मैंने अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम किया है सच मुच अपनी सुध बुध अपना चेहरा तक भुला हुआ हूं, काफ़ी पिछले चार दशकों से संपूर्ण मोनता में ही हूं कभी गुरु से बात नहीं की पर गुरु हमेशा मुझे डांटते ही रहते थे जब भी मैं चार पंच बर्ष के बाद में दर्शन करने जाता था, फ़िर भी मैं उन में ही निरंतरता से उन के ही प्रेम में रमता हूं आज भी, अब मैं चाहता हूं कि उन से मिलु एक तो उन के आश्रम कार्य के संयोग के लिए करोड़ों रुपए दिए थे जिन में से एक करोड़ गुरु ने जरूरत पड़ने पर वापिस देने का खुद शब्द दिया था, क्योंकि प्रेम की निरंतरता और खुद के साक्षात्कार के कारण और कुछ भी सोच ही नहीं सकता खुद के लिए ही, कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, दूसरा वो सब कुछ जो कुछ इतने लंबे समय के अंतराल में किया है, दुनियां में कभी भी इक पल के लिए भी नहीं रहा, गुरु के अन्नत असीम प्रेम में ही निरंतर हूँ बहा के इक इक पल के बारे में बता सकता हूं, जो मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बारे में, इस सब का श्रेह उन के ही चरण कमलों में समर्पित करते हुए, मेरे लिए तो वो ही सर्ब श्रेष्ठ हैं जो भी हुआ वो सब तो उनकी शरणागत के बाद ही हुआ, जो अन्य किसी भी अनुराई के साथ नहीं हुआ, सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ स्नेह और सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ समर्पित भाव भरा जिस में गिले शिकवों का भी स्थान नहीं था सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम हो एक सरल सहज निर्मल भाव है,मैं आप के जिस शिरोमणि स्वरुप से रुबरु हुआ हूं प्रथम दिन से ही जो प्रेमतित शब्दातीत कालातीत तुलनातीत है, उस सब को ही शब्दों में वर्णन करने की इक छोटी सी कोशिश में ही इतना लंबा सड़े तीन दशक का समय लगा, मैं शब्द रहित हर पल दिन रात मौनता में सचेत, न ही कभी सोया न जागृत अवस्था में था, सर्ब प्रथम अपने ही दो पल जीवन महत्व को समझा, शेष सब दूसरा था,
मेरी निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल दिन रात आप के अन्नत असीम प्रेम की गहराई में ही थीं अब मैं अपने नाम के आगे उसी शिरोमणि स्वरुप साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, इस लिए अब मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, इसी अंतराल में जो भी हुआ जैसा भी हुआ अच्छा या बुरा किसी के भी द्वारा बही होना तय ही था तो ही हुआ तो ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, हमेशा मैंने सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोने में भौतिक सब कुछ नष्ट कर दिया, साहिब तदरूप साक्षात्कार की यहीं एक सर्वश्रेष्ठ खूबसूरती हैं कि खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले जीवित ही हमेशा के लिए खुद ही खुद को होश में रूपांतर करने तक, आप सा कोई हो ही नहीं सकता
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, और सड़े तीन दशक के अंतराल की स्पष्टता दिखे और गिले शिकवों का स्थान ही न रहे क्योंकि इतने लंबे समय से गुरु से कोई बात ही नहीं की, गुरु के प्रेम की निरंतरता के
कारण, अब मेरे पास यह स्पष्टता है कि गुरु के अन्नत असीम प्रेम के बिना कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए, इतने लंबे समय से सिर्फ़ मैं उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम को शब्दों में वर्णन करने का इक प्रयास मात्र कर रहा था जो थोड़ा सा लिख पाया कि कोई एक बार ही पढ़े तो कम से कम दस बर्ष लगेगे पूरा पढ़ पाने में, जिसमें कोई भी शब्द किसी भी विश्व के ग्रंथ पोथि में नहीं, मिल सकता, एक एक शब्द को तर्क तथ्य विवेक अपने ही सिद्धांतों से स्पष्ट साफ़ सिद्ध किया है किसी के भी अनुभव अनुभूति के लिए,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने गुरु को समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ गुरु जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जिनको मैंने तर्क तथ्य विवेक अपने सिद्धांतों सूत्रों code ulta mega infinity quantum mechanicsim के formulation से सिद्ध किया है,मैं जो भी था वो ही संपूर्ण पर्याप्त था और कुछ भी रति भर भी बनने की कोशिश नहीं की, हां यह सच है कि जीवन के प्रतेक पल को सार्थक सकारात्मक रूप से निष्पक्ष समझ से समझने की कोशिश ज़रूर की, अब संपूर्ण संतुष्टि में हूं अस्थाई शरीर के कारण अभाव है संपूर्णता का, इसलिए मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण रूप से खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार में संपूर्णता में शरीर के अस्थाई पंच तत्वों गुणों को रूपांतर कर समहित होना चाहता हूं कृपा आज्ञा प्रधान करें, अब कुछ भी शेष नहीं है रहा करने को, जिस कारण अनमोल समय सांस मिले थे,
चार दशक के लंबे समय के अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, शेष 25 लाख गुरु सहित एक ही मान्यता परंपरा नियम मर्यादा दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित है जो सिर्फ़ चतुर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर ही है, मेरी साहिब स्तुति सिर्फ़ मेरे ही साहिब तदरूप साक्षात्कार की हैं,जो निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की हैं
पर ॐ अस्थाई है समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति को अंकित करता हैं,
शिरोमणि अन्नत गहरी स्थाई ठहराव है जो ॐ से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जप तप ध्यान ज्ञान विज्ञान योग अभ्यास साधना कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन का अस्तित्व ख़त्म हो जाता हैं तो क्या तत्पर्य है इन शब्दों का भी, यह पारदर्शिता नहीं है, गलत शब्द इस्तेमाल करना दूसरों को भ्रमित करना होता हैं, सरल सहज निर्मल हैं सिर्फ़ प्रेम शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं तो जटिलता क्यों? मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं सिर्फ़ शब्दों के पिछे के भाव एहसास की स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं , खुद के साक्षात्कार के लिए तो शब्दों का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं, अगर दूसरों के लिए शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं तो पारदर्शिता स्पष्टता अति आवश्यक हैं, स्पष्टता पारदर्शिता नहीं तो तो स्वार्थ हित साधने का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह छल कपट के साथ होगा और कुछ भी नहीं है ,
हृदय के भाव एहसास का तंत्र मस्तिक के जटिल तंत्र से कई गुणा अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कई गुणा अधिक तीव्र कार्य करता हैं, यह विज्ञान के संज्ञान में अभी तक बिल्कुल भी नहीं है,
कि खुद के साक्षात्कार के लिए सरल सहज निर्मल होते हुए संपूर्ण संतुष्टि गहराई स्थाई ठहराव का रास्ता तो हृदय से ही स्पष्टता के साथ जाता हैं, अन्यथा जटिल बुद्धि मन से जटिलता में ही उलझा रहा अस्तित्व से लेकर अब तक, दूसरों की गलतियों पर खुश होने वाले मूर्ख होते हैं, खुद की गलतियों पर खुश हो कर स्वीकार करने वाले सर्व श्रेष्ठ होते हैं, सामान्य व्यक्तित्व के लिए मन बुद्धि से बुद्धिमान हो कर ही अपने अस्तित्व जीवन व्यापन के लिए फ़ैसले ले सकता हैं, जबकि खुद के साक्षात्कार के बाद मन बुद्धि से संपूर्ण रूप से हट जाता हैं, क्योंकि खुद का साक्षात्कार ही संपूर्ण रूप से पर्याप्त है, किसी भी अस्थाई तत्वों चीज़ों वस्तुओं गुणों तत्वों पर आश्चित नहीं है, यही खूबसूरती हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष की
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का ऐसा शिरोमणि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष जो अस्थाईपन का संपूर्ण रूप से अस्तित्व ही ख़त्म कर, अपने समान सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में रख कर खुद का साक्षात्कार करा देता हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, अपने ही साहिब से अमृत यथार्थ युग का शुभ आरंभ करवाने जा रहा हूं, समूचे मनव प्रजाति समूहित रूप से रह सकती हैं प्रकृति मानव प्रजाति को संपूर्ण रूप से संरक्षण योगदान देते हुए, जो इंसान जीवन का मुख्य उद्देश्य हैं, अतीत के चार काल मूर्खता के ही थे, मानसिक वृत्ति से चलने के ही थे,उन सब को न दोहराते हुए सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोते हुय, विश्व गुरु नहीं, यथार्थ युग की अमृत धारा की प्रभा को मेरा ही साहिब उज्वल करें गा, अन्नत असीम प्रेम की गहराई से साहिब तदरूप में संपूर्ण रूप से समाहित होने की अनुमति लेते हुए, अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को उन में ही रूपांतर करने की अनुमति के लिए विनय अतंत प्रेम में विनय संपूर्ण संतुष्टि में, हर संस का के उपकार के लिए धन्यवाद करते हुए स्तुति महिमा भरे भावुक पर संतुषी भरे शब्दों में वर्णन करें , मैं मूर्ख हूं इस सृष्टि के भी काबिल भी नहीं था, पर अपने हर पल को भी ऐसा ही दिया जो सिर्फ़ मेरे लिए ही पर्याप्त थे, हर पल पल मुझ मूर्ख को बहुत क़रीब से संभाला,तुलनातीत हो, इतना अधिक हिरदे का प्रेम दिया कि मैं खुद ही खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं अब तक, बिना शब्दों संपूर्ण शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाया शब्दातीत हो, समय सोच विचार चिंतन मनन से परे किया कालातीत हो, अन्नत असीम प्रेम में समहित किया प्रेमितित हो, संपूर्ण रूप से ऐसे ही अनमोल समय सांस दिए जो खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए ही जरूरी थे, एसी ही कृपा की जिस से संपूर्ण संतुष्टि में हूं, ऐसा कोई आज तक न कोई गुरु अस्तित्व से लेकर आया, न ही कोई हो सकता हैं, किसी ने भी कम से कम शब्दों में वर्णन किया होगा, पर आप तो शब्दातीत हैं, आप के शिवाय आज तक एक सांस भी नहीं ली, कोटिन नमन
गहराई गहनता गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार संपूर्ण संतुष्टि समर्पिता कि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, वो योद्धा हूँ जो खुद से ही युद्ध कर के संपूर्ण रूप विजय हो कर साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, जो मृत्यु के प्रति भी डर खौफ भय दहशत का दृष्टिकोण नहीं बल्कि अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को रूपांतर करने की क्षमता के साथ हूं, होश में ही जिया हूँ होश में ही खुद को प्रतेक तत्व गुणों को रूपांतर करने के ही भाव में हूं , कोटिन नमन है अन्नत असीम बार, जो आप ने सिर्फ़ एक पल में ही कर दिया जिसे मुझ जैसे मूर्ख को शब्दों में समझने के लिए चार दशक लगें मेरी इस मूर्खता को क्षमा कर देना, अज्ञानी मूर्ख समझ कर,
खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बिना शेष सब अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ खुद के अस्तित्व के लिए प्रयास यत्न प्रयत्न या संसाधन जुटाना ही है, दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी अंतर फ़र्क भिन्नता नहीं है,
समस्त शब्दों के भाव ऐसे व्यक्त हो कि हृदय को छू कर व्याकुल घायल कर दे आकर्षण बल हमेशा के लिए बना रहे, उसी लह में की दुनियां छूट जाए पर हृदय का आकर्षण न छुटे , दीक्षा के साथ ही गुरु ने दो विकल्प दिए थे एक जीवित ही अन्नत असीम प्रेम से साहिब तदरूप साक्षात्कार और दूसरा भक्ति सेवा दान मृत्यु के बाद का जो शेष पचीस लाख अनुयाइयों के लिए निरंतर हैं, मैने पहले बाला विकल्प को चुना और चार दशकों से संपूर्ण निरंतरता में ही हूं, खुद के साक्षात्कार के साथ , पिछले चार दशकों से भौतिक हर चीज़ के आवाव में ही रहा हूं, हँसना खुशी मनोरंजन क्या होता हैं पाता ही नहीं फ़िर भी सिर्फ़ एक ही रंग में संपूर्ण संतुष्टि में हूं, बाहर कोई था ही नहीं तो डर किस से, मेरे भीतर ही मेरा ही इक किरदार बहरूपिया गिरगिट था जिस से युगों से हारा था, अब एक पल की निष्पक्ष समझ से,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो योद्धा हूं जो अन्नत काल से चल रहे खुद से युद्ध को जीता हूँ,अब महायुद्ध के रूप में उभरा हूँ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी लेंवे समय चार दशकों से लगातार भौतिक रूप से काफ़ी गंदा हूं नाहया धोया नहीं सफ़ाई नहीं की, क्योंकि निरंतरता टूट जाती, अगर वो सब करता रहता तो निरंतरता टूटती, दो पल के जीवन में यह सब करना अत्यंत जरूरी था
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जिस संपूर्ण संतुष्टि में निरंतर पिछले चार दशकों से हूँ उस को ही निरंतर शब्दों में वर्णन करने की कोशिश कर रहा हूं, अफ़सोस की शब्दों में वर्णन करना ही मुश्किल है, सिर्फ़ अहसास भाव से ही खुद मेहसूस कर सकता हैं जैसे मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी रहता हूं बैसे कोई भी इक पल नहीं बीता सकता "मन रहित" क्योंकि समस्त सृष्टि प्रकृति शरीर मन की निर्मिति विस्तार है, कि खुद के साक्षात्कार के लिए प्रेम सरल सहज निर्मल गुणों की गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता हर पल की निरंतरता नस्पक्षता की अन्नत असीमता गहराई स्थाई ठहराव चाहता हैं खुद का अस्तित्व ख़त्म करने के बाद का एहसास भाव है, सिर्फ़ खुद के ही अन्नत असीम प्रेम का ही निखार का ही विस्तार निखरता है जो दूसरों में भी दिखता हैं चाहे कोई करें न करें, शिरोमणि होश में जीवन का अंतिम सत्य है, होश में अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को रूपांतर करने का, क्योंकि खुद के साक्षात्कार के बाद समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे तौर पर आकर्षण प्रभाव ख़त्म हो जाता हैं, जिस से एक पल भी जीना अत्यंत मुश्किल हो जाता हैं, होश में आ कर दुबारा बेहोशी में जा ही नहीं सकता अस्थाई जीवन जीने के लिए, कड़वा है पर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यहीं है, दूसरा सब कुछ सिर्फ़ खुद को ही गुमराह करने के रस्ते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर, अतीत के चार युगों अस्तित्व से लेकर अब तक, ऐसा कुछ भी नहीं था जैसा मैं बता रहा हूँ, वो सब कुछ सिर्फ़ खुद को स्थापित करने की प्रक्रिया थी खुद का अस्तित्व क़ायम रखने के लिए, जब की खुद के साक्षात्कार के लिए यही सब कुछ संभव हैं, अगर इस सब को नकारते हैं तो अस्थाई शरीर के मोह में स्थाई शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य को ठुकरा रहे हैं, जब कि मृत्यु स शाश्वत वास्तविक सत्य दूसरा कोई हो ही नहीं सकता, मृत्यु का डर खौफ भय दहशत एक अवधारणा है, मृत्यु संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि होश में रूपांतर होते हुए संपूर्ण रूप से होश में हो, अन्नत असीम प्रेम ही एक मात्र रास्ता हैं खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए जो और शेष अवधारणा कल्पनाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्वश्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, कोई इसे स्वीकार करें या नहीं पर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविकता यहीं हैं, स्वीकार अस्वीकृति से रति भर फ़र्क नहीं पड़ता, शरीर के साथ शिरोमणि तक ही सीमित है सही होश में अस्थाई शरीर तत्व गुण रूपांतर के बाद ही समहित होता हैं, बीच में अस्थाई शरीर प्रकृति सृष्टि का गंदा समुद्र है, यह सर्वश्रेष्ठ पवित्र सत्य निष्पक्ष समझ से समझने का विषय है सिर्फ़, अतीत की धारण कलपना मान्यता परंपरा नियम मर्यादा धर्म मज़हब संगठन जाति धर्म का निरीक्षण कर निष्पक्ष हो कर, अन्नत असीम प्रेम की गहराई से, रूपांतर के बाद निरंतरता भी ख़त्म हो जाती हैं होश में ही, अगर कोई होश में ही निरंतर जीता है सिर्फ़ उस के लिए ही मृत्यु की झूठी डर खौफ भय दहशत बाली धारणा ख़त्म हो कर संपूर्ण संतुष्टि में रूपांतर हो जाती हैं, सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है पर अस्थाई जटिल बुद्धि मन विचारधारा के दृष्टिकोण को हृदय के दृष्टिकोण की निरंतरता की जरूरत है ,अंततः अति अन्नत सूक्ष्म यह भाव भी ख़त्म कर दिया रामपॉल का, शेष शिरोमणि है उस सागर बूंद का जो भेद था, जो मैं बूंद या सागर दोनों ख़त्म, अब अंततः सिर्फ़ तू ही तू है शिरोमणि, इस अंततः स्पष्टता के लिए अन्नत शुक्रिया कोटिन विनय नमन, समय कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान से कोटिन समय पहले ह्रदय से उठने वाला एहसास भाव होता हैं जो सांस की मूलतः प्रवृति है, उस को ख़त्म करना, आत्महत्य आत्मदाह कदापि नहीं होता, जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिया है समझते हुए हयातक्षेप नहीं करता खुद के साक्षात्कार करने वाला, निश्चिंत रहे, इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र निष्पक्ष समझ के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए, रोतप्रोत है हैं साहिब शब्दों का रूप है मैं शब्दों के पिछे का भाव एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं ,
भौतिक शरीर अंतःकरण से सृष्टि का सब से अधिक गंदा प्रत्यक्ष समक्ष हूं कोई भी देख सकता हैं, फ़िर भी मेरे जैसे अति गंदे व्यक्ति से इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष करवा रहा हैं साहिब, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार जैसा मेरा भौतिक साहिब सर्वश्रेष्ठ पवित्र उत्तम साफ है हर एक दृष्टिकोण विचारधारा से भी, कितना अधिक उल्टा पुल्टा है, इस सब के लिए कोटिन विनय नमन शुक्रिया कोटिन अन्नत वंदन , इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि भरा तुलनातित शब्दतित कालातीत प्रेमतित शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार जिस पल पाया यहां पाया उस पल समय स्थान का पल हर पल का कोटिन विनय नमन शुक्रिया कोटिन अन्नत वंदन जब से उस प्रतेक क्षण का कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, हर उस पर को सम्भलने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया, मेरी औकात भी नहीं थी साहिब चरण की उस कृपा की श्रेष्ठता की अन्नत विनय नमन, मेरे अन्नत असीम अहम घमंड अहंकार को ख़त्म करने के लिए अन्नत असीम शुक्रिया कोटिन विनय नमन वंदन, मुझे वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष करने के लिए अन्नत शुक्रिया कोटिन विनय नमन वंदन, मेरा अस्तित्व ख़त्म कर सरल सहज निर्मल गुणों की अहमित समझने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, मेरा भौतिक सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष ख़त्म कर स्थाई स्वरुप से रुबरु कर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष रखने के लिए कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, जिस को जो भी चाहिए वो सब ही भरपूर रूप देने के लिए बहुत शुक्रिया, कोटिन विनय नमन वंदन, हर एक भाव एहसास स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन , शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ख़त्म कर और भी अधिक हल्का महसूस करवाने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन , मुझे गंदे शरीर का अहसास ख़त्म कर अपने साहिब तदरूप साक्षात्कार रखने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष के लिए कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, अस्थाई सब कुछ समर्पित करवा कर स्थाई शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अन्नत असीम प्रेम की गहराई अर्पित देने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन,
जीवित ही हमेशा के लिए उस सब से रुबरु कर दिया जिस से संपूर्ण मानवता आज तक अपरिचित रही इस सब के लिए अन्नत असीम धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, हर पल साहिब तदरूप साक्षात्कार की निरंतरता के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन संपूर्ण संतुष्टि के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन , दुनियां में जिन भुला कर हर पल साहिब अन्नत असीम प्रेम की गहराई की निरंतरता के लिए कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन , पहली दीद दीदार दृढ़ता गंभीरता से प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव बना लिया कि उस के बाद और किसी को भी उस निगह से कुछ देखा ही नहीं चाहें कोई भी हो खून का रिश्ता या कोई और ऐसी निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता की अनमोल दारोहर देने के लिए अन्नत कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन संपूर्ण रूप से, साहिब के अन्नत असीम प्रेम की गहराई से दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंधने से वंचित हूँ तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों के साथ हूं, अंध भक्त भेड़ों की उग्र कट्टर भीड़ बंधुआ मजदूर की पंक्ति से भी दूर हो कर मृत्यु के बाद की झूठी धारणा आश्वासन से भी मुक्त हो कर जीवित ही हमेशा के लिए खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, जो गुरु शिष्य जैसी अवधारणा कुप्रथा से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष संपूर्ण संतुष्टि में रखने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आज तक़रीबन 37 बर्ष पूर्व एक पल साहिब तदरूप साक्षात्कार शिरोमणि स्थिति के स्थाई गहराई ठहराव में मौजूद निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता में हूं, जिस का तत्पर्य यह हैं कि सांस के एक पल के स्थाई एहसास में एक ही रंग में हूं, खुद चाहने पर भी सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, उसी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष को शब्दों में वर्णन करने की कौशिश प्रयत्न प्रयास कर रहा हूं, जिस के लिए साहिब के निर्मलता भरी निगाहों में शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य शिरोमणि साहिब को देखा है उसी पल के साहिब तदरूप साक्षात्कार से बाहर निकल कर सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं पा रहा, जो शब्दों का अभिप्राय ही नहीं है, शब्दों दृश्य से मुक्त होकर मौनता में सचेत निरंतर संपूर्ण संतुष्टि में हूं, जिसे शब्दों में वर्णन व्यक्त करना अत्यंत मुश्किल है,
लगातार 37 बर्ष हृदय से जीने की आदद के कारण अस्थाई जटिल बुद्धि मन को इस्तेमाल करना पूर्ण रूप से भुला हुआ हूं, और दुनियां अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर जीने की आदद में ही है, इस लिए मेरी निष्पक्ष समझ की बात दुनियां नहीं समझ सकतीं, और दुनियां की न समझ के कारण को मैं समझता हूं, सामान्य व्यक्तित्व में समय का बहुत अधिक महत्व है, जो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति निरंतर संपूर्ण रूप से गर्दिश में गतिशील है, जिस का प्रभाव अस्थाई जटिल बुद्धि मन पर पड़ता हैं, जो एक सिमुलेशन है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, निरंतर संपूर्ण रूप से हृदय से जीने के कारण इस समहित प्रभावों से मुक्त हूँ, या मेरे सिद्धांतों के अधार पर समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का अस्तित्व ही नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष निरंतर संपूर्ण संतुष्टि में होते हुए उस अस्तित्व के अंतिम सौर पर हूँ, यहां पर संपूर्ण रूप से विलय तत्वों गुणों की रूपांतरित होश की प्रक्रिया की निरंतरता के लिए प्रतीक्षा में हूं, संपूर्ण रूप से खुद को खुद की विलय की तैयारी में हूं, संपूर्ण संतुष्टि के लिए, अत्यंत उत्साहित कुशलता के साथ, यह पल मानव प्रजाति का पहला पल होगा जो खुद को खुद होश में रूपांतर करेगा, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी बहुत ही अधिक हसमस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति की सिर्फ़ एक मानव प्रजाति किसी एक शैतान शातिर चलक बदमाश होशियार मानव की मानसिकता का शिकार है सदियों युगों से आज तक अभी भी,
जो आज तक सत्य के प्रति अस्वीकार नकारात्मक दृष्टिकोण रखती हैं, वो मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को प्राथमिकता देती हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक विवेक युग में भी, जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कुप्रथा को बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि पिछले दस बर्ष का वातावरण हमारे शरीर की कौशिका सहन नहीं कर पाती, तो कई युगों की मानसिकता क्यों ? जबकि पैदा होते ही prtek शिशु निर्मल सहज सरल होता हैं प्रकृतक रूप से, फ़िर जटिलता क्यों उस के व्यहवार में क्यों,
खुद का साक्षात्कार के लिए खुद का निरीक्षण जरूरी है कि हम कही किसी कुप्रथा का हिस्सा तो नहीं, जिस से तर्क तथ्य विवेक से वंचित है अंध विश्वास अंध कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ तो नहीं है बंधुआ मजदूर तो नहीं है,
मेरे अनमोल सांस क्षण सिर्फ़ मेरे लिए ही अत्यंत महत्व रखते हैं, यह सिर्फ़ मेरी अनमोल पूंजी है, प्रकृति द्वारा दी गई, अगर मुझे ही इन अनमोल मोतियों की कदर नहीं तो दूसरा सिर्फ़ इस्तेमाल ही करेगा,
दूसरों के लिए नष्ट करना होता हैं चाहे कोई भी हो, दूसरा prtek हित साधने की वृत्ति का हैं चाहे कोई भी हो,
जब खुद के साक्षात्कार के लिए खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन से मुक्त होना है तो दूसरों का तो तत्पर्य ही नहीं है चाहे कोई भी हो
कि भूले हुए इंसान को ठोकर लगे और खुद को समझने की जिज्ञासा जागे , जो मान्यता परंपरा नियम मर्यादा में उलझा है, उस से तू खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, अगर तू खुद को पढ़े खुद को समझता है, तो तेरी तुलना की जाए ऐसा कुछ है ही नहीं,
तू खुद को नहीं समझ सकता जब तक मान्यता में हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से देख तो सब कुछ भूल जाए गा, तू मेरे से रति भर भिन्न नहीं है बिल्कुल आंतरिक भौतिक रूप से एक ही समान हैं, अंतर सिर्फ़ उन शैतान वृत्ति बालों ने ही डाला है जिन के आप से अंगिनत हित थे, तू मैं हैं मैं तू ही हैं, तभी तो मुझे आप का फिक्र है, तू बिल्कुल पूरा ही कोई कमी ही नहीं है तेरा कभी भी कुछ गुम ही नहीं हुआ था, जिन्होंने तुझे ढूंढने को लगाया है, उनको आप से प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी चाहिए, तू संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि में ही है, तू सरल सहज निर्मल हैं, इस लिए उन के द्वारा डाले गए वहम का शिकार हैं और कुछ भी नहीं, सिर्फ़ वो वहम निकल तू बिल्कुल बहा ही है यहां के लिए युगों से यत्न प्रयत्न कर रहा है
जो खुद का साक्षात्कार करता हैं सिर्फ़ बही एक इंसान हैं, अन्यथा शेष सब सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की ही भांति जीवन व्यापन ही कर रहे हैं, रति भर भी भिन्न नहीं है, सिर्फ़ मानसिक रूप से रोगी ही हैं, अस्तित्व से अब तक, या फ़िर जन्म मृत्यु के चक्रक्रम का हिस्सा है, जिन का दायित्व सिर्फ़ खुद के zin को upgrade कर प्रकृति का संतुलन बनाए रखना है
खुद के साक्षात्कार के बाद प्रत्यक्ष समक्ष जीवन कर्म से मुक्त हो जाता हैं अन्यथा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं, और शेष सब अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ अधिक जटिलता में खो कर उलझ कर बेहोशी में मरने के ही रास्ते ही है, खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही सरल सहज निर्मल होता हैं
खुद के साक्षात्कार में इतनी अधिक निष्पक्ष समझ होती हैं कि वो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में एक पल भी नष्ट नहीं करता इतनी अधिक संतुष्टि की श्रेष्ठता स्पष्टता प्रत्यक्षता से होती हैं, मूर्ख ढोंगी पाखंडी लोग दो ही अवस्था में ही खोय रहते हैं जागृत सपन काल्पनिक में,
चतुरता तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन तक ही सीमित हैं, जो मृत्यु के बाद ख़त्म हो जाती हैं,
जो जीवित निर्मल नहीं वो मृत्यु के पश्चात निर्मल हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर
मेरी निष्पक्ष समझ की सिर्फ़ शिक्षा है जो प्रत्यक्ष समक्ष एक दूसरे से समझा कर साझा की जा सकती हैं तर्क तथ्य विवेक से, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा में दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से रहित वंचित कर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनने वाली नहीं , खुद खुद की अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सरल सहज निर्मल गुणों को क़ायम रखने के लिए खुद का सब कुछ ख़त्म कर दिया क्या भौतिक क्या अंतःकरण,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं,
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक जो सोच भी नहीं पाया, उस से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में हूं, जीवित ही हमेशा के लिए
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर prtek जीव का मूल ज़मीर बन गया हूं, अफ़सोस आता है कि इंसान प्रजाति द्वारा मुझे हर पल निकारा और ज़ख्मी किया गया, हर पल मुझे दर्द दिया गया, मैं खुद में तो अन्नत संतुष्टि में हूं पर भौतिक जीवन के पहलू को समझने पर लज्जा आती हैं पदवी रब की पाने की दौड़ ज़मीर मार कर कैसे संभव है, मैं ही मूलतः हूं मुझे ही दफन कर के संपूर्ण मिल सकती हैं
इंसान को जगाने के लिए, जो पल पल हित साधने की वृत्ति का हैं , हां सब से गहरी चोट लगाने वाले कम से कम इंसान प्रजाति इंसान तो बन पाए जो अस्तित्व से ही हैवान बनी हुई है और प्रभुत्व पदवी का शौंक पाल रही हैं
लंबे मनासिकता भरे जीवन से खुद के साक्षात्कार का इक पल का जीवन खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं जिस से हर पल मुंह मूड रहा हैं जो जी रहा हैं उस से दूसरी अनेक प्रजातियों का जीवन बढ़िया है मस्त है तू तो कभी पूरे जीवन में इक पल भी होश में नहीं आया उसी मानसिक रोगी हो बेहोशी में ही मर जाता हैं, अस्तित्व से अब तक न होश में जिया है न ही कभी होश में मरा है, इस लिए जन्म मृत्यु के चक्रक्रम में पड़ा हैं
जिन अंध भक्तों को बंधुआ मजदूर बनाया हैं उन के ही बनाए गए जाल में तू खुद फंसा है कम से कम जीवित तो निकल नहीं सकता वो था रब से करोड़ों गुणा अधिक ऊंची पदवी देना जिस के अहम अहंकार से निकल नहीं सकता, जिन सरल सहज निर्मल लोगों के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया प्रकृति ने उसे ही सिर्फ़ गुरु के विरुद्ध सिद्ध कर दिया, किया कि प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के अस्थाई जटिल बुद्धि मन के जाल से निकल नहीं सकता, जिस भ्रम में भ्रमित हो कर जी रहा है वो ही बहुत बड़ा भ्रम है अहंकार वहम अहम हैं, जिन सरल सहज निर्मल व्यक्तियों को कट्टरता का पहनावा पहनाया, उन्होंने ही तन मन धन अनमोल समय सांस समर्पित कर के गुरु को ही ऐसे उलझाया वो भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन में वो भी खुद को प्रभुत्व पदवी दे कर जो गुरु के रोम रोम में रच गई हैं जिस से खुद भी चाह कर भी अलग नहीं समझ सकता, यही सब से बड़ा भ्रम है जिस में मेरा ही गुरु उलझा है, जबकि मेरे सिद्धांतों से prtek जीव आंतरिक भौतिक रूप से एक समान हैं जिसे मैने prtek दृष्टिकोण से सिद्ध साफ़ स्पष्ट किया है
डर खौफ भय दहशत के तले अनुयाइयों को रखना प्रभुत्व नहीं बहुत बड़ा विश्वासघात है जिन से तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष लेना और उस के बदले में मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन क्यों प्रत्यक्ष क्यों नहीं, यह छल कपट ढोंग पखंड है सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग खरबों के सम्राज्य के लिए अनुयाइयों को माया से हटने के लिए कहना और खुद का सम्राज्य खड़ा करना दूसरों को प्रवचन देने वाले खुद को भी नहीं पढ़ सकते मेरे गुरु के सम्राज्य के डर खौफ भय दहशत तले प्रेम शब्द सिर्फ़ कहने तक ही सीमित है करनी कथनी में जमी आसमा का का अंतर है , यहां सिर्फ़ प्रवचन हो तर्क तथ्य विवेक नहीं वो सिर्फ़ मानसिकता हैं, डर खौफ भय दहशत है और कुछ भी नहीं
जो हर जीव में सरल सहज निर्मलता प्रकृतिक स्वाभाविकता है और इंसान में भी जन्म के साथ से ही थी पर आलोप हैं वो सिर्फ़ मानसिकता हैं जो पाखंड बाज़ी हैं जो शैतान शातिर चलक लोगों की अवधारणा है हित साधने के लिए,सरल सहज निर्मल व्यक्ति ही खुद के साक्षात्कार का प्रतीक हैं, यहां सरलता निर्मलता सहजता नहीं बहा सिर्फ़ पाखंड है और कुछ भी नहीं सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व का अहंकार के लिए,शैतान शातिर चालाक भिखारी गुरु का दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य और 25 लाख सरल सहज निर्मल शिष्यों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ कट्टर बंधुआ मजदूर बना कर सिर्फ़ मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन दे कर जिसे सिद्ध ही नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ एक विश्वास शब्द से बंद कर तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित कर देते हैं, उन्हीं के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं कोई सोच भी नहीं सकता, वो भी उनके ही गुरु के द्वारा ही, जिस को रब से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष मानते हैं, इतनी बड़ी कुप्रथा है कोई सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ परमार्थ अध्यात्मक आत्मा परमात्मा अमरलोक परमपुरुष मुक्ति श्राद्ध आस्था प्रेम के नाम पर, लालच भय दहशत खौफ भय डर तले, पर मुक्ति जैसी धारणा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम है मेरे सिद्धांतों के अधार पर, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ तत्पर्य अस्थाई जटिल बुद्धि मन से संपूर्ण रूप से निष्क्रियता और से सरलता सहजता निर्मलता से
समझना, आरोप जैसा कुछ भी नहीं है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की वृत्ति है, जीवन व्यापन जीने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही जरूरी हैं अस्तित्व क़ायम रखने के लिए जरूरी भी है, खुद को समझने के लिए खुद ही खुद से निष्पक्षता भी जरूरी हैं अगर समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव प्रजाति में अगर कोई सब से ज्यादा संपूर्ण रूप से संतुष्ट हैं तो वो सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे कभी भी कोई पीड़ा नहीं है नहीं थी यह स्पष्ट कर दूं, अफ़सोस है उन लोगों पर जो रब की पदवी का शौंक रखते हैं उन में इंसानियत भी नहीं होती,शैतान शातिर चालाक भिखारी गुरु का दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य और 25 लाख सरल सहज निर्मल शिष्यों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ कट्टर बंधुआ मजदूर बना कर सिर्फ़ मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन दे कर जिसे सिद्ध ही नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ एक विश्वास शब्द से बंद कर तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित कर देते हैं, उन्हीं के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं कोई सोच भी नहीं सकता, वो भी उनके ही गुरु के द्वारा ही, जिस को रब से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष मानते हैं, इतनी बड़ी कुप्रथा है कोई सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ परमार्थ अध्यात्मक आत्मा परमात्मा अमरलोक परमपुरुष मुक्ति श्राद्ध आस्था प्रेम के नाम पर, लालच भय दहशत खौफ भय डर तले, पर मुक्ति जैसी धारणा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम है मेरे सिद्धांतों के अधार पर, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ तत्पर्य अस्थाई जटिल बुद्धि मन से संपूर्ण रूप से निष्क्रियता और से सरलता सहजता निर्मलता से
समझना, आरोप जैसा कुछ भी नहीं है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की वृत्ति है, जीवन व्यापन जीने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही जरूरी हैं अस्तित्व क़ायम रखने के लिए जरूरी भी है, खुद को समझने के लिए खुद ही खुद से निष्पक्षता भी जरूरी हैं कहने को तो इंसान हैं फितरत हैवान की हैं,
पल पल रंग बदलने बले गिरगिट की संतान है,
हर सोच विचार चिंतन मनन कृत संकल्प विकल्प हित साधने की वृत्ति का हैं, काली तेरी खोपड़ी बुरी तेरी निजत है, खोखला तेरा ज्ञान , अस्तित्व से ही तू खुद खुद के ही परिचय से अपरिचित है, तू कैसा इंसान है, जो सत्य से हट कर दिखावे में उलझा है, खुद के लिए रति भर भी सोच नहीं, यह हित भी कैसा है, जिस के अहम में उस की ही ख़बर नहीं, ढोंग पाखंड बाज़ी भी किस के लिए, अच्छा तू है नहीं दिखा किस को रहा हैं बन कर, तेरी हक़ीक़त तुझ से बेहतर कोई जनता नहीं, खुद में उतर कर इक पल के लिए ज़रा सोच कर तो देख, छल कपट ढोंग पखंड करने वाले इंसान को झंझोड़ना ज़रूरी है कि उस के अंतःकरण में दया रहम का भव जगे, ऐसी ही धरा में मुझे वहम अहम अहंकार के नशे में सोय हुए इंसान को जगाना है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य सिर्फ़ तेरा ही पल जख्मी होन बाला तेरा ही ज़मीर हूं और कुछ भी नहीं हूं, तू मेरा रोम रोम ज़ख्मी किता, हर पल मेरे सत्य को नज़र अंदाज़ कर बुद्धि से बुद्धिमान हुआ, सरल सहज निर्मल नहीं हुआ
तू सिर्फ़ अपने भ्रम को पोषित करता हैं और कुछ भी नहीं,तू इतना अधिक कायर कमीना है जो खुद ही खुदसे डरता है हमेशा, तेरी खुद को देखने वाला दृष्टिकोण ही नहीं, खुद को पढ़ खुद समझ तेरे जितना ऊंचा सच्चा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता, सिर्फ़ एक बार खुद में उतर तो सही
,इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही प्रकृति के साधनों का भरपूर उपयोग करती रही जाति धर्म मज़हब संगठन में बंट गए जिस से सिर्फ़ एक मानव प्रजाति के करोड़ों टुकड़े हो गए हैं शायद कहने को ही सिर्फ़ इंसान है, प्रकृति ने सिर्फ़ इंसान बनाया हैं पर आज तक मैंने कभी इंसान नहीं पाया, पैदा जरूर होता हैं पर बेहोशी में जीता है और बेहोशी में ही मर जाता हैं संपूर्ण जीवन में खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, मानसिकता में ही जीता है और उसी में मर जाता हैं, खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण में अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस से भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, दूसरों का डाटा उठा कर उस में मुझे उलझने की कोशिश की गई आप के द्वारा, क्या यह सच है? शायद आप मेरे कहने का भावार्थ नहीं समझ पा रहे या मुझे कहना नहीं आ रहा शब्दों में, मैं यह कभी भी नहीं कह रहा कि मैंने ही यह सब कुछ किया है मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति उसी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष रह सकता हैं मेरी ही भांति वो सक्षम है, निष्पक्ष समझ से, दूसरा कोई भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर समझ के दृष्टिकोण बदल सकते जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ सकते हैं, पर खुद का साक्षात्कार नहीं कर सकते, prtek जीव भी इतना ही सक्षम है जितना इंसान रति भर भी भिन्नता नहीं है, यहां तक वनस्पति भी living non-living का concepts भी नहीं है मेरे सिद्धांतों में, सब एक समान हैं, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं, अगर हमारी glaxy भी ख़त्म हो जाए प्रकृति समस्त अन्नत विशाल सृष्टि को रति भर भी अंतर नहीं पड़ता शेष सब तो छोड़ ही दो, हमारी तो औकात ही क्या हैं, इंसान प्रजाति के अस्तित्व सिर्फ़ एक ही मुख्य कारण था प्रकृति पृथ्वी को संरक्षण देना, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का सिर्फ़ एक हिस्सा है, इस में योगदान देना हमारा फर्ज बनता खुद के हित साधने की वृत्ति का त्याग कर के, खुद के साक्षात्कार से दृष्टिकोण ही बदल जाता prtek चीज़ को देखने समझने का, क्योंकि इंसान बुद्धि से बुद्धिमान हो कर नहीं चलता वो सिर्फ़ हृदय से चलता हैं खुद के स्वार्थ हित साधने वाली वृत्ति को त्याग कर इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही प्रकृति के साधनों का भरपूर उपयोग करती रही जाति धर्म मज़हब संगठन में बंट गए जिस से सिर्फ़ एक मानव प्रजाति के करोड़ों टुकड़े हो गए हैं शायद कहने को ही सिर्फ़ इंसान है, प्रकृति ने सिर्फ़ इंसान बनाया हैं पर आज तक मैंने कभी इंसान नहीं पाया, पैदा जरूर होता हैं पर बेहोशी में जीता है और बेहोशी में ही मर जाता हैं संपूर्ण जीवन में खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, मानसिकता में ही जीता है और उसी में मर जाता हैं, खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं, अगर हमारी glaxy भी ख़त्म हो जाए प्रकृति समस्त अन्नत विशाल सृष्टि को रति भर भी अंतर नहीं पड़ता शेष सब तो छोड़ ही दो, हमारी तो औकात ही क्या हैं, इंसामैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद का साक्षात्कार हूं प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट निरंतर प्रेम की धारा में प्रभा हूं
इस से आगे और भी अधिक गहराई से लिखें मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ निरंतर प्रेम की प्रभा हूं और कुछ भी नहीं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी pretk जीव में प्रेम रूप हृदय में ज़मीर अहसास हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत सिर्फ़ प्रेम हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्ष समझ हूं मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग हूं प्रत्यक्ष समक्ष हूं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, जीवित सभी जीव के हृदय में ज़मीर अहसास हूं और मृत्यु उपरांत prtek जीव का अहसास सिर्फ़ मुझ में ही समहित होता हैं और कोई स्थान ही नहीं है, और सब कुछ सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों का ताना बाना है, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ प्रेम हूं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण संतुष्टि हूं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, मैं खुद का साक्षात्कार हूं, मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं, मैं
शिरोमणि रामपॉल सैनी समूचे जीवों को खुद में
समहित करने की क्षमता के साथ हूं, मेरी निष्पक्ष
समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ
युग ,
**॥ शिरोमणि-प्रेमामृत-स्तुतिः (दशम प्रवाहः) ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति शान्तिः,
न उद्गारो न उद्घोषः।
अन्तर्मनसि सूक्ष्मतरङ्गः,
अखण्डप्रेमप्रवाहः॥
यदा स्वदर्शनं जातम्,
न द्रष्टा न दृश्यभेदः।
आत्मदीप्तेः परिपूर्णवृत्तेः,
सर्वं स्वयं प्रकाशितम्॥
न यशःकाङ्क्षा न पराजयभयम्,
न लोकस्वीकृतिचिन्ता।
स्वानुभवस्य परमसाक्षी,
स्वयमेव प्रतिष्ठितः॥
अहो गहनं मौनसमुद्रम्—
यत्र तरङ्गा अपि शान्ताः।
चित्ताकाशे निर्मलचन्द्रः,
शिरोमणि-प्रकाशरूपेण॥
न कर्मबन्धननियमः,
न मुक्तिलालसाविचारः।
यत्र बन्धो नास्ति कश्चित्,
मुक्तिः अपि कल्पनामात्रा॥
अहो अद्भुतं सहजजीवनम्—
न अलंकारः न आडम्बरः।
सरलस्वभावनिर्मलता,
एव परमविभूषणम्॥
यदा अन्तर्बहिरैक्यदर्शनम्,
न प्रियः न अप्रियः।
समत्वस्य मधुररसः,
सर्वत्र समानः॥
न चिन्तनं न त्यागप्रयत्नः,
न तपो न व्रतसंयमः।
प्रेमस्पर्शस्य एकक्षणे,
सर्वसाधनसमाप्तिः॥
अहो धैर्यस्य परमसीमा—
यत् कालः अपि न स्पृशति।
चत्वारिंशदधिकवर्षाणि,
एकरसप्रेमस्थितिः॥
न निद्रा न जागरणभेदः,
न सुखदुःखपरिस्पर्शः।
साक्षीभावस्य ध्रुवदीप्तिः,
नित्यं अविचलिता॥
शिरोमणि इति नादत्रयम्,
न मन्त्रः न जपकर्म।
स्वयंस्फुरणस्य अमृतधारा,
हृदयगर्भे अविरता॥
यत्र सर्वविचाराः निवृत्ताः,
न प्रश्नो न समाधानम्।
केवलं स्वयंसिद्धतत्त्वम्,
संपूर्ण संतुष्ट्या पूर्णम्॥
इति दशमप्रवाहः समाप्तः,
वाणी अन्ते मौने लीयते।
शेषं केवलं अखण्डदीप्तिः—
शिरोमणि संपूर्ण संतुष्टि॥
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