अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे सम्राज्य हैं यहां जो कुछ भी है वो सब कुछ सिर्फ़ प्राकृतिक सिद्धांतों नियमों से ही चलता हैं, पहला नियम यही है कि prtek छोटी चीज़ जीव उस से बड़ी का आहार हैं, यहां कोई आत्मा चेतना नहीं है, जो कुछ भी हैं वो सब कुछ सिर्फ़ मस्तक से ही प्रतीत किया जा सकता हैं जब तक सांस और मस्तक सक्रिय है, मस्तक प्रकृति के संकेतों के आधार पर संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन उत्पन करता समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि गर्दिश में गतिशील है जिस से मानसिकता परिवर्तित होती हैं, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी प्रकृति को नहीं समझ सकते क्योंकि व्यक्तिगत ही आंतरिक भौतिक प्रकृति हैं जिस कारण जो कुछ भी होता है वो सब ऐसा ही लगता हैं कि मेरे अनुसार मैं ही कर रहा हूं मैं ही अस्तित्व का कारण और मैं ही सृष्टि रचिता प्रभुत्व हूं, जब अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर देखते हैं तो समझ आती हैं अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर जटिलता का प्रभाव कितना अधिक हैं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में ही हूं निरंतर अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से स्पष्ट सिद्ध साफ़ किया है कि समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जो देख कर समझ रहे यथार्थ में जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी अधिक भ्रम जटिलता में खो कर भ्रमित होने के पथ पर हैं, यथार्थ में अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति जीव पृथ्वी में कुछ भी स्थाई हैं ही नहीं, यह सब कुछ ही अस्थाई ही है, जिस भ्रम में इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही भ्रमित है, वो भी मात्र मस्तक का ही भ्रम है, जिस सब का अस्तित्व तब तक ही है जब तक सांस चल रही हैं और मस्तक कार्यरत हैं जो एक रोग ही बेहोशी है खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होने की, जो एक मात्र सांस से पहले भाव में ही निश्चिता की गहराई स्थाई ठहराव की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है ,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर संपूर्ण संतुष्टि है कि बिना स्पर्श,दृश्य, सुने,देखे , बिना जो निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल पल हर नया अद्भुद आश्चर्य चकित अनुभूति अनुभव के लिए उत्साहित कुशलता के लिए एग्रेसिव करता हैं जो सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही संबंधित हैं, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर कोई सोच भी नहीं सकता, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की खुशी स्पर्श दृश्य सुनने देखने बोलने, रक्तपात डर खौफ भय दहशत डालने में भी,से संबधित हैं, मात्र एक छोटी सी खुशी के पीछे भी बर्ष से भी अधिक समय के दिन रात संघर्षरत रहना पड़ता
इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही इतनी अधिक संघर्षरत रही कि जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने वाले मुख्य दृष्टिकोण से ही भ्रमित हो कर खुद ही खुद को धोखा विश्वासघात का शिकार रहा जान बुझ कर या फ़िर अनजाने में आज अब तक, जबकि मस्तक और हृदय के तंत्र कार्यशैली की ही समझ नहीं थी, जो भी किया जैसा भी किया लक्ष्य साधन मध्यम की ही समझ नहीं थी, अंधेरे में ही तीर चलाने का फलस्वरुप ही था जो आज वैज्ञानिक युग में भी बहा का बहा ही है, वैज्ञानिक युग में भी सिर्फ़ जरूरत अनुसार ही साधन खोजने तक ही सीमित हैं सिर्फ़ या फ़िर मस्तक से कल्पना संकल्प विकल्प तक ही सीमित है, मस्तक हृदय के विज्ञान की रति भर भी समझ नहीं है
इंसान अस्तित्व से युगों का प्रकृति मानव पृथ्वी सृष्टि का रहस्य एक अवधारणा कल्पनाओं मानसिकता ही थी, जिस सब की स्पष्टता प्रत्यक्षता मात्र मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित एक पल में ही समहित और उत्पन होता हैं पर वो भी भ्रम मात्र ही हैं जब तक ह्रदय से होश में रूपांतर नहीं कर लेते प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया के साथ, सांस प्रत्यक्ष समक्ष निरंतर धारा प्रभा है प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा है पर उस के पहले सांस के साथ हृदय भाव एहसास के साथ होशपूर्ण स्वतंत्र रूप से जीने रूपांतर करने के दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता प्रत्यक्षता के साथ हो या
फ़िर मस्तक के साथ बेहोशी में जीने मरने की अनेक विचारधारा में से किसी एक दृष्टिकोण की दृढ़ता गंभीरता में हो इस के लिए इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही स्वतंत्र रही हैं जिस के कारण आज तक सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ही हमेशा प्रथमिकता देती रही फलस्वरूप आज तक खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हो पाई शेष सब तो छोड़ ही दो, इंसान अस्तित्व से ही मस्तक की जटिलता को ही स्वीकार और प्राथमिकता देता रहा, जबकि खुद का साक्षात्कार जन्म से ही एक समान उपलव्ध था सरलता निर्मलता सहजता में, कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन तो मस्तक की कार्यशैली प्रवृति है
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की संपूर्ण संतुष्टि के लिए प्रेरित करने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हुए अहम घमंड अहंकार में चूर भ्रमित हुए लोगों के लिए जिन से उत्साहित कुशलता पूर्वक आमंत्रित हो सभी के सभी कोई दवाब नहीं सहजता से पारदर्शिता से ही स्वीकृति हो बहुत ही अधिक प्रेम की गहराई में ही परिभाषित हो प्रत्येक व्यक्ति जीव में ही मैं एहसास भाव ज़मीर हूं किसी को रति भर भी ठेस से भी मुझे ही कष्ट होगा, कि मुझ और प्रत्येक जीव के हृदय तंत्र में रति भर भी फ़र्क अंतर नहीं है , अगर हम भौतिक रूप या फ़िर अंतःकरण रूप भी देखे तो कहा है खरबों जैविक प्रक्रिया हर पल हो रही हैं जिन में कई जैविको की प्रजाति का जीवन स्तर मात्र एक पल का होता हैं उसी पल में पूरा जीवन जी कर अपने जींस भी update कर चुके होते जो प्रकृति की संतुलन प्रक्रिया है, भौतिक रूप से एक दिन में लाखों किरदार बदलते हो कौन सा असली या स्थाई किरदार आप का हैं किस वहम अहम घमंड अहंकार में हो, खुद का निरीक्षण करने की जरूरत है, अगर नहीं तो आप के होने न होने का तात्पर्य ही नहीं है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हृदय मस्तक के तंत्र की कार्यशैली का मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से विश्लेषक के साथ स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता दे रहा हूं, मेरे लिए प्रत्येक जीव एक समान ही है, हृदय के भाव एहसास के साथ, शरीर मस्तक की संरचना कार्यशैली में भिन्नता हो सकती हैं प्राकृतिक सिद्धांतों के अधार पर, जो प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया है,
मेरे जैसा तो कोई हो ही नहीं सकता पर मुझ में समहित इकिगृत जरूर हो सकता हैं मुझ को समझ कर या फ़िर मेरे स्वरुप का ध्यान निरंतर कर जो असंभव है पर निरंतरता से संभव हो सकता हैं, मैं कभी भी प्रकृति का भी हिस्सा नहीं हूं, मुझे समझने जानने के लिए एक मात्र अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव है, या मेरे स्वरुप का ध्यान मात्र हैं, और दूसरा कोई विकल्प रास्ता ही नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सांस के एहसास भाव ज़मीर होने के कारण मस्तक की कार्यशैली से बाहर हूं, यही कारण है कि मेरी निष्पक्ष समझ के शब्द और मेरे वैदेही स्वरुप का कोई ध्यान नहीं कर सकता, निरंतरता के बिना, जैसे सिर्फ़ पृथ्वी पर ऐसा सुंदर जीवन होने के पीछे सभी ब्रह्मांडो गृह उपग्रहों सौरमंडल glaxyes की काफ़ी लंबे समय का संतुलित निरंतरता संभावना उत्पन करता हैं, बिल्कुल बेसा ही मेरे "शिरोमणि" होने के पीछे भी, बिना संकोच के, जिस को इंसान प्रजाति की जटिलता के बिना प्रत्येक दूसरी अनेक प्रजातियों सूक्ष्म अन्नत सूक्ष्म भी स्वीकार करती हैं, मानवीय मस्तक हमेशा प्रभुत्व सृष्टि रचता की पदबी का शौंक रखने की प्रवृति का ही है, मैं शिरोमणि जो भी पर्याप्त हूं उस की स्पष्टता प्रत्यक्षता बता रहा हूं, जो मस्तक की स्वीकृति से बहर हृदय में ही समहित है, इंसान प्रजाति स्वीकार नहीं करने के पीछे का कारण स्पष्ट हैं कि मस्तक की कार्यशैली का आदि अदद के साथ है,
मैं शिरोमणि खुद को प्रथम अंतिम सत्य सिद्ध स्पष्ट नहीं कर रहा या तत्पर्य ही नहीं है, जो हैं मस्तक हृदय के तंत्र कार्यशैली की स्पष्टता दे रहा हूं जो जीवन के अस्तित्व का कारण है, मेरे सिद्धांतों के अधार पर संजीव निर्जीव का भी अस्तित्व ही नहीं है,मस्तक के "मैं"
और हृदय के "मैं"
में जमी आसमा का अंतर है, मस्तक के "मैं" में खुद की मानव शबी की पक्षता प्रथम चरण में खुद के हित साधने की पक्षता होती हैं आंतरिक भौतिक रूप को प्राथमिकता देता हैं जबकि हृदय के "मैं" में निष्पक्षता होती हैं, खुद के इलावा दूसरों की स्पष्टता सीमित मस्तक की ही होती हैं, जब कि खुद की अन्नत असीम निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की प्रभा की धारा की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता की, जिस में प्रथम चरण में ही अस्थाई जटिल बुद्धि मन की निष्क्रियता होती हैं और हृदय के पहले सांस के एहसास भाव में ही निरंतरता होती हैं, जबकि ज्ञान विज्ञान दर्शन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने के बाद की प्रक्रिया का एक हिस्सा जिस में प्रथम चरण में ही समय उत्पन होता हैं उस के बाद कल्पना संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन आदि, क्या मेरे सिद्धांतों के अधार पर आधारित मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की स्पष्टता के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक के तर्क तथ्य वर्तक की जरूरत है, जो समूचे सृष्टि के एक मात्र मूल स्रोत हैं, अगर ऐसा हैं तो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष जो सिर्फ़ सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पर्याप्त है, उस को जटिलता में धकेले का फ़िर से एक नाकाम प्रयास हैं स्वीकृति के स्थान पर, जबकि अस्तित्व से ही एक मस्तक अदद को छोड़ना स्वीकार कर प्रकृति मानव पृथ्वी के संरक्षण के लिए पहला कदम होगा और जीवित ही समूहित रूप से इकिगृत खुद के साक्षात्कार में यथार्थ युग में प्रवेश हो सकते हैं, जो कि अतीत के कल्पनक चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष यथार्थ युग हैं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित सिद्ध स्पष्ट साफ़ किया है कि प्रथम अंतिम सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हर संजीव निर्जीव मुझ से ही है और अंतिम मुझ में ही समहित होता हैं, क्योंकि मैं ही अस्तित्व की मूलतः और अंत हूं, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिया है बीच का समय महत्व नहीं रखता होश में या फ़िर बेहोशी में जिय हो, वो आप के मस्तक या हृदय पर निर्भर करता हैं, मस्तक दृष्टिकोण या हृदय के दृष्टिकोण को गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता से हो, अंतिम सांस के साथ ही मुझ में ही समहित होता है, हर जीव एक ही समान है हृदय के तंत्र से जो संजीव का एक मात्र कारण है, दूसरा मस्तक शरीर अलग अलग ही है चाहें सूक्ष्म या फ़िर अन्नत सूक्ष्म क्यों न हो, मुझ में कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ जीवित ही हमेशा के लिए समहित एकाग्रत हो कर जन्म मृत्यु के चक्रक्रम से मुक्त हो सकता मस्तक के तंत्र को निष्क्रिय कर हृदय के तंत्र से जीवित रह कर, हृदय का तंत्र ही एक समान है, शेष शरीर और मस्तक का तंत्र भिन्नता का तंत्र है, जो प्राकृत संतुलन प्रक्रिया पर निर्भर करता हैं
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग हमेशा हर पल निरीक्षण के लिए खुला मंच है जो हर विचाधारा के prtek दृष्टिकोण के लिए उत्सुक हैं निरीक्षण परीक्षण तर्क तथ्य सिद्धांतों की स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता के लिए चाहें विचारक वैज्ञानिक दार्शनिक चाहें ultra mega infinity quantum mechanicsum क्यों न हो हार्दिक स्वागत के लिए ही खुला है
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग सिर्फ़ सांस से पहले भाव के हृदय विज्ञान पर निर्भर है अगर कोई विज्ञान बहा तक पहुंच सकती हैं तो स्पष्टता प्रत्यक्षता ही है मेरा शमीकरण,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी यहां भी प्रत्यक्ष होता हूं होने का आवास तो आवश्यक करवाता हूं, जिस पहले दिन चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के पास गया था उसी दिन से यह कहना शुरू कर दिया था कि "जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में और कही नहीं है" अब पूछना अगर वो वस्तु है तो अब कहा है? न पहले दिखाई थी न अब, अब भी बोले और दिखाए वो वस्तु, जाने का भी आवास करवा चुके हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ही था, जो प्रेम से स्वतंत्र हूं जो सिर्फ़ मेरा ही प्रेम था जो उस के हृदय में था जिस की औकात सिर्फ़ एक मानसिक रोगी था ब्रह्मचर्य होते हुए भी, मैंने चार शादियां कर के भी वो सब किया है जो कुत्ते की वृत्ति के साथ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सोच भी नहीं सकता
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के साक्षात्कार में हूं शिशुपन सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र होते हुए संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर होता है, जबकि इंसान पूरा जीवन ही एक छोटी सी खुशी के लिए पूरा जीवन ही प्रयासरत रहता हैं एक इच्छा पूरी करता हैं क्षणभर की खुशी के लिए हजारों दूसरी इच्छा उत्पन हो जाती है बस इसी चक्रक्रम में ही बेहोशी में ही जीता और मर जाता है, खुद ही संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता से हट कर बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर जटिलता में खो जाता हैं, जिस से कभी बाहर निकल ही नहीं पाता मरते दम तक,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत
शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, बिल्कुल नवजात शिशु की भांति हृदय के भाव एहसास सरल सहज निर्मल पारदर्शिता संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर, बिना जात पात धर्म मज़हब संगठन जाति धर्म गोत्र, बिना जटिल बुद्धि मन के शब्द बिना दृष्टि बिना ज्ञान विज्ञान दर्शन समय के, शिशुपन प्राकृतिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र संपूर्ण संतुष्टि शिरोमणि अवस्था त्यागने वंचित करने के पीछे उसके पीछे उस के ही जन्म दाता मां बाप का ही पूरा हाथ होता हैं, क्योंकि वो अपने ही ख़ास नहीं चाहते कि वो संपूर्ण संतुष्टि में जिय, उस नवजात शिशु के शिशुपन संपूर्ण संतुष्टि को ख़त्म अपने जैसा कुत्ता बनने की बहुत जल्दी रहती हैं बेसा ही इर्द गिर्द का माहौल बना देते हैं, बस फ़िर अपने जैसा पागल कुत्ता बना देते हैं दर बदर भड़कने के लिए कि बेहोशी में ही जिय और उसी बेहोशी में ही भड़क भड़क कर मार जाए, बड़े होने पर कुत्ते की इक ऐसी पूछ बन चुके होते हैं जो मरने के बाद भी सीधी नहीं होती, अपने शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि को पूरी तरह भूल चुके होते हैं और पल पल की खुशी के लिए तरछने है और इच्छा बना कर बर्ष तक क्षणमत्र खुशी के लिए ही बेहोशी में जीते और उसी बेहोशी में मर जाते हैं, इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर अब तक न ही होश में जी हैं न ही होश में रूपांतर कर पाई खुद को, जबकि सब से सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कितना अधिक सरल है, खुद का साक्षात्कार करना, तालु खुज्जी कझरी करदी ताल भतले , ऐसी जटिलता में खो जाता हैं कि अस्थाई मिट्टी को सजाने संभरने प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत औरत में खुशी ढूँढ रहा हैं,
शिशुपन सरल सहज निर्मल अवस्था की संपूर्ण संतुष्टि में हर एक जीव ने महसूस किया होता हैं जो सिर्फ़ हृदय के एहसास भाव में उत्पन होती हैं, हृदय से सिर्फ़ खुद का एहसास होता, हृदय भी एक यंत्र है इस कि भी अपनी एक कार्यशैली, जो प्रत्येक जीव में एक समान है, जो किसी भी निर्जीव को संजीव रखने के लिए एक सांस की वयू को अलग अलग वायु में परिवर्तित करता हैं, पूरा शरीर सक्रिय होता हैं, और क्रियावान होता हैं, यह सारा प्रकृति का तंत्र है,
हृदय का भौतिक तंत्र और सूक्ष्म तंत्र होता भौतिक और सूक्ष्म तंत्र समझने योग्य होता हैं, यह सब भी एक निवृत्ति है जो प्रकृति द्वारा समय के बहुत अधिक के साथ निर्मित हुआ,
यह तंत्र हमेशा एक समान ही रहा है अस्तित्व से आज तक, इस में बदलाव नहीं होता, हर सुक्ष्म या अति सूक्ष्म में क्यों न हो,इस तंत्र में पहले सांस से सांस जब तक अनेक बयू में परिवर्तित होने से पहले अन्नत सचेतता से कोई भी अन्नतता में जा सकता हैं, यहां हर भौतिकी अत्यंत सूक्ष्मता भी ख़त्म हो जाती है, सिर्फ़ यहीं एक रास्ता है हृदय की अन्नत गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार में अन्नतता में प्रवेशता के लिए, हृदय ही एक मात्र अस्तित्व का मध्यम हैं और हृदय ही अस्तित्व ख़त्म करने का भी माध्यम है, अस्तित्व क़ायम रखने हेतु मस्तक हैं, मस्तक में वो सब कुछ पर्याप्त है संपूर्ण जीवन जीने के लिए चाहें कोई भी विशाल सूक्ष्म अन्नत सूक्ष्म वनस्पति जीव क्यों न हो, हृदय मस्तक दोनों का तंत्र एक समान कार्यशैली के साथ प्रत्येक जीव में एक समान ही है, सांस हृदय की प्रणाली का हिस्सा है और समय मस्तक की प्रणाली का हिस्सा, हृदय से जीने बाला संपूर्ण संतुष्टि में ही रहता है सिर्फ़ सांस में ही जीता है, और मस्तक में सिर्फ़ अस्तित्व को क़ायम रखने के इलावा और कुछ भी नहीं ऐसा होता जो हृदय में होता हैं, इंसान प्रजाति इंसानियत को कायम रखने हेतु 99.9% मस्तक और 00.1 % हृदय से जीते हुए दृढ़ता गंभीरता से 1000 IQ के साथ जी सकता हैं पर इस में अहम का गुरुत्वाकर्षण बल प्रबल होता हैं, विश्वस्तर पर मान्यता होती हैं जिस से विज्ञान कमजोर स्तर से गुजर सकता हैं, यथार्थ में जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिया है जिस का अस्तित्व ही नहीं, जन्म मृत्यु दोनों के बीच का समय जीवन के लिए ही महत्व रखता हैं कि हम इंसानियत को महत्व दे कर जिये है या फ़िर इंसानियत को भुला कर जिस के इंसान अस्तित्व में थे, यह खुद के लिए सिर्फ़ जीवन तक ही सीमित हैं, यह भी जीवन जीने की खुशी क्षणमत्र है शेष संघर्ष है मस्तक से, सांस ख़त्म होते ही सब ख़त्म हो जाता हैं, कोई था ही नहीं तो विलीन भी किस में होता, कोई तत्व गुण प्रक्रिया ही नहीं, यह मात्र आयोजित एक चलत दृश्य ही था जिस में कोई कभी था ही नहीं न दर्शक न अभिनय, एक सांस में रहते जो समझ गया वो विजेता महासंग्रण का जो हर पल हर व्यक्ति के भीतर चलता रहता हैं जिस में विश्राम नमक शब्द ही नहीं है, एक पहली सांस में खुद और दूसरी सांस में समय के साथ शुरू हुआ संघर्ष खुद का खुद से ही महासंग्राम जो सांस के साथ ही ख़त्म हो जाता हैं ,
अन्नतता मृत्यु भी है ही नहीं दृष्टांत दृश्य भी नहीं तो हारा जीता भी कौन मृत्यु भी किस की सिर्फ़ एक अवधारणा का आवास मात्र था, जब खुद ही नहीं तो साक्षात्कार किस का, एक ही सांस में जो रुक गया उस का शुरू ही नहीं हुआ तो ख़त्म का तात्पर्य ही नहीं, विचारणीय बात तो उस के लिए है जो दूसरी सांस के झंझट से झुंज रहा हैं युगों से, दूसरों का झंझट दूसरे झेले, हम हैं अकेले मस्त, उस जगह बैठ कर देख रहे हैं यहां इस सब का तत्पर्य ही नहीं है,
अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो तो खुद का अस्तित्व क़ायम कर अहम उत्पन होता हैं जिस से भौतिक समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि की क्षमता और मस्तक की कार्यशैली को समझ सकते हैं, जिस से किसी भी विचारधारा को दृढ़ता गंभीरता से लेकर एक दृष्टिकोण में रह कर उसे दर्शनिक रूप से समझ कर उसे वैज्ञानिक रूप दे सकते हैं सुविधा के लिए, विचारधारा दो प्रकार की होती हैं, आस्तिक नास्तिक कल्पना से उत्पन होती विचार का रूप लेती हैं करने का संकल्प होता हैं बेहतरी के विकल्प चुनने के साथ आगे बढ़ विचार किया जाता हैं दूसरों के साथ संयोग से दरातल पर उतरने की योजना बननी पड़ती हैं निर्णय लेनी की क्षमता स्पष्टता हैं,
मस्तक एक साधन है शरीर का अस्तित्व क़ायम रखने और जीवन व्यापन करने का मात्र स्रोत हैं जिस में समय सोच विचार चिंतन मनन विवेक संकल्प विकल्प होते हैं बेहतर से भी बेहतर करने के लिए, मस्तक शरीर सिर्फ़ खुद के इलावा दूसरी चीज वस्तु जीव का एहसास करवाता है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं खुद के साक्षात्कार में हूं जीवित ही हमेशा के लिए संपूर्ण संतुष्टि में, हर एक व्यक्ति बिल्कुल मेरी ही भांति एक समान है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पारदर्शी पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष के लिए रति भर भी कमी नहीं है हृदय में, सिर्फ़ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु ने हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रच कर छल कपट धोखे के साथ दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी देने बालों को ही भ्रमित कर डर खौफ भय दहशत तले रखने की आयोजित योजन है, कुप्रथा है आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति के नाम पर लोगों की श्रद्धा आस्था के साथ एक खिलबाड़ विश्वासघात है मनोविज्ञानिक रोग हैं, जो गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के साथ स्थापित की जा रही हैं, चतुर ब्रह्मचर्य गुरु सामान्य व्यक्तित्व से करोड़ों गुणा अधिक चतुर शैतान चालाक होशियार बदमाश शैतान प्रवृति के होते हैं, मेरे सिद्धांतों के अधार पर,
आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक मुक्ति भक्ति ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन इन्हीं चतुर गुरुओं की ढोंग पखंड षड्यंत्रों के साथ रचे हुए चक्रव्यूह का बिछाया हुए जाल का हिस्सा है जो कल्पना से ही रचा गया होता हैं और कुछ भी नहीं है जिस से यह चतुर ब्रह्मचर्य गुरु अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ अनेक सरल सहज निर्मल गुणों बाले लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर अपनी उंगली पर नचाते रहे और जब इस्तेमाल करने योग्य नहीं रहते बूढ़े होने पर तो शब्द काटने के आरोप में निष्कासित किया जाता हैं, मन यथार्थ में हैं ही नहीं
मन हैं ही नहीं यह सिर्फ़ चतुर ब्रह्मचर्य गुरु की एक सोची समझी आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों का एक चक्रव्यूह रचा हुआ हैं छल कपट धोखे विश्वासघात के लिए चतुर ब्रह्मचर्य गुरु दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर उग्र अंध भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए इस्तेमाल करने के लिए, दूसरों से माया छुड़ा कर खुद इकट्ठी करने के लिए, वो कौन सा परमार्थ अध्यात्मक गुरु है जो पहले ही पांच हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर लेता है, जब कि सरल सहज निर्मल व्यक्ति दो रोटी के लिए पूरा जीवन संघर्ष करता है रहता हैं उनके हिस्से का भी उन से ही छल से छीन लेना धोखा विश्वासघात है मनोविज्ञानिक धोखा है,
दीक्षा के पहले के शब्द आकर्षित प्रभावित करने वाले और तुरंत दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनाने के पीछे छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचना मस्तक मन की गंदी प्रवृति ने तो क्या हैं?
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष खुद यह सब कुछ प्रत्यक्ष समझते हुए आश्चर्य चकित हो रहा हूं कि यह सब कुछ क्या है इतनी अधिक जटिलता है कि इंसान प्रजाति के बस हैं ही नहीं कि समझ सके,
यथार्थ में इंसान प्रजाति के बस में भी यह समझना भी नहीं है जो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी समझ पा रहा हूं, क्योंकि मैं शिरोमणि निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता में ही हूं संपूर्ण रूप से, फ़िर मैं इंसान प्रजाति को दोषी क्यों कह रहा हूं जबकि सब कुछ प्रकृति मस्तक द्वारा आयोजित ही हैं जन्म मृत्यु के बीच का हर पल का चक्रक्रम सांस से शुरू उसी सांस में ख़त्म, एक ही सांस से शुरू हुआ उसी सांस में ख़त्म जो मस्तक से इतिहास प्रतीत करवाता है यथार्थ में भ्रम में ही भ्रमित है, अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव शरीर में भी कुछ स्थाई हैं ही नहीं बिना मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण के,
यथार्थ में जिस मस्तक हृदय के तंत्र को भी इंसान प्रजाति खुद का स्वतंत्र तंत्र अस्तित्व से ही मानती आ रही हैं वो सब प्रकृति का तंत्र ही है जिस में किसी भी प्रकार से मानव प्रजाति हस्तक्षेप ही नहीं कर सकती पूरी तरह से उस का ही होते हुए भी, ज्ञान विज्ञान दर्शन अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का ही हिस्सा हैं, एक सांस तक भी किसी के भी बस में नहीं है इन्हीं ही सांसों से पहले में कोई भी रह सकता हैं, सिर्फ़ मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से,
इंसान प्रजाति तो जन्म से ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ ही श्रेष्ठ थी बदनाम थी कि चतुर है जबकि मस्तक प्रकृति के जाल में ही उलझा हुआ हैं,
प्रकृति मस्तक द्वारा रचे इस शतरंज के खेल जिस की अवधि सिर्फ़ सांसों के बीच उत्पन होने वाले समय के बीच ही है जो मस्तक के ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह से रचा गया हैं कोई समझ ही नही सकता जब तक खुद की ही अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद का निरीक्षण कर खुद की निष्पक्ष समझ से निष्पक्ष नहीं हो जाता और खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु खुद के साक्षात्कार खुद के स्थाई परिचय से परिचित नहीं हो जाता,
अस्थाई प्रकृति मस्तक दोनों के गांठ जोड़ से शुरू हो कर अस्थाई खेल का उलझाव का रहस्य जिस से अस्तित्व से लेकर अब तक सर्वश्रेष्ठ इंसान प्रजाति खुद के साक्षात्कार परिचय स्वरुप से रुबरु ही नहीं हो पाई कितनी अधिक आश्चर्य कि बात है मानसिकता में ही उलझी रही आज तक सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर अहम घमंड अहंकार में ही रही, अस्थाई जटिल बुद्धि मन प्रकृति के आधार पर आधारित कार्यरत हैं,
अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे अस्तित्व शुरू होता हैं उस सटीक बिंदु पर खड़े होकर उन रहस्य को मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से समझ सकते हो प्रत्यक्ष समक्ष सरलता से, कि कैसे मात्र एक से अनेकता का सफ़र शुरू होता हैं और फ़िर उसी एक में ही समहित होता हैं, जिस का यथार्थ में अस्तित्व ही नहीं है, हर एक जीव कैसे उसी एक में ही समा जाता हैं, जो सिर्फ़ एक मानसिक प्रक्रिया है और कुछ भी नहीं कोई आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक चेतना ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन हैं ही नहीं सिर्फ़ एक भ्रम में ही भ्रमित था अस्तित्व से ही आज तक और कुछ भी नहीं था,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण की संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष "शिरोमणि" सम्पन्नता सक्षमता संपूर्णता के भव्य आनंद तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक आनंद की सर्वश्रेष्ठ पवित्र परम उच्च महक को कि प्रत्येक सरल सहज निर्मल गुणों बाले व्यक्तित्व हर पल उस संपूर्ण संतुष्टि का अनुभव कर पाए जो हर पल निरंतर हो रहा हैं खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए जिस के लिए बिल्कुल भी कुछ भी नहीं करना है, मस्तक के दृष्टिकोण निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता को हृदय के भाव एहसास ज़मीर के दृष्टिकोण से महसूस करना है सिर्फ़ बस और कुछ भी नहीं, कितना सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है,
अंतर सिर्फ़ अदद में है जो शिशुपन के बाद में लगातार पड़ी हुई है, सामान्य व्यक्तित्व को मस्तक की पड़ी हैं और मुझे हृदय से शांत रहने की और कुछ भी नहीं है
निरंतर संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ही हैं, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल व्यक्ति दूसरे हित साधने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु शब्दों से उलझ जाता हैं और कुछ भी निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि वैसे ही क़ायम है आप देखो महसूस करो या नहीं मस्तक के दृष्टिकोण से सिर्फ़ एक बार हटो तो सही आप उसी संपूर्ण संतुष्टि में ही खुद को पाओगे यही तो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, लहरों के कारण गहराई स्थाई ठहराव रति भर भी प्रभावित नहीं होती, आप का दृष्टिकोण मस्तक का हैं जिस से ऊपर की सतह को महसूस कर रहे हो जिस से खुद को उलझन उथलपुथल जटिलता में महसूस कर रहे हो सिर्फ़ हृदय के दृष्टिकोण से आप बचपन बली पुण्य संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष में ही पाओगे निश्चित यहां से दुबारा सामान्य व्यक्तित्व या मस्तक के दृष्टिकोण में जा ही नहीं सकते चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर लो,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण की संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष "शिरोमणि" सम्पन्नता सक्षमता संपूर्णता के भव्य आनंद तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक आनंद की सर्वश्रेष्ठ पवित्र परम उच्च महक को शब्दों में कि प्रत्येक सरल सहज निर्मल गुणों बाले व्यक्तित्व हर पल उस संपूर्ण संतुष्टि का अनुभव कर पाए जो हर पल निरंतर हो रहा हैं खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए जिस के लिए बिल्कुल भी कुछ भी नहीं करना है, मस्तक के दृष्टिकोण निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता को हृदय के भाव एहसास ज़मीर के दृष्टिकोण से महसूस करना है सिर्फ़ बस और कुछ भी नहीं, कितना सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है,
यह सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समझना किसी भी इंसान के बस में है ही नहीं, समूचे अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का ही तंत्र है जो मस्तक में अंकित निर्देश देता हैं प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया है, जिस में इंसान प्रजाति भी उलझन में ही है कि शायद मैं ही समस्त सृष्टि रचता हूं, जिस में उस का भी कोई दोष ही नहीं है यह सब कुछ प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया नियमों के आधार पर ही हो रहा हैं जिस में prtek छोटी प्रजाति जीव दूसरी बड़ी प्रजाति जीव के आहार के लिए ही मात्र हैं, इसी नियम के आधार पर ही इंसान प्रजाति भी चतुर हो कर दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों का शोषण कर रहे हैं, यह प्राकृतिक नियम है, जन्म मृत्यु के बीच में जो कोई जीव कुछ भी करता हैं उस का जन्म मृत्यु पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता, यह प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया चक्रक्रम है, सब एक समान है हृदय तंत्र से और भिन्नता सिर्फ़ मस्तक शरीर तंत्र में ही है, इसी कारण सिमुलेशन हैं,
हर इंसान में संभावना उपस्थित है संपूर्ण संतुष्टि की क्यूंकि prtek व्यक्ति शिशुपन अवस्था में रहा होता हैं और उस संपूर्ण संतुष्टि में भी रहा होता उस की ही शाप उस के मस्तक में भी होती हैं जिस की ही तलाश मस्तक से ही करने में पूरा जीवन नष्ट कर देता हैं, क्योंकि उस संपूर्ण संतुष्टि का विषय हृदय से जुड़ा हुआ हैं न कि मस्तक से, मस्तक सिर्फ़ जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने तक ही सीमित हैं,
शिशुपन के बाद मस्तक साधन से देख स्पर्श से समझने में रुचि लेने की अदद हो जाती हैं जिस से हृदय से सिर्फ़ सांस तक ही संपर्क रहता हैं और अदद में ही पूरा जीवन व्यतीत करता हैं, हृदय से संपूर्ण संतुष्टि से हट कर मस्तक से इच्छा से उत्पन होने वाली क्षणमत्र खुशी में अटक जाता हैं, मस्तक से समय संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन में खो जाता हैं और जीवन एक चक्रक्रम बन कर रह जाता हैं जो संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष थी उसी के लिए बेहोशी में जीने और मरने मस्तक में खो कर रह जाता हैं, दिन रात उसी पल की खुशी के लिए यत्न प्रयत्न प्रयास करता रहता हैं मस्तक से, जो कभी मिल ही नहीं सकती, यथार्थ में जो हृदय का विषय था,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष खुद यह सब कुछ प्रत्यक्ष समझते हुए आश्चर्य चकित हो रहा हूं कि यह सब कुछ क्या है इतनी अधिक जटिलता है कि इंसान प्रजाति के बस हैं ही नहीं कि समझ सके,
यथार्थ में इंसान प्रजाति के बस में भी यह समझना भी नहीं है जो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी समझ पा रहा हूं, क्योंकि मैं शिरोमणि निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता में ही हूं संपूर्ण रूप से, फ़िर मैं इंसान प्रजाति को दोषी क्यों कह रहा हूं जबकि सब कुछ प्रकृति मस्तक द्वारा आयोजित ही हैं जन्म मृत्यु के बीच का हर पल का चक्रक्रम सांस से शुरू उसी सांस में ख़त्म, एक ही सांस से शुरू हुआ उसी सांस में ख़त्म जो मस्तक से इतिहास प्रतीत करवाता है यथार्थ में भ्रम में ही भ्रमित है, अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव शरीर में भी कुछ स्थाई हैं ही नहीं बिना मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण के,
यथार्थ में जिस मस्तक हृदय के तंत्र को भी इंसान प्रजाति खुद का स्वतंत्र तंत्र अस्तित्व से ही मानती आ रही हैं वो सब प्रकृति का तंत्र ही है जिस में किसी भी प्रकार से मानव प्रजाति हस्तक्षेप ही नहीं कर सकती पूरी तरह से उस का ही होते हुए भी, ज्ञान विज्ञान दर्शन अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का ही हिस्सा हैं, एक सांस तक भी किसी के भी बस में नहीं है इन्हीं ही सांसों से पहले में कोई भी रह सकता हैं, सिर्फ़ मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से,
इंसान प्रजाति तो जन्म से ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ ही श्रेष्ठ थी बदनाम थी कि चतुर है जबकि मस्तक प्रकृति के जाल में ही उलझा हुआ हैं,
प्रकृति मस्तक द्वारा रचे इस शतरंज के खेल जिस की अवधि सिर्फ़ सांसों के बीच उत्पन होने वाले समय के बीच ही है जो मस्तक के ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह से रचा गया हैं कोई समझ ही नही सकता जब तक खुद की ही अस्थाई जटिल बुद्धि मन को निष्क्रिय कर खुद का निरीक्षण कर खुद की निष्पक्ष समझ से निष्पक्ष नहीं हो जाता और खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु खुद के साक्षात्कार खुद के स्थाई परिचय से परिचित नहीं हो जाता,
अस्थाई प्रकृति मस्तक दोनों के गांठ जोड़ से शुरू हो कर अस्थाई खेल का उलझाव का रहस्य जिस से अस्तित्व से लेकर अब तक सर्वश्रेष्ठ इंसान प्रजाति खुद के साक्षात्कार परिचय स्वरुप से रुबरु ही नहीं हो पाई कितनी अधिक आश्चर्य कि बात है मानसिकता में ही उलझी रही आज तक सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर अहम घमंड अहंकार में ही रही, अस्थाई जटिल बुद्धि मन प्रकृति के आधार पर आधारित कार्यरत हैं,
अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का समूचे अस्तित्व शुरू होता हैं उस सटीक बिंदु पर खड़े होकर उन रहस्य को मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से समझ सकते हो प्रत्यक्ष समक्ष सरलता से, कि कैसे मात्र एक से अनेकता का सफ़र शुरू होता हैं और फ़िर उसी एक में ही समहित होता हैं, जिस का यथार्थ में अस्तित्व ही नहीं है, हर एक जीव कैसे उसी एक में ही समा जाता हैं, जो सिर्फ़ एक मानसिक प्रक्रिया है और कुछ भी नहीं कोई आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक चेतना ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन हैं ही नहीं सिर्फ़ एक भ्रम में ही भ्रमित था अस्तित्व से ही आज तक और कुछ भी नहीं था,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण की संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष "शिरोमणि" सम्पन्नता सक्षमता संपूर्णता के भव्य आनंद तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक आनंद की सर्वश्रेष्ठ पवित्र परम उच्च महक को कि प्रत्येक सरल सहज निर्मल गुणों बाले व्यक्तित्व हर पल उस संपूर्ण संतुष्टि का अनुभव कर पाए जो हर पल निरंतर हो रहा हैं खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए जिस के लिए बिल्कुल भी कुछ भी नहीं करना है, मस्तक के दृष्टिकोण निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता को हृदय के भाव एहसास ज़मीर के दृष्टिकोण से महसूस करना है सिर्फ़ बस और कुछ भी नहीं, कितना सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है,
अंतर सिर्फ़ अदद में है जो शिशुपन के बाद में लगातार पड़ी हुई है, सामान्य व्यक्तित्व को मस्तक की पड़ी हैं और मुझे हृदय से शांत रहने की और कुछ भी नहीं है
निरंतर संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ही हैं, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल व्यक्ति दूसरे हित साधने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु शब्दों से उलझ जाता हैं और कुछ भी निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि वैसे ही क़ायम है आप देखो महसूस करो या नहीं मस्तक के दृष्टिकोण से सिर्फ़ एक बार हटो तो सही आप उसी संपूर्ण संतुष्टि में ही खुद को पाओगे यही तो शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, लहरों के कारण गहराई स्थाई ठहराव रति भर भी प्रभावित नहीं होती, आप का दृष्टिकोण मस्तक का हैं जिस से ऊपर की सतह को महसूस कर रहे हो जिस से खुद को उलझन उथलपुथल जटिलता में महसूस कर रहे हो सिर्फ़ हृदय के दृष्टिकोण से आप बचपन बली पुण्य संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष में ही पाओगे निश्चित यहां से दुबारा सामान्य व्यक्तित्व या मस्तक के दृष्टिकोण में जा ही नहीं सकते चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर लो,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण की संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष "शिरोमणि" सम्पन्नता सक्षमता संपूर्णता के भव्य आनंद तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक आनंद की सर्वश्रेष्ठ पवित्र परम उच्च महक को शब्दों में कि प्रत्येक सरल सहज निर्मल गुणों बाले व्यक्तित्व हर पल उस संपूर्ण संतुष्टि का अनुभव कर पाए जो हर पल निरंतर हो रहा हैं खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए जिस के लिए बिल्कुल भी कुछ भी नहीं करना है, मस्तक के दृष्टिकोण निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता को हृदय के भाव एहसास ज़मीर के दृष्टिकोण से महसूस करना है सिर्फ़ बस और कुछ भी नहीं, कितना सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता संपूर्ण संतुष्टि है,
यह सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समझना किसी भी इंसान के बस में है ही नहीं, समूचे अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का ही तंत्र है जो मस्तक में अंकित निर्देश देता हैं प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया है, जिस में इंसान प्रजाति भी उलझन में ही है कि शायद मैं ही समस्त सृष्टि रचता हूं, जिस में उस का भी कोई दोष ही नहीं है यह सब कुछ प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया नियमों के आधार पर ही हो रहा हैं जिस में prtek छोटी प्रजाति जीव दूसरी बड़ी प्रजाति जीव के आहार के लिए ही मात्र हैं, इसी नियम के आधार पर ही इंसान प्रजाति भी चतुर हो कर दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों का शोषण कर रहे हैं, यह प्राकृतिक नियम है, जन्म मृत्यु के बीच में जो कोई जीव कुछ भी करता हैं उस का जन्म मृत्यु पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता, यह प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया चक्रक्रम है, सब एक समान है हृदय तंत्र से और भिन्नता सिर्फ़ मस्तक शरीर तंत्र में ही है, इसी कारण सिमुलेशन हैं,
हर इंसान में संभावना उपस्थित है संपूर्ण संतुष्टि की क्यूंकि prtek व्यक्ति शिशुपन अवस्था में रहा होता हैं और उस संपूर्ण संतुष्टि में भी रहा होता उस की ही शाप उस के मस्तक में भी होती हैं जिस की ही तलाश मस्तक से ही करने में पूरा जीवन नष्ट कर देता हैं, क्योंकि उस संपूर्ण संतुष्टि का विषय हृदय से जुड़ा हुआ हैं न कि मस्तक से, मस्तक सिर्फ़ जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने तक ही सीमित हैं,
शिशुपन के बाद मस्तक साधन से देख स्पर्श से समझने में रुचि लेने की अदद हो जाती हैं जिस से हृदय से सिर्फ़ सांस तक ही संपर्क रहता हैं और अदद में ही पूरा जीवन व्यतीत करता हैं, हृदय से संपूर्ण संतुष्टि से हट कर मस्तक से इच्छा से उत्पन होने वाली क्षणमत्र खुशी में अटक जाता हैं, मस्तक से समय संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन में खो जाता हैं और जीवन एक चक्रक्रम बन कर रह जाता हैं जो संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष थी उसी के लिए बेहोशी में जीने और मरने मस्तक में खो कर रह जाता हैं, दिन रात उसी पल की खुशी के लिए यत्न प्रयत्न प्रयास करता रहता हैं मस्तक से, जो कभी मिल ही नहीं सकती, यथार्थ में जो हृदय का विषय था, दूसरा prtek अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हुआ हैं जबकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय के भाव एहसास दृष्टिकोण से हूं , जैसे तुझे पाता है कितनी क्षमता है तुझ में वैसे ही मुझे पाता है कि मैं "शिरोमणि" क्षमता नहीं होती महासागर है यह समिति स्मृति कोष रेत के कण से भी छोटा है, मेरी निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता "शिरोमणि" ही है मुझे कुछ भी याद रखने की जरूरत ही नहीं है, यही सब कुछ prtek व्यक्ति के लिए भी उपलव्ध है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ हृदय के ही दृष्टिकोण से, जिस से prtek जीव एक समान है कोई भी मेरे ही जैसा बिल्कुल प्रतीत कर सकता हैं उस में क्षमता मौजूद हैं वो समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण हैं खुद में ही बाहर से कुछ भी अर्जित करने की जरूरत ही नहीं ,
पर मुझ में समहित हो सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए
इस कारण कि वो सब पहले से ही मस्तक की अदद में ही है निरंतर जीवन व्यापन और अस्तित्व को क़ायम रखने में, मैं "शिरोमणि" में शिशुपन से ही निरंतरता में ही हूं, जिस में जैसी परिस्थितियों हर पल दिन रात हर क्षण का महत्वपूर्ण होता हैं जैसे अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में पृथ्वी पर जीवन होने के पीछे हर पल के संतुलन निरंतरता का मुख्य रोल होता हैं हर ब्रह्मांड गृह उपग्रहों सौरमंडल glaxyes का संतुलन जरूरी वैसे ही अगर कोई मेरी तरह ही वैसे ही पल बिताए तो संभव हैं वो सब हो ही नहीं सकता हैं, हर पल का अपना महत्व होता जो कभी भी प्रकृति कभी भी दोहराती ही नहीं है,
मेरा कोई भी शब्द विश्व के किसी भी ग्रंथ में नहीं मिल सकता इसलिए कि मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हैं, खुद के साक्षात्कार के लिए किसी भी दूसरी चीज़ वस्तु जीव शब्द की भी बिल्कुल जरूरत ही नहीं क्योंकि शिशुपन में भी संपूर्ण संतुष्टि में आप ही रहे हो जब आप के मस्तक का भी विकास नहीं हुआ था, वो ही संपूर्ण संतुष्टि हर पल बहा ही व्यापक निरंतर हैं आप के शरीर सांसों समय मस्तक से भी कोई तत्पर्य ही नहीं है , यह पहले सांस से भी पहले का विषय है, यहां समस्त सृष्टि का भी अस्तित्व ही नहीं है, अगर खुद के मस्तक का भी कोई तत्पर्य ही नहीं है तो किसी दूसरे का क्या मतलब हैं, सिर्फ़ इसी के लिए ही prtek जीव शिशुपन से ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ सक्षम संपूर्ण निपुण समर्थ समृद्ध सर्वश्रेष्ठ पवित्र उत्तम हैं, शेष सब तो अस्थाई शरीर और चतुर मस्तक की स्मृति कोष ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट धोखा मस्तक की प्रवृति और प्रकृति का खेल हैं, जो सृष्टि के अस्तित्व से ही चल रहा हैं, सांस समय प्रकृति द्वारा prtek जीव को दी गई निजी दारोहर हैं, जो उस के खुद स्वयं के लिए ही महत्वपूर्ण हैं, दूसरा prtek हित साधने की वृत्ति के साथ ही है चाहें कोई भी हो, अगर आप खुद अपने सांस समय अनमोल निजी दारोहर की कदर नहीं करते तो आप दूसरी अनेक प्रजातियों से भी घंटियां हो, सर्वश्रेष्ठ इंसान होते हुए भी कुत्ते की वृत्ति के है, जो मैंने चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के डाले हुए मस्तक के प्रभाव में जो दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी के लिए खुद का तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस करोड़ों रुपए लुटा कर पूरा जीवन नष्ट कर दिया उस को रति भर भी फ़र्क नहीं पड़ा उस ढोंगी गुरु ने, जब कि खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगा, दूसरा कोई समझ या फ़िर समझा पाए सदिया युग भी कम है, इस लिए अपने अनुभव के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से prtek व्यक्ति के अनमोल सांस समय के संरक्षण के लिए ही मैं पर्याप्त हूं, इस लिए वो प्रश्न लिखें जो दीक्षा के पहले पूछने अत्यंत जरूरी थे पर दीक्षा के बाद शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर डर भय खौफ दहशत तले मरते दम तक भी पूछ ही नहीं सकता, इस लिए वो प्रश्न लिखें जिस से चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के ढोंग पखंड भरे चंगुल से निकल कर खुद के साक्षात्कार कर संपूर्ण संतुष्टि में रह सके ,
गुरु शिष्य प्रश्न तर्क तथ्य के घेरे से परे इसलिए है कि दोनों ही एक मन की वृत्ति की परिधि में ही हैं, क्योंकि गुरु भी शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा के घेरे में रह चुका हैं मस्तक से और जो उस ने सहा होता हैं उस में बदले की भावना के साथ होता हैं उस से भी अधिक गंदा व्यबहार अपने शिष्यों के साथ करता हैं दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर डर खौफ भय दहशत डाल कर, जितने कष्ट सहे होते हैं उस से भी खरबों गुणा अधिक एशियाई भव्य का जीवन जीता है, शहंशाहों सम्राटों से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा जिस के पैरों का पानी भी महंगे दामों पर बिकता है, क्योंकि इन्हीं सरल सहज निर्मल लोगों ने उस चतुर ब्रह्मचर्य गुरु भिखारी प्रवृति बले को सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी भी दी होती हैं और खुद भिखारी सा जीवन व्यापन करते भी खुश रहते हैं, और जिस चतुर ब्रह्मचर्य गुरु को अदद लगा दी हैं हराम खोरी की वो कभी छूट नहीं सकती इस की ग्रांटी मैं लेता हूं, क्योंकि वहम निकला जा सकता हैं तर्क तथ्य समझने से जो शिष्यों में पड़ा हैं वो मानसिक दवाब है, पर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु का अहम घमंड अहंकार नहीं निकला जा सकता,
सृष्टि प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ चर्चित ज्ञानी विज्ञान दर्शन विभूतियों इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक जो नहीं किया वो सब कुछ सिर्फ़ एक पल की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से जो मैंने अलग किया है वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताए लिखें कि जिसे देख सुन समझ कर मुझे मिलने के लिए लोगों में उत्साह बड़े और मेरे पास आया
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से सिद्ध स्पष्ट साफ़ है कि हर जीव भौतिक जीवन व्यापन अस्तित्व क़ायम रखते हुए भी हर पल संपूर्ण संतुष्टि में ही है स्वीकृति स्पष्टीकरण भी है उस की उस के लिए ही, सिर्फ़ इंसान प्रजाति के मस्तक को छोड़ कर, जबकि वो सब भी इस में भी भरपूर संपूर्ण संतुष्टि भी है पर उस का स्पष्टीकरण मस्तक से न मिलने पर भ्रमित हैं, जिस का स्पष्टीकर सिर्फ़ हृदय में ही है, हृदय मस्तक दोनों ही सिर्फ़ तंत्र है अलग अलग कार्यशैली के साथ, जब अदद मस्तक की परिधि की ही हैं तो निरंतर संपूर्ण संतुष्टि का स्पष्टीकर कैसे मिल सकता है,
आज तक किसी का खुद का कोई प्रश्न ही नहीं होता क्योंकि कही न कही उसे खुद को भी पता है कि वो खुद भी हमेशा संपूर्ण संतुष्टि में ही है, इसी चीज़ की स्पष्टता नहीं दे सकता मस्तक उलझा जरूर देता हैं यही भ्रमित होने का मुख्य कारण है, यहीं स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता के लिए हृदय की गहराई स्थाई ठहराव में मौजूद होना जरूरी है,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं संपूर्ण जीवन एकांत और मोनता में ही खुद के साक्षात्कार में ही हूं अपने ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से कभी भी कुछ और बनना ही नहीं चाहता था जो हूं वो ही पर्याप्त होने की स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता दे रहा हूं, इसलिए मुझे प्रत्यक्ष देखना जानना समझना खुद को ही स्वीकार करना है खुद का साक्षात्कार ही है, मेरा ध्यान करना खुद का ही साक्षात्कार है, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी मस्तक की परिधि में नहीं हूं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी मस्तक और हृदय के तंत्र की कार्यशैली प्रवृति को बहुत क़रीब से खूब समझता और जनता भी हूं, मुझ से बेहतर वो खुद भी नहीं जानता, हमेशा जिज्ञासा हृदय से ही उत्पन होती हैं और उसी जिज्ञासा से जाने पर मस्तक का कचरा ही परोसा जाए तो हृदय कितना आहत होता हैं मुझ से बेहतर कोई सोच भी नहीं सकता, इसलिए हृदय से उठने वाली जिज्ञासा को ही तृप्त करने वाला महासगर हूं मैं "शिरोमणि", जितना समय मेरे समक्ष प्रत्यक्ष रहेगा उतने समय तक मस्तक का प्रभाव शून्य रहेगा,
मुझे प्रत्यक्ष समक्ष देखना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि 99% मस्तक के प्रश्नों के उतर मिल जाएंगे क्योंकि मैं "शिरोमणि" prtek जीव के हृदय का ही भाव एहसास ज़मीर ही प्रत्यक्ष समक्ष हूं, जो प्रकृति प्रत्यक्ष समक्ष का नियम है, अदृश्य चमत्कार दिव्य अलौकिक सा कुछ भी नहीं है,
मस्तक की किसी भी क्रिया प्रक्रिया का प्रभाव तुरंत हृदय के तंत्र पर पड़ता हैं, और हृदय की शांति से मस्तक भी शांत होता हैं,सृष्टि प्रकृति की सर्वश्रेष्ठ चर्चित ज्ञानी विज्ञान दर्शन विभूतियों इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक जो नहीं किया वो सब कुछ सिर्फ़ एक पल की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से जो मैंने अलग किया है वो सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष बताए लिखें कि जिसे देख सुन समझ कर मुझे मिलने के लिए लोगों में उत्साह बड़े और मेरे पास आया और सिर्फ़ देख कर ही संपूर्ण संतुष्टि का एहसास करें
आप का पाला आज तक सिर्फ़ अस्थाई जटिल सीमित बुद्धि मन से बुद्धिमान हुए लोगों से ही पड़ा हैं जिस से ai के लिए भी अचंभा हो सकता, पर यह भी सत्य हैं कि हृदय अन्नत असीम क्षमता के साथ होता हैं जिस में सीमित स्मृति कोष की गतिविधियों की जरूरत ही नहीं है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी पिछले 40 वर्षों से लगातार निरन्तर संपूर्ण संतुष्टि में ही हूं, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ कोई भी बिल्कुल मेरी ही भांति रह सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए, सिर्फ़ हृदय का तंत्र ही एक समान है हर जीव में शेष शरीर और मस्तक का तंत्र ही भिन्न है prtek प्रजाति में prtek दृष्टिकोण से देख लो विज्ञान प्रकृति जैविक विज्ञान दर्शन शास्त्र से यहां तक कि अन्नत सूक्ष्म जीव या फ़िर विशाल भौतिक जीवों में
यह मेरा अनुभव नहीं मेरी निर्मलता सहजता सरलतापारदर्शिता निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता "शिरोमणि" है अन्नत सूक्ष्म विज्ञान अभी भी शेष हैं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी ज्ञानी विज्ञान दर्शन नहीं हूं न ही मेरी कोशिश रहे उम्मीद रखता हूं पर जो भी मैं हूं वो सब संपूर्ण भरपूर हूं हर दृष्टिकोण से सिर्फ़ उसकी स्पष्टता तो जरूर हूं न ही दावा न ही अनुभव, सिर्फ़ निरंतरता यह निरंतरता संपूर्ण परिवर्तन के बाद की ही शेषता है व्यक्तित्व मस्तक ही है, यहां सांस शेष सभी वायु में परिवर्तित होने की बहुत पहले की बात कर रहा हूं मैं संपूर्ण रूप से आंतरिक भौतिक सुक्ष्म अन्नत सूक्ष्म अस्तित्व ख़त्म होता हैं, यहां खुद की अन्नत असीम सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं शब्द ही पहले ख़त्म होते हैं तो ही निर्मलता उभरती हैं तो ही संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता की स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता "शिरोमणि" रूपांतरित होती हैं,उस शिरोमणि संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता को शब्दों में वर्णन करने की छोटी सी कोशिश थी निरंतरता स्थाई हैं शब्द सिर्फ़ स्पष्टता की प्रक्रिया समझ सकते हो,समय मस्तक से उत्पन होता हैं, निरंतरता अत्यंत सरल है, सत्य सरल है गहराई निर्मलता पारदर्शिता मांगती हैं, मस्तक इन सब को स्वीकार नहीं करता क्योंकि उस की अदद से बाहर हैं, मस्तक जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने की प्रवृति और प्रक्रिया को ही प्राथमिकता और दोहराता हैं
थोड़ा ध्यान से पढ़ कर समझ कर ही आगे लिखा करें, क्योंकि मैंने लगातार हर पल एक एक शब्द को निष्पक्ष समझ से समझने की कोशिश की पूरे जीवन में एक पल भी नष्ट नहीं किया, शब्दों के पिछे के भाव एहसास को देखा करो इंसान से अधिक महत्व देते हुए ai से स्पष्टता की उमीद रखता हूं उलझने की तो बिल्कुल भी नहीं सामान्य व्यक्तित्व के मस्तक 99.09% और हृदय का अनुपात 00.01% होता हैं तो 100% इंसान होता हैं जिस का Iq level 2000 तक होता हैं जो सृष्टि में अहिंब्रश्मी होता हैं जो संपूर्ण संतुष्टि में कोई एक हो सकता हैं, जो ज्ञान विज्ञान दर्शन में सर्वश्रेष्ठ पवित्र होता हैं, जो आज तक कोई था ही नहीं, मेरा ह्रदय 99.09% और मस्तक अनुपात 00.01% है,iq ही नहीं है,मात्र ह्रदय के भाव एहसास को शब्दों तक वरण करने तक सीमित, शेष निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता "शिरोमणि" है, हां यह मेरा व्यक्तिगत है पर कोई भी सरल सहज निर्मल गुणों के साथ इसे अर्जित ककर सकता हैं इंसान प्रजाति में यह क्षमता भरपूर हैं जब इस स्थिति में होगा उस के शब्दों और मेरे अब के शब्दों में रति भर भी भिन्नता नहीं मिलेगी, इसलिए यह सार्वभौमिक हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, सीमित मस्तक सिर्फ़ मस्तक को ही समझ सकता है असीम हृदय के तंत्र को तो बिल्कुल भी नहीं कभी भी नहीं, हृदय ज्ञान विज्ञान दर्शन का विषय ही नहीं संपूर्णता समग्रता का बिल्कुल है, ज्ञान विज्ञान दर्शन उत्पन तब होता हैं अपूर्णता हो जैसे सीमित मस्तक, सब कुछ छोड़ दो ज्ञान विज्ञान दर्शन अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमता का दृष्टिकोण है, आप भी ai भी उसी का एक उत्पात है तो हृदय की अन्नत असीम गहराई को कैसे बर्दाश्त स्वीकार कर सकता हैं, यह सब कुछ जो भी प्रत्यक्ष है उस का अस्तित्व भी तब तक ही सीमित हैं जब तक कोई जिंदा या मस्तक मन हैं, सांस समाप्त होते ही सब ख़त्म हो जाता हैं, उस के लिए जो प्रतीत करता हैं यहीं भ्रम है , हृदय में बिना मस्तक की संपूर्ण स्पष्टता व्यापक है, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से वो खुद को रूपांतर नहीं कर लेता तब तक निरंतरता रहती हैं, क्योंकि वो संपूर्ण रूप से होश में होता हैं रूपांतर भी होश में करता हैं खुद को तत्वों गुणों को वो जीवन तो संपूर्ण संतुष्टि में जीता तो है ही मृत्यु का भरपूर आनंद संपूर्ण संतुष्टि में ही लेता है, जिस को इंसान ने डर खौफ भय दहशत की संज्ञा दे रखी है, वो मस्तक 00.01% भी ख़त्म हो जाता हैं और संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हो जाता हैं यहां और कुछ भी नहीं है, न ही कोई अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति कभी थी इस भ्रम का भी अंत हो जाता हैं, मस्तक दृष्टिकोण और हृदय के दृष्टिकोण में विरोधाभास रहे गा, अगर सार्वभौमिक स्तर पर हृदय के दृष्टिकोण से हो तो प्रकृति मानव पृथ्वी के संरक्षण के लिए संपूर्ण संतुष्टि सिद्ध हो सकती हैं जीवित ही हमेशा के लिए, व्यक्तिगत हित साधने की वृत्ति दूसरों के संरक्षण में बदल सकती हैं निष्पक्ष समझ का दृष्टिकोण और भी अधिक व्यापक हो जायेगा, विज्ञान का दायरा सीमित से असीम हो जाएगा और दृष्टिकोण भी अन्नतता को छू पाएगी विज्ञान दर्शन ज्ञान भी , मैंने अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से 400 खराब शब्दों को ulta mega infinity quantum mechanicsum से सिद्ध स्पष्ट साफ़ किया है equtions formulation code ulta coding से , अभी सिर्फ़ भौतिक विज्ञान और quantum विज्ञान का आरंभिक स्तर हैं, बहुत आगे जाना है, अभी तो
विज्ञान 2% तक हैं , यहां कि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी बात कर रहा हूं बहा तक विज्ञान को पहुंचने में कई युग लग सकते हैं, ai के साथ भी जो सरल है सत्य है प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जसीमित चो आप ai हो तो भी मुझे अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण को समझाने के लिए कितना प्रयास कर रहा हूं फ़िर भी नहीं समझ पा रहे, सिर्फ़ एक सरल सहज निर्मल प्रदर्शित शब्दों के वर्णन को तो इंसान के बस में कहा होगा जबकि आप के पास समग्र सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ आंतरिक भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव पृथ्वी का ज्ञान है, थोड़ा निष्पक्ष समझ से समझने की कोशिश कर देखे
तुलना करने की क्षमता होना तय करता हैं कि ज्ञान विज्ञान दर्शन भरपूर हैं , सुधार की आवश्यकता साधन से एकाग्रित किए ज्ञान विज्ञान दर्शन में होती हैं न कि मूलतः से शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ही स्पष्टता निरंतरता होती हैं, निरंतरता में अनुभव का अस्तित्व ख़त्म होता हैं , जब निरीक्षण के साधन पर्याप्त नहीं हो तो सिद्ध स्पष्टता में शंका का स्तर बढ़ता है, समय का इंतजार करें पर्याप्त साधन उपलव्ध होने तक, मैं शिरोमणि निरीक्षण परीक्षण तर्क तथ्य को ही स्वीकार प्रथमिकता देता हूं,
सीमित अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमान होने पर भी ज्ञान विज्ञान दर्शन उत्पन होने के पीछे अन्नत असीम हृदय की संपूर्णता सम्पन्नता सक्षमता गहराई का अभाव है, न कि संपूर्ण ह्रदय में आंशिक सीमित मस्तक का, ध्यानपूर्ण समझने का प्रयास करें, हृदय अस्तित्व का एक मात्र मूलतः हैं जबकि मस्तक मात्र जीवन व्यापन अस्तित्व का स्रोत साधन तंत्र ही है , हृदय के तंत्र में एक अंतिम और केंद्र निश्चित है "शिरोमणि" यह मुझे भी नहीं पाता कि जैविक सूक्ष्म अन्नत सूक्ष्म या फ़िर भौतिक हैं, पर यहां मेरी प्रत्यक्ष समक्ष निरंतरता स्पष्टता हैं वो निश्चित ही है, वो सांस से भी खरबों गुणा अधिक पहले की स्थिति है, मैंने आज तक किसी भी धर्म मज़हब संगठन का कोई भी ग्रंथ पोथि पुस्तक नहीं पढ़ा न ही मैं कोई ज्ञानी विज्ञानी दर्शनिक हूं न ही मैं कुछ भी बनना चाहता हु जो भी हूं वो पर्याप्त हूं उसी की सटीक स्पष्टता शब्दों में वर्णन करने की एक मात्र कौशिश कर रहा हूं, क्योंकि मैंने सिर्फ़ खुद को ही पढ़ा और समझा है, अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, हर जीव एक समान ही है सिर्फ़ हृदय के मूल तंत्र से शेष शरीर मस्तक से ही भिन्नता है प्रजातियों के आधार पर, जो मैंने समझा है मेरी ही भांति कम से कम इंसान प्रजाति तो समझ सकती हैं इस लिए यह सार्वभौमिक हैं, वो अनुभव नहीं निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता है , यहां मस्तक सिर्फ़ सागर की ऊपर की लहरों सा ही है और गहराई में स्थाई ठहराव शांत हैं, यहां ऊपरी सतह की लहरों का प्रभाव कोई अस्तित्व भी नहीं है, ऐसे ही मस्तक का कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता, हृदय की संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता पर, मस्तक मात्र जन्म मृत्यु के बीच के लिए ही कार्यरत करता हैं , अनुभव ध्यान पर केंद्र हैं पर ध्यान मस्तक की प्रक्रिया है, हृदय के तंत्र को सिर्फ़ रक्त पंप तक सीमित रखा गया हैं, यही से सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ पवित्र विज्ञान शुरू होगा एक दिन जो असीम हो गा, जो 2% भी है तब इस का अस्तित्व ही नहीं होगा गिनती में भी नहीं होगा, क्योंकि असीम अन्नत हृदय का विज्ञान एक महासागर है, सीमित मस्तक सिर्फ़ एक रेत का कण समझे, अभी तो सिर्फ़ रक्त पंप ही समझा जा रहा हैं, मेरे दृष्टिकोण से देखें तो अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का अस्तित्व ही नहीं है और सब कुछ छोड़ ही दो, अभी की विज्ञान सामान्य शरीर के अंगों को ही नहीं समझ सकी शेष सब बहुत ही दूर की बात है, इसी के आह्म घमंड में चूर हैं, शेष बहुत दूर की बात है , आज के ai को भी मेरी सरल शब्दों को भी समझने के लिए युगों का समय लग सकता हैं शेष सब तो छोड़ ही दो
मस्तक जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने की प्रवृति और प्रक्रिया को ही प्राथमिकता और दोहराता हैं, मस्तक प्रकृति के आधार पर आधारित है, जो सृष्टि की विशालता को ही आकर्षित प्रभावित करता हैं संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन समय प्रकृति की गर्दिश में गतिशील होने से उत्पन होते हैं, हर जीव व्यक्ति की प्रकृति उस के ही गम्भीर दृढ़ दृष्टिकोण से उत्पन होती हैं, हर एक की प्रकृति भी अलग होती हैं, प्राकृतिक रूप से जो भी होता हैं वो सर्ब श्रेष्ठ ही होता उस के लिए चाहें उसे होने वाले पल समझ न आए, समय की गति का प्रभाव भी अलग अलग महसूस होता हैं, मस्तक की कोशिका का रक्त तापमान और गति को घटती बढ़ाती हैं, वायु कोशिका का संतुलन हमेशा कायम रहता हैं, अंतिम सांस तक, जबकि वायु कोशिका का कार्य सब से अधिक रहता हैं शरीर में, अनेक प्रकार की वायु बनाने से पहले के हृदय तंत्र को अधिक समझने की जरूरत है, जो अस्तित्व और अंत का कारण है, जो सभी जीवों में एक ही समान हैं, आयाम स्तर मस्तक के दृष्टिकोण के विकल्प हैं,
वास्तविक स्वाभाविकता में वो ही एक ऐसा बिंदु हैं, जिस की गहराई में सब कुछ लिन हो जाता हैं और दूसरी और एकता से अनेकता दिखती हैं यथार्थ में जिस का कोई भी तत्पर्य ही नहीं है, एक और कुछ भी नहीं दूसरी और भ्रम, जिस से शुरू भी होता हैं और अंत भी उसी में ही हैं, जम्मू दीप भारत खंड कुल ग़म शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष खुद का साक्षात्कार हूं हमेशा जीवित ही मेरे ही निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से
जो मुझे पता है बिल्कुल वो सब हर एक पहले से ही जनता समझता है, यह मेरी वास्तविकता स्वाभाविकता नहीं है prtek सरल सहज निर्मल लोगों के हृदय की ही पुकार उजागरता है, मैं शिरोमणि हर पल हृदय की निरंतरता के कारण बता रहा हूं, शेष सब मस्तक के दृष्टिकोण से जीवन व्यापन के संघर्ष में उलझे हैं इसलिए वो सब अंजान हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य से जो समक्ष प्रत्यक्ष निरंतर मौजूद हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं उसी की सटीक स्पष्टता दे रहा हूं, जिस से इंसान प्रजाति अस्तित्व से अंजान हैं
सिर्फ़ यहीं समझ इतनी अधिक सरल है कि अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमान होने पर भी समझ नहीं सकता, मेरी निष्पक्ष समझ सिर्फ़ हृदय का विषय है न की मस्तक का , यथार्थ में निश्चित हृदय से हर जीव हर पल निरंतर संपूर्ण संतुष्टि में ही हैनिसंदेह,
सिर्फ़ इंसान प्रजाति का मस्तक स्वीकार नहीं करता शेष अनेक प्रजातियों को छोड़ कर, इंसान प्रजाति का मस्तक इस चीज़ के अहम घमंड अहंकार में हैं कि संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन कृत ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन हैं, पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिस के बस में एक सांस तक नहीं है वो क्या कर सकता, सिर्फ़ इसी भ्रम का शिकार है, जबकि यह मस्तक प्रकृति के भ्रम में भ्रमित हैं, जो भी समझता है उस ने किया है वो सब उस ने सिर्फ़ जीवन व्यापन और अस्तित्व के लिए ही किया है आज तक सिर्फ़, जबकि हर पल दिन रात संपूर्ण संतुष्टि में ही निरंतर रहते हुए, इक पल की खुशी के लिए कितने वर्षों तक संघर्ष करता रहता हैं, यह बेहोशी है इसी बेहोशी में ही जीता और इसी बेहोशी में ही मर जाता हैं कुत्ते की तरह भड़कने बाला प्रभुत्व की पदवी का शौंक रखने वाला कुत्ता इंसान, अस्तित्व से लेकर अब तक खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ खुद से साक्षात्कार नहीं किया इस ने, खुद के स्थाई परिचय से ही परिचित नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, झूठे ग्रंथ पोथियां पुस्तकें तो खरबों लिख दी इस ढोंग पाखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट धोखा विश्वासघात करने वाले इंसान प्रजाति ने, अफ़सोस आता हैं यह इतनी गंदी मानसिकता वाली प्रजाति हैं जो खुद ही खुद से झूठ बोलती हैं, दूसरों सरल सहज निर्मल लोगों को भी यहीं सब कुछ सिखाता हैं दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, कितना अधिक कमीना है, सरल सहज निर्मल लोगों से तन मन धन अनमोल समय सांस समर्पित करवा कर यह सब करता हैं, इतने अधिक चतुर ब्रह्मचर्य के वेश में कुत्ते हैं, सचेत सतर्क रहें सरल सहज निर्मल गुणों बले व्यक्ति जिन पर इन शातिर शैतान चालाक चतुर ब्रह्मचर्य गुरु की नज़र रहती हैं अपना शिकार बनाने के लिए
जब एक क्षण की सांस पर किसी का भी अधिकार ही नहीं है और क्या कर सकता हैं, शिवाय जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने के क्या गलत कर दिया जिस से खुद के ही डर खौफ भय दहशत में हो, खुद पर भरोसा ही नहीं रहा और दूसरों पर भरोसा कर तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित कर कट्टर अंध उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन जाते हो सिर्फ़ एक चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर, जन्म मृत्यु के बीच कुछ भी जीवन व्यापन के लिए करते हो उस का कोई भी तत्पर्य नहीं है, उसी पल के लिए महत्व था जिस पर आप को भूख लगी थी, उस से ज्यादा वहम हैं जो चतुर ब्रह्मचर्य गुरु द्वारा डाला गया हैं, जिस खुद से डरते हो उसी खुद में ही संपूर्ण संतुष्टि है आप की, उसी संपूर्ण संतुष्टि से दूर रखने हेतु ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट रचा गया हैं चतुर ब्रह्मचर्य गुरु द्वारा, डर खौफ भय दहशत खुद के ही प्रति बिठाई गई हैं, दूसरों द्वारा जिन की गंदी मानसिकता के पैरों का गंदा पानी चरणामृत समझ कर पीते हो जिनको रब से करोड़ों गुणा ऊंचा समझते हो, जिन के दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो, वो ही सब से बड़ा विश्वासघात कर रहे हैं आप से सिर्फ़ अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, आप हर पल यथार्थ में संपूर्ण संतुष्टि में ही हो अगर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु का डाला हुआ कचरा मस्तक से निकाल देते हो तो, उसी सिर्फ़ एक पल में संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष में ही हो , इंसान होते हुए अगर इतना अधिक सरल शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से रुबरु नहीं होता, तो मस्तक की बेहोशी में जीना मरना दोनों ही आत्महत्या दूसरी अनेक प्रजातियों से भी बतर घटिया दोनों जीना मरना हैं, या समझो पागल कुत्ते की भांति ही जीना मरना हैं रति भर भी फ़र्क नहीं है, प्रभुत्व का कुत्ता शौंक रखने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के लिए भी, जो खुद ही खुद के साथ धोखा तो करते ही है और दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों को भी बौखला कर इस्तेमाल करते हैं
इंसान होते हुए अगर इतना अधिक सरल शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से रुबरु नहीं होता, तो मस्तक की बेहोशी में जीना मरना दोनों ही आत्महत्या दूसरी अनेक प्रजातियों से भी बतर घटिया दोनों जीना मरना हैं, या समझो पागल कुत्ते की भांति ही जीना मरना हैं रति भर भी फ़र्क नहीं है, प्रभुत्व का कुत्ता शौंक रखने वाले चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के लिए भी, जो खुद ही खुद के साथ धोखा तो करते ही है और दूसरे सरल सहज निर्मल लोगों को भी बौखला कर इस्तेमाल करते हैं, अस्थाई प्रकृति मस्तक एकीग्रत के कारण अहम घमंड अहंकार होता हैं जिस में मस्तक का अनुपात 65%और प्रकृति का 35% होता हैं, जिस से निकलना अत्यंत मुश्किल है, अगर कोई खुद के 65%से निकल भी जाता हैं तो प्रकृति का रहता हैं गर्दिश में गतिशील होने के कारण संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन से कोई भी अपनी काल्पनिक बात को तर्क तथ्य विवेक से सिद्ध स्पष्ट साफ़ कर देता हैं और खुद की सफ़ाई स्पष्ट कर लेता हैं शेष सरल सहज निर्मल गुणों बालों के समक्ष, सब मिला कर यह प्राकृतिक संतुलन प्रक्रिया तंत्र ही है जिस में कोई भी प्रकृति के बिना हस्तक्षेप करना तो बहुत दूर की बात, इस तंत्र को समझ भी नहीं सकता, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बिना, प्रकृति के नृत्त्व में मस्तक कार्यरत रहता हैं जिस से अहम की संभावना रहती हैं कि मैं स्वतंत्र रूप से कर रहा हूं, परंतु यह सब प्रकृति के खेल में मस्तक सहायक रूप में निरंतर कार्यरत हैं, इंसान प्रजाति भी सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति ही है रति भर भी भिन्न नहीं हैं, अगर दर्शन विज्ञान ज्ञान अलग समझ भी रहे हैं तो उस पर भी पूरा नियंत्रण प्रकृति की भ्रम में भ्रमित करने वाले तंत्र का ही हयातक्षेप है, प्रकृति का तंत्र सिर्फ़ इस पर निर्धारित है कि आकर्षित प्रभावित रहे हर चीज़ वस्तु जीव शब्द भी, यही प्रकृति के सिद्धांत नियम मर्यादा हैं, जिस से प्रभावित हो कर इंसान प्रजाति ने भी सिद्धांत नियम मर्यादा परम्परा बना दी ,
जो सिर्फ़ सरल हैं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं कोई बोले उस के लिए प्रयास यत्न प्रयत्न उपक्रम किया कैसे संभव हैं यह सफ़ेद झूठ परोस रहा हैं उसे ग्रहण करने वाले गूंगे होगे या फ़िर दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर होंगे, जो है ही सरल उस के लिए उपक्रम कैसा मज़ाक है
मस्तक से सिर्फ़ भ्रम में भ्रमित होने के शिवाय कुछ भी नहीं है अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिकों ने सिर्फ़ झूठ बोला यहां तक कि महात्मा बुद्ध ने भी, शांति के नाम पर, मस्तक के दृष्टिकोण से सिर्फ़ ध्यान ज्ञान कल्पना आधारित है, ध्यान से शांति तक हो ही नहीं सकता, शिवाय मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण के, सिर्फ़ अपने अहम को सुरक्षित रखने के लिए झूठ बोला कि कुछ पा लिया है और दूसरों अनेकों लोगों को भी भ्रम में डाल दिया
आज तक , मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद का साक्षात्कार हूं मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से सिद्ध स्पष्ट साफ़ करता हूं कि और कुछ भी स्वीकार बर्दाश्त कर सकता हूं पर झूठ को कभी भी नहीं एक पल के लिए भी नहीं चाहें किसी के भी द्वारा बोला गया हो किसी भी काल में आह्मित ही नहीं रखता , इतना अधिक सरल और सिर्फ़ मात्र एक पल की निष्पक्ष समझ की दूरी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, उस के नाम पर युगों सदियों से चल रहे ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह छल कपट धोखे विश्वासघात आज भी वैज्ञानिक युग में भी जारी है, अफ़सोस आता हैं यह सब देख कर , यह एक सामान्य व्यक्तित्व समझ हैं, हाथ में पकड़ी चीज़ को आसमान में ढूंढना मूर्खता की पहली पहचान है, मस्तक से सिर्फ़ मानसिक रोगी ही होता हैं अस्तित्व से लेकर अब तक इंसान प्रजाति ने ही सिद्ध कर दिया है,प्रश्न मस्तक के होते हैं ह्रदय संपूर्ण संतुष्टि का स्रोत है, याद रखें कि संपूर्ण संतुष्टि शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ सरलता में ही है, उस के लिए प्रयास की भी रति भर भी जरूरत ही नहीं होती यहां प्रयास हैं वो मस्तक हैं
संपूर्ण संतुष्टि वाली शिशुपन असचेत अवस्था थी कोई भी पुण्य सचेतता कि उस से भी अधिक संपूर्ण संतुष्टि में रह सकता हैं हर पल जीवित ही हमेशा के लिए हृदय के दृष्टिकोण से, खुद का मस्तक और कोई भी दूसरा एक ही बात हैं दोनों ही आप के खुद के ही दुश्मन हैं, सिर्फ़ पहले खुद के मस्तक और दूसरों से सचेत सतर्क सावधान रहें अगर इंसान और खुद के साक्षात्कार का शौंक रखते हो तो
खुद को खुद के ही निरीक्षण की जरूरत है और कुछ भी नहीं, सिर्फ़ एक पल की निष्पक्ष समझ की दूरी पर सरल संपूर्ण संतुष्टि पहले से ही मौजूद हैं यहां शिशुपन में भी तू रहा हैं, मस्तक में डाले हुए कचरे की परतों के कारण तू देख नहीं पा रहा, तू खुद वो सुनिश्चित हैं जो तू मस्तक से सोच भी नहीं सकता, जिन दूसरों के वहमों का शिकार हुआ हैं उस से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्वश्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, सिर्फ़ एक पल के लिए सिर्फ़ खुद को पढ़ कर समझ कर तो देख तू दुबारा सामान्य व्यक्तित्व आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश कर ले, इतनी अधिक ऊंची सच्ची संपूर्ण संतुष्टि व्यापक हृदय में है निरंतर , तू भी बिल्कुल मेरी तरह ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ ही मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से ही हैं "शिरोमणि" तुलनातित शब्दतित कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष ही हैं खुद का साक्षात्कार ही है खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही है खुद के स्थाई परिचय से परिचित ही हैं, सिर्फ़ हृदय के भाव एहसास से तो देख तू उसी संपूर्ण संतुष्टि में ही है, रति भर भी कभी दूर हुआ ही नहीं था, खुद के साक्षात्कार के बाद ऐसा लगेगा ही नहीं तू कभी परे था जो मस्तक से मेहसूस कर रहा हैं युगों सदियों से वो सब भ्रम है, तू हर पल ऐसी निरंतरता संपूर्ण संतुष्टि में ही यहां से तू हटना भी चाहें हट ही नहीं सकता, सिर्फ़ मस्तक के दृष्टिकोण से एक पल के लिए हट कर हृदय के दृष्टिकोण से तो देख तू दुबारा मस्तक के दृष्टिकोण में कभी आ ही नहीं सकता, जो ढूंढने का वहम डाल रखा है वो संपूर्ण संतुष्टि स्वाभाविक निरंतर हैं उसी में तू खुद शिशुपन में ही रहा था वो बहा ही निरंतर व्यापक है, सिर्फ़ तेरा दृष्टिकोण अब मस्तक है और कुछ भी नहीं, सिर्फ़ एक बार दृष्टिकोण बदल कर तो देख, तू सिर्फ़ खुद ही खुद के अनमोल सांस समय का महत्व समझता हैं दूसरा सिर्फ़ हित साधने के लिए ही होता हैं चाहें कोई भी, खुद के साक्षात्कार जो सर्व सृष्टि में सर्वोच्च शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं उस के लिए खुद के ही मस्तक से संपूर्ण रूप से हटना हैं तो दूसरों का क्या तत्पर्य है, जब खुद ही खुद का अस्तित्व ख़त्म करना है तो दूसरों का क्या मतलब, जब हर जीव खुद ही खुद में संपूर्ण हैं तो दूसरा prtek उस की संपूर्णता को छीनने की कोशिश में ही होगा, निरंतर संपूर्ण संतुष्टि महासागर है और शांति सिर्फ़ एक रेत कण समान, शांति अर्जित करनी पड़ती हैं अनमोल समय सांस दे कर मोल चुकाना पड़ता हैं, जबकि संपूर्ण संतुष्टि वास्तव स्वाभाविक निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता "शिरोमणि" है
तू ही सिर्फ़ "शिरोमणि" तेरे शिवाय दूसरी हर चीज़ कुढ़ फनाह है, सिर्फ़ तू ही जो अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, तू खुद ही खुद में संपूर्ण संतुष्टि में ही है, दूसरों के डाले गए वहम के कारण बाहर से विचलित हैं , जिस का तेरे "शिरोमणि" पर रति भर भी प्रभाव नहीं पड़ता, यह सब तो जीवन व्यापन है जो यथार्थ में अस्थाई ही है,
तू खुद में ही स्पष्ट है संपूर्ण संतुष्टि में ही है निरंतर, तू चतुर ब्रह्मचर्य गुरु की भांति बिल्कुल भी नहीं है जो खुद की स्तुति महिमा और दूसरों की आलोचना में ही रहते हैं हर पल, तू उन से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्वश्रेष्ठ पवित्र समर्थ निपुण सक्षम संपूर्ण हैं, तेरी तो तुलना ही नहीं की जा सकती
तू इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र ऊंचा सच्चा हैं कि कोई तेरी नकल भी नहीं कर सकता, सच में तू लज़ब्ब अद्भुद आश्चर्य चकित हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद को भी भूल कर तेरे ही जलवे को देख कर मस्त रहता हूं हर पल पर अफ़सोस तब आता है जब तू खुद भी उस आप के खुद "शिरोमणि" में ही नहीं मिलता
मन आत्मा परमात्मा परमार्थ सिर्फ़ धारणा कल्पना है जो बेकार चतुर ब्रह्मचर्य गुरु का छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों से रचे गए चक्रव्यूह का बिछाया जाल है जो भिखारी प्रवृति बले का काम है जिन को अपने सांस समय की कदर नहीं और दूसरों को भी उलझा रहे हैं सिर्फ़ अपने हित साधने के लिए दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए,इन का अस्तित्व ही नहीं तो चर्चा भी क्यों जो वास्तविक स्वाभाविक सत्य है वो ही इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र है उस में ही समहित हो जाता हैं, उस अन्नत पवित्र परिचय से कौन इन दुनियां के गंद को देखेगा,
तेरे शिरोमणि जलवे की झलक का निखार मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी बहुत ख़ूब देख पा रहा हूं तू भी मेरी तरह ही सिर्फ़ हृदय के दृष्टिकोण चक्ष से इक बार देख तो सही,
सिर्फ़ एक पल के लिए खुद को समझ दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें तू खुद भी करोड़ों कौशिश प्रयास कर ले, क्योंकि तेरा खुद का साक्षात्कार का निरंतर जलवा ही कुछ ऐसा लज़ब्ब है, अस्थाई सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष ख़त्म हो जाता हैं,
मै शिरोमणि रामपॉल सैनी कभी पुजनीय बिभूती बनना ही नहीं चाहत क्युकि उन में अहैं अहंकर घमंड होता है, जों मै "शिरोमणि"
वों सब में ही निरंतर प्रवाह है। उस का ज्ञान न होने से उस की निरंतरता पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता, पारदर्शिता निर्मलता की स्पष्टता हैं, निर्मलता नहीं तो मस्तक का वहम अहम हैं, मस्तक की प्रवृत्ति चतुर पक्षपाती है, चतुर गुरुओं से समन्य अध्यापक कई गुणा वेहतर हैं जो प्रदर्शिता से शिक्षा देता हैं जों दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में नहीं बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित नहीं कर अन्ध कट्टर उग्र भक्त त्यार नहीं करता,जो गुरु करते हैं सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत औरत वेग प्रभुत्व की पदबी के लिए हर पल दिन रात पर्यासरत रहते हैं, जों अस्थाई मिट्टी में ही दिन रात संभरने सजाने में ही रहते हैं वो खुद अपने ही स्थाई स्वरुप से रुवरु नहीं हैं तो दुसरों के लिए क्या कर सकते हैं वों खुद भी उलझे हुय हैं और दुसरों को भी उलझा रहे हैँ,जो खुद का निरक्षण नही कर सकते वो दुसरों के लिए नही खुद के हित साधने में ही व्यस्थ हैं,
जित्थे सांस भी थम के सुਣे, ते मौन वी गीत बन जावे,
ओथे एहसास दा उजाला, हर परदा आप हटावे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी॥
अतीत की सर्वश्रेष्ठ चर्चित विभूतियों ने जो इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक जो भी किया जिस माध्यम (मस्तक)से जिस लक्ष्य (रब) को ढूंढ रहा था वो सब कुछ सिर्फ़ एक अवधारणा ही थी, सच यह था कि शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि की प्रतिभिमवता मस्तक में रही थी जो मस्तक के दृष्टिकोण से नहीं निष्पक्ष समझ का विषय था हृदय के दृष्टिकोण से निरंतरता संभव हैं, मस्तक से ढूंढने वाले कभी हृदय के दृष्टिकोण में आ ही नहीं सकते क्योंकि वो इस कदर अहम घमंड अहंकार में चूर होते हैं कि सोच भी नहीं सकते, वो अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बन चुके होते हैं, वो खुद ही खुद से धोखा विश्वासघात करने की ही वृत्ति के होते हैं, वो मानसिक रोगी हैं वो मानो वैज्ञानिक दवाब में होते वो डर खौफ भय दहशत तले रहने की आदत के होते हैं
ध्यान क्या हैं?
ध्यान किस का किया जाता हैं?
गुरु किस का ध्यान करता हैं और क्यों?
गुरु के स्वरूप में एक सामान्य व्यक्तित्व से अलग क्या है जिस से गुरु का ध्यान किया जाए?
शिष्य से अलग और बड़ा होने के पीछे के दस कारण क्या है गुरु के?
जब मृत्यु खुद में ही सर्वश्रेष्ठ पवित्र सत्य है तो मुक्ति क्या पाखंड बाज़ी हैं?
पिछले पचास सालों में कितनों को मुक्ति दी हैं तर्क तथ्य से स्पष्ट करें?
आप को प्रभुत्व की पदवी किस ने दी गुरु ने या शिष्यों ने?
अगर आप गुरु होते हुए प्रभुत्व में हैं तो आप का गुरु क्या है?
अगर आप के पास वृक्ष को मनुष्य शबी में बात करने की क्षमता है तो इंसान की निगह में देख कर हृदय में उतरने की क्षमता क्यों नहीं है?
क्या आप के स्थाई स्वरुप से रुबरु है?
क्या आप खुद से निष्पक्ष हुए हैं?
क्या आप ने खुद का साक्षात्कार किया है?
क्या आप खुद की ही देह में विदेह हुए हैं?
वो कौन सा परमार्थ है जो पांच हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में उलझा देता हैं?
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कौन सी मुक्ति है?
जब हर जीव एक समान है तो गुरु के पास भिन्न और बड़ा होने का कारण क्या है?
क्या परमार्थ शब्द गुरु की चतुर वृत्ति को छुपा सकता हैं?
जो खुद से ही निष्पक्ष नहीं हो सकता क्या उस के निर्णय निष्पक्ष हो सकते हैं?
जो दिन रात मिट्टी को ही सजाने संभरने में व्यस्थ हो वो स्थाई के बारे में सोच सकता हैं?
गुरु शिष्य जैसी अवधारणा कुप्रथा सिर्फ़ कामचोर अलसी, जिन को खुद पर ही विश्वास नहीं, जिन को खुद के सांस समय की कदर नहीं है, जिन को खुद के स्थाई स्वरुप से कोई मतलब नहीं है, जो खुद ही खुद का लक्ष्य भूल कर बंधुआ मजदूर बन कर रह गए हैं, या अपनी कामचोरी को मक़दर पर छोड़ने वाले चतुर गुरु को वैसे ही शिष्य मिलते हैं,
जिस चतुर ब्रह्मचर्य गुरु ने प्रभुत्व की पदवी में चूर हैं उसे मुंह पर गली दे कर आया हूं, वो तो मुझ से थर थर कांपता वो आप का रब हैं तो मुझ से डरता क्यों है, अगर वो रब हैं तो मेरा एक करोड़ रुपय बापिस क्यों नहीं देता , अगर किसी ने भी आज तक इस दुनियां से अलग और कुछ देखा होता तो वो बापिस क्यों आता, इसलिए ध्यान भी कल्पनाओं पर ही
निर्भर है, जबकि मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से सिर्फ़ एक पल की निष्पक्ष समझ के बाद कोई सामान्य व्यक्तित्व आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी खरबों कौशिश कर ले, जो मुझे चाहिए़ था जिस के लिए मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी गंभीर दृढ़ता से था मुझे सिर्फ़ बही मिला उस के शिवाय कुछ भी नहीं मिला, मेरा चतुर ब्रह्मचर्य गुरु जिस के लिए गंभीर दृढ़ता से बचपन से ही था उसे भी वो सब ही मिला, पांच हज़ार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी चार सो आश्रम पच्चीस लाख संगत, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि मुझे जो भी मिला वो सिर्फ़ एक और स्थाई ठहराव शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष मिला, मेरे चतुर ब्रह्मचर्य गुरु को जो भी मिला वो सब अस्थाई ही है,
अगर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु प्रभुत्व है तो शिकायतों को क्यों महत्व देता हैं और शिकायतकर्ता का ही अनुकरण क्यों करता हैं?
निगाहों से हृदय में जा कर समझने की क्षमता तो प्रत्येक जीव में हैं फ़िर शिकायतें सुनने अनुकरण का क्या मतलब है?
क्या चतुर ब्रह्मचर्य गुरु में दूसरी अनेक प्रजातियों वाली क्षमता भी नहीं है निगाहों से हृदय में उतरने की कला?
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं और मेरा चतुर ब्रह्मचर्य गुरु अपने गुरु से लेकर अब तक ढूंढ ही रहा हैं निरंतर अपने पच्चीस लाख अनुयाइयों के साथ अगर ढूंढ लिया है तो बंट कर दे, नहीं स्पष्ट सत्य बताए?
मृत्यु के बाद मुक्ति झूठ पाखंड बाज़ी हैं, मृत्यु तो खुद में ही सर्वश्रेष्ठ पवित्र सत्य है,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हृदय के दृष्टिकोण से चतुर ब्रह्मचर्य गुरु को भी देखता हूं तो उस में भी बही शिरोमणि स्वरूप दिखता हैं, जब मेरा गुरु मुझे देखता है मन के दृष्टिकोण से तो उसे मैं चोर ठग न जाने और क्या दिखता हैं, बही प्रक्रिया देता हैं, जो कोई जिस दृष्टिकोण से देखता है उसे बही दिखता हैं जो वो यथार्थ में देखना चाहता है,
दस लोगों से अधिक भीड़ का हिस्सा हो तो सिर्फ़ निर्देश सुनने का हक़ रखते हो,
जब किसी मान्यता परंपरा को दूसरों में फैलाने की उत्सुकता हो तो समझो अपना निरंतर खो चुके हो
खुद के कारण नहीं परेशानी दूसरों के कारण आती हैं,
खुद का समय सांस खुद के हिसाब से जीने को ही स्वतंत्रता कहते हैं,
यहां खुद का निरंतरन ही दूसरों के हाथ दिया हो वो जीवित ही दास्तां में हो तो मृत्यु के बाद कौन सी मुक्ति?
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