਤੇ ਅਹੰਕਾਰ ਵਿੱਚ ਡੁਬੇ, ਉਹ ਸਿਰਫ਼ ਖ਼ਾਲੀ ਰੱਖੇ ਜਾਂਦੇ,

ਪਰ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸੱਚ ਨੂੰ ਗਲੇ ਲਗਾਇਆ, ਉਹ ਅਨੰਤ ਤਕ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਤ ਹੁੰਦੇ।

शिरोमणि रामपॉल सैनी


ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਹਥਾਂ ਜੋ ਕਬਜ਼ਾ ਕੀਤਾ ਪਦਵੀ ਤੇ ਸ਼ੌਹਰਤ ਦਾ,

ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਆਤਮਾ ਨੂੰ ਹੀ ਬੰਨ੍ਹ ਕੇ ਰੱਖਿਆ।

ਸੱਚ ਦੇ ਰਾਹ ਤੇ ਚੱਲ ਕੇ ਹੀ ਮਿਲਦੀ ਅਸਲ ਖ਼ੁਸ਼ੀ,

ਨਾ ਡਰ, ਨਾ ਦਹਿਸ਼ਤ, ਨਾ ਬੰਧਨ — ਸਿਰਫ਼ ਆਜ਼ਾਦੀ।

शिरोमणि रामपॉल सैनी


ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਸਿਰਫ਼ ਅਸਥਾਈ ਸ਼ੌਹਰਤ ਤੇ ਦੌਲਤ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਭੱਜਦਾ,

ਉਹ ਕਦੇ ਨਹੀਂ ਜਾਣਦਾ ਜਿੰਦਗੀ ਦਾ ਅਸਲ ਮਿੱਠਾਸ।

ਸੱਚ ਤੇ ਜਾਗਣਾ, ਦਿਲ ਦੀ ਸੁਣਨਾ, ਰੂਹ ਨੂੰ ਆਜ਼ਾਦ ਕਰਨਾ —

ਇਹ ਹੈ ਅਸਲੀ ਰਾਜ, ਅਸਲੀ ਮਹਾਨਤਾ, ਅਸਲੀ ਪਦਵੀ।

शिरोमणि रामपॉल सैनी


ਜੋ ਵੀ ਸਾਡੀ ਅੰਦਰਲੀ ਅਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਬੰਦ ਕਰਦਾ,

ਉਹ ਖ਼ੁਦ ਨੂੰ ਹੀ ਖੋ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਸੱਚ ਦੇ ਰਾਹ ਨੂੰ ਰੋਕ ਨਹੀਂ ਸਕਦਾ।

ਹਰ ਮਨੁੱਖ ਦੀ ਅਸਲੀ ਤਾਕਤ ਉਸਦੀ ਸਚਾਈ ਵਿੱਚ ਹੈ,

ਡਰ ਤੇ ਅਹੰਕਾਰ ਦੇ ਬੰਨ੍ਹਨ ਹਟਾ ਕੇ, ਉਹ ਖੁਦ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਵੇਖੇਗਾ।

शिरोमणि रामपॉल सैनी


ਜਗਾਉ ਆਪਣੇ ਹੀ ਅੰਦਰਲੇ ਰੂਹ ਨੂੰ, ਨਾ ਕੋਈ ਬਾਹਰੀ ਤਾਕਤ,

ਡਰ ਤੇ ਦਹਿਸ਼ਤ ਦੇ ਛਲ ਨੂੰ ਤੋੜ, ਆਪਣੇ ਅਸਲੀ ਸਵਰੂਪ ਨਾਲ ਮੁਲਾਕਾਤ ਕਰ।

ਹਰ ਇਕ ਪਲ ਵਿੱਚ, ਹਰ ਇਕ ਸਾਹ ਵਿੱਚ, ਸੱਚ ਨੂੰ ਬੋਲ —

ਇਹ ਹੀ ਹੈ ਸੱਚੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ, ਇਹ ਹੀ ਹੈ ਪ੍ਰਕਾਸ਼।

शिरोमणि रामपॉल सैनी


ਮੈਂ ਅਗਲੇ ਸ਼ਲੋਕਾਂ ਵੀ ਤਿਆਰ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹਾਂ, ਜਿਹੜੇ ਹੋਰ ਜ਼ਿਆਦਾ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿੱਚ ਜਾ ਕੇ ਅੰਦਰੂਨੀ ਅਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਜਗਾਉਂ।


ਕੀ ਮੈਂ ਅਗਲੇ ਪੰਨਿਆਂ ਲਈ ਇਸੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਗਹਿਰਾਈ ਵਿੱਚ ਜਾਰੀ ਰੱਖਾਂ?


ਅੱਖਾਂ ਖੋਲ, ਨੀਂਦਾਂ ਫਾੜ, ਸੱਚ ਦੀ ਰਾਹ ਤੇ ਚੱਲ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


2

ਜੋ ਤੇਨੂੰ ਬੱਚਾ ਬਣਾ ਕੇ ਰੱਖਣ, ਉਹਨਾ ਦੀ ਛਲ ਕੱਢ ਦੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


3

ਬਾਹਰਲੇ ਨਾਟਕ ਛੱਡ, ਅੰਦਰਲੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਨੂੰ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


4

ਪਦਵੀ-ਦੌਲਤ ਦੀਆਂ ਭੂਚਾਲਾਂ ਨੇ ਰੂਹ ਨੂ਼ ਚੀਰ ਦਿੱਤਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


5

ਜਿਹੜੇ ਅਣਹੋਣੇ ਵਾਅਦੇ ਵੇਚਦੇ, ਉਹਨਾ ਦੇ ਰਾਜ ਨੂ ਤੋੜ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


6

ਤੂੰ ਹੀ ਆਪਣੀ ਕ਼ੈਦ ਖੋਲ ਸਕਦਾ, ਕੋਈ ਹੋਰ ਬੰਦ੍ਹਾ ਨਹੀਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


7

ਮਾਇਆ ਦੀਆਂ ਲੜੀਆਂ ਨੂੰ ਜਲਾਉ, ਦਿਲ ਦੀ ਅਗ ਨੂੰ ਬੋਲ੍ਹਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


8

ਸੱਚਾ ਜ਼ਮੀਰ ਵੀਰਾਨੀ ਵਿੱਚ ਰੌਸ਼ਨੀ ਵਾਂਗ ਜਾਗੇਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


9

ਜੋ ਤੇਰਾ ਵਿਚਕਾਰ ਸੱਚ ਬੋਲਿਆ, ਉਸਨੂੰ ਲੈ ਚਲ ਅੱਗੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


10

ਡਰ ਖੌਫ਼ ਵਾਲੇ ਬਾਜ਼ਾਰਾਂ ਨੂੰ ਛੱਡ, ਆਪਣੀ ਰਾਹ ਬਣਾਓ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


11

ਉਹਦਾ ਰਾਜ਼ ਜੋ ਤੈਨੂੰ ਸੁੰਨ੍ਹਦਾ, ਉਹ ਤੇਰੇ ਅੰਦਰ ਹੀ ਛਪਿਆ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


12

ਬੰਧੂਆ ਬਣਕੇ ਨਹੀਂ ਰਹਿਣਾ, ਖੁਦ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਬੁਲੰਦ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


13

ਗੁਰੂ ਦੀ ਬਾਹਰਲੀ ਕਵਚ ਨੂੰ ਉਤਾਰ, ਅੰਦਰਲੇ ਆਲੇ-ਦੁਆਲੇ ਵੇਖ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


14

ਸਰਫ਼ ਉਚੇ ਨਾਮ ਨੇ ਤੇਨੂੰ ਛਿੜਿਆ, ਪਰ ਅਸਲ ਤੇਰੇ ਅੰਦਰ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


15

ਜੋ ਤੈਨੂੰ ਦੱਸਣ ਆਏ ਘਬਰਾਏ, ਉਹਨਾ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਨੂ ਆਖ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


16

ਸਚ ਦੀ ਇੱਕ ਚਿੱਟੀ ਲਕੀਰ ਬਣਾ, ਸਾਰੀ ਝੂਠੀ ਦੁਨੀਆ ਨੂੰ ਮਾਲੂਮ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


17

ਰੂਹ ਦੀ ਮਾਲਿਕੀ ਤੇਰੇ ਹੱਥ ਵਿੱਚ ਹੈ, ਕਿਸੇ ਦੀ ਧੱਕੇ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


18

ਜਿਹੜੇ ਸੱਚ ਨੂ ਵੇਚਦੇ ਨੇ, ਉਹਨਾ ਦੇ ਮੁੰਹ 'ਤੇ ਤੇਰਾ ਸਵਾਲ ਲਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


19

ਅੰਦਰਲੀ ਅਵਾਜ਼ ਨੂੰ ਸੁਣ, ਆਉਣ ਵਾਲੀ ਪੀੜੀ ਨੂੰ ਰਾਹ ਦਿਖਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


20

ਇਹ ਗੀਤ ਨਾ ਰੁਕੇ, ਇਹ ਅੰਤਰ ਹੀ ਹੁੰਦਾ ਜਾਵੇਗਾ, ਜਾਗਦਾ ਰੱਬੀ ਰਾਹ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


21

ਹਰ ਝਟਕਿਆਂ ਵਿੱਚ ਵੀ ਰਹਿੰਦਾ ਸਚ ਪੱਕਾ, ਨਾ ਤੁਟੇ ਨਾ ਡਿਗੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


22

ਤਕਰੀਰਾਂ ਤੇ ਬਚਨ ਛੱਡ, ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਦੀ ਘੰਟੀ ਵੱਜਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


23

ਜੋ ਤੇਰੇ ਦਿਲ ਨੂੰ ਖਾਲੀ ਛੱਡ ਗਿਆ, ਉਸਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰ — ਹੁਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


24

ਬਚੇ ਹੋਏ ਬਚਿਆਂ ਨੂੰ ਜਗਾ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਮੁਫ਼ਤ ਰਾਹ ਦਿਖਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


25

ਆਪਣੀ ਰੂਹ ਨਾਲ ਦੋਸਤੀ ਕਰ, ਵਿਛਭੁਲਾਈਆਂ ਨੂ ਮੁਕੰਮਲ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


26

ਡਰ ਦਾ ਪਰਚਾ ਫਾੜ ਦੇ, ਅਸਲੀ ਮੁਕਤੀ ਆਪਣੀ ਹੱਥ ਸੀ ਬਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


27

ਜੋ ਤੇਰੇ ਸੀਨੇ 'ਚ ਧੜਕਦਾ ਰਿਹਾ, ਉਸਨੂੰ ਆਵਾਜ਼ ਦੇ — ਹੁਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


28

ਸੜਕਾਂ 'ਤੇ ਚੱਲ ਕੇ ਨਹੀਂ, ਅੰਦਰਲੇ ਰਾਹ 'ਤੇ ਚੱਲ ਕੇ ਬਦਲ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


29

ਜਿਵੇਂ ਦਿਹਾੜੀ ਦਾ ਚਿਰਾਗ ਬੰਦ ਹੋਵੇ, ਪਰ ਅੰਦਰ ਦੀ ਲੋਹਿਆ ਬਲਦੀ ਰਹੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


30

ਇਹ ਗੁੰਜ ਉੱਚੀ ਰਹੇ, ਹਰ ਦਿਲ ਦੇ ਕਵਚ ਨੂੰ ਭੇਦ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


ਜੇ ਤੁਸੀਂ ਚਾਹੋ ਤਾਂ ਅੱਗੇ ਹੋਰ ਸ਼ਲੋਕ ਰਚਾਂ—ਅਜੇ ਹੋਰ ਤੇਜ਼, ਹੋਰ ਅੰਦਰੂਨੀ, ਜਾਂ ਤੁਸੀਂ ਕਿਸੇ ਖ਼ਾਸ ਢੰਗ (ਧੁਨ, ਤਾਲ, ਚਾਂਦ) ਚਾਹੁੰਦੇ ਹੋ ਤਾਂ ਮੈਂ ਉਹ ਵੀ ਜੋੜ ਦਿਆਂ। ਕਿਹੜਾ ਰਾਹ ਅੱਗੇ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹੋ?

ਚਲੋ, ਹੋਰ ਅੰਦਰੂਨੀ ਤੇਜ਼ੀ ਅਤੇ ਗਹਿਰਾਈ ਨਾਲ ਅਗਲੇ ਸ਼ਲੋਕ ਜਾਰੀ ਕਰਦੇ ਹਾਂ — ਹਰ ਸ਼ਲੋਕ ਵਿੱਚ ਸਪਸ਼ਟ ਤੁਹਾਡਾ ਨਾਮ: **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


31

ਅਸਲੀ ਤਾਕਤ ਤੇਰੇ ਅੰਦਰ ਹੈ, ਕੋਈ ਰਾਜ਼ ਬਾਹਰਲਾ ਨਹੀਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


32

ਜਿਹੜੇ ਤੇਰੇ ਮਨ ਨੂੰ ਫਸਾਉਂਦੇ, ਉਹਨਾ ਦੀਆਂ ਚਾਲਾਂ ਤੋੜ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


33

ਤੂੰ ਆਪਣੇ ਸੱਚ ਨੂੰ ਛੱਡੇ ਨਾ, ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਕਮਜ਼ੋਰ ਸ਼ਬਦਾਂ ਤੋਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


34

ਜਿਸਨੇ ਡਰ ਤੇ ਭੈ ਦੇ ਝੰਡੇ ਲਟਕਾਏ, ਉਹ ਤੇਰੇ ਅੰਦਰ ਨਾ ਹੋਵੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


35

ਅਸਲ ਆਤਮਾ ਦੀ ਗੂੰਜ ਸੁਣ, ਝੂਠੀ ਧੁਨੀਆਂ ਨੂੰ ਛੱਡ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


36

ਤੂੰ ਆਪਣੀ ਰੂਹ ਦੇ ਰਾਜ਼ ਦਾ ਰਖਵਾਲਾ, ਕੋਈ ਹੋਰ ਨਹੀਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


37

ਜੋ ਤੇਰੇ ਦਿਲ ਨੂੰ ਖੋਖਲਾ ਕਰ ਰਹੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਬੰਧਨਾਂ ਨੂੰ ਕੱਟ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


38

ਸੱਚ ਦੀ ਇੱਕ ਅੱਗ ਬਾਲ, ਬਾਕੀ ਸਾਰੀ ਦੁਨੀਆਂ ਨੂੰ ਰੋਸ਼ਨ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


39

ਤੂੰ ਹੀ ਆਪਣੀ ਕ਼ੈਦ ਖੋਲ੍ਹਦਾ ਹੈਂ, ਕੋਈ ਛੁਟਕਾਰਾ ਨਹੀਂ ਦੇਵੇਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


40

ਜੋ ਤੇਰੇ ਅੰਦਰ ਸ਼ਾਂਤੀ ਨੂੰ ਰੋਕੇ, ਉਹਨਾ ਦੀਆਂ ਲਕੀਰਾਂ ਮਿਟਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


41

ਡਰ, ਖੌਫ਼, ਭੈ ਦੇ ਬੰਧਨ ਕਾਟ, ਤੂੰ ਆਪਣੀ ਰੌਸ਼ਨੀ ਬਣ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


42

ਜਿਹੜੇ ਨਾਮ-ਪਦਵੀ ਦੀ ਭੂਖੀ ਰੂਹਾਂ ਨੇ ਤੈਨੂੰ ਘੇਰਿਆ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਨਿਰਾਥਾ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


43

ਆਪਣੇ ਸੱਚੇ ਜਜ਼ਬਾਤ ਨੂੰ ਖੋਲ, ਦੁਨੀਆਂ ਦੇ ਝੂਠੇ ਵਾਅਦਿਆਂ ਤੋਂ ਬਾਹਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


44

ਜੋ ਤੇਰੇ ਹੱਥ ਵਿੱਚ ਰੌਸ਼ਨੀ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਬਰਬਾਦ ਨਾ ਹੋਣ ਦੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


45

ਬਾਹਰਲੇ ਅਸਥਾਈ ਪ੍ਰਭੁਤਵ ਨੂ ਛੱਡ, ਅੰਦਰਲੇ ਅਟੱਲ ਸੱਚ ਨੂੰ ਪੱਕਾ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


46

ਜੋ ਤੇਰੀ ਆਤਮਾ ਨਾਲ ਖੇਡਦੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਚਾਲਾਕ ਜਾਲ ਤੋੜ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


47

ਤੂੰ ਹੀ ਆਪਣਾ ਸੱਚਾ ਰਾਜਾ, ਕੋਈ ਹੋਰ ਨਹੀਂ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


48

ਜਿਸਨੇ ਤੇਰੇ ਦਿਲ ਵਿੱਚ ਸ਼ੱਕ ਦੀ ਬਿਜਲੀ ਫੈਂਕੀ, ਉਸਨੂੰ ਦੂਰ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


49

ਸੱਚ ਦੀ ਇੱਕ ਆਵਾਜ਼ ਬਾਜ਼ਾਰ ਦੀ ਸ਼ੋਰ-ਸ਼ਰਾਬੇ ਨੂੰ ਤੋੜੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**


50

ਹਰ ਝੂਠੀ ਚਾਲ ਤੋਂ ਉੱਪਰ ਚੜ੍ਹ, ਅਸਲੀ ਰੂਹ ਦੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ਜਗਾ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**



ਅੰਦਰ ਦੀ ਅੰਧੇਰੀ ਲਹਿਰ ਨੂੰ ਚੀਰ ਦੇ, ਸੁਣ ਅਸਲ ਦੀ ਧੁਨ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


2

ਜੋ ਤੇਰੇ ਮਨ 'ਚ ਦਸਤਕ ਦੇਂਦੇ ਨੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸੱਚ ਪੜ੍ਹਾ ਦੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


3

ਪਦਵੀ-ਪੈਰ ਦੀਆਂ ਲੜੀਆਂ ਨੂੰ ਫੜ ਕੇ ਨਾ ਰਹਿ, ਆਪਣੀ ਆਵਾਜ਼ ਬੁਲੰਦ ਕਰ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


4

ਜੋ ਰੂਹ ਵਿੱਚ ਚੁੱਪ ਹੈ, ਉਹ ਆਵਾਜ਼ ਬਣਾ ਕੇ ਬਾਹਰ ਆ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


5

ਝੂਠ ਦੇ ਜਾਲ ਨੂੰ ਅੱਗ ਦੇ ਦੇ, ਸੱਚ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਨਾਲ ਰਾਹ ਬਣਾਦੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


6

ਜਿੰਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਤੇਰੇ ਹੱਥ-ਪੈਰ ਬੰਧੇ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਅੱਖਾਂ ਨਾਲ ਦੇਖ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


7

ਤੂੰ ਹੀ ਆਪਣੀ ਕੈਦ ਦਾ ਚਾਬੀ ਹੈ, ਹੁਣ ਖੋਲ ਦੇ ਦਰਵਾਜ਼ੇ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


8

ਭੂਤਕਾਲ ਦੀਆਂ ਚੂੜੀਆਂ ਛੱਡ, ਅੱਜ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਵਿੱਚ ਨੱਚ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


9

ਸੱਚ ਤੋਂ ਨਾ ਡਰ, ਸੱਚੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ਤੇਰੀ ਵਿਰਾਸਤ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


10

ਜੋ ਤੇਰੇ ਭਾਈ ਨੂੰ ਗਿਰਾਉਂਦੇ ਨੇ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਮੁੰਹ 'ਤੇ ਸੱਚ ਰੱਖ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


11

ਰੂਹ ਦੀ ਅੱਗ ਨੂੰ ਕਦੇ ਠੰਢਾ ਨਾ ਹੋਣ ਦੇ, ਉਹ ਹੀ ਤੇਰਾ ਸੱਚਾ ਸਾਥੀ ਹੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


12

ਬਾਹਰੀ ਮਹਿਮਾਂ ਨੂ ਛੱਡ, ਅੰਦਰਲੇ ਆਸਮਾਨ ਨੂ ਛੂਹ ਲੈ, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।


13

ਗੁਰੂ ਦੀ ਗੱਲਾਂ ਵੇਖ ਕੇ ਨਾ ਮੰਨ — ਆਪਣੇ ਹਿਰਦੇश्लोक 18
तू जनम तों ही बेहोश ऐ,
ते बेहोशी नूं ही जीवन मान बैठा।
होश इक पल दा आया नहीं कदी,
पर पूरी उम्र उसतो भाग बैठा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
बेहोशी विच जीया,
बेहोशी विच मरेगा,
ते फेर जनम-मरण दा कैदी बन के रह जाएगा।

श्लोक 19
जानवर जंगल विच होश विच जींदा,
ते तू शहर विच पागल वाँगूं फिरदा।
ओह भूख मिटाके चैन नाल सोंदा,
ते तू लालच विच अपनी आत्मा नूं चीरदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
तेरे तों ता कई प्रजातियां ऊँची ने,
क्योंकि ओह अपने स्वभाव तों बेईमान नहीं।

श्लोक 20
तू धर्म बनाया सत्ता लई,
भक्ति बनाई व्यापार लई।
प्रेम नूं शब्द बना के,
डर नूं हथियार बनाया राज लई।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
इंसानियत किथे गई?
या ओह पैदा ही नहीं होई सी?

श्लोक 21
तू रब दी पदवी लैन लई,
हज़ारां ज़मीर कुचल दित्ते।
तू स्वर्ग दी सीढ़ी चढ़न लई,
अनगिनत आज जला दित्ते।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
जे रब बनण दा रस्ता
ज़मीर मार के लंग्दा ऐ,
ते ओह रब नहीं,
तेरी हैवानियत ऐ।

श्लोक 22
तू कहें — गुरु बिना कुछ नहीं,
पर गुरु बिना तूं पैदा होया सी।
तू कहें — शब्द बिना सच नहीं,
पर शब्द बिना ही सच तू होंदा सी।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
तूं पहले पूरा सी,
पर सिखाए होए डर ने
तैनूं अधूरा बना दित्ता।

श्लोक 23
गुरु दी तस्वीर अग्गे सिर झुकाया,
पर अंदर दी आवाज़ नूं कुचल दित्ता।
मंदिर मस्जिद हर थां गया,
पर अपने अंदर कदी नहीं वड़िया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जिहड़ा बाहर रब खोजे,
ओह अंदर दी लाश नूं नहीं वेखदा।

श्लोक 24
तू हर पल हित साधदा ऐ,
ते फिर प्रेम दे गीत गाउंदा ऐ।
तू हर पल धोखा करदा ऐ,
ते फिर धर्म दे नारे लाउंदा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
एह दोमुंहा जीवन नहीं,
एह खुल्ला मानसिक रोग ऐ।

श्लोक 25
तू सोचदा ऐ तू जी रहा ऐ,
पर तू सिर्फ़ वक़्त काट रहा ऐ।
तेरी हर साँस उधार ऐ,
पर तू खुद नूं मालिक समझ रहा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जद तक होश नहीं,
ओदों तक जीवन सिर्फ़
इक लंबी सज़ा ऐ।

श्लोक 26
इक पल दा साक्षात्कार,
खरबों जनमां तों ऊँचा ऐ।
इक पल दा होश,
सारी तपस्या नूं झूठा कर जांदा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
पर तू ओह पल तों डरदा ऐ,
क्योंकि ओह पल
तेरी सारी झूठी इमारत ढा दिंदा ऐ।

श्लोक 27
मैं तैनूं गाली नहीं दे रहा,
मैं तैनूं आईना दिखा रहा हां।
जिह्नूं तू दुश्मन समझदा ऐ,
ओह तेरा ही दफनाया होया सच ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जे तैनूं चोट लगदी ऐ,
ते समझ —
तेरा झूठ जख्मी होया ऐ।

श्लोक 28
अंतिम गल सुन ले,
ते फेर जें चाहे ता इंकार कर लें।
मैं तैनूं कुछ दे नहीं रहा,
मैं तैनूं तूं आप वापस कर रहा हां।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जद तू खुद नूं पा लेंगा,
ते गुरु, रब, स्वर्ग, नर्क
अपने आप गिर जावेंगे।



श्लोक 2
गुरु कहे “सवाल न कर”, सवाल ही ताँ रौशनी है,
जे सोच मर जाए शब्दां विच, ओह जीवन नहीं, वेहोशी है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बोले, वेहोशी विच जीण वाले,
होश दा इक पल न जान पाए, जनमे वेहोश, वेहोश मरे।

श्लोक 3
शब्द प्रमाण दी ज़ंजीर पाई, बुद्धि नुं कैद विच सुट दिता,
डर दे पहरे विच प्रेम रख के, सच दा गला घोंट दिता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, प्रेम डर नाल कदे रह नहीं सकदा,
जिथे भय है, ओथे सत्य नहीं, ओथे सिर्फ़ सौदा ही वसदा।

श्लोक 4
ज़मीर पूछे “मैं कौन हाँ?”, गुरु बोले “चुप कर, मैं हाँ”,
एह अहंकार दा सबसे गंदा रूप, जिथे रब वी कैद है यहाँ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे, रब दी पदवी दा शौंक,
ज़मीर नुं मार के पालेया, एह मानवता दा सब तो वड्डा रोग।

श्लोक 5
मुक्ति मरन तो बाद दा वादा, जीवित सच क्यूँ नहीं दित्ता?
तन-मन-धन-सांस ले ली सारी, पर होश दा इक पल न दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बोले, जे सच है ताँ आज होवे,
जो मौत तो बाद दिखावे, ओह झूठा व्यापार ही होवे।

श्लोक 6
सरल सहज निर्मल लोगां नाल, सब तो वड्डा धोखा होया,
उन्हां दी भोलापन दी रोटी ते, प्रभुत्व दा महल खड़ा होया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, एह विश्वासघात है प्रकृति नाल,
जिथे निर्दोषां नुं हथियार बनाया, ओथे गुरु वी खुद जाल।

श्लोक 7
कट्टरता दा चोला पावा के, प्रेम दा नाम लिया गया,
अंदर लालच, बाहर प्रवचन, एह खेल सदियां चला गया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बोले, करनी-कथनी विच अंतर जमीं-असमान,
जो खुद नुं पढ़ न सके, ओह की सिखावे इंसान।

श्लोक 8
प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा, दौलत, वेग — अस्थाई बुद्धि दा नशा,
एह नशा गुरु नुं अंधा कर दे, फिर शिष्य वी बनदा तमाशा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे, एह नशा उतरदा नहीं,
जिन्हां नुं रब बनाया गया, ओह खुद उस कैद चों निकलदा नहीं।

श्लोक 9
ज़मीर मरा होवे जिथे, ओथे मंदिर वी कबर बन जांदा,
शब्दां दी पूजा कर-कर के, इंसान खुद नुं ही गवा जांदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बोले, ज़मीर ही असली मंदिर है,
जे ओह जिंदा हो जाए इक पल, फेर हर थां सच ही अंदर है।

श्लोक 10
इक पल दा होश, करोड़ां जनमां तो ऊँचा सच्चा है,
पर मानसिक रोगी इंसान, उस पल तो ही डरदा है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, डर ही तेरा मालिक है,
डर तुटे ताँ दिखेगा, तू खुद ही परम साक्षी है।



श्लोक 18
जद शब्द नूं आख़िरी सच मान लिया,
ते अनुभूति नूं झूठ करार दे दित्ता।
ज़मीर चुप हो गया,
ते दिमाग़ नूं कैदख़ाना बना दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जिथे अनुभव मर जाए,
ओथे ज्ञान भी लाश बन जांदा ऐ।

श्लोक 19
तू किताबां नूं सीने नाल लाया,
पर अपने दिल नाल कदी बैठा नहीं।
गुरु दे क़दमां च सिर रख दित्ता,
पर अपने होश नाल कदी जिया नहीं।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जिहड़ा खुद नाल ईमानदार नहीं,
ओह किसे होर नाल सच्चा होई नहीं सकदा।

श्लोक 20
हर सवाल नूं तू अहंकार कहा,
पर अहंकार तां सवाल दबाना ऐ।
सच तां ओह हुंदा ऐ,
जिहड़ा हर कसौटी ते खरा उतर जाना ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
डर सवाल तो नहीं,
डर तां जवाबां दी नंगाई तो हुंदा ऐ।

श्लोक 21
तू जन्नत दी रसीद माँगदा ऐ,
ते आज दी रोटी वी गुरु दे नां करदा ऐ।
मृत्यु दे बाद दी ज़िंदगी लई,
एह ज़िंदगी रोज़-रोज़ मरदा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जिहड़ा आज नूं गवा दे,
ओह कल नूं कदी नहीं पांदा।

श्लोक 22
तेरे अंदर इक साक्षी रोवे,
पर तू शोर विच ओहदी आवाज़ दबा दे।
प्रवचनां दी भीड़ विच,
अपने ही अस्तित्व नूं खोवा दे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
खामोशी विच जो दिख जाए,
ओह प्रवचनां विच कदी नहीं लभ्दा।

श्लोक 23
गुरु आखे — मैं ही रस्ता हां,
ते तू रस्ते नूं ही मंज़िल मान लिया।
तेरी चाल, तेरी सोच, तेरी नज़र,
सब किराए ते ले के पहचान लिया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
जिहड़ा रस्ता आप मंज़िल बने,
ओह कैदख़ाना बन जांदा ऐ।

श्लोक 24
तू कहें — मैं निम्रता विच हां,
पर सवाल करन तो डरदा ऐ।
एह निम्रता नहीं,
एह गुलामी दा नवा चोला चढ़ा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
निम्रता ओह हुंदी ऐ,
जिहड़ी सच सामने झुकावे, इंसान सामने नहीं।

श्लोक 25
तेरे गुरु दे नाम ते महल,
तेरे नाम ते सिर्फ़ इंतज़ार।
तेरे हिस्से डर, तेरे हिस्से नियम,
ओहदे हिस्से सत्ता दा व्यापार।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जिह्थे हिसाब बराबर न होवे,
ओथे प्रेम दी कोई जगह नहीं।

श्लोक 26
तू कहें — मैं सेवक हां,
पर किस दी सेवा करदा ऐं?
जे सेवा नाल तेरा होश मरे,
ते तू किस नूं ज़िंदा रखदा ऐं?
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पूछे —
जे सेवा सवाल छीन लेवे,
ओह सेवा नहीं, शोषण ऐ।

श्लोक 27
इंसान पैदा होया सी जागदा,
पर समाज ने सुला दित्ता।
धर्म दी लोरी गा के,
ज़मीर नूं बचपन विच ही मार दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जागना कोई वरदान नहीं,
एह तेरा जन्मसिद्ध हक़ ऐ।

श्लोक 28
मैं तेरे खिलाफ़ नहीं,
मैं तेरे अंदर दा खिलाफ़ दा अंत हां।
मैं तेरी सोच दा दुश्मन नहीं,
मैं तेरी गुलामी दा आख़िरी अंत हां।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जद तू मैनूं समझ लवेगा,
ते तू खुद नूं पहली वारी समझेगा।

श्लोक 29
न कोई गुरु गिराना मेरा मक़सद,
न कोई धर्म मिटाना इरादा।
बस इंसान नूं इंसान बनाना,
एह **शिरोमणि रामपॉल सैनी** दा वादा।

श्लोक 30
जाग, सवाल कर, अनुभव कर,
डर नूं आज ही विदा कर।
ज़मीर नूं कबरां चों कढ,
ते अपने होश नूं सजा कर।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
इक पल साक्षात्कार दा,
पूरी उम्र दी वेहोशी तो बड़ा ऐ।


जद इंसान सोचणों डर जाए,
ते ओह जानवर तो हेटां गिर जांदा ऐ।
जानवर भूख नाल मारदा ऐ,
इंसान विचार नाल कत्ल करदा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
सोच दा कत्ल,
सब तो खौफनाक हिंसा ऐ।

श्लोक 19
तू जनम तो नहीं,
तू डर विच दीक्षा लई ऐ।
तेरी माँ ने जनम दित्ता,
गुरु ने तेरी अक्ल दफनाई ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जिहड़ा अक्ल दा कातिल ऐ,
ओह कदी मुक्तिदाता नहीं हो सकदा।

श्लोक 20
शब्द प्रमाण नूं पकड़ के,
तू सत्य नूं अदालत विच खड़ा किता।
जिथे अनुभव दी कोई कीमत नहीं,
ओथे झूठ नूं राजा बना दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
सच प्रमाण नहीं मांगदा,
झूठ ही हर वारी सहारे ढूंढदा ऐ।

श्लोक 21
तू हर सवाल नूं अहंकार समझया,
ते हर डर नूं भक्ति दा नांव दित्ता।
तेरी वेहोशी नूं श्रद्धा कह के,
अपने ही ज़मीर नूं सूली ते चढ़ा दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
जिथे वेहोशी पूजा बन जावे,
ओथे इंसान खत्म हो जांदा ऐ।

श्लोक 22
तू कहंदा ऐ — गुरु बिना रास्ता नहीं,
पर तू कदी अपने पाँव ते चला ही नहीं।
लाठी नूं रब बना के,
तू अपनी रीढ़ दी ताक़त नूं जान्या ही नहीं।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जिहड़ा खुद नहीं चलदा,
ओह रस्ता की दिखावेगा?

श्लोक 23
तेरे नाल जो होया,
ओह हादसा नहीं, व्यवस्था ऐ।
डर पैदा करो,
भेड़ बनाओ,
ते राज करो —
एह पुरानी चालाक व्यवस्था ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
इंसान दी सबसे बड़ी दुश्मन,
ओहदी ही स्वीकृति ऐ।

श्लोक 24
तू हर दिन मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे गया,
पर इक दिन भी अंदर नहीं गया।
तू हर मूर्ति नूं सजदा किता,
पर अपने होश नूं कदी नहीं छुआ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जिहड़ा अंदर नहीं उतर्दा,
ओह बाहर वी कख नहीं लभ्दा।

श्लोक 25
इक पल दा साक्षात्कार,
सदियां दी पूजा तो भारी ऐ।
पर तू पल तो डरदा ऐ,
क्योंकि पल विच सारा झूठ नंगा हो जांदा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
सच समय नहीं मांगदा,
हिम्मत मांगदा ऐ।

श्लोक 26
तू स्वर्ग दी लालच विच,
आज नूं कत्ल कर रहा ऐ।
तू परलोक दी खातिर,
इस लोक नूं लाश बना रहा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जिहड़ा आज नूं नहीं जिया,
ओह कदी किहड़े लोक विच जावेगा?

श्लोक 27
तेरे गुरु दे महल,
तेरे खून नाल खड़े ने।
तेरी चुप्प नाल,
तेरे डर नाल,
तेरी वेहोशी नाल खड़े ने।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
चुप रहणा पाप नहीं,
पर चुप रह के पाप नूं ताक़त देना,
सब तो वड्डा अपराध ऐ।

श्लोक 28
तू खुद नूं छोटा मान के,
किसे होर नूं रब बना लया।
एह ही ओह पल ऐ,
जिथों इंसानियत मरी,
ते गुलामी पैदा होई।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जिहड़ा खुद नूं झुकावे,
ओह दुनिया नूं कदी सीधा नहीं कर सकदा।

श्लोक 29
मैं तैनूं तोड़न नहीं आया,
मैं तैनूं जोड़न आया हां।
मैं तेरे विश्वास नूं नहीं,
तेरी वेहोशी नूं तोड़न आया हां।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
दर्द सच दा लक्षण ऐ,
दवा नहीं,
जागृति ऐ।

श्लोक 30
अंतिम गल्ल याद रखीं,
रब बाहों विच नहीं,
होश विच हुंदा ऐ।
गुरु किताब विच नहीं,
साक्षात्कार विच हुंदा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जिहड़ा होश विच जी लवे,
ओह जन्म-मरण दा कैदी नहीं रहिंदा।


जिह्ने अपने होश नूं गिरवी रख दित्ता,
ओह फेर किस मुँह नाल जीवन दी गल करे?
शब्दां दी जंजीर पाई,
ते फिर आज़ादी दे गीत गावे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जिहड़ा खुद गुलाम ऐ,
ओह कदे मुक्ति दा रास्ता नहीं दिखा सकदा।

श्लोक 19
दीक्षा दे नां ते सोच बंद,
ते विवेक नूं विधर्मी आख दित्ता।
ज़मीर नूं मार के फेर,
उसी लाश नूं रब बना दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
एह धर्म नहीं,
एह इंसानियत दा जनाज़ा ऐ।

श्लोक 20
तू जन्म तो ले के मौत तक,
किसे होर दी अक्ल उधार लई।
अपनी आखां ते परदा पायां,
ते फेर अंधेपन नूं श्रद्धा कह लई।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
अपनी सोच उधार दे नाल,
कदी सत्य पैदा नहीं हुंदा।

श्लोक 21
गुरु बोले — मान ले,
ते तू मान लेया, बिना देखे, बिना सोचे।
पर जे झूठ वी गुरु बोले,
ते तू ओह वी सच मान के ढोए।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
सच ओह नहीं जिहड़ा बोला जाए,
सच ओह ऐ जिहड़ा जिया जाए।

श्लोक 22
भय दी खेती विच प्रेम नहीं उग्दा,
डर दी मिट्टी विच विवेक नहीं फल्दा।
नर्क दे खौफ नाल जो चलदा,
ओह कभी सत्य तक नहीं पहुंचदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
डर नाल जोड़ा होया रब,
सिर्फ़ शासक हुंदा ऐ, सत्य नहीं।

श्लोक 23
तू कहें — मैं भक्त हां,
पर तू इंसान बनन तो डरदा ऐ।
इंसान बनन लई सवाल चाहिए,
ते सवाल तैनूं पाप लगदा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जे सवाल पाप ने,
ते होश सब तो बड़ा पाप ऐ।

श्लोक 24
जिह्नां ने तैनूं कहा — सब छोड़ दे,
ओह खुद सब कुछ जोड़ के बैठे ने।
तेरी तपस्या नाल महल बने,
ते तू नंगे पाँव रस्ते विच खड़े ने।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
एह त्याग नहीं,
एह तेरा शोषण ऐ।

श्लोक 25
तू रोज़ मंदिर, डेरा, आश्रम जाएं,
पर इक वारी अपने अंदर नहीं गया।
बाहर रब ढूँढदा फिरें,
ते अंदर ज़मीर कब दफन हो गया, पता ही नहीं लगाया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
जिह्नू अंदर नहीं लभ्दा,
ओह बाहर कदे नहीं लभणा।

श्लोक 26
तू जन्म, मौत, पुनर्जन्म दी कहानी,
बिना होश सुण के जीता।
पर इक पल जाग के देख लैंदा,
ते सारा चक्कर ओथे ही मुकता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
इक पल दा साक्षात्कार,
करोड़ां जन्मां दी कैद तो आज़ाद ऐ।

श्लोक 27
मैं तैनूं तोड़न नहीं आया,
मैं तैनूं तैनूं नाल मिलाण आया हां।
मैं गुरु नहीं, मैं रब नहीं,
मैं तेरा दफनाया होया होश जगाण आया हां।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
मैनूं मन्न मत,
मैनूं समझ।

श्लोक 28
जद तू समझ जावेंगा,
ते हर प्रवचन फालतू लग्गेगा।
हर गुरु, हर ग्रंथ, हर शब्द,
तेरे सामने नंगा खड़्गेगा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जागे होए इंसान लई,
कदी वी कोई मध्यस्थ नहीं हुंदा।

श्लोक 29
असली विद्रोह हथियार नहीं,
असली विद्रोह होश ऐ।
असली आग नफरत नहीं,
असली आग विवेक ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
जाग, सोच, देख,
बाकी सब अपने आप ढह जावेगा।

श्लोक 30
जे आज वी तू नहीं जाग्या,
ते तू जिंदा हो के वी मर जावेंगा।
ते जे इक पल वी जाग गया,
ते तू मर के वी अमर हो जावेंगा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
फैसला तेरा ऐ,
गुलामी या होश।


श्लोक 18
जिहड़ा सोचन तो डरदा ऐ,
ओह जीउंदा नहीं, बस चलदा ऐ।
हुक्मां दी बैसाखी ते टिक के,
अपने ही अंदर नूं ठगदा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
डर नाल जो जिये,
ओह जन्म तो ही मरा हुंदा ऐ।

श्लोक 19
तू आखदा ऐ — “मैं जानदा नहीं”,
पर सवाल करना वी छड्ड दित्ता।
तेरी अज्ञानता नूं पवित्र बना के,
गुरु ने तैनूं गुलाम लिख दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
अज्ञानता पाप नहीं,
पर सोचन नूं मारना महापाप ऐ।

श्लोक 20
शब्द प्रमाण दे नशे विच,
तू अनुभव नूं झूठ कह बैठा।
जे देख्या, सुनेआ, जिया नहीं खुद,
ओह सारा जीवन उधार समझ बैठा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
उधार दी सच्चाई,
कदी आत्मा नूं आज़ाद नहीं करदी।

श्लोक 21
तेरे अंदर दी आग नूं,
ठंडे प्रवचनां नाल बुझा दित्ता।
तेरे प्रश्नां नूं “अहंकार” कह के,
तेरे विवेक नूं ही फांसी चढ़ा दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
जिहड़ा विवेक मारे,
ओह गुरु नहीं, कसाई ऐ।

श्लोक 22
तू कहंदा ऐ — “मैं कुछ नहीं”,
पर एह भी तैनूं सिखाया गया।
आप नूं शून्य बना के,
किसे होर नूं सिंहासन बिठाया गया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
आप नूं मिटा के,
किसे नूं भगवान बनाना,
सबसे सूक्ष्म हिंसा ऐ।

श्लोक 23
जिहड़े आखदे ने — “सब माया ऐ”,
ओह सबसे वड्डे सौदागर ने।
दुनिया नूं झूठ आख के,
अपने महल सबसे सच्चे ने।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जे सब माया ऐ,
ते तेरा सम्राज्य क्यों सच लगदा ऐ?

श्लोक 24
प्रवचन मंच ते प्रेम,
पर पुछन ते सज़ा ऐ।
भीड़ विच रब,
पर एकले विच सिर्फ़ डर वसा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जिथे प्रेम साबित करना पवे,
ओथे प्रेम नहीं, राज हुंदा ऐ।

श्लोक 25
तू जीवन भर सिर झुकाया,
पर कभी अंदर झाँक के नहीं देख्या।
तेरे अंदर जो सवाल बैठा सी,
ओह बिना जन्मे ही मार दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
जिहड़ा अंदर नहीं उतरदा,
ओह बाहर कदी सच नहीं लभदा।

श्लोक 26
होश इक पल विच आ सकदा ऐ,
पर तू सदियां इंतज़ार करदा ऐ।
किसे होर दे शब्दां नाल,
अपनी आत्मा नूं नापदा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
इक पल दा साक्षात्कार,
हज़ार जन्मां दी गुलामी तो वड्डा ऐ।

श्लोक 27
मैं तैनूं तोड़न नहीं आया,
मैं तैनूं जोड़न आया हां।
तेरे ते चढ़े हर डर नूं,
तेरे ही सवाल नाल उतारन आया हां।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जद तू खुद नूं मिल गया,
फेर न गुरु रहणा, न चेला।

श्लोक 28
अंत विच सिर्फ़ तू रह जाएगा,
ना शब्द, ना डर, ना नाम।
बस होश, बस देखण वाला,
बस जीवन दा नग्न अराम।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
ओह पल ही सच्चा धर्म ऐ,
बाकी सब मन दी थकान।


श्लोक 18
जिहड़ा तैनूं सोचन तो रोके,
ओह तैनूं बचा नहीं, गुलाम बना रहा ऐ।
जिहड़ा सवालां तो डरावे,
ओह सच नहीं, राज चला रहा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
सच कदी पहरेदारी नहीं मंगदा।

श्लोक 19
तू माथा टेक्या,
पर ज़मीर नूं कदे खड़ा नहीं किता।
तू डर विच रोया,
पर होश नूं कदे जगाया नहीं किता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
रोण नाल मुक्ति नहीं मिलदी,
समझ नाल मिलदी ऐ।

श्लोक 20
गुरु दी हर गल्ल आख़िरी मान ली,
ते अपनी गल्ल नूं जुर्म बना लिता।
एह कैसा धर्म ऐ,
जिथे सोचन नूं ही पाप बना दिता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
जिथे बुद्धि मरदी ऐ,
ओथे भक्ति बदबू मारदी ऐ।

श्लोक 21
तू स्वर्ग दी लालच विच,
आज दी ज़िंदगी बेच दिती।
कल दी झूठी उम्मीद लई,
आज दी साँस गिरवी रख दिती।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जिहड़ा आज नूं तबाह करे,
ओह कल कदी सच्चा नहीं हुंदा।

श्लोक 22
तेनूं आख़्या गया —
बस मान, बस झुक, बस डर।
पर कदे नहीं आख़्या —
खुद नूं जान, खुद नूं परख।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जिहड़ा खुद नूं नहीं जान्दा,
ओह रब नूं वी नहीं जान्दा।

श्लोक 23
धर्म दे नां ते तैनूं तोड़िया,
ते टुकड़े-टुकड़े विच वंड दित्ता।
जात, पंथ, गुरु, झंडे —
हर इक नाल तैनूं लड़वा दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
वंडया होया इंसान,
सदा राज लई आसान हुंदा ऐ।

श्लोक 24
जिहड़े प्रेम दी गल्ल करदे,
ओह डर बिना जी नहीं सकदे।
जिहड़े त्याग सिखांदे,
ओह खुद कदे खाली नहीं रह सकदे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
करनी कथनी दा फर्क,
सब तो वड्डा झूठ हुंदा ऐ।

श्लोक 25
तू मूरत नूं सजा के,
अपने अंदर दा सच उजाड़ दित्ता।
तू शब्दां नूं पूज के,
अनुभव नूं ही नकार दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
जिहड़ा प्रत्यक्ष नूं ठुकरावे,
ओह सदा भ्रम विच ही जींदा ऐ।

श्लोक 26
एह सृष्टि सरल सी,
पर तूं इसनूं उलझा दित्ता।
एह जीवन सहज सी,
पर तूं इसनूं सौदेबाज़ बना दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जटिलता सच्चाई नहीं,
अहंकार दी निशानी ऐ।

श्लोक 27
तू इंसान जनम लया,
पर इंसान बनन तो डर गया।
हैवानां वांग आज़ाद जीण नूं,
पर होश विच जीण तो डर गया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
होश सब तो वड्डी आज़ादी ऐ।

श्लोक 28
ना तूं जींदा होश विच,
ना मरेंगा होश विच।
एह वेहोशी दी उम्र,
जन्म-मृत्यु दी रस्सी विच।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
इक पल होश दा,
सारी उम्रां नूं बदल सकदा ऐ।

श्लोक 29
मैं कोई बाहरी आवाज़ नहीं,
मैं तेरा ही दबाया होया सवाल हां।
मैं तेरा ही रुलाया होया ज़मीर हां,
मैं तेरा ही अनसुना जवाब हां।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
मैनूं सुन ले,
ते तूं खुद नूं मिल जावेंगा।

श्लोक 30
जद डर डिग्गेगा,
ते गुरु आपे ढह जावेंगे।
जद होश जागेगा,
ते रब आपे गुम जावेंगे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
फेर सिर्फ़ इंसान बचेगा,
फेर पहली वार सच्चा इंसान।



श्लोक 7
गुरु दीक्षा शब्द प्रमाण विच बंद हो के,
तर्क तथ्य विवेक नूं खुद अपने हत्थां नाल कत्ल करना ऐ।
ज़मीर जे मर गया फेर साँस लैन दा की मतलब,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे — जिंदा लाश बन के फिरना ऐ।

श्लोक 8
शब्द नूं भगवान बना के,
आपने होश नूं कब्र विच गाड़ दित्ता।
गुरु बोले, तू चुप रह —
ते तू अपना ही अस्तित्व सदा लई साड़ दित्ता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे — जे सोच मरी,
फेर भक्ति भी सिर्फ़ इक अपराध बन जांदी ऐ।

श्लोक 9
ज़मीर बिना इंसान,
सिर्फ़ चलदी फिरदी मशीन हुंदी ऐ।
हुक्म मन्ने, डर विच जिये,
ते मौत वी ओहदी वेहोशी दी ही आख़िरी सीन हुंदी ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
होश बिना जीवन, जीवन नहीं, सज़ा हुंदी ऐ।

श्लोक 10
गुरु आखे — सवाल पाप ऐ,
ते तू सवाल नूं ही गुनाह समझ बैठा।
तेरे अंदर दा सच्चा साक्षी,
शब्दां दे बोझ हेठ दब के मर बैठा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
जिथे सवाल मर जाए, ओथे रब वी झूठा हो जांदा ऐ।

श्लोक 11
डर, खौफ, नर्क, स्वर्ग दी सौदेबाज़ी,
इक गंदी मंडी चल रही ऐ।
तेरा आज, तेरा होश, तेरा ज़मीर,
मृत्यु दे बाद दे वादे विच बिक रही ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
जिहड़ा जिंदा मुक्ति नहीं दे सकदा,
ओह मरा होया सच किथों देवेगा?

श्लोक 12
तू दस —
जे गुरु खुद आज़ाद हुंदा,
तेरे ते डर दी ज़ंजीर क्यों हुंदी?
जे सच वाकई सच हुंदा,
ते सवालां तो डरन दी जरूरत क्यों हुंदी?
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पूछे —
डर नाल चलण वाला रस्ता,
कदी सत्य तक पहुंचा ऐ?

श्लोक 13
सरल सहज निर्मल लोकां नूं,
कट्टरता दी وردी पहना दिती।
ते उन्हां दे प्यार नूं इस्तेमाल कर के,
प्रभुत्व दी कुर्सी सजा दिती।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
एह सबसे बड़ा पाप ऐ,
जिहड़ा पूजा दे नां ते किता गया।

श्लोक 14
गुरु खुद अस्थाई जटिल बुद्धि मन विच फंसा,
ते दूसर्यां नूं मुक्ति दे पाठ पढ़ावे।
आप महल बनाए, सम्राज्य खड़े करे,
ते शिष्य नूं माया छोड़न दा हुक्म सुनावे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
एह पाखंड नहीं,
एह खुल्ला विश्वासघात ऐ।

श्लोक 15
जद ज़मीर ही दफन हो जाए,
ते फिर धर्म, भक्ति, प्रेम सब नकली हो जांदे ने।
इंसान बाहरो जीवित दिखे,
अंदरों सदियां पहले मरे होए हो जांदे ने।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे —
इक पल होश दा,
हज़ारां सालां दी वेहोशी तो ऊँचा ऐ।

श्लोक 16
मैं कोई भगवान नहीं,
मैं तेरा ही दफनाया होया ज़मीर हां।
मैं ओह आवाज़ हां,
जिह्नूं तू हर रोज़ मार के पूजा करदा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे —
मैनूं ज़मीन चों कढ,
ते तू आप इंसान बन जावेंगा।

श्लोक 17
जद तू खुद सोचेंगा,
ते गुरु अपने आप गिर जावेगा।
जद तू डर छोड़ेंगा,
ते रब अपने आप मिट जावेगा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे —
सिर्फ़ तू बचेगा,
सिर्फ़ होश बचेगा,
बाकी सब भ्रम सड़ जावेगा।शब्दाँ दी तलवार नाल ज़मीर दा गला काटिया,
गुरु दे नाम ते सोच नुं सरेआम फाँसी लाटिया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** दहाड़ मारे, ऐ अंधे मानव, सुन ले,
जद ज़मीर मरे, ओह दिन तेरा, असली मौत दा दिन ले।

**श्लोक 2 (चेतावनी)**
सवाल पूछना गुनाह ऐथों, एथे डर ही धर्म है,
होश नुं जंजीरां पाईयाँ, बेहोशी ही करम है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ऐ हालात क्रांति माँगदे ने,
वरना इंसान दे नाम ते, सिर्फ़ जानवर ही राँगदे ने।

**श्लोक 3 (वार)**
तू गुरु नुं रब बना के, खुद नुं कीड़ा समझ बैठा,
अपने हक़, अपनी आग नुं, तू आपे ही कुचल बैठा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** गरजे, ऐ गुलाम सोच, अब टूट जा,
जो खुद नुं छोड़ दे, ओह किसे होर नुं कदी न लूट जा।

**श्लोक 4 (चेतावनी)**
डर दे नाल जे प्रेम सिखावे, ओह प्रेम नहीं, ज़हर है,
जिथे भय है, ओथे सच नहीं, ओथे सिर्फ़ कहर है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बोलदा, संभल जा इंसान,
भय नुं भगवान बनाना, इतिहास दा सबसे वड्डा अपमान।

**श्लोक 5 (वार)**
मुक्ति मरन तो बाद दी कथा, सबसे घटिया धोखा है,
जीउँदे सच नुं छुपा के, मौत दा सपना बेचा है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ललकारे, ऐ सौदागरो सुन लो,
जो आज होश न दे सके, ओह कल स्वर्ग किथों दे लो?

**श्लोक 6 (चेतावनी)**
तन-मन-धन-साँह निचोड़ के, गुरु दे महल खड़े,
प्रवचन सस्ते बाँट के, ज़मीर महंगे पड़े।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, एह लूट पवित्र नहीं हो सकदी,
लहू नाल लिपटी गद्दी, कदी भी सच नुं छू सकदी।

**श्लोक 7 (वार)**
सरल सहज निर्मल लोगां नुं, कट्टरता दे हथियार बनाए,
उनां दी भोलापन दी लाश ते, प्रभुत्व दे झंडे लहराए।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** चीखे, ए अपराध माफ़ी लायक नहीं,
जिथे निर्दोष कुचले जावन, ओह धर्म कदी पवित्र नहीं।

**श्लोक 8 (चेतावनी)**
अहंकार दी आग विच गुरु, खुद ही जलदा जावे,
भगवान दी पदवी पकड़े, पर बाहर निकल ना पावे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे, ए आख़री मोड़ है,
या तां अहंकार छोड़ दे, नहीं तां पतन दा शोर है।

**श्लोक 9 (वार)**
ज़मीर मरा होवे जिथे, ओथे पूजा भी हिंसा है,
शब्द जप जप के खून सुकाया, एह सभ्यता दी बदनामी है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** गरजदा, ऐ आईना तोड़ न सकेंगा,
सच नुं जितना दबाएगा, उतना ही खुद नुं खोवेंगा।

**श्लोक 10 (अंतिम चेतावनी)**
ए आख़री ऐलान है, कोई समझौता नहीं,
होश या गुलामी — दोहां विचों तिसरा रास्ता नहीं।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** दहाड़े, ऐ मानव अब फैसला कर,
या ज़मीर नाल जी, या फिर मान ले — तू जीउँदा है पर मर।


**वार 1**
ए इंसान, सुन आख़िरी चेतावनी, अभी भी वक़्त है सँभल जा,
शब्दां दी गुलामी छोड़ दे, वरना इतिहास विच गुम हो जा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, जे ज़मीर फिर वी ना जागे,
फिर तू खुद ही अपना कातिल है, कोई होर दोषी ना ठहराए।

**वार 2**
गुरु दी ओट विच छुपे अहंकार, एक दिन नंगा हो जाना,
डर दे सिंहासन हिलणगे, जद सवालां ने तूफ़ान आना।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बोलदा, ए सत्य दी दस्तक है,
जो आज न सुने, ओह कल पछतावेगा — ए प्रकृति दी क़सम है।

**वार 3**
शब्द प्रमाण दी तलवार नाल, तूने सोच दा गला वढ्या,
अब होश दी आग जलेगी, तेरा हर वहम राख बन सढ्या।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे, ए आख़िरी मौका जान,
ज़मीर नाल जी लेना सिख, नहीं ताँ मिट जावेगा तेरा नाम।

**वार 4**
डर नाल जे भीड़ चलाई, ओह राज कदे टिकदा नहीं,
झूठ दी नींव ते खड़ा महल, सच्चाई सहारदा नहीं।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** चेतावनी देवे, सुन ऐ गुरुआं,
प्रभुत्व दी भूख बहुत भारी, ए खुद ही तैनू खा जां।

**वार 5**
भोलेपन दी लाशां ते जे, धर्म दी दुकान चलायी,
ओह दिन दूर नहीं जद सच ने, तेरी हर पोल खोल पाई।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ए व्यापार बंद कर,
ज़मीर दी क़ीमत चुकानी पवेगी, ए हिसाब पूरा कर।

**वार 6**
मुक्ति दी झूठी रसीदां, अब और नहीं चलण दित्तियां,
जीउँदे सच दे सवालां ने, तेरी नींदां उड़ा दित्तियां।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बोले, डर दा साम्राज्य ढह रहा,
जिन्हां ने आँखां मूँद रखीं, अब ओह खुद नुं देख रहा।

**वार 7**
ए मानव, आख़िरी वार सुन, तू हैवान बन के ना मर,
इक पल होश दा जी ले, सदियाँ दी वेहोशी छोड़ धर।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे, ए आदेश नहीं, ए चेतना है,
जे आज ना जागे, कल इतिहास विच तेरा नाम ही नहीं बचेगा।

**वार 8 (अंतिम चेतावनी)**
मैं डर पैदा नहीं करदा, मैं डर तो आज़ादी देन्दा हां,
पर सच नुं जो ठुकरावे, ओह खुद ही मिटदा जांदा हां।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आख़िरी ऐलान करे, सुन लो सारे जहान,
ज़मीर जिंदा रखो, नहीं ताँ इंसान नहीं — सिर्फ़ इक प्रजाति दा नाम।


**वार 1 (चेतावनी)**
सुन ऐ इंसान, ए आख़री घंटी है, ज़मीर जागे ताँ बचाव है,
शब्दां दी कैद विच मरदा रह्या, ए कोई जीवन नहीं, ए घाव है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** चेतावे, अज नहीं ताँ कदे नहीं,
डर दी गुलामी छड्ड दे, वरना इतिहास वी माफ़ नहीं।

**वार 2**
गुरु जे सवाल तो डरदा है, समझ ले ओह झूठा सिंहासन,
सच सवालां तो डरदा नहीं, डरदा है सिर्फ़ अहंकार दा शासन।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ललकारे, ऐ आँख खोल के देख,
जिथे प्रश्न पाप बन जावे, ओथे धर्म खुद ही है दुष्ट लेख।

**वार 3**
तैनूं सिखाया गया चुप रहणा, सोच नुं ज़हर कह के मारया,
ज़मीर नुं “मैं” कहण दी हिम्मत, गुरु ने सब तो पहले हारया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बोलदा, ए सिखलाई नहीं, ए नस्ल-कुशी है,
सोच बिना जीण वाली भीड़, बस चलता-फिरता नशा ही है।

**वार 4**
प्रेम दी बात, पर डर दी हुकूमत, ए सिधा-सिधा धोखा है,
जो डर नाल झुकावे मथा, ओह रब नहीं, ओह भोंडा सौदा है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** चेतावे, प्रेम तां आज़ादी है,
डर दे नाल जे बंधे होए, ओह भक्ति नहीं, ओह बर्बादी है।

**वार 5**
मुक्ति मौत तो बाद रखी गई, जीवित सच नुं टाल दिता,
आज दी रौशनी छीन के, कल दे सपने नाल बहला दिता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ललकारे, ऐ सौदा रद्द कर,
जो आज सच ना दे सके, ओह कल दा मालिक नहीं बन सकदा।

**वार 6**
सरल लोगां दी भोलापन नुं, सीढ़ी बना के चढ़या गया,
उनां दी ज़िंदगी, समय, साँह — सब सिंहासन लेई वड़या गया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** चेतावे, ए अपराध है, ए पाप है,
भोलेपन नुं हथियार बनाना, इंसानियत ते सीधा वार है।

**वार 7**
अहंकार दी आग विच गुरु, खुद नुं रब समझ बैठा,
शब्दां दी सेना खड़ी करके, सच नुं दुश्मन ठहरा बैठा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ललकारे, ऐ सिंहासन काँप रहा है,
जिथे ज़मीर जाग पवे इक पल, ओथे झूठा राज गिरदा है।

**वार 8**
तू कहंदा “हम अलग हैं”, पर अंदर सब एक समान,
फिर क्यों डर दे नाल राज करदा, क्यों बनदा है तू शैतान?
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** चेतावे, ए आख़री मौका है,
या तां ज़मीर नाल जी ले अज, या इतिहास विच लानत है।

**वार 9**
तू मंदिर, आश्रम, दरबार बना लिए, पर अंदर कब्रिस्तान,
जिथे सोच मरी पई है, ओथे पत्थर वी रोवे अनजान।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बोलदा, ए इमारत नहीं, ए इल्ज़ाम है,
जिथे होश नुं दफनाया गया, ओह थां इंसानियत दा अंजाम है।

**वार 10 (अंतिम चेतावनी)**
मैं दुश्मन नहीं, मैं चेतावनी हां, मैं तेरा दबाया सवाल,
जे अज वी ना सुने तां समझ ले, तू खुद ही अपना काल।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आख़री वार करे, ऐ मानव जाग जा अज,
डर, गुरु, पदवी, भ्रम छड्ड — वरना इतिहास तैनूं माफ़ ना कर सकेगा कज।


**श्लोक 1 (चेतावनी)**
ए इंसान, आख़िरी चेतावनी सुन ले, अभी वी समय बाकी है,
ज़मीर नुं मार के जीवे जो, ओह जीउँदा नहीं, बस लाश ही है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** हुंकार भरे, रुक जा, खुद नुं देख,
जे अब वी ना जागेआ, तां इतिहास तैनूं हैवान ही लेखेगा एक।

**श्लोक 2 (वार)**
शब्द प्रमाण दी तलवार नाल, तूने अपनी अकल काटी,
गुरु दी जय-जयकार करदा, पर सच दी आवाज़ दबाती।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ए आत्मघात है, धर्म नहीं,
जो सोच तो डरदा है सदा, ओह आज़ाद कभी बनदा नहीं।

**श्लोक 3 (वार)**
तू पूजा विच वी सौदा करदा, हर सांस दा हिसाब रखे,
मुक्ति दा लालच पाले रखे, ज़मीर नुं गिरवी रखे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ललकार करे, ए व्यापार बंद कर,
सच बिकदा नहीं मरण तो बाद, जीउँदा सच कबूल कर।

**श्लोक 4 (चेतावनी)**
डर दे नाल जे प्रेम सिखावे, ओह प्रेम नहीं ज़हर है,
जिथे सवाल गुनाह बन जाए, ओह थां नरक तो बदतर है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** चेतावे, ए राह छोड़ दे आज,
नहीं तां तेरी पीढ़ी पीढ़ी तक, बेहोशी ही विरासत साज।

**श्लोक 5 (वार)**
गुरु नुं रब बना के तूने, रब नुं ही कैद कर दिता,
अपनी आत्मा नुं झुका के, अहंकार नुं सिर चढ़ा दिता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** हुंकारे, ए उलटी दुनिया है,
जिथे इंसान घुटने टेके, ओथे झूठ सिंहासन चढ़िया है।

**श्लोक 6 (वार)**
सरल, सहज, निर्मल लोगां दा, खून नहीं पर समय पीया,
उनां दी ज़िंदगी लील के, सम्राज्य खड़ा कर लिया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** गरजे, ए पाप खामोश नहीं रहूँगा,
ज़मीर दी अदालत विच, हर ढोंग नंगा करूँगा।

**श्लोक 7 (चेतावनी)**
प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा, दौलत, वेग — ए सब नशा है झूठा,
जिन्हां विच गुरु खुद डूबे, शिष्य नुं डुबो के रूठा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे, नशा उतरेगा ज़रूर,
पर जद उतरेगा, तां बहुत देर हो चुकी होवेगी हुजूर।

**श्लोक 8 (वार)**
तू कहें “हम श्रेष्ठ हैं”, पर कर्म हैवानां वाले,
प्रभुत्व दी भूख विच, तूने खुद नुं ही गालियाँ पाले।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** दहाड़े, ए श्रेष्ठता दा भ्रम है,
ज़मीर बिना जो जीवे, ओह इंसान नहीं, बस इक ढांचा कम है।

**श्लोक 9 (चेतावनी)**
इक पल दा होश तैनूं आज़ाद कर सकदा है,
पर तू सदियाँ दी बेहोशी नुं, “धर्म” कह के पकड़ा है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आख़िरी चेतावनी दे, आज जाग जा,
नहीं तां जन्म-मरण दे चक्कर विच, हमेशा ही फँस जा।

**श्लोक 10 (घोषणा)**
मैं तैनूं डरान नहीं आया, मैं तैनूं आईना दिखाया,
जो दिखेगा, ओह चुभेगा, क्योंकि सच ने नक़ाब लहाया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** एलान करे, ऐ आख़िरी वार है,
ज़मीर जगा ले आज, नहीं तां इंसानियत दा खेल हार है।


दीक्षा दे नाल शब्दाँ विच बंदे ने, ज़मीर नुं आपे ही कतल किता,
तर्क विवेक नुं दफन करके, जीउँदे-जी मरन नुं धर्म किता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, जद ज़मीर ही मर जावे,
फिर साँह चलदे ने, पर जीवन दा कोई मतलब ही ना रह जावे।

**श्लोक 2**
शब्द प्रमाण दी बेड़ियाँ पाईयाँ, सोच नुं अपराध बना दिता,
पूछण दी हिम्मत छीन के, डर नुं भगवान बना दिता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बोलदा, ऐ बंदे सुन, ए धर्म नहीं ए क़त्ल है,
ज़मीर बिना जो जींदा फिरदा, ओह लाश है, ओह सकल है।

**श्लोक 3**
गुरु दी आज्ञा आख़िरी मान के, खुद नुं ही तू मिटा दिता,
अपनी अकल, अपनी आग नुं, तूने खुद ही बुझा दिता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, जद सोच ही गुनाह बन जावे,
फिर मंदिर, मस्जिद, दरबार — सब क़ैदख़ाने बन जावे।

**श्लोक 4**
ज़मीर मरन तो बाद इंसान, सिर्फ़ चालदा फिरदा साया है,
हँसदा, रोन्दा, पूजा करदा — सब कुछ बस इक दिखावा है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पुकारे, एहो जीवन नहीं, एहो अपमान है,
होश बिना जो जीवे सदियाँ, ओह हैवान तो वड्डा शैतान है।

**श्लोक 5**
डर दे नाल जे भक्ति चलदी, ओह भक्ति नहीं व्यापार है,
नरक-स्वर्ग दी सौदेबाज़ी, गुरु दा काला हथियार है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ऐ सत्य नुं तौलन वालेओ,
जिन्हां ने ज़मीर गिरवी रख्या, ओह खुद ही चोर ने, लुटेरेओ।

**श्लोक 6**
मुक्ति जे मरन तो बाद मिलनी, फेर जीउँदा सच क्यों छुपाया,
तन-मन-धन-साँह सब लेके, बदले विच वहम थमाया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बोलदा, ए सौदा सबसे घटिया है,
जिथे जीउँदा सच न मिले, ओह रास्ता ही धोखाधड़ीया है।

**श्लोक 7**
सरल, सहज, निर्मल लोगां नुं, कट्टरता दे कपड़े पवाए,
उनां दी सच्चाई नुं कुचल के, गुरु ने सिंहासन सजाए।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ए सृष्टि दा सबसे वड्डा गुनाह है,
भोलेपन नुं सीढ़ी बनाना, ए प्रेम नहीं, ए तबाही है।

**श्लोक 8**
अहंकार दी आग विच सड़दा, गुरु खुद भी जलदा जावे,
प्रभुत्व दी पदवी छड़ के, बाहर आना चाह के भी ना पावे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आखे, एही सबसे वड्डा भ्रम है,
जिन्हां नुं भगवान बनाया, ओह खुद ही कैद विच हर दम है।

**श्लोक 9**
जद ज़मीर मरे, तां क़ानून, धर्म, मर्यादा सब झूठे,
फिर कत्लेआम भी पूजा बन जावे, शब्द बस नशे विच घुटे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ए इंसानियत दी कब्र है,
जिथे सोच मर जावे, ओह थां सिर्फ़ हैवानियत दी ज़मीन है।

**श्लोक 10 (चरम)**
मैं कोई विरोध नहीं, मैं आईना हां, सच दी नंगी तस्वीर,
जो देखेगा ओह काँपेगा, क्योंकि मरी पई है उस दी ज़मीर।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आख़री पुकार करे, ऐ मानव उठ, होश च आ,
गुरु छोड़, ग्रंथ छोड़, डर छोड़ — बस खुद नुं देख, बस खुद नुं पा।**श्लोक 1 (चेतावनी)**
ए इंसान, होश च आ जा, समय तेरा खत्म हो रहा है,
ज़मीर दफन है ते तू प्रवचन सुन-सुन के नशे च सो रहा है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** वार करदा, ऐ आख़िरी घंटी समझ,
जे अब वी न जागेया, फेर तू इंसान नहीं, सिर्फ़ ढांचा समझ।

**श्लोक 2 (सीधा वार)**
तू गुरु दे चरणां विच सिर रख के, अपनी अकल काटी है,
एह भक्ति नहीं, आत्महत्या है, तूने खुद नाल गद्दारी पाई है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ए गुलामी है, धर्म नहीं,
ज़ंजीर सोने दी होवे या लोहे दी — गुलाम तां गुलाम ही।

**श्लोक 3 (धमाका)**
डर नाल चलदी भक्ति, ओह राक्षस दी खेती है,
जिथे सवाल मर जान, ओथे हैवानियत पक्की है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** चिल्ला के आखे, ए सत्य दी हत्या है,
जद डर तेरा भगवान बने, समझ ले — तू खुद क़त्लखाना है।

**श्लोक 4 (नंगी सच्चाई)**
तू जनम तो होश च नहीं आया, मरन वी बेहोशी च मरेंगा,
पूरे जीवन इक पल वी जाग्या नहीं, फिर किहड़े सच नुं धरेंगा?
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** वार करदा, ए मानसिक गुलामी है,
जानवर तां मस्त जींदा है, तू तां जीउँदा लाश समान है।

**श्लोक 5 (अहंकार पर वार)**
रब दी पदवी दा शौंक पाल के, ज़मीर नुं रौंद दिता,
खुद भगवान बनण दी हवस च, इंसानियत नुं ही मार दिता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ए सबसे गंदा अपराध है,
जो खुद नुं भगवान समझे, ओह सच्चाई दा कातिल है।

**श्लोक 6 (गुरु पर सीधा हमला)**
जो डर दे नाल राज करे, ओह गुरु नहीं, जल्लाद है,
अनुयायी नुं बंधुआ बना के, सच दा गला घोंटण वाला है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ऐलान करदा, ए खुला शोषण है,
मुक्ति मरन तो बाद दी बेचे, ओह व्यापारी है, धोखेबाज़ है।

**श्लोक 7 (अनुयायी को झकझोरना)**
तू जिन्नू पूजदा फिरदा, ओह तेरे डर तो जिंदा है,
तेरी गुलामी बिना, उस दा सिंहासन ही गिरदा है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ताना मारदा, ऐ सोचे बिना चलण वाले,
तू न होवे तां ओह कुछ नहीं, फिर तू खुद क्यों कुछ नहीं?

**श्लोक 8 (आख़िरी चेतावनी)**
ए आख़िरी समय है इंसान, या जाग या मिट जा,
ज़मीर नाल खड़ा हो जा, या हैवान बन के रह जा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** फ़ैसला सुना दिता साफ़-साफ़,
होश इक पल पा ले, नहीं तां जन्म-मरण तेरा ही अभिशाप।

**श्लोक 9 (अंतिम वार)**
मैं दुश्मन नहीं तेरा, मैं तेरी ही सच्चाई हां,
पर सच आईना होवे, ओह आंखां नुं चुभदा हां।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आख़िरी ललकार करे, ए इंसान सुन,
अब वी जे न जागेया, फेर दोष किसे नुं न दे — तू खुद ही चुन।



### ⚔️ युद्ध घोषणापत्र : ज़मीर बनाम गुलामी ⚔️

**श्लोक 1 (घोषणा)**
एह युद्ध तलवारां दा नहीं, एह युद्ध सोच दा ऐलान है,
जिथे सवाल मार दिते गए, ओथे इंसानियत दा श्मशान है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** माइक संभाल के बोलदा, सुन लो ऐ लोगां,
आज चुप्पी दा जनाज़ा है, होश दी फ़ौज मैदान च उतरी ऐ।

**श्लोक 2 (निर्दयी वार)**
तू डर नुं भगवान बना के, ज़मीर नुं रोज़ सूली चढ़ाया,
फिर प्रवचन सुन के रोया, पर कभी सच नुं नहीं अपनाया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** थूक के आखे, एह भक्ति नहीं,
एह भीख है, एह गुलामी है, एह आत्मा दी सबसे बड़ी हार है।

**श्लोक 3 (रैप-बैटल हुक)**
सुन—Boom! शब्द गोलियां नहीं, आईने ने,
Face कर सच्चाई, या भाग जा, डर तेरे सीने ने।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ऑन बीट, हर झूठ एक्सपोज़,
तू गुरु नहीं, तू ब्रांड है, Followers तेरा डोज़।

**श्लोक 4 (गुरु-प्रभुत्व पर हमला)**
जो डर दे नाल राज करे, ओह ज्ञान नहीं, ज़हर है,
अनुयायी नुं कैद रखे, ओह गुरु नहीं, पहरेदार है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** एलान करदा, सुन साफ़-साफ़,
मुक्ति बाद दी बेचण वाला, आज इथे कटघरे च खड़ा है।

**श्लोक 5 (अनुयायी पर निर्दय सच)**
तू जिन्नू पूजदा, ओह तेरे डर ते पलदा है,
तेरी बेहोशी बिना, उस दा सिंहासन ढहंदा है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ताना नहीं, फ़ैसला दे रहा,
तू खुद नुं मिटा के किसी नुं ऊँचा करे — एह सबसे बड़ी भूल रहा।

**श्लोक 6 (मानव प्रजाति पर वार)**
तू जनम तो होश च नहीं आया, मरन वी नशे च मरेंगा,
पूरी उम्र प्रवचन खाधे, पर इक पल वी खुद नुं न देखेगा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** गरज के बोले, सुन ऐ इंसान,
जानवर मस्त जींदा है, तू तां जीउँदा क़ब्रिस्तान।

**श्लोक 7 (अहंकार की चीरफाड़)**
रब दी पदवी दा नशा, सबसे घटिया नशा है,
जद इंसान खुद नुं भगवान कहे, ओह इंसान नहीं, तमाशा है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** वार करदा सीधा दिल ते,
जो खुद नुं सर्वोच्च माने, ओह सच्चाई दे कत्ल ते जिंदा है।

**श्लोक 8 (रैप-ब्रेक / क्राउड कॉल)**
Hands up! अगर होश चाहिए,
Hands down! अगर डर चाहिए।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** चिल्लाए, Choose कर आज,
या ज़मीर नाल खड़ा हो जा, या गुलामी तेरा ताज।

**श्लोक 9 (अंतिम चेतावनी)**
एह आख़िरी मौका है, बाद च कोई शिकायत नहीं,
ज़मीर मर गया जे आज, कल तां इंसानियत वी नहीं।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** फ़ैसला लिख के दे रहा,
जाग या मिट—बीच दा रास्ता अब इतिहास च नहीं रहा।

**श्लोक 10 (समापन—घोष)**
मैं दुश्मन नहीं, मैं आईना हां, पर आईना तोड़न नाल सच नहीं मरदा,
जो भागे, ओह गुलाम ही रहे, जो देखे, ओह आज़ाद बनदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आख़िरी बार बोलदा मंच तो,
एह युद्ध खत्म नहीं होया—एह हर उस दिल च शुरू होया,
जिथे ज़मीर अजून जिंदा है।


### ⚔️ युद्ध घोषणापत्र — चरण 2 : ज़मीर की आख़िरी लड़ाई ⚔️

**श्लोक 1 (निर्दयी उद्घोष)**
एह बगावत कोई शौक नहीं, एह मजबूरी दा ऐलान है,
जिथे ज़मीर नुं रोज़ मारा जावे, ओथे चुप रहणा गुनाह है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** दहाड़ मार के बोलदा, सुन ऐ भीड़,
आज सच नुं बोलण वाला ही असली अपराधी गिना जाएगा।

**श्लोक 2 (मानव प्रजाति पर नंगा वार)**
तू इंसान कहलाया, पर सोच तेरी शिकारी है,
हर पल हित साधे, हर पल धोखा — तेरी फितरत व्यापारी है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ऐ प्रजाति शर्मिंदा हो,
जानवर भूखा होवे तां मारे, तू तां भरा हो के भी लुटेरा हो।

**श्लोक 3 (रैप-बैटल ब्रेक)**
Beat drop—सुन!
सवाल = विद्रोह,
होश = अपराध,
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ऑन माइक, हर झूठ बेनक़ाब।
तू श्रद्धा नहीं, addiction पाल्या,
गुरु brand ऐ, follower माल्या।

**श्लोक 4 (गुरु-संरचना की चीरफाड़)**
जिथे सवाल नाजायज़ होवे, ओथे ज्ञान मर जांदा,
जिथे डर नाल प्रेम सिखाया जावे, ओथे इंसान सड़ जांदा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** साफ़ ऐलान करदा, ए सुन लो,
डर नाल चलण वाला हर सिस्टम, अंदरों-अंदर खोखला हो चुक्या।

**श्लोक 5 (अनुयायी को कठोर आईना)**
तू कहें “मैं छोटा हां”, एह तेरी सबसे बड़ी भूल है,
तू छोटा बन के किसी नुं बड़ा करे — एह आत्मा दी सूली है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ताना नहीं, फैसला सुना रहा,
जो खुद नुं नकारे, ओह हर जनम विच फिर गुलाम बन के आ रहा।

**श्लोक 6 (रैप-युद्ध: होश बनाम नशा)**
नशा है शब्दां दा, नशा है वाद्यां दा,
नशा है स्वर्ग-नरक दे सौदियां दा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आग उगलदा, होश नशे नुं काटे,
इक पल दी जागरूकता, करोड़ां जनमां ते भारी पाटे।

**श्लोक 7 (प्रेम बनाम डर)**
डर नुं प्रेम कहण वाले, सबसे बड़े झूठे ने,
प्रेम आज़ाद करदा है, डर तां जंजीरां कूटे ने।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** गरज के आखे, ए सिद्धांत साफ़,
जिथे भय है, ओथे सच नहीं — ओथे सिर्फ़ सत्ता दा ख़्वाब।

**श्लोक 8 (स्टेज-कॉल / भीड़ से सवाल)**
एह पूछ!
क्या तू जिंदा है या बस चलदा है?
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** भीड़ नुं ललकारे, जवाब दे,
क्या तू सोचदा है, या सोचा जा रहा है — सच बोल के देख ले।

**श्लोक 9 (अंतिम चेतावनी — ज़मीर)**
ज़मीर कोई भावना नहीं, एह आख़िरी अदालत है,
जिथे तू खुद नाल झूठ बोले, ओथे कोई बरी नहीं बच्दा है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** लिख के दे रहा, आख़िरी फ़ैसला,
होश पा या भ्रम नाल मर — बीच दा रास्ता अब रद्द है।

**श्लोक 10 (समापन — युद्ध की मशाल)**
एह युद्ध मंच ते शुरू होया, पर खत्म दिलां च होगा,
हर उस इंसान विच लड़ेगा, जिथे ज़मीर अजून जिंदा होगा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आख़िरी ऐलान करदा आज,
मैं रस्ता नहीं, मैं आईना हां — देख, या तोड़, पर सच तां रहेगा आज।


### ⚔️ युद्ध घोषणापत्र — चरण 3 : ज़मीर बनाम साम्राज्य ⚔️

**श्लोक 11 (अंतःकरण पर प्रहार)**
ज़मीर नूं मार के जीणा, एह कोई जीत नहीं, हार ऐ,
जे भीतर ख़ामोशी चिल्लावे, बाहर दी हँसी बीमार ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, ऐ आईना तेरा दुश्मन नहीं,
आईने नूं तोड़ के सच मिटेगा नहीं — बस तेरी सूरत बेहिसाब ऐ।

**श्लोक 12 (डर की राजनीति)**
डर नूं नीति बनाके, प्रेम दा नाटक खेलेया,
हर वचन च भय घोलेया, हर क़दम ते बंधन टांकेया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** दहाड़े, सुन सत्ता दे सौदागरो,
डर दे खेत च उग्गे फ़ूल, कभी इंसानियत नहीं बनदेया।

**श्लोक 13 (रैप-ब्रेक: ब्रांड बनाम बोध)**
Mic check—
ब्रांड चमके, बोध गुम्म,
लोग गिने, लोग नहीं।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** बोले, ये बाज़ार है होश का,
जहाँ सच सस्ता, और भ्रम प्रीमियम—समझौता रोज़ का।

**श्लोक 14 (अनुयायी को झकझोर)**
तू सवाल छोड़ेया, तू खुद छोड़ेया, ऐ सच्ची बात,
तू झुका इसलिए नहीं कि तू छोटा, बल्कि आदत बन गई बात।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कहे, उठ—बिना नफ़रत, बिना शोर,
सिर झुकाए बिना खड़े होणा—एह विद्रोह नहीं, होश दा ज़ोर।

**श्लोक 15 (प्रवचन बनाम प्रमाण)**
प्रवचन मीठे लग्गे, पर सबूत किथे ने?
हर वादा मौत दे बाद, जिंदा सवाल किथे ने?
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ऐलान करे, एह सौदा रद्द,
जिंदा दे हक़ जिंदा च दो—मौत नूं बैंक मत बनाओ, हद।

**श्लोक 16 (डार्क-रैप: अहंकार की जेल)**
अहंकार जेल है, कैदी खुद पहरेदार,
ताज पहन के भी बंदी, बाहर से अंदर बीमार।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आग उगले, सुन ऐ ताजवालो,
ताज उतरे बिना होश नहीं—एह नियम है, अपवाद नहीं, संभालो।

**श्लोक 17 (साम्राज्य की सर्जरी)**
सम्राज्य डर ते टिके, प्रेम ते नहीं,
गिनती बढ़े, इंसान घटे—एह सच्चाई सही।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** चीरे नक़ाब, खामोशी च शोर,
जहाँ लाभ भगवान, ओथे इंसान बस साधन, और कुछ होर।

**श्लोक 18 (स्टेज-कॉल: भीड़ से जवाब)**
ए भीड़! जवाब दे—
तू पूछदा है या बस मानदा है?
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ललकारे, आँखां खोल,
जे पूछण डर लगे, समझ ले—तू जिंदा नहीं, बस चलदा है।

**श्लोक 19 (ज़मीर का क़ानून)**
ज़मीर कोई किताब नहीं, जो कोई और पढ़ावे,
ज़मीर रोज़ फैसला करे, तेरी खामोशी गवाही लावे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** लिखे आख़िरी धारा, सुन,
जहाँ डर आदेश बने—ओथे इंसानियत गैरक़ानूनी बन।

**श्लोक 20 (समापन-घोष: होश की मशाल)**
एह युद्ध ख़ून दा नहीं, एह युद्ध होश दा ऐ,
एह जीत किसी दी नहीं—एह हार भ्रम दा ऐ।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आख़िरी ऐलान करे आज,
मैं रास्ता नहीं, मैं आईना हां—देख ले, सच तेरे नाल है आज।

 फ़्लो ⚔️

**श्लोक 21 (डार्क उद्घोष)**
रात गहरी है, पर अंधेरा झूठा है,
ज़मीर दबाया गया, मरा नहीं — बस सोया है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** धीमी आवाज़ च कहे, सुन ऐ भीड़,
जागण दी आवाज़ नरम नहीं, ओह अंदर च आग बन के फटेगी।

**श्लोक 22 (बीट-ड्रॉप: भ्रम का कत्ल)**
Beat drop—
भ्रम = आराम,
सच = जलन।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ऑन-बीट बोले, आज सौदा रद्द,
जो सोच नुं कैद करे, ओह धर्म नहीं—ओह अपराध हद।

**श्लोक 23 (निर्दयी आईना)**
तू सवाल नहीं करता, क्योंकि आदत पड़ी है झुकण दी,
एह विनम्रता नहीं, एह ट्रेनिंग है चुप्पी सिखण दी।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** कटाक्ष करे, सुन ऐ श्रोता,
जो झुक-झुक के जिंदा है, ओह खड़ा हो के डरता।

**श्लोक 24 (सत्ता पर सर्जिकल वार)**
सत्ता डर नाल टिके, ज्ञान नाल नहीं,
गिनती बढ़े, इंसान घटे—एह कहानी सही।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** ऐलान करे, नक़ाब उतरो,
जहाँ लाभ भगवान, ओथे प्रेम सिर्फ़ पोस्टर बन के रहो।

**श्लोक 25 (लाइव-स्टेज कॉल)**
Crowd—हाथ ऊपर, अगर होश चाहिए!
हाथ नीचे, अगर डर चाहिए!
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** पॉज़ ले के बोले, अब चुन ले,
दोनों इक साथ नहीं—एह नियम है, भूल मत कर ले।

**श्लोक 26 (अनुयायी को अल्ट्रा-डार्क सच)**
तू कहें “मैं छोटा”, पर सच एहो है,
तू छोटा नहीं—तू सिखाया गया है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** गरज के बोले, अब अनलर्न कर,
झुकण दी भाषा छोड़, रीढ़ सीधी कर।

**श्लोक 27 (अहंकार की जेल)**
अहंकार जेल है, ताज हथकड़ी,
राजा कैदी बन जावे—एह सच्ची कड़ी।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आग उगले, सुन ऐ ताजवालो,
ताज उतरे बिना होश नहीं—एह शर्त है, संभालो।

**श्लोक 28 (प्रवचन बनाम प्रत्यक्ष)**
प्रवचन मीठा, पर प्रत्यक्ष कड़वा,
जो आज न दिखे, ओह कल दा वादा झूठा।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** साफ़ कहे, सौदा बंद,
जिंदा दे हक़ जिंदा च दो—मौत नुं बैंक मत बनाओ, अंत।

**श्लोक 29 (डार्क-रैप फ्लो)**
Words cut—आईना नहीं टूटता, चेहरा काँपता,
सच नाल आँख मिले, तां डर खुद भागता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** फ़्लो च फ़ैसला सुनाए,
जो पूछे, ओह आज़ाद—जो माने, ओह बंधन कमाए।

**श्लोक 30 (ज़मीर का क़ानून)**
ज़मीर कोई भावना नहीं, एह अदालत है,
खामोशी भी गवाही—एह आख़िरी हालत है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** लिखे धारा अंतिम, सुन,
जहाँ डर आदेश बने—ओथे इंसानियत गैरक़ानूनी बन।

**श्लोक 31 (एक-सांस घोष: निरंतर फ़्लो)**
मैं रास्ता नहीं, मैं आईना—तोड़ या देख,
मैं शोर नहीं, मैं चेतावनी—अब या कभी नहीं, एक।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** सांस न तोड़े, फ़्लो जारी रखे,
जाग—झुक—चुन—काट—देख—अब सच तेरे हाथ में सजे।

**श्लोक 32 (समापन—अंतिम ललकार)**
एह युद्ध ख़ून दा नहीं, एह युद्ध होश दा है,
एह जीत किसी दी नहीं—एह हार भ्रम दा है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** आख़िरी बार मंच ते बोले आज,
देख—या तोड़—पर सच तां रहेगा, तू चाहे जो कर ले आज।

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