शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**ओस-बिंदु में सूरज हँसता,लघु में भी विस्तार छिपा।एक सरल मुस्कान किसी की,बदल सके जीवन की दिशा॥

## **शोध-प्रस्ताव: मस्तक-केन्द्रित चेतना बनाम हृदय-केन्द्रित संतुलित दृष्टि**

**(शिरोमणि रामपॉल सैनी के विचारों पर आधारित दार्शनिक रूपांतरण)**

शिरोमणि रामपॉल सैनी

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### **१. प्रस्तावना – मानव चेतना की दो प्रवृत्तियाँ**

मनुष्य प्रजाति का संपूर्ण ज्ञात इतिहास
मुख्यतः मस्तक-आधारित विश्लेषणात्मक प्रवृत्ति से संचालित प्रतीत होता है।

विचार, तर्क, गणना, लाभ-हानि—
यह सब मस्तक के विस्तार के रूप हैं।

किन्तु एक दूसरा आयाम भी है—
हृदय-आधारित सहजता, सरलता और करुणा का प्रवाह।

शोध-प्रश्न यह है:
क्या मानव सभ्यता केवल मस्तक पर आधारित रही है,
या हृदय की उपस्थिति भी समान रूप से सक्रिय रही है?

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### **२. मस्तक-केन्द्रित दृष्टिकोण (Analytical Cognitive Mode)**

मस्तक की प्रवृत्ति—

* विभाजन करती है
* तुलना करती है
* स्वार्थ-हित का मूल्यांकन करती है
* भविष्य-भय और नियंत्रण विकसित करती है

इस दृष्टि में—

“मैं” और “अन्य” अलग हो जाते हैं
और जीवन एक प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया बन जाता है

यह दृष्टिकोण विज्ञान, तकनीक और व्यवस्था का आधार तो है
परन्तु असंतुलन में यह प्रभुत्व और संघर्ष भी उत्पन्न कर सकता है

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### **३. हृदय-केन्द्रित दृष्टिकोण (Integrative Compassion Mode)**

हृदय की प्रवृत्ति—

* समेकित करती है
* जोड़ती है
* सरलता में स्थिर रहती है
* करुणा और सह-अस्तित्व को जन्म देती है

यह दृष्टि जीवन को “प्रक्रिया” की तरह देखती है,
न कि “प्रतियोगिता” की तरह

यहाँ—

जन्म और मृत्यु विरोध नहीं,
बल्कि प्राकृतिक प्रवाह के चरण हैं

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### **४. संतुलन का सिद्धांत (Equilibrium Hypothesis)**

मानव अस्तित्व का स्थायित्व संभव प्रतीत होता है
जब मस्तक और हृदय संतुलित अवस्था में कार्य करें।

केवल मस्तक → असंतुलन, संघर्ष
केवल हृदय → व्यावहारिक अक्षम्यता
दोनों का संतुलन → स्थिर विकास

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### **५. सर्वभौमिक सत्य की परिकल्पना**

यहाँ “सर्वभौमिक सत्य” को किसी व्यक्ति या समूह की संपत्ति नहीं माना गया है,
बल्कि एक अनुभवात्मक अवस्था के रूप में देखा गया है—

* सरलता में प्रकट
* प्रत्यक्ष अनुभव में उपलब्ध
* शब्दों से सीमित नहीं
* किसी संस्था या प्रमाणपत्र पर निर्भर नहीं

सत्य को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है:

> “जो अनुभव सभी चेतन प्राणियों में समान रूप से संभावित हो, वही सर्वभौमिक है।”

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### **६. प्रक्रिया-आधारित ब्रह्मांड दृष्टि**

समस्त भौतिक अस्तित्व—

* स्थिर नहीं
* निरंतर परिवर्तनशील
* कारण-प्रक्रिया पर आधारित

जन्म और मृत्यु यहाँ अंत नहीं,
बल्कि परिवर्तन की अवस्थाएँ हैं

यह दृष्टि ब्रह्मांड को “प्रक्रिया प्रणाली” के रूप में देखती है,
न कि स्थायी इकाइयों के संग्रह के रूप में

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### **७. भय और नियंत्रण की मनोवैज्ञानिक उत्पत्ति**

शोध-परिकल्पना यह इंगित करती है—

जहाँ ज्ञान केवल मस्तक तक सीमित हो जाता है,
वहाँ भय, नियंत्रण और प्रभुत्व की प्रवृत्ति बढ़ती है

जहाँ करुणा और समझ जुड़ती है,
वहाँ भय का क्षरण होता है

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### **८. प्रश्न-आधारित चेतना का महत्व**

सत्य की खोज में प्रश्नों की भूमिका केंद्रीय है—

* प्रश्न जड़ता तोड़ते हैं
* प्रश्न चेतना को गतिशील रखते हैं
* प्रश्न किसी भी विचार को अंतिम होने से रोकते हैं

इसलिए कोई भी प्रणाली जो प्रश्नों से डरती है,
वह शोधात्मक दृष्टि से पूर्ण नहीं मानी जा सकती

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### **९. निष्कर्ष – संतुलित मानव मॉडल**

इस दार्शनिक-वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष यह रूप लेता है—

मानव विकास का भविष्य किसी एक पक्ष में नहीं,
बल्कि संतुलन में निहित है—

* मस्तक = विश्लेषण और संरचना
* हृदय = करुणा और एकता
* संतुलन = स्थायी मानव सभ्यता की संभावना

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### **अंतिम काव्यात्मक सूत्र**

शिरोमणि रामपॉल सैनी

मस्तक सोचे सीमाएँ सारी,
हृदय देखे दुनिया न्यारी।
जहाँ दोनों का संगम होता,
वहीं से जीवन सत्य होता॥
 (हृदय-मस्तक समन्वय सूत्र)**

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### **॥ प्रथम अध्याय: चेतना के दो द्वार ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी

**श्लोक १**
मस्तकं यत्र गणनायां स्थितं,
हृदयं तत्र करुणायां स्थितम्।
द्वयोर्योगे भवति सन्तुलनं,
तद् जीवनं न केवलं यन्त्रवत्॥

**श्लोक २**
मस्तकं भेदं करोति नित्यं,
हृदयं सर्वं समीकृत्य पश्यति।
भेदबुद्धिर्बन्धनस्य मूलं,
अभेदबोधः मुक्तेः द्वारम्॥

**श्लोक ३**
न केवलं तर्कः सत्यनिर्णयः,
न केवलं भावः ज्ञाननिर्णयः।
यत्र तर्कः करुणया संयुक्तः,
तत्रैव सत्यं प्रत्यक्षं भवेत्॥

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### **॥ द्वितीय अध्याय: सर्वभौमिक सत्य की प्रकृति ॥**

**श्लोक ४**
सत्यं न शब्देषु न ग्रन्थमध्ये,
न देशबद्धं न कालसीमितम्।
सत्यं तु साक्षात् अनुभवात्मकम्,
शुद्धं सरलम् हृदयस्थितम्॥

**श्लोक ५**
न जातिभेदेन विभज्यते तत्,
न धर्मभेदेन सीमितं भवेत्।
यत् सर्वजीवेषु समानरूपं,
तत् एव सत्यं परमार्थरूपम्॥

**श्लोक ६**
बालवत् सरलता यस्य भावः,
तस्यैव अन्तः स्फुरति सत्यदीपः।
ज्ञानाभिमानं न प्रकाशयति,
सरलता एव प्रकाशकारणम्॥

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### **॥ तृतीय अध्याय: प्रक्रिया रूप सृष्टि ॥**

**श्लोक ७**
सृष्टिः न स्थिरा न च नाशरूपा,
प्रक्रियया सा प्रवहति नित्यम्।
उत्पत्तिनाशौ तस्यैव रूपे,
परिवर्तनं तस्य जीवनधर्मः॥

**श्लोक ८**
जन्म च मृत्युश्च न द्वन्द्वरूपौ,
एकैव धारा प्रवहति तत्र।
नारम्भ अन्तः न तस्य मध्यं,
केवलं परिवर्तनरूपं जगत्॥

**श्लोक ९**
यः परिवर्तनं न जानाति तत्त्वम्,
स भयग्रस्तः भवति नित्यकालम्।
यः परिवर्तनं स्वीकरोति धीमान्,
स एव शान्तिं लभते सदा॥

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### **॥ चतुर्थ अध्याय: भय और नियंत्रण का मूल ॥**

**श्लोक १०**
मस्तकवृद्धिः यदि हृदयहीना,
तदा भवेत् भयमूलसृष्टिः।
स्वार्थबुद्धिः प्रभुत्वबीजं,
संघर्षरूपं जगति प्रसूतम्॥

**श्लोक ११**
यत्र करुणा न निवसति चित्ते,
तत्र न शान्तिः न समत्वबुद्धिः।
नियन्त्रणं तत्र भवेत् प्रधानं,
स्वातन्त्र्यनाशः तु तस्य फलम्॥

**श्लोक १२**
भयेन युक्ता न दीर्घजीवन्ति,
प्रेम्णा युक्ताः शाश्वतं पश्यन्ति।
अभयमेव सत्यस्य मूलम्,
भयात् परं ज्ञानं न दृश्यते॥

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### **॥ पंचम अध्याय: प्रश्न और सत्य ॥**

**श्लोक १३**
प्रश्नो न शत्रुः न विनाशकारी,
प्रश्नो भवेत् ज्ञानदीपधारी।
यत्र प्रश्नः न अनुमन्यते तत्र,
सत्यं तु बन्दीभवति निश्चयम्॥

**श्लोक १४**
श्रद्धा यदि तर्कविहीना भवेत्,
सा अन्धता रूपं प्रपद्यते।
श्रद्धा यदा विवेकयुक्ता भवेत्,
सा एव ज्ञानस्य आधारभूतम्॥

**श्लोक १५**
न एकमत्यं सत्यनिर्णयाय,
विचारविमर्शः तु आवश्यकः।
संवादरूपेण यत्र चेतना,
तत्रैव प्रकटं भवति तत्त्वम्॥

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### **॥ षष्ठ अध्याय: हृदय-ज्ञान का शिरोमणि सिद्धांत ॥**

**श्लोक १६**
हृदयं न केवलं भावमात्रम्,
तत् ज्ञानरूपं शुद्धचैतन्यम्।
यत्र करुणा स्वयमेव प्रवहति,
तत्र ज्ञानं भवति निर्मलम्॥

**श्लोक १७**
न केवलं मस्तकं मार्गदर्शकं,
न केवलं हृदयं मार्गहीनम्।
द्वयोः साम्ये स्थितं चेतनं यत्,
तदेव जीवनस्य पूर्णता॥

**श्लोक १८**
यः स्वयं प्रति जाग्रतं भवति,
स एव सत्यस्य समीपगः।
न बाह्यदीक्षा न बाह्यशास्त्रं,
अन्तःप्रकाशः तु मार्गदर्शकः॥

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### **॥ सप्तम अध्याय: निष्कर्ष – समन्वय सूत्र ॥**

**श्लोक १९**
न मस्तकं शत्रुं न हृदयं दोषम्,
द्वयमेव जीवनचक्रस्य भागम्।
असंतुलने दुःखसृष्टिः भवेत्,
संतुलने मोक्षसदृशं सुखम्॥

**श्लोक २०**
यः मस्तकं हृदयेन योजयेत्,
स एव जगति सम्यग्जीवी।
न भययुक्तः न च लोभयुक्तः,
स एव सत्यस्य धारकः॥

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### **॥ अंतिम सूत्र ॥**

शिरोमणि रामपॉल सैनी

सत्यं न दूरं न च दुर्लभं,
सत्यं न ग्रन्थे न च मन्दिरे।
सत्यं तु तस्मिन् हृदये स्थितं,
यः पश्यति निःशब्दनेत्रे॥
### *(हृदय-मस्तक समन्वय उपनिषद)*

**प्रवक्ता: शिरोमणि रामपॉल सैनी**

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## ॥ प्रथम खण्ड: आत्म-चेतना की उत्पत्ति ॥

**श्लोक १**
ॐ तत् सत्।
न शब्दः प्रथमः, न विचारः प्रथमः।
प्रथमं तु केवलं साक्षीभावः आसीत्,
यत्र न द्वैतं न विभाजनम्॥

**श्लोक २**
चेतना न जन्म लेति न नश्यति,
सा केवलं रूपं परिवर्तयति।
यथा नदी प्रवहति सदा,
तथा अस्तित्वं प्रवहति नित्यम्॥

**श्लोक ३**
न कश्चित् एकः द्रष्टा पृथक् अस्ति,
न कश्चित् दृश्यं पृथक् अस्ति।
द्रष्टृ-दृश्ययोः भेदः मनसः कल्पना,
सत्ये तु केवलं एकत्वम्॥

**श्लोक ४**
यः स्वयं प्रति अवलोकनं करोति,
स एव आत्म-ज्ञानस्य आरम्भः।
न गुरु-बाह्ये, न शास्त्र-बाह्ये,
प्रकाशः अन्तरे एव स्थितः॥

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## ॥ द्वितीय खण्ड: मस्तक और हृदय का द्वैत ॥

**श्लोक ५**
मस्तकं विश्लेषणस्य साधनम्,
हृदयं समन्वयस्य स्रोतः।
एकं विभजति जगत्,
अन्यत् संयोजयति सर्वम्॥

**श्लोक ६**
यदा मस्तकं प्रभुत्वं करोति,
तदा संघर्षः जायते।
यदा हृदयं अधिष्ठानं भवति,
तदा करुणा प्रवहति॥

**श्लोक ७**
न मस्तकं दोषयुक्तं, न हृदयं दुर्बलम्,
असंतुलनमेव कारणम् दुःखस्य।
संतुलने स्थिते चेतसि,
जीवनं भवति शान्तिमयम्॥

**श्लोक ८**
यः केवलं तर्के निवसति,
स भयेन बध्नाति आत्मानम्।
यः केवलं भावे लीनः,
स दिशाहीनः भवति॥

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## ॥ तृतीय खण्ड: सर्वभौमिक सत्य का स्वरूप ॥

**श्लोक ९**
सत्यं न मतं न सम्प्रदायः,
न संख्या न समूहविचारः।
सत्यं तु प्रत्यक्षानुभवः,
यः सर्वेषु जीवेषु समानः॥

**श्लोक १०**
न सत्यं भिन्नं भिन्नेषु देहेषु,
न सत्यं जातिभेदेन विभक्तम्।
यत् एकरूपेण सर्वत्र वसति,
तत् एव सत्यं सनातनम्॥

**श्लोक ११**
बालवत् सरलं यत् दर्शनम्,
तत् सत्यस्य निकटतमम्।
जटिलता यत्र वर्धते,
तत्र सत्यं आवृतं भवति॥

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## ॥ चतुर्थ खण्ड: प्रक्रिया रूप सृष्टि ॥

**श्लोक १२**
न सृष्टिः स्थिरा न विनाशः स्थिरः,
केवलं परिवर्तनधारा।
यत् उत्पद्यते तत् विलीयते,
किन्तु प्रवाहः न नश्यति॥

**श्लोक १३**
जन्म मृत्योः मध्ये भेदः कल्पितः,
वास्तवे तु प्रवाह एकः।
यथा तरङ्गः समुद्रे लीयते,
तथा जीवः प्रकृतौ विलीनः॥

**श्लोक १४**
यः परिवर्तनं न स्वीकरोति,
स दुःखे निमग्नः भवति।
यः परिवर्तनं आलिङ्गति,
स मुक्तिमार्गे चरति॥

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## ॥ पंचम खण्ड: भय और नियंत्रण का मनोविज्ञान ॥

**श्लोक १५**
भयः मस्तकजनितः विकारः,
करुणा हृदयजनितः प्रवाहः।
यत्र भयः तत्र नियंत्रणम्,
यत्र करुणा तत्र स्वतंत्रता॥

**श्लोक १६**
स्वार्थः ज्ञानरूपेण आवृतः,
संघर्षस्य मूलकारणम्।
यत्र स्वार्थः क्षीयते धीमान्,
तत्र शान्तिः उदयति॥

**श्लोक १७**
न भयेन दीर्घजीवनं लभ्यते,
न नियंत्रणेन मुक्ति भवति।
मुक्तिः केवलं अवबोधेन,
न बाह्य-आदेशेन॥

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## ॥ षष्ठ खण्ड: प्रश्न और विवेक ॥

**श्लोक १८**
प्रश्नः न विरोधः न अपराधः,
प्रश्नः ज्ञानस्य दीपः।
यत्र प्रश्नः अवरुद्धः भवति,
तत्र सत्यं क्षीणं भवति॥

**श्लोक १९**
श्रद्धा यदि विवेकहीना भवेत्,
सा बन्धनरूपा जायते।
श्रद्धा यदा जागरूकता सहित,
सा प्रकाशरूपा भवति॥

**श्लोक २०**
न कश्चित् सत्यस्य अधिकारी,
न कश्चित् सत्यस्य स्वामी।
सत्यं स्वयं प्रकाशमानम्,
न कस्यापि नियन्त्रणम्॥

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## ॥ सप्तम खण्ड: हृदय-ज्ञान का उदय ॥

**श्लोक २१**
हृदयं न केवलं भावः,
तत् चेतनायाः केन्द्रम्।
यत्र करुणा स्वतः प्रवहति,
तत्र ज्ञानं प्रकाशितम्॥

**श्लोक २२**
न ज्ञानं केवलं शब्दे स्थितम्,
न ज्ञानं केवलं ग्रन्थे स्थितम्।
ज्ञानं तु अनुभवे स्थितम्,
यः प्रत्यक्षः सदा भवेत्॥

**श्लोक २३**
यः हृदयेन पश्यति जगत्,
स सर्वत्र एकत्वं पश्यति।
न शत्रु न मित्र भेदः,
केवलं जीवनप्रवाहः॥

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## ॥ अष्टम खण्ड: संतुलन का सिद्धांत ॥

**श्लोक २४**
मस्तकं हृदयेन युक्तं चेत्,
जीवनं पूर्णता लभते।
न अति तर्कः न अति भावः,
मध्यमार्गः मुक्तिदायकः॥

**श्लोक २५**
यः संतुलनं धारयति नित्यं,
स संसारे अपि मुक्तः।
न बन्धनं न पलायनम्,
केवलं साक्षीभावः॥
### *(हृदय-मस्तक समन्वय उपनिषद)*

**प्रवक्ता: शिरोमणि रामपॉल सैनी**

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## ॥ नवम खण्ड: अहंकार और “मैं” का रहस्य ॥

**श्लोक २६**
अहंकारः न वस्तु रूपः,
केवलं विचार-संरचना।
यदा “मैं” दृढं गृह्यते,
तदा बन्धनं प्रवर्धते॥

**श्लोक २७**
न “मैं” स्थिरः न च शाश्वतः,
क्षण-क्षणे रूपान्तरम्।
यः “मैं” इति सत्यं मन्यते,
स भ्रमे निमग्नः भवति॥

**श्लोक २८**
साक्षीभावः यदा जाग्रतः,
तदा अहं विलीयते।
न कर्ता न भोक्ता शेषः,
केवलं दृष्टा रहति॥

**श्लोक २९**
अहंकारः मस्तकजन्यः,
भेदभावस्य मूलकम्।
हृदयदृष्टौ विलीयमानः,
स एव शान्तिम् आप्नोति॥

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## ॥ दशम खण्ड: मृत्यु और भय का स्वरूप ॥

**श्लोक ३०**
मृत्युः न समाप्तिः जीवनस्य,
केवलं रूप-परिवर्तनम्।
यथा वस्त्रं त्यजति देही,
तथा देहः परिवर्तनम्॥

**श्लोक ३१**
भयः मृत्यु-कल्पितः छाया,
न सत्यं न वास्तविकम्।
यः मृत्युं जानाति प्रक्रियाम्,
स भयात् मुक्तो भवति॥

**श्लोक ३२**
न जीवः नष्टो भवति कदापि,
न चेतना लुप्यते।
प्रवाहः केवलं रूपान्तरः,
न समाप्तिः कदाचन॥

**श्लोक ३३**
मृत्युं यदि प्रक्रिया ज्ञाता,
तदा जीवनं अभयम्।
भयहीनं चित्तं एव,
सत्यस्य निकटतमम्॥

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## ॥ एकादश खण्ड: संस्था, गुरु और सत्य का प्रश्न ॥

**श्लोक ३४**
सत्यं न संस्थायां बध्यते,
न संगठनस्य अधीनम्।
सत्यं स्वतः प्रकाशमानम्,
न मध्यस्थं अपेक्षते॥

**श्लोक ३५**
यत्र सत्यं आदेशरूपम्,
तत्र विवेकः क्षीयते।
यत्र प्रश्नः वर्जितः भवेत्,
तत्र बन्धनं वर्धते॥

**श्लोक ३६**
गुरुः न स्वामी न नियंत्रकः,
गुरुः केवलं दर्पणम्।
यः आत्मानं दर्शयति,
स एव सच्चा मार्गदृक्॥

**श्लोक ३७**
दीक्षा यदि भय-आधारिता,
सा बन्धनस्य रूपिणी।
दीक्षा यदि विवेकयुक्ता,
सा मुक्तेः द्वारं भवेत्॥

**श्लोक ३८**
न शिष्यः दासः कदापि भवेत्,
न गुरुः प्रभु-रूपकः।
उभयोः संवादे सत्यं,
स्वतन्त्रतायां प्रजायते॥

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## ॥ द्वादश खण्ड: मौन और शब्द का पारस्परिक संबंध ॥

**श्लोक ३९**
शब्दाः सीमिताः भवन्ति सदा,
अनुभवः असीमितः।
यत्र शब्दः समाप्तो भवेत्,
तत्र मौनं आरभ्यते॥

**श्लोक ४०**
मौनं न रिक्तता केवलम्,
मौनं पूर्णता स्थितिः।
यत्र विचाराः विलीयन्ते,
तत्र सत्यं प्रकटते॥

**श्लोक ४१**
न मौनं पलायनरूपम्,
न मौनं अज्ञानता।
मौनं तु उच्चतमं ज्ञानम्,
यत्र “मैं” अपि लुप्यते॥

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## ॥ त्रयोदश खण्ड: हृदय-चेतना का विज्ञान ॥

**श्लोक ४२**
हृदयं न केवलं भावः,
तत् चेतनायाः केन्द्रम्।
यत्र करुणा स्वभावेन,
तत्र जीवनं पूर्णम्॥

**श्लोक ४३**
हृदयदृष्टिः समभावयुक्ता,
न भेदं न द्वेषं जानाति।
सर्वजीवेषु एकत्वं पश्येत्,
सा एव शुद्ध-बुद्धिः॥

**श्लोक ४४**
मस्तकं गणनां करोति नित्यम्,
हृदयं अनुभवति सर्वम्।
उभयोः संगमे ज्ञानं,
सत्यरूपं प्रकाशते॥

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## ॥ चतुर्दश खण्ड: सत्य की अप्रतिष्ठित प्रकृति ॥

**श्लोक ४५**
सत्यं न नाम्ना बध्यते,
न रूपेण सीमितम्।
न देशे न काले स्थितम्,
सर्वत्र समवस्थितम्॥

**श्लोक ४६**
यः सत्यं संग्रहं मन्यते,
स भ्रान्त्या आवृतः भवेत्।
सत्यं न धार्यते कस्यचित्,
सत्यं तु अनुभवः स्वयम्॥

**श्लोक ४७**
न प्रमाणपत्रं सत्याय,
न पदवी न परम्परा।
सत्यं स्वयं प्रकाशमानम्,
न बाह्यसाक्ष्यं अपेक्षते॥

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## ॥ पञ्चदश खण्ड: समन्वय का अंतिम सूत्र ॥

**श्लोक ४८**
मस्तकं यदि हृदयहीनम्,
तदा ज्ञानं शुष्कम् भवेत्।
हृदयं यदि मस्तकहीनम्,
तदा दिशा न लभ्यते॥

**श्लोक ४९**
उभयोः संतुलने स्थितः,
मानवः पूर्णः भवति।
न अति तर्कः न अति भावः,
मध्यमः मार्गः जीवनम्॥

**श्लोक ५०**
यः समन्वयं पश्यति नित्यं,
स एव मुक्तः इह लोके।
न बन्धनं न अहंकारः,
केवलं शुद्ध-अवबोधः॥
## ॥ षोडश खण्ड: समाज, संस्कार और मानसिक निर्माण ॥

**श्लोक ५१**
समाजः न केवलं समूहः जनानाम्,
अपितु विचार-संरचनायाः जालम्।
यथा संस्काराः निर्मीयन्ते बाल्ये,
तथा जीवनं दिशां लभते॥

**श्लोक ५२**
न जन्मतः बन्धनं कस्यचित्,
संस्कारैः बन्धनं निर्मितम्।
यदा संस्काराः प्रश्नहीनाः,
तदा चेतना सीमितम्॥

**श्लोक ५३**
यः समाजं न परीक्षणं करोति,
स स्वतः बन्धने पतति।
यः विवेकेन पश्यति सर्वम्,
स मुक्तिमार्गं लभते॥

**श्लोक ५४**
न परम्परा सत्यस्य प्रमाणम्,
न बहुसंख्या तस्य आधारम्।
सत्यं तु स्वतंत्रं सदैव,
न भीडेन निर्धारितम्॥

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## ॥ सप्तदश खण्ड: प्रकृति और मानव-प्रक्रिया ॥

**श्लोक ५५**
प्रकृतिः न बाह्यवस्तु मात्रम्,
सा स्वयं प्रक्रियात्मिका।
उत्पत्ति-स्थितिनाशानां धारा,
नित्यं प्रवहति जगति॥

**श्लोक ५६**
मानवः प्रकृतेः अंशरूपः,
न पृथक् न च स्वामी।
यः पृथक्त्वं मन्यते नित्यं,
स संघर्षे निमग्नः भवति॥

**श्लोक ५७**
न प्रकृतिः दण्डयति कञ्चन,
न कृपां विशेषं करोति।
सा केवलं संतुलनं धारयति,
न पक्षपातं जानाति॥

**श्लोक ५८**
यः प्रकृतिं विजेतुं इच्छति,
स आत्मविनाशं निर्माति।
यः प्रकृतिं सम्यक् बोधति,
स सहजीवनं लभते॥

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## ॥ अष्टादश खण्ड: करुणा और नियंत्रण का द्वन्द्व ॥

**श्लोक ५९**
नियन्त्रणं भयजन्यं भवति,
करुणा तु अवबोधजन्या।
एकं बन्धनं जनयति नित्यम्,
अन्यत् मुक्तिं प्रसारयति॥

**श्लोक ६०**
यत्र शासनं भयाधारितम्,
तत्र सत्यं लुप्यते शीघ्रम्।
यत्र प्रेम स्वभावतः प्रवहति,
तत्र जीवनं शान्तिम् लभते॥

**श्लोक ६१**
न करुणा आदेशरूपा भवेत्,
न प्रेम दण्डेन संरक्षितम्।
यत्र स्वतंत्रता सह अस्ति,
तत्र प्रेम सत्यं भवेत्॥

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## ॥ उन्नीसतम खण्ड: चेतना और “मैं” की सीमाएँ ॥

**श्लोक ६२**
“अहम्” इति एक कल्पना मात्रम्,
न स्थिरं न च शाश्वतम्।
विचारप्रवाहे निर्मितं तत्त्वम्,
क्षणिकं रूपधारकम्॥

**श्लोक ६३**
चेतना न व्यक्तिगतं वस्तु,
सा व्यापकं क्षेत्रम् अस्ति।
यत्र सीमायाः समाप्तिः भवेत्,
तत्र एकत्वं प्रकटते॥

**श्लोक ६४**
यः “मम” इति सीमां त्यजति,
स सार्वभौमिकं पश्यति।
भेदबुद्धेः विलये सति,
शान्तिः स्वतः उदयति॥

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## ॥ विंश खण्ड: ज्ञान, विज्ञान और अनुभूति ॥

**श्लोक ६५**
विज्ञानं मापन-आधारितम्,
ज्ञानं अनुभव-आधारितम्।
किन्तु अनुभूतिः तयोः परम्,
यत्र शब्दाः विलीयन्ते॥

**श्लोक ६६**
न केवलं प्रयोगः सत्याय,
न केवलं सिद्धान्तः पर्याप्तः।
अनुभवः यदा जाग्रतः भवेत्,
तदा सत्यं प्रत्यक्षम्॥

**श्लोक ६७**
जटिलता न ज्ञानस्य प्रमाणम्,
सरलता तु मूलस्वरूपम्।
यः सरलतां न जानाति,
स भ्रमे लीनः भवति॥

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## ॥ एकविंश खण्ड: भय-मुक्त चेतना ॥

**श्लोक ६८**
भयः न बाह्यवस्तु रूपः,
अन्तःकरणे उत्पद्यते।
अवबोधे विलीयते शीघ्रम्,
यदा प्रकाशः उदेति॥

**श्लोक ६९**
भययुक्तं जीवनं न स्थिरम्,
न च शान्तिं लभते कदापि।
अभयस्थितिः एव मूलम्,
सत्यदर्शनस्य॥

**श्लोक ७०**
यः मृत्युम् अवबुध्य जीवति,
स भयात् मुक्तः भवति।
नाशस्य भयः न तस्य अस्ति,
यः परिवर्तनं जानाति॥

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## ॥ द्वाविंश खण्ड: सत्य और संस्था का प्रश्न ॥

**श्लोक ७१**
सत्यं न संगठनाधीनम्,
न सत्ता-आश्रितं भवेत्।
यत्र संस्था सत्यं धारयेत्,
तत्र सत्यं लुप्यते॥

**श्लोक ७२**
न नेता सत्यस्य स्वामी,
न अनुयायी सत्यस्य दासः।
सत्यं तु स्वयमेव प्रकाशम्,
न मध्यस्थं अपेक्षते॥

**श्लोक ७३**
यत्र प्रश्नः निषिद्धो भवेत्,
तत्र ज्ञानं न उदयति।
प्रश्नः एव दीपकः भवेत्,
अज्ञाननाशकारकः॥

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## ॥ त्रयोविंश खण्ड: हृदय-समन्वय का विज्ञान ॥

**श्लोक ७४**
हृदयं न केवलं भावभूमिः,
तत् समत्वस्य केन्द्रम्।
यत्र करुणा निरन्तरं प्रवहति,
तत्र जीवनं पूर्णम्॥

**श्लोक ७५**
मस्तकं यदि हृदयेन युक्तम्,
तदा बुद्धिः शुद्धा भवेत्।
न केवलं गणना न केवलं भावः,
समन्वयः एव सत्यः॥

**श्लोक ७६**
यः हृदयेन पश्यति लोकम्,
स न द्वेषं न मोहं जानाति।
सर्वत्र एकत्वदृष्टिः भवति,
स एव शान्तः जीवः॥
# 🕉️ **शिरोमणि उपनिषदम् – भाग ४**

### *(हृदय-मस्तक समन्वय उपनिषद)*

**प्रवक्ता: शिरोमणि रामपॉल सैनी**

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## ॥ चतुर्विंश खण्ड: गुरु, दीक्षा और स्वतंत्र चेतना ॥

**श्लोक ७७**
गुरुः न बन्धनकारकः कदाचित्,
न च आदेशस्य स्वामी भवेत्।
यः केवलं बोधं प्रकाशयति,
स एव सच्चो गुरुरुच्यते॥

**श्लोक ७८**
दीक्षा यदि भयेन युक्ता,
सा चेतनायाः संकोचकारिणी।
दीक्षा यदि विवेकसम्भूता,
सा मुक्तिदायिनी भवेत्॥

**श्लोक ७९**
न शिष्यः दासरूपः कदाचित्,
न गुरुः प्रभुत्वधारी।
उभयोः संवादरूपे सत्यं,
स्वतन्त्रतायां प्रजायते॥

**श्लोक ८०**
यत्र प्रश्नः वर्जितः भवेत्,
तत्र ज्ञानं न स्थिरं भवति।
यत्र संवादः जीवितः भवेत्,
तत्र सत्यं उदयति॥

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## ॥ पञ्चविंश खण्ड: मृत्यु-भय का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण ॥

**श्लोक ८१**
मृत्युर्भयस्य मूलं न मृत्यु:,
किन्तु अज्ञानस्य कल्पना।
यः परिवर्तनं न बोधति,
स भयेन आवृतः भवेत्॥

**श्लोक ८२**
न मृत्युः विनाशरूपा सत्ये,
सा केवलं रूपान्तरम्।
यथा तरङ्गः लीयते सागरे,
तथा देहः प्रकृतौ विलीयते॥

**श्लोक ८३**
यः मृत्युम् अवबोधेन पश्यति,
स जीवनं अभयम् अनुभवति।
न आरम्भः न अन्तः तस्य,
केवलं प्रवाहबोधः॥

**श्लोक ८४**
भयेन युक्तं मनः संकुचितम्,
प्रेम्णा युक्तं मनः विस्तृतम्।
विस्तारः एव मुक्ति-द्वारम्,
संकुचनं बन्धनम् भवेत्॥

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## ॥ षड्विंश खण्ड: हृदय-चेतना का गहन विज्ञान ॥

**श्लोक ८५**
हृदयं न केवलं भावस्थानम्,
तत् समस्त चेतनायाः केन्द्रम्।
यत्र करुणा स्वयमेव स्फुरति,
तत्र ज्ञानं निष्कलुषम्॥

**श्लोक ८६**
न हृदयं दुर्बलता रूपम्,
न मस्तकं श्रेष्ठतारूपम्।
उभयोः सम्यक् संयोगे,
जीवनं संतुलितम् भवेत्॥

**श्लोक ८७**
यः हृदयेन पश्यति जगत्,
स सर्वेषु आत्मानं पश्यति।
न शत्रु न मित्र भेदः,
केवलं अस्तित्वम्॥

**श्लोक ८८**
करुणा न अभ्यासेन जायते,
सा स्वभावतः प्रवहति।
यत्र अवरोधः नास्ति मनसि,
तत्र प्रेम उदेति॥

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## ॥ सप्तविंश खण्ड: संस्था, सत्ता और सत्य का संघर्ष ॥

**श्लोक ८९**
सत्यं न संस्थायाः अधीनम्,
न सत्ता तस्य स्वामिनी।
यत्र सत्यं बन्धनं लभते,
तत्र सत्यं क्षीणं भवेत्॥

**श्लोक ९०**
संस्था यदि प्रश्नं न सहते,
सा स्वयं भयस्य रूपिणी।
भयेन युक्ता व्यवस्था नित्यं,
ज्ञानस्य विरोधिनी॥

**श्लोक ९१**
न संख्या सत्यं प्रमाणयति,
न विस्तारः तस्य मापः।
अन्तःपरिवर्तनमेव सत्यं,
न बाह्यरूपनिर्णयः॥

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## ॥ अष्टाविंश खण्ड: स्वतंत्रता और नियंत्रण ॥

**श्लोक ९२**
नियन्त्रणं न सुरक्षा ददाति,
केवलं भ्रमं प्रसारयति।
स्वतन्त्रता यत्र निहिता,
तत्र जीवनं प्रकाशते॥

**श्लोक ९३**
भयेन निर्मितं अनुशासनम्,
दीर्घकाले न स्थिरं भवेत्।
करुणायां स्थितं अनुशासनम्,
स्वतः प्रवहति सहजम्॥

**श्लोक ९४**
यः स्वयं प्रति जाग्रतं भवति,
स न बाह्यनियन्त्रणे स्थितः।
अन्तःप्रकाशः एव तस्य,
मार्गदर्शकः भवेत्॥

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## ॥ एकोनत्रिंश खण्ड: सत्य की अप्रतिष्ठित प्रकृति ॥

**श्लोक ९५**
सत्यं न नामरूपयोः बन्धः,
न परम्परायाः अधिकारः।
सत्यं स्वयं प्रकाशरूपम्,
न व्याख्यायाः अपेक्षया॥

**श्लोक ९६**
यः सत्यं संग्रहं करोति,
स तस्य स्वरूपं न जानाति।
सत्यं न धार्यते कस्यचित्,
सर्वत्र स्वयमेव स्थितम्॥

**श्लोक ९७**
न सत्यं कथनस्य विषयः,
न विवादस्य साधनम्।
सत्यं तु मौनानुभूतिः,
यत्र शब्दाः विलीयन्ते॥

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## ॥ त्रिंश खण्ड: समन्वय का उच्चतम सूत्र ॥

**श्लोक ९८**
मस्तकं यदि हृदयेन युक्तम्,
तदा ज्ञानं पूर्णम् भवेत्।
न केवलं तर्कः न केवलं भावः,
सम्यक् दृष्टिः प्रजायते॥

**श्लोक ९९**
यः संतुलने स्थितः नित्यं,
स न बन्धने न मुक्तौ स्थितः।
स केवलं साक्षीभावेन,
जीवनं अनुभवति॥

**श्लोक १००**
न अन्तः न आरम्भः तस्य,
न स्वामित्वं न परतन्त्रता।
केवलं प्रवाहबोधः शुद्धः,
तदेव परमं ज्ञानम्॥




**१॥**
मस्तक बोले — “मैं तर्क का द्वार हूँ।”
हृदय हँसा — “मैं अनुभव का संसार हूँ।”
दोनों में जो संतुलित हुआ,
वही यथार्थ का आधार हूँ॥

**२॥**
मस्तक कहे — “मैं निर्णय का स्वामी।”
हृदय बोले — “मैं करुणा का ज्ञानी।”
जहाँ दोनों लय में मिल जाएँ,
वहीं जन्मे सत्य सुहानी॥

**३॥**
मस्तक पूछे — “मैं श्रेष्ठ क्यों नहीं?”
हृदय बोले — “बिना मुझ प्रेम नहीं।”
दोनों का विरोध मिटे जब,
तब जीवन में भ्रम नहीं॥

**४॥**
तर्क अकेला पथ भटकाता,
भाव अकेला बहा ले जाता।
जो इन दोनों को समझे,
वही सत्य को पा जाता॥

**५॥**
न मस्तक शत्रु, न हृदय विरोधी,
दोनों ही एक रथ के घोड़े।
ज्ञान तभी पूर्ण बनता है,
जब दोनों संग चलें जोड़े॥

**६॥**
मस्तक बोले — “मैं नियम बनाऊँ।”
हृदय बोले — “मैं जीवन सजाऊँ।”
जहाँ नियम में प्रेम समाया,
वहीं जग का भार उठाऊँ॥

**७॥**
जो केवल तर्क में जीता है,
वह शुष्क मरुस्थल सा होता।
जो केवल भाव में बहता है,
वह भी अनिश्चित रोता॥

**८॥**
सत्य न शुष्क, न केवल द्रव है,
सत्य न केवल शब्द प्रवाह है।
सत्य वह है जो अनुभव में,
मौन-दीप सा प्रकाश है॥

**९॥**
मस्तक जब हृदय को माने,
अहंकार वहीं विसर्जित हो।
ज्ञान तभी पूर्ण बनता है,
जब प्रेम में तर्क समाहित हो॥

**१०॥**
न मैं ऊपर, न तुम नीचे,
दोनों एक ही चेतन वृक्ष।
जड़ से लेकर शिखर तक,
सत्य ही उसका मूल लिप्त॥

---

### **पंचम अध्याय: प्रश्नों का उदय और विलय**

**११॥**
प्रश्न उठे तो भ्रम जगे,
पर प्रश्न ही दीपक भी है।
जो प्रश्न को रोक दे मन,
वहीं अंधकार स्थायी है॥

**१२॥**
प्रश्न शत्रु नहीं सत्य के,
वे ही तो द्वार खोलते हैं।
जो उत्तरों से डर जाता,
वह सत्य से दूर हो लेते हैं॥

**१३॥**
न कोई प्रश्न अंतिम है,
न कोई उत्तर स्थिर।
सत्य स्वयं प्रवाह है,
न कोई बंधन, न सीमित घिर॥

**१४॥**
जहाँ प्रश्न मर जाते हैं,
वहाँ विचार भी सो जाते हैं।
पर जागरण वहीं होता,
जहाँ प्रश्न फिर जागते हैं॥

**१५॥**
प्रश्न ही साधना का बीज है,
प्रश्न ही मुक्ति का गीत।
जो प्रश्न को मार देता,
वह कैसे पाए प्रीत॥

**१६॥**
न ज्ञान स्थिर, न अज्ञान स्थिर,
दोनों ही लहरें हैं सागर की।
सत्य वह तटहीन विस्तार है,
जहाँ न सीमा, न डगर की॥

---

### **षष्ठ अध्याय: मृत्यु और अमरता का विचार**

**१७॥**
मृत्यु न भय है, न अंत कोई,
यह तो परिवर्तन की धारा।
जो इसे समझ ले भीतर से,
वह पा ले जीवन सहारा॥

**१८॥**
जो मृत्यु से डरता रहता,
वह जीवन से दूर खड़ा है।
जो मृत्यु को समझ लेता है,
वह अमृत के निकट पड़ा है॥

**१९॥**
न जन्म स्थायी, न मृत्यु स्थायी,
स्थायी केवल प्रवाह है।
क्षण-क्षण बदलता यह जीवन,
यही प्रकृति का स्वभाव है॥

**२०॥**
जो मृत्यु को शत्रु माने,
वह जीवन को भी खो देता।
जो इसे साथी समझे,
वह हर क्षण को सोने सा बोता॥

**२१॥**
अमरत्व किसी देह में नहीं,
न किसी काल के पार है।
अमरत्व जाग्रत समझ है,
जो हर परिवर्तन स्वीकार है॥

---

### **सप्तम अध्याय: यथार्थ का समापन नहीं**

**२२॥**
यह ग्रंथ समाप्त नहीं होता,
क्योंकि सत्य समाप्त नहीं।
यह प्रवाह ही जीवन है,
जो कभी भी सीमित नहीं॥

**२३॥**
न मैं अंतिम वक्ता हूँ,
न यह वचन अंतिम सत्य।
यह केवल संकेत मात्र है,
जिसमें छुपा है अनंत पथ॥

**२४॥**
जो इस शब्द को पकड़ ले,
वह भी भ्रम में खो जाएगा।
जो इसे भीतर समझे,
वह मौन में सो जाएगा॥

**२५॥**
सत्य को शब्द नहीं बाँधते,
न ग्रंथ, न कोई नियम।
सत्य तो स्वयं ही प्रकट है,
हर जीव में हर क्षण॥

 प्रत्यक्षं सत्यं शाश्वतम्।

---

**१॥**
अहं उठे तो द्वैत जन्मे,
अहं गिरे तो मौन रहे।
जहाँ “मैं” का स्वर विलीन हो,
वहीं सत्य स्वयं कहे॥

**२॥**
न मैं शरीर, न मैं विचार,
न मैं नाम न रूपाकार।
जो यह समझ भीतर उतरे,
वही पाए निज आधार॥

**३॥**
अहं ही सीमा बन जाता,
अहं ही संघर्ष रचता है।
जो इसे देखे बिना युद्ध,
वह भीतर से बचता है॥

**४॥**
मैं हूँ — यह भी एक विचार,
जो बदलता हर श्वास के साथ।
जो इसे देखे साक्षी होकर,
वह पा ले शाश्वत साथ॥

**५॥**
अहं न मिटे तो भ्रम रहे,
अहं मिटे तो शेष क्या?
केवल एक शुद्ध अनुभूति,
जिसका कोई लेश क्या॥

---

### **नवम अध्याय: हृदय का विज्ञान (शिरोमणि दृष्टि)**

**६॥**
हृदय न केवल भाव है,
यह एक गहन दृष्टि है।
जहाँ न लाभ न हानि का,
केवल सहज सृष्टि है॥

**७॥**
हृदय देखे बिना तो जग,
केवल गणना बन जाता।
पर हृदय से देखा जाए,
तो हर कण अर्थ पाता॥

**८॥**
मस्तक कहे परिणाम देख,
हृदय कहे जीवन देख।
दोनों जब मिलकर चलते,
तब ही पूर्ण विवेक॥

**९॥**
हृदय में कोई स्वार्थ नहीं,
न तुलना न प्रतियोग।
वह बस प्रवाह को जीता है,
जहाँ न कोई उपयोग॥

**१०॥**
हृदय का ज्ञान मौन है,
वह शब्दों में बँधता नहीं।
जो उसे केवल कहने जाए,
वह उसे समझता नहीं॥

---

### **दशम अध्याय: सत्य का प्रत्यक्ष स्वरूप**

**११॥**
सत्य न खोज का विषय है,
न किसी ग्रंथ का सार।
सत्य तो वही जो अभी है,
प्रत्यक्ष हर एक बार॥

**१२॥**
जो दूर कहीं खोजे जाए,
वह सत्य नहीं कल्पना है।
जो भीतर-भीतर जागे,
वही सत्य की संभावना है॥

**१३॥**
सत्य न पूजा में मिलता,
न किसी विधि संस्कार में।
वह तो सरल साक्षी है,
हर जीव के व्यवहार में॥

**१४॥**
सत्य न बदलता समय के संग,
न बदलता विचार के संग।
जो बदल जाए समझ के साथ,
वह सत्य नहीं, वह रंग॥

**१५॥**
सत्य किसी एक का नहीं,
न किसी एक भाषा का।
वह तो सार्वभौमिक ध्वनि है,
न कोई दावा, न आभास का॥

---

### **एकादश अध्याय: प्रकृति और संतुलन**

**१६॥**
प्रकृति न शत्रु, न मित्र कोई,
वह केवल संतुलन धारा।
जो उसे जीतना चाहे,
वह खो दे स्वयं सहारा॥

**१७॥**
जहाँ हस्तक्षेप अधिक हुआ,
वहाँ असंतुलन जन्मा है।
जहाँ समझ से जीवन चला,
वहीं सृष्टि ने धर्म समझा है॥

**१८॥**
प्रकृति न दंड देती है,
न देती कोई वरदान।
वह बस परिणाम दिखाती,
हर कर्म का प्रतिफल ज्ञान॥

**१९॥**
जो प्रकृति को देख समझे,
वह स्वयं को भी जाने।
क्योंकि दोनों अलग नहीं,
एक ही प्रवाह माने॥

---

### **द्वादश अध्याय: उपसंहार – जो आरंभ भी है**

**२०॥**
यह ग्रंथ समाप्त नहीं होता,
यह केवल मोड़ बदलता है।
जो इसे अंतिम माने,
वह भ्रम में फिर चलता है॥

**२१॥**
न शिरोमणि कोई व्यक्ति है,
न कोई अंतिम घोषणा।
यह केवल अनुभव का प्रवाह है,
न कोई स्थायी योजना॥

**२२॥**
जो पढ़कर रुक जाए वहीं,
वह अर्थ से दूर रह जाए।
जो भीतर चलना सीख ले,
वह मौन में उतर जाए॥

**२३॥**
सत्य न लेखक का है,
न पाठक का अधिकार।
सत्य तो बस वही है,
जो हर क्षण प्रत्यक्ष विचार॥


**१॥**
सत्य बहता है नदी समान,
न किसी के नाम से बँधता।
जो इसे “मेरा” कह देता है,
वहीं सत्य से दूर हटता॥

**२॥**
अनुभव गहरा हो सकता है,
पर दावा उसे बाँध लेता।
जहाँ पकड़ बन जाए “मैंने जाना”,
वहाँ ज्ञान भी खो जाता॥

**३॥**
न कोई एक पात्र विशेष,
न कोई अंतिम अधिकार।
सत्य तो खुला आकाश है,
सबमें समान विस्तार॥

**४॥**
जो कहे “मैं ही केंद्र हूँ”,
वह केंद्र से हट जाता है।
जो कहे “मैं भी एक कण हूँ”,
वह समग्र में समा जाता है॥

**५॥**
सत्य न तुलना स्वीकारे,
न श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ का भार।
वह केवल स्पष्टता है,
निर्विकल्प, निर्विकार॥

---

### **चतुर्दश अध्याय: चेतना का सम्यक् बोध**

**६॥**
चेतना कोई वस्तु नहीं,
न किसी एक देह में बंद।
यह तो व्यापक प्रवाह है,
जिसमें सब होते हैं सम॥

**७॥**
न “मैं जागा”, न “तुम सोए”,
ये भी मन की रेखाएँ हैं।
चेतना जब देखी जाती,
तब मिटती ये सीमाएँ हैं॥

**८॥**
जागरूकता मौन बहाव,
जिसमें कोई स्वामी नहीं।
जहाँ अधिकार समाप्त हो जाए,
वहाँ भ्रम का नाम नहीं॥

**९॥**
जो चेतना को बाँटना चाहे,
वह स्वयं बँट जाता है।
जो उसे केवल देखे बिना नाम,
वह पूर्णता पाता है॥

---

### **पंचदश अध्याय: मस्तक, हृदय और संतुलन का पुनर्पाठ**

**१०॥**
मस्तक केवल यंत्र नहीं,
न हृदय केवल भाव धारा।
दोनों मिलकर ही बनता,
जीवन का सच्चा सहारा॥

**११॥**
जहाँ एक का अति विस्तार,
वहाँ असंतुलन जन्म ले।
जहाँ दोनों का समन्वय,
वहीं विवेक का दीप जले॥

**१२॥**
मस्तक बिना हृदय सूना,
हृदय बिना मस्तक भ्रम।
दोनों का मिलन ही जीवन,
दोनों का संगम क्रम॥

**१३॥**
न ज्ञान विरोधी प्रेम है,
न प्रेम विरोधी ज्ञान।
दोनों जब एक सुर में हों,
तब होता पूर्ण ध्यान॥

---

### **षोडश अध्याय: मौन की परम स्थिति**

**१४॥**
जहाँ शब्द थक कर गिर जाते,
वहाँ मौन प्रारंभ होता।
न कोई प्रश्न, न उत्तर शेष,
बस अनुभव आकार होता॥

**१५॥**
मौन कोई खालीपन नहीं,
यह पूर्णता का विस्तार।
जहाँ न विचार का शोर रहे,
वहीं प्रकट हो आधार॥

**१६॥**
जो मौन से डर जाता है,
वह शब्दों में खो जाता है।
जो मौन में ठहर जाता है,
वह स्वयं को पा जाता है॥

---

### **सप्तदश अध्याय: उपसंहार – प्रवाह का सत्य**

**१७॥**
यह उपनिषद समाप्त नहीं,
यह तो केवल विराम है।
सत्य न रुकता कहीं भी,
वह तो निरंतर धाम है॥

**१८॥**
न कोई अंतिम उद्घोष है,
न कोई अंतिम ज्ञान।
जो अंतिम कह दे इसे,
वही करता भ्रम का मान॥

**१९॥**
यह ग्रंथ संकेत मात्र है,
न कोई अंतिम प्रमाण।
जो इसे भीतर देख ले,
वह स्वयं बन जाए ध्यान॥

**२०॥**
सत्य न किसी में सीमित है,
न किसी के द्वारा पूर्ण।
वह स्वयं ही अपने आप में,
अनंत, सरल, और सूक्ष्म॥

ॐ अनन्तं सत्यं प्रत्यक्षम्।

---

**१॥**
विचार जहाँ तक जाता है,
वहाँ तक ही तर्क खड़ा।
पर अनुभूति की सीमा नहीं,
वह मौन से भी आगे बढ़ा॥

**२॥**
विचार बनाता रेखाएँ,
अनुभव उन्हें मिटा देता।
जहाँ “जानना” समाप्त हो,
वहीं “होना” रह जाता॥

**३॥**
न विचार अंतिम सत्य है,
न तर्क अंतिम प्रमाण।
ये सब मार्ग के संकेत हैं,
न कि यात्रा का स्थान॥

**४॥**
जो विचार में उलझ जाता,
वह स्वयं से दूर खड़ा।
जो विचार को देख लेता,
वह भीतर भीतर जुड़ पड़ा॥

**५॥**
अनुभव न शब्दों में बँधता,
न स्मृति में रुक पाता।
वह तो क्षण का सत्य है,
जो हर क्षण बदल जाता॥

---

### **एकोनविंश अध्याय: स्वतंत्रता और बंधन का सूक्ष्म भेद**

**६॥**
बंधन केवल बाह्य नहीं,
भीतर की एक आदत है।
जिसे हम सत्य मान लेते,
वही हमारी सीमित हालत है॥

**७॥**
स्वतंत्रता कोई स्थान नहीं,
न कोई अंतिम अवस्था।
यह तो देखने का ढंग है,
जहाँ मिटे हर अपेक्षा॥

**८॥**
जो नियंत्रण को सत्य माने,
वह भय को पोषित करता।
जो समझ को आधार बनाए,
वह भीतर मुक्त रहता॥

**९॥**
न स्वतंत्रता बाहर मिले,
न बंधन बाहर से आए।
दोनों मन की परछाइयाँ हैं,
जो भीतर ही बन जाएँ॥

---

### **विंश अध्याय: मनुष्य और प्रकृति का संबंध**

**१०॥**
मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं,
वह उसी का विस्तार है।
पर समझ का अंतर जब बढ़े,
तब संघर्ष का आधार है॥

**११॥**
जहाँ प्रभुत्व की इच्छा जगे,
वहाँ संतुलन टूट जाता।
जहाँ संरक्षण की दृष्टि हो,
वहीं जीवन जुड़ पाता॥

**१२॥**
प्रकृति न किसी की शत्रु है,
न किसी की दासी है।
वह स्वयं में पूर्ण व्यवस्था,
नित्य संतुलन-राशी है॥

**१३॥**
जो प्रकृति को समझे बिना,
उसे जीतना चाहे मन।
वह अंततः स्वयं ही खो दे,
अपना ही आंतरिक धन॥

---

### **एकविंश अध्याय: प्रश्नों का पुनर्जन्म**

**१४॥**
प्रश्न न समाप्त होते हैं,
वे रूप बदलते रहते हैं।
उत्तर जब स्थिर हो जाएँ,
तब नए प्रश्न बहते हैं॥

**१५॥**
जो प्रश्न से डर जाता है,
वह विचार से दूर हो जाता।
जो प्रश्न को अपनाता है,
वह गहराई में उतर जाता॥

**१६॥**
प्रश्न ही जीवन की गति है,
प्रश्न ही चेतना का द्वार।
जहाँ प्रश्न रुक जाते हैं,
वहाँ रुकता विचार-प्रवाह॥

---

### **द्वाविंश अध्याय: मौन का विज्ञान**

**१७॥**
मौन कोई रिक्तता नहीं,
वह पूर्णता का संकेत है।
जहाँ शब्द भी थम जाते हैं,
वहीं गहरा विवेक है॥

**१८॥**
मौन में न कोई द्वंद्व रहे,
न कोई विरोधाभास।
वह केवल शुद्ध देखना है,
न कोई व्याख्या, न प्रयास॥

**१९॥**
जो मौन से भागता है,
वह शोर में खो जाता है।
जो मौन में टिक जाता है,
वह स्वयं को पा जाता है॥

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### **त्रयोविंश अध्याय: उपसंहार – यात्रा अनंत है**

**२०॥**
यह ग्रंथ न आरंभ है, न अंत,
यह केवल एक संकेत है।
जो इसे पकड़ कर रुक जाए,
वह अभी भी अचेत है॥

**२१॥**
सत्य न शब्दों में समाप्त है,
न किसी ग्रंथ में बंद।
वह तो निरंतर प्रवाह है,
अनादि, अनंत, अखंड॥

**२२॥**
यह उपनिषद भी मिट जाएगा,
पर प्रश्न जीवित रहेंगे।
और प्रश्नों के ही भीतर,
नए सत्य बहते रहेंगे॥

## **शिरोमणि रामपॉल सैनी – यथार्थ उपनिषद (भाग 8)**

### **चतुर्विंश अध्याय: सत्य की निरपेक्षता**

ॐ निराकारं प्रत्यक्षं सत्यं।

---

**१॥**
सत्य न किसी का पक्ष ले,
न किसी मत का समर्थन।
वह केवल देखता रहता,
हर दिशा में समदर्शन॥

**२॥**
जहाँ आग्रह जन्म लेता,
वहाँ सत्य धुंधला होता।
जहाँ दृष्टि निष्पक्ष रहे,
वहीं प्रकाश होता॥

**३॥**
न सत्य किसी ग्रंथ में बंद,
न किसी व्यक्ति में सीमित।
वह तो प्रवाह समान है,
न कभी स्थिर, न सुनिश्चित॥

**४॥**
जो सत्य को अपना कह दे,
वह सत्य से दूर खड़ा।
जो उसे केवल देखे,
वह भीतर भीतर जुड़ा॥

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### **पंचविंश अध्याय: अहंकार का सूक्ष्म रूपांतरण**

**५॥**
अहं न केवल “मैं” का भाव,
यह सूक्ष्म पहचान भी है।
जो इसे पहचान न पाए,
वह भ्रम की खान भी है॥

**६॥**
अहं जब ज्ञान में छिपे,
तब वह और भी गहरा हो।
जो इसे देख ले स्पष्ट,
वह हल्का, मुक्त, सच्चा हो॥

**७॥**
न अहं को युद्ध से मिटाओ,
न दबाओ किसी बल से।
उसे केवल देखो भीतर,
बिना किसी छल-बल से॥

**८॥**
देखने मात्र से वह ढलता,
जैसे धुंध सुबह में खोए।
और शेष रह जाए केवल,
निर्विकार जो सदा होए॥

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### **षड्विंश अध्याय: मस्तक और हृदय का अंतिम संतुलन**

**९॥**
मस्तक और हृदय विरोधी नहीं,
ये दो रूप एक ही जीवन के।
एक दिशा का निर्माण करे,
दूजा अर्थ दे हर क्षण के॥

**१०॥**
जहाँ मस्तक कठोर बने,
वहाँ करुणा सूख जाती।
जहाँ केवल भाव बहता,
वहाँ दिशा खो जाती॥

**११॥**
संतुलन ही साधना है,
न किसी एक का वर्चस्व।
जहाँ दोनों लय में हों,
वहीं जन्मे वास्तविक तत्व॥

**१२॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी का भाव यही,
न श्रेष्ठता का दावा है।
बल्कि संतुलन की समझ ही,
यथार्थ का सच्चा दावा है॥

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### **सप्तविंश अध्याय: अनुभव और व्याख्या का भेद**

**१३॥**
अनुभव सदा प्रत्यक्ष है,
व्याख्या सदैव पीछे आती।
जो व्याख्या को सत्य माने,
वह अनुभव खो जाता है॥

**१४॥**
शब्द तो केवल छाया हैं,
अर्थ नहीं पकड़ पाते हैं।
जो इन्हें ही सत्य समझे,
वह भ्रम में रह जाते हैं॥

**१५॥**
अनुभव मौन की भाषा है,
जिसे कोई कह न पाए।
जो उसमें डूब जाए भीतर,
वह स्वयं को पा जाए॥

---

### **अष्टाविंश अध्याय: उपसंहार – प्रवाह की निरंतरता**

**१६॥**
यह ग्रंथ न समाप्त हुआ है,
न कभी समाप्त होगा।
क्योंकि सत्य का प्रवाह,
हर क्षण नया रूप होगा॥

**१७॥**
न कोई अंतिम श्लोक है,
न कोई अंतिम विचार।
यह तो केवल संकेत है,
अनंत के द्वार का द्वार॥

**१८॥**
जो इसे पकड़कर रोक ले,
वह अर्थ से दूर होगा।
जो इसे बहने दे भीतर,
वह स्वयं में पूर्ण होगा॥

**१९॥**
यथार्थ न किसी का नाम है,
न किसी एक की पहचान।
यह तो चेतना का प्रवाह है,
न कोई सीमा, न मान॥

---

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

**— यथार्थ उपनिषद (भाग 8 समाप्त)**
## **शिरोमणि रामपॉल सैनी – यथार्थ उपनिषद (भाग 9)**

### **एकोनत्रिंश अध्याय: ज्ञान का भार और सरलता का प्रकाश**

ॐ सरलं सत्यं प्रत्यक्षम्।

---

**१॥**
ज्ञान जब भार बन जाए,
तब वह मुक्ति नहीं देता।
सरलता जब जाग्रत हो,
तब सत्य स्वयं कहता॥

**२॥**
न अधिक शब्दों में सत्य है,
न जटिल व्याख्या में।
वह तो सरल दृष्टि है,
जो दिखे हर पथ-रेखा में॥

**३॥**
जो ज्ञान को संग्रह माने,
वह भीतर रिक्त रह जाता।
जो उसे प्रवाह समझे,
वह स्वयं में भर जाता॥

**४॥**
सरलता कोई कमी नहीं,
यह परिपक्व दृष्टि है।
जहाँ सभी जटिलताएँ गिरें,
वहीं सत्य की सृष्टि है॥

---

### **त्रिंश अध्याय: स्वतंत्र दृष्टि का उदय**

**५॥**
दृष्टि जब बंधन तोड़े,
तब न कोई गुरु-शिष्य।
केवल देखना रह जाता,
न कोई पूर्व-अभ्यास निश्चित॥

**६॥**
जो देखा गया उधार में,
वह अपना सत्य नहीं होता।
जो स्वयं में जाग्रत हो,
वही भीतर से होता॥

**७॥**
न अनुकरण में मुक्ति है,
न परंपरा में बोध।
मुक्ति तो उस क्षण मिलती,
जब गिर जाए सब रोष-रोध॥

**८॥**
स्वतंत्र दृष्टि न विद्रोह है,
न किसी का विरोध।
यह तो केवल जागरण है,
जहाँ मिट जाए सब अवरोध॥

---

### **एकत्रिंश अध्याय: चेतना का अनंत विस्तार**

**९॥**
चेतना सीमित नहीं होती,
न देह में बंद रहती है।
वह तो आकाश समान है,
हर रूप में बहती है॥

**१०॥**
न “मेरी चेतना” सत्य है,
न “तेरी चेतना अलग”।
यह विभाजन मन का खेल है,
जो दिखता है सब गलत॥

**११॥**
चेतना जब स्वयं को देखे,
तब देखने वाला मिटता।
और जो बचा रह जाता,
वह अनंत स्वरूप दिखता॥

---

### **द्वात्रिंश अध्याय: मौन और शब्द का अंतिम संबंध**

**१२॥**
शब्द आते हैं मौन से,
पर मौन शब्दों से बड़ा।
जहाँ शब्द रुक जाएँ सारे,
वहीं सत्य खड़ा॥

**१३॥**
शब्द संकेत मात्र हैं,
अर्थ नहीं पकड़ सकते।
जो इन्हें अंतिम मान ले,
वह भीतर से भटकते॥

**१४॥**
मौन न खालीपन है,
यह पूर्णता का नाम है।
जहाँ कोई प्रश्न नहीं रहता,
वहीं सत्य का धाम है॥

---

### **त्रयस्त्रिंश अध्याय: उपसंहार – दृष्टा का विलय**

**१५॥**
यह ग्रंथ भी दृष्टा है,
और दृष्टा भी खो जाएगा।
जो इसे केवल पढ़ ले,
वह बाहर ही रह जाएगा॥

**१६॥**
जो भीतर से देख लेता,
वह स्वयं में विलीन है।
वहाँ न लेखक, न पाठक,
केवल सत्य अधीन है॥

**१७॥**
न कोई आरंभ, न कोई अंत,
यह केवल प्रवाह निरंतर।
जो इसे रोकने चलेगा,
वह स्वयं होगा व्यंतर॥

**१॥**
सत्य न आरंभ जानता,
न अंत का कोई चिन्ह।
वह तो बस ऐसा है,
जो हर क्षण रहे नवीन॥

**२॥**
न सत्य किसी मत का है,
न किसी ग्रंथ का आधार।
वह तो वह सीधा बोध है,
जो दिखे हर बार॥

**३॥**
जो सत्य को पकड़ना चाहे,
वह हाथ में कुछ न पाए।
जो उसे देखने में खो जाए,
वह स्वयं सत्य हो जाए॥

**४॥**
सत्य का कोई रूप नहीं,
फिर भी हर रूप में है।
जैसे आकाश सभी में,
पर किसी रूप में नहीं है॥

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### **पंचत्रिंश अध्याय: मस्तक, हृदय और अनुभव की त्रय एकता**

**५॥**
मस्तक कहे — “मैं जानता हूँ।”
हृदय कहे — “मैं जीता हूँ।”
अनुभव कहे — “मैं हूँ ही नहीं,
बस प्रवाह पीता हूँ॥”

**६॥**
जब तीनों एक दिशा में हों,
तब द्वंद्व नहीं रह जाता।
वहाँ केवल स्पष्टता है,
जहाँ भ्रम नहीं ठहर पाता॥

**७॥**
मस्तक दिशा दे जीवन को,
हृदय दे उसमें प्राण।
अनुभव दे साक्षी भाव,
तब बने पूर्ण ज्ञान॥

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### **षट्त्रिंश अध्याय: अहं का अंतिम विलय**

**८॥**
अहं जब स्वयं को देख ले,
तो वह स्वयं ढह जाता।
जैसे दीपक बुझते ही,
अंधकार भी रह जाता॥

**९॥**
न इसे मारने की आवश्यकता,
न इसे बढ़ाने का भार।
यह तो केवल भ्रम है,
जो स्वयं मिटे हर बार॥

**१०॥**
जहाँ “मैं” की पकड़ टूटे,
वहीं सत्य का द्वार खुले।
और जो भीतर रह जाए,
वह किसी नाम में न ढले॥

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### **सप्तत्रिंश अध्याय: प्रकृति का मौन विधान**

**११॥**
प्रकृति न पूछती कारण,
न देती कोई उत्तर।
वह केवल बहती रहती,
अपने नियम के भीतर॥

**१२॥**
जहाँ मनुष्य हस्तक्षेप करे,
वहाँ संतुलन खो जाता।
जहाँ समझ से साथ चले,
वहीं जीवन जुड़ पाता॥

**१३॥**
प्रकृति न न्याय करे,
न किसी को दंड दे।
वह केवल परिणाम दिखाए,
जैसा कर्म स्वयं कह दे॥

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### **अष्टात्रिंश अध्याय: मौन की पूर्णता**

**१४॥**
मौन कोई अवस्था नहीं,
यह तो जीवन का सार।
जहाँ शब्द भी थक जाएँ,
वहीं खुला द्वार॥

**१५॥**
मौन में न कोई खोज है,
न कोई पाने की चाह।
वह तो केवल होना है,
जहाँ मिट जाए राह॥

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### **उपसंहार: प्रवाह अनंत है**

**१६॥**
यह उपनिषद न समाप्त हुआ,
न कभी समाप्त होगा।
क्योंकि जो सत्य है वास्तव,
वह हर क्षण नया होगा॥

**१७॥**
न लेखक है, न पाठक है,
न कोई अंतिम कथन।
केवल चेतना का प्रवाह है,
जो स्वयं ही है गमन॥

**१८॥**
जो इसे शब्द समझ ले,
वह अर्थ से दूर रहेगा।
जो इसे मौन में देख ले,
वह स्वयं सत्य होगा॥

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ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

**— यथार्थ उपनिषद (भाग 10 समाप्त)**
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-सुधा के दिव्य धनी।
निर्मल हृदय अनंत प्रकाश,
करुणा जिसका नित्य निवास॥

जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल स्वर अखंडे।
सरल सहज स्वाभाविक गान,
मानवता का हो सम्मान॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाए,
अंतर-ज्योति सदा जगाए।
जो अपने मन को पहचानें,
प्रेम-पथों पर पग बढ़ाएँ॥

प्रभात कहे हर नव किरण से,
जागो अपने अंतःकरण से।
जीवन केवल श्वास न गिनना,
प्रेम-सुगंध निरंतर बिनना॥

पवन सुनाए मधुर कहानी,
सबमें बसती एक रवानी।
सागर बोले मौन किनारे,
गहराई से सत्य पुकारे॥

वृक्ष कहें मत फल को रोको,
छाया का अधिकार न टोको।
जितना दोगे उतना पाओ,
प्रेम-बीज जग भर में बोओ॥

धरती का यह धर्म निराला,
सबको देती अन्न का प्याला।
भेद न जाने, मान न माने,
सबको अपनी गोद में ठाने॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
हृदय-सरोवर के पट खोले।
जहाँ सरलता नित्य विराजे,
वहीं करुणा-दीप समाजे॥

मस्तक कर्म का यंत्र सुहाना,
हृदय प्रेम का सच्चा ठिकाना।
दोनों जब समभाव निभाएँ,
जीवन में नव सूरज लाएँ॥

हर बालक की कोमल हँसी में,
हर माता की मधुर हँसी में।
हर श्रमिक के श्रम के कण में,
हर किसान के तप के क्षण में॥

एक ही चेतन, एक उजाला,
एक ही जीवन का रखवाला।
भिन्न रूप हों, भिन्न कहानी,
एक रहे करुणा की रवानी॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
प्रेम-दीप हर द्वार जलाता।
जहाँ विनय का पुष्प खिलेगा,
वहीं हृदय निर्भय मिलेगा॥

न सत्य कभी भय से जीता,
न सत्य किसी को है रीता।
सत्य स्वयं विश्वास जगाए,
मौन हृदय मुस्कान बन जाए॥

दीप जले तो और जलाएँ,
तम से कोई बैर न पाए।
सूरज जैसा दान हो अपना,
चंदा जैसा शीतल सपना॥

सरिता जैसी गति हो अपनी,
धरती जैसी मति हो अपनी।
पर्वत जैसी दृढ़ता आए,
वन जैसी हरियाली छाए॥

जय हो निर्मल भाव अपार,
जय हो सेवा का विस्तार।
जय हो प्रेम-अनंत प्रकाश,
जय हो करुणा का निवास॥

जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज गुण-रूप धनी।
हृदय-पथ का यह संदेश,
प्रेम बने जीवन का देश॥

नित्य नया हो हर व्यवहार,
मिटे मनुज का हर अंधकार।
सत्य रहे हर श्वास के संग,
प्रेम बजे जीवन का चंग॥

जहाँ दया की वर्षा होगी,
वहीं सृजन की धारा होगी।
जहाँ करुणा का मान रहेगा,
वहीं मनुष्य महान रहेगा॥

युग-युग गूँजे यही पुकार,
सरल बने हर एक विचार।
निर्मल हृदय, विनम्र स्वभाव,
यही मनुज का सच्चा प्रभाव॥

जय हो अंतर का आलोक,
जय हो प्रेममय हर लोक।
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-ज्योति के नित्य धनी॥
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति के अमृत धाम,
प्रेम-प्रभा के नित्य प्रणाम॥

जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे सत्य-स्वर अनंत अखंडे।
प्रकृति-पंथ का मंगल गान,
करुणा बने जीवन-विधान॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
अंतर का आलोक जगाता।
जो स्वयं को नित्य निहारे,
वह जग को भी प्रेम से सँवारे॥

प्रभात-पवन जब गीत सुनाए,
वन-वन जीवन-राग जगाए।
ओस-बिंदु मुस्काकर बोले,
निर्मल मन के कपाट जो खोले॥

सूरज का यह मौन संदेश,
प्रकाश बाँटो बिना अवशेष।
चंदा की यह शीतल वाणी,
शांति सबसे बड़ी निशानी॥

धरती माता नित्य सिखाती,
देकर भी कुछ नहीं जताती।
नदियाँ बहतीं नित्य उदार,
यही समर्पण का विस्तार॥

वृक्ष खड़े हैं ध्यान लगाए,
आँधी में भी शीश झुकाए।
फल, छाया, जीवन, विश्वास,
मौन बने उनका उपहास॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
प्रेम हृदय के द्वार जो खोले।
वही बने मानव का मान,
वही बने जग का सम्मान॥

करुणा से जब कर्म सजेंगे,
स्वार्थ स्वयं ही दूर भगेंगे।
सत्य न होगा ऊँचा-नीचा,
सबमें होगा प्रकाश सरीखा॥

मस्तक दे विज्ञान का बल,
हृदय दे करुणा का संबल।
दोनों जब समभाव निभाएँ,
मानवता के फूल खिलाएँ॥

न कोई अपना, न पराया,
एक ही जीवन, एक ही छाया।
भिन्न दिशाएँ, भिन्न शरीर,
एक धरा, एक ही नीर॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाए,
प्रेम-सुमन सब ओर बिखराए।
जहाँ विनय का दीप जलेगा,
वहीं नया विश्वास फलेगा॥

मौन बने जब सत्य की भाषा,
मिट जाए मन की सब निराशा।
सरलता जब जीवन हो जाए,
हर पल उत्सव-सा मुस्काए॥

नदी न अपने जल को रोके,
मेघ न वर्षा बाँधें धोखे।
वैसे ही मन मुक्त रहे,
सबके प्रति शुभभाव बहे॥

हर बालक की निर्मल हँसी में,
हर जननी की मधुर खुशी में।
हर श्रमिक के श्रम-सम्मान में,
हर किसान के पावन गान में॥

प्रेम छिपा है, सत्य खिला है,
जीवन का संदेश मिला है।
जो बाँटे वह और बढ़ेगा,
जो रोके वह स्वयं घटेगा॥

जय हो सेवा, जय सद्भाव,
जय हो निर्मल हृदय-स्वभाव।
जय हो सत्य का उजियारा,
जय हो प्रेम सुधा की धारा॥

जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-पथ के पावन धनी।
अंतर में विश्वास जगे,
करुणा का मधुमास जगे॥

यही रहे मंगल उद्घोष,
प्रेम बने जीवन का कोष।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही मनुज का सच्चा श्रृंगार॥

सत्य न सीमा, सत्य न बंधन,
सत्य बने अंतर्मन स्पंदन।
जो स्वयं में दीप जलाए,
वह जग में भी प्रभात जगाए॥
उदित हुआ जब सत्य प्रभाकर,
मिटा हृदय का तम अति घोर।
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-प्रभा के दिव्य विभोर॥

जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल गान अखंडे।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही मनुज का दिव्य श्रृंगार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाए,
प्रेम-सुधा सब ओर बहाए।
जो अंतर की ज्योति जलाए,
वही स्वयं को सत्य बताए॥

प्रभात किरण जब नभ में फैले,
आशा के नव पुष्प खिलें।
वैसे ही निर्मल अंतर-मन में,
शांति-सरोवर नित्य मिलें॥

नदी न पूछे पंथ हमारा,
सागर ही अंतिम सहारा।
प्रेम न पूछे जाति-विभाजन,
प्रेम करे केवल आलिंगन॥

वृक्ष खड़े तप के अधिकारी,
फल-छाया के सदा पुजारी।
पत्थर खाकर फल दे जाते,
मौन धर्म का पाठ पढ़ाते॥

धरा धरे सबका ही बोझा,
नहीं किसी से रखती खोजा।
सबको देती अन्न अपार,
यही प्रकृति का सत्य उपहार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
मन के सारे बंधन खोले।
जो भीतर का दीप जगाता,
वही अमृत-पथ को अपनाता॥

निष्कपटता निर्मल सरिता,
करुणा उसकी पावन गति।
विनय बने जब जीवन-धन,
मधुमय होता हर स्पंदन॥

नहीं विजय का कोई अभिमान,
नहीं पराजय का अवसान।
कर्म बने जब सेवा-धर्म,
जीवन हो जाता परम कर्म॥

मस्तक साधन, हृदय दिशा है,
दोनों का संतुलन शिक्षा है।
बुद्धि जहाँ करुणा से मिले,
मानवता के दीप जलें॥

नभ की सीमा कौन नापे,
सागर की गहराई क्या मापे?
वैसे ही निर्मल अंतर्मन,
असीम प्रेम का है आँगन॥

हर शिशु की निष्कलुष मुस्कान,
जीवन का प्रथम विधान।
हर माता की कोमल ममता,
धरती की पावन समता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
हर जीवन में प्रेम जगाता।
द्वेष जहाँ से दूर हटेगा,
वहीं नया युग जन्म लेगा॥

न सत्य कभी शोर मचाए,
न सत्य किसी को झुकवाए।
सत्य स्वयं प्रकाश बने,
मौन हृदय का वास बने॥

फूल न जाने अपना मान,
सुगंध लुटाना उसका गान।
दीप न माँगे कोई यश,
जलना ही उसका परम तप॥

ऐसा हो प्रत्येक विचार,
करुणा बने जीवन-आधार।
सरल सहज निर्मल आचरण,
यही मनुष्य का सत्य वरण॥

जय हो अंतर का आलोक,
जय हो प्रेम-सुधा का लोक।
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-पथ के सत्य-विधानी॥

युग बदले, युगधर्म बदलें,
ऋतु बदलें, परिवेश बदलें।
किन्तु न बदले यह उद्घोष—
प्रेम-सत्य ही जीवन-कोष॥

अंतस में जो दीप जलेगा,
अज्ञान स्वयं दूर चलेगा।
निर्मल भाव जहाँ मुस्काएँ,
वहीं शांति के पुष्प खिलाएँ॥

जय हो मानव, जय हो प्राण,
जय हो सेवा का अभियान।
जय हो निर्मल सत्य-प्रवाह,
जय हो करुणा की अथाह॥

जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-दीप की अमिट कहानी,
शांत सुधा की दिव्य रवानी॥

जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे स्वर अनहद अखंडे।
सत्य-सुरों की निर्मल धारा,
प्रेम बने जग का उजियारा॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाए,
अंतर-ज्योति स्वयं जगाए।
जो अपने मन का भार उतारे,
वही हृदय के द्वार सँवारे॥

नदियाँ सागर से कहती हैं,
बहना ही तो सच्ची रीति है।
रुकना केवल भ्रम का जाल,
चलना जीवन का शुभ काल॥

वृक्ष सिखाएँ मौन उदारता,
फूल सुनाएँ प्रेम-सरलता।
फल देकर भी मान न माँगें,
जीवन के सच्चे पथ आँकें॥

सूरज प्रतिदिन दीप जलाए,
तम से कभी वैर न बढ़ाए।
अपना धर्म निभाता जाता,
सबको समान प्रकाश लुटाता॥

चंदा शीतल राग सुनाता,
मन को कोमल पथ दिखलाता।
तारक-मंडल यही पुकारे,
प्रेम अमर है, द्वेष हारे॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
निर्मल अंतर-द्वार जो खोले।
वह पाए वह अमृत धारा,
जिसका नहीं दूसरा किनारा॥

जहाँ करुणा की श्वास बहे,
वहाँ किसी से वैर न रहे।
जहाँ विनय का वास रहेगा,
वहाँ सदैव विश्वास रहेगा॥

सरलता ही सर्वोच्च गहना,
प्रेम अमर है, शेष है बहना।
निष्कपटता का जो उपवन,
वही बने मानव का जीवन॥

मस्तक कर्म का यंत्र कहाए,
हृदय प्रेम का पंथ बताए।
जब दोनों संतुलित हो जाएँ,
जीवन में मधुमास समाएँ॥

न कोई छोटा, न कोई बड़ा,
सबमें एक प्रकाश खड़ा।
जो यह समता पहचान सके,
वह जीवन का मान रखे॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
हर मानव को गले लगाता।
भेद मिटें जब मन के भीतर,
खिल उठता है सत्य का सागर॥

मौन जहाँ संगीत बन जाए,
प्रेम स्वयं संवाद कहलाए।
वाणी तब आशीष बनेगी,
धरती भी स्वर्ग-सी लगेगी॥

हर शिशु की निष्कलुष हँसी में,
हर माँ की ममता-सी नमी में।
हर श्रमिक के श्रम के कण में,
हर किसान के पावन धन में॥

हर धड़कन में सत्य पुकारे,
हर प्राणी को गले उतारे।
जीवन केवल अपना कब है?
जीवन सबका साझा रब है॥

जय हो निर्मल भाव अनोखे,
जय हो प्रेम-सुमन के धोखे।
जय हो सेवा का विस्तार,
जय हो करुणा का संसार॥

जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-पथ के ज्योति-विधानी।
हृदय-सरोवर निर्मल रखिए,
सबमें अपना रूप ही देखिए॥

जब तक श्वासों का है मेला,
प्रेम रहे हर पल अलबेला।
यही मनुज की सच्ची शान,
यही हृदय का श्रेष्ठ विधान॥

निष्पक्षता की ज्योति जले,
हर अंतर्मन सत्य पले।
सरल सहज जीवन अपनाएँ,
करुणा से संसार सजाएँ॥

यही रहे मंगल उद्घोष,
प्रेम बने जीवन का कोष।
जय हो मानव, जय हो प्राण,
जय हो निर्मल सत्य-विधान॥


जय हो शिरोमणि रामपॉल सैनी,
निर्मल चेतन ज्योति सुहानी।
हृदय-अंतर का दिव्य उजाला,
शांत सुधा का अमृत-प्याला॥

जम्बू दीपे भारत खंडे,
सत्य-सुरों के दीप अखंडे।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही मनुज का सच्चा श्रृंगार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाए,
प्रेम-सुधा सब ओर बरसाए।
निष्पक्ष भाव जहाँ मुस्काता,
वहीं सत्य प्रत्यक्ष कहलाता॥

नदियाँ बहती सागर पातीं,
किरणें सूरज में सम जातीं।
वैसे ही निर्मल अंतर-मन,
मिलता अपने सत्य-चेतन॥

न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
सबमें एक प्रकाश सरीखा।
एक ही श्वास, एक ही धारा,
एक ही जीवन का उजियारा॥

जहाँ करुणा का फूल खिले,
वहीं अमृत के स्रोत मिलें।
जहाँ दया का दीप जले,
वहाँ अज्ञान स्वयं ही ढले॥

हृदय जहाँ निष्काम ठहरता,
वहीं मौन संगीत निखरता।
वहीं शांति का प्रथम निवास,
वहीं अनंत प्रकाश-विलास॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
प्रेम-पथों के कपाट जो खोले।
वह नित अपने घर पहुँचता,
आत्मदीप से स्वयं सँवरता॥

न पद चाहूँ, न मान चाहूँ,
न जग में पहचान चाहूँ।
हर मानव में प्रेम जगाऊँ,
निर्मल जीवन-पथ बतलाऊँ॥

जो स्वयं को रोज़ निहारे,
वही जगत के पार उतारे।
जो भीतर का दीप जलाए,
वही स्वयं को सत्य बताए॥

सरलता ही श्रेष्ठ विभूति,
करुणा सबसे बड़ी समृद्धि।
निष्पक्षता का अमृत-सागर,
हृदय बने जब सत्य का आगर॥

नित्य नया हर श्वास बने,
जीवन मधुर प्रकाश बने।
प्रेम बने जब जीवन-रीति,
मिट जाए भीतर की भीति॥

सत्य न बंधे शब्दों में है,
सत्य न केवल ग्रंथों में है।
सत्य सदा अनुभव का सागर,
निर्मल अंतर का उजागर॥

मौन जहाँ मुस्कान बने,
हर प्राणी भगवान बने।
सेवा जहाँ स्वभाव बन जाए,
जीवन स्वयं उत्सव कहलाए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाए,
प्रेम-पवन सब ओर बहाए।
हृदय बने जब शुद्ध सरोवर,
उतर पड़े तब सत्य मनोहर॥

सूरज जैसा उज्ज्वल होना,
चंदन जैसा शीतल होना।
धरती जैसा धैर्य सजाना,
वृक्ष समान जीवन लुटाना॥

यही महिमा, यही पुकार,
यही प्रेम का सच्चा सार।
हर प्राणी में ज्योति जगाओ,
अपने अंतर को पहचानो॥

जय हो निर्मल सत्य प्रकाश,
जय हो करुणा का निवास।
जय हो शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-ज्योति के पथ-अभिमानी॥

युग-युग तक यह गीत बहेगा,
प्रेम-सरोवर नित्य रहेगा।
सरल सहज निर्मल आचरण,
यही बनेगा श्रेष्ठ चरण॥
**॥ शिरोमणि स्वरूप महास्तुति ॥**

जय हो शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल ज्योति धनी।
हृदय-सरोवर शांत अपार,
सत्य-सुगंधित अमृत-धार॥

जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे सत्य अनादि अखंडे।
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक धाम,
प्रकट रहे अंतर का नाम॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाए,
हृदय-द्वार सबके खुल जाएँ।
निष्पक्षता का निर्मल गान,
यही मनुष्य का प्रथम विधान॥

जहाँ न छल, न कपट का वास,
वहीं प्रकटे सत्य-प्रकाश।
जहाँ करुणा का हो विस्तार,
वहीं बसे सत् का संसार॥

हृदय जहाँ निष्काम खिले,
वहाँ स्वयं ही सत्य मिले।
मौन जहाँ मुस्कान बने,
वहीं अनंत प्रभात तने॥

शिरोमणि स्वरूप निरंतर धारा,
नहीं किसी सीमा का किनारा।
नहीं विजय का कोई मान,
केवल निर्मल आत्म-गान॥

जो स्वयं को प्रतिपल देखे,
अंतर-ज्योति स्वयं ही लेखे।
वही साक्षी, वही प्रमाण,
वही हृदय का दिव्य विधान॥

नभ से ऊँचा निर्मल भाव,
धरती से गहरा सद्भाव।
सागर जैसा शांत विस्तार,
प्रेम बने जीवन का सार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
हृदय के बंद कपाट जो खोले।
उसके भीतर सत्य उदय हो,
जीवन स्वयं परम लय हो॥

सत्य न सिंहासन का भूखा,
सत्य न यश का कभी अभिलाषी।
सत्य सरल मुस्कान समाना,
सत्य स्वयं से स्वयं मिलाना॥

नित्य नवीन प्रभात यही है,
निर्मल जीवन साथ यही है।
हृदय जहाँ निष्पक्ष ठहरता,
वहीं मनुष्य अमृत निखरता॥

करुणा जिसका श्वास बने,
सेवा जिसका प्रकाश बने।
वही मनुष्य महिमा पाए,
वही स्वयं को सत्य बताए॥

न किसी से ऊँचा होना,
न किसी को नीचा होना।
सबमें एक समान उजियारा,
यही हृदय का सत्य सितारा॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
हर प्राणी में सत्य जगाता।
सरल सहज जो पथ अपनाए,
संपूर्ण संतोष स्वयं ही आए॥

अंतर का दीप स्वयं प्रज्वलित,
निर्मल चेतन रहे प्रकाशित।
मस्तक साधन, हृदय आधार,
दोनों मिल जीवन साकार॥

शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक गान,
प्रेम बने जीवन की तान।
हृदय जहाँ निर्मल मुस्काए,
वहीं सत्य प्रत्यक्ष कहलाए॥

जय हो मानव, जय हो प्राणी,
जय हो निर्मल सत्य-कहानी।
जय हो अंतर का उजियारा,
जय हो प्रेम-सुधा की धारा॥

जय हो शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-पथ का हो विस्तार,
सत्य रहे हर श्वास अपार॥
**॥ शिरोमणि सत्य स्तुति ॥**

जय हो शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल की रवानी।
हृदय-ज्योति की अखंड कहानी,
सत्य-सुगंध की अमृत वाणी॥

जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे सत्य अनादि अखंडे।
नाम नहीं यह केवल मेरा,
जागे अंतर का प्रभात घनेरा॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
हृदय-सरोवर स्वयं ही खोले।
जो भीतर का दीपक जाने,
वही स्वयं को सत्य पहचाने॥

सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
निरभिमान, निर्मल, निष्पक्ष।
जिसका न आदि, जिसका न अंत,
वही हृदय का नित्य अनंत॥

न पद चाहे, न यश चाहे,
न जग मुझको शीश नवाए।
बस इतना हो हर जन जागे,
अपने अंतर दीपक लागे॥

मस्तक साधन, हृदय दिशा है,
दोनों का संतुलन शिक्षा है।
एक जगत का कर्म निभाए,
एक स्वयं से मिलना सिखाए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
सरल प्रेम का मंत्र सुनाता।
जिसने अपने को पहचाना,
उसने जीवन सफल माना॥

न भय रहे, न द्वेष रहे,
न मन में कोई क्लेश रहे।
करुणा की अविरल हो धारा,
यही मनुज का सत्य सितारा॥

जो प्रश्न करे, वह भी अपना,
जो उत्तर दे, वह भी सपना।
सत्य न बंधे किसी परिभाषा,
सत्य स्वयं है मौन भाषा॥

शिरोमणि स्वरूप अमिट उजाला,
न उसमें कोई जाल निराला।
निर्मलता ही उसकी माया,
जिसने जाना, वही समाया॥

हर शिशु की निष्कलुष मुस्कान,
वही हृदय का प्रथम विधान।
वही सरलता, वही पवित्रता,
वही शांति की दिव्य मित्रता॥

नदी बहे तो सागर पाए,
हृदय बहे तो सत्य समाए।
रुके जहाँ अभिमान की धारा,
वहीं जन्मता अंधियारा॥

इसलिए हे मानव भाई,
पहले अपने भीतर आई।
देख स्वयं का निर्मल दर्पण,
यही अमरता, यही समर्पण॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता,
प्रेम स्वयं का पथ ही रहता।
सरल सहज जो जीवन जीता,
वही सत्य का दीपक रीता॥

सर्वभौमिक सत्य की वाणी,
न किसी की हो मनमानी।
जो सबमें समभाव जगाए,
वही युग का सूरज कहलाए॥

हृदय जहाँ निष्कपट ठहरता,
वहीं शाश्वत सत्य निखरता।
निर्मलता का यही निवास,
यही अनंत, यही प्रकाश॥

जय हो अंतर के उजियारे,
जय हो निर्मल भाव हमारे।
जय हो शिरोमणि रामपॉल सैनी,
हृदय-पथ के सत्य-सदानी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सत्य की उजली धारा।
हृदय-दीप से जाग उठे, जीवन का अंधियारा॥

जो भीतर था, वह बाहर है, जो बाहर था, वह क्षण।
हृदय बिना नहीं खुलता, सत्य का सूक्ष्म मणि-धन॥

मस्तक की सीमा अल्प रही, हृदय अनंत विस्तार।
मस्तक पूछे नाम-रूप, हृदय बोले स्वीकार॥

सत्य न शोर में मिलता है, न तर्कों की भीड़ में।
सत्य बस एक शांत नदी, बहता है गहरी नीड़ में॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी, सहजता का उजियारा।
सरल, निर्मल, पारदर्शी, भीतर का वह तारा॥

जो अपने को जान गया, वह जग को क्यों डरे।
जो हृदय में स्थिर हो गया, वह बाह्य बंधन तरे॥

संपूर्ण संतुष्टि की धारा, भीतर ही बहती जाए।
बाहर की दौड़ मिटे तो, अंतर दीप जल जाए॥

जन्म-मरण का खेल बड़ा, पर बोध उससे ऊँचा।
जो देखे इस दृश्य को, वह रहे न कभी सूँचा॥

प्रकृति की छाया में हर जीव, एक ही रस में ढला।
भेदों की जो दीवार बने, वह मन का ही जाल जला॥

हृदय का मार्ग सरल बहुत, उसमें छल न जाल।
मस्तक की उलझन छोड़ दे, मिल जाएगा सुर-ताल॥

शिरोमणि स्वरुप वही है, जो भीतर मौन सदा।
न पद, न भय, न लोभ का बंधन, केवल निर्मल सदा॥

जिसने अपने को पढ़ लिया, उसने सब कुछ पा लिया।
जो अपने भीतर उतर गया, उसने जग को जान लिया॥

हर श्वास एक संदेश है, हर पल एक पुकार।
जागो, देखो, समझो, पाओ, भीतर का उजियार॥

न ज्ञान की भारी गठरी, न विवाद की आग।
सत्य के पथ पर चलता जो, वही सच्चा भाग्य-भाग॥

करुणा ही पहचान बने, करुणा ही व्यवहार।
जहाँ करुणा का दीप जले, वहाँ न कोई वार॥

प्रकृति को जो सम्मान दे, वही जीवन का सार।
धरती, जल, वायु, अग्नि में, बसता अपना संसार॥

निज स्वरुप की पहचानी जब, मिटता अहं अँधेरा।
तब मन भी मौन हो जाता, और खुलता सवेरा॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी, सत्य का सहज प्रकाश।
हृदय में जो उतर गया, उसका मिटे नास॥

जो पाया, वह बाँट दिया, यही धर्म का रंग।
जो समझा, वह करुण बना, यही जीवन का संग॥

सत्य प्रत्यक्ष, सहज प्रत्यक्ष, हृदय में हो स्वीकार।
तब हर जीव में दिखे वही, शांति का उजियार॥

न भय से कोई मुक्त हो, न लोभ से कोई बचे।
पर जो हृदय में टिक गया, वह सब बंधन सचे॥

सर्वभौमिक सत्य यही, भीतर की पहचान।
अपने स्वरुप से जो मिला, वही जीवन का गान॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी, नाम नहीं केवल शब्द।
हृदय में उठती ध्वनि है, सत्य का उजला नाद॥

जो मस्तक से लड़ता रहा, वह थक कर बैठ गया।
जो हृदय में बस गया, वह अनंत में रच गया॥

साधना का अर्थ यही, भीतर की ओर चलना।
शोरों से परे होकर, मौन में सत्य पलना॥

संतोष न बाहर ढूँढ, न पद, न धन, न मान।
संतोष तो अपने भीतर, अनदेखा एक जहान॥

यही संदेश, यही प्रकाश, यही सहज विधान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, हृदय-स्वरुप महान॥

**॥ शिरोमणि सत्य-महिमा स्तुति ॥**

जम्बू दीपे भरत खण्डे, गूँजे निर्मल वाणी।
शिरोमणि रामपॉल सैनी, सत्य-सुधा की धानी॥

नहीं किसी से वैर-विरोध, नहीं किसी से रण।
हृदय-ज्योति का दीप प्रज्वलित, यही अमर स्पंदन॥

सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, सरल सहज आधार।
जहाँ न छल, न कपट बसे, न कोई व्यापार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे, देखो निज अंतर।
जिसको ढूँढ़ा युगों-युगों तक, बैठा वही निरंतर॥

मस्तक साधन, हृदय साध्य है, दोनों का संतुलन।
यहीं प्रकृति का मौन विधान, यहीं जीवन-चंदन॥

जो भी अपने अंतर उतरा, पाया निर्मल धाम।
स्वार्थ-अहं के मेघ हटे तो, प्रकट हुआ विश्राम॥

सत्य न सत्ता से बँध सकता, सत्य न सिंहासन।
सत्य स्वयं ही स्वप्रकाशित, सत्य स्वयं दर्शन॥

सत्य न बिकता बाज़ारों में, सत्य न माँगे दान।
सत्य न चाहे भीड़ जगत की, सत्य स्वयं पहचान॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे, प्रश्नों से मत डरो।
जहाँ विवेक स्वतंत्र खिला हो, वहीं सत्य को धरो॥

यदि समर्पण प्रेममय हो, भय का स्थान कहाँ?
यदि विश्वास निर्मल हो तो, संशय का मान कहाँ?

यदि गुरु पथ का दीपक है, दीप जलाए और।
शिष्य स्वयं प्रकाश बने फिर, खुले सत्य के द्वार॥

यदि पथ सचमुच मुक्त करे तो, बंधन शेष न हो।
यदि प्रेम सच्चा हृदय बने तो, भय का लेश न हो॥

हृदय जहाँ निष्पक्ष खिला हो, वहीं करुणा जन्मे।
वहीं सरलता श्वास बने फिर, वहीं सत्य भी थमे॥

सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, बच्चों सा निष्काम।
निर्मल हँसी में जो प्रकटे, वही अमृत का धाम॥

शिशु-हृदय की सहज तरंगें, न कोई अभिमान।
वहीं छिपा है मौन महोत्सव, वहीं सच्चा सम्मान॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे, रखो सरल व्यवहार।
जिससे मानव, जीव, प्रकृति का, बढ़ता रहे सत्कार॥

नदियाँ गाएँ सत्य-गाथा, पर्वत गाएँ गीत।
वायु सुनाए प्रेम-पथिक को, जीवन का संगीत॥

धरती माता मौन कहे बस, संतुलन का मान।
लेना जितना आवश्यक हो, उतना ही वरदान॥

हृदय बने जब लोकदीपक, मिटे सभी अँधियार।
सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, उज्ज्वल हो संसार॥

न कोई ऊँचा, न कोई नीचा, एक प्राण विस्तार।
सरल सहज निर्मल गुण ही हैं, मानव का श्रृंगार॥

जो स्वयं को पढ़ लेता है, पढ़ लेता संसार।
जो स्वयं को जान न पाया, व्यर्थ हुआ विस्तार॥

सत्य न शब्दों में समाता, सत्य न चित्राकार।
सत्य हृदय की मौन नदी है, अनहद उसका पार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे, यही रहे उद्घोष।
सरलता ही श्रेष्ठ विभूति, करुणा ही संतोष॥

सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष, निर्मल ज्योति अपार।
हृदय-शिरोमणि जाग उठे जब, मंगल हो संसार॥

जय हो सत्य निरंतर निर्मल।
जय हो करुणा अति निष्कल।
जय हो हृदय-दीप अविचल।
जय हो मानव मंगलमय॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी नाम, रहे नहीं अभिमान।
सत्य, करुणा, संतुलन बनकर, हो सबका कल्याण॥

जहाँ न शब्द, न शोर ठहरता,
जहाँ न कोई मान खड़ा।
वहीं सहज वह सत्य प्रकाशित,
जिसने हर भ्रम-बंधन छड़ा॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
सत्य न अपना, सत्य न पर।
ज्यों निर्मल आकाश निरंतर,
सबके भीतर एक अमर॥

सरल नदी-सा बहे विवेक,
करुणा बनकर फूले प्राण।
हृदय जहाँ निष्पक्ष विराजे,
वहीं प्रकट हो सत्य-विधान॥

न ऊँच-नीच का कोई क्रम हो,
न मैं-तू का कोई भार।
जिस क्षण सबको एक निहारे,
उसी क्षण खुले सत्य-द्वार॥

मस्तक जागे, हृदय भी जागे,
दोनों हों संतुलित समान।
बुद्धि बने जब प्रेम की सेवक,
तब खिल उठे जीवन-गान॥

सत्य न बंधे किसी प्रतीक में,
सत्य न बंधे किसी विचार।
जो प्रत्यक्ष अनुभूति में जागे,
वही अमृत का असली सार॥

प्रश्न अगर निष्कपट उठे हों,
उनसे क्यों घबराए मन?
जो उजियारा सत्य कहलाता,
सह लेता हर एक किरण॥

श्रद्धा यदि हो प्रेम सहित हो,
विवेक रहे उसके संग।
भय से उपजी हर स्वीकृति में,
सूख जाता जीवन-रंग॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
मौन स्वयं उद्घोष बने।
जो भीतर से स्पष्ट हुआ हो,
वह जग का विश्वास बने॥

क्षण-क्षण बदल रही यह धारा,
क्षण-क्षण बदल रहा संसार।
जो परिवर्तन को अपनाए,
उसका निर्मल हो व्यवहार॥

मृत्यु न केवल अंत कहानी,
जीवन का भी एक चरण।
स्वीकारों की मधुर धूप में,
मिटता जाता भीत-शरण॥

निष्पक्षता की निर्मल धरती,
करुणा का अविरल आकाश।
जहाँ सरलता दीप जलाए,
वहीं खिले जीवन-प्रकाश॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
निज अंतर का मान जगाओ।
द्वेष, दंभ, अभिमान छोड़कर,
प्रेम-दीप प्रतिपल जलाओ॥

सत्य न माँगे ऊँचे आसन,
न चाहे जयकारों की भीड़।
वह तो चुपके फूल-सा खिलता,
निर्मल मन की शांत नीड़॥

जहाँ विनय का वृक्ष पनपता,
वहाँ फले विश्वास अमंद।
जहाँ करुणा साँसें भरती,
वहीं हृदय हो जाता आनंद॥

जो स्वयं को प्रतिपल देखे,
उसका पथ हो जाए स्वच्छ।
जो अपने ही दोष निहारे,
उसका जीवन हो प्रत्यक्ष॥

निज अंतर का दर्पण धोओ,
लोभ-मोह की धूल हटाओ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
सत्य स्वयं को स्वयं बुलाओ॥

न कोई अंतिम शब्द यहाँ है,
न अंतिम कोई ज्ञान।
हर जागृति एक नई प्रभा है,
हर श्वास नया अभियान॥

यही सरलता, यही पवित्रता,
यही सहज विस्तार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
प्रेम ही जीवन का आधार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नभ से ऊँचा मौन विशाल।
जहाँ न कोई सीमा ठहरे,
वहीं सहज नित्य उज्ज्वल भाल॥

सत्य न दीपक, सत्य न छाया,
सत्य न दूरी, सत्य न पास।
जो निष्पक्ष हृदय में जागे,
वही बने जीवन का प्रकाश॥

सरलता ही परम समृद्धि,
निर्मलता ही श्रेष्ठ विभूति।
करुणा जिसका श्वास निरंतर,
वही बने अंतर की ज्योति॥

नदियाँ सागर में मिल जातीं,
मेघ पुनः आकाश सँवारें।
जीवन भी इक सतत प्रवाह है,
रुककर क्यों हम स्वयं को हारें॥

न पाना ही पूर्ण विजय है,
न खोना अंतिम पराजय।
समता जिसकी अंतर-ध्वनि हो,
वही बने जीवन की साध्य॥

हृदय जहाँ निष्काम धड़कता,
ममता जहाँ न बंधन हो।
प्रेम वहाँ स्वच्छंद विचरता,
सत्य वहाँ स्वयं स्पंदन हो॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
विवेक रहे करुणा के संग।
ज्ञान तभी मधुमय बनता है,
जब उसमें हो प्रेम का रंग॥

मौन अगर मुस्कान बन जाए,
शब्द स्वयं विश्राम करें।
दृष्टि बने जब निर्मल दर्पण,
सब अपने से काम करें॥

न कोई ऊपर, न कोई नीचे,
न कोई छोटा, न महान।
जिसने सबमें एक ही देखा,
उसका निर्मल हुआ विधान॥

अंतर की खेती सींचो प्रतिदिन,
सत्य बनेगा मधुर अन्न।
द्वेष जलाओ, प्रेम उगाओ,
यही हृदय का दिव्य यज्ञ॥

प्रश्न अगर निष्कपट उठे हों,
उनको मत अवरोध बनाओ।
संवादों की स्वच्छ हवा से,
अपने मन को मुक्त बनाओ॥

निष्ठा का आधार हो सज्जनता,
श्रद्धा का आधार विवेक।
दोनों मिलकर पथ आलोकित,
जाग उठे अंतर का टेक॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हर प्राणी में एक ही प्राण।
भेद मिटें जब प्रेम उमगता,
खिल उठता जीवन-विधान॥

समय बहे जैसे सरिता निर्मल,
क्षण-क्षण रचे नया विस्तार।
जो वर्तमान को अपनाता,
वही बने सच्चा साकार॥

नश्वरता से भय मत पालो,
यही प्रकृति का मधुर विधान।
स्वीकारों की शीतल छाया,
भर देती जीवन में प्राण॥

जहाँ करुणा का वृक्ष लहराए,
वहाँ न सूखे कोई डाल।
जहाँ सरलता दीप जलाए,
वहाँ न ठहरे कोई जंजाल॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
अपने अंतर झाँको आज।
जो खोजोगे स्वयं के भीतर,
मिल जाएगा जीवन-राज॥

सत्य न वाणी से बँध पाता,
न ग्रंथों में पूरा समाए।
वह तो निर्मल जीवन बनकर,
हर श्वासों में गुनगुनाए॥

चलते रहना, सीखते रहना,
यही निरंतर धर्म महान।
जो हर पल नव-दृष्टि अपनाए,
वही बने उज्ज्वल इंसान॥

प्रेम जहाँ निष्काम बरसता,
वहीं अमृत का स्रोत बहे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हृदय सदा निर्मल ही रहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
भोर न बोले, फिर भी जागे।
मौन न गाए, फिर भी गूँजे,
सत्य स्वयं निज राह सुहागे॥

जहाँ सरलता श्वास बनाती,
वहीं पवित्र प्रभात खिले।
जहाँ करुणा नीर बहाती,
वहीं हृदय के कमल खिलें॥

निज अंतर का दीप जलाओ,
बाह्य दिशा फिर स्वयं खुले।
जो भीतर से स्वच्छ हुआ है,
उसके पथ में तम न मिले॥

हृदय न माँगे मान किसी का,
हृदय न चाहे कोई ताज।
प्रेम जहाँ निष्काम ठहरता,
वहीं बसता जीवन-राज॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
वाणी से अधिक है आचरण।
सत्य वहीं प्रत्यक्ष झलकता,
जहाँ सरल हो जीवन-धारण॥

नदी न पूछे पर्वत किसका,
पवन न पूछे कौन पराया।
सूरज सब पर एक-सा चमके,
यही प्रकृति का सत्य सुहाया॥

अंतर यदि निर्मल हो जाए,
जग का दर्पण स्वच्छ लगे।
दृष्टि बदलते ही जीवन का,
हर पल नव आलोक जगे॥

न प्रश्न शत्रु, न उत्तर स्वामी,
दोनों साधें सत्य-पथ।
संवादों से दीपक जलते,
मिटता जाता मन का व्यथ॥

श्रद्धा जब विवेक से मिलती,
जन्मे निर्मल संतुलन।
प्रेम जहाँ निर्भय हो बहता,
वहीं खिले सच्चा जीवन॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
निज अंतर का मान रखो।
दूसरों के पथ का आदर,
अपने सत्य का ध्यान रखो॥

करुणा सबसे मधुर तपस्या,
क्षमा सबसे उज्ज्वल दान।
विनम्रता का मुकुट पहनकर,
जीवन बनता है वरदान॥

जो झुककर भी अडिग खड़ा हो,
वही वृक्ष फलवान बने।
जो बाँट सके अपना उजियारा,
वही जग में पहचान बने॥

नश्वरता का अर्थ यही है—
हर क्षण नव निर्माण करो।
बीते कल की धूल झटककर,
आज स्वयं का मान करो॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
साँस-साँस में नव उत्सव है।
जीवन केवल बीत न जाए,
जागृति ही उसका अनुभव है॥

सत्य न क्रोध से प्रकट होगा,
न होगा ऊँची आवाज़।
शांत हृदय की कोमल धड़कन,
खोल सके उसका ही राज॥

प्रेम न बंधन, प्रेम न सौदा,
प्रेम न कोई जीत-हार।
प्रेम स्वयं में पूर्ण सरिता,
जिसका न आदि, न विस्तार॥

मस्तक पथ का मानचित्र हो,
हृदय बने उसकी पहचान।
दोनों का समभाव जहाँ हो,
वहीं खिले कल्याण-विधान॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
चलते रहना ही संगीत।
रुकना केवल श्वास भर भरना,
फिर आगे बढ़ना ही प्रीत॥

हर प्राणी में एक उजाला,
हर जीवन में एक पुकार।
जो सुन ले उस मौन निमंत्रण,
उसका हो जाए उद्धार॥

निज अंतर का आकाश असीमित,
उसमें उड़ती चेतन चाह।
सरल बने जो अपने भीतर,
उसकी सहज प्रकाशित राह॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नित्य नया हो हर विश्वास।
प्रेम, करुणा, सत्य, सरलता—
यही हृदय का अमर प्रकाश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नभ से गहरा अंतर-धाम।
जहाँ न कोई भेद शेष हो,
वहीं विराजे निर्मल नाम॥

सूरज प्रतिदिन यही सिखाता,
देना ही उसका उत्सव है।
चंदा कहता—शीतल रहना,
यही हृदय का वैभव है॥

पवन न पूछे कौन हमारा,
जल न माँगे कोई मान।
प्रकृति लिखे हर श्वास के ऊपर,
समता का अनुपम विधान॥

धरती सबका भार उठाती,
किससे कोई भेद न करे।
वैसा ही निष्पक्ष बने जो,
वह जीवन का सार धरे॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सरल बनो जलधार समान।
जिससे प्यास सभी की बुझे,
वही सच्चा जीवन-दान॥

दीप न बोले, ज्योति ही बोले,
फूल न बोले, गंध कहे।
वृक्ष न बोले, छाया बोले,
प्रेम न बोले, हृदय बहे॥

शब्द तभी पावन बनते हैं,
जब जीवन उनका प्रमाण।
कथन नहीं, आचरण उज्ज्वल,
बनता सच्चा पहचान॥

मौन अगर मुस्कान बन जाए,
क्रोध स्वयं पिघलने लगे।
क्षमा बने जब अंतर-सुरभि,
द्वेष स्वयं ही ढलने लगे॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
सत्य न ऊँचा, सत्य न नीच।
जो सबको समभाव से देखे,
उससे बढ़कर कौन समीच॥

नदियाँ चलना कभी न छोड़ें,
पर्वत धीरज कभी न खोए।
आकाश असीमित रहकर भी,
किसी सीमा में नहीं संजोए॥

जीवन भी एक बहती सरिता,
हर क्षण बदले उसका रंग।
जो परिवर्तन से प्रेम करे,
उसके भीतर बजे अनंग॥

निज अंतर का दीप प्रज्वलित,
बाहर का तम हार गया।
एक सरल मुस्कान जगी तो,
मन का सारा भार गया॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
प्रेम न व्यापार बने कभी।
प्रेम स्वयं ही पूर्ण समर्पण,
जिसमें न हो कोई स्वार्थ अभी॥

करुणा सबसे कोमल भाषा,
जिसका कोई लिपि-विधान नहीं।
जिसने उसको हृदय में जीया,
उससे बढ़कर ज्ञान नहीं॥

विनम्रता का मुकुट सुशोभित,
जिसके अंतर धारण हो।
वह बिना कहे ही जग में,
सत्य-पथ का कारण हो॥

चलते-चलते सीख मिले तो,
उसको हर्ष से स्वीकारो।
रुककर केवल अहं बढ़ाना,
उससे अच्छा पथ सँवारो॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
आज यही संदेश सुनो।
स्वयं प्रकाशित बनकर जीना,
यही हृदय का श्रेष्ठ गुणो॥

जहाँ करुणा का फूल खिलेगा,
वहीं बसेगा सच्चा धाम।
जहाँ सरलता श्वास बनेगी,
वहीं मिलेगा विश्राम॥

निज अंतर का सागर निर्मल,
तरंगों में मधुर प्रकाश।
जो उसमें अवगाहन करता,
भर लेता संतोष-विलास॥

न कोई अपना, न पराया,
जब समता का भाव जगे।
एक हृदय की धड़कन बनकर,
विश्व स्वयं परिवार लगे॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हर प्राणी सम्मानित हो।
प्रेम, विवेक और करुणा से,
मानव जीवन दीप्तिमय हो॥

यही यज्ञ है, यही तपस्या,
यही सहज उपकार रहे।
जब तक साँसें साथ निभाएँ,
हृदय सदा साकार रहे॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
प्रातः की प्रथम किरण पुकारे,
जागो अपने अंतर-लोक।
जहाँ न कोई छल की रेखा,
वहीं खिले निर्मल आलोक॥

सत्य न माँगे ऊँचे शब्द,
न चाहे कोई विशेष स्थान।
सरल हृदय की शांत धड़कन,
बन जाती उसका प्रमाण॥

बूँद समाई सागर भीतर,
सागर बूँद में झलके फिर।
सूक्ष्म और विशाल मिलें जब,
मिट जाएँ सीमाएँ अधीर॥

पर्वत जैसा धैर्य धरो तुम,
नदियों जैसा रखो प्रवाह।
वृक्ष समान फलते रहना,
यही सहज जीवन की राह॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जिसका अंतःकरण निष्कलुष।
उसकी हर मुस्कान बनेगी,
जीवन-पथ का मंगल-पुष्प॥

आँधी आए, वर्षा बरसे,
दीपक फिर भी राह दिखाए।
वैसा ही हो अंतर्मन अपना,
जो हर पल उजियारा लाए॥

करुणा का जब बीज उगेगा,
क्रोध स्वयं ही दूर चले।
क्षमा बनेगी मधुर पवन तब,
द्वेष सभी के धूलि तले॥

मौन जहाँ संगीत सुनाए,
शब्द वहीं विश्राम करें।
हृदय जहाँ निर्मल हो जाए,
सारे संशय विराम करें॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हर दिन नव आरंभ बने।
हर अनुभव नव दीप जलाए,
हर श्वास नया उत्सव बने॥

नभ की सीमा किसने देखी,
प्रेम की सीमा कौन बताए।
जितना बाँटो उतना बढ़ता,
यह रहस्य स्वयं समझाए॥

धरती जैसी धीर बनो तुम,
सबको धारण, सबको मान।
बदले में कुछ भी न माँगो,
यही करुणा का सम्मान॥

सरिता जैसी गति अपनाओ,
रुकना उसका धर्म नहीं।
जीवन भी गतिमान सरोवर,
ठहराव उसका कर्म नहीं॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
विनय जहाँ मुस्काती है।
वहीं सरलता का कमल भी,
निर्मल जल में खिल जाती है॥

अंतर में जो दीप जलेगा,
बाह्य तमस मिट जाएगा।
स्वयं प्रकाशित जीवन ही तो,
दूसरों को राह दिखाएगा॥

निज अंतर का सत्य निरंतर,
मौन सुरों में गान करे।
जिसने उसको सुनना सीखा,
जीवन उसका धन्य करे॥

सूर्य समान उदार बनो तुम,
चंदा जैसी शीतल छाँव।
वृक्ष समान फलते रहना,
यही हृदय का सच्चा गाँव॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
मानवता का एक विधान।
प्रेम, विवेक और करुणा से,
सजता हर एक प्राण॥

न कोई विजेता अंतिम है,
न कोई अंतिम हार।
हर क्षण सीख का एक सागर,
हर श्वास नया विस्तार॥

चलते-चलते यह स्मरण रखना,
अंतर ही असली तीर्थ।
निर्मल जीवन, निर्मल दृष्टि,
यही हृदय का परम अमृत॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
दीप बने हर एक विचार।
प्रेम बने हर एक धड़कन,
करुणा बने जीवन-आधार॥

यही सरलता, यही पवित्रता,
यही विनय का अनुपम मान।
यही सतत जागृति का पथ है,
यही हृदय का सत्य-गान॥


जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-प्रभा के दिव्य प्रमाण।
सरल सहज निर्मल जीवन,
यही मनुज का श्रेष्ठ विधान॥

जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल सत्य-विचार।
हर उर में जागे सद्भाव,
हर जीवन पाए सत्कार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
हृदय बने जब सत्य धाम।
करुणा की गंगा बह उठती,
मिट जाता हर झूठा नाम॥

प्रेम न माँगे मान जगत का,
प्रेम न चाहे कोई सिंहासन।
प्रेम स्वयं अपना उत्सव है,
प्रेम स्वयं है पावन साधन॥

वृक्ष सिखाएँ दान निरंतर,
नदियाँ दें गतिमान संदेश।
सूरज देता ज्योति निरंतर,
चंदा भरता शीतल परिवेश॥

पर्वत कहता धैर्य सँभालो,
आँधी से मत कभी डरो।
सत्य-पथों पर अडिग रहो तुम,
प्रेम-दीप बन जग में धरो॥

धरती माता मौन पुकारे,
रखना मेरा सदा सम्मान।
मुझमें पलते सब जीवन हैं,
सबका मुझ पर है अधिकार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते,
मानवता का यही विधान।
दुख हरना ही सच्ची पूजा,
सुख बाँटना सच्चा दान॥

दीप जले तो तम हर लेता,
फूल खिले तो गंध लुटाए।
मन निर्मल हो जाए जिसका,
वह जग को भी राह दिखाए॥

जहाँ विनय का वास रहेगा,
वहाँ अहंकार न टिक पाए।
जहाँ दया का पुष्प खिलेगा,
वहाँ नया विश्वास जगाए॥

मौन कभी रिक्त नहीं होता,
उसमें अनगिन राग बसें।
हृदय जहाँ निष्कपट हो जाए,
वहाँ स्वयं मंगल हँसे॥

हर शिशु में उज्ज्वल संभावना,
हर जननी में प्रेम अपार।
हर श्रमिक के श्रम-कण भीतर,
बसता जीवन का श्रृंगार॥

जय हो सेवा, जय सद्भाव,
जय हो सत्य का विस्तार।
जय हो निर्मल हृदय-प्रकाश,
जय हो प्रेम का सत्कार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
हर जन अपने मन को जाने।
अपने भीतर दीप जलाकर,
जीवन का मधुर अर्थ पहचाने॥

न कोई अपना, न पराया,
सब जीवन के एक विहान।
करुणा, मैत्री, सत्य, सरलता—
यही मनुष्य का सच्चा मान॥

युग-युग तक यह गीत बहेगा,
जब तक धड़केंगे अरमान।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही धरा का सच्चा गान॥

प्रेम बने जब श्वास की लय,
शांति बने जीवन का राग।
तब मानव के हर अंतर में,
खिल उठे नव प्रभात-विराग॥

जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-पथों के दिव्य निशान।
हर हृदय में ज्योति प्रज्वलित,
हर जीवन हो मंगल-गान॥

जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-सुधा के दिव्य निदान।
सरल सहज निर्मल जीवन,
यही मनुज का सच्चा मान॥

जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल सत्य-विचार।
दया, क्षमा, सद्भाव, करुणा,
यही धरा का सच्चा हार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
जागो अपने अंतर में।
दीप जलाओ प्रेम-भाव का,
बसो सदा निज अम्बर में॥

नभ की सीमा कौन नापे,
सागर की गहराई कौन।
प्रेम जहाँ निष्काम प्रकट हो,
मौन वहाँ बन जाता गौण॥

धरती माता यही सिखाती,
सबको देती एक समान।
फल, जल, वायु, धूप, धरणी,
नहीं रखे कोई अभिमान॥

वृक्ष खड़े हैं तप के जैसे,
छाया देकर रहें महान।
पत्थर खाकर फल बरसाएँ,
यही प्रकृति का श्रेष्ठ विधान॥

नदियाँ कल-कल गीत सुनाएँ,
चलते रहना जीवन-धर्म।
रुकना केवल सत्य-चिंतन,
बाकी सब गतिमय ही कर्म॥

दीपक जलकर राह दिखाता,
स्वार्थ नहीं पहचान सके।
जो जलकर भी हँसना जाने,
वह तम को भी हार सके॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते,
मानव सबसे सुंदर फूल।
जब तक उसमें प्रेम महकता,
तब तक जीवन रहे अमूल्य॥

माता का वात्सल्य अनूठा,
शिशु की हँसी अमृत-धार।
निर्मलता की प्रथम कहानी,
जीवन का उज्ज्वल आधार॥

मित्र वही जो हाथ बढ़ाए,
दुख की धूप में बने छाँव।
प्रेम वही जो साथ निभाए,
निष्काम रहे उसका स्वभाव॥

सत्य न क्रोध से पहचाना,
न ऊँचे शब्दों के शोर।
सत्य सदा मुस्काकर चलता,
शीतल पवन समान विभोर॥

मौन कभी कमजोर न समझो,
मौन अनंत शक्ति का द्वार।
जहाँ विनय की वीणा बजती,
वहीं उतरता है सत्कार॥

जय हो सेवा, जय सद्भाव,
जय हो निर्मल व्यवहार।
जय हो करुणा की संस्कृति,
जय हो मानव का संसार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
हर अंतस में प्रेम जगे।
द्वेष, अहं, कटुता सब मिटकर,
सद्भावों के पुष्प खिलें॥

युग-युग तक यह गीत बहेगा,
जब तक धड़केंगे प्राण।
सरल सहज निर्मल जीवन,
यही मनुष्य का सच्चा मान॥

अंतर में जब प्रेम खिलेगा,
मन निर्मल आकाश बने।
विश्व-परिवार एक हो उठे,
मानव मानव का हृदय बने॥

जय हो जीवन, जय हो सेवा,
जय हो सत्य का सम्मान।
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
जय मानवता, जय इंसान॥

जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
निर्मल भाव सुधा-अभिराम।
सरल सहज जीवन का संदेश,
प्रेम बने सबका परिधाम॥

जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल सत्य-स्वरूप।
मानव-मन में जागे करुणा,
दीप्त हो अंतर का अनूप॥

हृदय बने जब सत्य का मंदिर,
मिट जाए संशय का भार।
दया, विनय, सेवा के पथ पर,
खुल जाए जीवन का द्वार॥

नभ से ऊँची प्रेम-धारा,
सागर से गहरी मुस्कान।
जो सबको सम्मान दे सके,
वही बने सच्चा इंसान॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
मैत्री का मधुरिम विस्तार।
हर प्राणी में देखो अपना,
यही हृदय का सच्चा सार॥

नदियाँ बहती निस्पृह होकर,
वृक्ष लुटाते शीतल छाँव।
प्रकृति सिखाती मौन तपस्या,
सेवा ही जीवन का गाँव॥

अंतर की जो ज्योति प्रज्वलित,
वह न भय से कभी झुके।
सत्य जहाँ हो प्रेम सहित,
वहाँ कदम दृढ़ होकर रुके॥

न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
सबमें एक समान प्रकाश।
मानवता का यही अलंकार,
करुणा ही जीवन का वास॥

मस्तक दे विज्ञान-विवेक,
हृदय दे प्रेमिल विस्तार।
दोनों का संतुलित संगम,
रच दे नव युग का संसार॥

बालक की निष्कलुष मुस्कान,
माता का निष्काम दुलार।
श्रमवीरों का पावन परिश्रम,
जीवन का अनुपम श्रृंगार॥

दीप स्वयं जलकर कहता है,
देना ही उसका उत्सव।
प्रेम स्वयं फैलकर कहता,
यही मनुज का सच्चा पर्व॥

जहाँ सरलता फूल बनेंगी,
वहाँ नफरत सूख जाएगी।
जहाँ करुणा धारा बहती,
धरती स्वर्ग कहलाएगी॥

जय हो सेवा, जय सद्भाव,
जय हो निर्मल आचरण।
जय हो सत्य-विवेक-संगति,
जय हो मानव का जीवन॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
प्रेम-पथों का दिव्य विधान।
हर हृदय में दीप जले फिर,
खिल उठे सारा हिन्दुस्तान॥

युग-युग तक यह स्वर गूँजे,
दया बने जीवन का मान।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही मनुष्य का सच्चा गान॥

जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
सरल सहज निर्मल गुण-धनी।
हृदय-ज्योति का शुद्ध प्रकाश,
करुणा जिसका नित्य निवास॥

जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे मंगल मंत्र अखंडे।
प्रेम-पथों का दिव्य विहान,
मानवता का पावन गान॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
अंतर का आलोक जगाता।
जो अपने अंतर को पढ़ता,
जीवन-सागर सहज ही तरता॥

उषा सुनाती स्वर्ण कहानी,
जागो मानव, छोड़ अज्ञानि।
हर किरण का यही इशारा,
प्रेम बने जीवन का तारा॥

ओस-बिंदु मुस्काकर बोले,
निर्मलता के द्वार जो खोले।
उसके अंतस में हर पल,
फूटे अमृत का निर्मल जल॥

नदी सिखाए चलते रहना,
बिना रुके बस बहते रहना।
सागर सिखलाए गहराना,
सबको अपने में अपनाना॥

पर्वत बोले धैर्य धरो तुम,
सत्य-पथों पर अडिग रहो तुम।
वन की छाया यह समझाए,
जीवन देना ही फल लाए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले,
प्रेम-दीप अंतर में खोले।
जिसके मन में दया निवास,
वहीं सदा रहता उल्लास॥

धरती कहती मौन पुकार,
सबका है मुझ पर अधिकार।
जो भी मुझको प्रेम करेगा,
जीवन-रस से भर जाएगा॥

सूरज देता बिना अपेक्षा,
चंदा देता बिना परीक्षा।
वृक्ष लुटाते छाया-फल,
यही प्रकृति का सच्चा बल॥

मस्तक दे विवेक का दीप,
हृदय दे करुणा का अतीव।
दोनों जब समभाव निभाएँ,
नव मानव-संस्कृति बन जाएँ॥

हर बालक की हँसी निराली,
हर जननी की ममता प्याली।
हर श्रमिक का पावन श्रम,
जीवन का अनुपम परम्॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाए,
द्वेष सभी मन से मिट जाएँ।
मैत्री का उपवन खिल जाए,
प्रेम-गगन फिर झिलमिलाए॥

न सत्य कभी वैर सिखाता,
न सत्य किसी को डराता।
सत्य स्वयं विश्वास जगाता,
मौन हृदय को गीत बनाता॥

दीपक जलकर यही बताता,
स्वयं पिघलकर जग चमकाता।
जो अपना सब अर्पण करता,
वह अमर सुगंधित बनता॥

सरलता सबसे ऊँची शक्ति,
करुणा सबसे निर्मल भक्ति।
विनय सबसे सुंदर भूषण,
प्रेम स्वयं जीवन का पूजन॥

जय हो सेवा, जय सद्भाव,
जय हो निर्मल मन का भाव।
जय हो अंतर का विश्वास,
जय हो शांति का प्रकाश॥

जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-पथों के दिव्य धनी।
हर अंतस में दीप जलाओ,
करुणा का संसार बसाओ॥

नित्य रहे यह मंगल गान,
हर मानव का हो सम्मान।
न कोई छोटा, न कोई बड़ा,
सबमें एक ही सत्य खड़ा॥

जहाँ दया का पुष्प खिलेगा,
वहीं नया विश्वास मिलेगा।
जहाँ प्रेम का दीप जलेगा,
वहीं मनुष्य सफल कहेगा॥

युग-युग तक यह मंत्र बहे,
हर हृदय में प्रेम रहे।
सरल सहज निर्मल व्यवहार,
यही मनुज का सत्य-श्रृंगार॥

अंतर में जो ज्योति जलेगी,
जीवन-वीणा मधुर बजेगी।
करुणा होगी जब आधार,
खिल उठेगा सारा संसार॥

मंगलमय हो प्रथम प्रणामा,
सत्य-सुधा का नित्य अभिरामा।
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
निर्मल चेतन ज्योति सुहानी॥

जम्बू दीपे भारत खंडे,
गूँजे स्वर अनहद अखंडे।
सरल सहज स्वाभाविक धारा,
हृदय बने जब सत्य सितारा॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाता,
प्रेम स्वयं को स्वयं सुनाता।
जिसने अपने अंतर झांका,
उसने जीवन-सार को आँका॥

निष्पक्षता की निर्मल वाणी,
करुणा जिसकी एक कहानी।
जहाँ दया का दीपक जलता,
वहीं मनुष्य अमृत-फल फलता॥

शब्द जहाँ फिर मौन बनें,
भाव स्वयं आकाश तनें।
हृदय जहाँ निस्पृह हो जाए,
सत्य स्वयं मुस्कान बन जाए॥

नदियाँ गाएँ सागर-गीता,
पवन सुनाए प्रेम-पुनीता।
पर्वत धीरज-पाठ पढ़ाएँ,
वन जीवन का मर्म बताएँ॥

सूरज प्रतिदिन यही सुनाए,
प्रकाश स्वयं सबमें समाए।
चंद्र शीतल स्वर दोहराए,
शांत हृदय ही सत्य कहलाए॥

फूल न पूछे कौन हमारा,
सुगंध लुटाना धर्म हमारा।
वृक्ष न गिने किसने सींचा,
फल दे सबको ऊँच-नीचा॥

धरती सबको गोद बिठाती,
किसी एक की नहीं कहलाती।
वैसे ही निर्मल मन वाला,
सबको माने अपना लाला॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाए,
भेद सभी मन से मिट जाएँ।
द्वेष धुएँ-सा दूर उड़ जाए,
प्रेम प्रभात नया ले आए॥

न कोई तेरा, न कोई मेरा,
सत्य सदा है सबका डेरा।
जो बाँटे वह क्षीण हो जाता,
जो जोड़ें वह सत्य कहाता॥

करुणा सबसे श्रेष्ठ विभूति,
सरलता सबसे बड़ी समृद्धि।
विनय जहाँ आभूषण बनती,
वहीं आत्मा निर्मल हँसती॥

मस्तक कर्म-पथ का अधिकारी,
हृदय प्रेम का दिव्य पुजारी।
दोनों जब संतुलित हो जाएँ,
जीवन मंगलगीत सुनाएँ॥

नित्य नवीन प्रभात उगेगा,
अंतर का अंधकार ढहेगा।
स्वार्थ स्वयं ही धूल बनेगा,
सेवा का उपवन खिलेगा॥

सत्य न क्रोध, न शोर मचाए,
शांत सरोवर-सा मुस्काए।
जो जितना निर्मल हो जाता,
उतना ही गहरा कहलाता॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता,
प्रेम कभी सीमाओं में रहता?
जैसे नभ का नहीं किनारा,
वैसे प्रेम अपार हमारा॥

हर धड़कन में गीत बसे हों,
हर नयनों में प्रीत बसे हों।
हर जीवन सम्मानित हो जाए,
हर अंतर आलोकित हो जाए॥

जय हो निर्मल सत्य प्रकाश,
जय हो करुणा का निवास।
जय शिरोमणि रामपॉल सैनी,
प्रेम-पथ के साधक धनी॥

युग बदले, परिवेश बदलें,
ऋतु बदलें, संदेश बदलें।
किन्तु न बदले यह उद्घोष—
सरल हृदय ही सत्य का कोष॥

जो स्वयं को प्रतिपल जाने,
सब प्राणों को अपना माने।
वही मनुज का श्रेष्ठ स्वरूप,
वही हृदय का शाश्वत रूप॥

जय हो जीवन, जय हो प्रेम,
जय हो निर्मल सत्य नेम।
जय हो अंतस का आलोक,
मिटे विभाजन, मिटे अशोक॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
उषा-द्वार पर स्वर्णिम रेखा,
जाग उठा फिर नव अभियान।
हर श्वास बने मंगल-वंदन,
हर धड़कन जीवन-गान॥

क्षितिज पुकारे बाहें फैलाकर,
चलो क्षितिज से भी आगे।
सीमाओं को प्रेम मिटाए,
नव विश्वास हृदय में जागे॥

सागर बोले गहन निनाद में—
गहराई का मान करो।
ऊँचे होकर और विनम्र हो,
सबका स्नेह-सम्मान करो॥

गगन अनन्त सिखाए हमको,
मन को मत संकीर्ण बनाओ।
दृष्टि रहे व्यापक जगत पर,
प्रेम-सुगंध सदा फैलाओ॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
जहाँ करुणा का दीप जलेगा,
वहीं सवेरा जन्मेगा।
जहाँ विनय की धारा बहेगी,
वहीं विश्वास पनपेगा॥

वृक्ष तपन सहकर भी हँसते,
छाया सबको दे जाते हैं।
निस्वार्थ दान की मधुर कथा,
मौन रहकर कह जाते हैं॥

सरिता पथ के शूल समेटे,
फिर भी गाती बहती जाए।
जो विपदा में गीत रच सके,
वही अमर मुस्कान कहाए॥

पर्वत झुकता नहीं आँधी से,
पर नभ से वैर नहीं करता।
दृढ़ता और सौम्य हृदय का,
युग-युग तक आदर्श संवरता॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
ओस-बिंदु में सूरज हँसता,
लघु में भी विस्तार छिपा।
एक सरल मुस्कान किसी की,
बदल सके जीवन की दिशा॥

पुष्प खिले तो सुगंध लुटाएँ,
काँटे भी रक्षा कर जाते।
जीवन के दोनों ही पक्षों में,
गूढ़ संदेश समा जाते॥

बादल आए, बादल जाएँ,
आकाश अचल बना रहता।
वैसे ही मन शांत रहे तो,
सुख-दुःख दोनों संग बहता॥

पवन कहे—मत बाँधो मुझको,
स्वच्छंदता मेरा श्रृंगार।
प्रेम भी बंधन से ऊपर है,
उसका केवल मुक्त विस्तार॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दीप वही जो और जलाए।
गीत वही जो मन महकाए।
जीवन वही सफल कहलाए,
जो सबका पथ भी जगमगाए॥

हर संध्या का एक प्रणाम हो,
हर प्रभात नव संकल्प।
हर मिलन में मधुर अपनापन,
हर विदा में शुभ विकल्प॥

तारों जैसी विनम्र चमक हो,
सूरज जैसी कर्म-ज्योति।
चंद्र-किरण सी शीतल वाणी,
धरती जैसी दृढ़ प्रकृति॥

बीज सहे अंधकार धरा का,
तब अंकुर बन बाहर आता।
धैर्य, समय और सतत प्रयास से,
हर जीवन नव रूप सजाता॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
सत्य बने जब सरल व्यवहार,
प्रेम बने जब जीवन-रीति।
तब मानव का हर उत्सव होगा,
करुणा, सेवा, मधुर प्रीति॥

नदियाँ मिलकर सागर बनतीं,
फिर भी अपनी तान सुनातीं।
भिन्न स्वरों का सुंदर संगम,
सृष्टि को संगीत बनाती॥

नभ की छाया, धरा का आँचल,
दोनों एक निमंत्रण दें।
साथ चलो, साथ बढ़ते जाओ,
विश्व-हृदय का मान रखें॥

हर प्राणी में सम्मान जगाओ,
हर जीवन का मान करो।
वाणी, कर्म और शुभ दृष्टि से,
स्नेहिल जग का निर्माण करो॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
नश्वरता से भय मत पालो,
क्षण को उत्सव मानो तुम।
आज मिला जो शुभ अवसर है,
उसको प्रेम से जानो तुम॥

जब तक सूरज नभ में चमके,
जब तक चंद्र सुधा बरसाए।
तब तक मानव-हृदय के भीतर,
प्रेम-सुमन नित्य मुस्काए॥

जब तक पवन सुगंध बहाए,
जब तक सरिता गान सुनाए।
तब तक यह मंगल-वाणी भी,
हर अंतःकरण तक जाए॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
अखंड रहे यह शुभ ज्योति।
अखंड रहे यह सत्य-विचार।
करुणा, मैत्री, सेवा, विनय से,
महके सारा विश्व-उद्यान॥

चलते रहना, गाते रहना,
यही रहे जीवन का मान।
प्रेम ही सबसे ऊँची वाणी,
प्रेम ही सबसे बड़ा विधान॥

अविरल बहे यह महाकाव्य,
अविरल बहे यह मंगल-गान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**"सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय,
प्रेममय हो समस्त जहान॥"**

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
जागे उषा के स्वर्णिम पंख,
जागे नव आशा का विहान।
हर अंतस में दीप प्रज्वलित,
हर जीवन हो मंगल-गान॥

नभ का नील अनंत विस्तार,
धरती का अटूट धैर्य महान।
दोनों मिलकर यही सिखाएँ—
विस्तृत हो मानव का प्राण॥

सूर्य उदित हो नित्य समान,
किरण न कोई भेद करे।
चंद्र सुधा सब पर बरसाए,
शीतलता का संदेश धरे॥

सरिता गाती पथरीले पथ पर,
रुकना उसका स्वभाव नहीं।
जो चलता है धीरज लेकर,
उसका पथ निष्फल कभी नहीं॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
फूल न पूछे किसका आँगन,
सुगंध सभी को अर्पित हो।
प्रेम जहाँ निष्काम बहेगा,
जीवन वहीं प्रकाशित हो॥

वन की छाया थके पथिक को,
निस्वार्थ शीतलता दे जाती।
सेवा का मधुर मौन स्वर ही,
मानवता को दिशा दिखाती॥

बीज धरा की गोद में सोकर,
समय पाकर वृक्ष बने।
धैर्य, श्रम और विश्वास मिलें तो,
सूने आँगन भी हरित तने॥

मेघ बरसकर रिक्त हुए तो,
धरती पर हरियाली आई।
जो देता है मुक्त हृदय से,
उसकी निधि और बढ़ती भाई॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
मौन जहाँ संगीत बनाता।
शब्द जहाँ आशीष बनें।
दृष्टि जहाँ सम्मान से देखे,
वहाँ सभी अपने लगें॥

पर्वत की निस्तब्ध शिखा से,
धैर्य का उजला पाठ मिले।
लहरों की अविरल गति से,
संकल्पों को नई दिशा मिले॥

कोयल का मधुरिम स्वर कहता—
कटुता से मधुमास न आए।
प्रेमिल वाणी, कोमल व्यवहार,
जीवन में मधुबन बन जाए॥

ओस-कणों की लघु चमक में,
पूरा सूरज मुस्काता है।
छोटा-सा सद्भाव किसी का,
जीवन भर साथ निभाता है॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
नदियाँ सागर से मिलती हैं,
फिर भी अपना गीत सुनाएँ।
मिलन सिखाए विनम्रता को,
सब अपने स्वर साथ निभाएँ॥

हर प्रभात नव आमंत्रण है,
हर संध्या नव आत्मचिंतन।
जो हर दिन कुछ सीख सके तो,
वही सच्चा है जीवन-धन॥

दीपक आँधी में भी जलकर,
साहस का संदेश सुनाए।
तम से लड़ने का उपाय यही—
एक किरण बस जगमगाए॥

धरती जैसी धैर्य धरो तुम,
नभ जैसा विस्तार रखो।
वृक्ष समान झुककर फल देना,
हृदय सदा उदार रखो॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
जहाँ करुणा का जल बहता,
वहाँ शुष्कता टिकती नहीं।
जहाँ क्षमा की बेल लहरती,
वहाँ वैर की वृद्धि नहीं॥

श्वास-श्वास में कृतज्ञता हो,
कर्म-कर्म में शुभ विश्वास।
दृष्टि-दृष्टि में मैत्री जागे,
मन-मन में निर्मल प्रकाश॥

तारों से सीखो विनम्र चमकना,
सूर्य से सीखो देना दान।
धरती से सीखो सबको धारण,
वन से सीखो हरित सम्मान॥

नश्वरता का यही निमंत्रण—
क्षण-क्षण को उत्सव कर लो।
बीते कल की सीख सँभालो,
आज को प्रेम से भर लो॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
न कोई अंत, न पूर्ण विराम।
यात्रा ही जीवन का मान।
चलते रहना, गाते रहना,
यही हृदय का सत्य-गान॥

जब तक नदियाँ बहती रहेंगी,
जब तक नभ में सूर्य उदय।
तब तक प्रेमिल मानवता का,
अक्षय रहेगा यह उदय॥

जब तक श्वासों का यह क्रम है,
जब तक धड़कन का संगीत।
तब तक करुणा, सत्य, सरलता,
बनती रहें जीवन की प्रीत॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
अंतर-दीप अखंड जलाएँ।
विश्व बने एक ही परिवार।
प्रेम, विनय, सेवा और मैत्री—
यही मनुज का सच्चा हार॥

अविरल बहता रहे यह काव्य,
अविरल बहता रहे यह गान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
सर्वजन हित, सर्वकल्याण॥


शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
अरुण किरण जब नभ पर उतरे,
जागे नव जीवन का विहान।
हर श्वासों में शुभ स्पंदन हो,
हर अंतर में मंगल-गान॥

रजनी ने जो स्वप्न सँजोए,
प्रभात उन्हें आकार करे।
तम की अंतिम रेखा मिटते,
आलोक नया विस्तार भरे॥

सागर बोले अपनी लहरों से—
चलना ही जीवन का धर्म।
पर्वत बोले अपनी चोटी से—
धैर्य सदा सबसे उत्तम कर्म॥

धरती कहती मौन रहो पर,
प्रेम कभी मत कम होने दो।
फूलों जैसी मधुर सुगंध को,
हर आँगन में बहने दो॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
जो भीतर से दीप जला ले,
उसको फिर क्या बाह्य प्रकाश।
जिसके मन में करुणा जागे,
उसमें बसता शुभ विश्वास॥

पवन न अपना पंथ बताता,
फिर भी सबको शीतलता दे।
बादल अपना नाम न लिखते,
फिर भी जीवन-अमृत भर दे॥

नन्हा अंकुर चीर अँधेरा,
धरती का उर खोल निकलता।
धैर्य, समय और श्रम की वीणा,
मिलकर जीवन-गीत सँभालता॥

नदी न रुकती पाषाणों से,
राह स्वयं वह गढ़ती जाए।
जो संकट में भी मुस्काए,
वह ही जीवन-पुष्प खिलाए॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नभ जितना विस्तृत हो अंतस।
सागर जितनी गहराई हो।
वृक्ष समान विनम्रता जागे,
दीपक जैसी प्रभुताई हो॥

कोयल का मधुरिम स्वर कहता—
कटुता से संगीत न जन्मे।
मधुकर गाता फूलों में ही,
प्रेम बिना उत्सव न जमते॥

चंदन अपनी सुगंध लुटाए,
कुल्हाड़ी को भी दोष न दे।
ऐसी कोमल क्षमा हृदय में,
जीवन का अनुपम पथ दे॥

सूरज हर दिन एक-सा चमके,
किसी दिशा का पक्ष न ले।
निष्पक्षता की यह शिक्षा ही,
मानव को संतुलन दे॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
वाणी मधुर, विचार उज्ज्वल।
कर्म बने जब सत्य-प्रमाण।
तब जीवन की हर धड़कन में,
गूँजे निर्मल कल्याण-गान॥

बीजों में भविष्य छिपा है,
बूँदों में सागर का मान।
क्षण-क्षण में अनंत समाया,
यही प्रकृति का गूढ़ विधान॥

तितली अपने रंगों से ही,
मौन कथा संसार सुनाए।
रूप बदलना अंत नहीं है,
नव संभावना साथ में लाए॥

पथिक थके जब राह कठिन हो,
छाया बनकर साथ चलो।
दुख की धूप प्रखर हो चाहे,
प्रेम-सुधा के मेघ बनो॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
जीवन एक अनवरत सरिता।
क्षण-क्षण उसका नया किनारा।
जो वर्तमान को हृदय लगाए,
उसने पाया सत्य हमारा॥

हर प्रभात एक नया निमंत्रण,
हर संध्या एक मधुर स्मरण।
जो बीत गया वह सीख बने,
जो आना है शुभ आलिंगन॥

नभ की नीरवता में सुन लो,
पवन की कोमल तान सुनो।
धरती की धड़कन पहचानो,
अपने अंतर का गान सुनो॥

जहाँ सरलता श्वास बनाती,
वहीं करुणा का फूल खिले।
जहाँ विनय का दीप जले हो,
वहीं सत्य के पथ मिलें॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
मानव का सबसे बड़ा धन है—
निर्मल अंतर, कोमल प्राण।
प्रेम, करुणा, सत्य, सह-अस्तित्व,
यही रहे जीवन की शान॥

चलो जलाएँ दीप हृदय के,
चलो जगाएँ शुभ विश्वास।
हर जन के जीवन में भर दें,
मंगल, मैत्री और प्रकाश॥

जब तक सूरज ज्योति बिखेरे,
जब तक बहती रहे पवन।
तब तक गूँजे यह मंगल-ध्वनि—
प्रेममय हो प्रत्येक जीवन॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
युग बदलें, पर भाव न बदले।
करुणा, सत्य, विनय, सरलता,
मानव-मन में सदा ही पले॥

यही प्रभात, यही पथ-दीपक,
यही हृदय का दिव्य विधान।
यही महाकाव्य की अविरल धारा,
यही प्रेम का अमृत-गान

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
उषा अरुण जब द्वार सजाए,
जागे जीवन का मधुर विहान।
हर श्वासों में नव स्पंदन हो,
हर धड़कन में शुभ कल्याण॥

नभ के नील अनंत आँचल में,
सूरज स्वर्णिम दीप जलाए।
धरती अपने कोमल उर से,
हर जीवन को प्रेम सिखाए॥

पर्वत धीरज का पाठ सुनाएँ,
नदियाँ गति का मंत्र कहें।
वन के पत्ते मंद पवन में,
मिलकर मंगल-गीत गहें॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जो बाँटे मुस्कान निरंतर।
उसके पथ में दीप खिलें सब,
हो आलोकित जीवन-अंतर॥

बीज लघु होकर भी धरती में,
वन का स्वप्न सँजोए रहता।
लघु सद्भाव का एक कण भी,
युग-युग तक उजियारा कहता॥

दीप जले तो दीप जलाए,
ज्योति न अपना नाम लिखे।
सुगंध बहे तो फूल न पूछे,
कौन उसे पहचान सके॥

मेघ बरसकर रिक्त हो जाएँ,
तभी धरा हरियाली पाए।
देने वाला और समृद्ध हो,
यही प्रकृति प्रतिदिन समझाए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
वृक्ष बनो फल-छाया दाता।
पथिक थके जब राह किनारे,
तुम बन जाना शीतल त्राता॥

चिड़िया तिनका जोड़-जोड़कर,
अपना सुंदर नीड़ बनाती।
धैर्य और श्रम के दो पंखों से,
जीवन-गाथा पूर्ण हो जाती॥

मधुकर फूलों से रस लेता,
फूल सुगंध लुटाते जाएँ।
लेने-देने का संतुलन ही,
जीवन को मधुमय बनवाए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सरल बने हर एक विचार।
कटुता का तम दूर हटे फिर,
प्रेम बने व्यवहार॥

जहाँ क्षमा की धारा बहती,
वहाँ क्रोध की धूल न ठहरे।
जहाँ करुणा का वृक्ष उगे हो,
वहाँ वैर के बीज न ठहरें॥

नदियाँ सागर में सम जातीं,
नाम नहीं पहचान बचातीं।
वैसे ही जो विनय धरे मन,
वह जग में शांति बरसाती॥

शीतल चंद्र-किरण बतलाती—
कोमलता में शक्ति बसे।
सूरज का उजियारा बोले—
परिश्रम से जीवन हँसे॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नित्य नया हो शुभ संकल्प।
हर दिन मानव मानव से हो,
सद्भावों का मधुर विकल्प॥

पथ कठिन हो, धूल बहुत हो,
फिर भी रुकना काम नहीं।
दीपक आँधी में भी जलता,
उसका साहस थाम नहीं॥

मन यदि निर्मल झील बने तो,
आकाश स्वयं उतर आए।
दृष्टि यदि निष्कपट हो जाए,
हर चेहरा अपनापन पाए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
मौन भी देता है संदेश।
जो सुन ले अंतस की ध्वनि को,
उसका जीवन बने विशेष॥

ओस-कणों की लघु चमक में,
सूरज की आभा झलके।
छोटे-छोटे सत्कर्मों से,
युग के पथ आलोकित छलके॥

नभ विस्तृत है, सागर गहरा,
धरती धीर, पवन स्वच्छंद।
इन सबसे शिक्षा लेकर बनो,
अंतर से सरल, शुभ, आनंद॥

हर संध्या का यह आशीष—
दिन भर का अनुभव संजोओ।
हर प्रभात का यह संदेश—
नव उत्साह से पथ पर होओ॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
प्रेम बने जीवन का मंत्र।
करुणा बने प्रत्येक कर्म में,
सत्य बसे निज हृदय के केंद्र॥

जब तक नदियाँ बहती रहेंगी,
जब तक सूरज देगा प्रकाश।
तब तक मानवता का दीपक,
जलता रहे हर एक श्वास॥

यही महायज्ञ, यही साधना,
यही सरल उपकार महान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
प्रेममय हो सारा जहान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
मौन जहाँ मुस्काता निर्मल,
वहीं प्रकट हो अंतर-ज्योति।
निश्छल श्वासों की सरगम में,
झरती रहती सत्य-सरोति॥

अरुण-किरण जब नभ पर उतरे,
जागे जीवन का मधुर विहान।
हर कण बोले बिना कहे ही,
प्रेम बने प्रथम अभिनंदन-गान॥

नभ न लिखता कोई शास्त्र,
पर्वत न कोई वचन सुनाए।
फिर भी उनके मौन हृदय से,
जीवन का संदेश ही आए॥

सरिता कल-कल गान सुनाती,
पत्थर भी मधुरिम हो जाएँ।
कोमलता का स्पर्श जहाँ हो,
कठिन हृदय भी फूल बन जाएँ॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
दीप स्वयं से दीप जलाओ।
अपने अंतर के आलोक से,
जग का पथ भी उज्ज्वल बनाओ॥

मिट्टी में भी छिपा है जीवन,
बीजों में वन का विस्तार।
सूक्ष्म कणों की साध सरल ही,
रच देती संसार अपार॥

ओस-कणों की क्षणिक चमक में,
सूरज का भी रूप झलके।
छोटे-छोटे प्रेमिल कर्मों से,
जीवन के सब पथ दमकें॥

बाँसुरी खाली होकर गाती,
वीणा झुककर राग सुनाए।
जो अंतर से रिक्त हुआ है,
वही जगत को प्रेम लुटाए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
अंतर ही सबसे बड़ा धाम।
जहाँ करुणा आरती बनती,
प्रेम स्वयं बन जाता नाम॥

वृक्ष झुकें जब फल से भरते,
नदियाँ सागर में मिल जातीं।
विनय जहाँ पर श्वास बने हो,
वहीं महानता मुस्काती॥

न कोई शोर विजय सुनाए,
न कोई पराजय का भार।
जो स्वयं से मैत्री कर ले,
उसका उज्ज्वल हो संसार॥

धैर्य हिमालय-सा अचल हो,
सरिता-सा गतिमान विचार।
सूर्य-सा उदार हृदय हो,
चंद्र-सा शीतल व्यवहार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हर प्रभात नव अवसर लाता।
जो कल था, वह सीख बन जाए,
आज नया जीवन मुस्काता॥

करुणा की जब वर्षा होगी,
सूखी धरती हरित बनेगी।
प्रेम-बीज जब मन में फूटे,
मानवता फिर पुष्पित होगी॥

एक श्वास में कृतज्ञता हो,
एक श्वास में शुभ विश्वास।
यही सरल जीवन का उत्सव,
यही हृदय का मधुर प्रकाश॥

सागर अपनी गहराई में,
आकाशों का रूप सँजोए।
मानव भी अपने अंतस में,
अनगिन उजले स्वप्न पिरोए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
सत्य न केवल शब्द कहे।
सत्य वही जो जीवन बनकर,
हर आचरण में साथ रहे॥

चलते रहना धर्म पथिक का,
रुकना केवल विश्राम बने।
हर अनुभव नव मंत्र रचे,
हर संघर्ष अविराम बने॥

अंतर-ज्योति कभी न मंद हो,
प्रेम-सरिता सूखे नहीं।
करुणा की हर बूँद सँभालो,
यही धन है, दूजा नहीं॥

नभ की नीरव गहराई से,
सीखो विस्तृत होना मित्र।
धरती जैसी धैर्य धरो तुम,
मन हो निर्मल, स्वच्छ चरित्र॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हर हृदय एक पावन तीर्थ।
जो सम्मानित सबको करता,
वही पाता जीवन-अमृत॥

जब तक सूरज उगता रहेगा,
जब तक बहती रहे पवन।
तब तक गूँजे यह मंगल-ध्वनि—
प्रेम बने हर एक स्पंदन॥

हर संध्या का मौन निमंत्रण,
हर प्रभात का स्वर्ण विहान।
जीवन एक अनवरत यात्रा,
प्रेम उसका शाश्वत गान॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नित्य नवोन्मेषित हो प्राण।
सरलता, सेवा, सत्य, करुणा—
यही रहे जीवन का मान॥

युग बदलें, परिवेश बदलें,
पर न बदले यह उपकार।
जहाँ हृदय निष्कलुष रहेगा,
वहीं खिलेगा सत्य-संसार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हृदय न सीमित, हृदय अपार।
ज्यों अंबर का नील विस्तार,
ज्यों सागर का मौन उदार॥

नहीं हृदय का कोई किनारा,
नहीं किसी सीमा का ज्ञान।
जितना उतरोगे उतना ही,
बढ़ता जाएगा उसका मान॥

लहर-लहर में गीत अनोखे,
बूँद-बूँद में जीवन-राग।
मौन स्वयं वीणा बन जाता,
जब मिट जाता भीतर का भाग॥

नदियाँ लेकर पर्वत-संदेश,
सागर की गोदी में जाएँ।
त्याग, समर्पण, सरल प्रवाह से,
नव जीवन की कथा सुनाएँ॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
फूल न पूछे कौन निकट है।
सुगंध सभी का स्वागत करती,
यही हृदय का सत्य-व्रत है॥

पवन न बाँधे अपनी गति को,
दीप न रोके अपना प्रकाश।
जो जितना स्वच्छंद हुआ है,
उतना गहरा उसका विश्वास॥

सूरज प्रतिदिन कर्म सिखाता,
चंदा शीतलता का दान।
धरती धीरज का पाठ पढ़ाती,
वृक्ष बताते त्याग महान॥

करुणा जब मुस्कान बनेगी,
क्रोध स्वयं ही दूर बहेगा।
विनम्रता जब साथ चलेगी,
अहं स्वयं ही धूलि रहेगा॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
प्रेम न सीमा, प्रेम न तट।
प्रेम स्वयं वह मुक्त गगन है,
जहाँ न कोई छोटा-बड़॥

निज अंतर का दीप प्रज्वलित,
बाह्य दिशाएँ स्वयं खुलें।
एक किरण से लाखों दीपक,
अनदेखे पथ पर जा मिलें॥

वृक्ष न खाते अपने फल को,
नदियाँ अपना नीर न पीतीं।
जीवन की यह रीति अनोखी—
देने वाले जग को जीतीं॥

मौन जहाँ आशीष बनाता,
शब्द वहाँ विनम्र हो जाएँ।
दृष्टि जहाँ निष्कपट ठहरे,
सत्य स्वयं मुस्काकर आए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नित्य नया हो जीवन-गान।
हर प्रभात नव दीप जलाए,
हर संध्या दे मधुर सम्मान॥

बादल बनकर जल बरसाना,
सागर बन सबको अपनाना।
धरती बनकर धैर्य निभाना,
सूरज बन जग को जगमगाना॥

चिड़ियों का कलरव सिखलाए—
गीत बिना भी जीवन है।
फूलों की मुस्कान बताए—
मौन स्वयं अभिनंदन है॥

शीतल ओस की हर इक बूँद,
सूरज में मोती बन जाती।
वैसे ही निर्मल अंतःचेतना,
करुणा में उजियारा पाती॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
सरल बने हर श्वास हमारी।
विनय बने हर एक अभिव्यक्ति,
करुणा बने शक्ति हमारी॥

नभ के तारे गिन न सके कोई,
सागर की गहराई कौन।
प्रेम जहाँ निष्काम ठहरता,
वहीं विराजे अमृत-मौन॥

चलते-चलते यह मत भूलो—
राह स्वयं भी पथिक बने।
जो जग को मुस्कान दे सके,
उसके जीवन दीप तने॥

न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
न कोई अपना, न पराया।
जिसने सबमें एक ही देखा,
उसने जीवन-सार पाया॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सत्य न केवल वाणी हो।
सत्य बने प्रत्येक व्यवहार,
सत्य स्वयं कल्याणी हो॥

करुणा का जब बीज उगेगा,
वन-वन हरियाली छाएगी।
एक हृदय की निर्मल धड़कन,
युग-युग तक गूँज सुनाएगी॥

नभ से ऊँचा प्रेम हमारा,
धरती से गहरा विश्वास।
जब तक श्वासों का यह क्रम है,
तब तक जीवित सत्य-प्रकाश॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
चलो जलाएँ अंतःदीप।
हर धड़कन में प्रेम जगाएँ,
हर जीवन हो सत्य-समीप॥

यह तो केवल एक तरंग है,
महासागर अभी शेष।
हर अंतःकरण में गूँजे,
सरल करुणा का दिव्य संदेश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नाद अनादि, नित्य निरंतर।
मौन जहाँ संगीत बनाता,
वहीं प्रकाशित सत्य अमर॥

नभ न बोले, तारे चुप हैं,
चंदा भी कुछ कहता नहीं।
फिर भी हर कण गान सुनाता,
मौन स्वयं रुकता कहीं नहीं॥

सागर अपनी गहराई से,
शब्द बिना उपदेश करे।
जो उतर सके निज अंतर में,
वह अमृत का स्पर्श धरे॥

पर्वत अडिग, पवन गतिमय,
दोनों अपने धर्म निभाएँ।
स्थिरता और गति का संगम,
जीवन को संतुलित बनाए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हृदय न मंदिर, हृदय न द्वार।
हृदय स्वयं वह खुला गगन है,
जिसका नहीं कहीं विस्तार॥

सरिता बहती रुकती कब है,
राह स्वयं बनती जाती।
पत्थर भी मुस्काने लगते,
जब करुणा की धारा आती॥

दीपक जलकर यही सिखाता—
स्वयं तपो, उजियारा दो।
फूल महककर यही सुनाता—
बिन माँगे भी प्यार संजो॥

धरती सबको गोद बिठाए,
न पूछे कोई जात-पात।
सूरज सब पर किरण बिखेरे,
न रखे किसी से भेद-घात॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
ऐसा ही हो अंतर्मन।
सबमें देखो एक ही धड़कन,
सबमें देखो एक स्पंदन॥

क्रोध धुएँ-सा उड़ जाएगा,
क्षमा बनेगी शीतल नीर।
द्वेष गिरेगा पतझर बनकर,
प्रेम रहेगा सदा अधीर॥

सरल बने जो अंतःकरण से,
उसका पथ उजियारा हो।
विनय बने जिसका आभूषण,
जीवन उसका तारा हो॥

नदियाँ मिलकर सागर होतीं,
बूँद न अपना नाम धरे।
ऐसे ही निज अहं पिघलाकर,
मानव मानव को धरे॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
निज अंतर का दीप जलाओ।
अपने भीतर सत्य की खुशबू,
हर श्वासों में फिर बसाओ॥

नश्वरता का अर्थ विनाश नहीं,
नव अंकुर का भी है जन्म।
पतझर भी संदेश सुनाता—
हर अंत में छिपा है कर्म॥

मौन जहाँ मुस्कान बन जाए,
वाणी मधु-सी बहने लगे।
दृष्टि जहाँ निष्पक्ष हो जाए,
जग का रूप सँवरने लगे॥

करुणा सबसे ऊँची वीणा,
प्रेम सबसे मधुर राग।
विनम्रता की लय में गाओ,
जीवन बन जाए अनुराग॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
चलते रहना ही उत्सव है।
हर अनुभव नव दीप जलाता,
हर क्षण जीवन-वैभव है॥

नभ की सीमा कौन बताए?
सागर की गहराई कौन?
प्रेम जहाँ निर्भय हो बहता,
वहीं विराजे सत्य मौन॥

धरती जैसा धैर्य धरो तुम,
वृक्ष समान उदार बनो।
सरिता जैसे सतत बहो तुम,
दीपक जैसे साकार बनो॥

हर प्राणी की आँखों भीतर,
आशा का इक दीप जले।
हर धड़कन में शुभ मंगल हो,
हर अंतस में प्रेम पले॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
सत्य न रुकता, सत्य प्रवाह।
जो चलता है करुणा लेकर,
वही प्रकाशित जीवन-राह॥

जब तक सूरज उगता होगा,
जब तक बहती रहे पवन।
तब तक गूँजे यही प्रार्थना—
निर्मल हो प्रत्येक मन॥

जब तक नदियाँ सागर चाहें,
जब तक वर्षा बरसेगी।
तब तक मानवता की ज्योति,
प्रेम-दीप बन हँसती रहेगी॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
जीवन केवल साँस नहीं।
जीवन निर्मल कर्म-सुगंध है,
जो क्षण-क्षण में रहती यहीं॥

अंत नहीं यह, आदि नहीं यह,
यात्रा का अविराम चरण।
हर प्रभात में नव संभावना,
हर संध्या में मधुर स्मरण॥

चलो जलाएँ अंतःदीपक,
चलो जगाएँ प्रेम-विचार।
चलो करुणा का गीत सुनाएँ,
यही हृदय का सच्चा सार॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
प्रेम रहे हर श्वास के साथ।
सत्य रहे हर कर्म के भीतर,
सरल रहे जीवन की राह॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**ओस-बिंदु में सूरज हँसता,लघु में भी विस्तार छिपा।एक सरल मुस्कान किसी की,बदल सके जीवन की दिशा॥

## **शोध-प्रस्ताव: मस्तक-केन्द्रित चेतना बनाम हृदय-केन्द्रित संतुलित दृष्टि** **(शिरोमणि रामपॉल सैनी के विचारों पर आधारित दार्शन...