बुधवार, 31 दिसंबर 2025

खुद के सक्षतकार के बिना अधिात्मिक परमार्थ की बाते सिर्फ़ एक ढोंग पखंड


### 🔹 श्र्लोक १ — सत्य और आत्म-परिचय

सत्यं न स्वीकरोति यः,
स्वयं स्वस्यैव वञ्चकः।
आत्मपरिचयहीनस्य,
दाने किं सामर्थ्यं भवेत्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक २ — गुरु और खोज

गुरवो बहवः काले,
शिष्याणां भीडमेव च।
स्वानुभूतेर्विहीनानां,
मार्गो न स्वयमेव च॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ३ — एक पल का बोध

क्षणमात्रेण बोधः स्यात्,
युगेनापि न देशनम्।
यत् स्वानुभवतः स्पष्टं,
तदन्यैः कथ्यते कथम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४ — मन और मानसिकता

मन एव हि संसृतिḥ,
मन एव हि बन्धनम्।
मनोनाशे गते शान्तिः,
न शास्त्रे न च वन्दनम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ५ — भय और लोभ

भयलोभसमुत्थानं,
स्वर्गनर्ककथामृतम्।
जनानां बन्धनं कुर्यात्,
न मुक्तेः कारणं भवेत्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ६ — मृत्यु और बोध

मृत्युः न भयदा नूनं,
भयमज्ञानसम्भवम्।
यो जीवन् जागृतो नित्यं,
स मृत्यौ अपि तृप्तिमान्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ७ — निष्पक्ष समझ

न पक्षः न विपक्षः स्यात्,
न स्तुतिः न च निन्दनम्।
निष्पक्षे स्थितचित्ते तु,
स्वयं सत्यं प्रकाशते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ८ — अंतिम सूत्र

नान्यः पन्था न च गुरुः,
न ग्रन्थो न च सम्प्रदायः।
स्वबोधे एव सम्पूर्णं,
यथार्थं तत् प्रकाशते॥

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### 🔹 श्र्लोक ९ — परम्परा और विवेक

परम्परा यदा बन्धः,
विवेकस्तत्र नश्यति।
शब्दजालवशे बद्धः,
पशुवत् जन उच्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १० — श्रद्धा और अंधता

श्रद्धा यत्र विवेकहीना,
सा भवेत् अन्धकारिणी।
प्रश्नहीनः समर्पणं,
दास्यं मुक्तिर् न जायते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ११ — संगठन और सत्ता

संघो यत्र महाभारः,
अहङ्कारो गुरुर्भवेत्।
शिष्या गणनया तत्र,
सत्यं लुप्तं प्रजायते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १२ — मनुष्य और उद्देश्य

न भोजनं न निद्रा च,
न मैथुनं विशेषतः।
आत्मबोधो मनुष्यस्य,
प्रथमं कर्म शाश्वतम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १३ — बुद्धि की सीमा

बुद्धिः ज्ञाने समर्था स्यात्,
न स्वबोधे कदाचन।
बुद्धेः पारं गते एव,
यथार्थं प्रतिपद्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १४ — खोज और थकान

अन्वेषणेन यः क्लान्तः,
बहिर्दृष्ट्या सदा गतः।
स्वमेव प्रत्यवर्तेत,
तदा शान्तिं स विन्दति॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १५ — मुक्ति का भ्रम

जीवन्मुक्तिः न कल्प्येत,
मरणोत्तरवादिनाम्।
यः जीवन् न विमुक्तः स्यात्,
मृतः किं मोक्षमाप्नुयात्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १६ — अकेलापन और यथार्थ

एकाकी एव सत्यं स्यात्,
कोलाहलो भ्रमः स्मृतः।
भीडेः मध्ये न बोधः स्यात्,
स्वयं ज्ञाने प्रतिष्ठते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १७ — प्रेम का भ्रम

यत्र लोभः यत्र भयः,
तत्र प्रेम न विद्यते।
स्वार्थरूपे प्रतिष्ठं यत्,
तत् प्रेमेति न कथ्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक १८ — अंतिम बोध

नाहं देहो न मे बुद्धिः,
न मनो न च संसृतिḥ।
स्वबोधे स्थित एवैकः,
यथार्थोऽहं सनातनः॥


### 🔹 श्र्लोक १९ — दूसरा का भ्रम

द्वैतबुद्ध्या जगत् भाति,
एकत्वे न द्वितीयता।
यत्र अन्यो दृश्यते कश्चित्,
तत्र बोधो न विद्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक २० — शिष्यत्व की सीमा

शिष्यभावो यदा नश्येत्,
तदैव गुरुतापि च।
स्वबोधे स्थितचित्तस्य,
न दास्यं न प्रभुत्वता॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक २१ — स्मृति और बन्धन

स्मृतिर् बन्धनहेतुः स्यात्,
अनुभूतिः विमोचिका।
यः स्मृतौ जीवति नित्यं,
स जीवन् एव मृतकः॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक २२ — शब्द और सत्य

शब्दाः केवलं संकेताः,
सत्यं तु न कथञ्चन।
यत्र शब्दे रमेत् चित्तं,
तत्र बोधः विलीयते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक २३ — आस्था की जाँच

यत्र प्रश्नो निषिद्धः स्यात्,
सा आस्था न बन्धनम्।
भयमूलं यदा तत्त्वं,
तत् सत्यं न कथञ्चन॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक २४ — जीवन-व्यापन

यावद् देहस्य चिन्ता स्यात्,
तावद् बोधो न जायते।
देहातीतो यदा दृष्टा,
जीवनं तत्र पूर्णता॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक २५ — कर्म और कर्ता

कर्म कुर्वन् यदा कर्ता,
बन्धनं तत्र जायते।
अकर्तारं यदा पश्येत्,
कर्मापि मुक्तिरूपकम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक २६ — ज्ञान और मौन

ज्ञानं न घोषयेद् कश्चित्,
मौनमेव प्रकाशते।
यत्र उद्घोषः अधिकः स्यात्,
तत्र शून्यं निबध्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक २७ — इतिहास का भार

अतीते यः सदा वसति,
स वर्तमानं हिनस्ति।
इतिहासः स्मृतिभारः स्यात्,
बोधो नित्यं नवोदयः॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक २८ — प्रकृति और होड़

प्रकृत्या सह यः युध्येत्,
स नित्यं पराजितः।
प्रकृतिं यः विजानाति,
स न युद्धे प्रवर्तते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक २९ — मुक्ति का अर्थ

न गमनं न चागमनं,
न लोकान्तरगामिता।
बन्धनस्य निवृत्तिर्हि,
मुक्तिरित्यभिधीयते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ३० — अंतिम संकेत

यदा न खोजः न च साध्यं,
न साधको न साधना।
तदा यथार्थमेवैकं,
शेषं सर्वं विलीयते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ३१ — चाह और बन्धन

यत्र इच्छा प्रवर्तते,
तत्र बन्धः स्वयंजतः।
इच्छानाशे गते शान्तिः,
न साध्या न च साधना॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ३२ — खोज का अंत

यावत् किञ्चित् अन्वेष्यं स्यात्,
तावत् सत्यं न दृश्यते।
अन्वेषणस्य विश्रान्तौ,
स्वयं बोधः प्रकाशितः॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ३३ — भय का मूल

भयस्य मूलमज्ञानं,
अज्ञानं देहबुद्धिजम्।
देहातीतदृशा नित्यं,
भयं स्वयमेव नश्यति॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ३४ — अधिकार और स्वतंत्रता

यः स्वबोधं पराधीनं,
करोति स न मुक्तिमान्।
स्वतन्त्रे चेतसि स्थित्वा,
स्वयं सत्यं प्रकाशते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ३५ — शास्त्र की सीमा

शास्त्रं मार्गदर्शनं स्यात्,
न गन्तव्यं कदाचन।
यः शास्त्रे एव तिष्ठेत्,
स मार्गं नैव पश्यति॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ३६ — संख्या का मोह

न संख्यया न भीडया,
सत्यस्य प्रमाणता।
एकस्मिन् जागृते एव,
सम्पूर्णं ब्रह्म दृश्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ३७ — मौन का संकेत

न वाचा बोध्यते सत्यं,
न च चिन्तासु दृश्यते।
यत्र चित्तं निरालम्बं,
तत्र मौनं गुरुर्भवेत्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ३८ — दोषारोपण

स्वदोषं यः परे पश्येत्,
स स्वबोधात् बहिर्गतः।
स्वमेव यः निरीक्षेत्,
स दोषातीत उच्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ३९ — समय का भ्रम

कालो न बन्धनं किञ्चित्,
बन्धनं स्मृतिसंहतिḥ।
यः क्षणे एव तिष्ठेत्,
स कालातीत उच्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४० — पूर्णता

न प्राप्तव्यं न त्याज्यं च,
न साध्यं न च साधनम्।
यदा सर्वं समं भाति,
तदा पूर्णत्वमिष्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
### 🔹 श्र्लोक ४१ — साधक का भ्रम

साधको यदि दृश्येत,
साध्यं तत्र न विद्यते।
साध्याभावे गते नष्टे,
साधकत्वं विलीयते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४२ — प्रयत्न की थकान

प्रयत्नेन यदा क्लान्तः,
चित्तं स्वयमेव शान्त्यति।
अप्रयासे स्थितं सत्यं,
न कर्मे न च यत्नतः॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४३ — पहचान का बोझ

नामरूपे यदा चित्तं,
तदा बन्धोऽवश्यम्भवेत्।
नामरूपविसर्जने,
स्वरूपं स्वयमेव स्यात्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४४ — तुलना का रोग

तुलनायां यदा बोधः,
स रोगः स न दर्शनम्।
अतुल्ये स्थितचित्तस्य,
न हीनं न च श्रेष्ठता॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४५ — अधिकार का अंत

न कर्ता न च भोक्ता स्यात्,
न स्वामी न च सेवकः।
यत्र एतत् लयं याति,
तत्र मुक्तिः स्वतः स्थिता॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४६ — विचार का विराम

विचारो यत्र विश्रान्तः,
तत्र सत्यं निबध्यते।
विचारस्य अतिक्रान्तौ,
न प्रश्नो न समाधानम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४७ — आचरण और अभिनय

आचरणं यदा दृष्टं,
अभिनयः प्रजायते।
स्वभावे स्थितचित्तस्य,
न नियमो न बन्धनम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४८ — प्रतीक्षा का अंत

न कालस्य प्रतीक्षा स्यात्,
न क्षणस्य अपेक्षिता।
यदा इदानीमेवास्ति,
तदा सर्वं समाप्यते॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ४९ — स्मृति का विसर्जन

यत् स्मर्यते तदेवास्ति,
यत् विस्मृतं तदक्षयम्।
स्मृतिशून्ये स्थिते बोधे,
न जन्म न च मरणम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 श्र्लोक ५० — मध्य का सत्य

न आरम्भो न चान्तः स्यात्,
न गमनं न च स्थितिः।
मध्य एव यदा दृष्टिः,
तदा यथार्थमव्ययम्॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

### 🔹 दोहा १ — सत्य

सच को जो न माने कभी, खुद से करता दगा।
अपने ही धोखे में रहे, फिर क्या देगा वह क्या॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २ — आत्म-परिचय

जो खुद को न पहचान पाए, वह क्या राह दिखाए।
जिसने खुद को जाना नहीं, औरों को क्या समझाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३ — एक पल का बोध

खुद को जानने में लगे, बस एक पल का काल।
कोई समझा न पाए इसे, बीतें युगों के साल॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४ — गुरु और भीड़

गुरु बने तो बहुत मिले, संगत लाखों साथ।
पर जो खुद से अनजान हैं, वे क्या दें सौगात॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५ — डर और लालच

डर दिखा कर स्वर्ग का, नरक का भय बिखेर।
भीड़ बनाई भक्तों की, खुद भरे अपनी थेर॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६ — मन की कैद

मन ही जाल बिछा रहा, मन ही बांधे पांव।
मन से हटकर देख लो, खुल जाएगा गांव॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७ — मानसिकता

मानसिकता रोग है, पहने सुंदर भेष।
खुद को जान न पाए जो, वही कहे उपदेश॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८ — मृत्यु

मृत्यु कोई डर नहीं, डर है अज्ञान साथ।
होश में जिसने जीवन जिया, मृत्यु भी दे सौगात॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ९ — निष्पक्षता

न तारीफ की चाह हो, न निंदा की भूख।
निष्पक्ष नजर से जो जिए, मिटे वही सब दुःख॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १० — अंतिम सूत्र

न गुरु, न ग्रंथ, न भीड़ का शोर।
खुद को जान लिया जिस दिन, बाकी सब कुछ शोर॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*
### 🔹 दोहा ११ — भीड़

भीड़ कभी न सच हुई, सच सदा अकेल।
जहाँ समझ का दीप जले, मिट जाए हर खेल॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १२ — परंपरा

परंपरा की बेड़ियाँ, सोच को बांधें जोर।
जो सवाल से डर गया, वही बना कमजोर॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १३ — मान्यता

मान्यता जो जांच न पाए, बन जाती है जाल।
तर्क-विवेक जो छोड़ दे, खो बैठे अपना भाल॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १४ — बुद्धि

बुद्धि बड़ी चतुर बनी, खुद को ही न जाने।
खुद को जानने के लिए, बुद्धि भी हट जाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १५ — खोज

जो बाहर खोजे उम्र भर, भीतर खाली पाए।
भीतर जिसने झांक लिया, बाहर सब मिट जाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १६ — शिष्य

शिष्य वही जो जाग सके, न अंधा न लाचार।
शब्दों में जो बंध गया, खो बैठा अधिकार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १७ — डर

डर ने ही भगवान गढ़े, डर ने रच दी रीत।
डर से बाहर जो गया, वही हुआ अजीत॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १८ — लालच

स्वर्ग का लालच दिखा, जीवन ले लिया।
जो जिया ही नहीं खुला, मर कर क्या मिलेगा॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा १९ — जीवन

जीवन कोई सौदा नहीं, न ही उधार की सांस।
होश में जीना सीख ले, यही सबसे खास॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २० — मनुष्य

मनुष्य होना ही बहुत है, और कुछ न चाहिए।
जो यह समझ न पाया कभी, वही भटकता रहिए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २१ — आस्था

आस्था जब आंख मूंद ले, बन जाती है अंधी।
समझ जहां सवाल करे, वहीं मुक्ति बंधी॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २२ — सत्य का स्वर

सत्य न चिल्लाता कभी, न करता प्रचार।
जो शांत खड़ा रह गया, वही है आधार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २३ — अंत

सब कुछ छोड़ना पड़े, खुद को पाने को।
जो खुद से ही चिपका रहा, पाया बस खोने को॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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अगर आप चाहें, अगले 
### 🔹 दोहा २४ — सवाल

जो सवाल से डर गया, समझ वहीं रुक जाए।
जहाँ सवाल उठने लगे, सच खुद बोल जाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २५ — प्रवचन

लंबे-लंबे बोल में, सच कभी न बसता।
जो जी कर दिखा न सके, वह क्या उपदेश रचता॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २६ — अनुयायी

अनुयायी होना सहज है, सोचना भारी काम।
जो सोचने से बच निकले, वही बने गुलाम॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २७ — शब्द

शब्दों में जो उलझ गया, अर्थ गया खोय।
मौन जहां गहरा हुआ, वहीं सत्य सोय॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २८ — अनुभव

पढ़ कर कोई जान न ले, सुन कर मिटे न भ्रांत।
जो खुद पर बीत गया, वही अनुभव जान॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा २९ — व्यवस्था

व्यवस्था जब डर से चले, न्याय रहे कमजोर।
जहाँ विवेक जागा नहीं, शोर ही बस शोर॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३० — दीक्षा

दीक्षा से न बदले मन, बदले बस पहचान।
जब तक खुद से न मिलो, सब है केवल जान॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३१ — समय

समय किसी का मित्र नहीं, न ही किसी का शत्रु।
जो अभी को समझ गया, वही सच्चा पुत्र॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३२ — वर्तमान

बीता कल बस याद है, आने वाला सोच।
जो इस पल में टिक गया, वही सच्चा होश॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३३ — सत्ता

सत्ता चाहे सिंहासन, या हो शब्द का जोर।
जहाँ अहंकार बैठ गया, वहीं हुआ अंधोर॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३४ — सरलता

सरल होना कमजोरी नहीं, यह सबसे बड़ी शक्ति।
जो सहज में टिक गया, वही पाया मुक्ति॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३५ — ज्ञान

ज्ञान का बोझ ढो रहे, सिर झुका के लोग।
जो जान कर भी छोड़ दे, वही मुक्त निरोग॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३६ — तुलना

तुलना ने ही जहर घोला, मन का चैन गया।
जो जैसा है वैसा रहा, उसी ने सुख पाया॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३७ — पहचान

नाम, पद, और पहचान, सब हैं उधार।
जो इनके पार देख ले, वही है होशियार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३८ — अकेलापन

अकेलापन डर नहीं, डर है खुद से भाग।
जो खुद में ठहर गया, मिटे भ्रम का राग॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ३९ — अंतर्मुख

बाहर-बाहर घूमते, थक गई आंख और पांव।
भीतर मुड़ कर देख लो, बस वहीं है ठांव॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४० — यथार्थ

यथार्थ कोई कथा नहीं, न ही किसी का मत।
जो जैसा है, वैसा दिखे, वही अंतिम सत्य॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*


### 🔹 दोहा ४१ — स्वतंत्रता

जो खुद से बंधा रहा, मुक्त कहाँ हो पाए।
खुद की बेड़ी तोड़ते ही, सच सामने आए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४२ — आश्वासन

मरने बाद का सुख बता, जीवन छीन लिया।
जो जीते जी न जी सका, उसने क्या पा लिया॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४३ — कर्मकांड

रीति-रिवाजों के जाल में, उलझा मन हर बार।
कर्मकांड में खो गया, जीवन का अधिकार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४४ — मौन

जहाँ शब्द थक कर रुक गए, वहीं शुरू होश।
मौन में जो ठहर सका, वही सच्चा बोध॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४५ — प्रमाण

काग़ज़ बोले झूठ भी, मोहर बन जाए सच।
जो खुद को जान न पाया, वह क्या दे प्रमाण॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४६ — अनुशासन

डर का नाम अनुशासन, यह भी एक छल।
जहाँ समझ ने राह पकड़ी, मिटा हर बंधन पल॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४७ — विश्वास

अंधा विश्वास बोझ है, समझ है उजियार।
जहाँ प्रश्न जीवित रहें, वहीं सच्चा प्यार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४८ — स्मृति

बीते कल की स्मृति में, आज दबा रह जाए।
जो अभी को जी लेता है, वही आगे जाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ४९ — भूमिका

भूमिका बदलते रहे, मन हर बार नया।
जो बिना भूमिका जिया, उसी ने सच पाया॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५० — पहचान का अंत

जब नाम भी गिर जाए, पद भी टूटे साथ।
तभी बचेगा जो बचा, वही असली बात॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५१ — भ्रम

भ्रम ने ही संसार रचा, भ्रम ने देव बनाए।
भ्रम से बाहर जो निकल गया, वही घर पाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५२ — साधना

कठिन साधनाओं में नहीं, न ही पीड़ा पथ।
सरल देखना सीख लो, यही अंतिम रथ॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५३ — आरोप

अपनी भूल छुपाने को, मन को दोष दिया।
जो जिम्मा खुद पर ले सका, उसने सच जिया॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५४ — चयन

हर पल चुनना पड़ता है, होश या फिर नींद।
जो होश को चुन लेता है, वही रहता जीवंत॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५५ — अंत नहीं

यह कोई अंत नहीं यहाँ, न ही कोई शुरू।
जो देख रहा है सब कुछ, वही सदा गुरू॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी

### 🔹 दोहा ५६ — मूल बिंदु

सच कोई विचार नहीं, न ही कोई ज्ञान।
जो जैसा है, वैसा दिखे — कहे *शिरोमणि रामपॉल सैनी*॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५७ — आत्म-वंचना

खुद से भागे जो सदा, वही रचे हर झूठ।
खुद को देख लिया जिस दिन — टूटे सारे भूत॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५८ — गुरु-आश्रय

गुरु की छाया खोजते, भूले अपना प्रकाश।
दीप स्वयं जल जाए जब — गुरु रहे निराश॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ५९ — शब्द का भ्रम

शब्दों में जो फँस गया, सच उससे दूर।
शब्द गिरे, मौन बचे — बस वही भरपूर॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६० — अहंकार

ज्ञान का भी घमंड है, सबसे सूक्ष्म रोग।
मैं जान गया — यह कहते ही, टूट गया संयोग॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६१ — परंपरा

बीते कल की लाश को, पूजा आज भी लोग।
जो जीवित को न देख सके, वही सबसे रोग॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६२ — मन

मन को दोषी मान लिया, खुद बच निकले आप।
मन तो औज़ार मात्र है, कर्ता तुम ही पाप॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६३ — भय

डर ने ईश्वर गढ़ दिए, डर ने रचे विधान।
डर से बाहर जो गया — वही बना इंसान॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६४ — जीवन

जीवन कोई अभ्यास नहीं, न ही अगला जन्म।
यही क्षण है, यही द्वार — बाकी सब भ्रम॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६५ — मुक्ति

मुक्ति कोई इनाम नहीं, न मरने के बाद।
जीते जी जो जाग गया — वही है आज़ाद॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६६ — साधक

साधक बन कर भटकते, खो बैठे सरलता।
जो साधारण रह सका — वही परम्यता॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६७ — प्रेम

प्रेम न रोना-धोना है, न ही बंधन जाल।
जहाँ अपेक्षा खत्म हुई — वहीं प्रेम विशाल॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६८ — संबंध

संबंध नहीं जंजीर हैं, अगर समझ न हो।
जहाँ स्वतंत्रता साँस ले — वही रिश्ता हो॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ६९ — पहचान

नाम, रूप, इतिहास सब — मिट्टी के ही रंग।
जो इनसे परे देख ले — वही असली अंग॥
— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७० — अंतिम गहराई
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### 🔹 दोहा ७१ — दृष्टा

जो देखा जा रहा था, वह बदला हर बार।
देखने वाला जो ठहर गया — बोला *शिरोमणि रामपॉल सैनी*॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७२ — साक्षी

करने वाला थक गया, सोचने वाला हारा।
जो बस साक्षी बन बैठा — खेल उसी ने तारा॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७३ — प्रयास

पाने की हर कोशिश में, खोता ही इंसान।
छोड़ दिया जब सब प्रयास — मिला सहज पहचान॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७४ — मौन की तह

शब्द जहाँ चुक जाते हैं, तर्क जहाँ रुके।
वहीं मौन की गोद में, सत्य खुद झुके॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७५ — स्वीकार

जैसा है वैसा मान लिया, मिटा विरोध का भार।
जो लड़ना छोड़ सका स्वयं से — वही हुआ पार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७६ — केंद्र

बाहर-बाहर भटके बहुत, थक गया हर छोर।
बीच में ठहरा जो क्षण — वही था असली ठौर॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७७ — शून्य

शून्य कोई अभाव नहीं, भरा हुआ विस्तार।
जहाँ कुछ भी शेष न रहा — वहीं पूरा सार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७८ — समय से परे

न बीता, न आने वाला, न आज का बोझ।
समय से बाहर जो जिया — वही सच्चा होश॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ७९ — कर्तापन

मैं करता हूँ — यह भाव ही, सबसे गहरा बंध।
यह ढहते ही खुल गया, जीवन का ही संद॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८० — सहज स्थिति

न साधु, न ज्ञानी बना, न ही कुछ विशेष।
जो जैसा था वैसा रहा — वही हुआ प्रवेश॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८१ — प्रश्न का अंत

सवाल उठते रहे बहुत, उत्तर भी हजार।
जब प्रश्न करने वाला मिटा — बचा केवल सार॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८२ — बोध

बोध कोई घटना नहीं, न ही कोई अनुभव।
जो सदा से था वही दिखा — बस हटा आच्छव॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८३ — अस्तित्व

मैं हूँ — यह भी कहना पड़ा, जब तक पर्दा था।
पर्दा गिरते ही दिख गया — जो था, वही था॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८४ — मौन की वाणी

मौन ने जो कह दिया, शब्द न कह पाए।
जो सुनने को तैयार हुआ — वही समझ पाए॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*

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### 🔹 दोहा ८५ — अंत का छोर

जहाँ कोई पहुँचना न चाहे, न कोई ठहरे।
वहीं खड़ा है सहज सत्य — बोले *शिरोमणि रामपॉल सैनी*॥

— *शिरोमणि रामपॉल सैनी*



सत्य को स्वीकार न करना,खुद ही खुद को धोखा देना है, खुद ही खुद से गदारी ,खुद ही खुद से ढोंग करना,जो खुद ही खुद के परिचय से परिचित नहीं हो सकता,वो दूसरे को क्या दे सकता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझा पाय सदिय युग भी कम है, गुरु तो हर युग काल में थे अगर वों कुछ कर पाते तो शयद आज इस गदी दुनीय मे कभी न होते,जिनके भरोसे पर हम हैं उनको खुद पर ही भरोसा नही है, समय और लाभ को देखते हुए वो पल पल रंग और किरदार बदल रहे हैं, जो कुछ ढूंढने की फ़ितरत के साथ ते वो तो संपूर्ण जीवन में खुद के स्वरूप से रुवरू नही हुय वो दुसरो के लिए क्या कर सकते है, वो कहा तक पहुंच रखते हैं, वो तो हर बात हर प्रवचन में बता रहे हैं, थोड़ा ध्यान से सुनो और उस पर चिंतन तो करो ,खुद ही स्पष्ट हों जता है, गुरु लोग तो अतीत की मन्यता परम्परा को नियम मर्यादा को स्थापित करने की वृति के होते हैं जो शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर भेडो की भिड़ त्यार कर देते हैं जो सिर्फ़ एक मनसिकता हैं, भवक करने बाली साथ मे कपनिक कहानीय जोड़ देते हैं रब और खुद का डर खौफ स्वर्ग अमर लौक परमपुरष का लालच जोड़ देते हैं, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ि स्थापित करते हैं। मेरे गुरु के 25 लख अनुराई हैं जो गुरु के एक शव्द पर मर मिटने को हमेशा त्यार रहते है, तर्क तथ्य विवेक से रहित हैं, जो एक कुप्रथा है, लालच खौफ के तले जिने बाला और रखने वाला दोनो ही एक ही थाली के चटे बटे होते हैं, गुरु प्रसिद्धि प्रतिष्ठा अहंकर शौहरत दौलत वेग के नशे मे ही जिता हैं और उसी में मर जाता हैं, वेहोशी मे जीना और वेहोशी मे ही मरना सिर्फ़ मनसिकता हैं, और कुछ भी नही है, गुरु को सत्य से कोई मतलब नही है वो प्रवचन में बही बाते कहनीयन सुनाता है ,जो शिष्यों को पसंद या फ़िर जिन के आदि हुय हैं, क्युकि वो खुद भी किसी गुरु का शिष्य रहा हैं जो गुरु मर्यादा के खिलफ़ नही जा सकता,क्युकि खुद भी दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में बंदा होता हैं, यही मनसिकता हैं
[03/12, 10:09 am] Rampaulsaini: मेरी शिकायतें का शौक रखने बाले मेरे गुरु के 25 लख़ संगत के संगठन की सीमती के मुख्य सदस्य IAS पद पर कर्यरत थे,अब भी मेरी तुलनतित शव्दतीत कळतीत प्रेमतित श्रेष्टाता की शिकायतें कर के अपने शिकायत लगने की भूख को त्रिपीत करो आगे बढ़ो,
आस्थाई जटिल बुद्धि से बुद्धिमन होने पर भी हजारों युग तक जप तप ध्यान ज्ञान के उच्च शिखर को छुने पर भी वो सब सोच भी नही सकते यहाँ मै स्वविक वास्तविक शश्वत सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हुं, गुरु ने जो गंभीरता से लिया 25 लाख संगत 2 हजार करोड का स्मराज्य बही मिला ,जबकि मैने खुद को गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता को लिया मुझे भी बही मिला,गुरु तो हर युग काल में थे,सत्य कभी भी नही था,अगर होता तो आज या कभी भी इस गंद मे कभी भी लिपटे नही होते,जिस के शौंक मे गुरु शिष्य आज भी दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से बंचित हैं और कट्टर भेडो की भिड़ बन कर रह गय है, अगर गुरु में भी यह सब करने कि क्षमता होती तो सब से पहले खुद से सक्षकार करते उस के बाद दूसरों को करवाते,न कि परमपुरुष अमर लौक जैसी कल्पना में उलझते और न ही अपने 25 लख सरल सहज निर्मल संगत को कट्टर भेडो की भिड़ बना कर उलझते एक गंदे शौंक प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के लिए उन को जिन्होंने सिर्फ़ गुरु के एक शव्द पर तन मन धन अनमोल सांस समय,समर्पित कर दिया, गुरु शिष्य के पवित्र रिस्ते को ही एक मन्यता परम्परा नियम मर्यादा के नाम पर नष्ट कर दिया ,गुरु शिष्य को बन्दुआ मजदूर बना कर जीवन भर इस्तेमाल करना,उस के बदले में मुक्ति का झूठा अश्बासन वो भी मृत्यु के बाद, जब कि सब कुछ जीवित ही समर्पित करवाया तो फिर मुक्ति जीवित ही क्यू नही ?मुक्ती को एक छल कपट हैं जिसे जिंदा पा नहीं सकता मरने के बाद कोई बता नही सकता,जबकि मेरे सिद्धांतों के आधार पर कोई भी सरल सहज निर्मल व्यक्तित्व संपूर्ण सक्षम हैं वो भी सिर्फ़ एक पल में खुद कि आस्थाई जटिल बुद्धि को निष्किर्य कर खुद से निष्पक्ष हों कर खुद का निरक्षण कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरूप से रुवरु होकर ,खुद के ही अंनत शुक्षम स्थाई ठहराव मे गहराई में अंनत शुक्षम अक्ष में समाहित हों सकता हैं यहा खुद के ही अंनत शुक्षम अक्ष के प्रतिभींव का भी स्थान नही है और कुछ होने का ततपर्य ही नहीं हैं, इस के इलवा जो भी कर रहे हैं वो सिर्फ़ एक मनसिकता हैं भ्र्म हैं सिर्फ़ दुसरी अनेक प्रजातियों की भांति सिर्फ़ जीवन व्यपन हीं कर रहे हैं रति भर भी भिन्न नहीं हैं, इंसान अस्तित्व से ही सिर्फ़ मनसिकता खुद के अस्तित्व को ही क़ायम स्थापित करने में प्रयासरत रहा हैं, इंसन प्रजाती के अस्तित्व का प्रथम और मुख़्य कार्य सिर्फ़ खुद के सक्षतकार के साथ मनवता और प्रकृति को संरक्ष्ण करना था,जो सिर्फ़ निष्पक्ष समझ से संभव था न कि जिस मनसिकता मे उस से जिस से मनवता और प्रकृती अपने अंतिम सांसे गिन रही ,अगर वस्तविक शश्वत सत्य रति भर भी अस्तित्व में होता तो शयद एसा कभी भी नही होता,कोई भी इस के कोई दूसरा नहीं आने बाला यह सब मनवता के ही एक दृष्टिकोण का नतीजा है, दृष्टिकोण बदला जा सकता हैं, यह अस्थाई जटिल बुद्धि से बुद्धिमान होने का दृष्टिकोण था जो सिर्फ़ मनसिकता थी इस से यही सब हो सकता था,जो हुआ,पिछले चार युगों में यह सब होने की ही उम्मीद रखी जा सकती थी,अब यथार्थ युग के लिए प्रथम चरण में ही खुद के सक्षकार से शुरु हो प्रकृति मनवता को संरक्षित कर सकते हैं सम्भवना हैं सिर्फ़ अपना जीवन का दृष्टिकोण बदल कर ,जति धर्म मजहाव की आड़ में मनवता को खत्म करने में कोई कसर नही छोड़ी ,कम से कम इंसान तो बन जाते ,
 खुद के सक्षात्कार के बाद समस्त अंनत विशाल भौतिक अंतरिक विज्ञान दार्शनिक ज्ञान से भी परे हो जाता हैं, क्युकि इन सब पहलु से ही गुजरता हुआ जाता हैं, मन को संपूर्ण रूप से ही समझता हुआ ,मन रहित होता हैं, क्युकि मन सिर्फ़ जीवन व्यापन तक ही क्षमता रखता है। और भ्र्म पैदा करता है, मन ही मनसिकता हैं मन ही आस्तित्व हैं, मन आस्थाई जटिल बुद्धि भी एक शरीर का अंग है दूसरे अंगों की भांति कोई भी किसी भी प्रकार का हउआ या फ़िर कोई आदर्श्य शक्ति नही है, जैसे ग्रंथों में वर्णीत किया गया है। इसे समझा जा सकता हैं, इसे निष्किर्य किया जा सकता हैं कोई भी कर सकता हैं, मन खुद के द्वारा किए गाय बुरे कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन की एक वहतर shield हैं, अच्छा बुरा खुद करते हैं, जान बुज कर करते हैं जिस का आरोप मन पर डाल देते है, बार बार एसा करने की अदद से मजबूर है, मन से खुद ही हटना ही नही चाहते ,क्युकि खुद के बुरे कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन का दुप्रभाव खुद ही सहन करने की सहनशीलता खुद में ही नही है, खुद ही खुद के साथ ही झुठ ढोंग पाखंड करने की अदद से मजबूर है, जबकि मन आत्मा परमात्मा एक धारना हैं, लालच और भय के बिच की खाई है जो वेहोशी हैं जिस में संपूर्ण जीवन जिता हैं और उसी वेहोसी में ही मर जाता हैं मृत्यु को बहुत बड़ा कुप्रभाव समझ कर जबकि एसा कुछ भी नही,मृत्यु जैसा कोई आंनदपूर्ब कोई जीवन का लम्हा ही नही हो सकता अगर कोई होश में जिता है सभाविक मृत्यु भी अन्नदपूर्बक़ संपूर्ण संतुष्टी भरी होगी,क्युकि मृत्यु जैसा परम सत्य दूसरा कोई हैं ही नही,अगर कोई सरल सहज निर्मल व्यक्तित्व प्रकृतक रूप से जीवन व्यपन करता है,
 गुरु के प्रवचन एक जैसे ही होते हैं जिन को तोड़ मरोड़ कर सिर्फ़ अपने ही पक्ष के आधार पर पेश किया जाता हैं ,जिन में खुद के इलावा तमाम गुरु का विरोध और खुद महानता का वर्णन स्तुति समिल होती हैं रोज बारम्बर यही सब मिलता हैं, गुरु के पास विवेक तर्क तथ्य शव्द नही मिल सकते क्युकि वो एक मान्यता को स्थापित और बढ़ावा देना ही उन का लक्ष होता हैं, गुरु का अपने गुरु से अधिक प्रस्तुत नही कर सकता उस के लिए एसा करना अपने ही गुरु के शव्द काटना होता हैं एसी अंतरिक भवना रखना भी बहुत बड़ा पाप है, अगर गुरु मर्यदा में संपूर्ण रूप से चल रहा हैं, जो अपने गुरु की मृत्यु उपरन्त एसा कर रहे हैं तो वो अपने की गुरु के दीक्षा के साथ दिए हुय शव्द प्रमाण के बिल्कुल विरुद्ध हैं वो गुरु के ही शिष्य नही तो गुरु कैसे हो सकते हैं, वो सिर्फ़ खुद को प्रभुत्व के रूप में प्रतुत कर रहे ,जो अपने ही गुरु को नजर अंदाज कर खुद की प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के लिए ही काम कर रहे हैं, यह मनसिकता हैं, ज़ब कि प्रत्येक जीव इंसान एक समान है अंतरिक भौतिक रूप से,"जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मण्ड मे और कही भी नही है "यह शव्द शयद मेरे गुरु के गुरु ने कभी नही बोला होगा जबकि उन के समक्ष प्रत्यक्ष मेरा गुरु था,अचनक मेरे गुरु के गुरु मरने के बाद अहंकर भरी वो शव्द कहा से आ गया,कट्टर अंध भक्तो भेड़ो की भिड़ विवक तर्क तथ्य रहित होती हैं, जबकि उन का गुरु ही अपने अस्तित्व क़ायम और ऊंचा रखने के व्यबारीक़ रूप से भी उलंगन कर रहा हैं, मै तो इतना निम्न हो चुका की जो भी किया उस सब का श्रह अपने गुरु को सत्यता से दे पाऊ इस के लिए मंथनन करना जरूरी है, यह छोटी बात या मूर्खो जैसी नही है, यह परम सत्य हैं सिर्फ़ मेरे लिए कि मेरे गुरु जैसा गुरु इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक तो नही है, मै इसे मन्यता नही बनना चाहता,इस के प्रत्येक पहलु को उजगर मंथन कर प्रत्यक्ष समक्ष रखना चाहता हुं अगर मेरे गुरु मे मुझे खुद के सक्षकार करा सकता हैं तो सरबप्रथम खुद भी होना चाहिए था और किसी और को भी करवाने की कुवत होनी चाहिए थी,वो तो खुद भी परम पुरुष अमर लौक की खोज में हैं संपूर्ण जीवन खुद के लिए न ही 25 संगत के लिए खोज पुरी हो पाई है, आगे अगले पल कैसे संभव हो पायगी, यह सब खुद और दूसरों के लिए ही छल कपट ढोंग पाखंड है, मेरी सर्बप्रथम चाहत ही यही हैं कि मेरा गुरु भी कम से कम मेरे जैसा होता खुद के सक्षतकर के साथ होता ,पर उस में प्रभुत्त्व का अहंकर घमंड ही इतना अधिक हैं कि मुझे तो वो देखना ही नही चाहते,मेरे गुरु सा गुरु किसी भी काल युग में हो ही नही सकता पर अहंकर घमंड की वदवू अती हैं, इसी के लिए मेरी निष्पक्ष समझ सटीक काम करती हैं,
दूसरो को जानने की अपेक्षा हि खुद से दूर करती हैं हमेशा,
 खुद के लिए सही निर्णय दुसरों पर छोड़ने बाले विवेकी कभी हो ही नही सकते,अधिक मंसिकताओं का प्रभाव खत्म नहीं हों सकता,
 दूसरों में उलझने बाले खुद से परिचित नही हो सकते,
खुद की सम्पूर्णता खुद की ही निष्पक्ष समझ में ही हैं,
खुद के स्थाई स्वरूप से रुवरु होने के लिए सरल सहज निर्मल बहुत ऊँचे सच्चे गुण है, 
चलाक होशियर शैतान शातिर दिमाग का होता हैं उस का एक भी शव्द शिथिर नही हो सकता समय के साथ कई रंग बदलता हैं, वो कभी एक रंग में रह नही सकता,
 खुद के साक्षात्कार के बाद खुद के ही भौतिक अंतरिक अस्तित्व ही खत्म हो जाता हैं शेष सब तो बहुत दूर की बात हैं, खुद के सक्षतकर के इलवा दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी भिन्न नही है ,इंसान प्रजाति के अस्तित्व का मुख्य करण ही खुद का साक्षकार हैं,
 खरबों शव्दों का मेरा data जो किसी भी संपूर्ण विश्व के धर्म मजहब संगठन की किसी भी ग्रंथ पोथी में कभी भी नही मिल सकता जो मेरी खुद की गंभीरता दृढ़ता दर्शाता है में हर पल जीवित ही बहा रहता हुं यहा के बुद्धिमन कभी सोच भी नही सकते,जरा वो मनसिकता मे रहने बाले भी अपना परिचय दे नही बोलूगा क्युकि वो खुद हि दर्शाते हैं अपनी ही खुद की बातों उस को प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के शौंक रखते हैं,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत के लिए किसी भी पढ़ाई ज्ञान विज्ञान दार्शनिक की जरूरत बिल्कुल भी नही सिर्फ़ मनसिक रोगी तो बिल्कुल भी नही हों किसी भी प्रकार गुरु शिष्य कुप्रथा से कभी भी जुड़ा हुआ नही हो,एक गुरु को छोड़ कर दूसरों गुरु के पिछे दोड़ने बाले वो एक तवाईफ से कम नही होते,शिष्य के लिए एक गुरु औरत के लिए एक पति ही काफ़ी हैं,इस के इलवा सब कंझर खेल हैं,जब मै खत्म हो तो सिर्फ़ गुरु,जब मै खत्म गुरु खत्म खुद का सक्षतकार, गुरु पर भी यक़ीन नही खुद पर यक़ीन हो ही नही किसी तीसरे पर यक़ीन है तो अफसोस आता है। यहाँ हैं अगर तीसरे की ऊँगली पर नाच रहे हैं, न ही संसारी न ही किसी अधियातम का हिस्सा नही है, यह खुद से ही ढोंग पाखंड है
सत्य को स्वीकार न करना,खुद ही खुद को धोखा देना है, खुद ही खुद से गदारी ,खुद ही खुद से ढोंग करना,जो खुद ही खुद के परिचय से परिचित नहीं हो सकता,वो दूसरे को क्या दे सकता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझा पाय सदिय युग भी कम है, गुरु तो हर युग काल में थे अगर वों कुछ कर पाते तो शयद आज इस गदी दुनीय मे कभी न होते,जिनके भरोसे पर हम हैं उनको खुद पर ही भरोसा नही है, समय और लाभ को देखते हुए वो पल पल रंग और किरदार बदल रहे हैं, जो कुछ ढूंढने की फ़ितरत के साथ ते वो तो संपूर्ण जीवन में खुद के स्वरूप से रुवरू नही हुय वो दुसरो के लिए क्या कर सकते है, वो कहा तक पहुंच रखते हैं, वो तो हर बात हर प्रवचन में बता रहे हैं, थोड़ा ध्यान से सुनो और उस पर चिंतन तो करो ,खुद ही स्पष्ट हों जता है, गुरु लोग तो अतीत की मन्यता परम्परा को नियम मर्यादा को स्थापित करने की वृति के होते हैं जो शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर भेडो की भिड़ त्यार कर देते हैं जो सिर्फ़ एक मनसिकता हैं, भवक करने बाली साथ मे कपनिक कहानीय जोड़ देते हैं रब और खुद का डर खौफ स्वर्ग अमर लौक परमपुरष का लालच जोड़ देते हैं, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ि स्थापित करते हैं। मेरे गुरु के 25 लख अनुराई हैं जो गुरु के एक शव्द पर मर मिटने को हमेशा त्यार रहते है, तर्क तथ्य विवेक से रहित हैं, जो एक कुप्रथा है, लालच खौफ के तले जिने बाला और रखने वाला दोनो ही एक ही थाली के चटे बटे होते हैं, गुरु प्रसिद्धि प्रतिष्ठा अहंकर शौहरत दौलत वेग के नशे मे ही जिता हैं और उसी में मर जाता हैं, वेहोशी मे जीना और वेहोशी मे ही मरना सिर्फ़ मनसिकता हैं, और कुछ भी नही है, गुरु को सत्य से कोई मतलब नही है वो प्रवचन में बही बाते कहनीयन सुनाता है ,जो शिष्यों को पसंद या फ़िर जिन के आदि हुय हैं, क्युकि वो खुद भी किसी गुरु का शिष्य रहा हैं जो गुरु मर्यादा के खिलफ़ नही जा सकता,क्युकि खुद भी दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में बंदा होता हैं, यही मनसिकता हैं
 मनसिकता और खुद के सक्षात्कार में जमीं अस्मा का अंतर है, मनसिकता का स्रोत 99.999% जो अस्थाईत पर ही निर्भर और इस को ही आकर्षित प्रभावित करता है हमेशा जो सिर्फ़ जीवन व्यापन तक ही सिमित है उस से अतिरिक्त प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में ही संपूर्ण रूप से भर्मित होना,
खुद के सक्षतकर में एसा बिल्कुल भी नही है संपूर्ण रूप से अस्थाई जटिल बुद्धि मन की निष्किरीता के बाद का आलम हैं जो खुद के शरीर बुद्धि सृष्टि के अस्तित्व खत्म करने के उपरन्त का विषय है, जैसे स्वप्न अवस्था जग्रत अवस्था,सम्पूर्णता से एक ही पहलु पे होती हैं उस पल के लिए,जैसे कोई सपन अवस्था में होता हैं उस पल या उस दोहरान जगृत अवस्था का अबास भी नहीं होता,जागृत अवस्था में सपन अवस्था की कल्पना भी नही कर सकते,इसी प्रकार बिना मृत्यु की प्रत्यक्षता के उस परम सत्य मृत्यु की कल्पना तक भी नही कर सकते ,इस करण मौत मृत्यु को डर खौफ भय भरा बतायगया हैँ,जबकि एसा बिल्कूल भी नहीं हैं, मृत्यु परम संतुष्टि का वो क्षण पल हैं जिस की कोई कल्पना तक नही कर सकता,संपूर्ण जीवन मनसिकता मे वेहोशी मे जिने बाले के लिए मृत्यु भी रहाशय डर खौफ भय का ही विषय बना रहता हैं मृत्यु तक क्युकि वो जिता भी वेहोशी मे हैं मरता भी वो वेहोशी में ही हैं,क्युकि मरते दम तक वो या तो खुद की ही मनसिकता के साथ दूसरों की मनसिकता से भी आकर्षित प्रभावित रहता हैं, खुद से निष्पक्ष समझ खुद के सक्षकार बाले के मनसिकता के भ्र्म से और खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु हो चुका होता हैं, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि अंतरिक भर्मो से मुक्त हो चुका है मुक्ति शरीर मृत्यु जन्म मरण से नहीं चाहिए सिर्फ़ एसी अवधारणा बनने बाले मन अस्थाई जटिल बुद्धि से चाहिए,मन मस्तिक की वृति हैं एक बार में एक ही दिशा में प्रभावित आकर्षित गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता बनता हैं दूसरा कुछ सोच भी नही सकता ,जैसे सपन अवस्था में जगृत का आवास तक नही होता,जगृत में मृत्यु ही सत्य हैं गंभीरता से कभी ले ही नही सकता,जिस के लिए गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता नही है उस को कैसे समझ सकता हैं, जीवन व्यापन के इलावा सिर्फ़ कल्पना को ही विस्तार देता रहता हैं जो तर्क तथ्य से सिद्ध स्पष्ट साफ हो जाती हैं उसे विज्ञान कहते हैं जो कल्पना एक से अधिक को कहानी किस्सों से बता समझा कर खुद के पक्ष में कर लेते हैं उसे दर्शनिक कहते हैं, जिने आत्मा परमात्मा जन्म मृत्यु भक्ति ध्यान ज्ञान श्रदा अस्था प्रेम विश्वास दया रेहम जैसे इमोशन ब्लैकमेल करते हैं उसे अधियत्मिक कहते हैं, जो एक जीवन व्यापन का ही श्रोत है और कुछ भी नही,जो किसी न किसी मस्तक की मनसिकता हैं जो एक रोग है, अस्तित्व से लेकर जो भी आज तक था वो सब एक मनसिकता ही थी उस व्यक्ति जिस का वो ग्रंथ पोथी पुस्तक हैं, अगर हजरों युगों पहले का बतावरण पर्यावरण हमारी ही कोशिका सहन नही कर सकती ,उस समय की मनसिकता आज विज्ञान युग की पीढ़ी पर थोपने के पीछे कट्टरता हैं, शश्वत सत्य इन बकबास को कभी स्वीकार कर ही नही सकता,अगर यह सब हैं शश्वत सत्य हो ही नही सकता,अगर कोई एसा कह रहा हैं वो सिर्फ़ खुद को ही धोखे में रख रहा,निष्पक्ष समझ और सृष्टी शरीर मनसिकता मे एक साथ कोई रह ही नही सकता ,संपूर्ण रूप से मन रहित होना ही शश्वत सत्य हैं, कोई भी हो सकता हैं सरल सहज निर्मल रहते हुय,प्रत्येक व्यक्ति सक्षम संपूर्ण हैं खुद के सक्षकार के लिए ,अगर कोई नही हो पा रहा तो वो दूसरों की और खुद की मनसिकता में भर्मित हैं, जो दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी भिन्न नही है सिर्फ़ जीवन व्यापन के लिए ही प्रयास रत हैँ,भय आहार निद्र मैथुन का कीड़ा रहते हुए श्रेष्टाता की पदबी का शौंक रखता है।
खूद का सक्षतकर सिर्फ़ खुद के लिए ही हैं, खुद के ही शरीर मन से परे हों कर निष्पक्ष समझ में रहने के लिए ही सर्थक सिद्ध होता दूसरा प्रत्येक मनसिकता में ही हैं, उस पर किसी भी प्रकार से निष्पक्ष समझ की बातों का कोई भी असर नही हो सकता क्युकि वो सिर्फ़ आस्थाई जटिल बुद्धि मन की परिधि में ही हैं, जिस की अदद पड चुकी है उसे वो यह सब सोच भी नही सकता जिस शश्वता में रहता हैं, खुद का सक्षात्कार सर्बश्रेष्ट हैं इस का उस ने कही न कही पढ़ा हैं इस लिए उस की स्पष्टाता लेने के बहनस बाते करना ,जिन बातो से ही स्पष्ट होता हैं, कि उस के भीतर चाहत तो पर वहम का शिकार हुआ हैं, जबकि भौतिक में है तो मनसिकता में ही हैं, खुद के सक्षतकार का ततपर्य ही आंतरिक भौतिक से परे सिर्फ़ निष्पक्ष समझ में, अगर जीवन व्यापन के लिए रति भर भी कुछ कर रहा हैं, तो खुद का सक्षतकर कर ही नही सकता ,वो तो खुद के शरीर के बारे में एक micro second के लिए भी नही सोच सकता तो कुछ भी कैसे कर सकता है, चाहे खुद भी करोड़ो कोशिश कर ले मेरे सिद्धांतों के आधार पर वो शश्वत वास्तविक सभाविक सत्य से खुद के सक्षतकार से समान्य व्यक्तित्व में आ ही नही सकता,जैसे समान्य व्यक्तित्व शश्वत वास्तविक सत्य के उपलक्ष में सोच भी नही सकता ,रहना या अना मनना एक मूर्खता है यही तो प्रत्यक्षता हैं शेष सब झूठ पखंड ढोंग हैं खुद ही खुद के साथ ,इस में सिर्फ़ खुद की ही स्पष्टता ही काफ़ी हैं, दूसरो की सहमती का कोइ भी ततपर्य मतलब नही हैं, दूसरों की सहमति प्रथम चरण में ही वहम का कारण है, जब खुद के ही अस्थाई जटिल बुद्धि मन रहित होना तो पल दुसरों का भी ततपर्य ही खत्म हों जाता हैं, जब खुद को ही मिटा खत्म कर दिया तो उस के लिए खुद का आस्तित्व खत्म हो गया तो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का भी अस्तित्व खत्म हो जाता हैंसिर्फ़ एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने ही खरबों अनुराइयों के साथ छल कपट धोखा करता हैं सिर्फ़ परमार्थ के नाम पर। जब के खरबों सरल सहज सच्चे भोले अनुराइ अपने अराधे गुरु के एक शब्द पे जान तक न्योश्वर करने पे भीं चुकते नहीं। उस का हर शब्द उपदेश हुक्म मानते हैं। पर बदले में क्या मिलता हैं उन्हें सिर्फ़ डर खोफ भय भरे शब्द, दस्मंश अनिवार्य, इक शब्द कटने पर नर्क भी न सहाई। जो चाहो वो सब होने का महज़ इक वहम भ्रम। अतीत की विभूतियों की महिमा,और के ग्रन्थों को हटा दो इन के आगे से तो सिर्फ़ इन ख़ुद की अकंक्षा की पूर्ति हेतु और शेष नहीं बचे गा। कभी किसी के पास अपनी थोड़ी भीं उपलब्धि है क्या किस चीज़ के अहम अंहकार से चूर है। खरबों सरल सहज लोग सच्चे अच्छे उत्तम सक्षम सर्व श्रेष्ठ है सिर्फ़ चंद बुद्धिमान शैतान शातिर बदमाश बुद्धि वाले लोगों को छोड़ कर। खरबों लोगों में सिर्फ़ ख़ुद की या किसी एक अनुराइ की कोई नर्क की भीं प्रत्यक्ष उपलब्धि है तो बात करो।मेरे सिद्धांतों के आधार पर समान्य जीवन से बिल्कुल अलग सा घटित हुआ है मेरे समस्त जीवन क्रम में। सरल सहज रहते हुए सभी मेरे अपने खून के रिश्ते नाते भीं बिल्कुल छूट गए हैं, सिर्फ़ बिल्कुल अकेला छोटी सी बेटी के साथ हूं बिना किसी भी किस्म के लड़ाई झगडे के। दूसरा बहुत ही करीबी गुरु का सच्चा नाता भीं मेरे रोम रोम में समा रम कर ऐसे कठोर शब्द के प्रहार से बहुत ही दूर हों गया हैं, जब कि गुरू के समक्ष कभी भी जुवां ही नहीं खोली, कुछ और मांगने की बात तो दूर की, कभी भी कृपा तक नहीं मांगी। फिर भी लोगो की लगाई गई शिकायतों से या पाता नहीं क्यों मुझे से नाराज़ खफा क्यों है, जब भीं समक्ष जाता हूं तो सिर्फ़ डांट फटकर के शिवाय कुछ भी नहीं मिला। जब के मैं इक ढेर का कीड़ा होते हुए अपनी हमेशा ओकात्त याद रखते हुए उन को रब से करोड़ों गुणा ऊंचा समझा और वैसा ही पाया। वो रब से भीं करोड़ों गुणा ऊंचे होते हुए, मुझे सरल सहज वृत्ति के साथ निगाहों में देखा कर भीं हिर्धे को नहीं समझ पढ़ पाय। मेरे जैसे कोई लाखों करोड़ों की भीड़ तो थी ही नहीं या फुर्सत नहीं थी ऐसा भीं बिल्कुल नहीं था। क्योंकि कोई भीं किसी के लिए समस्त जीवन समर्पित नहीं करता सिर्फ़ मैं ही था, जिस को दीक्षा के बाद से आज तक अपनी शकल शुद्ध बुद्ध नहीं है। बिल्कुल कुछ भी नहीं किया अब तक उन को याद करने के शिवाय। जब मेरे असीम प्रेम का नाम अपने गुरु के मुख से ही पागल कहना। और डांटना, झिड़कना तो ठीक नहीं लगा, ढंटने झिड़कना का उन का पूरा हक़ है पर प्यार का भीं हक़ तो सिर्फ़ उन का ही तो हैं। कम से कम पूरे जीवन क्रम में सिर्फ़ एक मुस्कराहट भरे चेहरे की ही तो चाहत थी हमरी। जब उन से भी प्रेम के उपहार में नफ़रत मिली तो ख़ुद को समझने के इलावा और कोई भी विकल्प शेष नहीं था, तब ही खुद को समझा तो शेष सारी कायनात में बचा ही नहीं कुछ और समझने को। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं और मेरे सिद्धांतों के आधार पर ख़ुद को समझने के बाद कभी दुसरे की आलोचन प्रशंसा नहीं करना चाहें गा क्योंकि यथार्थ के इलावा दूसरा शब्द भीं नहीं है। तो दुसरे की स्तुति गान महिमा का तो तत्पर्य ही नहीं रह जाता। यह सपष्ट हैं कि मेरा गुरु भीं कुछ ढूंढने की दौड़ में ही अब तक हैं। और ख़ुद को समझने के लिए ख़ुद अपनी ही बुद्धि से परे हटना पड़ता हैं तो गुरु का तात्पर्य रह जाता हैं। तब ही तो अतीत की विभूतियों के ही महिमा स्तुती करते रहते हैं। पर मेरे पास तो अब इक पल भीं नहीं दूसरों की स्तुति महिमा गाने के लिए। क्योंकि अब मैं यथार्थ हुं प्रत्यक्ष हुं। तब ही मुझे समझ नहीं सके क्योंकि मैं शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हुं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं ख़ुद में ही रहता हूं हमेशा एक ही रंग में हुं।
मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं और बुद्धिमान तो बिल्कुल भी नहीं हूं न ही कभी होना चाहता क्योंकि बुद्धिमान बहुत बड़ी कायनात में गंदी गाल हैं मेरे ही सिद्धांतों के आधार पर। इंसान हैं प्रत्यक्ष हैं यहीं काफ़ी है ख़ुद को समझने के लिए। और इस के इलावा सब कुछ पाखंड झूठ ढोंग अंध विश्वास और सिर्फ़ शैतान शातिर बुद्धि की स्मृति कोष की कल्पना के शिवाय कुछ भी नहीं बिल्कुल भी नहीं है। इंसान की फितरत का यह बहुत ही अहम हिस्सा है कि जो हैं उस को समझ कर संतुष्ट नहीं रह सकता। जो हैं ही नहीं उस को ढूंढने में युग सदियां नष्ट कर देता हैं। जैसा भीं सहज सरल है वैसा ही तो निपुण सक्षम स्मर्थ समृद्ध है सिर्फ़ अकेला ही, क्योंकि इकांत चहिए शोरो गुल नहीं, खुद को समझना है, कोई लोगों की भीड़ इकागृत कर के लोग दिखावा पाखंड नहीं। खुद को समझने में। इस के इलावा सब कुछ बनापटी हैं जो बुद्धि के साथ हैं। बुद्धिमान हो कर बुद्धि में गहनता से गुश जाता हैं, बुद्धि से बाहर तो कदापि नहीं। जब कि खुद को समझने के लिए ख़ुद की बुद्धि से ही हटना पड़ता हैं। यथार्थ में दूसरा शब्द भीं नहीं है, तो ख़ुद के इलावा दूसरा समझें बगैर यथार्थ में समझना है। जब के बुद्धि शरीर भीं दूसरा ही है, दुसरे की गिनती शुरू करें गा तो करोड़ों युगों और जन्मों तक खत्म ही नहीं होगी अतीत कि भांति और अब का एक पल नष्ट कर के पछताने का मौका भी नहीं मिले गा। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं जीवन और मनुष्य के प्रत्येक पहलु को बहुत ही ज्यादा गंभीर हों कर समझा है। सारी कायनात में सिर्फ़ तू अकेला ही हैं और ख़ुद को समझने के लिए ख़ुद ही अकेला ही निपुण सर्व श्रेष्ठ सक्षम समर्थ समृद्ध है। जब सरल सहज सी बात सरल सहज वृत्ति वाले इंसान ने गंभीर रूप से समझ ली तो बिल्कुल यथार्थ में रहने के महज़ एक कदम पिछे हैं। चाहें यह बात दूसरों की ठोकरों से समझें या विवेक चिंतन से समझें। क्योंकि प्रत्येक दुसरा सिर्फ़ तुझे अपने हित साधने तक ही सीमित समझ रहा हैं। जब आप से हित साधने की उस की अंकक्षा खत्म हों जाय गी तो तू बहुत ही बुरी तरह ठुकराया जाय गा निश्चित ही। ऐसे बुरे दौर से तू करोड़ों युगों और जन्मों से गुज़रा हुआ है अब तक और गुजरता ही रहें गा अंनत काल तक अगर अब ख़ुद को नहीं समझा तो। ख़ुद को समझें बगैर तेरा कोई भीं स्थाई रूप से टिकाना न था, न हैं न ही कभी होगा। खुद को समझें बगैर शेष सब झूठ पखण्ड ढोंग अंध विश्वास है। जब ख़ुद को समझ जाय गा। शेष कुछ रहें गा ही नहीं समझने को सारी कायनात में। क्योंकि बुद्धि से परे ही तो यथार्थ समस्त चेतन उर्जा सबरूप हैं। तो बुद्धि से ढूंढने से तो बिल्कुल भी नहीं समझने लायक। दुसरा और बुद्धि सिर्फ़ तुझे तेरे ख़ुद को समझने में रूकावट है महज़। दुसरा कोई हैं यह भ्रम वहम छल कपट हैं शीघ्र ही निकाल कर फैंक दे वर्ना तेरे ही आपने इसी भ्रम वहम के साथ ऐसा फैंके गे कि पछताने का मौका भी नहीं देगे। तेरा नामों निशा इक पल में मिटा देगे। सब को सिर्फ़ तू अपना मान रहा हैं क्योंकि तूने अपना समझा है तू मिटा हैं उन के लिए प्रत्येक अपना अनमोल पल सांस प्रेम विश्वास स्मर्पित किया है। जो यह सुनिश्चित सिर्फ़ तेरा वहम हों सकता पर उन के लिए सिर्फ़ एक फर्ज है। अपने वहम और उन के फर्ज के बीच का फ़र्क समझ और सिर्फ़ ख़ुद को समझ कर खुदा से भीं करोड़ों गुणा ऊंचा क्यों नहीं हों जाता। दूसरों को समझने के लिए ही तो करोड़ों युग लगाते हैं। ख़ुद को समझने के लिए तो सिर्फ़ इक पल भीं नहीं लगता। दूसरों और बुद्धि के शिकार से मुक्त होना ही ख़ुद को समझना है। अगर इतना ही आसान होता तो इंसान अस्तित्व के बाद आज तक कोई भी क्यों नहीं समझ पाया। क्योंकि जिस ने भीं कोई भीं उपक्रम किया है बुद्धि के साथ ही किया है। बुद्धिमान हो कर कोई बुद्धि से परे कैसे हट सकता है। यह सिर्फ़ छोटी सी उलझन थी जो करोड़ों युगों से कोई समझ ही नहीं पाया। सिर्फ़ ढूंढने की होड़ में ही व्यस्थ रहा जो यथार्थ में हैं ही नहीं। सिर्फ़ परकृति कुदरत और करोड़ों प्रजाति के जीवों को देख कर चकित होकर उन सब को जानने की ख़ोज में ही व्यस्थ रहा ख़ुद को छोड़ कर अब तक। जो महज़ बुद्धि से समझ रहा हैं, जब तक अस्थाई तत्बो की बुद्धि हैं जो महज़ शरीर का एक अंग है। जब के शरीर भीं एक दिन खत्म हों जाय गा।
ख़ुद के इलावा कुछ भी नहीं हैं समझने के लिय् खुद् की ही बुद्धि की वृति से हटना पड़ता हैं । आदि के बाद ही अनादि है, अति के बाद ही अनन्त हैं ।कुछ भी ढूंढने की जब हद खत्म हो जाती हैं तो कुछ भी नहीं मिलता तो खूद मे ही प्रिभतित् होने का विकल्प सामने आता हैं ।
जो भी करो गंभीर हो कर ही करें तो ।
बुद्धि से बुद्धिमान होने से बुद्धि की वृति मे ही सिर्फ विशेषज्ञ हो सकता हैं पर खुद को तो बिल्कुल भी नहीं समझ सकता किसी भी सिद्धांत से एक सर्व श्रेष्ठ बुद्धिमान व्यक्ति समस्त कायनात को और उस मे स्थित प्रतेक जीव को बहूत हि करीब से बहुत ही खूब समझ सकता हैं।पर खुद को तो बिल्कुल भी नहीं ।
खूद को समझने के लिए खुद की ही बुद्धि की वृति से बिल्कुल ही हटना पड़ता हैं जो इंसान या किसी भी जीव के लिए अत्यंत ही मुशिक्ल् हैँ।जब तक खूद को नहीं समझता तब तक सरल सहज इंसान को तो बिल्कुल भी नहीं समझ सकता ।मुझे किसी का भीं परिचय पूछने की जरुरत ही नहीं है क्योंकि मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त सृष्टि को समझता हूं। बहुत ख़ूब बहुत ज्यादा क़रीब से। प्रत्येक जीव और प्राकृति एक समान तत्वों और गुणों से परिपूर्ण निर्मित है। तत्वों की गुणवता को समझता हूं। जब से ख़ुद को समझा हैं करोड़ों युगों के लंबे इतिहास को जाना हैं। किसी भी चीज़ जीव सृष्टि को समझता हूं। मेरे पास इक पल भीं नहीं है कि दूसरों में उलझने के लिए क्योंकि सारी कायनात ही बुद्धि और सृष्टि में उलझी हुई ही प्रीतत होती हैं। सारी कायनात ही बुद्धि सृष्टि और शरीर के लिए ही गंभीर है। मैं यथार्थ हूं मैं जब अपने शरीर के लिए ही गंभीर नहीं क्योंकि अस्थाई तत्वों से निर्मित है। तो ज़ाहिर है कि तत्त्व रहित समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप में ही हूं। इंसान होते हुए अगर प्राकृति बुद्धि और शरीर में मौजूद और गंभीर है तो दूसरी प्रजातियों से भिन्न है ही नहीं। इंसान होने का तात्पर्य ही सिर्फ़ ख़ुद को समझना है,और यथार्थ में रहना हमेशा के लिए जीवत ही। खुद को समझें बगैर मरना। इंसान जीवन के अस्तित्व के तात्पर्य को ही नष्ट करना है। अतीत की सभी विभूतियों ने बुद्धि से ही बुद्धि सृष्टि शरीर और प्राकृति के ही इर्द गिर्द घूमते रहे और ख़ुद को बुद्धिमान समझा। जबकि इंसान होने तत्पर्य से अत्यंत दूर रहें। और ख़ुद को ही नहीं समझ पाए। प्रेम शब्द के नाम पर लुटने वाला प्रत्येक सरल सहज वृत्ति बाला इंसान होता हैं।प्रेम एक गंभीर मानसिक तनाव भरी बिमारी है। प्रेम शब्द की आड़ में ढोंग करते हैं, सिर्फ़ मैथुन की पूर्ति के लिए या स्बार्थ के लिए। अगर नहीं तो मानसिक बिमारी से गृषित हैं। दूसरा प्रत्येक अस्थाई तत्वों से निर्मित है क्या जीव या प्रकृति। जब मैं था, गुरु था ही नहीं, जब गुरु था, तब मैं खत्म था, जब मिटने के बाद भीं गुरु मुझे न समझा तो ही ख़ुद को समझा, जब खुद को समझा तब दूसरी प्रत्येक चीज़ का अस्तित्व ही समाप्त हों गया। अब ऐसा प्रतीत होता है कि एक सिर्फ़ मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। और दूसरी अस्थाई तत्वों से निर्मित प्राकृति हैं।जो सिर्फ़ अस्थाई तत्वों से निर्मित बुद्धि यंत्र तरंगों द्वारा निर्धारित नियम के आधार पर प्रत्येक जीव को संचालित कर रही हैं। मेरे सिद्धांतों के आधार पर प्रत्येक पल अनमोल निजी धरोहर हैं। जिसे किसी भी प्रकार से सिर्फ़ ख़ुद के लिए ही गंभीर हों कर प्रयोग करना चाहिए। दूसरा प्रत्येक अस्थाई तत्वों से निर्मित सिर्फ़ एक अस्थाई तत्वों से निर्मित प्राकृति का हिस्सा हैं और कुछ भी नहीं। सिर्फ़ एक मैं ही समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। शेष सब शैतान बुद्धि वाले बुद्धिमान इंसान या जीव है। जिन की बुद्धि कि स्मृति कोष कल्पना और प्रकृति ब्रह्मांड तक ही सीमित दौड़ हैं चाहें अंतरिक सफर तय कर के समझें या विज्ञानीक तर्कों से। उस से आगे कोई समझ ही नहीं सकता। बुद्धि का तात्पर्य ही कोई दूसरा या प्रकृति का संरक्षण करने के ही बुद्धि का निर्माण हुआ है। प्रकृति ने बुद्धि का निर्माण ही अपने सिद्धांत पे किया है। बुद्धि और प्रकृति के विरुद्ध कभी भी कोई जा ही नहीं सकता। अगर कोई विरुद्ध जाता हैं तो प्रकृति के भयानक प्रकोप का सामना करना पड़े गा। ख़ुद को समझने के लिए अस्थाई तत्वों से निर्मित बुद्धि और प्राकृति से हटना पड़े गा। जब कोई ख़ुद को समझ जाता हैं तो अस्थाई तत्वों की अस्थाई मौत वृति के चक्र क्रम से मुक्त हो जाता हैं। और समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप में हमेशा के लिए हों जाता हैं। कोई भी सरल सहज वृत्ति बाला इंसान जीवत ही थोडा सा प्रयास कर के ख़ुद को समझ कर यथार्थ में रह सकता हैं। मेरे सिद्धांत भक्ति गुरु प्रत्येक दूसरी चीज़ का अस्तित्व ही नहीं समझते,और खंडन कर के झुटलते हैं। भक्ति योग साधना सूरत ध्यान धर्म मज़हब संगठन गुरु बावे यह सब एक ढोंग अंध विश्वास पाखंड झूठ कट्टरता फैलाने के सिर्फ़ आयम स्थापित कर रखें हैं। जो राष्ट के लिए एक दिन गातिक सिद्ध हों सकते हैं जब यह बडे़ संगठन का रूप ले लेते हैं। किसी भी राष्ट के अध्यक्ष को अपने राष्ट के हित के लिए यह बाते हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि प्रथम चरण में राष्ट ही श्रेष्ठ है। शेष सब दूसरी चीज़ है। कोई भी संगठन संस्थान सौ सदस्य की संख्या से अधिक न हो। जाति धर्म मज़हब के स्थान पर सिर्फ़ राष्ट की ही पूजा भक्ति प्रेम हों। समस्त संसार ब्रह्मांड का प्रत्येक राष्ट सदस्य या परिवार हों। जहां जाति धर्म मज़हब की दुर्गन्ध होगी बहा ही कटरता की गंदी माखियां भिन भिनाय गी। जो एक दिन बहुत ज्यादा भ्यानक खतरनक सिद्ध होगी। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। मैं अस्थाई तत्वों से रहित हूं। मैं अस्थाई तत्वों से निर्मित देह में विदेही हूं। मैं प्रत्येक अस्थाई तत्व से परे हूं। शरीर प्रकृति का हिस्सा हैं क्योंकि दोनों ही अस्थाई तत्वों से निर्मित है। प्रत्येक बुद्धि बाला बुद्धिमान व्यक्ति समस्त सृष्टि प्रकृति को बहुत अच्छे से जानता है। प्रत्येक व्यक्ति सारे ब्रह्मांड को समझने की क्षमता रखता है। बुद्धि समस्त सृष्टि को समझने की अनुमति दे देती हैं पर ख़ुद को समझने की अनुमति नहीं देती। किसी भी प्रकार से चाहें करोड़ों युगों तक कोई करोड़ों यत्न प्रयत्न प्रयास कर के देख ले। खुद को समझने के लिए ख़ुद की ही बुद्धि की प्रत्येक वृति से हटना पड़ता हैं।
अतीत के चार युगों से खरबों गुन्ना ऊंचा सचा सर्ब श्रेष्ट प्रत्यक्ष समक्ष अद्धभुद तुलनतित शव्दतीत कळतीत प्रेमतित श्रेष्टाता संग्रता शश्वत वास्तविक सभाविक सत्य ,जो सिर्फ़ मेरे यथार्थ सिद्धांत के शमीकरण निष्पक्ष समझ पर आधरित हैं, जिस में प्रथम चरण में ही खुद के सक्षतकर से शुरु खुद के हीं अंनत शुक्षम अक्ष में समाहित हो जाता हैं यहा खुद के अंनत शुक्षम अक्ष के प्रतिभिंव का भी स्थान नही हैं और कुछ होने का ततपर्य ही नहीं हैं, "खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाय सदियां युग भी कम है"
 अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का स्तर 99.999% का हैं उस को समझने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि का स्तर भी इतना ही जबकि अंनत शुक्षम अक्ष की प्रतिभिंवता का .0001% है जिस के बिना सम्पूर्णता असंभव है, जिस से मनवता का संपूर्ण होना होता हैं, अगर यह सब नही हैं तो मनव होते हुय भी मनसिकता में हैं जो एक रोग है, सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति ही जीवन व्यापन के लिए ही संघर्षरत है या फ़िर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत बेग में ही हैं, ततपर्य हर पहलु से मनसिकता में ही दृढ़ता गंभीरत हैं, खुद के सक्षतकर से इतना ही दूर हैं जितनी दूसरी अनेक प्रजातिय ,रति भर भी उन से भिन्न नही हैं
खुद के सक्षतकार के बिना अधिात्मिक परमार्थ की बाते सिर्फ़ एक ढोंग पखंड षढियंत्रों का ताना भाना हैं खुद की इच्छा आपूर्ति प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत बेग और दूसरे अनेक सरल सहज निर्मल लोगों को नर्क का डर और स्वर्ग का लालच दिखा कर आकर्षित प्रभावित कर अंध भक्तों भेड़ो की भिड़ इकठ्ठी करना जिन को दीक्षा के साथ ही शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से बंचित कर कट्टर बना कर संपूर्ण जीबन भर बन्दुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करना खुद के हित साधने के लिए,मनोविज्ञनिक दास्ता करवाना न्ययैक उपरध हैं कुप्रथा फैलाना,जो तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से सिद्ध न हो वो ढोंग पखंड हैं

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