शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

खूद का सक्षतकार

सत्य को स्वीकार न करना,खुद ही खुद को धोखा देना है, खुद ही खुद से गदारी ,खुद ही खुद से ढोंग करना,जो खुद ही खुद के परिचय से परिचित नहीं हो सकता,वो दूसरे को क्या दे सकता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझा पाय सदिय युग भी कम है, गुरु तो हर युग काल में थे अगर वों कुछ कर पाते तो शयद आज इस गदी दुनीय मे कभी न होते,जिनके भरोसे पर हम हैं उनको खुद पर ही भरोसा नही है, समय और लाभ को देखते हुए वो पल पल रंग और किरदार बदल रहे हैं, जो कुछ ढूंढने की फ़ितरत के साथ ते वो तो संपूर्ण जीवन में खुद के स्वरूप से रुवरू नही हुय वो दुसरो के लिए क्या कर सकते है, वो कहा तक पहुंच रखते हैं, वो तो हर बात हर प्रवचन में बता रहे हैं, थोड़ा ध्यान से सुनो और उस पर चिंतन तो करो ,खुद ही स्पष्ट हों जता है, गुरु लोग तो अतीत की मन्यता परम्परा को नियम मर्यादा को स्थापित करने की वृति के होते हैं जो शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कट्टर भेडो की भिड़ त्यार कर देते हैं जो सिर्फ़ एक मनसिकता हैं, भवक करने बाली साथ मे कपनिक कहानीय जोड़ देते हैं रब और खुद का डर खौफ स्वर्ग अमर लौक परमपुरष का लालच जोड़ देते हैं, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ि स्थापित करते हैं। मेरे गुरु के 25 लख अनुराई हैं जो गुरु के एक शव्द पर मर मिटने को हमेशा त्यार रहते है, तर्क तथ्य विवेक से रहित हैं, जो एक कुप्रथा है, लालच खौफ के तले जिने बाला और रखने वाला दोनो ही एक ही थाली के चटे बटे होते हैं, गुरु प्रसिद्धि प्रतिष्ठा अहंकर शौहरत दौलत वेग के नशे मे ही जिता हैं और उसी में मर जाता हैं, वेहोशी मे जीना और वेहोशी मे ही मरना सिर्फ़ मनसिकता हैं, और कुछ भी नही है, गुरु को सत्य से कोई मतलब नही है वो प्रवचन में बही बाते कहनीयन सुनाता है ,जो शिष्यों को पसंद या फ़िर जिन के आदि हुय हैं, क्युकि वो खुद भी किसी गुरु का शिष्य रहा हैं जो गुरु मर्यादा के खिलफ़ नही जा सकता,क्युकि खुद भी दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में बंदा होता हैं, यही मनसिकता हैं
[05/12, 10:13 am] Rampaulsaini: मनसिकता और खुद के सक्षात्कार में जमीं अस्मा का अंतर है, मनसिकता का स्रोत 99.999% जो अस्थाईत पर ही निर्भर और इस को ही आकर्षित प्रभावित करता है हमेशा जो सिर्फ़ जीवन व्यापन तक ही सिमित है उस से अतिरिक्त प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग में ही संपूर्ण रूप से भर्मित होना,
खुद के सक्षतकर में एसा बिल्कुल भी नही है संपूर्ण रूप से अस्थाई जटिल बुद्धि मन की निष्किरीता के बाद का आलम हैं जो खुद के शरीर बुद्धि सृष्टि के अस्तित्व खत्म करने के उपरन्त का विषय है, जैसे स्वप्न अवस्था जग्रत अवस्था,सम्पूर्णता से एक ही पहलु पे होती हैं उस पल के लिए,जैसे कोई सपन अवस्था में होता हैं उस पल या उस दोहरान जगृत अवस्था का अबास भी नहीं होता,जागृत अवस्था में सपन अवस्था की कल्पना भी नही कर सकते,इसी प्रकार बिना मृत्यु की प्रत्यक्षता के उस परम सत्य मृत्यु की कल्पना तक भी नही कर सकते ,इस करण मौत मृत्यु को डर खौफ भय भरा बतायगया हैँ,जबकि एसा बिल्कूल भी नहीं हैं, मृत्यु परम संतुष्टि का वो क्षण पल हैं जिस की कोई कल्पना तक नही कर सकता,संपूर्ण जीवन मनसिकता मे वेहोशी मे जिने बाले के लिए मृत्यु भी रहाशय डर खौफ भय का ही विषय बना रहता हैं मृत्यु तक क्युकि वो जिता भी वेहोशी मे हैं मरता भी वो वेहोशी में ही हैं,क्युकि मरते दम तक वो या तो खुद की ही मनसिकता के साथ दूसरों की मनसिकता से भी आकर्षित प्रभावित रहता हैं, खुद से निष्पक्ष समझ खुद के सक्षकार बाले के मनसिकता के भ्र्म से और खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु हो चुका होता हैं, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि अंतरिक भर्मो से मुक्त हो चुका है मुक्ति शरीर मृत्यु जन्म मरण से नहीं चाहिए सिर्फ़ एसी अवधारणा बनने बाले मन अस्थाई जटिल बुद्धि से चाहिए,मन मस्तिक की वृति हैं एक बार में एक ही दिशा में प्रभावित आकर्षित गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता बनता हैं दूसरा कुछ सोच भी नही सकता ,जैसे सपन अवस्था में जगृत का आवास तक नही होता,जगृत में मृत्यु ही सत्य हैं गंभीरता से कभी ले ही नही सकता,जिस के लिए गंभीरता दृढ़ता प्रत्यक्षता नही है उस को कैसे समझ सकता हैं, जीवन व्यापन के इलावा सिर्फ़ कल्पना को ही विस्तार देता रहता हैं जो तर्क तथ्य से सिद्ध स्पष्ट साफ हो जाती हैं उसे विज्ञान कहते हैं जो कल्पना एक से अधिक को कहानी किस्सों से बता समझा कर खुद के पक्ष में कर लेते हैं उसे दर्शनिक कहते हैं, जिने आत्मा परमात्मा जन्म मृत्यु भक्ति ध्यान ज्ञान श्रदा अस्था प्रेम विश्वास दया रेहम जैसे इमोशन ब्लैकमेल करते हैं उसे अधियत्मिक कहते हैं, जो एक जीवन व्यापन का ही श्रोत है और कुछ भी नही,जो किसी न किसी मस्तक की मनसिकता हैं जो एक रोग है, अस्तित्व से लेकर जो भी आज तक था वो सब एक मनसिकता ही थी उस व्यक्ति जिस का वो ग्रंथ पोथी पुस्तक हैं, अगर हजरों युगों पहले का बतावरण पर्यावरण हमारी ही कोशिका सहन नही कर सकती ,उस समय की मनसिकता आज विज्ञान युग की पीढ़ी पर थोपने के पीछे कट्टरता हैं, शश्वत सत्य इन बकबास को कभी स्वीकार कर ही नही सकता,अगर यह सब हैं शश्वत सत्य हो ही नही सकता,अगर कोई एसा कह रहा हैं वो सिर्फ़ खुद को ही धोखे में रख रहा,निष्पक्ष समझ और सृष्टी शरीर मनसिकता मे एक साथ कोई रह ही नही सकता ,संपूर्ण रूप से मन रहित होना ही शश्वत सत्य हैं, कोई भी हो सकता हैं सरल सहज निर्मल रहते हुय,प्रत्येक व्यक्ति सक्षम संपूर्ण हैं खुद के सक्षकार के लिए ,अगर कोई नही हो पा रहा तो वो दूसरों की और खुद की मनसिकता में भर्मित हैं, जो दूसरी अनेक प्रजातियों से रति भर भी भिन्न नही है सिर्फ़ जीवन व्यापन के लिए ही प्रयास रत हैँ,भय आहार निद्र मैथुन का कीड़ा रहते हुए श्रेष्टाता की पदबी का शौंक रखता है।
[06/12, 8:17 am] Rampaulsaini: खूद का सक्षतकर सिर्फ़ खुद के लिए ही हैं, खुद के ही शरीर मन से परे हों कर निष्पक्ष समझ में रहने के लिए ही सर्थक सिद्ध होता दूसरा प्रत्येक मनसिकता में ही हैं, उस पर किसी भी प्रकार से निष्पक्ष समझ की बातों का कोई भी असर नही हो सकता क्युकि वो सिर्फ़ आस्थाई जटिल बुद्धि मन की परिधि में ही हैं, जिस की अदद पड चुकी है उसे वो यह सब सोच भी नही सकता जिस शश्वता में रहता हैं, खुद का सक्षात्कार सर्बश्रेष्ट हैं इस का उस ने कही न कही पढ़ा हैं इस लिए उस की स्पष्टाता लेने के बहनस बाते करना ,जिन बातो से ही स्पष्ट होता हैं, कि उस के भीतर चाहत तो पर वहम का शिकार हुआ हैं, जबकि भौतिक में है तो मनसिकता में ही हैं, खुद के सक्षतकार का ततपर्य ही आंतरिक भौतिक से परे सिर्फ़ निष्पक्ष समझ में, अगर जीवन व्यापन के लिए रति भर भी कुछ कर रहा हैं, तो खुद का सक्षतकर कर ही नही सकता ,वो तो खुद के शरीर के बारे में एक micro second के लिए भी नही सोच सकता तो कुछ भी कैसे कर सकता है, चाहे खुद भी करोड़ो कोशिश कर ले मेरे सिद्धांतों के आधार पर वो शश्वत वास्तविक सभाविक सत्य से खुद के सक्षतकार से समान्य व्यक्तित्व में आ ही नही सकता,जैसे समान्य व्यक्तित्व शश्वत वास्तविक सत्य के उपलक्ष में सोच भी नही सकता ,रहना या अना मनना एक मूर्खता है यही तो प्रत्यक्षता हैं शेष सब झूठ पखंड ढोंग हैं खुद ही खुद के साथ ,इस में सिर्फ़ खुद की ही स्पष्टता ही काफ़ी हैं, दूसरो की सहमती का कोइ भी ततपर्य मतलब नही हैं, दूसरों की सहमति प्रथम चरण में ही वहम का कारण है, जब खुद के ही अस्थाई जटिल बुद्धि मन रहित होना तो पल दुसरों का भी ततपर्य ही खत्म हों जाता हैं, जब खुद को ही मिटा खत्म कर दिया तो उस के लिए खुद का आस्तित्व खत्म हो गया तो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का भी अस्तित्व खत्म हो जाता हैं
[12/12, 8:22 am] Rampaulsaini: सिर्फ़ एक बुद्धिमान व्यक्ति अपने ही खरबों अनुराइयों के साथ छल कपट धोखा करता हैं सिर्फ़ परमार्थ के नाम पर। जब के खरबों सरल सहज सच्चे भोले अनुराइ अपने अराधे गुरु के एक शब्द पे जान तक न्योश्वर करने पे भीं चुकते नहीं। उस का हर शब्द उपदेश हुक्म मानते हैं। पर बदले में क्या मिलता हैं उन्हें सिर्फ़ डर खोफ भय भरे शब्द, दस्मंश अनिवार्य, इक शब्द कटने पर नर्क भी न सहाई। जो चाहो वो सब होने का महज़ इक वहम भ्रम। अतीत की विभूतियों की महिमा,और के ग्रन्थों को हटा दो इन के आगे से तो सिर्फ़ इन ख़ुद की अकंक्षा की पूर्ति हेतु और शेष नहीं बचे गा। कभी किसी के पास अपनी थोड़ी भीं उपलब्धि है क्या किस चीज़ के अहम अंहकार से चूर है। खरबों सरल सहज लोग सच्चे अच्छे उत्तम सक्षम सर्व श्रेष्ठ है सिर्फ़ चंद बुद्धिमान शैतान शातिर बदमाश बुद्धि वाले लोगों को छोड़ कर। खरबों लोगों में सिर्फ़ ख़ुद की या किसी एक अनुराइ की कोई नर्क की भीं प्रत्यक्ष उपलब्धि है तो बात करो।मेरे सिद्धांतों के आधार पर समान्य जीवन से बिल्कुल अलग सा घटित हुआ है मेरे समस्त जीवन क्रम में। सरल सहज रहते हुए सभी मेरे अपने खून के रिश्ते नाते भीं बिल्कुल छूट गए हैं, सिर्फ़ बिल्कुल अकेला छोटी सी बेटी के साथ हूं बिना किसी भी किस्म के लड़ाई झगडे के। दूसरा बहुत ही करीबी गुरु का सच्चा नाता भीं मेरे रोम रोम में समा रम कर ऐसे कठोर शब्द के प्रहार से बहुत ही दूर हों गया हैं, जब कि गुरू के समक्ष कभी भी जुवां ही नहीं खोली, कुछ और मांगने की बात तो दूर की, कभी भी कृपा तक नहीं मांगी। फिर भी लोगो की लगाई गई शिकायतों से या पाता नहीं क्यों मुझे से नाराज़ खफा क्यों है, जब भीं समक्ष जाता हूं तो सिर्फ़ डांट फटकर के शिवाय कुछ भी नहीं मिला। जब के मैं इक ढेर का कीड़ा होते हुए अपनी हमेशा ओकात्त याद रखते हुए उन को रब से करोड़ों गुणा ऊंचा समझा और वैसा ही पाया। वो रब से भीं करोड़ों गुणा ऊंचे होते हुए, मुझे सरल सहज वृत्ति के साथ निगाहों में देखा कर भीं हिर्धे को नहीं समझ पढ़ पाय। मेरे जैसे कोई लाखों करोड़ों की भीड़ तो थी ही नहीं या फुर्सत नहीं थी ऐसा भीं बिल्कुल नहीं था। क्योंकि कोई भीं किसी के लिए समस्त जीवन समर्पित नहीं करता सिर्फ़ मैं ही था, जिस को दीक्षा के बाद से आज तक अपनी शकल शुद्ध बुद्ध नहीं है। बिल्कुल कुछ भी नहीं किया अब तक उन को याद करने के शिवाय। जब मेरे असीम प्रेम का नाम अपने गुरु के मुख से ही पागल कहना। और डांटना, झिड़कना तो ठीक नहीं लगा, ढंटने झिड़कना का उन का पूरा हक़ है पर प्यार का भीं हक़ तो सिर्फ़ उन का ही तो हैं। कम से कम पूरे जीवन क्रम में सिर्फ़ एक मुस्कराहट भरे चेहरे की ही तो चाहत थी हमरी। जब उन से भी प्रेम के उपहार में नफ़रत मिली तो ख़ुद को समझने के इलावा और कोई भी विकल्प शेष नहीं था, तब ही खुद को समझा तो शेष सारी कायनात में बचा ही नहीं कुछ और समझने को। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं और मेरे सिद्धांतों के आधार पर ख़ुद को समझने के बाद कभी दुसरे की आलोचन प्रशंसा नहीं करना चाहें गा क्योंकि यथार्थ के इलावा दूसरा शब्द भीं नहीं है। तो दुसरे की स्तुति गान महिमा का तो तत्पर्य ही नहीं रह जाता। यह सपष्ट हैं कि मेरा गुरु भीं कुछ ढूंढने की दौड़ में ही अब तक हैं। और ख़ुद को समझने के लिए ख़ुद अपनी ही बुद्धि से परे हटना पड़ता हैं तो गुरु का तात्पर्य रह जाता हैं। तब ही तो अतीत की विभूतियों के ही महिमा स्तुती करते रहते हैं। पर मेरे पास तो अब इक पल भीं नहीं दूसरों की स्तुति महिमा गाने के लिए। क्योंकि अब मैं यथार्थ हुं प्रत्यक्ष हुं। तब ही मुझे समझ नहीं सके क्योंकि मैं शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हुं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं ख़ुद में ही रहता हूं हमेशा एक ही रंग में हुं।
[12/12, 8:22 am] Rampaulsaini: मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं और बुद्धिमान तो बिल्कुल भी नहीं हूं न ही कभी होना चाहता क्योंकि बुद्धिमान बहुत बड़ी कायनात में गंदी गाल हैं मेरे ही सिद्धांतों के आधार पर। इंसान हैं प्रत्यक्ष हैं यहीं काफ़ी है ख़ुद को समझने के लिए। और इस के इलावा सब कुछ पाखंड झूठ ढोंग अंध विश्वास और सिर्फ़ शैतान शातिर बुद्धि की स्मृति कोष की कल्पना के शिवाय कुछ भी नहीं बिल्कुल भी नहीं है। इंसान की फितरत का यह बहुत ही अहम हिस्सा है कि जो हैं उस को समझ कर संतुष्ट नहीं रह सकता। जो हैं ही नहीं उस को ढूंढने में युग सदियां नष्ट कर देता हैं। जैसा भीं सहज सरल है वैसा ही तो निपुण सक्षम स्मर्थ समृद्ध है सिर्फ़ अकेला ही, क्योंकि इकांत चहिए शोरो गुल नहीं, खुद को समझना है, कोई लोगों की भीड़ इकागृत कर के लोग दिखावा पाखंड नहीं। खुद को समझने में। इस के इलावा सब कुछ बनापटी हैं जो बुद्धि के साथ हैं। बुद्धिमान हो कर बुद्धि में गहनता से गुश जाता हैं, बुद्धि से बाहर तो कदापि नहीं। जब कि खुद को समझने के लिए ख़ुद की बुद्धि से ही हटना पड़ता हैं। यथार्थ में दूसरा शब्द भीं नहीं है, तो ख़ुद के इलावा दूसरा समझें बगैर यथार्थ में समझना है। जब के बुद्धि शरीर भीं दूसरा ही है, दुसरे की गिनती शुरू करें गा तो करोड़ों युगों और जन्मों तक खत्म ही नहीं होगी अतीत कि भांति और अब का एक पल नष्ट कर के पछताने का मौका भी नहीं मिले गा। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं जीवन और मनुष्य के प्रत्येक पहलु को बहुत ही ज्यादा गंभीर हों कर समझा है। सारी कायनात में सिर्फ़ तू अकेला ही हैं और ख़ुद को समझने के लिए ख़ुद ही अकेला ही निपुण सर्व श्रेष्ठ सक्षम समर्थ समृद्ध है। जब सरल सहज सी बात सरल सहज वृत्ति वाले इंसान ने गंभीर रूप से समझ ली तो बिल्कुल यथार्थ में रहने के महज़ एक कदम पिछे हैं। चाहें यह बात दूसरों की ठोकरों से समझें या विवेक चिंतन से समझें। क्योंकि प्रत्येक दुसरा सिर्फ़ तुझे अपने हित साधने तक ही सीमित समझ रहा हैं। जब आप से हित साधने की उस की अंकक्षा खत्म हों जाय गी तो तू बहुत ही बुरी तरह ठुकराया जाय गा निश्चित ही। ऐसे बुरे दौर से तू करोड़ों युगों और जन्मों से गुज़रा हुआ है अब तक और गुजरता ही रहें गा अंनत काल तक अगर अब ख़ुद को नहीं समझा तो। ख़ुद को समझें बगैर तेरा कोई भीं स्थाई रूप से टिकाना न था, न हैं न ही कभी होगा। खुद को समझें बगैर शेष सब झूठ पखण्ड ढोंग अंध विश्वास है। जब ख़ुद को समझ जाय गा। शेष कुछ रहें गा ही नहीं समझने को सारी कायनात में। क्योंकि बुद्धि से परे ही तो यथार्थ समस्त चेतन उर्जा सबरूप हैं। तो बुद्धि से ढूंढने से तो बिल्कुल भी नहीं समझने लायक। दुसरा और बुद्धि सिर्फ़ तुझे तेरे ख़ुद को समझने में रूकावट है महज़। दुसरा कोई हैं यह भ्रम वहम छल कपट हैं शीघ्र ही निकाल कर फैंक दे वर्ना तेरे ही आपने इसी भ्रम वहम के साथ ऐसा फैंके गे कि पछताने का मौका भी नहीं देगे। तेरा नामों निशा इक पल में मिटा देगे। सब को सिर्फ़ तू अपना मान रहा हैं क्योंकि तूने अपना समझा है तू मिटा हैं उन के लिए प्रत्येक अपना अनमोल पल सांस प्रेम विश्वास स्मर्पित किया है। जो यह सुनिश्चित सिर्फ़ तेरा वहम हों सकता पर उन के लिए सिर्फ़ एक फर्ज है। अपने वहम और उन के फर्ज के बीच का फ़र्क समझ और सिर्फ़ ख़ुद को समझ कर खुदा से भीं करोड़ों गुणा ऊंचा क्यों नहीं हों जाता। दूसरों को समझने के लिए ही तो करोड़ों युग लगाते हैं। ख़ुद को समझने के लिए तो सिर्फ़ इक पल भीं नहीं लगता। दूसरों और बुद्धि के शिकार से मुक्त होना ही ख़ुद को समझना है। अगर इतना ही आसान होता तो इंसान अस्तित्व के बाद आज तक कोई भी क्यों नहीं समझ पाया। क्योंकि जिस ने भीं कोई भीं उपक्रम किया है बुद्धि के साथ ही किया है। बुद्धिमान हो कर कोई बुद्धि से परे कैसे हट सकता है। यह सिर्फ़ छोटी सी उलझन थी जो करोड़ों युगों से कोई समझ ही नहीं पाया। सिर्फ़ ढूंढने की होड़ में ही व्यस्थ रहा जो यथार्थ में हैं ही नहीं। सिर्फ़ परकृति कुदरत और करोड़ों प्रजाति के जीवों को देख कर चकित होकर उन सब को जानने की ख़ोज में ही व्यस्थ रहा ख़ुद को छोड़ कर अब तक। जो महज़ बुद्धि से समझ रहा हैं, जब तक अस्थाई तत्बो की बुद्धि हैं जो महज़ शरीर का एक अंग है। जब के शरीर भीं एक दिन खत्म हों जाय गा।
[12/12, 8:23 am] Rampaulsaini: ख़ुद के इलावा कुछ भी नहीं हैं समझने के लिय् खुद् की ही बुद्धि की वृति से हटना पड़ता हैं । आदि के बाद ही अनादि है, अति के बाद ही अनन्त हैं ।कुछ भी ढूंढने की जब हद खत्म हो जाती हैं तो कुछ भी नहीं मिलता तो खूद मे ही प्रिभतित् होने का विकल्प सामने आता हैं ।
जो भी करो गंभीर हो कर ही करें तो ।
बुद्धि से बुद्धिमान होने से बुद्धि की वृति मे ही सिर्फ विशेषज्ञ हो सकता हैं पर खुद को तो बिल्कुल भी नहीं समझ सकता किसी भी सिद्धांत से एक सर्व श्रेष्ठ बुद्धिमान व्यक्ति समस्त कायनात को और उस मे स्थित प्रतेक जीव को बहूत हि करीब से बहुत ही खूब समझ सकता हैं।पर खुद को तो बिल्कुल भी नहीं ।
खूद को समझने के लिए खुद की ही बुद्धि की वृति से बिल्कुल ही हटना पड़ता हैं जो इंसान या किसी भी जीव के लिए अत्यंत ही मुशिक्ल् हैँ।जब तक खूद को नहीं समझता तब तक सरल सहज इंसान को तो बिल्कुल भी नहीं समझ सकता ।मुझे किसी का भीं परिचय पूछने की जरुरत ही नहीं है क्योंकि मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त सृष्टि को समझता हूं। बहुत ख़ूब बहुत ज्यादा क़रीब से। प्रत्येक जीव और प्राकृति एक समान तत्वों और गुणों से परिपूर्ण निर्मित है। तत्वों की गुणवता को समझता हूं। जब से ख़ुद को समझा हैं करोड़ों युगों के लंबे इतिहास को जाना हैं। किसी भी चीज़ जीव सृष्टि को समझता हूं। मेरे पास इक पल भीं नहीं है कि दूसरों में उलझने के लिए क्योंकि सारी कायनात ही बुद्धि और सृष्टि में उलझी हुई ही प्रीतत होती हैं। सारी कायनात ही बुद्धि सृष्टि और शरीर के लिए ही गंभीर है। मैं यथार्थ हूं मैं जब अपने शरीर के लिए ही गंभीर नहीं क्योंकि अस्थाई तत्वों से निर्मित है। तो ज़ाहिर है कि तत्त्व रहित समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप में ही हूं। इंसान होते हुए अगर प्राकृति बुद्धि और शरीर में मौजूद और गंभीर है तो दूसरी प्रजातियों से भिन्न है ही नहीं। इंसान होने का तात्पर्य ही सिर्फ़ ख़ुद को समझना है,और यथार्थ में रहना हमेशा के लिए जीवत ही। खुद को समझें बगैर मरना। इंसान जीवन के अस्तित्व के तात्पर्य को ही नष्ट करना है। अतीत की सभी विभूतियों ने बुद्धि से ही बुद्धि सृष्टि शरीर और प्राकृति के ही इर्द गिर्द घूमते रहे और ख़ुद को बुद्धिमान समझा। जबकि इंसान होने तत्पर्य से अत्यंत दूर रहें। और ख़ुद को ही नहीं समझ पाए। प्रेम शब्द के नाम पर लुटने वाला प्रत्येक सरल सहज वृत्ति बाला इंसान होता हैं।प्रेम एक गंभीर मानसिक तनाव भरी बिमारी है। प्रेम शब्द की आड़ में ढोंग करते हैं, सिर्फ़ मैथुन की पूर्ति के लिए या स्बार्थ के लिए। अगर नहीं तो मानसिक बिमारी से गृषित हैं। दूसरा प्रत्येक अस्थाई तत्वों से निर्मित है क्या जीव या प्रकृति। जब मैं था, गुरु था ही नहीं, जब गुरु था, तब मैं खत्म था, जब मिटने के बाद भीं गुरु मुझे न समझा तो ही ख़ुद को समझा, जब खुद को समझा तब दूसरी प्रत्येक चीज़ का अस्तित्व ही समाप्त हों गया। अब ऐसा प्रतीत होता है कि एक सिर्फ़ मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। और दूसरी अस्थाई तत्वों से निर्मित प्राकृति हैं।जो सिर्फ़ अस्थाई तत्वों से निर्मित बुद्धि यंत्र तरंगों द्वारा निर्धारित नियम के आधार पर प्रत्येक जीव को संचालित कर रही हैं। मेरे सिद्धांतों के आधार पर प्रत्येक पल अनमोल निजी धरोहर हैं। जिसे किसी भी प्रकार से सिर्फ़ ख़ुद के लिए ही गंभीर हों कर प्रयोग करना चाहिए। दूसरा प्रत्येक अस्थाई तत्वों से निर्मित सिर्फ़ एक अस्थाई तत्वों से निर्मित प्राकृति का हिस्सा हैं और कुछ भी नहीं। सिर्फ़ एक मैं ही समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। शेष सब शैतान बुद्धि वाले बुद्धिमान इंसान या जीव है। जिन की बुद्धि कि स्मृति कोष कल्पना और प्रकृति ब्रह्मांड तक ही सीमित दौड़ हैं चाहें अंतरिक सफर तय कर के समझें या विज्ञानीक तर्कों से। उस से आगे कोई समझ ही नहीं सकता। बुद्धि का तात्पर्य ही कोई दूसरा या प्रकृति का संरक्षण करने के ही बुद्धि का निर्माण हुआ है। प्रकृति ने बुद्धि का निर्माण ही अपने सिद्धांत पे किया है। बुद्धि और प्रकृति के विरुद्ध कभी भी कोई जा ही नहीं सकता। अगर कोई विरुद्ध जाता हैं तो प्रकृति के भयानक प्रकोप का सामना करना पड़े गा। ख़ुद को समझने के लिए अस्थाई तत्वों से निर्मित बुद्धि और प्राकृति से हटना पड़े गा। जब कोई ख़ुद को समझ जाता हैं तो अस्थाई तत्वों की अस्थाई मौत वृति के चक्र क्रम से मुक्त हो जाता हैं। और समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप में हमेशा के लिए हों जाता हैं। कोई भी सरल सहज वृत्ति बाला इंसान जीवत ही थोडा सा प्रयास कर के ख़ुद को समझ कर यथार्थ में रह सकता हैं। मेरे सिद्धांत भक्ति गुरु प्रत्येक दूसरी चीज़ का अस्तित्व ही नहीं समझते,और खंडन कर के झुटलते हैं। भक्ति योग साधना सूरत ध्यान धर्म मज़हब संगठन गुरु बावे यह सब एक ढोंग अंध विश्वास पाखंड झूठ कट्टरता फैलाने के सिर्फ़ आयम स्थापित कर रखें हैं। जो राष्ट के लिए एक दिन गातिक सिद्ध हों सकते हैं जब यह बडे़ संगठन का रूप ले लेते हैं। किसी भी राष्ट के अध्यक्ष को अपने राष्ट के हित के लिए यह बाते हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि प्रथम चरण में राष्ट ही श्रेष्ठ है। शेष सब दूसरी चीज़ है। कोई भी संगठन संस्थान सौ सदस्य की संख्या से अधिक न हो। जाति धर्म मज़हब के स्थान पर सिर्फ़ राष्ट की ही पूजा भक्ति प्रेम हों। समस्त संसार ब्रह्मांड का प्रत्येक राष्ट सदस्य या परिवार हों। जहां जाति धर्म मज़हब की दुर्गन्ध होगी बहा ही कटरता की गंदी माखियां भिन भिनाय गी। जो एक दिन बहुत ज्यादा भ्यानक खतरनक सिद्ध होगी। मैं यथार्थ हूं प्रत्यक्ष हुं समस्त शुद्ध चेतन उर्जा स्वरूप हूं। मैं अस्थाई तत्वों से रहित हूं। मैं अस्थाई तत्वों से निर्मित देह में विदेही हूं। मैं प्रत्येक अस्थाई तत्व से परे हूं। शरीर प्रकृति का हिस्सा हैं क्योंकि दोनों ही अस्थाई तत्वों से निर्मित है। प्रत्येक बुद्धि बाला बुद्धिमान व्यक्ति समस्त सृष्टि प्रकृति को बहुत अच्छे से जानता है। प्रत्येक व्यक्ति सारे ब्रह्मांड को समझने की क्षमता रखता है। बुद्धि समस्त सृष्टि को समझने की अनुमति दे देती हैं पर ख़ुद को समझने की अनुमति नहीं देती। किसी भी प्रकार से चाहें करोड़ों युगों तक कोई करोड़ों यत्न प्रयत्न प्रयास कर के देख ले। खुद को समझने के लिए ख़ुद की ही बुद्धि की प्रत्येक वृति से हटना पड़ता हैं।
[15/12, 8:52 pm] Rampaulsaini: अतीत के चार युगों से खरबों गुन्ना ऊंचा सचा सर्ब श्रेष्ट प्रत्यक्ष समक्ष अद्धभुद तुलनतित शव्दतीत कळतीत प्रेमतित श्रेष्टाता संग्रता शश्वत वास्तविक सभाविक सत्य ,जो सिर्फ़ मेरे यथार्थ सिद्धांत के शमीकरण निष्पक्ष समझ पर आधरित हैं, जिस में प्रथम चरण में ही खुद के सक्षतकर से शुरु खुद के हीं अंनत शुक्षम अक्ष में समाहित हो जाता हैं यहा खुद के अंनत शुक्षम अक्ष के प्रतिभिंव का भी स्थान नही हैं और कुछ होने का ततपर्य ही नहीं हैं, "खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाय सदियां युग भी कम है"
[17/12, 7:46 am] Rampaulsaini: अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का स्तर 99.999% का हैं उस को समझने बाली अस्थाई जटिल बुद्धि का स्तर भी इतना ही जबकि अंनत शुक्षम अक्ष की प्रतिभिंवता का .0001% है जिस के बिना सम्पूर्णता असंभव है, जिस से मनवता का संपूर्ण होना होता हैं, अगर यह सब नही हैं तो मनव होते हुय भी मनसिकता में हैं जो एक रोग है, सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति ही जीवन व्यापन के लिए ही संघर्षरत है या फ़िर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत बेग में ही हैं, ततपर्य हर पहलु से मनसिकता में ही दृढ़ता गंभीरत हैं, खुद के सक्षतकर से इतना ही दूर हैं जितनी दूसरी अनेक प्रजातिय ,रति भर भी उन से भिन्न नही हैं
[17/12, 9:57 am] Rampaulsaini: खुद के सक्षतकार के बिना अधिात्मिक परमार्थ की बाते सिर्फ़ एक ढोंग पखंड षढियंत्रों का ताना भाना हैं खुद की इच्छा आपूर्ति प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत बेग और दूसरे अनेक सरल सहज निर्मल लोगों को नर्क का डर और स्वर्ग का लालच दिखा कर आकर्षित प्रभावित कर अंध भक्तों भेड़ो की भिड़ इकठ्ठी करना जिन को दीक्षा के साथ ही शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से बंचित कर कट्टर बना कर संपूर्ण जीबन भर बन्दुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करना खुद के हित साधने के लिए,मनोविज्ञनिक दास्ता करवाना न्ययैक उपरध हैं कुप्रथा फैलाना,जो तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से सिद्ध न हो वो ढोंग पखंड हैं
[17/12, 11:36 am] Rampaulsaini: दूसरों के समक्ष खुद को सर्बश्रेष्ट सिद्ध करने बालों में इतनी हिम्मत हैँ क्या खुद का ही समना कर पाय शेष सब तो बहुत दूर कि बात हैं
[24/12, 8:30 pm] Rampaulsaini: सहिब सा गुरु मिले तो मृत्यु के बाद की अपेक्षा नही, जीवित ही सिर्फ़ एक पल में साहिब तद्रूप सक्षतकार होता अगर साहिब जी असिम अंनत प्रेम करते हैं, तो खुद को मिटा कर जिवित ही बहा रह सकते है, यहा के लिए कोई जीवित सोच भी नहीं सकता ,हम रहते है यहाँ तु मै अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि का भी आस्तित्व ही नहीं, खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु होकर, अन्नत सूक्ष्म अक्ष में यहा अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभींव का भी स्थान नही ,और कुछ होने का तत्पर्य ही नही हैं प्रत्यक्ष समक्ष मृत्यु के बाद का विषय ही नही हैं अगर कोई समझ रहा हैं तो वो अब भी भ्र्म से भर्मित हैं, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि के सर्बश्रेष्ट सक्ष्म स्मर्थ समृद्ध सहिब जी के शनीधे में भी,,सिर्फ़ एक पल लगता हैं खुद से निष्पक्ष हो कर खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु हो कर ,कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाय सादिया युग भी कम है, सिर्फ़ एक पल में खुद के अंनत शुक्षम अक्ष स्थाई ठहराव गहराई में संपूर्ण संथुष्टि हैं, सिर्फ़ एक सच्चे सहिब में संपूर्ण रूप से समाहित हों सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए ,सिर्फ़ सहज सरल निर्मल व्यक्ति,जो खुद की निष्पक्ष समझ में हो,मौत के बाद का तथ्य हैं ही नही, खुद की खुद की दूरी सिर्फ़ एक पल की निष्पक्ष समझ की हैं, युगो की बिल्कूल भी नहीं,
[24/12, 9:20 pm] Rampaulsaini: संपूर्ण जीवन में बीते हुय एक एक पल को कठिन नमन हर चले हुय कदम प्रत्येक सृष्टि की जीव वस्तु को कोटिन नमन की एसा साहिब पाया ,जिस ने चरणों में नही अपने हिर्ध्य संसों धडकन भाव आहसास में स्थान दिया,मेरी ओकात एक पगल कुत्ते की भी नही थी,मै नीच खुद की ही ओकत को समझा सही में मुझ में रेत के कण से अधिक कुछ भी नही था जो था दुश्मण साजन सिर्फ़ मेरा कुत्ता मन ही था,जो कोई भी गुरु किसी भी युग काल में कभी कर ही नही पाया वो सब सिर्फ़ मेरे सर्ब श्रेष्ट प्रत्यक्ष साहिब ने कर दिया,निष्पक्ष समझ का खजना दे दिया जिस से खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु हो कर साहिब तदरुप सक्षतकार हों गया,मै क़ाफ़िर युगों का इक पल की कृपा से वो सब कर दिया जो कोई सोच भी नही सकता,
[25/12, 8:44 am] Rampaulsaini: मन की वृति ही हैं भ्र्म में ही भर्मित होना,मन कोई हउआ आदर्श्य शक्ति नही सिर्फ़ एक धारना हैं जिस को बचपन से लेकर मृत्यु तक की अदद के रूप में देखा जा सकता हैं मन खुद ही खुद के साथ एक धोखे का नाम हैं, मन खुद के खुद के साथ किए गय गुन्ना का पर्दा हैं, मन खुद की मूर्खता का नाम हैं, मन खुद के ही बुरे कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन की वेहतर बचाव हैं, मन खुद के अच्छे कार्य के श्रह और बुरे कार्य की एक shield हैं, मन सिर्फ़ एक धारना हैं,एक अदद हैं, जिस से हटने से डरता है, आस्थाई जटिल बुद्धि मन भी एक शरीर का ही अंग है और कुछ भी नही ,कोई भी इस से हट सकता हैं, वो भी सिर्फ़ एक पल में खुद की निष्पक्ष समझ से ,खुद के सक्षतकार से,एसा हटाता हैं कि दुबारा समन्य व्यक्तित्व में आ ही नही सकता चाहे खुद भी करोड़ों यत्न प्रयत्न प्रयास कर ले,मुक्ति शरीर से नही सिर्फ़ मन धारनाओं से चाहिए ,जो खुद को समझने की रहा के लिए कचरे से कम नहीं हैं, जो तर्क तथ्य विवेक से वंचित करती है, ढूंढने को हैं ही नही क्युकि कुछ गुम ही नही हुआ,प्रत्येक जीव उसी एक में ही हर पल हैं जो न शरीर में अंताकरण या किसी ब्रह्मण्ड मे हैं, वो सिर्फ़ खुद की ही निष्पक्ष समझ हैं, जीवित इस लिए प्रतीत नही कर सकते की मन का भ्र्म की भौतिक और अंतकरण हैं, मन सिर्फ़ जीवन व्यपन के स्रोत ढूंढ़ता हैं न कि खुद को समझने के,मन खुद को स्थापित अस्तित्व को क़ायम रखता है।, जबकि खुद को समझने सक्षतकार के लिए खुद का अस्तित्व ही खत्म करना पडता हैं,
[25/12, 10:00 am] Rampaulsaini: दूसरों द्वारा गढ़े सिर्फ़ धारना हैं जो अहम अंहकार घमंड को और आधिक पुख्ता करते हैं जिन का खुद के सक्षतकार के लिए सिर्फ़ नकरात्मक सिद्ध होते हैं, कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन भक्ति योग साधना सूरत ध्यान ज्ञान विज्ञन दार्शन मुक्ति ,यह सब सिर्फ भ्र्म अहंकार को जन्म देती हैं मन बुद्धि से उत्पन होने बाली प्रत्येक चीज ,खुद के सक्षतकार के लिए सिर्फ़ कंटो भरा कचरा है ,और कुछ भी नही,मरने के बाद मिलने बालों यक़ीन रखने बालों के लिए कोई खजना हो सकता,प्रत्यक्ष समझ रखने बालों के लिए बिल्कुल भी नही ,हम हर पल micro Axis में रहने का शोंक पाले हुय,हम भूत भविष्य को ही खत्म करने की क्षमता के साथ जो सिर्फ़ धारना ही थी,हम दूसरों में खो कर अपना अनमोल समय सांस नष्ट करने बालों अंध भक्तों की भेड़ों की भिड़ में नही गिनते ,खुद में खुद के ही साहिब के तदरुप सक्षतकार हैं, हम ने खुद के ही साहिब को बाहर ढूंढने बाले मूर्ख बिल्कूल भी नही हैँ,मेरे सांस समय का महत्व दूसरा कोई नही समझ सकता ,इसलिए खुद के ही सांस समय का महत्व समझते हुय खुद के अंनत शुक्षम अक्ष में ही रहते है, जीवित ही हमेशा के लिए ,दुसरा सिर्फ़ हित साधने की ही वृति का हैँ चाहे कोई भी हो ,मरते दम तक उलझा कर रखे गा,अगर किसी गुरु ने रब ढूंढ लिया हैं तो वो शिष्यों को बंट कर दे,अगर शिष्यों ने भी ढूंढना ही हैं, तो फ़िर वो अंध भक्त क्यों बने दीक्षा के साथ ही शव्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से बंचित हो कर कट्ट्रता में खो कर तन मन धन अनमोल सांस समय समर्पित प्रत्यक्ष कर और उस को मिलने बाला मुक्ति का झूठा असबाशन मृत्यु के बाद का क्यू प्रत्यक्ष क्यों नही,जब की प्रत्येक चीज प्रत्यक्ष समर्पित कर ही सरल सहज निर्मल लोग कट्टर अंध भक्त तैयार करते हैं बंदुआ मजदूर की भांति ,डर खौफ दहशत के तले प्रेम भक्ति सिर्फ़ कहने तक ही सिमित है, कथनी करनी में जमी असमा का अंतर है, प्रसिद्धि प्रतिष्ठा सोहरत दौलत वेग प्रभुतव के नशे में चूर खुद से दूर होता हैं करीब किसी से भी हो ही नही सकता,गुरु हर जन्म में मिला पर और कुछ भी नही ,अब सच मिला है गुरु का तो महत्व ही खत्म हो गया,सिर्फ़ मै ही मेरे शश्वत साहिब का तदरुप सक्षतकार हुं, अगर मेरे ही गुरु में यह क्षमता होती तो 25 लाख संगत में से किसी और को भी सक्षतकार करबता जो सच मे मै चाहता हुं, प्रत्येक व्यक्ति उसी संपूर्ण संतुष्ट में रहे यहा मै हुं, जिस के लिए सरल सहज निर्मल को अंध भक्त बना कर परमपुरुष आम्रलोक का लालच और शव्द कटने के डर खौफ दहशत मे रख कर सम्राज्य चला रहे हैं, यह सब से बड़ा विश्बासघत हैं वो भी उन के ही साथ जिन्होने सिर्फ़ एक शव्द पर तन मन धन अनमोल सांस समय समर्पित कर दिया,अगर मै एसा होता जैसी IAS शिष्य द्वारा शिकायते लगा कर मेरे ही गुरु ने कोई आरोप लगा कर आश्रम से निष्काषित किया तो शयद आज में शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनतीत कळतीत प्रेमतित शव्दतित शश्वत वास्तविक शभाविक सत्य मे प्रत्यक्ष न होता,मै अब भी यह चाहत रखता हुं कि जो भी किया जैसा भी किया उस सब का श्रह भी साहिब जी के चरण कमलों रखूँ, क्यकि मैं इतना अधिक निम्न शुक्षम सरल सहज निर्मल हुं तो ही अंनत गहराई स्थाई ठहराव मे संपूर्ण संतुष्टी में हुं, यहा के लिए कोई सोच भी नही सकता ,बहा प्रत्यक्ष हुं,
[25/12, 10:14 am] Rampaulsaini: अफ़सोस आता है जब कोई पुरा जीवन गुरु आश्रम में ही समर्पित करने की जिज्ञासा से आता है तो उस बक्त किसी विशेष शिष्य IAS शिष्य की सिर्फ़ एक शिकायत पर कई आरोप लगा कर हमेशा के लिए निष्काषित कर दियक़ जाता हैं, जब वो पचास बर्ष से अधिक हो जय ,कुछ जीवन व्यपन के लिए संघर्ष करने की क्षमता शून्य हो जाय, यह डर खौफ भय दहशत का माहौल है प्रेम भक्ति तो बिल्कूल भी नही,द्स्त्ता गुलमी हीं है मुक्ति स्वतंत्रता तो बिल्कूल भी नही,कम से कम एसे स्थानों पर ,प्रेम सिर्फ़ कहने तक सिमित है यथार्थ में नहीं
[25/12, 10:25 am] Rampaulsaini: हम कंझरी की वृति के नही थे कि गुरु ही बदलते रहते ,खुद ही खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन को ही संपूर्ण रूप से निष्किर्य किया और खुद से ही निष्पक्ष समझ में आ गया जिस से संपूर्ण सृष्टि का खुद का अस्तित्व ही खत्म हो जाता है खुद की निष्पक्ष समझ के इलवा सब सृष्टि ही हैं मन से ही प्रतीत की जाती है, दुसरों से कोई भी अपेक्षा न रखते हुय खुद का दृष्टिकोण ही बदल दिया,हम जगृत सपन ,तुरियतीत में भी नही हैं, सिर्फ़ खुद की निष्पक्ष समझ में हैं
[25/12, 10:34 am] Rampaulsaini: हम होश में जीते हैं होश में ही खुद को रुपंतर करने की फ़ितरत के है,हम खुद की उलझन सुळजाने की वृति के हैं, दूसरो में उलझने बाले,खुद से ही दूर होते हैँ,वो सिर्फ़ एक मनसिक रोगी होते हैँ जो खुद का ही भ्र्म दूसरों पर थोपते मढ़ते हैँ ,लालच भय खौफ दिखा कर क्युकि उन का शौंक सिर्फ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा दौलत शोहरत वेग चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनना ,जो सिर्फ़ एक मनसिकता हैं,
[25/12, 10:52 am] Rampaulsaini: मिट्टी को ही सजाने संभरने महत्व गंभीरता दृढ़ता से लेने बाले इंसानियत से ही दूर होते हैं, वो सिर्फ़ अपनी ही लाखों की संगत की एक ही बात पर दृढ़ होते हैं जो प्रभुत्त्व की पदबी, जो उन का ही एक अहंकार का रूप ले लेता है, जबकि वो पदबी उन के ही द्वारा दी गई है— जो अज्ञानी मूर्ख थे ,जिनको कभी इस्तेमल के इलवा कोई भी महत्व नही दिया जाता जो अपनी ही दी गई प्रभुत्त्व की पदबी के ही दहशत डर खौफ भय के तले जीते हैं, इतना खोफ होता हैं कि कोई प्रश्न पूछ ही नही सकता ,अगर गलती कोई कर भी दे तो सारी संगत के समक्ष शव्द काटने के आरोप मे लजीत कर निस्क्षित कर दिया जाता हैं, कि अगली बार कोई हिम्मत ही नही करता,यह प्रेम मुलता बाली भक्ति नही हो सकती,
[25/12, 11:00 am] Rampaulsaini: मै वो सत्य हुं जो शव्द में नही होता अगर आ ही गया हैं तो तीर से भी अधिक शेद दर्द देगा ,मेरा कोई भी अपना शव्द नही हैं, आप के ही जमीर के ही शव्द हैं खुद को पढ़ने की कोशिश करो तो समझ पाओगे,दूसरों में उलझने की अदद से मजबूर हो ,इसलिए खुद से डरते हो ,खुद के सत्य ही खोज थी पर दुसरों में इस कदर उलझे की खुद के भीतर का रस्ता ही भूल गाय,
[25/12, 11:16 am] Rampaulsaini: मै इतना अधिक सरल सहज निर्मल था,तो ही खुद में साहिब तदरुप सक्षतकार हुं, मेरा गुरु कितना अधिक जटिल बुद्धि से जटिलता मन में हो गा कि कितने लंवे समय साथ रहते ही मुझे रति भर भी नही समझ पाय, अगर थोड़ा भी समझे होते तो IAS शिष्य की शिकायत पर एक पल के लिए ही विचार करते ,और मुझे मेरा पक्ष रखने का मौका देते ,फ़िर भी इन सब चीजों को नजर अंदाज कर ,सिर्फ़ इस चीज का श्रेह देना चाहता हुं जो खुद में ही सहिब तदरुप सक्षतकार किया,पर वो संगत ही द्वारा दी गई प्रभुत्त्व की पदबी और प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शोहरत दौलत बेग के ही अहंकर घमंड आहम में हैं,
[25/12, 12:17 pm] Rampaulsaini: शिष्य दीक्षा के साथ ही शव्द प्रमाण में बंधने की वृति के साथ और गुरु शिष्य द्वारा दी गई प्रभुत्व की पदबी को ही गंभीरता दृढ़ता गहनता से लेते हैं, जो दोनों के लिए सिर्फ़ एक मान्यता हैं, यहा मान्यता होती हैं बहा तर्क तथ्य विवेक अस्तित्व में ही नही होता समझने की क्षमता खत्म होती हैं, बहा ही अंध विश्वस कट्ट्रता कूप्रथा जन्म लेती हैं, ज्ञान विज्ञन की दुर्गती होती हैं
[25/12, 12:34 pm] Rampaulsaini: निष्पक्ष समझ ततपर्य संपूर्ण मन रहित जीबन ,यहा समय सोच विचार चिंतन मनन संकल्प विकल्प कल्पना का अस्तित्व ही खत्म होता है, खुद ही खुद के ही स्थाई परिचय से परिचित होता हैं, खुद के स्वरुप से ही रुवरु होता हैं, जीवित ही हमेशा के लिए जिस के लिए सिर्फ़ खुद का ही एक पल लगता हैं, दूसरा कोई समझे या फ़िर समझा पाय युग सदिया भी कम है, यह सिर्फ़ निष्पक्ष समझ से समझने का विषय है,
[25/12, 1:33 pm] Rampaulsaini: सरल सहज निर्मल अत्यंत ऊंचे सच्चे गुण है, दीक्षा के साथ ही इन सर्बश्रेष्ट गुणों से बंचित हो जाता है, प्रत्येक शिष्य शव्द प्रमाण में खुद ही खुद को बंद कर तर्क तथ्य विवेक से बंचित हो जाता हैं, मृत्यु के बाद की मुक्ति के लिए जीवित खुद के सक्षतकार होने बाले गुणों को ही खंडित कर दूसरों की मनसिकता का ही शिकार हो जाता हैं उसी मनसिकता का एसा शिकार हों जाता है कि खुद भी चाहे निकल ही नही सकता,खुद के ही ज़मीर की ही दूसरे से सुन ले तो विरोध पे उतर जाता हैं, मारने मरने पर उतरु हो जाता हैं क्युकि खुद का विवेक तर्क तथ्य दीक्षा के साथ शव्द प्रमाण में एसा गिरवी रखा होता हैँ जिसे सत्य मानता है, यही तो मनसिकता हैं रोग है, मृत्यु के बाद की मुक्ति केलिय् खुद के ही विवेक से वंचित हो गाय,
[25/12, 1:41 pm] Rampaulsaini: सहजता सरलता निर्मलता ,से ही खुद की ही गहराई को समझ देख सकता हैं, वरना इतिहास ही मनसिकता से भरा हुआ हैं, खुद की निष्पक्ष समझ के इलावा सब मनसिकता ही हैं जिस में दुसरी अनेक प्रजातिओं से भिन्नता नही दिखती ,रति भर भी नहीं सिर्फ़ उन से भी अधिक वत्ररता देखने को मिलती हैं एक सर्बश्रेष्ट प्रकृति की उत्पति इंसान प्रजाती में,
[25/12, 6:03 pm] Rampaulsaini: साहिब के सच्चे असीम अंनत प्रेम के इलवा कोई भी दूसरा रस्ता ही नही हैं, अगर कुछ भी कोई समझ रहा हैं सिर्फ़ भ्र्म हैं खुद ही खुद के साथ समझोता है, खुद ही खुद के साथ धोखा है, सांस समय इंसान शरीर के साथ संपूर्ण सक्षमता भी हैं कोई कमी हैं ही नही ,अगर कोई कमी निकाल रहा हैं तो उस का कोई हित होगा,मेरे सिद्धांतों के आधार पर प्रत्येक जीव एक समान है और खुद को समझ कर सिर्फ़ एक पल में खुद के स्थाई स्वरुप से रुवरु हो सकता हैं, जो सिर्फ़ निष्पक्ष समझ में ही हैं, और कही भी नही अतीत की विभुतियों ने तो ढूंढने प्रत्येक कला अपना ली नही मिला अगर होता तो मिलता अगर किसी को कुछ भी मिला होता तो वो बंट कर देता न कि फ़िर से ढूंढने को,अगर किसी एक ने एक ही रब को ढूंढा होता तो दूसरे के लिए ढूंढने का विषय ही नही होता ,सिर्फ़ समझने का विषय है, ढूंढने को कुछ था ही नही ,
[25/12, 7:07 pm] Rampaulsaini: मै वो सख्श हुं जिसे मेरे ही गुरु ने एक IAS पद पर कार्यरत विशेष शिष्य की सिर्फ़ एक शिकायत पर कई अरोप पुलिस न्यालय की धमकियों दे कर पगल गोषित कर आश्रम से निष्काशित किया था,कम से कम सिर्फ़ एक मौका तो दिया होता मुझे मेरा ही पक्ष रखने के लिए ,जिस गुरु को रब से भी खरबों गुन्ना ऊंचा सच्चा मान कर तन मन धन अनमोल समय समय समर्पित इतना अधिक असीम अंनत प्रेम किया था कि आज भी मुझे मेरा ही चेहरा ही याद नही ,मुझे उँगली के इशारे से बन्दगी की पंक्ति से गुरु के द्वारा ही निकला जाता था,प्रेम सत्य गूंगा होता हैं, अगर प्रेम सत्य की जुवान होती तो शयद आज मै खुद के सक्षतकार में नही होता,जो कुछ भी जब भी हुआ उस से श्रेष्ट हो ही नही अभी तो आज बहा ह यहा के लिए कोई सोच भी नही सकता
[25/12, 7:30 pm] Rampaulsaini: दो पल का जीवन हैं क्या गिला शिकवा अगला पल का पता नही, हो न हो ,
[25/12, 7:38 pm] Rampaulsaini: मेरा साहिब मेरा खुद का सक्षतकार हैं बाहर झूठ ढोंग पखंड हैं, वो सिर्फ़ एक मनसिकता हैं, डर खौफ भय देहस्त को भक्ति नही कट्टर अंध भक्तों की भिड़ हैं प्रेम नही ,
[25/12, 7:48 pm] Rampaulsaini: इतना अधिक ऊंचा गुरु मिला है फ़िर भी खुद से ही दूर हों तो गुरु से करीब हों ही नही सकते ,कट्ट्रता नही समझने की कोशिश करे खुद की उलझने की नही न खुद से न किसी से ,कईओं को विशेष बनने का कीड़ा होता हैं, हमें शेष रहने का ही जनून था तो ही खुद को समझा, हम किस फ़ितरत के होंगे जरा सोचो नफ़रत के बाद भी सब कुछ ले लिया आप विशेष बनने पर भी बिल्कुल खाली ,गुरु एक ही था समझ दृष्टिकोण सिर्फ़ अलग हैं मेरा आप का,सब एक समान है रति भर भी भिन्नता नही हैं, दो पल का जीवन हैं मस्त रहो ,
[25/12, 7:51 pm] Rampaulsaini: जो समझने की क्षमता खो देता हैं वो ही कट्टर होता हैं, वो खुद ही समने आ कर परिचय दे ही देते हैं,
[25/12, 8:18 pm] Rampaulsaini: आओ मिल कर सिर्फ़ इंसान बने जति धर्म माजहब संगठन रब तो हर एक इंसान ने उत्पन कर लिए ,पर वो नही बन पाय यथार्थ में प्रकृती ने जो बनाया पैदा किया था ,सरल सहज निर्मल इंसान,जो हर पल संपूर्ण संतुष्टि में मस्त रहें,
[25/12, 8:49 pm] Rampaulsaini: गुरु के प्रत्येक शव्द को खुद के जीवन से भी अधिक महत्व दें गुरु से अंनत असीम प्रेम के इलावा कोई दूसरा रास्ता ही नही हैं, न ही था ,न ही हो सकता हैं, मेरा खुद की निष्पक्ष समझ के पीछे सिर्फ़ साहिब जी से अंनत असीम प्रेम ही था ,हर पल दिन रात सिर्फ़ साहिब मे रमा हुं, तो ही खुद ही साहिब तदरुप सक्षतकार हुआ हुँ कोई भी हो सकता हैं, सिर्फ़ मेरा साहिब प्रेम में ही हैं, और दूसरे रास्ते सिर्फ़ मृत्यु के बाद का भ्र्म हैं और कुछ भी नही,समय सांस साहिब हैं तो प्रेम क्यों नही ,मृत्यु के बाद क्यों अभी क्यों नही ,खुद ही खुद के साथ धोखा क्यों, खुद के निष्पक्ष स्वरुप से रुवरु नही तो सहिब से नही खुद से ही धोखा क्यों, साहिब सा गुरु पिछले चार युगों में नही मिला किसी को भी,मेरे जैसे कमीने क़ाफ़िर को क्या से क्या बना दिया आप तो हो ही इतने अधिक श्रेष्ट ,मेरी तो ओकत ही नही शिष्यो के ही पैरो की दुल बन पाऊ, साहिब का तो मुख से नाम लु सोच भी नही सकता ,क्युकि वो शव्द का विषय ही नहीं, मेरे जैसे टूटे फूटे पर कृपा हों सकती है तो आप जैसे अनमोल हीरों पर क्यों नहीं, शायद हम में ही कोई कमी हों गी ,समझ कर दूर करे,मै भी चाहता हुं प्रत्येक उसी ही संतुष्टी मस्ती में ही रहे जिस में मै रहता हुं बहरी नही खुद ही खुद के निष्पक्ष स्वरुप से रुवरु खुद के ही साहिब के तदरुप सक्षतकार में, साहिब जी के शनिधे में प्रत्येक पल का खुद में हर पल समाहित हो कर रहे , क्षमता हैं तो विलंभ क्यों, कल नही अब और अभी अगले पल मौत हैं मौत से पहले मौत को समझना जरूरी है, मेरा और मेरे गुरु का दोनों का मशला निजी हैं, उस में गलती से भी नही खा मखा में पिश सकते हो दूर रहो ,खुद को गंभीरता से साहिब से प्रेम की और बढ़ो कही समय न निकल जाय, हम दूरी ही नही हैं, आप की आप से भी और साहिब से भी सिर्फ़ दूरी हि है ,दोनो से सम्पर्क सदने जुटों,
[26/12, 8:38 am] Rampaulsaini: मै शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने ही साहिब का अनकहा सत्य हुं, अहसास हुं ज़मीर हुं, पर निष्पक्ष समझ में ही हुं शव्दों का ततपर्य ही नही हुं, शव्द सिर्फ़ मनसिकता होती हैं जो खुद के इलवा दूसरों का अहसास है,जो एक भ्र्म हैं, मै सिर्फ़ शश्वत वास्तविक सभविक सत्य हुं जो खुद और समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि का अस्तित्व खत्म कर के ही उवरता हैं, मै निष्पक्ष समझ के समीकरण यथार्थ सिद्धांत" उपलवधि प्रत्यक्ष समक्ष यथार्थ युग हैं,
[26/12, 8:49 am] Rampaulsaini: पिछले चार युगों की अनेक चर्चित विभूतिओं का विषय रब या कोई प्रमस्तता थी जो उन के मत आधार ढूंढने का विषय था,पर मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण "यथार्थ सिद्धांत" उपलवधि प्रत्यक्ष यथार्थ" युग,प्रत्यक्षा हैं, रहशय आलौकिक चमत्कार दिव्य यह सब भ्र्म हैं कूप्रथा हैं इन सब को खंडित करता हुं, अगर कोई सही मनता है तो तर्क तथ्य विवेक से सिद्ध स्पष्ट करे,सत्य स्पष्टता मंगता हैं, उलझाव नही ,सत्य सरल सहज निर्मल प्रवृत्ति के साथ हैं, जतिलता मन की ही हैं,
[26/12, 8:57 am] Rampaulsaini: मै मेरे ही साहिब के भाव की उपज हुं जो शव्द का विषय नही अहसास हुं, जिस की प्रतीती मोनता की अंनत गहराई की निरंत्रता में ही हैं ,सिर्फ़ निष्पक्ष समझ में,

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

जहाँ अंत ही आरंभ है, जहाँ शून्य ही विस्तार,वहीं सच्चा जीवन है, वहीं सत्य साकार।**शिरोमणि रामपॉल सैनी — परम सूक्ष्म सूत्र-धारा**

**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच —** शिरोमणि रामपॉल सैनी — जहाँ श्वास भी लय हो, वहीं सत्य धाम, जहाँ “मैं” भी मिट जाए, वहीं मेरा नाम। न...