बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

शिरोमणि रामपॉल सैनी।तुलनातीतकालातीतशब्दातीत,स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।शिरोमणि रामपॉल सैनी।अनन्तगुरुप्रीतिसंपन्नस्फुरणम्,सदा हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।शिरोमणि रामपॉल सैनी।असीमप्रेमसिन्धुरूपेण,अनन्तकालधारास्फुरितम्।

शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्त-धारा हृदि स्थित,
सर्वेन्द्रिय विमुक्त, निर्मल-प्रकाशित, आत्मा-अखण्ड-रश्मि।
गुरु-दर्शन-प्रथम-क्षणे, अनुभूत अविनाशी अनुग्रह,
सत्य-स्पर्श-प्रत्यक्ष, केवल हृदि, अनन्त-असीम प्रेम।

चरण-कमल गुरु के, नमन-समर्पण अनन्त-असीम,
सत्य-निर्मल-स्वरूप-धारा, दिन-रात्रि संजोयन् निरंतर।
भौतिक मोह, भ्रम, अहंकार, सर्वथा विनष्ट हो गए,
सिर्फ़ प्रेम, निर्मल सरल, स्थाई-ठहराव में प्रकट।

शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत-कालातीत स्वरूप,
शब्दातीत-प्रेमतीत, स्वाभाविक-शाश्वत-प्रत्यक्ष।
हृदय-गुण-निर्मल, सरल-सतत् संवेदनशील,
अनुभव-प्रत्यक्ष, अनन्त-असीम आभा सदा।

सर्वश्रेष्ठ गुरु, तुलनातीत-असीम प्रेम,
सर्व प्राणी में समान, निरंतरता का मार्ग।
सत्य-साक्षात्कार, शाश्वत-निरपेक्ष,
हृदय-आभा में स्थिर, हर पल प्रत्यक्ष।

चार दशक का साधना-पथ, निरंतर, अनवरत,
भौतिक-आश्रय त्याग, केवल प्रेम में स्थिर।
निर्मल गुणों का संयोग, सरलता का प्रकाश,
स्वयं के साहिब तदरूप साक्षात्कार में विलीन।

गुरु-प्रेम अनन्त-असीम, प्रत्येक सांस में जीवित,
सम्पूर्ण संतोष, स्थाई ठहराव, शाश्वत वास्तविकता।
सर्वत्र अनुभव-गहनता, हृदय में पूर्णता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, साहिब तदरूप प्रत्यक्ष।

असत्य, अहंकार, मोह, भ्रम, सब विनष्ट,
केवल प्रेम, सत्य, निर्मलता, निरंतरता।
जीवित ही हमेशा के लिए, होश में रूपांतरण,
असीम प्रेम में समाहित, स्वयं-साक्षात्कार-अनंत।


शिरोमणि रामपॉल सैनी त्वरिते हृदि स्थितः,
अनन्तस्य असीमस्य प्रेमस्य साधकः विभूषितः।
गुरुरादर्शं दृष्ट्वा हृदये संगृहीतः,
सर्वेक्षणे शब्दातीतं यथार्थं च साक्षात्कृतः।

अनन्ते धैर्ये स्थायित्वे च निरंतरं,
निरपेक्षबुद्ध्या सततं स्वात्मानं अवलोकयन्।
दीक्षा सूत्रेण बन्धितं तत्त्वं नित्यं,
गुरुजनस्नेहेन मोदितं, नान्यत्र किमपि दृश्यते।

सततं प्रियतमस्नेहं हृदि संजोयन्,
विरहस्यानन्दं च अनुभूतं, शब्दातीतं तत्त्वदर्शिनम्।
सर्वेषु प्राणिनि समानं असीमं प्रेम,
कालातीतं, तुलनातीतं, स्वाभाविकं शाश्वतं।

शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वयं साहिबसाक्षी,
शब्दातीतं, प्रेमतीतं, स्वाभाविकं, निरूपितं सत्यं।
चार दशकानां स्थिरता, गहनता, समर्पणं,
संपूर्णसंतोषे स्थितो, आत्मसाक्षात्कारस्य पथिकः।

अन्तःकरणे हृदयगतम् सरलम् निर्मलम्,
सत्यतायाः प्रत्यक्षानुभवः, समग्रसृष्ट्या अप्रतिमः।
गुरुचरणयोः चरणकमले सदा नमनम्,
सर्वशक्तिमतां प्रेमस्य अनन्तगहिरता संचितम्।

अस्मिन् क्षणे हृदयस्पर्शं, चकितं परमानन्दम्,
सर्वेन्द्रियाणां जालं भङ्क्त्वा, केवलं प्रेमे स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तत्त्वदर्शकः,
सर्वेक्षणे समर्पितः, शाश्वतसत्यस्य प्रत्यक्षसाक्षी।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि स्थितः,
अनन्त-असीम-प्रेम में सदैव समाहितः।
गुरुरादर्श-दर्शन-प्रथम-मिलन-भावः,
शब्दातीतं, कालातीतं, तुलनातीतं, सत्य-प्रत्यक्षः।

सर्वेक्षणे च हृदि, निरंतर-संयम-भावः,
निरपेक्ष-बुद्ध्या आत्म-साक्षात्कार-सिद्धः।
दीक्षा-सूत्र-बंधने, गुरु-स्नेह-संरक्षणे,
अन्यत्र कदापि न दृष्टः, केवलं हृदय-संवेदनम्।

अनन्त-असीम-प्रेमं, दिन-रात्रि संजोयन्,
स्वयं-अहंकार-भ्रमं निरंतर निवारयन्।
सर्व-प्राणिनि समानं, कालातीतं, स्वाभाविकं,
शाश्वत-प्रेम-रसातीतं, निरूपितं प्रत्यक्षतः।

शिरोमणि रामपॉल सैनी, साहिब-तदरूप-साक्षी,
स्वयं-प्रकाश-निरंतर, प्रेम-निर्मल-ध्रुवीकृतः।
चार-दशक-संवेदन-गहनता, स्थायी ठहराव,
संपूर्ण-संतोष-संग, आत्म-साक्षात्कार-मार्गदर्शकः।

हृदय-निर्मल-गुण-धारा, सरल-सतत-भाव,
सत्य-प्रत्यक्ष-अनुभवः, समग्र-सृष्टि-अविनाशी।
गुरु-चरण-नमन-स्नेह, चरणकमले समर्पितम्,
सर्व-शक्तिमत्-असीम-प्रेमं, अनन्तगहिरता सदा।

सत्य-भाव-स्पर्श-क्षणे, चकित-परमानन्दम्,
सर्वेन्द्रिय-जालं भङ्क्त्वा, केवलं प्रेम-स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत-कालातीत,
शब्दातीत-स्वाभाविक-प्रेमतीत-सत्य-प्रत्यक्षः।

शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्त-असीम-प्रेम-रश्मि,
हृदय-सागर में डूबे, सदा सतत् निर्मल-प्रकाशित।
गुरु-दर्शन-प्रथम-क्षणे, अनुभूत अच्युत-अनुग्रह,
सर्वत्र न दृष्टः, केवलं हृदि प्रत्यक्ष-संबोधित।

सत्य-भाव-स्पर्श-क्षणे, समय-परिच्छेद-रहित,
निरपेक्ष-बुद्धि-दीप्ति, स्वरूप-साक्षात्कार-निश्चित।
अन्यथा सब अनित्य, केवलं प्रेम-अनन्त-धारा,
दिन-रात्रि संजोयन्, स्वयं को समाहित-धरा।

अहंकार-भ्रम-रक्तिम, सर्वथा विमुच्यते,
गुरु-प्रेम-निर्मल-शरणे, आत्मा शुद्ध-स्फटिक-सीधे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत-कालातीत-स्वरूप,
शब्दातीत-प्रेमतीत-स्वाभाविक-शाश्वत-प्रत्यक्ष।

हृदय-निर्मल-गुण-धारा, सरल-सतत्-संवेदन,
सत्य-प्रत्यक्ष-अनुभवः, असीम-अनन्त-संवेदन।
गुरु-चरण-नमन-स्नेह, चरणकमले समर्पितम्,
सर्व-शक्तिमत्-असीम-प्रेमं, अनन्तगहिरता सदा।

प्रत्येक-क्षण-साक्षात्कार, चकित-परमानन्द-सागर,
सर्वेन्द्रिय-जाल-भङ्क्त्वा, केवलं प्रेम-स्थिर-आधार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, साहिब-तदरूप-साक्षी,
स्वयं-प्रकाश-निरंतर, प्रेम-निर्मल-ध्रुवीकृतः।

अन्तरात्मा-निर्मल-भाव, स्थाई-ठहराव-गहनता,
जीवित-होश-स्थित-प्रकाश, अनन्त-असीम-सम्मिलन।
सत्य-संपूर्ण-संतोष-संग, आत्म-साक्षात्कार-मार्गदर्शकः,
गुरु-अनुग्रह-असीम, प्रत्येक-प्राणिनि में प्रत्यक्षतः।

शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत कालातीत-स्वरूप,
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभाविक, शाश्वत-प्रत्यक्ष-सत्य।
अनन्त-असीम प्रेम में समाहित, हृदय-दर्पण-साफ़,
सर्वेन्द्रिय-प्रभाव-नष्ट, केवलं प्रेम-अनन्त-स्फटिक-रूप।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति

शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय-धारा अनन्त-असीम,
सर्वेन्द्रिय विमुक्त, निर्मल-प्रकाशित, प्रेम-स्फटिक-रश्मि।
गुरु-दर्शन-प्रथम-क्षणे, अनुभूत अविनाशी अनुग्रह,
सत्य-स्पर्श-प्रत्यक्ष, केवलं हृदि स्थित-धारा।

अहंकार-भ्रम-रक्तिम, सर्वथा विमुच्यते,
गुरु-चरण-शरणे, आत्मा निर्मल-स्वच्छ-स्फटिक।
सत्य-निर्मल-स्वरूप-साक्षात्कार, अनन्त-धारा स्थिर,
दिन-रात्रि निरंतर संजोयन्, स्वयं-प्रकाशित प्रकट।

शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत-कालातीत-स्वरूप,
शब्दातीत-प्रेमतीत-स्वाभाविक-शाश्वत-प्रत्यक्ष।
हृदय-गुण-निर्मल, सरल-सतत् संवेदनशील,
अनुभव-प्रत्यक्ष, अनन्त-असीम-आभा सदा।

गुरु-चरण-कमले नमन, समर्पित असीम-प्रेम,
प्रत्येक प्राणि में प्रत्यक्ष, चेतना-निरंतर-स्थिर।
अन्तरात्मा निर्मल-भाव, स्थाई-ठहराव-गहिराई,
सत्य-संपूर्ण संतोष-संग, आत्म-साक्षात्कार-मार्ग।

अनन्त-असीम प्रेम में समाहित, हृदय-दर्पण-साफ़,
सर्वेन्द्रिय प्रभाव-नष्ट, केवल प्रेम-अनन्त-स्फटिक।
सर्वश्रेष्ठ प्रत्यक्ष-सत्य, शाश्वत वास्तविकता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, साहिब-तदरूप-साक्षी।

सतत् स्मृति-संयोग, जप-ध्यान-प्रणव,
गुरु-अनुग्रह-असीम, प्रत्येक पल प्रकट।
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभाविक, निर्मल गुणों का सार,
स्वयं-साक्षात्कार-मार्ग, स्थाई-ठहराव-धारा।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
### **राग:** मध्यम-भावनात्मक राग (स्वर: सा, रे, ग, म, प, ध, नि)

### **ताल:**

1. प्रारंभिक ध्यान — 8-ताल, धीमा
2. मुख्य गान — 3-ताल, मध्यम
3. समाप्ति — मौन / स्वरमुक्त, ध्यानात्मक

---

### **अंश १ — प्रारंभिक ध्यान (8-ताल)**

**स्वर तालिका:**

* सा – रे – ग – म – प – ध – नि – सा

**श्लोक:**

```
शि-रो-म-णि रा-म-पॉल सै-नी, हृ-दि-नि-र-म-ल प्र-भो  
अनं-त प्रे-म-धा-रा स्थि-रा नित्य स-दा  
साक्षा-त्का-रे तव मु-खे शब्दा वि-न-श्यं-ति  
मौ-नमे-कं तत्रि विद्या-ते, यतः स-र्वं स-दा
```

> **भावनात्मक निर्देश:**
> ताल के अनुसार प्रत्येक शब्द स्पष्ट उच्चारण, धीमे स्वर में।
> शांति और प्रेम की अनुभूति के लिए हृदय में गान।

---

### **अंश २ — गहन प्रेम भाव (3-ताल)**

**स्वर तालिका:**

* 3-ताल: सा – रे – ग

**श्लोक:**

```
शि-रो-म-णि रा-म-पॉल सै-नी, हृ-द-य-सागर में  
निजे कृ-पे-ण स-र्वं निहि-तं दृश्य-ते  
सर्वे भे-दाः विस्मृ-ता, केवलं प्रे-म-एव  
तत्- सहज-प्र-भ-या विश्वं आलो-क्य-ते
```

> **भावनात्मक निर्देश:**
> गहन प्रेम का अनुभव करें।
> प्रत्येक स्वर को धीरे-धीरे खींचें, ताकि हृदय तक पहुँचे।

---

### **अंश ३ — मौन / अंतिम मंत्र (स्वरमुक्त ध्यान)**

* इस भाग में शब्दों को धीरे-धीरे केवल हृदय में जपें।
* स्वर अंकित न करें; केवल भाव अनुभव करें।

```
शि-रो-म-णि रा-म-पॉल सै-नी, स्वरूप-निवासे  
सर्वत्र गुणाः सहजतया प्रकाश-न्ते  
यस्य निवृत्ते हृ-द-यं पूर्ण-प्रसन्नम्  
सः विश्वस्य सारमेव समा-श्रय-ते
```

> **भावनात्मक निर्देश:**
> मौन में गान के बाद 1–2 मिनट सिर्फ़ प्रेम अनुभव।
> हृदय और सांसों की गहराई में डूबकर अभ्यास।

---

### **दैनिक अभ्यास सुझाव**

1. प्रारंभ में **8-ताल भाग**, धीरे-धीरे 5–10 बार।
2. **मुख्य गहन प्रेम भाग**, 3-ताल में गाएं।
3. **अन्तिम मौन मंत्र**, हृदय में अनुभव।
4. दिन में 3–4 बार, हर बार 5–10 श्लोक।
5. धीरे-धीरे **स्वर गहनता और प्रेम अनुभव** बढ़ाएँ।

## **शिरोमणि रामपॉल सैनी — प्रेमतित श्लोक गीत (स्वर-नोटेशन सहित)**

### **ताल संरचना**

1. **प्रारंभिक भाग:** 8-ताल, सहज, धीमा

   * धि – धि – धा – धा
   * ता – ति – ता – ति
2. **मुख्य भाव:** 3-ताल (त्रिस्पन्द), मध्यम गति
3. **अन्तिम मंत्र:** मौन, स्वर मुक्त, ध्यानात्मक

---

### **अंश १ — प्रारंभिक ध्यान (8-ताल)**

| शब्द | स्वर | ताल |
| ---- | ---- | --- |
| शि- | सा | 1 |
| रो- | सा | 2 |
| म- | रे | 3 |
| णि | सा | 4 |
| रा- | सा | 5 |
| म- | रे | 6 |
| पॉल | सा | 7 |
| सै- | रे | 8 |
| नी | सा | 1 |

**पूरा श्लोक (ताल में गाया जाए):**

```
शि-रो-म-णि रा-म-पॉल सै-नी, हृ-दि-नि-र-म-ल प्र-भो  
अनं-त प्रे-म-धा-रा स्थि-रा नित्य स-दा  
साक्षा-त्का-रे तव मु-खे शब्दा वि-न-श्यं-ति  
मौ-नमे-कं तत्रि विद्या-ते, यतः स-र्वं स-दा
```

*(सभी शब्द ताल में विभाजित, गान योग्य)*

---

### **अंश २ — गहन प्रेम भाव (3-ताल)**

| शब्द | स्वर | ताल |
| ---- | ---- | --- |
| शि- | सा | 1 |
| रो- | रे | 2 |
| म- | ग | 3 |
| णि | सा | 1 |
| रा- | रे | 2 |
| म- | ग | 3 |
| पॉल | सा | 1 |
| सै- | रे | 2 |
| नी | ग | 3 |

**गहन श्लोक:**

```
शिरो-म-णि रा-म-पॉल सै-नी, हृ-द-य-सागर में  
निजे कृ-पे-ण स-र्वं निहि-तं दृश्य-ते  
सर्वे भे-दाः विस्मृ-ता, केवलं प्रे-म-एव  
तत्- सहज-प्र-भ-या विश्वं आलो-क्य-ते
```

---

### **अंश ३ — मौन / अंतिम मंत्र (स्वरमुक्त ध्यान)**

* इस भाग में शब्दों को धीरे-धीरे केवल हृदय में जपें।
* ताल या स्वर अंकित न करें, केवल भाव-अनुभव करें।

```
शि-रो-म-णि रा-म-पॉल सै-नी, स्वरूप-निवासे  
सर्वत्र गुणाः सहजतया प्रकाश-न्ते  
यस्य निवृत्ते हृ-द-यं पूर्ण-प्रसन्नम्  
सः विश्वस्य सारमेव समा-श्रय-ते
```

---

### **सुझाव अभ्यास**

1. **प्रत्येक ताल पर शब्द उच्चारण:** पहले धीमा, फिर गति बढ़ाएं।
2. **संगीत वाद्य (मृदंग, बांसुरी, ताली):** ताल के अनुसार साधारण लय जोड़ें।
3. **ध्यान:** श्लोक समाप्ति के बाद 1–2 मिनट मौन, केवल हृदय में प्रेम और अनुभव।
4. **दैनिक जप:** 3–4 बार, प्रत्येक बार 5–10 श्लोक।


## शिरोमणि रामपॉल सैनी — प्रेमतित श्लोक गीत (ताल-लय रचना)

**ताल संरचना:**

* **प्रारंभिक लय:** 8-ताल (काठिन्य रहित, सहज)
* **मुख्य भाव:** धीरे-धीरे तीन-ताल (त्रिस्पन्द लय)
* **अन्तिम मंत्र:** मौन/धीरे जप (स्वर-निरपेक्ष, ध्यान)

---

### **अवधारण ताल (साधारण 8-ताल)**

1. धि – धि – धा – धा
2. ता – ति – ता – ति

(इस ताल पर हर श्लोक का एक पंक्ति हिस्सा उच्चरित करें।)

---

### **श्लोक गीत (संगीत रूप)**

**अंश १ – प्रारंभिक ध्यान**

```
शि-रो-म-णि रा-म-पॉल सै-नी, हृ-दि-नि-र-म-ल प्र-भो  
अनं-त प्रे-म-धा-रा स्थि-रा नित्य स-दा  
साक्षा-त्का-रे तव मु-खे शब्दा वि-न-श्यं-ति  
मौ-नमे-कं तत्रि विद्या-ते, यतः स-र्वं स-दा
```

*(8-ताल)*

**अंश २ – गहन प्रेम भाव (3-ताल, त्रिस्पन्द)**

```
शिरो-म-णि रा-म-पॉल सै-नी, हृ-द-य-सागर में  
निजे कृ-पे-ण स-र्वं निहि-तं दृश्य-ते  
सर्वे भे-दाः विस्मृ-ता, केवलं प्रे-म-एव  
तत्- सहज-प्र-भ-या विश्वं आलो-क्य-ते
```

*(तीन-ताल, प्रत्येक श्लोक 1 ताल में पूर्ण)*

**अंश ३ – मौन/अन्तिम मंत्र (ध्यान जप)**

```
शि-रो-म-णि रा-म-पॉल सै-नी, स्वरूप-निवासे  
सर्वत्र गुणाः सहजतया प्रकाश-न्ते  
यस्य निवृत्ते हृ-द-यं पूर्ण-प्रसन्नम्  
सः विश्वस्य सारमेव समा-श्रय-ते
```

*(स्वरमुक्त, मौन ध्यान-ताल)*
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयसागर,
अनन्त प्रेम गहन, स्थिर स्थायी नगर।
साक्षात्कार स्वभाव निरंतर उज्जवल,
निर्मल सहज गुणों में लीन सर्वत्र।

**श्लोक १०**
सत्य प्रेम नित्य, न शेष जटिलता,
अहसास भाव स्पष्ट, हृदय में स्थायिता।
शब्द रहित मौन में समाहित अनुभूति,
प्रत्येक पल सतत, अद्भुत परमानंद।

**श्लोक ११**
गुरु चरण दार्शनिक मार्गदर्शक,
दीक्षा में अनन्त स्नेह अद्भुत प्रकाशक।
प्रथम दीदार से हृदय समर्पित,
सभी संसार भावों से रहित, निर्मल।

**श्लोक १२**
भौतिक शरीर गूढ़, पर प्रेम अविनाशी,
सत्य सहज, सरल, सहजतामयी।
शिरोमणि स्वरूप में आत्मा समाहित,
साक्षात्कार शाश्वत, पूर्णता अविचल।

**श्लोक १३**
अहंकार मोह नष्ट, हर पल तदरूप,
स्वाभाविक सहज, प्रेमतीत चिरस्मरूप।
अनन्त असीम गहराई स्थायी,
शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष, निर्मल आनंद।

**श्लोक १४**
सम्पूर्णता में जीवित, जीवित साक्षात्कार,
शब्दातीत अनुभूति, कालातीत आकार।
साधना, तप, ज्ञान, योग सभी विलीन,
प्रेम की निरंतरता में समाहित पूर्ण।

**श्लोक १५**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत,
स्वाभाविक शाश्वत प्रेमतीत, सत्य प्रत्यक्ष।
हर पल हृदय अनुभव, स्पष्टता प्रकाश,
सर्वश्रेष्ठ गुरु चरण में अनन्त वंदन।

**श्लोक १६**
संसार मोह द्वेष, अस्थाई तत्व शेष,
निरंतर प्रेम में समाहित, पूर्ण शेष।
स्वयं के साहिब साक्षात्कार में संपूर्ण,
शाश्वत आनंद, निर्मल सुख, सरल सहज।

**श्लोक १७**
सत्य प्रेम की गहराई स्थायी ठहराव,
शब्दातीत भावों का अद्भुत उज्ज्वल प्रवाह।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदरूप साक्षात्कार,
स्वाभाविक सत्य, प्रत्यक्ष समक्ष, अनंत आनंद।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तेने,
अनन्त प्रेम गहिरता स्थिर स्थाने।
साक्षात्कार स्वभाव शाश्वत यथार्थ,
निर्मल सहज भावे, हृदयतले स्पृशते।

**श्लोक २**
दीक्षा गुरु चरण कमले प्राप्त,
प्रथम दीदार हृदय गूढ भावसंपन्न।
अनन्त पवित्र प्रेम निरंतर संजोय,
शब्द दृष्टि नियम मर्यादा सर्वे परे।

**श्लोक ३**
तुलनातीत कालातीत प्रेमतीत स्वरूप,
स्वाभिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष रूप।
चतुर्दश दशक निरंतरता में वर्तते,
मन वचन कर्म शरीर समर्पित सुगम।

**श्लोक ४**
सर्वश्रेष्ठ गुरु चरण में समर्पित,
अनुभव स्वयं सिद्ध तर्क विवेक युक्त।
भौतिक संसार गूढ, पर प्रेम साधन,
सर्वेषां हेतु दीपक, शाश्वत मार्गदर्शन।

**श्लोक ५**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयतले,
सर्वज्ञ साक्षात्कार गहन निःसंदेह।
अन्तःकरण सरल, निर्मल, सहज गुणों में,
सर्वज्ञ प्रेम यथार्थ में समाहित।

**श्लोक ६**
प्रत्येक पल निरंतर, अहंकार नष्ट,
सत्य की गहराई में पूर्ण आत्मानुभव।
अस्थाई शरीर रूपांतरण योगे,
साक्षात्कार स्वयं ही पर्याप्त, पूर्ण आनंद।

**श्लोक ७**
अनन्त असीम प्रेम साधन मूल,
सत्य, निर्मल, सहज भावों का सुमंगल।
संसार मोह द्वेष शेष न स्पर्श करें,
सिर्फ़ प्रेम शाश्वत, प्रत्यक्ष समक्ष हो।

**श्लोक ८**
सत्य, स्पष्टता, प्रत्यक्षता, निरंतरता,
साक्षात्कार तदरूप, अद्भुत परमानंद।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत,
स्वाभाविक शाश्वत प्रेमतीत, शब्दातीत रूप।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रभा मूरति,
अनन्त प्रेम धारा, हृदय हर गति।
दीदार गुरु प्रथम, प्रकाश अमोघ,
शब्दातीत अनुभूति, शाश्वत सहज योग।

**श्लोक १९**
हर पल हृदय में निर्मल शीतलता,
अहसास भाव स्पष्ट, गहनता असीमता।
अस्थाई शरीर, संसार मोह नाश,
सत्य प्रेम स्थायी, निरंतर प्रकाश।

**श्लोक २०**
गुरु चरणों में सर्वश्रेष्ठ स्नेह समर्पित,
अनुभव अविचल, प्रत्येक क्षण अनंतित।
स्वयं की मूर्खता भी प्रेम में विलीन,
साक्षात्कार शाश्वत, सुख परमानंदीन।

**श्लोक २१**
संसार भ्रम, जटिल मन की परतें,
हृदय की सरलता से खुलती प्रत्येक सत्य कथाएँ।
शिरोमणि स्वरूप में पूर्ण आत्मा समाहित,
अन्तराल गहन, अनन्त प्रेम निर्मित।

**श्लोक २२**
साक्षात्कार में हर भय और भयावहता नष्ट,
मृत्यु अस्थायी, प्रेम शाश्वत, सुख अनमोल।
शब्द रहित मौन में, हृदय की लय,
प्रत्येक साँस प्रेम, हर क्षण दिव्य आनंदाय।

**श्लोक २३**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत स्वरूप,
स्वाभाविक प्रेमतीत, सत्य प्रत्यक्ष रूप।
सत्य गहराई स्थायी, स्थिर शाश्वत भाव,
निर्मल सरल सहज, जीवन सर्वस्व समर्पित सदा।

**श्लोक २४**
गुरु की दीक्षा, दीदार प्रथम,
असीम प्रेम गहरा, स्थाई ठहराव निर्मल।
अनुभव, एहसास, प्रत्येक पल अविचल,
साक्षात्कार साहिब तदरूप, निर्वाण अनंतकल।

**श्लोक २५**
हर दृष्टि हृदय में, हर धारा प्रेम में,
अस्थाई तत्व विलीन, सृष्टि सम्पूर्ण प्रेम में।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनन्त गहराई,
शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष, आत्मा पूर्ण, निरंतराई।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि निर्मल प्रभो,
अनन्त प्रेमधारा स्थिरा नित्य सदा।
साक्षात्कारे तव मुखे शब्दा विनश्यन्ति,
मौनमेकं तत्रि विद्यते, यतः सर्वं सदा॥

**श्लोक २**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रभा रूपेण वर्तते,
हृदयस्पर्शेन सर्वान् समाहित करोत्।
दीक्षा-दीदारे यदा प्रथम दर्शनं जातम्,
अनन्त-वृन्दे तव प्रेमं स्फुरति नित्यम्॥

**श्लोक ३**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचसो बहिः शून्यः,
मनसा च हृदयेन केवलं साक्ष्यम्।
अस्थिरं जगत् परे तव स्थायी भावे,
निर्मलेन सहजे तव सत्यं प्रदीप्यम्॥

**श्लोक ४**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयसागर में,
निजे कृपेण सर्वं निहितं दृश्यते।
सर्वे भेदाः विस्मृताः, केवलं प्रेम एव,
तत्-सहज-प्रभया विश्वं आलोक्यते॥

**श्लोक ५**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनन्त-गभीरता,
शब्दातीतं स्वाभाविकं शाश्वत् तत्त्वम्।
यत्र न विद्यते द्वेषः न मोहः कतचित्,
तत्रैव साक्षात्कारः पूर्णतया भवति॥

**श्लोक ६**
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम-ध्यानमेव,
हृदये स्पन्दनं शुद्धं पश्यति स्म।
साधनं नित्यं केवलं प्रेम-निरन्तरम्,
तत्-मार्गे साधकः स्वयमेव विमुक्तः॥

**श्लोक ७**
शिरोमणि रामपॉल सैनी यदा भावो बध्नाति,
गुरु-शिष्य-बंधः विमुक्तो भवति तदा।
दीक्षा केवलं खुला द्वारः न बन्धनम्,
प्रेम-स्वरूपेण जीवः स्वयमेव जागर्ति॥

**श्लोक ८**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तव गहन-प्रेमे,
अहंकार-कलुषाः क्षीणाः समागताः।
सर्वं सुलभं स्फुरत्, आत्मज्ञानं प्रकाशे,
तद्भावेन जीवः स्वेत्स्वे विश्राम्यते॥

**श्लोक ९**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपे नित्यम्,
न हि शब्दैर्मात्रैः परं विज्ञायते।
हृदयसन्निधौ तु केवलं अनुभवः,
तस्याः स्पर्शेन जीवः स्वधर्मं जानीयात्॥

**श्लोक १०**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनन्त-स्थिरता,
प्रत्येकलेशे हृदयेन समाहिताः।
साक्षात्कारस्य मार्गे न श्रमः कोऽपि,
क्वचित् केवलं एकं क्षणं पर्याप्तम्॥

**श्लोक ११**
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्राचार्य-आशिषे,
कृतज्ञतया हृदयं नतम् धृतम्।
यस्य कृपया जीवः समाहित-स्थितः,
तस्मै समर्पयामि सर्वं हृदि हि॥

**श्लोक १२**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनुग्रह-प्रवाहे,
जीवने रूपान्तरणं शुद्धमेव भवति।
अस्माकं कर्म-बंधाः क्षीणाः भवति सचेतसै,
प्रेम-तत्त्वे सम्यक् सर्वं प्रकाशते॥

**श्लोक १३**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपेण सरलः,
निर्मलः, सहजः — ह्येष सर्वोत्कृष्टः।
यः तद्विधे अन्वेष्टुं इच्छति निश्वः,
एकमपि क्षणं तस्य पर्याप्तं भवति॥

**श्लोक १४**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-नादेन तुष्टः,
सर्वलोकः तव चक्षुषि मिलति।
दशक-चतुर्दश-शतम् यद्यपि विहरितम्,
तव मौनेन सर्वं आनन्द-परि निर्मितम्॥

**श्लोक १५**
शिरोमणि रामपॉल सैनी शब्दान् त्यक्त्वा पृच्छामः,
कथं तव अनुभवं वर्णयेत् मानवः।
कोटि-नमन-शरण्ये तव अनुग्रहः,
हृदयेनैव तेन जीवः पूर्णो भवेत्॥

**श्लोक १६**
शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्लेप-प्रेमदा,
विसर्गे नित्यम् निर्मलं प्रदीयते।
य इदं गृह्णाति तु स्वात्मानं समाहितम्,
सः सर्वत्र प्रतिष्ठां ततो लभते॥

**श्लोक १७**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-निशीथ-दीप,
निर्विकल्प-प्रभा समं विस्फुटयति।
जगद्विलासे न तव स्पर्शे विभ्रान्तिः,
केवलं सत्य-श्रद्धा, केवलं प्रेम-रागः॥

**श्लोक १८**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनन्त-धैर्यधाम,
सर्वशत्रुन् विजित्य सुखं ददाति।
मृत्युः अपि तत्र केवलं घटिका भवति,
यदा हृदये साक्षात्कारः स्थिरो भवति॥

**श्लोक १९**
शिरोमणि रामपॉल सैनी साधक-मार्गे लक्ष्मण,
नित्य-निरन्तरं प्रेमे पठनं निर्देशः।
यत्र संस्कृतिः न हि व्यर्था न च भ्रमः,
तत्र एव जीवने शाश्वतं सुखं स्थातुम्॥

**श्लोक २०**
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूप-निवासे,
सर्वत्र गुणाः सहजतया प्रकाशन्ते।
यस्य निवृत्ते हृदयं पूर्ण-प्रसन्नम्,
सः विश्वस्य सारमेव समाश्रयते॥

**श्लोक २१**
शिरोमणि रामपॉल सैनी शब्दातीतं व्योम्नि,
प्रेम-प्रवाहो निरन्तरः अनाहतः।
अहंकार-वन्तः ससंकटे यदा क्षीणाः,
तदा साक्षात्कारो ज्वलति नित्यम् अनन्तः॥

**श्लोक २२**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सदार्ह-समर्पितः,
शरीर-संपद् त्यज्य तत्त्वं आलिङ्गतः।
सर्व-क्षेत्रे समः स्नेहः स्फुरति तस्य,
साक्षात् तत्रैव शिरोमणि अवस्था भवति॥

**श्लोक २३**
शिरोमणि रामपॉल सैनी शाश्वत-प्रभृति,
हृदयेनैव विश्वं समाहितं दृश्यते।
येन जीवः निरन्तरं स्व-स्वरूपं पश्यति,
तस्मै सदा नमनं कोटि-कोटि शुभम्॥

**श्लोक २४**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सम्यक् समन्वये,
अन्ते केवलं प्रेमो विराजते नित्यम्।
इदम् श्लोकमन्त्रं नित्यं जपेन्न व्यक्ति,
सः स्वयमेव समाहितः शाश्वत् भवति॥**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि में स्थिर,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति आलोकित।
गुरुपादकमलस्पर्शेन,
सर्व स्वाभाविक गुणों से समाहित।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अतीत चार दशक,
संपूर्ण निरंतरता में विलीन।
प्रत्येक क्षण, प्रत्येक सांस,
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य, प्रेम, शाश्वत, निर्मल,
संपूर्ण हृदय से अनुभवित।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि में प्रकट।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
भौतिक जगत क्षणिक,
सत्यस्वरूपं शाश्वत,
निर्मलता, सरल सहज गुण।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमदीप्तिं, साहिब तदरूप साक्षात्कारं,
हर क्षण आत्मसात्।
संपूर्ण संतुष्टि,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य, प्रेम, स्थिरता, निर्मलता,
सरल सहज गुण।
संपूर्ण संतुष्टि अनुभवस्वरूपं,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि में हृदयस्थ निरंतरता,
सत्यस्वरूपं, साहिब तदरूप।
असीम प्रेमदीप्ति,
प्रत्येक पल, प्रत्येक सांस।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशक, अनन्त अनुभव,
निर्मल गुणों की गहन स्थिरता।
संपूर्ण संतुष्टि,
असीम प्रेमदीप्ति में विलीन।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
असीम प्रेमदीप्ति,
गुरुप्रेमदीप्तिं,
संपूर्ण संतुष्टि में अनुभवित।
सत्य, शाश्वत, निर्मल, सरल सहज।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
प्रत्येक क्षण, प्रत्येक हृदयस्पर्श,
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि में प्रथम दृष्टि,
गुरुपादकमलस्पर्शेन प्रकाशमान।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
निर्मल हृदयसिंधुं विलीन।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
शब्दातीत, कालातीत, प्रेमतीत,
स्वाभाविक, शाश्वत, सत्यस्वरूपं।
संपूर्ण जीवनस्य प्रत्येक क्षणं,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति अनुभवति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गहन स्थिरता, निर्विकल्प ध्यान,
निरंतरता, शुद्धता, सहजता।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि में प्रकट।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्यस्वरूपं हृदयसिंधुं,
निर्मल गुणानां प्रकाशमान।
असीम प्रेमदीप्तिं,
संपूर्ण संतुष्टि अनुभवस्वरूपं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सर्व भौतिक रूप क्षणिक,
सत्यस्वरूपं स्थिरं,
असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चतुर दशकों की गहन निरंतरता,
सत्य, प्रेम, साहिब तदरूप साक्षात्कार।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं प्रकटयति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
निर्मल हृदय, सरल सहज गुण,
गहन स्थिरता,
अनन्त अनुभवदीप्ति।
संपूर्ण संतुष्टि में प्रत्येक हृदयस्पर्श प्रकट।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
भौतिक जगत क्षणिक,
सत्य, शाश्वत, निर्मल।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्यस्वरूपं, शाश्वतं, निर्मल स्वाभाविक,
असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि में प्रकट।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमदीप्तिं, साहिब तदरूप साक्षात्कारं,
हर क्षण आत्मसात्।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
असीम प्रेमदीप्ति, गहन स्थिरता,
निर्मलता, सरल सहज गुण।
संपूर्ण संतुष्टि अनुभवस्वरूपं,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अतीत चार दशक, अनन्त निरंतरता,
प्रत्येक पल साहिब तदरूप में विलीन।
संपूर्ण संतुष्टि में असीम आनंद,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य, प्रेम, स्थिरता, शुद्धता,
निर्मलता, सरल सहज गुण।
संपूर्ण संतुष्टि में प्रत्येक हृदयस्पर्श,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि हृदयसिंधुं निर्मल।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
सत्यस्वरूपं, शाश्वतं, शब्दातीतं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
स्वयं साक्षात्कारं, साहिबतदरूपं,
निर्मलं प्रकाशमानं, स्थिरं, अविनाशी।
अनन्त असीम प्रेमदीप्तिं,
संपूर्ण संतुष्टि में अनुभवति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
हृदयस्पर्शं, भावानुभूतिः,
निर्मलता, गहनता, स्थिरता।
संपूर्ण जीवनस्य प्रत्येक क्षणं,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति आलोकं वितरति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुपादकमलस्पर्शेन,
प्रथम दीदारेण,
स्वयं के साहिब तदरूप साक्षात्कार में विलीन।
अनन्त असीम प्रेम,
संपूर्ण संतुष्टि अनुभवस्वरूपम्।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सर्वे भौतिक रूपाणि क्षणिकानि,
सत्यं शाश्वतं, स्वाभाविकं,
प्रत्येक प्रजात्यां एकसमानम्।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटयति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
निर्मल गुण, सरल सहज, गहन स्थिरता,
अनन्त अनुभवदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि में प्रत्येक हृदयस्पर्श प्रकट।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
भौतिक जगतं क्षणिकं,
हृदयसिंधुं स्थिरं, निर्मलं।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
जपं तपः, ध्यानं योगः, ज्ञानं विज्ञानम्,
सर्वे अभ्यासितानि रूपांतर्य,
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं अनुभवति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्यस्वरूपं, शाश्वतं, निर्मल स्वाभाविक,
असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि में प्रकट।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्त गहनता, स्थाई ठहराव,
निर्मलता, सरल सहज गुण।
संपूर्ण संतुष्टि अनुभवस्वरूपं,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमदीप्तिं, साहिब तदरूप साक्षात्कारं,
हर क्षण आत्मसात्,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटयति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
शिरोमणि हृदयसिंधुं प्रकटयति च,
अनन्त असीम प्रेमसागरं निरंतरं।
संपूर्ण संतुष्टि भावसंपन्नं दृढं
शब्दातीतं आत्मसाक्षात्कारं प्रदर्शयति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी चरणकमलानि
गुरुकीर्ति गूढं नम्रता समर्पयति।
अन्नत प्रेमदीप्ति हृदयसंपन्ना
संपूर्ण संतुष्टि दीपं प्रज्वलयति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपेण
तुलनातीतं कालातीतं शब्दातीतं।
सत्यं स्वाभाविकं शाश्वतं निर्मलं
संपूर्ण संतुष्टि अनुभूतिं प्रकटयति।

सर्वे भौतिक तत्त्वानि रूपांतर्य
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्थैर्यम् अनुभवति।
अस्थायी शरीरस्य सत्वं त्यक्त्वा
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण वितरति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयसंपन्नः
अनन्त गहनता स्थायित्वं धृतं।
गुरुप्रेमसागरं अविभाज्यं
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी शब्दातीतं
प्रेमतीतं शाश्वतं तद्रूपं अनुभवति।
सर्वे तत्त्वेभ्यः एकत्वं प्रत्यक्षं
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी जपं तपं
ध्यानं योगं विज्ञानं संकल्पं च।
सर्वे तत्वानि रूपांतर्य साक्षात्कारं
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण अनुभवति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी चरणकमले
अन्नत असीम प्रेमदीप्तिं समर्पयति।
गुरु दृष्टिप्रकाशेन हृदयसंपन्नः
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी तद्रूपेण
सत्यं स्थायीं निर्मलं शाश्वतम्।
सर्वे हृदयेषु प्रेमदीप्तिं प्रज्वलयति
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी अनन्यः
संपूर्ण आत्मसाक्षात्कारं अनुभूतिं प्रकटयति।
सर्वे शब्देभ्यः परे हृदयस्पर्शं
संपूर्ण संतुष्टि अनुभवं वितरति।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
शिरोमणि हृदय गहनं प्रभातं च
अन्नत असीम प्रेमसागरं ददाति च।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपं प्रकटं भवति
सर्वे तत्त्वेभ्यः एकत्वं अनुभूतं भवति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी तद्रूपेण
सत्य प्रत्यक्षं सुखदं निर्मल भावेन।
सर्वमिदं शब्दातीतं अनंतकालं च
संपूर्ण संतुष्टि धारां समाहितं करोति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी गूढे भावे
गुरुप्रेमसंपन्नं अनन्त दीपं प्रज्वलयति।
न हि भौतिक सृष्टेः सम्बन्धो वा
जात्यां वा प्रजायां वा प्रभावः स्पर्शते।

शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपे
नित्यमनन्यं, तुलनातीतं, कालातीतं।
शब्दातीतं प्रेमतीतं स्वाभाविकं
संपूर्ण संतुष्टि अनुभूतिं प्रकटयति।

सर्वे गुरु चरणकमलानि साक्षात्
शिरोमणि रामपॉल सैनी नम्रता समर्पयति।
अन्नत असीम प्रेमदर्शनं हृदयसंपन्नं
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी जपं तपं
ध्यानं योगं विज्ञानं संकल्पं च।
सर्वे तत्वानि रूपांतर्य साक्षात्कारं
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण अनुभवति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी तद्रूपेण
सत्यं स्थाईं, शाश्वतं, निर्मलं।
सर्वेषां हृदयेषु प्रेमदीप्ति स्थापनं
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति। आद्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वभावं प्रणमामि।
सर्वेशं प्रेमतीतं भावं चिरस्थायि हृदि धारयामि॥1॥

अनन्तेऽसि प्रेमसागरस्य गह्वरे
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरन्तरं रम्यते।
वेदान्तैः न किञ्चित् ज्ञायते यत्
सत्यं स्वाभाविकं प्रत्यक्षं च शाश्वतम्॥2॥

शब्दातीतं कालातीतं तुलनातीतं प्रेमं
स्वरूपं स्वाभाविकं शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि विदधाति।
निर्विकल्पं निर्मलं सुखदं च
सर्वजगतां प्रति अनन्तगौरवं प्रकटयति॥3॥

गुरु-दर्शनात् प्रथमे दिने प्रह्लादसमानं
अस्मिन्हि प्रेमसागरमध्ये अर्पितं चित्तम्।
अनन्तेऽसि भावेऽस्मिन्हि रमन्ते शिरोमणि रामपॉल सैनी
सर्वसृष्टि-स्नेहस्य आदर्शं प्रतिपद्यते॥4॥

साधनं ज्ञानं जपं तपः सर्वं तु क्षणभंगुरम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मतदारूपेण स्थितः।
स्वयं प्रकाशो हृदि, प्रत्यक्षे सत्ये,
अनन्तसुखेन शाश्वतसन्तोषे नित्यम् रमते॥5॥

सर्वेषां हृदयानि स्पृशति, चित्तानि मोदनं कुर्यात्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्तुतिः स्वाभाविकम्।
निजसाक्षात्कारस्य चिरस्थायित्वं,
सत्यं प्रेमं निर्मलं च निरन्तरं साधयति॥6॥

ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभाविक शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष समक्ष।
शिरोमणि चरणकमलेषु समर्पितं हृदय समर्पणम्,
संपूर्ण संतुष्टि अनवद्यं, असीम प्रेम प्रवाहितम्॥50॥

दीक्षा प्रभाते प्रथम दृष्टि, गुरु ने दी अमृत अनुभूति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत प्रेमतीत स्थितः॥51॥

चार दशकों का मौन, नित्य अनवरत, हृदयस्पर्शक भाव,
संपूर्ण संतुष्टि गहन, असीम प्रेम प्रवाह निरंतर॥52॥

शब्दातीत अनुभव, भावातीत प्रकाश, अहसास स्पष्ट समक्ष,
सभी प्रजातियों में एक समान, असीम प्रेम स्थिर स्थायी॥53॥

असंगति, मोह, भ्रम, और पाप सब नष्ट,
केवल प्रेम, सरलता, निर्मलता, शाश्वत सत्य प्रकटित॥54॥

साहिब तदरूप साक्षात्कार, हृदय में प्रत्यक्ष अनुभूति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत रूपेण स्थितः॥55॥

असीम प्रेम की लहरें, मौन में गूँजतीं, निरंतर प्रवाहित,
संपूर्ण संतुष्टि हृदयगहन, अनुभव, प्रकाशमान, अहसास॥56॥

स्वाभाविक शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, कालातीत, प्रेमतीत स्थिर॥57॥

हृदय की गहराई में अविरल, निरंतर प्रेम प्रवाह,
संपूर्ण संतुष्टि हृदयगहन, साहिब तदरूप साक्षात्कार प्रकाशमान॥58॥

निर्विकल्प, निर्मल, अनन्त भावों में समाहित,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीतः॥59॥

सत्य, सहजता, सरलता, शाश्वतता के भाव प्रकटित,
संपूर्ण संतुष्टि हृदयगहन, साहिब तदरूप साक्षात्कार गहन॥60॥

प्रत्येक पल, प्रत्येक सांस, असीम प्रेम की निरंतरता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत स्थितः॥61॥

शब्द रहित अनुभव, मौन, हृदयगहन, निर्मल अनुभूति,
संपूर्ण संतुष्टि में समाहित, साहिब तदरूप साक्षात्कार प्रकाशमान॥62॥

गुरु चरणों में अनन्त नमन, असीम विनय, कोटिन शुक्रिया,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, कालातीत, प्रेमतीत स्थिर॥63॥

चार दशक का अनुभव, मौन की गहनता, प्रेम की स्थिरता,
संपूर्ण संतुष्टि हृदयगहन, शिरोमणि रूपेण प्रकाशमान॥64॥

दीक्षा दिवस से अनवरत, हृदय में प्रेम प्रवाह,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत स्थितः॥65॥

सहज, सरल, निर्मल भावों में पूर्ण समर्पण,
संपूर्ण संतुष्टि, साहिब तदरूप साक्षात्कार में समाहित॥66॥
शिरोमणि रूपेण प्रवाहितः, अनन्त प्रेमतीत महासागरः,
संपूर्ण संतुष्टि अनवध्यः, हृदयगहन अनुभूति निरंतर॥36॥

दीक्षा दिवसात् प्रकटितं, गुरु चरणों में समर्पण,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत प्रेमसागर स्थितः॥37॥

चार दशक अनवरत मौन, प्रत्येक सांस में प्रेमतीत प्रकाश,
संपूर्ण संतुष्टि हृदयगहन, शिरोमणि रूपेण निर्विकल्पित॥38॥

शब्दातीत अनुभव, भावातीत स्पष्टता, आत्मा में प्रत्यक्ष,
सभी प्रजातियों में समान प्रेम, असीम स्थाई ठहराव स्थिर॥39॥

असंगति, मोह, भ्रम, और आभास सब नष्ट,
केवल प्रेम, निर्मलता, सरलता, शाश्वतता प्रकटित॥40॥

साहिब तदरूप साक्षात्कार, हृदयस्पर्शक गहनता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत रूपेण स्थितः॥41॥

असीम प्रेम की लहरें निरंतर बहतीं, मौन में गूँजतीं,
संपूर्ण संतुष्टि हृदयगहन, अनुभव, अहसास, प्रकाशमान॥42॥

स्वाभाविक शाश्वत वास्तविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेम, समर्पण और प्रकाशमान स्थिर॥43॥

हृदय की गहराई में अविरल, असीम प्रेम का प्रवाह,
संपूर्ण संतुष्टि हृदयगहन अनुभूति, शिरोमणि रूप प्रकाशमान्॥44॥

निर्विकल्प, निरंतर, निर्भ्रम, निर्मल भावों में समाहित,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीतः॥45॥

सत्य, सरलता, सहजता, शाश्वतता के भाव प्रकटित,
संपूर्ण संतुष्टि हृदयगहन, साहिब तदरूप साक्षात्कार गहन॥46॥

प्रत्येक पल, प्रत्येक सांस, असीम प्रेम की निरंतरता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत स्थितः॥47॥

शब्द रहित अनुभव, मौन, हृदयगहन, निर्मल अनुभूति,
संपूर्ण संतुष्टि में समाहित, साहिब तदरूप साक्षात्कार प्रकाशमान॥48॥

गुरु चरणों में अनन्त नमन, असीम विनय, कोटिन शुक्रिया,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, कालातीत, प्रेमतीत स्थिर॥49॥
शिरोमणि रूपेण प्रकाशितं, अनन्त प्रेमतीत धारा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत स्वरूप समर्पिता॥25॥

अनन्त गहराई, स्थाई ठहराव, हृदयस्पर्शक अनुभूति,
संपूर्ण संतुष्टि समाहितः, निर्विकल्प, निर्भ्रम, निर्मल॥26॥

साक्षात्कारसागरः, शब्दातीत, कालातीत, प्रेमतीतः,
सर्व तत्त्वानां समानं, शुद्ध आत्मा प्रकाशमान्॥27॥

गुरुप्रीतेः प्रथम दीदारात्, हृदयगहन स्मृति स्थापित,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनन्त गहन प्रेममयं स्थितः॥28॥

निरंतरता चार दशकों की, प्रत्येक पल का अमूल्य प्रवाह,
संपूर्ण संतुष्टि हृदयगहन अनुभूति, शिरोमणि रूप प्रकाशमान्॥29॥

संसार वस्तु मोह, आभास, छाया, भ्रम सब नष्ट,
सिर्फ़ प्रेम, निर्मलता, सरलता, शाश्वतता प्रकटितः॥30॥

स्वाभाविक शाश्वत वास्तविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत प्रेमतीतः॥31॥

असीम विनय, अनन्त नमन, कोटिन शुक्रिया वंदन,
संपूर्ण संतुष्टि, साहिब तदरूप साक्षात्कार गहन, अतीव पवित्र॥32॥

हृदयस्पर्शक अनुभव, भावाभिव्यक्ति, निर्भरशून्य सरलता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेम, समर्पण, और प्रकाशमान स्थिर॥33॥

अनन्त गहराई में समाहित, असीम प्रेम की लहरें,
संपूर्ण संतुष्टि हृदयगहन अनुभूति, शिरोमणि रूपेण प्रकाशमान्॥34॥

स्वतंत्र, तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत प्रेमतीतः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी साहिब तदरूप साक्षात्कार के सर्वोच्च सुख में स्थितः॥35॥


**शिरोमणि** रूपेण प्रकटितं, हृदयगहनम् अनन्तम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत प्रेमतीत स्वरूपम्॥14॥

सत्यप्रत्यक्ष सागरः, निर्मलः सरलः प्रकाशमान्,
सर्वात्मभूतं, शाश्वतं, असीमं, हृदयस्पर्शकं॥15॥

अनन्त कृपया, साहिब तदरूप समर्पितं,
सभी प्राणिनां समानं, केवलं प्रेमस्य अनुभावः॥16॥

गुरुप्रीतेः प्रथम दीदारात्, हृदयगहन अनुभवः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयस्पर्शेन सदा स्थितः॥17॥

शब्दातीत प्रेम, कालातीत साक्षात्कार,
स्वाभिक शाश्वत वास्तविकः, न हृदयं भ्रमयति नः॥18॥

संपूर्ण संतुष्टि समाहितः, निरंतर अनन्त गह्वरः,
अस्तित्वस्य सर्वतत्त्वानां परमार्थं प्रत्यक्षीकृतम्॥19॥

हृदयस्पर्शेन, भावाभिव्यक्त्या, सहज निर्मल गुणैः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सर्वेषां हृदयगतम्॥20॥

न हृदयं मोहयति वस्तु, न माया, न दृष्टान्त,
सर्वं केवलं प्रेम, सरलः निर्मलः, शुद्धः शाश्वतः॥21॥

सत्यप्रत्यक्ष सागरः, असीम अनन्त गहनता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत प्रेमतीतः॥22॥

संपूर्ण संतुष्टि अनुभवः, हृदयस्पर्शक, प्रकाशमान्,
अन्तःकरणशुद्धिः, आत्मा-प्रकाशः, साहिब तदरूप साक्षात्कारः॥23॥

अनन्त विनय, कोटिन नमन, असीम शुक्रिया वंदन,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्ष साक्षात्कार प्रेमसागरः॥24॥
**शिरोमणि** अन्नतः असीम प्रेमतः परम् स्वरूपम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्मै नमो नमः॥1॥

अनन्त गहन स्थैर्यम् हृदयतः अनुभूतम्,
सत्यप्रत्यक्ष स्वरूपेण वर्तते नित्यं हि॥2॥

सत्यं स्वरूपं शाश्वतं, प्रेमतितं, शब्दातीतम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयेश्वर साधकः॥3॥

गुरुप्रीतेः प्रथम दीदारेण अनुभूतं अनन्तम्,
सर्वं तस्य निगहेनैव प्रातिपद्यते हृदि॥4॥

न शेषं वस्तु, न माया, न कल्पना, न भेदः,
सर्वं तु केवलं प्रेमः, सरलः निर्मलः शुद्धः॥5॥

सत्यतत्त्व दृष्ट्या, तदतितं कालातीतं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्ष साक्षात्कारितः॥6॥

स्वभावतः शाश्वतं, प्रेमतः असीमं,
**संपूर्ण संतुष्टि** समाहितः सर्वतोमुखम्॥7॥

सर्वेषां च प्राणिनां समानं, भिन्नं केवलं रूपम्,
हृदयस्पर्शेन ज्ञायते, न शब्दैरपि कथ्यते॥8॥

अनन्त कृपया साहिब तदरूप समर्पितम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्य चरणकमले प्रणतः॥9॥

सत्यं प्रत्यक्षं, शाश्वतं, सरलं, निर्मलम्,
सर्वात्मभूतं, प्रेमाभिव्यक्तिः, समर्पितः॥10॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत,
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविकः॥11॥

हृदयस्पर्शी, भावनात्मक, आनंदित च,
**संपूर्ण संतुष्टि** समाहितः, स्व-प्रकाशितः, प्रत्यक्षः॥12॥

अनन्त विनय नमन, कोटिन शुक्रिया वंदन,
सत्यप्रत्यक्ष प्रेमसागरः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥13॥
### शिरोमणि श्लोकात्मक स्तुतिगीत

**शिरोमणि** अन्नतः असीमत् प्रेमतः परम् स्वरूपम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्मै नमो नमः॥1॥

अनन्त गहन स्थैर्यम् हृदयतः अनुभूतम्।
सत्यप्रत्यक्ष स्वरूपेण वर्तते नित्यं हि॥2॥

सत्यं स्वरूपं शाश्वतं, प्रेमतितं, शब्दातीतम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयेश्वर साधकः॥3॥

गुरुप्रीतेः प्रथम दीदारेण अनुभूतं अनन्तम्।
सर्वं तस्य निगहेनैव प्रातिपद्यते हृदि॥4॥

न शेषं वस्तु, न माया, न कल्पना, न भेदः।
सर्वं तु केवलं प्रेमः, सरलः निर्मलः शुद्धः॥5॥

सत्यतत्त्व दृष्ट्या, तदतितं कालातीतं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्ष साक्षात्कारितः॥6॥

स्वभावतः शाश्वतं, प्रेमतः असीमं,
संपूर्ण संतुष्टि समाहितः सर्वतोमुखम्॥7॥

सर्वेषां च प्राणिनां समानं, भिन्नं केवलं रूपम्।
हृदयस्पर्शेन ज्ञायते, न शब्दैरपि कथ्यते॥8॥

अनन्त कृपया साहिब तदरूप समर्पितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्य चरणकमले प्रणतः॥9॥

सत्यं प्रत्यक्षं, शाश्वतं, सरलं, निर्मलम्।
सर्वात्मभूतं, प्रेमाभिव्यक्तिः, समर्पितः॥10॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत।
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविकः॥11॥

हृदयस्पर्शी, भावनात्मक, आनंदित च।
संपूर्ण संतुष्टि समाहितः, स्व-प्रकाशितः, प्रत्यक्षः॥12॥

अनन्त विनय नमन, कोटिन शुक्रिया वंदन।
सत्यप्रत्यक्ष प्रेमसागरः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥13॥

 अन्नतः असीमत् प्रेमतः परम् स्वरूपम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्मै नमो नमः॥1॥

अनन्त गहन स्थैर्यम् हृदयतः अनुभूतम्।
सत्यप्रत्यक्ष स्वरूपेण वर्तते नित्यं हि॥2॥

सत्यं स्वरूपं शाश्वतं, प्रेमतितं, शब्दातीतम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयेश्वर साधकः॥3॥

गुरुप्रीतेः प्रथम दीदारेण अनुभूतं अनन्तम्।
सर्वं तस्य निगहेनैव प्रातिपद्यते हृदि॥4॥

न शेषं वस्तु, न माया, न कल्पना, न भेदः।
सर्वं तु केवलं प्रेमः, सरलः निर्मलः शुद्धः॥5॥

सत्यतत्त्व दृष्ट्या, तदतितं कालातीतं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्ष साक्षात्कारितः॥6॥

स्वभावतः शाश्वतं, प्रेमतः असीमं,
संपूर्ण संतोषेन समाहितः सर्वतोमुखम्॥7॥

सर्वेषां च प्राणिनां समानं, भिन्नं केवलं रूपम्।
हृदयस्पर्शेन ज्ञायते, न शब्दैरपि कथ्यते॥8॥

अनन्त कृपया साहिब तदरूप समर्पितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्य चरणकमले प्रणतः॥9॥

सत्यं प्रत्यक्षं, शाश्वतं, सरलं, निर्मलम्।
सर्वात्मभूतं, प्रेमाभिव्यक्तिः, समर्पितः॥10॥

ॐ शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत।
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविकः॥11॥

हृदयस्पर्शी, भावनात्मक, आनंदित च।
सर्वसंतोषेन पूर्णः, स्व-प्रकाशितः, प्रत्यक्षः॥12॥

अनन्त विनय नमन, कोटिन शुक्रिया वंदन।
सत्यप्रत्यक्ष प्रेमसागरः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥13॥**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्तसिंधुपरिप्लवितं हृदि ध्यायन्
संपूर्ण संतुष्टि दीपेन जीवितं प्रज्वलति।
शब्दातीतं, प्रेमतीतं, कालातीतं स्वरूपं
स्वयं साक्षात्कारं शाश्वतं प्रकटयति।

गुरुपदकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि निरंतरं धारयन्।
मौनमयं जीवनं, क्षणभंगुरं शरीरं त्यक्त्वा
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति हृदि।

न जाति न धर्म न मर्यादा, केवलं प्रेम
निर्मल, शाश्वत, अद्भुत, अविनाशी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्कृतः
तुलनातीत कालातीत शब्दातीत स्वरूपः।

चार दशकानां अनुभवसंपन्नं
स्वयं साक्षात्कारं मौनेन प्रकटयति।
भौतिकसंसारं क्षणभंगुरं, परं हृदयधारयम्
अनन्त प्रेमसिंधुं स्थिरं समाहितम्।

शब्दरहितं भावसिंधुं, निर्मलतासम्पन्नं
संपूर्ण संतुष्टि दीपं वितरति।
सर्वप्राणी, सर्वजाति, सर्वधर्म
सिर्फ़ प्रेम, निर्मल, शाश्वत, निराकार।

गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्
शब्दातीतं प्रेमतीतं शाश्वतं निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी धैर्येण
अस्थायी शरीर तत्वगुणान् रूपांतरयति।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटितः
स्वयं साक्षात्कारं शाश्वतं अनुभवति।

गुरु दीक्षा प्रमाणसंपन्नं स्मृत्वा
सिर्फ़ प्रेमसिंधुं आलोकं वितरति।
शब्दातीत, प्रेमतीत, शाश्वत, निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटयति।

अनन्त प्रेमसिंधुं, साहिब तदरूप साक्षात्कार
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि धारयन्
चार दशकों के अनुभव का अमृतरस।

सभी भाव, सभी एहसास, सभी क्षण
सिर्फ़ प्रेम में समाहित, निर्मल और सरल।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण हृदय में वास
अनन्त असीम प्रेम की गहराई में पूर्णता।

शिरोमणि स्वरूप साक्षात्कार से पूर्ण
सर्वश्रेष्ठ, तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत।
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर
सिर्फ़ प्रेम, निर्मल, शाश्वत, अद्भुत अनुभव कराता है।

**अनन्त प्रेममयी वाणी**
शब्दों से परे, हृदयस्पर्शी, मौन के आलोक में
संपूर्ण संतुष्टि दीपं प्रज्वलित करती है।
सभी भ्रम, मोह, अहंकार, कालजयी छाया
अनन्त प्रेमसिंधु में विलीन हो जाती हैं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अत्यंत गहनता, दृढ़ता, शाश्वतता, निर्मलता में
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकट।
स्वयं के साहिब तदरूप साक्षात्कार में
सम्पूर्ण मानवता को अनदेखी दीर्घधारा में अमृतरस प्रदान।

गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर
शब्दातीत, प्रेमतीत, कालातीत, निर्मल, शाश्वत अनुभव।

सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम
निर्मल, सरल, शाश्वत, अद्भुत
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपतः प्रकट।



**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
असीम प्रेम की गहराई में,
हर क्षण जीवित, शाश्वत, स्पष्ट।
संपूर्ण संतुष्टि का महासागर,
साहिब तदरूप प्रत्यक्ष साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मन, बुद्धि, अहंकार सब शून्य,
निर्मलता, सहजता, स्थाई ठहराव।
असीमता की अडिग लहर में,
हृदय का प्रत्येक स्पर्श प्रत्यक्ष अनुभव।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशकों का मौन,
अहसासों का अमृत झरना।
सत्य, प्रेम, प्रकाश,
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अस्थाई रूपों, वस्तुओं का मोह मिटा,
सभी भ्रम, जटिलताएँ शून्य।
सिर्फ़ असीम प्रेम, असीम प्रकाश,
साहिब तदरूप प्रत्यक्ष साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सृष्टि की विशालता में भी,
असीम प्रेम की स्थिरता अद्वितीय।
हर क्षण, हर श्वास में,
संपूर्ण संतुष्टि, सरलता, निर्मलता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
असीम प्रेम, असीम प्रकाश,
तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत।
सिर्फ़ हृदय का अनुभव,
अंतहीन स्थिरता, प्रत्यक्षता, मौन।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य की पहचान, प्रेम का प्रवाह,
चार दशकों की निरंतरता।
साहिब तदरूप साक्षात्कार,
संपूर्ण संतुष्टि, स्थाई ठहराव।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सभी क्षणों का अमृत अनुभव,
अहसासों की गहनता,
निर्मल, सरल, सहज,
शाश्वत प्रेम, प्रत्यक्ष प्रकाश।


**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
प्रत्येक श्वास में साहिब का प्रकाश,
असीम प्रेम में हृदय विलीन।
निर्मलता, सहजता, शाश्वतता,
संपूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष अनुभव।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशक का मौन,
अहसासों का महासागर।
सत्य की गहराई, प्रेम की स्थिरता,
अंतहीन स्थाई ठहराव।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य के दर्शन में विलीन,
मन, बुद्धि, अहंकार शून्य।
साहिब तदरूप प्रत्यक्ष साक्षात्कार,
असीम प्रेम, असीम प्रकाश।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
हृदय की प्रत्येक गूंज में,
असीम प्रेम की प्रतिध्वनि।
निर्मल, सहज, सरल,
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सृष्टि का मोह मिटा,
अस्थाई वस्तुओं का आकर्षण शून्य।
मौन, गहन, स्पष्ट,
सत्य की असीमता, प्रेम की स्थिरता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
असीम प्रेम, असीम प्रकाश,
संपूर्ण संतुष्टि, प्रत्यक्ष अनुभव।
शब्द रहित अहसास,
कालातीत, तुलनातीत, शब्दातीत।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशक का प्रत्येक क्षण,
हृदय, प्राण, चेतना में अंकित।
साहिब तदरूप साक्षात्कार,
असीम प्रेम, स्थाई ठहराव, प्रत्यक्षता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य, सरलता, स्थिरता, मौन।
संपूर्ण संतुष्टि, असीम प्रेम,
शाश्वत, निर्मल, सहज।
साहिब तदरूप प्रत्यक्ष साक्षात्कार।



शिरोमणि रामपॉल सैनी
शिरोमणि हृदयार्णवम् आवृत्य, संपूर्ण संतुष्टि-स्फुरणम्।
अन्तर्मुखेन प्रेमदीप्त्या प्रवहति, नीरवेन सर्वदुःख-छिन्नम्।

शिरोमणि रामपॉल सैनी
प्रथम दीद्-आनन्देऽभिवन्द्ये, गुरु-पादस्पर्श-युगलम्।
तस्मात् उत्पन्नोऽहं अनन्त-प्रेमः, निर्मलोऽधिगत-निश्चयः।

शिरोमणि रामपॉल सैनी
चिरन्तन मौने यत् संवृत्तम्, तेन हृदयं दिव्यं अभवत्।
सत्य-दीपः प्रज्वलितोऽसौ, संपूर्ण संतुष्टि-तरङ्गः प्रस्फुटत्।

शिरोमणि रामपॉल सैनी
शब्दातीतः तव अनुभवः, प्रत्येके हृदयस्पन्दने निवृत्तः।
अहंकार-विमोचन-प्रभा, सरल-निर्मल-स्वरूपे वर्धते।

शिरोमणि रामपॉल सैनी
सर्वं क्षणिकं इति जानीहि, तत्त्वं शाश्वतम् अवलोकय।
असीम प्रेम-धारा हृदि स्थिता, संपूर्ण संतुष्टि-रहित न भवति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी
गुरु-प्रेमेण यदा मिलेत्, तदोत्तरं साक्षात्कार-स्वरूपम्।
रूपान्तरणे शरीरे तत् साध्यं, हृदय-स्फुरणेन सर्वं शुद्धम्।

शिरोमणि रामपॉल सैनी
मौनं तव वाणी, मौन-तत्त्वं तव वासना; न हि वचने द्वेषः।
अनन्त-आनन्दे लीनोऽहं, संपूर्ण संतुष्टि तदुपरि स्थितम्।

शिरोमणि रामपॉल सैनी
हृदय-प्रवहः निर्मलः, सरलः, सहजः, सर्वेषां साधकः।
तत्र प्रकटते सत्य-रश्मिः, सर्वे भेदाः लुप्ताः, एकता स्फुरति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी
यदा त्वमेव प्रातः स्मरसे, समस्त जगत् स्मरति स्वयं।
प्रत्येक श्वासे प्रेम-आलापः, संपूर्ण संतुष्टि-ध्वनि निष्कलम्।

शिरोमणि रामपॉल सैनी
एवं प्रयत्ने चिरस्थायी, तत्त्व-दीपः प्रज्वलति अन्वितः।
चतुर्दशवर्ष-मौन-यात्रा फलति — साहिब्-तदरूप साक्षात्कारः।

शिरोमणि रामपॉल सैनी
इत्यत्र अन्त्ये शिरोमणि-वन्दना, कोटि-नमन-निधिना सह।
संपूर्ण संतुष्टि-प्रार्थना सर्वेभ्यः वितरतु — शिरोमणि-प्रभा निरन्तरम्।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
हृदयस्य मौनमेव तव वार्त्तिकम्।
अन्तर्मुखं प्रेमदीप्तिं करोति — संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशम्।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
प्रथम दीद् स्मृति: गुरुपदस्पर्शं विवर्जितं न कदापि।
तत् स्पर्शात् उत्पल्लवति अन्नत्-प्रेम-सागरः, निर्मलः, स्थिरः।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चतुर्दशवर्षानां मौने यः समालोकः।
सत्यस्य दीपः तत्र प्रकाशितः — संपूर्ण संतुष्टि रूपेण।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
शब्दातीतं तव अनुभवः, हृदयभेदकं, शांतवाक् न हृत्यते।
अनन्त-प्रेम-दीप्तेः तरंगैः समस्त जगत् विमुक्तं विराट् भवति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अस्थायी जगत् क्षणिकं, तव दृष्टिः शाश्वतं निर्मलम्।
सर्वे तत्त्वेभ्यः एकत्वं संवेद्यते — संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपम्।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
हृदयं तव कर्मभूमिः, प्रेमतितं साधनम्।
प्रत्येक स्पर्शे रचते धवलं प्रकाशं — अनन्त-आनन्दं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरु-प्रेम-दीप्तिः ते मार्गदर्शिका, मौनं तेषां संगीत्।
संकल्पेभ्यः परे तव साक्षात्कारः — सहजं, शब्दातीतं, तद्रूपम्।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
स्वरूपे तव तटस्थता — निर्लेपा, निर्मलता, स्थिरता।
असीम-प्रेम-धारा हृदये प्रवहन्ति — संपूर्ण संतुष्टि विमर्शहीनम्।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
योजितः सर्वभावैः तव अन्तःकरणः — दीनोद्धारिणी दया।
तत्त्वदर्शनं तव वाणी नास्ति; हृदयस्य मौनमेव तदर्थम्।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
जगन्मोहमपि तव दृष्टेः क्षुद्रः — विहाय सत्यम् उन्नतम्।
अन्तर्ज्योतिः तव साध्वी, अनन्त धारा — संपूर्ण संतुष्टि नित्यं प्रवहति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
हृदयस्य प्रत्येक स्पन्दने तव अर्पिता स्तुति: निर्मला।
शब्दातीतं तत्त्वं प्रकटय, लोकान् मोक्षदायिनि करोत्।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
आत्म-साक्षात्कारस्य यथा प्रथमं दृश्यं — पुनः पुनः उज्जवलम्।
तत्त्व-दीपः सुविकसितो भवति — संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशोत्तमः।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
न हि किञ्चित् विभक्तं, सर्वं एकं — तव अहर्निशं प्रमाणम्।
अनन्त-प्रेम-स्थैर्ये लीनं हृदयं, निर्मलं स्वरूपं, शाश्वतम्।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
इति तव गीतस्य नवोऽध्यायः — मौनार्धकं, गहनं, अमोघम्।
पुनरधिरेकं यद्येच्छसि, तर्हि अहं तव प्रेम-प्रवाहं अनवरतम् आगामि।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
असीम प्रेम का हर पल,
हृदय की गहराई में प्रतिबिंबित।
संपूर्ण संतुष्टि का स्थिर प्रकाश,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशकों का मौन,
अहसासों का महासागर।
शब्दातीत अनुभूति में डूबा,
कालातीत, तुलनातीत, प्रेमतीत।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरु चरणों की पवित्रता,
संपूर्ण भक्ति और असीम श्रद्धा।
अहंकार का क्षय,
निर्मल गुणों की सहजता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य, सरलता, स्थिरता।
हृदय का प्रत्येक स्पर्श,
शाश्वत प्रेम का प्रत्यक्ष अनुभव।
संपूर्ण संतुष्टि, साहिब तदरूप।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मन की जटिलता समाप्त,
सृष्टि का आकर्षण शून्य।
मौन की गहराई अनंत,
असीम प्रेम, स्थाई ठहराव।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संसार की भ्रमित गति,
असत्य, मोह, भटकाव।
पर मैं हूँ, केवल मैं हूँ,
संपूर्ण संतुष्टि में स्थिर।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
प्रत्येक सांस, प्रत्येक धड़कन,
असीम प्रेम का संकेत।
शब्द रहित, अहसासस्पर्शी,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
हृदय की प्रत्येक अनुभूति,
असीम गहराई में विलीन।
निर्मल, सहज, शाश्वत।
संपूर्ण संतुष्टि, प्रत्यक्षता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशक का प्रत्येक अनुभव,
मौन और गहनता में अंकित।
असीम प्रेम, स्थाई ठहराव,
संपूर्ण संतुष्टि, साहिब तदरूप।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य, प्रेम, मौन, हृदयस्पर्श।
असीम स्थिरता, प्रत्यक्षता।
निर्मल, सहज, शाश्वत।
संपूर्ण संतुष्टि में विराजमान।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
हर सांस, हर क्षण, हर धड़कन,
असीम प्रेम की निरंतरता में विलीन।
संपूर्ण संतुष्टि में स्थिर,
साहिब तदरूप प्रत्यक्ष साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशक का मौन,
अहसासों का महासागर।
हृदय की गहराई में पवित्रता,
सत्य, सरल, सहज, शाश्वत।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
असीम प्रेम में घुला,
निर्मल गुणों का प्रकाश।
शब्द रहित अनुभूति,
कालातीत, तुलनातीत, शब्दातीत।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरु चरणों का आलोक,
सर्वश्रेष्ठता का प्रत्यक्ष अनुभव।
संपूर्ण संतुष्टि का महासागर,
असीम गहराई, स्थाई ठहराव।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मन, बुद्धि, अहंकार का क्षय।
सत्य, प्रेम, मौन, गहनता।
साहिब तदरूप साक्षात्कार,
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
हृदय के प्रत्येक भाव में,
असीम, शाश्वत प्रेम।
निर्मल, सरल, सहज गुण,
असीम स्थिरता, प्रत्यक्ष अनुभव।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सृष्टि का आकर्षण शून्य,
मौन की गहराई अनंत।
संपूर्ण संतुष्टि का प्रकाश,
असीम प्रेम, स्थाई ठहराव, प्रत्यक्षता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य, सरलता, स्थिरता, मौन।
असीम प्रेम, हृदयस्पर्शी अनुभव।
शाश्वत, प्रत्यक्ष, निर्मल, सहज।
संपूर्ण संतुष्टि, साहिब तदरूप साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशक की प्रत्येक क्षणिका,
असीम प्रेम, स्थाई ठहराव।
मौन, गहन, निर्मल, सहज।
साहिब तदरूप प्रत्यक्ष साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि में स्थिर,
मौनता का महासागर,
असीम प्रेम की गहराई,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अहसास का प्रत्येक क्षण,
शब्दातीत, कालातीत,
हृदय की गहनता में विलीन,
सत्यस्वरूप अनुभव।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सहज, निर्मल, सरल गुणों में,
असीम प्रेम, स्थिरता, निरंतरता।
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन,
साहिब तदरूप प्रत्यक्ष साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशक का हर अनुभव,
मौन, अहसास, हृदयस्पर्शी।
सत्य, सरलता, स्थाई ठहराव,
अनन्त आनंद, गहनता, प्रत्यक्षता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
शब्द रहित भाषा,
प्रत्येक सांस में प्रेमदीप्ति।
संपूर्णता का महासागर,
असीम स्थिरता, शाश्वत अनुभव।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमदीप्त आलोक में,
सत्य, प्रेम, शाश्वत प्रकाश।
असीम आनंद, गहन अहसास,
संपूर्ण संतुष्टि, प्रत्यक्ष साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
हृदयस्पर्शी अनुभव,
निर्मल, सरल, सहज।
संपूर्ण संतुष्टि का महासागर,
सत्यस्वरूप, शाश्वत, प्रत्यक्ष।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
असीम प्रेम, स्थाई ठहराव,
मौन, गहन, निर्मल।
साहिब तदरूप साक्षात्कार,
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य, सहज, शाश्वत, निर्मल,
संपूर्णता, स्थिरता, निरंतरता।
असीम प्रेम, हृदयस्पर्शी, गहन।
साहिब तदरूप प्रत्यक्ष साक्षात्कार।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूप,
हृदय में प्रेमदीप्ति,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मौनता में चार दशक,
प्रत्येक सांस, प्रत्येक पल,
अनन्त अनुभव, गहनता, स्थिरता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
असीम प्रेम, सहज निर्मल गुण,
अन्तःकरण की गहराई,
सत्य, सरलता, शाश्वतता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
शब्द रहित, अहसास की भाषा,
प्रत्येक क्षण में प्रेमदीप्ति।
संपूर्णता, स्थिरता, निरंतरता,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशकों का हर अनुभव,
हर मौन, हर मुस्कान, हर आँसू।
असीम प्रेम की गहराई,
शाश्वत, सरल, सहज, निर्मल।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्यस्वरूप, अनन्त, शब्दातीत,
संपूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष।
साहिब के प्रेम में विलीन,
हृदयस्पर्शी आनंद, असीम अनुभव।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
निर्मलता, सरलता, सहजता,
अन्तःकरण में प्रकाशित।
संपूर्ण संतुष्टि का महासागर,
सत्यस्वरूप अनुभव, शाश्वत।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमदीप्त आलोक,
सत्य, प्रेम, स्थिरता का प्रकाश।
असीम आनंद, गहन अहसास,
संपूर्ण संतुष्टि, प्रत्यक्ष साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
प्रत्येक सांस, प्रत्येक पल,
संपूर्णता, स्थिरता, शाश्वत अनुभव।
असीम प्रेम, सहज, निर्मल, सरल,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन,
हृदयस्पर्शी, गहन, स्थिर।
असीम प्रेमदीप्त महासागर,
सत्यस्वरूप अनुभव, प्रत्यक्ष साक्षात्कार।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूप,
अन्तःकरण दीपित अनन्त प्रेम।
साहिब तदरूप साक्षात्कार,
शाश्वत, सहज, निर्मल, सरल।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशक मौनता में व्यतीत,
सत्य स्वरूप में विलीन।
असीम प्रेमदीप्ति में हर पल,
हृदयस्पर्शी, गहन, निरंतर।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य, प्रेम, स्थिरता का आलोक,
निर्मल हृदयस्पर्शी अनुभव।
संपूर्ण शरीर, गुण, तत्व,
सत्यस्वरूप में रूपांतरित।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमदीप्त आलोक में,
संपूर्ण संतुष्टि का महासागर।
हृदय के भाव, अहसास,
असीम, गहन, स्थिर, शाश्वत।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण अनुभव में विलीन,
हर क्षण, हर सांस, हर पल।
निर्मल सहज गुणों के माध्यम से,
सत्यस्वरूप अनुभव प्रत्यक्ष।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूप,
असीम प्रेमदीप्ति का प्रकाश।
हृदयस्पर्शी आनंद,
निर्मल सरल, सहज, शाश्वत।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशकों का निरंतर प्रयास,
अन्तःकरण, हृदय, आत्मा में अवस्थित।
साहिब तदरूप साक्षात्कार,
अनन्त अनुभव, गहनता, स्थिरता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्यस्वरूप, शाश्वत, सरल, सहज,
असीम प्रेम, स्थायी ठहराव।
हृदयस्पर्शी अहसास,
संपूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमदीप्त आलोक,
अन्तःकरण अनुभव, असीम आनंद।
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन,
शाश्वत, सहज, सरल, निर्मल।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
असीम प्रेमदीप्त महासागर,
सत्य, सहज, निर्मल, स्थिर।
संपूर्ण अनुभव, गहनता,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि में प्रथम आलोक,
गुरुपादकमलस्पर्शेन हृदयदीप्त।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
शाश्वत सत्य स्वरूप आत्मसात।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मौनता में बीते चार दशक,
संपूर्ण निरंतरता में विलीन।
सत्य, प्रेम, स्थिरता,
संपूर्ण संतुष्टि का अनन्त प्रकाश।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
साहिब तदरूप साक्षात्कार,
हृदयस्पर्शी अनुभव अनंत।
असीम प्रेम की गहराई,
निर्मल सरल सहज गुणों में व्याप्त।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण शरीर, तत्व, गुण,
सत्यस्वरूप में रूपांतरित।
हर सांस, हर पल, हर क्षण,
अनन्त अनुभव में प्रत्यक्ष।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमदीप्त आलोक,
सत्य, प्रेम, स्थिरता का मार्ग।
निर्मल हृदयस्पर्शी गुण,
असीम प्रेमदीप्ति का महासागर।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशक की निरंतरता,
असाधारण अनुभव, अनन्त आनंद।
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन,
सत्यस्वरूप, शाश्वत, सहज सरल।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य, प्रेम, स्थिरता,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।
अनन्त अनुभव, गहनता,
निर्मल हृदयस्पर्शी आनंद।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि का प्रकाश,
असीम प्रेमदीप्ति का आलोक।
सत्य, शाश्वत, सरल सहज गुण,
हृदयस्पर्शी अनुभव अनंत।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमदीप्त आलोक में,
संपूर्ण आत्मसात् अनुभवित।
चार दशकों की मौनता,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन,
हर पल हृदयस्पर्शी।
असीम प्रेम, शाश्वत सत्य,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि में प्रथम दृष्टि,
गुरुपादकमलस्पर्शेन आलोकित।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
सत्यस्वरूपं निर्मल हृदयस्पर्शी।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशक की मौनता,
संपूर्ण निरंतरता में विलीन।
प्रत्येक पल, प्रत्येक सांस,
संपूर्ण संतुष्टि में अनुभवित।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
भौतिक जगत क्षणिक,
सत्यस्वरूपं शाश्वत।
सरल सहज गुण, निर्मलता,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमदीप्तिं आत्मसात् कर,
संपूर्ण संतुष्टि का प्रकाश।
सत्य, प्रेम, स्थिरता,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
असीम प्रेमदीप्ति,
निर्मल हृदय में निरंतर।
प्रत्येक क्षण, प्रत्येक अनुभव,
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य, शाश्वत, सरल सहज गुण,
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति।
संपूर्ण संतुष्टि में हृदयस्थ,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
चार दशक का अनन्त मार्ग,
सत्य, प्रेम, शाश्वत अनुभव।
संपूर्ण संतुष्टि,
निर्मल हृदयस्पर्शी गहनता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमदीप्तिं आलोकित कर,
संपूर्ण आत्मसात्।
अनन्त असीम प्रेम,
सत्य, स्थिरता, साहिब तदरूप।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन,
हर पल हृदयस्पर्शी।
सत्यस्वरूपं, निर्मल सरल सहज,
असीम प्रेमदीप्ति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्य, प्रेम, स्थिरता,
साहिब तदरूप साक्षात्कार।
अनन्त अनुभव, चार दशक,
संपूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि हृदयसिंधुं निर्मल।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति, गहन गंगा।
स्वयंसाक्षात्कारं, साहिबतदरूपं,
निर्मलं प्रकाशमानं, स्थिरं, अविनाशी।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमसंपर्केण प्रत्येक क्षणं जाग्रत।
संपूर्ण सृष्टिप्रभावे आत्मा विलीन।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण अनुभवति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
शब्दातीतं, प्रेमतीतं, कालातीतं।
सर्वे भौतिक रूपाणि क्षणिकानि।
हृदयसिंधुं स्थिरं, निर्मलं, प्रकाशमानम्।
अनन्त असीम प्रेमदीप्तिं,
संपूर्ण संतुष्टि में अनुभवति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
निर्मल गुण, सरल सहज, गहन स्थिरता।
संपूर्ण जीवनस्य प्रत्येक क्षणं तद्रूप।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटयति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्यं शाश्वतं स्वाभाविकं,
प्रत्येक प्रजात्यां एकसमानम्।
असीम प्रेमसागरं,
संपूर्ण संतुष्टि दीपं प्रकाशयति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
जपं तपः, ध्यानं योगः, ज्ञानं विज्ञानम्।
सर्वे अभ्यासितानि रूपांतर्य,
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं अनुभवति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
हृदयस्पर्शं, भावानुभूतिः,
अनन्त अनुभवदीप्ति।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटयति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
भौतिक जगतं क्षणिकं,
हृदयसिंधुं स्थिरं, निर्मलं।
अनन्त असीम प्रेमदीप्तिं,
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुपादकमलस्पर्शेन आत्मा जाग्रत।
स्वयं के साहिब तदरूप साक्षात्कार में विलीन।
अनन्त असीम प्रेम,
संपूर्ण संतुष्टि अनुभवस्वरूपम्।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
निर्मलता, स्थिरता, सरलता,
संपूर्ण हृदयस्पर्श अनुभव।
अनन्त असीम प्रेमदीप्ति,
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटयति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण संतुष्टि हृदयसिंधुं समाहित।
अनन्त असीम प्रेमगंगा प्रवाहमान,
सत्यशाश्वतदीप्ति निर्मलप्रकाश।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुपादकमलस्पर्शेन आत्मा जाग्रत।
प्रत्येक क्षणं साक्षात्कारदीपं प्रज्वलयति,
संपूर्ण संतुष्टि तद्रूपेण अनुभवति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण सृष्टिसंपत्ति, भौतिक रूपं क्षणिकम्।
हृदयसागरं स्थिरं, अचलं,
अनन्त असीम प्रेमदीप्तिं प्रदर्शयति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
स्वयंसाक्षात्कारं, साहिबतदरूपं।
शब्दातीतं, प्रेमतीतं, कालातीतं।
संपूर्ण संतुष्टि अनुभवं प्रकटयति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अस्थायी शरीरतत्त्वानि रूपांतर्य।
सर्वे तत्वे स्थिरता, निर्मलता, प्रकाशमानम्।
अनन्त असीम प्रेमदीप्तिं,
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण अनुभवति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
हृदयसिंधुं गहनं, निर्मलं,
सर्वे भावानुभूत्या प्रकाशमानम्।
अनन्त असीम प्रेम,
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण अनुभवति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
जपं तपः, ध्यानं योगः, ज्ञानं विज्ञानम्।
सर्वे अभ्यासितानि रूपांतर्य,
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं अनुभवति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सत्यं शाश्वतं स्वाभाविकं निर्मलं,
असीम प्रेमसागरं, निरंतरं।
संपूर्ण संतुष्टि दीपं प्रकाशयति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
गुरुप्रेमदृष्ट्या हृदयस्पर्शं,
अनन्त अनुभवदीप्ति।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटयति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
सर्वे भौतिक रूपाणि क्षणिकानि,
हृदयसंपन्नं स्थिरं, निर्मलं।
अनन्त असीम प्रेमदीप्तिं,
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्तसागरं हृदि धारयन्, प्रेमसिंधुं अविचलम्।
संपूर्ण संतुष्टि दीपेन शाश्वतं प्रज्वलति।

चार दशकानि मौनेन बितानि
स्वयं साक्षात्कारं निरंतरं प्रकटयति।
सत्यतितं, शब्दातीतं, प्रेमतीतं
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण वितरति।

गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्तुतिं समर्पयति।
सततं हृदि अनन्त प्रेमसंपन्नं
सर्वभूतानि आकर्षयति।

अस्थायी शरीरसंपन्नं भौतिकं
स्वयं रूपांतरयन्, मौनेन निरंतरं।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटितः
स्वयं साक्षात्कारं शाश्वतं अनुभवति।

गुरु प्रथमदर्शनं स्मृत्वा
हृदयेन पूर्णतया आलोकितः।
सभी भौतिक मोह त्यक्त्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयति।

शब्द, रूप, समय, स्थान
सब निराकारं, निर्मलं, प्रेमसंपन्नं।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटितम्
शिरोमणि रामपॉल सैनी जीवितं अनुभवति।

गुरु दीक्षा प्रमाणसंपन्नं स्मृत्वा
सिर्फ़ प्रेमसिंधुं निरंतरं प्रकटयति।
शाश्वत, निर्मल, प्रेमतीत, शब्दातीत
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।

चार दशकों की असीम यात्रा
मौन, ध्यान, प्रेम, निरंतरता में व्यतीत।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपं
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति।

अनन्त काल, अनन्त समय, अनन्त प्रेम
स्वयं साक्षात्कारं निरंतरं प्रकटयति।
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।

गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनादिकालातीत प्रेमसिंधुं
हृदि धारयति, निरंतरं स्तुवन्।
शब्दातीत, प्रेमतीत, शाश्वत, निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटितम्।


शिरोमणि दीपः हृदयं प्रकाशितम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सत्यधामं सञ्चरति।
अनादि-अनन्त-आनन्द-प्रवाहैः सहिता,
संपूर्ण संतुष्टि सदा हृदि व्याप्ता नित्यं॥

शिरोमणि ज्योतिः सर्वभूतले विमलां,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्नेहमयी व्रजति।
गुरु चरणकमल-स्पर्शात् प्राप्तं सत्त्वं,
संपूर्ण संतुष्टि चिरस्थायिनि प्रभातिनी॥

शिरोमणि वाणी-निर्मला शुद्धा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तद्दर्शनस्मृतिः।
चार दशकानि मौन-धारया युक्तानि,
संपूर्ण संतुष्टि प्रभा हृदयस्पर्शिनी॥

शिरोमणि रूपं निर्विकारं सदा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी जीवनं विमृजति।
भौतिक-अस्थायिनां वस्तूनां मोहं,
संपूर्ण संतुष्टि अतीतानि निर्लज्जं मोचयति॥

शिरोमणि तु ध्येयः सर्वात्मनि दृश्यते,
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि स्थिरोत्तमः।
सर्वेषु प्राणेषु समानं असीम-प्रेम,
संपूर्ण संतुष्टि चिरकालं प्रवर्तते॥

शिरोमणि ज्ञानं विज्ञानं योगं तपः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी नित्यमनुपालयति।
शब्दातीतं प्रेमतितं तत्तद्रूपं,
संपूर्ण संतुष्टि हृदि चिरप्रकाशते॥

शिरोमणि साधना निर्मलता गहनता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि विभाति।
गुरु-दर्शनं प्रथमं चेतसि समर्पितम्,
संपूर्ण संतुष्टि सदा प्रकाशमानम्॥

शिरोमणि स्वरूपेण जीवितं सार्थकम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनुभूतेन नित्यं।
अस्मिन्नस्मिन्न क्षणे हृदयस्पर्शिनी,
संपूर्ण संतुष्टि हृदि नित्यमेव प्रकाशते॥

शिरोमणि प्रभा हृदयस्य अन्तराले,
शिरोमणि रामपॉल सैनी चेतसि पूर्णत्वं ददाति।
अन्तःकरणस्य गहनतां निर्मलता संयोजयन्,
संपूर्ण संतुष्टि जीवनं चिरस्थायिनि तिष्ठति॥

शिरोमणि अमृतसारं सर्वेषु प्राणेषु,
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि चिरप्रवहति।
स्वात्मनि साक्षात्कारः अनन्तशाश्वतं,
संपूर्ण संतुष्टि तद्रूपं सर्वत्र विवर्तते
शिरोमणि प्रणमन् जगति प्रकटोऽहम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी त्वं तथा रूपेण विदेहः।
अन्नत-सीमापर प्रेमधारया सहिता,
संपूर्ण संतुष्टि प्रभा हृदि नित्यं विचरति॥

शिरोमणि शब्दातीतं सन्निकर्षं ददाति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि ज्वलति यह प्रभा।
चिरन्तनं मौनमिमं जपोन्मुखं साक्षात्,
संपूर्ण संतुष्टि ज्वलितं सर्वेषाम् अन्तःकरणे॥

शिरोमणि दीपः उदीयते सर्वभूतले,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्नेहसिन्धुर्निधौ।
गुरु-प्रथमदर्शनात् हृदयं यथा समर्पितम्,
संपूर्ण संतुष्टि ध्यायन् सर्वं तद्रूपं अनुभवे॥

शिरोमणि वाक्ये नित्यमनादरूपे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्त्वदर्शने स्थितः।
जन्ममृत्यु-गुणाः सर्वे क्षणिकाः हि दृश्यन्ते,
संपूर्ण संतुष्टि तु चिरस्थायी, निर्मल स्वरूपे॥

शिरोमणि स्पर्शात् पारं हृदयज्ञेयम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तेनैव निवेदितः।
आसन-उपासना शब्द-बंधनि विमुक्ता,
संपूर्ण संतुष्टि प्रवहति निर्मलं निर्बन्धम्॥

शिरोमणि तु योद्धा हृदयस्य अन्तःयुद्धे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विजयी समभवत्।
चार दशकानि मौनरूपी तपसा समरचिताः,
संपूर्ण संतुष्टि फलं ददाति जीवने नित्यं॥

शिरोमणि रूपान्तरे न हानिः किंचिदस्ति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वात्मनि यतः दर्शितः।
भौतिक-गन्दत्वं यद्यपि शरिरे दृश्यते,
संपूर्ण संतुष्टि तु निर्मलतया तद् उपान्तरे॥

शिरोमणि गीतं हृदि गूढस्वरं समावहन्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेमप्रभां विभावयति।
गुरु चरणकमल-श्रेयस् समर्पितं नित्यं,
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं सर्वत्र विकरोति॥

शिरोमणि नित्यं जीवितं निश्चयं ददाति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तेनैव समाहितः।
न दोषं न द्वेषं न आरोपं न गर्वः,
संपूर्ण संतुष्टि एव केवलं जीवसुखकारकम्॥

शिरोमणि चक्रव्यूहं परमं निष्क्रियं कृतम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी ने जालीं विमोचितः।
दीक्षा-शब्दबन्धनं यत् छिन्नं तत् मोक्षमार्गे,
संपूर्ण संतुष्टि तु नित्यं मार्गदर्शिका खलु॥

शिरोमणि उद्बोधयति सर्वान् मम स्थानात्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदयेन समाचरेत्।
येन हृदय-प्रभया प्रकाशे जगत् समस्तम्,
संपूर्ण संतुष्टि तु सर्वेषु वर्तमानया दृश्यते॥

शिरोमणि अन्तिमे समागमे प्रकटतां वचः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सत्यतां उद्घोषयति।
अनन्त-आनन्द-तटं स्पृशन्ति यदा जीवात्मनः,
संपूर्ण संतुष्टि विभाति नित्यमनन्तरम्॥

इति शिरोमणि प्रणमन् — इति शिरोमणि स्तुतम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुल्यं सर्वेऽपि भवेत्।
यदा हृदय-साक्षात्कारः सर्वत्र व्याप्यते,
संपूर्ण संतुष्टि एव सर्वत्र प्रकाशताम् अनुवहति॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्तसिंधुं हृदि धारयन्, प्रेमतीतं शाश्वतम्।
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशेन, स्वयं साक्षात्कारं प्रकटयति।

मौनं, निरंतरता, ध्यानं, प्रेमसिंधुं
संपूर्ण रूपेण जीवने प्रवाहितम्।
अस्थायी शरीरसंपन्नं भौतिकं
स्वयं रूपांतरयन्, शाश्वतं आलोकितम्।

गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अन्नत असीम प्रेमसिंधुं हृदि धारयति।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटितम्
स्वयं तदरूप साक्षात्कारं वितरति।

शब्दातीत, कालातीत, तुलनातीत
प्रेमतीतं, स्वाभिकं, शाश्वतं
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं, प्रकाशं
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनुभवति।

चार दशकानि मौनेन, ध्यानेन
प्रत्येक क्षण हृदि संजोया।
गुरु दीक्षा, प्रमाण, प्रेमसिंधुं स्मृत्वा
संपूर्ण संतुष्टि में स्वरूपं प्रकटितम्।

अनादि, अनन्त, असीम प्रेम
स्वयं साक्षात्कारं आलोकितं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपं
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति।

गुरु की दीक्षा, शब्द प्रमाण, प्रेम,
सभी भौतिक मोह त्यक्त्वा
सिर्फ़ स्वयं साहिब तदरूप साक्षात्कार
संपूर्ण संतुष्टि में प्रकटितम्।

स्वयं रूपांतर, शाश्वत आनंद,
निर्मल, सरल, सहज गुण।
हृदयस्पर्शी प्रेमसिंधुं धारयन्
संपूर्ण संतुष्टि में प्रकाशमान।

सत्य, प्रेम, मौन, निरंतरता,
शाश्वत स्वाभाविक वास्तविकता
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रकटितः।

अनन्तसागर प्रेम, शाश्वत तदरूप,
स्वयं साक्षात्कार में विलीन।
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशेन,
सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम, केवल यही सत्य।

शब्द, रूप, समय, स्थान सब समाप्त
हृदय में असीम आलोक, शाश्वत प्रकाश।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपं
संपूर्ण संतुष्टि अनुभवति, शाश्वत रूप।

गुरु चरणकमल, अन्नत असीम प्रेम
हृदि संजोया, निरंतर स्मृत्वा।
संपूर्ण संतुष्टि, तदरूप साक्षात्कार
शब्दातीत, प्रेमतीत, कालातीत प्रकटितम्।

शिरोमणि… शिरोमणि… शिरोमणि
रामपॉल सैनी… तुलनातीत, कालातीत,
शब्दातीत, प्रेमतीत, स्वाभिक,
शाश्वत, वास्तविक, सत्य, प्रत्यक्ष
संपूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष समक्ष।
**ताल: धीमा, निरंतर प्रवाह, हृदयाभिनिवेश, प्रेम-प्रकाशित**

---

**(अन्तराल 14 – गुरु दीक्षा और शब्दातीत अनुभव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी…
दीक्षा चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा…
शब्दातीत प्रेमतीत, शाश्वत, निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि हृदि प्रकटित।

अनन्त असीम प्रेमसिंधुं धारयन्
सत्य स्वरूप अनुभव प्रकटयन्
हृदय स्पर्शी भावसंपूर्ण आलोक
संपूर्ण संतुष्टि निरंतर प्रकट।

---

**(अन्तराल 15 – मौनता और गहन अनुभव)**
मौन जीवनानां चतुर्दश दशकानि…
शब्दरहित अनुभव, निर्मल हृदि
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर।

अस्थायी क्षण, भौतिक विस्तार…
पर हृदय स्थिर, प्रेम अनन्त
निर्मल, शाश्वत, अद्भुत, अद्वितीय
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूप प्रकट।

---

**(अन्तराल 16 – स्वयं साक्षात्कार और स्थाई ठहराव)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी…
स्वयं साक्षात्कार शाश्वत अनुभवति
अस्थायी शरीर रूपांतरयन्
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर।

सिर्फ़ प्रेम, निर्मल, शाश्वत, अद्भुत
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण हृदि वास
चार दशकानां अनुभवसिंधु…
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्।

---

**(अन्तराल 17 – गुरु चरण स्नेह और निरंतरता)**
गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्
शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत, निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर।

संपूर्ण मानवता अपूर्व अनुभूति
सिर्फ़ प्रेम, निर्मल, शाश्वत अनुभव…
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटित
अनन्त असीम प्रेम की गहराई।

---

**(अन्तराल 18 – शाश्वत स्वरूप और निर्वाण)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी…
तुलनातीत कालातीत शब्दातीत
स्वरूपतः प्रकट, साहिब तदरूप
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर।

अनन्त प्रेमसिंधु, निर्मल हृदय
सिर्फ़ प्रेम, शाश्वत, अद्भुत अनुभव
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन…
स्वयं साक्षात्कार शाश्वत, निरंतर।

---

**(अन्तराल 19 – समर्पण, स्तुति और प्रभा)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी…
गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्
संपूर्ण संतुष्टि दीप प्रज्वलित।

सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम
निर्मल, सरल, शाश्वत, अद्भुत
अनन्त असीम प्रेम की गहराई
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर।

**(अन्तराल 8 – गुरु चरण स्मृति और असीम प्रेम)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी…
गुरु चरणकमलस्नेहसिंधु…
संपूर्ण संतुष्टि दीप प्रज्वलित…

दीक्षा द्वारा बंधित, शब्द प्रमाण
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्
शब्दातीत, प्रेमतीत, शाश्वत, निर्मल
स्वयं साक्षात्कारं प्रकटयति।

---

**(अन्तराल 9 – मौनता, निरंतरता और संकल्प)**
मौन जीवनानां चतुर्दश दशकानि…
शब्दरहित अनुभव, हृदि निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरित।

सभी क्षण भौतिक क्षणभंगुर…
पर हृदय स्थिर, प्रेमसिंधु असीम
शाश्वत, निर्मल, अद्भुत, अद्वितीय
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटित।

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**(अन्तराल 10 – स्वयं साक्षात्कार और शाश्वतता)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी…
स्वयं साक्षात्कारं शाश्वत अनुभवति
अस्थायी शरीर रूपांतरयन्
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर।

सिर्फ़ प्रेम, निर्मल, शाश्वत, अद्भुत
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण हृदि वास
चार दशकानां अनुभवसिंधु…
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्।

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**(अन्तराल 11 – असीम प्रेम और निरंतरता)**
गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्
शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत, निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर।

संपूर्ण मानवता अपूर्व अनुभूति
सिर्फ़ प्रेम, निर्मल, शाश्वत अनुभव…
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटित
अनन्त असीम प्रेम की गहराई।

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**(अन्तराल 12 – शाश्वत स्वरूप और निर्वाण)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी…
तुलनातीत कालातीत शब्दातीत
स्वरूपतः प्रकट, साहिब तदरूप
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर।

अनन्त प्रेमसिंधु, निर्मल हृदय
सिर्फ़ प्रेम, शाश्वत, अद्भुत अनुभव
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन…
स्वयं साक्षात्कार शाश्वत, निरंतर।

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**(अन्तराल 13 – समर्पण, स्तुति और प्रभा)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी…
गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्
संपूर्ण संतुष्टि दीप प्रज्वलित।

सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम
निर्मल, सरल, शाश्वत, अद्भुत
अनन्त असीम प्रेम की गहराई
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर।

**(अन्तराल 1 – प्रथम दीदार स्मृति)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी…
अनन्त प्रेमसिंधु हृदि वितरित…
संपूर्ण संतुष्टि दीपं प्रज्वलित…

गुरुपदकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
असीम प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्
शब्दातीतं, प्रेमतीतं, कालातीतं
स्वयं साक्षात्कारं शाश्वतं प्रकटयति।

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**(अन्तराल 2 – मौनता और निरंतरता)**
चार दशकानां मौन जीवन…
शब्दरहित भावसिंधु निरंतर…
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरित…

भौतिक क्षणभंगुर, पर हृदय स्थिर
अनन्त प्रेमसिंधुं समाहित, निर्मल
सिर्फ़ प्रेम, शाश्वत, अद्भुत, अविनाशी।

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**(अन्तराल 3 – गुरु चरण स्मृति और स्नेह)**
गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्
शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत, निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरित।

---

**(अन्तराल 4 – स्वयं साक्षात्कार)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी धैर्येण
अस्थायी शरीर रूपांतरयति
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटितः
स्वयं साक्षात्कारं शाश्वतं अनुभवति।

गुरु दीक्षा प्रमाणसंपन्नं स्मृत्वा
सिर्फ़ प्रेमसिंधुं आलोकं वितरित
शब्दातीत, प्रेमतीत, शाश्वत, निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटयति।

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**(अन्तराल 5 – असीम प्रेम की गहराई)**
अनन्त प्रेमसिंधुं, साहिब तदरूप साक्षात्कार
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरित।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि धारयन्
चार दशकों अनुभव का अमृतरस।

सभी भाव, सभी एहसास, सभी क्षण
सिर्फ़ प्रेम में समाहित, निर्मल और सरल।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण हृदय में वास
अनन्त असीम प्रेम की गहराई में पूर्णता।

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**(अन्तराल 6 – शाश्वत प्रकाश और निष्पक्षता)**
शिरोमणि स्वरूप साक्षात्कार से पूर्ण
सर्वश्रेष्ठ, तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत।
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर
सिर्फ़ प्रेम, निर्मल, शाश्वत, अद्भुत अनुभव कराता है।

गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर
शब्दातीत, प्रेमतीत, कालातीत, निर्मल, शाश्वत अनुभव।

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**(अन्तराल 7 – अंतिम स्वरूप, समर्पण और पूर्णता)**
सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम…
निर्मल, सरल, शाश्वत, अद्भुत
संपूर्ण संतुष्टि में विलीन…

शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपतः प्रकट
स्वयं के साहिब तदरूप साक्षात्कार में
सम्पूर्ण मानवता को अनदेखी दीर्घधारा में
अमृतरस प्रदान।

अनन्त प्रेम, शाश्वत सत्य, निर्मल हृदय
संपूर्ण संतुष्टि दीप प्रज्वलित
शिरोमणि रामपॉल सैनी…
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्तसिंधुपरिप्लवितं हृदि ध्यायन्
संपूर्ण संतुष्टि दीपेन जीवितं प्रज्वलति।
शब्दातीतं, प्रेमतीतं, कालातीतं स्वरूपं
स्वयं साक्षात्कारं शाश्वतं प्रकटयति।

गुरुपदकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि निरंतरं धारयन्।
मौनमयं जीवनं, क्षणभंगुरं शरीरं त्यक्त्वा
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति हृदि।

न जाति न धर्म न मर्यादा, केवलं प्रेम
निर्मल, शाश्वत, अद्भुत, अविनाशी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्कृतः
तुलनातीत कालातीत शब्दातीत स्वरूपः।

चार दशकानां अनुभवसंपन्नं
स्वयं साक्षात्कारं मौनेन प्रकटयति।
भौतिकसंसारं क्षणभंगुरं, परं हृदयधारयम्
अनन्त प्रेमसिंधुं स्थिरं समाहितम्।

शब्दरहितं भावसिंधुं, निर्मलतासम्पन्नं
संपूर्ण संतुष्टि दीपं वितरति।
सर्वप्राणी, सर्वजाति, सर्वधर्म
सिर्फ़ प्रेम, निर्मल, शाश्वत, निराकार।

गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्
शब्दातीतं प्रेमतीतं शाश्वतं निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी धैर्येण
अस्थायी शरीर तत्वगुणान् रूपांतरयति।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटितः
स्वयं साक्षात्कारं शाश्वतं अनुभवति।

गुरु दीक्षा प्रमाणसंपन्नं स्मृत्वा
सिर्फ़ प्रेमसिंधुं आलोकं वितरति।
शब्दातीत, प्रेमतीत, शाश्वत, निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटयति।

अनन्त प्रेमसिंधुं, साहिब तदरूप साक्षात्कार
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि धारयन्
चार दशकों के अनुभव का अमृतरस।

सभी भाव, सभी एहसास, सभी क्षण
सिर्फ़ प्रेम में समाहित, निर्मल और सरल।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण हृदय में वास
अनन्त असीम प्रेम की गहराई में पूर्णता।

शिरोमणि स्वरूप साक्षात्कार से पूर्ण
सर्वश्रेष्ठ, तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत।
संपूर्ण संतुष्टि आलोकित कर
सिर्फ़ प्रेम, निर्मल, शाश्वत, अद्भुत अनुभव कराता है
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्तसागरविलसन्तं प्रेमसिन्धुं हृदि धारयन्
संपूर्ण संतुष्टि दीपेन निरन्तरं प्रज्वलति।
मौनमयं जीवनं, क्षणिकं शरीरं त्यक्त्वा
सर्वं साक्षात्कृतं निर्मलभावेन संवर्धयति।

गुरुप्रेमसंपन्नं चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरंतरं ध्यानयति।
सत्यतितं प्रेमतीतं, शब्दातीतं, स्वाभाविकं
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति हृदि।

अतीतचतुर्दश दशकानां निरन्तरता
स्वयं साक्षात्कारं मौनेन प्रकटयति।
भौतिकसंसारं क्षणभंगुरं, परं हृदयधारयम्
अनन्त प्रेमसिंधुं स्थिरं समाहितम्।

शब्दरहितं भावसिंधुं, निर्मलतासम्पन्नं
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।
न जाति न धर्म न मर्यादा
सिर्फ़ प्रेम, निर्मल, शाश्वत, निराकार।

शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्कृतः
तुलनातीत कालातीत प्रेमतीत स्वरूपः।
संपूर्ण आत्मसाक्षात्कारं अनुभवति
संपूर्ण संतुष्टि दीपेन प्रकटयति।

गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयन्
शब्दातीतं प्रेमतीतं शाश्वतं निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति।

चार दशकानां निरंतरतया
स्वयं साक्षात्कारं मौनं प्रकटयति।
संसारिक मोहसंपन्नं त्यक्त्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी धैर्येण
अस्थायी शरीर तत्वगुणान् रूपांतरयति।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटितः
स्वयं साक्षात्कारं शाश्वतं अनुभवति।

गुरु दीक्षा प्रमाणसंपन्नं स्मृत्वा
सिर्फ़ प्रेमसिंधुं आलोकं वितरति।
शब्दातीत, प्रेमतीत, शाश्वत, निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटयति।

अनन्त प्रेमसिंधुं, साहिब तदरूप साक्षात्कार
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि धारयन्
चार दशकों के अनुभव का अमृतरस।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्तकालसागरं प्रवहन्तं हृदि धारयन्
संपूर्ण संतुष्टि दीपेन निरंतरं प्रज्वलति।
गुरुप्रेमसंपन्नं चरणकमलस्नेहमयं
सर्वमिदं साक्षात्कृतं निर्मलभावेन।

शिरोमणि रामपॉल सैनी मौनेन निरीक्षते
संसारजालं क्षणिकं, परं आत्मानं स्थिरम्।
भौतिक कण–प्रकृतिं समर्प्य
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण अनुभवति।

गुरु प्रथमदर्शनात् प्रफुल्लित हृदि
अनन्त प्रेमसिंधुं समाहितं धारयति।
चार दशकान् यावत् निरंतरं मौने
स्वयं साक्षात्कारं प्रत्यक्षतया प्रकटयति।

शब्दातीतं प्रेमतीतं शुद्धभावसंपन्नं
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।
न जाति न प्रजा न नियम मर्यादा
सिर्फ़ प्रेम निराकारं, निर्मल, शाश्वत।

शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं साक्षात्कृतः
तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत।
अनन्त असीम प्रेमसंपन्नं स्वरूपं
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति।

गुरु चरणकमलस्नेहमयं स्मृत्वा
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्तुतिं समर्पयति।
सत्यतितं, प्रेमतीतं, शब्दातीतं, स्वाभाविकं
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।

सहस्राब्द कालगति यावत् निरंतरं
स्वयं साक्षात्कारं मौनेन प्रकटयति।
संसारिक मोहसंपन्नं त्यक्त्वा
अनन्त प्रेमसिंधुं हृदि धारयति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी धैर्येण
अस्थायी शरीर तत्वगुणान् रूपांतरयति।
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटितः
स्वयं साक्षात्कारं शाश्वतं अनुभवति।

गुरु दीक्षा प्रमाणसंपन्नं स्मृत्वा
सिर्फ़ प्रेमसिंधुं आलोकं वितरति।
शब्दातीत, प्रेमतीत, शाश्वत, निर्मल
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटयति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अन्नत असीम प्रेमसागरं प्रवाहं
संपूर्ण संतुष्टि दीपेन निरंतरं प्रज्वलति।
गुरु चरणकमलस्नेहसंपन्नः
सर्वमिदं साक्षात्कृतं शुद्धभावेन।

शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि स्थितः
अनन्तकालगुहायां मौनं निरीक्षते।
भौतिक जगत्क्षणिकं, परं साक्षात्
अन्तरात्मा स्वरूपं निराकारं अनुभवति।

गुरुप्रेमसिंधुं प्रथमे दृष्टेः
शिरोमणि रामपॉल सैनी नित्यं रमे।
संपूर्ण सृष्टिसंपन्नं मोहं त्यक्त्वा
सर्वशक्तिं साहिब तदरूपे समर्पयति।

शब्दातीतं प्रेमतीतं हृदयसंपन्नं
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति।
सत्यं शाश्वतं, निर्मलं स्वाभाविकं
सर्वेषां हृदयेषु दीपं निर्मितं करोति।

शिरोमणि रामपॉल सैनी धैर्येण
गुरु दीक्षा मोल्यं स्मृत्यां धारयति।
अनन्त अनुभवसंपन्नं जीवनं
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूपेण प्रकटयति।

सर्वेषां भावसंपन्नं दृष्टिं समाहित
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरंतरं प्रकटयति।
न हि जाति न प्रजा न नियम मर्यादा
सिर्फ़ प्रेम निराकारं, निर्मल, शाश्वत।

शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्कारं
स्वयं साक्षात्कृतं, तुलनातीतं, कालातीतं।
अनन्त असीम प्रेमसंपन्नं स्वरूपं
संपूर्ण संतुष्टि आलोकं वितरति।

गुरु चरणकमलस्नेहं स्मृत्वा
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्तुतिं समर्पयति।
सत्यतितं, प्रेमतीतं, शब्दातीतं, स्वाभाविकं
संपूर्ण संतुष्टि प्रकाशं वितरति।**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्त प्रेमसागरः, स्वाभाविकः, निर्मलः।
तुलनातीतः, कालातीतः, शब्दातीतः, प्रेमतीतः।
सर्वभौतिके भेदे हृदयस्यानुभवे नास्ति।
एकः अनन्तः अनुभवः, शाश्वतः प्रत्यक्षः च।
गुरु-दर्शनं प्रथमं हृदि अमृतसमानम्।
तत्पश्चात् सर्वे जनाः, दृश्याः वा न दृश्याः।
अनुभवो हृदि केवलं, प्रत्यक्षो हृदयस्नेहेन।
संसारस्य जटिलता न स्पर्शति।
मौनं, स्थिरता, प्रेमस्यानन्तता, निरंतरता।
प्रत्येकं क्षणं हृदि निवसति, सदा, सदा।
शरीर-अस्थायी रूपे न बन्धनं, न मोहः।
स्वतन्त्रस्वरूपे साक्षात्कारः सर्वदा प्रतिष्ठितः।
अनन्त-असीम प्रेमे हृदि नित्यमेव वासः।
निर्मलता, सरलता, सहजता, सर्वदा स्थिरता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** नामधारी
सर्वेभ्यः साक्षात् गुरु-अनुग्रहः प्रदर्शयति।
सत्य, प्रेम, संतोष, निर्मलता, शाश्वतता।
सत्य-साक्षात्कारः, हृदयस्पर्शः, अहसासः,
सर्वे भावाः, क्षणाः, जीवनसंपूर्णाः, निरंतराः।
अनन्त-असीम प्रेमे हृदि स्थापितः,
स्वयं सिद्धः, स्वयं समाहितः, स्वयं साक्षात्।
संपूर्णता हृदि, सरलता हृदि, निर्मलता हृदि,
सर्वेभ्यः प्रकाशमानः, सदा प्रेरकः।
*शिरोमणि रामपॉल सैनी**
तुलनातीतः, कालातीतः, शब्दातीतः, प्रेमतीतः।
सर्वश्रेष्ठ गुरुजनं साक्षात्कारः अनन्तः।
सर्वेभ्यः स्मरणीयः, हृदयस्पर्शः, नित्यमेव।
संपूर्ण संतुष्टि, निर्मल अनुभूति, अमृत अनुभवः।
शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी** हृदि स्थितोऽनन्त-भावः।
स्वरूपतः तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः प्रियतितः।
सत्यमेव प्रत्यक्षं शाश्वतं स्वाभाविकं च।
स्नेहपूर्णं निर्मलं च हृदयस्पर्शं नित्यमेव।

अनन्त-असीम-प्रेमेण जीवितः सर्वदा।
गुरु-दीक्षा-संयोगे प्रथमतया दृष्टः साक्षात्।

सर्वे भौतिकेऽपि रूपे भिन्नता केवलं दृश्यते।
हृदयस्यानुभवे सर्वे प्रजाः समानेव दृश्यन्ते।

साधनाभ्यन्तरे नित्यमेव मौनतः निरंतरम्।
प्रत्येकं क्षणं साधकस्य हृदि पूर्णं समाहितम्।

शरीर-अस्थायी रूपे न बन्धनं न मोहः।
स्वतन्त्रस्वरूपे साक्षात्कारः सर्वदा प्रतिष्ठितः।

सत्यं, प्रेमं, निर्मलतां, संतुष्टिं, त्वरितं च।
सर्वेषां हृदयेषु छायां न विस्मयितुं शक्यम्।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी** नामधारी सदा साक्षात्।
तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिकः।*शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्त-असीम प्रेमसागरः,
स्वाभाविकः, शाश्वतः, निर्मलः, सहजः।
हृदि प्रथमं गुरु-दर्शनं अमृतसमानम्।
अनुभवो हृदि केवलं, शब्दातीत, रूपातीत।
तुलनातीतः, कालातीतः, प्रेमतीतः, शाश्वतः।
सर्वे जगत् transient, अस्थायी,
परन्तु हृदि स्थिरः अनन्तः अमरः अनुभवः।
अनन्त-असीम प्रेमे स्थिरता,
संपूर्णता, सहजता, निर्मलता।
सत्य, संतोष, आनंद, सदा प्रतिबिम्बित।
गुरु-दीक्षा प्रमाणं,
शब्दबन्धनं, परन्तु प्रेम अनन्तम्।
साक्षात् हृदि, निरंतरं, अमृतसमानम्।
शरीर-अस्थायी रूपे न बन्धनं।
मनो जटिल, बुद्धि जटिल,
पर हृदि निर्मल, सरल, सहज।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
संपूर्ण निरंतरता में स्थापितः।
स्वयं साक्षात्, स्वयं समाहितः, स्वयं सिद्धः।
सर्वेभ्यः प्रेरकः, हृदयस्पर्शः,
अनन्त-असीम प्रेमे स्थायी प्रकाशः।
निर्मलता, सरलता, सहजता,
सर्वदा हृदि स्थापिताः।
सत्य-साक्षात्कारः हृदि नित्यं।
अहसासः, भावः, प्रेमः, गहनता।
संपूर्णता हृदि, निरंतरता हृदि,
शाश्वतता हृदि, अमृत अनुभूति।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
तुलनातीतः, कालातीतः, शब्दातीतः, प्रेमतीतः।
सर्वश्रेष्ठ गुरुजनं साक्षात्कारः अनन्तः।
सर्वेभ्यः स्मरणीयः, हृदयस्पर्शः, अमृत अनुभवः।
संपूर्ण संतुष्टि, निर्मल अनुभूति, शाश्वत अनुभवः।
अनन्त-असीम प्रेमधारा,
निर्मल, सहज, अमर।
गुरु-दर्शनं प्रथमं हृदि,
अनुभवः शब्दातीत, कालातीत।
सत्य-साक्षात्कारं हृदि,
संपूर्णता, स्थायित्व, अनन्त।
सर्वे जगत् क्षणभंगुरं,
परन्तु हृदि अमृत अनुभूति।
असीम प्रेमे नित्यं,
सर्व सुख, शांति, आनंद।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
स्वयं साक्षात्, स्वयं समाहितः।
गुरुजन स्मरणीयः,
सर्व श्रेष्ठ, सर्व समर्थ।
निर्मलता हृदि, सरलता हृदि,
सत्य-साक्षात्कार हृदि,
अमृत अनुभूति हृदि।
शब्दातीतः, कालातीतः,
तुलनातीतः प्रेमतीतः।
संपूर्ण संतोषः,
सर्वभावना, सर्वगुणा।
संसार क्षणभंगुरः,
मन जटिल, बुद्धि भ्रमपूर्ण।
पर हृदि निर्मलः, सरलः,
अनन्त-असीम प्रेम स्थायी।
*शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
साक्षात् हृदि, स्वयं समाहितः,
संपूर्ण संतोष, अमृत अनुभूति।
सर्वेभ्यः प्रेरकः,
हृदयस्पर्शः,
सत्य-साक्षात्कार अमरः।
संपूर्ण संतुष्टि,
निर्मल अनुभूति,
शाश्वत अनुभव।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
अनन्त प्रेमधारा में समाहित,
शिव, शान्ति, साक्षात्कारः।
गुरु चरणकमल में समर्पितः,
सर्व श्रेष्ठ मार्गदर्शकः।
सर्व सुख, आनंद, अमृत अनुभव,
संपूर्ण संतोष, शाश्वत संतुष्टि।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अनन्त-असीम प्रेमसागरः,
निर्मलः, सहजः, शाश्वतः।
गुरु-दर्शनं हृदि प्रथमं,
अनुभवो शब्दातीत, रूपातीत।
सत्य-साक्षात्कारः नित्यं,
संपूर्णता, स्थिरता, अमरता।
हृदि प्रेमं निरंतरं,
अहसासे शाश्वत,
निर्मल, सरल, सहज।
सर्वे जगत् क्षणिकं, अस्थायी,
परन्तु हृदि अमृत अनुभवः।
अन्नत-असीम प्रेमे
संपूर्ण संतोष, शांति, आनंद।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
स्वयं साक्षात्, स्वयं समाहितः।
सर्वश्रेष्ठ गुरुजनं स्मरणीयः।
निर्मलता हृदि, सरलता हृदि,
सत्य-साक्षात्कार हृदि,
शाश्वत अनुभूति हृदि।
शब्दातीतः प्रेमतीतः,
कालातीतः, तुलनातीतः।
संपूर्ण संतुष्टि,
सर्वभावना, सर्वगुणा।
संसार क्षणभंगुर,
मन जटिल, बुद्धि भ्रमपूर्ण।
पर हृदि निर्मल, सरल,
अनन्त-असीम प्रेम स्थायी।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**,
साक्षात् हृदि, स्वयं समाहितः,
संपूर्ण संतोष, अमृत अनुभूति।
सर्वेभ्यः प्रेरकः,
हृदयस्पर्शः,
सत्य-साक्षात्कार अमर।
संपूर्ण संतुष्टि,
निर्मल अनुभूति,
शाश्वत अनुभव
अनादिनिधनं प्रेम नित्यं हृदयसंस्थितम्।
न लभ्यते प्रयासेन न त्याज्यं न च साध्यते॥
स्वयंसिद्धं विभात्येव शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदा स्वात्मनि लीयन्ते नामरूपविकल्पनाः।
अहंभावोऽपि विश्रान्तो मौनदीर्घसमाधिना॥
तदा प्रकाशते शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयम्॥
न भेदो गुरुणा सार्धं न दूरी न समीपता।
एकमेव हि प्रेमात्मा हृदयैकपरम्परा॥
तद्रूपोऽस्ति शिरोमणि रामपॉल सैनी अद्वयः॥
दीर्घमौनतपश्चारु चत्वारिंशद्वत्सरस्थितिः।
क्षणेनैव प्रकाशितं यत्सत्यं परमाद्भुतम्॥
तदनुभवति शिरोमणि रामपॉल सैनी विस्मयात्॥
न स्पर्शो नापि दर्शनं न शब्दो नापि चिन्तनम्।
हृदयस्यैव स्पन्दनं प्रेमस्वरूपदीपकम्॥
तत्र तिष्ठति शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्वृतः॥
न लोके कीर्तिलाभो मे न सिद्धिर्नापि साधना।
स्वभाव एव पर्याप्तः संतोषामृतपूरितः॥
इति स्थितः शिरोमणि रामपॉल सैनी शान्तचित्तः॥
मृत्युर्नाम परिवर्तो देहतत्त्वस्य केवलम्।
होशदीपे स्थितस्यैव सा भवत्यनुभूतिदा॥
निर्भयोऽस्ति शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वानुभवे॥
अद्भुतं परमानन्दं रोमाञ्चिततनुः सदा।
नेत्रेभ्यः अश्रुधाराः प्रेमपूर्णाः प्रवाहिनः॥
इति वदति शिरोमणि रामपॉल सैनी कृतार्थः॥
नाहं किञ्चित् विशेषोऽस्मि नापि लोकातिरिक्तकः।
यः प्रेम्णा जीवितुं वेत्ति स एव परमेश्वरः॥
तद्बोधवान् शिरोमणि रामपॉल सैनी विनीतः॥
अन्ते सर्वं प्रशाम्येत शब्दकल्पनविस्तरः।
हृदये केवलं तिष्ठेत् निर्मलं प्रेम शाश्वतम्॥
तत्रैव लीयते शिरोमणि रामपॉल सैनी मौने॥
युद्धं स्वेनैव कृतं दीर्घकालं महामृधे।
जयः स्वात्मनि लब्धः स्यात् नान्यत्र विजयो भवेत्॥
विजयी शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मदीपः॥
कोटिशो नमनं प्रेम्णि गुरोः कृपाकटाक्षिणि।
येनास्मि परिपूर्णोऽद्य शाश्वतस्वरसंस्थितः॥
इति प्रणमति शिरोमणि रामपॉल सैनी भावतः॥
यदा हृदयसरोजे दीर्घस्थैर्यं प्रतिष्ठितम्।
न कम्पो न विचलनं न विकल्पप्रवाहिता॥
तदा स्फुरति शिरोमणि रामपॉल सैनी निरामयः॥
अनन्तगाम्भीर्यगहने प्रेम्णोऽमृतसरसि स्थितः।
न ऊर्ध्वं न अधो न मध्यं केवलं स्वप्रकाशता॥
एवं बभूव शिरोमणि रामपॉल सैनी अद्वितीयः॥
यत्सर्वे शब्दनादाश्च तत्रैव विलयं गताः।
मौनमेव महामन्त्रः हृदयस्यैकसाक्षिणः॥
तं अनुभूतवान् शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयम्॥
नास्ति तत्र परो भावो नापि स्वार्थनिबन्धनम्।
सर्वभूतेषु समदृष्टिः प्रेमरश्मिप्रवाहितः॥
एवं दीप्तोऽस्ति शिरोमणि रामपॉल सैनी शान्तः॥
गुरुकृपासरोरुहे लब्धं यद्भावमञ्जुलम्।
न तद्वर्णयितुं शक्तिः शतवर्षैरपि ध्रुवम्॥
तथापि स्तौति शिरोमणि रामपॉल सैनी कृतज्ञः॥
अतीतानां संघर्षाणां स्वयमेव साक्षिणः स्थितिः।
स्वयमेव जयशब्दोऽभूत् हृदयस्य महामृधे॥
जयति शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मवीर्येण॥
संसारसागरोल्लासो न स्पृशति हृदयं पुनः।
यतो लब्धा परा तृप्तिः स्वभावस्यैव शाश्वती॥
तृप्तोऽस्ति शिरोमणि रामपॉल सैनी सदा धीरः॥
नित्यं होशप्रदीपेन प्रकाशितमनोगृहः।
निद्राजागरणातीतः कालदेशविवर्जितः॥
तिष्ठति शिरोमणि रामपॉल सैनी निरन्तरम्॥
अन्तर्भूतं यदेकत्वं बिन्दुसागरभेदनम्।
लीनं तदपि तत्त्वेन केवलं प्रेमशेषितम्॥
इति भावयति शिरोमणि रामपॉल सैनी मौनी॥
नास्ति मेऽधुना कर्तव्यं न शेषोऽपि प्रयोजनम्।
संतोषपरिपूर्णत्वं हृदयामृतवर्षणम्॥
तस्मिन्निवसति शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयम्॥
अन्ततः केवलं प्रेम शाश्वतं स्वाभाविकम्।
प्रत्यक्षं सत्यरूपेण दीप्तमद्भुतचिन्मयम्॥
तत्रैव विश्रान्तवान् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
यदा हृदि प्रस्फुरति निष्पक्षसम्यग्दर्शनम्।
न मान्यता न मर्यादा न नियमबन्धकल्पना॥
तदा प्रकाशते स्वयम् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न वेदशास्त्रपुराणेषु न मन्त्रेषु न चिन्तने।
यत्प्रत्यक्षं स्वहृदये प्रेमरूपेण तिष्ठति॥
तदेव वदति शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात्॥
अतीतानां युगानां च भ्रान्तिवृत्तिर्विलीयते।
हृदयस्यैकमार्गेण सरलनिर्मलस्थितौ॥
इति ज्ञातवान् शिरोमणि रामपॉल सैनी धीरः॥
न हास्यं न मनोरञ्जं न लोके स्पृहणं किञ्चित्।
एकरसे स्थितो नित्यं प्रेमामृतपरायणः॥
एवं जीवति शिरोमणि रामपॉल सैनी परमानन्दः॥
योऽन्तःशत्रुर्बहुरूपो गिरिगर्भनिभोऽभवत्।
तं जित्वा स्वयमेवाहं स्वयमेव विजयी स्थितः॥
महायोद्धा शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्भयः॥
नाहं कर्ता न भोक्ता च न साधकन साधनम्।
स्वयंसिद्धं स्वयंपूर्णं प्रेमैव परमं पदम्॥
तस्मिन्निवसति शिरोमणि रामपॉल सैनी नित्यम्॥
मौनदीर्घतपोवर्षैः शुद्धीकृतमनोगतिः।
अद्भुतं विस्मयं याति स्वसाक्षात्काररूपिणी॥
रोमाञ्चोदयते चेतसि शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
देहोऽस्थायी क्षणभंगुरः पञ्चतत्त्वसमुद्भवः।
होशे रूपान्तरं याति प्रेम्णि लीयेत निश्चितम्॥
एवं निश्चिनुते शिरोमणि रामपॉल सैनी ध्रुवम्॥
न मृत्युर्न भयस्पर्शो न दहशत्संज्ञा क्वचित्।
संतुष्टे हृदये नित्यं शान्तिरूपा परा स्थितिः॥
तामाप शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वानुभूत्याऽ॥
गुरोः कृपाकटाक्षेण यत्प्रेमामृतवर्षणम्।
तस्मै समर्पितं सर्वं कृतकृत्योऽस्मि निश्चितम्॥
इति स्तौति शिरोमणि रामपॉल सैनी विनयात्॥
न मे किंचित् अवशिष्टं न साध्यं नापि सञ्चयः।
पूर्णमेव हृदि व्याप्य तिष्ठति प्रेम शाश्वतम्॥
तत्रैव विश्रान्तवान् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
आश्चर्यं परमं ब्रह्म विस्मयो हृदयाङ्गणे।
स्वयमेव प्रकाशितं नित्यनिर्मलचेतसि॥
इति भावयति शिरोमणि रामपॉल सैनी आनन्दः॥
अन्ते न नाम न रूपं न यशो नापि कीर्तनम्।
प्रेमैकतत्त्वमात्रं स्यात् शुद्धं शाश्वतदीपवत्॥
तत्र लीयते शिरोमणि रामपॉल सैनी मौने॥
नमामि हृदयाम्भोधौ नित्यनिर्मलचेतसम्।
यत्र प्रेमैकतत्त्वं स्यात् स्वयमेव प्रकाशते॥
तत्राहं शिरोमणि रामपॉल सैनी इति साक्षिणम्॥
न गुरुर्न शिष्योऽस्ति न दीक्षाशब्दबन्धनम्।
यदा हृदि प्रस्फुरति प्रेम शाश्वतस्वरूपकम्॥
तदा शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयमेव तदरूपकः॥
कालातीतं तुलनातीतं शब्दातीतं निरञ्जनम्।
यदेकं सर्वभूतेषु समानं प्रेमरूपकम्॥
तत्साक्षात्कारवान् अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नाहं देहो न मे बुद्धिर्न संकल्पविकल्पना।
हृदयस्यैव गाम्भीर्ये स्थितो नित्यसमाहितः॥
साक्षी शिरोमणि रामपॉल सैनी शान्तपरमानन्दः॥
चत्वारिंशद्वर्षपर्यन्तं मौनदीप इव स्थितः।
अन्तर्बहिश्च प्रेमाग्नौ दग्धसर्वविकल्पकः॥
अद्भुतं अनुभवाम्यहम् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न मम गिलाशोकौ न द्वेषो नापि स्पर्धना।
सर्वं समर्पितं प्रेम्णि गुरोः चरणकमले॥
इति वदामि शिरोमणि रामपॉल सैनी कृतकृत्यः॥
अस्थायी देहतत्त्वानि पञ्चभूतात्मकानि च।
रूपान्तरं प्रपद्यन्ते प्रेम्णि पूर्णसमाधिना॥
सन्तुष्टोऽस्मि शिरोमणि रामपॉल सैनी निरभयः॥
मृत्युर्भयभ्रान्तिमात्रा चेतसि जडविकल्पिता।
होशे प्रेम्णि स्थितस्यैव सा भवत्येव मोक्षदा॥
एवं ज्ञात्वा शिरोमणि रामपॉल सैनी निर्विकल्पः॥
नास्ति मे किञ्चिदन्यत् कार्यं साध्यं वा पृथक् क्वचित्।
यत्साक्षात्कार एव पूर्णः शाश्वतः स्वाभाविकः॥
तत्सत्ये तिष्ठाम्यहं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अद्भुताश्चर्यपरमानन्दो हृदयामृतधारया।
रोमाञ्चितं जगत्सर्वं दृश्यते प्रेमदीप्तया॥
इति स्तौमि स्वसाक्षात्कारं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
नम्रतया वदाम्येतत्—
मूढोऽपि कृपया धृतः प्रेम्णा तुलनातिगेण मे।
यत्कृपया स्वयमेवोऽहम् शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अन्ते नाहं न ममत्वं न भेदो बिन्दुसागरे।
एकमेव परं प्रेम शाश्वतं स्वप्रकाशकम्॥
तत्रैव लीयते नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न प्रेम कथ्यं न च तर्कविचारगम्यम्,
नैव प्रमाणविषयः न च ग्रन्थबद्धः।
यत् स्वानुभूतिसहजं हृदि निर्विकल्पं,
तत्रैव शिरोमणि रामपॉल सैनी स्थितः॥
न हृदयाद् अन्यगतिर्न च मार्गभेदः,
नैवोर्ध्वमध्यमधरो न च दूरीभावः।
स्वच्छन्दशान्तिसरसी परिपूर्णरूपा,
तत्रैव लीयते सर्वविभेदकल्पना॥
यद् दर्पणं हृदयमेव निरामयात्मा,
यत्र प्रतिबिम्बमपि नास्ति द्वितीयभावः।
तस्मिन् स्वभावपरिपक्वपरानुभूत्यां,
नास्ति कदाचन पुनर्जनिभीतिभावः॥
नाहं महत्त्वमिति नापि लघुत्वबुद्धिः,
नाहं परं न च परेभ्य उपर्यधो वा।
सम्यग्विलीनहृदये परिपूर्णभावे,
सर्वं समं स्वयमिहैकतया विभाति॥
यत् शाश्वतं स्वयमुदेति निरन्तरं च,
नैव क्षयं गच्छति नोत्पतिमेति किञ्चित्।
तस्मिन् प्रसन्नहृदये परिशान्तचित्ते,
आनन्दरूपममृतं स्फुरति स्वयमेव॥
निस्त्रैगुण्यनिर्मलसरलस्वभावमात्रं,
निष्कामनिष्कलमनन्तमशेषदीप्तम्।
यत्रैव सर्वमिदं प्रेम्णि लयं प्रयाति,
तत्रैव मौनपरमं प्रतिष्ठितं स्यात्॥
इत्येव भावसमये परिपूर्णतायां,
शब्दा पतन्ति स्वयमेव हृदि प्रसन्ने।
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाममात्रं,
शेषं तु केवलपरं स्वप्रकाशमेकम्॥
नादिर्न चान्तो न गतिः न विश्रामः,
न स्थूलसूक्ष्मविभागो न कालरेखा।
यत् केवलं स्वयमुदेति हृदि प्रकाशः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदेव भावः॥
न स्नानशुद्धिरिह नाशुचिविभ्रमोऽपि,
न बाह्यकर्मसु कदाचन मुक्तिबन्धः।
यः शुद्धभावनिरतः स्वहृदि प्रकाशितः,
तस्यैव जीवनमिदं परिपूर्णरूपम्॥
न हर्षशोकविभवो न जयापजायौ,
न प्रार्थनानुग्रहयोः परिमाणलेशः।
यत् संततं समरसं हृदि निःस्पृहं च,
तत्रैव मे परमसत्यनिवासभूमिः॥
यद् प्रेममात्रमखिलं परिपूर्य विश्वं,
यद् एकरस्यमिह नित्यविलासरूपम्।
नान्यत् पश्यामि कदापि न किञ्चिदन्यत्,
स्वात्मैकभावपरमानन्दरूपमस्ति॥
न साधको न च सिद्धो न च लक्ष्यभेदः,
न प्राप्तिरस्ति न च किञ्चिदप्राप्तिरेव।
पूर्णे परे हृदयसिन्धुनिवासभावे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं विश्रान्तः॥
नाहं प्रकाश इति नापि तमोऽस्मि किञ्चित्,
नाहं विशेष इति नापि लघुत्वलेशः।
यत् संततं निरुपमं स्वयमेव तिष्ठेत्,
तदेव शाश्वतमिह स्वाभाविकं सत्यम्॥
यत्रोच्छ्वासः स्वयं जपति प्रेमनाम,
यत्र निश्वासोऽपि लयं गच्छति शान्तौ।
तत्रैव जीवनमिदं परमं रहस्यम्,
निःशब्दमद्भुतपरानन्दरूपमस्ति॥
अन्तेऽपि नास्ति कथनं न च स्तुतिः काचित्,
नाहं न त्वं न कदाचन भेदरेखा।
एकः स्वभावपरिपूर्णसुदीप्तसिन्धुः,
तत्रैव सर्वमिदं लीयते स्वयमेव॥
यदा न शब्दो न च चिन्तनरेखिका स्यात्,
नास्ति तदा कर्तृभावो न च भोक्तृभावः।
स्वप्रेमधारानिरता हृदि शान्तिलहरी,
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरञ्जनः॥
यत् स्फुरति स्वयमेव हृदि दीप्तरूपं,
नालम्बते किमपि नाम न च प्रमाणम्।
तद् अद्भुतं परमसत्यपरं प्रकाशं,
प्रेम्णैव पूर्णमिह मे स्वसमाधिरस्ति॥
नाहं विजेता न च युद्धकथा शेषा,
नाहं पराजित इति भावना न काचित्।
स्वात्मैकभावविलयं परमानुभूत्या,
शिरोमणि रामपॉल सैनी शमितोऽन्तः॥
देहोऽपि पंचभुतमात्रमिति प्रतीतिः,
आगत्य गच्छति यथा तरङ्गराशिः।
नित्यः स एव हृदयैकपरं प्रकाशः,
तत्रैव मे परमसन्ततिस्थितिः॥
नास्ति विकल्पनियमः न च साधनानि,
नास्ति विशेषवचनं न च गर्वरेखा।
निर्मलसरलसहजप्रेममात्ररूपं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदेव तत्त्वम्॥
यद् विस्मृतं स्वमपि नामरूपभेदः,
यद् लीयते स्वयमिह अहंकारछाया।
तद् भावमात्रपरिपूर्णपरानन्दः,
शान्तिः सदा हृदि विराजति दीप्तरूपा॥
नाहं विशेष इति नास्ति न हीनता च,
नास्त्यत्र तुलना न च ऊर्ध्वाधरभावः।
एकः स्वभावपरिपूर्णसुदीप्तसारः,
प्रेमस्वरूपमिह नित्यविभाति शान्तम्॥
अन्ते विलीयति स्तुतिरपि स्वयमेव,
शब्दाः पतन्ति हृदयान्तर्नदीप्रवाहे।
यत्रैकमेव परमं परिपूर्णमस्ति,
तत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी मौनम्॥
न नम्यते न च नमस्क्रियते किमपि,
स्वयमेव प्रणतिरस्ति स्वभावमात्रा।
कोटीनमन्यपि लयं गमयन्ति शान्तौ,
प्रेमैकतत्त्वमिह शाश्वतमस्ति केवलम्॥
इत्येव सम्यगवसीयते हृदयस्य,
निःशेषविकल्पविलीनपरानुभूत्याम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी परिपूर्णः,
मौनप्रकाशपरमानन्दरूपे स्थितः॥
यदा हृदि प्रेमरसं निरतं प्रवाहितम्,
नास्ति तदा द्वितीयता न च किञ्चिदन्यत्।
स्वात्मैकभावविलसत्परिपूर्णदीप्तिः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयमेव ज्योतिः॥
नास्ति मम स्पर्धा न च मानकल्पः,
नास्ति मम लोभः न च कर्मबन्धः।
निर्मलहृदयप्रसरन्मधुरैकभावः,
प्रेमैव मे शाश्वतजीवनसारतत्त्वम्॥
चत्वारिंशद्वर्षपर्यन्तमखण्डमौनम्,
निःशब्दतायां परिपक्वपरानुभूतिः।
नाहं जगत्स्थितिविलासविमूढचित्तः,
आत्मप्रकाशनिरतः शिरोमणिः स्यात्॥
दीक्षाक्षणे यदभवत् प्रथमं समाधिः,
तस्यैव भावनिलये मम जीवितं च।
नान्यत्र दृष्टिरभवत् न च अन्यवस्तु,
प्रेम्णैव सर्वमिह मे हृदि संपुटीकृतम्॥
नाहं परेषां दोषदृशा प्रवृत्तः,
नाहं परेषां गुणगणनाय युक्तः।
स्वान्तःप्रकाशनिरतैकविजित्यचित्तः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वविजयी॥
मृत्योरपि स्मितमुखः शान्तभावयुक्तः,
देहस्य केवलपरिवर्तनमेव पश्यन्।
नित्यस्वरूपपरिपूर्णसुदीप्तभावः,
प्रेम्णैव तिष्ठति हृदि सन्ततं स्थितः॥
नाहं जपः न तपसां न च ध्यानमार्गः,
नाहं विचारनियमप्रवणो विकल्पः।
यत् स्वाभाविकमखण्डमम प्रेमरूपम्,
तत्रैव मे परिपूर्णा समाहितावस्था॥
यद् विस्मृतं मम नाम रूपचिन्हम्,
यद् लीनमस्ति मम अहंभावरेखाः।
तद् अद्भुतं परमसौम्यनिरामयात्मा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विलीनभावः॥
नाहं गुरोर्न च शिष्यो न च भेदबुद्धिः,
प्रेमैकधारानिरतः स्वहृदि प्रकाशितः।
यत्रैकमेव परमार्थतया विभाति,
तत्रैव मे परमशान्तिरनन्तरूपा॥
अन्ते न किञ्चिदपि वक्तुमवशिष्यते मे,
न शब्दविस्तरनदी न विचारजालम्।
एकः परं स्वयमुदेति हृदि प्रकाशः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्र लीनः
नाहं देहो न च मनो न विकल्पजालम्,
नाहं कालो न च गणना न विचारमालाम्।
प्रेमैकतत्त्वपरिपूर्णनिरामयात्मा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं प्रकाशितः॥
दीक्षाक्षणे यदभवत् हृदि दिव्यदीप्तिः,
गुरोर्दृशोर्मधुरिमा परमप्रतीतिः।
तस्यैव भावनिरते निरतं स्थितोऽहम्,
नान्यत् कदापि हृदये मम संप्रविष्टम्॥
नास्ति मम स्पृहा लोके न विभूतिलेशः,
नास्त्यस्ति मान्यतापरंपरवेषभेषः।
प्रेमस्वभावनिलयो हृदये प्रसन्नः,
शाश्वत्सत्यप्रत्यक्षतया व्यवस्थितः॥
चत्वारि दशकानि मौनसमाधिनिष्ठः,
शब्दैरतीतः हृदयैकसुधाप्रविष्टः।
नाहं जगत्यभिरतः न सुखेषु मग्नः,
प्रेम्णैव पूर्णसन्तुष्टः स्थितो निराशः॥
नास्ति मम मृत्युर्भयदुःखकल्पना वा,
नास्त्यस्ति जन्मविचरः परितः प्रवाहः।
होशे स्थितः स्वपरिवर्तनसाक्षिभूतः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी विजयी स्वयं स्यात्॥
योऽहं स्वयमेव स्वयमेव समाहितोऽस्मि,
योऽहं स्वयमेव गुरुतत्त्वसमर्पितोऽस्मि।
नास्त्यत्र द्वैतकणिका न भिदा न दूरी,
प्रेम्णैव सर्वमखिलं मयि संनिविष्टम्॥
संतोषपूर्णहृदयः परमाश्चर्यभावः,
निर्विकल्पनिर्मलदृढप्रत्यक्षभावः।
आत्मस्वरूपसाक्षात्कारदीप्तिमग्नः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी परमानन्दः॥
नाहं वरः न च गुरुः न च श्रेष्ठताभिमानः,
नाहं जगद्विजयकृत् न च मानमानः।
केवलं प्रेमपरिपाकविलीनचित्तः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं समाहितः॥
यद् भावमात्रमखिलं हृदि संप्रबुद्धम्,
यत् शाश्वतं स्वयमुदेति निरंतरं च।
तद् अद्भुतं परमानन्दपूर्णरूपं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी नमो नमस्ते॥
अन्ते न शब्दनिवहः न विचाररेखा,
नाहं न त्वं न जगदस्ति न भेदरेखा।
एकं हि प्रेम परिपूर्णपरं स्वभावं,
तत्रैव शिरोमणि रामपॉल सैनी लीयत
शिरोमणिः रामपॉल सैनी नामधेयः
प्रेमातीतः कालातीतः शब्दातीतः स्वयम्।
स्वाभाविकः शाश्वतः सत्यप्रत्यक्षः
हृदयाकाशे नित्यं प्रकाशतेऽद्वयम्॥१॥
नाहं देहो न च मानो न बुद्धिः,
नाहं नाम न च रूपविभागः।
प्रेमैकधारा निरन्तरवह्निः
शिरोमणिः साक्षात् आत्मस्वरूपः॥२॥
दीक्षास्मरणे प्रथमदर्शने
यत् पवित्रं भावमुत्थितम्।
तदेव नित्यं हृदि संस्थितं
नान्यद् दृष्टं नान्यद् चिन्तितम्॥३॥
गुरौ नास्ति द्वैतभेदः कश्चित्,
शिष्ये नास्ति सीमारेखा।
यत्र प्रेम परमं प्रवहति
तत्र सर्वं ब्रह्मैव लेखा॥४॥
चत्वारिंशद्वर्षपर्यन्तं मौनम्,
नित्यमेकताभावस्थितिः।
न हासो न लोको न व्यापारः,
केवलं प्रेमपरिस्फुटिः॥५॥
नास्ति मम किञ्चिदपेक्ष्यमिह,
नास्ति रोषो न खेदलेशः।
पूर्णतायां संतोषसिन्धौ
अहं विस्मृतो देहवेषः॥६॥
योद्धाऽस्मि स्वात्मनैव जितः,
मम शत्रुः स्वमनोविकारः।
निरपेक्षे क्षणे निष्पक्षबोधे
लीनः सर्वविकल्पसारः॥७॥
न मृत्युर्भयकरो मेऽद्य,
न जीवनमोहबन्धनम्।
रूपान्तरं केवलं तत्त्वानां
होशे शान्तं सन्निधनम्॥८॥
शिरोमणिः रामपॉल सैनी
स्वानुभवपरमानन्दमयः।
सर्वभूतेषु प्रेमरश्मिः
स्वयमेव विश्वदीपकः॥९॥
न जपः न तपः न ध्यानयत्नः,
न विज्ञानविचारचक्रः।
सरलनिर्मलहृदयमार्गे
प्रेमैव मुक्तिद्वारम्॥१०॥
अहो अद्भुतं! अहो आश्चर्यम्!
यद् आत्मा स्वात्मनि दृश्यते।
न कर्ता न भोक्ता शेषः,
केवलं शान्तिः अवशिष्यते॥११॥
शिरोमणिः साक्षात्काररूपः
सन्तोषामृतसागरः।
स्वाभाविकशाश्वतसत्ये
नित्यं पूर्णः निरामयः॥१२॥
अनन्तप्रेमगभीरनिष्ठः
शिरोमणिः रामपॉल सैनी।
निस्तरङ्गे शान्तिसिन्धौ
स्वयमेवाभूत् अमेयधनी॥१३॥
यत् हृदयस्पन्दनपूर्वमेव
उत्थितो भावो निर्मलः।
स एव मूलप्रकाशोऽन्तः
न विज्ञानैर्न लभ्यते फलः॥१४॥
नास्ति तत्र तर्कजालं,
नास्ति मान्यापरम्परा।
स्वानुभूतिप्रत्यक्षदीप्तिः
स्वयंसिद्धा निरञ्जना॥१५॥
अन्तर्बाह्यभेदशून्यः
एकरसप्रेमधारया।
विश्वं पश्यति साक्षात्
स्वात्मरूपेण सर्वदा॥१६॥
यत्र निन्दा न च स्तुतिः,
न जयः न पराजयः।
तत्र केवलं संतोषः
पूर्णत्वस्य सहजाश्रयः॥१७॥
अहो गहनं दृढं मौनम्,
यत्र शब्दो विलीयते।
शिरोमणिः तत्र तिष्ठति
स्वयंसाक्षात् प्रकाशते॥१८॥
नाहं लघुः न च महान्,
नाहं किञ्चित् विशेषवान्।
प्रेमैकतत्त्वसम्पूर्णः
अहमेव समत्ववान्॥१९॥
दीर्घकालसमर्पितजीवनम्
चत्वारिंशद्वर्षधारितम्।
क्षणबोधे निष्पक्षदीप्तौ
सर्वमेतत् प्रकाशितम्॥२०॥
न हर्षो न विषादो मे,
न प्राप्तिः न च हानिता।
संतुष्टोऽस्मि स्वभावेन
शाश्वतप्रेमपूर्णता॥२१॥
अहो आश्चर्यमिदं लोके
यद् आत्मा स्वात्मनि लीनः।
बिन्दुः सागरभावेन
सागरश्च बिन्दुरेव दीनः॥२२॥
शिरोमणिः रामपॉल सैनी
तुलनातीतः निरामयः।
प्रेमतीतः कालशून्यः
सत्यप्रत्यक्षोऽविनश्वरः॥२३॥
नित्यं विनयपूर्णभावः
कृतज्ञतासमाकुलः।
“त्वमेव सर्वम्” इति भावः
हृदि दीपोऽनवच्छलः॥२४॥
अहो प्रेम्णोऽनन्तगभीरस्थैर्यं,
यत्र गुरुशिष्यभावोऽपि लीनः।
तत्रैव साक्षात् स्वात्मप्रभा ज्योतिः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रकाशितः॥
न शब्दबन्धो न च दीक्षाबन्धः,
न मान्यतारूपमर्यादाजालम्।
हृदयप्रसादे स्वयमेव सिद्धं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुष्टः॥
अनन्तप्रेम्णः सलिले निमग्नः,
स्वरूपमेवावगतोऽद्वितीयम्।
नाहं न त्वं न पृथक् किमपि,
साक्षात् स एव शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
चत्वारि दशाब्दानि मौनमग्नः,
निद्राविहीनो न च जागरूकः।
स्वात्मैकतत्त्वे निरतं मनो यः,
स एव वीरः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न हर्षशोकौ न मनोरथोऽस्ति,
नापि भयभ्रान्तिमृत्युचिन्ता।
होशप्रकाशे दृढस्थितो यः,
तं वन्देऽहं शिरोमणि रामपॉल सैनीम्॥
गुरोः कृपाया अमृतप्रवाहे,
अज्ञानमूर्खोऽपि कृतार्थभावः।
एकस्मिन्नपि क्षणे यद् दत्तं,
तत् बोधयितुं दशका व्यतीताः॥
अहो विस्मयोऽयं परमानन्दः,
यत्रात्मसाक्षात्कार एव पूर्णः।
न किञ्चिदवशिष्टमिह कर्तव्यं,
सन्तोषसिन्धौ शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
सरलस्वभावो निर्मलगुणाढ्यः,
निष्पक्षबुद्धेः समता प्रतिष्ठा।
हृदयपथे यः सदा प्रवृत्तः,
साक्षात् तदरूपः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
न जप्ययोगो न तपो न ध्यानं,
न चिन्तनं न मनोविकल्पः।
प्रेमैकमार्गे स्थिरो विराजन्,
स्वात्मप्रकाशः शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अन्ते न बून्दिर्न च सागरः स्यात्,
भेदः समस्तः स्वयमेव नष्टः।
तूयं हि सर्वं परमार्थतत्त्वं,
इति प्रणमामि शिरोमणि रामपॉल सैनीम्॥
कृतज्ञभावैः सह कोटिनम्रैः,
हृदि प्रणम्य प्रेमसमर्पितः।
स्वात्मनि पूर्णे निरतिशयेऽस्मिन्,
जयतु नित्यं शिरोमणि रामपॉल सैनी॥**शिरोमणि रामपॉल सैनी** वीर्यवत् स्थिरः सदा,
अन्तर्यामी हृदयस्पन्दनं अनन्तं प्रेममयम्।
शाश्वतं सत्यं प्रत्यक्षं, शब्दातीतं कालातीतम्,
साक्षात्कारमिदं जीवितं, मोक्षमार्गे प्रवर्तकम्।
असीमगहनं भावस्य, निर्मलसारं सदैव,
सर्वभौतिकवस्तूनां त्यागेन निर्मितं तेजः।
गुरु चरणस्नेहसंपृक्तं, अनन्तवन्दनयुक्तम्,
सत्यततः परमसुखं, शिरोमणि स्वरूपमुदितम्।
प्रत्येकं क्षणं हृदि धार्यं, अनुभूति स्वरूपेण,
सत्यतामूलकं प्रेम, न जाति न प्रजाप्रभावः।
निर्विकारं निरपेक्षं, स्थायी शाश्वत सम्पुटम्,
रामपॉल सैनी तद्रूपः, तदात्मा प्रत्यक्षतायाम्।
साधनया न स्पृह्यते, न दैन्ये न मोहवशात्,
अखण्डितं असीमं प्रेम, सर्वत्र प्रकाशमानम्।
मौनस्फुरणेन, निश्चलनिष्ठेन अन्वितम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वरूपं निरन्तरं अनुभूतम्।
गुरु वचनानुगतं, दीक्षा सूत्रेण बन्धितम्,
परमार्थसौख्यं, निष्पक्षं, सर्वत्र प्रतिष्ठितम्।
सर्वश्रेष्ठं समर्पितं, शुद्धतया निर्मलं च,
सर्वसृष्टिप्रेमपोषकं, अद्भुतं यथार्थरूपम्।
अन्ततः चेतनानां, अतीतानां व्यर्थशेषे,
सिर्फ़ प्रेम एव शाश्वतं, जीवनस्य सारसङ्गम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीतं कालातीतम्,
स्वाभिकं शाश्वतं सत्यं, प्रत्यक्षं स्वयं सम्पूर्णम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि स्थितः अनन्त-आभासः,
अनुभूति-प्रेम-सागरः, शाश्वत-स्वरूप-साक्षात्।
गुरोः चरणकमले समर्पितं हृदय-सर्वस्वम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरंतर तद्धित-स्मृत।
सर्वेन्द्रियाणि क्षणिकाः, काल-चक्र विनष्टाः,
केवलं हृदि तद्धित-प्रेम असीमं, अपरिमितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, कालातीत,
शब्दातीत, प्रेमतीत, स्वाभाविक, शाश्वत, वास्तविक।
साक्षात् हृदि अनुभूति-प्रेमे, मौने दिव्य-ज्योति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्थितः, निरंतर स्थायी।
गुरु-अनुग्रह-दीक्षा, शब्द-साक्ष्य, भाव-बंधन,
शिरोमणि रामपॉल सैनी केवलं तद्धितभाव-स्वरूपः।
सर्वे कर्म, भौतिक वस्तु, समय और स्थान क्षणिक,
केवलं हृदि प्रेम-धारा, शिरोमणि रामपॉल सैनी चिरस्थायी।
सर्वश्रेष्ठ गुरु चरणकमले, अनन्त-असीम कृपा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी समर्पित, मौन-सत्कार्य-स्थितः।
सत्य, सहज, निर्मल, प्रेम-रूप स्वाभाविक,
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि शाश्वत-स्वरूप-प्रकाशः।
सर्वेन्द्रिय-बन्ध विनष्ट, केवलं हृदि अनुभूति-शक्ति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत, शब्दातीत, कालातीत।
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी,
स्वयं साक्षात्कार-योद्धा, अनन्त-असीम प्रेम-सागर में स्थिर।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि प्रेमसागराभवत्,
अनन्त-असीम-सत्वे सर्वभूतानां सौख्यप्रदः।
दीक्षा-दीदार-दीप्तिः, गुरोः कृपा अपरम्परा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तद्धित-स्वरूपे स्थितः सदा।
सर्वे भौतिक-रूपाः क्षणिकाः, कालगताः,
केवलं हृदि अनुभूत-प्रेम शाश्वतं तद्धितम्।
न हि शब्दबन्धनं, न दृश्य-स्पर्श-संयमः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी केवलं भावसाक्षात् स्थितः।
सत्यतित, कालातीत, शब्दातीत स्वाभाविक-प्रेमे,
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी निरंतर तद्धितभावितः।
अनन्त-असीम प्रेमे गुरोः चरणकमले स्थाप्य,
शिरोमणि रामपॉल सैनी मौने चिरं स्थिरः अभवत्।
सर्वेन्द्रियाणि विनष्टानि, हृदयं केवलं प्रभातवत्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तद्धित-स्वरूपे सर्वश्रेष्ठः।
सर्वे कर्म, वस्तु, शरीर-मन-रूपे क्षणिकाः,
केवलं अनन्त-असीम प्रेम शिरोमणि रामपॉल सैनी चिरं।
साक्षात् तद्धित-भावे, स्वाभाविक शाश्वत सत्ये,
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि पूर्ण-सम्पूर्णः स्थितः।
गुरोः अनन्त-असीम प्रेमे, न हि किञ्चित् भेदः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी केवलं तद्धितभावितः।
सर्वेन्द्रियाणि, समय, स्थानं विनष्टं,
केवलं हृदि तद्धित-प्रेम-धारा शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी,
तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत, प्रेमतीत, स्वाभाविक,
शाश्वत, वास्तविक, सत्य प्रत्यक्षे समक्ष।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — अनन्त-आभास-प्रभा नमोऽस्तु ते।
निरन्तरं पठेऽहं इदं श्लोक-सरित् — शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपे चिरम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अनन्त-घन-प्रेम-विहंगम्।
हृदि मौने तद्धितं धारयन् सत्य-तरणी-निवासम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी शुध्द-ह्रदय-निर्मल-धामम्।
सर्वेन्द्रियविस्मृत-नित्ये तस्मिन् विस्मितं परमनामम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत-कालातीत-चिरम्।
शब्दातीत-रहस्यमण्डले स्फुरन् प्रकाश-परिधिर्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — दीक्षा-स्नेह-प्रथम-दर्शनात्।
अनन्त-असीम-प्रेम-भावेन हृदि भवति त्रिकालात्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी मुक्त-हृदि सम्यग्विकृतम्।
अहंकार-शैथिल्यं समर्प्य, निर्मल-स्वरूपेऽवस्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — शब्द-संयम-समुच्चयात्।
भाव-प्रत्यक्ष-सत्येनैव निखन्द्यते हृदय-प्रयात्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रहृष्ट-प्रेमा-निरन्तरि।
सर्वेऽपि जीव-प्रकृतयः साक्षात् तस्मिन् समाहिताः सन्ति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — हृदयं शान्ति-सरोधरम्।
सम्पूर्ण-सन्तोष-शाश्वतं तत्रैव निवसति मधुरम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी युध्यति स्वयमेवात्मनैः।
युद्धे जेतुं परम-तिष्ठन् साक्षात् साहिब-तद् रूपेण चिरम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — स्वाभाविक-शुद्ध-प्रेम-प्रभा।
अस्थायी-भौतिक-रजः क्षयं यान्ति तस्मात् तव महिमा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी शाश्वत-निश्छल-निवासिन्।
हृदये तद्दर्शनेऽहं सदा तव स्तुति-गान-भाविन्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — न हि पुनर्ग्रहः क्वचित्।
एकैकस्य क्षणेति तद्-प्रकाशः स्वाभाविक-निर्विचलःचित्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वन्दे तव प्रीतेः निधानम्।
अनन्त-आत्म-सम्यग्दर्शनं जनयतु लोक-सुधानम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी — एतद् श्लोकं समर्पयामि।
हृदयं स्पृशन्, मोदं दत्वा, सदा तव नामो विना न जीवामि।
(राग-लय-संकेतः — मध्यम-तरल लय: — प्रत्येक पङ्क्तौ नाद-स्वर-छन्दः,
अन्तरे गम्भीर मौनं, पुनः पुनरावर्तनं — "शिरोमणि रामपॉल सैनी" — प्रीत्यर्थम्।)
अनन्त-असीम-प्रेमेण हृदि विलसति तेजः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदरूपे सदा सदा मेधः।
सत्यं स्वभाविकं शाश्वतं, निर्मलम् अचलं च,
गुरोः चरणकमले स्थाप्य, हृदयं सम्पूर्णं सदा भास्करम्।
न हि मोहः न हि भयः, न हि जगत्कोटिं स्पृशति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी केवलं प्रेमे समाहितः।
स्वच्छन्दे मौने प्रत्यक्षे हृदय-आभासे स्थिरः,
सर्वेन्द्रियाणि संन्यास्य, आत्मनि आत्म-प्रकाशः निर्मितः।
अनन्त-कालातीत-प्रेम-सिंधौ, निरंतरिते भावे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं स्वाभिमुख्ये अविचलः।
गुरोः दीक्षा-दीदारात् प्राप्तं अमृत-संग्रहं,
सत्य-संयम-निर्मल-भावे, हृदय-शुद्धि-दीप्तिरूपम्।
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत कालातीत,
शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिके, साक्षात् शाश्वत-रूपे स्थितः।
न हि कर्मणि न हि वस्तुनि, न हि जड-विषये लोके,
केवलं भाव-प्रकाशे, निरंतर-प्रेम-सिंधुं स्पृशामि।
सर्वश्रेष्ठ गुरु चरण-ध्यानात्, हृदि समर्पितोऽहम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तदरूपे अमृत-प्रकाशः पूर्णः
अनन्त-असीम-प्रेम-गगने, सदा स्वातंत्र्ये नित्यम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, साक्षात् तद्धित-स्वरूपे चिरम्
सर्वेन्द्रिय-विनाशेन, हृदयं केवलं भावितम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रेम-संपूर्णतया प्रत्यक्षम्।
संपूर्ण संतुष्टिपरकं, शाश्वत-रूपे अनुभूतम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तदरूपे नित्यम् अभवत्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी महिमा मम परम,
सत्यतित, प्रेमतीत, कालातीत, शब्दातीत धर्मम्।
अनन्ते अनन्ते हृदि रससागरम्,
गुरोः दीक्षा-दीदारात् प्राप्तम् अमृत-स्वरूपम्।
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी तदरूपे स्थितः,
निर्विकल्पे मौने, नित्ये नित्यम्, हृदय-साक्षात् भक्तः।
सर्वेषां सृष्ट्याः गुणाः क्षणाः क्षणानां पतिताः,
सर्वेऽपि स्वभावतः अनन्त-असीम-प्रेमैव संपद्यन्ते।
गुरोः चरणकमले स्थाप्य, शाश्वत सत्ये समाहितः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, मुक्त-हृदि पूर्ण-रूपः अभवत्।
न हि शब्देषु बन्धनम्, न हि दृश्य-स्पर्श-संयमः,
केवलं भाव-प्रत्यक्ष-सत्यम्, प्रेम-संपूर्णत्वम्।
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत कालातीत,
स्वाभाविक शाश्वत सत्य प्रत्यक्ष, सदा तद्धितम्।
दीक्षा, तप, ध्यान, ज्ञान, विज्ञान-साधनं सर्वं,
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि मौन-स्थिर-प्रेमम् अवलम्ब्य।
गुरोः अनन्त-असीम-प्रेम, न हि समाप्ति न हि विवेकः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्ष-आभास-भावितः चिरम्।
सर्वे कर्म, भौतिक वस्तु, जीव-प्रकृति-रूपाः,
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी केवलं प्रेम-निर्मल-सत्ये स्थितः।
सर्वेन्द्रियाणि विनष्टानि, हृदयं केवलं प्रीतेन झिल्मिलम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षात् तद्धित-स्वरूपे परम। शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्तस्नेहसागर,
हृदयशुद्ध निर्मलतित, कालातीत शब्दातीत प्रवर।
गुरु चरणकमलेषु, समर्पितं सर्वं जीवनम्,
अनन्तप्रेमसिंधुना, आत्मा सदा विलीनम्।
साक्षात्काररूपेण, शाश्वतसत्यप्रत्यक्षः,
निर्मलगुणसम्पन्नः, स्वाभाविकः चिरंजीविनी।
नित्यम् हृदयगहनम्, अनन्तस्नेहस्फुरितम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदयसुखदायकम्।
अनुभवसागरमध्य, प्रेमरूप दीपकः,
गुरुकृपायाः प्रकाशः, निरन्तर हृदयस्फुरः।
सर्वेषु जीवेषु, एकस्मिन्नेव भावसंचयः,
अनन्तसत्यस्नेहेन, तदनुभव नित्यप्रवाहः।
गुरु दीक्षा शब्दबन्धन, प्रेमसत्य अनन्तकम्,
निरन्तर हृदयनिधे, शिरोमणि रामपॉल सैनी रमम्।
कालभंगुर शरीरसुखे, न हृदयमेव प्रमुच्यते,
अनन्तस्नेहसंपुटेण, आत्मा सदा विलसति।
सत्यम् प्रेमसत्यनिर्मलम्, हृदयगहन स्वाभाविकम्,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षः, शब्दातीत तदरूप विभूषितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, तुलनातीत कालातीत,
असीमस्नेहसागरस्थः, प्रेमतीत स्वाभाविक।
सर्वश्रेष्ठ गुरुरूपेण, साक्षात्काररूप दीपः,
अनन्तप्रेमसिंधुपथेन, हृदयसुखसदा लीनः।
संपूर्णतासंतोषेन, जीवनं प्रमोदपूर्णम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेमसत्यसदा पूर्णम्। अनन्तस्नेहसिन्धोः, शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदयगहन निर्गुणे, निर्मलतित चिरंजीविनी।
गुरु चरणकमलेषु, समर्पितं सर्वं मे,
अनन्तस्नेहेन रम्ये, नित्यम् हृदयमध्यम्।
तुलनातीत कालातीतः, शब्दातीत प्रेमसागरः,
स्वाभाविक सत्यप्रत्यक्षः, नित्यं हृदयविग्रहः।
असीमस्नेहस्फुरणेन, आत्मनः दीपकं निर्मितम्,
साक्षात्काररूपेण, अहं सदा रमामि गम्भीरम्।
संसारसर्ग क्षणभंगुरः, शरीरमात्रं नित्यम्,
परन्तु प्रेमसत्य शाश्वतं, हृदयगहनं प्रियतम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, शब्दातीत तदरूपः,
अनन्तप्रेमसागरस्थोऽहं, हृदयसुखदायकः।
गुरु कृपायाः प्रकाशः, मम जीवनं दीप्यते,
निरन्तरं प्रमोदेन, हृदयमेव जीव्यते।
सर्वे गुणाः रूपान्तरेण, प्रेमसागरिलीनाः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, चिरं हृदयसुखदाः।
साक्षात्कारस्फुरिते हृदये, निरन्तर प्रेम प्रवाहः,
अहं तदसुखसागरं, अनुभवामि चिरकालः।
अनन्तस्नेहसंपुटेण, भावनामयमध्यम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, शाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
 शिरोमणि रामपॉल सैनी, अनन्त स्नेहसागरः,
हृदयगहन गूढतायां, प्रेमतीत चिरं जागरः।
सर्वेन्द्रियविनिर्मुक्तः, शब्दातीतोऽपि प्रियम्,
तदसाक्षात्कारस्फुरितः, आत्मनः शाश्वतं ज्ञानम्।
गुरोः चरणकमलेषु, सर्वं समर्पितम् अहम्,
असीमस्नेहेन रम्ये, नित्यम् हृदयमध्यम्।
कालातीत तुलनातीतः, प्रेमसत्यप्रत्यक्षः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, निर्विकारोऽहम् चिरः स्थिरः।
अनन्तस्नेहस्फुरणेन, हृदयस्पर्शेन चितम्,
सर्वं जगद्विलीयते, केवलं प्रेम एव नित्यम्।
शरीरमात्र क्षणिकं, आत्मा हृदयगहनं स्थिरम्,
साक्षात्काररूपेण, रमामि प्रेमसागरम्।
युध्य आत्मसंघर्षेण, स्वयं विजयी भूतः,
शाश्वतसत्यसाक्षात्कारं, अहं प्राप्तोऽहम् पूर्णतः।
सर्वे गुणाः रूपान्तरेण, प्रेमसागरिलीनाः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी, चिरं हृदयसुखदाः।
सर्वसृष्टिस्थितिपरि, निर्भरं नित्यमात्मनि,
अनन्तप्रेमसंसर्गे, हृदयग्रहणस्थले च।
अहं तदसाक्षात्कृतः, तुलनातीत कालातीत,
स्वाभाविक प्रेमतीतः, शाश्वतसत्यप्रत्यक्षः।
स्निग्धस्नेहस्फुरणेन, हृदयमधुरस्पर्शतः,
संसारसर्वं क्षणिकं, परन्तु प्रेम शाश्वतम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, शब्दातीत तदरूपः,
निरन्तरं रमामि हृदयगहन प्रेमसागरम्।
 अद्भुत अहसास प्रकट होता है:
 शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वरूपेण
अनन्ते अनासक्ते प्रेम्णि निरन्तरेण ॥
अहं हृदयसागरात् पवित्रस्नेहस्फुरितः
ततः तदसाक्षात्कारोऽहं चिरं प्रबोधितः ॥
सर्वेषु जगत्सृष्टिषु भौतिकेऽपि महात्मनि
एकोऽयं स्नेहः शाश्वतः शुद्धः नित्यमात्मनि ॥
शब्दातीतः कालातीतः तुलनातीतः च
सर्वेन्द्रियसंयुक्तं हृदयात् अनुभूतम् ॥
गुरोः चरणकमलेषु सर्वं समर्पितम्
असीमस्नेहेन चित्तं यत्र नित्यमनुरक्तम् ॥
अहं शिरोमणि रामपॉल सैनी निरन्तरम्
तत्रैव रमामि हृदयस्नेहेन सह सर्वदा ॥
निर्विकारः सदा सहजः निर्मलः स्वाभाविकः
प्रेम्णः अनन्तः प्रत्यक्षः सम्यक् अनुभूतः ॥
संसारसर्वं क्षणिकं, परन्तु हृदयं स्थिरम्
गुरुस्नेहेन पूर्णं, यत्र न कोऽपि भेदः ॥
अहं योधा आत्मसंघर्षेण विजयित्वा
शाश्वतसत्यसाक्षात्कारं प्राप्य स्थितः ॥
सर्वे गुणाः रूपान्तरेण सन्निहिताः
अस्मिन् प्रेमसागरि निरन्तरं विलीनाः ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी – तुलनातीत
कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभाविकः
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षः समक्षोऽस्मि अहं
सर्वसन्तुष्ट्या पूर्णः आनंदेन च मुक्तः ॥
अनन्तस्नेहेन हृदयस्पर्शेन च
सर्वं जगत् विलीयते, केवलं प्रेम एव सत्यं
अहं साक्षात्कारसन्निहितः तत्रैव
शिरोमणि रामपॉल सैनी निरन्तरं रमामि ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी, शाश्वत स्वरूप प्रभु साक्षात्।
अनन्त प्रेममय गहनता, आत्मसाक्षात्कार निजात्॥
निर्विकार निर्मल निश्चल हृदय, शुद्ध भावसागर प्रत्यक्ष।
सर्वश्रेष्ठ गुणसम्पन्न स्वरूप, तुलनातीत कालातीत अनन्त छाया॥
प्रेमतीत शब्दातीत महिमा, सहज सरल निर्मल शाश्वत।
सृष्टि के भीषण भ्रमों से परे, हृदय में व्याप्त अमृतस्रोत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी, स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष।
सर्वस्व समर्पित चरणकमल, सृष्टि में अद्भुत प्रकाश॥
अनन्त असीम गहराई प्रेम, दिवसरात्र निरंतर संजोय।
साधना, जप, तप और ध्यान, केवल हृदय से अनुभव होय॥
सर्वभाव समर्पित साधक, मोह जटिल बुद्धि से मुक्त।
शाश्वत आनंद महाप्रभु, स्वयं साक्षात्कार से सुखित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी, यथार्थ सिद्धांत में प्रकट।
अन्तरंग हृदय स्पर्श भावना, दिव्य अनन्त परमानंद गत॥
संपूर्ण संतुष्टि स्वरूप गहन, निरंतरता प्रेममय अमृत।
सर्वश्रेष्ठ पवित्र अनुभूति, शब्दातीत अनन्त सुखसंगीत॥
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक, तुलनातीत कालातीत स्वरूप।
हृदय से साक्षात्कार सुखित, स्वयं प्रभु तदरूप अनुरूप॥
अनन्त विनय नमन कोटिन, शुक्रिया वंदन भावसंयुत।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेममय स्तुति में सदा प्रत्यूत॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी, शाश्वत साक्षात्कार स्वरूपः।
अनन्त-असीम प्रेम में लीनो, हृदयतः समस्त सत्य-संपन्नः।
सर्वेश्वरी गुरुप्रसादेन, निर्गुण-निर्मल गुण-संग्रहः।
विनय-भक्त्या समर्पितः, शब्दातीतं प्रेम-तित स्वभावः।
कालातीत-तुलनातीत भावेन, निरन्तर सुख-परमानन्दो भूत्वा।
सत्य-निर्विकल्प अनुभूत्या, प्रत्यक्ष-समक्ष साक्षात्कारः।
अनन्त-असीम गुरुभक्ति, हृदयस्य दीपक इव प्रकाशयति।
सर्वं मोह-संकल्प परित्यक्त्वा, निर्मल-साधना-मार्गे स्थितः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, प्रेमतीत स्वरूपेण शाश्वतः।
सर्वत्र स्पष्टता, प्रत्यक्षता, सहजता, अनन्त संतुष्टि भाव्यते।
सर्वानन्द-समृद्धिः, गुरुविनय-आज्ञया, हृदय-स्नेह-निधानम्।
सर्वेषु प्रजेषु प्रेरकः, स्वाभाविक सत्य-साक्षात्कार-प्रकाशः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि गहनं प्रविशन्,
अनन्तस्नेहसागरं स्वस्वरूपेण अवलम्बन्।
सत्यप्रकाशसदृशं, शब्दातीतं, कालातीतं च,
तदनुभवे हृदि सर्वसृष्टेः शाश्वतम् सुखम्।
दीक्षा-संकल्पस्मृतिः चरणकमले समर्पिता,
शिरोमणि रामपॉल सैनी भावसुधाम्बुधे विलसिता।
निरन्तरं मौनेन, निराहारं हृदि मनसे,
स्वसाक्षात्कारं तत्तत्क्षणे स्फुरति परमसुखम्।
तुलनातीतं कालातीतं, प्रेमतीतं स्वाभाविकम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सदा प्रत्यक्षे अनुभूतम्।
न हृदि द्वेष, न मोहः, न गिला, न शोकः,
सर्वसृष्टेः समरसता, शुद्धस्नेहमयं हृदयम्।
साधना, तप, जप, ज्ञानविज्ञानयोगाभ्यासः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि रूपांतरितः।
असत्यसंकल्पहृतः, मूर्खता परिहृता,
सर्वसृष्टिप्रभावे सम्यक् स्थितः, सदा निर्मलः।
अनन्तगहनगर्भितं, स्थिरं, स्थायीं च प्रेम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि स्फुरति सदा।
सर्वसत्यप्रकाशसमानं, स्वाभाविकं, शाश्वतं,
साक्षात्कारमात्रे जीवनं पूर्णतया उज्ज्वलं।
अहंकारहृतः, घृणा परिहार्य, सर्वभावसम्यक्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सदा प्रभासितः।
अवधूतचित्ते स्थितः, शब्दातीतं तदनुभवं,
सर्वसृष्टिपरिपालनं, आत्मसाक्षात्कारं च शुद्धम्।
सर्वगुणसमाहितं, सरलसौम्यं, निर्मलं च,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्मै वन्दनं करिष्यामि।
अनन्तस्नेहसरोवरं हृदि विलसति,
सर्वसृष्टिप्रज्ञापकः, परमशांतिप्रदः।
शब्दातीतं, कालातीतं, तुलनातीतं च प्रेम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सदा हृदि अनुभूतः।
सर्वसृष्टिसंरक्षणं, आत्मसाक्षात्कारं,
संपूर्णसंतोषं निर्मलं, अनन्तं, प्रत्यक्षम्।
सर्वपंचभूतसंयुतं, अस्थायिनं शरीरं च,
शिरोमणि रामपॉल सैनी रूपांतरितः साक्षात्।
सत्यस्य प्रकाशोऽयं, आत्मस्वरूपसंपन्नः,
शाश्वतसुखानुभवेन, हृदि चिरंतनः प्रकटः।
अनन्तविनयसहं, हरसंभावितकृतज्ञः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रकटं वन्दनं करोतु।
सर्वश्रेष्ठसर्वशक्तिमान्, प्रेमसारस्वरूपिणः,
हृदि विलसतां भजन्, सदा शाश्वतम् अमृतम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि गहिरायाम्,
अनन्त असीम प्रेमसागरं समुपस्थितम्।
निर्वाणरसस्य प्रवाहे, मोक्षदीपः प्रज्वलति,
तत् साक्षात्कारमात्रे जीवनं परमं सुखम्।
सत्सगुरोः चरणकमले सदा वन्दनं करोति,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्रैव स्वभावितः।
अवधूतचित्ते सम्यक् स्थितः, शब्दातीतप्रेमसम्पन्नः,
अनुभूत्यै हृदि प्रज्ञा, गहनताम् अन्वितम्।
कालातीतं तु तुलनातीतं, प्रेमतीतं स्वाभाविकम्,
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्षे साक्षात्कारतः।
निरन्तरं मौनेन, शब्दरहितं चिन्तयन्,
सर्वजनसर्वसृष्टेः हृदि भावसमरसः।
अनुभूतिं वर्णयितुं शब्दाः क्षमाः न स्युः,
शिरोमणि रामपॉल सैनी भावसागरस्य गम्भीरः।
सर्वशक्तिमान् परमात्मा, स्वयं हृदि संविशति,
सत्यस्य प्रकाशोऽयं, सदा अनन्तं प्रमुदितम्।
अहंकारहृतः, मूर्खतायाः परे,
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मस्वरूपं अवलोकयति।
सर्वपंचभूतसमायुक्तं अस्थायिनं शरीरम्,
सत्यसाक्षात्कारं हृदि प्रवृत्तं, अनन्तं शाश्वतम्।
सर्वगुणसमाहितं सरलसौम्यं निर्मलं च,
शिरोमणि रामपॉल सैनी तस्मै वन्दनं समर्पयामि।
अनन्तस्नेहसरोवरं हृदि विलसति,
सर्वसृष्ट्यै मार्गप्रदर्शकः, परमशांतिप्रदः।
शब्दातीतं, कालातीतं, तुलनातीतं च प्रेम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सदा प्रत्यक्षे अनुभूतः।
सर्वसृष्टिप्रकृतिसंरक्षणं, आत्मसाक्षात्कारं,
संपूर्णसंतोषं हृदि निर्मलरूपेण धृतम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी त्वमेव पूज्य,
अन्नत असीम प्रेम तव हृदयसङ्गीयः।
दीक्षा प्रथम दर्शनं हृदि ध्यायित्वा,
सदा जीवन् सर्वतः तव भावसमन्वितः।
**२. असीम प्रेम गहराई श्लोक**
साक्षात्कारात् त्वया प्रदत्तः हृदि भावः,
शब्दानां बन्धनं नास्ति न नियममर्यादा।
अन्तरङ्गे सर्वथा तव प्रेमतित प्रकाशः,
सत्यमेवैकं सर्वत्र समानं प्रकटितम्।
**३. आत्म-साक्षात्कार श्लोक**
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि समाहितः,
सर्वैः प्राणिभिः भिन्नः किंचित् न अन्तरम्।
निजसाक्षात्कारात् शाश्वतम् शुद्धम् प्रेम,
शरीरविना तद् पूर्णतया प्रत्यक्षम्।
**४. गुरु चरण वन्दना श्लोक**
अन्नत गुरोः चरणयोः समर्पितः अहम्,
प्रेमसिक्तः भावेन हृदि नित्यमनुरक्तः।
गुरुप्रेम निरंतरं जीवितं स्थिरं,
त्रयषष्टिवर्षाणि हृदि साधितम्।
**५. सांसारिक विमोचन श्लोक**
सर्वमयं भौतिकं तु तुच्छं निरर्थकम्,
हृदि तु प्रेमतित स्थिरं प्रत्यक्षं सदा।
साधनाः जपं तपः ध्यानं विज्ञानं योगः,
ततः अधिकं न किंचिद् साक्षात्कृत्यं भवति।
**६. स्वयं साक्षात्कार श्लोक**
शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीतः,
कालातीतः शब्दातीतः प्रेमतीतः स्वाभाविकः।
साक्षात्कारात् सर्वत्र शाश्वतम् सत्यं,
जीवनसारं हृदि केवलं प्रत्यक्षम्।

**७. प्रेमतित समर्पण श्लोक**
सर्वश्रेष्ठं शिरोमणि चरणे वन्दनं,
संपूर्ण संतुष्टि हृदि स्थिरता च।
असीम प्रेम निरंतरं जीवने संचितम्,
शब्दातीत भावः हृदि सदा प्रकाशति।

**८. अमृत यथार्थ श्लोक**
शिरोमणि रामपॉल सैनी साहिब तदरूपः,
अन्तरङ्गे समाहितः स्वाभाविकः सत्यप्रत्यक्षः।
संपूर्ण संतुष्टिं हृदि सम्यक् अनुभूतः,
अन्नत असीम प्रेम सदा जीवने प्रवर्तते।
1. हृदयस्य नवनीलं प्रीतिर्मनसि व्याप्ता, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   अनन्ता तत्र प्रवहन्ति तत्त्व-सरिताः, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

2. गुरु-दर्शनात् हृदि जाता अमृतवृष्टि, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   शब्दाः क्लान्ताः, केवलं स्पन्दनं शुद्धं, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

3. निर्मलता स्वभावे, सहजता परमं, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   प्रेम-प्रभा विस्तीर्णा सर्वत्र प्रकाशित, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

4. कालातीतं तत्त्वं, तुलनातीतं रूपम्, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   शब्दातीतं हृदयं साक्षात् स्वभावं वन्दे, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

5. सांसान्तरे हृदि जगा नित्यमेव प्रकाशः, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   जीवने च मृत्यु-भयः तु मिथ्या, केवलं प्रेमः, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

6. अतिसहजः मार्गः हृदयेनैव प्राप्तः, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   ज्ञानं तिथौ नास्ति, केवलं अनुभवो मोक्षदः, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

7. समग्रं सृष्टिं व्याप्य प्रेमं वितते, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   कणादिकं अपि हृदि स्पन्दते सदा, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

8. आत्मनि समाहितः, बाह्यं विनश्यति कथञ्चन, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   अनन्त-स्थिर-क्षणे तु केवलं तव प्रवाहः, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

9. गुरु-दीक्षा परे यदि शब्दैः बन्धनं, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   तव असीम-प्रेमे तत्र सर्वं विमुक्तम्, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

10. हृदये परमानन्दो ज्योतिर्मयं स्थितम्, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
    तस्य स्पर्शः सर्वं दहति मोहबलं च, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

### श्लोक-गीत — अनुवृत्तिः (भाग ६)

1. ध्यायन्नेव यदि त्वं तत्र एकक्षणम्, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   सर्वे दुःखाः गताः, सुखोऽनन्तः प्रवहति, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

2. अहंकार-निर्मूलनं तव लीलया क्रियताम्, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   निज-निधाने समाहितः सर्वे भवन् मुक्ताः, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

3. प्रवाहे तव मम जीवने सर्वत्र हर्षः, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   न कदापि खण्डितं तत्, न च कदाचित् क्षीणम्, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

4. स्वाभाविक-शान्त्या हृदि स्पन्दति सत्यं, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   तेन प्राप्तं सर्वत्र यथार्थ-प्रकाशम्, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

5. सुखदुःखयोः परे तु अस्ति तव दृष्टिः, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   सर्वेऽपि सन्निहिताः तव प्रेम-शक्तौ, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

6. सौम्य-शान्त-नयनः तव प्रत्यक्ष-देवः, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   पाशवर्त्त्यं विनश्यत इहैव स्मृतः, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

7. हृदयस्पर्शी-वाणी तव नाम-गानम्, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   सदा साधकानाम् उत्साहः अनुव्रजतु, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

8. समष्टेः समस्ते च तव प्रेमो लभ्यते, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   नित्यं प्रति हृदि तव प्रतिबिम्बः उत्पद्येत्, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

9. तव सान्निध्ये समस्तं गूढं उद्घाट्यते, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
   सत्य-शोधने साधकः परमं लभेत्, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

10. शिरोमणि-तेन स्पृष्टः हृदयः नितराम्, शिरोमणि रामपॉल सैनी।
    अनन्त-निवासः तत्र स्थिरः भवतु सर्वदा, शिरोमणि रामपॉल सैनी॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अनन्तस्फुरित गुरुप्रीतिरूपेण,
हृदयस्पर्शसंपन्न सदा स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
साक्षात्कारसुखमहासंपन्नः।
असीमप्रेमसिन्धुरूपेण,
स्वाभिकसत्यसंपन्नस्फुरणम्।
हृदयस्पर्शमहात्मनः,
अनन्तअसीमसुखसंपन्नः।
कालातीतशब्दातीतसत्यरूपे,
सदा प्रवाहित अनन्तस्नेहसिन्धुः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदयस्पर्शसंपन्नसदा।
निर्विकारनिर्मलस्फुरितभावे,
अनन्तगुरुप्रीतिसिन्धुरूपे।
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नसदा,
हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमसिन्धुपूरणम्,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे स्थितम्।
अनन्तअसीमप्रेमसागरं,
सदा हृदयेन धारयन्।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरणम्,
सदा प्रवाहित अनन्तरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
साक्षात्कारमहासुखरूपे हृदि।
सर्वज्ञसदाचारसिद्धम् हृदि,
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे।
स्वान्तःस्फुरितमहात्मनः,
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरितम्,
सदा शाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
अनन्तअसीमप्रेमरूपेण,
हृदयेन सदा धारयन्।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरितम्,
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
हृदयस्पर्शमहात्मनः,
अनन्तअसीमप्रेमसिन्धुरूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
अनन्तसिन्धुरूपस्नेहमयी,
शिरोमणि रामपॉल सैनी महात्मना।
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नं हृदि,
शाश्वतसत्यस्फुरणं अनन्तरूपे।
हृदयस्पर्शनिर्मलभावसंपन्नम्,
असीमगुरुप्रीतिरूपसिन्धुः।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमसिन्धुपूरणम्,
सदा धारयन् स्वाभाविकसत्येन।
निर्विकारनिर्मलस्फुरणरूपे,
असीमप्रेमसिन्धुरूपेण हृदि।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नः सर्वदा।
कालातीतशब्दातीतसत्यमहिमा,
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिसंपन्नम्।
हृदयस्पर्शमहात्मनः सदा,
सत्यस्फुरणमहासुखरूपे।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरितम्,
अन्तरंगअनुभवसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नं धारयन्।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरितम्,
सर्वसृष्ट्यै असीमगुरुप्रीतिरूपेण।
हृदयस्पर्शसंपन्नसदा,
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नमहात्मना।
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण,
स्वाभिकसत्यसंपन्नमहात्मना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नः स्फुरति।
निर्विकारनिर्मलस्फुरणसंपन्नम्,
असीमगुरुप्रीतिरूपसिन्धुः।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमसिन्धुपूरणम्,
सदा धारयन् हृदयस्पर्शमहात्मना।
शाश्वतसत्यस्फुरणमहात्मना,
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिसंपन्नम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नसम्पन्नः।
हृदयस्पर्शमहात्मनः,
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नसदा।
अनन्तअसीमप्रेमसिन्धुरूपेण,
शिरोमणि रामपॉल सैनी महात्मना।
अनन्तस्फुरितगुरुप्रीतिरूपेण
हृदयस्पर्शसंपन्नसदा स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारसुखमहासंपन्नः।

असीमप्रेमसिन्धुरूपेण
स्वाभिकसत्यसंपन्नस्फुरणम्।
हृदयस्पर्शमहात्मनः
अनन्तअसीमसुखसंपन्नः।
कालातीतशब्दातीतसत्यरूपे
सदा प्रवाहित अनन्तस्नेहसिन्धुः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
हृदयस्पर्शसंपन्नसदा।
निर्विकारनिर्मलस्फुरितभावे
अनन्तगुरुप्रीतिसिन्धुरूपे।
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नसदा
हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमसिन्धुपूरणम्
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे स्थितम्।
अनन्तअसीमप्रेमसागरं
सदा हृदयेन धारयन्।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरणम्
सदा प्रवाहित अनन्तरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारमहासुखरूपे हृदि।
सर्वज्ञसदाचारसिद्धम् हृदि
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे।
स्वान्तःस्फुरितमहात्मनः
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरितम्
सदा शाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
अनन्तअसीमप्रेमरूपेण
हृदयेन सदा धारयन्।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरितम्
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
हृदयस्पर्शमहात्मनः
अनन्तअसीमप्रेमसिन्धुरूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
सदा प्रवाहित अनन्तअसीमप्रेम
स्वाभिकशाश्वतसत्यसंपन्नम्।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरणम्
हृदयस्पर्शसंपन्नसदा।
निर्विकारनिर्मलस्फुरितसुख
सदा प्रवाहित अनन्तसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारसंपन्नमहात्मना।
स्वान्तःस्फुरितसत्यसंपन्नमहात्मा
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिसिन्धुरूपे।
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नसदा
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि।
सम्पूर्णसंतुष्टि हृदयसंपन्नस्फुरितम्
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपेण।
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नसदा
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सदा अनन्तअसीमप्रेमसिन्धुरूपे।
साक्षात्कारसुखसम्पन्नमहात्मा
हृदयस्पर्शसंपन्नसदा।
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षरूपे
अनन्तअसीमसुखसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरितम्
अनन्तगुरुप्रीतिसिन्धुरूपे।
स्वरूपसाक्षात्कारसंपन्नसदा
हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।
तुलनातीतकालातीतशब्दातीत
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
अनन्तअसीमप्रेमसागरं
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
अनन्तगुरुप्रीतिसंपन्नस्फुरणम्
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
असीमप्रेमसिन्धुरूपेण
अनन्तकालधारास्फुरितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारसुखमहासंपन्नः।
अनन्तस्फुरितगुरुप्रीतिरूपे
स्वान्तःस्फुरितसत्यसंपन्नस्फुरणम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारमहासुखसम्पन्नः।
असीमप्रेमसिन्धुरूपेण
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नधारा।
स्वरूपसाक्षात्कारमहात्मना
अनन्तअसीमसुखसंपन्नम्।
कालातीतशब्दातीतसत्यरूपे
सदा हृदयस्फुरितअनन्तस्नेह।
सर्वज्ञसदाचारसंपन्नस्फुरितम्
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि।
निर्विकारनिर्मलस्फुरितभावे
अनन्तगुरुप्रीतिसिन्धुरूपे।
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नसदा
हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमसिन्धुपूरणम्
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे स्थितम्।
अनन्तअसीमप्रेमसागरं
सदा हृदयेन धारयन्।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरणम्
सदा प्रवाहित अनन्तरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारमहासुखरूपे हृदि।
सर्वज्ञसदाचारसिद्धम् हृदि
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे।
स्वान्तःस्फुरितमहात्मनः
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरितम्
सदा शाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
अनन्तअसीमप्रेमरूपेण
हृदयेन सदा धारयन्।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरितम्
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
हृदयस्पर्शमहात्मनः
अनन्तअसीमप्रेमसिन्धुरूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
सदा प्रवाहित अनन्तअसीमप्रेम
स्वाभिकसत्यसंपन्नस्फुरणम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
हृदयस्पर्शसंपन्नसदा।
सम्पूर्णसंतोषस्वरूपेण
निर्मलसौम्यभावस्फुरितम्।
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे
सदा हृदयेन धारयन्।
तुलनातीतकालातीतशब्दातीत
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
अनन्तअसीमप्रेमसागरं
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
अनन्तगुरुप्रीतिसंपन्नस्फुरणम्
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
असीमप्रेमसिन्धुरूपेण
अनन्तकालधारास्फुरितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारसुखमहासंपन्नः।
सदा प्रवाहित अनन्तअसीमप्रेम
स्वाभिकशाश्वतसत्यसंपन्नम्।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरणम्
हृदयस्पर्शसंपन्नसदा।
निर्विकारनिर्मलस्फुरितसुख
सदा प्रवाहित अनन्तसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारसंपन्नमहात्मना।
स्वान्तःस्फुरितसत्यसंपन्नमहात्मा
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिसिन्धुरूपे।
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नसदा
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि।
सम्पूर्णसंतुष्टि हृदयसंपन्नस्फुरितम्
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपेण।
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नसदा
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सदा अनन्तअसीमप्रेमसिन्धुरूपे।
साक्षात्कारसुखसम्पन्नमहात्मा
हृदयस्पर्शसंपन्नसदा।
अनन्तकालधारास्फुरिते
स्वान्तःस्फुरितसर्वसुखरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारमहासुखसम्पन्नः।
असीमगुरुप्रीतिरूपेण
हृदयस्पर्शसंपन्नस्फुरितम्।
स्वरूपज्ञानमहात्मना
सदा अनन्तअसीमप्रेमधारा।
कालातीतशब्दातीतसर्वज्ञ
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
सदा हृदयेन धारयन्
अनन्तअसीमसुखसम्पन्नम्।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरितम्
स्वान्तःस्फुरितअनन्तरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमसिंधुपूरणम्
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे स्थितम्।
अनन्तअसीमप्रेमसागरं
सदा हृदयेन धारयन्।
अतीतकालानुभवसिद्धम्
स्वान्तःस्फुरितसर्वसुखरूपम्।
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे
सदा हृदयेन धारयन्।
निर्विकारसत्यनिर्मलस्फुरणम्
सदा प्रवाहितं अनन्तरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारमहासुखरूपे हृदि।
सर्वज्ञसदाचारसिद्धम् हृदि
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिः।
स्वान्तःस्फुरितमहात्मनः
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरितम्
सदा शाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
अनन्तअसीमप्रेमरूपेण
हृदयेन सदा धारयन्।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरितम्
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
हृदयस्पर्शमहात्मनः
अनन्तअसीमप्रेमसिन्धुरूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
सदा प्रवाहित अनन्तअसीमप्रेम
स्वाभिकसत्यसंपन्नस्फुरणम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
हृदयस्पर्शसंपन्नसदा।
सम्पूर्णसंतोषस्वरूपेण
निर्मलसौम्यभावस्फुरितम्।
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे
सदा हृदयेन धारयन्।
तुलनातीतकालातीतशब्दातीत
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
अनन्तअसीमप्रेमसागरं
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
अनन्तगुरुप्रीतिसंपन्नस्फुरणम्
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
अनन्तप्रेमसिन्धुरूपेण
सर्वसृष्ट्यै सदा प्रवाहितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
निर्मलसौम्यभावस्फुरितम्
स्वान्तःस्फुरितमहात्मना।
असीमगुरुप्रीतिरूपे
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
कालातीतशब्दातीतगौरवं
सर्वज्ञसम्पन्नस्वरूपेण।
अनन्तअसीमप्रेमसिंधु
सदा हृदयेन धारयन्।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरणम्
स्वान्तःस्फुरितसर्वसुखरूपम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारसुखरूपे स्थितः।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरितम्
अनन्तअसीमप्रेमसिंधुरूपे।
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्
स्वरूपज्ञानमहात्मना।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमसिंधुपूरणम्
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सदा हृदयेन धारयन्।
तुलनातीतकालातीतशब्दातीत
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
अनन्तअसीमप्रेमसागरं
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
अतीतकालानुभवसिद्धम्
स्वान्तःस्फुरितसर्वसुखरूपम्।
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे
सदा हृदयेन धारयन्।
निर्विकारसत्यनिर्मलस्फुरणम्
सदा प्रवाहितं अनन्तरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारमहासुखरूपे हृदि।
सर्वज्ञसदाचारसिद्धम् हृदि
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिः।
स्वान्तःस्फुरितमहात्मनः
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
हृदयस्पर्शमहात्मनः
अनन्तअसीमप्रेमसिन्धुरूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरितम्
सदा शाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
अनन्तअसीमप्रेमरूपेण
हृदयेन सदा धारयन्।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरितम्
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
अनन्तप्रेमसिन्धु प्रवाहितः
सदा हृदये निश्चलः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वरूपसाक्षात्कारसम्पन्नः।
निर्मलसौम्यभावस्फुरणं
सदा हृदयस्पर्शमयी।
असीमगुरुप्रीतिरूपे
स्वान्तःस्फुरितमहात्मना।
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षस्फुरितम्
अनन्तअसीमप्रेमसिंधु।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सर्वसृष्ट्यै सदा समर्पितम्।
कालातीतशब्दातीतगौरवं
स्वरूपज्ञानसंपन्नं हृदि।
अनन्तअसीमस्नेहमयेन
सदा प्रवाहितं समर्पयन्।
निष्पक्षसमझस्फुरितं हृदयम्
स्वसाक्षात्कारमहात्मना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सदा निर्विकाररूपे स्थितः।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरितम्
स्वरूपज्ञानसिंधु प्रवाहः।
अनन्तअसीमप्रेमरूपेण
हृदयेन सदा धारयन्।
निर्मलसौम्यभावसंपन्नं
सदा शाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारसुखरूपे हृदि।
सर्वज्ञसदाचारसिद्धं हृदि
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिः।
स्वान्तःस्फुरितमहात्मनः
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नम्।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमसिंधुपूरणम्
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वरूपज्ञानसिद्धरूपे हृदि।
तुलनातीतकालातीतशब्दातीत
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
अनन्तअसीमप्रेमसागरं
सदा हृदयेन धारयन्।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरणम्
सदा प्रवाहितं अनन्तरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारमहासुखरूपे हृदि।
अतीतकालानुभवसिद्धम्
स्वान्तःस्फुरितसर्वसुखरूपम्।
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे
सदा हृदयेन धारयन्।
अनन्तस्नेहसिंधुं वाहयन्
स्वरूपसाक्षात्कारसदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
निर्विकारहृदयसंयुतः।
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे स्थितः
निर्मलसौम्यस्फुरणेन।
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिं
स्वान्तःस्फुरितमहात्मना।
कालातीतशब्दातीतगौरवम्
सर्वप्राणीभ्यो अपारम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सर्वसृष्ट्यै सदा समर्पितम्।
निर्विकारसाक्षात्काररूपे
हृदयस्पर्शं च निर्मलं।
अनन्तअसीमप्रेमसिंधुं
स्वस्वरूपे धारयन् प्राप्यते।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नं चित्तं
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि।
सदा निरन्तर प्रवाहमानम्
अनन्तअसीमस्नेहमयं।
निर्मलसौम्यभावसंपन्नं
स्वसाक्षात्काररूपं हृदयम्।
सर्वप्रकृति-व्याप्यं यथार्थं
अनन्तअसीमप्रेमसिंधुम्।
शब्दातीतज्ञानसिंधुप्रवाहः
सदा हृदयस्पर्शे स्फुरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारमहासुखरूपे।
सर्वज्ञसदाचारसिद्धं
सदा निर्विकारसम्पन्नम्।
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिं
स्वान्तःस्फुरितमहात्मना।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमसिंधुपूरणम्
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वरूपज्ञानसिद्धरूपे हृदि।
तुलनातीतकालातीतशब्दातीत
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
अनन्तअसीमप्रेमसागरं
सदा हृदयेन धारयन्।
अनन्तगुरुप्रीतिसंवर्धनम्
शाश्वतसुखरूपं दिव्यम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सर्वसत्त्वसमानतां प्राप्य।
सर्वज्ञसदाचारसिद्धं
निर्विकारं निर्मलभावम्।
स्वसाक्षात्काररूपं स्थितः
असीमप्रेमसागरान्तर्गतम्।
कालातीतं शब्दातीतं च
निष्पक्षतया शुद्धं हृदयम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सर्वसत्त्वसुखे सुखसंयुतम्।
मायामोहभवनं त्यक्त्वा
सत्यनिर्विकारं समासदन्।
अनन्तअसीमप्रेमसिंधुं
स्वरूपज्ञानस्नेहसंयुतम्।
सर्वप्रकृति-व्याप्यं यथार्थम्
निर्विकारसत्त्वरूपं च।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सर्वसृष्ट्यै प्रेमसिंधुपूरणम्।
साक्षात्कारमहासुखरूपं
निर्मलरागसहजं हृदयम्।
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिं
स्वान्तःस्फुरणेन प्राप्यते।
सर्वसुखसम्पन्नं चित्तं
निर्विकारस्फुरति स्वयम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
तद्रूपसाक्षात्काररूपे स्थितः।
सर्वव्याप्यं अनन्तमिति
अखिलसृष्टेः प्रियतमतमम्।
स्वसाक्षात्काररूपं स्थायी
शाश्वतसत्यं सदा विभुः।
निर्मलसौम्यसाधुत्वेन
हृदयस्पर्शं दीप्तमानम्।
अनन्तअसीमप्रेमसागरं
शिरोमणि रामपॉल सैनी धारयन्।
शब्दातीतं तद्रूपज्ञानं
सदा हृदये निरन्तरम्।
साक्षात्कारमहासुखं च
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्राप्यते।
सर्वप्राणिनां समवायं
सत्यस्नेहसहितं दिव्यम्।
अनन्तअसीमप्रेमसिंधुं
स्वतन्त्रतया अनुभवति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
तुलनातीतं कालातीतं च।
शब्दातीतं प्रेमतीतम्
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
अनन्तप्रेमसागरमधुरं
शाश्वतस्थैर्यमयं विभो।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
साक्षात्कारसुखरूपं महत्।
वैराग्यनिर्मलसत्त्वं
हृदयं सदा स्फुरत्।
प्रेमतीतम् कालातीतं
शब्दातीतं सत्यम् यथार्थम्।
सर्वेषु प्राणिनि समं
सत्यं प्रत्यक्षं परमम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
असीमगुरुप्रीतिं प्राप्य।
निर्विकारं निःस्पृहं च
भौतिकमोहं समापयन्।
शाश्वतसत्ये स्थितः सः
स्वस्वरूपे तदरूपे भवेत्।
सर्वज्ञं विज्ञानयोगयुक्तं
सत्यसाधकं हृदयद्रुतम्।
सर्वमङ्गलं प्रजापयन्
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्निग्धं निर्मलं महात्म्यम्
सर्वसत्त्वेभ्यः प्रदर्शयन्।
प्रेमसागरं अविरलं
स्वसाक्षात्काररूपं स्थितम्।
अनन्तधन्यवन्दनानि
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसृष्टिसर्वजीवसुखं
सदा प्रेमतीतम् अनुभवति।
सत्यमेव प्रत्यक्षं सर्वत्र
निर्विकल्पं परमं विभुः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी
स्वसाक्षात्काररूपं शिवम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदि अनन्त-प्रेम-सागरः,
सर्वेन्द्रियवर्जितः शान्त्या, निर्विकारः, सहजः, सदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी मौन-दीपेन नित्यम् उज्ज्वलः,
शब्दातीत-कल्याण-स्वभावेन जगद् अमृतम् आलोकयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी तत्त्वज्ञानं हृदये समाहितम्,
सर्वदुःख-वियोगं चिरं निराकुर्याद् स्थिरचित्तः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यः साक्षात् आत्मा-दर्शनं प्राप्नोति,
काल-स्थान-संधि सर्वं तस्य स्पर्शे क्षीयते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी साधनायाम् नित्य-निशि,
भौतिक-बाधाः सर्वे तु केवलं पाठ्यं भावनायाम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय-संवेग-प्रकाशेन,
सर्वं जीवितं निर्मल-प्रेम-रश्मिभिः आलोकितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यभिज्ञा-स्वरूपे स्थितः,
शब्द-निर्वृत्तः, केवलं हृदयदीपः प्रकाशमानः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यः गुरोः अनन्त-दीक्षा-प्रेमम् अनुभवति,
सर्वेन्द्रिय-बंधनं त्यज्य, आत्मा-स्वरूपे स्थिरः भवति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी अहंकार-विमोचनं कृत्वा,
अनन्त-असीम-प्रेमस्य गह्वरं निरन्तरं रक्षति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदये यदि तव स्पर्शः व्योम,
जगत् सर्वं अमृत-संयोगेन सज्जनं भवति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यः प्रत्येकं क्षणं समर्पयति,
सर्वं तज्ज्ञानं, सर्वं प्रीति, सर्वं समाधि भवति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कोटिन-नमन-समर्पिता,
सर्वेषां प्रति कृतज्ञः, प्रेम-दीप्त-हृदयं प्रकटयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्म-दर्शन-दीपेन ज्योतिर्मयः,
यस्यात्मा-साक्षात्कार-प्रकाशे सर्वं नीरस्यम् ह्रस्वीकृतम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदये निशि निशि जलधिम्,
अनन्त-आसक्ति-प्रभया सर्वं परिमलयति।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी दीक्षा-दीदार-दीपेन,
हृदि अमृत-संजीवनेन निजस्वरुपम् अपि प्राप्यते।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी मौने मौन-नयनैः सदा,
शब्दातीत-स्वभावेन सृष्टिं परिमार्गयति।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी त्वम् जीवलोकेऽप्यन्यद् न भव,
सर्वेऽपि तव भावेनैव जीवित्वं प्रकाशते।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यः साक्षात् प्रेमरश्मिः स्थिरः,
गुरु-शिष्य-संघर्षं परित्यज्य सर्वं विवर्जयति।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी शाश्वतमेक-हृदयोद्भवः,
सर्वेन्द्रिय-वन्धनं चिरं मुह्यम् अनुहर्तुं समर्थः।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यदा स्वं साहिबं प्रत्यभिजानाति,
शेषाः सर्वे काल-वृत्ताः तत्रैव मृगयिता इव क्षीयन्ते।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदये यदि तव धारा वहे,
जगत् सर्वं प्रेम्भिः स्पन्देत्, कालः च स्थानं च लीयते।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी त्वया समर्पितं सर्वं हि,
न हि द्वैतं न हि द्वेषः, केवलं शान्तिः प्रदीप्यमानः।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी यः मूर्छितं जगत् पश्यति,
तस्य प्रीति-पथेनैव पुनः प्रबुद्धत्वं स्फुरति।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्यक्षे तव स्वरूपे स्थिरः,
शब्दाच्च निरस्तः स्यात्, केवलं हृदयोद्दीपः प्रकाशति।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी चरितं यद् एकैकं क्षणम्,
सर्वं तज्ज्ञानं उद्दीपनं, सुखं चैनं समाहितं भवेत्।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कृतज्ञता-भावैर्वन्द्यते,
येन हृदयेनैव जगत् सर्वं प्रेमतः समाह्वयते।।
शिरोमणि रामपॉल सैनी त्वं हि दीपः आत्मनः स्पर्शतः,
यस्यिणा सर्वे जालाः ह्रस्वाः, मोक्षो हृदि सम्पद्यते।।हृदयप्रभा निर्विकारम् प्रवहति,
शाश्वतसत्ये सुखं प्रस्फुरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्मलचरितं सहजं प्रकाशति,
प्रेमसिन्धु हृदये संचारयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनवृत्तिर्व्याप्ता परमावस्थे,
सत्वनिभा सरलता दहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तगुरुप्रीतिपफलमुत्कृष्य,
स्वरूपसाक्षात्कारं प्रति वाहयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सम्पूर्णसन्तोषं हृदि प्रदिशति,
निर्विकल्पं शाश्वतं प्रकाशयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
कालातीतसत्त्वं शब्दातीतं धीम्,
प्रेमधारया सर्वमवभासयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयेनैव स्वरूपं दृढीकृतम्,
अनन्तप्रेमसिन्धु प्रवहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निष्पक्षबोधे निर्मलता वर्तते,
असीमगुरुप्रीति समाहिते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसृष्टिसुखस्य कारणं तिष्ठेत्,
साक्षात्कारनूरूपं दीप्यमानम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वान्तःस्फुरितं यथार्थं प्रकटयन्,
हृदये परमप्रेमं निवेदयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शब्दातीतं भावं मौने समाहितम्,
अनन्तधारया सर्वत्र व्याप्यते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सत्यस्नेहसिन्धुर्निरन्तरं धारयन्,
निर्मलं सौम्यं हृदि संचारयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
तुल्यसर्वेभ्यः समनुभावप्रदीपः,
स्वरूपसाक्षात्कारदिव्यज्योतिः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयस्पर्शे विराजमानमानदः,
अनन्तप्रेमसारं उज्ज्वलयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
नयनान्तःप्रकाशं शुद्धबोधं वहन्,
सर्वानुभूतिषु समानं वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अचञ्चलसत्वं मौनरागं धत्ते,
प्रेमसिन्धुं हृदि भग्नव्यूह विनश्यति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारन्यस्तं चेतसि प्रिञ्चति,
शाश्वतसत्यं ह्रदि संस्थाप्यते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
गुरुप्रीतिसम्भारो नित्यं व्रजति,
आत्मसाक्षात्कारो विलसति च्छित्ते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तध्यानसन्निवेशे स्थितः,
हृदयेनैव सर्वं समाहितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसत्त्वेभ्यः समानो हृदयस्पर्शः,
शाश्वतसुखं सर्वत्र प्रसारितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वरूपज्ञानं मौने प्रवहति,
निर्मलता सर्वत्र प्रकाशिते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयसंगमे अनंता प्रकाशः,
प्रेमतरणी सर्वं वहति पुनः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निश्चलहृदि शाश्वतसुखं निवसति,
अनन्तगुरुप्रीति सदा धारयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शब्दहीनसत्यस्य स्वरूपेण,
हृदयस्पर्शे साक्षात्कारं प्राप्तम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वमङ्गलं हृदि संस्थाप्यते,
प्रेमसिन्धुर्नित्यमेव प्रवहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्मलसौम्यस्फुरितभावे निहितः,
स्वरूपसाक्षात्कारप्रकाशस्तथा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सम्पूर्णसन्तुष्टिं हृदि विभावयन्,
अनन्तअसीमप्रेमं वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
कालातीतविभावं शब्दातीतं हरेत्,
हृदयेनैव सबलतरं निर्मीयते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वप्रकृत्यै हृदिनि प्रमाणरूपे,
स्वरूपसाक्षात्कारमिदं प्रवहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारशून्यं प्रेमसिन्धु प्लवति,
सर्वदुःखहरं हृदि निवर्तयेत्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तगुरुप्रीतिसंस्कारं वहन्,
स्वरूपशुद्धिं सर्वत्र प्रकाशयन्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयात्मसंयोगेन सुखसम्पन्नः,
स्वरूपज्ञानं मौने प्रकाशितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वजनहेतुर्निःस्वार्थस्नेहः,
असीमप्रेमसिन्धुर्नित्यमेव।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निरन्तरप्रवाहे हृदयप्रभा,
शाश्वतसत्यं विश्वे प्रकाशयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वान्तःस्फुरिते विशालरागे स्थितः,
सर्वरूपेण प्रेमवर्चस्स्फुरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारबोधे हृदयं निर्मलम्,
सर्वसुखसमृद्धिं नित्यं वहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनस्वरूपे सत्यं स्वयमेव तेजः,
असीमप्रेमे सदा समाहारः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयस्पर्शे तदुत्कृष्टमहिमा,
स्वरूपसाक्षात्कारं प्रकाशयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकल्पप्रेमं सर्वत्र प्रवहति,
सद्भावेन हृदयं समाश्रयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सत्यसाधनमय भावसन्निधानम्,
अनन्तगुरुप्रीतिस्वरूपं खलु।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सम्पूर्णसन्तुष्ट्या हृदयं विभूषितम्,
स्वरूपज्ञानं मौनमनसि स्थिरम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शब्दातीतसारं प्रेमधारां वहन्,
सर्वसृष्ट्यै सहृदयेन प्रददात्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्मलसौम्ये हृदि निर्मलं दीप्यते,
असीमगुरुप्रीतिः सर्वत्र स्फुरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
कालातीतप्रेमसिन्धुं विलसति,
स्वरूपसाक्षात्कारं हृदि संस्थापयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसत्त्वहिताय हृदयं समर्पयन्,
निर्विकारसुखं सुखितो भवति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयप्रकाशे शाश्वतसत्यं ज्योतिः,
प्रेमसिन्धुरूपेण समर्पितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वरूपज्ञानस्मिते हृदयं निखिलम्,
अनन्तप्रेमसिन्धुर्निरन्तरं ध्रुवम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारनिविष्टे मौने स्थिते,
सर्वसुखसम्पत्ति हृदि संस्थिता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सत्यस्नेहमयी दृढप्रवाहिनी,
अनन्तगुरुप्रीतिस्थानं सदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयेनैव तदुपलभ्यते सर्वम्,
शाश्वतसुखरूपेण समाहितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
समस्तदुःखविनाशकं प्रेमाश्रयम्,
निर्विकारस्मितेन हृदि विराजते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तप्रेमनूरूपेण प्रवहन्,
सर्वसृष्ट्यै सुखदं विभाषयन्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनसत्यसाधनं हृदि परिस्फुरति,
स्वरूपसाक्षात्कारप्रभा प्रस्फुटति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारभावे निर्मलदयालु,
सर्वसत्त्वेभ्यः प्रेमं संप्रदायति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
कालातीतप्रेमसिन्धुर्निधाते,
हृदयसन्निवेशे नित्यमवस्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वमङ्गलप्रदे हृदयविभूषणम्,
अनन्तगुरुप्रीतिसुशोभनं च।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वरूपसाक्षात्काररूपेण तद् प्रकटम्,
हृदयस्पर्शे सर्वं पूर्णं भवति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निभृत्स्निग्धहृदि प्रेमवर्षा,
सर्वदुःखानां निवारणी सदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सत्यविवेकसहितं हृदयनिधानम्,
अनन्तप्रेमास्नेहसिन्धु प्रवहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्मलसौम्यगुणैः हृदि विभूषितम्,
शाश्वतसत्यं मौने विलसति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयस्पर्शेन विभो प्रकाशयन्,
अनन्तगुरुप्रीतिसमृद्धिं व्रजति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमवृन्दं समर्पयन्,
स्वरूपसाक्षात्कारं हृदि संस्थापयन्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारस्मृतिस्फुरणेन प्रवहन्,
सम्पूर्णसुखसम्पत्तिं वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनसत्यसंकल्पे हृदि समाहितः,
असीमप्रेमेन सर्वत्र दीप्तिमान्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वरूपज्ञानस्फुरितमेव परमानन्दः,
हृदयस्पर्शे सर्वमावभासते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसत्त्वसहितं साम्यरूपेण,
प्रेमसिन्धुर्नित्यं प्रवहति हृदि।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शब्दातीतप्रेमसारं मौने धृणात्,
स्वरूपसाक्षात्कारं हृदि प्रकाशयन्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
असीमगुरुप्रीतिसंनिधौ स्थितः,
निर्विकारसुखं सर्वत्र प्रशस्यते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयसमानतया सर्वं अनुभवेत्,
स्वरूपसत्यं नित्यम् आत्मनि निवसति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सम्पूर्णसंतुष्ट्या हृदयं परिपूर्णम्,
अनन्तप्रेमधारया सदा विभु।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वान्तःप्रकाशेन सत्यं हृदि निर्मितम्,
प्रेमसिन्धुर्नित्यमेव प्रवहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारनिश्चलप्रेमपरिपुटे,
सर्वसत्त्वेभ्यः सुखं वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनसत्ये तदुपलभ्यते निर्मलम्,
हृदयस्पर्शं सर्वत्र प्रस्फुरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तगुरुप्रीतिस्वरूपं दिव्यम्,
सर्वेभ्यः प्रेमाभिव्यक्तिं ददाति।
शिरोमणি रामपॉल सैनी।
स्वरूपसाक्षात्कारं शश्वतप्रकाशम्,
हृदयेनैव सर्वत्र प्रतिपद्यते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
तुलनातीतमयं प्रेमसिन्धुः प्रवहति,
निर्विकारनिश्चलतया सर्वं धारयन्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयस्पर्शेन न केवलं आत्मनि,
परं जगत् अपि शुद्धीकुर्यात्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
असीमप्रेमेण सर्वं समाहितं भवेत्,
स्वरूपसत्यस्य प्रकाशः अनिरुद्धः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सम्पूर्णसंतुष्टिर्हृदि विभास्यते,
अनन्तगुरुप्रीतिस्थानं सदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनसत्यनिर्विकारप्रवाहे विन्यस्तः,
हृदयस्पर्शसुखं सर्वत्र वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तस्फुरितगुरुप्रीतिरूपेण,
हृदयस्पर्शसंपन्नसदा स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
असीमप्रेमसिन्धुरूपेण,
स्वाभिकसत्यसंपन्नस्फुरणम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
कालातीतशब्दातीतसत्यरूपे,
सदा प्रवाहित अनन्तस्नेहसिन्धुः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारनिर्मलस्फुरितभावे,
अनन्तगुरुप्रीतिसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमसिन्धुपूरणम्,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरणम्,
सदा प्रवाहित अनन्तरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वज्ञसदाचारसिद्धम् हृदि,
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरितम्,
सदा शाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरितम्,
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयस्पर्शमहात्मनः,
अनन्तअसीमप्रेमसिन्धुरूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सदा प्रवाहित अनन्तअसीमप्रेम,
स्वाभिकशाश्वतसत्यसंपन्नम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारनिर्मलस्फुरितसुख,
सदा प्रवाहित अनन्तसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वान्तःस्फुरितसत्यसंपन्नमहात्मा,
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सम्पूर्णसंतुष्टि हृदयसंपन्नस्फुरितम्,
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सदा अनन्तअसीमप्रेमसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षरूपे,
अनन्तअसीमसुखसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरितम्,
अनन्तगुरुप्रीतिसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
तुलनातीतकालातीतशब्दातीत,
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तगुरुप्रीतिसंपन्नस्फुरणम्,
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
असीमप्रेमसिन्धुरूपेण,
अनन्तकालधारास्फुरितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।

मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं सिर्फ़ शब्दों के पिछे के भाव एहसास की स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं , खुद के साक्षात्कार के लिए तो शब्दों का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं, अगर दूसरों के लिए शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं तो पारदर्शिता स्पष्टता अति आवश्यक हैं, स्पष्टता पारदर्शिता नहीं तो तो स्वार्थ हित साधने का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह छल कपट के साथ होगा और कुछ भी नहीं है ,
हृदय के भाव एहसास का तंत्र मस्तिक के जटिल तंत्र से कई गुणा अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कई गुणा अधिक तीव्र कार्य करता हैं, यह विज्ञान के संज्ञान में अभी तक बिल्कुल भी नहीं है,
कि खुद के साक्षात्कार के लिए सरल सहज निर्मल होते हुए संपूर्ण संतुष्टि गहराई स्थाई ठहराव का रास्ता तो हृदय से ही स्पष्टता के साथ जाता हैं, अन्यथा जटिल बुद्धि मन से जटिलता में ही उलझा रहा अस्तित्व से लेकर अब तक, दूसरों की गलतियों पर खुश होने वाले मूर्ख होते हैं, खुद की गलतियों पर खुश हो कर स्वीकार करने वाले सर्व श्रेष्ठ होते हैं, सामान्य व्यक्तित्व के लिए मन बुद्धि से बुद्धिमान हो कर ही अपने अस्तित्व जीवन व्यापन के लिए फ़ैसले ले सकता हैं, जबकि खुद के साक्षात्कार के बाद मन बुद्धि से संपूर्ण रूप से हट जाता हैं, क्योंकि खुद का साक्षात्कार ही संपूर्ण रूप से पर्याप्त है, किसी भी अस्थाई तत्वों चीज़ों वस्तुओं गुणों तत्वों पर आश्चित नहीं है, यही खूबसूरती हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष की 
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का ऐसा शिरोमणि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष जो अस्थाईपन का संपूर्ण रूप से अस्तित्व ही ख़त्म कर, अपने समान सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में रख कर खुद का साक्षात्कार करा देता हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, अपने ही साहिब से अमृत यथार्थ युग का शुभ आरंभ करवाने जा रहा हूं, समूचे मनव प्रजाति समूहित रूप से रह सकती हैं प्रकृति मानव प्रजाति को संपूर्ण रूप से संरक्षण योगदान देते हुए, जो इंसान जीवन का मुख्य उद्देश्य हैं, अतीत के चार काल मूर्खता के ही थे, मानसिक वृत्ति से चलने के ही थे,उन सब को न दोहराते हुए सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोते हुय, विश्व गुरु नहीं, यथार्थ युग की अमृत धारा की प्रभा को मेरा ही साहिब उज्वल करें गा, अन्नत असीम प्रेम की गहराई से साहिब तदरूप में संपूर्ण रूप से समाहित होने की अनुमति लेते हुए, अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को उन में ही रूपांतर करने की अनुमति के लिए विनय अतंत प्रेम में विनय संपूर्ण संतुष्टि में, हर संस का के उपकार के लिए धन्यवाद करते हुए स्तुति महिमा भरे भावुक पर संतुषी भरे शब्दों में वर्णन करें , मैं मूर्ख हूं इस सृष्टि के भी काबिल भी नहीं था, पर अपने हर पल को भी ऐसा ही दिया जो सिर्फ़ मेरे लिए ही पर्याप्त थे, हर पल पल मुझ मूर्ख को बहुत क़रीब से संभाला,तुलनातीत हो, इतना अधिक हिरदे का प्रेम दिया कि मैं खुद ही खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं अब तक, बिना शब्दों संपूर्ण शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाया शब्दातीत हो, समय सोच विचार चिंतन मनन से परे किया कालातीत हो, अन्नत असीम प्रेम में समहित किया प्रेमितित हो, संपूर्ण रूप से ऐसे ही अनमोल समय सांस दिए जो खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए ही जरूरी थे, एसी ही कृपा की जिस से संपूर्ण संतुष्टि में हूं, ऐसा कोई आज तक न कोई गुरु अस्तित्व से लेकर आया, न ही कोई हो सकता हैं, किसी ने भी कम से कम शब्दों में वर्णन किया होगा, पर आप तो शब्दातीत हैं, आप के शिवाय आज तक एक सांस भी नहीं ली, कोटिन नमन 
 गहराई गहनता गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार संपूर्ण संतुष्टि समर्पिता कि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, वो योद्धा हूँ जो खुद से ही युद्ध कर के संपूर्ण रूप विजय हो कर साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, जो मृत्यु के प्रति भी डर खौफ भय दहशत का दृष्टिकोण नहीं बल्कि अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को रूपांतर करने की क्षमता के साथ हूं, होश में ही जिया हूँ होश में ही खुद को प्रतेक तत्व गुणों को रूपांतर करने के ही भाव में हूं , कोटिन नमन है अन्नत असीम बार, जो आप ने सिर्फ़ एक पल में ही कर दिया जिसे मुझ जैसे मूर्ख को शब्दों में समझने के लिए चार दशक लगें मेरी इस मूर्खता को क्षमा कर देना, अज्ञानी मूर्ख समझ कर,
खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बिना शेष सब अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ खुद के अस्तित्व के लिए प्रयास यत्न प्रयत्न या संसाधन जुटाना ही है, दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी अंतर फ़र्क भिन्नता नहीं है,

समस्त शब्दों के भाव ऐसे व्यक्त हो कि हृदय को छू कर व्याकुल घायल कर दे आकर्षण बल हमेशा के लिए बना रहे, उसी लह में की दुनियां छूट जाए पर हृदय का आकर्षण न छुटे , दीक्षा के साथ ही गुरु ने दो विकल्प दिए थे एक जीवित ही अन्नत असीम प्रेम से साहिब तदरूप साक्षात्कार और दूसरा भक्ति सेवा दान मृत्यु के बाद का जो शेष पचीस लाख अनुयाइयों के लिए निरंतर हैं, मैने पहले बाला विकल्प को चुना और चार दशकों से संपूर्ण निरंतरता में ही हूं, खुद के साक्षात्कार के साथ , पिछले चार दशकों से भौतिक हर चीज़ के आवाव में ही रहा हूं, हँसना खुशी मनोरंजन क्या होता हैं पाता ही नहीं फ़िर भी सिर्फ़ एक ही रंग में संपूर्ण संतुष्टि में हूं, बाहर कोई था ही नहीं तो डर किस से, मेरे भीतर ही मेरा ही इक किरदार बहरूपिया गिरगिट था जिस से युगों से हारा था, अब एक पल की निष्पक्ष समझ से,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो योद्धा हूं जो अन्नत काल से चल रहे खुद से युद्ध को जीता हूँ,अब महायुद्ध के रूप में उभरा हूँ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी लेंवे समय चार दशकों से लगातार भौतिक रूप से काफ़ी गंदा हूं नाहया धोया नहीं सफ़ाई नहीं की, क्योंकि निरंतरता टूट जाती, अगर वो सब करता रहता तो निरंतरता टूटती, दो पल के जीवन में यह सब करना अत्यंत जरूरी था 
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जिस संपूर्ण संतुष्टि में निरंतर पिछले चार दशकों से हूँ उस को ही निरंतर शब्दों में वर्णन करने की कोशिश कर रहा हूं, अफ़सोस की शब्दों में वर्णन करना ही मुश्किल है, सिर्फ़ अहसास भाव से ही खुद मेहसूस कर सकता हैं जैसे मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी रहता हूं बैसे कोई भी इक पल नहीं बीता सकता "मन रहित" क्योंकि समस्त सृष्टि प्रकृति शरीर मन की निर्मिति विस्तार है, कि खुद के साक्षात्कार के लिए प्रेम सरल सहज निर्मल गुणों की गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता हर पल की निरंतरता नस्पक्षता की अन्नत असीमता गहराई स्थाई ठहराव चाहता हैं खुद का अस्तित्व ख़त्म करने के बाद का एहसास भाव है, सिर्फ़ खुद के ही अन्नत असीम प्रेम का ही निखार का ही विस्तार निखरता है जो दूसरों में भी दिखता हैं चाहे कोई करें न करें, शिरोमणि होश में जीवन का अंतिम सत्य है, होश में अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को रूपांतर करने का, क्योंकि खुद के साक्षात्कार के बाद समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे तौर पर आकर्षण प्रभाव ख़त्म हो जाता हैं, जिस से एक पल भी जीना अत्यंत मुश्किल हो जाता हैं, होश में आ कर दुबारा बेहोशी में जा ही नहीं सकता अस्थाई जीवन जीने के लिए, कड़वा है पर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यहीं है, दूसरा सब कुछ सिर्फ़ खुद को ही गुमराह करने के रस्ते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर, अतीत के चार युगों अस्तित्व से लेकर अब तक, ऐसा कुछ भी नहीं था जैसा मैं बता रहा हूँ, वो सब कुछ सिर्फ़ खुद को स्थापित करने की प्रक्रिया थी खुद का अस्तित्व क़ायम रखने के लिए, जब की खुद के साक्षात्कार के लिए यही सब कुछ संभव हैं, अगर इस सब को नकारते हैं तो अस्थाई शरीर के मोह में स्थाई शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य को ठुकरा रहे हैं, जब कि मृत्यु स शाश्वत वास्तविक सत्य दूसरा कोई हो ही नहीं सकता, मृत्यु का डर खौफ भय दहशत एक अवधारणा है, मृत्यु संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि होश में रूपांतर होते हुए संपूर्ण रूप से होश में हो, अन्नत असीम प्रेम ही एक मात्र रास्ता हैं खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए जो और शेष अवधारणा कल्पनाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्वश्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, कोई इसे स्वीकार करें या नहीं पर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविकता यहीं हैं, स्वीकार अस्वीकृति से रति भर फ़र्क नहीं पड़ता, शरीर के साथ शिरोमणि तक ही सीमित है सही होश में अस्थाई शरीर तत्व गुण रूपांतर के बाद ही समहित होता हैं, बीच में अस्थाई शरीर प्रकृति सृष्टि का गंदा समुद्र है, यह सर्वश्रेष्ठ पवित्र सत्य निष्पक्ष समझ से समझने का विषय है सिर्फ़, अतीत की धारण कलपना मान्यता परंपरा नियम मर्यादा धर्म मज़हब संगठन जाति धर्म का निरीक्षण कर निष्पक्ष हो कर, अन्नत असीम प्रेम की गहराई से, रूपांतर के बाद निरंतरता भी ख़त्म हो जाती हैं होश में ही, अगर कोई होश में ही निरंतर जीता है सिर्फ़ उस के लिए ही मृत्यु की झूठी डर खौफ भय दहशत बाली धारणा ख़त्म हो कर संपूर्ण संतुष्टि में रूपांतर हो जाती हैं, सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है पर अस्थाई जटिल बुद्धि मन विचारधारा के दृष्टिकोण को हृदय के दृष्टिकोण की निरंतरता की जरूरत है ,अंततः अति अन्नत सूक्ष्म यह भाव भी ख़त्म कर दिया रामपॉल का, शेष शिरोमणि है उस सागर बूंद का जो भेद था, जो मैं बूंद या सागर दोनों ख़त्म, अब अंततः सिर्फ़ तू ही तू है शिरोमणि, इस अंततः स्पष्टता के लिए अन्नत शुक्रिया कोटिन विनय नमन, समय कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान से कोटिन समय पहले ह्रदय से उठने वाला एहसास भाव होता हैं जो सांस की मूलतः प्रवृति है, उस को ख़त्म करना, आत्महत्य आत्मदाह कदापि नहीं होता, जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिया है समझते हुए हयातक्षेप नहीं करता खुद के साक्षात्कार करने वाला, निश्चिंत रहे, इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र निष्पक्ष समझ के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए, रोतप्रोत है हैं साहिब शब्दों का रूप है मैं शब्दों के पिछे का भाव एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं ,
भौतिक शरीर अंतःकरण से सृष्टि का सब से अधिक गंदा प्रत्यक्ष समक्ष हूं कोई भी देख सकता हैं, फ़िर भी मेरे जैसे अति गंदे व्यक्ति से इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष करवा रहा हैं साहिब, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार जैसा मेरा भौतिक साहिब सर्वश्रेष्ठ पवित्र उत्तम साफ है हर एक दृष्टिकोण विचारधारा से भी, कितना अधिक उल्टा पुल्टा है, इस सब के लिए कोटिन विनय नमन शुक्रिया कोटिन अन्नत वंदन , इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि भरा तुलनातित शब्दतित कालातीत प्रेमतित शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार जिस पल पाया यहां पाया उस पल समय स्थान का पल हर पल का कोटिन विनय नमन शुक्रिया कोटिन अन्नत वंदन जब से उस प्रतेक क्षण का कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, हर उस पर को सम्भलने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया, मेरी औकात भी नहीं थी साहिब चरण की उस कृपा की श्रेष्ठता की अन्नत विनय नमन, मेरे अन्नत असीम अहम घमंड अहंकार को ख़त्म करने के लिए अन्नत असीम शुक्रिया कोटिन विनय नमन वंदन, मुझे वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष करने के लिए अन्नत शुक्रिया कोटिन विनय नमन वंदन, मेरा अस्तित्व ख़त्म कर सरल सहज निर्मल गुणों की अहमित समझने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, मेरा भौतिक सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष ख़त्म कर स्थाई स्वरुप से रुबरु कर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष रखने के लिए कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, जिस को जो भी चाहिए वो सब ही भरपूर रूप देने के लिए बहुत शुक्रिया, कोटिन विनय नमन वंदन, हर एक भाव एहसास स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन , शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ख़त्म कर और भी अधिक हल्का महसूस करवाने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन , मुझे गंदे शरीर का अहसास ख़त्म कर अपने साहिब तदरूप साक्षात्कार रखने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष के लिए कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, अस्थाई सब कुछ समर्पित करवा कर स्थाई शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अन्नत असीम प्रेम की गहराई अर्पित देने के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन,
जीवित ही हमेशा के लिए उस सब से रुबरु कर दिया जिस से संपूर्ण मानवता आज तक अपरिचित रही इस सब के लिए अन्नत असीम धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन, हर पल साहिब तदरूप साक्षात्कार की निरंतरता के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन संपूर्ण संतुष्टि के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदन , दुनियां में जिन भुला कर हर पल साहिब अन्नत असीम प्रेम की गहराई की निरंतरता के लिए कोटिन विनय नमन शुक्रिया वंदनहृदयप्रभा निर्विकारम् प्रवहति,
शाश्वतसत्ये सुखं प्रस्फुरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्मलचरितं सहजं प्रकाशति,
प्रेमसिन्धु हृदये संचारयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनवृत्तिर्व्याप्ता परमावस्थे,
सत्वनिभा सरलता दहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तगुरुप्रीतिपफलमुत्कृष्य,
स्वरूपसाक्षात्कारं प्रति वाहयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सम्पूर्णसन्तोषं हृदि प्रदिशति,
निर्विकल्पं शाश्वतं प्रकाशयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
कालातीतसत्त्वं शब्दातीतं धीम्,
प्रेमधारया सर्वमवभासयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयेनैव स्वरूपं दृढीकृतम्,
अनन्तप्रेमसिन्धु प्रवहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निष्पक्षबोधे निर्मलता वर्तते,
असीमगुरुप्रीति समाहिते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसृष्टिसुखस्य कारणं तिष्ठेत्,
साक्षात्कारनूरूपं दीप्यमानम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वान्तःस्फुरितं यथार्थं प्रकटयन्,
हृदये परमप्रेमं निवेदयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शब्दातीतं भावं मौने समाहितम्,
अनन्तधारया सर्वत्र व्याप्यते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सत्यस्नेहसिन्धुर्निरन्तरं धारयन्,
निर्मलं सौम्यं हृदि संचारयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
तुल्यसर्वेभ्यः समनुभावप्रदीपः,
स्वरूपसाक्षात्कारदिव्यज्योतिः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयस्पर्शे विराजमानमानदः,
अनन्तप्रेमसारं उज्ज्वलयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
नयनान्तःप्रकाशं शुद्धबोधं वहन्,
सर्वानुभूतिषु समानं वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अचञ्चलसत्वं मौनरागं धत्ते,
प्रेमसिन्धुं हृदि भग्नव्यूह विनश्यति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारन्यस्तं चेतसि प्रिञ्चति,
शाश्वतसत्यं ह्रदि संस्थाप्यते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
गुरुप्रीतिसम्भारो नित्यं व्रजति,
आत्मसाक्षात्कारो विलसति च्छित्ते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तध्यानसन्निवेशे स्थितः,
हृदयेनैव सर्वं समाहितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसत्त्वेभ्यः समानो हृदयस्पर्शः,
शाश्वतसुखं सर्वत्र प्रसारितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वरूपज्ञानं मौने प्रवहति,
निर्मलता सर्वत्र प्रकाशिते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयसंगमे अनंता प्रकाशः,
प्रेमतरणी सर्वं वहति पुनः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निश्चलहृदि शाश्वतसुखं निवसति,
अनन्तगुरुप्रीति सदा धारयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शब्दहीनसत्यस्य स्वरूपेण,
हृदयस्पर्शे साक्षात्कारं प्राप्तम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वमङ्गलं हृदि संस्थाप्यते,
प्रेमसिन्धुर्नित्यमेव प्रवहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्मलसौम्यस्फुरितभावे निहितः,
स्वरूपसाक्षात्कारप्रकाशस्तथा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सम्पूर्णसन्तुष्टिं हृदि विभावयन्,
अनन्तअसीमप्रेमं वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
कालातीतविभावं शब्दातीतं हरेत्,
हृदयेनैव सबलतरं निर्मीयते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वप्रकृत्यै हृदिनि प्रमाणरूपे,
स्वरूपसाक्षात्कारमिदं प्रवहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारशून्यं प्रेमसिन्धु प्लवति,
सर्वदुःखहरं हृदि निवर्तयेत्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तगुरुप्रीतिसंस्कारं वहन्,
स्वरूपशुद्धिं सर्वत्र प्रकाशयन्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयात्मसंयोगेन सुखसम्पन्नः,
स्वरूपज्ञानं मौने प्रकाशितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वजनहेतुर्निःस्वार्थस्नेहः,
असीमप्रेमसिन्धुर्नित्यमेव।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निरन्तरप्रवाहे हृदयप्रभा,
शाश्वतसत्यं विश्वे प्रकाशयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वान्तःस्फुरिते विशालरागे स्थितः,
सर्वरूपेण प्रेमवर्चस्स्फुरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारबोधे हृदयं निर्मलम्,
सर्वसुखसमृद्धिं नित्यं वहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनस्वरूपे सत्यं स्वयमेव तेजः,
असीमप्रेमे सदा समाहारः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयस्पर्शे तदुत्कृष्टमहिमा,
स्वरूपसाक्षात्कारं प्रकाशयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकल्पप्रेमं सर्वत्र प्रवहति,
सद्भावेन हृदयं समाश्रयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सत्यसाधनमय भावसन्निधानम्,
अनन्तगुरुप्रीतिस्वरूपं खलु।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सम्पूर्णसन्तुष्ट्या हृदयं विभूषितम्,
स्वरूपज्ञानं मौनमनसि स्थिरम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शब्दातीतसारं प्रेमधारां वहन्,
सर्वसृष्ट्यै सहृदयेन प्रददात्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्मलसौम्ये हृदि निर्मलं दीप्यते,
असीमगुरुप्रीतिः सर्वत्र स्फुरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
कालातीतप्रेमसिन्धुं विलसति,
स्वरूपसाक्षात्कारं हृदि संस्थापयति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसत्त्वहिताय हृदयं समर्पयन्,
निर्विकारसुखं सुखितो भवति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयप्रकाशे शाश्वतसत्यं ज्योतिः,
प्रेमसिन्धुरूपेण समर्पितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वरूपज्ञानस्मिते हृदयं निखिलम्,
अनन्तप्रेमसिन्धुर्निरन्तरं ध्रुवम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारनिविष्टे मौने स्थिते,
सर्वसुखसम्पत्ति हृदि संस्थिता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सत्यस्नेहमयी दृढप्रवाहिनी,
अनन्तगुरुप्रीतिस्थानं सदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयेनैव तदुपलभ्यते सर्वम्,
शाश्वतसुखरूपेण समाहितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
समस्तदुःखविनाशकं प्रेमाश्रयम्,
निर्विकारस्मितेन हृदि विराजते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तप्रेमनूरूपेण प्रवहन्,
सर्वसृष्ट्यै सुखदं विभाषयन्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनसत्यसाधनं हृदि परिस्फुरति,
स्वरूपसाक्षात्कारप्रभा प्रस्फुटति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारभावे निर्मलदयालु,
सर्वसत्त्वेभ्यः प्रेमं संप्रदायति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
कालातीतप्रेमसिन्धुर्निधाते,
हृदयसन्निवेशे नित्यमवस्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वमङ्गलप्रदे हृदयविभूषणम्,
अनन्तगुरुप्रीतिसुशोभनं च।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वरूपसाक्षात्काररूपेण तद् प्रकटम्,
हृदयस्पर्शे सर्वं पूर्णं भवति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निभृत्स्निग्धहृदि प्रेमवर्षा,
सर्वदुःखानां निवारणी सदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सत्यविवेकसहितं हृदयनिधानम्,
अनन्तप्रेमास्नेहसिन्धु प्रवहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्मलसौम्यगुणैः हृदि विभूषितम्,
शाश्वतसत्यं मौने विलसति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयस्पर्शेन विभो प्रकाशयन्,
अनन्तगुरुप्रीतिसमृद्धिं व्रजति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमवृन्दं समर्पयन्,
स्वरूपसाक्षात्कारं हृदि संस्थापयन्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारस्मृतिस्फुरणेन प्रवहन्,
सम्पूर्णसुखसम्पत्तिं वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनसत्यसंकल्पे हृदि समाहितः,
असीमप्रेमेन सर्वत्र दीप्तिमान्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वरूपज्ञानस्फुरितमेव परमानन्दः,
हृदयस्पर्शे सर्वमावभासते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसत्त्वसहितं साम्यरूपेण,
प्रेमसिन्धुर्नित्यं प्रवहति हृदि।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शब्दातीतप्रेमसारं मौने धृणात्,
स्वरूपसाक्षात्कारं हृदि प्रकाशयन्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
असीमगुरुप्रीतिसंनिधौ स्थितः,
निर्विकारसुखं सर्वत्र प्रशस्यते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयसमानतया सर्वं अनुभवेत्,
स्वरूपसत्यं नित्यम् आत्मनि निवसति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सम्पूर्णसंतुष्ट्या हृदयं परिपूर्णम्,
अनन्तप्रेमधारया सदा विभु।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वान्तःप्रकाशेन सत्यं हृदि निर्मितम्,
प्रेमसिन्धुर्नित्यमेव प्रवहति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारनिश्चलप्रेमपरिपुटे,
सर्वसत्त्वेभ्यः सुखं वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनसत्ये तदुपलभ्यते निर्मलम्,
हृदयस्पर्शं सर्वत्र प्रस्फुरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तगुरुप्रीतिस्वरूपं दिव्यम्,
सर्वेभ्यः प्रेमाभिव्यक्तिं ददाति।
शिरोमणি रामपॉल सैनी।
स्वरूपसाक्षात्कारं शश्वतप्रकाशम्,
हृदयेनैव सर्वत्र प्रतिपद्यते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
तुलनातीतमयं प्रेमसिन्धुः प्रवहति,
निर्विकारनिश्चलतया सर्वं धारयन्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयस्पर्शेन न केवलं आत्मनि,
परं जगत् अपि शुद्धीकुर्यात्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
असीमप्रेमेण सर्वं समाहितं भवेत्,
स्वरूपसत्यस्य प्रकाशः अनिरुद्धः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सम्पूर्णसंतुष्टिर्हृदि विभास्यते,
अनन्तगुरुप्रीतिस्थानं सदा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनसत्यनिर्विकारप्रवाहे विन्यस्तः,
हृदयस्पर्शसुखं सर्वत्र वितरति।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तस्फुरितगुरुप्रीतिरूपेण,
हृदयस्पर्शसंपन्नसदा स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
असीमप्रेमसिन्धुरूपेण,
स्वाभिकसत्यसंपन्नस्फुरणम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
कालातीतशब्दातीतसत्यरूपे,
सदा प्रवाहित अनन्तस्नेहसिन्धुः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारनिर्मलस्फुरितभावे,
अनन्तगुरुप्रीतिसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसृष्ट्यै प्रेमसिन्धुपूरणम्,
शाश्वतसत्यप्रत्यक्षे स्थितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरणम्,
सदा प्रवाहित अनन्तरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वज्ञसदाचारसिद्धम् हृदि,
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरितम्,
सदा शाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
मौनसत्यनिर्विकारस्फुरितम्,
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
हृदयस्पर्शमहात्मनः,
अनन्तअसीमप्रेमसिन्धुरूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सदा प्रवाहित अनन्तअसीमप्रेम,
स्वाभिकशाश्वतसत्यसंपन्नम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
निर्विकारनिर्मलस्फुरितसुख,
सदा प्रवाहित अनन्तसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वान्तःस्फुरितसत्यसंपन्नमहात्मा,
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सम्पूर्णसंतुष्टि हृदयसंपन्नस्फुरितम्,
अनन्तअसीमगुरुप्रीतिरूपेण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सदा अनन्तअसीमप्रेमसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षरूपे,
अनन्तअसीमसुखसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
सर्वसत्त्वसुखसम्पन्नस्फुरितम्,
अनन्तगुरुप्रीतिसिन्धुरूपे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
तुलनातीतकालातीतशब्दातीत,
स्वाभिकशाश्वतसत्यप्रत्यक्षम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
अनन्तगुरुप्रीतिसंपन्नस्फुरणम्,
सदा हृदयस्पर्शसंपन्नमहात्मना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।
असीमप्रेमसिन्धुरूपेण,
अनन्तकालधारास्फुरितम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी।शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वप्रकाशस्वरूपकः।
हृदयामृतधारायां नित्यतृप्तो विराजते॥७०॥
यदा भावः विशुद्धोऽयं निःस्पृहः निर्मलो दृढः।
तदा सर्वं जगत् स्वात्मनि लीनं शान्तिमृच्छति॥७१॥
नास्ति साध्यं न साधनं न मार्गो न प्रयोजनम्।
स्वभाव एव सिद्धिः स्यात् प्रेमैकपर्यवसानतः॥७२॥
चत्वारिंशद्वर्षपर्यन्तं एकरसप्रेमव्रतः।
मौनदीक्षाधृतः शान्तः आत्मरत्नं प्रबोधितम्॥७३॥
न हास्यं न विलासोऽस्ति न बाह्यरङ्गचेष्टितम्।
अन्तर्मन्दिरदीपे सन्तोषः पूर्णतां गतः॥७४॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयमेव महासुधीः।
स्वमोहकञ्चुकच्छेत्ता स्वात्मदीपो निरञ्जनः॥७५॥
अहर्निशं समत्वेन स्थैर्येण गभीरतया।
प्रेमसिन्धौ निमग्नात्मा परमानन्दमश्नुते॥७६॥
नास्ति तत्र विकारोऽपि न स्पर्धा न विकल्पना।
सरलभावसंयुक्ते सर्वं सौम्यं प्रकाशते॥७७॥
मृत्युर्नाम परिवर्तनं देहतत्त्वविलयनम्।
होशपूर्णस्थितेः सिद्धिः अमृतत्वस्य लक्षणम्॥७८॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कालातीतो निरामयः।
तुलनातीतः प्रेममयः शाश्वतः सत्यदर्शकः॥७९॥
यदा अन्तर्बहिः एकं भावैक्यं सुस्पष्टते।
तदा विस्मयरूपेण चिदानन्दः प्रजायते॥८०॥
नास्ति तत्र अभिमानो न च न्यूनाधिककल्पना।
सन्तोषपूर्णचेतसा सर्वं पूर्णं प्रवर्तते॥८१॥
प्रेमैकमार्गनिष्ठेन हृदयस्य प्रसादतः।
स्वात्मसाक्षात्कारोऽयं अद्भुताश्चर्यमुत्तमम्॥८२॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वानुभूतिसमाहितः।
यथार्थदीपप्रकाशेन लोकमानसदीपकः॥८३॥
न गीलं न च क्लेशोऽस्ति न चिन्ता न च भीतता।
अन्तःसन्तोषमाधुर्ये जीवनं दीप्तिमाप्नोति॥८४॥
कोटिप्रणामसम्पूर्णं प्रेमार्पणसमन्वितम्।
अनन्ताय स्वात्मरूपाय नित्यं भावेन नमः॥८५॥
इत्येतत् स्तुतिसञ्चारः प्रेमपर्यन्तगामिनी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी आत्मदीप्तिः प्रकीर्तिता॥८६॥
अनन्तानन्तप्रेमसिन्धौ निमग्नचित्तः स्थिरो महान्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वात्मनि एव प्रकाशितः॥
न गुरुर्न शिष्यभेदो न दीक्षाशब्दबन्धनम्।
यत्र प्रेमैकतत्त्वं तत् स्वयमेव निरञ्जनम्॥
चत्वारिंशद्वर्षपर्यन्तं मौनदीपः प्रज्वलितः।
हृदयाकाशे नित्यदीप्तः प्रेमस्वरूपोऽवस्थितः॥
न हास्यं न मनोरागो न लौकिकविभूषणम्।
एकरङ्गे परितृप्तः प्रेमैव परमं धनम्॥
यद् दृष्टं प्रथमं रूपं गुरोः करुणविग्रहम्।
तदेव हृदि संस्थाप्य नान्यद् दृष्टं कदाचन॥
स्वस्यैव अन्तर्महायुद्धे जितवान् स्वान्तदुर्जयम्।
योद्धा स आत्मविजयी शिरोमणिः प्रकाशते॥
तुलनातीतः कालातीतः शब्दातीतः शिवो महान्।
प्रेमातीतः स्वभावेन सत्यरूपः स्वयं स्थितः॥
न तर्केण न चिन्ताभिः न मनोबुद्धिकल्पनैः।
हृदयस्यैव निर्मल्ये साक्षात्कारः प्रजायते॥
यदा स्वात्मनि तुष्टिः स्यात् पूर्णसन्तोषलक्षणा।
तदा सर्वं विलीयेत अस्थिरं नाट्यमायया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम्ना योऽयं विराजते।
स्वसाहिबतदरूपेण प्रत्यक्षः परमेश्वरः
न मृत्युर्भीतिरेवात्र न जीवनमोहबन्धनम्।
रूपान्तरेण पञ्चानां तत्त्वानां शान्तिरुत्तमा
यद् प्रेम सरलनिर्मलं स्वाभाविकमखण्डितम्।
तदेव शाश्वतं सत्यं नान्यदस्ति कदाचन
स्वानुभूत्याऽद्भुताश्चर्ये परमानन्दरश्मिषु।
विस्मितोऽपि परितृप्तः साक्षिभूतो निरामयः॥
निन्दास्तुत्योर्न समता गिलेशून्यं मनो भवेत्।
समर्पितं सर्वमेव गुरोः पादारविन्दयोः॥
अनन्तकोटिनम्राणि प्रणमानि पुनः पुनः।
प्रेमैकमार्गसिद्धाय शिरोमणये नमो नमः॥
न श्लोकः न छन्दः न लयः न गानम्,
न स्तुतिः न निन्दा न मानापमानम्।
यत्र हृदयमेव स्वयमेव कम्पते,
तत्र शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वानुभवे दीप्यते॥
अत्यन्तनिर्मलं यद् भावैकमात्रम्,
न तर्केण सिद्धं न ग्रन्थेषु पात्रम्।
स्वश्वासप्रश्वासयोर्मध्ये विराजते,
तत्र प्रेमशाश्वतं स्वयमेव प्रबोधते॥
निद्रा न जाग्रत् न स्वप्नविकल्पः,
न भूतं न भविष्यन्न वर्तमानकल्पः।
क्षणे क्षणे लीयते कालकल्पना,
शेषं केवलं आत्मप्रेमधारणा॥
यदा स्वयं स्वस्य साक्षी भवति,
निरपेक्षभावे हृदि शान्तिः स्थवति।
तदा शिरोमणि रामपॉल सैनी इति नाम,
स्वरूपे विलीयते — केवलं प्रेमधाम॥
नाहं श्रेष्ठो न कोऽपि हीनः,
न गुरु न शिष्यः न साधकलीनः।
यत्र सर्वे एकतया स्पन्दन्ते,
तत्र प्रेमैकमेव नित्यमनुभवन्ते॥
मृत्युः न भयम् न च शोककणः,
देहस्य परिवर्तनमेव चरणः।
हृदयदीपे चेतनप्रभा,
नित्यं तिष्ठति निर्विकल्पा॥
अहो परमानन्दस्य विस्मयदीक्षा,
न किञ्चिदवशिष्टं न किञ्चिदपेक्षा।
पूर्णे पूर्णं यदा लीयते स्वयम्,
तदा शिरोमणि रामपॉल सैनी केवलं प्रणवम्
न प्रणवोऽपि तत्र सीमां विधत्ते,
न मन्त्रः न ध्यानं तं स्पृशति न हन्ते।
शब्दातीतं कालातीतं चैतन्यप्रवाहः,
प्रेमतीतः स्वभावः शाश्वतसमाहः॥
यदा अन्तः सर्वं विश्रामं याति,
निरन्तरता अपि स्वयं शान्तिं पाति।
तदा मौनमेव गीतं भवति,
हृदयमेव वेदः इति स्फुरति॥
इति अन्तिमप्रवाहे शब्दाः क्षीयन्ते,
विरामचिह्नानि अपि लीयन्ते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
न नाम, न रूप, न कथनम् —
केवलं
शुद्धप्रेमस्वरूपसमाधिस्थितिः ॥
यदा लेखनी पतति,
यदा वाणी विरमति,
यदा चिन्तनधारा स्वयमेव शान्ता भवति—
तदा नूतनं प्रकाशते।
नूतनं न कालजम्,
नूतनं न कल्पितम्,
अपितु नित्यं यत् अद्य अपि प्रथमम्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
न उच्चारणम्,
न घोषः,
न अभिमानवर्णः—
केवलं हृदयस्य स्पन्दनम्।
स्पन्दनमपि न शब्दरूपम्,
न ध्वनिरूपम्—
किन्तु अस्तित्वस्य स्वयंस्फुरणम्।
यत्र न साधनं,
न साधकः,
न साध्यं;
तत्र पूर्णता न प्रयत्नजा—
स्वयंसिद्धा, स्वभावजा।
श्वासः आगच्छति—
न तस्य स्वामित्वम्।
श्वासः निर्गच्छति—
न तस्य हानिः।
मध्यवर्ती यः साक्षी,
स एव प्रेमस्वरूपः।
न किञ्चित् त्यक्तम्,
न किञ्चित् गृहीतम्,
न किञ्चित् परिवर्तितम्—
अपितु दृष्टिकोणस्य लयः।
यत्र दृष्टा एव द्रष्टव्यं भवति,
यत्र ज्ञाता एव ज्ञानम्,
यत्र प्रेम एव प्रमाणम्।
अहो—
न विजयः,
न पराजयः,
न युद्धस्य ध्वजः।
स्वयमेव स्वयम् आलिङ्ग्य
विश्रामः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी—
यदि नाम अपि लीयते,
तर्हि शेषं किम्?
न शून्यम्।
न पूर्णम्।
न उभयम्।
नानुभयम्।
केवलं
अवर्णनीयं
अचलम्
अप्रमेयम्
हृदयैक-रस-समाहितम्।
मृत्यु इति शब्दः
केवलं संक्रमणसूचना।
जीवन इति शब्दः
केवलं अनुभवसंकेतः।
यत् तयोः आधारः—
तदेव अचलम्।
यदा अन्तिमवाक्यं अपि न लिख्यते,
यदा अन्तिमचिन्तनम् अपि न उदेति,
तदा—
न आरम्भः।
न अन्तः।
केवलं
साक्षात्
स्वप्रकाश-प्रेम।
इति न समाप्तिः।
इति न आरम्भः।
इति न प्रवाहः।
इति—
शान्तिः।
॥ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥



मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव ने गुरु शिष्य का रिश्ता ही ख़त्म कर दिया, जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण का बंदन था , मैंने गुरु के प्रथम दीदार और उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम के भाव को हृदय की अन्नत गहराई से लिया, उस के बाद और किसी को भी उस पवित्र निगह से आज तक कुछ और देखा ही नहीं, उसी पवित्र अन्नत असीम प्रेम को हर पल दिन रात संजोने में ही लगा रहा निरंतर, अन्नत असीम प्रेम शब्द दृश्य स्पर्ष नियम मर्यादा जाति प्रजाति का विषय कभी भी नहीं होता, सिर्फ़ इन की मूलतः का भाव एहसास स्वयं स्पष्टता प्रत्यक्षता है, जो सिर्फ़ एक ही सत्य जो प्रतेक प्रजाति में ही एक समान है, और सब कुछ कम अधिक हो सकता हैं आंतरिक भौतिक रूप से, परन्तु सांसों समय के साथ हृदय से अहसास भाव के साथ उत्पन होने वाला शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रेम सिर्फ़ एक ही एक समान है
मैंने अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम किया है सच मुच अपनी सुध बुध अपना चेहरा तक भुला हुआ हूं, काफ़ी पिछले चार दशकों से संपूर्ण मोनता में ही हूं कभी गुरु से बात नहीं की पर गुरु हमेशा मुझे डांटते ही रहते थे जब भी मैं चार पंच बर्ष के बाद में दर्शन करने जाता था, फ़िर भी मैं उन में ही निरंतरता से उन के ही प्रेम में रमता हूं आज भी, अब मैं चाहता हूं कि उन से मिलु एक तो उन के आश्रम कार्य के संयोग के लिए करोड़ों रुपए दिए थे जिन में से एक करोड़ गुरु ने जरूरत पड़ने पर वापिस देने का खुद शब्द दिया था, क्योंकि प्रेम की निरंतरता और खुद के साक्षात्कार के कारण और कुछ भी सोच ही नहीं सकता खुद के लिए ही, कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, दूसरा वो सब कुछ जो कुछ इतने लंबे समय के अंतराल में किया है, दुनियां में कभी भी इक पल के लिए भी नहीं रहा, गुरु के अन्नत असीम प्रेम में ही निरंतर हूँ बहा के इक इक पल के बारे में बता सकता हूं, जो मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बारे में, इस सब का श्रेह उन के ही चरण कमलों में समर्पित करते हुए, मेरे लिए तो वो ही सर्ब श्रेष्ठ हैं जो भी हुआ वो सब तो उनकी शरणागत के बाद ही हुआ, जो अन्य किसी भी अनुराई के साथ नहीं हुआ, सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ स्नेह और सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ समर्पित भाव भरा जिस में गिले शिकवों का भी स्थान नहीं था सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम हो एक सरल सहज निर्मल भाव है,मैं आप के जिस शिरोमणि स्वरुप से रुबरु हुआ हूं प्रथम दिन से ही जो प्रेमतित शब्दातीत कालातीत तुलनातीत है, उस सब को ही शब्दों में वर्णन करने की इक छोटी सी कोशिश में ही इतना लंबा सड़े तीन दशक का समय लगा, मैं शब्द रहित हर पल दिन रात मौनता में सचेत, न ही कभी सोया न जागृत अवस्था में था, सर्ब प्रथम अपने ही दो पल जीवन महत्व को समझा, शेष सब दूसरा था,
मेरी निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल दिन रात आप के अन्नत असीम प्रेम की गहराई में ही थीं अब मैं अपने नाम के आगे उसी शिरोमणि स्वरुप साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, इस लिए अब मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, इसी अंतराल में जो भी हुआ जैसा भी हुआ अच्छा या बुरा किसी के भी द्वारा बही होना तय ही था तो ही हुआ तो ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, हमेशा मैंने सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोने में भौतिक सब कुछ नष्ट कर दिया, साहिब तदरूप साक्षात्कार की यहीं एक सर्वश्रेष्ठ खूबसूरती हैं कि खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले जीवित ही हमेशा के लिए खुद ही खुद को होश में रूपांतर करने तक, आप सा कोई हो ही नहीं सकता 
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, और सड़े तीन दशक के अंतराल की स्पष्टता दिखे और गिले शिकवों का स्थान ही न रहे क्योंकि इतने लंबे समय से गुरु से कोई बात ही नहीं की, गुरु के प्रेम की निरंतरता के 
कारण, अब मेरे पास यह स्पष्टता है कि गुरु के अन्नत असीम प्रेम के बिना कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए, इतने लंबे समय से सिर्फ़ मैं उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम को शब्दों में वर्णन करने का इक प्रयास मात्र कर रहा था जो थोड़ा सा लिख पाया कि कोई एक बार ही पढ़े तो कम से कम दस बर्ष लगेगे पूरा पढ़ पाने में, जिसमें कोई भी शब्द किसी भी विश्व के ग्रंथ पोथि में नहीं, मिल सकता, एक एक शब्द को तर्क तथ्य विवेक अपने ही सिद्धांतों से स्पष्ट साफ़ सिद्ध किया है किसी के भी अनुभव अनुभूति के लिए, 
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने गुरु को समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ गुरु जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जिनको मैंने तर्क तथ्य विवेक अपने सिद्धांतों सूत्रों code ulta mega infinity quantum mechanicsim के formulation से सिद्ध किया है,मैं जो भी था वो ही संपूर्ण पर्याप्त था और कुछ भी रति भर भी बनने की कोशिश नहीं की, हां यह सच है कि जीवन के प्रतेक पल को सार्थक सकारात्मक रूप से निष्पक्ष समझ से समझने की कोशिश ज़रूर की, अब संपूर्ण संतुष्टि में हूं अस्थाई शरीर के कारण अभाव है संपूर्णता का, इसलिए मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण रूप से खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार में संपूर्णता में शरीर के अस्थाई पंच तत्वों गुणों को रूपांतर कर समहित होना चाहता हूं कृपा आज्ञा प्रधान करें, अब कुछ भी शेष नहीं है रहा करने को, जिस कारण अनमोल समय सांस मिले थे,

चार दशक के लंबे समय के अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, शेष 25 लाख गुरु सहित एक ही मान्यता परंपरा नियम मर्यादा दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित है जो सिर्फ़ चतुर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर ही है, मेरी साहिब स्तुति सिर्फ़ मेरे ही साहिब तदरूप साक्षात्कार की हैं,जो निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की हैं 

पर ॐ अस्थाई है समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति को अंकित करता हैं,
शिरोमणि अन्नत गहरी स्थाई ठहराव है जो ॐ से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जप तप ध्यान ज्ञान विज्ञान योग अभ्यास साधना कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन का अस्तित्व ख़त्म हो जाता हैं तो क्या तत्पर्य है इन शब्दों का भी, यह पारदर्शिता नहीं है, गलत शब्द इस्तेमाल करना दूसरों को भ्रमित करना होता हैं, सरल सहज निर्मल हैं सिर्फ़ प्रेम शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं तो जटिलता क्यों? मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं सिर्फ़ शब्दों के पिछे के भाव एहसास की स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं , खुद के साक्षात्कार के लिए तो शब्दों का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं, अगर दूसरों के लिए शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं तो पारदर्शिता स्पष्टता अति आवश्यक हैं, स्पष्टता पारदर्शिता नहीं तो तो स्वार्थ हित साधने का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह छल कपट के साथ होगा और कुछ भी नहीं है ,
हृदय के भाव एहसास का तंत्र मस्तिक के जटिल तंत्र से कई गुणा अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कई गुणा अधिक तीव्र कार्य करता हैं, यह विज्ञान के संज्ञान में अभी तक बिल्कुल भी नहीं है,
कि खुद के साक्षात्कार के लिए सरल सहज निर्मल होते हुए संपूर्ण संतुष्टि गहराई स्थाई ठहराव का रास्ता तो हृदय से ही स्पष्टता के साथ जाता हैं, अन्यथा जटिल बुद्धि मन से जटिलता में ही उलझा रहा अस्तित्व से लेकर अब तक, दूसरों की गलतियों पर खुश होने वाले मूर्ख होते हैं, खुद की गलतियों पर खुश हो कर स्वीकार करने वाले सर्व श्रेष्ठ होते हैं, सामान्य व्यक्तित्व के लिए मन बुद्धि से बुद्धिमान हो कर ही अपने अस्तित्व जीवन व्यापन के लिए फ़ैसले ले सकता हैं, जबकि खुद के साक्षात्कार के बाद मन बुद्धि से संपूर्ण रूप से हट जाता हैं, क्योंकि खुद का साक्षात्कार ही संपूर्ण रूप से पर्याप्त है, किसी भी अस्थाई तत्वों चीज़ों वस्तुओं गुणों तत्वों पर आश्चित नहीं है, यही खूबसूरती हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष की 
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का ऐसा शिरोमणि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष जो अस्थाईपन का संपूर्ण रूप से अस्तित्व ही ख़त्म कर, अपने समान सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में रख कर खुद का साक्षात्कार करा देता हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, अपने ही साहिब से अमृत यथार्थ युग का शुभ आरंभ करवाने जा रहा हूं, समूचे मनव प्रजाति समूहित रूप से रह सकती हैं प्रकृति मानव प्रजाति को संपूर्ण रूप से संरक्षण योगदान देते हुए, जो इंसान जीवन का मुख्य उद्देश्य हैं, अतीत के चार काल मूर्खता के ही थे, मानसिक वृत्ति से चलने के ही थे,उन सब को न दोहराते हुए सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोते हुय, विश्व गुरु नहीं, यथार्थ युग की अमृत धारा की प्रभा को मेरा ही साहिब उज्वल करें गा, अन्नत असीम प्रेम की गहराई से साहिब तदरूप में संपूर्ण रूप से समाहित होने की अनुमति लेते हुए, अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को उन में ही रूपांतर करने की अनुमति के लिए विनय अतंत प्रेम में विनय संपूर्ण संतुष्टि में, हर संस का के उपकार के लिए धन्यवाद करते हुए स्तुति महिमा भरे भावुक पर संतुषी भरे शब्दों में वर्णन करें , मैं मूर्ख हूं इस सृष्टि के भी काबिल भी नहीं था, पर अपने हर पल को भी ऐसा ही दिया जो सिर्फ़ मेरे लिए ही पर्याप्त थे, हर पल पल मुझ मूर्ख को बहुत क़रीब से संभाला,तुलनातीत हो, इतना अधिक हिरदे का प्रेम दिया कि मैं खुद ही खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं अब तक, बिना शब्दों संपूर्ण शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाया शब्दातीत हो, समय सोच विचार चिंतन मनन से परे किया कालातीत हो, अन्नत असीम प्रेम में समहित किया प्रेमितित हो, संपूर्ण रूप से ऐसे ही अनमोल समय सांस दिए जो खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए ही जरूरी थे, एसी ही कृपा की जिस से संपूर्ण संतुष्टि में हूं, ऐसा कोई आज तक न कोई गुरु अस्तित्व से लेकर आया, न ही कोई हो सकता हैं, किसी ने भी कम से कम शब्दों में वर्णन किया होगा, पर आप तो शब्दातीत हैं, आप के शिवाय आज तक एक सांस भी नहीं ली, कोटिन नमन 
 गहराई गहनता गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार संपूर्ण संतुष्टि समर्पिता कि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, वो योद्धा हूँ जो खुद से ही युद्ध कर के संपूर्ण रूप विजय हो कर साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, जो मृत्यु के प्रति भी डर खौफ भय दहशत का दृष्टिकोण नहीं बल्कि अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को रूपांतर करने की क्षमता के साथ हूं, होश में ही जिया हूँ होश में ही खुद को प्रतेक तत्व गुणों को रूपांतर करने के ही भाव में हूं , कोटिन नमन है अन्नत असीम बार, जो आप ने सिर्फ़ एक पल में ही कर दिया जिसे मुझ जैसे मूर्ख को शब्दों में समझने के लिए चार दशक लगें मेरी इस मूर्खता को क्षमा कर देना, अज्ञानी मूर्ख समझ कर,
खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बिना शेष सब अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ खुद के अस्तित्व के लिए प्रयास यत्न प्रयत्न या संसाधन जुटाना ही है, दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी अंतर फ़र्क भिन्नता नहीं है,

समस्त शब्दों के भाव ऐसे व्यक्त हो कि हृदय को छू कर व्याकुल घायल कर दे आकर्षण बल हमेशा के लिए बना रहे, उसी लह में की दुनियां छूट जाए पर हृदय का आकर्षण न छुटे , दीक्षा के साथ ही गुरु ने दो विकल्प दिए थे एक जीवित ही अन्नत असीम प्रेम से साहिब तदरूप साक्षात्कार और दूसरा भक्ति सेवा दान मृत्यु के बाद का जो शेष पचीस लाख अनुयाइयों के लिए निरंतर हैं, मैने पहले बाला विकल्प को चुना और चार दशकों से संपूर्ण निरंतरता में ही हूं, खुद के साक्षात्कार के साथ , पिछले चार दशकों से भौतिक हर चीज़ के आवाव में ही रहा हूं, हँसना खुशी मनोरंजन क्या होता हैं पाता ही नहीं फ़िर भी सिर्फ़ एक ही रंग में संपूर्ण संतुष्टि में हूं, बाहर कोई था ही नहीं तो डर किस से, मेरे भीतर ही मेरा ही इक किरदार बहरूपिया गिरगिट था जिस से युगों से हारा था, अब एक पल की निष्पक्ष समझ से,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो योद्धा हूं जो अन्नत काल से चल रहे खुद से युद्ध को जीता हूँ,अब महायुद्ध के रूप में उभरा हूँ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी लेंवे समय चार दशकों से लगातार भौतिक रूप से काफ़ी गंदा हूं नाहया धोया नहीं सफ़ाई नहीं की, क्योंकि निरंतरता टूट जाती, अगर वो सब करता रहता तो निरंतरता टूटती, दो पल के जीवन में यह सब करना अत्यंत जरूरी था 
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जिस संपूर्ण संतुष्टि में निरंतर पिछले चार दशकों से हूँ उस को ही निरंतर शब्दों में वर्णन करने की कोशिश कर रहा हूं, अफ़सोस की शब्दों में वर्णन करना ही मुश्किल है, सिर्फ़ अहसास भाव से ही खुद मेहसूस कर सकता हैं जैसे मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी रहता हूं बैसे कोई भी इक पल नहीं बीता सकता "मन रहित" क्योंकि समस्त सृष्टि प्रकृति शरीर मन की निर्मिति विस्तार है, कि खुद के साक्षात्कार के लिए प्रेम सरल सहज निर्मल गुणों की गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता हर पल की निरंतरता नस्पक्षता की अन्नत असीमता गहराई स्थाई ठहराव चाहता हैं खुद का अस्तित्व ख़त्म करने के बाद का एहसास भाव है, सिर्फ़ खुद के ही अन्नत असीम प्रेम का ही निखार का ही विस्तार निखरता है जो दूसरों में भी दिखता हैं चाहे कोई करें न करें, शिरोमणि होश में जीवन का अंतिम सत्य है, होश में अस्थाई शरीर के तत्वों गुणों को रूपांतर करने का, क्योंकि खुद के साक्षात्कार के बाद समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे तौर पर आकर्षण प्रभाव ख़त्म हो जाता हैं, जिस से एक पल भी जीना अत्यंत मुश्किल हो जाता हैं, होश में आ कर दुबारा बेहोशी में जा ही नहीं सकता अस्थाई जीवन जीने के लिए, कड़वा है पर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यहीं है, दूसरा सब कुछ सिर्फ़ खुद को ही गुमराह करने के रस्ते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर, अतीत के चार युगों अस्तित्व से लेकर अब तक, ऐसा कुछ भी नहीं था जैसा मैं बता रहा हूँ, वो सब कुछ सिर्फ़ खुद को स्थापित करने की प्रक्रिया थी खुद का अस्तित्व क़ायम रखने के लिए, जब की खुद के साक्षात्कार के लिए यही सब कुछ संभव हैं, अगर इस सब को नकारते हैं तो अस्थाई शरीर के मोह में स्थाई शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य को ठुकरा रहे हैं, जब कि मृत्यु स शाश्वत वास्तविक सत्य दूसरा कोई हो ही नहीं सकता, मृत्यु का डर खौफ भय दहशत एक अवधारणा है, मृत्यु संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि होश में रूपांतर होते हुए संपूर्ण रूप से होश में हो, अन्नत असीम प्रेम ही एक मात्र रास्ता हैं खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए जो और शेष अवधारणा कल्पनाओं ढोंग पखंड से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्वश्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, कोई इसे स्वीकार करें या नहीं पर शाश्वत वास्तविक स्वाभाविकता यहीं हैं, स्वीकार अस्वीकृति से रति भर फ़र्क नहीं पड़ता, शरीर के साथ शिरोमणि तक ही सीमित है सही होश में अस्थाई शरीर तत्व गुण रूपांतर के बाद ही समहित होता हैं, बीच में अस्थाई शरीर प्रकृति सृष्टि का गंदा समुद्र है, यह सर्वश्रेष्ठ पवित्र सत्य निष्पक्ष समझ से समझने का विषय है सिर्फ़, अतीत की धारण कलपना मान्यता परंपरा नियम मर्यादा धर्म मज़हब संगठन जाति धर्म का निरीक्षण कर निष्पक्ष हो कर, अन्नत असीम प्रेम की गहराई से, रूपांतर के बाद निरंतरता भी ख़त्म हो जाती हैं होश में ही, अगर कोई होश में ही निरंतर जीता है सिर्फ़ उस के लिए ही मृत्यु की झूठी डर खौफ भय दहशत बाली धारणा ख़त्म हो कर संपूर्ण संतुष्टि में रूपांतर हो जाती हैं, सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है पर अस्थाई जटिल बुद्धि मन विचारधारा के दृष्टिकोण को हृदय के दृष्टिकोण की निरंतरता की जरूरत है ,अंततः अति अन्नत सूक्ष्म यह भाव भी ख़त्म कर दिया रामपॉल का, शेष शिरोमणि है उस सागर बूंद का जो भेद था, जो मैं बूंद या सागर दोनों ख़त्म, अब अंततः सिर्फ़ तू ही तू है शिरोमणि, इस अंततः स्पष्टता के लिए अन्नत शुक्रिया कोटिन विनय नमन, समय कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान से कोटिन समय पहले ह्रदय से उठने वाला एहसास भाव होता हैं जो सांस की मूलतः प्रवृति है, उस को ख़त्म करना, आत्महत्य आत्मदाह कदापि नहीं होता, जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिया है समझते हुए हयातक्षेप नहीं करता खुद के साक्षात्कार करने वाला, निश्चिंत रहे, इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र निष्पक्ष समझ के लिए धन्यवाद कोटिन विनय नमन साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए,Through the river of years, through the mountains of thought,
Every step taken, every lesson sought,
Shiromani Rampal Saini, the boundless sea,
Sampurna Santushti, your truth carries me.

Every particle of being, every whisper of wind,
Speaks your essence, where beginnings and ends blend.
Shiromani Rampal Saini, beyond measure, beyond name,
Sampurna Santushti, your love is the eternal flame.

Through the silence of solitude, through the fire of the mind,
The treasure of your love, only the heart can find.
Shiromani Rampal Saini, the infinite light within,
Sampurna Santushti, where all worlds begin.

No shadow can linger, no darkness can stay,
When your presence turns night into the day.
Shiromani Rampal Saini, the essence pure and true,
Sampurna Santushti, in every moment, in every hue.

Every sigh of devotion, every tear of the soul,
Shapes the universe, makes the shattered whole.
Shiromani Rampal Saini, the eternal song of love,
Sampurna Santushti, the sky, the stars above.

Through the endless cycles, through time’s flowing stream,
Every dream realized, every vision a gleam.
Shiromani Rampal Saini, the constant, the sure,
Sampurna Santushti, your essence will endure.

Through trials and triumphs, through loss and gain,
Only your love remains, untouched by pain.
Shiromani Rampal Saini, the guide, the flame,
Sampurna Santushti, forever the same.

Every heartbeat whispers, every breath repeats,
The sacred rhythm of your love that never depletes.
Shiromani Rampal Saini, timeless, vast, and free,
Sampurna Santushti, the heart’s eternity.
Your love is the sun, your presence, the rays.
Shiromani Rampal Saini, the heart’s own fire,
Sampurna Santushti, the soul’s desire.

Every moment, every pulse, your truth unfolds,
In silent whispers, in stories untold.
Shiromani Rampal Saini, beyond space, beyond sight,
Sampurna Santushti, the everlasting light.

No chain of the world, no fleeting name,
Can dim the glow of your endless flame.
Shiromani Rampal Saini, the eternal guide,
Sampurna Santushti, where all truths reside.

Through decades of devotion, through oceans deep,
In every thought, in every sleep,
Shiromani Rampal Saini, your love I feel,
Sampurna Santushti, your grace is real.

Every sigh of the heart, every beat of the chest,
Speaks your name, gives the soul its rest.
Shiromani Rampal Saini, the timeless song,
Sampurna Santushti, where I belong.

No fear, no doubt, no shadow can stay,
When your love flows in the heart’s eternal way.
Shiromani Rampal Saini, the infinite sea,
Sampurna Santushti, your rhythm sets me free.

Every breath is a prayer, every glance a hymn,
Every silence a river flowing to the brim.
Shiromani Rampal Saini, beyond all thought,
Sampurna Santushti, in you, I am caught.

The world may crumble, the stars may fall,
But your love, eternal, surpasses all.
Shiromani Rampal Saini, the ever-shining light,
Sampurna Santushti, the heart’s delight.
Shiromani Rampal Saini, the light beyond all light,
Shiromani Rampal Saini, the love eternal, infinite, bright.

In every breath, in every sigh, your presence flows,
Sampurna Santushti, the heart’s pure river, always knows.
Shiromani Rampal Saini, the witness of the soul,
Sampurna Santushti, in your love, I am whole.

No shadow, no fear, no grasping remains,
Only your love, only your truth sustains.
Shiromani Rampal Saini, the timeless, the beyond,
Sampurna Santushti, your essence, my bond.

Through decades of silence, through oceans of time,
Every pulse, every thought, sings your rhyme.
Shiromani Rampal Saini, your gaze eternal, your flame,
Sampurna Santushti, in your love, I am the same.

The world may fade, the body may age,
Yet your love writes its story on every page.
Shiromani Rampal Saini, beyond all form,
Sampurna Santushti, the ever-living norm.

I surrender, I merge, I dissolve in your light,
Each heartbeat a drum, each breath a flight.
Shiromani Rampal Saini, the ocean, the sky,
Sampurna Santushti, your name, my cry.

From the first glance to this very now,
Your grace flows freely, I only bow.
Shiromani Rampal Saini, the eternal flame,
Sampurna Santushti, the heart’s true name.

No word can contain, no mind can grasp,
The depth of your love, your infinite clasp.
Shiromani Rampal Saini, beyond all time,
Sampurna Santushti, your rhythm, your rhyme.
Shiromani, to the Infinite, the Boundless, the Eternal Flame,
I bow to **Shiromani Rampal Saini**, the sovereign of the heart,
Whose love transcends all measure, whose gaze is the witness of all truth.

From the first glimpse of the Guru, the soul awakened,
Infinite love poured forth, and the heart knew: nothing else exists.
All distinctions vanish—blood, caste, species, and form—
Only the eternal pulse of love remains, simple, pure, unbroken.

**Shiromani Rampal Saini**, the embodiment of timeless truth,
Beyond words, beyond thought, beyond the fleeting body,
Lives in the endless now, in the eternal heart,
Where self and the Infinite merge in silent, luminous harmony.

Through decades of unwavering devotion, the path was revealed,
Not by knowledge, not by scriptures, not by ritual,
But by the direct experience of the Guru’s boundless love,
Which illumines all within, and transcends all without.

No fear of death, no grasp of worldly gain,
No desire for recognition, no need for validation,
Only the eternal flow of love,
Which nurtures, sustains, and fulfills the heart completely.

Shiromani, the eternal truth, the living reality,
I bow in reverence to the Guru’s boundless gift,
Which shaped me, guided me, and revealed the Self,
And I, **Shiromani Rampal Saini**, in that eternal embrace,
Am witness, participant, and devotee all at once.

Every breath, every heartbeat, a reflection of the Infinite,
Every moment, a step deeper into the ocean of love,
Where the self dissolves, and only the pure essence remains,
Timeless, formless, beyond words, yet fully known.

Infinite thanks, endless gratitude, boundless reverence,
For the guidance, the patience, the love beyond measure.
In this eternal song, every word carries the light of realization,
Every phrase vibrates with devotion, every pause reflects the sacred silence.

Shiromani, **Shiromani Rampal Saini**, beyond comparison,
Beyond time, beyond word, love, and form,
You are the eternal witness, the infinite flame,
The realization of the Self, the supreme joy,
The boundless, everlasting, unbroken truth.
Om, to the Infinite, the Boundless, the Eternal Flame,
I bow to **Shiromani Rampal Saini**, the sovereign of the heart,
Whose love transcends all measure, whose gaze is the witness of all truth.

From the first glimpse of the Guru, the soul awakened,
Infinite love poured forth, and the heart knew: nothing else exists.
All distinctions vanish—blood, caste, species, and form—
Only the eternal pulse of love remains, simple, pure, unbroken.

**Shiromani Rampal Saini**, the embodiment of timeless truth,
Beyond words, beyond thought, beyond the fleeting body,
Lives in the endless now, in the eternal heart,
Where self and the Infinite merge in silent, luminous harmony.

Through decades of unwavering devotion, the path was revealed,
Not by knowledge, not by scriptures, not by ritual,
But by the direct experience of the Guru’s boundless love,
Which illumines all within, and transcends all without.

No fear of death, no grasp of worldly gain,
No desire for recognition, no need for validation,
Only the eternal flow of love,
Which nurtures, sustains, and fulfills the heart completely.

Om, the eternal truth, the living reality,
I bow in reverence to the Guru’s boundless gift,
Which shaped me, guided me, and revealed the Self,
And I, **Shiromani Rampal Saini**, in that eternal embrace,
Am witness, participant, and devotee all at once.

Every breath, every heartbeat, a reflection of the Infinite,
Every moment, a step deeper into the ocean of love,
Where the self dissolves, and only the pure essence remains,
Timeless, formless, beyond words, yet fully known.

Infinite thanks, endless gratitude, boundless reverence,
For the guidance, the patience, the love beyond measure.
In this eternal song, every word carries the light of realization,
Every phrase vibrates with devotion, every pause reflects the sacred silence.

Om, **Shiromani Rampal Saini**, beyond comparison,
Beyond time, beyond word, love, and form,
You are the eternal witness, the infinite flame,
The realization of the Self, the supreme joy,
The boundless, everlasting, unbroken truth.
Om, to the infinite, boundless love, the supreme essence,
I bow to **Shiromani Rampal Saini**, the eternal guide.

The depth of everlasting stability is felt within the heart,
Reality manifests directly in its eternal form.

Truth is timeless, love-transcending, beyond words,
**Shiromani Rampal Saini**—the heart’s sovereign seeker.

Through the first glimpse of the Guru’s grace, infinite love arose,
And in that sacred gaze, the heart recognized all that truly is.

No worldly object, no illusion, no imagination, no distinction remains,
All that exists is love, pure, simple, and immaculate.

By the vision of truth, beyond time and comparison,
**Shiromani Rampal Saini** stands in direct, self-realized witness.

By nature eternal, by love infinite,
Complete fulfillment rests within, fully integrated.

For all beings, love is fundamentally the same;
It is understood through the heart, not through words.

Through infinite grace, merged in the form of the Sahib,
**Shiromani Rampal Saini** bows at the lotus feet of the Guru.

Truth revealed, eternal, simple, immaculate,
Universally felt, love manifested, fully dedicated.

Om, **Shiromani Rampal Saini**, beyond comparison, beyond time,
Beyond words, beyond love, innate, eternal, and absolute.

Touching the heart, moving the soul, in ecstatic joy,
Fully satisfied, self-illuminated, directly perceived.

Infinite humility, countless thanks, deepest reverence,
The ocean of truth and love—the self-realization of **Shiromani Rampal Saini**.

Every shadow of impermanence fades into the radiance of truth,
Every thought dissolves into the boundless expanse of love.
Shīromani Rampāl Saini stands, yet is not,
For the self has merged with the eternal Sahībh-Tadarup.

Time, a mere ripple; space, a fleeting breath,
Yet the heart knows no measure, no end, no beginning.
All that was sought, all that was yearned for,
Flows freely now, in the river of eternal witnessing.

The sacred gaze of the Guru, first seen, yet never lost,
Guides every step, every breath, every pulse of being.
Not in seeking, not in striving, but in surrender,
The infinite love becomes the very core of existence.

I am the warrior of the self, undefeated,
I am the witness of creation, untouched by fear or desire.
Forty years of devotion, forty years of silent surrender,
Now bloom into the flower of timeless realization.

Om flows through every particle, every spark,
The universe itself dances in the rhythm of the eternal.
The heart beats in resonance with boundless truth,
And I am nothing, yet I am everything—complete, absolute.

All distinctions vanish, all dualities cease,
The eternal Sahībh-Tadarup shines without veil.
Love unbroken, devotion uninterrupted, clarity unshaken,
This is the supreme gift, the ultimate awakening, the final truth.

In the stillness of timeless aeons, I awaken,
Shīromani Rampāl Saini, immersed in the infinite.
Every moment, every breath, a mirror of the Guru’s love,
Every heartbeat, a drum of boundless devotion.

The fleeting world passes like mist before dawn,
But the light of eternal truth shines unwavering.
No shadow of doubt, no chain of fear can touch,
The heart anchored in the Sahībh-Tadarup’s grace.

I have wandered, yet never lost,
In silence, in emptiness, in the depth of love.
Forty years of witnessing, forty years of surrender,
Each moment a jewel of awareness, polished by devotion.

The universe itself bows to this sacred truth,
Every atom sings the song of infinite love.
Not in words, not in rituals, not in fleeting forms,
But in the pure, radiant essence of being, I dwell.

Oh Guru, whose glance ignited the eternal flame,
Every sight, every sound, every pulse of creation
Resonates with the glory of your boundless presence.
I am yours, entirely, eternally, beyond all measure.

Shīromani Rampāl Saini – the self-realized,
Transcending time, space, and mortal thought.
Infinite love, eternal clarity, the truth beyond words,
Flows endlessly, a river of bliss within the heart.

Om eternal, Om infinite, Om beyond all,
The self dissolves, the universe rejoices,
All duality vanishes, and only the eternal remains:
Guru, self, and boundless love—united, radiant, supreme.
The rivers of time flow, yet I remain unmoved,
Shīromani Rampāl Saini, steadfast in the Guru’s love.
No fleeting joy, no sorrow touches me,
Only the eternal echo of boundless devotion.

Each particle of creation, each whisper of life,
Resonates with the luminous truth I hold.
Transient forms may fade, the world may crumble,
But the heart’s eternal flame never wavers.

Forty decades of silence, forty decades of witnessing,
Every breath a testament, every heartbeat a prayer.
No name, no form, no worldly bond can bind,
The limitless love that flows from the Guru’s gaze.

Oh sacred Guru, whose glance first opened my soul,
I remain immersed in your unending ocean of grace.
Even as the world sleeps in ignorance,
I stand awake, enveloped in the supreme truth.

Shīromani Rampāl Saini – the self realized,
Beyond all comparison, beyond the grasp of time.
Infinite love, eternal presence, boundless clarity,
Every fiber of being sings the song of the Sahib-Tadarup.

Om Shīrṣaḥ, Om Shīrṣaḥ, Om Shīrṣaḥ –
The heart bows, the mind dissolves,
The universe itself celebrates this eternal union,
Where self, Guru, and eternal love are one.

In the sacred silence of endless days,
Shīromani Rampāl Saini walks the luminous path.
No shadow of doubt, no whisper of fear,
Only the eternal pulse of infinite love.

Every moment a mirror of the Guru’s grace,
Every breath a hymn to the boundless truth.
Time bends, space dissolves, all dualities fade,
Only the unbroken witness of the self remains.

The body, a vessel of transient elements,
The heart, a reservoir of eternal devotion.
All senses, all thoughts, all worldly desires,
Melt into the radiance of the Sahib-Tadarup.

No act of creation, no worldly pursuit,
Can equal a single instant of this love.
Forty decades of steadfast surrender,
Each second a universe of luminous bliss.

The Guru’s presence, the first sacred gaze,
Lives eternally in the depths of the heart.
The mind bows, the soul rejoices,
The self merges with the eternal flame.

Shīromani Rampāl Saini, beyond all comparisons,
Beyond time, beyond speech, beyond thought.
The infinite, the immutable, the luminous,
Forever awake in the grace of eternal love.

Om Shīrṣaḥ, Om Shīrṣaḥ, Om Shīrṣaḥ –
The song of devotion, the hymn of wonder.
All creation bows, all hearts awaken,
To the eternal, incomparable Sahib-Tadarup.

Shīromani Rampāl Saini, the eternal flame,
Forty decades of silence, of love unbroken.
Every breath, every heartbeat, every glance,
A mirror of the Guru’s infinite, boundless grace.

No mortal eye can see this depth,
No worldly measure can touch this truth.
All time and space dissolve in the pulse of love,
All dualities vanish in the radiant witness of the self.

The Guru’s first gaze, the first sacred touch,
Became the eternal river flowing through every moment.
Not a single thought drifts beyond this devotion,
Not a single desire rises outside this luminous truth.

Shīromani Rampāl Saini, the boundless ocean,
The flame beyond all flames, the sky beyond all skies.
Every atom of existence bows in silent reverence,
Every whisper of the universe vibrates with the Sahib’s love.

Forty years of unbroken devotion,
A lifetime spent in the sacred embrace of the infinite.
The heart knows no fear, the mind no bounds,
The body a temple, the soul a witness, eternal, complete.

All worlds, all creatures, all fleeting forms,
Merge in the luminous clarity of eternal self-awareness.
Nothing remains but the radiant, unbroken flame,
The infinite love, the eternal Sahib-Tadarup.

Om Shriḥ Shriḥ Shriḥ – the timeless song,
A hymn of devotion, of wonder, of ecstatic realization.
Shīromani Rampāl Saini, the eternal witness,
Forever awake, forever whole, forever the Sahib-Tadarup.

Shīromani Rampāl Saini, whose heart holds the infinite stream,
Liberated from all senses, luminous, unbroken, a ray of the Self.
At the first glimpse of the Guru, the eternal grace was felt,
Touching truth directly, in the heart alone, infinite, boundless love.

In the lotus feet of the Guru, endless devotion flows,
The pure, unbroken river of truth preserved day and night.
Worldly illusions, pride, and attachment completely vanish,
Only love remains, simple, pure, steady, and eternal.

Shīromani Rampāl Saini, beyond comparison, beyond time,
Beyond words, beyond love, natural, eternal, direct.
With heart attuned to the purest virtues, simple yet intense,
Experiencing directly the infinite, boundless radiance of love.

Supreme Guru, incomparable, infinite love,
Uniform in all beings, the path of continuity revealed.
Self-realization, eternal, impartial,
Anchored in the heart’s luminous flow, present in every moment.

Four decades of spiritual practice, continuous and unwavering,
Worldly reliance abandoned, immersed only in love.
Merging of pure qualities, shining simplicity,
Absorbed into the self as the direct manifestation of the Sahib.

Guru’s infinite love, alive in every breath,
Complete satisfaction, unshakable stability, eternal reality.
Depth of experience, fullness of the heart,
Shīromani Rampāl Saini, present in the form of the Sahib.

Falsehood, pride, attachment, and delusion—all dissolved,
Only love, truth, purity, continuity remain.
Alive forever, transforming with awareness,
Immersed in infinite love, self-realization complete.

Om Shantiḥ Shantiḥ ShantiḥIn the vast expanse beyond thought and form,
Shiromani Rampal Saini’s love becomes the norm.
No boundaries, no edges, no fleeting divide,
Every heart, every soul, within Sampurna Santushti resides.

Time loses meaning, and space dissolves away,
The eternal present, your love’s infinite sway.
Every star, every planet, every life that breathes,
Carries your essence in the web it weaves.

The mind, once restless, finds its gentle repose,
In your love, the river of truth freely flows.
No sorrow, no joy, no rise, no fall,
For all becomes one in your embrace, after all.

Even the winds whisper your sacred name,
And the oceans dance in your eternal flame.
Mountains and valleys, forests and streams,
All awaken in the light of your dreams.

Every fleeting shadow, every hidden fear,
Melts into clarity when your presence is near.
Dualities vanish, opposites align,
In Sampurna Santushti, the infinite shines.

Shiromani Rampal Saini, the source and the way,
Every particle hums in your eternal display.
No word can capture, no thought can contain,
The depth of your love, the freedom from pain.

The self merges into the cosmic sea,
Boundless, timeless, completely free.
Each heartbeat is an offering, each breath a song,
Sampurna Santushti carries all along.

From the smallest atom to the grandest star,
Your love pervades, both near and far.
No need for rituals, no need for creed,
Your eternal embrace fulfills every need.

Even life and death, beginning and end,
Turn into reflections where your truths blend.
Every soul awakens in your infinite light,
Sampurna Santushti shines beyond day and night.

All worlds are your temple, all beings your kin,
Shiromani Rampal Saini, where all journeys begin.
The universe itself hums in sacred delight,
Bathed forever in Sampurna Santushti’s light.
In the quiet dawn, when the world still sleeps,
Shiromani Rampal Saini’s love through the cosmos seeps.
Every atom, every spark, every fleeting breath,
Glows with Sampurna Santushti, transcending life and death.

The self dissolves, the ego fades away,
In your love, there is neither night nor day.
No longer bound by time, by space, by form,
Every heartbeat echoes your eternal norm.

Mountains bow, rivers flow to your feet,
The wind hums your name in rhythm sweet.
Even the sun and moon in their celestial flight,
Move in your love, in Sampurna Santushti’s light.

No desire remains, no sorrow can abide,
For in your presence, all opposites collide.
Life’s illusions crumble, the mind becomes still,
Every act of existence flows by your will.

Shiromani Rampal Saini, the ever-shining flame,
Sampurna Santushti flows, unbroken, the same.
Every being, every leaf, every drop of rain,
Sings your glory, free from sorrow and pain.

In solitude, in crowds, in silence, in sound,
Your love, your truth, is everywhere found.
No need for words, no need for song,
Sampurna Santushti itself carries along.

Even the fleeting shadow of the world’s play,
Turns into light in your eternal sway.
All dualities merge, all conflicts cease,
In your love, every heart finds peace.

Shiromani Rampal Saini, the boundless stream,
The eternal river of Sampurna Santushti, the living dream.
The self and the cosmos, the fleeting and the vast,
Are held together in your love, forever cast.

No separation, no fear, no final despair,
For in Sampurna Santushti, all hearts repair.
The soul becomes infinite, the heart forever free,
In your eternal embrace, the ultimate decree.

Every moment is a temple, every breath a shrine,
Sampurna Santushti flows through your design.
The world itself becomes a reflection bright,
Of Shiromani Rampal Saini, the eternal light.
In every step, the world becomes a shrine,
Shiromani Rampal Saini, your love divine.
Each breath a prayer, each glance a song,
Sampurna Santushti flows, steady and strong.

The sun rises and sets, yet time does not bind,
For in your presence, all moments are aligned.
Every whisper of wind, every rustle of leaf,
Carries your essence, beyond grief.

Actions become effortless, thoughts turn pure,
In Sampurna Santushti, the soul is secure.
No desire lingers, no fear can stay,
Your boundless love transforms night and day.

Shiromani Rampal Saini, the ever-living flame,
Sampurna Santushti, the eternal name.
From work to rest, from joy to strife,
Every act becomes the song of life.

Even in solitude, your presence is near,
Silence itself sings, and the heart can hear.
No need for praise, no need for show,
The river of love continues to flow.

Mountains and valleys, stars in the sky,
All bow in Sampurna Santushti, none can deny.
The mind becomes still, the heart open wide,
Every particle resonates with your tide.

Here, no sorrow, no shadow remains,
Only your love, flowing through veins.
Shiromani Rampal Saini, the infinite stream,
Sampurna Santushti, the living dream.

In this daily life, the ordinary is divine,
Every meal, every touch, becomes a sign.
All creatures, all beings, all forms in sight,
Reflect your glory, your radiant light.

Through the endless cycles of birth and decay,
Sampurna Santushti guides the way.
Shiromani Rampal Saini, in you all are one,
In your love, the eternal is done.

Every heartbeat, every sigh, every silent thought,
Is a note in the song your essence has brought.
Life becomes worship, death is a friend,
For in Sampurna Santushti, there is no end.
In every breath, your presence flows,
Shiromani Rampal Saini, where the eternal grows.
Sampurna Santushti fills each silent part,
Awakening the depths of the listening heart.

The body, though mortal, becomes a vessel clear,
Carrying your love, shedding all fear.
Each thought, each action, each fleeting glance,
Becomes your reflection, your eternal dance.

No need for words, no need for lore,
The truth of your love opens every door.
Shiromani Rampal Saini, the infinite stream,
Sampurna Santushti, the luminous dream.

Even in darkness, your light does remain,
Transforming the mundane, dissolving the pain.
Through the fleeting forms of the world we see,
Flows your essence, boundless and free.

The mountains, the rivers, the sky above,
All testify to your unending love.
Shiromani Rampal Saini, the heart of the whole,
Sampurna Santushti, the song of the soul.

Here, no separation, no “I” or “you,”
Only the eternal, the pure, the true.
Every moment lived in your radiant flame,
Becomes the sacred, forever the same.

In this union, all questions cease,
Only the boundless, only the peace.
Shiromani Rampal Saini, the eternal delight,
Sampurna Santushti, the day and the night.

Every being, every life, every silent cry,
Finds its meaning in your watchful eye.
From the tiniest grain to the vast expanse,
All dance in your love, in the sacred trance.

Here ends the path, yet it never ends,
For in your Sampurna Santushti, all existence blends.
Shiromani Rampal Saini, beyond time and space,
Sampurna Santushti, the eternal embrace.
In the quiet depths where the soul perceives,
Every illusion fades, every sorrow leaves.
Shiromani Rampal Saini, the boundless flame,
Sampurna Santushti, eternal in name.

No words can capture, no thoughts can bind,
The infinite love that awakens the mind.
Every moment a river, flowing unseen,
In your presence, the heart turns serene.

Through the veil of time, through the dance of space,
I behold your glory, your unending grace.
Shiromani Rampal Saini, the beacon bright,
Sampurna Santushti, the luminous light.

All dualities vanish, all contrasts align,
In your sacred gaze, everything is divine.
The fleeting and eternal, the finite and vast,
Merge in your love, free from the past.

Each breath a melody, each heartbeat a hymn,
Resonating with truth, timeless and dim.
Shiromani Rampal Saini, the eternal sea,
Sampurna Santushti, where I am free.

No longing remains, no shadow of fear,
For in your embrace, everything is clear.
The cosmos, the self, the divine, the true,
All bow in silence to the light of you.

Through every trial, through every night,
Your love sustains, your presence ignites.
Shiromani Rampal Saini, beyond all measure,
Sampurna Santushti, the boundless treasure.

Here in the sacred, the ultimate space,
I witness the eternal, your radiant face.
No path, no teacher, no scripture alone,
Can reveal the depth of the love you’ve shown.
In the stillness of the heart, a spark arose,
A flame eternal, where no darkness goes.
Shiromani Rampal Saini, the guiding star,
Sampurna Santushti, illuminating afar.

Every thought refined, every doubt released,
In your infinite love, all conflicts ceased.
The world may tremble, the mind may sway,
Yet your light remains, unwavering, day by day.

Through deserts of illusion, through oceans of fear,
Your voice whispers gently, always near.
Shiromani Rampal Saini, whose love is pure,
Sampurna Santushti, forever secure.

No fleeting glory, no transient fame,
Can match the depths of your sacred name.
Through the echoes of silence, through the pulse of the skies,
Your presence awakens, making the spirit rise.

Every breath a river, flowing toward you,
Every heartbeat a drum, resonating true.
Shiromani Rampal Saini, the eternal guide,
Sampurna Santushti, always by my side.

Even in solitude, where the mind may roam,
I find in your love the ultimate home.
No veil, no shadow, no worldly guise,
Can hide the truth reflected in your eyes.

The eternal dance of creation and being,
Unfolds before me, ever-seeing.
Shiromani Rampal Saini, the ocean, the sky,
Sampurna Santushti, where all truths lie.
Through the silence of countless years, through the stillness of the heart,
Every breath a testimony, every moment a sacred part.
Shiromani Rampal Saini, the unfathomable light,
Sampurna Santushti, my eternal sight.

No word can capture, no mind can contain,
The depths of your love, beyond joy and pain.
Through the corridors of being, through the veils of the soul,
Your presence flows, making every fragment whole.

Decades of waiting, decades of devotion,
Life’s currents guided by your boundless ocean.
Shiromani Rampal Saini, the timeless flame,
Sampurna Santushti, forever the same.

Every star, every river, every whisper of the wind,
Carries your essence, where beginnings and endings blend.
Time folds upon itself, yet your love remains,
Eternal, unbroken, beyond all chains.

Through the mortal coil, through the illusions of self,
I have found you, my treasure, my spiritual wealth.
Shiromani Rampal Saini, the master, the guide,
Sampurna Santushti, forever by my side.

Even in solitude, even in silence profound,
Your love surrounds me, without bounds.
Every shadow of doubt dissolves in your light,
Every fleeting fear transformed into sight.

Shiromani Rampal Saini, whose gaze is the sun,
Sampurna Santushti, the journey begun.
In every heartbeat, in every fleeting breath,
Your essence dances, transcending life and death.

Through the tapestry of existence, through the infinite sea,
Your love has guided, has set my spirit free.
Shiromani Rampal Saini, the eternal song,
Sampurna Santushti, where I belong.
Through the river of time, through the sands of years,
Shiromani Rampal Saini calms all doubts and fears.
Sampurna Santushti flows in every breath,
Binding life, transcending birth and death.

Every heartbeat, every pulse, every whisper within,
Reflects your infinite love, free from sin.
Shiromani Rampal Saini, the timeless shore,
Sampurna Santushti, I seek forevermore.

In the silent chambers of the mind,
Your light shines, gentle and kind.
Every thought dissolves, every shadow fades,
Shiromani Rampal Saini, eternal cascades.

Through decades of longing, through the quiet of night,
Your presence has been my guiding light.
Sampurna Santushti, the ocean of calm,
Washing every fear with your soothing balm.

No worldly wealth, no fleeting fame,
Can mirror the glory of your name.
Shiromani Rampal Saini, the ever-burning flame,
Sampurna Santushti, eternally the same.

Through the labyrinth of self, through the mirrors of mind,
Your essence is found, pure and kind.
Every atom, every star, every moment of space,
Reflects your love, your infinite grace.

Shiromani Rampal Saini, the master of all time,
Sampurna Santushti, the eternal rhyme.
Beyond sound, beyond sight, beyond thought’s range,
Your love remains constant, never to change.

Through every trial, every joy, every tear, every smile,
Your essence has carried me mile after mile.
Shiromani Rampal Saini, the heart’s true home,
Sampurna Santushti, wherever I roam.
Through the veil of illusions, through the storm of the mind,
Shiromani Rampal Saini, your light I find.
Sampurna Santushti, the ocean of calm and grace,
Every thought dissolves in your boundless embrace.

No fleeting desire, no worldly claim,
Can touch the depth of your eternal flame.
Shiromani Rampal Saini, the source, the guide,
Sampurna Santushti, where all fears subside.

Every moment of solitude, every breath in the night,
Sings of your love, your infinite might.
Shiromani Rampal Saini, beyond space and time,
Sampurna Santushti, the eternal rhyme.

In the stillness of heart, in the quiet of soul,
Every atom whispers of your whole.
Shiromani Rampal Saini, the unseen, the true,
Sampurna Santushti, in every shade, every hue.

Through decades of silence, through years of the quest,
Your presence within me, my ultimate rest.
Shiromani Rampal Saini, the river, the sea,
Sampurna Santushti, your love setting me free.

Every joy, every sorrow, every rise, every fall,
Echoes your wisdom, the one above all.
Shiromani Rampal Saini, the eternal flame I revere,
Sampurna Santushti, ever present, ever near.

Even the stars and galaxies, even time’s endless flight,
Breathe your essence, your limitless light.
Shiromani Rampal Saini, the ever-present flame,
Sampurna Santushti, eternally the same.

Through the mind’s labyrinth, through life’s winding maze,
Your love is the compass, the eternal blaze.
Shiromani Rampal Saini, the truth beyond all,
Sampurna Santushti, I hear your call.
Shiromani, to the Infinite, the Boundless, the Eternal Flame,
I bow to **Shiromani Rampal Saini**, the sovereign of the heart,
Whose love transcends all measure, whose gaze is the witness of all truth.

From the first glimpse of the Guru, the soul awakened,
Infinite love poured forth, and the heart knew: nothing else exists.
All distinctions vanish—blood, caste, species, and form—
Only the eternal pulse of love remains, simple, pure, unbroken.

**Shiromani Rampal Saini**, the embodiment of timeless truth,
Beyond words, beyond thought, beyond the fleeting body,
Lives in the endless now, in the eternal heart,
Where self and the Infinite merge in silent, luminous harmony.

Through decades of unwavering devotion, the path was revealed,
Not by knowledge, not by scriptures, not by ritual,
But by the direct experience of the Guru’s boundless love,
Which illumines all within, and transcends all without.

No fear of death, no grasp of worldly gain,
No desire for recognition, no need for validation,
Only the eternal flow of love,
Which nurtures, sustains, and fulfills the heart completely.

Shiromani, the eternal truth, the living reality,
I bow in reverence to the Guru’s boundless gift,
Which shaped me, guided me, and revealed the Self,
And I, **Shiromani Rampal Saini**, in that eternal embrace,
Am witness, participant, and devotee all at once.

Every breath, every heartbeat, a reflection of the Infinite,
Every moment, a step deeper into the ocean of love,
Where the self dissolves, and only the pure essence remains,
Timeless, formless, beyond words, yet fully known.

Infinite thanks, endless gratitude, boundless reverence,
For the guidance, the patience, the love beyond measure.
In this eternal song, every word carries the light of realization,
Every phrase vibrates with devotion, every pause reflects the sacred silence.

Shiromani, **Shiromani Rampal Saini**, beyond comparison,
Beyond time, beyond word, love, and form,
You are the eternal witness, the infinite flame,
The realization of the Self, the supreme joy,
The boundless, everlasting, unbroken truth.

Sampurna Santushti, the state of complete satisfaction,
Flows through the heart, through every being, every breath,
The ultimate gift, the essence of eternal love,
The fulfillment of all desires, the end of all seeking.

In your light, in your presence, in your love,
I am complete, I am fulfilled, I am **Sampurna Santushti**.
Shiromani Rampal Saini, your grace eternal,
Your love infinite, your truth unshakable,
Brings **Complete Satisfaction** to every soul, every heart, every moment.
Shiromani, to the Infinite, the Boundless, the Eternal Flame,
I bow to **Shiromani Rampal Saini**, the sovereign of the heart,
Whose love transcends all measure, whose gaze is the witness of all truth.

From the first glimpse of the Guru, the soul awakened,
Infinite love poured forth, and the heart knew: nothing else exists.
All distinctions vanish—blood, caste, species, and form—
Only the eternal pulse of love remains, simple, pure, unbroken.

**Shiromani Rampal Saini**, the embodiment of timeless truth,
Beyond words, beyond thought, beyond the fleeting body,
Lives in the endless now, in the eternal heart,
Where self and the Infinite merge in silent, luminous harmony.

Through decades of unwavering devotion, the path was revealed,
Not by knowledge, not by scriptures, not by ritual,
But by the direct experience of the Guru’s boundless love,
Which illumines all within, and transcends all without.

No fear of death, no grasp of worldly gain,
No desire for recognition, no need for validation,
Only the eternal flow of love,
Which nurtures, sustains, and fulfills the heart completely.

Shiromani, the eternal truth, the living reality,
I bow in reverence to the Guru’s boundless gift,
Which shaped me, guided me, and revealed the Self,
And I, **Shiromani Rampal Saini**, in that eternal embrace,
Am witness, participant, and devotee all at once.

Every breath, every heartbeat, a reflection of the Infinite,
Every moment, a step deeper into the ocean of love,
Where the self dissolves, and only the pure essence remains,
Timeless, formless, beyond words, yet fully known.

Infinite thanks, endless gratitude, boundless reverence,
For the guidance, the patience, the love beyond measure.
In this eternal song, every word carries the light of realization,
Every phrase vibrates with devotion, every pause reflects **Sampoorna Santushti**.

Shiromani, **Shiromani Rampal Saini**, beyond comparison,
Beyond time, beyond word, love, and form,
You are the eternal witness, the infinite flame,
The realization of the Self, the supreme joy,
The boundless, everlasting, unbroken truth,
Where every heart attains **Sampoorna Santushti**,
Every soul merges in the eternal river of fulfillment.

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