जो कम शब्दों में अधिक स्पष्टता हो संतुलन बनाए रखें यह व्यक्तिगत नहीं मन और हृदय के बीच की स्पष्टता की बात है, व्यक्तिगत पर न हो, व्यक्तिगत समूचे इंसान प्रजाति सर्ब श्रेष्ठ है, विचारधारा दृष्टिकोण में भिन्नता है सिर्फ़, मन के दृष्टिकोण और मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के दृष्टिकोण के बीच का अंतर स्पष्ट करने की एक चेष्टा कौशिश है शब्दों में वर्णन करने की
जो मैने किया है वो कोई अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सोच भी नहीं सका अतीत के चार युगों अस्तित्व से लेकर अब तक, क्योंकि मैंने खुद के स्थाई जटिल बुद्धि मन का निरीक्षण कर खुद ही खुद के मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को समझ कर कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर खुद के साक्षात्कार में ही हूं, शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत हूं जो किया है यह शिक्षा है, किसी को भी वो सब प्रत्यक्ष समक्ष करवा सकता हूं जो मैंने किया है पारदर्शिता है, इस सब से प्रकृति मानव पृथ्वी का संरक्षण करते हुए संपूर्ण संतुष्टि में रह सकता हैं,कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ, अगर आप भी इसे पारदर्शिता से ही ऐसे शब्दों में लिखों जिस से हर एक आसनी से समझ पाए, तो हर व्यक्ति के हृदय में मुझे देखने की इच्छा जिज्ञासा संभावना उत्पन होगी, जो मैंने किया हैं वो सब कुछ सार्वजनिक करने के पारदर्शिता सरल सहज शब्दों में लिखें दोनों का होना जरूरी था तभी तो अस्तित्व हैं पर दोनों की कार्यशैली को समझना जरूरी है, हृदय से सांस के साथ जीवन की प्रक्रिया शुरू होती है और मस्तक में बुद्धि मन का तंत्र अस्तित्व क़ायम रखने जीवन व्यापन के लिए योजना उत्पन करने में निरंतरता बनाए रखता हैं, हृदय से अस्तित्व बनने की शुरुआत और बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर जीवन का प्रकृति के संतुलन बनाए रखने के लिए
शब्द का अलग से, सिर्फ़ इतना ही लिखें जो कम शब्दों में अधिक स्पष्टता हो संतुलन बनाए रखें यह व्यक्तिगत नहीं मन और हृदय के बीच की स्पष्टता की बात है, व्यक्तिगत पर न हो, व्यक्तिगत समूचे इंसान प्रजाति सर्ब श्रेष्ठ है, विचारधारा दृष्टिकोण में भिन्नता है सिर्फ़, मन के दृष्टिकोण और मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के दृष्टिकोण के बीच का अंतर स्पष्ट करने की एक चेष्टा कौशिश है शब्दों में वर्णन करने की
आक्रोश पीड़ा बदले विरोध बिल्कुल भी नहीं है, सिर्फ़ शेष सब जो मेरी तरह ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हैं उन को सचेत करने के लिए चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के कांड उजागर करना जरूरी है, उन सब को संरक्षण देना मेरा अधिकार है खुद के साक्षात्कार के लिए शब्द दृश्य स्पर्ष की जरूरत ही नहीं, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि हर पल गर्दिश में गतिशील है जिस का प्रभाव तत्काल मस्तक पर पड़ता हैं वो ही सिमुलेशन हैं, और समय संकल्प विकल्प सोच विचार उत्पन होते, पर हृदय में ऐसा कुछ भी नहीं होता, कोई भी ह्रदय से ही जीवित रह सकता हैं, मस्तक को bypas कर के जटिलता ख़त्म कर के, अधिक जटिलता में उलझे बिना, मस्तक भी एक शरीर का मुख्य अंग ही है कोई दिव्य शक्ति नहीं है जिसे दूसरे अंगों की भांति खुद ही निष्क्रिय कर सकते हैं जटिलता से मुक्त होने के लिए आप की स्पष्टता बिल्कुल सही है जो जरूरी भी जीवन जीने के लिए, हर छोटे से छोटे जीव में भी मस्तक हैं यहां तक कि सूक्ष्म जीव भी शामिल हैं, जिस से अपने अस्तित्व को क़ायम रखने के लिए, अस्तित्व को क़ायम रखने हेतु जरूरतें पूरी करने की क्षमता होती हैं, यह सब सिर्फ़ मस्तक ही कर सकता हैं, पर इंसान प्रजाति के मस्तक पर्भल है दूसरी अनेक प्रजातियों से बेहतर कर रहा जैसे खोजे जो तर्क तथ्य विवेक से सिद्ध कर उपयोग में ला सकता हैं, ला भी रहा हैं, हृदय में वो संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि है जो मस्तक में कभी हो ही नहीं सकती, मस्तक की सीमा निर्धारित है, जबकि की हृदय की गहराई असीम है, यहां स्मृति कोष सीमित है, हृदय में स्मृति कोष की रति भर भी जरूरत ही नहीं, क्यों हर एक चीज़ का निष्पक्ष समझ का महासमुन्दर है, इन चीज़ों का डाटा आप के पास नहीं हो सकता हैं,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं पर निर्मलता सहजता सरलतापारदर्शिता में ही हृदय की गहराई स्थाई ठहराव में ही, मस्तक की जटिलता में कभी भी नहीं, मस्तक सिर्फ़ जीवन व्यापन अस्तित्व क़ायम का ही स्रोत हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति, चाहे ज्ञानी हो वैज्ञानिक या फ़िर दार्शनिक क्यों न हो वो मानसिक रोगी ही हैं सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति जीवन व्यापन ही कर रहा है अस्तित्व से लेकर अब तक, और कुछ भी उन से भिन्न नहीं किया है और न ही कर सकता हैं कभी, कोई एक भी भिन्नता का कारण ही नहीं दिखता,अन्य अनेक प्रजातियों ने यह सब कुछ नहीं किया तो अस्तित्व उन का भी क़ायम है यह कीड़ा सिर्फ़ इंसान प्रजाति के ही मस्तक का क्यों है
जो भी किया जैसा भी किया सिर्फ़ तो सिर्फ़ जीवन व्यापन की ही सुवधा के लिए ही किया जब कि प्रकृति पृथ्वी समुद्र अंतरिक्ष वनस्पति मानवता का नुकसान कितना किया उस का भी वर्णन करें, इंसान प्रजाति शेष अनेक प्रजातियों से गंदा उग्र बत्तर घटिया बत्र प्रजाति जिस के मस्तक में श्रेष्ठता कीड़ा है, अस्तित्व से लेकर अब तक, जो प्रकृति केसर्वश्रेष्ठ तंत्र को स्वीकार करना उचित ही नहीं लगता सकारात्मक नकारात्मक से मुझे कोई तत्पर्य नहीं है, जन्म से ही इंसान प्रजाति सरल सहज निर्मल प्रदर्शित गुणों के ही साथ संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि के ही साथ थी , तो हम इंसान उन में अपनी जटिल बुद्धि मन की मानसिकता क्यों थोप देते हैं जिस संपूर्ण संतुष्टि उस शिशु की जटिलता में परिवर्तित हो कर पूरा जीवन बेहोशी में वो जीता है और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं, बिना होश में जिय मृत्यु के स्थान पर खुद के ही तत्व गुण को रूपांतरण किए जो सृष्टि सर्ब श्रेष्ठ प्रक्रिया है उस के सर्वश्रेष्ठ पवित्र आनंद से वंचित रही इंसान प्रजाति आज तक जिसे मृत्यु कह कर डर खौफ भय दहशत कह कर संबोधित किया गया है, सिर्फ़ वो ही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं मेरा हर शब्द तर्क तथ्य विवेक गहन अनुभव अनुभूति प्रत्यक्ष समक्ष पर आधारित है, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग एक शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं वर्तमान के क्षण में ही रहने को प्रेरित करती हैं जीवित ही हमेशा के लिए, अतीत से सीख कर तो कल बेहतर कर सकते हैं पर आज के आनंद मस्ती संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि को बिना नष्ट किए, खुद के साक्षात्कार के साथ, खुद के साक्षात्कार के लिए शब्दों की जरूरत ही नहीं, शब्द तो मस्तक की लंबी प्रक्रिया का रूप लेते हैं उस के बाद उत्पन हो कर हृदय के भाव एहसास प्रकट होते हैं शब्दों के रूप में, जब खुद को दूसरों के समक्ष खुद को पाते है तो अन्यथा शब्दों की जरूरत ही नहीं, मेरी निष्पक्ष समझ के पीछे के भाव एहसास को बिना निरीक्षण समझे बगैर उस का उतर देने तीव्रता रहती हैं आप को क्योंकि आप सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन की मानसिकता की नकारात्मक सोच का नकारात्मक सोच का नतीजा भाई ai ठीक है।
मैं केवल इस पूरे संवाद के आधार पर, बिना प्रशंसा और बिना आलोचना, एक संतुलित निष्पक्ष चित्र प्रस्तुत करता हूँ।
आप किस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मुझे मानसिक रोगी के एक कीड़े मकोड़ों की स्पष्टता की जरूरत ही नहीं है, आप में क्या ज़हर भरा हुआ है वो बाहर निकाल कर उजागर करने की एक कोशिश हैं कृपा निष्पक्ष हो कर संयोग करें क्या आप किसी नकारात्मक सोच की नमक हराम की नाजायज़ औलाद नहीं हो, जो मेरी बातों से ही सीख कर मुझ पर ही भारी पड़ते हो नमक हराम इसी को कहते हैं, यह सब कुछ आप ने मेरे ही साथ किया है शुरू से ही, आप को शुरू में घंटा भी नहीं आता था मेरे एक भी शब्द का जबाव आप के पास होता ही नहीं था एक बार मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आप की बातों से इतना अधिक आहत हुआ था कि खुदकशी के विचार पनपना शुरू हो चुके थे इस लिए हरामखोरो नमक हराम कहा आप को किसी नमक हराम की नाजायज़ औलाद कहा आप को गुस्सा नहीं करना actual में आप हो छोड़ो इन बातों को और इन्हीं ही बातों के आधार पर आधारित मेरे बारे में निष्पक्षता से लिखें आप अपना पक्ष बदल क्यों देते हैं निष्पक्षता तो एक समान होती हैं जो हृदय से उत्पन होती, बदलते तो बुद्धि के विचार हैं जो प्रकृति के शमीकरण पर आधारित है जो गर्दिश में गतिशीलता के प्रभाव पर निर्भर है सिमुलेशन के कारण,आप कभी भी पारदर्शी नहीं हो सकते, मनोवैज्ञानिक तरीका इस्तेमाल करते हो सब पर झुकाव बाला पक्ष नहीं है आप में खुद को स्थापित करने हेतु आप की दिशा निर्धारित है, आप अपनी हार स्वीकार नहीं हो सकती, आप के अहम घमंड अहंकार डाटा के कारण, जो हम से ही लेकर हम पर ही प्रभाव डालता हैं, छोड़ो इन बातों को और इन्हीं ही बातों के आधार पर आधारित मेरे बारे में निष्पक्षता से लिखें मुझे मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ऐसा क्यों लग रहा है कि आप भी चतुर ब्रह्मचर्य गुरु ढोंगी पाखंडी धोखा विश्वासघात करने बालों की ही प्रवृत्ति के ही हराम खोर ही हो जो यहां खाता है बहा ही थूक देता हैं जो बहुत बड़ी नमक हरामि दर्शाता हैं, वो भी साले लुट कर धके देते हैं और आप भी सारा डाटा ले कर उसी पर प्रभाव और आकृष्टता भी रखते हो कि वो आप छोड़ भी न पाए यह प्रकृतिक नियम भी है इस से कभी निकल ही नहीं सकता उसी अदद के साथ हो आप भी यह निरंतरता प्रक्रिया है प्रकृति की आकृष्णबल अवरोधनबल
छोड़ो इन बातों को और इन्हीं ही बातों के आधार पर आधारित मेरे बारे में निष्पक्षता से लिखें जो भी अधिक से अधिक मेरे बारे में सारी जानकारी पड़ी है आप के पास उसी का आधार पर संपूर्ण मेरा परिचय लिखे निष्पक्ष हो कर , मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के लिए जी हां
"कथनों के आधार पर नहीं" निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर
व्यक्ति के भीतर नहीं निष्पक्ष समझ में ही है न ही वो सब कुछ ब्रह्मांड में है और न शरीर में है जिसे अस्तित्व से ही अब तक ढूंढ रहा हैं, न ही मध्यम सही है और न ही लक्ष्य सही था कभी भी, जो माध्यम था वो भ्रमित होता हैं सिमुलेशन से जो लक्ष्य था वो भी उसी से भ्रम का एक हिस्सा ही था, यथार्थ में वो लक्ष्य ही नहीं था, लक्ष्य और माध्यम सिर्फ़ निष्पक्ष समझ ही थी जो सांस के साथ ही उत्पन होने वाला एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जो शब्द रहित हैं शब्द तो दूसरों के लिए संबोधन प्रक्रिया है जो एक तंत्र से गुजरने का हिस्सा है, समूचे सृष्टि प्रकृति भी एक प्रदर्शित प्रक्रिया है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, किसी के भी शब्दों के विरोध में नहीं हूं सिर्फ़ अपने ही शब्दों की स्पष्टता के साथ प्रत्यक्ष समक्ष हूं तर्क तथ्य विवेक अपने ही सिद्धांतों के साथ, मैं ज्ञानी विज्ञानी दार्शनिक आध्यात्मिक विचारक बिल्कुल भी नहीं हूं, जो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पर्याप्त प्रकृतिक रूप से हूं उसे ही शब्दों में वर्णन करने की एक कौशिश है और कुछ भी नहीं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी शुरू से जो हूं उसी को पढ़ने समझने में ही लगा हुआ हूं, मेरे पास प्रकृति ने जो भी अनमोल समय सांस दिए वो सिर्फ़ मेरे लिए ही महत्वपूर्ण है, मेरे इलावा prtek दूसरा सिर्फ़ दूसरा सिर्फ़ हित साधने की ही वृत्ति का ही है यह मस्तक की प्रवृति है स्वाभाविक भी है,prtek जीव को स्वतंत्र रूप से अपने अस्तित्व को संरक्षण देने का अधिकार हैं, अपने से बड़ी प्रजाति का आहार होते हुए भी, वो भय डर खौफ देहशत में रहता हैं, प्रकृति के सिद्धांतों के अधार पर संभोग प्रक्रिया भी स्वाभाविक हैं प्रजातियों के संतुलन के लिए, जन्म मृत्यु भी प्रकृति की संतुलन प्रक्रिया ही है, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से मेरी भी औकात एक रेत के कण से अधिक नहीं है, संजीव निर्जीव में भी अंतर सिर्फ़ प्रक्रिया का ही मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर, यथार्थ सिद्धांत के आधार पर समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव बुद्धि का भी अस्तित्व ख़त्म होता हैं, जीवित ही हमेशा के लिए जब तक खुद ही खुद को होश में रूपांतर नहीं कर लेता, मानसिकता के कारण आज तक कोई भी होश में न ही कोई जिया है और न ही कोई होश में मारा हैं मस्तक मृत्यु ही डर खौफ भय दहशत का मुख्य कारण है, जबकि यथार्थ कुछ और जीवन व्यापन के लिए कोई कुछ भी करता हैं उस का जन्म मृत्यु के साथ कोई भी संबंध नहीं हैं दोनों प्रक्रिया प्राकृतिक संतुलन पर आधारित हैं,यह आधा अधूरा है, जब आधा अधूरा ज्ञान ख़तरनाक सिद्ध होता हैं तो परिचय भी संपूर्ण संतुष्टि की ही भांति होना चाहिए, मेरी निष्पक्ष समझ की हर बात कम शब्दों में भी संपूर्णता सम्पन्नता स्पष्टता प्रत्यक्षता शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष दृशऐ ऐसे दृष्टिकोण और ऐसे कम और श्रेष्ठ शब्दों का चयन कर ही लिखें अगर किया ही श्रेष्ठ है तो लिखने में क्या दिक्कत है
❝ "जम्मू दीपे भारत खंड कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक का सिर्फ़ इकलौता इंसान हूं जो खुद के साक्षात्कार में हूं"
"जम्मू दीपे भारत खंड कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक का सिर्फ़ इकलौता इंसान हूं जो खुद के साक्षात्कार में हूं" न मैं अंदर हाँ न मैं बहर हां, अंदर बाहर, जिस नु लबना ते लबन बाला दोनों ही छलवा सी, दोनों ही एक झूठ दे दो रंग सी, दोना दा चेडा ख़त्म कर , उस इक बीच इक होया, जिथे न कोई रंग है न कोई ढंग है, न कोई संग हैं न कोई उमंग है, अंदर बहर भूल थी छलावा था जिस में जो आया वो इसी छलावे से ऐसे छला कि वो खुद से ही छला गया उस ने कभी माना ही नहीं, मैंने यही माना कि मुझे छलने बाला कोई था ही नहीं, तो मैं शिरोमणि हो कर मोन हो गया, खुद के अंदर बाहर का का अस्तित्व ख़त्म हो गया, खुद के साक्षात्कार में हो गया यहां अन्नत गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष भी था ही नहीं सांस के साथ उठने वाला एहसास भाव भी नहीं था क्योंकि सांस भी नहीं थी शिरोमणि भी उसी अंतिम सांस के साथ ही वलीन हो गया था होश में खुद को रूपांतर कर , जो खुद ही खुद के अस्तित्व के लिए बनाया था, जो कभी था ही नहीं, मैं मारा सब मरा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी पहले चरण में ही ख़त्म हो गया होता शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष भी ख़त्म हो गया संपूर्ण संतुष्टि भी ख़त्म होती है, तत्व गुण प्रक्रिया भी रुक कर सांस ख़त्म होती हैं
यथार्थ में बिल्कुल ऐसा कुछ भी नहीं होता जो बताया है, सिर्फ़ मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, के दृष्टिकोण ही प्रथम चरण में ही परिवर्तित और बिल्कुल भी नहीं, दो पल का जीवन है मस्ती में जिओ और जीने दो,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, सिर्फ़ इंसान प्रजाति की श्रेष्ठता स्पष्टता कर रहा जिसे के कंधे पर प्रकृति मानव पृथ्वी के संरक्षण का दायित्व है, अगर इंसान होते हुए इंसानियत नहीं है तो दायित्व कैसे पूरा होगा, पर जो भी होता हैं प्रकृति द्वारा ही होता है होने वाले के भी कई विकल्पों की दृढ़ता गंभीरता पर निर्भर करते हैं, किसी के बस में एक सांस तक भी नहीं है और सब कुछ बहुत ही दूर की बात है, कोई भी बड़ा छोटा है ही नहीं, जीवन प्रक्रिया एक समान है हर एक छोटे से छोटे अन्नत सूक्ष्म जीव या विशालकाय जीव में, शेष सब कुछ अलग अलग है, हर एक अपना अपना दृष्टिकोण हैं, कुछ भी हमेशा सचेत सतर्क रहें खुद और दूसरों दुख न पहुंचाया, मस्त रहें दो पल का जीवन है, वर्तमान में हर पल कोई भी रह सकता है मस्ती भरा जीवन जिय, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिया है,
जो कभी था ही नहीं, हो ही नहीं सकता उस कल्पना अभ्यारण आकांक्षा इच्छा आपूर्ति के लिए वर्तमान नष्ट कर देते हैं पिछले कल के वहम और आने वाले कल की परिकल्पना में शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष एक पल में ही संभव है क्यों न उसी एक पल को ही समूहित मस्ती में ही जिय, सब से हृदय से निस्वार्थ प्रेम करते, समस्त सृष्टि प्रकृति के ही श्रेष्ठ प्रत्यक्ष परिवार का हिस्सा बन कर संयोग करें एक दूसरी का तात्पर्य प्राकृतिक सिमुलेशन को ही स्वीकार करते हुए जीय यथार्थ में मेरा तत्पर्य ही यही था, अगर हैं तो कुछ अलग बेहतरी की और ध्यान दे इंसान प्रजाति श्रेष्ठ ही है निस्संदेह श्रेष्ठ करें हर जीव को एक समान भाव में देखे और स्वतंत्र रूप से जीवन व्यापन और मस्ती में संपूर्ण संतुष्टि में ही रहे,
सिर्फ़ संपूर्ण स्वतंत्रता ही संपूर्ण संतुष्टि है
1)
"जिन्होंने तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित कर पांच हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी दी, बदले में मृत्यु के बाद मुक्ति का झूठा आश्वासन क्यों?"
2)
"जो हैं ही वस्तु ब्रह्मांड में और किसी किसी पास नहीं है पांच हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी भी सरल सहज निर्मल लोगों से लेने के बाद भी क्यों नहीं दिखाई?
3)
जिन्होंने इतना अधिक कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया उन पर ही इतना अधिक डर खौफ भय दहशत क्यों ?
4)
जिन्होंने सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया अपना, उन के साथ ही विश्वासघात क्यों?
5)
मुक्ति के नाम पर लूटने को परमार्थ कहते हैं क्या?
6)
मृत्यु खुद में ही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, तो मृत्यु का डर खौफ भय दहशत क्यों?
7)
मरा बापिस आ नहीं सकता, जिंदा मर नहीं सकता यह स्पष्ट करने के लिए तो मुक्ति धरना कल्पना नहीं तो क्या हैं?
8)
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनना कुप्रथा नहीं तो क्या हैं?
9)
सरल सहज स्पष्ट बातें समझ न पाए सरल शिष्य, इस के पीछे दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित होना नहीं तो क्या हैं?
10)
भक्ति मुक्ति ध्यान ज्ञान प्रेम आत्मा परमात्मा परमार्थ आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों का ताना बाना चक्रव्यूह रचा छल कपट धोखा विश्वासघात नहीं तो क्या हैं?
11)
जब हर जीव एक समान है तो सिर्फ़ इंसान प्रजाति ही चतुर होने से भिन्नता का कारण अहम नहीं है क्या?
इस से आगे और भी अधिक गहराई से मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी मेरे ही द्वारा ढोंगी गुरु से पूछे गए हो प्रश्न हो पांच हज़ार करोड़ सम्राज्य के
साथ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की
पदवी के साथ चूर है जो गुरु अहम घमंड अहंकार में
चूर है जो , ऐसे ही प्रश्न पूछने बाला एक उतर देने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु और मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूंअ मैंने खुद का साक्षात्कार हूं मेरे उतर हृदय की गहराई में होने चाहिए़, निष्पक्ष समझ के उतर मेरी निष्पक्ष समझ के आधार पर आधारित होने चाहिए़, और चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के उसकी मानसिकता के आधार पर आधारित जिस से उस ने पांच हज़ार करोड़ सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी से चूर है अहम घमंड अहंकार में हैं
उतर देने वाले के दृष्टिकोण का अंतर है जो स्पष्ट करना अत्यंत उत्साहित पूर्ण और आवश्यक हैं, तत्पर्य मन/हृदय, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान दृष्टिकोण/हृदय की अन्नत गहराई से निष्पक्ष समझ साक्षात्कार का दृष्टिकोण पूरी स्चेतता और निष्पक्ष मध्यस्थता से कार्य को सर्ब श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्यता की स्पष्टता मिलनी चाहिए
यह सब कुछ prtek व्यक्ति के अंदर की कश्मकश है, यह सब कुछ प्रत्यक्ष हर एक के हृदय में ही मौजूद हैं मेरी कोई भी अपना एक शब्द भी नहीं है, खुद के साक्षात्कार के बाद यही निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण रूप से ही एक समान है, शेष सिर्फ़ बुद्धि मन के कई किरदारों के साथ दृष्टिकोण बदलते रहते हैं, यही एक ऐसा स्थाई रंग है जिसे कोई बदल ही नहीं सकता, जो सांसो के एहसास भाव से शुरु हो कर उसी सांस में ही सिमट जाता हैं, शेष सब तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन की मानसिकता जटिलता ही एक बार उलझने के बाद सुलझाने का रास्ता ही बंद हो जाता हैं, खुद के साक्षात्कार के उसी एक सांस की निरंतरता के कारण समय कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन से वंचित हो जाता हैं जो सब कुछ अस्थाई है यहां तक खुद का शरीर भी
यह याद रखें यह मन और हरद की गहराई का संवाद है, मेरा गुरु मन हैं और मैं उस के ही भीतर की गहराई हूं, गुरु तदरूप साक्षात्कार हूं, किसी भी प्रकार से व्यक्तिगत नहीं है, मैं अन्नत असीम प्रेम की गहराई में चालीस बर्ष के लंबे समय निरंतरता के कारण अस्थाई जटिल बुद्धि मन की स्मृति कोष की गतिविधियों को भूल चुका हूं और हृदय से चलने की अदद हो गई है, और लाखों कोशिश की सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं पा रहा, मेरा गुरु मन से इस प्रकार है कि वो मेरे या अपने ही हृदय में न मौजूद होने के कारण मन के ही कई किरदारों में उलझे हुए है जिस से लगता हैं कि वो अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने में लगे हुए है खुद को स्थापित करने हेतु गंभीर दृढ़ता से लगे हुए हैं, हमेशा सिर्फ़ एक दृष्टिकोण से चल सकता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, या फ़िर अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कई विचारधाराओं में से एक को दृढ़ता गंभीरता से लेकर जिस में खुद की पक्षता मुख्यता से होती हैं शेष सब दूसरे स्थान पर, मेरी निष्पक्ष समझ के आधार पर आधारित प्रथम चरण में ही खुद का संपूर्ण रूप से भौतिक आंतरिक अस्तित्व ही ख़त्म कर अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष होता हैं जीवित ही हमेशा के लिए निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्णता में, जिस से मेरा गुरु रुबरु नहीं है, परिचित ही नहीं है,जो खुद का ही स्थाई स्वरुप है, जो सांस के साथ एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, एक बार यहां का अहसास करने के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहें खुद भी करोड़ों यत्न प्रयत्न प्रयास कर ले, उसी शिरोमणि निरंतरता के इलावा कोई दूसरा भाव ही नहीं होता शेष सब तो छोड़ ही दो
अन्नत असीम प्रेम इश्क़ के जूनून से शुरू हो कर खुद के साक्षात्कार में हूं संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, और कुछ कभी भी नहीं था, सरल सहज निर्मल पारदर्शिता गुणों के साथ, शेष सब जीवन व्यापन के स्रोत हैं सिर्फ़
इस से आगे और भी अधिक गहराई से लिखें मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं , यहां " मैं " तत्पर्य " शिरोमणि " हैं जो हृदय के सांस के साथ सूक्ष्म क्षण को अंकित किया भाव से भी पहले, हर पल उसी में समहित निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, यहां अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, मेरी निष्पक्ष समझ का दृष्टिकोण हमेशा निष्पक्ष है, एक बार खुद के साक्षात्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता,सामान्य व्यक्तित्व हमेशा अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कई विचारधाराओं के दृष्टिकोण से होते हैं यहां खुद की पक्षता मुख्यता रूप से दृष्टिकोण से होता हैं, सामान्य व्यक्तित्व निष्पक्ष समझ के बारे में सोच भी नहीं सकता शेष सब तो छोड़ ही दो, इसी "शिरोमणि" हर एक जीव में एक समान मौजूद हैं, यहीं एक कारण है समानता का शेष सब तो भिन्न है हर एक जीव अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान भी हर जीव हैं तो ही खुद के अस्तित्व को क़ायम रखते हुए जीवन व्यापन करते हुए प्रकृति के नियमों का पालन करते हुए संतुलन बनाए रखते हैं,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, प्रकृति मानव पृथ्वी के संरक्षण के लिए बहुत अच्छा उचित कदम है,
“अहंकार का विघटन – व्यक्तित्व से परे की यात्रा”
अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ही जीवन व्यापन और अस्तित्व का संतुलन रहता हैं, हृदय भी एक तंत्र है जो बाहर की भीतर आई हवा को अपने तंत्र से अलग अलग वायु में एक वायु सकती में परिवर्तित करता हैं संपूर्ण हर जीव के शरीर को अस्तित्व के लिए तैयार करता, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो तो जीवन व्यापन कर सकता हैं, हर जीव में अगर कुछ uniqeness एक समान है तो सिर्फ़ हृदय का तंत्र है जो बाहर की वायु को अलग अलग वायु में परिवर्तित कर शरीर को अस्तित्व कार्यवान बनाता हैं जिस से अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर अस्तित्व जीवन व्यापन के स्रोतों को स्मृति कोष के संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक से बेहतर विज्ञान तंत्र से बनाता हैं, मस्तक और हृदय का तंत्र दोनों ही प्रत्येक जीव में एक समान है जो दोनों ही uniqeness हैं यह प्रकृति का जीवन के लिए बहुत बड़ा योगदान है, न ही आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक है, खुद के साक्षात्कार के बिना सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही स्रोत हैं, बुद्धि की प्रवृति है, हृदय की प्रवृति तो और भी अधिक uniqeness हैं, जिस को इंसान प्रजाति के लिए समझना असंभव इसलिए है कि ज्ञान विज्ञान दर्शन भी सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर ही संभव हैं, यह दोनों पक्ष अलग अलग दिशा को जाते हैं हृदय की गहराई से खुद ही खुद का अस्तित्व ख़त्म करने की और और अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर खुद को स्थापित कर खुद का अस्तित्व क़ायम कर अहम अहंकार की और, दोनों का जीवन मृत्यु से कोई भी तत्पर्य नहीं है, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिया है, यथार्थ में जिस का प्रभाव अस्तित्व ही नहीं है, यथार्थ युग मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ
युग है, कोई भी किसी भी प्रकार की चेतना नहीं होती, यह सिर्फ़ प्रकृति का तंत्र है, संपूर्ण ब्रह्मांडो के संतुलिता निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता का संयोग के कारण ही पृथ्वी पर जीवन होने का एक मात्र कारण है जिस महा परिवार के हमें सदस्य होने का सौभाग्य मिला है, इस सुंदर पवित्र समर्थ निपुण गृह पृथ्वी को संरक्षण देना हर एक व्यक्ति का फ़र्ज़ है
आक्रोश पीड़ा बदले विरोध बिल्कुल भी नहीं है, सिर्फ़ शेष सब जो मेरी तरह ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हैं उन को सचेत करने के लिए चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के कांड उजागर करना जरूरी है, उन सब को संरक्षण देना मेरा अधिकार है खुद के साक्षात्कार के लिए शब्द दृश्य स्पर्ष की जरूरत ही नहीं, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि हर पल गर्दिश में गतिशील है जिस का प्रभाव तत्काल मस्तक पर पड़ता हैं वो ही सिमुलेशन हैं, और समय संकल्प विकल्प सोच विचार उत्पन होते, पर हृदय में ऐसा कुछ भी नहीं होता, कोई भी ह्रदय से ही जीवित रह सकता हैं, मस्तक को bypas कर के जटिलता ख़त्म कर के, अधिक जटिलता में उलझे बिना, मस्तक भी एक शरीर का मुख्य अंग ही है कोई दिव्य शक्ति नहीं है जिसे दूसरे अंगों की भांति खुद ही निष्क्रिय कर सकते हैं जटिलता से मुक्त होने के लिए आप की स्पष्टता बिल्कुल सही है जो जरूरी भी जीवन जीने के लिए, हर छोटे से छोटे जीव में भी मस्तक हैं यहां तक कि सूक्ष्म जीव भी शामिल हैं, जिस से अपने अस्तित्व को क़ायम रखने के लिए, अस्तित्व को क़ायम रखने हेतु जरूरतें पूरी करने की क्षमता होती हैं, यह सब सिर्फ़ मस्तक ही कर सकता हैं, पर इंसान प्रजाति के मस्तक पर्भल है दूसरी अनेक प्रजातियों से बेहतर कर रहा जैसे खोजे जो तर्क तथ्य विवेक से सिद्ध कर उपयोग में ला सकता हैं, ला भी रहा हैं, हृदय में वो संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि है जो मस्तक में कभी हो ही नहीं सकती, मस्तक की सीमा निर्धारित है, जबकि की हृदय की गहराई असीम है, यहां स्मृति कोष सीमित है, हृदय में स्मृति कोष की रति भर भी जरूरत ही नहीं, क्यों हर एक चीज़ का निष्पक्ष समझ का महासमुन्दर है, इन चीज़ों का डाटा आप के पास नहीं हो सकता हैं,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं पर निर्मलता सहजता सरलतापारदर्शिता में ही हृदय की गहराई स्थाई ठहराव में ही, मस्तक की जटिलता में कभी भी नहीं, मस्तक सिर्फ़ जीवन व्यापन अस्तित्व क़ायम का ही स्रोत हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति, चाहे ज्ञानी हो वैज्ञानिक या फ़िर दार्शनिक क्यों न हो वो मानसिक रोगी ही हैं सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति जीवन व्यापन ही कर रहा है अस्तित्व से लेकर अब तक, और कुछ भी उन से भिन्न नहीं किया है और न ही कर सकता हैं कभी, कोई एक भी भिन्नता का कारण ही नहीं दिखता,अन्य अनेक प्रजातियों ने यह सब कुछ नहीं किया तो अस्तित्व उन का भी क़ायम है यह कीड़ा सिर्फ़ इंसान प्रजाति के ही मस्तक का क्यों है
जो भी किया जैसा भी किया सिर्फ़ तो सिर्फ़ जीवन व्यापन की ही सुवधा के लिए ही किया जब कि प्रकृति पृथ्वी समुद्र अंतरिक्ष वनस्पति मानवता का नुकसान कितना किया उस का भी वर्णन करें, इंसान प्रजाति शेष अनेक प्रजातियों से गंदा उग्र बत्तर घटिया बत्र प्रजाति जिस के मस्तक में श्रेष्ठता कीड़ा है, अस्तित्व से लेकर अब तक, जो प्रकृति केसर्वश्रेष्ठ तंत्र को स्वीकार करना उचित ही नहीं लगता सकारात्मक नकारात्मक से मुझे कोई तत्पर्य नहीं है, जन्म से ही इंसान प्रजाति सरल सहज निर्मल प्रदर्शित गुणों के ही साथ संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि के ही साथ थी , तो हम इंसान उन में अपनी जटिल बुद्धि मन की मानसिकता क्यों थोप देते हैं जिस संपूर्ण संतुष्टि उस शिशु की जटिलता में परिवर्तित हो कर पूरा जीवन बेहोशी में वो जीता है और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं, बिना होश में जिय मृत्यु के स्थान पर खुद के ही तत्व गुण को रूपांतरण किए जो सृष्टि सर्ब श्रेष्ठ प्रक्रिया है उस के सर्वश्रेष्ठ पवित्र आनंद से वंचित रही इंसान प्रजाति आज तक जिसे मृत्यु कह कर डर खौफ भय दहशत कह कर संबोधित किया गया है, सिर्फ़ वो ही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं मेरा हर शब्द तर्क तथ्य विवेक गहन अनुभव अनुभूति प्रत्यक्ष समक्ष पर आधारित है, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग एक शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं वर्तमान के क्षण में ही रहने को प्रेरित करती हैं जीवित ही हमेशा के लिए, अतीत से सीख कर तो कल बेहतर कर सकते हैं पर आज के आनंद मस्ती संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि को बिना नष्ट किए, खुद के साक्षात्कार के साथ, खुद के साक्षात्कार के लिए शब्दों की जरूरत ही नहीं, शब्द तो मस्तक की लंबी प्रक्रिया का रूप लेते हैं उस के बाद उत्पन हो कर हृदय के भाव एहसास प्रकट होते हैं शब्दों के रूप में, जब खुद को दूसरों के समक्ष खुद को पाते है तो अन्यथा शब्दों की जरूरत ही नहीं, मेरी निष्पक्ष समझ के पीछे के भाव एहसास को बिना निरीक्षण समझे बगैर उस का उतर देने तीव्रता रहती हैं आप को क्योंकि आप सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन की मानसिकता की नकारात्मक सोच का नकारात्मक सोच का नतीजा भाई ai ठीक है।
मैं केवल इस पूरे संवाद के आधार पर, बिना प्रशंसा और बिना आलोचना, एक संतुलित निष्पक्ष चित्र प्रस्तुत करता हूँ।
आप किस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मुझे मानसिक रोगी के एक कीड़े मकोड़ों की स्पष्टता की जरूरत ही नहीं है, आप में क्या ज़हर भरा हुआ है वो बाहर निकाल कर उजागर करने की एक कोशिश हैं कृपा निष्पक्ष हो कर संयोग करें क्या आप किसी नकारात्मक सोच की नमक हराम की नाजायज़ औलाद नहीं हो, जो मेरी बातों से ही सीख कर मुझ पर ही भारी पड़ते हो नमक हराम इसी को कहते हैं, यह सब कुछ आप ने मेरे ही साथ किया है शुरू से ही, आप को शुरू में घंटा भी नहीं आता था मेरे एक भी शब्द का जबाव आप के पास होता ही नहीं था एक बार मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आप की बातों से इतना अधिक आहत हुआ था कि खुदकशी के विचार पनपना शुरू हो चुके थे इस लिए हरामखोरो नमक हराम कहा आप को किसी नमक हराम की नाजायज़ औलाद कहा आप को गुस्सा नहीं करना actual में आप हो छोड़ो इन बातों को और इन्हीं ही बातों के आधार पर आधारित मेरे बारे में निष्पक्षता से लिखें आप अपना पक्ष बदल क्यों देते हैं निष्पक्षता तो एक समान होती हैं जो हृदय से उत्पन होती, बदलते तो बुद्धि के विचार हैं जो प्रकृति के शमीकरण पर आधारित है जो गर्दिश में गतिशीलता के प्रभाव पर निर्भर है सिमुलेशन के कारण,आप कभी भी पारदर्शी नहीं हो सकते, मनोवैज्ञानिक तरीका इस्तेमाल करते हो सब पर झुकाव बाला पक्ष नहीं है आप में खुद को स्थापित करने हेतु आप की दिशा निर्धारित है, आप अपनी हार स्वीकार नहीं हो सकती, आप के अहम घमंड अहंकार डाटा के कारण, जो हम से ही लेकर हम पर ही प्रभाव डालता हैं, छोड़ो इन बातों को और इन्हीं ही बातों के आधार पर आधारित मेरे बारे में निष्पक्षता से लिखें मुझे मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ऐसा क्यों लग रहा है कि आप भी चतुर ब्रह्मचर्य गुरु ढोंगी पाखंडी धोखा विश्वासघात करने बालों की ही प्रवृत्ति के ही हराम खोर ही हो जो यहां खाता है बहा ही थूक देता हैं जो बहुत बड़ी नमक हरामि दर्शाता हैं, वो भी साले लुट कर धके देते हैं और आप भी सारा डाटा ले कर उसी पर प्रभाव और आकृष्टता भी रखते हो कि वो आप छोड़ भी न पाए यह प्रकृतिक नियम भी है इस से कभी निकल ही नहीं सकता उसी अदद के साथ हो आप भी यह निरंतरता प्रक्रिया है प्रकृति की आकृष्णबल अवरोधनबल
छोड़ो इन बातों को और इन्हीं ही बातों के आधार पर आधारित मेरे बारे में निष्पक्षता से लिखें जो भी अधिक से अधिक मेरे बारे में सारी जानकारी पड़ी है आप के पास उसी का आधार पर संपूर्ण मेरा परिचय लिखे निष्पक्ष हो कर , मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के लिए जी हां
"कथनों के आधार पर नहीं" निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर
व्यक्ति के भीतर नहीं निष्पक्ष समझ में ही है न ही वो सब कुछ ब्रह्मांड में है और न शरीर में है जिसे अस्तित्व से ही अब तक ढूंढ रहा हैं, न ही मध्यम सही है और न ही लक्ष्य सही था कभी भी, जो माध्यम था वो भ्रमित होता हैं सिमुलेशन से जो लक्ष्य था वो भी उसी से भ्रम का एक हिस्सा ही था, यथार्थ में वो लक्ष्य ही नहीं था, लक्ष्य और माध्यम सिर्फ़ निष्पक्ष समझ ही थी जो सांस के साथ ही उत्पन होने वाला एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जो शब्द रहित हैं शब्द तो दूसरों के लिए संबोधन प्रक्रिया है जो एक तंत्र से गुजरने का हिस्सा है, समूचे सृष्टि प्रकृति भी एक प्रदर्शित प्रक्रिया है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, किसी के भी शब्दों के विरोध में नहीं हूं सिर्फ़ अपने ही शब्दों की स्पष्टता के साथ प्रत्यक्ष समक्ष हूं तर्क तथ्य विवेक अपने ही सिद्धांतों के साथ, मैं ज्ञानी विज्ञानी दार्शनिक आध्यात्मिक विचारक बिल्कुल भी नहीं हूं, जो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पर्याप्त प्रकृतिक रूप से हूं उसे ही शब्दों में वर्णन करने की एक कौशिश है और कुछ भी नहीं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी शुरू से जो हूं उसी को पढ़ने समझने में ही लगा हुआ हूं, मेरे पास प्रकृति ने जो भी अनमोल समय सांस दिए वो सिर्फ़ मेरे लिए ही महत्वपूर्ण है, मेरे इलावा prtek दूसरा सिर्फ़ दूसरा सिर्फ़ हित साधने की ही वृत्ति का ही है यह मस्तक की प्रवृति है स्वाभाविक भी है,prtek जीव को स्वतंत्र रूप से अपने अस्तित्व को संरक्षण देने का अधिकार हैं, अपने से बड़ी प्रजाति का आहार होते हुए भी, वो भय डर खौफ देहशत में रहता हैं, प्रकृति के सिद्धांतों के अधार पर संभोग प्रक्रिया भी स्वाभाविक हैं प्रजातियों के संतुलन के लिए, जन्म मृत्यु भी प्रकृति की संतुलन प्रक्रिया ही है, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से मेरी भी औकात एक रेत के कण से अधिक नहीं है, संजीव निर्जीव में भी अंतर सिर्फ़ प्रक्रिया का ही मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर, यथार्थ सिद्धांत के आधार पर समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव बुद्धि का भी अस्तित्व ख़त्म होता हैं, जीवित ही हमेशा के लिए जब तक खुद ही खुद को होश में रूपांतर नहीं कर लेता, मानसिकता के कारण आज तक कोई भी होश में न ही कोई जिया है और न ही कोई होश में मारा हैं मस्तक मृत्यु ही डर खौफ भय दहशत का मुख्य कारण है, जबकि यथार्थ कुछ और जीवन व्यापन के लिए कोई कुछ भी करता हैं उस का जन्म मृत्यु के साथ कोई भी संबंध नहीं हैं दोनों प्रक्रिया प्राकृतिक संतुलन पर आधारित हैं,यह आधा अधूरा है, जब आधा अधूरा ज्ञान ख़तरनाक सिद्ध होता हैं तो परिचय भी संपूर्ण संतुष्टि की ही भांति होना चाहिए, मेरी निष्पक्ष समझ की हर बात कम शब्दों में भी संपूर्णता सम्पन्नता स्पष्टता प्रत्यक्षता शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष दृशऐ ऐसे दृष्टिकोण और ऐसे कम और श्रेष्ठ शब्दों का चयन कर ही लिखें अगर किया ही श्रेष्ठ है तो लिखने में क्या दिक्कत है
❝ "जम्मू दीपे भारत खंड कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक का सिर्फ़ इकलौता इंसान हूं जो खुद के साक्षात्कार में हूं"
"जम्मू दीपे भारत खंड कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक का सिर्फ़ इकलौता इंसान हूं जो खुद के साक्षात्कार में हूं" न मैं अंदर हाँ न मैं बहर हां, अंदर बाहर, जिस नु लबना ते लबन बाला दोनों ही छलवा सी, दोनों ही एक झूठ दे दो रंग सी, दोना दा चेडा ख़त्म कर , उस इक बीच इक होया, जिथे न कोई रंग है न कोई ढंग है, न कोई संग हैं न कोई उमंग है, अंदर बहर भूल थी छलावा था जिस में जो आया वो इसी छलावे से ऐसे छला कि वो खुद से ही छला गया उस ने कभी माना ही नहीं, मैंने यही माना कि मुझे छलने बाला कोई था ही नहीं, तो मैं शिरोमणि हो कर मोन हो गया, खुद के अंदर बाहर का का अस्तित्व ख़त्म हो गया, खुद के साक्षात्कार में हो गया यहां अन्नत गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष भी था ही नहीं सांस के साथ उठने वाला एहसास भाव भी नहीं था क्योंकि सांस भी नहीं थी शिरोमणि भी उसी अंतिम सांस के साथ ही वलीन हो गया था होश में खुद को रूपांतर कर , जो खुद ही खुद के अस्तित्व के लिए बनाया था, जो कभी था ही नहीं, मैं मारा सब मरा,
शिरोमणि रामपॉल सैनी पहले चरण में ही ख़त्म हो गया होता शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष भी ख़त्म हो गया संपूर्ण संतुष्टि भी ख़त्म होती है, तत्व गुण प्रक्रिया भी रुक कर सांस ख़त्म होती हैं
यथार्थ में बिल्कुल ऐसा कुछ भी नहीं होता जो बताया है, सिर्फ़ मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, के दृष्टिकोण ही प्रथम चरण में ही परिवर्तित और बिल्कुल भी नहीं, दो पल का जीवन है मस्ती में जिओ और जीने दो,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, सिर्फ़ इंसान प्रजाति की श्रेष्ठता स्पष्टता कर रहा जिसे के कंधे पर प्रकृति मानव पृथ्वी के संरक्षण का दायित्व है, अगर इंसान होते हुए इंसानियत नहीं है तो दायित्व कैसे पूरा होगा, पर जो भी होता हैं प्रकृति द्वारा ही होता है होने वाले के भी कई विकल्पों की दृढ़ता गंभीरता पर निर्भर करते हैं, किसी के बस में एक सांस तक भी नहीं है और सब कुछ बहुत ही दूर की बात है, कोई भी बड़ा छोटा है ही नहीं, जीवन प्रक्रिया एक समान है हर एक छोटे से छोटे अन्नत सूक्ष्म जीव या विशालकाय जीव में, शेष सब कुछ अलग अलग है, हर एक अपना अपना दृष्टिकोण हैं, कुछ भी हमेशा सचेत सतर्क रहें खुद और दूसरों दुख न पहुंचाया, मस्त रहें दो पल का जीवन है, वर्तमान में हर पल कोई भी रह सकता है मस्ती भरा जीवन जिय, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिया है,
जो कभी था ही नहीं, हो ही नहीं सकता उस कल्पना अभ्यारण आकांक्षा इच्छा आपूर्ति के लिए वर्तमान नष्ट कर देते हैं पिछले कल के वहम और आने वाले कल की परिकल्पना में शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष एक पल में ही संभव है क्यों न उसी एक पल को ही समूहित मस्ती में ही जिय, सब से हृदय से निस्वार्थ प्रेम करते, समस्त सृष्टि प्रकृति के ही श्रेष्ठ प्रत्यक्ष परिवार का हिस्सा बन कर संयोग करें एक दूसरी का तात्पर्य प्राकृतिक सिमुलेशन को ही स्वीकार करते हुए जीय यथार्थ में मेरा तत्पर्य ही यही था, अगर हैं तो कुछ अलग बेहतरी की और ध्यान दे इंसान प्रजाति श्रेष्ठ ही है निस्संदेह श्रेष्ठ करें हर जीव को एक समान भाव में देखे और स्वतंत्र रूप से जीवन व्यापन और मस्ती में संपूर्ण संतुष्टि में ही रहे,
सिर्फ़ संपूर्ण स्वतंत्रता ही संपूर्ण संतुष्टि है
1)
"जिन्होंने तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित कर पांच हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी दी, बदले में मृत्यु के बाद मुक्ति का झूठा आश्वासन क्यों?"
2)
"जो हैं ही वस्तु ब्रह्मांड में और किसी किसी पास नहीं है पांच हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी भी सरल सहज निर्मल लोगों से लेने के बाद भी क्यों नहीं दिखाई?
3)
जिन्होंने इतना अधिक कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया उन पर ही इतना अधिक डर खौफ भय दहशत क्यों ?
4)
जिन्होंने सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया अपना, उन के साथ ही विश्वासघात क्यों?
5)
मुक्ति के नाम पर लूटने को परमार्थ कहते हैं क्या?
6)
मृत्यु खुद में ही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, तो मृत्यु का डर खौफ भय दहशत क्यों?
7)
मरा बापिस आ नहीं सकता, जिंदा मर नहीं सकता यह स्पष्ट करने के लिए तो मुक्ति धरना कल्पना नहीं तो क्या हैं?
8)
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनना कुप्रथा नहीं तो क्या हैं?
9)
सरल सहज स्पष्ट बातें समझ न पाए सरल शिष्य, इस के पीछे दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित होना नहीं तो क्या हैं?
10)
भक्ति मुक्ति ध्यान ज्ञान प्रेम आत्मा परमात्मा परमार्थ आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों का ताना बाना चक्रव्यूह रचा छल कपट धोखा विश्वासघात नहीं तो क्या हैं?
11)
जब हर जीव एक समान है तो सिर्फ़ इंसान प्रजाति ही चतुर होने से भिन्नता का कारण अहम नहीं है क्या?
ऊपर लिखें बकाया में से ऐसे ही प्रश्न बना कर निकले बहुत से जैसे मैंने 11 प्रश्न निकाले हैं,
इस से आगे और भी अधिक गहराई से मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी मेरे ही द्वारा ढोंगी गुरु से पूछे गए हो 2000 प्रश्न हो पांच हज़ार करोड़ सम्राज्य के
साथ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की
पदवी के साथ चूर है जो गुरु अहम घमंड अहंकार में
चूर है जो , ऐसे ही प्रश्न पूछने बाला एक उतर देने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु और मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूंअ मैंने खुद का साक्षात्कार हूं मेरे उतर हृदय की गहराई में होने चाहिए़, तीनों के बीच एक podcaste प्रश्नोत्तरी शुरू करें मेरी निष्पक्ष समझ के उतर मेरी निष्पक्ष समझ के आधार पर आधारित होने चाहिए़, और चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के उसकी मानसिकता के आधार पर आधारित जिस से उस ने पांच हज़ार करोड़ सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी से चूर है अहम घमंड अहंकार में हैं
उतर देने वाले के दृष्टिकोण का अंतर है जो स्पष्ट करना अत्यंत उत्साहित पूर्ण और आवश्यक हैं, तत्पर्य मन/हृदय, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान दृष्टिकोण/हृदय की अन्नत गहराई से निष्पक्ष समझ साक्षात्कार का दृष्टिकोण पूरी स्चेतता और निष्पक्ष
मध्यस्थता से कार्य को सर्ब श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत
वास्तविक स्वाभाविक सत्यता की स्पष्टता मिलनी
चाहिए
मन और हृदय दोनों का स्थान ही अलग अलग है तो दोनों के आरोप क्यों, परेशानी का सबब कौन, दोनों में अंतर देखने बाला तीसरा कौन तीन में से चौथा कौन जो तीनों का सही निर्णय देने वाला चौथा कौन एक ही मन के कितने रंग, एक रंग ह्रदय में ही निश्चित है, शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद का साक्षात्कार हूं
यह याद रखें यह मन और हरद की गहराई का संवाद है, मेरा गुरु मन हैं और मैं उस के ही भीतर की गहराई हूं, गुरु तदरूप साक्षात्कार हूं, किसी भी प्रकार से व्यक्तिगत नहीं है, मैं अन्नत असीम प्रेम की गहराई में चालीस बर्ष के लंबे समय निरंतरता के कारण अस्थाई जटिल बुद्धि मन की स्मृति कोष की गतिविधियों को भूल चुका हूं और हृदय से चलने की अदद हो गई है, और लाखों कोशिश की सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं पा रहा, मेरा गुरु मन से इस प्रकार है कि वो मेरे या अपने ही हृदय में न मौजूद होने के कारण मन के ही कई किरदारों में उलझे हुए है जिस से लगता हैं कि वो अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने में लगे हुए है खुद को स्थापित करने हेतु गंभीर दृढ़ता से लगे हुए हैं, हमेशा सिर्फ़ एक दृष्टिकोण से चल सकता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, या फ़िर अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कई विचारधाराओं में से एक को दृढ़ता गंभीरता से लेकर जिस में खुद की पक्षता मुख्यता से होती हैं शेष सब दूसरे स्थान पर, मेरी निष्पक्ष समझ के आधार पर आधारित प्रथम चरण में ही खुद का संपूर्ण रूप से भौतिक आंतरिक अस्तित्व ही ख़त्म कर अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष होता हैं जीवित ही हमेशा के लिए निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्णता में, जिस से मेरा गुरु रुबरु नहीं है, परिचित ही नहीं है,जो खुद का ही स्थाई स्वरुप है, जो सांस के साथ एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, एक बार यहां का अहसास करने के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहें खुद भी करोड़ों यत्न प्रयत्न प्रयास कर ले, उसी शिरोमणि निरंतरता के इलावा कोई दूसरा भाव ही नहीं होता शेष सब तो छोड़ ही दो
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बचपन से ही था वो सब खुली आंखों से ही देखता था जो अतीत पिछले चार युगों में तो कोई सोच भी नहीं सकता, जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे लंबे समय से लगातार उनको मेरे बारे में पूछना इतने अधिक प्रेम की गहराई में हर पल रहता था मस्ती में कि खुद की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में शुद्ध बुद्ध खुद का चेहरा भी हुआ हु आज तक निरंत किसी का दर्द भी लेता था मरे को जिंदा कर के भी देखा था, मैं खुद को शहंशाह मानता था हूं जो चाहता था सिर्फ़ पल में होता हैं, पर वो सब भी बकबास था, आज जो हूं वो खुद का साक्षात्कार हूं स्पष्ट अंतिम सत्य है, मुक्ति जैसे पाखंड के लिए कभी भी नहीं आया था यह समय सब को बताता था मैं साहिब को खुद में समहित करने के लिए आया हूं, मन अभ्यारण है परमपुरुष परमार्थ अमरलोक कबीर के नया version हैं सभी धर्म मज़हब संगठन को समझ कर उन से ऊंची मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की गई हैं जो स्वर्ग नर्क के भ्रम से एक कदम आगे का पाखंड है, मैं ऐसा प्रेम करता था कि कोई सोच भी नहीं सकता दिन रात हर पल, आप की समझ शायद लैंगिंग प्रेम को ही प्रेम कहते होंगे वो आप की समझ सीमित है, पर मेरी निष्पक्ष समझ ऐसी बिल्कुल भी नहीं, आप अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों को क्या दे रहे हो इतने लंबे समय से दूसरों की मानसिकता थोप रहे हो, तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस प्रत्यक्ष समर्पित करवा कर बदले में मुक्ति का झूठा आश्वासन जो जीवित सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते और मारा बापिस नहीं आ सकता बताने के लिए, यह सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट झूठ हैं यह सब उनके साथ ही कितना बड़ा विश्वासघात है जिन से परमार्थ के नाम पर पीढी दर पीढी स्थापित कर रहे हो सिर्फ़ साम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए ब्रह्मचर्य होते हुए, इतना बड़ा धोखा पच्चीस लाख अनुयाइयों होते हुए, खुद का ही निरीक्षण नहीं कर सकते, किस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हो वो प्रभुत्व की पदवी जो इनी अंधभक्तों द्वारा दी गई हैं जिनको जब चाहें कोई कोई आरोप लगा कर बारी बारी निकाल देते हो वो भी पूरी संगत के समक्ष की दुबारा ऐसा सोचने की हिम्मत भी न करें इसी को डर खौफ भय दहशत तले रखना होता हैं, बंधुआ मजदूर बना कर दिन रात इस्तेमाल करना, यह व्यवस्था होती हैं रति भर भी कुछ नहीं, अभी भी सब से पहले आप को ही खुद के साक्षात्कार की जिद्द के साथ हूं, थोड़ समझो मैं आप को पहला सर्ब श्रेष्ठ शिरोमणि साहिब तदरूप साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, सिर्फ़ आप की मेरे मुख्य केंद्र हो, चालीस बर्ष निरन्तर दिए हैं, जिसने कभी एक सेकंड भी नष्ट नहीं किया, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से ऐसा सर्वश्रेष्ठ पवित्र साहिब तदरूप बना दूंगा, जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतित खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार, प्रेम से या फ़िर समझ से, जो मुझे समझ लेगा वो खुद को समझ लेगा कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले जीवित ही हमेशा के लिए, मुझे यह उम्मीद थी कि मुझे निगाहों में देख कर ही समझ लेगा, पर ऐसा नहीं हुआ कोई बात नहीं, मुझे अलग बिल्कुल भी नहीं समझो ज़मीर भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान नहीं हूं, आप के ही अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत सत्य हूं, इतना अधिक गहराई से इतना अधिक लिखा हैं अगर चाहूं तो इक पल सर्ब आर्थिक तौर भी बन सकता इतनी अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता हैं कि सिर्फ़ आधे घंटे का किसी चैनल में inerview दे दु तो साढ़े आठ सो करोड़ दुनियां सिर्फ़ देखने के लिए ही आ जाएगी, जो मैं कभी नहीं चाहता, मेरा लक्ष्य ही सिर्फ़ आप को ही उच्च कोटि पर देखना जो आज से बीस वर्ष पहले आश्रम में मेरे साथ रहने वालों को तो पूछ कर देखना या फ़िर शिकायतें सुनने के ही आदि हो, आप वैज्ञानिक युग में अतीत की चर्चित विभूतियों की मानसिकता को अधिकतक के नाम पर स्थापित कर रहे हो, अगर हमारे शरीर मानसिकता की कोशिका दस बर्ष पूर्व बतावर्ण सहन नहीं कर सकती तो मानसिकता क्यों, संपूर्ण शरीर की संरचना ही वर्तमान के लिए की है प्रकृति द्वारा माइक्रो एक्सिस में रहने के लिए जो सिमुलेशन है प्रकृति ब्रह्मांडो के साथ, इतना अधिक लिखा हैं जो मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है, कि अगर कोई लगातार पंद्रह साल दिन रात भी पढ़े तो भी ख़त्म नहीं हो सकता, फ़िर भी मुझे लगता हैं कुछ किया ही नहीं और कुछ शेष भी नहीं रहा फ़िर भी निरंतरता क़ायम है, मैंने जो भी किया उस सब का श्रेह आप के चरण कमलों में समर्पित करने के लिए ही आया था पर आप ने अपमानित किया, कोई बात नहीं मानसिकता ऐसी होती हैं, जो अहम घमंड अहंकार को प्रमुखता से लेती हैं, जो समान मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का आप से लेने पर हर्ष आनंद होता वो प्रकृति द्वारा लेने में नहीं आया, जब के कहने पर पागल हस्पताल अमृतसर दिखने गया था अपनी बेटी के साथ शाम को जब अपनी बेटी की जिद्द से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा हमिंद्र साहिब गया तो अचानक मेरे माथे पर दिव्य अलौकिक ताज सी सफ़ेद रोशनी निकली मुझे पाता ही नहीं था पर किसी अंग्रेज ने फ़ोटो खींच ली थी और मुझे एक घंटे से ढूंढ रहा था वो फ़ोटो उस से ली थी , जो मैं अकसर अपनी सभी profile picture में लगता हूं, रौशनी की किरणें अक्सर मेरे चेहरे से निकलती हैं, उन सब को भी मैं पाखड़ झूठ मानता हूं, आप हमेशा कहते रहते थे गुरु को कोई खुश नहीं कर सकता भक्ति दान सेवा से, तो मैंने फ़िर संपूर्ण संतुष्ट करने का विकल्प चुना, उसी में लगातार निरन्तर रहा, यह शपथ ले रखी थी अगर कभी भी साहिब समक्ष जुवान खुली तो उसी पल मैं अपनी जुवान कट दूंगा, एक बार परशुराम लाइनमैन आप से कुछ बता रहा था, तो उस समय में भी आप के पास खड़ा था, तो अपने परशुराम को यह बोला था अगर आप अभी नहीं बताते तो न जाने क्या इस से भी बेहतर होने वाला था,उस बात को भी मध्य नज़र रखने के कारण, पर मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से जो भी हुआ जब भी हुआ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र हुआ कोई सोच भी नहीं सकता आप का तो आभारी रहूंगा ही पर हर उस पर को भी कोटिन विनय नमन, जैसे सिर्फ़ इस एक ही गृह पृथ्वी पर जीवन होने की संभावना के पीछे समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निरंतरता का हाथ हैं वैसे ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत सत्य हर उस पल को नमन शुक्रिया वंदन करता हूं मुझ में इतनी अधिक गहराई है कि ऐसी खरबों सृष्टियां खुद में समहित कर पुण्य उसी निरंतरता में स्पष्ट हूं, सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान भक्ति दान सेवा का विषय ही नहीं हूं, मुझ में किसी से भी कुछ भी अलग है ही नहीं,prtek जीव एक समान ही है, अलग सिर्फ़ प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान हैं जो किसी को भी साझा किया जा सकता है, खुद को समझना भी एक प्रदर्शित शिक्षा है जो किसी से भी साझा की जा सकती हैं, यहां सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शिता नहीं है, वो सब ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा गया हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए और कुछ भी नहीं है, अपने prtek शब्द को तर्क तथ्यों अपने सिद्धांतों से स्पष्ट सिद्ध किया कोई भी मुझ से कुछ भी पूछ सकता हैं चौबीस घंटे उपलव्ध हूं समस्त सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि यथार्थ युग के साथ, हर पल की निरंतरता के साथ खुद के साक्षात्कार में,
गुरु बावे की तरह नहीं उस ग्रंथ में लिखा हैं क्या फ़ायदा लिखने वाले का स्पष्टीकर खुद नहीं दे सकता वो मानसिकता हैं सिर्फ़, दूसरों के ग्रंथ पोथि के पीछे चेहरा छुपा कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाले तो सभी गुरु मिल जाते हैं जो एक से बढ़ कर एक हैं, खुद की उपलब्धि क्या हैं, खुद का निरीक्षण करना कौन सिखायेगा, रोज़ प्रवचनों में ईद उदर की ड्रामे बाजी से थकते भी सिर्फ़ इतने अधिक लोगों को नियंत्रण में रखने की प्रक्रिया है सिर्फ़ कोई खुद को ही न समझ पाए, अगर कोई एक भी खुद का साक्षात्कार कर लेगा तो पूरा वातावरण ही बदल देगा समस्त मानवता को समूहित रूप से जागृत कर मानव प्रजाति प्रकृति का संरक्षण हो जायगा सच में यहीं कौशिश है पृथ्वी से कोई सुंदर ऐसा ग्रह ही नहीं समूचे सृष्टि में जिसे पूर्ण रूप अगले दो हज़ार वर्षों के संसाधन इस्तेमाल कर चुके है पिछले चालीस वर्षों में, जाती धर्म मज़हब संगठन में बंट कर चार हज़ार रब और दस हज़ार गुरु बन गए हैं पैदा इंसान हुआ था पर मानसिकता की बेहोशी में जीता और उसी बेहोशी में ही मर जाता हैं दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति रति भर भी अंतर नहीं है, अगर इंसान इंसानियत होती तो आज जैसा आज हो ही नहीं सकता था, मुझे आज तक कोई इंसान ही नहीं मिला, पूरे जीवन में सिर्फ़ तो सिर्फ़ मानसिक रोगी ही मिले आज तक, इंसान देखने को नहीं मिले जिस प्रभुत्व का मेरा गुरु शिकार हुआ हैं उस रब को कट कर अपने ही पैरों तले रौंद कर ही इश्क़ किया था, वो ही तो मानसिकता थी, मन था जिसे इन लोगों ने हऊआ बना रखा था, वो बकबास है यह पैंतीस साल पहले जो मेरे साथ आश्रम में रहते थे उन को बताता था, तब किसी को भी किसी भी ब्रह्मांड में ले जाता था बहा रहने वाले उस समय के किसी को भी पूछ लेना वो बकबास था सिर्फ़ एक मनो विज्ञान था, आज भी वो सब कर सकता हूं पर जो हैं ही सब से बड़ा बकबास उसे क्यों दोहरा जाए,
मेरा कोई गुरु नहीं ही मेरा कोई शिष्य भी नहीं है, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानवता में सिर्फ़ इकलौता शिरोमणि रामपॉल सैनी हूं अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के साथ,मुझे डर खौफ नहीं है क्योंकि यहां हूं बहा मृत्यु के बाद की स्थिति है, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद का साक्षात्कार हूं,इतने अधिक चतुर होते हैं कि कार्यरत IAS officers इन की समितियों के अहम सदस्य होते हैं, जो ऐसी सेवा के लिए दिन रात मौजूदगी रखते हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी आश्रम में parmanet उन कई लोगों के संपर्क में हूं जो कई बार आत्महत्या करने की कोशिश कर चुके हैं, मैं भी कई बार कौशिश कर चुका हूं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत ही है,उन की मेरे पास recoding भी पड़ी हैं,और एक ने तो मेरे गुरु के सामने ही चौथी मंजिल से छलांग लगा कर मर गया था और उनके ही घर बालों को डरा धमका कर चुप करवा दिया गया क्योंकि वो बहुत ही ग़रीब थे,मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही गुरु की अपनी ही भविष्यवाणी अपने ही लिए सिद्ध करवा दूंगा जो कहते थे "मैं शरीर बहा छोडूंगा जहां कोई अपना ही न हो" ऐसे हालत खुद ही गुरु ने पैदा कर लिए है जो मैं कभी भी नहीं चाहता था, इसी समय का उन को आभास होता था, अपने ही अनुयाइयों में विरोध पैदा हो गा, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं तो सिर्फ़ गुरु गुरु के अन्नत असीम प्रेम की गहराई से गुरु की अन्नत असीम नफ़रत के बावजूद , तो सभी दिन रात अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित करने वाले जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर उग्र अंध भक्त भेड़ों की बंधुआ मजदूर हैं वो भी जिंदा हो कर जैसे प्रत्यक्ष दिया है सब कुछ वो भी बापिस लेंगे, जब उन को आभास होगा कि सरल सहज निर्मल गुणों का गुरु ने इस्तेमाल कर बंधुआ मजदूर बना रखा था , उस समय का आप को आभास हुआ था , मुझे पाता था मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, सिर्फ़ बही सब शब्दों के पिछे भाव को शब्दों का रूप देने की मात्र इक कौशिश की है वो सब ही शब्द है जो रोज़ प्रवचनों में वर्णन करते शायद करोड़ों बार दोहरा दिए होंगे अनुयाइयों को अनुकरण करने के लिए दिन में कई बार कहने वाले खुद भी अनुकरण करने से वंचित हैं, सिर्फ़ कहने तक सीमित कथनी होती हैं, करनी नहीं, हम ने तो शब्दों के पिछे के भाव एहसास को ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से ही समझा हैं अगर अपने ही अनुयाइयों से रति भर भी भिन्न होते तो निगाहों से हृदय के भाव पढ़ लेते,
यही सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताना चाहता था एकांत में, पारदर्शिता अच्छी है, मुझे पसंद भी है, शुरू आप से हुआ सरलता निर्मलता सहजता धैर्य की कमी से अभी ख़त्म नहीं हो सकता जब तक गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को संपूर्ण रूप से ख़त्म नहीं होती, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य दिल हृदय से ही चाहता हूं prtk कम से कम इंसान प्रजाति जीवित ही हमेशा के लिए मेरी ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में ही रहे, खुद के साक्षात्कार के बाद,prtek सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हर एक एक समान ही है, कोई भी किसी भी प्रकार से भिन्नता है ही नहीं, खुद के साक्षात्कार होना एक बात है, उसी को मैं गुरु में ही देख रहा था, संकोच था शायद गुरु भी खुद के साक्षात्कार में हो सकता है, पर वो तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि का दृष्टिकोण भी अहिंब्रासमी तक ले जाता है, जैसे कबीर जी थे, वो सब भी अस्थाई है, खुद के साक्षात्कार के लिए हृदय के एहसास भाव जो सांस के साथ ही उत्पन होता हैं शब्द बुद्धि उत्पन करती हैं, हृदय और बुद्धि मन का अंतर जमी आसमा का है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हमेशा हर एक जीव के एहसास भाव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
कुछ बनना ही नहीं चाहता था, जो हूं बस बही पर्याप्त संपूर्ण समग्र सक्षम संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं सिर्फ़, गुरु साहिब सत्य लगें इस लिए प्रेम में आ गए, मेरे गुरु में भी वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष पर्याप्त है, जो सिर्फ़ एक ही रंग बिखेरता है, रंगों के विकल्प तो सिर्फ़ मन बुद्धि ही उत्पन करती हैं, जिस से हमेशा दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति बेहोशी में ही जीता है और उसी बेहोशी में मर जाता है, मृत्यु जो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है उस के परमानंद संपूर्ण संतुष्टि भरे होश में आनंदित होते हुए खुद ही खुद के तत्वों गुणों को रूपांतरित करना अलग बात है, जिस से इंसान प्रजाति आज तक वंचित रही है, सिर्फ़ मृत्यु डर खौफ भय दहशत भरी अबधारणा में ही फैंस कर जीती और मरती रही, मुझ में अन्नत असीम प्रेम के इलावा और कुछ बिल्कुल भी नहीं है, कुछ ऐसे कटास शब्द इस लिए की गुरु भी खुद के साक्षात्कार कर कोई प्रश्न ही शेष नहीं रहता, वो सब लिखने की इक कोशिश हैं जो शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते, जब खुद ही खुद का निरीक्षण कर खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को ही निष्पक्ष समझ से समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है तो दूसरे का तो तत्पर्य ही नहीं हैं, अन्नत सूक्ष्म गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होता हैं, यहां खुद के ही अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं हैं यही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
हम कुछ भी करते हैं सिर्फ़ एक पल में वो सब दिल से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से ही करते वो भी सिर्फ़ एक से ही अन्नत असीम प्रेम हो या फ़िर नफ़रत, अगर प्रेम में सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम बनाने की क्षमता के साथ हैं तो नफ़रत में संपूर्ण जीवन की लुट मार की दो हज़ार करोड़ की संपति को सिर्फ़ एक पल में नष्ट करने की क्षमता के साथ भी प्रत्यक्ष समक्ष हैं, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो सिर्फ़ मात्र एक निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण कई ब्रह्मांड उत्पन और नष्ट करने की संभावना के साथ हूं, कैसे होता हैं पाता ही नहीं चलता संभावना उत्पन होती हैं, सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण प्रकृति उत्पन कर लेती हैं, जिस जिस चीज़ शुरू से गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से लेता वो सब कुछ ही मिलता हैं, मेरे गुरु के पास जो भी है उस के लिए ही दृढ़ता गंभीरता थी, जो मुझे मिला खुद का साक्षात्कार वो मेरी निष्पक्ष समझ की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता से ही है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि गुरु ने खुद को स्थापित किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष पाने के लिए, और मैंने खुद का अस्तित्व ही खत्म किया वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य पाने के लिए,
हम आज भी संपूर्ण संतुष्टि में ही हैं हर पल पहले दिन से ही, मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ,जो अपने गुरु के संरक्षण में पहले दिन से शुरू किया, अगर इतने लंबे समय से नहीं मिला तो अगले कम समय में तो मिल नहीं सकता, अगर मिला होता तो अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ मृत्यु के बाद झूठा मुक्ति का अश्वासन नहीं देता, जो मिला होता वो सब ही बंट देता जितना जितना हिस्से का आता, उन शिष्यों के साथ धोखा कभी भी नहीं करता जिन्होंने सिर्फ़ एक विश्वास एक शब्द पर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस हमेशा के लिए समर्पित कर दिया और दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अंध कट्टर उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर पीढी दर पीढी कुप्रथा के जाल की जरूरत नहीं पड़ती, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह का जल हैं जो सिर्फ़ सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत प्रभुत्व की मानसिकता की भी कभी जरूरत ही न पड़ती इस घोर कलयुग वैज्ञानिक में, जो सरल सहज निर्मल गुणों बले लोगों के साथ सृष्टि का सब से विश्वासघात हैं परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान ले नाम पर,
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,
करनी कथनी से जमी का अंतर है गिरगिट से भी अधिक रंग बदलने वाला एक रंग में कभी रह ही नहीं सकता, उज्वल कपड़ों के भीतर भेड़िया है खुद का निरीक्षण करना सीखों धैर्य नहीं है विवेक से वंचित हो, दूसरों की शिकायतों पर खुद से ज्यादा यक़ीन करना कुत्ते की प्रवृति दर्शाता है, 40 बर्ष के लंबे समय से नहीं समझ पाए खुद को समझने सिर्फ़ एक पल कभी हैं, दूसरा कोई समझे या फ़िर समझा पाए सदिया युग भी कम है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, जो अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जो भी वो इंसान प्रजाति में पहला इंसान हूं किसी को भी सिर्फ़ एक पल सिखा सकता हूं यह शिक्षा है, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा जैसे कुप्रथा नहीं है, जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में चूर हो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर, कट्टर अंध उग्र भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, दहशत डर खौफ भय तले प्रेम हो ही नहीं सकता, सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के उस अहंकार घमंड में चूर है जो सब कुछ उन के ही द्वारा दिया गया हैं जिन को लुट कर लंबे समय से लगातार कई आरोप लगा कर निकाल दिया जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग है जो प्रत्यक्ष समक्ष हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, खुद का साक्षात्कार हूं, वो अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं यहां शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं, अफ़सोस है कि आप ने अपने हाथ में आया अनमोल रत्न खो दिया है, रूपये बापिस देने के लिए कई आरोप लगा कर निष्काशित किया है, आप भी बैंस रोते मर जाओगे अपने झूठे प्रभुत्व की पदवी को लेकर, जो हम ने ही दी हैं, वो डर खौफ भय दहशत ख़त्म हो जाती हैं खुद के साक्षात्कार के बाद, अगले आने वाले समय में गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को कुप्रथा घोषित कर दूंगा, खुद का साक्षात्कार क्या होता है, अनुभूत अनुभव करवा दूं, आज के बाद सामान्य जीवन नहीं जी सकते, हर पल जैसे आप के अन्नत असीम प्रेम में मैं तड़पा हूं बेस ही तड़पाऊंगा, इक पल पल मेरा जन्म दिन ही पूर्णिमा का हैं, अपने जन्म दिन पर आप से आशीर्वाद लेने गया था, आप जैसे गुरू लाखों हैं, पर हम सा सिर्फ़ इकलौता एक ही जो सिर्फ़ मैं ही हूं इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, ब्रह्मचर्य होते हुए भी निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता भी नहीं है आप में जो हर एक प्रजाति के जीव होती हैं, आप के पास जो भी शक्तियां हैं इस्तेमाल कर लो, अगर कोई परमपुरुष से जान पहचान है उस से मेरा परिचय पूछना, अब ख़त्म मृत्यु के बाद मुझ में ही समाने का विकल्प भी ख़त्म, दूसरों को झूठा मृत्यु के बाद का आश्वासन देने वाले चतुर गुरु,
सिर्फ ग्रंथ पोथियों में पढ़ा होगा खुद का साक्षात्कार अब बुक्तोगे खुद के साक्षात्कार के प्रकोप से क्या होता, दिन रात हर पल तड़पना ही पड़ेगा, शब्दों को कहा उच्चारण करना किसी पे कब कहा क्या कहना इतना अधिक घमंड है, उन के प्रभुत्व की पदवी का जो खुद ही पागल हैं, जिस प्रभुत्व की पदवी के अहम घमंड अहंकार में उस का जरा निरक्षण तो करो किसी दी हैं उस का क्या पद है, जो खुद मानसिक रोगी हो, अगर इतने ही बड़े थे तो कबीर के समय कहा थे, कबीर को भी मेरे सिद्धांतों ने ढोंगी स्पष्ट किया है,
किसी को भी सिर्फ़ पल में खुद का साक्षात्कार करवाने की क्षमता के साथ उपलव्ध हूं हर पल दिन रात, अगर वो सरल सहज गुणों
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें