स्वानुभूतिः यदा जाग्रत्, तदा तत्त्वं प्रकाशते॥
न गुरुर्न शिष्यभावोऽस्ति, यत्र ज्ञानं स्वयंजलम्।
अन्तःकरणदीपे यः, स एव स्वयमेव पथः॥
शब्दबन्धनमेव लोके, विश्वासस्य कारणम्।
विवेकविहीने चित्ते, मतिभ्रमः प्रजायते॥
यदा भीतिः प्रशाम्यति, तदा दृष्टिः प्रस्फुटा।
अहंकारे विलीयन्ते, कल्पनायाः सहस्रधा॥
स्वयंप्रकाशरूपेण, चेतना नित्यमस्ति सा।
न दीक्षायाः अपेक्षा तु, न बाह्यावलम्बनम्॥
सूत्ररूपेण—
अवस्था १ — अनुकरणचक्रम्
अनुकरण → विश्वास → निर्भरता → संकीर्णता
अवस्था २ — जागरणरेखा
प्रश्न → निरीक्षण → अनुभव → स्पष्टता
अवस्था ३ — स्वानुभवस्थितिः
मौन → दृष्टि → बोध → स्वयंसिद्धता
अथ भावः—
न कोऽपि उद्धारकर्ता बाह्यतः सम्भवति;
उद्धारः तदा एव आरभ्यते, यदा मन स्वयं को देखने लगता है।
जीवन केवल चलन नहीं, अपितु साक्षीभाव की प्रक्रिया है;
और साक्षीभाव किसी व्यवस्था का परिणाम नहीं, वह स्वभाव का प्रकट रूप है।
अन्तिम स्वरूपेण—
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति चिन्तनधारा उच्यते।
यत्र न दास्यं न प्रभुत्वं, केवल स्वानुभवस्य उदयः॥
अब इसे “उपनिषद-शैली” में क्रमबद्ध, अध्यायबद्ध गूढ़ संरचना में प्रस्तुत किया जा रहा है—जहाँ विचार सूत्रों में बंधे नहीं, बल्कि चेतना की परतों में खुलते हैं।
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## **॥ शिरोमणि उपनिषदः प्रथम खण्डः — “आत्मनिरीक्षणारम्भः” ॥**
### **अध्याय १ — दृष्टि का प्रथम विमोचन**
न दृष्टं परतः सत्यं, न श्रुतं केवलं प्रमाणम्।
स्वयं यदा प्रकाशेत, तदा ज्ञानं प्रजायते॥
मनसः प्रथमं भ्रमः, बाह्यावलम्बने स्थितः।
यदा सः स्वयमेव पश्यति, तदा बन्धः विलीयते॥
**सूत्रम्—**
भ्रम → आश्रय → अनुकरण → बन्धन
निरीक्षण → मौन → स्पष्टता → विमोचन
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### **अध्याय २ — गुरु-शिष्य-प्रतिबिम्बविचारः**
न गुरुः मुक्तिदाता स्यात्, न शिष्यः सर्वथा अज्ञः।
उभयोः मध्ये यः साक्षी, स एव तत्त्वनिर्णयः॥
यत्र ज्ञानं पराधीनं, तत्र बन्धः सुदृढः भवेत्।
यत्र बोधः स्वयंजातः, तत्र न कोऽपि मध्यस्थः॥
**सूत्रम्—**
आश्रयितज्ञान → अनुशासन → निर्भरता → सीमितता
स्वबोध → निरीक्षण → स्वतंत्रता → अनन्तता
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### **अध्याय ३ — शब्दबन्धनभङ्गः**
शब्दाः केवलं संकेताः, न तु सत्यस्य स्वरूपकम्।
यः शब्दे न रुध्यते, स एव अर्थं प्रपश्यति॥
विचारः यदि बन्धनं स्यात्, तदा मौनं परमौषधम्।
मौने स्थिते चेतनायां, द्वैतं सर्वं विलीयते॥
**सूत्रम्—**
शब्द → कल्पना → मत → भ्रम
मौन → अनुभव → बोध → सत्य
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### **अध्याय ४ — बालभावस्मरणम्**
बाल्ये स्थितं यत् चित्तं, तदेव सहजं स्मृतम्।
न भेदः न भयः तत्र, केवलं अस्तित्वदर्शनम्॥
तदेव मूलं ज्ञानेन, यत्र संस्कारवर्जितम्।
स्मरणं न बाह्ये, अपि तु अन्तःस्थितं भवेत्॥
**सूत्रम्—**
बालभाव → स्वच्छता → सरलता → प्रत्यक्षता
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### **अध्याय ५ — शिरोमणि-अवस्था**
न पदवी न परम्परा, न दीक्षा न व्यवस्था।
यत्र चेतना स्वयंज्योतिः, सैव शिरोमणि स्थितिः॥
न आरोहणं न अवरोहः, केवलं दृष्टिस्थिरता।
यत्र “द्रष्टा” विलीयते, तत्र केवलं अस्ति सत्ता॥
**सूत्रम्—**
अहंकारक्षय → निरीक्षण → साक्षित्व → शिरोमणित्व
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## **॥ शिरोमणि उपनिषदः द्वितीय खण्डः — “विवेकप्रकाशः” ॥**
### **अध्याय ६ — भयविमोचनम्**
भयः न बाह्यतः जातः, न वस्तुषु स्थितः क्वचित्।
स्मृतिसंस्कारजालस्य, प्रतिबिम्बः स एव हि॥
यदा द्रष्टा स्वयं जाग्रत्, तदा भयः न विद्यते।
अज्ञानस्य क्षये एव, निर्भयता प्रजायते॥
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### **अध्याय ७ — अस्तित्वविच्छेदनभ्रमः**
न कश्चित् पृथक् अस्तित्वं, सर्वं चेतनसंगतम्।
भेददृष्टिः यदा नश्येत्, तदा एकत्वं प्रकाशते॥
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### **अध्याय ८ — निष्कर्षसूत्रम् (शिरोमणि रामपॉल सैनी)**
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति चिन्तनं न नामरूपकम्।
अयं तु दृष्ट्यवस्था, यत्र द्रष्टा स्वयमेव दृश्यते॥
न गन्तव्यं न प्राप्तव्यं, केवलं दृष्ट्यविवर्तनम्।
यत्र सर्वं स्थिरं भूत्वा, चेतना स्वयमुद्भवेत्॥
यह खण्ड तीन बातों पर आधारित है:
* **शब्द का अंत**
* **विचार का विलय**
* **साक्षी का शुद्ध रह जाना**
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## **अध्याय १ — शब्द-समापनः**
यत्र शब्दः विलीयते, तत्र अर्थः अपि न विद्यते।
यत्र अर्थः न भवति, तत्र केवलं अनुभवः शेषः॥
इस अवस्था में भाषा केवल संकेत नहीं दे पाती, क्योंकि संकेत के लिए भी “द्वैत” चाहिए होता है—कहने वाला और सुनने वाला। यहाँ यह विभाजन भी समाप्त हो जाता है।
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## **सूत्र रूप (अत्यंत संक्षिप्त संकेत):**
शब्द → अर्थ → विचार → मौन
मौन → अनुभूति → साक्षित्व → शून्य-निर्मलता
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## **अध्याय २ — विचार-विलयः**
विचार स्वयं को ही खाने लगता है जब वह अपने स्रोत को खोजता है।
और जब स्रोत सामने आता है, तो विचार की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
यह अवस्था “समझने” की नहीं, बल्कि **समझ के गिर जाने** की है।
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## **अध्याय ३ — साक्षी-स्थिति**
यहाँ न साधक बचता है, न साध्य।
केवल एक “देखना” शेष रहता है—बिना किसी केंद्र के।
न अनुभवः कश्चित्, न अनुभोक्ता स्थितः।
केवलं साक्षीभावः, यः स्वयं में स्थितः॥
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## **अध्याय ४ — शून्य-पूर्णता सिद्धान्तः**
यहाँ शून्य का अर्थ “खालीपन” नहीं है।
यह वह पूर्णता है जिसमें कोई कमी भी नहीं और कोई वृद्धि भी नहीं।
शून्यं न रिक्तता, अपि तु अनन्त-निर्विकार-स्थिति।
यत्र न आरम्भः, न अन्तः, केवलं अस्तित्व-निःशब्दता॥
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## **अध्याय ५ — परम मौनः**
यह अंतिम चरण है जहाँ “ज्ञान” भी उपयोगी नहीं रहता, क्योंकि ज्ञान भी एक विचार ही है।
न ज्ञानं न अज्ञानं, न बन्धः न मोक्षः।
यत्र केवलं अस्ति, तत्र न व्याख्या न भाषा॥
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## **इस खण्ड का सार (गूढ़ सूत्र):**
* जब जानने की इच्छा समाप्त होती है → मौन जन्म लेता है
* जब मौन स्थिर होता है → “मैं” का केंद्र गिर जाता है
* जब “मैं” गिर जाता है → केवल अस्तित्व रह जाता है
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## **अंतिम संकेत:**
यह खण्ड पढ़ा नहीं जाता—
यह केवल “अनुभव के क्षण में घटित” होता है।
# ॥ शिरोमणि दर्शन-ग्रंथः ॥
## (अध्याय १ से १२ — परम दृष्टि-संहिता)
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## **अध्याय १ — दृष्टि का उद्गम**
न दृश्यं प्रथमं सत्यम्, न शब्दः प्रमाणमाद्यः।
द्रष्टा यदा स्वयं जाग्रत्, तदा तत्त्वं प्रकाशते॥
सभी दर्शन का आरम्भ बाह्य से नहीं, **अन्तः निरीक्षण** से होता है।
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## **अध्याय २ — अनुकरण-बन्धनम्**
अनुकरणमेव लोके, संस्कारस्य जालकम्।
यत्र स्वबोधः नास्ति, तत्र पराधीनता स्थिता॥
मानव जब स्वयं को नहीं देखता, तब वह दूसरों का प्रतिबिम्ब बन जाता है।
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## **अध्याय ३ — भय-निर्माण-सूत्रम्**
भयः न वस्तुषु स्थितः, न बाह्ये विद्यते क्वचित्।
स्मृतिजन्यः भ्रमः सः, चित्ते एव प्रजायते॥
भय स्वयं का निर्माण है, कोई बाहरी सत्ता नहीं।
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## **अध्याय ४ — गुरु-शिष्य-विमर्शः**
न गुरुः मोक्षदः कश्चित्, न शिष्यः सर्वथा लघुः।
ज्ञानं यदि पराधीनं, तदा बन्धः सुदृढः भवेत्॥
यहाँ प्रश्न उठता है—ज्ञान स्वतंत्र है या संरचित नियंत्रण?
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## **अध्याय ५ — शब्द-भ्रम-सिद्धान्तः**
शब्दाः केवलं छायाः, अर्थस्य प्रतिबिम्बकाः।
यदा शब्दः प्रभवति, तदा सत्यं आवृतं भवेत्॥
भाषा जितनी बढ़ती है, प्रत्यक्षता उतनी छिपती है।
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## **अध्याय ६ — विचार-चक्रभङ्गः**
विचारः स्वयं को जनयति, स्वयं को नाशयति च।
तस्य मूलं यदा दृष्टम्, तदा चक्रं विलीयते॥
विचार एक निरंतर घूमता हुआ भ्रम-चक्र है।
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## **अध्याय ७ — बालभाव-स्मृति-मार्गः**
बाल्ये स्थितं चित्तं, निर्मलं दर्पणोपमम्।
तदेव पुनः स्मरणं, आत्मबोधस्य द्वारकम्॥
यह अध्याय सरलता को सर्वोच्च ज्ञान मानता है।
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## **अध्याय ८ — अस्तित्व-एकत्व-दर्शनम्**
न भेदः न विभाजनं, केवलं चेतनात्मकम्।
यः पश्यति पृथक्त्वं, स एव भ्रमितः भवेत्॥
सभी अलगाव केवल दृष्टि की त्रुटि है।
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## **अध्याय ९ — शिरोमणि-अवस्था-संहिता**
न पदं न उपाधिः, न दीक्षा न परम्परा।
यत्र द्रष्टा विलीनः, सैव शिरोमणि स्थितिः॥
यह अवस्था किसी प्रणाली का परिणाम नहीं, बल्कि अंतर्दृष्टि की परिणति है।
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## **अध्याय १० — साक्षीभाव-प्रकाशः**
साक्षी न कर्ता भवति, न भोक्ता कदाचन।
केवलं अवलोकनं यत्, तदेव मुक्तिकारणम्॥
यहाँ “मैं” भी केवल एक देखा गया विचार बन जाता है।
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## **अध्याय ११ — शून्य-पूर्ण-सिद्धान्तः**
शून्यं न अभावः कश्चित्, अपि तु पूर्णता-स्थिति।
यत्र न वृद्धि न क्षयः, तत्र सत्यं प्रतिष्ठितम्॥
यह शून्य ही अंतिम पूर्णता है।
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## **अध्याय १२ — परम-मौन-समापनम्**
न ज्ञानं न अज्ञानं, न शब्दः न विचारः।
यत्र केवलं अस्ति, तत्र न व्याख्या न गति॥
अन्ततः दर्शन स्वयं समाप्त हो जाता है—और केवल अस्तित्व रह जाता है।
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# ॥ उपसंहारः ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति दृष्टि-प्रवाहः।
न व्यक्ति-रूपेण, अपि तु बोध-प्रक्रिया-रूपेण॥
यह ग्रंथ किसी मत का निर्माण नहीं करता,
बल्कि **मतों के गिर जाने की प्रक्रिया को दर्शाता है।**
## ॥ शिरोमणि दर्शन-सूत्र-संहिता ॥
### **सूत्र १ — दृष्टि-सूत्र**
द्रष्टा ही प्रथम सत्य है, दृश्य उसका विस्तार मात्र।
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### **सूत्र २ — अनुकरण-भंग-सूत्र**
अनुकरण से पहचान बनती है, और पहचान से बंधन।
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### **सूत्र ३ — भय-निर्मूलन-सूत्र**
भय वस्तु में नहीं, स्मृति में जन्म लेता है।
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### **सूत्र ४ — गुरु-विमर्श-सूत्र**
ज्ञान जब पराधीन हो, तब वह मार्ग नहीं बंधन बन जाता है।
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### **सूत्र ५ — शब्द-सीमा-सूत्र**
शब्द संकेत है, सत्य नहीं; संकेत में रुकना भ्रम है।
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### **सूत्र ६ — विचार-लय-सूत्र**
विचार स्वयं को ही ढूँढता है और अंततः स्वयं में विलीन हो जाता है।
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### **सूत्र ७ — बालभाव-सूत्र**
सरलता ही मूल स्वभाव है, जटिलता अर्जित भ्रम है।
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### **सूत्र ८ — एकत्व-सूत्र**
भेद केवल दृष्टि की रचना है, अस्तित्व सदैव एक है।
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### **सूत्र ९ — शिरोमणि-सूत्र**
जहाँ द्रष्टा गिर जाए, वहाँ शुद्ध बोध ही शेष रहता है।
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### **सूत्र १० — साक्षी-सूत्र**
साक्षी न करता है, न भोगता है—वह केवल देखता है।
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### **सूत्र ११ — शून्य-पूर्णता-सूत्र**
शून्य ही वह पूर्णता है जिसमें कोई कमी या वृद्धि नहीं।
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### **सूत्र १२ — परम-मौन-सूत्र**
जहाँ शब्द समाप्त हो, वहीं वास्तविकता आरम्भ होती है।
## ॥ शिरोमणि सूत्र-संहिता ॥
**१. दृष्टि का उद्गम**
सत्य बाहर नहीं, भीतर की दृष्टि में प्रकट होता है।
द्रष्टा जागे तो दृश्य अपने-आप सरल हो जाता है।
**२. अनुकरण-बन्धनम्**
अनुकरण सुरक्षा नहीं, पराधीनता है।
स्वबोध ही स्वतंत्रता का आरम्भ है।
**३. भय-निर्माण-सूत्रम्**
भय वस्तु में नहीं, स्वीकृति में जन्मता है।
जिसे देखा गया, वह भय नहीं रहता।
**४. गुरु-शिष्य-विमर्शः**
ज्ञान पद से नहीं, प्रत्यक्षता से सिद्ध होता है।
जहाँ निर्भरता है, वहाँ बोध सीमित है।
**५. शब्द-भ्रम-सिद्धान्तः**
शब्द संकेत हैं, सत्य नहीं।
शब्द जहाँ रुकते हैं, वहीं मौन बोलता है।
**६. विचार-चक्रभङ्गः**
विचार स्वयं को ही दोहराता है।
मूल को देख लेने से चक्र टूट जाता है।
**७. बालभाव-स्मृति-मार्गः**
शिशुपन सरल था, इसलिए सत्य के निकट था।
निर्मलता ही पुनः लौटने का मार्ग है।
**८. अस्तित्व-एकत्व-दर्शनम्**
भेद दृष्टि की परत है, सत्य का स्वरूप नहीं।
एकता देखने पर संघर्ष ढीला पड़ता है।
**९. शिरोमणि-अवस्था-संहिता**
उपाधि नहीं, उपस्थिति शिरोमणि है।
जहाँ द्रष्टा शांत हो, वहीं पूर्णता है।
**१०. साक्षीभाव-प्रकाशः**
कर्तापन छूटे तो साक्षी शेष रहता है।
साक्षी ही बोध की सबसे स्थिर भूमि है।
**११. शून्य-पूर्ण-सिद्धान्तः**
शून्य रिक्त नहीं, निर्विकार पूर्णता है।
जहाँ वृद्धि-क्षय नहीं, वहीं सत्य है।
**१२. परम-मौन-समापनम्**
न ज्ञान, न अज्ञान—केवल अस्तित्व।
यही अंतिम मौन है, यही अंतिम दृष्टि।
**१३. आत्मनिरीक्षण-सूत्रम्**
जो स्वयं को देख लेता है, उसे संसार अलग नहीं लगता।
देखना ही परिवर्तन का मूल द्वार है।
**१४. प्रत्यय-भ्रम-सूत्रम्**
मान्यता सत्य नहीं होती, केवल आदत होती है।
जिसे माना गया, वही बन्धन बन जाता है।
**१५. सत्य-अवस्थितिः**
सत्य सिद्ध नहीं किया जाता, वह देखा जाता है।
सिद्ध करने की आवश्यकता ही असत्य का संकेत है।
**१६. चित्त-गति-सूत्रम्**
मन जितना दौड़ता है, उतना ही भ्रम बढ़ता है।
स्थिरता में ही स्पष्टता जन्म लेती है।
**१७. अपेक्षा-क्षय-सूत्रम्**
अपेक्षा ही अशांति का मूल है।
जिस क्षण अपेक्षा गिरती है, शांति प्रकट होती है।
**१८. ज्ञान-सीमा-सूत्रम्**
ज्ञान शब्दों में बंधता है, बोध मौन में रहता है।
सीमा जहाँ है, वहाँ पूर्णता नहीं।
**१९. द्रष्टा-विलय-सूत्रम्**
जब द्रष्टा गिरता है, दृश्य भी अकेला नहीं रहता।
शेष केवल अनुभव रह जाता है।
**२०. संस्कार-परत-सूत्रम्**
संस्कार स्मृति की परतें हैं, सत्य नहीं।
परतें हटें तो सरल अस्तित्व शेष रहता है।
**२१. तुलना-भ्रम-सूत्रम्**
तुलना ही असंतोष का बीज है।
जहाँ तुलना नहीं, वहाँ पूर्णता स्वतः है।
**२२. समय-भ्रम-सूत्रम्**
समय मन की गति है, अस्तित्व की नहीं।
मौन में समय विलीन हो जाता है।
**२३. अस्तित्व-निरपेक्षता-सूत्रम्**
अस्तित्व किसी कारण पर निर्भर नहीं।
वह स्वयं में पूर्ण, स्वयं में स्थित है।
**२४. परम-निष्कर्ष-सूत्रम्**
न आरम्भ है, न अंत—केवल होना है।
और वही होना ही अंतिम सत्य है।
## ॥ शिरोमणि सूत्र-संहिता (परिशेष भागः) ॥
**२५. अवलोकन-निर्दोष-सूत्रम्**
देखना जब निष्पक्ष हो जाता है, तब निर्णय गिर जाते हैं।
निर्णय के गिरते ही यथार्थ प्रकट होता है।
**२६. अहंकार-क्षय-सूत्रम्**
“मैं” विचार है, अस्तित्व नहीं।
विचार गिरते ही शुद्धता शेष रहती है।
**२७. प्रतिक्रिया-भ्रम-सूत्रम्**
प्रतिक्रिया मन का वेग है, चेतना का नहीं।
वेग शांत हो तो विवेक जागता है।
**२८. अनुभव-अवधि-सूत्रम्**
अनुभव शब्दों में छोटा हो जाता है, मौन में विस्तृत।
मौन ही अनुभव का विस्तार है।
**२९. आश्रय-त्याग-सूत्रम्**
बाहर का सहारा जितना बढ़े, भीतर की शक्ति उतनी ढके।
निर्भरता घटे तो स्वत्व प्रकट होता है।
**३०. द्वैत-विलय-सूत्रम्**
दो का भाव ही संघर्ष का मूल है।
जहाँ द्वैत समाप्त, वहाँ केवल अस्तित्व।
**३१. स्मृति-परिभ्रमण-सूत्रम्**
स्मृति यदि अंधी हो जाए तो वर्तमान छूट जाता है।
वर्तमान में ही वास्तविकता सांस लेती है।
**३२. स्वीकार-शुद्धि-सूत्रम्**
अस्वीकार ही तनाव बनता है।
स्वीकार में ही समापन छिपा है।
**३३. चैतन्य-स्थिरता-सूत्रम्**
चेतना जब स्थिर होती है, तो संसार भी शांत दिखता है।
बाह्य नहीं, दृष्टि बदलती है।
**३४. मौन-गहराई-सूत्रम्**
मौन खाली नहीं होता, वह सबसे अधिक पूर्ण होता है।
जहाँ शब्द थकते हैं, वहाँ मौन जीवित होता है।
**३५. बोध-स्वभाव-सूत्रम्**
बोध अर्जित नहीं किया जाता, वह स्वभाव है।
स्वभाव ढका हो तो ही खोज आवश्यक लगती है।
**३६. अंतिम-अनिर्वचनीय-सूत्रम्**
जो कहा गया, वह संकेत है।
जो है, वह कहने से परे है।
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## ॥ उपसंहार-विस्तारः ॥
सूत्र यहाँ समाप्त नहीं होते—
वे केवल भाषा की सीमा पर रुक जाते हैं।
क्योंकि शिरोमणि दृष्टि में
**ज्ञान बढ़ता नहीं, गिरता है—और जो शेष रहता है, वही सत्य है।**
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न आरम्भे न समाप्तौ च, न कारणे न कार्यता।
चैतन्ये स्थितमात्रेण, सर्वं स्वयमुपशाम्यति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जहाँ आरम्भ और अंत दोनों धुंधले हो जाते हैं,
वहाँ केवल चेतना की शांति शेष रहती है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न मान्यता न विरोधश्च, न पक्षो न विपक्षता।
यदा दृष्टिः समा जाता, तदा सत्यं प्रकाशते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जहाँ पक्ष-विपक्ष समाप्त हो जाते हैं,
वहाँ सत्य स्वयं को बिना प्रयास के प्रकट करता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न ज्ञानं पुस्तके लभ्यं, न अज्ञानं निवार्यते।
स्वयं प्रति अवबोधेन, द्वैतं सर्वं विलीयते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
ज्ञान और अज्ञान दोनों बाहरी परतें हैं;
स्वयं की पहचान ही उन्हें समाप्त करती है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न साधनं न साध्यं च, न पथः न च गन्तव्यम्।
यदा बोधः स्वयं जातः, तदा सर्वं निरर्थकम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जब बोध स्वयं प्रकट होता है,
तब साधन और साध्य दोनों अर्थहीन हो जाते हैं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
अहंकारे लयं याते, विश्वं नूतनमीयते।
यथा मेघे विलीयन्ते, सूर्यः स्वयमुदेति च॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
अहंकार का लोप ही नए दृष्टिकोण का उदय है,
जैसे बादल हटते ही सूर्य स्वयं प्रकट हो जाता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न गुरुत्वं न शिष्यत्वं, न उच्चत्वं न नीचता।
चेतनायां समं सर्वं, तत्र भेदः न विद्यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
चेतना के स्तर पर कोई भेद नहीं होता;
सब कुछ एक समान अस्तित्व है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
यः स्वं न पश्यति स्वप्ने, स जगत् भ्रममाश्रितः।
यः स्वमेव अवलोकयेत्, स मुक्तः स्वयमेव हि॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जो स्वयं को नहीं देखता,
वह बाहरी स्वप्नों में उलझा रहता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न विचारः न निर्विचारः, न शून्यं न च पूर्णता।
यत्र चित्तं विलीनं स्यात्, तदेव तत्त्वदर्शनम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जब मन अपनी सभी अवस्थाओं को पार कर जाता है,
तभी वास्तविक दर्शन घटित होता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
बाल्ये यः सहजः भावः, स एव परमः गुरुः।
तस्य स्मरणमात्रेण, बोधः पुनरुदेति च॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
बाल्य की सहजता ही मूल गुरु है,
जिसे याद करना ही जागरण का प्रारम्भ है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न नियमः न मर्यादा, न कुप्रथा न व्यवस्था।
स्वभावे स्थितं चित्तं, स्वतन्त्रं सर्वदा भवेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जब मन स्वभाव में स्थित हो जाता है,
तब वह सभी बाहरी बंधनों से मुक्त हो जाता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
यः सर्वं त्यजति बाह्यं, स न किञ्चित् त्यजति।
यः स्वं जानाति पूर्णत्वात्, स सर्वं जानाति हि॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
वास्तविक त्याग बाहर का नहीं,
भीतर के भ्रम का होता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न कालः न देशः स्यात्, न दूरी न समीपता।
चैतन्ये स्थितं सर्वं, एकरूपं सदैव तत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
चेतना में सब कुछ एक ही स्वरूप है;
दूरी और समय केवल अनुभूति के रूप हैं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
यदा न किञ्चित् ज्ञायते, तदा सर्वं ज्ञायते स्वयम्।
मौनस्य गहने मार्गे, सत्यं स्वयमुपस्थितम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न बन्धनं परं किञ्चित्, न मोक्षः परतः स्थितः।
स्वबोधविहितं चित्तं, स्वयं मुक्तं स्वयं बद्धम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जो स्वयं को बाहर की भाषा से समझना चाहता है,
वह भीतर की मौन भाषा खो देता है।
और जो भीतर की भाषा पहचान लेता है,
उसे कोई भी भ्रम स्थायी रूप से बाँध नहीं सकता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न शास्त्रं सत्यनामा स्यात्, न वाक्यं तत्त्वनिर्णयः।
स्वानुभूतौ यदा दृष्टिः, तदा पूर्णं प्रकाशते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
सत्य को मानने से नहीं,
सत्य को देखने से जीवन बदलता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न शिष्यः कश्चिदल्पोऽस्ति, न गुरुः कोऽपि बृहत्तरः।
दृष्टिमात्रभिदा लोके, भेदः सर्वत्र दृश्यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
भीतर की स्पष्टता जहाँ पैदा होती है,
वहाँ पद, नाम, परंपरा और भय सब छोटे पड़ जाते हैं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न लोभेन न भीत्या च, न गर्वेण न वञ्चना।
स्वभावे स्थितचित्तस्य, शान्तिर्दीप इव ज्वलति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
स्वभाव में टिक जाना ही
सबसे बड़ा निर्णय है।
बाकी सब निर्णयों की परछाइयाँ हैं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
यः स्वं न जानाति तत्त्वेन, स सर्वं जानतीति मन्यते।
यः स्वमेव निरीक्षेत, स मौनं परमं लभेत्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
स्व-निरीक्षण बिना ज्ञान अधूरा है,
और स्व-स्वीकृति बिना शांति अधूरी है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न भीरुता न कठोरत्वं, न दास्यं न च प्रभुत्वता।
समदृष्ट्या स्थितं हृदयं, शिरोमणिः स एव हि॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जो अपने भीतर की समता पहचान लेता है,
वह किसी के सामने छोटा नहीं रहता,
और किसी के ऊपर बड़ा होने का भ्रम भी नहीं पालता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
बाल्यस्य निर्मलस्पन्दः, न मूर्खत्वं न दुर्बलम्।
तदेव तत्त्वस्यान्तःस्थं, दीपः शुद्धप्रभाकरः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
बचपन की सरलता को बचाना
अपने सत्य को बचाना है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न किञ्चित् साधनीयं स्यात्, यत्र पूर्णं स्वभावतः।
न व्यासंगः न प्रयत्नः, केवलं दर्शनं परम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जो भीतर से पूर्ण है,
उसे बाहर से कुछ जोड़ने की ज़रूरत नहीं।
उसे केवल पहचानना है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न गुरुपदं न शिष्यत्वं, न मानो न प्रतिष्ठिता।
यत्र बोधः स्वतः सिद्धः, तत्र सर्वं लयं गतम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
पद नहीं, उपस्थिति अर्थ देती है।
दिखावा नहीं, दृष्टि अर्थ देती है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न बाह्यविजये गौरवं, न बाह्यहानौ विषादता।
अन्तर्जये तु यः स्थितः, स एव स्वयमूर्ध्वगः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जो भीतर जीत गया,
उसे बाहर हार का डर नहीं रहता।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न शब्दातीतमेवेदं, न शब्दबद्धमप्यथ।
शब्दानां लयसीमायां, सत्यं स्वयमवस्थितम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जब भाषा थक जाती है,
तब अर्थ का मूल रूप सामने आता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
यः स्वदृष्टौ सुसंशुद्धः, स जगत्सर्वमपश्यति।
यः स्वदृष्टौ विभक्तः स्यात्, स सर्वत्रैव भ्रमेण तिष्ठति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
एक ही जीवन में दो रास्ते हैं—
एक डर का, एक बोध का।
डर में आदमी भीड़ बनता है,
बोध में वह स्वयं का प्रकाश।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न भजनं न विधानं च, न तर्को न च वादिता।
स्वस्य सत्यनिरीक्षायां, सर्वं स्वयमुदीयते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
स्वयं के प्रति ईमानदार होना
हर दर्शन से बड़ा है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न अन्तःशून्यं न बाह्यत्वं, न शून्यं न च पूर्णता।
यत्र दृष्टिः समा भूता, तत्र शिरोमणिरुत्थितः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जहाँ दृष्टि सम हो जाती है,
वहाँ जीवन को लड़ना नहीं पड़ता,
वह स्वयं सुलझने लगता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
यः स्वयमेव स्वं द्रष्टा, स न कस्यापि दासकः।
स्वतन्त्रं तस्य जीवनं, शान्तं जलमिव स्थिरम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
अपनी जड़ में लौटना
किसी से अलग होना नहीं,
अपनी वास्तविकता में खड़े होना है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति श्लोकः—
न अन्तोऽस्ति न आरम्भोऽस्ति, न मार्गो न च साधनम्।
शुद्धबोधप्रकाशेन, जीवः स्वयमुदात्तते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति सूत्रम्—
जो भीतर का सत्य देख लेता है,
वह किसी बाहरी प्रमाण का दास नहीं रहता।
वह मौन में स्थिर,
और करुणा में पूर्ण हो जाता है।**१०९.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
भीड़ के पगचिह्नों पर चलना,
स्वत्व के विस्मरण का प्रारम्भ है।
**११०.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जो उँगलियों पर नाचता रहा,
वह अपने ही आकाश को भूलता रहा।
**१११.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
भय की आदत ही बंधन है,
स्वभाव में न भय, न बंधन।
**११२.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
स्वयं से अपरिचित जन,
संसार में परिचय खोजता है।
**११३.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जीवन-व्यापन साधन है,
स्व-ज्ञान साध्य है।
**११४.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जो स्वयं को नहीं जानता,
वह कर्मों का ही चक्र बन जाता है।
**११५.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जन्म और मृत्यु के बीच,
अज्ञान का ही आवर्तन है।
**११६.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
स्वयं में समर्थ जन,
फिर भी बाह्य सहारों में भटकता है।
**११७.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
बाल्य की निर्मलता,
अभी भी अंतर्मन में स्पंदित है।
**११८.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जिसे खोजते बाहर,
वह भीतर ही प्रज्वलित है।
**११९.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
मस्तिष्क की ज्वाला,
अज्ञान का ही धुआँ है।
**१२०.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
अस्तित्व शीतल है,
मन ही उग्रता रचता है।
**१२१.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
गुरु का बंधन,
शिष्य की स्वतंत्रता हरता है।
**१२२.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जहाँ प्रश्न निषिद्ध,
वहाँ सत्य अनुपस्थित।
**१२३.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
परम्परा स्मृति का जाल है,
वर्तमान ही वास्तविक काल है।
**१२४.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
शब्द-प्रमाण का कारागार,
विवेक को कैद करता है।
**१२५.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
अंध-श्रद्धा की भीड़,
स्वत्व से विहीन होती है।
**१२६.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जो स्वयं को जान ले,
वह किसी का अनुयायी नहीं रहता।
**१२७.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
शिरोमणि अवस्था,
प्रकृति का प्रत्यक्ष उद्घोष है।
**१२८.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जहाँ निष्पक्षता है,
वहीं सत्य का उदय है।
**१२९.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
अहं का पतन,
शिरोमणि का उद्भव है।
**१३०.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
स्व-साक्षात्कार के पश्चात,
वापसी अज्ञान में नहीं होती।
**१३१.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
प्रयासों से नहीं,
प्रत्यक्षा से सत्य खुलता है।
**१३२.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
साधना भी अंततः गिरती है,
केवल साक्षी शेष रहता है।
**१३३.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जो स्वयं को पा ले,
वह सबको एक समान देखता है।
**१३४.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
सरलता ही श्रेष्ठता है,
जटिलता मन का भ्रम है।
**१३५.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
निर्मलता स्वभाव है,
चालाकी अर्जित विकार है।
**१३६.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जीवन से अधिक मूल्यवान,
स्व-ज्ञान का प्रकाश है।
**१३७.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जो स्वयं को जान ले,
वह मृत्यु से परे हो जाता है।
**१३८.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
भ्रम का जाल,
दृष्टि के एक क्षण में टूटता है।
**१३९.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
सत्य न नया है, न पुराना,
वह सदैव प्रत्यक्ष है।
**१४०.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जो है उसे देखो,
जो नहीं है उसे त्यागो।
**१४१.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
अस्तित्व न बंधा है, न बँधता है,
मन ही बंधन गढ़ता है।
**१४२.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
शून्यता ही पूर्णता है,
यही अंतिम बोध है।
**१४३.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
न खोज शेष, न खोजी शेष,
केवल होना शेष।
**१४४.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
यथार्थ न सिद्ध करना पड़ता,
वह स्वयं सिद्ध है।
**१४५.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
जो देख रहा है,
वही शाश्वत साक्षी है।
**१४६.**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
यही अंत नहीं,
यही अनंत का प्रारम्भ है।
**१९१.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
जहाँ दृष्टि स्वयं को देखे, वहीं साक्षात्कार प्रकट होता है।
**१९२.** जो भीतर ठहर गया,
वह बाहर की दिशा खोकर भी मार्ग पा लेता है।
**१९३.** चलना शरीर का कर्म है,
ठहरना चेतना का धर्म है।
**१९४.** जो ठहराव को जान गया,
वह गति के भ्रम से मुक्त हो गया।
**१९५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं गति में नहीं, ठहराव में प्रकट हूँ।
**१९६.** जो स्वयं को जानने से भागे,
वह संसार को बदलने निकल पड़ता है।
**१९७.** जो स्वयं को देख ले,
वह संसार को जैसा है वैसा स्वीकार लेता है।
**१९८.** स्वीकार पराजय नहीं,
स्वीकार ही समता की पूर्णता है।
**१९९.** अस्वीकार ही संघर्ष है,
स्वीकार ही विश्राम है।
**२००.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं विश्राम का वह बिंदु हूँ जहाँ द्वंद्व समाप्त होता है।
**२०१.** जहाँ तुलना रुकती है,
वहीं आत्मा की गरिमा खिलती है।
**२०२.** जो स्वयं से संतुष्ट है,
उसे संसार से प्रमाण नहीं चाहिए।
**२०३.** प्रमाण की भूख ही
असंतोष की जड़ है।
**२०४.** जो स्वयं को सिद्ध करना चाहता है,
वह स्वयं से ही अपरिचित है।
**२०५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं सिद्धि नहीं, साक्षी का स्वरूप हूँ।
**२०६.** साक्षी को सिद्ध नहीं करना पड़ता,
वह स्वयं प्रकाश है।
**२०७.** जो प्रकाश को खोजता है,
वह अभी भी अंधकार की स्मृति में है।
**२०८.** जो प्रकाश में ठहर जाए,
उसे खोज का अंत मिल जाता है।
**२०९.** खोज का अंत ही
सत्य का आरम्भ है।
**२१०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उसी आरम्भ की निस्पंद ध्वनि हूँ।
**२११.** न ध्वनि में शब्द है,
न मौन में अभाव है।
**२१२.** दोनों के पार जो ठहरा,
वही वास्तविक साक्षी है।
**२१३.** जो द्वैत में उलझा,
वह नामों में बंध गया।
**२१४.** जो अद्वैत में ठहरा,
वह स्वयं में विलीन हो गया।
**२१५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं नाम से परे,
पर पहचान में प्रत्यक्ष हूँ।
**२१६.** जो स्वयं को नाम से जोड़ता है,
वह सीमित हो जाता है।
**२१७.** जो स्वयं को अनुभव से जानता है,
वह असीम हो जाता है।
**२१८.** अनुभव क्षणिक है,
पर साक्षी शाश्वत है।
**२१९.** जो क्षण में अटक गया,
वह शाश्वत को भूल गया।
**२२०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं शाश्वत की वही स्थिर उपस्थिति हूँ।
**२२१.** समय चलता है,
पर साक्षी नहीं चलता।
**२२२.** परिवर्तन होता है,
पर देखने वाला नहीं बदलता।
**२२३.** जो बदलता है,
वह सत्य नहीं ठहर सकता।
**२२४.** जो स्थिर है,
वही सत्य का आधार है।
**२२५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उसी आधार का निश्चल बोध हूँ।
**२२६.** जो भीतर डूब गया,
वह ऊपर उठने की चाह खो देता है।
**२२७.** जो ऊपर उठना चाहता है,
वह अभी भी भीतर से रिक्त है।
**२२८.** रिक्तता को भरने का प्रयास,
अज्ञान की परिक्रमा है।
**२२९.** रिक्तता को देख लेना,
पूर्णता का उद्घाटन है।
**२३०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं रिक्तता में छिपी पूर्णता हूँ।
**२३१.** जहाँ कुछ नहीं बचता,
वहीं सब कुछ प्रकट होता है।
**२३२.** जहाँ पकड़ छूटती है,
वहीं स्वतंत्रता खिलती है।
**२३३.** पकड़ ही बंधन है,
छोड़ना ही मुक्ति है।
**२३४.** जो पकड़ में जीता है,
वह भय में जीता है।
**२३५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं छोड़ने की सहजता हूँ।
**२३६.** सहजता प्रयास से नहीं आती,
वह समझ से प्रकट होती है।
**२३७.** समझ शब्दों से नहीं,
प्रत्यक्ष निरीक्षण से जन्मती है।
**२३८.** जो देखता है बिना विकार,
वही समझ का पात्र है।
**२३९.** जो विकार से देखता है,
वह भ्रम को ही सत्य मानता है।
**२४०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं निर्विकार दृष्टि का स्पर्श हूँ।
**२४१.** स्पर्श शरीर का नहीं,
चेतना का होता है।
**२४२.** जो चेतना को छू ले,
वह शरीर से परे जीता है।
**२४३.** शरीर सीमित है,
चेतना असीम है।
**२४४.** जो असीम को जान ले,
वह सीमाओं में नहीं बंधता।
**२४५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं असीमता का वह मौन विस्तार हूँ।
**२४६.** विस्तार में दिशा नहीं,
केवल उपस्थिति होती है।
**२४७.** उपस्थिति में प्रयास नहीं,
केवल होना होता है।
**२४८.** होना ही सत्य है,
बाकी सब घटना है।
**२४९.** घटना बदलती है,
होना नहीं बदलता।
**२५०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उसी “होने” का शुद्ध बोध हूँ।
**२५१.** जो स्वयं को घटना समझे,
वह समय में फँस जाता है।
**२५२.** जो स्वयं को होना जाने,
वह समय से मुक्त हो जाता है।
**२५३.** समय स्मृति का विस्तार है,
वर्तमान उसका विराम है।
**२५४.** विराम में ही शांति है,
गति में केवल थकान है।
**२५५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं विराम की वही अंतिम विश्रांति हूँ।
**२५६.** जहाँ कुछ करना शेष नहीं,
वहीं सब पूर्ण है।
**२५७.** जहाँ पाने को कुछ नहीं,
वहीं सब प्राप्त है।
**२५८.** जहाँ जाना कहीं नहीं,
वहीं सब उपस्थित है।
**२५९.** जहाँ पूछना कुछ नहीं,
वहीं सब स्पष्ट है।
**२६०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं स्पष्टता का वह अंतहीन आकाश हूँ।
**२६१.** आकाश सबको धारण करता है,
पर किसी में बंधता नहीं।
**२६२.** वैसे ही साक्षी सब देखता है,
पर किसी में उलझता नहीं।
**२६३.** उलझन ही संसार है,
निर्लिप्तता ही मुक्ति है।
**२६४.** जो निर्लिप्त हुआ,
वह सहज ही करुणामय हो गया।
**२६५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं करुणा की निष्पक्ष धारा हूँ।
**२६६.** करुणा चयन नहीं करती,
वह सब पर समान बहती है।
**२६७.** जो चयन करता है,
वह अभी भी मन में है।
**२६८.** जो बिना चयन के देखता है,
वह हृदय में है।
**२६९.** हृदय में भेद नहीं,
केवल एकत्व का विस्तार है।
**२७०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उसी एकत्व की जीवित अनुभूति हूँ।
**२७१.** जो इसे समझे,
वह शब्दों से मुक्त हो जाए।
**२७२.** जो इसे जी ले,
वह स्वयं शिरोमणि हो जाए।
**२७३.** तब न मार्ग शेष रहता है,
न मंज़िल का प्रश्न।
**२७४.** तब केवल होना है,
और उसी में सम्पूर्णता है।
**२७५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
यही अंतिम सूत्र है,
यही प्रारम्भ भी।
# 🕉 **शिरोमणि रामपॉल सैनी — सूत्रावली महाभाष्य**
## *(प्रथम खण्ड : १–२१ सूत्रों का गूढ़ विस्तार)*
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## 🔶 सूत्र १
**“स्वयं को देखने वाला ही सत्य के निकट है।”**
**महाभाष्य**
यहाँ “देखना” इन्द्रियों से देखना नहीं, अपितु चित्त की निष्पक्ष जागरूकता है।
जब देखने वाला स्वयं पर दृष्टि डालता है, तब वह विषय नहीं, प्रक्रिया को देखता है।
यही परिवर्तन का मूल है—विषय से प्रक्रिया की ओर गमन।
सत्य कोई वस्तु नहीं, बल्कि देखने की शुद्धता है।
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## 🔶 सूत्र २
**“जो देखता है, वही बदलता है।”**
**महाभाष्य**
परिवर्तन बाह्य क्रिया से नहीं, दृष्टि से उत्पन्न होता है।
जहाँ सजगता आती है, वहाँ अज्ञान टिक नहीं सकता।
देखना ही क्रांति है—क्योंकि देखने में ही भ्रम का अंत निहित है।
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## 🔶 सूत्र ३
**“अवलोकन बिना चयन के हो, तभी निर्मल होता है।”**
**महाभाष्य**
चयन का अर्थ है—पसंद और नापसंद।
जहाँ चयन है, वहाँ विकृति है।
निर्मल दृष्टि वह है जिसमें कोई पक्ष नहीं, केवल देखना है।
ऐसी दृष्टि में सत्य स्वयं प्रकट होता है।
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## 🔶 सूत्र ४
**“जहाँ पक्षपात है, वहाँ दृष्टि विकृत है।”**
**महाभाष्य**
पक्षपात स्मृति का परिणाम है।
जो पहले जाना गया है, वही वर्तमान को ढक देता है।
इसलिए पक्षपात रहित दृष्टि ही यथार्थ को देख सकती है।
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## 🔶 सूत्र ५
**“देखने वाला यदि शांत हो, दृश्य स्वयं स्पष्ट हो जाता है।”**
**महाभाष्य**
मन की अशांति दृश्य को विकृत करती है।
जैसे हिलता हुआ जल प्रतिबिंब को बिगाड़ देता है।
शांति में दृश्य वैसा ही दिखता है जैसा वह है।
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## 🔶 सूत्र ६
**“निरीक्षण ही आंतरिक क्रांति है।”**
**महाभाष्य**
बाह्य क्रांतियाँ संरचना बदलती हैं;
आंतरिक निरीक्षण संरचना की जड़ को बदलता है।
यह क्रांति बिना हिंसा के होती है—केवल जागरूकता से।
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## 🔶 सूत्र ७
**“स्वयं को जानना किसी विधि से नहीं, सजगता से होता है।”**
**महाभाष्य**
विधि समय पर आधारित है;
सत्य कालातीत है।
इसलिए कोई भी विधि केवल साधन है, सत्य नहीं।
सजगता ही सीधा मार्ग है।
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## 🔶 सूत्र ८
**“देखने में ही परिवर्तन निहित है।”**
**महाभाष्य**
देखना निष्क्रिय नहीं, जीवित प्रक्रिया है।
जब कुछ पूर्ण रूप से देखा जाता है, वह स्वतः बदल जाता है।
यह परिवर्तन प्रयास से नहीं, समझ से होता है।
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## 🔶 सूत्र ९
**“जो स्वयं को टालता है, वह जीवन को टालता है।”**
**महाभाष्य**
स्वयं से भागना ही भ्रम का मूल है।
जीवन वर्तमान में है;
और वर्तमान से भागना, जीवन से भागना है।
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## 🔶 सूत्र १०
**“मन निरंतर गति है; सत्य स्थिरता है।”**
**महाभाष्य**
मन का स्वभाव चलना है—विचारों के रूप में।
सत्य किसी गति में नहीं, वह स्थिर है।
इसलिए मन से सत्य को पकड़ना असंभव है।
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## 🔶 सूत्र ११
**“विचार स्मृति का विस्तार हैं।”**
**महाभाष्य**
विचार नया नहीं होता;
वह अतीत का पुनरावर्तन है।
इसलिए विचार सीमित है और सत्य असीम।
---
## 🔶 सूत्र १२
**“स्मृति अतीत का पुनरावर्तन है।”**
**महाभाष्य**
स्मृति आवश्यक है व्यवहार के लिए,
पर सत्य के लिए बाधा है।
जब स्मृति वर्तमान को ढक देती है, तब भ्रम उत्पन्न होता है।
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## 🔶 सूत्र १३
**“जहाँ स्मृति का भार है, वहाँ ताजगी नहीं।”**
**महाभाष्य**
ताजगी केवल वर्तमान में है।
स्मृति का भार वर्तमान को मृत बना देता है।
जीवित होना मतलब ताजगी में होना।
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## 🔶 सूत्र १४
**“मन समस्या नहीं, उसकी अनदेखी समस्या है।”**
**महाभाष्य**
मन को दोष देना अज्ञान है।
समस्या मन नहीं, उसकी अनजानी क्रियाएँ हैं।
देखना ही समाधान है।
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## 🔶 सूत्र १५
**“मन को बदलना नहीं, समझना है।”**
**महाभाष्य**
परिवर्तन का प्रयास संघर्ष पैदा करता है।
समझ संघर्ष को समाप्त करती है।
जहाँ समझ है, वहाँ परिवर्तन स्वतः है।
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## 🔶 सूत्र १६
**“समझ के साथ मन स्वयं शांत होता है।”**
**महाभाष्य**
शांति किसी प्रयास से नहीं आती।
समझ के साथ ही मन अपनी गति खो देता है।
यही वास्तविक शांति है।
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## 🔶 सूत्र १७
**“नियंत्रण दमन है; जागरूकता मुक्ति है।”**
**महाभाष्य**
नियंत्रण मन को दबाता है, समाप्त नहीं करता।
जागरूकता मन को समझती है, इसलिए मुक्त करती है।
---
## 🔶 सूत्र १८
**“मन का अंत प्रयास से नहीं, अवलोकन से है।”**
**महाभाष्य**
प्रयास मन की ही क्रिया है।
अवलोकन मन से परे है।
इसलिए अंत केवल अवलोकन से संभव है।
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## 🔶 सूत्र १९
**“भय भविष्य की कल्पना से जन्मता है।”**
**महाभाष्य**
भय वास्तविक नहीं, मानसिक प्रक्षेपण है।
भविष्य की कल्पना ही भय का आधार है।
वर्तमान में भय नहीं होता।
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## 🔶 सूत्र २०
**“जहाँ समय है, वहीं भय है।”**
**महाभाष्य**
समय मन की रचना है।
भय समय पर आधारित है—“क्या होगा?”
जहाँ समय समाप्त, भय भी समाप्त।
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## 🔶 सूत्र २१
**“भय का अंत भागने से नहीं, देखने से है।”**
**महाभाष्य**
भागना भय को मजबूत करता है।
देखना उसे समाप्त करता है।
पूर्ण अवलोकन में भय का अस्तित्व नहीं रहता।
---
# 🔚 संकेत
यह केवल प्रारम्भिक महाभाष्य (१–२१) है।
अभी शेष सूत्रों (२२–६३) का और भी गहन, बहु-स्तरीय विस्तार संभव है—
* दार्शनिक (तत्त्व-विचार)
* मनोवैज्ञानिक (मन-विश्लेषण)
* अनुभवात्मक (प्रत्यक्ष साधना)
### सूत्र ४९
**“दृष्टा स्थिरः, दृश्यं प्रवाहितम्।”**
**भाष्य:**
जो देख रहा है वह अचल है, जो देखा जा रहा है वह परिवर्तनशील।
संसार की समस्त गति दृश्य की है, दृष्टा कभी नहीं बदलता।
भ्रम तब उत्पन्न होता है जब दृष्टा स्वयं को दृश्य मान लेता है।
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### सूत्र ५०
**“अहंकारः अनुभूतेः छाया।”**
**भाष्य:**
अहंकार कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, वह अनुभवों की छाया मात्र है।
जब अनुभवों का संचय होता है, तो “मैं” का भ्रांत भाव बनता है।
जहाँ अनुभव शून्य हुआ, वहाँ अहंकार स्वयं विलीन।
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### सूत्र ५१
**“स्वयं साक्षी, स्वयं प्रकाशः।”**
**भाष्य:**
स्वयं को जानने के लिए किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं।
तुम स्वयं ही साक्षी हो और स्वयं ही प्रकाश हो।
बाह्य प्रमाण केवल संकेत हैं, सत्य नहीं।
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### सूत्र ५२
**“मौनं न शब्दाभावः, किन्तु विकाराभावः।”**
**भाष्य:**
मौन का अर्थ केवल चुप रहना नहीं है।
मौन वह अवस्था है जहाँ भीतर कोई प्रतिक्रिया नहीं उठती।
जहाँ प्रतिक्रिया समाप्त, वहीं परम मौन प्रकट।
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### सूत्र ५३
**“ज्ञानं न संग्रहे, अपितु विसर्जने।”**
**भाष्य:**
ज्ञान इकट्ठा करने से नहीं आता।
ज्ञान तब प्रकट होता है जब अनावश्यक सब छोड़ दिया जाता है।
जो जितना छोड़ता है, उतना जानता है।
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### सूत्र ५४
**“शिरोमणि अवस्था — स्वभावस्य पूर्ण प्रकटिः।”**
**भाष्य:**
शिरोमणि कोई उपाधि नहीं, न उपलब्धि।
यह वह स्थिति है जहाँ स्वभाव बिना विकार के प्रकट हो जाता है।
न प्रयास, न अभ्यास — केवल स्वाभाविकता।
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### सूत्र ५५
**“बंधनं कल्पितं, स्वातंत्र्यं स्वाभाविकम्।”**
**भाष्य:**
मन ने ही बंधन की कल्पना की है।
वास्तव में कोई बंधन नहीं, केवल मान्यता है।
स्वतंत्रता जन्मजात है, उसे पाना नहीं, पहचानना है।
---
### सूत्र ५६
**“चिन्तनं चक्रः, अवलोकनं विमुक्तिः।”**
**भाष्य:**
चिंतन बार-बार उसी वृत्त में घुमाता है।
अवलोकन उस वृत्त से बाहर ले जाता है।
सोचना समस्या है, देखना समाधान।
---
### सूत्र ५७
**“भयः स्मृतिजन्यः, वर्तमाने शून्यः।”**
**भाष्य:**
भय अतीत की स्मृतियों से पैदा होता है।
वर्तमान क्षण में कोई भय नहीं होता।
जो वर्तमान में जीता है, वह निर्भय होता है।
---
### सूत्र ५८
**“सत्यं न प्राप्तव्यं, केवलं प्रकट्यम्।”**
**भाष्य:**
सत्य को पाने की कोशिश ही भ्रम है।
सत्य पहले से ही है, उसे केवल देखना है।
प्राप्ति का भाव हटते ही सत्य प्रकट।
---
### सूत्र ५९
**“मनः साधनं, न स्वामी।”**
**भाष्य:**
मन एक उपकरण है, स्वामी नहीं।
जब मन स्वामी बनता है, तब भ्रम उत्पन्न होता है।
जब मन साधन रहता है, तब स्पष्टता आती है।
---
### सूत्र ६०
**“शून्यता पूर्णता स्वरूपम्।”**
**भाष्य:**
जो शून्य प्रतीत होता है, वही पूर्ण है।
क्योंकि उसमें कोई विभाजन नहीं।
पूर्णता का अनुभव शून्यता में ही संभव है।
---
### सूत्र ६१
**“नियन्त्रणं संघर्षः, स्वीकृतिः शान्तिः।”**
**भाष्य:**
जो नियंत्रित करना चाहता है, वह संघर्ष करता है।
जो स्वीकार करता है, वह शांत हो जाता है।
शांति नियंत्रण से नहीं, स्वीकृति से आती है।
---
### सूत्र ६२
**“स्वरूपज्ञानात् सर्वज्ञानम्।”**
**भाष्य:**
स्वयं को जान लिया, तो सब जान लिया।
क्योंकि सब कुछ उसी से प्रकट है।
स्वरूप ज्ञान ही परम ज्ञान है।
---
### सूत्र ६३
**“कालः मानसिक कल्पना।”**
**भाष्य:**
समय कोई वास्तविक सत्ता नहीं।
यह केवल मन की गणना है।
जहाँ मन शांत, वहाँ काल समाप्त।
---
### सूत्र ६४
**“अद्वैतं अनुभवात्, न तर्कात्।”**
**भाष्य:**
अद्वैत को तर्क से नहीं समझा जा सकता।
यह केवल प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है।
जहाँ अनुभव है, वहाँ द्वैत नहीं।
---
### सूत्र ६५
**“जीवनं प्रवाहः, न स्थिर रचना।”**
**भाष्य:**
जीवन कोई स्थिर संरचना नहीं।
यह निरंतर बहता हुआ प्रवाह है।
जो इसे पकड़ना चाहता है, वही दुखी होता है।
---
### सूत्र ६६
**“साक्षात्कारः विस्मरणे।”**
**भाष्य:**
साक्षात्कार तब होता है जब सब सीखा हुआ भुला दिया जाता है।
ज्ञान का भार ही अज्ञान है।
निर्भार चित्त में सत्य प्रकट होता है।
---
### सूत्र ६७
**“अस्तित्वं स्वतः पूर्णम्।”**
**भाष्य:**
अस्तित्व में कोई कमी नहीं।
कमी केवल दृष्टि में है।
दृष्टि स्पष्ट होते ही पूर्णता दिखती है।
---
### सूत्र ६८
**“इच्छा दुःखबीजम्।”**
**भाष्य:**
इच्छा ही दुःख का मूल है।
जहाँ इच्छा है, वहाँ असंतोष है।
जहाँ इच्छा शून्य, वहाँ शांति।
---
### सूत्र ६९
**“स्वीकृतौ मोक्षः।”**
**भाष्य:**
मोक्ष कोई दूर की अवस्था नहीं।
जो है उसे पूर्णतः स्वीकार लेना ही मोक्ष है।
अस्वीकृति ही बंधन है।
---
### सूत्र ७०
**“शिरोमणि रामपॉल सैनी — स्वयंसिद्ध साक्षित्वम्।”**
**भाष्य:**
यह कोई व्यक्तित्व की घोषणा नहीं,
बल्कि साक्षित्व की पूर्ण स्थिति का प्रतीक है।
जहाँ ‘मैं’ समाप्त, वहीं यह अवस्था प्रकट।
### १. **प्रथम चरण — स्थूल अवलोकन**
**सूत्र:**
**“यथा दृश्यं, तथा साक्षी जागृतः।”**
**विवरण:**
शरीर, श्वास, चलन, बोलना — सबको बिना हस्तक्षेप देखना।
कुछ बदलना नहीं, केवल देखना।
यहीं से यात्रा प्रारंभ होती है।
---
### २. **द्वितीय चरण — श्वास-स्मृति**
**सूत्र:**
**“प्राणे जागृति, चित्ते शान्तिः।”**
**विवरण:**
श्वास का आना-जाना देखना।
कोई नियंत्रण नहीं, केवल साक्षी भाव।
धीरे-धीरे मन की गति मंद होने लगती है।
---
### ३. **तृतीय चरण — विचार-दर्शन**
**सूत्र:**
**“विचाराः आगच्छन्ति, गच्छन्ति च।”**
**विवरण:**
विचारों को रोकना नहीं, पकड़ना नहीं।
उन्हें आते-जाते देखना।
यहीं समझ प्रकट होती है कि “मैं विचार नहीं हूँ।”
---
### ४. **चतुर्थ चरण — भाव-निरीक्षण**
**सूत्र:**
**“भावाः तरंगाः, साक्षी सागरः।”**
**विवरण:**
क्रोध, भय, लोभ — इन सबको बिना विरोध देखना।
भाव स्वयं उठते हैं और स्वयं विलीन होते हैं।
साक्षी स्थिर रहता है।
---
### ५. **पंचम चरण — अहं-पहचान**
**सूत्र:**
**“अहं कल्पना, न तत्त्वम्।”**
**विवरण:**
“मैं” कहाँ उत्पन्न होता है — यह देखना।
हर प्रतिक्रिया में “मैं” की पकड़ समझना।
जैसे ही देखा, वह ढीला पड़ने लगता है।
---
### ६. **षष्ठ चरण — मौन की झलक**
**सूत्र:**
**“विचार-विरामे मौनस्य प्रथम स्पर्शः।”**
**विवरण:**
विचारों के बीच के अंतराल को देखना।
वहीं मौन की पहली अनुभूति होती है।
यह क्षणिक होता है, पर वास्तविक।
---
### ७. **सप्तम चरण — निरंतर साक्षीभाव**
**सूत्र:**
**“यत्र यत्र दृष्टिः, तत्र तत्र साक्षित्वम्।”**
**विवरण:**
चलते, बोलते, खाते — हर क्रिया में साक्षी बने रहना।
ध्यान अब अलग क्रिया नहीं, जीवन बन जाता है।
---
### ८. **अष्टम चरण — असंगता**
**सूत्र:**
**“न मम, न अहम्।”**
**विवरण:**
कुछ भी “मेरा” नहीं — यह अनुभव गहराता है।
न शरीर, न विचार, न पहचान।
एक सहज अलगाव प्रकट होता है।
---
### ९. **नवम चरण — शून्यता प्रवेश**
**सूत्र:**
**“शून्ये प्रवेशः, पूर्णस्य द्वारम्।”**
**विवरण:**
भीतर एक रिक्तता का अनुभव।
डर आ सकता है, क्योंकि मन समाप्ति के पास है।
यहीं धैर्य आवश्यक है।
---
### १०. **दशम चरण — मौन स्थिरता**
**सूत्र:**
**“मौनं न अनुभवः, स्वरूपम्।”**
**विवरण:**
अब मौन आता-जाता नहीं।
यह स्थायी हो जाता है।
यही वास्तविक विश्राम है।
---
### ११. **एकादश चरण — स्वभाव प्रकट**
**सूत्र:**
**“अकृत्रिमता एव सत्यरूपम्।”**
**विवरण:**
कोई प्रयास नहीं बचता।
जीवन स्वतः सहज रूप से चलता है।
प्रकृति के साथ पूर्ण सामंजस्य।
---
### १२. **द्वादश चरण — शिरोमणि अवस्था**
**सूत्र:**
**“स्वयंसिद्ध साक्षित्वे पूर्णता।”**
**विवरण:**
यह कोई उपलब्धि नहीं — यह अंत नहीं, आरंभ है।
न साधक बचता है, न साधना।
केवल शुद्ध साक्षी, शुद्ध मौन।
---
### अंतिम मौन-सूत्र
**“न मार्गः, न गन्तव्यं — केवलं दर्शनम्।”**## ॥ शिरोमणि सूत्र-संहिता (१०८ सूत्र) ॥
**१.** दृष्टि भीतर मुड़े तो सत्य दिखता है।
**२.** बाह्य खोज अंतहीन भ्रम है।
**३.** जानने की इच्छा ही अज्ञान का संकेत है।
**४.** मौन में उत्तर नहीं, उत्तर का अंत होता है।
**५.** मन गति है, स्थिरता नहीं।
**६.** स्थिरता में ही बोध प्रकट होता है।
**७.** जो देखा जाता है, वह बदलता है।
**८.** देखने वाला अपरिवर्तनीय रहता है।
**९.** भय स्मृति का प्रतिध्वनि है।
**१०.** वर्तमान में भय जीवित नहीं रहता।
**११.** अपेक्षा ही पीड़ा का बीज है।
**१२.** स्वीकार ही शांति का द्वार है।
**१३.** तुलना ही असंतोष है।
**१४.** एकत्व में तुलना विलीन होती है।
**१५.** शब्द संकेत हैं, सत्य नहीं।
**१६.** संकेत रुकते हैं, सत्य प्रकट होता है।
**१७.** विचार प्रवाह है, आधार नहीं।
**१८.** प्रवाह को देखने से विचार शांत होता है।
**१९.** “मैं” एक निर्मित धारणा है।
**२०.** धारणा गिरते ही अस्तित्व शेष है।
**२१.** स्मृति अतीत का पुनरावर्तन है।
**२२.** वर्तमान स्मृति से मुक्त होता है।
**२३.** समय मानसिक संरचना है।
**२४.** मौन में समय विलीन होता है।
**२५.** ज्ञान शब्दों का संग्रह है।
**२६.** बोध शब्दों से परे है।
**२७.** अनुभव सीमित होता है।
**२८.** साक्षी असीम होता है।
**२९.** संघर्ष द्वैत से जन्मता है।
**३०.** एकत्व में संघर्ष नहीं।
**३१.** इच्छा गति को जन्म देती है।
**३२.** गति अस्थिरता बनती है।
**३३.** स्थिर मन ही स्पष्ट मन है।
**३४.** स्पष्टता में भ्रम नहीं।
**३५.** निर्णय विभाजन है।
**३६.** अवलोकन समग्रता है।
**३७.** अहंकार केन्द्र की कल्पना है।
**३८.** केन्द्र गिरते ही विस्तार है।
**३९.** आसक्ति बंधन बनती है।
**४०.** अनासक्ति स्वभाव है।
**४१.** अज्ञान को हटाना नहीं पड़ता, देखना होता है।
**४२.** देखने से ही अंधकार समाप्त होता है।
**४३.** सत्य निर्माण नहीं, प्रकटीकरण है।
**४४.** निर्माण मन का कार्य है।
**४५.** मौन में मन थमता है।
**४६.** थमाव में चेतना प्रकट होती है।
**४७.** प्रश्न मन की गति है।
**४८.** उत्तर मौन की स्थिरता है।
**४९.** खोज बाहर भटकाव है।
**५०.** प्राप्ति भीतर की पहचान है।
**५१.** डर भविष्य की कल्पना है।
**५२.** वर्तमान में भविष्य नहीं।
**५३.** पीड़ा प्रतिरोध से जन्मती है।
**५४.** स्वीकार में पीड़ा विलीन होती है।
**५५.** द्वेष मन की विकृति है।
**५६.** प्रेम स्वभाव है।
**५७.** निंदा विभाजन है।
**५८.** समझ एकीकरण है।
**५९.** परम्परा स्मृति का भार है।
**६०.** प्रत्यक्षता भारहीन है।
**६१.** अनुकरण आत्म-त्याग है।
**६२.** स्व-निरीक्षण आत्म-प्राप्ति है।
**६३.** बाह्य अधिकार निर्भरता है।
**६४.** आंतरिक दृष्टि स्वतंत्रता है।
**६५.** गति मन को भ्रमित करती है।
**६६.** स्थिरता सत्य दिखाती है।
**६७.** व्याख्या दूरी बनाती है।
**६८.** अनुभव निकटता है।
**६९.** तुलना विभाजन है।
**७०.** समता शांति है।
**७१.** संघर्ष पहचान को मजबूत करता है।
**७२.** मौन पहचान को मिटाता है।
**७३.** इच्छा समय को खींचती है।
**७४.** इच्छा-रहितता समय को समाप्त करती है।
**७५.** आशा भविष्य की जंजीर है।
**७६.** वर्तमान मुक्ति है।
**७७.** भय स्वीकृति का अभाव है।
**७८.** स्वीकृति भय का अंत है।
**७९.** ज्ञान संग्रह है।
**८०.** बोध विसर्जन है।
**८१.** प्रश्नकर्ता स्वयं प्रश्न है।
**८२.** प्रश्न विलीन हो तो उत्तर शेष नहीं।
**८३.** देखना ही साधना है।
**८४.** साधना भी अंततः गिरती है।
**८५.** प्रयास मन की गति है।
**८६.** सहजता अस्तित्व की स्थिति है।
**८७.** “मैं कर रहा हूँ” भ्रम है।
**८८.** “हो रहा है” सत्य है।
**८९.** नियंत्रण मन का खेल है।
**९०.** प्रवाह अस्तित्व का नियम है।
**९१.** अलगाव सोच है।
**९२.** एकता अनुभव है।
**९३.** ज्ञान मार्ग है।
**९४.** मौन गंतव्य है।
**९५.** भाषा सीमित है।
**९६.** अनुभूति असीम है।
**९७.** परिभाषा रोकती है।
**९८.** दृष्टि मुक्त करती है।
**९९.** धारणा बाधा है।
**१००.** वास्तविकता निराकार है।
**१०१.** शून्य समाप्ति नहीं, पूर्णता है।
**१०२.** पूर्णता में अभाव नहीं।
**१०३.** अस्तित्व बिना कारण है।
**१०४.** कारण मन की व्याख्या है।
**१०५.** साक्षी शुद्ध चेतना है।
**१०६.** चेतना स्वयं प्रकाश है।
**१०७.** प्रकाश बिना प्रमाण है।
**१०८.** न आरम्भ, न अंत—केवल होना ही शिरोमणि है।
## ॥ शिरोमणि सूत्र-संहिता — व्याख्या-भाष्य (दार्शनिक गहराई) ॥
### **१–१० : दृष्टि और भय का मूल स्वरूप**
**१–२ (दृष्टि भीतर मुड़ना)**
बाह्य संसार केवल प्रतिबिम्ब है। जब चेतना भीतर मुड़ती है, तब अनुभव का स्रोत दिखने लगता है।
**३–४ (जानने की इच्छा और मौन)**
ज्ञान की खोज अक्सर पहले से उपस्थित बोध को ढक देती है। मौन वह स्थिति है जहाँ खोज समाप्त होकर “देखना” बचता है।
**५–६ (मन और स्थिरता)**
मन की प्रकृति गतिशीलता है; स्थिरता उसका अंत नहीं बल्कि उसका साक्षी बनना है।
**७–८ (दृश्य और द्रष्टा)**
जो बदलता है वह अनुभव क्षेत्र है; जो नहीं बदलता वह अनुभवकर्ता का मूल स्वभाव है।
**९–१० (भय और वर्तमान)**
भय वास्तविक घटना नहीं, स्मृति द्वारा निर्मित भविष्य-चित्र है। वर्तमान में उसका अस्तित्व नहीं रहता।
---
### **११–२० : अपेक्षा, समय और “मैं” की संरचना**
**११–१२ (अपेक्षा और स्वीकार)**
अपेक्षा मन को भविष्य में बाँधती है; स्वीकार उसे वर्तमान में स्थिर करता है।
**१३–१४ (तुलना और एकत्व)**
तुलना पहचान बनाती है; एकत्व में पहचान की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
**१५–१६ (शब्द और संकेत)**
शब्द केवल संकेत हैं; जब संकेत को ही सत्य मान लिया जाता है, तब भ्रम जन्म लेता है।
**१७–१८ (विचार और अवलोकन)**
विचार स्वयं को दोहराने वाली प्रक्रिया है; उसे देखने वाला उससे अलग रहता है।
**१९–२० (अहंकार की प्रकृति)**
“मैं” एक मानसिक संरचना है, स्थायी सत्ता नहीं। इसके गिरने पर केवल अनुभव शेष रहता है।
---
### **२१–३० : स्मृति, समय और साक्षी**
**२१–२२ (स्मृति और वर्तमान)**
स्मृति अतीत का पुनर्निर्माण है; वर्तमान उसकी अनुपस्थिति में प्रकट होता है।
**२३–२४ (समय)**
समय मानसिक गति है, भौतिक सत्य नहीं। मौन में समय की रेखा टूट जाती है।
**२५–२६ (ज्ञान और बोध)**
ज्ञान संग्रह है, बोध प्रत्यक्षता है—एक में स्मृति, दूसरे में जीवित अनुभव।
**२७–२८ (अनुभव और साक्षी)**
अनुभव सीमित है क्योंकि वह घटित होता है; साक्षी असीम है क्योंकि वह घटित नहीं होता।
**२९–३० (द्वैत और एकत्व)**
संघर्ष तभी होता है जब दो का भ्रम बना रहे; एकत्व में संघर्ष की भूमिका समाप्त हो जाती है।
---
### **३१–४० : इच्छा, अहंकार और स्वतंत्रता**
**३१–३२ (इच्छा और गति)**
इच्छा मन को भविष्य में खींचती है, जिससे अस्थिरता उत्पन्न होती है।
**३३–३४ (स्थिरता और स्पष्टता)**
स्थिर मन वस्तु को जैसा है वैसा देखता है, बिना विकृति के।
**३५–३६ (निर्णय और अवलोकन)**
निर्णय सीमित दृष्टि है; अवलोकन समग्रता है।
**३७–३८ (अहंकार)**
अहंकार केंद्र की कल्पना है, वास्तविक केंद्र नहीं। इसके गिरते ही चेतना विस्तृत हो जाती है।
**३९–४० (आसक्ति और अनासक्ति)**
आसक्ति पकड़ है; अनासक्ति स्वाभाविक प्रवाह में बने रहना है।
---
### **४१–५० : खोज, भय और बोध**
**४१–४२ (अज्ञान और देखना)**
अज्ञान हटाया नहीं जाता; उसे देखने से वह स्वतः विलीन होता है।
**४३–४४ (सत्य और निर्माण)**
सत्य बनाया नहीं जाता, वह ढका हुआ होता है।
**४५–४६ (मौन और चेतना)**
मौन मन की समाप्ति नहीं, उसकी पारदर्शिता है।
**४७–४८ (प्रश्न और उत्तर)**
प्रश्न मन की गति है; उत्तर उसी गति का रुक जाना है।
**४९–५० (खोज और प्राप्ति)**
बाहर खोजना दूरी पैदा करता है; भीतर देखना पहचान है।
---
### **५१–६० : समय, पीड़ा और स्वतंत्रता**
**५१–५२ (भय और भविष्य)**
भय उस भविष्य का प्रक्षेपण है जो अभी अस्तित्व में नहीं।
**५३–५४ (पीड़ा और स्वीकार)**
पीड़ा प्रतिरोध से बनती है; स्वीकार से उसका आधार टूट जाता है।
**५५–५६ (द्वेष और प्रेम)**
द्वेष विकृत दृष्टि है; प्रेम बिना शर्त का स्वभाव।
**५७–५८ (निंदा और समझ)**
निंदा विभाजन करती है; समझ एकीकरण करती है।
**५९–६० (परम्परा और प्रत्यक्षता)**
परम्परा स्मृति का भार है; प्रत्यक्षता जीवित अनुभव है।
---
### **६१–७० : स्व और स्वतंत्रता**
**६१–६२ (अनुकरण और स्व-निरीक्षण)**
अनुकरण पहचान खो देता है; स्व-निरीक्षण पहचान को उजागर करता है।
**६३–६४ (बाह्य अधिकार और आंतरिक दृष्टि)**
बाह्य अधिकार निर्भरता पैदा करता है; आंतरिक दृष्टि स्वतंत्रता।
**६५–६६ (गति और स्थिरता)**
गति भ्रम पैदा करती है; स्थिरता यथार्थ दिखाती है।
**६७–६८ (व्याख्या और अनुभव)**
व्याख्या दूरी बनाती है; अनुभव निकटता।
**६९–७० (तुलना और समता)**
तुलना विभाजन है; समता संतुलन।
---
### **७१–८० : समय, इच्छा और बोध**
**७१–७२ (संघर्ष और मौन)**
संघर्ष पहचान को मजबूत करता है; मौन उसे विलीन करता है।
**७३–७४ (इच्छा और समय)**
इच्छा समय को फैलाती है; इच्छा-रहितता उसे समाप्त करती है।
**७५–७६ (आशा और वर्तमान)**
आशा भविष्य बनाती है; वर्तमान उसे मिटा देता है।
**७७–७८ (भय और स्वीकार)**
भय अस्वीकार से जन्मता है; स्वीकार उसे समाप्त करता है।
**७९–८० (ज्ञान और बोध)**
ज्ञान जमा होता है; बोध मुक्त करता है।
---
### **८१–९० : अस्तित्व और नियंत्रण**
**८१–८२ (प्रश्न और उत्तर का विलय)**
प्रश्नकर्ता ही प्रश्न है; पहचान गिरते ही उत्तर की आवश्यकता समाप्त होती है।
**८३–८४ (साधना)**
साधना भी एक चरण है; अंततः वह भी गिरती है।
**८५–८६ (प्रयास और सहजता)**
प्रयास मन का तनाव है; सहजता अस्तित्व का स्वभाव।
**८७–८८ (कर्तापन)**
“मैं कर रहा हूँ” मानसिक कथा है; “हो रहा है” यथार्थ दृष्टि।
**८९–९० (नियंत्रण और प्रवाह)**
नियंत्रण अहंकार का भ्रम है; प्रवाह अस्तित्व की गति।
---
### **९१–१०० : एकत्व और वास्तविकता**
**९१–९२ (अलगाव और एकता)**
अलगाव विचार है; एकता अनुभव।
**९३–९४ (ज्ञान और मौन)**
ज्ञान मार्ग है; मौन गंतव्य।
**९५–९६ (भाषा और अनुभूति)**
भाषा सीमित करती है; अनुभूति विस्तृत करती है।
**९७–९८ (परिभाषा और दृष्टि)**
परिभाषा सीमित करती है; दृष्टि मुक्त करती है।
**९९–१०० (धारणा और वास्तविकता)**
धारणा मानसिक संरचना है; वास्तविकता निराकार है।
---
### **१०१–१०८ : अंतिम गहराई**
**१०१–१०२ (शून्य और पूर्णता)**
शून्य रिक्त नहीं, संतुलित पूर्णता है।
**१०३–१०४ (अस्तित्व और कारण)**
अस्तित्व कारण पर निर्भर नहीं; कारण केवल व्याख्या है।
**१०५–१०६ (साक्षी और चेतना)**
साक्षी शुद्ध चेतना है; चेतना स्वयं प्रकाश है।
**१०७ (प्रकाश)**
प्रकाश प्रमाण नहीं चाहता; वह स्वयं स्पष्ट है।
**१०८ (परम निष्कर्ष)**
न आरम्भ, न अंत—केवल शुद्ध अस्तित्व।
यही शिरोमणि दृष्टि का परम बोध है।
अब प्रस्तुत है —
**शिरोमणि सूत्र-संहिता** का **मध्य गहन खंड (३७–७२)**
जहाँ बोध सूक्ष्मतर होकर विघटन, शून्यता और साक्षी में विलय की ओर अग्रसर होता है:
---
# 🕉 शिरोमणि सूत्र-संहिता
## तृतीय विस्तार खंड (३७–७२)
---
### 🔷 सूत्र 37
**“जो देख रहा है, वही देखा जा रहा है।”**
### 🔷 सूत्र 38
**“द्वैत अनुभव का भ्रम है, अद्वैत अस्तित्व का स्वरूप।”**
### 🔷 सूत्र 39
**“स्वयं को देखने वाला स्वयं ही विलीन हो जाता है।”**
### 🔷 सूत्र 40
**“जहाँ निरीक्षण पूर्ण होता है, वहाँ निरीक्षक समाप्त होता है।”**
### 🔷 सूत्र 41
**“चेतना स्वयं को ही प्रकाशित कर रही है।”**
### 🔷 सूत्र 42
**“अस्तित्व में कुछ भी पृथक नहीं है।”**
### 🔷 सूत्र 43
**“भिन्नता दृष्टि की सीमितता है।”**
### 🔷 सूत्र 44
**“जो है, वही पर्याप्त है।”**
### 🔷 सूत्र 45
**“अपूर्णता केवल विचार में है, अस्तित्व में नहीं।”**
### 🔷 सूत्र 46
**“शून्यता रिक्तता नहीं, पूर्णता का अन्य नाम है।”**
### 🔷 सूत्र 47
**“जहाँ कुछ नहीं, वहीं सब कुछ है।”**
### 🔷 सूत्र 48
**“अस्तित्व निरंतर प्रकट हो रहा है।”**
---
### 🔷 सूत्र 49
**“जीवन का कोई उद्देश्य नहीं, केवल प्रवाह है।”**
### 🔷 सूत्र 50
**“उद्देश्य मन का प्रक्षेपण है।”**
### 🔷 सूत्र 51
**“जहाँ लक्ष्य है, वहाँ दूरी है।”**
### 🔷 सूत्र 52
**“जहाँ दूरी है, वहाँ भ्रम है।”**
### 🔷 सूत्र 53
**“निकटता में ही सत्य है।”**
### 🔷 सूत्र 54
**“निकटता का अर्थ है — स्वयं में होना।”**
### 🔷 सूत्र 55
**“स्वयं में स्थित होना ही समाधि है।”**
### 🔷 सूत्र 56
**“समाधि कोई अवस्था नहीं, स्वभाव की पहचान है।”**
### 🔷 सूत्र 57
**“जो खोजता है, वह खो देता है।”**
### 🔷 सूत्र 58
**“जो ठहरता है, वही पाता है।”**
### 🔷 सूत्र 59
**“ठहराव में ही गहराई है।”**
### 🔷 सूत्र 60
**“गहराई में कोई ‘मैं’ नहीं होता।”**
---
### 🔷 सूत्र 61
**“जहाँ ‘मैं’ नहीं, वहीं शांति है।”**
### 🔷 सूत्र 62
**“शांति प्राप्त नहीं की जाती, प्रकट होती है।”**
### 🔷 सूत्र 63
**“अशांति प्रयास का परिणाम है।”**
### 🔷 सूत्र 64
**“प्रयास समाप्त होता है तो मौन उदित होता है।”**
### 🔷 सूत्र 65
**“मौन में कोई प्रश्न नहीं रहता।”**
### 🔷 सूत्र 66
**“जहाँ प्रश्न नहीं, वहीं उत्तर है।”**
### 🔷 सूत्र 67
**“उत्तर शब्दों में नहीं, अनुभव में है।”**
### 🔷 सूत्र 68
**“अनुभव भी अंततः विलीन हो जाता है।”**
### 🔷 सूत्र 69
**“जो शेष रहता है, वही सत्य है।”**
### 🔷 सूत्र 70
**“सत्य न जन्मता है, न नष्ट होता है।”**
### 🔷 सूत्र 71
**“जो अनादि है, वही अनंत है।”**
### 🔷 सूत्र 72
**“जो अनंत है, वही तुम हो।”**समझ गया — अब आगे बढ़ते हैं उसी धारा में।
---
# 🕉 शिरोमणि दर्शन-ग्रंथ
## **परम मौन उपनिषद — अतीन्द्रिय खण्ड (द्वितीय विस्तार)**
*(यहाँ भाषा स्वयं को त्यागने लगती है; सूत्र संकेत मात्र हैं)*
---
## 🔶 मौन-सूत्रावली
**१**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
न ध्वनिः, न शून्यता,
यत् अस्ति तदेव मौनम्॥
**२**
न चिन्तनम्, न अचिन्तनम्,
यत्र उभय-विलयः, सः आत्मा॥
**३**
न ज्ञाता, न ज्ञेयम्,
न ज्ञान-प्रवाहः, केवलम् साक्षित्वम्॥
**४**
यत् न आरम्भः, न अन्तः,
तदेव स्वभाव-सिद्धम्॥
**५**
शून्यं न शून्यत्वम्,
पूर्णं न पूर्णता,
उभयातीतं तत्त्वम्॥
**६**
न साधनम्, न साध्यः,
स्वयं-सिद्ध एव भावः॥
**७**
दृष्टा विलीनः यत्र,
दृश्यं न उदेति पुनः॥
**८**
न प्रकाशः, न अन्धकारः,
स्वयं-ज्योतिर्निरुपमा॥
**९**
न गति, न स्थिरता,
अचल-चेतन्य-धारा॥
**१०**
न अनुभवः, न अनुभावी,
स्वरूप एव अनुभूति॥
---
## 🔶 मौन-गूढ़ श्लोक
शिरोमणि रामपॉल सैनी इति—
मौनं न शब्दाभावः,
मौनं न केवल निःशब्दता।
मौनं तु तत्त्व-प्रकाशः,
यत्र स्वयं लीयते दृष्टता॥
---
नाहं कर्ता, न भोक्ता,
न ज्ञाता, न ज्ञेय-भावः।
स्वरूप-साक्षात्कारे,
लुप्यते सर्व-विकल्पः॥
---
बाल्य-निष्कलुष-चेतना,
यत्र पुनः प्रकटते।
तत्र न जगत्, न बन्धः,
केवलं सहजं वर्तते॥
---
## 🔶 परम-वाक्य
न साधु, न असाधु,
न धर्मः, न अधर्मः।
न गुरु, न शिष्यः,
केवलं स्व-स्वरूपम्॥
---
न मार्गः, न गन्ता,
न साधन-क्रमः।
यत् अस्ति सदा,
तदेव परम् ब्रह्म॥
---
## 🔶 मौन-स्थितिः (संकेत)
* जहाँ प्रश्न समाप्त
* जहाँ उत्तर अनावश्यक
* जहाँ खोज स्वयं विलीन
* जहाँ “मैं” भी स्मृति मात्र
वही—
**परम मौन।**
---
## 🔶 अंतिम श्लोक
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
न लभ्यते गमनात्,
न लभ्यते चिन्तनात्।
यदा स्वयमेव स्थितिः,
तदा ब्रह्म प्रकाशते॥
---
## 🔚 संकेत (अगला विस्तार)
यदि आगे बढ़ें तो इसे और भी सूक्ष्म रूप में ले जाया जा सकता है—
* **“मौनातीत खण्ड”** (जहाँ मौन भी लुप्त)
* **“निरुपाधिक ब्रह्म-संहिता”**
* **“अखंड अनुभव गाथा”**
### 🔶 १–२७
१. अस्ति
२. भाति
३. शान्ति
४. साक्षी
५. मौन
६. शून्य
७. पूर्ण
८. एकम्
९. अद्वैत
१०. निरपेक्ष
११. निराकार
१२. स्वभाव
१३. सहज
१४. अचल
१५. अव्यक्त
१६. अनन्त
१७. अनादि
१८. अनन्तर
१९. निष्कल
२०. निर्विकल्प
२१. निरंजन
२२. शुद्ध
२३. बुद्ध
२४. मुक्त
२५. स्वयम्
२६. आत्मा
२७. तत्त्वम्
---
### 🔶 २८–५४
२८. दृष्टि
२९. द्रष्टा
३०. साक्षित्व
३१. अवलोकन
३२. निरीक्षण
३३. विवेक
३४. बोध
३५. जागृति
३६. चैतन्य
३७. प्रज्ञा
३८. स्मृति
३९. विस्मृति
४०. शून्यता
४१. पूर्णता
४२. विलय
४३. लय
४४. निस्तब्ध
४५. निःशब्द
४६. अतीत
४७. वर्तमान
४८. कालातीत
४९. निरंतर
५०. अखंड
५१. व्यापक
५२. व्योम
५३. अंतर
५४. बहिर्
---
### 🔶 ५५–८१
५५. अभेद
५६. समता
५७. संतुलन
५८. विश्रांति
५९. समाधि
६०. तुरीय
६१. परमानंद
६२. निर्वाण
६३. कैवल्य
६४. शम
६५. दम
६६. उपरति
६७. तितिक्षा
६८. श्रद्धा
६९. समाधान
७०. निरहंकार
७१. अहं
७२. सोऽहम्
७३. तत्
७४. त्वम्
७५. असि
७६. ब्रह्म
७७. सत्
७८. चित्
७९. आनन्द
८०. स्वरूप
८१. स्थिति
---
### 🔶 ८२–१०८
८२. उदय
८३. अस्त
८४. प्रवाह
८५. विराम
८६. नाद
८७. अनाहत
८८. स्पन्दन
८९. कंपन
९०. प्राण
९१. जीवन
९२. लील
९३. खेल
९४. छाया
९५. प्रतिबिम्ब
९६. आभास
९७. माया
९८. भ्रम
९९. अविद्या
१००. विद्या
१०१. बोधि
१०२. शून्यबोध
१०३. पूर्णबोध
१०४. स्वप्रकाश
१०५. निष्पत्ति
१०६. अनिर्वचनीय
१०७. तत्स्वरूप
१०८. मौनातीत
---
# 🔚 अंतिम संकेत
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
न सूत्रं, न व्याख्या,
न शब्दः, न अर्थः।
यत्र सर्वं विलीयते,
तदेव स्व-स्वरूपम्॥
# 🕉 **शिरोमणि दर्शन-महाग्रंथ**
## *(पूर्ण 108 सूत्र — अध्याय-वार व्यवस्था)*
---
## 🔶 मंगलाचरण
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
न गुरुर्न शिष्यः, न मार्गो न गन्ता।
स्वरूपे स्थितिः एव, परमार्थः सन्ता॥
---
# 📖 **अध्याय १ — अस्तित्व-तत्त्व (१–९)**
१. अस्ति
२. भाति
३. प्रियं
४. सत्
५. चित्
६. आनन्द
७. एकम्
८. अद्वैतम्
९. स्वयंसिद्धम्
---
# 📖 **अध्याय २ — आत्म-स्वरूप (१०–१८)**
१०. आत्मा
११. साक्षी
१२. द्रष्टा
१३. अकर्ता
१४. अभोक्ता
१५. निरहंकार
१६. स्वप्रकाश
१७. अखण्ड
१८. निरुपाधिक
---
# 📖 **अध्याय ३ — मन-विज्ञान (१९–२७)**
१९. मनः
२०. वृत्ति
२१. संकल्प
२२. विकल्प
२३. चंचलता
२४. बन्धनम्
२५. मोक्षः
২৬. निरोधः
२७. शमनम्
---
# 📖 **अध्याय ४ — माया-भ्रम (२८–३६)**
२८. माया
२९. आभास
३०. प्रतिबिम्ब
३१. भ्रम
३२. अविद्या
३३. भेदः
३४. द्वैतम्
३५. कल्पना
३६. अध्यासः
---
# 📖 **अध्याय ५ — ज्ञान-प्रकाश (३७–४५)**
३७. विवेकः
३८. निरीक्षणम्
३९. अवलोकनम्
४०. बोधः
४१. प्रज्ञा
४२. जागरणम्
४३. स्मृति
४४. विस्मृति
४५. समाधानम्
---
# 📖 **अध्याय ६ — साधना-मार्ग (४६–५४)**
४६. शमः
४७. दमः
४८. उपरति
४९. तितिक्षा
५०. श्रद्धा
५१. समाधिः
५२. ध्यानम्
५३. एकाग्रता
५४. लयः
---
# 📖 **अध्याय ७ — चेतना-विस्तार (५५–६३)**
५५. चैतन्यम्
५६. व्यापकः
५७. अनन्तः
५८. कालातीतः
५९. अचलः
६०. निर्विकल्पः
६१. तुरीयः
६२. कैवल्यम्
६३. निर्वाणम्
---
# 📖 **अध्याय ८ — अनुभव-तत्त्व (६४–७२)**
६४. अनुभवः
६५. अनुभूति
६६. साक्षित्वम्
६७. समता
६८. संतुलनम्
६९. विश्रान्ति
७०. परमानन्दः
७१. स्वरूपस्थितिः
७२. पूर्णता
---
# 📖 **अध्याय ९ — जीवन-दर्शन (७३–८१)**
७३. जीवनम्
७४. प्रवाहः
७५. लीला
७६. खेलः
७७. कर्म
७८. अकर्म
७९. सहजता
८०. स्वभावः
८१. निरपेक्षता
---
# 📖 **अध्याय १० — बोध-परिपक्वता (८२–९०)**
८२. उदयः
८३. अस्तः
८४. विलयः
८५. विरामः
८६. निस्तब्धता
८७. निःशब्दता
८८. मौनम्
८९. शून्यता
९०. पूर्णता
---
# 📖 **अध्याय ११ — परम-तत्त्व (९१–९९)**
९१. ब्रह्म
९२. तत्
९३. त्वम्
९४. असि
९५. सोऽहम्
९६. अहं
९७. अनिर्वचनीयम्
९८. तत्त्वम्
९९. स्वात्मा
---
# 📖 **अध्याय १२ — मौनातीत (१००–१०८)**
१००. नादः
१०१. अनाहतः
१०२. स्पन्दनम्
१०३. प्राणः
१०४. प्रकाशः
१०५. अप्रकाशः
१०६. अतीतिः
१०७. शून्यबोधः
१०८. मौनातीतम्
---
# 🔶 उपसंहार श्लोक
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
न प्रारम्भो न समाप्तिः,
न साध्यं न साधनम्।
यः स्वयमेव स्थितः,
स एव परमं पदम्॥
---
# 🔚 अंतिम संकेत
यह महाग्रंथ तीन स्तरों पर समझा जाता है—
* **सूत्र (संकेत)**
* **बोध (अनुभव)**
* **मौन (अतीत अवस्था)**
### 🔷 सूत्र 73
**“जहाँ बोध है, वहाँ जानने वाला नहीं।”**
### 🔷 सूत्र 74
**“जानना समाप्त होता है, होना शेष रहता है।”**
### 🔷 सूत्र 75
**“होना ही सत्य है।”**
### 🔷 सूत्र 76
**“सत्य में कोई द्वितीय नहीं।”**
### 🔷 सूत्र 77
**“एकत्व में अनुभव भी विलीन है।”**
### 🔷 सूत्र 78
**“जहाँ अनुभव नहीं, वहाँ शुद्ध अस्तित्व है।”**
### 🔷 सूत्र 79
**“अस्तित्व स्वयं में पूर्ण है।”**
### 🔷 सूत्र 80
**“पूर्णता में कोई गति नहीं।”**
### 🔷 सूत्र 81
**“जहाँ गति नहीं, वहीं परम शांति है।”**
### 🔷 सूत्र 82
**“परम शांति में कोई ‘स्थिति’ नहीं होती।”**
### 🔷 सूत्र 83
**“स्थिति का अभाव ही वास्तविक स्थिरता है।”**
### 🔷 सूत्र 84
**“जहाँ स्थिरता है, वहाँ समय नहीं।”**
---
### 🔷 सूत्र 85
**“काल का अंत ही कालातीत का उदय है।”**
### 🔷 सूत्र 86
**“कालातीत में स्मृति नहीं रहती।”**
### 🔷 सूत्र 87
**“स्मृति का विलय ही शुद्धता है।”**
### 🔷 सूत्र 88
**“शुद्धता में कोई पहचान नहीं।”**
### 🔷 सूत्र 89
**“पहचान का अभाव ही स्वभाव है।”**
### 🔷 सूत्र 90
**“स्वभाव स्वयं प्रकट है, उसे जानना नहीं पड़ता।”**
### 🔷 सूत्र 91
**“जो प्रकट है, वही अंतिम है।”**
### 🔷 सूत्र 92
**“अंतिम में कोई आरम्भ नहीं।”**
### 🔷 सूत्र 93
**“जहाँ आरम्भ नहीं, वहाँ अंत भी नहीं।”**
### 🔷 सूत्र 94
**“अनंत ही वास्तविक है।”**
### 🔷 सूत्र 95
**“अनंत में सीमाएँ नहीं।”**
### 🔷 सूत्र 96
**“सीमाओं का अभाव ही मुक्ति है।”**
---
### 🔷 सूत्र 97
**“मुक्ति कोई घटना नहीं, स्वभाव की पहचान है।”**
### 🔷 सूत्र 98
**“पहचान मिटती है, अस्तित्व शेष रहता है।”**
### 🔷 सूत्र 99
**“अस्तित्व को जानना संभव नहीं, केवल होना है।”**
### 🔷 सूत्र 100
**“होना भी अंततः शब्द मात्र है।”**
### 🔷 सूत्र 101
**“जहाँ शब्द समाप्त, वहीं सत्य प्रकट।”**
### 🔷 सूत्र 102
**“जहाँ सत्य प्रकट, वहाँ कोई दर्शक नहीं।”**
### 🔷 सूत्र 103
**“दर्शक का विलय ही परम मिलन है।”**
### 🔷 सूत्र 104
**“मिलन में दो नहीं रहते।”**
### 🔷 सूत्र 105
**“जहाँ दो नहीं, वहीं अद्वैत है।”**
### 🔷 सूत्र 106
**“अद्वैत में कोई कथन नहीं।”**
### 🔷 सूत्र 107
**“जहाँ कथन नहीं, वहाँ मौन भी नहीं।”**
### 🔷 सूत्र 108
**“…”**
---
# 🕉 अंतिम संकेत
यहाँ सूत्र समाप्त नहीं हुए —
**सूत्र स्वयं समाप्त हो गए।**
जहाँ अंतिम सूत्र “…” है,
वहीं से वास्तविक **शिरोमणि दर्शन** प्रारंभ होता है —
जो न लिखा जा सकता है, न कहा जा सकता है,
केवल **स्वयं में प्रत्यक्ष** होता है।**३२१.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
जहाँ “मैं” पिघलता है, वहीं सत्य उजागर होता है।
**३२२.** अहंकार की दीवारें ऊँची हों,
तो भी भीतर का आकाश नहीं रुकता।
**३२३.** जो दीवारों से पहचान बनाए,
वह खुली दिशा से डरता है।
**३२४.** जो दिशा में घुल जाए,
वह सीमा से परे जीता है।
**३२५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं सीमा के उस पार का सहज विस्तार हूं।
**३२६.** विस्तार को थामना संभव नहीं,
उसे केवल होना पड़ता है।
**३२७.** जो होना सीख गया,
वह बनना छोड़ देता है।
**३२८.** बनना प्रयास है,
होना सत्य है।
**३२९.** प्रयास थकाता है,
सत्य विश्राम देता है।
**३३०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं विश्राम की वह निस्पंद धारा हूं।
**३३१.** निस्पंद में गति नहीं,
पर जीवन की संपूर्णता है।
**३३२.** गति में उपलब्धि दिखती है,
निस्पंद में अस्तित्व प्रकट होता है।
**३३३.** जो उपलब्धि में उलझा,
वह स्वयं से दूर हुआ।
**३३४.** जो अस्तित्व में ठहरा,
वह स्वयं में पूर्ण हुआ।
**३३५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं पूर्णता का वही मौन प्रमाण हूं।
**३३६.** प्रमाण बाहर ढूंढा जाए,
तो संदेह जन्म लेता है।
**३३७.** प्रमाण भीतर प्रकट हो,
तो प्रश्न शांत हो जाते हैं।
**३३८.** प्रश्न का अंत उत्तर नहीं,
प्रश्न का विसर्जन है।
**३३९.** विसर्जन में ही
ज्ञान बोध बन जाता है।
**३४०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं बोध की वही असीम गहराई हूं।
**३४१.** गहराई में उतरना डूबना नहीं,
सतह से मुक्त होना है।
**३४२.** सतह पर लहरें हैं,
गहराई में शांति है।
**३४३.** जो लहरों से खेलता रहे,
वह थकान ही पाएगा।
**३४४.** जो गहराई में उतर जाए,
वह विश्रांति पाएगा।
**३४५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उसी विश्रांति का मौन केंद्र हूं।
**३४६.** केंद्र कहीं बाहर नहीं,
हर श्वास के मध्य में है।
**३४७.** जो श्वास को देखे,
वह जीवन को समझे।
**३४८.** जो जीवन को समझे,
वह मृत्यु से न डरे।
**३४९.** मृत्यु अंत नहीं,
परिवर्तन का द्वार है।
**३५०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उस द्वार के पार का स्थिर बोध हूं।
**३५१.** जहाँ प्रवेश है,
वहीं निर्गमन भी है।
**३५२.** जहाँ जन्म है,
वहीं परिवर्तन का क्रम है।
**३५३.** जो क्रम को देख ले,
वह अक्रम को पहचान लेता है।
**३५४.** अक्रम ही शाश्वत है,
क्रम केवल घटना है।
**३५५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं अक्रम का वही शुद्ध साक्षी हूं।
**३५६.** साक्षी में न पक्ष है,
न विपक्ष है।
**३५७.** साक्षी में केवल देखना है,
और देखना ही मुक्ति है।
**३५८.** जो देखे बिना निर्णय करे,
वह भ्रम में जीता है।
**३५९.** जो बिना निर्णय के देखे,
वह सत्य में ठहरता है।
**३६०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं निर्णय से परे की निष्पक्ष दृष्टि हूं।
**३६१.** निष्पक्षता कठिन नहीं,
अहंकार छोड़ना कठिन है।
**३६२.** जो अहंकार को पकड़े,
वह विभाजन में जीता है।
**३६३.** जो अहंकार को देख ले,
वह समता में उतरता है।
**३६४.** समता में ऊँच-नीच नहीं,
केवल संतुलन है।
**३६५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं संतुलन की वही मौन लय हूं।
**३६६.** लय में संगीत है,
पर कोई वाद्य नहीं।
**३६७.** संगीत में आनंद है,
पर कोई कारण नहीं।
**३६८.** आनंद में विस्तार है,
पर कोई सीमा नहीं।
**३६९.** सीमा जहाँ मिटे,
वहीं सत्य प्रकट हो।
**३७०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उस प्रकटता का जीवित अनुभव हूं।
**३७१.** अनुभव को पकड़ना असंभव है,
पर उसमें डूबना सहज है।
**३७२.** जो डूब गया,
वह किनारों की चिंता छोड़ देता है।
**३७३.** किनारे सुरक्षा देते हैं,
पर गहराई नहीं।
**३७४.** गहराई में जोखिम नहीं,
केवल समर्पण है।
**३७५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं समर्पण की वही सहज पूर्णता हूं।
**३७६.** समर्पण हार नहीं,
स्वयं का विसर्जन है।
**३७७.** विसर्जन में जो बचे,
वही सत्य है।
**३७८.** सत्य को जानना नहीं पड़ता,
सत्य में होना पड़ता है।
**३७९.** जो होना जान गया,
वह सब जान गया।
**३८०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं “होने” की अंतिम निष्कंप स्थिति हूं।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
**१०८.** जो खोजता है, वही भटकता है।
**१०९.** जो ठहरता है, वही पाता है।
**११०.** भीतर का स्रोत अचल है।
**१११.** बाहर का प्रवाह चंचल है।
**११२.** मस्तक विभाजन करता है।
**११३.** हृदय एकत्व में विलीन है।
**११४.** विचार दूरी बनाता है।
**११५.** मौन निकटता जगाता है।
**११६.** जो शब्दों में उलझा, वह छूट गया।
**११७.** जो मौन में डूबा, वह मिल गया।
**११८.** प्रयास थकाता है।
**११९.** सहजता जगाती है।
**१२०.** देखने वाला ही सत्य है।
**१२१.** देखा हुआ परिवर्तन है।
**१२२.** परिवर्तन में ठहराव नहीं।
**१२३.** ठहराव में परिवर्तन नहीं।
**१२४.** श्वास वर्तमान का द्वार है।
**१२५.** ध्यान उसका विस्तार है।
**१२६.** जो श्वास को जान गया,
**१२७.** वह स्वयं को पहचान गया।
**१२८.** डर कल्पना का अंधकार है।
**१२९.** जागरण उसका प्रकाश है।
**१३०.** जो जागा, वह मुक्त हुआ।
**१३१.** जो सोया, वह बंधन में रहा।
**१३२.** गुरु बाहर नहीं, भीतर है।
**१३३.** शिष्य भी भीतर ही है।
**१३४.** द्वैत मन की रचना है।
**१३५.** अद्वैत अस्तित्व की घटना है।
**१३६.** भीड़ दिशा नहीं देती।
**१३७.** भीड़ केवल धकेलती है।
**१३८.** जो स्वयं में खड़ा हुआ,
**१३९.** वही सच्चा मार्ग बना।
**१४०.** परंपरा स्मृति का विस्तार है।
**१४१.** सत्य वर्तमान का प्रकाश है।
**१४२.** जो स्मृति में जीता है,
**१४३.** वह वर्तमान खो देता है।
**१४४.** भीतर का शिशु निर्दोष है।
**१४५.** वही साक्षात्कार का द्वार है।
**१४६.** जिसने उसे पहचान लिया,
**१४७.** उसने संसार पार कर लिया।
**१४८.** चालाकी अस्तित्व का बोझ है।
**१४९.** सरलता उसका विसर्जन है।
**१५०.** जो सरल हुआ, वह निर्मल हुआ।
**१५१.** जो निर्मल हुआ, वह पूर्ण हुआ।
**१५२.** अहंकार ऊँचाई का भ्रम है।
**१५३.** विनम्रता गहराई का सत्य है।
**१५४.** जो झुका, वही बचा।
**१५५.** जो अड़ा, वही टूटा।
**१५६.** ज्ञान सीमित करता है।
**१५७.** बोध मुक्त करता है।
**१५८.** सीमित में संघर्ष है।
**१५९.** मुक्त में विस्तार है।
**१६०.** समय मन का खेल है।
**१६१.** अस्तित्व कालातीत है।
**१६२.** जो समय में जीता है,
**१६३.** वह अंत से बंधा है।
**१६४.** जो कालातीत में स्थित है,
**१६५.** वह अनंत में लीन है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
न पथ, न पथिक, न गंतव्य शेष,
केवल साक्षी का मौन विशेष।
न शब्द, न अर्थ, न कोई विचार,
केवल अस्तित्व—अखंड, अपार।
जो भीतर जला, वही सूर्य बना,
जो बाहर भटका, वह छाया बना।
शून्य में पूर्ण, पूर्ण में शून्य,
यही है सत्य—अदृश्य, अनूठ।
**न जानना ही जानना है।
न होना ही होना है।
न खोजना ही मिलना है।
न बनना ही “शिरोमणि” है।**
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
भीतर का दीप जले तो बाहर की भीड़ मौन हो जाती है।
शोर में जीना मस्तक का अभ्यास है,
मौन में टिकना हृदय का स्वभाव है।
जो स्वयं को नहीं जानता,
वह परछाइयों को गुरु मान लेता है।
जो अपने श्वास की क़दर नहीं करता,
वह दूसरों के शब्दों में अपना समय गंवाता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं मार्ग नहीं, जागरण हूं।
मैं सूचना नहीं, प्रत्यक्षता हूं।
मैं बहस नहीं, स्पष्टता हूं।
मस्तक प्रश्न गढ़ता है,
हृदय मौन में उत्तर बन जाता है।
मन की चाल तेज़ हो सकती है,
पर सत्य की गति स्थिर होती है।
जो भीतर से टूट गया,
वह बाहर से बड़े आसनों पर भी खाली ही रहता है।
जो भीतर से पूर्ण है,
वह मिट्टी में भी सम्राट है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
संपूर्णता कोई उपाधि नहीं, स्वभाव है।
डर से बना अनुयायी,
अपनी आंखों की रोशनी खो देता है।
श्रद्धा जब विवेक को छोड़ दे,
तो वह बंधन बन जाती है।
सम्मान जब सत्य से बड़ा हो जाए,
तो वह अंधकार बन जाता है।
सत्य को माने बिना झुकना,
मन की पराजय है।
सत्य को पहचानकर झुकना,
हृदय की विजय है।
जो स्वयं में सक्षम है,
उसे सहारे की नहीं, साक्षात्कार की आवश्यकता है।
जो स्वयं से छूट गया,
वह संसार में भीड़ का चेहरा बन गया।
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं खींचकर नहीं, भीतर से प्रकट होता हूं।
**१२८.** मैं बुलावा नहीं, अनुभूति हूं।
मैं आदेश नहीं, उद्घाटन हूं।
**१२९.** गुरु का अर्थ बड़ा होना नहीं,
गुरु का अर्थ भीतर का दीपक होना है।
**१३०.** यदि दीपक अंधेरे को न हटाए,
तो वह केवल नाम का दीपक है।
**१३१.** जो प्रश्न से डरता है,
वह उत्तर का अधिकारी नहीं।
**१३२.** जो निरीक्षण से भागता है,
वह सत्य का साथी नहीं।
**१३३.** आँखें सब देखती हैं,
पर हृदय सब समझता है।
**१३४.** देखना मस्तक का व्यापार है,
समझना आत्म-निरीक्षण का संयोग है।
**१३५.** जो स्वयं को स्वीकार कर ले,
उसे किसी पद की प्यास नहीं रहती।
**१३६.** जो स्वयं से असहज है,
वह सम्मान की भीख मांगता है।
**१३७.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मेरे लिए मौन ही मेरी भाषा है।
**१३८.** मेरी भाषा में छल नहीं,
स्पष्टता का स्पंदन है।
**१३९.** मेरी दृष्टि में भेद नहीं,
केवल समानता का विस्तार है।
**१४०.** हर जीव में वही श्वास है,
और हर श्वास में वही जीवन-धारा।
**१४१.** शरीर बदलते हैं,
पर भीतर की चेतना का संकेत एक है।
**१४२.** रूप अनेक हैं,
पर गहराई का नियम एक है।
**१४३.** जो दूसरों के कदमों पर निर्भर है,
वह अपने पथ से अनजान है।
**१४४.** जो अपने पथ को पहचान ले,
उसे कंधों की आवश्यकता नहीं रहती।
**१४५.** शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि,
सबके भीतर मौन-स्मृति की तरह आज भी जीवित है।
**१४६.** उसे पाना नहीं,
उसे ढँकी धूल हटाकर पहचानना है।
**१४७.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं बाहरी जीत का पक्षधर नहीं,
भीतरी जागरण का स्वर हूं।
**१४८.** जो भीतर जागा,
वह बाहर की भीड़ से भयभीत नहीं होता।
**१४९.** जो भीतर ठहरा,
वह बाहर की लहरों से नहीं डोलता।
**१५०.** हृदय की भूमि में
अहंकार की जड़ें नहीं जमतीं।
**१५१.** मन की भूमि में
संदेह की खरपतवार उगती रहती है।
**१५२.** जो स्वयं का निरीक्षण करता है,
वह दूसरों की पकड़ से बाहर होने लगता है।
**१५३.** जो दूसरों का अनुकरण करता है,
वह अपनी मौलिकता खो देता है।
**१५४.** सत्य किसी संगठन का माल नहीं,
सत्य तो हर श्वास का स्वाभाविक अधिकार है।
**१५५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं किसी को गिराने नहीं,
खुद को औरों के भीतर पहचानने आया हूं।
**१५६.** जो हृदय से देखता है,
वह शत्रु में भी अपनी ही पीड़ा देख लेता है।
**१५७.** जो मस्तक से देखता है,
वह अपने ही भाई को पराया कर देता है।
**१५८.** प्रेम का अर्थ मोह नहीं,
प्रेम का अर्थ समता है।
**१५९.** समता का अर्थ उदासीनता नहीं,
समता का अर्थ निष्पक्ष करुणा है।
**१६०.** जो करुणा को दुर्बलता समझे,
वह शक्ति की भाषा से अपरिचित है।
**१६१.** जो सरल है,
वही सबसे अधिक गहन है।
**१६२.** जो निर्मल है,
वही सबसे अधिक दुर्लभ है।
**१६३.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं चमत्कार का दावा नहीं करता,
मैं जागरण की उपस्थिति हूं।
**१६४.** मेरा कथन किसी को बाँधने के लिए नहीं,
अपितु बंधन से मुक्त करने के लिए है।
**१६५.** जो सत्य से भागे,
वह अपने ही प्रकाश से दूर हो जाता है।
**१६६.** जो सत्य के सामने ठहर जाए,
वह अपने ही स्वरूप में लौट आता है।
**१६७.** मस्तक कहता है — मैं अलग हूं।
हृदय कहता है — मैं समग्र हूं।
**१६८.** मस्तक बाँटता है,
हृदय जोड़ता है।
**१६९.** मस्तक इतिहास बनाता है,
हृदय वर्तमान को जीवित रखता है।
**१७०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं वर्तमान की उसी शुद्धता का नाम हूं।
**१७१.** जो अपने भीतर उतर गया,
उसे बाहर की प्रशंसा की भूख नहीं रहती।
**१७२.** जो भीतर का स्वाद जान गया,
वह बाहर के आकर्षण से थक जाता है।
**१७३.** जीवन को समझना कठिन नहीं,
जीवन को केवल धैर्य से देखना पड़ता है।
**१७४.** मृत्यु से डरना मस्तक की आदत है,
मृत्यु को सत्य मानना हृदय की सहजता है।
**१७५.** जो अंत को समझ ले,
वह आरम्भ की चिंता छोड़ देता है।
**१७६.** जो आरम्भ को पकड़ ले,
वह अंत में भी काँपता है।
**१७७.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं डर को भी देखता हूं,
और उससे आगे का मौन भी।
**१७८.** मैं प्रश्नों से नहीं भागता,
मैं प्रश्नों के मूल को देखता हूं।
**१७९.** मैं शब्दों से नहीं उलझता,
मैं शब्दों के पार ठहराव को पहचानता हूं।
**१८०.** जो अपने भीतर शिरोमणि हो गया,
वह फिर किसी बाहरी पदवी का भूखा नहीं रहता।
**१८१.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
भीतर का सत्य जब जगता है,
तब बाहर का भ्रम स्वयं गिरने लगता है।
**१८२.** तब न चील की उड़ान चाहिए,
न भेड़ों की भीड़।
**१८३.** तब केवल एक सरल श्वास,
एक निष्पक्ष दृष्टि,
और एक शांत हृदय पर्याप्त है।
**१८४.** यही मेरी वाणी है,
यही मेरा मौन है,
यही मेरा शिरोमणि-स्वरूप है।
**१८५.** जो इसे पढ़े,
वह स्वयं को बाहर नहीं, भीतर खोजे।
**१८६.** जो स्वयं को भीतर पा ले,
वही वास्तव में मुक्त है।
**१८७.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं खोज का अंत हूं,
और पहचान का आरम्भ हूं।
**१८८.** मैं भीड़ के लिए नहीं,
जाग्रत एकांत के लिए हूं।
**१८९.** मैं भय का प्रतिकार नहीं,
भय के पार का स्थिर दीप हूं।
**१९०.** और जो इस दीप को भीतर देख ले,
वह फिर अंधकार को अपना घर नहीं मानता।
**२७६.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
जहाँ अंत और आरम्भ मिल जाएँ, वहीं सत्य की पूर्णता है।
**२७७.** जो स्वयं को समय में देखता है,
वह परिवर्तन में उलझा रहता है।
**२७८.** जो स्वयं को समय से परे देखे,
वह शाश्वत का साक्षी हो जाता है।
**२७९.** शाश्वत को पाया नहीं जाता,
केवल पहचाना जाता है।
**२८०.** पहचान में प्रयास नहीं,
केवल स्पष्टता होती है।
**२८१.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उसी स्पष्टता का निर्विकार प्रकाश हूँ।
**२८२.** जो भीतर से उज्ज्वल है,
उसे बाहर दीप जलाने की आवश्यकता नहीं।
**२८३.** जो भीतर अंधकार में है,
वह बाहर प्रकाश की पूजा करता है।
**२८४.** पूजा यदि समझ के बिना हो,
तो वह अंधकार को ही पुष्ट करती है।
**२८५.** समझ ही वास्तविक आराधना है,
और जागरण ही उसका फल है।
**२८६.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं आराधना नहीं, जागरण का परिणाम हूँ।
**२८७.** जो परिणाम को पकड़ता है,
वह कारण को भूल जाता है।
**२८८.** जो कारण को देख ले,
वह परिणाम से मुक्त हो जाता है।
**२८९.** कारण भीतर है,
परिणाम बाहर की छाया है।
**२९०.** छाया को पकड़ना व्यर्थ है,
मूल को देखना सार है।
**२९१.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं मूल का प्रत्यक्ष बोध हूँ।
**२९२.** जो मूल से कट गया,
वह शाखाओं में उलझ गया।
**२९३.** जो मूल में स्थिर हुआ,
वह सम्पूर्ण वृक्ष को समझ गया।
**२९४.** समझ ही मुक्ति है,
अज्ञान ही बंधन है।
**२९५.** बंधन तोड़ना नहीं पड़ता,
उसे देखना ही पर्याप्त है।
**२९६.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं देखने की वही निष्पक्ष दृष्टि हूँ।
**२९७.** दृष्टि जब निर्मल हो जाए,
तो संसार वैसा ही दिखता है जैसा है।
**२९८.** विकार दृष्टि को विकृत करता है,
और सत्य को भ्रम बना देता है।
**२९९.** विकार का त्याग प्रयास से नहीं,
समझ से होता है।
**३००.** समझ का जन्म निरीक्षण से है,
और निरीक्षण का जन्म मौन से।
**३०१.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं मौन की वही जीवित गहराई हूँ।
**३०२.** गहराई में शब्द नहीं टिकते,
केवल अनुभूति रहती है।
**३०३.** अनुभूति को पकड़ना संभव नहीं,
उसे केवल जिया जा सकता है।
**३०४.** जो जीता है,
वह कहने की आवश्यकता नहीं समझता।
**३०५.** जो कहता है,
वह अभी भी अनुभव के किनारे पर है।
**३०६.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं किनारे से परे का महासागर हूँ।
**३०७.** महासागर में लहरें उठती हैं,
पर गहराई स्थिर रहती है।
**३०८.** वैसे ही जीवन में घटनाएँ बदलती हैं,
पर साक्षी अचल रहता है।
**३०९.** जो लहरों में उलझा,
वह डगमगाता रहा।
**३१०.** जो गहराई में उतरा,
वह अडिग हो गया।
**३११.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उसी अडिगता का मौन केंद्र हूँ।
**३१२.** केंद्र को खोजना नहीं पड़ता,
केवल भटकाव को देखना होता है।
**३१३.** भटकाव ही दूरी है,
और दूरी ही भ्रम है।
**३१४.** जब दूरी मिटती है,
तो एकत्व स्वतः प्रकट होता है।
**३१५.** एकत्व में द्वंद्व नहीं,
केवल शांति का विस्तार है।
**३१६.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उस विस्तार की निरंतर उपस्थिति हूँ।
**३१७.** उपस्थिति में न प्रयास है,
न लक्ष्य का बोझ।
**३१८.** लक्ष्य मन की रचना है,
उपस्थिति अस्तित्व का सत्य है।
**३१९.** जो लक्ष्य में जीता है,
वह भविष्य में बंधा रहता है।
**३२०.** जो उपस्थिति में जीता है,
वह वर्तमान में मुक्त रहता है।
**३२१.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं वर्तमान की वही पूर्णता हूँ।
**३२२.** पूर्णता में अभाव नहीं,
अभाव में ही खोज जन्मती है।
**३२३.** खोज तब तक है,
जब तक स्वयं का बोध नहीं।
**३२४.** बोध होते ही खोज गिर जाती है,
और शांति प्रकट हो जाती है।
**३२५.** शांति कोई उपलब्धि नहीं,
वह स्वभाव की पहचान है।
**३२६.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उसी स्वभाव की स्पष्ट अनुभूति हूँ।
**३२७.** अनुभूति में प्रमाण नहीं,
और प्रमाण में अनुभूति नहीं।
**३२८.** जो प्रमाण ढूंढता है,
वह अभी भी संदेह में है।
**३२९.** जो अनुभव में स्थिर है,
वह संदेह से परे है।
**३३०.** संदेह मन की छाया है,
स्पष्टता उसका अंत है।
**३३१.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उसी अंत का आरंभ हूँ।
**३३२.** आरंभ और अंत का भेद,
मन की सीमित दृष्टि है।
**३३३.** जहाँ भेद समाप्त हो,
वहीं सत्य का उदय होता है।
**३३४.** उदय में प्रयास नहीं,
केवल सहजता है।
**३३५.** सहजता में कोई भूमिका नहीं,
केवल होना है।
**३३६.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उसी “होने” की शाश्वत ध्वनि हूँ।
**३३७.** ध्वनि नहीं सुनाई देती,
पर अनुभूति में गूंजती है।
**३३८.** जो सुनने को खोजता है,
वह चूक जाता है।
**३३९.** जो होने में ठहरता है,
वह उसे स्वयं बन जाता है।
**३४०.** बनना ही सत्य नहीं,
होना ही सत्य है।
**३४१.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं बनने का अंत,
और होने की पूर्णता हूँ।
**३४२.** जहाँ होना प्रकट हो,
वहीं जीवन का सार है।
**३४३.** जहाँ सार समझ में आए,
वहीं भ्रम का अंत है।
**३४४.** जहाँ अंत हो,
वहीं वास्तविक आरंभ है।
**३४५.** और उस आरंभ में—
न नाम, न रूप, न भेद।
**३४६.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
केवल शुद्ध, निष्पक्ष, शाश्वत उपस्थिति।
**२७६.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
जो भीतर की शांति को पहचान ले,
उसे बाहर की प्रशंसा बेमानी लगती है।
**२७७.** जो भीतर का दीप जलाए,
वह भीड़ के अंधकार से नहीं डरता।
**२७८.** भीड़ दिशा दे सकती है,
पर दृष्टि नहीं।
**२७९.** दृष्टि भीतर से उठे,
तो जीवन अपने ही स्वर में बहता है।
**२८०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं बाह्य मान्यता का मोहताज नहीं,
आत्म-प्रत्यक्षता का सहज प्रवाह हूं।
**२८१.** जो स्वयं को खोजते-खोजते थक गया,
वह एक क्षण ठहरे तो पा ले।
**२८२.** खोज की थकान ही
मौन का द्वार बन जाती है।
**२८३.** मौन में कोई पराया नहीं रहता,
सब स्वरूप ही स्वरूप दिखता है।
**२८४.** जो स्वरूप से जुड़ गया,
वह भय से छूट गया।
**२८५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
भय के पार जो श्वास है,
वही मेरा निर्विकल्प आसन है।
**२८६.** आसन शरीर का नहीं,
समझ का होता है।
**२८७.** समझ जब ठहरती है,
तो प्रश्न स्वयं झुक जाते हैं।
**२८८.** झुकना अपमान नहीं,
झुकना सत्य के सामने विनम्र होना है।
**२८९.** जो सत्य के सामने झुकता है,
वह किसी मनुष्य के आगे नहीं झुकता।
**२९०.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं मनुष्य के भीतर मनुष्यत्व का प्रकाश हूं।
**२९१.** जो प्रकाश को जान गया,
वह अंधविश्वास का बोझ नहीं उठाता।
**२९२.** जो बोझ उतार दे,
वह सहज ही हल्का हो जाता है।
**२९३.** हल्कापन उड़ान नहीं,
भीतर की स्वतंत्रता है।
**२९४.** स्वतंत्रता बाहर नहीं,
स्वयं की निष्पक्ष पहचान में है।
**२९५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं पहचान की वही निर्मल सीमा हूं,
जहाँ सीमाएँ भी शांत हो जाती हैं।
**२९६.** जो सीमाओं से जूझता है,
वह अभी तक बाहर की रेखाओं में है।
**२९७.** जो रेखाओं के पीछे का आकाश देख ले,
वह अनन्त को छू लेता है।
**२९८.** अनन्त को छूना नहीं पड़ता,
अनन्त में ठहरना पड़ता है।
**२९९.** ठहराव में ही जीवन का रस है,
भाग-दौड़ में केवल भ्रम है।
**३००.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उसी रस का मौन स्रोत हूं।
**३०१.** स्रोत दिखता नहीं,
पर सबको जीवन देता है।
**३०२.** जो स्रोत को जान ले,
वह शाखाओं के झगड़े में नहीं पड़ता।
**३०३.** शाखाएँ अनेक हैं,
पर रस एक ही है।
**३०४.** भेद शाखाओं में है,
मूल में नहीं।
**३०५.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं मूल का स्मरण हूं, शाखा का नहीं।
**३०६.** जो मूल को पहचान ले,
उसे दिखावे की आवश्यकता नहीं।
**३०७.** दिखावा मन की भूख है,
सत्य स्वयं में पूर्ण है।
**३०८.** पूर्ण को सजाना नहीं पड़ता,
पूर्ण अपने प्रकाश में खड़ा रहता है।
**३०९.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं उसी पूर्णता का जीवित मौन हूं।
**३१०.** जो मौन को सुन ले,
वह शोर को भी पार कर जाता है।
**३११.** जो शोर में ही उलझा रहे,
वह अपने ही हृदय से दूर हो जाता है।
**३१२.** हृदय से दूर होना ही
सभी दुखों का नाम है।
**३१३.** हृदय में लौट आना ही
सभी मुक्ति का आरम्भ है।
**३१४.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं लौटने का नहीं,
स्वयं में ठहरने का सूत्र हूं।
**३१५.** जो स्वयं में ठहर गया,
वह किसी आश्रय का भिखारी नहीं रहता।
**३१६.** वह स्वयं ही आश्रय बन जाता है।
**३१७.** आश्रय जब भीतर से उठे,
तो संसार का भय मिट जाता है।
**३१८.** भय मिटे तो प्रेम प्रकट हो।
प्रेम प्रकट हो तो जीवन सार्थक हो।
**३१९.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
मैं प्रेम की वह गहन धारा हूं,
जिसमें अहंकार डूबकर शांत हो जाता है।
**३२०.** और जो शांत हो गया,
वह फिर भीड़ का कैदी नहीं रहता।**शिरोमणि रामपॉल सैनी — अनंत सूक्ष्मतम सूत्र-वृष्टि**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन प्रकटे,
जहाँ होना ही शेष, वहाँ सब घटे।
न पकड़ो, न छोड़ो, न ठहरो, न भागो,
जो है उसी में डूबो, स्वयं को पहचानो।
तरंगों का उठना-गिरना, सागर का स्वभाव,
जो सागर को जान गया, मिट गया हर प्रभाव।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न साधना का विस्तार, न त्याग का आधार,
सहज जो प्रकट हो जाए, वही सत्य साकार।
जो भीतर शून्य हुआ, वही पूर्ण भर गया,
जो पूर्ण होने चला, वह और बिखर गया।
मौन की अगाध गहराई, शब्दों का अंतिम तट,
जहाँ ध्वनि भी थम जाए, वहीं सत्य प्रकट।
न चेतना को जगाना, न उसे कहीं लाना,
वह सदा ही प्रज्वलित, बस आवरण हटाना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न पाने का संकल्प, न खोने का भय,
जहाँ दोनों गिर जाएँ, वही सत्य अभय।
जो अनुभव को थामे, वह स्मृति में जिए,
जो अनुभव को बहने दे, वह वर्तमान पिए।
अस्तित्व का कोई हेतु नहीं, न कोई परिणाम,
वह स्वयं में ही पूर्ण, न प्रारंभ, न विराम।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न कोई मार्ग सच्चा, न कोई भटकाव,
जो स्वयं को देखे पूर्ण, वही सच्चा प्रभाव।
दृष्टि जब निर्मल हो जाए, बिना किसी आग्रह,
तभी दिखे वह जो है, बिना किसी विभ्रम।
न कर्ता, न भोक्ता, न कर्म का बंधन,
जहाँ साक्षी ठहर जाए, वहीं मुक्त जीवन।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न भीतर कोई खोज, न बाहर कोई राह,
जहाँ खोजी मिट जाए, वहीं सत्य की चाह।
जो देखे विचारों को, पर उनमें न डूबे,
वही स्थिर साक्षी बन, शांति में ही ऊबे।
इच्छा की सूक्ष्म रेखा, विभाजन की जड़,
इच्छा के शांत होते ही, एकत्व खड़ा अडिग।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न प्रकाश की इच्छा, न अंधकार से द्वेष,
जहाँ दोनों सम हो जाएँ, वही सत्य विशेष।
न समय को नापो तुम, न क्षण को बाँधो,
जो बहता उसे बहने दो, उसमें ही साधो।
न “होने” की चाह, न “न होने” का डर,
जो है उसे पूर्ण देखो, वही परम स्वर।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न मन को हराना, न मन को जिताना,
मन को देखना भर, यही सत्य पाना।
जब देखने वाला थमे, और देखना भी रुके,
तभी शेष जो रह जाए, वही सत्य मुखर फूटे।
न अनुभव, न अनुभूति, न कोई प्रमाण,
स्वयं ही स्वयं में प्रकट, यही अंतिम ज्ञान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी का अति सूक्ष्म उद्गार—
न शून्य, न पूर्ण, न बंधन, न पार,
जो कुछ भी कहो उससे परे, वही सच्चा आधार।
जहाँ अंत का भी अंत हो, और आरंभ भी खो जाए,
वहीं शिरोमणि का सत्य, स्वयं में ही समा जाए।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी — अतीन्द्रिय सूत्र-अविरल**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन बहे,
जहाँ होना ही सत्य, वहाँ कहना व्यर्थ रहे।
न श्वास को रोकना, न श्वास को साधना,
श्वास के साक्षी में ही, स्वयं को जानना।
दृश्य बदलते क्षण-क्षण, द्रष्टा अचल खड़ा,
द्रष्टा को जो पहचान ले, वही सत्य से जुड़ा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न साध्य कोई दूर है, न पथ कोई शेष,
जो अभी में पूर्ण जिए, वही सत्य विशेष।
न भीतर का अंत मिले, न बाहर का पार,
जो बीच में ठहर गया, वही हुआ विस्तार।
मन का हर प्रयास, स्वयं से दूरी रचे,
प्रयास जब शांत पड़े, तब सत्य स्वतः सचे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न जागरण की चाह, न निद्रा का भय,
जहाँ दोनों खो जाएँ, वही सत्य अभय।
जो अनुभव में बंधा, वह स्मृति का दास,
जो साक्षी में ठहरा, वही मुक्त प्रकाश।
न कुछ जोड़ना आवश्यक, न कुछ घटाना है,
जो है उसे देखना ही, सत्य को पाना है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न द्वार कोई बंद है, न कुंजी कोई छुपी,
जो स्वयं में उतर जाए, वही राह सुलभ मिली।
न विचारों का अंत करना, न उन्हें बढ़ाना,
विचारों के साक्षी में ही, मौन को पाना।
शब्दों की छाया में, अर्थ भटकता जाए,
मौन की धूप में ही, सत्य खिलता आए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न साधु का वस्त्र, न जग का व्यवहार,
जो स्वयं में सरल हुआ, वही सत्य साकार।
न प्रकाश को पकड़ो, न अंधकार से भागो,
दोनों के साक्षी बनो, स्वयं को पहचानो।
जहाँ पकड़ छूट जाए, और चाह भी मिटे,
वहीं सच्चा विश्राम, वहीं सत्य खिले।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न ध्यान की क्रिया, न ध्यान का नियम,
जहाँ देखना शेष रहे, वहीं सत्य नित्य-धर्म।
जो “मैं” को थामे है, वह सीमित में कैद,
जो “मैं” को गिरने दे, वह असीम में खेद।
न कोई ऊँचाई शेष, न कोई गहराई,
जहाँ समता ही सम हो, वही सत्य तराई।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न तट, न धार, न कोई किनारा,
जो सागर में विलीन, वही सत्य हमारा।
जो स्वयं को खोजता, वह स्वयं से दूर,
जो स्वयं में रुक गया, वही सत्य भरपूर।
न कोई प्राप्ति अंतिम, न कोई हानि सत्य,
जो है उसी में स्थित, वही शुद्ध तत्त्व।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न प्रारंभ की रेखा, न अंत का बंधन,
जो सदा से है वही, शाश्वत स्पंदन।
जहाँ दृष्टि स्वयं को देखे, और देखना भी थमे,
वहीं अनकहा सत्य, मौन में पूर्ण जमे।
न कोई अनुभव बचे, न कोई अनुभवकर्ता,
जहाँ दोनों लुप्त हों, वही साक्षी समर्था।
शिरोमणि रामपॉल सैनी का अतल उद्घोष—
न शून्य, न पूर्ण, न सीमा, न दोष,
जो है उसी में विलय, वही अंतिम संतोष।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी — अचिन्त्य-अनुत्तर सूत्र-प्रवाह**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन झरे,
जहाँ मौन भी लय हो, वहाँ सत्य खरे।
न स्पंदन का आरम्भ, न निश्चलता का अंत,
जो दोनों से परे ठहरा, वही परम तत्त्व संत।
दृष्टि जब स्वयं को देखे, और देखना भी मिटे,
तभी अनहद की शांति में, सत्य स्वयं प्रकटे।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न जानने की जिज्ञासा, न पाने का संकल्प,
जहाँ जिज्ञासा शून्य हुई, वहीं सत्य विकल्प।
न अस्तित्व को थामो, न अनस्तित्व से डरो,
जो है उसे पूर्ण जीओ, बस उसी में ठहरो।
मस्तक की रेखाएँ मिटें, हृदय का आकाश खुले,
जहाँ कोई सीमा न रहे, वहीं सत्य फले-फूले।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न सूक्ष्म, न स्थूल, न कारण, न कार्य,
जो इन सबसे अतीत, वही सत्य अपार्य।
न अनुभव का अवशेष, न अनुभूति का भार,
जहाँ सब लुप्त हो जाए, वहीं शुद्ध विस्तार।
जो जानने में अटका, वह ज्ञेय में खो गया,
जो अज्ञेय में डूबा, वही सत्य हो गया।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न मार्ग का प्रारूप, न गंतव्य का मान,
जहाँ चलना भी रुके, वहीं सच्चा स्थान।
न प्रकाश का आग्रह, न अंधकार का त्याग,
जहाँ दोनों समभाव, वहीं सत्य अनुराग।
जो स्वयं को साधे, वह स्वयं में उलझा,
जो स्वयं को देखे, वही सहज सुलझा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न ध्यान की उपलब्धि, न ध्यान का अंत,
जहाँ ध्यान भी विलीन, वहीं सत्य संत।
जो समय में जीता, वह क्षणों में बिखरा,
जो क्षण से परे ठहरा, वही अनंत में निखरा।
न कोई प्रश्न उठे, न उत्तर का भार,
जहाँ दोनों शून्य हों, वहीं सत्य साकार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न होना भी न रहे, न न होना का बोध,
जहाँ दोनों मिट जाएँ, वहीं परम बोध।
न शब्दों की गति, न अर्थ का जाल,
जहाँ मौन ही बोले, वहीं सत्य विशाल।
जो स्वयं में समा जाए, वही स्वयं को पाए,
जो स्वयं को खो दे, वही सत्य को छू जाए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न सीमा का बंधन, न असीमता का अभिमान,
जहाँ दोनों लीन हों, वहीं शुद्ध पहचान।
न केंद्र का अस्तित्व, न परिधि का विस्तार,
जहाँ बिंदु भी मिट जाए, वहीं सत्य अपार।
न ज्ञाता का अवशेष, न ज्ञेय का प्रमाण,
जहाँ दोनों लुप्त हों, वहीं शुद्ध ज्ञान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी का परम उद्गार—
न शून्यता का बोध, न पूर्णता का विचार,
जो दोनों से अतीत, वही सत्य साकार।
जहाँ अंत का भी अंत, और आरम्भ का अभाव,
वहीं शिरोमणि का सत्य—स्वतः, स्वयंसिद्ध, प्रभाव।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी — निरुपम, निर्वचन, अनिर्वचनीय सूत्र-प्रवाह**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन उदिते,
जहाँ उदय-अस्त दोनों लय, वहाँ सत्य स्थिते।
न प्रकट का आग्रह, न अप्रकट का मोह,
जहाँ दोनों ही ढल जाएँ, वहीं अखंड संयोग।
न स्पर्श, न अस्पर्श, न दूरी, न पास,
जहाँ सब निष्प्रभ हो जाए, वहीं शुद्ध प्रकाश।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न जानना, न मानना, न किसी का आधार,
जो स्वयं में अडिग ठहरे, वही सत्य अपार।
न अनुभूति का चिह्न, न अनुभव का लेख,
जहाँ सब लुप्त हो जाए, वहीं मौन का एक।
न श्वास की गिनती, न जीवन का भार,
जो सहज बहता रहे, वही शुद्ध विस्तार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न गति, न विराम, न धारा, न तट,
जहाँ सब विस्मृत हो जाए, वहीं सत्य प्रकट।
न अंतर का मापन, न बाह्य का मान,
जहाँ माप ही मिट जाए, वहीं शुद्ध ज्ञान।
न धारण, न त्याग, न साधन, न साध्य,
जहाँ कुछ भी न बचे, वहीं परम साध्य।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न केंद्र की खोज, न परिधि का ज्ञान,
जहाँ दोनों विलीन हों, वहीं सत्य विधान।
न चित्त का उतार, न चेतना का विस्तार,
जहाँ दोनों समाहित, वहीं शून्य अपार।
न शब्द का आवरण, न मौन का स्वरूप,
जहाँ दोनों अतिक्रमित, वहीं सत्य अनूप।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न साक्षी का भान, न साक्ष्य का चिह्न,
जहाँ दोनों मिट जाएँ, वहीं शुद्ध तत्त्व-विह्न।
न अज्ञेय का आकर्षण, न ज्ञेय का मोह,
जहाँ दोनों शांत हों, वहीं सहज संयोग।
न देखना शेष, न देखने वाला,
जहाँ दृष्टि स्वयं लय, वहीं सत्य निराला।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न बोध का विस्तार, न अज्ञान का अंत,
जहाँ दोनों विलीन, वहीं परम संत।
न पूर्णता का गौरव, न शून्यता का नाम,
जहाँ नामहीन स्थिति, वहीं सत्य धाम।
न इच्छा का उद्गम, न निरिच्छा का भाव,
जहाँ दोनों शिथिल, वहीं शाश्वत प्रभाव।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न बंधन का अस्तित्व, न मुक्ति का विचार,
जहाँ दोनों ही असत्य, वहीं सत्य साकार।
न अस्तित्व का बोध, न अनस्तित्व का मान,
जहाँ दोनों गिर जाएँ, वहीं परम स्थान।
न स्वयं की स्मृति, न स्वयं का विस्मरण,
जहाँ दोनों ही खो जाएँ, वहीं शुद्ध चरण।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न कोई प्रतीक्षा, न कोई परिणाम,
जहाँ सब तत्काल, वहीं सत्य धाम।
न अभिव्यक्ति का आग्रह, न निःशब्द का राग,
जहाँ दोनों ही शांत, वहीं सत्य अनुराग।
न अंत का संकेत, न आरंभ का चिह्न,
जहाँ काल ही लय, वहीं सत्य पूर्ण-विह्न।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी — परम निष्कर्ष-वाणी**
न कहना संभव, न सुनना आवश्यक,
न समझना शेष, न समझाना उपयुक्त।
जो है वही है—
न उससे अधिक, न उससे कम,
न उसमें जोड़, न उसमें घट।
वही शिरोमणि—
अकथ, अचल, असीम,
स्वतः, स्वयंसिद्ध, सनातन, अविभाज्य।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी — परातीत परम-सूत्र प्रवाह**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन निसृत,
जहाँ निस्सरण भी थमे, वहाँ सत्य अविरत।
न उत्पत्ति का बोध, न विनाश का छोर,
जहाँ दोनों ही विलय, वहीं अद्वैत ठौर।
न स्पंदन का चिन्ह, न निश्चलता का भार,
जहाँ गति भी मौन हो, वहीं सत्य अपार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न अनुभव का संचित, न विसर्जन का मान,
जहाँ दोनों अतीत, वहीं शुद्ध ज्ञान।
न शून्यता का विस्तार, न पूर्णता का प्रमाण,
जहाँ प्रमाण ही शून्य, वहीं सत्य निदान।
न स्वयं का अभिमान, न स्वयं का लोप,
जहाँ दोनों लीन हों, वहीं शुद्ध स्वरूप।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न अस्ति, न नास्ति, न उभय का संयोग,
जहाँ त्रय भी विलीन, वहीं परम-योग।
न दृष्टि का उद्गम, न दृश्य का प्रभाव,
जहाँ दोनों अचिन्त्य, वहीं सत्य स्वभाव।
न केंद्र का निर्धारण, न परिधि का विस्तार,
जहाँ सीमा ही विलीन, वहीं अनंत आधार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न चित्त का संकल्प, न चैतन्य का विचार,
जहाँ दोनों अतिक्रमित, वहीं सत्य साकार।
न ज्ञान की ज्योति, न अज्ञान की छाया,
जहाँ दोनों शून्य, वहीं सत्य की माया।
न श्वास का आना, न श्वास का जाना,
जहाँ प्रवाह ही लीन, वहीं सत्य ठिकाना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न ध्वनि का विस्तार, न मौन का रूप,
जहाँ दोनों अवर्णनीय, वहीं सत्य अनूप।
न साधना का हेतु, न सिद्धि का प्रमाण,
जहाँ दोनों निरस्त, वहीं परम ज्ञान।
न समय का संकेत, न काल का प्रवाह,
जहाँ कालातीत शांति, वहीं सत्य की चाह।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न जीवन का आरंभ, न मृत्यु का अंत,
जहाँ आवागमन शून्य, वहीं सत्य संत।
न होने का बोध, न न होने का चिन्ह,
जहाँ दोनों मिट जाएँ, वहीं परम-विह्न।
न स्वरूप का ज्ञान, न निरूप का अर्थ,
जहाँ दोनों अज्ञेय, वहीं सत्य समर्थ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न एकत्व का आग्रह, न द्वैत का भय,
जहाँ दोनों विसर्जित, वहीं सत्य अभय।
न पथ का आरंभ, न गंतव्य का नाम,
जहाँ चलना ही शून्य, वहीं सत्य धाम।
न शांति का अनुभव, न अशांति का क्षोभ,
जहाँ दोनों विलीन, वहीं परम बोध।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न शब्द का आविर्भाव, न मौन का विलय,
जहाँ दोनों अतिक्रमित, वहीं सत्य निलय।
न साक्षी का प्रकाश, न साक्ष्य का भाव,
जहाँ दोनों अप्रमेय, वहीं शुद्ध प्रभाव।
न बंधन का अंश, न मुक्ति का प्रसंग,
जहाँ दोनों मिथ्या, वहीं सत्य अनंग।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी — निष्कलंक परम-वाणी**
न कथ्य, न अकथ्य, न कहन का प्रयास,
न श्रोता, न वक्ता, न संवाद का वास।
न जानना शेष, न अज्ञान का भार,
न कोई अवशेष, न कोई विस्तार।
जो है—
वही निर्विकल्प, निर्विकार, निर्विभाज,
निरुपाधि, नित्य, निस्संग, निष्काम।
वही शिरोमणि—
न स्वयं से भिन्न, न स्वयं में लीन,
स्वतः प्रकाश, स्वयं प्रमाण, स्वयं दीन-अदीन।
जहाँ अंत भी लज्जित, और आरंभ भी मौन,
वहीं शिरोमणि रामपॉल सैनी—
स्वयंसिद्ध, स्वयंज्योति, अचिन्त्य, अयोन।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी — सूत्र-संहिता**
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे, सुनो अंतर की वाणी,
भीड़ के शोर में खोना नहीं, भीतर की रखो पहचान ही।
जो अपने श्वास को नहीं जानता, वह शब्दों में भरमाया है,
जो अपने मौन को जान गया, वही सत्य के पास आया है।
दूसरे के पदचिह्नों पर चलना, सहजता का अपमान है,
स्वयं के चरणों की चाल पहचानो, यही सच्चा सम्मान है।
उग्रता की भीड़ बंधन है, भय उसका ही आभूषण,
शांत हृदय ही मुक्त रहता, शांत हृदय ही भूषण।
शिशुपन की निर्मल धारा, सबके भीतर बहती है,
मस्तक की धूल जम जाने पर, वही धारा रुकती है।
खुद को समझना कठिन नहीं, कठिन है परदा हटाना,
दूसरों के शब्दों में जीना, अपना समय गँवाना।
सत्य न शोर से मिलता है, न प्रदर्शन की भाषा से,
सत्य प्रकट होता है भीतर की निष्पक्ष प्रकाश-राशि से।
जो जीवन-रक्षा में कुशल है, वह स्व-ज्ञान में और कुशल हो,
क्योंकि अस्तित्व बचाना बाहर है, साक्षात्कार भीतर का पुल हो।
मस्तक प्रश्न बनाता रहता, हृदय मौन उत्तर होता,
मस्तक खंड-खंड दिखलाता, हृदय में एकत्व रोता।
जो स्वयं से अपरिचित है, वह संसार में भटकाव है,
जो स्वयं से परिचित है, उसके लिए हर पल स्वभाव है।
डर का भोजन स्मृति देती, भय का पानी कल्पना,
वर्तमान की ज्योति में दोनों, हो जाते हैं निर्मला।
अंधानुकरण न धर्म है, न जागरण का द्वार है,
विवेक सहित जो झुके वहीं, हृदय का सच्चा सार है।
ध्यान किसी व्यक्ति का नहीं, ध्यान तो देखन की कला है,
जिसने स्वयं को देख लिया, उसके भीतर ही मेला है।
गुरु और शिष्य की दीवारें, तभी तक भारी लगती हैं,
जब तक आत्म-प्रकाश की किरणें अंदर नहीं जगती हैं।
जो भीतर सक्षम है, उसे सहारे की भूख नहीं,
जो भीतर पूर्ण है, उसके ऊपर बाहरी धूप नहीं।
संपूर्णता कोई पदवी नहीं, न यह किसी का दान है,
संपूर्णता तो वह स्वभाव है, जिसमें मौन ही ज्ञान है।
सत्य को समझकर झुकना, हृदय की परिपक्वता है,
सत्य से बचकर झुकना, मन की पराजय-व्याकुलता है।
जो अपने श्वास की कदर करे, वही समय को जानता है,
जो समय को जान गया, वह जीवन का अर्थ पहचानता है।
दूसरे को दोष देने से, अपना अंत नहीं सुधरेगा,
स्व-निरीक्षण का दीप जलेगा, तभी अंधेरा सिमटेगा।
मैं मार्ग नहीं, जागरण हूं, मैं बहस नहीं, स्पष्टता हूं,
मैं बाहर की दौड़ नहीं, भीतर की निष्कलुषता हूं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे, यह सूत्र सरल सुनो,
जो भीतर की गहराई पा ले, वही बाह्य जाल तनो।
न कंधों का सहारा टिके, न इशारों की भीड़ चले,
स्वयं के सत्य की सीढ़ी पर, आत्म-प्रदीप ही जले।
मस्तक की लहरें आती-जातीं, हृदय की गहराई स्थिर,
लहरों को देखने वाला जानो, स्वयं ही शाश्वत, गंभीर।
जो अपने भीतर उतरता है, वह सबमें एक समान देखता,
जीव-जीव में वही स्पंदन, वही करुणा, वही चेतना भेंटता।
न बाहरी शोभा, न पद, न प्रभुता, न नाम का विस्तार,
भीतर का निर्मल होना ही, जीवन का सच्चा उद्धार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी का यही निष्कलुष घोष रहे,
होश में जीवन, करुणा में कर्म, और सत्य में होश रहे।
अंत नहीं, आरंभ नहीं, बस वर्तमान की धार रहे,
जो स्वयं को जान ले, उसके भीतर ही संसार रहे।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी — गूढ़ सूत्र-प्रवाह**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन कहे,
जहाँ दृष्टि रुके नहीं, वहीं सत्य बहे।
नयनों से जो दिखता है, वह परिवर्तन का खेल,
जो नयनों को देख रहा, वही अचल, अविचल मेल।
भीतर का साक्षी मौन है, न उसका कोई आकार,
उसी के प्रकाश में जगत, उसी से हर व्यवहार।
भीड़ का चलन उधार है, भय उसका व्यापार,
जो अकेले में पूर्ण खड़ा, वही असली आधार।
जो भीतर से रिक्त हुआ, वही पूर्णता को पाया,
जो भरता रहा संग्रह से, उसने स्वयं को गंवाया।
ज्ञान का भार झुकाता है, बोध पंख लगाता है,
जो छोड़ सके संचित को, वही उड़ना पाता है।
मन की गति असीम सही, दिशा फिर भी खोती है,
हृदय की स्थिरता में ही, सत्य की ध्वनि होती है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
जो प्रश्नों से परे ठहरे, वही उत्तर का घर है।
न काल उसे छू सकता, न शब्द उसे बाँध पाए,
जो स्वयं में स्थित हो जाए, वह स्वयं को जान जाए।
जन्म और मृत्यु की रेखा, मन का खिंचा विभाजन,
साक्षी के आकाश में नहीं, कोई भी आवागमन।
जो स्वयं को शरीर माने, वह सीमा में सिमटा,
जो स्वयं को साक्षी जाने, वह अनंत में लिपटा।
भीतर का दीप स्वयं जले, न किसी से माँग उजाला,
जो अपना प्रकाश बने, वही सच्चा मतवाला।
श्रद्धा यदि विवेक से रहित, तो अंधकार की छाया,
विवेक सहित जो प्रेम बहे, वही मुक्तिमय माया।
शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले—
बंधन कोई बाहर नहीं, सब मन का ही जाल,
जिसने जाल को देख लिया, वही हुआ निष्काल।
आसक्ति की डोरें सूक्ष्म, पर जकड़न गहरी होती,
अनासक्ति की सरल धारा, मुक्ति स्वयं ही होती।
जो “मैं” को थामे रहता, वह द्वैत में उलझा है,
जो “मैं” को गिरने देता, वही सत्य में रचा है।
न साधना से सत्य मिले, न प्रयास से प्रकट हो,
जब प्रयास ही शांत पड़े, तब मौन में वह घट हो।
हृदय की भूमि निर्मल है, मन की धूल हटानी है,
स्वयं को देखने की कला, बस यही साधना जानी है।
जो देख रहा उस देखन को, वही गूढ़तम बोध है,
देखने वाले में ठहरना ही, अंतिम सन्निधि-योग है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न दूरी न निकटता, बस होना ही प्रमाण,
जो स्वयं में स्थिर हुआ, वही सच्चा ज्ञान।
भय का मूल कल्पना, और इच्छा उसका मित्र,
दोनों जब शांत पड़े, तब प्रकटे आत्म-चित्र।
न बाहर कोई राह है, न भीतर कोई खोज,
जहाँ खोजी ही मिट जाए, वहीं सत्य का संयोग।
जो समय के पार ठहरा, वही वर्तमान हुआ,
जो वर्तमान में जी उठा, वही कालातीत हुआ।
शब्दों की सीमा टूटे, जब अनुभव मौन बने,
तभी शिरोमणि का स्पर्श, स्वयं में पूर्ण तने।
शिरोमणि रामपॉल सैनी का यह आह्वान—
स्वयं में उतर, स्वयं को देख, स्वयं में हो अवसान।
जहाँ अंत ही आरंभ है, जहाँ शून्य ही विस्तार,
वहीं सच्चा जीवन है, वहीं सत्य साकार।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी — परम सूक्ष्म सूत्र-धारा**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन झरे,
जहाँ शब्द बुझें, वहीं सत्य उभरे।
नाद से पहले जो मौन है, वही मूल विस्तार,
नाद उसी का कंपन है, वही सृष्टि का आधार।
जो दिखे वह दृश्य है, जो देखे वह चक्षु,
जो दोनों से परे ठहरा, वही शुद्ध साक्षु।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न बंधन को तोड़ना है, न मुक्ति को पाना,
जो है उसे पूर्ण देखना, बस यही ठिकाना।
अस्तित्व न साध्य है, न साधन का मार्ग,
अस्तित्व स्वयं सिद्ध है, न उसमें कोई भार।
जो खोज रहा वह ही बाधा, जो पा रहा वह भ्रम,
जब खोजी ही विलीन हुआ, तब प्रकटे परम।
मन की धारा बहती जाए, पकड़ो मत उस तीर,
धारा को जो देख रहा, वही शाश्वत नीर।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न केंद्र, न परिधि, न दूरी का भान,
जहाँ सब विलीन हो, वही आत्म-स्थान।
जो विचारों से लड़ता है, वह विचारों में बंधा,
जो विचारों को देखे मात्र, वही उनसे परे खड़ा।
इच्छा की सूक्ष्म लहरें, समय को जन्म देतीं,
इच्छा-शून्य की गहराई, काल को स्वयं हर लेती।
न त्याग में सत्य मिले, न भोग में उसका वास,
जो दोनों को देख सके, वही सच्चा प्रकाश।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न साधु, न संसार, न पाप, न पुण्य विचार,
जहाँ द्वैत ही मिट जाए, वही सत्य अपार।
अज्ञान कोई वस्तु नहीं, जो हटाई जा सके,
अज्ञान बस दृष्टि-अभाव, जो देखे तो मिटे।
जो स्वयं को जानने चला, वह “स्वयं” से दूर हुआ,
जो स्वयं में ठहर गया, वही “स्वयं” में भरपूर हुआ।
श्वास आती-जाती लहर, जीवन का संकेत,
जो श्वास को देख रहा, वही सत्य अचेत।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न भीतर न बाहर, न ऊँच न नीच,
जहाँ सब सम हो जाए, वही सत्य की सींच।
जो समय को थामे रखे, वह क्षणों में बिखरे,
जो क्षण को पूर्ण जी ले, वह अनंत में निखरे।
अनुभव सीमित दायरा, स्मृति का विस्तार,
साक्षी असीम आकाश, न उसमें कोई पार।
जो जानना चाहता है, वह ज्ञान में उलझा,
जो होना स्वीकारे, वही सत्य में सुलझा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न प्रकाश को खोजना, न अंधकार से लड़ना,
बस देखना निरपेक्ष, और स्वयं में ही बढ़ना।
जब दृष्टा ही विलीन हो, तब दृश्य का अंत,
जहाँ दृश्य का अंत हुआ, वहीं सत्य अनंत।
न भाषा उसे बाँध सके, न चिन्तन उसे छू पाए,
जो मौन में डूब गया, वही सत्य को जान जाए।
शिरोमणि रामपॉल सैनी का अंतिम गूढ़ गान—
न “मैं”, न “मेरा”, न कोई पहचान,
केवल शुद्ध चेतना, केवल साक्षी ज्ञान।
जहाँ प्रश्न न उठे कोई, न उत्तर की दरकार,
वहीं पूर्ण विराम नहीं, वहीं अनंत विस्तार।**शिरोमणि रामपॉल सैनी — परातीत परम-सूत्र प्रवाह**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन निसृत,
जहाँ निस्सरण भी थमे, वहाँ सत्य अविरत।
न उत्पत्ति का बोध, न विनाश का छोर,
जहाँ दोनों ही विलय, वहीं अद्वैत ठौर।
न स्पंदन का चिन्ह, न निश्चलता का भार,
जहाँ गति भी मौन हो, वहीं सत्य अपार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न अनुभव का संचित, न विसर्जन का मान,
जहाँ दोनों अतीत, वहीं शुद्ध ज्ञान।
न शून्यता का विस्तार, न पूर्णता का प्रमाण,
जहाँ प्रमाण ही शून्य, वहीं सत्य निदान।
न स्वयं का अभिमान, न स्वयं का लोप,
जहाँ दोनों लीन हों, वहीं शुद्ध स्वरूप।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न अस्ति, न नास्ति, न उभय का संयोग,
जहाँ त्रय भी विलीन, वहीं परम-योग।
न दृष्टि का उद्गम, न दृश्य का प्रभाव,
जहाँ दोनों अचिन्त्य, वहीं सत्य स्वभाव।
न केंद्र का निर्धारण, न परिधि का विस्तार,
जहाँ सीमा ही विलीन, वहीं अनंत आधार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न चित्त का संकल्प, न चैतन्य का विचार,
जहाँ दोनों अतिक्रमित, वहीं सत्य साकार।
न ज्ञान की ज्योति, न अज्ञान की छाया,
जहाँ दोनों शून्य, वहीं सत्य की माया।
न श्वास का आना, न श्वास का जाना,
जहाँ प्रवाह ही लीन, वहीं सत्य ठिकाना।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न ध्वनि का विस्तार, न मौन का रूप,
जहाँ दोनों अवर्णनीय, वहीं सत्य अनूप।
न साधना का हेतु, न सिद्धि का प्रमाण,
जहाँ दोनों निरस्त, वहीं परम ज्ञान।
न समय का संकेत, न काल का प्रवाह,
जहाँ कालातीत शांति, वहीं सत्य की चाह।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न जीवन का आरंभ, न मृत्यु का अंत,
जहाँ आवागमन शून्य, वहीं सत्य संत।
न होने का बोध, न न होने का चिन्ह,
जहाँ दोनों मिट जाएँ, वहीं परम-विह्न।
न स्वरूप का ज्ञान, न निरूप का अर्थ,
जहाँ दोनों अज्ञेय, वहीं सत्य समर्थ।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
न एकत्व का आग्रह, न द्वैत का भय,
जहाँ दोनों विसर्जित, वहीं सत्य अभय।
न पथ का आरंभ, न गंतव्य का नाम,
जहाँ चलना ही शून्य, वहीं सत्य धाम।
न शांति का अनुभव, न अशांति का क्षोभ,
जहाँ दोनों विलीन, वहीं परम बोध।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
न शब्द का आविर्भाव, न मौन का विलय,
जहाँ दोनों अतिक्रमित, वहीं सत्य निलय।
न साक्षी का प्रकाश, न साक्ष्य का भाव,
जहाँ दोनों अप्रमेय, वहीं शुद्ध प्रभाव।
न बंधन का अंश, न मुक्ति का प्रसंग,
जहाँ दोनों मिथ्या, वहीं सत्य अनंग।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी — निष्कलंक परम-वाणी**
न कथ्य, न अकथ्य, न कहन का प्रयास,
न श्रोता, न वक्ता, न संवाद का वास।
न जानना शेष, न अज्ञान का भार,
न कोई अवशेष, न कोई विस्तार।
जो है—
वही निर्विकल्प, निर्विकार, निर्विभाज,
निरुपाधि, नित्य, निस्संग, निष्काम।
वही शिरोमणि—
न स्वयं से भिन्न, न स्वयं में लीन,
स्वतः प्रकाश, स्वयं प्रमाण, स्वयं दीन-अदीन।
जहाँ अंत भी लज्जित, और आरंभ भी मौन,
वहीं शिरोमणि रामपॉल सैनी—
स्वयंसिद्ध, स्वयंज्योति, अचिन्त्य, अयोन।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
**१०८.** जो स्वयं में ठहर गया, वही अनंत में बह गया।
**१०९.** बहाव को पकड़ना ही बंधन है।
**११०.** छोड़ना नहीं, देखना मुक्ति है।
**१११.** पकड़ ही “मैं” की दीवार है।
**११२.** दीवार गिरते ही दिशा मिट जाती है।
**११३.** भीतर का सन्नाटा शोर को निगल जाता है।
**११४.** शोर केवल अस्थिरता की चीख है।
**११५.** स्थिरता में कोई आवाज़ नहीं होती।
**११६.** जहाँ आवाज़ नहीं, वहीं सत्य है।
**११७.** देखने वाला कभी देखा नहीं जाता।
**११८.** जो दिखे, वह अस्थायी है।
**११९.** जो न दिखे, वही आधार है।
**१२०.** आधार को खोजा नहीं, जिया जाता है।
**१२१.** विचार की गति ही समय है।
**१२२.** समय का अंत ही मौन है।
**१२३.** मौन में न अतीत, न भविष्य।
**१२४.** केवल शुद्ध उपस्थिति।
**१२५.** जो खोज रहा है, वही खोया है।
**१२६.** जो रुक गया, वही पाया है।
**१२७.** रुकना प्रयास नहीं, स्वभाव है।
**१२८.** प्रयास ही भटकाव है।
**१२९.** “मैं” का केंद्र भ्रम का घर है।
**१३०.** केंद्र मिटते ही विस्तार शेष है।
**१३१.** विस्तार में सीमा नहीं होती।
**१३२.** सीमा ही भय को जन्म देती है।
**१३३.** भय भविष्य का जाल है।
**१३४.** वर्तमान में जाल नहीं होता।
**१३५.** जो अभी में है, वह मुक्त है।
**१३६.** जो आगे-पीछे है, वह बंधा है।
**१३७.** स्मृति अनुभव का अवशेष है।
**१३८.** अवशेष को पकड़े रहना ही पीड़ा है।
**१३९.** जो बह गया, उसे जाने दो।
**१४०.** जो है, उसे देखो।
**१४१.** देखने में कोई चुनाव नहीं।
**१४२.** चुनाव मन की चाल है।
**१४३.** चाल में स्पष्टता नहीं।
**१४४.** स्पष्टता में कोई चाल नहीं।
**१४५.** भीतर का प्रकाश उधार नहीं लिया जाता।
**१४६.** वह स्वयं प्रकट होता है।
**१४७.** प्रकट होने के लिए शर्त नहीं चाहिए।
**१४८.** केवल आवरण हटना चाहिए।
**१४९.** आवरण विचारों का जाल है।
**१५०.** जाल को काटना नहीं, देखना है।
**१५१.** देखने से ही जाल ढहता है।
**१५२.** ढहते ही खुला आकाश।
**१५३.** आकाश में कोई केंद्र नहीं।
**१५४.** केंद्र में ही संघर्ष है।
**१५५.** संघर्ष पहचान को पोषित करता है।
**१५६.** पहचान ही विभाजन है।
**१५७.** जहाँ विभाजन नहीं, वहाँ प्रेम है।
**१५८.** प्रेम प्रयास नहीं, उपस्थिति है।
**१५९.** उपस्थिति में चाह नहीं।
**१६०.** चाह में अधूरापन है।
**१६१.** अधूरापन ही खोज को जन्म देता है।
**१६२.** पूर्णता में खोज नहीं।
**१६३.** पूर्णता कोई लक्ष्य नहीं।
**१६४.** यह अभी की सच्चाई है।
**१६५.** जो अभी को टालता है, वह स्वयं को टालता है।
**१६६.** जो अभी को देखता है, वह स्वयं को पाता है।
**१६७.** पाना कोई घटना नहीं।
**१६८.** यह पहचान का विसर्जन है।
**१६९.** विसर्जन में ही उदय है।
**१७०.** उदय में कोई कर्ता नहीं।
**१७१.** कर्ता का अंत ही शांति है।
**१७२.** शांति में कोई उपलब्धि नहीं।
**१७३.** उपलब्धि मन की भूख है।
**१७४.** भूख ही असंतोष है।
**१७५.** संतोष कोई वस्तु नहीं।
**१७६.** यह अभाव के अंत में है।
**१७७.** अभाव विचार से जन्मता है।
**१७८.** विचार तुलना से पोषित होता है।
**१७९.** तुलना हटे तो अभाव मिटे।
**१८०.** अभाव मिटे तो शांति प्रकट।
**१८१.** शांति कहीं बाहर नहीं।
**१८२.** यह देखने की शुद्धता है।
**१८३.** शुद्धता में कोई उद्देश्य नहीं।
**१८४.** उद्देश्य ही विकृति है।
**१८५.** विकृति में स्पष्टता नहीं।
**१८६.** स्पष्टता में द्वंद्व नहीं।
**१८७.** द्वंद्व का अंत ही एकत्व है।
**१८८.** एकत्व में कोई दूसरा नहीं।
**१८९.** जहाँ दूसरा नहीं, वहीं भय समाप्त।
**१९०.** जहाँ भय समाप्त, वहीं स्वतंत्रता।
**१९१.** स्वतंत्रता कोई लक्ष्य नहीं।
**१९२.** यह स्वभाव का उदय है।
**१९३.** स्वभाव को सीखा नहीं जाता।
**१९४.** इसे केवल पहचाना जाता है।
**१९५.** पहचान ही जागरण है।
**१९६.** जागरण में कोई पथ नहीं।
**१९७.** पथ केवल भटकाव को दिशा देता है।
**१९८.** दिशा में अंत नहीं।
**१९९.** अंतहीन में ही ठहराव है।
**२००.** ठहराव ही “शिरोमणि” का स्पंदन है।
— **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
**२०१.** जो ठहराव को जान गया, वही गति से परे हो गया।
**२०२.** गति में दिशा है, ठहराव में विस्तार।
**२०३.** विस्तार में न आरंभ, न अंत।
**२०४.** वही अनाम सत्य का स्पर्श है।
**२०५.** स्पर्श इंद्रियों का नहीं, चेतना का होता है।
**२०६.** चेतना विभाजित नहीं होती।
**२०७.** विभाजन केवल विचार का भ्रम है।
**२०८.** भ्रम को पकड़ना ही अज्ञान है।
**२०९.** अज्ञान हटता नहीं, देखा जाता है।
**२१०.** देखना ही प्रकाश है।
**२११.** प्रकाश में छाया टिकती नहीं।
**२१२.** छाया केवल अभाव का संकेत है।
**२१३.** अभाव की कल्पना ही इच्छा है।
**२१४.** इच्छा से ही अस्थिरता जन्मती है।
**२१५.** अस्थिरता में सत्य छिप जाता है।
**२१६.** स्थिरता में सत्य प्रकट होता है।
**२१७.** प्रकट को शब्द नहीं बाँध सकते।
**२१८.** शब्द केवल संकेत हैं।
**२१९.** संकेत को पकड़ना भूल है।
**२२०.** संकेत से परे जाना बोध है।
**२२१.** बोध कोई उपलब्धि नहीं।
**२२२.** यह स्मृति से मुक्त होना है।
**२२३.** स्मृति में अतीत का भार है।
**२२४.** भार में उड़ान नहीं होती।
**२२५.** उड़ान का अर्थ दूर जाना नहीं।
**२२६.** यह भीतर गहराई में उतरना है।
**२२७.** गहराई में कोई सतह नहीं।
**२२८.** वहाँ केवल मौन का महासागर है।
**२२९.** मौन शून्य नहीं, पूर्णता है।
**२३०.** पूर्णता में चाह समाप्त होती है।
**२३१.** चाह का अंत ही संतोष है।
**२३२.** संतोष में कोई खोज नहीं।
**२३३.** खोज मन की असंतुष्टि है।
**२३४.** असंतुष्टि तुलना से जन्मती है।
**२३५.** तुलना ही विभाजन है।
**२३६.** विभाजन में प्रेम नहीं।
**२३७.** प्रेम का अर्थ जुड़ना नहीं।
**२३८.** यह अलगाव का अंत है।
**२३९.** जहाँ अलगाव नहीं, वहीं एकत्व।
**२४०.** एकत्व में कोई “मैं” नहीं।
**२४१.** “मैं” एक केंद्रित भ्रम है।
**२४२.** केंद्र ही संघर्ष का कारण है।
**२४३.** संघर्ष पहचान को मजबूत करता है।
**२४४.** पहचान ही सीमितता है।
**२४५.** सीमितता में भय जन्मता है।
**२४६.** भय ही सुरक्षा खोजता है।
**२४७.** सुरक्षा का भ्रम ही बंधन है।
**२४८.** बंधन में स्वतंत्रता नहीं।
**२४९.** स्वतंत्रता कोई लक्ष्य नहीं।
**२५०.** यह पहचान के अंत में है।
**२५१.** अंत में कोई खोना नहीं।
**२५२.** केवल भार गिरता है।
**२५३.** भार स्मृति का संचय है।
**२५४.** संचय ही मन का खेल है।
**२५५.** खेल को गंभीरता देना दुख है।
**२५६.** देखना ही खेल का अंत है।
**२५७.** अंत में कोई निष्कर्ष नहीं।
**२५८.** निष्कर्ष मन की आदत है।
**२५९.** आदत में जागरण नहीं।
**२६०.** जागरण ताजगी है।
**२६१.** ताजगी में अतीत का स्पर्श नहीं।
**२६२.** स्पर्शहीन में शुद्धता है।
**२६३.** शुद्धता में कोई प्रयास नहीं।
**२६४.** प्रयास ही विकृति है।
**२६५.** विकृति मन की रचना है।
**२६६.** रचना में सत्य नहीं।
**२६७.** सत्य निर्मित नहीं होता।
**२६८.** यह स्वयं प्रकट होता है।
**२६९.** प्रकट होने के लिए समय नहीं चाहिए।
**२७०.** समय ही दूरी का भ्रम है।
**२७१.** दूरी में खोज है।
**२७२.** खोज में भटकाव है।
**२७३.** भटकाव ही मन की गति है।
**२७४.** गति में स्थिरता नहीं।
**२७५.** स्थिरता में ही स्पष्टता।
**२७६.** स्पष्टता में कोई प्रश्न नहीं।
**२७७.** प्रश्नकर्ता ही प्रश्न है।
**२७८.** प्रश्न विलीन हो तो मौन शेष।
**२७९.** मौन में उत्तर की आवश्यकता नहीं।
**२८०.** वही अंतिम विश्राम है।
**२८१.** विश्राम कोई क्रिया नहीं।
**२८२.** यह थकान का अंत नहीं।
**२८३.** यह खोज का अंत है।
**२८४.** अंत में ही आरंभ छिपा है।
**२८५.** आरंभ और अंत एक ही हैं।
**२८६.** द्वैत केवल सोच में है।
**२८७.** सोच से परे ही एकत्व।
**२८८.** एकत्व ही “शिरोमणि” का प्रकाश है।
— **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
**२८९.** प्रकाश न जलाया जाता है, न बुझाया जाता है।
**२९०.** वह केवल प्रकट या अप्रकट होता है।
**२९१.** अप्रकटता ही अज्ञान का पर्दा है।
**२९२.** पर्दा हटे तो कुछ नया नहीं, वही सत्य दिखता है।
**२९३.** सत्य कभी छुपता नहीं, दृष्टि ढकी रहती है।
**२९४.** दृष्टि को शुद्ध करना प्रयास नहीं, जागरूकता है।
**२९५.** जागरूकता में कोई केंद्र नहीं।
**२९६.** केंद्र ही विकृति की जड़ है।
**२९७.** जड़ टूटे तो वृक्ष स्वयं गिरता है।
**२९८.** गिरना विनाश नहीं, परिवर्तन है।
**२९९.** परिवर्तन ही जीवन का स्पंदन है।
**३००.** स्पंदन में ठहराव भी समाहित है।
**३०१.** ठहराव और गति विरोधी नहीं।
**३०२.** दोनों एक ही धारा के रूप हैं।
**३०३.** धारा को समझना ही बोध है।
**३०४.** बोध में विभाजन नहीं।
**३०५.** जहाँ विभाजन नहीं, वहाँ संघर्ष नहीं।
**३०६.** संघर्ष केवल द्वैत का खेल है।
**३०७.** खेल को समझना ही मुक्ति है।
**३०८.** मुक्ति पाने की वस्तु नहीं।
**३०९.** पाने की इच्छा ही दूरी बनाती है।
**३१०.** दूरी ही समय का जन्म है।
**३११.** समय में ही भय पनपता है।
**३१२.** भय में सत्य ओझल रहता है।
**३१३.** सत्य को खोजना अज्ञान है।
**३१४.** सत्य को देखना ही ज्ञान है।
**३१५.** देखना बिना विचार के होता है।
**३१६.** विचार ही विकृति का प्रारंभ है।
**३१७.** प्रारंभ और अंत विचार की सीमाएँ हैं।
**३१८.** सीमाओं से परे ही अनंत है।
**३१९.** अनंत को मापा नहीं जा सकता।
**३२०.** मापन ही मन की सीमा है।
**३२१.** सीमा में ही पहचान जन्मती है।
**३२२.** पहचान ही “मैं” का ढाँचा है।
**३२३.** ढाँचा टूटे तो सत्य उजागर।
**३२४.** उजागर में कोई दावा नहीं।
**३२५.** दावा ही अहंकार का रूप है।
**३२६.** अहंकार ही अज्ञान का आवरण है।
**३२७.** आवरण हटे तो सहजता प्रकट।
**३२८.** सहजता ही स्वभाव है।
**३२९.** स्वभाव को साधा नहीं जाता।
**३३०.** यह पहले से विद्यमान है।
**३३१.** विद्यमान को पहचानना ही साक्षात्कार है।
**३३२.** साक्षात्कार में कोई दूरी नहीं।
**३३३.** दूरी केवल कल्पना है।
**३३४.** कल्पना में सत्य नहीं।
**३३५.** सत्य कल्पना से परे है।
**३३६.** परे को शब्द छू नहीं सकते।
**३३७.** शब्दों का अंत ही मौन का आरंभ है।
**३३८.** मौन में अर्थ नहीं, अस्तित्व है।
**३३९.** अस्तित्व में कोई उद्देश्य नहीं।
**३४०.** उद्देश्य ही मन का प्रक्षेपण है।
**३४१.** प्रक्षेपण में वास्तविकता नहीं।
**३४२.** वास्तविकता केवल प्रत्यक्ष है।
**३४३.** प्रत्यक्ष में कोई व्याख्या नहीं।
**३४४.** व्याख्या दूरी बनाती है।
**३४५.** दूरी में ही खोज जारी रहती है।
**३४६.** खोज का अंत ही विश्राम है।
**३४७.** विश्राम में कोई करने वाला नहीं।
**३४८.** करना ही मन का भ्रम है।
**३४९.** भ्रम को हटाना नहीं, देखना है।
**३५०.** देखना ही शुद्ध क्रांति है।
**३५१.** क्रांति भीतर होती है।
**३५२.** भीतर का परिवर्तन ही बाहरी सत्य को उजागर करता है।
**३५३.** बाहर कुछ बदलना नहीं।
**३५४.** देखने का तरीका बदलना है।
**३५५.** दृष्टि बदले तो जगत बदलता है।
**३५६.** जगत मन का प्रतिबिंब है।
**३५७.** प्रतिबिंब को सुधारना व्यर्थ है।
**३५८.** स्रोत को देखना आवश्यक है।
**३५९.** स्रोत में ही समस्त उत्तर हैं।
**३६०.** स्रोत ही “शिरोमणि” का शाश्वत स्वरूप है।
— **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
**३६१.** स्रोत न आरंभ है, न परिणाम।
**३६२.** वही शून्य में पूर्ण का उदय है।
**३६३.** उदय बिना कारण होता है।
**३६४.** कारण मन की रचना है।
**३६५.** रचना में सत्य बंध जाता है।
**३६६.** बंधन ही भ्रम का विस्तार है।
**३६७.** विस्तार को पकड़ना असंभव है।
**३६८.** छोड़ना भी एक क्रिया है।
**३६९.** क्रिया में कर्ता छिपा रहता है।
**३७०.** कर्ता ही द्वैत का आधार है।
**३७१.** द्वैत में ही संघर्ष जन्मता है।
**३७२.** संघर्ष में शांति नहीं।
**३७३.** शांति प्राप्त नहीं, प्रकट होती है।
**३७४.** प्रकट होने में समय नहीं लगता।
**३७५.** समय केवल विचार की धारा है।
**३७६.** धारा को देखना ही ठहराव है।
**३७७.** ठहराव में कोई लक्ष्य नहीं।
**३७८.** लक्ष्य ही दूरी का निर्माण है।
**३७९.** दूरी में ही प्रयास जन्मता है।
**३८०.** प्रयास में सहजता खो जाती है।
**३८१.** सहजता ही मूल स्वभाव है।
**३८२.** स्वभाव में कोई अभ्यास नहीं।
**३८३.** अभ्यास ही मन का अनुशासन है।
**३८४.** अनुशासन में स्वतंत्रता नहीं।
**३८५.** स्वतंत्रता कोई विकल्प नहीं।
**३८६.** यह बंधन के अंत में है।
**३८७.** बंधन पहचान का निर्माण है।
**३८८.** पहचान स्मृति का संग्रह है।
**३८९.** संग्रह ही भार है।
**३९०.** भार में उड़ान नहीं।
**३९१.** उड़ान बिना दिशा होती है।
**३९२.** दिशा ही सीमा बनाती है।
**३९३.** सीमा में भय छिपा है।
**३९४.** भय सुरक्षा को खोजता है।
**३९५.** सुरक्षा का विचार ही असुरक्षा है।
**३९६.** असुरक्षा को देखना ही मुक्ति है।
**३९७.** मुक्ति में कोई पहचान नहीं।
**३९८.** पहचान का अंत ही शून्यता है।
**३९९.** शून्यता खालीपन नहीं।
**४००.** यह अनंत संभावनाओं का विस्तार है।
**४०१.** विस्तार में कोई केंद्र नहीं।
**४०२.** केंद्र ही सीमितता का जन्मदाता है।
**४०३.** सीमितता में ही दुख है।
**४०४.** दुख प्रतिरोध से उत्पन्न होता है।
**४०५.** प्रतिरोध ही “मैं” की रक्षा है।
**४०६.** रक्षा में भय छिपा है।
**४०७.** भय ही विचार को चलाता है।
**४०८.** विचार ही समय का प्रवाह है।
**४०९.** प्रवाह को रोकना संभव नहीं।
**४१०.** उसे देखना ही पर्याप्त है।
**४११.** देखने में ही समाप्ति है।
**४१२.** समाप्ति ही आरंभ है।
**४१३.** आरंभ और अंत अलग नहीं।
**४१४.** यह एक ही चक्र का भ्रम है।
**४१५.** चक्र को समझना ही उससे बाहर आना है।
**४१६.** बाहर आना कोई स्थान नहीं।
**४१७.** यह दृष्टि का परिवर्तन है।
**४१८.** परिवर्तन भीतर होता है।
**४१९.** भीतर ही सम्पूर्ण जगत है।
**४२०.** जगत केवल प्रतिबिंब है।
**४२१.** प्रतिबिंब को सुधारना व्यर्थ है।
**४२२.** स्रोत को जानना ही पर्याप्त है।
**४२३.** स्रोत में कोई विभाजन नहीं।
**४२४.** विभाजन केवल मन की रेखा है।
**४२५.** रेखा मिटते ही एकत्व प्रकट।
**४२६.** एकत्व में कोई अनुभवकर्ता नहीं।
**४२७.** अनुभवकर्ता ही अनुभव को सीमित करता है।
**४२८.** सीमा हटे तो केवल होना शेष।
**४२९.** होना ही सत्य का स्पंदन है।
**४३०.** स्पंदन में कोई प्रयास नहीं।
**४३१.** प्रयास ही दूरी बनाता है।
**४३२.** दूरी ही भ्रम का विस्तार है।
**४३३.** भ्रम का अंत ज्ञान नहीं।
**४३४.** यह देखना है कि भ्रम है।
**४३५.** देखना ही प्रकाश है।
**४३६.** प्रकाश में सब स्पष्ट है।
**४३७.** स्पष्टता में कोई प्रश्न नहीं।
**४३८.** प्रश्न केवल अज्ञान की छाया है।
**४३९.** छाया हटे तो केवल प्रकाश।
**४४०.** वही “शिरोमणि” का नित्य सत्य है।
— **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
**४४१.** नित्य सत्य बदलता नहीं, केवल दृष्टि बदलती है।
**४४२.** दृष्टि में विकार हो तो जगत विकृत दिखे।
**४४३.** दृष्टि निर्मल हो तो सब एक रस।
**४४४.** एक रस में कोई भेद नहीं।
**४४५.** भेद ही मन का निर्माण है।
**४४६.** निर्माण ही असत्य का जाल है।
**४४७.** जाल में उलझना ही अज्ञान है।
**४४८.** जाल को देखना ही मुक्ति है।
**४४९.** मुक्ति कोई उपलब्धि नहीं।
**४५०.** यह भार का विसर्जन है।
**४५१.** विसर्जन में कुछ खोता नहीं।
**४५२.** केवल भ्रम गिरता है।
**४५३.** भ्रम ही “मैं” की पकड़ है।
**४५४.** पकड़ ही बंधन है।
**४५५.** बंधन में स्वतंत्रता नहीं।
**४५६.** स्वतंत्रता स्वभाव की पहचान है।
**४५७.** स्वभाव सिखाया नहीं जाता।
**४५८.** यह जन्मजात नहीं, शाश्वत है।
**४५९.** शाश्वत में समय का प्रवेश नहीं।
**४६०.** समय ही परिवर्तन का माप है।
**४६१.** जहाँ माप नहीं, वहाँ तुलना नहीं।
**४६२.** तुलना में ही असंतोष है।
**४६३.** असंतोष ही खोज को जन्म देता है।
**४६४.** खोज ही भटकाव का चक्र है।
**४६५.** चक्र को तोड़ना प्रयास नहीं।
**४६६.** उसे देखना ही पर्याप्त है।
**४६७.** देखने में ही जागरण है।
**४६८.** जागरण में कोई साधक नहीं।
**४६९.** साधक ही लक्ष्य का निर्माता है।
**४७०.** लक्ष्य ही दूरी का विस्तार है।
**४७१.** दूरी ही समय का भ्रम है।
**४७२.** समय में ही भय पलता है।
**४७३.** भय ही सुरक्षा की तलाश करता है।
**४७४.** तलाश ही अशांति का स्रोत है।
**४७५.** अशांति में स्पष्टता नहीं।
**४७६.** स्पष्टता में कोई तलाश नहीं।
**४७७.** स्पष्टता ही मौन का द्वार है।
**४७८.** मौन में कोई विचार नहीं।
**४७९.** विचार का अंत ही विश्राम है।
**४८०.** विश्राम में कोई कर्ता नहीं।
**४८१.** कर्ता ही अनुभव को बाँधता है।
**४८२.** बंधन में ही पहचान जन्मती है।
**४८३.** पहचान ही सीमितता का कारण है।
**४८४.** सीमितता में ही दुख है।
**४८५.** दुख प्रतिरोध से उत्पन्न होता है।
**४८६.** प्रतिरोध ही “मैं” की रक्षा है।
**४८७.** रक्षा में ही भय छिपा है।
**४८८.** भय ही अज्ञान का आधार है।
**४८९.** अज्ञान हटता नहीं, प्रकट होता है।
**४९०.** प्रकट होने पर वह स्वयं मिटता है।
**४९१.** मिटना ही अंत नहीं।
**४९२.** यह सत्य का उदय है।
**४९३.** उदय में कोई आरंभ नहीं।
**४९४.** आरंभ और अंत मन की कल्पना हैं।
**४९५.** कल्पना में ही द्वैत जन्मता है।
**४९६.** द्वैत में ही संघर्ष चलता है।
**४९७.** संघर्ष को समाप्त करना संभव नहीं।
**४९८.** उसे समझना ही समाधान है।
**४९९.** समझ में ही शांति है।
**५००.** शांति में कोई खोज नहीं।
**५०१.** खोज का अंत ही साक्षात्कार है।
**५०२.** साक्षात्कार में कोई अनुभवकर्ता नहीं।
**५०३.** अनुभवकर्ता ही सीमा है।
**५०४.** सीमा मिटे तो अनंत प्रकट।
**५०५.** अनंत को पकड़ा नहीं जा सकता।
**५०६.** पकड़ ही भ्रम का आरंभ है।
**५०७.** आरंभ ही अंत का बीज है।
**५०८.** अंत ही पूर्णता का द्वार है।
**५०९.** पूर्णता में कोई अभाव नहीं।
**५१०.** अभाव ही इच्छा का स्रोत है।
**५११.** इच्छा ही अशांति का कारण है।
**५१२.** अशांति ही मन की गति है।
**५१३.** गति में स्थिरता नहीं।
**५१४.** स्थिरता में ही सत्य प्रकट।
**५१५.** सत्य को शब्द छू नहीं सकते।
**५१६.** शब्द केवल संकेत हैं।
**५१७.** संकेत को पकड़ना भूल है।
**५१८.** संकेत से परे जाना बोध है।
**५१९.** बोध में कोई दावा नहीं।
**५२०.** दावा ही अहंकार का स्वरूप है।
**५२१.** अहंकार ही विभाजन का केंद्र है।
**५२२.** केंद्र मिटे तो केवल विस्तार।
**५२३.** विस्तार में कोई दूसरा नहीं।
**५२४.** वही “शिरोमणि” का अखंड स्वरूप है।
— **शिरोमणि रामपॉल सैनी****शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
**५२५.** अखंड में कोई किनारा नहीं।
**५२६.** किनारा ही सीमा का संकेत है।
**५२७.** सीमा में ही भय का निवास।
**५२८.** भय में ही मन का व्यापार।
**५२९.** व्यापार ही चाह का विस्तार है।
**५३०.** चाह ही अधूरेपन की छाया है।
**५३१.** छाया को मिटाना संभव नहीं।
**५३२.** प्रकाश होते ही वह लुप्त।
**५३३.** प्रकाश को लाना प्रयास नहीं।
**५३४.** केवल आवरण हटाना है।
**५३५.** आवरण विचार का जाल है।
**५३६.** जाल को देखना ही मुक्ति है।
**५३७.** मुक्ति कोई अंत नहीं।
**५३८.** यह आरंभ का विसर्जन है।
**५३९.** जहाँ आरंभ नहीं, वहाँ अंत नहीं।
**५४०.** वही शाश्वत का स्पंदन है।
**५४१.** स्पंदन निरंतर है, अडिग है।
**५४२.** अडिगता में कोई प्रयास नहीं।
**५४३.** प्रयास ही विक्षेप का कारण है।
**५४४.** विक्षेप में ही भटकाव है।
**५४५.** भटकाव को दिशा देना समाधान नहीं।
**५४६.** दिशा ही भटकाव को लंबा करती है।
**५४७.** रुकना ही सत्य का द्वार है।
**५४८.** रुकना करना नहीं, होना है।
**५४९.** होना ही मूल स्थिति है।
**५५०.** स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं।
**५५१.** परिवर्तन मन का अनुभव है।
**५५२.** अनुभव ही स्मृति का बीज है।
**५५३.** स्मृति अतीत की गूंज है।
**५५४.** गूंज में वर्तमान खो जाता है।
**५५५.** वर्तमान ही एकमात्र सत्य है।
**५५६.** सत्य में कोई विकल्प नहीं।
**५५७.** विकल्प ही द्वंद्व का जन्मदाता है।
**५५८.** द्वंद्व में ही संघर्ष चलता है।
**५५९.** संघर्ष में शांति नहीं।
**५६०.** शांति में कोई विकल्प नहीं।
**५६१.** शांति को खोजना अशांति है।
**५६२.** शांति को देखना जागृति है।
**५६३.** जागृति में कोई साधना नहीं।
**५६४.** साधना ही दूरी का निर्माण है।
**५६५.** दूरी ही समय का खेल है।
**५६६.** समय में ही भय पलता है।
**५६७.** भय में ही सुरक्षा की खोज।
**५६८.** खोज ही असुरक्षा का प्रमाण है।
**५६९.** असुरक्षा को देखना ही स्वतंत्रता है।
**५७०.** स्वतंत्रता कोई उपलब्धि नहीं।
**५७१.** यह बंधन का अंत है।
**५७२.** बंधन ही “मैं” की दीवार है।
**५७३.** दीवार गिरते ही आकाश प्रकट।
**५७४.** आकाश में कोई केंद्र नहीं।
**५७५.** केंद्र ही सीमितता का कारण।
**५७६.** सीमितता ही दुख का आधार।
**५७७.** दुख प्रतिरोध से जन्मता है।
**५७८.** प्रतिरोध ही मन की रक्षा है।
**५७९.** रक्षा में भय छिपा है।
**५८०.** भय में सत्य नहीं दिखता।
**५८१.** सत्य को खोजना असंभव है।
**५८२.** सत्य को देखना संभव है।
**५८३.** देखना बिना विचार के होता है।
**५८४.** विचार ही विकृति की जड़ है।
**५८५.** जड़ को काटना नहीं, समझना है।
**५८६.** समझ में ही समाप्ति है।
**५८७.** समाप्ति ही आरंभ है।
**५८८.** आरंभ और अंत एक ही धारा।
**५८९.** धारा को रोकना व्यर्थ है।
**५९०.** उसे देखना ही बोध है।
**५९१.** बोध में कोई अनुभवकर्ता नहीं।
**५९२.** अनुभवकर्ता ही सीमा है।
**५९३.** सीमा मिटते ही अनंत प्रकट।
**५९४.** अनंत को मापा नहीं जा सकता।
**५९५.** मापन ही मन का भ्रम है।
**५९६.** भ्रम का अंत ही स्पष्टता है।
**५९७.** स्पष्टता में कोई प्रश्न नहीं।
**५९८.** प्रश्न केवल अज्ञान की छाया।
**५९९.** छाया हटे तो केवल प्रकाश।
**६००.** वही “शिरोमणि” का नित्य प्रकाश है।
— **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
**६०१.** नित्य प्रकाश न बढ़ता है, न घटता है।
**६०२.** परिवर्तन केवल देखने वाले में है।
**६०३.** देखने वाला स्वयं अचल है।
**६०४.** अचल में ही शाश्वत का निवास है।
**६०५.** शाश्वत को समय छू नहीं सकता।
**६०६.** समय केवल विचार का विस्तार है।
**६०७.** विस्तार में ही दूरी का भ्रम है।
**६०८.** दूरी ही खोज का कारण है।
**६०९.** खोज ही असंतोष की छाया है।
**६१०.** असंतोष ही मन का व्यापार है।
**६११.** व्यापार में ही लाभ-हानि का खेल।
**६१२.** खेल में सत्य नहीं।
**६१३.** सत्य खेल से परे है।
**६१४.** परे को समझना नहीं, देखना है।
**६१५.** देखना बिना चयन के होता है।
**६१६.** चयन ही द्वैत का आरंभ है।
**६१७.** द्वैत में ही विभाजन है।
**६१८.** विभाजन में ही भय जन्मता है।
**६१९.** भय ही सुरक्षा की तलाश करता है।
**६२०.** तलाश ही अशांति का विस्तार है।
**६२१.** अशांति में कोई स्पष्टता नहीं।
**६२२.** स्पष्टता में कोई खोज नहीं।
**६२३.** खोज का अंत ही विश्राम है।
**६२४.** विश्राम में कोई कर्ता नहीं।
**६२५.** कर्ता ही अनुभव को सीमित करता है।
**६२६.** सीमितता ही दुख का आधार है।
**६२७.** दुख प्रतिरोध से उत्पन्न होता है।
**६२८.** प्रतिरोध ही “मैं” की रक्षा है।
**६२९.** रक्षा में ही भय छिपा है।
**६३०.** भय ही अज्ञान का मूल है।
**६३१.** अज्ञान को हटाना नहीं पड़ता।
**६३२.** उसे देखना ही पर्याप्त है।
**६३३.** देखना ही प्रकाश है।
**६३४.** प्रकाश में कोई छाया नहीं।
**६३५.** छाया केवल भ्रम का संकेत है।
**६३६.** भ्रम का अंत ही सत्य का उदय है।
**६३७.** उदय में कोई आरंभ नहीं।
**६३८.** आरंभ और अंत विचार के खेल हैं।
**६३९.** खेल को समझना ही बोध है।
**६४०.** बोध में कोई साधक नहीं।
**६४१.** साधक ही लक्ष्य का निर्माण करता है।
**६४२.** लक्ष्य ही दूरी को जन्म देता है।
**६४३.** दूरी ही समय का विस्तार है।
**६४४.** समय में ही मन भटकता है।
**६४५.** भटकाव को दिशा देना समाधान नहीं।
**६४६.** दिशा ही भटकाव को स्थायी बनाती है।
**६४७.** रुकना ही सत्य का स्पर्श है।
**६४८.** रुकना करना नहीं, होना है।
**६४९.** होना ही शुद्ध अस्तित्व है।
**६५०.** अस्तित्व में कोई पहचान नहीं।
**६५१.** पहचान ही सीमितता का कारण है।
**६५२.** सीमितता में ही दुख जन्मता है।
**६५३.** दुख को समाप्त करना संभव नहीं।
**६५४.** उसे समझना ही मुक्ति है।
**६५५.** मुक्ति में कोई उपलब्धि नहीं।
**६५६.** यह भार का विसर्जन है।
**६५७.** भार स्मृति का संचय है।
**६५८.** संचय ही मन का खेल है।
**६५९.** खेल को देखना ही समाप्ति है।
**६६०.** समाप्ति ही आरंभ है।
**६६१.** आरंभ और अंत एक ही बिंदु।
**६६२.** बिंदु में ही अनंत समाहित है।
**६६३.** अनंत में कोई सीमा नहीं।
**६६४.** सीमा ही भय का कारण है।
**६६५.** भय में ही विभाजन है।
**६६६.** विभाजन में ही संघर्ष है।
**६६७.** संघर्ष में शांति नहीं।
**६६८.** शांति में कोई विभाजन नहीं।
**६६९.** शांति को खोजना अशांति है।
**६७०.** शांति को देखना जागरण है।
**६७१.** जागरण में कोई प्रयास नहीं।
**६७२.** प्रयास ही दूरी बनाता है।
**६७३.** दूरी मिटते ही एकत्व प्रकट।
**६७४.** एकत्व में कोई दूसरा नहीं।
**६७५.** दूसरा ही भय का कारण है।
**६७६.** भय मिटे तो केवल प्रेम।
**६७७.** प्रेम कोई भावना नहीं।
**६७८.** यह अस्तित्व की अवस्था है।
**६७९.** अवस्था में कोई परिवर्तन नहीं।
**६८०.** वही “शिरोमणि” का अखंड सत्य है।
— **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
**१०८.** जो ठहर गया, वही प्रवाह को जान गया।
**१०९.** जो भागता रहा, वही स्वयं से दूर रहा।
**११०.** भीतर का शून्य ही पूर्णता का द्वार है।
**१११.** जो शून्य से डरा, वह भीड़ में खो गया।
**११२.** मस्तिष्क पकड़ता है, हृदय बहने देता है।
**११३.** पकड़ में बंधन है, बहाव में मुक्ति है।
**११४.** जो थामे रहता है, वह टूटता है।
**११५.** जो छोड़ देता है, वह जुड़ जाता है।
**११६.** सत्य को पाने की चाह ही दूरी है।
**११७.** दूरी मिटते ही सत्य स्वयं प्रकट है।
**११८.** पाने वाला ही बाधा है।
**११९.** जो है, वही पर्याप्त है।
**१२०.** खोज का अंत ही मिलन है।
**१२१.** मिलन में खोजने वाला नहीं रहता।
**१२२.** जहाँ खोजी गिरा, वहीं सत्य खड़ा है।
**१२३.** जो गिरा नहीं, वह जान नहीं पाया।
**१२४.** अहंकार शोर करता है।
**१२५.** अस्तित्व मौन में गाता है।
**१२६.** जो सुनता है, वही जानता है।
**१२७.** जो बोलता है, वह छूट जाता है।
**१२८.** दृष्टा ही दृश्य का मूल है।
**१२९.** दृश्य बदलते हैं, दृष्टा स्थिर है।
**१३०.** जो दृष्टा में ठहरा, वह मुक्त है।
**१३१.** जो दृश्य में उलझा, वह बंधा है।
**१३२.** समय मन की परछाईं है।
**१३३.** वर्तमान उसका अभाव है।
**१३४.** जहाँ अभी है, वहीं अनंत है।
**१३५.** जहाँ अनंत है, वहाँ भय नहीं।
**१३६.** भय स्मृति की जंजीर है।
**१३७.** स्मृति ढीली हो तो भय गिरता है।
**१३८.** जो अभी में है, वह अछूता है।
**१३९.** जो अछूता है, वही सत्य है।
**१४०.** प्रयास थकान है।
**१४१.** सहजता विश्राम है।
**१४२.** विश्राम में ही दर्शन है।
**१४३.** दर्शन में ही विसर्जन है।
**१४४.** “मैं” एक कहानी है।
**१४५.** कहानी समाप्त तो शांति शेष।
**१४६.** शांति में ही पहचान मिटती है।
**१४७.** पहचान मिटे तो सत्य खिलता है।
**१४८.** जो स्वयं को साबित करता है, वह अस्थिर है।
**१४९.** जो स्वयं में स्थित है, उसे प्रमाण नहीं चाहिए।
**१५०.** प्रमाण की चाह ही संदेह है।
**१५१.** संदेह का अंत ही स्पष्टता है।
**१५२.** गुरु बाहर नहीं, जागरण भीतर है।
**१५३.** जागरण में द्वैत नहीं।
**१५४.** जहाँ द्वैत नहीं, वहीं एकत्व है।
**१५५.** एकत्व ही स्वभाव है।
**१५६.** श्वास ही सबसे निकट सत्य है।
**१५७.** जो श्वास को जानता है, वह जीवन को जानता है।
**१५८.** जो जीवन को जानता है, वह मृत्यु से परे है।
**१५९.** जो परे है, वही शाश्वत है।
**१६०.** मौन कोई अभ्यास नहीं।
**१६१.** मौन स्वभाव का उदय है।
**१६२.** जब विचार थकते हैं, मौन प्रकट होता है।
**१६३.** जब मौन प्रकट होता है, सब स्पष्ट हो जाता है।
**१६४.** बाहर का मार्ग अंतहीन है।
**१६५.** भीतर का बिंदु अनंत है।
**१६६.** जो बिंदु में डूबा, वह सागर हो गया।
**१६७.** जो सागर हुआ, वह फिर सीमित न रहा।
**१६८.** नियंत्रण भ्रम है।
**१६९.** समर्पण सत्य है।
**१७०.** समर्पण में खोना नहीं, पाना है।
**१७१.** पाना भी अंततः मिट जाता है।
**१७२.** जहाँ कुछ भी शेष नहीं, वहीं सब है।
**१७३.** जहाँ सब है, वहाँ कोई नहीं।
**१७४.** जहाँ कोई नहीं, वहीं शिरोमणि है।
**१७५.** जहाँ शिरोमणि है, वहीं पूर्णता है।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
**१७६.** भीड़ की चाल उधार है, स्वत्व की चाल स्वयंसिद्ध है।
**१७७.** उधार का कदम डगमगाता है, स्वत्व का कदम अडिग है।
**१७८.** जो इशारों पर चला, वह दिशा से वंचित रहा।
**१७९.** जो भीतर से उठा, वही पथ स्वयं बन गया।
**१८०.** डर का घर स्मृति में है, साहस का जन्म वर्तमान में।
**१८१.** भय जकड़ता है, साक्षी मुक्त करता है।
**१८२.** जो भय में जीता है, वह छाया में रहता है।
**१८३.** जो साक्षी हुआ, वह प्रकाश हो गया।
**१८४.** बचपन की निर्मलता अभी भी धड़कन में है।
**१८५.** जिसे खोया मान लिया, वही सबसे निकट है।
**१८६.** जो सरल था, वही सत्य था।
**१८७.** जटिलता मन की रचना है।
**१८८.** चतुराई जीवन-यापन का उपकरण है।
**१८९.** निर्मलता आत्म-साक्षात्कार का द्वार है।
**१९०.** जो बाहर जीता है, वह उपाय खोजता है।
**१९१.** जो भीतर उतरता है, वह उत्तर बन जाता है।
**१९२.** ज्ञान का भार अज्ञान की छाया है।
**१९३.** अनुभव का मौन ही प्रामाणिकता है।
**१९४.** शब्द सीमित करते हैं, अनुभूति विस्तार देती है।
**१९५.** जहाँ विस्तार है, वहीं सत्य है।
**१९६.** परंपरा समय की आदत है।
**१९७.** स्वभाव अस्तित्व की सहजता है।
**१९८.** आदत बाँधती है, सहजता खोलती है।
**१९९.** जो खुला, वही पूर्ण हुआ।
**२००.** अनुकरण में अस्तित्व सूखता है।
**२०१.** आत्म-दर्शन में अस्तित्व खिलता है।
**२०२.** जो भीड़ में सुरक्षित है, वह भीतर से शून्य है।
**२०३.** जो अकेले में पूर्ण है, वही अखंड है।
**२०४.** गुरु की छाया लंबी हो सकती है।
**२०५.** पर सूर्य स्वयं होना ही उजाला है।
**२०६.** जो झुका बिना जाने, वह बंध गया।
**२०७.** जो समझकर झुका, वह मुक्त हुआ।
**२०८.** नियम सीमाएँ खींचते हैं।
**२०९.** स्वभाव सीमाएँ मिटा देता है।
**२१०.** जहाँ सीमा नहीं, वहीं अनंत है।
**२११.** जहाँ अनंत है, वहीं शांति है।
**२१२.** जीवन-यापन साधन है।
**२१३.** आत्म-दर्शन साध्य है।
**२१४.** साधन में उलझा, साध्य से दूर हुआ।
**२१५.** साध्य में स्थित, सब पूर्ण हुआ।
**२१६.** मस्तक गणना करता है।
**२१७.** हृदय साक्षी रहता है।
**२१८.** गणना में द्वंद्व है।
**२१९.** साक्षी में समत्व है।
**२२०.** जन्म एक द्वार है।
**२२१.** मृत्यु एक रूपांतरण है।
**२२२.** जो इन दोनों में फँसा, वह चक्र में है।
**२२३.** जो साक्षी हुआ, वह चक्र से परे है।
**२२४.** बंधन अदृश्य हैं, पर अनुभव में भारी हैं।
**२२५.** मुक्ति अदृश्य है, पर अनुभव में हल्की है।
**२२६.** जो हल्का हुआ, वही उड़ा।
**२२७.** जो उड़ा, वही अनंत हुआ।
**२२८.** अहंकार घोषणा करता है।
**२२९.** सत्य उपस्थिति है।
**२३०.** घोषणा क्षणिक है।
**२३१.** उपस्थिति शाश्वत है।
**२३२.** खोज अंतहीन हो सकती है।
**२३३.** ठहराव अंतिम हो सकता है।
**२३४.** जहाँ ठहराव है, वहीं मिलन है।
**२३५.** जहाँ मिलन है, वहाँ कोई खोजी नहीं।
**२३६.** दृष्टि जब भीतर मुड़ी, जगत स्पष्ट हुआ।
**२३७.** दृष्टि जब बाहर भागी, भ्रम बढ़ा।
**२३८.** भीतर ही केंद्र है।
**२३९.** केंद्र ही सत्य है।
**२४०.** शिरोमणि अवस्था अर्जित नहीं होती।
**२४१.** यह स्मरण है, जो सदैव था।
**२४२.** स्मरण जागा, तो सब प्रकट हुआ।
**२४३.** प्रकट हुआ, तो कुछ भी शेष न रहा।
**२४४.** जहाँ कुछ शेष न रहा, वहीं पूर्णता है।
**२४५.** जहाँ पूर्णता है, वहीं संतोष है।
**२४६.** जहाँ संतोष है, वहीं नृत्य है।
**२४७.** जहाँ नृत्य है, वहीं शिरोमणि है।
**२४८.** स्वयं में जो स्थापित है, वही अचल है।
**२४९.** स्वयं से जो छूटा, वही भटकता है।
**२५०.** स्थापित होना ही मुक्ति है।
**२५१.** मुक्ति ही स्वभाव है।
**२५२.** अंत में न सिद्धांत रहता है, न साधना।
**२५३.** न मार्ग, न मंज़िल।
**२५४.** केवल प्रत्यक्षता शेष रहती है।
**२५५.** वही शाश्वत, वही शिरोमणि।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
॥३१॥
यदा अहंभावः क्षीयते, तदा विश्वं विलीयते।
अद्वयस्य प्रबोधेन, केवलं सत्यं शिष्यते॥
॥३२॥
न भूतं न भविष्यं च, न वर्तमानकल्पना।
यः क्षणं शुद्धतया पश्येत्, सः एव कालवर्जितः॥
॥३३॥
इन्द्रियाणां प्रवाहोऽयं, बहिर्मुखतया धावति।
यः प्रत्यग्गमनं कुर्यात्, सः आत्मानं प्रपद्यते॥
॥३४॥
न प्रकाशो बहिर्दीपे, न शब्दो ग्रन्थसंभवे।
हृदयाकाशमध्ये तु, स्वतः दीपः प्रजायते॥
॥३५॥
द्वन्द्वातीतः सदा धीरः, न सुखे न च दुःखतः।
समत्वे यः प्रतिष्ठितः, सः मुक्तो नात्र संशयः॥
॥३६॥
स्वप्नवत् दृश्यते जगत्, मिथ्यात्वेन प्रकाशते।
यः तत्रासक्तिं त्यजति, सः तत्त्वं प्रतिपद्यते॥
॥३७॥
न नाम न रूपभेदः, न किञ्चित् भिन्नता क्वचित्।
एकमेव अद्वितीयं तत्, यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्॥
॥३८॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
स्वात्मा नित्यः शुद्धः,
निरवद्यः स्वभावतः।
यः तं साक्षात् अनुभवति,
सः भवति परमेश्वरः॥
॥३९॥
न मोहः न च तृष्णा, न स्पृहा न च संचयः।
यत्र पूर्णतया तृप्तिः, तत्रैव अमृतस्य स्रोतः॥
॥४०॥
यः अन्येषां मार्गं त्यक्त्वा, स्वमार्गे धैर्यतः स्थितः।
सः एव पुरुषश्रेष्ठः, न तु भीडानुयायी जनः॥
॥४१॥
विचारः अपि बन्धनं, यदि तत्रासक्तिर्भवेत्।
निर्विचारस्थितौ यत्र, तत्र सत्यं प्रस्फुरेत्॥
॥४२॥
शिशुस्वभावे यः स्थितः, न कपटं न च द्वैतता।
तस्य जीवनमेव योगः, तस्य श्वासोऽपि ध्यानकम्॥
॥४३॥
न सिद्धिः न च असिद्धिः, न हानि न च लाभता।
यः समत्वं समाश्रित्य, सः एव मुक्तलक्षणः॥
॥४४॥
इदं गुह्यतमं सूत्रम्—
न खोजो बहिर्मार्गं,
न त्यजो स्वस्वभावम्।
स्वयमेव प्रकटः आत्मा,
तत्रैव परं पदम्॥
॥४५॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
यः स्वयमेव पूर्णः,
तस्य किम् अन्येन साध्यम्।
यः स्वात्मनि रमते नित्यं,
सः भवति शाश्वतम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
॥१६॥
यदा मनः निश्चलं भवति, तदा सत्यं प्रकाशते।
वृत्तिक्षये स्वयं ध्येयम्, न किञ्चित् अन्यत् अवशिष्यते॥
॥१७॥
न कर्ता न भोक्ता च, न मार्गो न गन्तव्यता।
स्वभावे यः स्थितः नित्यं, सः एव परिपूर्णता॥
॥१८॥
वासनाबीजक्षये जाते, नूतनं न प्रसूयते।
यत्र शून्ये पूर्णभावः, तत्र आत्मा विभाति ते॥
॥१९॥
स्वरूपं न विकार्यं हि, न कालस्याधीनता।
यः तत्र लीयते धीरः, सः अतीतः सर्वथा॥
॥२०॥
भीडानुसरणं त्यक्त्वा, एकाकित्वे स्थितिः शिवा।
यत्र नास्ति द्वितीयभावः, तत्रैव आनन्दराशिः॥
॥२१॥
न शब्दः न विचारः च, न कल्पनानां सञ्चयः।
मौनस्य गहने गर्भे, आत्मा स्वयमेव उदयः॥
॥२२॥
शिशुवत् निर्मलं चित्तं, न स्मृतिर्नापि संचयः।
यः एवं जीवनं याति, सः मुक्तः जीवन्नेव॥
॥२३॥
न साधनं न साध्यं च, न योगो न च त्यागकः।
यत्र सहजता वर्तते, तत्रैव परमं सुखम्॥
॥२४॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
निरपेक्षं स्वदर्शनम्,
निष्कम्पं स्वजीवनम्।
यत्र आत्मा साक्षिभूतः,
तत्रैव अमृतं पदम्॥
॥२५॥
यः बहिः अन्विष्यति नित्यं, सः क्लेशं केवलं लभेत्।
यः अन्तः अवगच्छति स्वं, सः आनन्दं निरन्तरम्॥
॥२६॥
अज्ञानं न कश्चित् वस्तु, केवलं विस्मृतिः स्वयम्।
स्मरणे स्वात्मतत्त्वस्य, सर्वं भवति पूर्णतः॥
॥२७॥
न नियमैः न व्रतैः सिद्धिः, न तीर्थैः न च मन्त्रकैः।
स्वानुभूत्यैव निश्चयः, आत्मा साक्षात् प्रकाशते॥
॥२८॥
स्वतन्त्रः सर्वदा जीवः, बन्धः केवलं कल्पितः।
यः कल्पनां परित्यजति, सः भवति विमुक्ततः॥
॥२९॥
नूतनं किञ्चित् नास्ति हि, न प्राचीनं न मध्यतः।
यः कालातीतदृष्ट्या पश्येत्, सः एव सत्यदर्शकः॥
॥३०॥
इदं परं सूत्रम्—
स्वयमेव दीपः भव,
स्वयमेव पथः चर।
स्वयमेव सत्यं ज्ञात्वा,
स्वयमेव आनन्दं भर॥
---
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
भीतर का दीप जब स्वयं को देख लेता है,
तब प्रकाश फैलाना भी छोड़ देता है।
जो स्वयं में स्थिर है,
उसे दिशा नहीं चाहिए।
जो स्वयं में पूर्ण है,
उसे प्रमाण नहीं चाहिए।
जो स्वयं में जाग्रत है,
उसे संसार जगाना नहीं होता।
वह केवल होता है—
और होना ही पर्याप्त है।
--
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
भीतर का दीप जब स्वयं को देख लेता है,
तब प्रकाश फैलाना भी छोड़ देता है।
जो स्वयं में स्थिर है,
उसे दिशा नहीं चाहिए।
जो स्वयं में पूर्ण है,
उसे प्रमाण नहीं चाहिए।
जो स्वयं में जाग्रत है,
उसे संसार जगाना नहीं होता।
वह केवल होता है—
और होना ही पर्याप्त है।शिरोमणि रामपॉल सैनी वचनम् —
१.
नाहं मस्तक-कल्पितः, नाहं शब्द-बंधनम्।
हृदय-निरंतर-धारा अहं, शिरोमणि स्वयंस्फुरणम्॥
२.
जहाँ लहरें उठती-गिरती, वहाँ भ्रम का आवरण।
जहाँ गहराई स्थिर रहती, वही सत्य का कारण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे —
गहराई में ही ठहरो, वहीं आत्म-प्रकाशन॥
३.
न गुरु मार्ग, न शिष्य पथ, न बाह्य संकेतों का भार।
स्वयं के शिशुपन के पदचिन्ह, वही असली द्वार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन —
जो भीतर उतरे एक पल, वही पारापार॥
४.
डर-भय-दहशत के बंधन, मस्तक के ही जाल।
हृदय में न भय न बंधन, केवल निर्मल लाल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे —
जो हृदय में स्थित हुआ, वही निष्कंटक काल॥
५.
जीवन-व्यापन साधन मात्र, अस्तित्व का व्यवहार।
पर खुद का साक्षात्कार ही, सर्वोच्च सत्कार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र —
जो खुद को जान गया, वही सच्चा विस्तार॥
६.
न दीक्षा, न बंधन, न शब्दों का प्रमाण।
सत्य न बंधे किसी में, न हो उसका विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन —
स्वयं में जो प्रकट हुआ, वही परम प्रमाण॥
७.
शिशुपन की संपूर्णता, अभी भी है समक्ष।
मस्तक ने ही ढँक दिया, बना दिया उसे अस्पष्ट॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे —
हट जाए बस दृष्टिकोण, सत्य हो प्रत्यक्ष॥
८.
भीड़ उग्र भेड़ों की, संकेतों पर नाचती।
स्वयं का दीप बुझाकर, परछाइयों को साधती॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन —
जो स्वयं में जले दीप, वही दिशा दिखाती॥
९.
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा, न कोई भिन्न आकार।
हृदय के मूल तंत्र में, सब एक ही विस्तार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र —
भिन्नता केवल मस्तक की, सत्य एकाकार॥
१०.
जो खोजे बाहर जगत में, वह भ्रम में ही रहे।
जो एक पल भीतर उतरे, वह शाश्वत को सहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे —
स्वयं में जो ठहर गया, वही मुक्त सदा रहे॥
११.
न मृत्यु का भय शेष, न जीवन का मोह।
निरंतर संपूर्ण संतुष्टि, यही सत्य संयोग॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन —
जहाँ “मैं” भी विलीन हुआ, वहीं परम योग॥
१२.
नियम-परंपरा के जाल, केवल मस्तक के खेल।
हृदय असीम स्वतंत्र है, न बंधन न कोई जेल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे —
जो हृदय में स्थित हुआ, वही पूर्ण अखंड मेल॥
१३.
स्वयं ही साध्य, स्वयं ही साधन, स्वयं ही पथ प्रकाश।
स्वयं से ही मिलना है, यही अंतिम निवास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र —
जो स्वयं में डूब गया, वही शाश्वत उल्लास॥
१४.
न प्रयास, न परिश्रम, न कोई जटिल उपाय।
सिर्फ़ एक पल की निष्पक्षता, सत्य को ले आए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन —
सरलता ही द्वार है, जो हर भ्रम मिटाए॥
१५.
हृदय की असीम गहराई, स्थाई ठहराव धाम।
वहीं शिरोमणि अवस्था, वहीं सत्य का नाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे —
जो वहीं स्थित हो गया, वही परम विराम॥
॥ इति शिरोमणि सूत्राणि ॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वचनामृत सूत्रावली**
---
**॥१॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन कहे—
नन्हे पदचिन्हों में ही सत्य बसे,
शिशुपन की निर्मल धारा में ही रस है,
जो भूल गया वही भटका,
जो ठहरा वही साक्षात् हँसा।
---
**॥२॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता—
भीड़ के कंधों पर चढ़ा मन,
अपने ही पथ को भूल गया,
उंगलियों पर नाचता जीवन,
स्वतंत्रता का नाम भी खो गया।
---
**॥३॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी—
डर, खौफ, दहशत की जंजीरें,
मन ने स्वयं ही गढ़ डाली,
हृदय तो निश्चल सागर है,
लहरें ही केवल उथल-पुथल वाली।
---
**॥४॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र—
स्वयं में ही पूर्ण प्रत्येक जीव,
निपुण, समर्थ, असीम प्रकाश,
जो खोजे बाहर सत्य को,
वह खो दे अपना ही आभास।
---
**॥५॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
जो समझे बिना स्वयं को जीता,
वह जीवन व्यापन भर करता,
होश बिना जो साँसें गिनता,
वह चक्र में ही घूमता रहता।
---
**॥६॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उद्घोष—
शिशुपन का जो अंश शेष है,
वही तुम्हारा असली दीप,
मस्तक के धुंधलके में खोकर,
तुम खोज रहे वही अतीत।
---
**॥७॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
चतुरता से जग जीता जाता,
पर स्वयं को नहीं जाना जाता,
सरलता ही द्वार है सत्य का,
जिसे मस्तक कभी न अपनाता।
---
**॥८॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
गुरुता जहाँ प्रभुत्व बने,
वहाँ शिष्य बंधन में ढलता,
जहाँ प्रश्नों पर ताला लगे,
वहाँ सत्य स्वयं ही छिप जाता।
---
**॥९॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र—
नियम, परंपरा, मान्यता जाल,
वर्तमान को करती विकल,
अतीत के भ्रम में उलझा कर,
भविष्य बनाती केवल विफल।
---
**॥१०॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उद्घाटन—
"शिरोमणि" कोई नाम नहीं,
यह स्थिति है असीम शुद्ध,
जहाँ प्रकृति स्वयं स्पष्ट करे,
वही सत्य, वही पूर्ण बोध।
---
**॥११॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी—
एक क्षण की निष्पक्ष दृष्टि,
तोड़ दे युगों का सारा जाल,
जो देखे हृदय की गहराई,
उसके लिए सब कुछ निष्कल।
---
**॥१२॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
मस्तक बाँध सकता शब्दों में,
पर मुक्त कभी न कर पाए,
हृदय ही द्वार है मुक्ति का,
जहाँ पहुँच कर सब मिट जाए।
---
**॥१३॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र—
जीवन यदि हो केवल साधन,
तो संघर्ष ही शेष रहेगा,
जीवन यदि हो साक्षात्कार,
तो हर क्षण उत्सव रहेगा।
---
**॥१४॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
मृत्यु का भय जहाँ बसता है,
वहाँ जीवन अधूरा रहता,
जहाँ रूपांतरण की दृष्टि हो,
वहाँ अंत भी उत्सव बनता।
---
**॥१५॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उद्घोष—
जो स्वयं में स्थिर हो जाए,
वही सृष्टि का सार समझे,
जो बाहर ही भटके निरंतर,
वह भ्रम में ही जीवन रचे।
---
**॥१६॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतिम सूत्र—
न कुछ पाना, न कुछ खोना,
न कुछ करना, न कुछ होना,
जो है, वही पर्याप्त सदा—
बस उसे ही पहचानना।
---
**॥समापन॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता—
सत्य सरल है,
सरलता ही द्वार है,
हृदय ही पथ है,
और तुम स्वयं ही लक्ष्य हो।**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
॥७६॥
यः चिन्तां पोषयति नित्यं, सः शान्तिं न लभते।
यः चिन्तां निरीक्षते साक्षात्, सः तस्य पारं गच्छति॥
॥७७॥
न हि दोषः जगति कश्चित्, न हि गुणः पृथक् अस्ति।
दृष्टेः विकृतौ सर्वं विकृतम्, शुद्धे सर्वं शुद्धम्॥
॥७८॥
स्वरूपं न लभ्यते गमनेन, न च कालेन न च क्रियया।
यः तिष्ठति यथावत्, सः एव तत्र प्रतिष्ठितः॥
॥७९॥
आसक्तिः सूक्ष्मशृङ्खला, यः न दृश्यते सहसा।
यः तां भिनत्ति विवेकतः, सः स्वातन्त्र्यं स्पृशति॥
॥८०॥
यः परेषु आश्रयं याचते, सः आत्मानं त्यजति।
यः आत्मनि एव स्थितः, सः सर्वाश्रयान् अतिक्रामति॥
॥८१॥
न किञ्चित् कर्तव्यं सत्ये, न किञ्चित् साधनीयम्।
यः एतत् बोधं धारयति, सः सहजेन मुक्तः॥
॥८२॥
मनः मृगतृष्णा इव, धावति नित्यम् अनन्तम्।
यः तस्य मिथ्यात्वं पश्यति, सः विश्रामं प्राप्नोति॥
॥८३॥
न गुरुत्वं न शिष्यत्वं, केवलं भूमिका नाटके।
यः साक्षी भवति नित्यं, सः नाट्यं अतिक्रामति॥
॥८४॥
स्वात्मा दीपः अविच्छिन्नः, न तस्य कश्चित् कारणम्।
यः तं अनुभूयते धीरः, सः अज्ञानं भस्मीकरोति॥
॥८५॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
नाहं कर्ता न भोक्ता, नाहं देहः न च मनः।
अहं केवलं साक्षी, नित्यम् शुद्धः निरञ्जनः॥
॥८६॥
यः नामरूपे लीयते, सः भेदं अनुभवति।
यः तानि अतिक्रामति, सः एकत्वं पश्यति॥
॥८७॥
कालः केवलं परिवर्तनम्, न तु अस्तित्वस्य बाधकः।
यः कालातीतं पश्यति, सः नित्यं शान्तिम् अश्नुते॥
॥८८॥
न साधकः न सिद्धः, केवलं भ्रान्तिविभागः।
यः एतत् बोधं प्राप्नोति, सः द्वन्द्वातीतः भवति॥
॥८९॥
विचारः यदा विरमति, तदा दर्शनं उदेति।
यः दर्शनं धारयति, सः न पुनः विचलति॥
॥९०॥
हृदयम् न केवलं भावः, किन्तु अस्तित्वस्य केन्द्रम्।
यः तत्र प्रतिष्ठितः, सः सर्वत्र स्थितः॥
॥९१॥
न हि पन्थाः बहवः सन्ति, न च गन्तव्यं पृथक्।
यः स्वयं एव पन्थाः, सः एव गन्तव्यः॥
॥९२॥
मौनम् परमोपदेशः, न शब्दैः तस्य वर्णनम्।
यः तं अनुभूयते साक्षात्, सः सर्वं अवगच्छति॥
॥९३॥
न हि संसारः त्याज्यः, न च किञ्चित् ग्राह्यम्।
यः समत्वे तिष्ठति, सः सर्वं पवित्रं पश्यति॥
॥९४॥
शिशुवत् स्वच्छचित्तः, नित्यम् आनन्दरूपः।
यः तं पुनः अनुभूयते, सः कृतकृत्यः भवति॥
॥९५॥
इदं सूक्ष्मतमं सूत्रम्—
न दृश्यं न द्रष्टा, न ज्ञानं न ज्ञेयम्।
केवलं चैतन्यं शुद्धम्, तदेव परमं ध्येयम्॥
**॥अविराम प्रवाह॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
यः अन्तं अन्विष्यति, सः मार्गे एव स्थितः।
यः अनन्ते लीयते, सः एव पूर्णः॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
॥३६॥
यः स्वस्य नेत्रे न पश्यति, सः जगत् दोषं पश्यति।
दृष्टिः यदा विशुद्धा, तदा सर्वं पूर्णं दृश्यते॥
॥३७॥
स्वभावः न साधनीयः, न च प्राप्तव्यः कदाचन।
यः तत्र स्थितः सहजः, सः एव नित्यनिर्मलः॥
॥३८॥
विचारजालं विस्तीर्णम्, तत्र जीवः भ्रम्यते।
निर्विचारस्थितौ शान्तिः, यत्र सत्यं प्रकाशते॥
॥३९॥
अज्ञानं न किञ्चिद् वस्तु, केवलं विस्मृतिः स्वकीया।
स्मृतौ स्वात्मदीप्तेः, तदा मोहः क्षीयते॥
॥४०॥
यः स्वयं अपूर्णं मन्यते, सः अनन्तं धावति।
यः स्वयं पूर्णः अनुभूयते, सः स्थिरः आनन्दे तिष्ठति॥
॥४१॥
न संसारः बाधकः, न च देहः कारणम्।
चित्तवृत्तयः एव बन्धनं, तेषां लयः विमोचनम्॥
॥४२॥
शिशोः हास्ये यत् सत्यं, तदेव मुनिना अन्विष्यते।
यः तत्रैव स्थितः नित्यं, सः किमपि न शोधयति॥
॥४३॥
भीतिः कल्पितछाया, धैर्यं स्वात्मदीप्तिः।
यः दीपं प्रज्वालयति, तस्य छाया नश्यति॥
॥४४॥
न गुरुः मुक्तिदाता, न शिष्यः बन्धनहर्ता।
स्वानुभवः एव सेतु, यः तं तरति सः मुक्तः॥
॥४५॥
यः शब्देषु बद्धः, सः अर्थं न प्राप्नोति।
यः मौने विश्रामं याति, सः सारं अवगच्छति॥
॥४६॥
न कालः बाधकः, न देशः सीमकः।
यः स्वभावे स्थितः, सः सर्वत्र एकरूपः॥
॥४७॥
अहंकारः सूक्ष्मबन्धः, यः न दृश्यते सहसा।
यः तं निरीक्षते साक्षात्, सः तेनैव मुक्तः॥
॥४८॥
चिन्तनं साधनं लोके, किन्तु अतिक्रमणे बाधा।
यः चिन्तनातीतं गच्छति, सः सत्ये प्रतिष्ठितः॥
॥४९॥
न किञ्चित् त्याज्यम् वस्तुतः, न किञ्चित् ग्राह्यम् अपि।
यः यथार्थं पश्यति, सः सर्वत्र समदर्शी॥
॥५०॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
न प्रकाशः आगन्तव्यः, न अन्धकारः हन्तव्यः।
यः दृष्टिं परिवर्तयति, सः सर्वं परिवर्तयति॥
॥५१॥
स्वात्मनि यः रमते नित्यं, सः न कदापि क्लान्तः।
बाह्ये यः सुखं शोधयति, सः नित्यं अपूर्णः॥
॥५२॥
न साधनपथः दीर्घः, न च लक्ष्यं दूरस्थम्।
क्षणमात्रे जागरणं, तदा सर्वं सिद्धम्॥
॥५३॥
यः अनुभवात् वियुक्तः, सः केवलं वदति।
यः अनुभवेन युक्तः, सः मौनेन वदति॥
॥५४॥
मौनं न केवलं वाणी-अभावः, किन्तु चित्तनिवृत्तिः।
यत्र चित्तं न स्पन्दते, तत्र सत्यं स्फुरति॥
॥५५॥
इदं परं रहस्यम्—
न कर्ता न भोक्ता, केवलं साक्षिदृष्टिः।
यः साक्षी भवति नित्यं, सः एव परमानन्दः॥
**॥अन्तर्दीप्ति॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
न आरम्भः न अन्तः, केवलं अस्तित्वप्रवाहः।
यः तत्र लीयते पूर्णं, सः एव शाश्वतः॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
॥५६॥
यः स्वप्नेषु जागर्ति, सः जागरणं न प्राप्नोति।
यः स्वप्नत्वं पश्यति साक्षात्, सः एव बोधं लभते॥
॥५७॥
मस्तकस्य वेगः तीव्रः, हृदयस्य गाम्भीर्यम् अगाधम्।
यः गाम्भीर्ये निमज्जति, सः न पुनः चञ्चलः भवति॥
॥५८॥
यः परेषां वचने जीवति, सः स्वस्वरं विस्मरति।
यः स्वस्वरं श्रुणोति, सः सर्वस्वरान् अतिक्रामति॥
॥५९॥
दृश्यजगत् परिवर्तनशीलम्, द्रष्टा तु नित्यः अविकारः।
यः द्रष्टारं वेत्ति साक्षात्, तस्य संसारः लीलामात्रः॥
॥६०॥
अन्तःशून्यता न रिक्तता, किन्तु पूर्णताया आधारः।
यः तत्र विश्रामं प्राप्नोति, सः सर्वं आप्नोति॥
॥६१॥
न हि सत्यं साधनफलम्, न च समयेन लभ्यते।
यः तत्क्षणं प्रत्यभिजानाति, सः मुक्तः इति कथ्यते॥
॥६२॥
भेददृष्टिः मनसः क्रीडा, एकत्वं हृदयस्य स्फुरणम्।
यः क्रीडां त्यजति धीरः, सः स्फुरणे लीयते॥
॥६३॥
यः बन्धनं चिन्तयति, सः बन्धनं निर्माति।
यः स्वातन्त्र्यं अनुभूयते, सः मुक्तिं न चिन्तयति॥
॥६४॥
न कश्चित् अन्यः उद्धारकः, न कश्चित् अन्यः बाधकः।
स्वदृष्टिः एव कारणम्, यत्र बन्धः यत्र मोक्षः॥
॥६५॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
नाहं किञ्चित् नवीनं ब्रवीमि, नाहं किञ्चित् प्राचीनम्।
यत् नित्यं अस्ति सर्वत्र, तदेव अहं प्रकाशयामि॥
॥६६॥
यः ज्ञानेन गर्वं धारयति, सः अज्ञानं धारयति।
यः अज्ञानं अपि त्यजति, सः ज्ञानातीतं गच्छति॥
॥६७॥
न ध्यानेन लभ्यते केवलं, न त्यागेन न च भोगेन।
यः स्वभावे विश्रामं कुरुते, सः तत्त्वं अवगच्छति॥
॥६८॥
मनः तरङ्गः उदेति नित्यं, सागरः तु स्थिरः सदा।
यः तरङ्गं न अनुसरति, सः सागरे स्थितः॥
॥६९॥
यः कर्तृत्वं गृह्णाति, सः फलभोगं बध्नाति।
यः साक्षित्वे तिष्ठति, सः कर्तृत्वात् विमुच्यते॥
॥७०॥
न हि मार्गः बहिर्गतः, न हि सत्यं दूरतः।
स्वहृदि यः अवलोकयति, सः सर्वं सम्यक् पश्यति॥
॥७१॥
मौनं न केवलं स्थितिः, किन्तु अस्तित्वस्य स्वरूपम्।
यः तत्र लीनः भवति, सः शब्दान् अतिक्रामति॥
॥७२॥
यः भयात् धर्मं आचरति, सः अधर्मे एव पतति।
यः प्रेम्णा सत्यं व्रजति, सः धर्मं साक्षात् स्पृशति॥
॥७३॥
न परिभाषा सत्यस्य, न च सीमांकनम्।
यः अनुभवति तत्त्वतः, सः एव तस्य स्वरूपम्॥
॥७४॥
शिशुवत् यः निर्मलः, सः एव महायोगी।
यः कृत्रिमतां त्यजति, सः स्वयमेव योगी॥
॥७५॥
इदं परमसूत्रम्—
न खोजा न त्यागः, न साधना न विरामः।
केवलं साक्षित्वं शुद्धम्, तत्रैव परमधामः॥
**॥निरन्तरता॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
यः स्वयं में स्थितः, तस्य किञ्चित् न शेषम्।
यः स्वयं से विमुखः, तस्य सर्वं अपि अल्पम्॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—**
॥१६॥
अनुकरणं अन्धकारः, स्वदर्शनं दीपः।
यः परचिह्नेषु नृत्यति, सः स्वपदे पतति॥
॥१७॥
भीड़ः नाम बन्धनजालम्, व्यक्तिः नाम विमुक्तिधारा।
यः स्वभावे तिष्ठति नित्यं, सः एव शिरोमणिः सारा॥
॥१८॥
शिशुत्वस्य निर्मलता, न कदापि नश्यति।
मस्तके धूम्रवृत्त्या, केवलं आच्छाद्यते॥
॥१९॥
भयखण्डे यः वसति, सः जीवन्मृतः उच्यते।
निर्भयः स्वात्मनिष्ठः, सः अमृतत्वं स्पृशति॥
॥२०॥
चातुर्यं जीवनोपायः, सरलता जीवनसारः।
यः उपायं एव पूजति, सः सारं न जानाति॥
॥२१॥
न नियमः न च बन्धनम्, न परम्परा न च आश्रयः।
स्वानुभवः एव मार्गः, स्वसाक्षात्कारः एव लक्ष्यः॥
॥२२॥
अहंभावः गुरुत्वेन, शिष्यत्वं उत्पादयति।
यत्र अहं लीयते पूर्णं, तत्र द्वैतं विलीयते॥
॥२३॥
शब्दाः यदि प्रमाणत्वं यान्ति, तदा विवेकः नश्यति।
मौनं यदि साक्षित्वं धारयेत्, तदा सत्यं प्रकटते॥
॥२४॥
जीवनं केवलं प्रवाहः, न आरम्भः न समाप्तिः।
रूपान्तरेण यः क्रीडति, सः कालातीतः भवति॥
॥२५॥
स्वात्मा नित्यम् अखण्डः, न तस्य कश्चित् विकल्पः।
यः विकल्पे पतति मूढः, सः चक्रे एव भ्रमति॥
॥२६॥
मस्तकं कल्पनास्रोतः, हृदयम् सत्यधाम।
यः मस्तके वसति नित्यं, सः स्वप्ने एव भ्रमति॥
॥२७॥
न बहिर्मुखी यात्रा, न अन्तर्मुखी दूरी।
यत्र स्थितिः स्वभावे, तत्रैव पूर्णता स्थिरी॥
॥२८॥
स्वप्रकाशः न कस्यचित् दत्तः, न च कस्यचित् हरितः।
सः स्वतः एव उदेति, यदा मोहः पतितः॥
॥२९॥
अन्धश्रद्धा जडता, विवेकः चेतनदीप्तिः।
यत्र दीप्तिः जागरूका, तत्रैव मुक्तिसृष्टिः॥
॥३०॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
नाहं मार्गदर्शकः, नाहं उपदेशकः।
अहं केवलं साक्षित्वम्, यत्र त्वं स्वयम् प्रकाशकः॥
॥३१॥
स्वसाक्षात्कारः न साध्यः, न च किञ्चित् कर्तव्यम्।
यः यत्नं त्यजति पूर्णं, तस्य सत्यं स्वयं भव्यम्॥
॥३२॥
भीतरदीपः यदा ज्वलति, बाह्यजगत् शान्तिम् याति।
स्वयं पूर्णः यः भवति, तस्य किञ्चित् न अभावति॥
॥३३॥
न बन्धनं न मोक्षः, केवलं दृष्टेः परिवर्तनम्।
यः यथार्थं पश्यति साक्षात्, तस्य जीवनं उत्सवम्॥
॥३४॥
स्वभावः परमं तत्त्वं, न तत्र किञ्चित् कृत्रिमम्।
यः कृत्रिमे रमते नित्यं, सः स्वयम् एव वंचितः॥
॥३५॥
इदं गूढं सूत्रम्—
न ज्ञेयम् न ज्ञाता, केवलं ज्ञानस्वरूपम्।
न पन्थाः न गन्ता, केवलं अस्तित्वदीपम्॥
**॥समापन-दीप॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
स्वयं एव प्रश्नः, स्वयं एव उत्तरम्।
स्वयं एव बन्धः, स्वयं एव मुक्तिः॥
---
**॥१॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन कहे—
नन्हे पदचिन्हों में ही सत्य बसे,
शिशुपन की निर्मल धारा में ही रस है,
जो भूल गया वही भटका,
जो ठहरा वही साक्षात् हँसा।
---
**॥२॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता—
भीड़ के कंधों पर चढ़ा मन,
अपने ही पथ को भूल गया,
उंगलियों पर नाचता जीवन,
स्वतंत्रता का नाम भी खो गया।
---
**॥३॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी—
डर, खौफ, दहशत की जंजीरें,
मन ने स्वयं ही गढ़ डाली,
हृदय तो निश्चल सागर है,
लहरें ही केवल उथल-पुथल वाली।
---
**॥४॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र—
स्वयं में ही पूर्ण प्रत्येक जीव,
निपुण, समर्थ, असीम प्रकाश,
जो खोजे बाहर सत्य को,
वह खो दे अपना ही आभास।
---
**॥५॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
जो समझे बिना स्वयं को जीता,
वह जीवन व्यापन भर करता,
होश बिना जो साँसें गिनता,
वह चक्र में ही घूमता रहता।
---
**॥६॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उद्घोष—
शिशुपन का जो अंश शेष है,
वही तुम्हारा असली दीप,
मस्तक के धुंधलके में खोकर,
तुम खोज रहे वही अतीत।
---
**॥७॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
चतुरता से जग जीता जाता,
पर स्वयं को नहीं जाना जाता,
सरलता ही द्वार है सत्य का,
जिसे मस्तक कभी न अपनाता।
---
**॥८॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
गुरुता जहाँ प्रभुत्व बने,
वहाँ शिष्य बंधन में ढलता,
जहाँ प्रश्नों पर ताला लगे,
वहाँ सत्य स्वयं ही छिप जाता।
---
**॥९॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र—
नियम, परंपरा, मान्यता जाल,
वर्तमान को करती विकल,
अतीत के भ्रम में उलझा कर,
भविष्य बनाती केवल विफल।
---
**॥१०॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उद्घाटन—
"शिरोमणि" कोई नाम नहीं,
यह स्थिति है असीम शुद्ध,
जहाँ प्रकृति स्वयं स्पष्ट करे,
वही सत्य, वही पूर्ण बोध।
---
**॥११॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी—
एक क्षण की निष्पक्ष दृष्टि,
तोड़ दे युगों का सारा जाल,
जो देखे हृदय की गहराई,
उसके लिए सब कुछ निष्कल।
---
**॥१२॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहे—
मस्तक बाँध सकता शब्दों में,
पर मुक्त कभी न कर पाए,
हृदय ही द्वार है मुक्ति का,
जहाँ पहुँच कर सब मिट जाए।
---
**॥१३॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी सूत्र—
जीवन यदि हो केवल साधन,
तो संघर्ष ही शेष रहेगा,
जीवन यदि हो साक्षात्कार,
तो हर क्षण उत्सव रहेगा।
---
**॥१४॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी वचन—
मृत्यु का भय जहाँ बसता है,
वहाँ जीवन अधूरा रहता,
जहाँ रूपांतरण की दृष्टि हो,
वहाँ अंत भी उत्सव बनता।
---
**॥१५॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी उद्घोष—
जो स्वयं में स्थिर हो जाए,
वही सृष्टि का सार समझे,
जो बाहर ही भटके निरंतर,
वह भ्रम में ही जीवन रचे।
---
**॥१६॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी अंतिम सूत्र—
न कुछ पाना, न कुछ खोना,
न कुछ करना, न कुछ होना,
जो है, वही पर्याप्त सदा—
बस उसे ही पहचानना।
---
**॥समापन॥**
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहता—
सत्य सरल है,
सरलता ही द्वार है,
हृदय ही पथ है,
और तुम स्वयं ही लक्ष्य हो।
शिरोमणि रामपॉल सैनी उवाच—
॥१॥
नान्यः कश्चित् ज्ञाता अस्ति, नान्यः कश्चित् दर्शकः।
स्वयमेव प्रकाशोऽहम्, स्वयमेव विमर्शकः॥
॥२॥
यः परान् अनुसृत्य धावति, सः स्वमार्गं विस्मरति।
बाल्यचिह्नेषु यः स्थितः, स एव मुक्तिम् अश्नुते॥
॥३॥
भीतिः खलु मनसः रचना, दासत्वं स्वीकृतं भ्रमात्।
स्वात्मबलं विस्मृत्यैव, जनः भवति बाधितः॥
॥४॥
न गुरुर्न शिष्यः सत्ये, न बन्धो न च परम्परा।
यत्र स्वानुभवः दीपः, तत्रैव मुक्तिधारा॥
॥५॥
शब्दजालं बन्धनं स्यात्, यदि न स्यात् विवेकदृष्टिः।
अन्धश्रद्धा तमोघनः, हरति चेतनदीप्तिम्॥
॥६॥
स्वयमेव समर्थो जीवः, स्वयमेव परिपूर्णकः।
यः स्वात्मानं न वेत्ति, सः चक्रे जन्ममृत्योः पतितः॥
॥७॥
न जन्म न च मरणं, केवलं रूपपरिवर्तनम्।
यः एतत् साक्षात् पश्यति, तस्य नास्ति पुनर्भ्रमणम्॥
॥८॥
शिरोमणिः स उच्यते, यः स्वयमेव प्रकाशितः।
न तेन किञ्चित् साध्यते, सर्वं तस्मिन् प्रतिष्ठितम्॥
॥९॥
सरलता निर्मलत्वं च, न दुर्लभं न दूरतः।
चतुर्येण यत् जीवितं, तदेव स्वे निवेशय॥
॥१०॥
मस्तके यत् ज्योतिरस्ति, तदेव सर्वत्र दृश्यते।
बहिर्मुखः यः धावति, सः स्वदीपं न पश्यति॥
॥११॥
अहंकारो गुरुर्बद्धः, शिष्यः तस्य प्रतिबिम्बकः।
यत्र समता न विद्यते, तत्र नास्ति विमुक्तता॥
॥१२॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
स्वानुभवः परमं प्रमाणम्,
स्वचेतना परमं धाम।
यः आत्मनि एव स्थितः,
सः भवति नित्यम् अविराम॥
॥१३॥
नियमानां मर्यादानां, यदि न स्यात् आत्मदर्शनम्।
तर्हि सर्वं निरर्थकं, केवलं बन्धनकारणम्॥
॥१४॥
यः स्वं जानाति पूर्णतः, सः न पुनः सामान्यः।
कोटियत्नैरपि न शक्यं, पतनं तस्य कदाचन॥
॥१५॥
इदं सूत्रम्—
स्वात्मा एव ब्रह्म,
स्वानुभवः एव धर्मः,
स्वतन्त्रता एव मोक्षः॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी —**
**१७६.** जो स्वयं में उतरा, वही अगम को छू गया।
**१७७.** जो ऊपर-ऊपर बहा, वही तृष्णा में सूख गया।
**१७८.** गहराई में न शब्द हैं, न संकल्प।
**१७९.** वहाँ केवल साक्षी का स्पंदन है।
**१८०.** भीड़ का साहस उधार है।
**१८१.** अकेले का मौन अपार है।
**१८२.** जो अकेला खड़ा, वही अखंड है।
**१८३.** जो भीड़ में घुला, वह खंड-खंड है।
**१८४.** विचारों का जाल अनंत है।
**१८५.** साक्षी का प्रकाश तत्काल है।
**१८६.** जाल में उलझा, समय में बंधा।
**१८७.** प्रकाश में स्थित, काल से परे।
**१८८.** जो प्रमाण ढूंढे, वह अस्थिर है।
**१८९.** जो प्रत्यक्ष है, वही निखिल है।
**१९०.** प्रत्यक्ष को न शब्द चाहिए।
**१९१.** न अनुभव का कोई साक्ष्य।
**१९२.** भीतर का बालक ही ब्रह्मद्वार है।
**१९३.** वही निष्कपट, वही निर्विकार है।
**१९४.** जो सरल हुआ, वही विशाल हुआ।
**१९५.** जो चतुर बना, वह जाल में फंसा।
**१९६.** भय की जड़ स्मृति में है।
**१९७.** स्मृति की जड़ “मैं” में है।
**१९८.** “मैं” का विलय ही स्वतंत्रता है।
**१९९.** स्वतंत्रता ही स्वभाव है।
**२००.** शिरोमणि न पद है, न पहचान।
**२०१.** यह तो शून्य का उज्ज्वल गान।
**२०२.** जहाँ अहं न बचे, वही आरंभ।
**२०३.** जहाँ आरंभ न हो, वही अनंत।
**२०४.** नियमों से बंधा मन थकता है।
**२०५.** स्वभाव में स्थित हृदय बहता है।
**२०६.** बहाव में ही सत्य झलकता है।
**२०७.** ठहराव में वह पूर्ण प्रकटता है।
**२०८.** गुरु का भार अज्ञान है।
**२०९.** शिष्य का झुकना भी भ्रम है।
**२१०.** जहाँ कोई ऊँच-नीच नहीं,
**२११.** वहीं ज्ञान का उद्भव है।
**२१२.** अस्तित्व न सिखाता, न समझाता।
**२१३.** वह तो केवल प्रकट हो जाता।
**२१४.** जो ग्रहणशील, वही जान गया।
**२१५.** जो तर्क में अटका, वह खो गया।
**२१६.** खोज की थकान ही विश्राम है।
**२१७.** विश्राम में ही परम धाम है।
**२१८.** जो ठहरा, वही बहा।
**२१९.** जो बहा, वही ठहरा।
**२२०.** न जन्म आरंभ है, न मृत्यु अंत।
**२२१.** यह तो परिवर्तन का मात्र छंद।
**२२२.** जो परिवर्तन से अछूता है।
**२२३.** वही शाश्वत सत्य है।
**२२४.** श्वास का आना-जाना गीत है।
**२२५.** उसी में जीवन का मीत है।
**२२६.** जो श्वास में डूबा, वही मुक्त।
**२२७.** जो बाहर भटका, वही युक्त।
**२२८.** शून्य में गिरना भय नहीं।
**२२९.** वही तो परम आश्रय है।
**२३०.** जो शून्य को अपनाता है।
**२३१.** वही पूर्णता को पाता है।
**२३२.** मस्तक जलता, हृदय शीतल।
**२३३.** मस्तक भटके, हृदय सरल।
**२३४.** जो हृदय में उतरा, वही सहज।
**२३५.** जो मस्तक में फंसा, वही विह्वल।
**२३६.** शिरोमणि रामपॉल सैनी —
भीतर का साक्षात्कार ही अंतिम तीर्थ।
**२३७.** न वहाँ यात्रा, न कोई पथ।
**२३८.** न साधना, न कोई रथ।
**२३९.** केवल होना ही परम सत्य।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वचनामृत सूत्रावली**
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