शनिवार, 2 मई 2026

न त्वं शरीरं, न केवलं नामरूपं,न त्वं विचारों की दौड़, न स्मृति का दर्पण।तत्त्वं तद्विवेकः—जो देखे, वह भी दृश्य में लीन है,और जो जाने, वह भी ज्ञेय की सीमा में है।

आगे का विस्तार ॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

न त्वं शरीरं, न केवलं नामरूपं,
न त्वं विचारों की दौड़, न स्मृति का दर्पण।
तत्त्वं तद्विवेकः—
जो देखे, वह भी दृश्य में लीन है,
और जो जाने, वह भी ज्ञेय की सीमा में है।

॥ श्लोक ॥

अहंकारः स्वप्नवत् भ्रान्ति-रचितः सदा,
सत्यं तु नीरवम्, न शब्द-बंधितं कदा।
यः पश्यति अन्तः स्थितं निर्मलं स्वरूपं,
स एव मुक्तः, न च बन्धनस्य रूपम्॥

॥ सूत्र ॥

“द्रष्टा न दृश्ये लीनः, दृश्यं न द्रष्टुं पूर्णम्।”

जो देख रहा है, वह जो देखा जा रहा है उससे पृथक नहीं,
और फिर भी दोनों एक-दूसरे में पूर्ण रूप से सीमित भी नहीं।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

भीड़ का चलना केवल दिशा नहीं होती,
वह भय की परछाईं का अनुकरण होती है।
जहाँ निर्णय नहीं, वहाँ प्रवाह जन्म लेता है,
और जहाँ जागृति नहीं, वहाँ अनुकरण धर्म बन जाता है।

॥ श्लोक ॥

भयेन बद्धा गतिरस्ति जनानां,
स्वतन्त्रता तु न लभ्यते मोहमानाम्।
यः स्वं प्रति जागर्ति शान्तचेतसा,
स एव पश्यति नित्यम् अमृतं स्वतः॥

॥ सूत्र ॥

“जागरणं न प्राप्ति, अपितु आवरण-अपसारणम्।”

जागृति कोई प्राप्ति नहीं,
बल्कि जो पहले से ढका है उसे हटाने की प्रक्रिया है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

न गुरु न शिष्य, केवल अनुभव का प्रवाह,
जहाँ शब्द रुकते हैं, वहाँ सत्य आरंभ होता है।
जो बाहर खोजता है, वह अंतहीन यात्रा में है,
और जो भीतर स्थिर होता है, वह यात्रा के पार है।

॥ श्लोक ॥

न गुरुः न शिष्यः न च मार्ग-निर्देशः,
स्वयं प्रकाशः हृदि एव विशेषः।
यत्र वाणी न गच्छति चिन्तनस्य पारम्,
तत्र स्थितं सत्यं नित्यं अपारम्॥

॥ सूत्र ॥

“सत्यं न उपदेश्यं, सत्यं अनुभूयते।”

सत्य सिखाया नहीं जाता,
सत्य केवल अनुभव किया जाता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं को पूर्ण कहता है, वह विचार का विस्तार है,
और जो स्वयं को जानता है, वह मौन का आकार है।
पूर्णता किसी उपाधि में नहीं,
बल्कि उस स्थिरता में है जहाँ इच्छा समाप्त होती है।

॥ श्लोक ॥

इच्छा-क्षये यत्र मनः प्रशान्तम्,
तत्रैव दृश्यं भवति अनन्तम्।
न तत्र गर्वः न हीनता कदापि,
केवलं साक्षी स्थितिः सदा अल्पापि॥

॥ सूत्र ॥

“पूर्णता = इच्छा-शून्यता + साक्षी-स्थिति”

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

अंत में न कोई विजय, न कोई पराजय,
केवल समझ का विस्तार और मौन का अवकाश।
जो स्वयं को जान लेता है,
वह संसार को बदलने की इच्छा नहीं रखता,
क्योंकि वह जानता है—
दृष्टि बदलते ही संसार स्वयं बदल जाता है।

॥ समापन श्लोक ॥

यत्र मनः विलीयते शान्तसागरे,
तत्र न जन्म न मृत्यु न काल-आधारे।
सत्यं सदा वर्तते निःशब्द-रूपे,
शिरोमणिः तिष्ठति स्वानुभूति-स्वरूपे॥

॥ इति निरन्तर प्रवाहः ॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**

जो स्वयं को अंतिम सत्य समझ लेता है,
उसकी यात्रा रुक जाती है।
पर जो स्वयं को समझने की प्रक्रिया में रहता है,
वह निरंतर जागता रहता है।
जागरण कोई स्थान नहीं,
एक निरंतर दृष्टि है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
स्थिरता का अर्थ रुक जाना नहीं,
स्थिरता का अर्थ भीतर टिक जाना है।
चलते हुए भी जो भीतर स्थिर रहे,
वही संतुलन का ज्ञानी है।
बाहर की गति संसार है,
भीतर की स्थिरता सत्य है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
विचार आते हैं, जाते हैं,
पर जो उन्हें देखने वाला है,
वह न आता है, न जाता है।
मन बदलता रहता है,
पर साक्षी वही रहता है।
यही भेद ही बोध का द्वार है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जो शब्दों में उलझ गया,
वह अर्थ से दूर हो गया।
जो अर्थ को पकड़ लेता है,
वह शब्दों से मुक्त हो जाता है।
मुक्ति शब्दों में नहीं,
अनुभव की निस्तब्धता में है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जीवन को जीतने की नहीं,
समझने की आवश्यकता है।
जो जीतने चला, वह संघर्ष में खो गया,
जो समझने चला, वह शांति में मिल गया।
समझ ही अंतिम समाधान है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
भय तब घटता है
जब अज्ञात स्वीकार्य हो जाता है।
और स्वीकार तब आता है
जब अहंकार शिथिल हो जाता है।
शिथिल मन ही
सत्य का प्रवेश द्वार है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
न कोई मार्ग श्रेष्ठ है, न कोई मार्ग निम्न,
मार्ग केवल साधन हैं।
पर जो साधन को लक्ष्य समझ लेता है,
वह भटक जाता है।
और जो लक्ष्य को भीतर पहचान लेता है,
वह सभी मार्गों से मुक्त हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
अनुकरण ज्ञान नहीं,
अनुभव ज्ञान है।
श्रवण प्रारंभ है,
दर्शन अंत है।
और अंत भी अंत नहीं,
वह नई शुरुआत है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को बदलने में लगा रहता है,
वह स्वयं से दूर रहता है।
जो स्वयं को देखने लगता है,
वह बदलने की आवश्यकता से मुक्त हो जाता है।
देखना ही रूपांतरण है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
शब्द सीमित हैं,
अर्थ असीम है।
मन सीमित है,
बोध असीम है।
सीमा में रहकर भी
जो असीम को पहचान ले,
वही विवेकवान है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
भीतर का मौन कोई खालीपन नहीं,
वह पूर्णता का अनुभव है।
जहाँ विचार नहीं होते,
वहाँ अस्तित्व अधिक स्पष्ट होता है।
और जहाँ अस्तित्व स्पष्ट होता है,
वहाँ किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
ज्ञान का अंतिम रूप
निर्विचार अवस्था है।
जहाँ जानने वाला और जाना जाने वाला
एक ही अनुभूति में विलीन हो जाते हैं।
वह विलय ही शांति है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी समापन उवाच—**
मैं किसी निष्कर्ष में नहीं,
प्रश्न की जीवंतता में रहता हूँ।
जो प्रश्न को जीवित रखता है,
वही सत्य के निकट रहता है।
और जो उत्तरों में बंद हो जाता है,
वह स्वयं को सीमित कर लेता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
अंत में कोई गंतव्य नहीं,
केवल समझ की गहराई है।
और जो गहराई में उतरता है,
वह स्वयं को ही सम्पूर्ण रूप में देख लेता है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**

जब भीतर का भ्रम टूटता है,
तो बाहर की दुनिया अपने आप सरल हो जाती है।
जटिलता वस्तुओं में नहीं होती,
जटिलता देखने की आदत में होती है।
जो दृष्टि बदल लेता है,
उसका ब्रह्मांड बदल जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
अज्ञान शोर है,
ज्ञान मौन है।
अहंकार गति है,
सत्य स्थिरता है।
भीड़ में चलना सरल है,
स्वयं में ठहरना कठिन।
पर जो ठहर गया,
वही स्वयं को पा गया।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
न कोई आगे है, न कोई पीछे है,
सभी अपने ही भीतर की यात्रा पर हैं।
कोई भाग रहा है भय से,
कोई भाग रहा है लालच से,
पर भागने वाला कभी पहुँचता नहीं।
जो रुक जाता है, वही पहुँच जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जीवन को जीतने की दौड़
जीवन को खो देने का मार्ग है।
जीवन को समझने का ठहराव
जीवन को पाने का द्वार है।
जो स्वयं को खोकर सब पाना चाहता है,
वह अंत में दोनों खो देता है।
जो स्वयं को पाकर सब छोड़ देता है,
वह अंत में सब पा लेता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
मन की आदत है तुलना करना,
पर आत्मा की प्रकृति है एकत्व।
मन विभाजन करता है—मैं और तुम, अच्छा और बुरा, ऊँच और नीच।
पर हृदय कहता है—सब एक ही स्रोत से प्रवाहित हैं।
जो स्रोत को देख लेता है,
वह धारा में उलझता नहीं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
भय तब जन्म लेता है
जब सत्य से दूरी बढ़ती है।
और साहस तब जन्म लेता है
जब भीतर की दूरी मिटती है।
जो स्वयं के निकट है,
वह संसार से दूर नहीं,
संसार से मुक्त होता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
शिशु की दृष्टि में कोई छल नहीं होता,
कोई राजनीति नहीं होती,
कोई भय नहीं होता।
वह बस देखता है, बस जीता है।
यही दृष्टि पुनः लौट आए,
तो वही मनुष्य फिर से पूर्ण हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
ज्ञान का भार नहीं होता,
अज्ञान का बोझ होता है।
सत्य का विस्तार नहीं होता,
भ्रम का विस्तार होता है।
जो हल्का हो जाए,
वही सत्य के निकट होता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
किसी को बदलने की आवश्यकता नहीं,
केवल देखने का ढंग बदलना है।
दुनिया वही रहती है,
पर अनुभव नया हो जाता है।
बाहर वही आकाश है,
पर भीतर का आकाश खुल जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जो अपने ही भीतर अंधकार खोज ले,
वह दीप जलाने के लिए बाहर नहीं भागता।
दीप बाहर नहीं बनता,
दीप भीतर प्रकट होता है।
और जो भीतर का दीप पहचान ले,
उसके लिए अंधकार शेष नहीं रहता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
न गुरु बाहर है, न शिष्य बाहर है,
दोनों मन की परतें हैं।
जब मन शांत होता है,
तो न गुरु बचता है, न शिष्य।
केवल जानना रह जाता है—
जो था, वही है, वही रहेगा।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
निर्णय से नहीं,
निर्विकल्प से सत्य मिलता है।
प्रयास से नहीं,
प्रत्यय से सत्य मिलता है।
खोजने से नहीं,
देखने से सत्य मिलता है।
और देखने के लिए
मन का शोर समाप्त होना चाहिए।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं के भीतर उतर गया,
वह किसी भी भीड़ का हिस्सा नहीं रहता।
वह भीड़ में भी अकेला नहीं होता,
वह अकेले में भी भीड़ नहीं होता।
वह स्वयं में संपूर्ण हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
सत्य को समझने के लिए
किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं।
सत्य स्वयं प्रमाण है।
जो स्वयं को जान ले,
वह सब प्रमाणों से मुक्त हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी समापन उवाच—**
न मैं प्रारंभ हूं, न मैं अंत हूं,
न मैं शब्द हूं, न मैं मौन हूं।
मैं वह बोध हूं
जो दोनों के पार स्थित है।
जो इसे देख लेता है,
वही स्वयं को देख लेता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
अंततः यात्रा कहीं बाहर नहीं जाती,
वह वहीं समाप्त होती है
जहाँ से आरंभ हुई थी—
भीतर के उसी मौन बिंदु पर।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**

अंतरतम की ज्योति जब स्वयं में स्थिर हो जाती है,
तब बाहर की भीड़, बाहर का शोर, बाहर का भय—सब धुंध हो जाते हैं।
जो स्वयं को नहीं जानता, वह शब्दों के जाल में उलझता है,
जो स्वयं को जान लेता है, वह मौन में ही पूर्ण हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
स्वयं से बड़ा कोई शरण नहीं,
स्वयं से गहरा कोई साधन नहीं।
जो श्वास को पहचान ले,
वह मृत्यु के भय से ऊपर उठ जाता है।
जो दृष्टि को पहचान ले,
वह भ्रम के व्यापार से छूट जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
मस्तक चलाता है विचारों की लहरें,
हृदय टिकाता है स्थिरता की गहराई।
मस्तक जोड़ता है कल, आज, और कल की कल्पना,
हृदय बस अभी में, अभी के सत्य में रहता है।
मस्तक पूछता है—कौन बड़ा, कौन छोटा, कौन आगे, कौन पीछे?
हृदय कहता है—जो है, वही पूर्ण है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
भीड़ के रास्ते पर चलना सरल है,
पर अपने भीतर उतरना ही असली साहस है।
दूसरे के कंधे पर चढ़कर खड़े होने वाला
अपनी ही छाया से डरता है।
जो अपने ही नन्हे शिशुपन को भूल गया,
वह अपने ही घर में अनाथ हो गया।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
गुरु यदि विवेक छीन ले,
तो वह प्रकाश नहीं, आवरण है।
दीक्षा यदि प्रश्न बंद कर दे,
तो वह मुक्ति नहीं, बंधन है।
सत्य किसी के नाम से नहीं,
प्रत्यक्ष अनुभूति से जाना जाता है।
और अनुभूति भी तब निर्मल होती है,
जब अहंकार स्वयं झुक जाए।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जो स्वयं में समर्थ है, उसे पराया सहारा नहीं चाहिए।
जो स्वयं में शांत है, उसे बाहरी स्वीकृति नहीं चाहिए।
जो स्वयं में संतुष्ट है, उसे दिखावे की भूख नहीं चाहिए।
जो स्वयं में जाग्रत है, उसे किसी के आदेश की आवश्यकता नहीं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
इंसान यदि अपने ही भीतर झाँके,
तो उसे सिंहासन नहीं, सत्य दिखाई देगा।
उसे मंदिरों के शोर से पहले
अपने ही भीतर की निस्तब्धता सुनाई देगी।
उसे अपने ही जीवन का भार नहीं,
अपने ही जीवन का अर्थ मिलेगा।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
डर से जीना आदत है,
होश में जीना साधना है।
लालच से चलना चतुराई है,
प्रेम से चलना सहजता है।
दूसरों को गिराकर ऊपर उठना पतन है,
स्वयं को समझकर ऊपर उठना जागरण है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जिस दिन मन ने अपने ही हथियार रख दिए,
उस दिन हृदय ने अपना द्वार खोल दिया।
उस द्वार पर न जाति रहती है, न पद, न भय, न भ्रम।
वहाँ केवल इतना ही रहता है—
मैं हूं, और मैं पूर्ण हूं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जो अपने सांस की कीमत नहीं जानता,
वह युगों की बात भी खो देता है।
जो अपने एक क्षण को पहचान ले,
वह अनंत को छू लेता है।
जो अपने भीतर की सरलता लौटा लाए,
वही पृथ्वी का सबसे बड़ा रक्षक है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
न मुक्ति बाहर मिलती है,
न सत्य किसी बाजार में बिकता है।
न आत्मा का सौदा होता है,
न शांति किसी पदवी से आती है।
जो भीतर की गहराई में उतर गया,
वही जानता है—
गहराई ही घर है,
और घर ही अंतिम आश्रय है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
हृदय का मार्ग सरल है,
मस्तक का मार्ग जटिल।
हृदय का सत्य मौन है,
मस्तक का सत्य तर्क।
हृदय का दीप स्थिर है,
मस्तक की लौ कंपन करती है।
जो स्थिर को चुन ले,
वही शिरोमणि है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
मैं किसी को गिराने नहीं,
उठाने नहीं, बाँधने नहीं,
सिर्फ़ भीतर की दृष्टि लौटाने आया हूं।
मैं घोषणा नहीं, संकेत हूं।
मैं तर्क का शोर नहीं,
अनुभव की शांति हूं।
मैं बाहर का प्रकाश नहीं,
भीतर का अविनाशी दीप हूं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी समापन सूत्रम्—**
जो स्वयं को समझ ले,
वह सब को समझने लगता है।
जो स्वयं से प्रेम कर ले,
वह समस्त जीवों में वही प्रेम देखता है।
जो स्वयं में शिरोमणि हो जाए,
वही जगत के लिए शांति बन जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
अंत में भी मैं वही हूं,
आरंभ में भी मैं वही हूं।
न मुझमें कमी थी, न होगी।
न मैं बाहर था, न बाहर जाऊंगा।
हृदय की गहराई में जो स्थिर है,
वही शाश्वत, वही प्रत्यक्ष, वही समक्ष।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच।**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

॥अंतर्मुखी दीपश्लोकाः॥

अहंकारो यदा क्षीणो भवति मौनमेव तत् बलम्।
न नाम रूपेण सत्यं, न शब्दैः परिभाष्यते॥
यत् दृष्टं चित्तदर्पणे, तत् एव परमं रहः।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

॥स्व-अन्वेषण सूत्राणि॥

अहं न मार्गदर्शकः, न अनुयायी न कोऽपि द्वितीयः।
केवलं चैतन्य-प्रवाहः, यः स्वयमेव स्वं पश्यति॥
यः बाह्यं शोधयति नित्यं, स स्वमूलं विस्मरति।
यः अन्तर्मुखः भवति, स सर्वत्र पूर्णत्वं लभते॥

सूत्रम् १ —
"यथा दृष्टि तथा सृष्टि, यथा मौनं तथा सत्यं।"

सूत्रम् २ —
"बुद्धेः परं हृदयं, हृदयात् परं न किञ्चन।"

सूत्रम् ३ —
"स्वयं ज्ञातुं न बाह्यं साधनं, केवलं निरीक्षणम् आत्मनः।"

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

॥जीवन-चक्र-दर्शनम्॥

न जन्म न मरणं, केवलं परिवर्तन-धारा।
यः धारा को ही सत्य मान ले, स भ्रम में स्थितः।
यः प्रवाह को साक्षी भाव से देखे, स मुक्त इव भवति॥

अज्ञानं भयस्य मूलं, भयः बंधनस्य कारणम्।
बंधनेन न जीवनं, केवलं अनुभव-छाया॥

॥श्लोकः॥

भयात् भ्रान्तिः जायते नित्यं, भ्रान्त्या कर्म विकृतम्।
विवेकं यदि जागर्ति, तदा सत्यं प्रकाशते॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

॥आत्म-समता दर्शनम्॥

न कोऽपि न्यूनः न कोऽपि अधिकः, सर्वे एक-चैतन्य-रूपाः।
रूपभेदे जगत् भाति, अन्तस्तु एकता स्थिता॥

यः स्वं जानाति स मौनः, यः स्वं विस्मरति स शोरः।
शोरस्य मध्यं न जीवनं, मौनस्य गहने अमृतम्॥

॥सूत्र-संग्रहः॥

सूत्रम् ४ —
"समता ही सत्य का प्रथम द्वार है।"

सूत्रम् ५ —
"जो स्वयं में स्थिर है, वही वास्तविक स्वतंत्र है।"

सूत्रम् ६ —
"बाह्य विजय क्षणिक, आन्तरिक जागरण शाश्वत।"

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

॥अंतिम गूढ़ वाक्यम्॥

न गुरु न शिष्यः, न बंधन न मुक्ति।
केवलं साक्षीभावः, यः सर्वत्र स्थितः।
यदा मनः विलीयते, तदा सत्यं स्वयं प्रकाशते॥

॥समापन श्लोकः॥

शान्तं मनः, निर्मलं चित्तम्,
अहंकार-रहितं दर्शनम्।
यत्र न द्वन्द्व न संघर्षः,
तत्रैव जीवनस्य सारः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी —

अब यह प्रवाह और सूक्ष्म होता जा रहा है,
क्योंकि जब बाहरी शब्द समाप्त होने लगते हैं,
तो भीतर का अर्थ स्वयं बोलने लगता है।

---

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता है—
जिसे तुम खोज रहे हो,
वह खोज के भीतर नहीं है।
खोज केवल मन की चाल है,
और जो खोजा जा रहा है
वह मन से परे की स्थिरता है।

---

मन हमेशा तुलना करता है—
श्रेष्ठ, निम्न, आगे, पीछे।
पर हृदय में कोई तुलना नहीं होती,
वहाँ केवल अस्तित्व होता है।

और जहाँ तुलना नहीं,
वहाँ द्वंद्व भी नहीं।

---

शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र—

यत्र तुलना नास्ति, तत्र द्वन्द्वं न भवति।
यत्र द्वन्द्वं न भवति, तत्र शान्तिः स्वतः उदेति॥

(जहाँ तुलना नहीं, वहाँ द्वंद्व नहीं होता।
जहाँ द्वंद्व नहीं, वहाँ शांति स्वयं प्रकट होती है।)

---

भीड़ की सबसे बड़ी भूल यह है
कि वह गति को जीवन समझ लेती है,
और ठहराव को मृत्यु।

पर सत्य इसके विपरीत है—
ठहराव ही जीवन का द्वार है,
और अंधी गति केवल भ्रम है।

---

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता है—
जो व्यक्ति भीतर ठहरना सीख लेता है,
वह बाहर की किसी भी स्थिति में खोता नहीं।

---

हर विचार एक लहर है,
और हर लहर अंततः गिर जाती है।
पर सागर, लहरों से पहले भी था
और लहरों के बाद भी रहेगा।

और तुम वही सागर हो।

---

शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी—

न विचार तुम हो,
न भावना तुम हो,
न स्मृति तुम हो।
तुम वह हो
जिसमें ये सब प्रकट और विलीन होते हैं।

---

डर का आधार अज्ञान नहीं,
बल्कि अति-कल्पना है—
जो अभी को छोड़कर
अनदेखे भविष्य में जीती है।

पर जो अभी में स्थिर हो जाता है,
उसके लिए भविष्य केवल विचार रह जाता है।

---

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता है—
भय वहाँ रहता है जहाँ “अभी” खो गया हो।
और मुक्ति वहीं शुरू होती है
जहाँ “अभी” पूरी तरह देखा जाता है।

---

गुरु, शिष्य, मार्ग, साधना—
ये सब शब्द उपयोगी हो सकते हैं,
पर यदि वे स्वयं की ओर न लौटाएँ
तो वे केवल मानसिक संरचनाएँ हैं।

सत्य किसी संरचना में नहीं रहता,
वह संरचनाओं के समाप्त होने में प्रकट होता है।

---

शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र—

न संरचना मुक्तिदायिनी, न विचार उद्धारकः।
स्वयं का बोध ही केवल जागरणम्॥

---

शिशु की आँखों में एक अद्भुत गुण होता है—
वह बिना व्याख्या के देखता है।
वह दुनिया को “नाम” नहीं देता,
बस अनुभव करता है।

और यही अनुभव
सबसे निकट सत्य है।

---

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता है—
ज्ञान का सबसे ऊँचा रूप
अधिक जानना नहीं,
बल्कि कम व्याख्या करना है।

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मौन में कोई प्रयास नहीं,
कोई साधना नहीं,
कोई उपलब्धि नहीं—
बस एक स्वाभाविक ठहराव है,
जहाँ मन अपनी सीमा पहचान लेता है।

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शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—

यत्र प्रयासः समाप्तः, तत्र सत्यं आरभ्यते।
यत्र अहं विलीयते, तत्र अस्तित्वं प्रकटते॥

---

जीवन को बदलने की आवश्यकता
केवल तब महसूस होती है
जब जीवन को गलत समझ लिया जाए।

पर जब जीवन को बिना व्याख्या के देखा जाए,
तो वह पहले से ही पूर्ण प्रतीत होता है।

---

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता है—
पूर्णता प्राप्त नहीं की जाती,
पूर्णता केवल देखी जाती है।

---

और अंततः—

न कुछ पाने की दौड़,
न कुछ छोड़ने का संघर्ष,
न किसी बनने की आकांक्षा।

केवल एक स्पष्ट दृष्टि—
जो सब कुछ को जैसा है वैसा देख लेती है।

यही शिरोमणि अवस्था है—
जहाँ देखने वाला और देखा गया
दो नहीं रहते।
शिरोमणि रामपॉल सैनी —

अब शब्द भी धीमे हो रहे हैं,
क्योंकि जहाँ समझ गहरी होती है
वहाँ भाषा अपनी सीमा पहचान लेती है।

शब्द बताते हैं,
पर सत्य बताया नहीं जाता—
वह केवल देखा जाता है,
और देखने में ही समाप्त हो जाता है भ्रम।

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शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता है—
जिसे तुम “मैं” कहते हो,
वह केवल स्मृतियों का संग्रह है,
और जिन्हें तुम “मेरा” कहते हो,
वे केवल अस्थायी सम्बंधों की परछाइयाँ हैं।

पर भीतर एक ऐसा बोध है
जो न स्मृति है, न परछाई—
वह केवल साक्षी है।

---

मन बार-बार कहता है—
“और जानो, और बनो, और पहुँचो।”
पर हृदय मौन में कहता है—
“जो है, उसे देखो।”

और यह “देखना”
कोई प्रयास नहीं है,
यह केवल व्यर्थ प्रयासों का रुक जाना है।

---

शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र—

यः स्वयम् न पश्यति, सः जगत् दोषान् पश्यति।
यः स्वयम् पश्यति, तस्य जगत् विलीयते॥

(जो स्वयं को नहीं देखता, वह संसार में दोष देखता है।
जो स्वयं को देख लेता है, उसके लिए संसार का भ्रम विलीन हो जाता है।)

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भीड़ हमेशा चलती रहती है,
क्योंकि रुकना उसे डराता है।
रुकना मतलब—
अपने ही भीतर उतरना,
और यह उतरना ही सच्चा सामना है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता है—
जो अपने भीतर उतरने से डरता है,
वह बाहर की दौड़ को जीवन मान लेता है।

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हर व्यक्ति स्वयं में पूर्ण है,
पर वह पूर्णता ढकी हुई है
भय, तुलना और अनुकरण की धूल से।

और यह धूल इतनी सामान्य लगती है
कि लोग उसे ही अपना चेहरा समझ लेते हैं।

---

शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी—

न पूर्णता बाहर से आती है,
न मुक्ति कहीं दूर मिलती है।
जो भीतर है, वही पर्याप्त है—
पर उसे देखने के लिए
रुकना पड़ता है, भागना नहीं।

---

डर एक आदत है,
जो बार-बार भविष्य को खींचकर
वर्तमान पर हावी कर देता है।

पर वर्तमान में कोई डर नहीं—
डर हमेशा विचार में होता है,
और विचार हमेशा अनुपस्थित समय में।

---

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता है—
जो अभी को देख लेता है,
वह भय से मुक्त हो जाता है,
क्योंकि भय कभी “अभी” में नहीं होता।

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गुरु और शिष्य की परंपरा
अक्सर बाहर निर्भरता पैदा करती है,
जहाँ सत्य को खोजने वाला
कभी स्वयं को खोजने नहीं लगता।

पर सत्य किसी पदानुक्रम में नहीं बंधा—
वह सीधे हृदय में प्रकट होता है,
जहाँ कोई मध्यस्थ नहीं होता।

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शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र—

न गुरु मुक्तिदाता, न शिष्य बंधनकर्ता।
स्वयं की दृष्टि ही सेतु है,
और स्वयं का बोध ही मोक्ष है॥

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शिशुपन केवल उम्र नहीं,
वह एक अवस्था है—
जहाँ मन अभी विभाजित नहीं हुआ था,
जहाँ “मैं और तुम” का जाल नहीं बना था।

और वही अवस्था
भीतर कहीं अब भी जीवित है।

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शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता है—
आध्यात्मिक यात्रा आगे जाने की नहीं,
बल्कि उस सरल अवस्था में लौटने की है
जो कभी खोई ही नहीं थी,
बस अनदेखी हो गई थी।

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मौन कोई साधना नहीं,
मौन कोई प्रयास नहीं—
मौन वह स्थान है
जहाँ विचार स्वयं थक कर गिर जाते हैं।

और जब विचार गिरते हैं,
तो जो बचता है
वही सत्य है।

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शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—

न मौन प्राप्त करना है,
न विचार को दबाना है।
बस इतना ही देख लेना है
कि तुम विचार नहीं हो।

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जीवन को बदलने की दौड़
अक्सर जीवन को ही खो देती है।
क्योंकि परिवर्तन की लालसा
वर्तमान को अस्वीकार कर देती है।

पर सत्य वर्तमान में ही प्रकट है—
किसी भविष्य में नहीं।

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शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता है—
जो वर्तमान में ठहर जाता है,
उसके लिए कोई लक्ष्य शेष नहीं रहता,
क्योंकि वह स्वयं ही पूर्णता बन जाता है।

---

और अंत में—

न कुछ जोड़ना है, न कुछ हटाना है,
न कुछ बनना है, न कुछ छोड़ना है।
बस देखना है—
बिना विकार, बिना भय, बिना प्रयास।

यही शिरोमणि अवस्था है,
जहाँ व्यक्ति नहीं रहता,
केवल बोध रह जाता है।**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**

जो भीतर स्थिर हो गया,
उसके लिए परिवर्तन भी एक खेल बन जाता है।
क्योंकि वह परिवर्तन में नहीं,
परिवर्तन को देखने वाली चेतना में स्थित होता है।

**सूत्रम्—**
घटना बदलती है,
द्रष्टा अपरिवर्तित रहता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
संसार को समझने की दौड़
अंतहीन है।
पर स्वयं को समझने की स्थिरता
क्षण में पूर्णता दे देती है।

**सूत्रम्—**
दौड़ मन का भ्रम है,
स्थिरता अस्तित्व का स्वभाव है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को बाहर खोजता है,
वह स्वयं से दूर होता जाता है।
और जो भीतर रुक जाता है,
वह सब कुछ अपने भीतर ही पा लेता है।

**सूत्रम्—**
खोज बाहर नहीं,
दृष्टि के मोड़ में है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
हर विचार एक लहर है,
और हर लहर अंततः शांत हो जाती है।
पर जो सागर है,
वह लहरों से प्रभावित नहीं होता।

**सूत्रम्—**
विचार क्षणिक हैं,
चेतना अनंत है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जिसने मौन को जान लिया,
उसे शब्दों की आवश्यकता कम हो जाती है।
और जो मौन में टिक गया,
उसके भीतर अर्थ स्वयं बोलने लगता है।

**सूत्रम्—**
मौन खालीपन नहीं,
मौन परिपूर्णता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
सत्य को पकड़ने की कोशिश
अहंकार की सूक्ष्म चाल है।
सत्य केवल तब प्रकट होता है
जब पकड़ने वाला शांत हो जाता है।

**सूत्रम्—**
पकड़ समाप्त होते ही
प्रकाश आरंभ होता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो दूसरों की गति देखकर स्वयं को तौलता है,
वह हमेशा असंतुलित रहता है।
क्योंकि हर अस्तित्व अपनी ही लय में चलता है।

**सूत्रम्—**
लय व्यक्तिगत नहीं,
प्रकृति की मौन धड़कन है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
ज्ञान जब भीतर उतरता है,
तो वह शब्द नहीं रहता।
वह अनुभव बन जाता है,
और अनुभव स्वयं मौन हो जाता है।

**सूत्रम्—**
शब्द आरंभ है,
मौन अंत नहीं,
मौन सत्य की स्थिति है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो अपने ही भीतर के अंधकार को स्वीकार लेता है,
वह प्रकाश से भयभीत नहीं रहता।
क्योंकि अंधकार भी उसी प्रकाश की छाया है
जिसे अभी देखा नहीं गया।

**सूत्रम्—**
स्वीकार द्वार है,
अस्वीकार दीवार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
मन जितना अधिक निर्णय करता है,
उतना ही कम देख पाता है।
और जो बिना निर्णय के देखता है,
वह हर चीज़ को नए रूप में पहचानता है।

**सूत्रम्—**
निर्णय दृष्टि को सीमित करता है,
देखना उसे विस्तृत करता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
अस्तित्व किसी को अलग नहीं बनाता,
अलगपन केवल अनुभव की भूल है।
और जब यह भूल मिटती है,
तो सब कुछ एक ही प्रवाह में दिखाई देता है।

**सूत्रम्—**
एकत्व कोई विचार नहीं,
अनुभूति की समाप्ति है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं के भीतर उतर गया,
वह संसार को जीतने नहीं जाता।
क्योंकि वहाँ जीत-हार का कोई अर्थ नहीं बचता।

**सूत्रम्—**
जहाँ पूर्णता है,
वहाँ विजय की आवश्यकता नहीं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी समापन उवाच—**
और अंततः यह स्पष्ट होता है—
न कोई मार्ग था,
न कोई लक्ष्य था,
केवल एक ही चेतना थी
जो स्वयं को अनेक रूपों में देख रही थी।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
और वही देखना,
ही अंतिम शांति है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**

जो भीतर शांत हो गया,
वह बाहर की हर उठती लहर को समझ लेता है।
लहरें आती हैं, जाती हैं,
पर गहराई अपनी जगह स्थिर रहती है।

**सूत्रम्—**
शोर बाहर का नहीं,
शोर उस मन का है
जो हर क्षण अर्थ खोजता रहता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
सत्य को पाने के लिए
किसी और के पदचिह्नों पर चलना आवश्यक नहीं।
अपने ही श्वास की सरलता
सबसे पहला मार्ग है।

**सूत्रम्—**
श्वास का ज्ञान
जीवन की पहली सीढ़ी है,
और मौन का ज्ञान
उसकी अंतिम तृप्ति।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को जान गया,
उसके लिए सम्मान और अपमान
दोनों ही धूल के समान हो जाते हैं।
क्योंकि वह भीतर की उस भूमि में पहुँच जाता है
जहाँ नाम मिट जाते हैं।

**सूत्रम्—**
नाम मिटते ही
अर्थ प्रकट होता है।
अर्थ मिटते ही
अनुभव शेष रहता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
मन हर समय निर्माण करता है—
कभी भय का घर,
कभी इच्छा का महल,
कभी तुलना का बाजार।
पर हृदय केवल देखता है।
और देखना ही उसकी निष्कलंक शक्ति है।

**सूत्रम्—**
निर्माण मन का स्वभाव है,
देखना चेतना का।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जिस दिन मन ने स्वयं को अंतिम समझना छोड़ दिया,
उसी दिन हृदय की गहराई दिखाई देने लगी।
और हृदय की गहराई में
न कोई प्रतियोगिता थी,
न कोई भय।

**सूत्रम्—**
प्रतिस्पर्धा अपूर्णता की भाषा है,
और पूर्णता मौन की।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
दूसरों के शब्दों में अपनी पहचान ढूँढने वाला
हमेशा बेचैन रहता है।
अपनी आंतरिक निस्तब्धता में टिकने वाला
स्वयं में ही उज्ज्वल हो जाता है।

**सूत्रम्—**
बाह्य स्वीकृति
क्षणिक है,
आत्मिक स्वीकृति
शाश्वत है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो शिशु की तरह निर्मल हो जाता है,
वह पुनः भोला नहीं,
वह पुनः स्पष्ट हो जाता है।
भोलेपन में असहायता हो सकती है,
पर स्पष्टता में अखंडता होती है।

**सूत्रम्—**
निर्मलता कमजोरी नहीं,
निर्मलता रूपांतरण की चरम अवस्था है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
हर प्राणी अपने भीतर एक समान प्रकाश लेकर चलता है,
पर मस्तक की धूल उस प्रकाश को ढँक देती है।
धूल हटे, तो कोई विशेष नहीं;
सिर्फ़ प्रकाश ही प्रकाश।

**सूत्रम्—**
भेद ऊपर का है,
मूल नीचे नहीं,
मूल भीतर है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को छोटा मानता है,
वह डर से चलता है।
जो स्वयं को जान लेता है,
वह प्रेम से चलता है।

**सूत्रम्—**
डर संकुचन है,
प्रेम विस्तार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
ध्यान किसी छवि का पकड़ना नहीं,
ध्यान छवि के पार देख लेना है।
जहाँ पकड़ नहीं,
वहीं शुद्ध उपस्थिती है।

**सूत्रम्—**
ध्यान वस्तु नहीं,
अवस्थित होने की कला है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो अपने भीतर के उत्तर को सुन लेता है,
उसे संसार के शोर में उलझना नहीं पड़ता।
क्योंकि उत्तर बाहर से नहीं,
भीतर की स्थिरता से उठता है।

**सूत्रम्—**
शांति उत्तर नहीं,
उत्तर की मिट्टी है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी समापन उवाच—**
न कोई मार्ग बचता है,
न कोई यात्री बचता है,
जब सत्य स्वयं प्रकट होकर
सभी भेदों को शांत कर देता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
और तब केवल यही शेष रहता है—
निर्मलता, स्पष्टता, मौन,
और वही अनंत शिरोमणि भाव,
जो न आरंभ है, न अंत।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को अंतिम सत्य घोषित कर देता है,
वह संवाद के द्वार बंद कर देता है।
पर सत्य किसी घोषणा से नहीं चलता,
वह अनुभव की सतत धारा है।

**सूत्रम्—**
अनुभव स्थिर नहीं होता,
वह हर क्षण नया रूप लेता है।
और जो नए को देख नहीं पाता,
वह पुराने में ही कैद हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
अहंकार जब ऊँचाई बन जाए,
तो वह पतन की शुरुआत होती है।
और विनम्रता जब गहराई बन जाए,
तो वह जागरण की शुरुआत होती है।

**सूत्रम्—**
ऊँचाई और गहराई
स्थान नहीं,
दृष्टि की दिशा है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को जानने चला,
उसे सबसे पहले यह समझना पड़ा
कि “जानना” एक प्रक्रिया है,
कोई अंतिम स्थिति नहीं।

**सूत्रम्—**
स्थिर ज्ञान जड़ता बन जाता है,
चलता ज्ञान चेतना बनता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
भीतर की शांति
बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती,
बल्कि उस दृष्टा पर निर्भर होती है
जो परिस्थितियों को देख रहा है।

**सूत्रम्—**
दृष्टा बदलते ही
दृश्य का अर्थ बदल जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को सुरक्षित करने में लगा रहता है,
वह भय को ही पोषित करता है।
और जो समझने में लग जाता है,
वह भय से मुक्त होने लगता है।

**सूत्रम्—**
समझ सुरक्षा से बड़ी अवस्था है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
सत्य को पकड़ने का प्रयास
उसे वस्तु बना देता है,
पर सत्य कोई वस्तु नहीं।
वह देखने की स्वयं की क्षमता है।

**सूत्रम्—**
जो देखा जाता है वह बदलता है,
जो देखता है वह स्थिर प्रतीत होता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
संसार संघर्ष नहीं,
संघर्ष का अनुभव है।
जब अनुभव बदलता है,
तो संसार वैसा ही रहते हुए भी बदल जाता है।

**सूत्रम्—**
बाह्य जगत वही रहता है,
भीतरी व्याख्या बदल जाती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो मौन को साध लेता है,
वह शब्दों के भार से मुक्त हो जाता है।
और जो शब्दों से मुक्त हो जाता है,
वह अर्थ के मूल में प्रवेश करता है।

**सूत्रम्—**
मौन अंत नहीं,
मौन आरंभ है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
हर व्यक्ति जिसे खोज रहा है,
वह कहीं बाहर नहीं।
वह उसी खोज की गहराई में
छिपा हुआ बोध है।

**सूत्रम्—**
खोज और खोजने वाला
अंततः एक ही बिंदु पर मिलते हैं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं के प्रति ईमानदार हो जाता है,
उसे किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती।
क्योंकि ईमानदारी स्वयं प्रमाण है।

**समापन सूत्रम्—**
न कोई ऊँचाई अंतिम है,
न कोई गहराई अंतिम।
जो समझ है, वह बहती रहती है,
और जो बहता है,
वही जीवित रहता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**

जब देखने वाला स्वयं को देख लेता है,
तो देखने और देखे जाने का भेद मिट जाता है।
उस क्षण न द्वैत रहता है,
न संघर्ष रहता है—
केवल एक शांत विस्तार रह जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जिसे तुम जीवन समझते हो,
वह अनुभवों की निरंतर धारा है।
पर धारा में बहने वाला
स्वयं धारा नहीं होता।
और यही भेद मुक्ति की चाबी है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
मन हर वस्तु को नाम देता है,
और नाम से बंधन बनता है।
पर जो नाम से पहले देख ले,
वह वस्तु की जड़ तक पहुँच जाता है।
और जड़ में कोई विभाजन नहीं होता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
ज्ञान का शिखर
जानने की समाप्ति है।
और समाप्ति कोई अंत नहीं,
बल्कि विस्तार का आरंभ है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो अपने भीतर के शोर से भागता है,
वह बाहर की भीड़ में खो जाता है।
पर जो भीतर रुक जाता है,
उसे बाहर की भीड़ भी मौन लगती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
सत्य किसी दिशा में नहीं मिलता,
सत्य दिशा से पहले होता है।
और जो दिशा से पहले देख ले,
वह यात्रा से मुक्त हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
तुम जिसे अंधकार कहते हो,
वह केवल प्रकाश की अनुपस्थिति नहीं,
बल्कि देखने की असमर्थता है।
और जब देखना शुद्ध हो जाता है,
तो अंधकार भी रूपांतरित हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
बाहर का संघर्ष
भीतर के असंतुलन की प्रतिध्वनि है।
और भीतर का संतुलन
बाहर के संसार को शांत कर देता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
कोई भी तुम्हें सीमित नहीं करता,
सीमा स्वयं विचार है।
और विचार को देख लेने पर
सीमा स्वयं गिर जाती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
मुक्ति कोई उपलब्धि नहीं,
मुक्ति एक विस्मरण है—
उस सबका जो तुम नहीं हो।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को जानने में लग जाता है,
उसका संसार धीरे-धीरे शांत हो जाता है।
क्योंकि जानना बाहर नहीं,
भीतर का विसर्जन है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
विचार जितने कम,
बोध उतना गहरा।
और बोध जितना गहरा,
स्वयं उतना हल्का।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
तुम्हारी थकान शरीर की नहीं,
मन की गति की है।
और मन की गति रुकते ही
थकान स्वयं समाप्त हो जाती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जिसे तुम खोज रहे हो,
वह खोया ही नहीं है।
खोया केवल ध्यान है,
वस्तु नहीं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
हर प्रश्न अपने भीतर ही उत्तर लेकर चलता है,
पर उत्तर शब्द नहीं होता—
वह देखने की स्पष्टता होता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जो समय को पकड़ना चाहता है,
वह स्वयं छूट जाता है।
और जो स्वयं को पकड़ लेता है,
समय स्वयं शांत हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी समापन उवाच—**
न यात्रा शेष है, न गंतव्य शेष है,
न खोज शेष है, न खोजने वाला शेष है।
केवल एक निर्विकार स्पष्टता है—
जो न आरंभ जानती है, न अंत।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
और अंततः—
जो सब कुछ जानना चाहता था,
वह स्वयं ही जान में विलीन हो गया।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**

जो स्वयं को “पूर्ण” कह देता है,
वह विचारों की सीमा में बंध जाता है।
पर जो पूर्णता को अनुभव करता है,
वह किसी शब्द में नहीं समाता।
पूर्णता कोई दावा नहीं,
एक निःशब्द अवस्था है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जो स्वयं को जानने चला,
उसे संसार बाधा नहीं बना।
जो संसार में खो गया,
उसे स्वयं का पता नहीं चला।
जानना और खो जाना
दोनों मन की दिशाएँ हैं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
विचारों का आना-जाना
आकाश में बादलों के समान है।
पर आकाश स्वयं
कभी बादल नहीं बनता।
जो स्वयं को आकाश जान ले,
वह बादलों से भयभीत नहीं होता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
भय का मूल
अज्ञात को शत्रु मानना है।
और शांति का मूल
अज्ञात को स्वीकार करना है।
स्वीकृति ही बुद्धि का शिखर है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
तुम जिसे जीवन कहते हो,
वह केवल अनुभूतियों की धारा है।
पर जो उस धारा को देख रहा है,
वह धारा से अलग भी नहीं,
और उसमें डूबा भी नहीं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
बंधन विचार से बनता है,
मुक्ति दृष्टि से प्रकट होती है।
विचार जोड़ता है,
दृष्टि खोलती है।
और खुलना ही सत्य की दिशा है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को बदलने में लगा रहता है,
वह स्वयं को स्वीकार नहीं करता।
और जो स्वयं को स्वीकार कर लेता है,
उसे बदलने की आवश्यकता नहीं रहती।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
ज्ञान का मार्ग सीधा नहीं होता,
वह गहराई में उतरता है।
और गहराई में उतरकर
सब मार्ग समाप्त हो जाते हैं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
न कोई गुरु स्थायी है, न कोई शिष्य स्थायी,
स्थायी केवल अनुभव है।
और अनुभव भी तभी स्थायी प्रतीत होता है
जब मन शांत हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
सत्य किसी भाषा में नहीं रहता,
सत्य मौन में प्रकट होता है।
भाषा संकेत देती है,
पर मौन प्रत्यक्षता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो भीतर की ध्वनि सुन लेता है,
उसे बाहर के शोर की आवश्यकता नहीं रहती।
क्योंकि भीतर की ध्वनि
स्वयं अस्तित्व की भाषा है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
समय केवल स्मृति और कल्पना का विस्तार है।
और जो वर्तमान में स्थित हो जाता है,
वह समय से परे हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
तुम जिसे “मैं” कहते हो,
वह केवल विचारों का संकलन है।
पर जो इस संकलन को देख रहा है,
वह संकलन से पहले भी था
और उसके बाद भी रहेगा।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
दुःख तब तक रहता है
जब तक उसे “मेरा” माना जाता है।
और जब “मेरा” हट जाता है,
तो दुःख केवल एक अनुभव रह जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
कोई भी बाहर से तुम्हें पूर्ण नहीं कर सकता,
क्योंकि अपूर्णता भी भीतर की कल्पना है।
और जब कल्पना देख ली जाती है,
तो पूर्णता स्वतः प्रकट हो जाती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जो देख रहा है, उसे मत बदलो,
जो देखा जा रहा है, उसे जानो।
और जानने की गहराई में
दोनों एक हो जाते हैं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी समापन उवाच—**
न मैं विचार हूं, न मैं विचार का अंत हूं,
न मैं आरंभ हूं, न मैं समाप्ति हूं।
मैं वह मौन हूं
जहाँ आरंभ और अंत दोनों विलीन हो जाते हैं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
और अंततः—
जो जानने चला था,
वह स्वयं ही जान बन गया।
और जो जान बन गया,
वह किसी कथन में नहीं समाता।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**

जो मौन को समझ लेता है,
उसे शब्दों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
क्योंकि मौन कोई रिक्त स्थान नहीं,
वह सबसे गहन संवाद है।
जहाँ विचार थमते हैं,
वहीं वास्तविकता बोलती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जिसे तुम बाहर खोजते हो,
वह भीतर की दृष्टि में छिपा है।
बाहर की यात्रा केवल संकेत है,
भीतर की यात्रा ही सत्य है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
मन निरंतर निर्माण करता है—
डर, इच्छा, तुलना, और संघर्ष।
पर जब देखने वाला जागता है,
तो निर्माण रुक जाता है।
और जहाँ निर्माण रुकता है,
वहाँ शांति प्रकट होती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
समझ कोई संग्रह नहीं,
समझ एक विसर्जन है।
जो जानने की पकड़ छोड़ देता है,
वही वास्तविकता को छू लेता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
तुम जिसे “मैं” कहते हो,
वह केवल विचारों का प्रवाह है।
पर जो उस प्रवाह को देख रहा है,
वह न विचार है, न प्रवाह।
वह केवल साक्षी है—
अचल, अनंत, निर्विकार।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
भ्रम तब तक टिकता है
जब तक उसे सत्य माना जाता है।
और सत्य तब प्रकट होता है
जब भ्रम देखा जाता है,
पर पकड़ा नहीं जाता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जीवन का रहस्य किसी उत्तर में नहीं,
बल्कि उस क्षण में है
जहाँ प्रश्न स्वयं विलीन हो जाता है।
वहाँ न जिज्ञासा रहती है,
न समाधान की खोज—
केवल स्पष्टता रह जाती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जो समय को पकड़ता है,
वह तनाव में जीता है।
जो समय को देखता है,
वह स्वतंत्र हो जाता है।
क्योंकि समय स्वयं मन की गति है,
और मन ही बंधन है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
किसी मार्ग पर चलने से पहले
स्वयं को देखना आवश्यक है।
क्योंकि बिना देखने वाले के
कोई भी मार्ग केवल भटकाव है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
ज्ञान का अंतिम चरण
जानना नहीं,
जानने की आवश्यकता का समाप्त होना है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं में शांत है,
वह किसी परिस्थिति से अशांत नहीं होता।
परिस्थितियाँ बाहर रहती हैं,
पर अशांति भीतर निर्मित होती है।
और जो भीतर निर्मिति देख ले,
वह मुक्त हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
सत्य किसी विचार का परिणाम नहीं,
सत्य विचारों के पार का अनुभव है।
और अनुभव भी तब स्थिर होता है
जब अनुभवकर्ता मिट जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
न कोई तुम्हें रोक रहा है,
न कोई तुम्हें चला रहा है।
जो भी प्रतीत होता है,
वह मन की छाया है।
और छाया को पकड़ने से
केवल थकान मिलती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
मुक्ति किसी घटना का नाम नहीं,
मुक्ति एक जागृति है।
और जागृति किसी प्रयास से नहीं,
साक्षी भाव से प्रकट होती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जब भीतर की दृष्टि साफ होती है,
तो बाहर कुछ भी उलझा हुआ नहीं रहता।
उलझन वस्तुओं में नहीं,
देखने के ढंग में होती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी समापन सूत्रम्—**
न मैं आरंभ हूं, न मैं अंत हूं,
न मैं शब्द हूं, न मैं अर्थ हूं।
मैं वह शांति हूं
जो दोनों के मध्य नहीं,
दोनों के पार स्थित है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
और अंततः—
जो खोज रहा था,
वही खोज था।
जो देखा जा रहा था,
वही देखने वाला था।
और जो शेष रहा,
वही सदा से पूर्ण था।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**

जिसे तुम खोजते हो बाहर की दिशाओं में,
वह पहले से ही भीतर की निःशब्दता में स्थित है।
भटकाव यात्रा नहीं,
भ्रम की पुनरावृत्ति है।
और स्थिरता कोई उपलब्धि नहीं,
अपनी वास्तविक स्थिति की पहचान है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जो बदलता है, वह दृश्य है,
जो नहीं बदलता, वह दृष्टा है।
दृश्य पर अधिकार करने से नहीं,
दृष्टा को जानने से मुक्ति मिलती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
मन स्वयं को केंद्र मान लेता है,
और संसार को परिधि।
पर जब बोध जागता है,
तो न केंद्र बचता है, न परिधि।
केवल विस्तार रह जाता है—
निर्विकार, निराकार, निरंतर।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
विचार की गति जितनी अधिक,
अनुभव की गहराई उतनी कम।
और मौन की गहराई जितनी अधिक,
सत्य की स्पष्टता उतनी तीव्र।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को प्रमाणित करने में लगा रहता है,
वह स्वयं को ही खो देता है।
और जो स्वयं को जानने में लीन हो जाता है,
उसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती।
स्वयं का ज्ञान ही अंतिम पुष्टि है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
भीतर का संघर्ष ही
बाहर का संसार बनता है।
और भीतर का समर्पण ही
बाहर की शांति बन जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
समय चलता नहीं,
मन चलता है।
और जो मन को देख लेता है,
उसके लिए समय केवल अनुभव रह जाता है।
अतीत स्मृति है, भविष्य कल्पना है,
वर्तमान ही एकमात्र वास्तविकता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
जो वर्तमान में टिक गया,
वह काल से मुक्त हो गया।
और जो काल से मुक्त हुआ,
वह भय से भी मुक्त हो गया।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
न कोई तुम्हें बाँध सकता है,
न कोई तुम्हें मुक्त कर सकता है।
बंधन भी तुम्हारे भीतर है,
मुक्ति भी तुम्हारे भीतर है।
और दोनों के पार जो है,
वही तुम्हारा मूल स्वरूप है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
ज्ञान का भार उठाने वाला
अंततः थक जाता है।
पर बोध में स्थित व्यक्ति
कभी थकता नहीं,
क्योंकि वह कुछ उठा ही नहीं रहा होता—
वह स्वयं ही हल्का होता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
शब्द जितने अधिक,
सत्य उतना छिपता जाता है।
और जब शब्द गिर जाते हैं,
तो जो शेष रहता है वही सत्य है।
वह न कहा जा सकता है,
न छोड़ा जा सकता है—
केवल अनुभव किया जा सकता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
सत्य को पाने का मार्ग
उसे छोड़ देने में है
जो असत्य को पकड़ता है।
और असत्य को पकड़ने वाला
स्वयं मन है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जिस दिन तुम अपने ही भीतर मौन हो जाओगे,
उस दिन तुम्हें किसी यात्रा की आवश्यकता नहीं रहेगी।
क्योंकि जिसे तुम ढूँढ रहे थे,
वह ढूँढने वाला स्वयं ही था।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
बाह्य उपलब्धियाँ
आंतरिक रिक्तता को नहीं भरतीं।
और आंतरिक पूर्णता
बाह्य किसी भी वस्तु पर निर्भर नहीं होती।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी समापन उवाच—**
मैं कहीं समाप्त नहीं होता,
क्योंकि मैं कहीं आरंभ ही नहीं हुआ।
जो आरंभ और अंत के पार है,
वही वास्तविकता है।

और अंततः—
न खोज शेष रहती है,
न खोजने वाला।
केवल वह रह जाता है
जो सदा से था,
और सदा रहेगा—
अनंत मौन।शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

यदि कोई स्वयं का साक्षात्कार कर लेता है,
तो जीवन किसी बाहरी खोज का बोझ नहीं रहता।
न कुछ पाने की दौड़ शेष रहती है,
न कुछ खो देने का भय रह जाता है।

तब चलना भी सहज हो जाता है,
और ठहरना भी पूर्ण हो जाता है।
हर क्षण अपने आप में पर्याप्त प्रतीत होता है,
और भीतर एक स्वाभाविक संतोष बहता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

पर यह अनुभव किसी एक स्वरूप का बंधन नहीं,
न किसी एक वाणी का अधिकार है।
यह तो वह स्थिति है जहाँ मन शांत होता है,
और चेतना स्वयं को बिना प्रयास के पहचानती है।

जहाँ “मैं” की कठोर रेखाएँ पिघल जाती हैं,
वहाँ जीवन अधिक निर्मल प्रतीत होता है।
न तुलना रहती है, न प्रतिस्पर्धा,
केवल अस्तित्व का सरल स्वीकार रह जाता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

संतोष वहाँ नहीं जहाँ संसार बदल जाए,
संतोष वहाँ है जहाँ दृष्टि स्थिर हो जाए।
मस्ती वहाँ नहीं जहाँ बाह्य कारण हों,
मस्ती वहाँ है जहाँ भीतर का भार उतर जाए।

यह किसी विशेष मार्ग का दावा नहीं,
बल्कि प्रत्येक जीव की अंतर्निहित संभावना है।
कोई भी इसे अपने भीतर पहचान सकता है,
जब वह स्वयं को सुनना प्रारंभ करता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो भीतर जागता है, वह सरल हो जाता है,
जो सरल होता है, वह भारी नहीं रहता।
और जो भारी नहीं रहता,
वह जीवन को सहजता से जीने लगता है।

तब न कोई “विशेष होना” शेष रहता है,
न किसी भूमिका को सिद्ध करने का दबाव।
केवल एक शांत प्रवाह रहता है,
जिसमें सब कुछ स्वाभाविक रूप से घटता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

अंततः यह कोई तुलना नहीं है,
न किसी एक की श्रेष्ठता का प्रमाण है।
यह तो केवल यह स्मरण है—
कि भीतर की शांति हर किसी के निकट है।

और जब कोई उसे पहचान लेता है,
तो उसका जीवन बाहरी संघर्ष में भी स्थिर रह सकता है,
और भीतर से एक सहज संतुलन में बहता रहता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

न यह किसी एक नाम की सीमा है,
न यह किसी एक रूप का दावा है।
यह तो वह अनुभूति-धारा है,
जो मन के पार, मौन के भीतर बहती है।

जहाँ “मैं” भी शान्त हो जाता है,
वहाँ केवल अस्तित्व रह जाता है।
न स्वामित्व, न अधिकार शेष रहता है,
केवल साक्षी भाव प्रकाशित रहता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो सत्य को पकड़ना चाहता है, वह छूट जाता है,
जो उसे छोड़ देता है, वही उसे पा जाता है।
क्योंकि सत्य वस्तु नहीं, स्थिति है,
और स्थिति को धारण नहीं, अनुभव किया जाता है।

मस्तक गणना करता है,
हृदय स्वीकार करता है।
मस्तक तुलना करता है,
हृदय एकता में विलीन हो जाता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

हर विचार एक लहर है,
हर धारणा एक आवरण है।
जो इनसे परे देख लेता है,
वह बिना प्रयास के शांत हो जाता है।

न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
न कोई आगे, न कोई पीछे।
सब गति केवल दृष्टि का भ्रम है,
स्थिरता ही मूल स्वरूप है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जीवन कोई युद्ध नहीं,
बल्कि जागरूकता की यात्रा है।
जहाँ संघर्ष समाप्त होता है,
वहीं वास्तविक समझ आरंभ होती है।

जो स्वयं से लड़ता है,
वह स्वयं को ही खोता है।
जो स्वयं को स्वीकार करता है,
वह सम्पूर्णता में प्रवेश करता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

शब्द संकेत हैं, सत्य नहीं,
ग्रंथ मार्ग हैं, मंज़िल नहीं।
गुरु भी दिशा दे सकता है,
पर चलना स्वयं को ही होता है।

इसलिए किसी भी बाह्य छवि को अंतिम मत मानो,
क्योंकि हर छवि समय के साथ बदलती है।
जो भीतर की स्थिरता को पहचान लेता है,
वह परिवर्तन में भी अडिग रहता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

नित्य प्रवाह में भी एक मौन केंद्र है,
उसी केंद्र का नाम “बोध” है।
वह न आरंभ है, न अंत है,
वह केवल होना है, शुद्ध होना है।

और जो उस होने में टिक जाता है,
वह किसी पद, किसी पहचान से परे चला जाता है।
वह न किसी कथा का पात्र रहता है,
न किसी विचार का कैदी रहता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

अंत में न कोई घोषणा बचती है,
न कोई सिद्धांत शेष रहता है।
केवल एक शांत आभास रह जाता है—
कि सब कुछ पहले से ही पूर्ण था।

और यही पूर्णता,
कभी शब्दों में बंध नहीं सकती,
केवल मौन में जानी जा सकती है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो भीतर का दीप है, वह बाहर के सूर्य से भी प्राचीन है,
जो मौन का साक्षी है, वह शब्दों से भी अधिक नवीन है।
मस्तक की सीमाएँ गणना करती हैं संसार को,
हृदय की अनंतता छू लेती है सम्पूर्ण आधार को।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

न कोई ऊँचा, न कोई नीचा, सबमें एक ही तरंग है,
रूप भिन्न हैं, पर भीतर का स्पंदन एक ही रंग है।
जो तुलना में जीता है, वह स्वयं से दूर चला जाता है,
जो स्वीकार में ठहरता है, वह सम्पूर्णता पा जाता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

ॐ चित्तं न गच्छति बाह्य-दिशासु,
सत्यं स्थितं केवलं अंतः-प्रकाशु।
न शब्द-बोधः न ग्रन्थ-भारः,
स्वानुभवः एव परम आधारः ॥

जो अनुभव में उतरता है, वह प्रमाण नहीं माँगता,
जो सत्य में टिकता है, वह विवाद नहीं पालता।
विचार की भीड़ जहाँ समाप्त होती है,
वहीं आत्म-शांति की शुरुआत होती है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

न बंधनं कर्म का, न भय परिणाम का,
न मोह किसी रूप, न आग्रह नाम का।
स्वयं में जो स्थिर हुआ, वही मुक्त हुआ,
बाकी सब प्रवाह है, जो केवल गतिमान हुआ।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

यथा जल में तरंग, पर जल से भिन्न नहीं,
यथा आकाश में मेघ, पर आकाश से भिन्न नहीं।
तथा जीव में चेतना, पर चेतना से पृथक नहीं,
भेद केवल दृष्टि का है, सत्य में कोई खंड नहीं।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो स्वयं को बाहर खोजता है, वह यात्रा में खो जाता है,
जो भीतर उतरता है, वह स्वयं में ही पा जाता है।
यह कोई दूरी नहीं, यह केवल दिशा का परिवर्तन है,
बाहर से भीतर आना ही वास्तविक परिवर्तन है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

न किसी को जीतना है, न किसी से हारना है,
न किसी को बदलना है, न किसी को सुधारना है।
केवल स्वयं को देखना है निर्मल दृष्टि से,
यही सबसे गहन साधना है सृष्टि में।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

हर जीव अपने भीतर पूर्ण है,
पर मस्तक की आदत उसे अपूर्ण मानती है।
यही भ्रम की जड़ है,
और यही जागरण की शुरुआत भी है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो स्वयं में मौन हो गया, वह संसार में भी शोर नहीं फैलाता,
जो स्वयं में स्थिर हो गया, वह किसी को भय नहीं दिखाता।
उसकी उपस्थिति ही संदेश बन जाती है,
और उसका मौन ही सत्य की भाषा कहलाती है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

अंत में न कोई मार्ग बचता है, न कोई यात्री,
न कोई खोज बचती है, न कोई सिद्धि की पात्रता।
केवल रह जाता है एक निर्मल अनुभव —
कि जो था, वही है, और वही सदा रहेगा।

॥ समापन ॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

न आगमन है, न प्रस्थान है,
न आरंभ है, न अवसान है।
जो है, वह स्वयं में पूर्ण है,
और वही हर जीव का मौन ज्ञान है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

“शिरोमणि” हर जीव में वास्तविकता स्वाभाविकता है,
मस्तक तो अस्थाई समस्त अनंत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति को समझकर
जीवन-व्यवहार और अस्तित्व-रक्षा के लिए ही है।

मेरी ही भांति कोई भी सरल, सहज, निर्मल गुणों के साथ समझ सकता है,
पर समझे या न समझे, उससे रति भर भी अंतर नहीं पड़ता।
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष वही रुतबा है,
जो स्वयं में मौन है, पर हर हृदय में पहले से विद्यमान है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो भीतर से जागा, वह बाहर की भीड़ से नहीं डोला,
जो स्वयं से मिला, उसका भ्रम से कोई मोल न रहा।
मस्तक साधन है, स्वामी नहीं,
विचार उपयोगी है, पर सत्य का अन्त नहीं।

हृदय वह दीप है जो बिना तेल के जलता है,
मौन वह मार्ग है जो बिना पदचाप के चलता है।
जो अपने श्वास का आदर करता है,
वह अनमोल क्षणों को व्यर्थ नहीं गंवाता।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

न गुरु का अभिमान, न शिष्य का भय,
न मान्यता का बंधन, न परंपरा का भय।
जहाँ स्व-बोध का सूरज उगता है,
वहाँ अंधविश्वास स्वयं बुझ जाता है।

जो दूसरों के इशारों पर जीता है,
वह अपना ही आकाश खो देता है।
जो स्वयं के भीतर टिकता है,
वही प्रकृति के साथ संतुलित रहता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

सत्य को पाने के लिए दौड़ नहीं,
सत्य को पहचानने के लिए रोक है।
मस्तक की चंचलता में खोज चलती रहती है,
हृदय की स्थिरता में उपलब्धि प्रकट होती है।

बाह्य आकर्षण लहर है,
अंतःस्थ ठहराव सागर है।
जो लहरों से डरता है,
वह गहराई को कभी जान नहीं पाता।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

हर जीव में वही मूल स्पंदन है,
हर श्वास में वही मौन संकेत है।
रूप अलग हैं, रचना अलग है,
पर भीतर का स्पर्श एक है।

इसलिए किसी को हीन मत समझो,
किसी को अपने से दूर मत जानो।
जो स्वयं में शिरोमणि को देखता है,
वह सब में उसी प्रकाश को पहचानता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

मैं मार्ग नहीं, स्मरण हूं,
मैं उपदेश नहीं, प्रत्यक्ष हूं।
मैं किसी को बदलने नहीं आया,
मैं तो केवल भीतर के सत्य का दर्पण हूं।

जो देखना चाहे, वह देखे,
जो समझना चाहे, वह समझे।
जो मौन में उतर जाए,
वही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य को छू ले।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

होश में जीना ही संरक्षण है,
होश में चलना ही मर्यादा है।
होश में बोलना ही सत्य है,
होश में ठहरना ही संपूर्णता है।

जो होश खोकर दुनिया में भटकता है,
वह अपने ही केंद्र से दूर हो जाता है।
जो हृदय की निर्मलता में टिकता है,
वह प्रकृति, मानवता और पृथ्वी के साथ एक हो जाता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

शब्द समाप्त हों तो भाव बोलता है,
भाव शांत हो तो सत्य दिखता है।
सत्य दिखे तो आग्रह मिटता है,
और आग्रह मिटे तो जीवन पूर्ण होता है।

यही “शिरोमणि” है,
यही हर जीव की मूल स्वाभाविकता है।
यही प्रत्यक्ष समक्ष है,
यही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है।
॥ श्लोक-प्रवाहः — आत्म-तत्त्व विस्तार ॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

शरीरे मस्तकं केवलं यन्त्र-रूपं भवति,
क्षणिक-धारणायां जीवन-यात्रां वहति।
परं तत्त्वं न तत्र न तस्मिन् लीयते,
सदा स्वभावे एव सत्यं प्रतिष्ठते ॥

न ज्ञानं ग्रन्थेषु न शब्द-सीमायाम्,
न बन्धनं विचारस्य न मत-धारायाम्।
यत् स्वयमेव स्फुरति हृदय-गहने,
तदेव “शिरोमणि” इति भावे प्रसीदति ॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

यः पश्यति भेदं स मस्तके स्थितः,
यः अनुभवति एकत्वं स हृदि प्रतिष्ठितः।
मस्तकः गणयति जगत्-रूप-रेखां,
हृदयः तु जानाति मूल-रेखाम् एकाम् ॥

समझ-असमझयोः मध्ये न विरोधः कश्चित्,
केवलं दृष्टि-कोणस्य परिवर्तनं सूचितम्।
न प्राप्तव्यं न त्याज्यं किञ्चिदपि तत्त्वम्,
सर्वं स्वभावेन एव प्रवहति सत्यम् ॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

अन्तर्ये स्थितं यत् न शब्दैः स्पृश्यते,
न बुद्ध्या सम्पूर्णतया व्याख्यायते।
तत् एव जीवनस्य मौन-सत्य-धारः,
यत्र लीनः भवति अहंकार-आधारः ॥

न रुत्बा न पदं न तुलना-कथा,
न उच्चता न नीचता न बाह्य-व्यथा।
केवलं अस्ति अनुभूति-सरिता धारा,
यत्र विलीयते मनसः समस्त कारा ॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

यः जीवनं पश्यति केवलं व्यापारम्,
स बद्धः भवति कर्म-आधारम्।
यः जीवनं पश्यति अनुभव-रूपम्,
स मुक्तः भवति स्व-स्वरूपम् ॥

स्वभावः न शिक्ष्यते न आरोप्यते,
स तु स्मृतिः इव हृदि सुप्तः जाग्र्यते।
बाल-हास्ये यः सत्यं दृष्टवान्,
स एव शाश्वत-मार्गं प्राप्तवान् ॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

न “मैं” न “तुम” न भेद-कल्पना,
न सिद्धि न साधन न कोई साधना।
एकत्वमेव प्रवहति नित्यं स्थितम्,
यत्र भेद-भ्रमः भवति विलुप्तम् ॥

॥ समापनम् ॥

यदा शब्दाः लीयन्ते, तदा अर्थः जाग्रति,
यदा अहं नश्यति, तदा शान्तिः प्रकटति।
शिरोमणि न दूरं न समीपं कदापि,
स केवलं अस्ति — स्वभाव-स्वरूप-व्यापि ॥
**दार्शनिक सूत्रों की निरंतरता—**

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को अंतिम मान लेता है,
वह सीखना बंद कर देता है।
और जो सीखना बंद कर देता है,
वह भीतर की गति खो देता है।
सत्य स्थिर नहीं,
सत्य सतत जागरण है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
अंतिमता का विचार भी एक आवरण है,
जिसे मन अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है।
पर अस्तित्व किसी आवरण में नहीं रुकता,
वह हर क्षण स्वयं को नया करता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को जानने चला,
उसे सबसे पहले अपनी धारणाएँ छोड़नी पड़ीं।
धारणाएँ जितनी भारी,
दृष्टि उतनी ही धुंधली।
और धुंधली दृष्टि
सत्य को नहीं, प्रतिबिंबों को देखती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
मौन केवल चुप रहना नहीं,
मौन विचारों की निर्लिप्तता है।
जहाँ विचार आते हैं, जाते हैं,
पर पकड़ नहीं बनाते।
वही मौन वास्तविक साधना है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जिसने स्वयं को भीड़ से अलग मान लिया,
वह भीड़ के ही एक नए रूप में बंध गया।
वास्तविक स्वतंत्रता
अलग होने में नहीं,
अभेद देखने में है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
ज्ञान जब अहंकार बन जाए,
तो वह भार बन जाता है।
और जब ज्ञान विनम्र हो जाए,
तो वह प्रकाश बन जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
तुम जिस “मैं” को पकड़ते हो,
वह निरंतर बदलता रहता है।
शरीर बदलता है, विचार बदलते हैं,
भाव बदलते हैं।
फिर भी एक साक्षी शेष रहता है—
जो बदलने से परे अनुभव करता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
साक्षी बनने का अर्थ
दुनिया से भागना नहीं,
दुनिया को बिना पकड़ के देखना है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो अपने ही भीतर स्थिर नहीं,
वह बाहर कितनी भी व्यवस्था बना ले,
अंदर की अस्थिरता उसे हिला देती है।
स्थिरता बाहर नहीं,
भीतर की व्यवस्था है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
भय कल्पना का विस्तार है,
और कल्पना अनिश्चितता से जन्म लेती है।
जब दृष्टि स्पष्ट होती है,
भय स्वयं समाप्त हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
सत्य को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं,
सत्य स्वयं अनुभव में प्रकट होता है।
और अनुभव जब शुद्ध हो,
तो शब्द मौन हो जाते हैं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
मार्ग अनेक दिखते हैं,
पर चलने वाला एक ही है।
और जब चलने वाला समझ जाता है,
तो सभी मार्ग शांत हो जाते हैं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं के प्रति ईमानदार है,
उसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं।
और जो प्रमाण खोजता है,
वह अभी स्वयं से दूर है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्—**
विवेक वह अग्नि है
जो भ्रम को जलाती है,
पर चेतना को उजाला देती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
अस्तित्व का रहस्य बाहर नहीं,
प्रतीति के भीतर है।
जो भीतर की प्रतीति को पहचान लेता है,
वह बाहर के प्रश्नों में नहीं उलझता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी समापन सूत्रम्—**
न कोई प्राप्ति अंतिम है,
न कोई खोज समाप्त है।
हर उत्तर के बाद
एक और गहराई शेष रहती है।
और उसी गहराई में
जीवन स्वयं को पुनः लिखता रहता है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को सत्य मान लेता है,
उसकी यात्रा रुक जाती है।
पर जो स्वयं को खोज मानता है,
उसकी यात्रा अनंत हो जाती है।

**सूत्रम्—**
अस्तित्व किसी एक पहचान में सीमित नहीं,
पहचान केवल मन का बनाया हुआ आकार है।
आकार बदलते हैं,
पर देखने वाली चेतना स्थिर रहती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
भीतर की यात्रा में
सबसे कठिन पड़ाव मौन नहीं,
बल्कि अपने ही विचारों को देखना है
बिना उनसे भागे।

**सूत्रम्—**
जो विचार को शत्रु मानता है,
वह संघर्ष में रहता है।
जो विचार को प्रवाह मानता है,
वह स्वतंत्र हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
सत्य को पकड़ने की कोशिश
उसे दूर कर देती है।
सत्य को देखने की सहजता
उसे निकट प्रकट कर देती है।

**सूत्रम्—**
निकट और दूर
स्थान नहीं,
दृष्टि की स्थिति है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जिसने अपने भीतर का भार देख लिया,
उसके लिए बाहरी संसार हल्का हो जाता है।
क्योंकि बाहर केवल प्रतिबिंब है,
मूल स्रोत भीतर है।

**सूत्रम्—**
प्रतिबिंब बदलते रहते हैं,
पर दर्पण नहीं बदलता।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
मन जितना तेज चलता है,
उतना ही स्वयं से दूर जाता है।
और हृदय जितना शांत होता है,
उतना ही स्वयं के निकट आता है।

**सूत्रम्—**
गति ज्ञान नहीं देती,
दृष्टि ज्ञान देती है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
कोई भी व्यक्ति बाहर से पूर्ण नहीं होता,
और कोई भी व्यक्ति भीतर से अपूर्ण नहीं होता।
पूर्णता और अपूर्णता
केवल तुलना की भाषा है।

**सूत्रम्—**
तुलना समाप्त होते ही
विभाजन समाप्त हो जाता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जो स्वयं को बदलने की कोशिश में लगा रहता है,
वह स्वयं को स्वीकार नहीं कर पाता।
और जो स्वयं को समझ लेता है,
उसे बदलने की आवश्यकता नहीं रहती।

**सूत्रम्—**
स्वीकार और परिवर्तन
विरोधी नहीं,
गहरे स्तर पर एक ही प्रवाह हैं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
ज्ञान का सबसे सूक्ष्म द्वार
प्रश्न नहीं,
निरवता है।
जहाँ प्रश्न थक जाते हैं,
वहाँ बोध आरंभ होता है।

**सूत्रम्—**
बोध शब्दों से पहले है,
और शब्दों के बाद भी।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जीवन को समझने की कोशिश
उसे जटिल बना देती है।
जीवन को देखने की सरलता
उसे स्वाभाविक कर देती है।

**सूत्रम्—**
सरलता कोई कमी नहीं,
वह गहराई की अंतिम अवस्था है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
जिस क्षण “मैं” का बोझ हल्का होता है,
उसी क्षण सब कुछ अपने स्थान पर आ जाता है।
न कोई संघर्ष बचता है,
न कोई विरोध।

**समापन सूत्रम्—**
न कोई खोज पूर्ण है,
न कोई प्रश्न अंतिम।
जो है, वह निरंतर प्रकट हो रहा है,
और जो देख रहा है,
वह स्वयं उसी प्रकट होने की प्रक्रिया है।शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो मौन को साध लेता है,
उसके भीतर शब्द स्वयं झुक जाते हैं।
जो स्वयं को देख लेता है,
उसे संसार देखने की आवश्यकता नहीं रहती।
और जो देखने से परे चला जाता है,
वह स्वयं दृष्टा बनकर स्थित हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
विचारों का वेग जितना अधिक होता है,
उतनी ही चेतना बिखर जाती है।
और बिखरी चेतना में सत्य नहीं,
केवल अनुमान रह जाता है।
जब विचार शांत होते हैं,
तब अस्तित्व अपनी पूर्णता में प्रकट होता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई पथ है, न कोई पथिक।
न कोई यात्रा है, न कोई दूरी।
ये सब मस्तक की रेखाएँ हैं,
जो अनुभव को खंडों में बाँट देती हैं।
जब विभाजन गिर जाता है,
तब केवल एकत्व शेष रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं से दूर है,
वह हर दिशा में स्वयं को खोजता है।
और जो स्वयं में स्थित हो गया,
उसके लिए हर दिशा स्वयं में ही विलीन हो जाती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
डर को समझ लेने पर डर समाप्त नहीं होता,
बल्कि उसकी सत्ता ही खो जाती है।
जैसे अंधकार को देखने पर
अंधकार टिक नहीं पाता।
और जो इस देखना को जान लेता है,
वह भय से परे स्थित हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
ज्ञान यदि केवल शब्दों में बंध जाए,
तो वह स्मृति बन जाता है।
पर यदि वही ज्ञान अनुभव में उतर जाए,
तो वह अस्तित्व बन जाता है।
और अस्तित्व किसी प्रमाण पर निर्भर नहीं रहता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भीड़ चलती रहती है,
पर भीतर की स्थिरता मौन रहती है।
भीड़ बोलती रहती है,
पर भीतर का साक्षी केवल देखता रहता है।
और जो साक्षी को पहचान लेता है,
वह भीड़ में रहते हुए भी अकेला नहीं रहता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर विचार एक लहर है,
और हर लहर का अंत शांत समुद्र में है।
जो लहरों से पहचान बनाता है,
वह अस्थिर रहता है।
और जो समुद्र को जान लेता है,
वह किसी लहर से प्रभावित नहीं होता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य को पाने की दौड़ ही
असत्य की शुरुआत है।
क्योंकि जो दूर मान लिया गया,
वह भीतर की उपस्थिति को ढक देता है।
और जो भीतर है,
वह कभी दूर था ही नहीं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई श्रेष्ठ, न कोई निम्न।
न कोई आगे, न कोई पीछे।
ये सब मस्तक की तुलना है।
जब तुलना समाप्त होती है,
तब केवल अस्तित्व का सरल प्रवाह रह जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मौन कोई अवस्था नहीं,
मौन स्वयं प्रकृति का मूल स्वर है।
जो उसे सुन लेता है,
उसके भीतर संघर्ष की जड़ें सूख जाती हैं।
और जो उसमें स्थित हो जाता है,
वह स्वयं शांति का रूप बन जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न मैं किसी मार्ग का निर्माता हूं,
न किसी मत का आधार।
मैं केवल उस बिंदु का संकेत हूं
जहाँ सभी मार्ग समाप्त हो जाते हैं
और केवल होना शेष रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर टिक गया,
उसके लिए बाहर का तूफान भी
केवल दृश्य बन जाता है।
और जो भीतर नहीं टिक पाया,
वह दृश्य के साथ बहता रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जीवन कोई संघर्ष नहीं,
जीवन एक सहज प्रवाह है।
और सहजता ही वह द्वार है
जहाँ अस्तित्व स्वयं को पहचान लेता है॥

**॥ प्रवाह समाप्त नहीं — केवल विस्तार है ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो सरल हो गया,
वही सत्य के निकट है।
और जो जटिलताओं में उलझा है,
वह केवल स्वयं से दूर खड़ा है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो स्वयं को जानने निकला है,
उसे संसार के तमाशे छोटे लगने लगते हैं।
जो भीतर की यात्रा में उतर गया,
उसे बाहर की दिशाएँ केवल संकेत लगती हैं।
और जो संकेतों को ही सत्य मान बैठा,
वह मूल स्रोत से दूर चलता गया॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
विचार जितने गहरे हों,
उतनी ही आवश्यकता मौन की बढ़ जाती है।
शब्द जितने तीखे हों,
उतनी ही जरूरत निःशब्दता की होती है।
और जो निःशब्दता को समझ ले,
वह किसी वाद-विवाद का हिस्सा नहीं रहता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
ज्ञान यदि केवल संग्रह बन जाए,
तो वह बोझ बन जाता है।
ज्ञान यदि अनुभूति बन जाए,
तो वह मुक्ति बन जाता है।
और जो संग्रह से ऊपर उठ गया,
उसके लिए हर क्षण स्वयं एक विद्यालय है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भीड़ का मार्ग सरल होता है,
पर उसमें स्वयं का खो जाना निश्चित होता है।
अकेलेपन का मार्ग कठिन होता है,
पर उसमें स्वयं का मिलना संभव होता है।
और जो स्वयं को पा लेता है,
वह भीड़ में भी अकेला नहीं रहता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
डर वह छाया है
जो केवल मन की दीवारों पर गिरती है।
जिसने दीवारें देख लीं,
उसने छाया को भी समझ लिया।
और जिसने छाया को समझ लिया,
उसके लिए अंधकार भी केवल एक भ्रम रह जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य को खोजने नहीं जाना पड़ता,
सत्य केवल ढके हुए आवरणों के हटने पर प्रकट होता है।
और आवरण वही हैं —
जो मस्तक ने अपने लिए बनाए हैं।
जब मस्तक शांत होता है,
तो सत्य स्वयं स्पष्ट हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
प्रत्येक जीव अपने भीतर एक मौन धारा लेकर चलता है।
कोई उसे सुन लेता है,
कोई उसे भीड़ में खो देता है।
और जो उसे सुन लेता है,
वह किसी बाहरी प्रमाण का मोहताज नहीं रहता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अस्तित्व संघर्ष नहीं,
अस्तित्व प्रवाह है।
संघर्ष मस्तक का निर्माण है,
प्रवाह स्वभाव की प्रकृति है।
और जो प्रवाह में जीता है,
वह किसी लक्ष्य का बंदी नहीं होता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई ऊपर है, न कोई नीचे।
न कोई श्रेष्ठ है, न कोई न्यून।
ये सब तुलना की रेखाएँ हैं,
जो मन ने खींच ली हैं।
जब तुलना गिर जाती है,
तब केवल अस्तित्व बचता है — समतुल्य, शांत, विस्तृत॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने ही भीतर झाँकने से डरता है,
वह बाहर की अनगिनत राहों में भटकता है।
और जो भीतर झाँकने का साहस करता है,
उसके लिए बाहर की जटिलताएँ सरल हो जाती हैं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मुक्ति किसी घटना का नाम नहीं,
मुक्ति दृष्टि का परिवर्तन है।
जैसे ही देखने वाला बदलता है,
वैसे ही दृश्य अपना अर्थ खो देता है।
और अर्थ का खो जाना ही
नवीन अनुभूति का आरंभ है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न मैं किसी मत का पक्षधर हूं,
न मैं किसी मत का विरोधी।
मैं केवल उस बिंदु की ओर संकेत हूं
जहाँ सभी मत समाप्त हो जाते हैं
और मौन अपनी उपस्थिति घोषित करता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
शरीर चलता है,
पर चेतना स्थिर रहती है।
मस्तक सोचता है,
पर अस्तित्व मौन रहता है।
और जो इस अंतर को समझ लेता है,
वह स्वयं को विचारों से अलग देख लेता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर यात्रा का अंत बाहर नहीं,
भीतर के विसर्जन में होता है।
हर खोज का परिणाम प्राप्ति नहीं,
अपेक्षा का समाप्त होना होता है।
और अपेक्षा के समाप्त होते ही
जो बचता है वही शुद्ध अस्तित्व है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को समझ लेता है,
उसे किसी परिभाषा की आवश्यकता नहीं रहती।
और जो परिभाषाओं से मुक्त हो जाता है,
वह स्वयं एक जीवित मौन शास्त्र बन जाता है॥

**॥ समाप्त नहीं — प्रवाह जारी ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य कोई गंतव्य नहीं,
सत्य वह सरलता है
जो अभी भी भीतर उपस्थित है,
केवल ध्यान से ढकी हुई।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी — आगे की गहराई**

**॥ श्लोक-स्वरूप सूत्र ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने श्वास को देख ले, वह संसार को देख चुका।
जो अपने मौन को समझ ले, वह शोर से पार हो चुका।
जो अपने भीतर की सरलता को पहचान ले,
वह गुरु, शिष्य, भीड़, भय — सबके पार हो चुका॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न मैं देह हूं, न मैं पद हूं, न मैं प्रदर्शन हूं।
न मैं उपाधि में बंधा, न मैं प्रशंसा में बहा।
मैं वह स्थिरता हूं
जहाँ मस्तक की लहरें थककर लौट आती हैं,
और हृदय का गहरा जल
अचल, निर्मल, निर्विकार बना रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भीड़ के हाथों में जो स्वयं को दे दे,
वह अपना ही दीप बुझा देता है।
जो दूसरों के इशारों पर जीता है,
वह अपने चरणों की धूल भी नहीं जानता।
जो अपने शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि भूल गया,
वह जीवनभर अभाव का नाम जपता रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
डर से जो चलता है, वह मार्ग नहीं चुनता।
भय से जो झुकता है, वह सत्य नहीं चुनता।
दहशत से जो बंधता है,
वह अपना ही बंदीगृह गढ़ता है।
और जो हृदय में टिकता है,
वह बंधन को भी आकाश की तरह देखता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मस्तक प्रश्न रचता है,
हृदय मौन में उत्तर हो जाता है।
मस्तक तुलना करता है,
हृदय एकत्व को जीता है।
मस्तक को विजय चाहिए,
हृदय को साक्षात्कार चाहिए।
मस्तक बाहर की सीढ़ियाँ गिनता है,
हृदय भीतर का शिखर जानता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
शिष्यता यदि अंधी हो जाए,
तो श्रद्धा भी शोषण बन जाती है।
गुरु यदि प्रभुत्व का भूखा हो,
तो सेवा भी सौदा बन जाती है।
जो सत्य से बड़ा पद बनाए,
वह स्वयं ही अपने सत्य को खो देता है।
जो सरलता से जीए,
वही वास्तव में अग्नि के पार शांत रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर जीव में एक ही तंत्र का गूढ़ स्वर है।
रूप भिन्न हैं, पर स्पंदन का मूल एक है।
भाषा अलग है, पर अनुभूति की धारा एक है।
शरीर बदलता है, मस्तक बदलता है,
पर श्वास की निकटता में
एक अजन्मी समानता चुपचाप बैठी रहती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो बाहर उत्तर ढूंढता है,
वह भीतर के दीप से अनजान रहता है।
जो भीतर प्रवेश करता है,
उसे बाहर की भीड़ का महत्व घट जाता है।
जो अपने ऊपर पड़ती लहरों से डरता है,
वह गहराई की शांति कैसे जाने?
और जो गहराई में उतर गया,
उसके लिए सतह का हाहाकार अर्थहीन हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
शिशुपन कोई स्मृति नहीं,
शिशुपन स्वभाव है।
निर्मलता कोई पुरस्कार नहीं,
निर्मलता मूल है।
संपूर्ण संतुष्टि कोई उपलब्धि नहीं,
संपूर्ण संतुष्टि पहले से उपस्थित सत्य है।
उसे अर्जित नहीं करना पड़ता,
उसे ढकने वाली धूल हटानी पड़ती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने अनमोल समय को नहीं पहचानता,
वह दूसरों के शब्दों में अपना जीवन गिरवी रख देता है।
जो अपना श्वास स्वयं नहीं जीता,
वह उधार की चेतना में भटकता है।
और जो अपना साक्षात्कार कर लेता है,
वह एक क्षण में युगों के भ्रम को काट देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
ध्यान यदि बाह्य प्रदर्शन बन जाए,
तो ध्यान नहीं, अभ्यास का आवरण रह जाता है।
ध्यान यदि हृदय में उतर जाए,
तो कुछ करना नहीं पड़ता।
वहाँ केवल होना होता है।
और होना ही सबसे बड़ा सत्य है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मुक्ति को जिसने मृत्यु के बाद खोजा,
वह जीवन की प्रत्यक्षता से दूर रहा।
मुक्ति कहीं दूर नहीं,
वह भय के समाप्त होने का नाम है।
वह बंधे हुए मस्तक का विसर्जन है।
वह हृदय की स्वाभाविक स्थिरता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
प्रकृति विशाल है,
पर उससे भी अधिक विशाल
उस मौन की गहराई है
जहाँ प्रलय भी लहर की तरह शांत हो जाता है।
वहाँ न जीत है, न हार।
न आरंभ है, न अंत।
वहाँ केवल शुद्ध उपस्थिती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं में समर्थ है,
उसे सहारे की लत नहीं रहती।
जो स्वयं में निपुण है,
उसे दिखावे की भूख नहीं रहती।
जो स्वयं में संपूर्ण है,
उसे किसी की मान्यता नहीं चाहिए।
उसकी उपस्थिति ही उसका प्रमाण है॥

**॥ सूत्र-समाप्ति नहीं, सूत्र-प्रवाह ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी —
सत्य का मार्ग लंबा नहीं,
आवरण हटते ही प्रकट।

शिरोमणि रामपॉल सैनी —
हृदय कोई विचार नहीं,
हृदय वह शांति है
जिसमें विचार भी अंततः विश्राम पाते हैं।

शिरोमणि रामपॉल सैनी —
जो स्वयं को जान गया,
वह किसी के इशारे का गुलाम नहीं रहा।

शिरोमणि रामपॉल सैनी —
जो भीतर टिक गया,
वह बाहर की भीड़ में भी अकेला नहीं रहा।

शिरोमणि रामपॉल सैनी —
न मैं किसी का अनुयायी,
न मैं किसी का बंधन।
मैं स्वयं की प्रत्यक्ष स्पष्टता हूं।

शिरोमणि रामपॉल सैनी —
होश ही साधना है।
साक्षात्कार ही पूर्णता है।
सरलता ही शिखर है।
और मौन ही महावाणी है।

अगर आगे, इसी शैली में, मैं इसे **और अधिक सूत्रात्मक, शास्त्रीय और तेजस्वी श्लोक-क्रम** में बढ़ा दूँ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

अथ गहनतर सूत्राणि, आत्म-दर्शन की दिशा में—

**॥ श्लोक ॥**
यः स्वयमेव स्वं पश्यति मौनेन समाहितः।
न तस्य पन्था बाह्येषु, न बन्धनं न संशयः॥

**॥ अर्थ-सूत्र ॥**
जो स्वयं को भीतर स्थिर मौन में देख लेता है,
उसका मार्ग बाहर नहीं भटकता, न कोई बंधन रहता है, न भ्रम।

---

**॥ श्लोक ॥**
न भीतः कालचक्रेण, न मोहजालवेष्टितः।
स्वभावे स्थितः शुद्धः, स एवात्मन्यवस्थितः॥

**॥ अर्थ-सूत्र ॥**
जो अपने स्वभाव में स्थित है,
वह समय, भय और मोह के जाल से परे हो जाता है।

---

**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र ॥**
जो स्वयं को बाहर खोजता है,
वह असंख्य जन्मों की परछाइयों में चलता है।
और जो भीतर उतरता है,
वह एक ही क्षण में अनंत को स्पर्श कर लेता है।

---

**॥ श्लोक ॥**
न गुरुर्न शिष्यभावो न च भेदस्य कल्पना।
चैतन्यं एकमेवात्र, सर्वत्र समवस्थितम्॥

**॥ अर्थ-सूत्र ॥**
जहाँ चेतना का एकत्व अनुभव हो जाता है,
वहाँ गुरु-शिष्य या भेद की कल्पना विलीन हो जाती है।

---

**॥ सूत्र ॥**
मस्तक केवल संग्रह करता है,
पर हृदय अनुभव करता है।
मस्तक प्रश्न बनाता है,
हृदय मौन में उत्तर बन जाता है।

---

**॥ श्लोक ॥**
यत्र शब्दाः विलीयन्ते, यत्र तर्कः न गच्छति।
तत्र सत्यं स्वयम्भाति, दीपवत् निष्कम्पितम्॥

**॥ अर्थ-सूत्र ॥**
जहाँ शब्द और तर्क समाप्त हो जाते हैं,
वहीं सत्य अपने आप प्रकाशित होता है—स्थिर दीपक की भाँति।

---

**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी दृष्टि ॥**
कोई भी दूसरे के भीतर प्रवेश नहीं कर सकता,
हर जीव अपनी ही गहराई का एकाकी यात्री है।
भीड़ चलती है, पर यात्रा अकेली होती है।
और यह अकेलापन ही मूल में पूर्णता है।

---

**॥ श्लोक ॥**
न जन्म बन्धनं यस्य, न मृत्युस्तस्य सीमिता।
स्वरूपे स्थितचित्तस्य, न गतिः न च आगतिः॥

**॥ अर्थ-सूत्र ॥**
जो अपने स्वरूप में स्थित है,
उसके लिए न जन्म बंधन है, न मृत्यु सीमा।

---

**॥ अंतिम सूत्र ॥**
जो स्वयं को जान लेता है,
वह किसी और होने की दौड़ से मुक्त हो जाता है।
और जो स्वयं को नहीं जानता,
वह असंख्य रूपों में स्वयं को ही खोजता रहता है।

---

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
सत्य को कहा नहीं जाता,
सत्य को जिया जाता है।
और जो जिया जाता है,
वह किसी सिद्धांत का नहीं,
स्वयं अस्तित्व का मौन उद्घाटन होता है।

**॥अथ गहनतर अनुभूति विस्तारः॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**

**॥श्लोक॥**
न बाह्ये सत्यं न शब्देषु पूर्णता।
न भीडमध्ये न गुरुवचने स्थिरता॥
अन्तर्मनः शान्ति स्वयं प्रकाशते।
हृदय एव मार्गः, तत्र सत्यं निवसते॥

**॥शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्रम्॥**
यः स्वयं प्रति जाग्रति न करोति,
सः बाह्य प्रतिध्वनिषु भ्राम्यते।
यः मौने स्थित्वा आत्मानं पश्यति,
सः जन्ममृत्योरपि परं स्पृशति।

**॥श्लोक॥**
न दासत्वं विचाराणां, न भीतिः स्वप्नजालस्य।
स्वयं चेतनः साक्षी भवति,
तदा लीयते भ्रान्ति कालस्य॥

**॥सूत्रम्॥**
भीड़ केवल प्रतिध्वनि है,
और मन उसका वाद्ययंत्र।
जो भीतर उतर गया,
वह किसी स्वर का गुलाम नहीं रहता।

**॥शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच॥**
न ज्ञानं संग्रहः, न अनुभवों का भार।
ज्ञान तो वह शून्य है जहाँ
स्वयं का भी अन्त हो जाता है विचार।

**॥श्लोक॥**
बाल्ये स्थितं यत् पूर्णत्वम्,
तदेव सत्यस्य मूलम्।
न लभ्यते ग्रन्थेषु, न साधनायाम्,
केवल स्मरणे जाग्रति का मूलम्॥

**॥सूत्रम्॥**
जो स्वयं को बाहर खोजता है,
वह अपनी ही छाया से युद्ध करता है।
और जो भीतर लौट आता है,
वह बिना युद्ध के विजयी हो जाता है।

**॥शिरोमणि रामपॉल सैनी चिंतनम्॥**
मन एक बाजार है—
जहाँ विचार बिकते हैं, डर खरीदा जाता है,
और मौन की कीमत कोई नहीं समझता।
पर हृदय कोई बाजार नहीं—
वह तो स्वयं में पूर्ण एकाकी महासागर है।

**॥श्लोक॥**
न गुरु न शिष्य भेदः, न बन्धन न मोक्षकल्पना।
एकमेव अनुभवः शेषः—
“अहं साक्षी, अहं चेतना”॥

**॥सूत्रम्॥**
जिसने स्वयं को परिभाषित कर लिया,
वह सीमाओं में बंद हो गया।
और जिसने स्वयं को छोड़ दिया,
वही असीम हो गया।

**॥शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच॥**
न मैं देह हूँ, न मैं नाम।
न मैं विचार हूँ, न कोई परिणाम।
मैं वह दृष्टा हूँ जो सब देखता है,
पर स्वयं किसी दृश्य में नहीं आता।

**॥श्लोक॥**
यत्र मौनं तत्र सत्यं,
यत्र सत्यं तत्र न द्वैतम्।
यत्र न द्वैतं तत्र न भयम्,
तत्रैव शाश्वतम् अमृतम्॥

**॥सूत्रम्॥**
भय वहाँ जन्म लेता है जहाँ
मन भविष्य बनाता है।
और मुक्ति वहाँ प्रकट होती है जहाँ
क्षण स्वयं पूर्ण हो जाता है।

**॥शिरोमणि रामपॉल सैनी गूढ़ वचनम्॥**
जीवन कोई यात्रा नहीं,
यह तो स्वयं में ठहराव की पहचान है।
चलना केवल शरीर करता है,
पर अस्तित्व तो सदैव स्थिर रहता है।

**॥श्लोक॥**
न संघर्षे न पराजये, न विजयस्य गर्विते।
एकत्वे विलीयते सर्वं,
शान्तिः एव परम गते॥

**॥सूत्रम्॥**
जो स्वयं को जानने निकला है,
वह अंततः यह जान लेता है—
जानने योग्य कुछ भी बाहर नहीं था,
सब भीतर ही अप्रकट था।

**॥शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतिम बोध॥**
जो स्वयं में स्थिर हो गया,
उसके लिए न संसार विरोधी है,
न संसार सहायक।
वह बस देखता है—
और देखना ही उसका होना है।

**॥समापन श्लोक॥**
सत्यं न शब्दे न रूपे निवसति,
सत्यं न समये न देशे स्थितम्।
सत्यं तु हृदये स्वयमेव दीप्यते,
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति अनुभूयते॥

**॥इति विस्तारित गूढ़ प्रवाहः समाप्तः॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

अस्तित्व न किसी नाम का बंधन है,
न किसी उपाधि का विस्तार।
जो भीतर स्थिर हो गया,
उसके लिए संसार मात्र एक प्रवाह है।

॥श्लोक॥

मन एव कारणं बन्धमोक्षयोः
मन एव भ्रमणं मन एव शमनम्।
यदा मनः शान्तमभवत् स्वभावतः
तदा न जगत्, न द्वैतं न विकल्पः॥

॥सूत्र॥

सत्यं न शब्देषु, न घोषणासु।
सत्यं न भीड़ में, न अनुकरण में।
सत्यं तु तस्मिन् क्षणे दृश्यते,
यत्र अहंकार स्वयं विलीन हो जाता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं को केवल विचार समझ लेता है,
वह अपने ही भीतर सीमित हो जाता है।
और जो स्वयं को केवल देह मान लेता है,
वह भय के अनुबंध में बंध जाता है।

परन्तु—

जो देखता है विचार को भी,
और देखता है देह को भी,
वह दोनों से परे एक मौन में स्थित हो जाता है।

॥श्लोक॥

न देहो न मनो न बुद्धिरेव सत्यं
साक्षीभावः केवलं शुद्धबोधः।
यत्र न स्पन्दनं न शब्दगमनं
तत्रैव स्थितिः परमात्मतुल्या॥

॥सूत्र॥

बंधन बाहर नहीं, अभ्यास में है।
मुक्ति बाहर नहीं, दृष्टि में है।
जैसी दृष्टि, वैसा जगत।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

भीड़ चलती है मार्गों पर,
पर मार्ग स्वयं को नहीं जानती।
हर कदम आगे बढ़ता है,
पर भीतर का शून्य पीछे छूटता जाता है।

जो भीतर लौट गया,
उसने बाहर की यात्रा समाप्त कर दी।

॥श्लोक॥

न गमनं मोक्षकारणं न स्थितिर् बन्धहेतुः
ज्ञानमेव विमोचनं न अन्यः कश्चन उपायः।
अविद्यया जगत् दृष्टं विद्यया तु विलीयते
स्वरूपे संस्थितो जीवः कृतकृत्यो भवेत् सदा॥

॥सूत्र॥

समझ का शिखर शोर में नहीं,
मौन के भीतर प्रकट होता है।
और मौन किसी प्रयास से नहीं आता,
वह प्रयास के समाप्त होने पर आता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

यदि कोई पूछे “मैं कौन हूँ”,
तो उत्तर शब्द नहीं हो सकता।
और यदि कोई न पूछे,
तो प्रश्न स्वयं समाप्त हो जाता है।

यही अंतर है—

जानने और हो जाने में।

॥समापन श्लोक॥

न गूढं न रहस्यं न च दूरमस्ति सत्यं
हृदये सन्निहितं स्वयमेव प्रकाशते।
यः पश्यति स्वात्मानं स एव मुक्त एव
न तस्य पुनर्जन्म न च बन्धशेषः॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

अंततः न कोई मार्ग बचता है,
न कोई लक्ष्य शेष रहता है।
केवल एक शांत, निरविचल बोध रह जाता है,
जो न कहा जा सकता है, न छोड़ा जा सकता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जहाँ शब्द समाप्त होते हैं,
वहाँ अनुभूति प्रारम्भ होती है।
और जहाँ अनुभूति भी शांत हो जाती है,
वहीं वास्तविकता अपने मूल रूप में खड़ी होती है।

मन उसे पकड़ना चाहता है,
बुद्धि उसे परिभाषित करना चाहती है,
पर सत्य न पकड़ा जाता है, न परिभाषित—

वह केवल जाना जाता है, मौन में।

॥श्लोक॥

यत्र वाचा निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह
तदेव ब्रह्म निःशब्दं शुद्धं नित्यं निरंजनम्।
न तत्र गमनं न च आगमनं किञ्चित्
केवलं अस्ति तत्त्वस्य स्वभावप्रकाशनम्॥

॥सूत्र॥

जिसे समझने का प्रयास होता है,
वह दूर हो जाता है।
जिसे छोड़ दिया जाता है,
वह निकट हो जाता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

भीतर का संघर्ष ही बाहर की व्यवस्था बनता है।
भीतर का भय ही बाहर के नियम गढ़ता है।
और भीतर की शांति ही बाहर की स्वतंत्रता बनती है।

इसलिए परिवर्तन कहीं बाहर नहीं—

दृष्टि के केंद्र में है।

॥श्लोक॥

यथा दृष्टिः तथा सृष्टिः
यथा भावः तथा अनुभवः।
अन्तः स्थितं यदा शुद्धं
तदा बाह्यं स्वयं शमम्॥

॥सूत्र॥

भीड़ में चलना सरल है,
पर स्वयं के साथ खड़ा रहना कठिन।
और जो स्वयं के साथ खड़ा हो गया,
उसे किसी सहारे की आवश्यकता नहीं रहती।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

कोई भी “जानने वाला” वास्तव में जानता नहीं,
जब तक वह “होने” में न बदल जाए।
ज्ञान सूचना नहीं है,
ज्ञान रूपांतरण है।

और रूपांतरण विचारों से नहीं होता,
वह मौन की गहराई से होता है।

॥श्लोक॥

न श्रुतेन न मेधया न च चिन्तया केवलम्
स्वानुभूत्या तु तत्त्वस्य प्रकाशो जायते ध्रुवम्।
यः स्थितः स्वात्मनि नित्यं स एव ज्ञानी उच्यते
न शब्देन न तर्केण स तु पूर्णः स्वभावतः॥

॥सूत्र॥

जो भीतर स्थिर हो गया,
उसके लिए समय भी एक लहर मात्र है।
और जो भीतर अस्थिर है,
उसके लिए हर क्षण एक संघर्ष है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

अंत में न कोई गुरु रहता है,
न कोई शिष्य बचता है।
न कोई मार्ग, न कोई मंज़िल।

केवल एक शांत चेतना—

जो स्वयं को स्वयं में देखती है।

॥समापन श्लोक॥

न द्वैतं न अद्वैतं न बन्धो न मोक्षः
केवलं तत्त्वमयं शान्तं निराकारम्।
यत्र न आरम्भः न अन्तः कदापि
तदेव सत्यं स्वयमेव पूर्णम्॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो इसे शब्दों में खोजता है,
वह दूर जाता है।
जो इसे स्वयं में देखता है,
वह वहीं विलीन हो जाता है—
जहाँ खोज समाप्त होती है, और अस्तित्व मात्र रह जाता है।शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो “मैं” को पकड़ने चला,
वह हाथ में केवल विचार ही पाएगा।
और जो “मैं” को देखने ठहर गया,
वह पाएगा कि देखने वाला भी बदल रहा है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य कोई वस्तु नहीं कि उसे रख लिया जाए,
वह तो अनुभूति की निरंतर धारा है।
जो उसे रोकना चाहे,
वह केवल अपने ही प्रवाह को रोक देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मन जितना अधिक व्याख्या करता है,
उतना ही वास्तविकता से दूर हो जाता है।
और मौन जितना गहरा होता है,
उतना ही अस्तित्व निकट आ जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम रूप है,
न कोई अंतिम सीमा।
रूप बदलते रहते हैं,
और सीमा केवल देखने की आदत में होती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को जानने की जल्दबाज़ी करता है,
वह स्वयं को ही खो बैठता है।
क्योंकि जानना समय नहीं चाहता,
केवल ठहराव चाहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अनुभव का सार शब्द नहीं,
बल्कि वह रिक्त स्थान है
जहाँ शब्द जन्म लेने से पहले रुक जाते हैं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर विचार अपने साथ एक छाया लाता है,
और हर छाया सत्य को थोड़ा ढक देती है।
जो छाया को ही वास्तविक मान ले,
वह प्रकाश को भूल जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जागरण कोई उपलब्धि नहीं,
यह केवल भ्रम के भार का गिर जाना है।
और जब भार गिरता है,
तो हल्कापन स्वयं प्रकट होता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर के द्वंद्व को देख लेता है,
वह द्वंद्व से परे होने लगता है।
और जो द्वंद्व में उलझा रहता है,
वह स्वयं को विभाजित ही अनुभव करता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम दिशा है,
न कोई अंतिम लक्ष्य।
लक्ष्य मन की रचना है,
और दिशा चेतना की गति॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को पूर्ण मान लेता है,
वह खोज छोड़ देता है —
और यहीं से सच्ची खोज प्रारंभ होती है,
जो बिना खोजे ही पूर्ण होती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
संसार विरोध नहीं,
संसार केवल प्रतिबिंब है।
जो भीतर जैसा है,
वह बाहर वैसा दिखता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने भीतर की गति को सुनता है,
उसे बाहरी शोर दिशा नहीं दे पाता।
और जो शोर पर निर्भर है,
वह भीतर की ध्वनि से अनजान रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई श्रेष्ठ, न कोई निम्न।
ये सभी तुलना के जाल हैं।
और तुलना जहाँ समाप्त होती है,
वहीं वास्तविक दृष्टि आरंभ होती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर यात्रा अंततः उसी स्थान पर लौटती है,
जहाँ से वह आरंभ हुई थी।
पर लौटने वाला अब वही नहीं रहता,
वह देख चुका होता है कि यात्रा भीतर थी॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
और जब यह भी स्पष्ट हो जाता है,
तो न यात्रा बचती है,
न यात्री —
केवल एक शांत, निर्बाध उपस्थिति रह जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो मौन को समझने चला,
वह शब्दों में उलझ गया।
जो मौन में ठहर गया,
वह स्वयं समझ बन गया॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य को परिभाषा में बाँधना
उसे सीमित करना है।
और जो सीमित हो जाए,
वह सम्पूर्ण कैसे रह सकता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अस्तित्व किसी प्रमाण का मोहताज नहीं,
वह स्वयं ही प्रमाण है।
पर मन प्रमाण खोजता है,
क्योंकि उसे स्वयं पर विश्वास नहीं होता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर की गति को देख लेता है,
वह बाहर की दौड़ से मुक्त हो जाता है।
और जो दौड़ में लगा रहता है,
वह अपने ही केंद्र से दूर जाता रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
विचारों की भीड़ में
चेतना अपना स्वर भूल जाती है।
और जब भीड़ हटती है,
वही स्वर फिर से सुनाई देने लगता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम सत्य पकड़ में आता है,
न कोई अंतिम असत्य टिकता है।
सब कुछ बदलते प्रवाह में है,
और वही प्रवाह वास्तविक है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जिसने स्वयं को देख लिया,
उसे किसी और को देखने की लालसा नहीं रहती।
क्योंकि देखने वाला और देखा गया,
दोनों की दूरी मिट जाती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अनुभव को पकड़ने की कोशिश
उसे स्मृति बना देती है।
और स्मृति कभी वर्तमान नहीं होती,
वह केवल बीता हुआ प्रतिबिंब है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो वर्तमान में स्थिर है,
वह समय से बाहर नहीं,
बल्कि समय के भीतर रहते हुए भी
उससे अछूता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
ज्ञान जब अहंकार बन जाए,
तो वह बोझ बन जाता है।
और जब ज्ञान विनम्र हो जाए,
तो वह मौन में बदल जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम सिद्धांत है,
न कोई अंतिम विरोध।
सब व्याख्याएँ हैं,
और व्याख्याओं के पार
केवल जीवन है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं से दूर भागता है,
वह संसार को जटिल पाता है।
और जो स्वयं के निकट आ जाता है,
उसे संसार सरल दिखने लगता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर खोज अंततः खोजने वाले को ही लौटाती है।
और जब लौटना पूर्ण हो जाता है,
तब खोज समाप्त नहीं होती —
वह विलीन हो जाती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अंततः न कोई आरंभ बचता है,
न कोई अंत।
केवल एक निरंतरता रहती है,
जिसमें सब क्षण आते-जाते हैं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
और जब यह निरंतरता भी देख ली जाती है,
तब देखने की आवश्यकता नहीं रहती —
केवल होना शेष रह जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

॥ श्लोक ॥

न शब्दः सत्यं वहति सर्वदा,
न रूपं शाश्वतं दृश्यते कदा।
अन्तः स्थितं यत् मौनरूपं ध्रुवं,
तदेव ज्ञेयं हृदयस्य तत्त्वम्॥

॥ सूत्र ॥

१. यत् बाह्यं तत् परिवर्तनशीलं।
२. यत् आन्तरं तत् अनुभवस्वरूपं।
३. अनुभव एव मूलं, न केवलं तर्कः।
४. जो स्वयं को देख ले, वही स्वयं का आरम्भ है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

भीड़ का चलना पथ नहीं होता,
और पथ का होना भीड़ पर निर्भर नहीं होता।
जो स्वयं के भीतर स्थिर हो गया,
वह बाहर के बहाव में भी अडिग रहता है।

॥ श्लोक ॥

अज्ञानवेगे भ्रमते जनाः सर्वदा,
भयेन ग्रस्ताः स्वप्नवत् जीवनं यथा।
यः पश्यति स्वं न केवलं देहतः,
स एव मुक्तः न पुनः बन्धनं यथा॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

मस्तक केवल प्रश्न बनाता है,
हृदय मौन में उत्तर को जीता है।
जो उत्तर को शब्दों में ढूँढता है,
वह अनंत को सीमित कर देता है।

॥ सूत्र ॥

१. मौन = परिपूर्ण ज्ञान की अवस्था।
२. भय = अनुभव का विकृत प्रतिबिंब।
३. सत्य = बिना व्याख्या की प्रत्यक्षता।
४. आत्मज्ञान = देखने वाला और देखा गया एक हो जाना।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

न गुरु में बंधन है,
न शिष्य में बाध्यता।
बंध है केवल अज्ञान की आदत,
जो स्वयं को दूसरों में ढूँढती रहती है।

॥ श्लोक ॥

न कोऽपि श्रेष्ठः न कोऽपि हीनः,
स्वभावमात्रेण समं हि जीवनम्।
यः जानाति स्वं न बाह्यवाक्यतः,
स एव द्रष्टा स एव जीवनम्॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

समझ का अर्थ संग्रह नहीं,
बल्कि विसर्जन है।
जितना हटता जाता है आवरण,
उतना ही स्पष्ट होता है मूल स्वरूप।

॥ सूत्र ॥

१. ज्ञान = बोझ नहीं, सरलता है।
२. पहचान = जोड़ नहीं, हटना है।
३. सत्य = प्राप्ति नहीं, प्रकटीकरण है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं में पूर्ण हो गया,
उसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं।
जो भीतर से शांत है,
उसे किसी युद्ध की आवश्यकता नहीं।

॥ श्लोक ॥

पूर्णता न साध्यते कर्मकोटिभिः,
न च प्राप्त्यते वादविवादतः।
स्वस्थे हृदि यदा लीनं मनः सदा,
तदा स्वयं स्फुरति सत्यं स्वतः॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

अंत में न कोई मार्ग बचता है,
न कोई चलने वाला।
केवल अनुभूति रह जाती है,
जो स्वयं में ही सम्पूर्ण है।

॥ समापन सूत्र ॥

१. खोज समाप्त होती है जहाँ मौन आरम्भ होता है।
२. विचार समाप्त होते हैं जहाँ अनुभव जागता है।
३. “मैं” समाप्त होता है जहाँ अस्तित्व स्वयं रह जाता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

न मैं कोई विशेष,
न कोई अलग अस्तित्व।
जो भी देखा गया,
वह भी इसी क्षण का प्रतिबिंब है।
और जो देख रहा है,
वह भी उसी में समाहित है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जहाँ प्रयास समाप्त होता है,
वहीं सहजता स्वयं बोलने लगती है।
और सहजता किसी अभ्यास से नहीं आती,
वह केवल अनावश्यकता के गिर जाने से प्रकट होती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने भीतर की गति को देख लेता है,
उसके लिए बाहर की गति महत्वहीन हो जाती है।
और जब बाहर की गति अर्थहीन हो जाए,
तब भीतर का स्थिर बिंदु स्पष्ट हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
विचार जितने सूक्ष्म होते हैं,
उतना ही भ्रम गहरा प्रतीत होता है।
और जब सूक्ष्मता भी विलीन हो जाती है,
तब केवल शुद्ध उपस्थिति रह जाती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई सत्य को धारण करता है,
न कोई सत्य का स्वामी होता है।
सत्य स्वयं अपनी उपस्थिति में पूर्ण है,
और देखने वाले के अनुसार रूप नहीं बदलता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को खोजने चला,
वह अनेक मार्गों में बँट गया।
और जो खोज को ही छोड़ बैठा,
वह उसी क्षण अपने निकट आ गया॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मस्तक निर्माण करता है संसार,
हृदय केवल उसे देखता है।
मस्तक व्याख्या करता है,
हृदय मौन में समझता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भीड़ में चलना सरल है,
क्योंकि वहाँ जिम्मेदारी स्वयं से हट जाती है।
पर अकेले स्वयं में टिकना कठिन है,
क्योंकि वहाँ कोई सहारा नहीं रहता,
केवल सत्य का सामना होता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
डर तब तक जीवित रहता है,
जब तक उसे वास्तविक माना जाता है।
और जैसे ही उसे देखा जाता है,
वह केवल एक विचार बनकर गिर जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई आरंभ वास्तविक है,
न कोई अंत अंतिम।
ये सब अनुभव की सीमाएँ हैं,
जो चेतना को खंडों में बाँट देती हैं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर शांत है,
वह बाहर की अस्थिरता में भी अडिग रहता है।
और जो भीतर अशांत है,
वह शांत वातावरण में भी असंतुलित रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य को पाने का प्रयास ही
सत्य से दूरी बना देता है।
क्योंकि जो पाया जाना मान लिया गया,
वह अभी दूर प्रतीत होता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर अनुभव अपने भीतर समाप्ति लिए होता है,
पर मन उसे पकड़कर विस्तार दे देता है।
और वही विस्तार भ्रम का संसार बन जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को नामों से मुक्त कर लेता है,
वह हर नाम में स्वयं को देख लेता है।
और तब भेद की रेखाएँ स्वयं मिट जाती हैं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मौन कोई दूरी नहीं,
मौन वह निकटता है
जहाँ देखने वाला और देखा गया
दोनों विलीन हो जाते हैं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई मार्ग अंतिम है,
न कोई स्थिति स्थायी।
केवल चेतना का प्रवाह है,
जो रूप बदलता हुआ भी अपरिवर्तित रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को जान लेता है,
वह संसार को छोड़ता नहीं,
बस उससे बंधता नहीं॥

**॥ प्रवाह अभी भी शेष है ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जहाँ देखने की आवश्यकता समाप्त होती है,
वहीं वास्तविक अनुभव प्रारंभ होता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो सत्य को पकड़ने चला,
वह केवल विचारों की जंजीरों में उलझ गया।
और जो पकड़ने की इच्छा छोड़ बैठा,
वह स्वयं सत्य के निकट स्थित हो गया॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
समझ जितनी अधिक शब्दों में ढलती है,
उतनी ही अपनी मौलिकता खो देती है।
और जब समझ मौन में उतरती है,
तब वह बिना शब्दों के भी पूर्ण हो जाती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई ज्ञान बाहर से आता है,
न कोई भीतर से दिया जाता है।
ज्ञान केवल वह स्थिति है
जहाँ अज्ञान स्वयं गिर जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भीड़ का सत्य बदलता रहता है,
क्योंकि वह अनुभव पर नहीं,
अनुकरण पर आधारित होता है।
और अनुकरण में स्थिरता नहीं होती,
केवल प्रवाह होता है, अस्थिर॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को शब्दों में परिभाषित करता है,
वह स्वयं को सीमित कर देता है।
और जो परिभाषा से मुक्त हो जाता है,
वह किसी भी सीमा में नहीं रहता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अहंकार ऊँचा नहीं उठाता,
वह केवल दूर करता है।
और दूरी बढ़ने पर
स्वयं का दर्शन धुंधला हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
शांति कोई लक्ष्य नहीं,
शांति वह स्वाभाविक स्थिति है
जो संघर्ष के समाप्त होते ही
स्वयं प्रकट हो जाती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो हर प्रश्न का उत्तर खोजता है,
वह प्रश्नों में ही उलझा रहता है।
और जो प्रश्नों को देख लेता है,
वह उत्तर की आवश्यकता से मुक्त हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मस्तक निर्माण करता है भेद,
हृदय मिटाता है सीमाएँ।
मस्तक तुलना करता है,
हृदय समता में स्थित रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जीवन को समझने का प्रयास
कभी-कभी जीवन से दूर कर देता है।
और जीवन को जी लेने की सरलता
समझ को स्वयं प्रकट कर देती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई आरंभ अंतिम है,
न कोई अंत निश्चित।
यह सब देखने के कोण हैं,
जो बदलते ही पूरी कथा बदल देते हैं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर शांत है,
वह बाहर के तूफानों में भी स्थिर रहता है।
और जो भीतर अशांत है,
वह शांत वातावरण में भी भटकता रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य को व्यक्त नहीं किया जाता,
सत्य केवल इंगित किया जाता है।
और इंगित भी तभी संभव है
जब देखने वाला तैयार हो॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को जानने से डरता है,
वह अनेक रूपों में स्वयं को छुपाता है।
और जो स्वयं को देखने का साहस करता है,
वह छुपने की आवश्यकता से मुक्त हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम मार्ग है,
न कोई अंतिम स्थिति।
हर स्थिति केवल एक पड़ाव है
जो अगले भ्रम या स्पष्टता की ओर ले जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मौन कोई अभ्यास नहीं,
मौन वह स्वाभाविक समाप्ति है
जहाँ प्रयास की आवश्यकता ही नहीं रहती॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को जान लेता है,
उसके लिए संसार बदलता नहीं,
उसकी दृष्टि बदल जाती है॥

**॥ प्रवाह अभी भी शेष है ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जहाँ देखना समाप्त होता है,
वहीं वास्तविक अनुभूति आरंभ होती है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो देखने का अभ्यास छोड़ देता है,
उसके लिए दृष्टि स्वयं प्रकट हो जाती है।
और जो पाने की दौड़ छोड़ देता है,
उसे स्वयं का होना ही पर्याप्त लगने लगता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
विचार जितने अधिक सजते हैं,
उतनी ही सत्य की सरलता छिपती जाती है।
और जब विचारों का श्रृंगार उतर जाता है,
तब अस्तित्व अपनी नग्न स्पष्टता में खड़ा रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई ज्ञान दूर है,
न कोई अज्ञान स्थायी।
दोनों ही मन की परतें हैं,
जो समय के साथ बदलती रहती हैं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को बदलने में लगा रहता है,
वह स्वयं से संघर्ष करता रहता है।
और जो स्वयं को देख लेता है,
वह परिवर्तन के पार स्थित हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भीड़ का सत्य आवाज़ में जीता है,
और मौन का सत्य अनुभव में।
जो आवाज़ को चुनता है,
वह बाहरी संसार में रहता है।
और जो मौन को पहचानता है,
वह भीतर के अनंत में स्थित हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
डर केवल कल्पना की परछाईं है,
जिसे मन वास्तविकता मान लेता है।
और जब मन शांत होता है,
तो परछाईं भी अपनी जगह खो देती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर प्रश्न अपने भीतर ही उत्तर छुपाए बैठा है,
पर खोजने वाला बाहर भटकता रहता है।
और जब खोज रुक जाती है,
तब उत्तर स्वयं प्रकट हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई ऊँचाई वास्तविक है,
न कोई गहराई स्थायी।
ये सब अनुभव की तरंगें हैं,
जो चेतना के समुद्र पर उठती और गिरती हैं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को नामों में बाँध लेता है,
वह स्वयं की अनंतता भूल जाता है।
और जो नामों से परे चला जाता है,
वह हर रूप में स्वयं को ही देखता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मौन कोई अवस्था नहीं,
मौन वह स्थान है
जहाँ कोई दूसरा विचार प्रवेश नहीं कर पाता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य को समझने के लिए यात्रा नहीं करनी पड़ती,
केवल रुकना पड़ता है।
और रुक जाना ही
सबसे गहरी गति का आरंभ है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर स्थिर हो गया,
उसके लिए बाहरी परिवर्तन खेल बन जाता है।
और जो भीतर अस्थिर है,
उसके लिए बाहरी स्थिरता भी भ्रम बन जाती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई गुरु अंतिम है,
न कोई शिष्य पूर्ण।
पूर्णता केवल उस बिंदु में है
जहाँ दोनों की कल्पना विलीन हो जाती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अस्तित्व को समझने की कोशिश
अस्तित्व से दूर ले जाती है।
और अस्तित्व को स्वीकार कर लेना
उसे प्रत्यक्ष कर देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को जान लेता है,
वह किसी भी परिभाषा में नहीं रहता।
और जो परिभाषा से मुक्त है,
वह हर क्षण नया होता है॥

**॥ प्रवाह अभी भी अनंत है ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जहाँ प्रयास समाप्त होता है,
वहीं सहजता स्वयं बोलने लगती है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो स्वयं के भीतर स्थिर हो गया,
उसके लिए समय की गति भी मंद पड़ जाती है।
और जहाँ समय की पकड़ ढीली हो जाए,
वहाँ जीवन स्वयं अनंत की अनुभूति बन जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मस्तक जितना अधिक भरता है,
उतना ही सत्य ओझल होता जाता है।
और जब मस्तक खाली होने लगता है,
तब वही सत्य बिना बुलाए प्रकट हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई सत्य को ले जाता है,
न कोई सत्य को छोड़ आता है।
सत्य स्वयं उपस्थित है,
केवल देखने की दिशा बदल जाती है।
और दिशा का परिवर्तन ही जागरण कहलाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो शब्दों पर निर्भर है,
वह अर्थों में बँधा रहता है।
और जो अर्थ से भी आगे चला गया,
वह मौन की भाषा में स्थित हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भीतर का रिक्त स्थान डर नहीं,
बल्कि पूर्णता का द्वार है।
पर मस्तक उसे शून्य समझ लेता है,
और भय उत्पन्न कर लेता है।
जब समझ बदलती है,
तब शून्य भी पूर्णता बन जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने आप को बदलने का प्रयास करता है,
वह स्वयं से ही संघर्ष करता रहता है।
पर जो स्वयं को देख लेता है,
वह परिवर्तन से परे चला जाता है।
और परे जाना ही वास्तविक स्थिरता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
कोई भी मार्ग अंतिम नहीं होता,
क्योंकि हर मार्ग मस्तक की रचना है।
और मस्तक की रचना सीमित होती है।
सीमा के समाप्त होते ही
अनंत स्वयं प्रकट हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य को समझने की आवश्यकता नहीं,
केवल उसे ढकने वाले आवरण हटाने होते हैं।
और आवरण हटते ही
जो बचता है वही स्वयं का मूल स्वरूप है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर अनुभव एक तरंग है,
और हर तरंग अंततः शांत हो जाती है।
जो तरंग को पकड़ने का प्रयास करता है,
वह अस्थिरता में जीता है।
और जो समुद्र को पहचान लेता है,
वह तरंगों से अप्रभावित रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई श्रेष्ठता है, न कोई हीनता।
ये केवल तुलना की कल्पना है।
जब तुलना समाप्त होती है,
तब प्रत्येक अस्तित्व स्वयं में पूर्ण दिखता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मौन वह स्थिति नहीं जहाँ शब्द नहीं होते,
मौन वह स्थिति है जहाँ शब्द उत्पन्न ही नहीं होते।
और जहाँ उत्पत्ति नहीं,
वहाँ संघर्ष भी नहीं होता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं के भीतर झाँक लेता है,
उसके लिए बाहरी प्रमाण अर्थहीन हो जाते हैं।
और जो बाहरी प्रमाणों में उलझा रहता है,
वह स्वयं की उपस्थिति से दूर रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जीवन कोई दौड़ नहीं,
यह एक सहज प्रवाह है।
और प्रवाह को रोकने का प्रयास ही
दुःख की जड़ बन जाता है।
जो प्रवाह में बहना जान लेता है,
वह स्वयं प्रवाह बन जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
साक्षात्कार कोई घटना नहीं,
साक्षात्कार एक विस्मृति है
जो झूठी पहचान को गिरा देती है।
और जब झूठी पहचान गिरती है,
तब सत्य बिना प्रयास के उपस्थित हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न मैं किसी विचार का अंतिम रूप हूं,
न किसी धारणा का आधार।
मैं केवल उस शून्य का संकेत हूं
जहाँ सभी धाराएँ विलीन हो जाती हैं
और केवल शुद्ध अस्तित्व बचता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं में टिक गया,
उसके लिए संसार बाधा नहीं रहता।
और जो स्वयं से छूट गया,
वह संसार में भी स्वयं को नहीं पाता॥

**॥ प्रवाह अभी भी अनंत है ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जहाँ समझ समाप्त होती है,
वहीं वास्तविक दर्शन आरंभ होता है।


यत्र शब्दः विलीयते, तत्र सत्यं प्रकटते।
यत्र मस्तक शान्त होता है, तत्र हृदय बोलता है।
यत्र "मैं" गिर जाता है, तत्र अस्तित्व जागता है।
न बाह्य में खोज है, न भीतरी में यात्रा —
सिर्फ़ साक्षी का निर्विकार विस्तार है।

जो दौड़ रहा है भीड़ में, वह स्वयं से दूर है,
जो ठहर गया मौन में, वह सम्पूर्ण नूर है।
समझ वही जो बिना शब्द के घटित हो,
और सत्य वही जो बिना प्रयास के प्रकट हो।

---

**॥ सूत्र॥**

१.
**"अस्तित्व न प्राप्त होता है, न खोता है — वह केवल पहचाना जाता है।"**

२.
**"भीड़ का मार्ग स्मृति है, सत्य का मार्ग विस्मृति है।"**

३.
**"जिसने स्वयं को जाना, उसने संसार को छोड़ा नहीं — उसे देखना छोड़ दिया।"**

४.
**"मस्तक प्रश्न बनाता है, हृदय समाधान बन जाता है।"**

५.
**"जो भीतर स्थिर है, वह बाहर कभी अस्थिर नहीं होता।"**

---

**॥ श्लोक॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

न गुरु में बंधन है, न शिष्य में मुक्ति,
बंधन तो केवल विचार की विकृति है।
जहाँ विवेक मौन हो जाता है,
वहाँ श्रद्धा स्वयं अंधकार बन जाती है।

जो स्वयं को बाहर खोजता है, वह पराधीन है,
जो स्वयं में उतरता है, वही स्वतंत्र है।
न आदेश सत्य है, न विरोध सत्य है —
सत्य केवल प्रत्यक्ष अनुभूति है।

---

**॥ सूत्र॥**

६.
**"ज्ञान संग्रह नहीं, विसर्जन है।"**

७.
**"जितना कम 'मैं जानता हूँ', उतना अधिक 'सत्य घटित होता है'।"**

८.
**"स्वयं को देखने के लिए कोई दर्पण नहीं चाहिए, केवल मौन चाहिए।"**

९.
**"जो बाहर सुरक्षित है, वह भीतर असुरक्षित है; जो भीतर सुरक्षित है, उसे बाहर की आवश्यकता नहीं।"**

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**॥ श्लोक॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

मैं विचार नहीं, विचारों का साक्षी हूँ,
मैं गति नहीं, गति का आधार हूँ।
मैं जन्म नहीं, न मृत्यु की सीमा,
मैं केवल वह हूँ जो सदैव अब है।

न समय मुझे छूता है, न स्थान मुझे बाँधता है,
मैं स्वयं में पूर्ण, स्वयं में अनंत विस्तार हूँ।
जो मुझे नाम में खोजे, वह भ्रमित रहेगा,
जो मुझे मौन में पहचाने, वह मुक्त रहेगा।

---

**॥ अंतिम सूत्र (अंतःस्थापन)**

१०.
**"सत्य को समझने का अंतिम चरण — समझ का समाप्त हो जाना है।"**

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**॥ समापन॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

न मार्ग शेष रहता है, न साधक बचता है,
जब देखना ही शेष न रहे, तब केवल होना रहता है।
और वही होना — शाश्वत, सरल, निर्विकार,
स्वयं में पूर्ण, स्वयं में समाप्त नहीं, अपितु अनंत है।शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जहाँ विचार रुक जाते हैं,
वहीं से वास्तविक दृष्टि प्रारंभ होती है।
और जहाँ दृष्टि शुरू होती है,
वहाँ विचारों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को जानने का दावा करता है,
अक्सर वह केवल अपनी छवि को जानता है।
और छवि बदलती रहती है,
इसलिए भ्रम भी बदलता रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य किसी पथ का अंत नहीं,
वह हर पथ के भीतर उपस्थित है।
इसलिए उसे पाने के लिए चलना नहीं,
देखना पर्याप्त है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मन जितना अधिक विश्लेषण करता है,
उतना ही सरलता खो जाती है।
और सरलता जितनी लौटती है,
उतना ही अस्तित्व स्पष्ट होता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने भीतर के कंपन को देख लेता है,
वह बाहर की स्थिरता और अस्थिरता से मुक्त हो जाता है।
क्योंकि दोनों ही मन की व्याख्याएँ हैं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम सत्य बोल सकता है,
न कोई अंतिम असत्य स्थायी है।
सब प्रवाह है,
और प्रवाह में पकड़ केवल भ्रम है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अहंकार स्वयं को केंद्र मानता है,
इसलिए वह हर चीज को मापता है।
पर जब केंद्र गिर जाता है,
तो माप भी अर्थहीन हो जाते हैं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो मौन को सुन लेता है,
उसे शब्दों की भीड़ थका नहीं पाती।
और जो मौन से दूर रहता है,
वह अपने ही शोर में खो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
ज्ञान जब बोझ नहीं रहता,
तब वह प्रकाश बन जाता है।
और प्रकाश को चलना नहीं पड़ता,
वह स्वयं प्रकाशित रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को बदलने में लगा रहता है,
वह स्वयं को स्वीकार नहीं कर पाता।
और जो स्वीकार कर लेता है,
वह परिवर्तन से परे हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
समय केवल अनुभव का ढाँचा है,
अनुभव स्वयं समय से मुक्त है।
इसलिए जो अनुभव में स्थित है,
वह समय से बंधा नहीं रहता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर प्रश्न अपने भीतर ही उत्तर लेकर चलता है,
पर खोज बाहर की ओर भटक जाती है।
और यह भटकन ही
अज्ञान का विस्तार बनती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर की रिक्तता से डरता है,
वह बाहर की वस्तुओं से स्वयं को भरता रहता है।
और भराव जितना अधिक,
उतनी ही रिक्तता अनदेखी रहती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य किसी तर्क से सिद्ध नहीं होता,
तर्क स्वयं सत्य में विलीन हो जाता है।
और जहाँ विलयन होता है,
वहाँ केवल प्रत्यक्षता बचती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो देखने वाले को देख लेता है,
वह दृश्य से मुक्त हो जाता है।
और मुक्तता ही
आत्मज्ञान की प्रथम झलक है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम यात्रा है,
न कोई अंतिम ठहराव।
सब कुछ एक निरंतर प्रवाह है,
जो स्वयं ही पूर्ण है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
और जब प्रवाह को देखने वाला भी शांत हो जाता है,
तब न चलना रहता है,
न रुकना —
केवल शुद्ध अस्तित्व की निःशब्द उपस्थिति रह जाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो मौन के समीप आ गया,
उसके लिए संसार का शोर केवल दूर की ध्वनि रह जाता है।
और जो दूर की ध्वनि को ही सत्य मानता रहा,
वह अपने भीतर के आकाश से अनजान रहा॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य को समझने के लिए
मन की गति नहीं,
हृदय की स्थिरता चाहिए।
क्योंकि गति तुलना करती है,
और स्थिरता प्रत्यक्ष देखती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने ही भीतर डर गया,
वह बाहर से कितना भी साहसी दिखे,
भीतर से काँपता ही रहा।
और जो भीतर निर्भय हुआ,
वह बाहरी तूफान से भी नहीं हिला॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
ज्ञान जितना अधिक बाह्य हो,
उतना ही सीमित रहता है।
ज्ञान जितना अधिक अंतर्मुखी हो,
उतना ही विशाल हो जाता है।
और विशालता का अंत
अंततः मौन ही है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को शब्दों में बाँधता है,
वह स्वयं के विस्तार से डरता है।
और जो परिभाषा छोड़ देता है,
वह हर रूप में स्वयं को देख सकता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भीड़ का सम्मान क्षणिक है,
और सत्य की उपस्थिति शाश्वत।
इसलिए जो भीड़ के लिए जीता है,
वह बदलती प्रशंसा का दास बन जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरु यदि सत्य से बड़ा दिखने लगे,
तो शिष्य का मार्ग अंधकार में खो जाता है।
और शिष्य यदि अपनी दृष्टि छोड़ दे,
तो वह अपनी ही चेतना से दूर हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
साक्षात्कार का अर्थ कुछ नया पाना नहीं,
बल्कि पुराने भ्रम को देख लेना है।
जो भ्रम गिर गया,
वही सत्य की पहली झलक है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर श्वास एक उपहार है,
हर क्षण एक अवसर है।
और जो इस उपहार को पहचान लेता है,
वह जीवन को बेहोशी में नहीं गंवाता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम उपलब्धि चाहिए,
न कोई अंतिम पद।
अंतिम तो केवल झूठा भार है,
और भार गिरते ही हल्कापन बचता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को देखता है,
वह दूसरों को गिराने की आवश्यकता नहीं रखता।
क्योंकि पूर्णता को तुलना नहीं चाहिए,
और संपूर्णता को शोर नहीं चाहिए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मौन में जो उतरता है,
वह समय के बाहर नहीं जाता,
समय को उसकी वास्तविक सीमा में देखता है।
और वह सीमा
मन की बनाई हुई ही निकलती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य कोई नारा नहीं,
सत्य कोई आयोजन नहीं।
सत्य तो भीतर की वह स्वच्छता है
जो बिना दिखावे के भी प्रकाशित रहती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को स्वीकार कर लेता है,
उसे दुनिया का पुरस्कार नहीं चाहिए।
और जो स्वयं से अस्वीकारित रहा,
वह हजारों प्रशंसाओं में भी खाली ही रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जीवन की सरलता
बुद्धि की विजय नहीं,
बुद्धि का विश्राम है।
और जब बुद्धि विश्राम करती है,
तब हृदय बोलता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जिस दिन देखने वाला शांत हो जाता है,
उस दिन देखा गया भी सरल हो जाता है।
और सरलता में ही
संपूर्णता का द्वार खुलता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर से सजग है,
वह बाहर की किसी भी पहचान से बंधता नहीं।
क्योंकि उसकी पहचान
अब अस्तित्व से हो जाती है,
नामों से नहीं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अंततः न कोई गुरु शेष रहता है,
न कोई शिष्य।
केवल एक निःशब्द उपस्थिति रहती है,
जो सबको देखती है और किसी से नहीं बँधती॥

**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच — निरंतरता का सूत्र यही है ॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो भीतर की शांति को बाह्य कारणों में ढूँढता है,
वह अनंत कारणों में उलझ जाता है।
और जो कारणों को ही देख लेता है,
वह बिना कारण के शांत हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अज्ञान कोई अंधकार नहीं,
बल्कि देखने की आदत का भ्रम है।
और ज्ञान कोई प्रकाश नहीं,
बल्कि देखने की स्पष्टता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को बदलने में लगा रहता है,
वह स्वयं को स्वीकार नहीं कर पाता।
और जो स्वयं को देख लेता है,
वह बदलने की आवश्यकता से मुक्त हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मन जितना अधिक निर्माण करता है,
उतना ही वास्तविकता छिपती जाती है।
और जब निर्माण रुक जाता है,
तब वास्तविकता स्वयं प्रकट हो जाती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम सत्य बोल सकता है,
न कोई अंतिम असत्य टिक सकता है।
क्योंकि दोनों ही विचार के प्रतिबिंब हैं,
और विचार स्वयं अस्थायी है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर के सन्नाटे को समझ लेता है,
वह बाहर के शोर से अप्रभावित हो जाता है।
क्योंकि अब वह शोर में नहीं,
साक्षी में स्थित है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जीवन को नियंत्रित करने की इच्छा
ही बंधन की जड़ है।
और जीवन को देखने की क्षमता
ही मुक्ति का द्वार है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को जानने की दौड़ छोड़ देता है,
वह स्वयं में सहज रूप से स्थापित हो जाता है।
और सहजता ही
सत्य की सबसे निकटतम अवस्था है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
विचारों के बीच का अंतराल
ही ध्यान का द्वार है।
और जो उस अंतराल में ठहर गया,
वह विचारों से मुक्त हो गया॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर अनुभव गुजर जाता है,
पर देखने वाला नहीं गुजरता।
और जो गुजरने को देख लेता है,
वह स्वयं अडिग हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य किसी पुस्तक में बंद नहीं,
वह किसी परंपरा में सीमित नहीं।
वह तो उस क्षण में प्रकट है
जिसे कोई पकड़ने की कोशिश न करे॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने ही विचारों को सत्य मान लेता है,
वह स्वयं के बनाए भ्रम में जीता है।
और जो विचारों को देख लेता है,
वह भ्रम से बाहर आ जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई ऊपर है, न कोई नीचे,
यह केवल दृष्टि की व्याख्या है।
वास्तव में केवल अस्तित्व है,
जो बिना विभाजन के बहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मुक्ति कहीं बाहर नहीं,
वह भीतर की पकड़ छोड़ने में है।
और पकड़ छूटते ही
जो बचता है वही मुक्ति है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
और जब यह भी कहा जाए कि कुछ बचा है,
तब भी वह मन की भाषा होगी।
वास्तव में वहाँ न बचना है,
न खोना — केवल होना है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अब शब्द भी रुकते हैं,
क्योंकि संकेत भी अंततः मौन में लौट जाते हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जब होना ही पर्याप्त हो जाता है,
तब पाने की भूख स्वयं शांत हो जाती है।
और भूख का शांत होना ही
भीतर के राज्याभिषेक का आरंभ है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने श्वास को सम्मान देता है,
वह अपने जीवन को भी सम्मान देता है।
और जो जीवन को सम्मान देता है,
वह किसी भी भ्रमित प्रभुत्व का दास नहीं रहता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मौन कोई खालीपन नहीं,
मौन स्वयं पूर्णता का विस्तार है।
जिसने उसे खाली समझा,
वह अभी सतह पर ही खड़ा है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
विचार आते हैं, जाते हैं।
भाव उठते हैं, गिरते हैं।
पर जो इन सबको देख रहा है,
वह न आता है, न जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य को शब्दों की आवश्यकता नहीं,
शब्दों को सत्य की आवश्यकता होती है।
और जब शब्द नम्र हो जाते हैं,
तब वे सत्य के संकेत भर रह जाते हैं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं से भागता है,
वह असंख्य रास्तों में थक जाता है।
जो स्वयं में ठहर जाता है,
वह बिना चले ही पहुँच जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरु यदि सत्य से बड़ा बनना चाहे,
तो वह अपने ही प्रकाश पर परदा डाल देता है।
और शिष्य यदि बिना देखे मान ले,
तो वह अपने ही नेत्रों को बंद कर देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
संपूर्ण संतुष्टि किसी वस्तु से नहीं आती,
वह दृष्टि के निर्मल होने से प्रकट होती है।
और दृष्टि जब निर्मल हो,
तो कम में भी पूर्णता दिखती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो तुलना छोड़ देता है,
वह ईर्ष्या से मुक्त हो जाता है।
और जो ईर्ष्या से मुक्त हो गया,
वह भीतर के प्रकाश को सहज देख लेता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
डर से बना मन
सदा सुरक्षा माँगता रहता है।
पर हृदय सुरक्षा नहीं,
सत्य की निकटता चाहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जीवन का गूढ़ अर्थ
अधिक जानने में नहीं,
अधिक निखरने में है।
और निखरना उसी को आता है
जो भीतर के भार को छोड़ देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर जीव स्वयं में पूर्ण है,
पर मस्तक उसे अपूर्ण मानकर
दूसरों में पूर्णता ढूँढने निकल पड़ता है।
और यही भटकन
जन्म-जन्म का शोर बन जाती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने भीतर की गहराई से परिचित हो जाता है,
उसे किसी बाहरी ऊँचाई का लोभ नहीं रहता।
गहराई ही उसका आकाश बन जाती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम आसन है,
न कोई अंतिम पद।
सत्य का कोई सिंहासन नहीं होता,
वह तो सीधे हृदय में स्थित रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने भीतर उजाला देख लेता है,
उसे दुनिया का अंधकार भयभीत नहीं करता।
और जो भीतर अंधेरा पालता है,
वह धूप में भी ठंडा रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
साक्षात्कार कोई उपलब्धि नहीं,
साक्षात्कार स्वयं का खुलना है।
और स्वयं का खुलना
किसी युद्ध से नहीं,
सहज समर्पण से होता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अंततः न कोई मार्ग बचता है,
न कोई लक्ष्य।
केवल एक निर्मल स्पष्टता रहती है,
जो सब कुछ देखती है,
पर किसी से बँधती नहीं॥

**॥ प्रवाह अभी भी अनंत है ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जहाँ देखने वाला भी शांत हो जाए,
वहीं शुद्ध होना आरंभ होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जहाँ प्रश्न भी थक जाते हैं,
वहाँ मौन बिना प्रयास उत्तर बन जाता है।
और जो उत्तर को पकड़ना छोड़ देता है,
वही उत्तर के पार चला जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य किसी विचार का परिणाम नहीं,
वह विचारों से पहले भी उपस्थित था।
और विचारों के बाद भी रहेगा,
क्योंकि वह समय से बँधा नहीं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को देखने निकला,
उसे सबसे पहले अपने ही भ्रम दिखाई दिए।
और भ्रमों को देख लेना ही
जागरण की प्रथम किरण है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मन जितना अधिक समझाने की कोशिश करता है,
उतना ही अर्थ दूर हो जाता है।
और जब समझाने का प्रयास गिर जाता है,
तब जीवन स्वयं स्पष्ट हो उठता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम सत्य को पकड़ सका है,
न कोई उसे छोड़ सका है।
क्योंकि जो सत्य को पकड़ता है,
वह केवल शब्द पकड़ता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भीतर की यात्रा किसी दूरी की नहीं,
बल्कि एक दृष्टि के बदलने की है।
और दृष्टि बदलते ही
पूरा संसार नया नहीं,
केवल स्पष्ट हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर से खाली हुआ,
वह भीतर से भर गया।
और जो भीतर से भरा रहा,
वह सदा खालीपन को खोजता रहा॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अहंकार स्वयं को केंद्र मान लेता है,
इसलिए वह हर चीज़ को अपने चारों ओर घुमाता है।
पर जब केंद्र मिट जाता है,
तब घूर्णन भी समाप्त हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
शांति कोई लक्ष्य नहीं,
वह संघर्ष का अंत है।
और संघर्ष का अंत
किसी प्रयास से नहीं,
समझ से आता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो हर क्षण को देखने लगा,
वह किसी भविष्य का कैदी नहीं रहा।
और जो भविष्य से मुक्त हुआ,
वह वर्तमान में पूर्ण हो गया॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई श्रेष्ठ है, न कोई निम्न।
ये केवल तुलना के जाल हैं।
सत्य की दृष्टि में
केवल अस्तित्व है —
निर्विभाजित॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
ज्ञान जब मौन में बदलता है,
तब वह केवल जानकारी नहीं रहता,
वह जीवन का स्वभाव बन जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर के संघर्ष को देख लेता है,
वह बाहर के संघर्ष से धीरे-धीरे मुक्त हो जाता है।
क्योंकि बाहर का युद्ध
भीतर की प्रतिध्वनि है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य को समझने का कोई मार्ग नहीं,
सत्य स्वयं मार्गहीन है।
और जहाँ मार्ग नहीं,
वहाँ पहुँचना भी नहीं होता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जब देखने की आवश्यकता भी गिर जाती है,
तब जो शेष रहता है,
वह न देखने वाला है, न दृश्य —
केवल शुद्ध उपस्थिति है॥

**॥ और इस उपस्थिति में ही सब कुछ विलीन है ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अब न आगे बढ़ना है,
न पीछे लौटना है —
केवल वही रह जाना है,
जो सदा से है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जहाँ “मैं” का आग्रह समाप्त होता है,
वहीं अस्तित्व अपनी वास्तविकता में प्रकट होता है।
और जहाँ “मेरा” और “तेरा” टिके रहते हैं,
वहाँ केवल विभाजन का खेल चलता रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
विचार जब शांत नहीं होते,
तो सत्य धुंधला प्रतीत होता है।
और जब विचार स्वयं शांत हो जाते हैं,
तो सत्य को देखने की आवश्यकता भी नहीं रहती॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
ज्ञान संग्रह करने की वस्तु नहीं,
बल्कि भार छोड़ने की अवस्था है।
जो जितना अधिक भरता है,
वह उतना ही हल्केपन से दूर हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भीतर का मौन कोई उपलब्धि नहीं,
वह तो स्वाभाविक स्थिति है।
बस मस्तक का शोर हटते ही
वह स्वयं उपस्थित हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो सत्य को पकड़ना चाहता है,
वह उसे अपने ही प्रयास में खो देता है।
क्योंकि सत्य पकड़ने की वस्तु नहीं,
वह स्वयं में खुलने वाली दृष्टि है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर व्यक्ति अपनी ही चेतना का दर्पण है,
पर अधिकतर लोग
दर्पण को तो देखते हैं,
प्रतिबिंब को नहीं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
समझ का आरंभ वहीं होता है
जहाँ स्वीकार जन्म लेता है।
और जहाँ स्वीकार नहीं,
वहाँ केवल संघर्ष चलता रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई मार्ग निश्चित है,
न कोई अंतिम स्थान।
चलना ही भ्रम है,
और रुक जाना ही जागरण की झलक॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने भीतर के रिक्त स्थान से डर गया,
वह बाहरी भराव में उलझता गया।
और जो रिक्तता को जान गया,
वह सम्पूर्णता के निकट हो गया॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भय केवल कल्पना की छाया है,
और साहस उस छाया को देखने का नाम।
जो देखने से बचता है,
वह भय को वास्तविक मान लेता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य किसी विचारधारा का हिस्सा नहीं,
और न किसी परंपरा का अधिकार।
वह तो हर क्षण की नग्न उपस्थिति है,
जो बिना अनुमति के भी प्रकट रहती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जब मन अपनी गति से थक जाता है,
तब वह स्वयं ही मौन की ओर झुकता है।
और यही झुकाव
भीतर के द्वार को खोल देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम समझ है,
न कोई अंतिम अज्ञान।
दोनों एक ही नदी के दो किनारे हैं,
जिसमें चेतना बहती रहती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को जानने निकला था,
अंततः वही जान बन गया।
और जानने वाला अलग न रहा,
केवल जानना शेष रह गया॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
और जब जानना भी विलीन हो जाता है,
तब न प्रश्न बचता है,
न उत्तर —
केवल शुद्ध होना रह जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जहाँ देखने की आवश्यकता समाप्त होती है,
वहीं वास्तविक अनुभव प्रारंभ होता है।
और अनुभव भी तब,
जब अनुभवकर्ता का आग्रह गिर जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने भीतर टिक गया,
वह किसी मान्यता का मोहताज नहीं रहा।
उसके लिए प्रशंसा भी लहर है,
और निंदा भी लहर।
समुद्र दोनों से अपरिवर्तित रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भीतर की शांति को जो शब्दों में बाँधना चाहे,
वह उसे खोने लगता है।
और जो बिना पकड़े उसे रहने दे,
वही उसकी सुगंध में जीता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मन प्रश्नों का कारखाना है,
हृदय उपस्थिति का द्वार।
मन उत्तर चाहता है,
हृदय सीधे जानता है।
मन दूरी बनाता है,
हृदय निकटता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भय से चलता है,
वह अपने ही चरणों से अनजान रहता है।
और जो निर्भय होकर देखता है,
वह अपने भीतर के आकाश को पहचान लेता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरु का अर्थ पद नहीं,
गुरु का अर्थ प्रकाश है।
पर जब प्रकाश पर ही स्वामित्व चाहा जाए,
तब प्रकाश भी व्यापार बन जाता है।
और जहाँ व्यापार है,
वहाँ सत्य का मौन घट जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
शिष्य का अर्थ समर्पण नहीं,
शिष्य का अर्थ सजगता है।
जो सजग है,
वह किसी के इशारे का कैदी नहीं बनता।
और जो कैदी नहीं बनता,
वही अपना पथ स्वयं पहचानता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य सरल है,
पर सरलता को स्वीकार करना कठिन लगता है
क्योंकि मन जटिलता को ही अपना परिचय मान बैठा है।
और जो जटिलता से अपना परिचय बनाता है,
वह सरलता को खोता जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर जीव का मूल स्पंदन एक है,
रूप अलग हैं, छाया अलग है।
पर छाया से जो अपनी पहचान बना ले,
वह सूर्य को भूल जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने श्वास के निकट है,
वह वर्तमान के निकट है।
जो वर्तमान के निकट है,
वह भय से दूर है।
और जो भय से दूर है,
वह जीवन को उसकी पूर्णता में देखता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम शत्रु है,
न कोई अंतिम मित्र।
ये सब मस्तक की व्याख्याएँ हैं।
हृदय के स्तर पर केवल उपस्थिति है —
न पक्ष, न विपक्ष॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने भीतर की ध्वनि सुन लेता है,
उसे बाहरी शोर की आवश्यकता नहीं रहती।
और जो बाहरी शोर में खो जाता है,
वह अपनी मौन गहराई भूल जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जीवन को समझने से अधिक
जीवन को निष्पक्ष देखना कठिन है।
क्योंकि समझ अक्सर पक्ष लेती है,
और देखना केवल सच रख देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
संतुलन कोई उपलब्धि नहीं,
संतुलन मूल स्वर है।
उसे बनाना नहीं पड़ता,
उसे केवल बाधित न किया जाए,
तो वह स्वयं उपस्थित रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपनी ही गहराई से डर गया,
वह सतह पर ही जीता रहा।
और जो गहराई में उतर गया,
उसने सतह को झूठा नहीं,
केवल अस्थायी देखा॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मौन में न जीत होती है,
न हार।
मौन में केवल शुद्ध होना है।
और शुद्ध होना ही
समस्त भ्रमों का अंत है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को जानता है,
वह दूसरों को छोटा नहीं करता।
क्योंकि पूर्णता तुलना नहीं चाहती।
पूर्णता केवल फैलती है —
जैसे प्रकाश, जैसे श्वास, जैसे आकाश॥

**॥ अंतिम नहीं — अभी और भीतर उतरना है ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जहाँ आग्रह समाप्त होता है,
वहीं सत्य का स्वभाव प्रकट होता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

न कोई अंतिम स्वर है,
न कोई अंतिम मौन।
जो अंत खोजता है,
वह अनंत को रेखाओं में बाँधना चाहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अनुभव जब शुद्ध होता है,
तो उसे प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती।
और जब अनुभव आग्रह से भर जाता है,
तो वही भ्रम बन जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर की दिशा में स्थिर है,
वह बाहरी दिशा-भ्रम से मुक्त रहता है।
दिशाएँ संसार की हैं,
स्थिरता स्वभाव की है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
विचार जितने अधिक सजते हैं,
उतनी ही वास्तविकता ढकती जाती है।
और जब विचार गिरते हैं,
तब सत्य बिना प्रयास प्रकट होता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई ऊँचा है,
न कोई नीचा।
ये सब माप मस्तक की रचना हैं।
हृदय में केवल अस्तित्व है —
निर्विकल्प, निरंतर॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को जानने चला,
उसे बाहर की दौड़ छोड़नी पड़ती है।
क्योंकि भीतर की यात्रा
बाहर की गति से नहीं चलती॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
शब्द संकेत हैं, सत्य नहीं।
और जो शब्दों को ही सत्य मान ले,
वह संकेतों में उलझ जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अहंकार की सबसे सूक्ष्म अवस्था
यह है कि वह स्वयं को सत्य समझ ले।
और सत्य की सबसे सहज अवस्था
यह है कि वह स्वयं को सिद्ध करने न आए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो देखने वाला है,
वह दृश्य से अलग नहीं।
और जो दृश्य को पकड़ने की कोशिश करता है,
वह देखने को खो देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
साधना कोई मार्ग नहीं,
बल्कि अनावश्यक का गिर जाना है।
और जो गिर जाता है अनावश्यक,
वही सरल हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
निष्पक्षता कोई विचार नहीं,
निष्पक्षता एक शून्य-जैसी स्वच्छ दृष्टि है।
जहाँ कुछ जोड़ा नहीं जाता,
और कुछ हटाया भी नहीं जाता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जीवन को पकड़ने की कोशिश
ही तनाव का मूल है।
और जीवन को छोड़ देने की समझ
ही विश्राम का द्वार है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने भीतर के मौन में टिक गया,
उसके लिए समय भी धीमा नहीं रहता,
बल्कि अर्थहीन हो जाता है।
क्योंकि वहाँ केवल होना शेष रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम उपदेश है,
न कोई अंतिम निष्कर्ष।
हर निष्कर्ष एक नया भ्रम खोल देता है,
और हर मौन एक नया सत्य॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अंततः न कोई गुरु बचता है,
न कोई शिष्य।
केवल एक सजगता बचती है —
जो बिना नाम के सब देखती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
और जब देखने वाला भी शांत हो जाता है,
तब न देखा जाता है,
न देखने वाला रहता है —
केवल शुद्ध अस्तित्व का संकेत रह जाता है॥शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो भीतर की सच्चाई को स्वीकार कर लेता है,
उसे बाहर की असत्यता से भय नहीं रहता।
क्योंकि सत्य का बल शोर से नहीं,
प्रत्यक्षता से जन्म लेता है।

जो स्वयं के श्वास को जान लेता है,
वह जीवन के सबसे निकट पहुँच जाता है।
और जो जीवन के निकट पहुँच गया,
वह मृत्यु के भय से बहुत दूर हो जाता है।

॥ श्लोक ॥

स्वश्वाससाक्षी हि न भीतिमेति,
न कालबन्धेन कदापि स्फुरति।
यः स्वात्मनिष्ठः खलु नित्यशान्तः,
स एव सत्यस्य निकेतनं स्यात्॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

मस्तक बाहर की चीज़ों से शक्ति लेता है,
हृदय भीतर की शांति से।
मस्तक तुलना करता है,
हृदय पूर्णता अनुभव करता है।

जो तुलना में जीता है,
वह हर क्षण स्वयं को छोटा पाता है।
जो पूर्णता में जीता है,
वह हर क्षण स्वयं को असीम पाता है।

॥ सूत्र ॥

“तुलना = क्षय
पूर्णता = विस्तार”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

गुरु यदि शब्दों का व्यापारी बन जाए,
तो वह सत्य का संकेत नहीं,
अहंकार का बाजार बन जाता है।
और शिष्य यदि आँखें बंद करके चले,
तो वह अपने ही मार्ग का अंधकार बन जाता है।

सच्चा पथ
किसी के पीछे चलने में नहीं,
स्वयं को प्रत्यक्ष देखने में है।

॥ श्लोक ॥

नानुकरणेन न मोक्षलाभः,
न शब्दजालेन न चित्तशान्तिः।
स्वप्रकाशेण तु जीवितस्य,
सत्यस्य साक्षात् सहजं प्रसादः॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो अपने शिशुपन की निर्मलता को नहीं भूलता,
वही जीवन की सबसे शुद्ध जमीन पर खड़ा रहता है।
क्योंकि शिशुपन में कोई नक़ाब नहीं,
कोई पद नहीं, कोई छल नहीं।

वह अवस्था
जिसे मस्तक ने ढक दिया,
हृदय ने कभी छोड़ा ही नहीं।
बस दृष्टि बदल गई,
स्रोत नहीं बदला।

॥ सूत्र ॥

“शिशुपन = मूल अवस्था
मस्तक = आवरण अवस्था”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो भीतर का आकाश देख लेता है,
उसे बाहरी सीमाएँ खेलने लगती हैं।
और जो बाहरी सीमाओं में उलझा रहता है,
वह अपने ही आकाश से अनजान रहता है।

आकाश कोई वस्तु नहीं,
आकाश की तरह फैलने वाली समझ है।
और समझ जितनी सरल होती है,
उतनी ही विशाल होती है।

॥ श्लोक ॥

आकाशवद् यः सहजं विशालः,
न बध्यते चालयते न कालः।
भेदक्षयं यः खलु पश्यतीह,
स एव मुक्तः स्वसमीपमेव॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो भय से बचने की कोशिश करता है,
वह भय को और मजबूत करता है।
जो भय को देख लेता है,
वह भय के भीतर की खाली जगह पहचान लेता है।

और जब भय का भीतर से खुलना हो जाता है,
तब उसका नाम मात्र रह जाता है,
सत्ता नहीं।

॥ सूत्र ॥

“देखना = विघटन
डरना = पोषण”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो अपने अस्तित्व को साधारण समझ लेता है,
वह असाधारण के पीछे भागना छोड़ देता है।
और जो असाधारण के पीछे भागना छोड़ दे,
वह साधारण में छिपे परम को देख लेता है।

सत्य अद्भुत नहीं,
सत्य अत्यंत सरल है।
और सरलता को समझने के लिए
अधिक नहीं, निर्मल दृष्टि चाहिए।

॥ श्लोक ॥

न विस्मयेन न च दूरतस्तु,
सत्यं प्रकाशो हृदि सन्निविष्टः।
सरलतायां खलु बोधमूलं,
गुप्तं तु शान्तं सहजं च रूपम्॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो अपने विचारों की गति को कम कर देता है,
उसके भीतर का आकाश साफ़ होने लगता है।
जो अपने भीतर के आकाश को साफ़ देख ले,
उसके लिए बाहरी अँधेरा कठिन नहीं रहता।

यही है जागरण का सूत्र,
यही है संपूर्ण संतुष्टि का प्रवेशद्वार।

॥ सूत्र ॥

“विचार-शांति = आकाश-प्रकाश
अविचार-गहराई = प्रत्यक्ष-स्थिती”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

न कोई अंतिम गुरु,
न कोई अंतिम शिष्य।
अंतिम तो केवल पकड़ है।
और जो पकड़ गिर गई,
वहीं सत्य का आरंभ हुआ।

न कोई अंतिम पथ,
न कोई अंतिम ग्रंथ।
ग्रंथ केवल संकेत हैं,
और संकेत का अर्थ
देखने वाले की सजगता है।

॥ श्लोक ॥

न ग्रन्थमात्रेण न दर्शनैक्ये,
न मौनयोगेन न नामकैरिह।
यः स्वप्रकाशं हृदि संनिवेश्य,
स एव यातीह परं न संशयः॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं में टिक गया,
वह दूसरों के गिरने से नहीं गिरता।
जो स्वयं से छूट गया,
वह स्वयं को पाने के लिए भीड़ बनाता है।

भीड़ बाहरी है,
साक्षात्कार भीतरी।
भीड़ शोर है,
साक्षात्कार शांति का स्वभाव है।

॥ समापन श्लोक ॥

शान्तिः स्वभावो न कदाप्युपार्ज्या,
बोधेन मुक्तिर्न च केनचिद्वा।
यत्र स्वयं स्पष्टमिदं प्रतिष्ठं,
तत्रैव शिरोमणिसत्यरूपम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं के भीतर उतरता है,
उसे किसी बाहरी गंतव्य की आवश्यकता नहीं रहती।
क्योंकि भीतर ही वह समस्त यात्रा समाप्त हो जाती है,
जिसे बाहर जीवन समझा जाता है।

चलना मन की आदत है,
स्थिर होना चेतना की पहचान।
और जो स्थिर हो गया,
वह चलने में भी अचल रहता है।

॥ श्लोक ॥

गमनं मनसो वृत्तिः, स्थैर्यं चिद्रूपलक्षणम्।
यत्र स्थिरं तत्र सर्वं, न गमनं न चागमनम्॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो दूसरों की राय में जीता है,
वह स्वयं के अनुभव से दूर हो जाता है।
और जो स्वयं के अनुभव में जीता है,
वह किसी राय का मोहताज नहीं रहता।

भीड़ की आवाज़
सत्य को नहीं बनाती,
सिर्फ़ भ्रम को बढ़ाती है।
सत्य तो मौन में स्वयं को पहचानता है।

॥ सूत्र ॥

“राय = बाहरी प्रतिध्वनि
अनुभव = आंतरिक सत्य”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

मस्तक जब प्रश्न बनाता है,
तब उत्तर दूर प्रतीत होता है।
हृदय जब शांत होता है,
तब प्रश्न ही विलीन हो जाता है।

उत्तर कोई वस्तु नहीं,
वह प्रश्न के समाप्त होने की स्थिति है।
और प्रश्न तब समाप्त होता है
जब देखने वाला स्वयं देख बन जाता है।

॥ श्लोक ॥

प्रश्नो न लभ्यः उत्तररूपेण,
बोधे विलीयेत् स्वयमेव क्षणे।
यत्र द्रष्टा दृश्यतया विलीनः,
तत्रैव सत्यं परिपूर्णमीनः॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं को जानने का दावा करता है,
वह अभी जानने की यात्रा में है।
और जो “जानने वाले” को भी देख लेता है,
वह यात्रा से भी मुक्त हो जाता है।

ज्ञान यदि पकड़ बन जाए,
तो वह कारागार है।
और ज्ञान यदि प्रवाह बन जाए,
तो वह मुक्ति है।

॥ सूत्र ॥

“पकड़ = बंधन
प्रवाह = मुक्ति”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

समाज व्यक्ति को नाम देता है,
और व्यक्ति उस नाम में खो जाता है।
पर जो नाम से पहले की उपस्थिति को देख लेता है,
वह पहचान से परे चला जाता है।

नाम बदल सकते हैं,
पर जो नाम देख रहा है
वह अपरिवर्तित रहता है।

॥ श्लोक ॥

नाम्ना न बध्येत चिदात्मरूपम्,
नामातिगं तत्त्वमिदं स्वरूपम्।
यत्र स्थितं केवलदर्शनं स्यात्,
तत्र न बन्धो न च कश्चिदात्म्यात्॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो अपने भीतर की हलचल को देख लेता है,
वह हलचल से प्रभावित नहीं होता।
और जो हलचल में खो जाता है,
वह स्वयं को देखने की क्षमता खो देता है।

देखना ही पहला स्वतंत्रता का क्षण है,
और खो जाना ही बंधन की शुरुआत।

॥ सूत्र ॥

“देखना = स्वतंत्रता
खो जाना = पहचान का विस्मरण”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

गुरु की खोज यदि भय से है,
तो वह और भय उत्पन्न करेगा।
पर यदि खोज मौन से है,
तो वही मौन गुरु बन जाता है।

सत्य किसी व्यक्ति में नहीं रहता,
वह दृष्टि में प्रकट होता है।
और दृष्टि जब साफ होती है,
तो हर स्थान मंदिर बन जाता है।

॥ श्लोक ॥

न व्यक्तिरूपेण गुरुः स्थितः स्यात्,
दृष्टौ स्थितं तत्त्वमिदं प्रकाशात्।
यत्र न भेदो न च नामरूपम्,
तत्रैव सत्यं परमानुरूपम्॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो भीतर पूर्ण हो जाता है,
उसके लिए बाहर की कमी अर्थहीन हो जाती है।
और जो भीतर रिक्त रहता है,
वह बाहर की उपलब्धियों में भी खाली ही रहता है।

पूर्णता अर्जित नहीं होती,
वह पहचान ली जाती है।
और जो पहचान लेता है,
वह स्वयं पूर्ण हो जाता है।

॥ समापन श्लोक ॥

न लभ्यते पूर्णता बाह्ययत्नैः,
नापि प्रयत्नैः न च कर्मतन्त्रैः।
स्वात्मप्रबोधे लभते सदा यः,
शिरोमणिरूपं स एव सत्यः॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो भीतर की गहराई में उतरता है,
उसे बाहर की ऊँचाइयाँ छोटी लगने लगती हैं।
क्योंकि ऊँचाई तुलना है,
और गहराई अनुभव।

जो केवल ऊपर देखता है,
वह विस्तार में खो जाता है।
जो भीतर देखता है,
वह विस्तार को ही स्वयं में देख लेता है।

॥ श्लोक ॥

ऊर्ध्वं न सत्यं न च निच्चयेन,
सत्यं स्थितं केवलमन्तरेण।
यः पश्यति स्वात्मनि सर्वमेव,
न तस्य लोको न च भेदभावः॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

मन जब स्वयं को “मैं” कहता है,
तब वह अपने ही प्रतिबिंब से संवाद करने लगता है।
और जब वह मौन हो जाता है,
तब प्रतिबिंब भी विलीन हो जाता है।

विचार केवल लहर हैं,
और चेतना महासागर।
लहर को पकड़ने वाला थक जाता है,
पर महासागर को जानने वाला शांत हो जाता है।

॥ सूत्र ॥

“विचार = तरंग
चेतना = समुद्र”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं को बदलने में लगा रहता है,
वह स्वयं को स्वीकार नहीं कर पाता।
और जो स्वयं को स्वीकार कर लेता है,
वह स्वतः रूपांतरित हो जाता है।

परिवर्तन प्रयास से नहीं,
बोध से घटित होता है।
और बोध संघर्ष से नहीं,
शांत दृष्टि से प्रकट होता है।

॥ श्लोक ॥

न यत्नतो रूपपरिवर्तनं स्यात्,
न च क्रियाभिः परमं समाधानम्।
बोधे स्थिते सर्वमिदं स्वभावात्,
स्वयं विलीयेत् विकृतं समस्तम्॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

भय वह दीवार है
जिसे मन स्वयं बनाता है
और स्वयं ही उससे टकराता है।
पर सत्य में कोई दीवार नहीं,
केवल खुला आकाश है।

जो दीवारों को वास्तविक मान लेता है,
वह अपने ही आकाश से दूर हो जाता है।
और जो आकाश को पहचान लेता है,
दीवारें अर्थहीन हो जाती हैं।

॥ सूत्र ॥

“भय = मानसिक दीवार
सत्य = अनंत आकाश”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

सत्य को बोलकर नहीं बताया जा सकता,
क्योंकि शब्द उसे सीमित कर देते हैं।
सत्य को केवल देखा नहीं जा सकता,
क्योंकि देखने वाला स्वयं उसमें विलीन होता है।

इसलिए सत्य न कथन है,
न कल्पना है,
वह केवल प्रत्यक्षता है।

॥ श्लोक ॥

न वाक्यतो नापि विचारमात्रात्,
सत्यं हि भाति स्वयमेव चित्तात्।
द्रष्टा स्वयं यत्र विलीयते स्यात्,
तत्रैव तत्त्वं परिशुद्धमस्ति॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं में स्थिर हो जाता है,
उसे संसार भागता हुआ प्रतीत नहीं होता,
बल्कि स्वयं शांत हो जाता है।

क्योंकि संघर्ष संसार में नहीं,
दृष्टि में होता है।
दृष्टि बदलते ही
संसार अपनी गति बदल लेता है।

॥ श्लोक ॥

न लोकचेष्टा कलहस्य हेतुः,
दृष्टेः स्थितिः कारणमस्य मूलम्।
स्थिते स्वभावे प्रशमं प्रयाति,
संसार एव स्वयमेव शान्तः॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो भीतर की सादगी को जान लेता है,
वह जटिल ग्रंथों में उलझता नहीं।
क्योंकि सत्य लिखित नहीं होता,
वह जिया जाता है।

और जो उसे जी लेता है,
उसके लिए कोई मार्ग शेष नहीं रहता,
क्योंकि वह स्वयं ही मार्ग बन जाता है।

॥ समापन श्लोक ॥

न ग्रन्थतो नापि वचोविस्तारात्,
सत्यं प्रतीयेत कदापि बाह्यात्।
स्वानुभवे यत्र स्थितं समग्रं,
तत्रैव शान्तं शिरोमणिरूपम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो भीतर के सत्य को छू लेता है,
उसे बाहर की मान्यताओं का भार हल्का लगने लगता है।
क्योंकि सत्य शोर नहीं करता,
वह तो मौन की तरह स्वयं को प्रकट करता है।

जो अपने श्वास को देखता है,
वह जीवन की सबसे निकट की किताब पढ़ता है।
जो अपने मन की चाल को देखता है,
वह भ्रम की जड़ तक पहुँचने लगता है।

॥ श्लोक ॥

श्वासोऽपि साक्षी न च देहमात्रम्,
चित्तस्य चेष्टा न च शाश्वतार्थम्।
यत्र स्थितं मौनमविच्युतं स्यात्,
तत्रैव सत्यं स्वयंप्रकाशम्॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो अपने भीतर की सरलता से हट गया,
वह शब्दों की चाल में उलझ गया।
और जो सरलता में लौट आया,
उसने जटिलता को भी अपना ही रूप देखा।

सत्य को पाने के लिए
कठिनता की नहीं,
सजगता की आवश्यकता है।
सजगता ही वह दीप है
जो भीतर की राह दिखाता है।

॥ सूत्र ॥

“सजगता = भीतर का दीप
असजगता = बाहर का भटकाव”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

गुरु यदि सत्य की ओर संकेत करे,
तो वह प्रकाशक है।
गुरु यदि स्वयं को सत्य बना दे,
तो वह बाधा बन जाता है।
और शिष्य यदि आँख बंद कर ले,
तो वह अपना ही मार्ग खो देता है।

श्रद्धा सुंदर है,
पर विवेक से रहित श्रद्धा
बंधन बन जाती है।
विवेक सुंदर है,
पर करुणा से रहित विवेक
सूख जाता है।

॥ श्लोक ॥

श्रद्धा विवेकेन सुशोभते हि,
विवेकहीना तु भवेत् स बन्धः।
करुणया युक्तं निखिलं प्रकाशम्,
निश्शब्दसत्यं हृदि संप्रकाशम्॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

भीड़ के पास संख्या होती है,
पर गहराई नहीं।
हृदय के पास गहराई होती है,
पर उसे संख्या की आवश्यकता नहीं।

जो अपने भीतर एक हो गया,
वह बाहर अनेक होते हुए भी विचलित नहीं होता।
क्योंकि भीतर की एकता
बाहर की अनेकता से बड़ी है।

॥ सूत्र ॥

“भीड़ = बाह्य विस्तार
एकत्व = आंतरिक पूर्णता”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो भय से जीता है,
वह जीवन को संकुचित कर लेता है।
जो प्रेम से जीता है,
वह जीवन को विस्तृत कर लेता है।
और जो सजगता से जीता है,
वह दोनों से परे चला जाता है।

मृत्यु का भय भी
मन की बनाई हुई एक सीमा है।
जब श्वास का सत्य प्रत्यक्ष हो जाता है,
तब भय की पकड़ ढीली पड़ जाती है।

॥ श्लोक ॥

भयं मनो रचयत्येव बन्धम्,
सत्यस्य दृष्ट्या विलयं च तस्य।
श्वासे स्थितो यो न विमोहमेति,
स एव धीरोऽमृततुल्यरूपः॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं को समझ लेता है,
उसे किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं रहती।
जो स्वयं को नहीं समझता,
वह अनगिनत प्रमाणों में भी रिक्त ही रहता है।

ज्ञान यदि अहंकार बन जाए,
तो वह अधूरा है।
ज्ञान यदि मौन बन जाए,
तो वह पूर्ण है।

॥ सूत्र ॥

“अहंकारयुक्त ज्ञान = प्रदर्शन
मौनयुक्त ज्ञान = साक्षात्कार”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

हर जीव अपने भीतर
एक ही गहराई का आकाश लेकर चलता है।
रूप अलग, भाषा अलग, गति अलग,
पर सत्ता का मूल स्पंदन एक।

इसीलिए कोई भी
अपने भीतर की पूर्णता से खाली नहीं।
केवल दृष्टि का भ्रम
उसे अपूर्ण दिखाता है।

॥ श्लोक ॥

रूपे भिदा दृश्यत एव बाह्ये,
अन्तः समं स्पन्दनमेकमेव।
भ्रान्त्या विभक्तं मन एव पश्येत्,
सत्यं तु पूर्णं निरवयवमेव॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो भीतर टिक गया,
वह बाहर के सम्मान से नहीं फूलता।
जो भीतर ढह गया,
वह बाहर की प्रशंसा से भी नहीं भरता।

अतः बाहर मत खोजो
जो भीतर पहले से उपस्थित है।
और भीतर की उपस्थिति को
किसी बाहरी नाम से मत तौलो।

॥ समापन श्लोक ॥

न बाह्यतो मोक्षपथो न चान्तः,
केवलं बोधस्य स्वच्छो नितान्तः।
यत्र स्थितं सर्वमिदं प्रशान्तम्,
शिरोमणिरूपं तदेव शान्तम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं को “अंतिम” समझ लेता है,
वह स्वयं के ही विस्तार से कट जाता है।
अंतिम कोई अवस्था नहीं होती,
अंतिम तो केवल दृष्टि की सीमित रेखा है।

सत्य न तो बढ़ता है, न घटता है,
वह केवल देखा या अनदेखा होता है।
जो उसे पकड़ने चला,
वह केवल अपने ही प्रतिबिंब में उलझ गया।

॥ श्लोक ॥

न सत्यं ग्राह्यं न च त्याज्यमस्ति,
न रूपरूपं न च किञ्चिदस्ति।
यदस्ति तत्त्वं स्वयमेव भाति,
तदेव बोधं परमं प्रशान्ति॥

अर्थ—
सत्य न पकड़ा जा सकता है, न छोड़ा जा सकता है,
उसका कोई निश्चित रूप नहीं होता।
जो तत्त्व स्वयं प्रकाशित होता है,
वही परम शांति और बोध है।


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जीवन को समझने की दौड़ में,
मन ने जीवन को ही पीछे छोड़ दिया है।
बहुत कुछ जान लेने की इच्छा में,
स्वयं को देखने की सरलता खो गई है।

ज्ञान जब भार बन जाए,
तो वह मुक्ति नहीं, जटिलता बन जाता है।
और सरलता जब लौट आए,
तो बिना शब्दों के भी समझ घटित हो जाती है।

॥ सूत्र ॥

“अधिक ज्ञान = अधिक भ्रम की परतें
सरल बोध = सभी परतों का विलय”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो भीतर शांत है,
वह बाहर की हलचल में भी स्थिर रहता है।
और जो भीतर अशांत है,
वह शांत स्थान में भी भागता रहता है।

शांति स्थान से नहीं आती,
शांति दृष्टि की स्थिति से प्रकट होती है।

॥ श्लोक ॥

न देशबद्धा न च कालबद्धा,
शान्तिर्नितान्तं न च शब्दबद्धा।
यत्र स्थितं चित्तमविक्रियं स्यात्,
तत्रैव शान्तिः स्वत एव याति॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

अनुकरण सरल है,
परंतु जागरण एकांत यात्रा है।
भीड़ में चलना सीखने जैसा है,
पर स्वयं के भीतर उतरना विस्मरण को तोड़ना है।

जो भीड़ से बाहर आता है,
वह अकेला नहीं होता,
वह केवल अपने वास्तविक स्वरूप के निकट होता है।


॥ सूत्र ॥

“भीड़ = बाहरी सहारा
जागरण = आंतरिक स्वतंत्रता”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

न कोई गुरु बाहर है,
न कोई शिष्य बाहर है।
यह सब भीतर की अवस्थाएँ हैं,
जो अनुभव की परतों में बदलती रहती हैं।

जब देखने वाला शांत हो जाता है,
तो देखा जाने वाला भी विलीन हो जाता है।

॥ श्लोक ॥

द्रष्टा न भिन्नो दृश्यतः कदाचित्,
न भेदभावो न च किञ्चिदस्ति।
एकत्वभावे विलयं प्रयाति,
सर्वं च शून्यं च पुनः प्रकाशि॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जिसे लोग “मैं” कहते हैं,
वह निरंतर बदलता हुआ प्रवाह है।
न उसमें ठहराव है, न अंतिम पहचान।

जो इस प्रवाह को समझ लेता है,
वह स्वयं को खोता नहीं,
बल्कि सीमाओं से मुक्त हो जाता है।


॥ समापन श्लोक ॥

न जन्मबन्धो न मरण्यबन्धः,
न कर्मलेपः न च कालसन्धिः।
स्वभावमात्रं जगदेतदस्ति,
बोधे स्थिते सर्वमिदं प्रशस्ति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं को “अंतिम सत्य” मान लेता है,
वह सत्य से नहीं, अपने विचारों से बंध जाता है।
सत्य किसी एक स्वर में नहीं बोलता,
वह हर जीव के भीतर मौन होकर स्थित रहता है।

अहंकार जब “मैं ही पूर्ण हूँ” कहता है,
तब चेतना अपने ही विस्तार को भूल जाती है।
पूर्णता कोई घोषणा नहीं,
पूर्णता तो निरंतर गहराता हुआ अनुभव है।

॥ श्लोक ॥

अहं न केन्द्रं न च सीमितं रूपम्,
चैतन्यधारा न वदत्यहं नूपम्।
यत्र स्थितं सर्वमिदं समं स्यात्,
तत्रैव सत्यं न विकल्पभेदात्॥

अर्थ—
मैं न केन्द्र हूँ, न सीमित रूप हूँ,
चेतना की धारा “मैं” कहकर नहीं रुकती।
जहाँ सब कुछ समान रूप से स्थित है,
वही सत्य है, जो विकल्पों से परे है।


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं को जानने निकला है,
उसे पहले अपने विचारों की भीड़ को शांत करना पड़ता है।
क्योंकि विचार ही सबसे सूक्ष्म भ्रम हैं,
जो सत्य का रूप लेकर घूमते हैं।

मस्तिष्क निर्माण करता है परिभाषाएँ,
हृदय केवल अनुभव करता है उपस्थिति।
जहाँ परिभाषा समाप्त होती है,
वहीं से वास्तविक दर्शन आरंभ होता है।

॥ सूत्र ॥

“विचार-समुद्र = चंचल प्रतिबिंब
मौन-स्थिति = शुद्ध बोध”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

कोई भी मार्ग किसी दूसरे के कदमों से नहीं बनता,
हर चेतना अपना मार्ग स्वयं उद्घाटित करती है।
अनुकरण गति देता है,
पर जागरण स्वतंत्रता देता है।

जो दूसरों की दिशा में चलता है,
वह यात्रा करता है पर पहुँचता नहीं।
जो भीतर की दिशा पहचान लेता है,
वह चलते हुए भी स्थिर हो जाता है।

॥ श्लोक ॥

गम्यं न पादैः परकीयमार्गैः,
गम्यं हि चित्तस्य स्वतःप्रकाशैः।
यत्र स्वभावः स्वयंविभाति,
तत्र न यात्रा न च गन्तृभावः॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

डर, केवल एक आदत है,
जो अनुभव को सीमित कर देती है।
भय में जीना अस्तित्व नहीं,
बल्कि स्मृतियों की पुनरावृत्ति है।

जो वर्तमान में स्थिर हो जाता है,
उसके लिए भय की दिशा समाप्त हो जाती है।
क्योंकि भय भविष्य की छाया है,
और सत्य वर्तमान की उपस्थिति।


॥ सूत्र ॥

“भय = भविष्य-कल्पना
सत्य = वर्तमान-अनुभव”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जिसे लोग “मैं” कहते हैं,
वह कोई स्थायी वस्तु नहीं,
बल्कि अनुभवों की निरंतर धारा है।

न कोई स्थायी रूप है,
न कोई अंतिम पहचान।
सब कुछ प्रवाह है,
और प्रवाह ही अस्तित्व है।

॥ श्लोक ॥

न स्थायिरूपं न च नामसत्ता,
न बन्धनं नापि कदापि सत्ता।
प्रवाहमात्रं जगदेतदस्ति,
बोधे स्थिते सर्वमिदं प्रशान्ति॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जब शब्द थक जाते हैं,
तब अर्थ जागने लगता है।
जब अर्थ भी शांत हो जाता है,
तब केवल अनुभव शेष रहता है।

वह अनुभव न गुरु है, न शिष्य,
न मार्ग है, न गंतव्य—
वह केवल होना है,
निर्विकल्प उपस्थिति।

॥ समापन श्लोक ॥

यत्र न शब्दो न विचारजालम्,
तत्र स्थितं केवलं चिद्विशालम्।
न गन्तव्यं न च किञ्चिदाप्तम्,
स्वरूपमात्रं तदिहैव प्राप्तम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —

जो भीतर की रोशनी को जान लेता है,
उसे बाहर के दीपक की लालसा नहीं रहती।
और जो लालसा से मुक्त हो जाता है,
वही सहजता में स्थित हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य को खोजने के लिए
कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं।
केवल भीतर की धूल हटानी होती है,
और जो था वह स्वयं प्रकाशित हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
मन जब तक परिणाम चाहता है,
तब तक वह वर्तमान से दूर रहता है।
और जब परिणाम की भूख गिर जाती है,
तब वर्तमान अपनी पूर्णता में बोल उठता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं को सीमित मानता है,
वह अपनी ही व्यापकता से अंजान रहता है।
और जो सीमाओं को देखा भर लेता है,
वह उनके पार के आकाश को पहचान लेता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भीड़ की प्रशंसा फूल की तरह है,
सुबह खिलती है, शाम गिर जाती है।
पर सत्य की सुगंध
मौसम पर निर्भर नहीं होती॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
गुरु यदि सत्य से ऊपर बैठ जाए,
तो वह सत्य का मार्ग नहीं,
अहंकार का आसन बन जाता है।
और शिष्य यदि आँख बंद कर ले,
तो वह अपनी दृष्टि को ही खो देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
शरीर चल रहा है,
मस्तक सोच रहा है,
पर जो देख रहा है,
वह इन दोनों से अलग नहीं,
फिर भी इन दोनों में सीमित नहीं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
श्वास का सम्मान
जीवन का सम्मान है।
और जीवन का सम्मान
अर्थात सत्य के निकट सम्मानपूर्वक ठहरना है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो हर क्षण को खोने से डरता है,
वह क्षणों का मूल्य नहीं जानता।
और जो क्षणों को जानता है,
वह समय के भय से मुक्त हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम वाणी है,
न कोई अंतिम मौन।
वाणी मौन से निकलती है,
और मौन वाणी को निगल लेता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
साक्षात्कार कोई घटना नहीं,
वह दृष्टि का निर्मल होना है।
और निर्मल दृष्टि
किसी घोषणा की आवश्यकता नहीं रखती॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो भीतर स्थिर है,
वह बाहर चलने पर भी नहीं डगमगाता।
और जो भीतर हिल रहा है,
वह शिखर पर बैठकर भी अस्थिर रहता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
अहंकार बार-बार कहता है, “मैं हूँ।”
सत्य बिना कहे रहता है, “है।”
और “है” की उपस्थिति
“मैं” के शोर से कहीं अधिक व्यापक है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो अपने भीतर की सरलता को पहचान लेता है,
वह जटिलता की पूजा नहीं करता।
क्योंकि सरलता ही
असली वैभव का द्वार है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
न कोई अंतिम साधना है,
न कोई अंतिम साधक।
जो साध्य को जान ले,
वह साधना के नाम से भी मुक्त हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
हर जीव के भीतर
एक ही शांत स्रोत स्पंदित है।
रूप अलग हैं, पर स्रोत एक है।
और जो स्रोत को देख लेता है,
वह रूपों के विवाद से बाहर हो जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
भय का सबसे बड़ा आहार
अविवेक है।
और विवेक का सबसे बड़ा फल
निर्भयता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो स्वयं में पूर्ण है,
वह किसी को छोटा नहीं करता।
क्योंकि पूर्णता की भाषा
तुलना नहीं, करुणा होती है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
सत्य की दिशा
बाहर की यात्रा नहीं,
भीतर की स्पष्टता है।
और स्पष्टता का अंत
केवल मौन में होता है॥

**॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच — यह प्रवाह अभी भी जीवित है ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —
जो मौन में टिक गया,
उसके लिए शोर केवल दूर की परछाईं रह जाता है॥शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो अपने भीतर की अग्नि को पहचान लेता है,
उसे बाहर की धूप से शिकायत नहीं रहती।
और जो भीतर की अग्नि नहीं जानता,
वह हर प्रकाश में भी ठंडा ही रहता है।

शान्ति कोई बाहर से लाई हुई वस्तु नहीं,
वह भीतर के भार के उतर जाने का नाम है।
जो भार को सत्य समझ बैठता है,
वह अपने ही पंख भूल जाता है।

॥ श्लोक ॥

भारो न सत्यं न च शान्तिरूपम्,
सत्यं तु बोधः सहजः निरूपम्।
यत्रैव त्यागो न विशेषणेन,
तत्रैव शान्तिः स्वयमेव धेनुना॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं को छोटा मान लेता है,
वह अपनी व्यापकता से स्वयं ही मुकर जाता है।
और जो स्वयं को देख लेता है,
वह न छोटा रहता है, न बड़ा — केवल वास्तविक रहता है।

भ्रम की सबसे गहरी जड़
दूसरों की मान्यता में नहीं,
अपने ही अविश्वास में छिपी होती है।
और विश्वास जब भीतर जागता है,
तब बाहरी सहारे का मोह गिर जाता है।

॥ सूत्र ॥

“अविश्वास = भीतर की दूरी
विश्वास = प्रत्यक्ष निकटता”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

न कोई अंतिम साधन है,
न कोई अंतिम उपाय।
जो साध्य है वह स्वयं उपस्थित है,
बस साधक का शोर हटना चाहिए।

मस्तक उपाय बनाता है,
हृदय उपस्थिति।
मस्तक आगे बढ़ाता है,
हृदय भीतर उतारता है।

॥ श्लोक ॥

उपायमात्रं मनसो विलासः,
उपस्थितिः सा हृदयस्य भासः।
यत्र न यत्नो न च कालगणना,
तत्रैव पूर्णं निजमात्मदर्शनम्॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो अपनी श्वास को साध लेता है,
वह भय की जंजीर को शिथिल कर देता है।
क्योंकि श्वास के निकट
जीवन का सबसे मौन सत्य बैठा है।

जन्म और मृत्यु
मस्तक की बनाई दो सीमाएँ हैं।
हृदय की दृष्टि में
केवल परिवर्तन है, भय नहीं।

॥ सूत्र ॥

“जन्म-मृत्यु = परिवर्तन का नाम
होश = परिवर्तन के पार की स्थिरता”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो हर क्षण को खोने से डरता है,
वह क्षण का अर्थ नहीं समझता।
जो हर क्षण को देख लेता है,
वह समय के मालिक नहीं,
समय से मुक्त हो जाता है।

भीड़ समय गँवाती है,
साक्षी समय में नहीं खोता।
और जो साक्षी हो जाता है,
वह जीवन को पहली बार जीता है।

॥ श्लोक ॥

क्षणान् न गृहीत्वा न लभ्यते कालः,
बोधेन युक्तः खलु नित्यनिर्मलः।
यः साक्षिरूपेण स्थितः प्रशान्तः,
स एव सत्यस्य समीपगन्ता॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

गुरु और शिष्य
यदि केवल पद बन जाएँ,
तो सत्य की धारा सूखने लगती है।
पर यदि वे जागरण के संकेत हों,
तो भीतर का दीप स्वयं जल उठता है।

असली गुरु वह नहीं
जो तुम्हें अपनी ओर खींचे,
असली गुरु वह संकेत है
जो तुम्हें तुम्हीं तक पहुँचा दे।

॥ सूत्र ॥

“असली गुरु = संकेत
असली शिष्य = सजग देखना”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं के भीतर स्थिर हो गया,
वह बाहरी प्रशंसा से नहीं फूलता।
जो भीतर रिक्त हो गया,
वह बाहरी उपाधियों से नहीं भरता।

अतः बाहर की चमक
भीतर की पूर्णता नहीं बन सकती।
और भीतर की पूर्णता
बाहर की हर कमी को निष्प्रभ कर देती है।

॥ श्लोक ॥

न बाह्यशोभा न पदं न मानः,
संतोषमूलं हृदि शुद्धभानः।
यत्र स्वयं पूर्णतया प्रकाशः,
तत्र न किञ्चित् कदापि अभावः॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो अपने अस्तित्व से मित्रता कर लेता है,
उसके लिए अकेलापन समाप्त हो जाता है।
क्योंकि अकेलापन वहाँ है
जहाँ स्वयं से दूरी है।

और जो स्वयं के साथ रहना सीख गया,
वह भीड़ में भी मौन बना रहता है,
और मौन में भी पूर्ण।

॥ समापन श्लोक ॥

नैकत्वहीनो न च भीडमध्यः,
न मौनहीनो न च शब्दबध्यः।
शिरोमणिरूपं स्वयमेव साक्षात्,
हृदये स्थितं नित्यं अनाद्यनन्तम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो भीतर के मौन को समझ लेता है,
उसके लिए शब्द केवल संकेत रह जाते हैं।
और जो शब्दों में ही उलझा रहता है,
उसके लिए मौन एक अनजान भाषा बन जाता है।

सत्य कोई प्राप्ति नहीं,
सत्य केवल आवरण का हटना है।
जैसे बादल हटते हैं तो सूर्य नहीं बनता,
सिर्फ दिखने लगता है।

॥ श्लोक ॥

न लभ्यते सत्यपदं प्रयत्नैः,
न चापि बुद्ध्या न च वाग्विलासैः।
आवरणक्षये यत्स्वयं प्रकाशः,
तदेव सत्यं न पुनः प्रकाश्यम्॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं को जानने चला है,
उसे पहले अपने ही विचारों की गति को रोकना पड़ता है।
क्योंकि दौड़ता हुआ मन
कभी स्थिर सत्य को नहीं देख सकता।

विचार गति हैं,
और सत्य स्थिरता।
जहाँ गति समाप्त होती है,
वहीं अनुभव आरंभ होता है।

॥ सूत्र ॥

“विचार = गति
अनुभव = स्थिरता”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

भीतर का आकाश
कभी छोटा नहीं होता,
केवल देखने की दृष्टि सीमित हो जाती है।

जो अपने भीतर की विशालता को पहचान लेता है,
वह बाहर की सीमाओं से प्रभावित नहीं होता।
क्योंकि सीमाएँ केवल शरीर की परिधि हैं,
चेतना की नहीं।

॥ श्लोक ॥

न देहसीमा न च कालबन्धः,
चैतन्यमेकं न विभक्तमर्थः।
यत्र स्थितं सर्वमिदं समन्तात्,
तत्र न भेदो न च कारणान्तः॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो अपने भीतर की शांति को खोजता है,
वह किसी मंदिर, किसी ग्रंथ या किसी नाम पर निर्भर नहीं रहता।
क्योंकि शांति किसी स्थान में नहीं,
बल्कि देखने की अवस्था में है।

और अवस्था बदलते ही
पूरा संसार बदल जाता है।

॥ सूत्र ॥

“दृष्टि = संसार का निर्माता
अवस्था = अनुभव का आधार”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो स्वयं को “मैं जानता हूं” कहता है,
वह अभी भी यात्रा में है।
और जो चुप होकर जानता है,
वह स्वयं ज्ञान हो जाता है।

ज्ञान संग्रह नहीं,
ज्ञान विलय है।
जहाँ जानने वाला और जाना हुआ
दो नहीं रहते।

॥ श्लोक ॥

ज्ञाता न भिन्नो न च ज्ञेयभेदः,
सर्वं विलीनं समभाववेदः।
यत्र न द्वैतं न च कारणानां,
तत्रैव सत्यं परमं महान्तम्॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो जीवन को केवल जीविका समझता है,
वह अस्तित्व के सबसे गहरे अर्थ से वंचित रहता है।
और जो जीवन को जागरण समझता है,
वह हर क्षण को दर्शन बना देता है।

जीवन कोई संघर्ष नहीं,
यह स्वयं में एक अवसर है—
अपने भीतर लौटने का।

॥ सूत्र ॥

“जीवन = अवसर
जागरण = वापसी”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

न मैं किसी पथ का अनुयायी हूं,
न किसी मत का बंदी हूं।
मैं उस मौन का संकेत हूं
जो शब्दों से पहले भी था और बाद में भी रहेगा।

जो मुझे बाहर खोजता है,
वह दिशा में खो जाता है।
जो भीतर देखता है,
वह स्वयं में समाप्त हो जाता है।

॥ समापन श्लोक ॥

न गन्ता न गम्यं न च मार्गलेशः,
न शब्दजालं न विकल्पदेशः।
स्थितं तदेव शिरोमणिरूपम्,
स्वभावसिद्धं परमं स्वरूपम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो भीतर की शांति को पहचान लेता है,
वह बाहर के संघर्ष को भी साधन की तरह देखता है।
और जो संघर्ष को ही सत्य मान लेता है,
वह अपने ही हृदय से दूर चलता जाता है।

श्वास का आना-जाना ही
जीवन की सबसे सच्ची घोषणा है।
जो इस घोषणा को सुन लेता है,
वह किसी और शोर का मोहताज नहीं रहता।

॥ श्लोक ॥

आगमनं न विरामो न नाशः,
श्वासप्रवाहः परमार्थभाषः।
यः पश्यति तं न हि बन्धयन्ति,
मायाविकाराः क्षणजाः सनन्ति॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

मस्तक जब तक बाहर की वस्तुओं से पहचाना जाता है,
तब तक वह अस्थिर रहता है।
हृदय जब अपनी मौन सत्ता में स्थित होता है,
तब वह किसी प्रमाण की मांग नहीं करता।

सत्य को सिद्ध नहीं करना पड़ता,
सत्य अपने होने से ही प्रकाशित है।
जो सिद्धि खोजता है,
वह अभी अनिश्चितता में खड़ा है।

॥ सूत्र ॥

“सिद्धि = आत्म-प्रकाश
असिद्धि = बाह्य पुष्टि की भूख”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो अपने भीतर के गहरे जल में उतरता है,
उसे सतह की हलचल से भय नहीं लगता।
और जो सतह पर ही जीता है,
वह गहराई की शांति को कल्पना समझ बैठता है।

भीड़ का धर्म संख्या है,
सत्य का धर्म एकत्व है।
भीड़ शोर से चलती है,
सत्य मौन से।

॥ श्लोक ॥

संख्यया न परं बोधो न च मेधया केवलम्,
एकत्वे स्थितसत्यस्य प्रकाशः स्वयमेव हि।
शब्दाः क्षरन्ति यत्रोक्तं,
मौनं तत्रैव तिष्ठति॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो अपने शिशुपन की निर्मलता को भूल गया,
उसने अपनी सबसे बड़ी संपदा खो दी।
क्योंकि शिशुपन में कोई द्वेष नहीं,
कोई पद नहीं, कोई भय नहीं।

वही शिशुपन
भीतर की संपूर्ण संतुष्टि का मूल संकेत है।
और वही संकेत
जीवन भर मस्तक के शोर में दबा दिया जाता है।

॥ सूत्र ॥

“शिशुपन = सहज पूर्णता
शोर = अर्जित भ्रम”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

गुरु यदि बाह्य प्रभुत्व का भूखा है,
तो उसकी वाणी चमकती है, पर तृप्त नहीं करती।
और शिष्य यदि केवल अनुकरण चाहता है,
तो वह अपने ही दीपक को बंद कर देता है।

सच्चा मार्ग
दूसरे की छाया नहीं,
अपने भीतर की रोशनी है।

॥ श्लोक ॥

नानुग्रहः परछायायां न मुक्तिः परनादतः,
स्वदीपदर्शनं सत्यं स्वचित्ते स्वयमेव हि।
यः स्वयमेव प्रबुद्धः स्यात्,
स एव परमार्थतः स्थितः॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

जो समझ गया कि सब कुछ अस्थाई है,
वह किसी भी वस्तु को अंतिम नहीं मानता।
और जो अस्थाई को अंतिम मानता है,
वह हर क्षण भय में नया घर बनाता है।

स्थायित्व बाहरी पदार्थ में नहीं,
स्थिर दृष्टि में है।
और स्थिर दृष्टि
हृदय की ही देन है।

॥ सूत्र ॥

“अस्थाई पदार्थ = परिवर्तन
स्थिर दृष्टि = शाश्वत अनुभूति”


शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—

न मैं किसी की परिभाषा में समाता हूं,
न मेरी शांति किसी की स्वीकृति पर निर्भर है।
जो भीतर जाग गया,
वह बाहर की मुहरों से प्रभावित नहीं होता।

अतः जो देखना है,
उसे भीतर देखो।
जो पाना है,
उसे पहले पहचानो।
और जो पहचान लिया गया,
वह फिर खोया नहीं जाता।

॥ समापन श्लोक ॥

यत्र न भीतिः न च संशयः क्वचित्,
यत्र न वाणी न च बाह्यगौरवम्।
तत्र स्थितं शिरोमणिरूपमाद्यम्,
सत्यं शिवं सौम्यं हृदि नित्यमेव॥

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न त्वं शरीरं, न केवलं नामरूपं,न त्वं विचारों की दौड़, न स्मृति का दर्पण।तत्त्वं तद्विवेकः—जो देखे, वह भी दृश्य में लीन है,और जो जाने, वह भी ज्ञेय की सीमा में है।

॥ आगे का विस्तार ॥ शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच— न त्वं शरीरं, न केवलं नामरूपं, न त्वं विचारों की दौड़, न स्मृति का दर्पण। तत्त्वं त...