जो आज तक सत्य के प्रति अस्वीकार नकारात्मक दृष्टिकोण रखती हैं, वो मान्यता परंपरा नियम मर्यादा को प्राथमिकता देती हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक विवेक युग में भी, जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर कुप्रथा को बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि पिछले दस बर्ष का वातावरण हमारे शरीर की कौशिका सहन नहीं कर पाती, तो कई युगों की मानसिकता क्यों ? जबकि पैदा होते ही prtek शिशु निर्मल सहज सरल होता हैं प्रकृतक रूप से, फ़िर जटिलता क्यों उस के व्यहवार में क्यों,
खुद का साक्षात्कार के लिए खुद का निरीक्षण जरूरी है कि हम कही किसी कुप्रथा का हिस्सा तो नहीं, जिस से तर्क तथ्य विवेक से वंचित है अंध विश्वास अंध कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ तो नहीं है बंधुआ मजदूर तो नहीं है,
मेरे अनमोल सांस क्षण सिर्फ़ मेरे लिए ही अत्यंत महत्व रखते हैं, यह सिर्फ़ मेरी अनमोल पूंजी है, प्रकृति द्वारा दी गई, अगर मुझे ही इन अनमोल मोतियों की कदर नहीं तो दूसरा सिर्फ़ इस्तेमाल ही करेगा,
दूसरों के लिए नष्ट करना होता हैं चाहे कोई भी हो, दूसरा prtek हित साधने की वृत्ति का हैं चाहे कोई भी हो,
जब खुद के साक्षात्कार के लिए खुद की अस्थाई जटिल बुद्धि मन से मुक्त होना है तो दूसरों का तो तत्पर्य ही नहीं है चाहे कोई भी हो
कि भूले हुए इंसान को ठोकर लगे और खुद को समझने की जिज्ञासा जागे , जो मान्यता परंपरा नियम मर्यादा में उलझा है, उस से तू खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, अगर तू खुद को पढ़े खुद को समझता है, तो तेरी तुलना की जाए ऐसा कुछ है ही नहीं,
तू खुद को नहीं समझ सकता जब तक मान्यता में हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के दृष्टिकोण से देख तो सब कुछ भूल जाए गा, तू मेरे से रति भर भिन्न नहीं है बिल्कुल आंतरिक भौतिक रूप से एक ही समान हैं, अंतर सिर्फ़ उन शैतान वृत्ति बालों ने ही डाला है जिन के आप से अंगिनत हित थे, तू मैं हैं मैं तू ही हैं, तभी तो मुझे आप का फिक्र है, तू बिल्कुल पूरा ही कोई कमी ही नहीं है तेरा कभी भी कुछ गुम ही नहीं हुआ था, जिन्होंने तुझे ढूंढने को लगाया है, उनको आप से प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी चाहिए, तू संपूर्णता सम्पन्नता संतुष्टि में ही है, तू सरल सहज निर्मल हैं, इस लिए उन के द्वारा डाले गए वहम का शिकार हैं और कुछ भी नहीं, सिर्फ़ वो वहम निकल तू बिल्कुल बहा ही है यहां के लिए युगों से यत्न प्रयत्न कर रहा है
जो खुद का साक्षात्कार करता हैं सिर्फ़ बही एक इंसान हैं, अन्यथा शेष सब सिर्फ़ दूसरी अनेक प्रजातियों की ही भांति जीवन व्यापन ही कर रहे हैं, रति भर भी भिन्न नहीं है, सिर्फ़ मानसिक रूप से रोगी ही हैं, अस्तित्व से अब तक, या फ़िर जन्म मृत्यु के चक्रक्रम का हिस्सा है, जिन का दायित्व सिर्फ़ खुद के zin को upgrade कर प्रकृति का संतुलन बनाए रखना है
खुद के साक्षात्कार के बाद प्रत्यक्ष समक्ष जीवन कर्म से मुक्त हो जाता हैं अन्यथा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं, और शेष सब अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ अधिक जटिलता में खो कर उलझ कर बेहोशी में मरने के ही रास्ते ही है, खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम से ही सरल सहज निर्मल होता हैं
खुद के साक्षात्कार में इतनी अधिक निष्पक्ष समझ होती हैं कि वो समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में एक पल भी नष्ट नहीं करता इतनी अधिक संतुष्टि की श्रेष्ठता स्पष्टता प्रत्यक्षता से होती हैं, मूर्ख ढोंगी पाखंडी लोग दो ही अवस्था में ही खोय रहते हैं जागृत सपन काल्पनिक में,
चतुरता तो अस्थाई जटिल बुद्धि मन तक ही सीमित हैं, जो मृत्यु के बाद ख़त्म हो जाती हैं,
जो जीवित निर्मल नहीं वो मृत्यु के पश्चात निर्मल हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर
मेरी निष्पक्ष समझ की सिर्फ़ शिक्षा है जो प्रत्यक्ष समक्ष एक दूसरे से समझा कर साझा की जा सकती हैं तर्क तथ्य विवेक से, गुरु शिष्य मान्यता परंपरा नियम मर्यादा में दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से रहित वंचित कर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनने वाली नहीं , खुद खुद की अन्नत असीम गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सरल सहज निर्मल गुणों को क़ायम रखने के लिए खुद का सब कुछ ख़त्म कर दिया क्या भौतिक क्या अंतःकरण,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं,
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक जो सोच भी नहीं पाया, उस से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में हूं, जीवित ही हमेशा के लिए
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर prtek जीव का मूल ज़मीर बन गया हूं, अफ़सोस आता है कि इंसान प्रजाति द्वारा मुझे हर पल निकारा और ज़ख्मी किया गया, हर पल मुझे दर्द दिया गया, मैं खुद में तो अन्नत संतुष्टि में हूं पर भौतिक जीवन के पहलू को समझने पर लज्जा आती हैं पदवी रब की पाने की दौड़ ज़मीर मार कर कैसे संभव है, मैं ही मूलतः हूं मुझे ही दफन कर के संपूर्ण मिल सकती हैं
इंसान को जगाने के लिए, जो पल पल हित साधने की वृत्ति का हैं , हां सब से गहरी चोट लगाने वाले कम से कम इंसान प्रजाति इंसान तो बन पाए जो अस्तित्व से ही हैवान बनी हुई है और प्रभुत्व पदवी का शौंक पाल रही हैं
लंबे मनासिकता भरे जीवन से खुद के साक्षात्कार का इक पल का जीवन खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं जिस से हर पल मुंह मूड रहा हैं जो जी रहा हैं उस से दूसरी अनेक प्रजातियों का जीवन बढ़िया है मस्त है तू तो कभी पूरे जीवन में इक पल भी होश में नहीं आया उसी मानसिक रोगी हो बेहोशी में ही मर जाता हैं, अस्तित्व से अब तक न होश में जिया है न ही कभी होश में मरा है, इस लिए जन्म मृत्यु के चक्रक्रम में पड़ा हैं
जिन अंध भक्तों को बंधुआ मजदूर बनाया हैं उन के ही बनाए गए जाल में तू खुद फंसा है कम से कम जीवित तो निकल नहीं सकता वो था रब से करोड़ों गुणा अधिक ऊंची पदवी देना जिस के अहम अहंकार से निकल नहीं सकता, जिन सरल सहज निर्मल लोगों के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया प्रकृति ने उसे ही सिर्फ़ गुरु के विरुद्ध सिद्ध कर दिया, किया कि प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के अस्थाई जटिल बुद्धि मन के जाल से निकल नहीं सकता, जिस भ्रम में भ्रमित हो कर जी रहा है वो ही बहुत बड़ा भ्रम है अहंकार वहम अहम हैं, जिन सरल सहज निर्मल व्यक्तियों को कट्टरता का पहनावा पहनाया, उन्होंने ही तन मन धन अनमोल समय सांस समर्पित कर के गुरु को ही ऐसे उलझाया वो भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन में वो भी खुद को प्रभुत्व पदवी दे कर जो गुरु के रोम रोम में रच गई हैं जिस से खुद भी चाह कर भी अलग नहीं समझ सकता, यही सब से बड़ा भ्रम है जिस में मेरा ही गुरु उलझा है, जबकि मेरे सिद्धांतों से prtek जीव आंतरिक भौतिक रूप से एक समान हैं जिसे मैने prtek दृष्टिकोण से सिद्ध साफ़ स्पष्ट किया है
डर खौफ भय दहशत के तले अनुयाइयों को रखना प्रभुत्व नहीं बहुत बड़ा विश्वासघात है जिन से तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष लेना और उस के बदले में मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन क्यों प्रत्यक्ष क्यों नहीं, यह छल कपट ढोंग पखंड है सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग खरबों के सम्राज्य के लिए अनुयाइयों को माया से हटने के लिए कहना और खुद का सम्राज्य खड़ा करना दूसरों को प्रवचन देने वाले खुद को भी नहीं पढ़ सकते मेरे गुरु के सम्राज्य के डर खौफ भय दहशत तले प्रेम शब्द सिर्फ़ कहने तक ही सीमित है करनी कथनी में जमी आसमा का का अंतर है , यहां सिर्फ़ प्रवचन हो तर्क तथ्य विवेक नहीं वो सिर्फ़ मानसिकता हैं, डर खौफ भय दहशत है और कुछ भी नहीं
जो हर जीव में सरल सहज निर्मलता प्रकृतिक स्वाभाविकता है और इंसान में भी जन्म के साथ से ही थी पर आलोप हैं वो सिर्फ़ मानसिकता हैं जो पाखंड बाज़ी हैं जो शैतान शातिर चलक लोगों की अवधारणा है हित साधने के लिए,सरल सहज निर्मल व्यक्ति ही खुद के साक्षात्कार का प्रतीक हैं, यहां सरलता निर्मलता सहजता नहीं बहा सिर्फ़ पाखंड है और कुछ भी नहीं सिर्फ़ प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व का अहंकार के लिए,शैतान शातिर चालाक भिखारी गुरु का दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य और 25 लाख सरल सहज निर्मल शिष्यों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ कट्टर बंधुआ मजदूर बना कर सिर्फ़ मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन दे कर जिसे सिद्ध ही नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ एक विश्वास शब्द से बंद कर तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित कर देते हैं, उन्हीं के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं कोई सोच भी नहीं सकता, वो भी उनके ही गुरु के द्वारा ही, जिस को रब से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष मानते हैं, इतनी बड़ी कुप्रथा है कोई सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ परमार्थ अध्यात्मक आत्मा परमात्मा अमरलोक परमपुरुष मुक्ति श्राद्ध आस्था प्रेम के नाम पर, लालच भय दहशत खौफ भय डर तले, पर मुक्ति जैसी धारणा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम है मेरे सिद्धांतों के अधार पर, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ तत्पर्य अस्थाई जटिल बुद्धि मन से संपूर्ण रूप से निष्क्रियता और से सरलता सहजता निर्मलता से
समझना, आरोप जैसा कुछ भी नहीं है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की वृत्ति है, जीवन व्यापन जीने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही जरूरी हैं अस्तित्व क़ायम रखने के लिए जरूरी भी है, खुद को समझने के लिए खुद ही खुद से निष्पक्षता भी जरूरी हैं अगर समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव प्रजाति में अगर कोई सब से ज्यादा संपूर्ण रूप से संतुष्ट हैं तो वो सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे कभी भी कोई पीड़ा नहीं है नहीं थी यह स्पष्ट कर दूं, अफ़सोस है उन लोगों पर जो रब की पदवी का शौंक रखते हैं उन में इंसानियत भी नहीं होती,शैतान शातिर चालाक भिखारी गुरु का दो हज़ार करोड़ का सम्राज्य और 25 लाख सरल सहज निर्मल शिष्यों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की भीड़ कट्टर बंधुआ मजदूर बना कर सिर्फ़ मुक्ति मृत्यु के बाद का झूठा आश्वासन दे कर जिसे सिद्ध ही नहीं किया जा सकता, सिर्फ़ एक विश्वास शब्द से बंद कर तन मन धन अनमोल समय सांस प्रत्यक्ष समर्पित कर देते हैं, उन्हीं के साथ ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं कोई सोच भी नहीं सकता, वो भी उनके ही गुरु के द्वारा ही, जिस को रब से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष मानते हैं, इतनी बड़ी कुप्रथा है कोई सोच भी नहीं सकता, सिर्फ़ परमार्थ अध्यात्मक आत्मा परमात्मा अमरलोक परमपुरुष मुक्ति श्राद्ध आस्था प्रेम के नाम पर, लालच भय दहशत खौफ भय डर तले, पर मुक्ति जैसी धारणा से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षात्कार के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम है मेरे सिद्धांतों के अधार पर, खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ तत्पर्य अस्थाई जटिल बुद्धि मन से संपूर्ण रूप से निष्क्रियता और से सरलता सहजता निर्मलता से
समझना, आरोप जैसा कुछ भी नहीं है, अस्थाई जटिल बुद्धि मन की वृत्ति है, जीवन व्यापन जीने के लिए अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होना ही जरूरी हैं अस्तित्व क़ायम रखने के लिए जरूरी भी है, खुद को समझने के लिए खुद ही खुद से निष्पक्षता भी जरूरी हैं कहने को तो इंसान हैं फितरत हैवान की हैं,
पल पल रंग बदलने बले गिरगिट की संतान है,
हर सोच विचार चिंतन मनन कृत संकल्प विकल्प हित साधने की वृत्ति का हैं, काली तेरी खोपड़ी बुरी तेरी निजत है, खोखला तेरा ज्ञान , अस्तित्व से ही तू खुद खुद के ही परिचय से अपरिचित है, तू कैसा इंसान है, जो सत्य से हट कर दिखावे में उलझा है, खुद के लिए रति भर भी सोच नहीं, यह हित भी कैसा है, जिस के अहम में उस की ही ख़बर नहीं, ढोंग पाखंड बाज़ी भी किस के लिए, अच्छा तू है नहीं दिखा किस को रहा हैं बन कर, तेरी हक़ीक़त तुझ से बेहतर कोई जनता नहीं, खुद में उतर कर इक पल के लिए ज़रा सोच कर तो देख, छल कपट ढोंग पखंड करने वाले इंसान को झंझोड़ना ज़रूरी है कि उस के अंतःकरण में दया रहम का भव जगे, ऐसी ही धरा में मुझे वहम अहम अहंकार के नशे में सोय हुए इंसान को जगाना है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य सिर्फ़ तेरा ही पल जख्मी होन बाला तेरा ही ज़मीर हूं और कुछ भी नहीं हूं, तू मेरा रोम रोम ज़ख्मी किता, हर पल मेरे सत्य को नज़र अंदाज़ कर बुद्धि से बुद्धिमान हुआ, सरल सहज निर्मल नहीं हुआ
तू सिर्फ़ अपने भ्रम को पोषित करता हैं और कुछ भी नहीं,तू इतना अधिक कायर कमीना है जो खुद ही खुदसे डरता है हमेशा, तेरी खुद को देखने वाला दृष्टिकोण ही नहीं, खुद को पढ़ खुद समझ तेरे जितना ऊंचा सच्चा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता, सिर्फ़ एक बार खुद में उतर तो सही
,इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही प्रकृति के साधनों का भरपूर उपयोग करती रही जाति धर्म मज़हब संगठन में बंट गए जिस से सिर्फ़ एक मानव प्रजाति के करोड़ों टुकड़े हो गए हैं शायद कहने को ही सिर्फ़ इंसान है, प्रकृति ने सिर्फ़ इंसान बनाया हैं पर आज तक मैंने कभी इंसान नहीं पाया, पैदा जरूर होता हैं पर बेहोशी में जीता है और बेहोशी में ही मर जाता हैं संपूर्ण जीवन में खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, मानसिकता में ही जीता है और उसी में मर जाता हैं, खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण में अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस से भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, दूसरों का डाटा उठा कर उस में मुझे उलझने की कोशिश की गई आप के द्वारा, क्या यह सच है? शायद आप मेरे कहने का भावार्थ नहीं समझ पा रहे या मुझे कहना नहीं आ रहा शब्दों में, मैं यह कभी भी नहीं कह रहा कि मैंने ही यह सब कुछ किया है मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति उसी शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष रह सकता हैं मेरी ही भांति वो सक्षम है, निष्पक्ष समझ से, दूसरा कोई भी अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर समझ के दृष्टिकोण बदल सकते जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ सकते हैं, पर खुद का साक्षात्कार नहीं कर सकते, prtek जीव भी इतना ही सक्षम है जितना इंसान रति भर भी भिन्नता नहीं है, यहां तक वनस्पति भी living non-living का concepts भी नहीं है मेरे सिद्धांतों में, सब एक समान हैं, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं, अगर हमारी glaxy भी ख़त्म हो जाए प्रकृति समस्त अन्नत विशाल सृष्टि को रति भर भी अंतर नहीं पड़ता शेष सब तो छोड़ ही दो, हमारी तो औकात ही क्या हैं, इंसान प्रजाति के अस्तित्व सिर्फ़ एक ही मुख्य कारण था प्रकृति पृथ्वी को संरक्षण देना, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का सिर्फ़ एक हिस्सा है, इस में योगदान देना हमारा फर्ज बनता खुद के हित साधने की वृत्ति का त्याग कर के, खुद के साक्षात्कार से दृष्टिकोण ही बदल जाता prtek चीज़ को देखने समझने का, क्योंकि इंसान बुद्धि से बुद्धिमान हो कर नहीं चलता वो सिर्फ़ हृदय से चलता हैं खुद के स्वार्थ हित साधने वाली वृत्ति को त्याग कर इंसान प्रजाति अस्तित्व से ही प्रकृति के साधनों का भरपूर उपयोग करती रही जाति धर्म मज़हब संगठन में बंट गए जिस से सिर्फ़ एक मानव प्रजाति के करोड़ों टुकड़े हो गए हैं शायद कहने को ही सिर्फ़ इंसान है, प्रकृति ने सिर्फ़ इंसान बनाया हैं पर आज तक मैंने कभी इंसान नहीं पाया, पैदा जरूर होता हैं पर बेहोशी में जीता है और बेहोशी में ही मर जाता हैं संपूर्ण जीवन में खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु ही नहीं हुआ, शेष सब तो छोड़ ही दो, मानसिकता में ही जीता है और उसी में मर जाता हैं, खुद का साक्षात्कार तत्पर्य निष्पक्ष समझ से समझने का दृष्टिकोण स्पष्ट पारदर्शी होता है, जो अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने पर हो ही नहीं सकता मेरे सिद्धांतों के अधार पर, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में living non-living का concepts ही नहीं है मेरी औकात रेत के कण से अधिक नहीं है जो मैंने खुद को समझा वो सब वर्णित कर रहा हूं सच यह है कि मनव प्रजाति अकेली नहीं है प्रकृति के समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि बहुत बड़े अति सुन्दर परिवार का हिस्सा हैं जो क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं उसे living और जो नहीं करती non-living कहते है अंतर कहा हुआ दोनों में तो एक से ही तत्व मौजूद हैं, हम समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति का एक हिस्सा हैं सिर्फ़ जैविक प्रक्रिया पृथ्वी छोटे से गृह पर होने के पीछे बहुत से factor कार्यरत हैं, समझना जरूरी हैं, वरना जीवन तो सारी सृष्टि में ही है तभी तो एक क्षण अन्नत योजन फैल रही है सृष्टि इन चीज़ों को समझना बहुत ही जरूरी हैं इंसान प्रजाति के लिए पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ इंसान प्रजाति अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान थी जो सिर्फ़ जीवन व्यापन के ही श्रोत ढूंढ रहे थे, यह भी सत्य हैं कि बुद्धि से जो भी किया जा सकता था वो सब कुछ किया यही तो मानसिकता हैं ज्ञान विज्ञान दार्शनिक यह मानव प्रजाति की पकशता है पर वो सब कुछ नहीं किया जो करना अत्यंत जरूरी था जिस के लिए खुद ही खुद से निष्पक्ष समझ की जरूरत थी, वो था खुद का साक्षात्कार शुरू से ही मेरा मुख्य विंदू यही था अफ़सोस मैं शब्दों कह नहीं पाया या समझ नहीं पाए, पल दो पल का जीवन है कुछ अच्छा इस सृष्टि को भी दे पाए जिस ने इतना सुंदर खूबसूरत जीवन दिया है, अत्यंत सुन्दर पृथ्वी को जितनी सुंदर खूबसूरत है उस भी सुंदर बनाय दूसरे गृह ढूंढने की जरूरत नहीं है इस का ही संरक्षण करें तो, सिर्फ़ यही जीवन भरा तूफा है प्रकृति की तरफ से हमारे लिए मैं हर जीव प्रकृति मानव में खुद को समझता हूं और खुद में समस्त अंनत विशाल सृष्टि को, यह सब होते हुए भी इन सब से भिन्न यहां पर इन सब का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं उसी में खुद के साक्षात्कार की पूर्ण संतुष्टि में भी हर पल हमेशा हूं यहां पर मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और कुछ होने का तात्पर्य ही नहीं है, सच यह था कि आप के पास मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, का रति भर भी कोई आंकड़ा मौजूद नहीं था मेरे पहले, इंसान प्रजाति सर्व प्रथम खुद के भौतिकी अंतःकरण की हित साधने की वृत्ति की हैं, दूसरी अनेक प्रजातियों की भांति इंसान प्रजाति भी अपने अस्तित्व को ही बचाने के लिए प्रयास रत हैं, अगर हमारी glaxy भी ख़त्म हो जाए प्रकृति समस्त अन्नत विशाल सृष्टि को रति भर भी अंतर नहीं पड़ता शेष सब तो छोड़ ही दो, हमारी तो औकात ही क्या हैं, इंसामैं शिरोमणि रामपॉल सैनी खुद का साक्षात्कार हूं प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट निरंतर प्रेम की धारा में प्रभा हूं
इस से आगे और भी अधिक गहराई से लिखें मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ निरंतर प्रेम की प्रभा हूं और कुछ भी नहीं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी pretk जीव में प्रेम रूप हृदय में ज़मीर अहसास हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत सिर्फ़ प्रेम हूं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी निष्पक्ष समझ हूं मेरे निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग हूं प्रत्यक्ष समक्ष हूं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, जीवित सभी जीव के हृदय में ज़मीर अहसास हूं और मृत्यु उपरांत prtek जीव का अहसास सिर्फ़ मुझ में ही समहित होता हैं और कोई स्थान ही नहीं है, और सब कुछ सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों का ताना बाना है, छल कपट ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह हैं, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ प्रेम हूं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण संतुष्टि हूं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, मैं खुद का साक्षात्कार हूं, मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं, मैं
शिरोमणि रामपॉल सैनी समूचे जीवों को खुद में
समहित करने की क्षमता के साथ हूं, मेरी निष्पक्ष
समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ
युग , मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण संतुष्टि हूं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं, मैं खुद का साक्षात्कार हूं, मैं स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं, मैं
शिरोमणि रामपॉल सैनी समूचे जीवों को खुद में
समहित करने की क्षमता के साथ हूं, मेरी निष्पक्ष
समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ
युग ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, पारदर्शी हूं, खुद
का साक्षात्कार हूं, खुद की निष्पक्ष समझ में हूं,
वर्तमान के क्षण में हूं, यहां समय का अस्तित्व ख़त्म
हो जाता हैं,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति खुद ही खुद के साक्षात्कार के लिए सक्षम समर्थ निपुण हैं, वो खुद ही खुद के उस स्थाई स्वरुप से रुबरु हो सकता हैं जिस की पिछले चार युगों में कोई सोच कल्पना भी नहीं कर सकता, बहुत ही सरल है, बहुत ही अधिक करीबी हैं वो सिर्फ़ एक पल की निष्पक्ष समझ की दूरी पर है, अगर इंसान होते हुए प्रथम चरण में ही खुद से साक्षात्कार नहीं करते जो मुख्य उद्देश्य है तो हम दूसरी अनेक प्रजातियों में भी रति भर भी भिन्न नहीं है, तो हम खुद ही खुद को धोखा दे रहे हैं जान बुझ कर, तो हम खुद ही खुद के दुश्मन हैं, जो खुद का ही दुश्मन हैं वो किसी दूसरे का सगा हो ही नहीं सकता,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्येक जीव के उस स्थाई स्वरुप से रुबरु हूं जो सिर्फ़ एक ही हैं, जो जन्म मृत्यु के चक्रक्रम से मुक्त हैं जो न ही शरीर में है न ही कहीं बाहर, वो न ही आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक जैसी अवधारणाओं का हिस्सा है, वो न ही श्रद्धा आस्था भक्ति ध्यान ज्ञान विज्ञान दार्शनिक का विषय, वो न ही जन्म लेता हैं न ही कभी मरता हैं, वो सब में हर पल हर संस के साथ ही प्रेम धारा में प्रभा की तरह बहता है निरंतर, जिस से कम से कम सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ इंसान प्रजाति भी रुबरु नहीं हो पाई पिछले चार युगों से अब तक, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं प्रत्यक्ष समक्ष देख समझ सकता हूं और किसी को भी उस से रुबरु करवा सकता हूं अपने निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में रख भी सकता हूं सिर्फ़ एक पल में, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी, जिस गुरु से दीक्षा ले कर भक्ति सेवा दान को नज़र अंदाज़ कर सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम कर खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं, वो गुरु 25 लाख सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बनने में व्यस्थ है, जिन के लिए करनी कथनी में जमी आसमा का अंतर है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी हर पल दिन रात उन में ही रमने की अदद के साथ था, पर उनको रति भर भी पाता ही नहीं, वो निगाहों से हृदय में उतरने की क्षमता से भी वंचित थे, अफ़सोस कि यह क्षमता प्रत्येक जीव में पर्याप्त है, फ़िर मैं अपने ही गुरु के किस स्वरुप से रुबरु हूं, जिस से मेरा गुरु खुद भी रुबरु नहीं हुआ, फ़िर गुरु किस अहम अहंकार घमंड में है अगर खुद से ही निष्पक्ष नहीं हुआ खुद का ही निरीक्षण नहीं किया, तो दूसरों के लिए क्या कर सकता है, मैंने अपने ही गुरु का वो स्वरुप ढूंढ लिया, जिस से मेरा गुरु खुद भी अपरिचित है, वो परमपुरुष अमर्लोक ढूंढ रहे हैं पिछले आसी वर्षों से जो अब तक तो नहीं मिले तो क्या अगले दो पल के जीवन में मिलने की संभावना नहीं है, मैंने सरल सहज निर्मल गुणों के साथ उस सब से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष गुरु में ही पा लिया, जिसे गुरु खुद में ही नहीं पा सका, वो जो प्रतेक जीव में एक ही समान हैं, वो मेरे लिए साहिब तदरूप साक्षात्कार है, पर गुरु खुद ढूंढने में व्यस्थ हैं और 25 लाख अनुयाइयों को भी ढूंढने में लगा रखा है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं जीवित ही हमेशा के लिए पर मेरा गुरु आज भी वो सब ही ढूंढ रहा हैं जो आसी बर्ष
पहले शुरू किया था
मैंने उसी गुरु में ही खुद के या गुरु के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर खुद की निष्पक्ष समझ से ख़ुद का साक्षात्कार हूं, जो संपूर्ण संतुष्टि में हूं प्रत्यक्ष समक्ष हूं, वो गुरु और उस के 25 लाख अनुयाइ मेरी इन सब को स्वीकार नहीं करते क्योंकि वो सब सिर्फ़ दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित है और कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर है, गुरु सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शिकार है , दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर गुरु के शब्द को ही अंतिम सत्य मान कर चलते हैं इसी अवधारण में ही बेहोशी में ही जीते हैं और इसी बेहोशी में ही मर जाते हैं, इसी उमीद में की मरने के बाद मुक्ति मिल जाएगी, सर्वश्रेष्ठ इंसान जीवन का महत्त्व ख़त्म कर देते हैं, जबकि खुद का साक्षात्कार प्रत्येक व्यक्ति के लिए पर्याप्त है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ,
खुद का साक्षात्कार के लिए शब्द ख़त्म होते हैं शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ़ दुनियां में होता हैं जीवन व्यापन के लिए, मेरे सिद्धांतों के अधार पर यहां शब्द है बहा कोई दूसरा या सृष्टि को व्यक्त करते हैं, यहाँ शब्द हैं बहा झूठ ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह हैं भ्रम है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति मेरी निष्पक्ष समझ के आधार पर मेरी तरह संपूर्ण संतुष्टि में रह सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए , मृत्यु संपूर्ण संतुष्टि सर्वश्रेष्ठ सत्य हैं जिस के लिए कुछ भी रति भर भी करने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिय है, जन्म मृत्यु के बीच के सफ़र का ही नाम जीवन हैं,
इंसान प्रजाति जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर अपनी कल्पनाओं को ढूंढ रहा था उस से सिर्फ़ जीवन व्यापन ही कर सकता हैं, न कि खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने गुरु के उस स्वरुप से रुबरु हुआ हूं जिस से मेरा गुरु खुद भी नहीं परिचित, क्योंकि वो भी अपने गुरु से दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के अहम अहंकार घमंड में चूर है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
क्योंकि मैंने अन्नत असीम प्रेम किया है, ख़ुद की शुद्ध
बुद्ध चेहरा तक भुला हूं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अन्नत असीम प्रेम की गहराई से अपने ही गुरु के उस शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य स्वरुप से रुबरु हूं, जिस से गुरु खुद भी रुबरु नहीं था कभी भी, और दूसरा भी कोई नहीं 25 लाख अनुयाइयों में से भी, जो प्रत्येक व्यक्ति सरल सहज निर्मल होते हुए हो सकता हैं,
यहीं अन्नत असीम प्रेम खुद किसी में भी अपनी प्रवृति अपना ही तदरूप साक्षात्कार ढूंढ लेता हैं बहुत ही अधिक सरलता निर्मलता सहजता से, अन्नत असीम प्रेम एक ऐसा आकर्षित बल है जो किसी भी जीव में अपना ही तदरूप साक्षात्कार को ढूंढ लेता हैं , मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे समझना खुद को समझना एक ही बात है जो मुझे समझ गया वो भी खुद का साक्षात्कार उसी पल कर सकता हैं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्येक जीव में साँसों के एहसास भाव में ही हूं, मन से परे बुद्धि से परे शरीर से परे सोच विचार चिंतन मनन विवेक ज्ञान विज्ञान ध्यान दार्शनिक के भी परे, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ इक पल की निष्पक्ष समझ में हूं , मेरा अन्नत असीम प्रेम शब्दों से भी परे अन्नत मोनता की गहराई में ही है , मेरा अन्नत असीम प्रेम की गहराई निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत के आधार पर, मन बुद्धि की छाया से भी बहुत अधिक परे है, मेरा अन्नत असीम प्रेम खुद की निष्पक्ष समझ खुद की ही शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला देता हैं, कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, हर पल सम्पूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष समक्ष रहता है हर पल जीवित ही हमेशा के लिए, खुद ही खुद की ही देह से ही विदेह हो जाता हैं , मेरा प्रेम वो है जो खुद में समहित कर लेता हैं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और क्या हो सकता हैं, और जो भी है सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट हैं,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से, युगों सदियों का भ्रम सिर्फ़ एक पल में ख़त्म होता हैं और उसी एक पल में खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए समहित हो जाता हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर, जो बनाई हुई युगों की ढूंढने बाली धारणाओं से से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरा श्रमिकरण सिर्फ़ एक पल में ही पर्याप्त है खुद के साक्षात्कार के लिए अनुभव अनुभूति प्रत्यक्ष समक्ष हैं
इस से आगे और भी अधिक गहराई से लिखें मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ हृदय के भव अहसास में ही प्रत्यक्ष समक्ष हूं प्रत्येक जीव के
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो ही हृदय का अहसास ज़मीर भव हूं जिसे युगों सदियों से हर पल नज़र अंदाज़ कर बुद्धि मन में उलझ जाते हो, वो सिर्फ़ जीवन व्यापन का स्रोत है और कुछ भी नहीं, या फ़िर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सब से अलग इक ऐसा अद्भुद आश्चर्य चकित दृष्टिकोण रखता हूं जो खुद का ही आंतरिक भौतिक दृष्टिकोण ही हमेशा के लिए बदल देता सृष्टि प्रकृति मानव के प्रति, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव शरीर बुद्धि मन प्रत्यक्ष समक्ष अस्तित्व हीन हो जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का दृष्टिकोण ही इतना अधिक स्पष्ट है तर्क तथ्य मेरे सिद्धांतों के साथ, खुद का साक्षात्कार हूं शब्दों का विशेष ही ख़त्म होता
हैं,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि में इंसान प्रजाति की प्रवृति खोज की ही रही है अस्तित्व से ही लेकर, पर उस के साधन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ढूंढते थे जो सिर्फ़ जीवन व्यापन का ही स्रोत था, पर ख़ोज का मध्यम गलत था, जबकि ढूंढने का विषय ही नहीं था, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल होते हुए निष्पक्ष समझ से समझने का विषय था,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु के बिना कोई भी व्यक्ति इंसान हो ही सकता, सिर्फ़ एक मानसिक रोगी हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान भी मानसिकता ही है और कुछ भी नहीं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, के बिना इंसान अस्तित्व से लेकर पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ एक मानसिक रोगी ही हैं चाहे कोई भी हो, शायद दूसरी अनेक प्रजातियों से भी खरबों गुणा अधिक नीच अग्र बतर भयानक ख़तरनाक है खुद के लिए प्रकृति मानव प्रजाति के लिए, खुद के साक्षात्कार के बाद एक सर्वश्रेष्ठ इंसान बन जाता हैं जो प्रकृति मानव का भी संरक्षण संभालने की क्षमता आ जाती हैं
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में जब से इंसान अस्तित्व में हैं तब से लेकर अब तक कोई एक भी इंसान खुद के साक्षात्कार नहीं कर पाया, सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी इकलौता एक ऐसा इंसान हूं, जो सरल सहज निर्मल होते हुए, अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम से खुद का अस्तित्व ख़त्म कर अपने गुरु के शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य से प्रत्यक्ष समक्ष रुबरु हुआ हूं, जिस से गुरु खुद भी अंजान हैं, उस का आंतरिक भौतिक स्वरूप बहुत ही शोर गुल से भरा हुआ हैं, अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी 25 लाख अनुयाइयों को संदेश निर्देश देने में व्यस्थ है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं ,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव के पास शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट ही था सरल सहज निर्मल गुणों के साथ फ़िर भी आज तक कोई भी व्यक्ति खुद का साक्षात्कार ही नहीं कर पाया, अतीत की चर्चित बुद्धिमान विभूतियाँ भी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी उलझी भ्रमित रही और अन्य लोगों को भी उलझा कर रखा, सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन में अपने शौंक हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट कर अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, सरल सहज निर्मल लोगों को, दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, जो एक कुप्रथा है, जो सदियों से चली आ रही हैं, जबकि प्रत्येक व्यक्ति खुद ही खुद में सक्षम समर्थ निपुण हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर खुद के साक्षात्कार के लिए, खुद का साक्षात्कार, अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों की अवधारणा कल्पना झूठ पाखंड बाज़ी से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, सिर्फ़ एक पल में कोई भी सरल सहज निर्मल व्यक्ति खुद ही खुद को समझ सकता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर ,
खुद का साक्षात्कार इतना अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ और इतना अधिक समक्ष प्रत्यक्ष स्पष्ट इतना अधिक क़रीब साफ़ की कोई सोच भी नहीं सकता, फ़िर भी पागल कुत्ते की भांति अस्तित्व से लेकर अब तक सिर्फ़ भड़कता ही रहा और सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर भड़कता ही रहा, कितना अधिक शातिर चलक शैतान चतुर है, उज्वल कपड़े पहनने वाले गुरु लोग,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अतीत के चार युगों में इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक था ही नहीं, क्योंकि सत्य की कोई नक़ल ही नहीं की जा सकती, जो भी था वो मानसिकता का सिर्फ़ कचरा ही था जिसे जैसा चाहा तोड़ मरोड़ कर ग्रंथ पोथियों पुस्तकों के रूप में पेश किया गया,
जिस कथित प्रभुत्व होने के अहम अहंकार घमंड में गुरु चूर है वो प्रभु रब की पदवी उन्होंने ही दी हैं जिन सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर खुद के हित साधने के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं, खरबों का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ , जिन से प्रत्यक्ष तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित करवा कर, बदले में मृत्यु के बाद की झूठी मुक्ति का अश्वासन दिया जाता हैं एक आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह रच कर छल कपट तंत्र के
अंतर्गत , यह सब शैतान चालाक होशियार बदमाश चतुरता चलाकी है, उनके साथ ही जिन्होंने सिर्फ़ सिर्फ़ एक शब्द पर ही अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समर्पित कर दिया, सच में गुरु शिष्य का रिश्ता इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र गहरा है कि ऐसा दूसरा कोई सृष्टि में दूसरा रिश्ता ही नहीं, उसी पवित्र उत्तम रिश्ते को ही इतनी अधिक चतुराई से ताड़ ताड़ किया जाता हैं सिर्फ़ एक गुरु द्वारा ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं जिस को शिष्य के ही द्वारा पूजा जाता हैं, रब से भी ऊंची पदवी दी जाती हैं, वो ही गुरु सिर्फ़ अपने हित साधने के लिए पीढी दर पीढी इस्तेमाल करता हैं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत तले रखता हैं अपने ही अनुयाइयों को, जिस दृष्टिकोण में प्रत्येक व्यक्ति हैं वो सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने का ही दृष्टिकोण है जो सिर्फ़ एक मानसिकता हैं भ्रम है और कुछ भी नहीं, मेरा शिरोमणि रामपॉल सैनी का मेरी निष्पक्ष समझ का दृष्टिकोण है जो एक दम स्पष्ट साफ़ सिद्ध है, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से, सिर्फ़ खुद ही खुद को सिर्फ़ एक पल में ही समझ सकता हैं कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है ,
खुद का साक्षात्कार एक बात है जो इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर आज तक नहीं कर पाई, खुद का अस्तित्व ख़त्म कर गुरु के उस स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर उसी का तदरूप साक्षात्कार होना दूसरी बात है, वो भी उस गुरु के जो पचीस लाख अनुयाइयों में दिन रात हर पल उलझा हुआ हैं संपूर्ण रूप से सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ आंतरिक भौतिक रूप से, जो खुद के ही स्थाई परिचय से ही अपरिचित हैं, मैने उस गुरु में भी खुद का साक्षात्कार कर लिया, जो यह सोच भी नहीं सकता, उस से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट निरंतरता में ही हूं निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में, मेरे अन्नत असीम प्रेम में जो भी हुआ जैसा भी हुआ किसी के ही द्वारा बो ही होना प्रकृति द्वारा ही तै सर्वश्रेष्ठ स्पष्ट था, तब ही तो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
खुद का साक्षात्कार तत्पर्य मृत्यु के बाद का शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिय, निष्पक्ष समझ से होश में ही जीते हुए खुद को अनेक तत्वों में खुद ही रूपांतर कर सकता हैं, सरल सहज निर्मल अन्नत असीम प्रेम से खुद का साक्षात्कार कर सकता हैं, मृत्यु भ्रम है अवधारणा कल्पना झूठ डर खौफ भय
दहशत हैं, चतुर गुरुओं का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का
चक्रव्यूह हैं, अपने हित साधने के लिए
यहीं अन्नत असीम प्रेम खुद किसी में भी अपनी प्रवृति अपना ही तदरूप साक्षात्कार ढूंढ लेता हैं बहुत ही अधिक सरलता निर्मलता सहजता से, अन्नत असीम प्रेम एक ऐसा आकर्षित बल है जो किसी भी जीव में अपना ही तदरूप साक्षात्कार को ढूंढ लेता हैं , मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे समझना खुद को समझना एक ही बात है जो मुझे समझ गया वो भी खुद का साक्षात्कार उसी पल कर सकता हैं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्येक जीव में साँसों के एहसास भाव में ही हूं, मन से परे बुद्धि से परे शरीर से परे सोच विचार चिंतन मनन विवेक ज्ञान विज्ञान ध्यान दार्शनिक के भी परे, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ इक पल की निष्पक्ष समझ में हूं , मेरा अन्नत असीम प्रेम शब्दों से भी परे अन्नत मोनता की गहराई में ही है , मेरा अन्नत असीम प्रेम की गहराई निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत के आधार पर, मन बुद्धि की छाया से भी बहुत अधिक परे है, मेरा अन्नत असीम प्रेम खुद की निष्पक्ष समझ खुद की ही शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला देता हैं, कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, हर पल सम्पूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष समक्ष रहता है हर पल जीवित ही हमेशा के लिए, खुद ही खुद की ही देह से ही विदेह हो जाता हैं , मेरा प्रेम वो है जो खुद में समहित कर लेता हैं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और क्या हो सकता हैं, और जो भी है सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट हैं,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से, युगों सदियों का भ्रम सिर्फ़ एक पल में ख़त्म होता हैं और उसी एक पल में खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए समहित हो जाता हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर, जो बनाई हुई युगों की ढूंढने बाली धारणाओं से से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरा श्रमिकरण सिर्फ़ एक पल में ही पर्याप्त है खुद के साक्षात्कार के लिए अनुभव अनुभूति प्रत्यक्ष समक्ष हैं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ हृदय के भव अहसास में ही प्रत्यक्ष समक्ष हूं प्रत्येक जीव के
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो ही हृदय का अहसास ज़मीर भव हूं जिसे युगों सदियों से हर पल नज़र अंदाज़ कर बुद्धि मन में उलझ जाते हो, वो सिर्फ़ जीवन व्यापन का स्रोत है और कुछ भी नहीं, या फ़िर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सब से अलग इक ऐसा अद्भुद आश्चर्य चकित दृष्टिकोण रखता हूं जो खुद का ही आंतरिक भौतिक दृष्टिकोण ही हमेशा के लिए बदल देता सृष्टि प्रकृति मानव के प्रति, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव शरीर बुद्धि मन प्रत्यक्ष समक्ष अस्तित्व हीन हो जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का दृष्टिकोण ही इतना अधिक स्पष्ट है तर्क तथ्य मेरे सिद्धांतों के साथ, खुद का साक्षात्कार हूं शब्दों का विशेष ही ख़त्म होता
हैं,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि में इंसान प्रजाति की प्रवृति खोज की ही रही है अस्तित्व से ही लेकर, पर उस के साधन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ढूंढते थे जो सिर्फ़ जीवन व्यापन का ही स्रोत था, पर ख़ोज का मध्यम गलत था, जबकि ढूंढने का विषय ही नहीं था, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल होते हुए निष्पक्ष समझ से समझने का विषय था,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु के बिना कोई भी व्यक्ति इंसान हो ही सकता, सिर्फ़ एक मानसिक रोगी हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान भी मानसिकता ही है और कुछ भी नहीं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, के बिना इंसान अस्तित्व से लेकर पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ एक मानसिक रोगी ही हैं चाहे कोई भी हो, शायद दूसरी अनेक प्रजातियों से भी खरबों गुणा अधिक नीच अग्र बतर भयानक ख़तरनाक है खुद के लिए प्रकृति मानव प्रजाति के लिए, खुद के साक्षात्कार के बाद एक सर्वश्रेष्ठ इंसान बन जाता हैं जो प्रकृति मानव का भी संरक्षण संभालने की क्षमता आ जाती हैं
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में जब से इंसान अस्तित्व में हैं तब से लेकर अब तक कोई एक भी इंसान खुद के साक्षात्कार नहीं कर पाया, सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी इकलौता एक ऐसा इंसान हूं, जो सरल सहज निर्मल होते हुए, अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम से खुद का अस्तित्व ख़त्म कर अपने गुरु के शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य से प्रत्यक्ष समक्ष रुबरु हुआ हूं, जिस से गुरु खुद भी अंजान हैं, उस का आंतरिक भौतिक स्वरूप बहुत ही शोर गुल से भरा हुआ हैं, अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी 25 लाख अनुयाइयों को संदेश निर्देश देने में व्यस्थ है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं ,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव के पास शाश्वत वास्तविक स्व
मैंने उसी गुरु में ही खुद के या गुरु के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर खुद की निष्पक्ष समझ से ख़ुद का साक्षात्कार हूं, जो संपूर्ण संतुष्टि में हूं प्रत्यक्ष समक्ष हूं, वो गुरु और उस के 25 लाख अनुयाइ मेरी इन सब को स्वीकार नहीं करते क्योंकि वो सब सिर्फ़ दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित है और कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर है, गुरु सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी का शिकार है , दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बन कर गुरु के शब्द को ही अंतिम सत्य मान कर चलते हैं इसी अवधारण में ही बेहोशी में ही जीते हैं और इसी बेहोशी में ही मर जाते हैं, इसी उमीद में की मरने के बाद मुक्ति मिल जाएगी, सर्वश्रेष्ठ इंसान जीवन का महत्त्व ख़त्म कर देते हैं, जबकि खुद का साक्षात्कार प्रत्येक व्यक्ति के लिए पर्याप्त है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ,
खुद का साक्षात्कार के लिए शब्द ख़त्म होते हैं शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ़ दुनियां में होता हैं जीवन व्यापन के लिए, मेरे सिद्धांतों के अधार पर यहां शब्द है बहा कोई दूसरा या सृष्टि को व्यक्त करते हैं, यहाँ शब्द हैं बहा झूठ ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह हैं भ्रम है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं prtek सरल सहज निर्मल व्यक्ति मेरी निष्पक्ष समझ के आधार पर मेरी तरह संपूर्ण संतुष्टि में रह सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए , मृत्यु संपूर्ण संतुष्टि सर्वश्रेष्ठ सत्य हैं जिस के लिए कुछ भी रति भर भी करने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि जन्म मृत्यु प्रकृतिक प्रक्रिय है, जन्म मृत्यु के बीच के सफ़र का ही नाम जीवन हैं,
इंसान प्रजाति जिस अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर अपनी कल्पनाओं को ढूंढ रहा था उस से सिर्फ़ जीवन व्यापन ही कर सकता हैं, न कि खुद को समझ कर खुद का साक्षात्कार,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने गुरु के उस स्वरुप से रुबरु हुआ हूं जिस से मेरा गुरु खुद भी नहीं परिचित, क्योंकि वो भी अपने गुरु से दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित हो कर अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के अहम अहंकार घमंड में चूर है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
क्योंकि मैंने अन्नत असीम प्रेम किया है, ख़ुद की शुद्ध
बुद्ध चेहरा तक भुला हूं,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अन्नत असीम प्रेम की गहराई से अपने ही गुरु के उस शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य स्वरुप से रुबरु हूं, जिस से गुरु खुद भी रुबरु नहीं था कभी भी, और दूसरा भी कोई नहीं 25 लाख अनुयाइयों में से भी, जो प्रत्येक व्यक्ति सरल सहज निर्मल होते हुए हो सकता हैं,
यहीं अन्नत असीम प्रेम खुद किसी में भी अपनी प्रवृति अपना ही तदरूप साक्षात्कार ढूंढ लेता हैं बहुत ही अधिक सरलता निर्मलता सहजता से, अन्नत असीम प्रेम एक ऐसा आकर्षित बल है जो किसी भी जीव में अपना ही तदरूप साक्षात्कार को ढूंढ लेता हैं , मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे समझना खुद को समझना एक ही बात है जो मुझे समझ गया वो भी खुद का साक्षात्कार उसी पल कर सकता हैं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्येक जीव में साँसों के एहसास भाव में ही हूं, मन से परे बुद्धि से परे शरीर से परे सोच विचार चिंतन मनन विवेक ज्ञान विज्ञान ध्यान दार्शनिक के भी परे, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ इक पल की निष्पक्ष समझ में हूं , मेरा अन्नत असीम प्रेम शब्दों से भी परे अन्नत मोनता की गहराई में ही है , मेरा अन्नत असीम प्रेम की गहराई निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत के आधार पर, मन बुद्धि की छाया से भी बहुत अधिक परे है, मेरा अन्नत असीम प्रेम खुद की निष्पक्ष समझ खुद की ही शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला देता हैं, कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, हर पल सम्पूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष समक्ष रहता है हर पल जीवित ही हमेशा के लिए, खुद ही खुद की ही देह से ही विदेह हो जाता हैं , मेरा प्रेम वो है जो खुद में समहित कर लेता हैं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और क्या हो सकता हैं, और जो भी है सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट हैं,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से, युगों सदियों का भ्रम सिर्फ़ एक पल में ख़त्म होता हैं और उसी एक पल में खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए समहित हो जाता हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर, जो बनाई हुई युगों की ढूंढने बाली धारणाओं से से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरा श्रमिकरण सिर्फ़ एक पल में ही पर्याप्त है खुद के साक्षात्कार के लिए अनुभव अनुभूति प्रत्यक्ष समक्ष हैं
इस से आगे और भी अधिक गहराई से लिखें मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ हृदय के भव अहसास में ही प्रत्यक्ष समक्ष हूं प्रत्येक जीव के
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो ही हृदय का अहसास ज़मीर भव हूं जिसे युगों सदियों से हर पल नज़र अंदाज़ कर बुद्धि मन में उलझ जाते हो, वो सिर्फ़ जीवन व्यापन का स्रोत है और कुछ भी नहीं, या फ़िर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सब से अलग इक ऐसा अद्भुद आश्चर्य चकित दृष्टिकोण रखता हूं जो खुद का ही आंतरिक भौतिक दृष्टिकोण ही हमेशा के लिए बदल देता सृष्टि प्रकृति मानव के प्रति, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव शरीर बुद्धि मन प्रत्यक्ष समक्ष अस्तित्व हीन हो जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का दृष्टिकोण ही इतना अधिक स्पष्ट है तर्क तथ्य मेरे सिद्धांतों के साथ, खुद का साक्षात्कार हूं शब्दों का विशेष ही ख़त्म होता
हैं,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि में इंसान प्रजाति की प्रवृति खोज की ही रही है अस्तित्व से ही लेकर, पर उस के साधन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ढूंढते थे जो सिर्फ़ जीवन व्यापन का ही स्रोत था, पर ख़ोज का मध्यम गलत था, जबकि ढूंढने का विषय ही नहीं था, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल होते हुए निष्पक्ष समझ से समझने का विषय था,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु के बिना कोई भी व्यक्ति इंसान हो ही सकता, सिर्फ़ एक मानसिक रोगी हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान भी मानसिकता ही है और कुछ भी नहीं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, के बिना इंसान अस्तित्व से लेकर पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ एक मानसिक रोगी ही हैं चाहे कोई भी हो, शायद दूसरी अनेक प्रजातियों से भी खरबों गुणा अधिक नीच अग्र बतर भयानक ख़तरनाक है खुद के लिए प्रकृति मानव प्रजाति के लिए, खुद के साक्षात्कार के बाद एक सर्वश्रेष्ठ इंसान बन जाता हैं जो प्रकृति मानव का भी संरक्षण संभालने की क्षमता आ जाती हैं
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में जब से इंसान अस्तित्व में हैं तब से लेकर अब तक कोई एक भी इंसान खुद के साक्षात्कार नहीं कर पाया, सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी इकलौता एक ऐसा इंसान हूं, जो सरल सहज निर्मल होते हुए, अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम से खुद का अस्तित्व ख़त्म कर अपने गुरु के शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य से प्रत्यक्ष समक्ष रुबरु हुआ हूं, जिस से गुरु खुद भी अंजान हैं, उस का आंतरिक भौतिक स्वरूप बहुत ही शोर गुल से भरा हुआ हैं, अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी 25 लाख अनुयाइयों को संदेश निर्देश देने में व्यस्थ है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं ,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव के पास शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट ही था सरल सहज निर्मल गुणों के साथ फ़िर भी आज तक कोई भी व्यक्ति खुद का साक्षात्कार ही नहीं कर पाया, अतीत की चर्चित बुद्धिमान विभूतियाँ भी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी उलझी भ्रमित रही और अन्य लोगों को भी उलझा कर रखा, सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन में अपने शौंक हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट कर अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, सरल सहज निर्मल लोगों को, दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, जो एक कुप्रथा है, जो सदियों से चली आ रही हैं, जबकि प्रत्येक व्यक्ति खुद ही खुद में सक्षम समर्थ निपुण हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर खुद के साक्षात्कार के लिए, खुद का साक्षात्कार, अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों की अवधारणा कल्पना झूठ पाखंड बाज़ी से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, सिर्फ़ एक पल में कोई भी सरल सहज निर्मल व्यक्ति खुद ही खुद को समझ सकता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर ,
खुद का साक्षात्कार इतना अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ और इतना अधिक समक्ष प्रत्यक्ष स्पष्ट इतना अधिक क़रीब साफ़ की कोई सोच भी नहीं सकता, फ़िर भी पागल कुत्ते की भांति अस्तित्व से लेकर अब तक सिर्फ़ भड़कता ही रहा और सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर भड़कता ही रहा, कितना अधिक शातिर चलक शैतान चतुर है, उज्वल कपड़े पहनने वाले गुरु लोग,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अतीत के चार युगों में इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक था ही नहीं, क्योंकि सत्य की कोई नक़ल ही नहीं की जा सकती, जो भी था वो मानसिकता का सिर्फ़ कचरा ही था जिसे जैसा चाहा तोड़ मरोड़ कर ग्रंथ पोथियों पुस्तकों के रूप में पेश किया गया,
जिस कथित प्रभुत्व होने के अहम अहंकार घमंड में गुरु चूर है वो प्रभु रब की पदवी उन्होंने ही दी हैं जिन सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर खुद के हित साधने के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं, खरबों का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ , जिन से प्रत्यक्ष तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित करवा कर, बदले में मृत्यु के बाद की झूठी मुक्ति का अश्वासन दिया जाता हैं एक आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह रच कर छल कपट तंत्र के
अंतर्गत , यह सब शैतान चालाक होशियार बदमाश चतुरता चलाकी है, उनके साथ ही जिन्होंने सिर्फ़ सिर्फ़ एक शब्द पर ही अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समर्पित कर दिया, सच में गुरु शिष्य का रिश्ता इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र गहरा है कि ऐसा दूसरा कोई सृष्टि में दूसरा रिश्ता ही नहीं, उसी पवित्र उत्तम रिश्ते को ही इतनी अधिक चतुराई से ताड़ ताड़ किया जाता हैं सिर्फ़ एक गुरु द्वारा ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं जिस को शिष्य के ही द्वारा पूजा जाता हैं, रब से भी ऊंची पदवी दी जाती हैं, वो ही गुरु सिर्फ़ अपने हित साधने के लिए पीढी दर पीढी इस्तेमाल करता हैं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत तले रखता हैं अपने ही अनुयाइयों को, जिस दृष्टिकोण में प्रत्येक व्यक्ति हैं वो सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने का ही दृष्टिकोण है जो सिर्फ़ एक मानसिकता हैं भ्रम है और कुछ भी नहीं, मेरा शिरोमणि रामपॉल सैनी का मेरी निष्पक्ष समझ का दृष्टिकोण है जो एक दम स्पष्ट साफ़ सिद्ध है, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से, सिर्फ़ खुद ही खुद को सिर्फ़ एक पल में ही समझ सकता हैं कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है ,
खुद का साक्षात्कार एक बात है जो इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर आज तक नहीं कर पाई, खुद का अस्तित्व ख़त्म कर गुरु के उस स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर उसी का तदरूप साक्षात्कार होना दूसरी बात है, वो भी उस गुरु के जो पचीस लाख अनुयाइयों में दिन रात हर पल उलझा हुआ हैं संपूर्ण रूप से सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ आंतरिक भौतिक रूप से, जो खुद के ही स्थाई परिचय से ही अपरिचित हैं, मैने उस गुरु में भी खुद का साक्षात्कार कर लिया, जो यह सोच भी नहीं सकता, उस से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट निरंतरता में ही हूं निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग में, मेरे अन्नत असीम प्रेम में जो भी हुआ जैसा भी हुआ किसी के ही द्वारा बो ही होना प्रकृति द्वारा ही तै सर्वश्रेष्ठ स्पष्ट था, तब ही तो मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
खुद का साक्षात्कार तत्पर्य मृत्यु के बाद का शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जन्म मृत्यु प्रकृतिक संतुलन प्रक्रिय, निष्पक्ष समझ से होश में ही जीते हुए खुद को अनेक तत्वों में खुद ही रूपांतर कर सकता हैं, सरल सहज निर्मल अन्नत असीम प्रेम से खुद का साक्षात्कार कर सकता हैं, मृत्यु भ्रम है अवधारणा कल्पना झूठ डर खौफ भय
दहशत हैं, चतुर गुरुओं का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का
चक्रव्यूह हैं, अपने हित साधने के लिए
यहीं अन्नत असीम प्रेम खुद किसी में भी अपनी प्रवृति अपना ही तदरूप साक्षात्कार ढूंढ लेता हैं बहुत ही अधिक सरलता निर्मलता सहजता से, अन्नत असीम प्रेम एक ऐसा आकर्षित बल है जो किसी भी जीव में अपना ही तदरूप साक्षात्कार को ढूंढ लेता हैं , मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई हूं, सरल सहज निर्मल गुणों के साथ प्रत्यक्ष समक्ष हूं मुझे समझना खुद को समझना एक ही बात है जो मुझे समझ गया वो भी खुद का साक्षात्कार उसी पल कर सकता हैं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी प्रत्येक जीव में साँसों के एहसास भाव में ही हूं, मन से परे बुद्धि से परे शरीर से परे सोच विचार चिंतन मनन विवेक ज्ञान विज्ञान ध्यान दार्शनिक के भी परे, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ इक पल की निष्पक्ष समझ में हूं , मेरा अन्नत असीम प्रेम शब्दों से भी परे अन्नत मोनता की गहराई में ही है , मेरा अन्नत असीम प्रेम की गहराई निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत के आधार पर, मन बुद्धि की छाया से भी बहुत अधिक परे है, मेरा अन्नत असीम प्रेम खुद की निष्पक्ष समझ खुद की ही शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला देता हैं, कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, हर पल सम्पूर्ण संतुष्टि में प्रत्यक्ष समक्ष रहता है हर पल जीवित ही हमेशा के लिए, खुद ही खुद की ही देह से ही विदेह हो जाता हैं , मेरा प्रेम वो है जो खुद में समहित कर लेता हैं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सिर्फ़ अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष के प्रतिभिम्व का भी स्थान नहीं है और क्या हो सकता हैं, और जो भी है सिर्फ़ ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट हैं,
मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग से, युगों सदियों का भ्रम सिर्फ़ एक पल में ख़त्म होता हैं और उसी एक पल में खुद के साक्षात्कार में जीवित ही हमेशा के लिए समहित हो जाता हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर, जो बनाई हुई युगों की ढूंढने बाली धारणाओं से से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरा श्रमिकरण सिर्फ़ एक पल में ही पर्याप्त है खुद के साक्षात्कार के लिए अनुभव अनुभूति प्रत्यक्ष समक्ष हैं
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक सत्य सिर्फ़ हृदय के भव अहसास में ही प्रत्यक्ष समक्ष हूं प्रत्येक जीव के
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी वो ही हृदय का अहसास ज़मीर भव हूं जिसे युगों सदियों से हर पल नज़र अंदाज़ कर बुद्धि मन में उलझ जाते हो, वो सिर्फ़ जीवन व्यापन का स्रोत है और कुछ भी नहीं, या फ़िर सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी सब से अलग इक ऐसा अद्भुद आश्चर्य चकित दृष्टिकोण रखता हूं जो खुद का ही आंतरिक भौतिक दृष्टिकोण ही हमेशा के लिए बदल देता सृष्टि प्रकृति मानव के प्रति, समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव शरीर बुद्धि मन प्रत्यक्ष समक्ष अस्तित्व हीन हो जाता हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग का दृष्टिकोण ही इतना अधिक स्पष्ट है तर्क तथ्य मेरे सिद्धांतों के साथ, खुद का साक्षात्कार हूं शब्दों का विशेष ही ख़त्म होता
हैं,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि में इंसान प्रजाति की प्रवृति खोज की ही रही है अस्तित्व से ही लेकर, पर उस के साधन अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर ढूंढते थे जो सिर्फ़ जीवन व्यापन का ही स्रोत था, पर ख़ोज का मध्यम गलत था, जबकि ढूंढने का विषय ही नहीं था, सिर्फ़ सरल सहज निर्मल होते हुए निष्पक्ष समझ से समझने का विषय था,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु के बिना कोई भी व्यक्ति इंसान हो ही सकता, सिर्फ़ एक मानसिक रोगी हैं, ज्ञान विज्ञान दार्शनिक प्रतिभा कला कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन विवेक ध्यान भी मानसिकता ही है और कुछ भी नहीं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, के बिना इंसान अस्तित्व से लेकर पिछले चार युगों से अब तक सिर्फ़ एक मानसिक रोगी ही हैं चाहे कोई भी हो, शायद दूसरी अनेक प्रजातियों से भी खरबों गुणा अधिक नीच अग्र बतर भयानक ख़तरनाक है खुद के लिए प्रकृति मानव प्रजाति के लिए, खुद के साक्षात्कार के बाद एक सर्वश्रेष्ठ इंसान बन जाता हैं जो प्रकृति मानव का भी संरक्षण संभालने की क्षमता आ जाती हैं
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में जब से इंसान अस्तित्व में हैं तब से लेकर अब तक कोई एक भी इंसान खुद के साक्षात्कार नहीं कर पाया, सिर्फ़ मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी इकलौता एक ऐसा इंसान हूं, जो सरल सहज निर्मल होते हुए, अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम से खुद का अस्तित्व ख़त्म कर अपने गुरु के शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य से प्रत्यक्ष समक्ष रुबरु हुआ हूं, जिस से गुरु खुद भी अंजान हैं, उस का आंतरिक भौतिक स्वरूप बहुत ही शोर गुल से भरा हुआ हैं, अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी 25 लाख अनुयाइयों को संदेश निर्देश देने में व्यस्थ है, मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य हूं ख़ुद का साक्षात्कार हूं ,
समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव के पास शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट ही था सरल सहज निर्मल गुणों के साथ फ़िर भी आज तक कोई भी व्यक्ति खुद का साक्षात्कार ही नहीं कर पाया, अतीत की चर्चित बुद्धिमान विभूतियाँ भी, अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान हो कर भी उलझी भ्रमित रही और अन्य लोगों को भी उलझा कर रखा, सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन में अपने शौंक हित साधने के लिए ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट कर अपना सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के लिए, सरल सहज निर्मल लोगों को, दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, जो एक कुप्रथा है, जो सदियों से चली आ रही हैं, जबकि प्रत्येक व्यक्ति खुद ही खुद में सक्षम समर्थ निपुण हैं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर खुद के साक्षात्कार के लिए, खुद का साक्षात्कार, अतीत की चर्चित विभूतियों दार्शनिकों वैज्ञानिकों की अवधारणा कल्पना झूठ पाखंड बाज़ी से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष हैं, सिर्फ़ एक पल में कोई भी सरल सहज निर्मल व्यक्ति खुद ही खुद को समझ सकता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है,
मेरे सिद्धांतों के अधार पर ,
खुद का साक्षात्कार इतना अधिक सरल सहज निर्मल गुणों के साथ और इतना अधिक समक्ष प्रत्यक्ष स्पष्ट इतना अधिक क़रीब साफ़ की कोई सोच भी नहीं सकता, फ़िर भी पागल कुत्ते की भांति अस्तित्व से लेकर अब तक सिर्फ़ भड़कता ही रहा और सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर भड़कता ही रहा, कितना अधिक शातिर चलक शैतान चतुर है, सफ़ेद उज्वल कपड़े पहनने वाले गुरु लोग,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष अतीत के चार युगों में इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक था ही नहीं, क्योंकि सत्य की कोई नक़ल ही नहीं की जा सकती, जो भी था वो मानसिकता का सिर्फ़ कचरा ही था जिसे जैसा चाहा तोड़ मरोड़ कर ग्रंथ पोथियों पुस्तकों के रूप में पेश किया गया,
जिस कथित प्रभुत्व होने के अहम अहंकार घमंड में गुरु चूर है वो प्रभु रब की पदवी उन्होंने ही दी हैं जिन सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध भक्त कट्टर भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर खुद के हित साधने के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं, खरबों का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी के साथ , जिन से प्रत्यक्ष तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित करवा कर, बदले में मृत्यु के बाद की झूठी मुक्ति का अश्वासन दिया जाता हैं एक आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह रच कर छल कपट तंत्र के
अंतर्गत , यह सब शैतान चालाक होशियार बदमाश चतुरता चलाकी है, उनके साथ ही जिन्होंने सिर्फ़ सिर्फ़ एक शब्द पर ही अपना सब कुछ प्रत्यक्ष समक्ष समर्पित कर दिया, सच में गुरु शिष्य का रिश्ता इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ पवित्र गहरा है कि ऐसा दूसरा कोई सृष्टि में दूसरा रिश्ता ही नहीं, उसी पवित्र उत्तम रिश्ते को ही इतनी अधिक चतुराई से ताड़ ताड़ किया जाता हैं सिर्फ़ एक गुरु द्वारा ही सृष्टि का सब से बड़ा विश्वासघात किया जाता हैं जिस को शिष्य के ही द्वारा पूजा जाता हैं, रब से भी ऊंची पदवी दी जाती हैं, वो ही गुरु सिर्फ़ अपने हित साधने के लिए पीढी दर पीढी इस्तेमाल करता हैं, सिर्फ़ डर खौफ भय दहशत तले रखता हैं अपने ही अनुयाइयों को, जिस दृष्टिकोण में प्रत्येक व्यक्ति हैं वो सिर्फ़ अस्थाई जटिल बुद्धि मन से बुद्धिमान होने का ही दृष्टिकोण है जो सिर्फ़ एक मानसिकता हैं भ्रम है और कुछ भी नहीं, मेरा शिरोमणि रामपॉल सैनी का मेरी निष्पक्ष समझ का दृष्टिकोण है जो एक दम स्पष्ट साफ़ सिद्ध है, तर्क तथ्य विवेक सिद्धांतों से, सिर्फ़ खुद ही खुद को सिर्फ़ एक पल में ही समझ सकता हैं कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदिया युग भी कम है ,
खुद का साक्षात्कार एक बात है जो इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर आज तक नहीं कर पाई, खुद का अस्तित्व ख़त्म कर गुरु के उस स्थाई स्वरुप से रुबरु हो कर उसी का तदरूप साक्षात्कार होना दूसरी बात है, वो भी उस गुरु के जो पचीस लाख अन
मेरे अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव ने गुरु शिष्य का रिश्ता ही ख़त्म कर दिया, जो दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण का बंदन था , मैंने गुरु के प्रथम दीदार और उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम के भाव को हृदय की अन्नत गहराई से लिया, उस के बाद और किसी को भी उस पवित्र निगह से आज तक कुछ और देखा ही नहीं, उसी पवित्र अन्नत असीम प्रेम को हर पल दिन रात संजोने में ही लगा रहा निरंतर, अन्नत असीम प्रेम शब्द दृश्य स्पर्ष नियम मर्यादा जाति प्रजाति का विषय कभी भी नहीं होता, सिर्फ़ इन की मूलतः का भाव एहसास स्वयं स्पष्टता प्रत्यक्षता है, जो सिर्फ़ एक ही सत्य जो प्रतेक प्रजाति में ही एक समान है, और सब कुछ कम अधिक हो सकता हैं आंतरिक भौतिक रूप से, परन्तु सांसों समय के साथ हृदय से अहसास भाव के साथ उत्पन होने वाला शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रेम सिर्फ़ एक ही एक समान है
मैंने अपने गुरु से अन्नत असीम प्रेम किया है सच मुच अपनी सुध बुध अपना चेहरा तक भुला हुआ हूं, काफ़ी पिछले चार दशकों से संपूर्ण मोनता में ही हूं कभी गुरु से बात नहीं की पर गुरु हमेशा मुझे डांटते ही रहते थे जब भी मैं चार पंच बर्ष के बाद में दर्शन करने जाता था, फ़िर भी मैं उन में ही निरंतरता से उन के ही प्रेम में रमता हूं आज भी, अब मैं चाहता हूं कि उन से मिलु एक तो उन के आश्रम कार्य के संयोग के लिए करोड़ों रुपए दिए थे जिन में से एक करोड़ गुरु ने जरूरत पड़ने पर वापिस देने का खुद शब्द दिया था, क्योंकि प्रेम की निरंतरता और खुद के साक्षात्कार के कारण और कुछ भी सोच ही नहीं सकता खुद के लिए ही, कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, दूसरा वो सब कुछ जो कुछ इतने लंबे समय के अंतराल में किया है, दुनियां में कभी भी इक पल के लिए भी नहीं रहा, गुरु के अन्नत असीम प्रेम में ही निरंतर हूँ बहा के इक इक पल के बारे में बता सकता हूं, जो मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के बारे में, इस सब का श्रेह उन के ही चरण कमलों में समर्पित करते हुए, मेरे लिए तो वो ही सर्ब श्रेष्ठ हैं जो भी हुआ वो सब तो उनकी शरणागत के बाद ही हुआ, जो अन्य किसी भी अनुराई के साथ नहीं हुआ, सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ स्नेह और सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ समर्पित भाव भरा जिस में गिले शिकवों का भी स्थान नहीं था सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम हो एक सरल सहज निर्मल भाव है,मैं आप के जिस शिरोमणि स्वरुप से रुबरु हुआ हूं प्रथम दिन से ही जो प्रेमतित शब्दातीत कालातीत तुलनातीत है, उस सब को ही शब्दों में वर्णन करने की इक छोटी सी कोशिश में ही इतना लंबा सड़े तीन दशक का समय लगा, मैं शब्द रहित हर पल दिन रात मौनता में सचेत, न ही कभी सोया न जागृत अवस्था में था, सर्ब प्रथम अपने ही दो पल जीवन महत्व को समझा, शेष सब दूसरा था,
मेरी निष्पक्ष समझ की निरंतरता हर पल दिन रात आप के अन्नत असीम प्रेम की गहराई में ही थीं अब मैं अपने नाम के आगे उसी शिरोमणि स्वरुप साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, इस लिए अब मेरा नाम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, इसी अंतराल में जो भी हुआ जैसा भी हुआ अच्छा या बुरा किसी के भी द्वारा बही होना तय ही था तो ही हुआ तो ही मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं, हमेशा मैंने सरल सहज निर्मल गुणों को ही संजोने में भौतिक सब कुछ नष्ट कर दिया, साहिब तदरूप साक्षात्कार की यहीं एक सर्वश्रेष्ठ खूबसूरती हैं कि खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहे खुद भी खरबों प्रयास यत्न प्रयत्न कर ले जीवित ही हमेशा के लिए खुद ही खुद को होश में रूपांतर करने तक, आप सा कोई हो ही नहीं सकता
इंसान अस्तित्व से लेकर अब तक, और सड़े तीन दशक के अंतराल की स्पष्टता दिखे और गिले शिकवों का स्थान ही न रहे क्योंकि इतने लंबे समय से गुरु से कोई बात ही नहीं की, गुरु के प्रेम की निरंतरता के
कारण, अब मेरे पास यह स्पष्टता है कि गुरु के अन्नत असीम प्रेम के बिना कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार के लिए, इतने लंबे समय से सिर्फ़ मैं उस अन्नत पवित्र असीम प्रेम को शब्दों में वर्णन करने का इक प्रयास मात्र कर रहा था जो थोड़ा सा लिख पाया कि कोई एक बार ही पढ़े तो कम से कम दस बर्ष लगेगे पूरा पढ़ पाने में, जिसमें कोई भी शब्द किसी भी विश्व के ग्रंथ पोथि में नहीं, मिल सकता, एक एक शब्द को तर्क तथ्य विवेक अपने ही सिद्धांतों से स्पष्ट साफ़ सिद्ध किया है किसी के भी अनुभव अनुभूति के लिए,
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी अपने गुरु को समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ गुरु जो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जिनको मैंने तर्क तथ्य विवेक अपने सिद्धांतों सूत्रों code ulta mega infinity quantum mechanicsim के formulation से सिद्ध किया है,मैं जो भी था वो ही संपूर्ण पर्याप्त था और कुछ भी रति भर भी बनने की कोशिश नहीं की, हां यह सच है कि जीवन के प्रतेक पल को सार्थक सकारात्मक रूप से निष्पक्ष समझ से समझने की कोशिश ज़रूर की, अब संपूर्ण संतुष्टि में हूं अस्थाई शरीर के कारण अभाव है संपूर्णता का, इसलिए मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी संपूर्ण रूप से खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार में संपूर्णता में शरीर के अस्थाई पंच तत्वों गुणों को रूपांतर कर समहित होना चाहता हूं कृपा आज्ञा प्रधान करें, अब कुछ भी शेष नहीं है रहा करने को, जिस कारण अनमोल समय सांस मिले थे,
चार दशक के लंबे समय के अन्नत असीम प्रेम की गहराई स्थाई ठहराव की निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग, खुद के साहिब तदरूप साक्षात्कार हूं तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य में प्रत्यक्ष समक्ष हूं, शेष 25 लाख गुरु सहित एक ही मान्यता परंपरा नियम मर्यादा दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित है जो सिर्फ़ चतुर कट्टर अंध भक्त भेड़ों की उग्र भीड़ बंधुआ मजदूर ही है, मेरी साहिब स्तुति सिर्फ़ मेरे ही साहिब तदरूप साक्षात्कार की हैं,जो निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग की हैं
पर ॐ अस्थाई है समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति को अंकित करता हैं,
शिरोमणि अन्नत गहरी स्थाई ठहराव है जो ॐ से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्व श्रेष्ठ प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, जप तप ध्यान ज्ञान विज्ञान योग अभ्यास साधना कृत संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन का अस्तित्व ख़त्म हो जाता हैं तो क्या तत्पर्य है इन शब्दों का भी, यह पारदर्शिता नहीं है, गलत शब्द इस्तेमाल करना दूसरों को भ्रमित करना होता हैं, सरल सहज निर्मल हैं सिर्फ़ प्रेम शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं तो जटिलता क्यों? मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत स्वाभिक शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं सिर्फ़ शब्दों के पिछे के भाव एहसास की स्पष्टता प्रत्यक्षता तदरूप साक्षात्कार हूं , खुद के साक्षात्कार के लिए तो शब्दों का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं, अगर दूसरों के लिए शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं तो पारदर्शिता स्पष्टता अति आवश्यक हैं, स्पष्टता पारदर्शिता नहीं तो तो स्वार्थ हित साधने का ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह छल कपट के साथ होगा और कुछ भी नहीं है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें