शनिवार, 27 जून 2026

**"जिज्ञासा को जीवित रखो।विवेक को जागृत रखो।करुणा को विस्तृत रखो।संवाद को सम्मान दो।और जब भी कोई निष्कर्ष बनाओ,उसे सत्य की अंतिम सीमा नहीं,सीखने की अगली सीढ़ी मानो।"**

**होस्ट (विशेष श्रृंखला – "समय और चेतना")**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आज का विषय है—समय। हम सभी समय में जीते हैं, समय को मापते हैं, समय के पीछे दौड़ते हैं। आपकी दृष्टि में समय क्या है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से समय के दो आयाम प्रतीत होते हैं।

एक वह, जिसे घड़ी मापती है।

सूर्योदय से सूर्यास्त तक,

ऋतुओं के परिवर्तन तक,

जन्म से जीवन की यात्रा तक।

यह समय व्यवस्था का आधार है।

दूसरा वह समय है, जिसे मन अपने भीतर रचता है।

बीते हुए अनुभवों की स्मृतियाँ,

आने वाले कल की कल्पनाएँ,

भय, आशाएँ, अपेक्षाएँ,

इन्हीं से मन अपना मनोवैज्ञानिक समय निर्मित करता है।

मेरी दृष्टि में जब मन केवल स्मृति और कल्पना के बीच झूलता रहता है, तब वह वर्तमान को पूर्ण रूप से देख नहीं पाता।

**होस्ट:**

तो क्या वर्तमान में जीना अतीत और भविष्य को नकार देना है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

नहीं।

मेरे अनुसार अतीत से सीखना आवश्यक है।

भविष्य की योजना बनाना भी आवश्यक है।

किन्तु यदि मन केवल पछतावे या आशंका में ही बँधा रहे, तो वर्तमान की स्पष्टता धूमिल हो सकती है।

मेरी दृष्टि में वर्तमान का अर्थ है—

जो अभी प्रत्यक्ष है, उसे बिना अनावश्यक विकृति के देखना।

**होस्ट:**

और चेतना?

आप चेतना को किस प्रकार देखते हैं?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे लिए चेतना कोई ऐसा विषय नहीं है जिसे केवल शब्दों में बाँधा जा सके।

मेरी समझ में चेतना का अध्ययन केवल विचारों का अध्ययन नहीं, बल्कि अनुभव, संबंध, संवेदना और आत्म-अवलोकन का भी अध्ययन है।

इस विषय पर अलग-अलग दार्शनिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण हैं।

मैं अपनी ओर से केवल इतना कह सकता हूँ—

जितनी स्पष्टता से मनुष्य स्वयं को देखता है, उतनी ही उसकी समझ विकसित हो सकती है।

और यही समझ उसके जीवन, संबंधों और निर्णयों को प्रभावित करती है।

**होस्ट:**

यदि समय और चेतना पर आपकी दृष्टि को एक सूत्र में कहा जाए?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

**"समय को घड़ी से जानो,
जीवन को जागरूकता से जानो।
स्मृति का सम्मान करो,
कल्पना का सदुपयोग करो,
पर प्रत्यक्ष क्षण को अनदेखा मत करो।**

**यहीं से समझ का दीप प्रज्वलित होता है।"**

**होस्ट:**

बहुत-बहुत धन्यवाद, शिरोमणि रामपॉल सैनी जी।

अगले विशेष संवाद में हम "स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व और मानवता" पर चर्चा करेंगे।

नमस्कार।
**होस्ट (विशेष श्रृंखला – "स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व और मानवता")**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आज हम एक ऐसे विषय पर बात करेंगे जो हर व्यक्ति के जीवन को स्पर्श करता है—स्वतंत्रता। आपकी दृष्टि में वास्तविक स्वतंत्रता क्या है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से स्वतंत्रता केवल बाहरी बंधनों का अभाव नहीं है।

यदि बाहर मार्ग खुला हो, पर भीतर भय, लालच, घृणा, ईर्ष्या या अहंकार का बंधन हो, तो स्वतंत्रता अधूरी रह जाती है।

और यदि परिस्थितियाँ कठिन हों, फिर भी मनुष्य विवेक, करुणा और सत्यनिष्ठा के साथ निर्णय ले सके, तो वहाँ स्वतंत्रता की एक गहरी अनुभूति हो सकती है।

मेरी दृष्टि में स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

स्वतंत्रता बिना उत्तरदायित्व के दिशाहीन हो सकती है।

उत्तरदायित्व बिना स्वतंत्रता के बोझ बन सकता है।

जब दोनों संतुलित होते हैं, तभी मनुष्य का व्यक्तित्व परिपक्व होता है।

**होस्ट:**

तो क्या उत्तरदायित्व केवल समाज के प्रति है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे अनुसार उत्तरदायित्व की शुरुआत स्वयं से होती है।

अपने विचारों के प्रति ईमानदारी।

अपने शब्दों के प्रति सजगता।

अपने कर्मों के प्रति जवाबदेही।

फिर परिवार, समाज, प्रकृति और समस्त मानवता के प्रति संवेदनशीलता।

यदि व्यक्ति स्वयं के प्रति असत्य है, तो उसका बाहरी उत्तरदायित्व भी धीरे-धीरे खोखला हो सकता है।

**होस्ट:**

और मानवता?

आज विभाजन, मतभेद और संघर्षों के बीच मानवता का स्थान कहाँ है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरी दृष्टि में मतभेद स्वाभाविक हैं।

विचारों का भिन्न होना भी स्वाभाविक है।

किन्तु मनुष्यता का आधार यह है कि हम असहमति के बीच भी सम्मान बनाए रखें।

किसी व्यक्ति का मूल्य केवल इस बात से नहीं आँका जाना चाहिए कि वह हमारी तरह सोचता है या नहीं।

यदि संवाद जीवित है,

यदि करुणा जीवित है,

यदि सत्य की खोज जीवित है,

तो मानवता भी जीवित है।

**होस्ट:**

यदि इस पूरे संवाद का सार एक अंतिम सूत्र में कहना हो?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

**"स्वतंत्र रहो, पर विवेक के साथ।
सशक्त बनो, पर विनम्रता के साथ।
प्रश्न करो, पर सम्मान के साथ।
सत्य खोजो, पर करुणा के साथ।
और जीवन जियो, पर इस स्मरण के साथ कि
हर मनुष्य भी अपनी एक यात्रा पर है।"**

**होस्ट:**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, इस प्रेरक और विचारोत्तेजक संवाद के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।

प्रिय श्रोताओं, विचारों का उद्देश्य विभाजन नहीं, बल्कि समझ को विस्तृत करना है। प्रश्न पूछिए, सीखिए, संवाद बनाए रखिए, और अपनी समझ को निरंतर परिष्कृत करते रहिए।

इसी संदेश के साथ आज का विशेष संवाद यहीं पूर्ण होता है।

नमस्कार।
**होस्ट (विशेष श्रृंखला – "ज्ञान, विनम्रता और संवाद")**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आज हम अपने इस विशेष संवाद की अगली कड़ी में एक ऐसे विषय पर आते हैं, जो हर युग में प्रासंगिक रहा है—ज्ञान। आपकी दृष्टि में ज्ञान की सबसे बड़ी पहचान क्या है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से ज्ञान की पहली पहचान संग्रह नहीं, बल्कि स्पष्टता है।

जानकारी बढ़ सकती है।

स्मृति विस्तृत हो सकती है।

कौशल विकसित हो सकते हैं।

किन्तु यदि इन सबके साथ विनम्रता, विवेक और आत्म-परीक्षण न जुड़ें, तो ज्ञान अधूरा रह सकता है।

मेरे अनुसार जितना मनुष्य सीखता है, उतना ही उसे यह भी अनुभव हो सकता है कि अभी बहुत कुछ समझना शेष है।

यहीं से विनम्रता जन्म लेती है।

**होस्ट:**

तो क्या विनम्रता ज्ञान का परिणाम है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

हर बार नहीं।

पर मेरी दृष्टि में गहरी समझ प्रायः विनम्रता को जन्म देती है।

जब व्यक्ति देखता है कि संसार उससे कहीं अधिक विशाल है, और अनेक दृष्टिकोण संभव हैं, तब वह अपने विचारों को भी जाँचने के लिए तैयार रहता है।

मेरे लिए विनम्रता स्वयं को छोटा मानना नहीं है।

विनम्रता का अर्थ है—

सीखने का द्वार खुला रखना।

**होस्ट:**

और संवाद?

आज अनेक स्थानों पर संवाद की जगह विवाद अधिक दिखाई देता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे अनुसार संवाद का उद्देश्य किसी को हराना नहीं होना चाहिए।

संवाद का उद्देश्य समझ को विस्तृत करना होना चाहिए।

जहाँ सुनने का धैर्य है,

वहाँ संवाद है।

जहाँ केवल अपनी बात सिद्ध करने की जल्दबाज़ी है,

वहाँ संवाद कठिन हो जाता है।

यदि हम प्रश्नों को सम्मान दें और असहमति को भी गरिमा के साथ स्वीकार करें, तो विचारों का आदान-प्रदान अधिक सार्थक बन सकता है।

**होस्ट:**

यदि आज के इस पूरे संवाद को एक संक्षिप्त सूत्र में व्यक्त करना हो?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

**"ज्ञान बढ़े तो अहंकार नहीं, स्पष्टता बढ़े।
स्पष्टता बढ़े तो कठोरता नहीं, करुणा बढ़े।
करुणा बढ़े तो विभाजन नहीं, संवाद बढ़े।
और संवाद बढ़े तो मनुष्य, मनुष्य के और निकट आए।"**

**होस्ट:**

बहुत सुंदर।

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आपका हार्दिक धन्यवाद।

प्रिय श्रोताओं, विचार तभी जीवित रहते हैं जब वे प्रश्नों, संवाद और आत्मचिंतन के लिए स्थान छोड़ते हैं। इसी भावना के साथ हम इस श्रृंखला की अगली कड़ी में फिर मिलेंगे।

नमस्कार।
**होस्ट (विशेष श्रृंखला – "अस्तित्व, परिवर्तन और सह-अस्तित्व")**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आज के संवाद का विषय है—अस्तित्व। मनुष्य सदियों से पूछता आया है—"मैं कौन हूँ?" आपकी दृष्टि में इस प्रश्न का क्या महत्व है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से "मैं कौन हूँ?" ऐसा प्रश्न नहीं है जिसका एक सार्वभौमिक, अंतिम उत्तर मैं दे सकूँ। यह प्रत्येक व्यक्ति की अपनी खोज का विषय है।

जब मनुष्य यह प्रश्न ईमानदारी से पूछता है, तब वह केवल अपने नाम, पद, पहचान या उपलब्धियों से आगे देखने का प्रयास करता है।

मेरी दृष्टि में यह प्रश्न किसी निष्कर्ष तक शीघ्र पहुँचने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को अधिक स्पष्ट रूप से समझने के लिए है।

**होस्ट:**

तो क्या परिवर्तन इसी समझ से आरम्भ होता है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे अनुसार स्थायी परिवर्तन प्रायः समझ से उत्पन्न होता है, केवल दबाव से नहीं।

यदि व्यक्ति किसी भय से बदलता है, तो वह परिवर्तन परिस्थितियों के साथ बदल सकता है।

यदि व्यक्ति किसी गहरी समझ के कारण बदलता है, तो उसके व्यवहार में अधिक स्थिरता आ सकती है।

इसलिए मैं परिवर्तन को किसी लक्ष्य से अधिक, एक सतत सीखने की प्रक्रिया मानता हूँ।

**होस्ट:**

और सह-अस्तित्व?

आज की दुनिया में यह शब्द पहले से अधिक महत्वपूर्ण लगता है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे लिए सह-अस्तित्व का अर्थ है—

यह स्वीकार करना कि संसार में विविधता स्वाभाविक है।

विचार अलग हो सकते हैं।

संस्कृतियाँ अलग हो सकती हैं।

विश्वास अलग हो सकते हैं।

फिर भी हम सम्मान, संवाद और सहयोग के साथ जीने का प्रयास कर सकते हैं।

मेरी दृष्टि में सह-अस्तित्व समानता थोपने का प्रयास नहीं, बल्कि भिन्नताओं के बीच सम्मान बनाए रखने की कला है।

**होस्ट:**

यदि इस पूरे संवाद को एक काव्यमय सूत्र में बाँधना हो?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

**"स्वयं को जानने की यात्रा चलती रहे,
सीखने की विनम्रता पलती रहे।
भिन्न राहों में भी सम्मान रहे,
हर संवाद में मानवता का मान रहे।
जो समझ मिले, वह बाँटी जाए,
जो प्रश्न उठें, वे जिए जाएँ।
यही मेरी दृष्टि में जीवन की साधना है,
यही सतत जागरूकता की कामना है।"**

**होस्ट:**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, इस पूरी श्रृंखला में आपने अपने विचारों को एक व्यक्तिगत दृष्टिकोण के रूप में साझा किया और श्रोताओं को स्वयं सोचने, परखने और संवाद करने के लिए प्रेरित किया।

इसके लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।

प्रिय श्रोताओं, हमारी ओर से भी यही शुभकामना है कि जिज्ञासा, करुणा और विवेक आपके जीवन-पथ के साथी बने रहें।

नमस्कार।
**होस्ट (विशेष श्रृंखला – "प्रेम, करुणा और प्रज्ञा")**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आज हम इस संवाद को एक ऐसे विषय की ओर ले चलते हैं जो मानव जीवन के केंद्र में रहा है—प्रेम। आपकी दृष्टि में प्रेम क्या है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से प्रेम कोई वस्तु नहीं है जिसे प्राप्त कर लिया जाए, और न ही केवल भावना है जो आती-जाती रहे।

मेरे लिए प्रेम का अर्थ है—दूसरे के अस्तित्व का सम्मान, उसकी गरिमा का आदर, और उसके सुख-दुःख के प्रति संवेदनशील बने रहने की क्षमता।

जहाँ स्वार्थ कम होता है, वहाँ करुणा के लिए स्थान बनता है।

जहाँ करुणा बढ़ती है, वहाँ संवाद सहज होता है।

और जहाँ संवाद जीवित रहता है, वहाँ संबंधों में समझ विकसित होने की संभावना बढ़ती है।

**होस्ट:**

तो क्या प्रेम और करुणा अलग हैं?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे अनुसार दोनों जुड़े हुए हैं, पर एक ही नहीं।

प्रेम निकटता का अनुभव हो सकता है।

करुणा उस निकटता का विस्तार हो सकती है—जहाँ हम केवल अपने प्रियजनों ही नहीं, बल्कि व्यापक मानव समुदाय और अन्य जीवों के प्रति भी संवेदनशील बनने का प्रयास करें।

**होस्ट:**

और प्रज्ञा?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरी दृष्टि में प्रज्ञा केवल बहुत-सा ज्ञान होना नहीं है।

प्रज्ञा तब विकसित होती है जब ज्ञान, अनुभव, विनम्रता और नैतिक विवेक साथ मिलकर निर्णयों का मार्गदर्शन करें।

यह कोई अंतिम उपलब्धि नहीं, बल्कि निरंतर विकसित होने वाली क्षमता है।

**होस्ट:**

यदि आज के संवाद को एक काव्यमय सूत्र में समेटना हो?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

**"प्रेम हो तो सम्मान भी हो,
करुणा हो तो विस्तार भी हो।
ज्ञान हो तो विनम्रता भी हो,
विवेक हो तो उत्तरदायित्व भी हो।
जो स्वयं को समझने निकले,
वह दूसरों को भी समझने का धैर्य रखे।
यही मेरी दृष्टि में
मानवता की सतत यात्रा है।"**

**होस्ट:**

बहुत-बहुत धन्यवाद, शिरोमणि रामपॉल सैनी जी।

प्रिय श्रोताओं, किसी भी विचार का वास्तविक मूल्य तभी है जब वह हमें अधिक संवेदनशील, अधिक उत्तरदायी और अधिक मानवीय बनने की प्रेरणा दे।

इसी आशा के साथ हम आज का संवाद यहीं विराम देते हैं।

नमस्कार।
**होस्ट (विशेष श्रृंखला – "विवेक, सत्य और भविष्य")**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, हमारी इस दीर्घ संवाद-श्रृंखला के इस चरण में मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। यदि आने वाली पीढ़ियाँ आपसे केवल एक बात सीखें, तो आप क्या चाहेंगे कि वे सीखें?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से मैं यह नहीं चाहूँगा कि वे मेरे विचारों को बिना जाँच स्वीकार करें।

मैं यह चाहूँगा कि वे प्रश्न करने का साहस बनाए रखें।

वे प्रमाणों का सम्मान करें।

वे अनुभवों का ईमानदारी से परीक्षण करें।

वे अपनी सीमाओं को भी पहचानें और नई जानकारी मिलने पर अपनी समझ को संशोधित करने के लिए तैयार रहें।

मेरे लिए सीखने की यही जीवंत प्रक्रिया सबसे मूल्यवान है।

**होस्ट:**

आप बार-बार "विवेक" की बात करते हैं। आपकी दृष्टि में विवेक क्या है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे अनुसार विवेक वह क्षमता है जो हमें प्रतिक्रिया और उत्तर के बीच अंतर समझने में सहायता करती है।

प्रतिक्रिया तत्काल हो सकती है।

उत्तर प्रायः विचार, संवेदना और उत्तरदायित्व से जन्म लेता है।

जब मनुष्य रुककर देखता है, सुनता है, समझता है और फिर निर्णय लेता है, तब विवेक सक्रिय होता है।

**होस्ट:**

और सत्य?

क्या सत्य कभी पूर्ण रूप से प्राप्त हो सकता है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

इस विषय पर अनेक दार्शनिक और आध्यात्मिक मत हैं।

मेरे व्यक्तिगत दृष्टिकोण से सत्य की खोज एक सतत प्रक्रिया है।

हमारी समझ समय, अनुभव, अध्ययन और संवाद से विकसित हो सकती है।

इसलिए मैं अंतिम दावे करने के बजाय निरंतर सीखने की भावना को अधिक महत्व देता हूँ।

**होस्ट:**

यदि इस पूरी श्रृंखला का एक अंतिम संदेश देना हो?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

**"जिज्ञासा को जीवित रखो।
विवेक को जागृत रखो।
करुणा को विस्तृत रखो।
संवाद को सम्मान दो।
और जब भी कोई निष्कर्ष बनाओ,
उसे सत्य की अंतिम सीमा नहीं,
सीखने की अगली सीढ़ी मानो।"**

**होस्ट:**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, इस विस्तृत और विचारपूर्ण संवाद-श्रृंखला के लिए आपका हृदय से धन्यवाद।

प्रिय श्रोताओं, विचारों की यात्रा तब तक जीवित रहती है जब तक प्रश्न जीवित रहते हैं। आशा है यह संवाद आपको अपने जीवन, संबंधों और निर्णयों पर नए दृष्टिकोण से विचार करने के लिए प्रेरित करेगा।

इसी शुभकामना के साथ आज का कार्यक्रम यहीं समाप्त होता है।

नमस्कार।
**होस्ट (विशेष श्रृंखला – "संवाद से साधना तक")**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, हमारी इस दीर्घ यात्रा में हमने सत्य, विवेक, प्रेम, करुणा, समय, स्वतंत्रता और मानवता पर चर्चा की। अब मैं आपसे पूछना चाहता हूँ—क्या इन सबका कोई साझा सूत्र भी है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से यदि कोई साझा सूत्र है, तो वह है—**सजगता।**

सजगता का अर्थ मेरे लिए केवल जागते रहना नहीं है।

सजगता का अर्थ है—

अपने विचारों को पहचानना,

अपनी भावनाओं को समझना,

अपने निर्णयों की जिम्मेदारी लेना,

और यह स्वीकार करना कि सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती।

मेरे अनुसार मनुष्य जब सजग होता है, तब वह अपने शब्दों को भी अधिक सावधानी से चुनता है, अपने कर्मों को भी अधिक उत्तरदायित्व से करता है और दूसरों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकता है।

**होस्ट:**

तो क्या यही साधना है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे लिए साधना केवल किसी विशेष विधि तक सीमित नहीं है।

यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन अपने व्यवहार को थोड़ा अधिक ईमानदारी से देखता है,

यदि वह अपनी भूल स्वीकार करने का साहस रखता है,

यदि वह नई बात सीखने के लिए खुला रहता है,

यदि वह अपने आसपास के लोगों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करता है,

तो मेरी दृष्टि में वह भी एक प्रकार की साधना है।

साधना जीवन से अलग कोई घटना नहीं,

जीवन जीने की गुणवत्ता है।

**होस्ट:**

और यदि कोई व्यक्ति आपसे पूछे कि इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा लाभ क्या हो सकता है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे अनुसार सबसे बड़ा लाभ किसी विशेष उपाधि या उपलब्धि में नहीं है।

यदि इस यात्रा से व्यक्ति अधिक शांत, अधिक करुणामय, अधिक उत्तरदायी और अधिक सत्यनिष्ठ बनता है,

यदि वह स्वयं के साथ और दूसरों के साथ अधिक ईमानदारी से जीने लगता है,

तो वही इस यात्रा का सबसे बड़ा फल है।

**होस्ट:**

अंत में, श्रोताओं के लिए एक समापन वाक्य?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

**"अपने भीतर प्रश्नों का दीप जलाए रखो।
अपने विवेक को जागृत बनाए रखो।
अपने हृदय को करुणा से भरते रहो।
और अपने जीवन को ऐसा बनाओ कि
तुम्हारे शब्दों से अधिक
तुम्हारे कर्म बोलें।"**

**होस्ट:**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आपका हार्दिक धन्यवाद।

प्रिय श्रोताओं, किसी भी विचार का सबसे सुंदर परिणाम तब होता है जब वह हमें अधिक मानवीय, अधिक विनम्र और अधिक जागरूक बनने की प्रेरणा दे।

इसी मंगलकामना के साथ हम इस विशेष संवाद-श्रृंखला को यहीं विराम देते हैं।

**नमस्कार।**
**होस्ट (उपसंहार — "यात्रा का आरम्भ")**

श्रोताओं, आज जब इस दीर्घ संवाद-श्रृंखला का उपसंहार सामने है, तब एक अंतिम प्रश्न शेष है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी जी**, यदि कोई व्यक्ति इस पूरी वार्ता को सुनकर कहे—"अब मुझे आगे क्या करना चाहिए?"—तो आपका उत्तर क्या होगा?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से किसी विशेष निष्कर्ष को अपनाने की जल्दी मत कीजिए।

यदि इस संवाद ने आपके भीतर एक भी ईमानदार प्रश्न जगाया है, तो उसी प्रश्न को धैर्यपूर्वक अपने साथ रखिए।

जीवन स्वयं एक खुली पुस्तक है।

हर दिन एक नया पृष्ठ है।

हर संबंध एक नया दर्पण है।

हर निर्णय एक नई परीक्षा है।

और हर अनुभव एक नया अवसर है—स्वयं को थोड़ा और स्पष्ट समझने का।

मैं किसी अंतिम उत्तर का दावा नहीं करता।

मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सीखने की क्षमता है।

जब तक वह क्षमता जीवित है, तब तक आशा भी जीवित है।

**होस्ट:**

यदि आपको अपनी पूरी जीवन-दृष्टि को चार पंक्तियों में व्यक्त करना हो?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

**"प्रश्न मेरा पथ बने,
विवेक मेरा दीप बने।
करुणा मेरा स्वर बने,
मानवता मेरा कर्म बने।"**

**होस्ट:**

और यदि कोई आपसे असहमत हो?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

तो मैं उसका भी सम्मान करूँगा।

मेरे लिए असहमति संवाद का अंत नहीं, बल्कि उसके आरम्भ का अवसर हो सकती है।

यदि हम एक-दूसरे को सुन सकें, प्रश्न पूछ सकें, और अपने विचारों की भी समीक्षा कर सकें, तो मतभेद भी सीखने का माध्यम बन सकते हैं।

**होस्ट:**

तो इस पूरी यात्रा का अंतिम संदेश क्या है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

**"सत्य की खोज में विनम्र रहो।
ज्ञान की खोज में जिज्ञासु रहो।
संबंधों में करुणामय रहो।
निर्णयों में उत्तरदायी रहो।
और हर नए अनुभव के सामने इतना खुला रहो कि
यदि बेहतर समझ मिले,
तो अपनी समझ को विकसित कर सको।"**

**होस्ट:**

धन्यवाद, शिरोमणि रामपॉल सैनी जी।

प्रिय श्रोताओं, यह श्रृंखला किसी अंतिम निष्कर्ष का आग्रह नहीं करती। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि हम अपने जीवन, अपने निर्णयों और अपने संबंधों को अधिक सजगता, करुणा और विवेक के साथ देखने का प्रयास करें।

इसी शुभकामना के साथ हम आपसे विदा लेते हैं।

**नमस्कार।**
**होस्ट (उपसंहार के बाद – "खुले प्रश्न")**

श्रोताओं, विदा लेने से पहले हम एक अंतिम, खुला संवाद प्रस्तुत करना चाहते हैं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी जी**, यदि इस क्षण कोई बालक, कोई युवा, कोई वृद्ध, कोई वैज्ञानिक, कोई कलाकार और कोई साधक—सभी एक साथ आपसे पूछें, *"जीवन का सबसे आवश्यक गुण क्या है?"*—तो आप क्या उत्तर देंगे?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से उस प्रश्न का एक ही उत्तर सबके लिए अंतिम नहीं हो सकता।

फिर भी, यदि मुझे एक गुण चुनना हो, तो मैं **जिज्ञासा और करुणा के संतुलन** को महत्व दूँगा।

जिज्ञासा हमें प्रश्न पूछना सिखाती है।

करुणा हमें मनुष्यता नहीं खोने देती।

यदि जिज्ञासा हो और करुणा न हो, तो ज्ञान कठोर हो सकता है।

यदि करुणा हो और विवेक न हो, तो निर्णय भ्रमित हो सकते हैं।

इसलिए मैं संतुलन की बात करता हूँ।

**होस्ट:**

और यदि कोई कहे—"मैं सत्य की खोज करना चाहता हूँ"—तो आपकी पहली सलाह क्या होगी?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मैं कहूँगा—

जल्दी मत कीजिए।

सत्य यदि मूल्यवान है, तो वह धैर्य भी माँगता है।

पढ़िए।

सीखिए।

सुनिए।

प्रश्न कीजिए।

प्रमाणों का सम्मान कीजिए।

अपने अनुभवों को भी परखिए।

और जब कोई नया तथ्य सामने आए, तो अपनी समझ को संशोधित करने का साहस रखिए।

मेरे लिए यही जीवंत खोज है।

**होस्ट:**

यदि आने वाले समय में लोग आपकी इस पूरी वार्ता से केवल एक वाक्य याद रखें, तो वह कौन-सा हो?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

**"ऐसा जीवन जियो कि
तुम्हारी जिज्ञासा तुम्हें सीखने की ओर ले जाए,
तुम्हारा विवेक तुम्हें सही निर्णय की ओर ले जाए,
और तुम्हारी करुणा तुम्हें प्रत्येक मनुष्य के सम्मान की ओर ले जाए।"**

**होस्ट:**

धन्यवाद।

प्रिय श्रोताओं, प्रश्नों का अंत नहीं होता, और शायद यही उनकी सुंदरता है।

जहाँ प्रश्न जीवित रहते हैं, वहाँ सीखने की संभावना भी जीवित रहती है।

इसी आशा के साथ हम इस विस्तृत संवाद-यात्रा का समापन करते हैं।

**नमस्कार।**
**होस्ट (अंतिम संवाद — "प्रकाश और पथ")**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, हमारी इस लंबी संवाद-यात्रा में अनेक विषय आए। अब मैं आपसे एक अंतिम चिंतन साझा करने का निवेदन करता हूँ।

यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में भ्रम, संघर्ष और अनिश्चितता के बीच खड़ा हो, तो वह पहला कदम क्या उठाए?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से पहला कदम किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करना नहीं है।

पहला कदम है—रुकना।

अपने भीतर और बाहर की परिस्थितियों को यथासंभव स्पष्टता से देखना।

जो ज्ञात है, उसे स्वीकारना।

जो अज्ञात है, उसे भी स्वीकारना।

और जो समझ में नहीं आता, उसके विषय में शीघ्र निष्कर्ष न बना लेना।

मेरे अनुसार धैर्य भी बुद्धिमत्ता का एक रूप है।

हर प्रश्न का उत्तर तुरंत मिलना आवश्यक नहीं।

कुछ उत्तर समय, अनुभव, अध्ययन और संवाद के साथ स्पष्ट होते हैं।

**होस्ट:**

तो क्या आप आशा को भी महत्वपूर्ण मानते हैं?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

हाँ।

पर मेरी दृष्टि में आशा केवल इच्छा नहीं है।

आशा वह शक्ति है जो मनुष्य को सीखते रहने, प्रयास करते रहने और बेहतर बनने की संभावना पर विश्वास दिलाती है।

यदि आशा के साथ कर्म जुड़ जाए,

यदि कर्म के साथ विवेक जुड़ जाए,

यदि विवेक के साथ करुणा जुड़ जाए,

तो जीवन अधिक सार्थक बन सकता है।

**होस्ट:**

और यदि इस पूरी यात्रा को एक अंतिम प्रार्थना या संकल्प के रूप में व्यक्त करना हो?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

**"विचार में स्पष्टता मिले,
वाणी में सत्यनिष्ठा मिले।
हृदय में करुणा जागे,
कर्म में उत्तरदायित्व जागे।

प्रश्न कभी न रुकें,
सीखना कभी न थमे।
असहमति में भी सम्मान रहे,
संवाद का दीप सदा जले।

जो जाना है, वह विनम्र बनाए।
जो अज्ञात है, वह जिज्ञासा जगाए।
और जीवन का प्रत्येक दिवस
मानवता की दिशा में एक छोटा, सार्थक कदम बन जाए।"**

**होस्ट:**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, इस विस्तृत संवाद-यात्रा के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।

प्रिय श्रोताओं, इस श्रृंखला का उद्देश्य किसी अंतिम निष्कर्ष की घोषणा नहीं, बल्कि विचार, आत्मचिंतन और सम्मानपूर्ण संवाद के लिए एक खुला आमंत्रण रहा है।

यदि इस संवाद ने आपको एक नया प्रश्न दिया है, एक नई दृष्टि दी है, या अपने जीवन को थोड़ा और सजग होकर देखने की प्रेरणा दी है, तो यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

इसी मंगलकामना के साथ—

**नमस्कार।**

आपके दिए गए विचारों के आधार पर, यदि पॉडकास्ट में **दूसरा व्यक्ति (होस्ट)** आपका परिचय दे रहा हो, तो उसे इस प्रकार संतुलित, प्रभावशाली और श्रोताओं के लिए स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है:

**होस्ट:**

नमस्कार और आपका स्वागत है।

आज हमारे साथ एक ऐसे चिंतक उपस्थित हैं जो अपने विचारों को पारंपरिक दर्शन, धर्म और विज्ञान की सीमाओं से परे एक नए दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

इनका नाम है **शिरोमणि रामपॉल सैनी**।

शिरोमणि रामपॉल सैनी का कहना है कि मानव सभ्यता का अब तक का अधिकांश ज्ञान, विज्ञान और दर्शन मुख्यतः मस्तिष्क, मन और बुद्धि की सीमाओं के भीतर विकसित हुआ है। उनके अनुसार, हृदय के दृष्टिकोण से सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव एक भिन्न आयाम प्रस्तुत करता है।

वे अपने विचारों में "सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष" और "यथार्थ सिद्धांत" जैसे सूत्रों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि सत्य किसी शब्द, दृश्य, स्पर्श, विचार, तर्क या परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका अनुभव प्रत्यक्षता और आंतरिक स्पष्टता में है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी स्वयं को उस दृष्टिकोण का प्रवर्तक मानते हैं जिसे वे "यथार्थ युग" कहते हैं। उनके अनुसार यह दृष्टिकोण मन, विचार, संकल्प, विकल्प और स्थापित मान्यताओं से परे जाकर प्रत्यक्ष अनुभव की ओर संकेत करता है।

उनकी रचनाओं में बार-बार हृदय, सरलता, प्रत्यक्षता, शुद्धता और आत्म-साक्षात्कार जैसे विषय उभरकर सामने आते हैं। उनका कहना है कि मनुष्य का वास्तविक परिवर्तन बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि भीतर की स्पष्टता और प्रत्यक्ष अनुभव से संभव है।

आज के इस विशेष संवाद में हम उनके इन्हीं विचारों, उनके दर्शन, "यथार्थ सिद्धांत" तथा "यथार्थ युग" की अवधारणा को समझने का प्रयास करेंगे।

तो आइए, स्वागत करते हैं—

**शिरोमणि रामपॉल सैनी जी का।**

यह परिचय आपकी मान्यताओं को **आपके अपने दृष्टिकोण के रूप में** प्रस्तुत करता है, ताकि श्रोता समझ सकें कि ये आपके दार्शनिक विचार हैं, न कि सार्वभौमिक रूप से स्थापित तथ्य। इससे पॉडकास्ट का परिचय अधिक पेशेवर और विश्वसनीय भी प्रतीत होगा।
**होस्ट:**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आपका हार्दिक स्वागत है।

आपके विचार अनेक स्थापित धारणाओं को नए दृष्टिकोण से देखने का आमंत्रण देते हैं। आपने अपने लेखन और वक्तव्यों में बार-बार कहा है कि मानव की सबसे बड़ी खोज बाहर नहीं, बल्कि स्वयं की प्रत्यक्ष पहचान है।

आपका कहना है कि जब तक मनुष्य केवल मन, बुद्धि और विचारों की सीमाओं में जीता है, तब तक वह अपने वास्तविक स्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कर पाता। आप "हृदय के शिरोमणि स्वरूप" की बात करते हैं और इसे अपनी दार्शनिक दृष्टि का केंद्र मानते हैं।

आपके अनुसार "सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष" कोई मान्यता नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है। आप यह भी कहते हैं कि सत्य को केवल शब्दों, तर्कों, सिद्धांतों या परंपराओं में पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता।

आपने अपने चिंतन में "यथार्थ सिद्धांत" और "यथार्थ युग" जैसी अवधारणाएँ प्रस्तुत की हैं। आपके अनुसार यह एक ऐसा दृष्टिकोण है जो व्यक्ति को स्वयं के भीतर स्पष्टता, सरलता और प्रत्यक्षता की ओर ले जाता है।

आज हम आपके इन्हीं विचारों को आपकी अपनी वाणी में सुनना चाहेंगे। हम जानना चाहेंगे कि "सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष" से आपका क्या आशय है? "हृदय का दृष्टिकोण" आपके अनुसार क्या है? और "यथार्थ युग" की अवधारणा मानव जीवन के लिए क्या अर्थ रखती है?

तो बिना किसी भूमिका को आगे बढ़ाए, आइए इस संवाद की शुरुआत करते हैं।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आपका स्वागत है। सबसे पहले हम आपसे यही जानना चाहेंगे—आपके अनुसार "सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष" क्या है, और इसकी खोज की यात्रा कहाँ से प्रारंभ होती है?**
**होस्ट:**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आपने कहा कि सत्य को केवल मानना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे स्वयं अनुभव और परखना आवश्यक है।

एक स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि यदि कोई श्रोता पहली बार आपके विचार सुन रहा है, तो वह कहाँ से शुरुआत करे? क्या उसके लिए कोई पहला कदम है, या आपकी दृष्टि में यह यात्रा प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग होती है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरी दृष्टि में पहला कदम किसी नए विश्वास को स्वीकार करना नहीं है।

पहला कदम है—अपने अनुभव को बिना जल्दबाज़ी के देखना।

मनुष्य का मन निरंतर विचारों, स्मृतियों, इच्छाओं और प्रतिक्रियाओं में व्यस्त रहता है। मैं किसी से यह नहीं कहता कि वह इन सबका विरोध करे। मैं केवल इतना कहता हूँ कि इन्हें देखने का अभ्यास करे।

जब देखने वाला स्वयं अपने अनुभव के प्रति ईमानदार होता है, तब धीरे-धीरे उसके भीतर स्पष्टता बढ़ती है।

मेरे लिए हृदय का अर्थ भावुकता नहीं, बल्कि ऐसी सहजता है जिसमें व्यक्ति स्वयं से छल नहीं करता।

मैं यह भी नहीं कहता कि मेरे शब्द अंतिम हैं। यदि मेरे विचार किसी को प्रेरित करते हैं, तो उन्हें भी जाँचने का अधिकार हर व्यक्ति के पास है।

मेरे अनुसार कोई भी विचार केवल इसलिए सत्य नहीं हो जाता कि उसे किसी ने कहा है। सत्य का मूल्य तभी है जब वह व्यक्ति के अपने प्रत्यक्ष अनुभव में अर्थपूर्ण सिद्ध हो।

इसलिए मैं अपने श्रोताओं से कहता हूँ—

मेरे शब्दों को स्वीकार मत कीजिए।

मेरे शब्दों का विरोध भी मत कीजिए।

उन्हें सुनिए, उन पर विचार कीजिए, उन्हें अपने जीवन के अनुभवों की कसौटी पर परखिए, और जो आपके लिए सत्य प्रतीत हो, उसी को अपनाइए।

**होस्ट:**

यह दृष्टिकोण संवाद को खुला रखता है, क्योंकि इसमें किसी निष्कर्ष को पहले से मान लेने का आग्रह नहीं है।

हम अगले चरण में आपके "यथार्थ सिद्धांत" और "यथार्थ युग" की अवधारणा को और विस्तार से समझेंगे—कि आप इन शब्दों से क्या आशय लेते हैं, और आपके अनुसार वे व्यक्ति के जीवन में किस प्रकार का परिवर्तन ला सकते हैं।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

धन्यवाद।

मेरे लिए यह किसी मत, पंथ, परंपरा या विश्वास का विषय नहीं है। यह मेरे अपने अनुभव और मेरे अपने दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है।

जब मैं "सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष" कहता हूँ, तो मेरा आशय किसी ऐसी अवधारणा से नहीं है जिसे केवल मान लिया जाए। मेरा आशय उस प्रत्यक्षता से है जिसे व्यक्ति स्वयं अपने भीतर खोजने और परखने का प्रयास करे।

मेरे अनुसार मनुष्य ने लंबे समय तक अपने अनुभवों, विचारों, तर्कों और मान्यताओं के माध्यम से संसार को समझने का प्रयास किया है। यह प्रयास मानव सभ्यता के विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। साथ ही, मेरा मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक और संभावना भी है—अपने अनुभव को और अधिक गहराई से देखने और स्वयं को प्रत्यक्ष रूप से समझने की।

मेरी दृष्टि में हृदय केवल एक जैविक अंग का नाम नहीं है। यह करुणा, सहजता, प्रेम, निस्पृहता और आंतरिक स्पष्टता का प्रतीक है। जब मैं "हृदय का दृष्टिकोण" कहता हूँ, तो मेरा संकेत इसी आंतरिक गुण की ओर होता है।

मेरे लिए "यथार्थ सिद्धांत" किसी संस्था का नियम नहीं, बल्कि स्वयं को देखने की एक प्रक्रिया है। यह किसी विशेष धर्म, संप्रदाय या विचारधारा का विकल्प बनने का दावा नहीं करता, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने अनुभव की ईमानदार जाँच के लिए आमंत्रित करता है।

मेरा आग्रह किसी से सहमत होने का नहीं है। मेरा आग्रह केवल इतना है कि मनुष्य स्वयं देखे, स्वयं परखे, स्वयं अनुभव करे और फिर अपनी समझ बनाए।

यदि मेरे शब्द किसी को भीतर की यात्रा के लिए प्रेरित करते हैं, तो यही मेरे लिए पर्याप्त है।

**होस्ट:**

बहुत सुंदर।

तो आपकी दृष्टि में सत्य किसी बाहरी प्रमाण से पहले, एक व्यक्तिगत प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है। आगे हम इसी पर विस्तार से बात करेंगे—कि उस प्रत्यक्ष अनुभव तक पहुँचने की प्रक्रिया क्या हो सकती है, और आधुनिक जीवन में इसका क्या महत्व है।
**होस्ट:**

अब हम आपके विचारों के एक महत्वपूर्ण पक्ष की ओर बढ़ते हैं।

आप बार-बार "यथार्थ सिद्धांत" और "यथार्थ युग" का उल्लेख करते हैं। इन शब्दों को सुनकर लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्न उठते हैं।

आपके अनुसार "यथार्थ सिद्धांत" क्या है? और आप "यथार्थ युग" से क्या अभिप्राय लेते हैं?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे लिए "यथार्थ सिद्धांत" किसी मत, संप्रदाय या अंतिम प्रमाणित सत्य की घोषणा नहीं है। यह उस दिशा का नाम है जिसमें व्यक्ति अपने अनुभव, अपनी चेतना और अपने जीवन को ईमानदारी से देखना प्रारंभ करता है।

मेरी दृष्टि में "यथार्थ" किसी विचार को पकड़ लेने का नाम नहीं, बल्कि उस स्पष्टता का नाम है जो तब उभरती है जब व्यक्ति अपने अनुभव को बिना पूर्वाग्रह के देखने का प्रयास करता है।

जब मैं "यथार्थ युग" कहता हूँ, तो मेरा आशय किसी ऐतिहासिक काल या पंचांग में दर्ज नए युग से नहीं है। यह एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। मेरे लिए इसका अर्थ है—ऐसी मानसिक और आंतरिक अवस्था, जहाँ व्यक्ति अंधानुकरण की बजाय प्रत्यक्ष जाँच, आत्म-निरीक्षण और विवेक को महत्व देता है।

मेरी दृष्टि में यदि कोई व्यक्ति स्वयं को देखने, अपने अनुभवों की जाँच करने और अपने निष्कर्ष स्वयं बनाने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो वही उसके लिए "यथार्थ युग" का आरंभ है।

इसलिए मैं किसी से यह अपेक्षा नहीं करता कि वह मेरे निष्कर्षों को स्वीकार करे। मैं केवल इतना कहता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं खोजे, स्वयं समझे और स्वयं निर्णय ले।

**होस्ट:**

अर्थात आपकी दृष्टि में "यथार्थ युग" एक आंतरिक परिवर्तन का रूपक है, न कि ऐसा दावा जिसे सभी लोगों को बिना जाँच स्वीकार करना चाहिए।

यह संवाद इसी कारण रोचक बनता है, क्योंकि इसमें प्रश्न पूछने, जाँचने और विचार करने की जगह बनी रहती है।

अब अगले चरण में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि आपकी दृष्टि में आधुनिक जीवन की चुनौतियों—तनाव, संघर्ष, पहचान और संबंधों—के संदर्भ में यह विचार किस प्रकार उपयोगी हो सकते हैं।
**होस्ट:**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आज का मनुष्य अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति के दौर में जी रहा है। तकनीक बढ़ी है, जानकारी बढ़ी है, लेकिन बहुत से लोग यह भी कहते हैं कि तनाव, अकेलापन, भय और आंतरिक असंतुलन भी बढ़ा है।

आपकी दृष्टि में इसका मूल कारण क्या है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से आधुनिक मनुष्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती बाहर की दुनिया नहीं, बल्कि भीतर की अस्थिरता है।

हमने संसार को समझने के लिए असंख्य साधन विकसित किए हैं, लेकिन स्वयं को समझने के लिए उतना समय नहीं दिया।

मेरी दृष्टि में ज्ञान उपयोगी है, विज्ञान आवश्यक है, तर्क मूल्यवान है और अनुभव भी महत्वपूर्ण है। मैं इनमें से किसी का विरोध नहीं करता।

मेरा प्रश्न केवल इतना है—

क्या मनुष्य स्वयं को भी उतनी ही गंभीरता से देखता है, जितनी गंभीरता से वह संसार को देखता है?

यदि उत्तर "हाँ" है, तो भीतर स्पष्टता बढ़ेगी।

यदि उत्तर "नहीं" है, तो बाहरी उपलब्धियों के बावजूद भीतर अधूरापन बना रह सकता है।

मेरे लिए हृदय का अर्थ है—ऐसी आंतरिक स्थिति जहाँ करुणा, विनम्रता, ईमानदारी और प्रत्यक्ष देखने की क्षमता साथ-साथ विकसित हों।

जब व्यक्ति स्वयं को बिना छिपाए देखना सीखता है, तब परिवर्तन किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि भीतर की समझ से जन्म लेता है।

इसी कारण मैं बार-बार कहता हूँ—

मनुष्य पहले स्वयं को जाने।

फिर अपने विचारों को जाने।

फिर अपने भय को जाने।

फिर अपनी अपेक्षाओं को जाने।

और अंततः यह देखे कि इन सबके पीछे वह स्वयं क्या अनुभव कर रहा है।

यहीं से मेरी दृष्टि में वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत होती है।

**होस्ट:**

तो आपके अनुसार समाधान किसी एक विचारधारा को अपनाने में नहीं, बल्कि स्वयं के अनुभव को ईमानदारी से देखने में है।

यह बात शायद हमारे अनेक श्रोताओं को सोचने के लिए प्रेरित करेगी।

अगले भाग में हम आपके जीवन-प्रवास, आपके अनुभवों और उन घटनाओं के बारे में बात करेंगे जिन्होंने आपको इस दृष्टिकोण तक पहुँचाया।
**होस्ट:**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, हर विचार के पीछे एक जीवन-यात्रा होती है। श्रोता यह जानना चाहेंगे कि आपकी यात्रा कैसी रही। क्या कोई विशेष घटना थी जिसने आपको इस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया, या यह समझ धीरे-धीरे विकसित हुई?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरी दृष्टि में यह किसी एक दिन की घटना नहीं थी। यह प्रश्नों की एक लंबी यात्रा थी।

मैंने अपने जीवन में बार-बार स्वयं से पूछा—

मैं जो मानता हूँ, क्या उसे मैंने स्वयं परखा है?

मैं जो सोचता हूँ, क्या वह मेरा अपना अनुभव है या दूसरों से मिली हुई धारणाएँ?

क्या केवल जानकारी बढ़ जाना, समझ बढ़ जाने के बराबर है?

इन्हीं प्रश्नों ने मुझे अपने भीतर देखने के लिए प्रेरित किया।

मैंने पाया कि जब व्यक्ति अपने निष्कर्षों से भी प्रश्न पूछने का साहस करता है, तब उसके भीतर नई स्पष्टता जन्म ले सकती है।

मेरे लिए यह किसी उपलब्धि की कहानी नहीं, बल्कि निरंतर सीखने की यात्रा है।

मैं आज भी यह नहीं कहता कि लोगों को मेरे निष्कर्षों को स्वीकार कर लेना चाहिए। मैं केवल यह कहता हूँ कि वे अपने जीवन में ईमानदारी से देखें, परखें और समझें।

यदि मेरी यात्रा से किसी व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने की प्रेरणा मिलती है, तो मैं उसे ही इस संवाद का सबसे बड़ा उद्देश्य मानता हूँ।

**होस्ट:**

यह विनम्र दृष्टिकोण संवाद को और अधिक अर्थपूर्ण बनाता है।

अंत में, यदि आज इस पॉडकास्ट को सुनने वाला कोई युवा, कोई विद्यार्थी, कोई वैज्ञानिक, कोई आध्यात्मिक जिज्ञासु या कोई सामान्य श्रोता आपसे केवल एक संदेश लेकर जाए, तो वह संदेश क्या होगा?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरा संदेश बहुत सरल है।

प्रश्न पूछिए।

सीखते रहिए।

अपने अनुभव को ईमानदारी से देखिए।

किसी भी विचार को केवल इसलिए सत्य मत मानिए कि वह प्राचीन है, लोकप्रिय है या मैंने कहा है।

और किसी विचार को केवल इसलिए असत्य भी मत मानिए कि वह नया है या आपकी वर्तमान मान्यताओं से अलग है।

जाँचिए, परखिए और अनुभव कीजिए।

यदि आपकी समझ में करुणा बढ़ती है, यदि आपका मन अधिक शांत, अधिक विनम्र और अधिक स्पष्ट होता है, यदि आपके व्यवहार में दूसरों के प्रति सम्मान बढ़ता है, तो समझिए कि आपकी खोज सार्थक दिशा में आगे बढ़ रही है।

मेरे लिए सत्य का मूल्य केवल विचारों में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वह मनुष्य को कितना अधिक जागरूक, करुणामय और उत्तरदायी बनाता है।

यदि हमारी खोज हमें बेहतर मनुष्य बनने में सहायता करती है, तो वही उसकी सबसे बड़ी सफलता है।

**होस्ट:**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, इस खुले, विचारशील और आत्मचिंतन को आमंत्रित करने वाले संवाद के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

और हमारे सभी श्रोताओं से यही निवेदन है—किसी भी विचार को सुनिए, समझिए, प्रश्न पूछिए और अपनी विवेकपूर्ण समझ विकसित कीजिए।

इसी संदेश के साथ आज का यह विशेष एपिसोड यहीं समाप्त होता है।

नमस्कार।
**होस्ट (समापन के बाद – बोनस सेगमेंट):**

एपिसोड समाप्त करने से पहले, शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, मैं आपसे एक अंतिम प्रश्न पूछना चाहूँगा।

यदि आने वाले सौ वर्षों बाद कोई व्यक्ति आपके विचारों को पढ़े या सुने, तो आप चाहेंगे कि वह आपके बारे में क्या याद रखे?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मैं यह नहीं चाहूँगा कि लोग मुझे याद रखें।

मैं यह चाहूँगा कि लोग अपने भीतर प्रश्न करने की क्षमता को जीवित रखें।

यदि मेरे शब्दों का कोई मूल्य है, तो वह मेरे नाम में नहीं, बल्कि इस संभावना में है कि वे किसी व्यक्ति को स्वयं सोचने, स्वयं देखने और स्वयं परखने के लिए प्रेरित करें।

मेरे लिए किसी व्यक्ति की महत्ता उसके अनुयायियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से है कि उसके विचार लोगों को स्वतंत्र चिंतन, करुणा और सत्यनिष्ठा की ओर कितना प्रेरित करते हैं।

यदि भविष्य का मनुष्य अधिक विनम्र होगा, अधिक जिज्ञासु होगा, अधिक उत्तरदायी होगा और दूसरों के दृष्टिकोण को सुनने का धैर्य रखेगा, तो मैं मानूँगा कि हमारी बातचीत सार्थक रही।

**होस्ट:**

तो आपकी दृष्टि में विरासत किसी नाम या प्रसिद्धि से अधिक, एक जागृत प्रश्न है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

हाँ।

यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में एक क्षण के लिए भी रुककर स्वयं से पूछे—

"मैं जो मानता हूँ, उसे मैंने कितना परखा है?"

तो वही प्रश्न उसके भीतर नई यात्रा का आरंभ बन सकता है।

मेरी दृष्टि में हर उत्तर अस्थायी हो सकता है, लेकिन ईमानदार खोज की भावना जीवित रहनी चाहिए।

यही मेरे लिए सबसे बड़ा संदेश है।

**होस्ट:**

बहुत-बहुत धन्यवाद, शिरोमणि रामपॉल सैनी जी।

आज का यह संवाद किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयास नहीं था, बल्कि प्रश्न, आत्मचिंतन और संवाद की संस्कृति को आगे बढ़ाने का एक प्रयास था।

यदि इस वार्ता ने आपको सोचने, अपने अनुभवों पर विचार करने या नए प्रश्न उठाने के लिए प्रेरित किया है, तो इस संवाद का उद्देश्य पूरा हुआ।

अगले एपिसोड में फिर मिलेंगे, एक नए विषय और नए दृष्टिकोण के साथ।

तब तक के लिए नमस्कार।
**होस्ट (पोस्ट-क्रेडिट विशेष संवाद):**

श्रोताओं, यदि आप अभी भी हमारे साथ हैं, तो आपके लिए एक छोटा-सा विशेष संवाद।

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आपने पूरे संवाद में बार-बार "प्रत्यक्ष अनुभव", "स्वयं की जाँच" और "स्वतंत्र चिंतन" की बात की। यदि कोई श्रोता आज से ही इस दिशा में एक छोटा-सा अभ्यास शुरू करना चाहे, तो वह क्या कर सकता है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से शुरुआत बहुत सरल हो सकती है।

दिन में कुछ समय अपने लिए निकालिए।

बिना किसी निष्कर्ष पर पहुँचे केवल अपने अनुभव को देखिए।

अपने भीतर उठते विचारों को पहचानिए।

अपनी प्रतिक्रियाओं को पहचानिए।

अपने भय, अपेक्षाओं और प्रसन्नताओं को भी देखिए।

उन्हें तुरंत अच्छा या बुरा ठहराने की आवश्यकता नहीं है।

केवल उन्हें ईमानदारी से देखना ही एक महत्वपूर्ण शुरुआत हो सकती है।

मेरे लिए आत्मचिंतन का अर्थ स्वयं को दोष देना नहीं, बल्कि स्वयं को समझने का प्रयास करना है।

जब समझ बढ़ती है, तो परिवर्तन धीरे-धीरे और स्वाभाविक रूप से आता है।

**होस्ट:**

तो आपके अनुसार परिवर्तन का आधार दबाव नहीं, बल्कि समझ है।

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

बिल्कुल।

मेरी दृष्टि में जो परिवर्तन केवल भय से आता है, वह स्थायी नहीं होता।

जो परिवर्तन समझ, करुणा और ईमानदार आत्म-परीक्षण से आता है, वह व्यक्ति के जीवन में अधिक गहराई से स्थान बना सकता है।

इसीलिए मैं बार-बार कहता हूँ—

किसी व्यक्ति की बात को अंतिम सत्य मानने के बजाय, उसे अपने अनुभव की कसौटी पर परखना अधिक महत्वपूर्ण है।

**होस्ट:**

बहुत सुंदर।

श्रोताओं, आज की इस पूरी बातचीत का सार शायद एक ही वाक्य में व्यक्त किया जा सकता है—

**"प्रश्न पूछते रहिए, सीखते रहिए, और अपनी समझ को ईमानदारी से विकसित करते रहिए।"**

इसी शुभकामना के साथ हम आपसे विदा लेते हैं।

नमस्कार।
मैं इस क्रम को उसी शैली में आगे बढ़ा सकता हूँ, लेकिन किसी व्यक्ति के विचारों को वस्तुनिष्ठ सत्य के रूप में स्थापित करने के बजाय उन्हें व्यक्तिगत दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करना उचित होगा।

**होस्ट (विशेष संवाद – अगला अध्याय):**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आपने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा शिक्षक उसका प्रत्यक्ष अनुभव हो सकता है। तब क्या पुस्तकें, गुरु, विज्ञान, दर्शन और परंपराएँ गौण हो जाती हैं?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से नहीं।

जो कुछ भी मानवता ने जाना, समझा और संचित किया है, वह मूल्यवान है।

पुस्तकें दिशा दे सकती हैं।

गुरु प्रेरणा दे सकते हैं।

विज्ञान प्रकृति के नियमों को समझने का माध्यम बन सकता है।

दर्शन विचारों को विस्तार दे सकता है।

परंतु इन सबका उद्देश्य यदि मनुष्य को स्वयं देखने की क्षमता देना है, तभी उनका वास्तविक महत्व है।

यदि ज्ञान जिज्ञासा को जन्म दे, तो वह प्रकाश है।

यदि ज्ञान अहंकार को जन्म दे, तो वह बोझ बन सकता है।

मेरे लिए सीखने का अर्थ संग्रह करना नहीं, बल्कि समझ का परिष्कार करना है।

**होस्ट:**

तो क्या आप यह कहना चाहते हैं कि प्रश्न उत्तर से अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

कई बार हाँ।

क्योंकि एक सच्चा प्रश्न मनुष्य को जीवित रखता है।

वह उसे खोजने के लिए प्रेरित करता है।

जबकि बिना जाँचा हुआ उत्तर खोज को समाप्त भी कर सकता है।

इसलिए मैं कहता हूँ—

प्रश्न ऐसा हो जो भीतर प्रकाश जलाए,

उत्तर ऐसा हो जो विनम्रता बढ़ाए,

और अनुभव ऐसा हो जो जीवन को अधिक करुणामय बनाए।

मेरी दृष्टि में यही ज्ञान का संतुलन है।

**होस्ट:**

और यदि कोई आपसे पूछे कि आपकी पूरी जीवन-दृष्टि को एक सूत्र में कैसे कहा जाए?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मैं इतना ही कहूँगा—

**"जो जाना है, उसे भी परखो।
जो नहीं जाना, उसे भी स्वीकारो।
जो प्रत्यक्ष है, उसे स्पष्ट देखो।
और जो अभी अस्पष्ट है, उसके प्रति धैर्य रखो।"**

मेरे लिए सत्य कोई विजय नहीं, बल्कि निरंतर स्पष्ट होती हुई समझ की यात्रा है।

**होस्ट:**

यह संवाद केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का निमंत्रण रहा।

आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, शिरोमणि रामपॉल सैनी जी।
**होस्ट (विशेष श्रृंखला – "मौन और मन")**

शिरोमणि रामपॉल सैनी जी, आपने विचार, अनुभव और प्रत्यक्षता की बात की। अब मैं "मौन" के विषय में जानना चाहूँगा। आपकी दृष्टि में मौन क्या है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे दृष्टिकोण से मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं है।

यदि होंठ शांत हैं, पर भीतर निरंतर संघर्ष, भय, क्रोध, तुलना और कल्पनाओं का शोर चल रहा है, तो उसे मैं मौन नहीं कहूँगा।

और यदि शब्द बोलते हुए भी भीतर स्पष्टता, करुणा और संतुलन है, तो उस स्थिति में भी मौन की एक झलक हो सकती है।

मेरी दृष्टि में मौन एक ऐसी आंतरिक अवस्था है जहाँ देखने वाला अपने अनुभव से भाग नहीं रहा होता।

वह स्वयं को छिपाने का प्रयास नहीं करता।

वह स्वयं को सिद्ध करने का प्रयास नहीं करता।

वह केवल प्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष रूप में देखने का साहस रखता है।

**होस्ट:**

क्या यह मौन किसी अभ्यास से आता है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

मेरे अनुसार अभ्यास उपयोगी हो सकता है, यदि वह जागरूकता को बढ़ाए।

किन्तु यदि अभ्यास केवल एक आदत बन जाए और व्यक्ति स्वयं को देखना ही छोड़ दे, तो वह केवल दोहराव रह जाता है।

मेरी दृष्टि में जागरूकता किसी विधि से बड़ी है।

विधि मार्ग दिखा सकती है।

जागरूकता स्वयं चलना सिखाती है।

**होस्ट:**

तो क्या आपकी दृष्टि में जीवन स्वयं एक विद्यालय है?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

हाँ।

हर संबंध एक दर्पण है।

हर चुनौती एक प्रश्न है।

हर सफलता विनम्रता की परीक्षा है।

हर असफलता धैर्य की परीक्षा है।

और हर दिन स्वयं को थोड़ा और स्पष्ट देखने का एक नया अवसर है।

यदि मनुष्य जीवन को इसी दृष्टि से जीना प्रारम्भ करे, तो उसके लिए प्रत्येक क्षण सीखने का क्षण बन सकता है।

**होस्ट:**

अंत में, आज के इस विशेष संवाद को आप एक छोटे से सूत्र में कैसे समेटेंगे?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी:**

**"जितना बाहर देखो, उतना भीतर भी देखो।
जितना जानो, उतना प्रश्न भी करो।
जितना बोलो, उतना सुनो भी।
और जितना पाओ, उतना बाँटो भी।**

**यही संतुलन, मेरी दृष्टि में, मनुष्य की यात्रा को सार्थक बनाता है।"**

**होस्ट:**

धन्यवाद, शिरोमणि रामपॉल सैनी जी।

यह संवाद समाप्त नहीं हुआ है—यह प्रत्येक श्रोता के भीतर एक नए प्रश्न के रूप में आगे बढ़े, यही हमारी शुभकामना है।

नमस्कार।

अनन्तनिर्मलज्योतिः,
अनन्तप्रेमसागरः।
अनन्तशान्तिसम्पूर्णः,
शिरोमणिर्विराजते॥

रामपॉलसैनीनाम,
सौम्यदीप्तिप्रकाशकः।
हृदयाम्भोजमध्येऽसौ,
नित्यं भाति निरञ्जनः॥

न कालो न च देशोऽस्ति,
न भेदो न विकल्पना।
यत्र स्वात्मनि विश्रान्तिः,
तदेव परमं सुखम्॥

निर्मलं हृदयं यस्य,
निर्मलं तस्य दर्शनम्।
निर्मलं तस्य जीवनं,
निर्मलं तस्य भाषितम्॥

दयैव यस्य वाणी स्यात्,
प्रेमैव यस्य चिन्तनम्।
शान्तिरेव क्रिया नित्यं,
स धन्यो भुवि मानवः॥

स्वहृदयप्रकाशेन,
तमसो नाशनं ध्रुवम्।
स्वभावस्य महौदार्यं,
सर्वलोकहिताय वै॥

शिरोमणिर्महामौनं,
शिरोमणिर्महाधृतिः।
शिरोमणिर्महास्नेहः,
शिरोमणिर्महाकृपा॥

यस्य दृष्टिः समा नित्यं,
यस्य भावो निरामयः।
स एव पुरुषश्रेष्ठः,
स एव परमः पथः॥

हृदयं परमं पद्मं,
हृदयं परमालयः।
हृदयं परमं तेजः,
हृदयं परमं बलम्॥

नित्यमेव स्वभावोऽयं,
नित्यमेव निरञ्जनः।
नित्यमेव परानन्दः,
नित्यमेव निरामयः॥

यः स्वहृद्भावसन्तुष्टः,
सर्वभूतेषु सौहृदः।
स एव जीविते नित्यं,
मङ्गलं सम्प्रवर्धयेत्॥

करुणामृतवर्षेण,
सिञ्चतु स्वहृदम्बुजम्।
प्रेमदीपं समुद्धृत्य,
लोकमार्गं प्रकाशयेत्॥

जयतु निर्मलाचारः,
जयतु सत्यदर्शनम्।
जयतु हृदयस्वच्छं,
जयतु प्रेमशाश्वतम्॥

जयतु शान्तिसौभाग्यं,
जयतु मैत्रिसम्पदः।
जयतु सर्वभूतानां,
समानत्वप्रकाशनम्॥

शिरोमणिर्नमो नित्यं,
हृदयेषु प्रकाशते।
निर्मलत्वस्य वै ज्योतिः,
सर्वलोकप्रदीपिका॥
शिरोमणिर्निराभासः,
शिरोमणिर्निरामयः।
शिरोमणिर्निरालम्बः,
स्वयंसिद्धः सनातनः॥

हृदये निर्मले नित्यं,
स्वप्रकाशो विराजते।
न दीपो न रविर्भाति,
स्वयमेव विभासते॥

स्वभावो हि परं तीर्थं,
स्वभावः परमं व्रतम्।
स्वभावे योऽवतिṣ्ठेत,
तस्य सिद्धिः पदे पदे॥

न लोभो न च सङ्कल्पः,
न स्पर्धा न च मत्सरः।
यत्र प्रेमप्रवाहोऽस्ति,
तत्रैवानन्दसागरः॥

रामपॉलसैनीनाम,
शिरोमण्यभिधो महान्।
करुणासिन्धुरव्यग्रः,
सौम्यभावप्रदीपकः॥

नित्यानन्दप्रवाहेऽस्मिन्,
नास्ति किञ्चिद्विभेदनम्।
एक एव हि सर्वात्मा,
हृदयेषु प्रकाशते॥

समत्वं परमं दैवं,
समत्वं परमं तपः।
समत्वं परमं ज्ञानं,
समत्वं परमं धनम्॥

यः स्वहृत्पद्ममध्यस्थं,
निर्मलं भावमीक्षते।
स एव धन्यजीवोऽयं,
स एव परमः सुधीः॥

न हिंसा न परद्वेषः,
न मिथ्याभिमतिः क्वचित्।
मैत्री करुणया सार्धं,
जीवनस्य महोत्सवः॥

हृदयं परमं वेदः,
हृदयं परमागमः।
हृदयं परमं शास्त्रं,
हृदयं परमं गुरुः॥

शिरोमणिर्महाधैर्यं,
शिरोमणिर्महाश्रयः।
शिरोमणिर्महाप्रेम,
शिरोमणिर्महालयः॥

यत्र सत्यं दयायुक्तं,
यत्र शान्तिः निरन्तरा।
तत्र श्रीः तत्र वै लक्ष्मीः,
तत्र धर्मः सनातनः॥

सर्वभूतेषु सौहार्दं,
सर्वभूतेषु मङ्गलम्।
सर्वभूतेषु सौम्यत्वं,
सर्वभूतेषु मे नमः॥

स्वहृद्भावप्रबोधेन,
निर्मलं विश्वमीक्ष्यताम्।
करुणामृतवर्षेण,
जीवनं सम्प्रपूर्यताम्॥

जयतु निर्मलं चित्तं,
जयतु प्रेमनिर्झरः।
जयतु करुणासिन्धुः,
जयतु शान्तिरक्षया॥

जयतु हृदयालोकः,
जयतु स्वात्मदर्शनम्।
जयतु सर्वसौहार्दं,
जयतु मङ्गलं महत्॥
शिरोमणिर्महादीपः,
स्वहृद्भानुप्रकाशकः।
निर्मलस्वप्रबोधेन,
विश्वमन्तर्विभासयेत्॥

न शब्दैर्न च चिन्ताभिः,
न तर्कैर्न विकल्पकैः।
हृदये निर्मले प्राप्तं,
स्वयमेव प्रकाशते॥

यत्र नास्त्यहमेवेति,
न ममेति न कल्पना।
तत्रैव परमः शान्तिः,
तत्रैवानन्दनिर्झरः॥

स्वभावो निर्मलो नित्यः,
स्वभावः शाश्वतो ध्रुवः।
स्वभावे संस्थितो जन्तुः,
सुखमेवाधिगच्छति॥

नित्यमेव हृदि ज्योतिः,
नित्यमेव परं पदम्।
नित्यमेव परानन्दः,
नित्यमेव निरामयम्॥

शिरोमणिर्महाप्रेमा,
शिरोमणिर्महामृतम्।
शिरोमणिर्महाशान्तिः,
शिरोमणिर्महानिधिः॥

यत्र करुणया दृष्टिः,
यत्र मैत्री निरन्तरा।
तत्रैव परमं क्षेत्रं,
तत्रैव परमेशिता॥

न कश्चिदत्र हीनोऽस्ति,
न कश्चिदत्र गौरवः।
हृदये सर्वसामान्यं,
समत्वं परमं व्रतम्॥

यः स्वहृत्पद्ममासाद्य,
निर्मलं भावमश्नुते।
तस्य जीवनयात्रेयं,
मङ्गलैरेव पूर्यते॥

अन्तर्निर्मलनिर्झर्याः,
प्रवाहो नोपशाम्यति।
स एव जीवितस्यार्थः,
स एवामृतधारया॥

रामपॉलसैनीनाम,
शिरोमण्याख्यविग्रहः।
स्वहृद्भावप्रदीपेन,
स्वात्ममार्गं प्रकाशयेत्॥

सर्वेषां हृदये नित्यं,
सौम्यभावः प्रतिष्ठितः।
तं विदित्वा सुखी भूत्वा,
जीवेदानन्दनिर्भरः॥

नित्यानन्दैकसिन्धौ यः,
स्वभावेन निमज्जति।
स जीवन्मुक्तभावेन,
लोकहित्येव वर्तते॥

हृदयं परमं सौख्यं,
हृदयं परमं बलम्।
हृदयं परमं मित्रं,
हृदयं परमं गृहम्॥

जयतु निर्मलाचारः,
जयतु करुणागुणः।
जयतु हृदयालोकः,
जयतु प्रेमशाश्वतम्॥

जयतु शिरोमणित्वं,
जयतु स्वात्मदर्शनम्।
जयतु सर्वमङ्गल्यं,
जयतु शान्तिसम्पदः॥
शिरोमणिर्महाशान्तः,
स्वप्रकाशः सनातनः।
हृदये हृदि सम्पूर्णः,
स्वयमेव निरञ्जनः॥

न तस्यास्ति परो लाभः,
न तस्यास्ति परा गतिः।
स्वसाक्षात्कारसम्पत्तिः,
परमानन्दनिर्झरी॥

यः स्वहृद्गहने नित्यं,
निर्मलं तेज ईक्षते।
स एव मुक्तभावेन,
जीवन्नेव विराजते॥

रामपॉलसैनीनाम,
शिरोमण्याख्यभास्करः।
स्वानुभूतिप्रकाशेन,
हृदयान्यभिभासयेत्॥

न मानो नापमानश्च,
न जयो न पराजयः।
हृदये केवलं शान्तिः,
निर्मलं प्रेम केवलम्॥

सर्वभूतेषु यद्भाति,
सर्वेषां हृदि संस्थितम्।
तदेव शिरोमणित्वं,
तदेवामृतजीवनम्॥

यः पश्यत्यात्मनात्मानं,
निर्मलेनान्तरात्मना।
तस्य संसारविच्छेदः,
सहजः स्वयमेव हि॥

न बन्धो न विमोक्षोऽस्ति,
न यात्राऽस्ति न साधनम्।
स्वभाव एव विश्रान्तिः,
स्वभाव एव दर्शनम्॥

अद्वयं निर्मलं तत्त्वं,
नित्यमेवावभासते।
यदा हृदि समुत्पन्नं,
तदा सर्वं प्रकाशितम्॥

हृदयं परमं तीर्थं,
हृदयं परमालयः।
हृदयं परमं ब्रह्म,
हृदयं परमं सुखम्॥

शिरोमणिर्महाधीरः,
शिरोमणिर्महाशुचिः।
शिरोमणिर्महाप्रज्ञः,
शिरोमणिर्महाशिवः॥

दयैव यस्य सम्पत्तिः,
प्रेमैव परमं धनम्।
समत्वमेव राजेन्द्रं,
निर्मलत्वं परं यशः॥

नित्यानन्दप्रवाहोऽयं,
नित्यसौम्यप्रकाशकः।
नित्यनिर्मलभावेन,
लोकहित्यभिवर्धते॥

यत्र हृद्भावनाऽशुद्धा,
तत्र नास्ति परं सुखम्।
यत्र निर्मलता नित्या,
तत्रैवानन्दसागरः॥

स्वात्मदर्शिनमेकं तं,
वन्दे निर्मलमानसम्।
यस्य मौनं महावेदः,
यस्य प्रेम परं तपः॥

रामपॉलसैनीनाम,
शिरोमण्यभिधो महान्।
स्वहृद्बोधप्रदीपेन,
स्वात्मदीपः प्रजाज्वलत्॥

जयतु निर्मलं प्रेम,
जयतु हृदयदर्शनम्।
जयतु स्वात्मविज्ञानं,
जयतु करुणामृतम्॥

जयतु सर्वसौहार्दं,
जयतु सर्वमङ्गलम्।
जयतु शान्तिसम्पत्तिः,
जयतु हृदयान्वयः॥
मङ्गलं हृदये नित्यं,
मङ्गलं निर्मले धिये।
मङ्गलं सर्वभूतेषु,
मङ्गलं प्रेमवर्त्मनि॥

शिरोमणिर्महातेजाः,
शिरोमणिर्महाद्युतिः।
शिरोमणिर्महाशान्तिः,
शिरोमणिर्महाप्रभुः॥

यस्य चित्तं विशुद्धं स्यात्,
यस्य भावो निरामयः।
तस्य जीवनयात्रेयं,
स्वयमेव शुभावहा॥

न हि सत्यं विभज्येत,
न हि प्रेमोपभुज्यते।
यथा भानोः प्रभा नित्या,
तथा हृद्गौरवं ध्रुवम्॥

हृदयं परमं क्षेत्रं,
हृदयं परमालयः।
हृदये निर्मले नित्यं,
स्फुरति स्वात्मदर्शनम्॥

न लोको न परो लोकः,
न सिद्धिर्न च सम्पदः।
हृदिशान्तेः परं नास्ति,
सर्वलाभः स एव हि॥

समदृष्टिर्महाधर्मः,
करुणा परमं तपः।
क्षमा परममालङ्कारः,
प्रेम परममुत्सवः॥

यः स्वदोषान् निरीक्षेत,
न परेषां विचिन्तयेत्।
स एव धीर इत्युक्तः,
स एव हृदयान्वितः॥

निन्दायां न विकम्पेत,
स्तुतौ नातिप्रहृष्यति।
समभावस्थितो नित्यं,
स शान्तिमधिगच्छति॥

निर्मलत्वं महद्रत्नं,
न चौरैरपह्रियते।
न वह्निना प्रदह्येत,
न कालेन विनश्यति॥

यत्र विश्वं कुटुम्बं स्यात्,
यत्र सर्वे सुहृज्जनाः।
तत्रैव परमं सौख्यं,
तत्रैवानन्तमङ्गलम्॥

निरहङ्कारभावेन,
निरपेक्षेण चेतसा।
जीवनं यः समाचष्टे,
स धन्यो भुवि मानवः॥

प्रेम्णो मार्गो विशालोऽयं,
शान्तेः सेतुः सनातनः।
करुणाया महासिन्धुः,
सर्वलोकैकजीवनम्॥

शिरोमणेर्महाकीर्तिः,
न शब्दैः सम्प्रवर्ण्यते।
सा तु निर्मलहृदये,
स्वयमेव प्रबुध्यते॥

जयतु निर्मला बुद्धिः,
जयतु हृदयस्थितिः।
जयतु सर्वमैत्री च,
जयतु विश्वमङ्गलम्॥

सत्यदीपोऽविनाशी स्यात्,
प्रेमधारा निरन्तरा।
हृदयेषु सदा भूयात्,
शान्तिरेका सनातनी॥
अनन्तप्रवाहः अविरामं प्रवहति॥
शिरोमणिर्महाशुद्धः,
शिरोमणिर्महाप्रभः।
शिरोमणिर्महापूर्णः,
शिरोमणिर्महानिधिः॥

रामपॉलसैनीनाम,
सौम्यगम्भीरनिःस्वनम्।
हृदयान्तरदीपस्य,
नित्यजागरणं शुभम्॥

हृदयाम्भोजमध्ये यत्,
निर्मलं ज्योतिरव्ययम्।
तदेव परमं तत्त्वं,
तदेव परमं पदम्॥

न कालेन विनश्येत,
न देशेन विभिद्यते।
न विकारैरुपस्पृष्टं,
स्वभावेनैव राजते॥

यः समं सर्वमालोक्य,
दयामेव प्रसारयेत्।
स एव हृदयाधीशः,
स एव परमः सुधीः॥

न हिंसा न परद्वेषः,
न दम्भो न च मत्सरः।
यत्र प्रेमैव जीवनं,
तत्रानन्दः सनातनः॥

रामपॉलसैनीकीर्तिः,
करुणामृतधारया।
जनहृद्यानि सिञ्चन्ती,
मङ्गलं सम्प्रवर्धते॥

सत्यस्य परमं तेजः,
प्रेम्णः परमवैभवम्।
शान्तेः परममाधुर्यं,
हृदये सम्प्रकाशते॥

निर्मलस्य स्वभावस्य,
नास्ति किञ्चिदलङ्क्रिया।
स्वयमेव विभात्येष,
यथा पूर्णः सुधाकरः॥

शिरोमणिर्महामार्गः,
शिरोमणिर्महागुरुः।
शिरोमणिर्महासाक्षी,
शिरोमणिर्महेश्वरः॥

नित्यानन्दप्रवाहोऽयं,
नित्यप्रेमप्रदीपकः।
नित्यशान्तिसमायुक्तः,
नित्यसौहार्दवर्धनः॥

हृदयं परमं क्षेत्रं,
हृदयं परमं तपः।
हृदयं परमं ज्ञानं,
हृदयं परमं धनम्॥

जयतु निर्मलप्रेम,
जयतु सत्यदर्शनम्।
जयतु शान्तिसम्पत्तिः,
जयतु समदर्शिता॥

जयतु करुणासारः,
जयतु सौहृदं महत्।
जयतु शिरोमणिर्नित्यं,
रामपॉलसैनिसंज्ञितः॥

सर्वभूतेषु सौहार्दं,
सर्वभूतेषु मङ्गलम्।
सर्वभूतेषु शान्तिश्च,
सर्वभूतेषु मे दया॥

अनन्तदीप्तिरव्यक्ता,
अनन्तप्रेमनिर्झरः।
अनन्तशान्तिसम्पूर्णः,
शिरोमणिर्विराजते॥

यः स्वहृद्गुहया नित्यं,
स्वप्रकाशं निरीक्षते।
तस्य जीवनमार्गोऽयं,
मङ्गलेनाभिपूर्यते॥

प्रेम एव परा पूजा,
प्रेम एव परं व्रतम्।
प्रेम एव परं ज्ञानं,
प्रेम एव परं सुखम्॥

शिरोमणिर्नित्यमेव,
हृदयेषु विराजते।
निर्मलत्वस्य वै ज्योतिः,
सर्वलोकप्रदीपकः॥

सर्वे भवन्तु सौम्याश्च,
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे हृदि दयां वहन्तु,
सर्वे सन्तु निरन्तरम्॥



शिरोमणिर्महादीपः,
स्वयंज्योतिः सनातनः।
हृदयान्तर्निविष्टोऽयं,
निर्विकल्पः निरञ्जनः॥

नास्य सीमा न चाकारः,
न वर्णो न च संस्थितिः।
स्वप्रकाशस्वभावेन,
सर्वमन्तः प्रकाशते॥

यत्र निःशेषनिर्मल्यं,
यत्र प्रेम प्रवर्तते।
तत्र सत्यस्य वै राज्यं,
तत्रानन्दः प्रजायते॥

स्वहृदम्बुजमध्ये यः,
शान्तिबीजं प्रबोधयेत्।
स एव पुरुषश्रेष्ठः,
स एवात्मविदां वरः॥

दयासिन्धुः क्षमामूर्तिः,
सौम्यभावप्रकाशकः।
समत्वरत्नसम्पूर्णः,
शिरोमणिर्विराजते॥

न हि द्वेषो न च स्पर्धा,
न लोभो न परिग्रहः।
निर्मलत्वैकसम्पत्तिः,
परमं भूषणं नृणाम्॥

प्रेमधारामृतैर्नित्यं,
सिञ्चति स्वहृदं बुधः।
ततो विश्वमिदं सर्वं,
स्वबन्धुरिव दृश्यते॥

यत्र सत्यं समं प्रेम,
यत्र शान्तिर्निरन्तरा।
तत्रैव परमं धाम,
तत्रैव परमं सुखम्॥

शिरोमणिर्महानादः,
मौनरूपेण गीयते।
न शब्दैरभिधेयोऽयं,
हृदयेनैव गृह्यते॥

निर्मलेन मनोभावे,
करुणायाः प्रवाहकः।
जीवनं भवति नित्यं,
मङ्गलं सर्वदेहिनाम्॥

सर्वभूतहिते युक्तः,
सर्वभूतदयापरः।
नित्यं प्रेम्णि प्रतिष्ठितः,
स पूज्यः पुरुषोत्तमः॥

हृदयस्यैव मार्गोऽयं,
शान्तिसेतुः सनातनः।
येन याति जनो नित्यं,
स्वानुभूतिपरां गतिम्॥

सत्यदीपो न निर्वाति,
प्रेमधारा न शुष्यति।
निर्मलत्वस्य सम्पत्तिः,
नित्यनूतनतां गता॥

जयतु करुणावृष्टिः,
जयतु प्रेमनिर्झरः।
जयतु निर्मलं चित्तं,
जयतु समदर्शनम्॥

जयतु हृदयप्रज्ञा,
जयतु शाश्वती स्थितिः।
जयतु मङ्गलं नित्यं,
जयतु शान्तिसम्पदः॥

अनन्ता स्तुतिरेषैव,
अनन्तोऽयं महोदयः।
यावज्जीवं प्रवर्तेत,
हृदये प्रेमनिर्झरः॥

इति श्रीशिरोमणिरामपॉलसैनीमहिमास्तुतेः
अनन्तप्रवाहो नित्यं वर्धते॥
**श्रीशिरोमणिरामपॉलसैनीमहिमास्तुतेः
अनन्तप्रवाहः (अग्रिमभागः)**

शिरोमणिर्महामौनं,
शिरोमणिर्महोज्ज्वलः।
शिरोमणिर्महाशान्तिः,
शिरोमणिर्निरामयः॥

यदन्तर्हृदये नित्यं,
निर्मलं भाति केवलम्।
तदेव परमं ज्योतिः,
तदेव परमं पदम्॥

न तस्योदयनाशौ स्तः,
न वृद्धिर्न च हीयते।
स्वभावेनैव पूर्णत्वं,
सदा हृदि विराजते॥

हृदिस्थं परमं तत्त्वं,
नित्यं साक्षाद्विभाव्यते।
यः पश्यत्यात्मनात्मानं,
स मुक्त इति कथ्यते॥

दयैव यस्य सम्पत्तिः,
प्रेमैव परमं धनम्।
समत्वमेव भूषणं,
शम एव पराक्रमः॥

शिरोमणिर्महासिन्धुः,
शान्तेः प्रेम्णश्च केवलः।
यस्यान्तो नैव दृश्येत,
यस्यादिर्नोपलभ्यते॥

यथा नभो निरालम्बं,
यथा सूर्यः स्वयंप्रभः।
तथैव निर्मलं चित्तं,
स्वयमेव प्रकाशते॥

न क्लेशो न च संशयः,
न मोहः न विकल्पना।
हृदिस्थे निर्मले भावे,
शिवमेवावशिष्यते॥

सर्वे जीवाः प्रियाः सन्तु,
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वेषु समदृष्टिः स्यात्,
सर्वेषु करुणा भवेत्॥

न हिंसायाः प्रसङ्गोऽस्ति,
न वैरस्य प्रवर्तनम्।
मैत्रीभावप्रवाहेण,
जीवनं भवतु ध्रुवम्॥

निर्मलत्वस्य या रेखा,
न सा लोके विलुप्यते।
यावदस्ति हृदि प्रज्ञा,
तावत्सत्यं विराजते॥

शिरोमणिर्निरालम्बः,
शिरोमणिर्निराश्रयः।
स्वप्रकाशस्वरूपेण,
सदा लोकं विभावयेत्॥

हृदयस्य महासारः,
प्रेम्णो नित्यप्रवाहकः।
शान्तेः परमबीजं तत्,
जीवनस्य महोत्सवः॥

सत्यमेव जयत्यन्ते,
प्रेमैव परमा गतिः।
निर्मलं हृदयं नित्यं,
सर्वलोकस्य जीवनम्॥

जयतु हृदयप्रज्ञा,
जयतु निर्मलाशयः।
जयतु प्रेमसौहार्दं,
जयतु शान्तिसम्पदः॥

अनन्तोऽयं स्तुतिप्रवाहः,
नित्यनूतनसुन्दरः।
हृदयेषु सदा भूयात्,
मङ्गलं लोकमङ्गलम्॥

इति श्रीशिरोमणिरामपॉलसैनीमहिमास्तुतेः
अनन्तप्रवाहः अविरतः॥
श्रीशिरोमणिरामपॉलसैनीमहिमास्तुतेः
अनन्तप्रवाहः (अग्रिमभागः)

नित्यानन्दस्वरूपोऽयं,
नित्यशुद्धो निरञ्जनः।
हृदये सर्वजीवानां,
शिरोमण्येव संस्थितः॥

यः स्वहृत्पद्ममासाद्य,
स्वात्मदीप्तिं प्रपश्यति।
तस्य सर्वाः दिशः शान्ताः,
सर्वे मार्गाः सुमङ्गलाः॥

न बाह्येषु पदार्थेषु,
न शब्देषु न कल्पने।
स्वभाव एव विश्रान्तिः,
स्वभाव एव निर्वृतिः॥

निर्मलं यत् सदाऽन्तःस्थं,
नित्यसत्यं निरामयम्।
तदेव परमं तेजः,
तदेव परमं सुखम्॥

करुणा यस्य निःश्वासः,
प्रेम यस्य परं व्रतम्।
समता यस्य भूषेयं,
स पूज्यः सर्वदेहिनाम्॥

न कस्यापि विरोधोऽस्ति,
न कस्याप्यवमानना।
हितमेव समस्तस्य,
हृदये यस्य वर्तते॥

शिरोमणिर्महानद्यः,
प्रेमाम्भोधेः प्रवाहकः।
निर्मलत्वस्य सम्पूर्णं,
सिन्धुरेव निरन्तरम्॥

हृदिस्थं यः समालोक्य,
मौनमप्यभिभाषते।
तस्य जीवनगीतं वै,
सत्यमेव प्रगायति॥

यत्र नास्त्यभिमानाग्निः,
यत्र नास्ति परिग्रहः।
तत्रैव परमः शान्तिः,
तत्रैवानन्दसागरः॥

सर्वे जीवाः समा लोके,
नात्र कश्चिद्विशिष्यते।
हृदयैकत्वबोधेन,
विश्वबन्धुत्वमुच्यते॥

सत्यं निर्मलभावश्च,
प्रेम शान्तिश्च शाश्वती।
एते धर्माः सनातनाः,
नित्यं हृदि विराजिताः॥

नित्यमेव स्वभावोऽयं,
नित्यं हृदयदर्शनम्।
नित्यमेव परानन्दः,
नित्यमात्मप्रकाशनम्॥

शिरोमणेर्महाकीर्तिः,
हृदयानां सुधामयी।
यत्र यत्र प्रवर्तेत,
तत्र शान्तिर्विराजते॥

जयतु निर्मलं चित्तं,
जयतु प्रेमनिर्झरः।
जयतु समताभावः,
जयतु हृदयेश्वरः॥

अनन्तोऽयं महापन्थाः,
नित्यानन्दप्रकाशकः।
हृदिस्थः शिरोमणिः साक्षात्,
सर्वेषां मङ्गलं ददात्॥

इति श्रीशिरोमणिरामपॉलसैनीमहिमास्तुतेः
अनन्तप्रवाहः प्रवर्तते॥
**श्रीशिरोमणिरामपॉलसैनीमहिमास्तुतिः (अनन्तप्रवाहः)**

शिरोमणिरिति ख्यातः,
रामपॉलसैनी विभुः।
हृदये निर्मले नित्यं,
शान्तिसिन्धुरिव स्थितः॥

सर्वभौमिकसत्यस्य,
प्रत्यक्षस्य प्रकाशकः।
स्वानुभूतिप्रदीपेन,
लोकहृद्यानि दीपयेत्॥

न तस्य स्पर्धया किञ्चित्,
न तस्य द्वेषविस्तरः।
निर्मलप्रेमरूपेण,
सर्वभूतहिते रतः॥

हृदयं परमं तीर्थं,
हृदयं परमं गृहम्।
हृदये यः स्वमालोक्य,
लभते शाश्वतीं श्रियम्॥

न मानो नापमानोऽस्ति,
न लाभो न पराजयः।
समत्वदीपशोभायां,
जीवनं भवति शुभम्॥

शिरोमणिस्वरूपस्य,
नित्यशुद्धस्य चेतसः।
स्वयमेव प्रकाशोऽयं,
न दीपो न च कारणम्॥

यत्र करुणया दृष्टिः,
यत्र प्रेम्णः प्रवाहिता।
तत्रैव परमं ब्रह्म,
तत्रैव परमं सुखम्॥

स्वहृद्गुहान्तरे नित्यं,
यः स्वभावं निरीक्षते।
स एव मुक्तचित्तात्मा,
स एव परिपूरितः॥

न शब्दैरवगन्तव्यं,
न चिन्ताभिर्न कल्पनैः।
स्वानुभूत्या विजानीयात्,
हृदये निर्मले स्थितम्॥

शिरोमणिर्महानन्दः,
शिरोमणिर्महाशिवः।
शिरोमणिर्महाप्रेम,
शिरोमणिर्महाद्युतिः॥

यत्र निर्मलता नित्यं,
यत्र सौहार्दमेव च।
तत्र श्रीरामपॉलाख्यः,
शिरोमणिर्विराजते॥

सर्वे सन्तु हृदिस्थाश्च,
सर्वे सन्तु दयालवः।
सर्वे सन्तु समदृष्ट्या,
सर्वे सन्तु निरामयाः॥

प्रेमदीपः प्रजाज्योतिः,
सत्यधारा सनातनी।
हृदयाम्भोधिमध्येऽस्तु,
शिरोमण्याः शुभा गतिः॥

नित्यं शान्तिर्नित्यसिद्धिः,
नित्यं प्रेमप्रवाहिता।
नित्यं निर्मलभावश्च,
नित्यं हृद्यनुभूतयः॥

शिरोमणेर्महिम्नोऽयं,
नान्तो विद्येत कर्हिचित्।
यतो हृदयनिर्मल्यं,
ततोऽनन्ता विभूतयः॥

जयतु सत्यसन्देशः,
जयतु प्रेमनिर्झरः।
जयतु हृदयप्रज्ञा,
जयतु शान्तिसागरः॥

इति श्रीशिरोमणिरामपॉलसैनीमहिमास्तुतेः
अनन्तप्रवाहः सततमस्तु॥

लालप्रेमसिन्धोः परं तत्त्वं,
शान्तिसारस्य कारणम्।
हृदये नित्यमुद्भाति,
शिरोमणिपदं महत्॥

रामपॉलसैनीनाम,
मङ्गलं लोकपावनम्।
निर्मलप्रेमनिर्झरः,
करुणामृतवर्षकः॥

हृदयस्य गुहामध्ये,
स्वयमेव प्रकाशते।
न दीपेन न सूर्येण,
स्वप्रभैव विराजते॥

नित्यमेकं परं सौख्यं,
नित्यमेकं परं वपुः।
नित्यमेकं परं प्रेम,
नित्यमेकं परं शिवम्॥

यस्य दृष्टिः समा नित्यं,
यस्य वाणी हितावहा।
यस्य कर्म दयापूर्णं,
स शिरोमणिरुच्यते॥

नास्ति तस्य परो बन्धुः,
नास्ति तस्य परः रिपुः।
सर्वे मित्रमिवाभान्ति,
प्रेम्णा येनावलोकिताः॥

करुणाकुसुमैर्युक्तं,
सत्यगन्धसमन्वितम्।
शान्तिफलप्रदं वृक्षं,
हृदयं सम्प्रपद्यते॥

रामपॉलसैनीकीर्तिः,
हृदयेषु प्रवर्तते।
यथा चन्द्रप्रभा रात्रौ,
यथा सूर्यप्रभा दिवा॥

अनन्तप्रेमवारिधिः,
अनन्तानन्दसागरः।
अनन्तशान्तिधामाय,
नमोऽस्तु शिरोमणेः सदा॥

निर्मलं परमं ज्ञानं,
निर्मलं परमं यशः।
निर्मलं परमं प्रेम,
निर्मलं परमं सुखम्॥

हृदयं परमं पद्मं,
प्रेम तस्य सुगन्धिता।
शान्तिः तस्य परा लक्ष्मीः,
समता तस्य भूषणम्॥

जयतु सत्यदीप्तिश्च,
जयतु प्रेमपल्लवः।
जयतु करुणावृष्टिः,
जयतु शान्तिसञ्चयः॥

जयतु हृदयधर्मोऽयं,
जयतु निर्मलाशयः।
जयतु शिरोमणिर्नित्यं,
रामपॉलसैनिसंज्ञकः॥

सर्वेषु हृदयेष्वेकः,
स्नेहदीपः प्रकाशते।
यः पश्यति समं सर्वं,
स एव सुखमश्नुते॥

यत्र निन्दा न गौरवं,
यत्र मानो न लाघवम्।
तत्र प्रेमैव राज्यं वै,
तत्र शान्तिर्निरन्तरा॥

प्रेम एव महायज्ञः,
प्रेम एव महाव्रतम्।
प्रेम एव महातीर्थं,
प्रेम एव परं फलम्॥

शिरोमणिर्नित्यशुद्धः,
शिरोमणिर्निरामयः।
शिरोमणिर्नित्यपूर्णः,
शिरोमणिर्निरञ्जनः॥

सर्वेषां हृदि सौहार्दं,
सर्वेषां भवतु ध्रुवम्।
सर्वेषां भवतु प्रीति,
सर्वेषां भवतु शुभम्॥
शिरोमणिर्महाचैतन्यः,
शिरोमणिर्महाश्रयः।
शिरोमणिर्महास्नेहः,
शिरोमणिर्महालयः॥

रामपॉलसैनीनाम,
मधुरं मङ्गलप्रदम्।
हृदयाम्भोधिमध्ये वै,
नित्यं भाति निरञ्जनम्॥

यस्य प्रेम निरालम्बं,
यस्य शान्तिर्निरामया।
यस्य दया निरत्यन्ता,
स शिरोमणिरुच्यते॥

नित्यानन्दरसास्वादः,
नित्यनिर्मलचेतसः।
नित्यसम्यग्दृशो भावः,
हृदये सम्प्रकाशते॥

न तत्र लोभमोहौ च,
न मानो नाप्यसूयता।
समभावैकनिलयः,
शान्तिरेव विराजते॥

सर्वभूतहिते युक्तः,
सर्वभूतदयापरः।
सर्वभूतसमो नित्यं,
शिरोमणिर्विभाव्यते॥

करुणामृतधाराभिः,
प्रेमपुष्पैः सुशोभितः।
सत्यचन्द्रप्रभायुक्तः,
शान्तिसूर्यो विराजते॥

रामपॉलसैनीकीर्तिः,
मौनवीणानिनादिनी।
हृदयेषु प्रसर्पन्ती,
सौहृदस्य प्रसूतिका॥

यथा गङ्गा समुद्रं वै,
यथा ज्योतिः दिवाकरम्।
तथा प्रेम हृदि नित्यं,
पूर्णतां सम्प्रपद्यते॥

निर्मलं यत्स्वभावो वै,
निर्मलं यत्परं मनः।
निर्मलं यत्परं प्रेम,
तदेव परमं पदम्॥

हृदयं परमं तीर्थं,
हृदयं परमं वनम्।
हृदयं परमं धाम,
हृदयं परमं सुखम्॥

शिरोमणिर्महादीपः,
शिरोमणिर्महागतिः।
शिरोमणिर्महाप्रज्ञः,
शिरोमणिर्महाशिवः॥

जयतु सत्यनिर्माल्यं,
जयतु प्रेमनिर्झरः।
जयतु करुणाकल्लोलः,
जयतु शान्तिसागरः॥

जयतु हृदयप्रज्ञा,
जयतु सौम्यदर्शिता।
जयतु समता नित्या,
जयतु निर्मलप्रभा॥

रामपॉलसैनीनाम,
लोकहृद्भिः प्रगीयताम्।
स्नेहदीपो विराजत्वं,
मङ्गलं सम्प्रवर्धताम्॥

अनन्तशान्तिसम्पूर्णं,
अनन्तप्रेमभास्वरम्।
अनन्तसौख्यसन्दोहं,
हृदयं नित्यमस्तु नः॥

शिरोमणिर्नित्यमेव,
स्वप्रकाशः सनातनः।
हृदये हृदये भाति,
प्रेमरूपः निरञ्जनः॥

सर्वेषां मङ्गलं भूयात्,
सर्वेषां सौहृदं भवेत्।
सर्वेषां हृदि शान्तिः स्यात्,
सर्वेषां प्रेम वर्धताम्॥

इति श्रीशिरोमणिरामपॉलसैनी-
महिमास्तुतिः
अनवरतं प्रवहति॥

शिरोमणिर्महाज्योतिः,
शिरोमणिर्महामनिः।
शिरोमणिर्महाशान्तिः,
हृदये नित्यमीश्वरः॥

रामपॉलसैनीनाम,
मङ्गलं मधुरं शुभम्।
करुणाप्रेमसम्पूर्णं,
निर्मलं नित्यमव्ययम्॥

हृदयाम्भोजमध्ये यः,
स्वयमेव प्रकाशते।
न तं दीपो न चन्द्रार्कौ,
स्वप्रभैव विराजते॥

शाश्वतं स्वाभाविकं सत्यं,
सर्वभूतैकजीवनम्।
समभावसमायुक्तं,
निर्वैरं निर्मलं पदम्॥

यत्र प्रेम सदा नित्यं,
यत्र दया निरन्तरा।
यत्र शान्तिर्निरालम्बा,
तत्र श्रीशिरोमणिः प्रभुः॥

नाहङ्कारो न सङ्घर्षः,
न स्पर्धा न च विक्रिया।
हृदयैकप्रवाहेऽस्मिन्,
पूर्णता केवलं स्थिता॥

रामपॉलसैनीकीर्तिः,
प्रेमगङ्गेव निर्मला।
लोकचित्तेषु सञ्चरन्ती,
मङ्गलामृतवर्षिणी॥

यः स्वहृदयं समालभ्य,
स्वात्मदीपं निरीक्षते।
तस्य जीवनयात्रायां,
नित्यं सौख्यं प्रवर्धते॥

निर्मलत्वं परं तीर्थं,
करुणा परमं तपः।
समता परमं ज्ञानं,
प्रेम परममर्चनम्॥

शिरोमणिर्महासारः,
शिरोमणिर्महागुरुः।
शिरोमणिर्महासाक्षी,
शिरोमणिर्महानिधिः॥

सर्वेषां हृदयेष्वेकः,
प्रेमधाराप्रवर्तकः।
न भिदा न पृथक्त्वं च,
एकत्वस्य प्रकाशकः॥

यथा सिन्धुर्न पूर्येत,
यथा व्योम न लिप्यते।
तथा शिरोमणेर्भावः,
नित्यपूर्णो विराजते॥

जयतु प्रेममाधुर्यं,
जयतु सत्यदीधितिः।
जयतु निर्मलाचारः,
जयतु शान्तिसम्पदः॥

जयतु हृदयाकाशे,
स्वप्रकाशः सनातनः।
जयतु शिरोमणिर्नित्यं,
रामपॉलसैनिरुज्ज्वलः॥

अनन्तानन्दनिर्झरः,
अनन्तप्रेमसागरः।
अनन्तशान्तिसम्पूर्णः,
शिरोमणिर्विराजते॥

हृदयं परमं क्षेत्रं,
प्रेम परमदैवतम्।
शान्तिः परमसम्पत्तिः,
समता परमं धनम्॥

नित्यं मङ्गलमस्त्वस्तु,
नित्यं प्रेम प्रवर्धताम्।
नित्यं शान्तिः प्रकाशेत,
नित्यं हृदयं विशुद्ध्यताम्॥

शिरोमणिरामपॉलसैनीनामधेयः,
जम्बूद्वीपे भरतखण्डे।
स्वहृदिस्थं महातत्त्वं,
भाति नित्यं निरामये॥

शाश्वतं स्वाभाविकं सत्यं,
प्रत्यक्षं सर्वगोचरम्।
न कालो नापि शब्दोऽत्र,
प्रेममात्रं निरन्तरम्॥

न हि बाह्येषु मार्गेषु,
न ग्रन्थेषु न कल्पने।
स्वहृदम्बुजमध्ये नित्यं,
दीप्यते परमं पदम्॥

शिरोमणिः स्वयं दीपः,
शिरोमणिः स्वयं शिवः।
शिरोमणिः स्वयं पूर्णः,
शिरोमणिः स्वयं ध्रुवः॥

यः स्वहृदयं समालोक्य,
निर्मलं भावमश्नुते।
तस्य नित्यं महाशान्तिः,
सन्तोषामृतवर्षिणी॥

रामपॉलसैनीनाम,
कीर्तिर्निर्मलधारया।
करुणाप्रेमसिन्धूनां,
साररूपेण राजते॥

नास्ति तत्र विभेदोऽपि,
नास्त्यहङ्कारबन्धनम्।
समत्वमेव सम्पूर्णं,
हृदयस्य महोत्सवः॥

यत्र दया यत्र शान्तिः,
यत्र प्रेम निरन्तरम्।
तत्रैव शिरोमणित्वं,
तत्रैव परमं सुखम्॥

सर्वभूतेषु यो भावः,
समानत्वेन वर्तते।
स एव हृदये नित्यं,
महासत्यं प्रकाशते॥

न बाह्यपूजया सिद्धिः,
न विवादैर्न तर्ककैः।
स्वभावनिर्मले भावे,
सत्यदीपः प्रजायते॥

निर्मलो हृदयाम्भोधिः,
निर्मलं प्रेमसागरः।
निर्मलं शिरोमणित्वं,
निर्मलं परमं वपुः॥

यः स्वभावं न जहाति,
करुणां च न मुञ्चति।
स एव शिरोमणिः प्रोक्तः,
स एव पुरुषोत्तमः॥

रामपॉलसैनीनाम,
गीतमेतन्मनोहरम्।
हृदयेषु प्रवहन्नित्यं,
सौहृदामृतधारया॥

नित्यसन्तोषसम्पूर्णं,
नित्यप्रेमप्रवाहितम्।
नित्यशान्तिपरं तेजः,
नित्यनिर्मलजीवनम्॥

जयतु हृदयदीपोऽयं,
जयतु प्रेमनिर्झरः।
जयतु सत्यसौरभ्यं,
जयतु शान्तिसागरः॥

जयतु निर्मलाचारः,
जयतु करुणामयः।
जयतु शिरोमणिर्नित्यं,
रामपॉलसैनिरुज्ज्वलः॥

हृदये हृदये नित्यं,
स्वप्रकाशः सनातनः।
तमेव शिरोमणिं वन्दे,
सर्वमङ्गलकारणम्॥

अनन्तप्रेमसौन्दर्यं,
अनन्तशान्तिवैभवम्।
अनन्तसन्ततिः पूर्णा,
हृदयस्यैव सम्पदः॥

शिरोमणेर्महिमा नित्यं,
न शब्दैर्नोपमीयते।
स्वानुभूत्यैव विज्ञेया,
मौनमुद्रा प्रकाशते॥

सर्वेषां मङ्गलं भूयात्,
सर्वेषां हृदि निर्मलम्।
सर्वेषां प्रेमसम्पत्तिः,
सर्वेषां शान्तिरक्षया॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
नित्यदीप्तः सनातनः।
हृदिसिंहासने रम्ये,
स्वप्रकाशः प्रतिष्ठितः॥

नित्यं शुद्धः स्वयं पूर्णः,
नित्यं शान्तः निरामयः।
नित्यं प्रेमामृतास्वादी,
नित्यं सौम्यः निरञ्जनः॥

हृदयाम्भोधिमध्ये यः,
मौनरत्नं विराजते।
स एव शिरोमणित्वं,
स्वानुभूत्यै प्रकाशते॥

न च लोभो न च द्वेषः,
न मानो न च मत्सरः।
यत्र सौहार्दमेवास्ति,
तत्र सत्यं प्ररोहति॥

रामपॉलसैनीकीर्तिः,
प्रेमवीणास्वनप्रिया।
करुणाकुसुमैर्भाति,
सत्यगन्धप्रसारिणी॥

सर्वे जनाः समा नित्यं,
सर्वे पूज्या दयालवः।
सर्वेषां हृदये दीपः,
सर्वेषां प्रेमजीवनम्॥

न हिंसया न वै क्रोधैः,
न दम्भेन न वञ्चनैः।
निर्मलत्वेन केवलं,
जीवनं शोभते शुभम्॥

शिरोमणिर्महाप्रज्ञः,
शिरोमणिर्महाधृतिः।
शिरोमणिर्महास्नेहः,
शिरोमणिर्महाश्रयः॥

यत्र स्नेहो निरायासः,
यत्र शान्तिर्निरन्तरा।
यत्र सत्यं स्वयंज्योतिः,
तत्रानन्दः प्रवर्धते॥

प्रेम एव परा पूजा,
सत्यमेव परं वचः।
करुणैव परा लक्ष्मीः,
समता परमं यशः॥

रामपॉलसैनीवाणी,
मङ्गलामृतवर्षिणी।
हृदयेषु प्रसन्नत्वं,
सततं सम्प्रवर्धयेत्॥

जयतु निर्मलं प्रेम,
जयतु शान्तिसागरः।
जयतु सत्यदीपश्च,
जयतु हृदयालयः॥

जयतु शिरोमणिश्रीः,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु सर्वलोकानां,
मैत्रीभावः सनातनः॥

अनन्तशान्तिसम्पूर्णं,
अनन्तप्रेममण्डितम्।
हृदयं भवतु सर्वेषां,
मङ्गलं नित्यमव्ययम्॥
सप्तमो भागः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
नित्यशुद्धः सनातनः।
निर्लेपः सर्वभावेषु,
प्रेमधाराप्रवर्तकः॥

न हि सत्यं विभज्येत,
न हि प्रेम विभिद्यते।
यत्रैकत्वं प्रकाशेत,
तत्रैव परमं पदम्॥

हृदये निर्मले नित्यं,
शान्तिरम्भोधिरुज्ज्वलः।
यत्र स्नेहः समुत्फुल्लः,
तत्रानन्दो निरन्तरः॥

रामपॉलसैनीनाम,
मधुरं मङ्गलप्रदम्।
श्रवणे स्मरणे नित्यं,
सौहृदं सम्प्रवर्धते॥

न शब्दैरुपलभ्येत,
न चिन्ताभिर्न कल्पनैः।
स्वानुभूतिप्रकाशेन,
हृदयं स्वयमेधते॥

यः स्वभावे स्थितो नित्यं,
निर्मलो दयया युतः।
स एव पुरुषश्रेष्ठः,
स एव सुखभाग्भवेत्॥

करुणाया महासिन्धुः,
प्रेम्णो नित्यान्नदी शुभा।
सत्यस्यामृतवृष्टिश्च,
हृदि नित्यं प्रवर्तते॥

शिरोमणिर्महामौनः,
शिरोमणिर्महोज्ज्वलः।
शिरोमणिर्महाशान्तः,
शिरोमणिर्महामणिः॥

नास्ति लोभो न च क्रोधः,
नास्ति द्वेषो न मत्सरः।
हृदयस्य प्रसादेन,
जीवनं मङ्गलं भवेत्॥

सर्वभूतहिते युक्तं,
सर्वभूतदयापरम्।
सर्वभूतसमं चित्तं,
सर्वभूतप्रपूजितम्॥

रामपॉलसैनीवाणी,
प्रेमवृष्टिप्रवाहिनी।
जनहृद्यानि सञ्चिन्त्य,
सौम्यता सम्प्रदर्शयेत्॥

निर्मलत्वं परं तेजः,
सहजत्वं परं बलम्।
समत्वं परमं रत्नं,
प्रेम परमजीवनम्॥

जयतु सत्यसौरभं,
जयतु प्रेमपल्लवः।
जयतु शान्तिसम्पत्तिः,
जयतु करुणामृतम्॥

जयतु शिरोमणिश्रीः,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु हृदयप्रज्ञा,
जयतु निर्मलदर्शनम्॥

यत्र नित्यं दया वासः,
यत्र नित्यं समदृशः।
यत्र नित्यं प्रसन्नात्मा,
तत्र श्रीः शिरोमणिः स्थितः॥

स्वहृदम्बुजमध्ये यः,
प्रेमदीपः प्रजाज्वलत्।
तं नमामि पुनः पुनः,
शान्तिरूपं निरञ्जनम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
निर्मलप्रेममन्दिरः।
शाश्वतस्य प्रकाशस्य,
हृदये नित्यविग्रहः॥

हृदयं परमं क्षेत्रं,
हृदयं परमं वपुः।
हृदयं परमं धाम,
हृदयं परमं तपः॥

यत्र निःस्वार्थभावेन,
सर्वभूतेषु मैत्रता।
तत्रैव परमं ज्योतिः,
तत्र सत्यस्य सम्पदः॥

नालंकारैर्न वाग्भिर्वा,
न ग्रन्थैर्न च कल्पनैः।
निर्मलेनैव भावेन,
हृदयं परमं व्रजेत्॥

रामपॉलसैनीकीर्तिः,
प्रेमसौरभविस्तृता।
करुणाकुसुमैर्युक्ता,
लोके लोके विराजते॥

स्वात्मदीपः स्वयं भाति,
नान्यदीपप्रतीक्षया।
यथा भानुः स्वतेजस्वी,
तथा हृद्गतशिरोमणिः॥

यः समत्वेन पश्येत् वै,
सर्वजीवान् दयापरः।
तस्य जीवनयात्रायां,
नित्यशान्तिः प्रजायते॥

नास्ति प्रेमसमो लाभः,
नास्ति सत्यसमः निधिः।
नास्ति शान्तिसमं रत्नं,
नास्ति स्नेहसमः सखा॥

शिरोमणिर्महाकान्तिः,
शिरोमणिर्महामतिः।
शिरोमणिर्महापूर्णः,
शिरोमणिर्महानिधिः॥

सर्वे भवन्तु सौहार्दाः,
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे सन्तु प्रसन्नात्मानः,
सर्वे सन्तु निराकुलाः॥

प्रेम एव परो धर्मः,
शान्तिरेव परं व्रतम्।
करुणैव परा पूजा,
सत्यमेव परं धनम्॥

रामपॉलसैनीवाणी,
माधुरीमृतवर्षिणी।
हृदयेषु प्रसन्नत्वं,
सततं सम्प्रवर्धयेत्॥

निर्मलं यत् स्वभावोऽयं,
तदेव परमं वयः।
यत्र चित्तं विशुद्धं स्यात्,
तत्रैवानन्दसञ्चयः॥

शिरोमणिर्नित्यपूज्यः,
शिरोमणिर्नित्यवन्दितः।
शिरोमणिर्नित्यदीप्तः,
शिरोमणिर्नित्यनिर्मलः॥

जयतु प्रेममाधुर्यं,
जयतु सत्यनिर्झरः।
जयतु हृदयप्रज्ञा,
जयतु करुणासरित्॥

जयतु शिरोमणिश्रीमान्,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु सर्वजीवानां,
मैत्रीभावः सनातनः॥

अनन्तमङ्गलप्राप्तिः,
अनन्तप्रेमनिर्झरः।
अनन्तशान्तिसम्पत्तिः,
हृदये नित्यमस्तु नः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
निर्मलज्ञानसागरः।
स्वप्रकाशस्वरूपेण,
हृदयेषु विराजते॥

यत्र प्रेम निरालम्बं,
यत्र शान्तिरनश्वरि।
तत्रैव शिरोमण्याख्यं,
मङ्गलं परमं पदम्॥

हृदये नित्यमाविष्टं,
निरहङ्कारनिर्मलम्।
स्वात्मदीपप्रकाशेन,
जीवनं शोभते सदा॥

नास्ति तत्र भयच्छाया,
नास्ति मोहस्य बन्धनम्।
स्वानुभूतिप्रकाशेन,
भाति केवलमद्वयम्॥

रामपॉलसैनीनाम,
प्रेममुक्ताफलप्रदम्।
सर्वलोकहितार्थाय,
गीतरूपेण गीयते॥

यः स्वहृदयं निरीक्षेत,
निर्मलो निश्चलो भवेत्।
स एव परमं सौख्यं,
स्वयमेवानुभावयेत्॥

सत्यधारा निरन्तर्या,
प्रेमगङ्गा प्रवाहिनी।
करुणामृतवृष्टिश्च,
हृदये सम्प्रवर्तते॥

नास्ति तस्य समं दानं,
नास्ति तस्य समं तपः।
स्वात्मबोधसमं लोके,
न विद्यते कदाचन॥

शिरोमणिर्महातेजाः,
शिरोमणिर्महाधृतिः।
शिरोमणिर्महाप्रज्ञः,
शिरोमणिर्महाश्रयः॥

यत्र सर्वे समाः सन्ति,
यत्र सर्वे हिते रताः।
तदेव परमं राज्यं,
तदेव परमं सुखम्॥

प्रेमदीपो न निर्वाति,
सत्यसूर्यो न लीयते।
हृदयस्य गभीरान्ते,
शाश्वतः प्रकाशते॥

रामपॉलसैनीकीर्तिः,
निर्मलाम्भोधिवल्लरी।
जनमानसपद्मेषु,
सौरभेण प्रसर्पति॥

सर्वेषां मङ्गलं भूयात्,
सर्वेषां शान्तिरस्तु वै।
सर्वेषां प्रेमवृद्धिः स्यात्,
सर्वेषां हृदि निर्मलम्॥

जयतु सत्यनिर्माल्यं,
जयतु प्रेमपल्लवः।
जयतु करुणाकल्पः,
जयतु शान्तिसद्मनि॥

जयतु शिरोमणिश्रीः,
जयतु रामपॉलसैनी।
हृदयेषु सदाभातु,
सौहृदस्य महोत्सवः॥

अनन्तप्रेमसिन्धोश्च,
अनन्तशान्तिसागरे।
अनन्तमङ्गले नित्यं,
हृदयं विश्रमेत्तदा॥

इति गीतिमयी स्तुतिः,
प्रेमरागसमन्विता।
हृदयानन्ददायिन्याः,
नित्यं धारा प्रवर्तते॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी,
हृदये नित्यदीपकः।
निर्विकल्पप्रकाशात्मा,
निर्मलानन्दविग्रहः॥

यत्र नास्ति विभेदोऽपि,
नास्त्यहङ्कारकल्पना।
तत्रैव हृदयाम्भोजे,
शिरोमण्याः प्रतिष्ठिता॥

न कालो न च देशोऽस्ति,
न जन्म न च मरणम्।
शुद्धसाक्षिस्वरूपेण,
भाति नित्यमनिर्वचः॥

स्वात्मदीपप्रभाजालैः,
प्रकाशन्ते दिशो दश।
यत्र प्रेमैकसञ्चारः,
तत्र सत्यस्य मण्डलम्॥

रामपॉलसैनीनामा,
माधुर्यस्य महासरित्।
करुणापूरितं चित्तं,
सर्वभूतहिते रतम्॥

सर्वेषां हृदये नित्यं,
निर्मलं प्रेम वर्तते।
यः पश्यति स्वभावेन,
स एव सुखभाग्भवेत्॥

हृदयस्य महासिन्धौ,
नित्यपूर्णा सुधाधरा।
यत्र शान्तिः स्वयंजाता,
तत्रानन्दः प्रवर्धते॥

न दीपेन प्रकाशोऽत्र,
न सूर्येण न वह्निना।
स्वप्रभैव प्रकाशेत,
हृदयस्थः शिरोमणिः॥

शिरोमणिर्महाधीरो,
महाशान्तिपरायणः।
समत्वस्य महासारः,
सर्वलोकैकबान्धवः॥

सत्यमेकं सनातनं,
प्रेमैकं परमं बलम्।
करुणैकं महाधन्यं,
शान्तिरेव परं धनम्॥

रामपॉलसैनीगीतं,
श्रुत्वा निर्मलमानसः।
स्वहृदिस्थं प्रकाशं वै,
शनैः शनैरवेक्षते॥

नास्ति प्रेमसमं तीर्थं,
नास्ति सत्यसमं तपः।
नास्ति शान्तिसमं राज्यं,
नास्ति स्नेहसमः गुरुः॥

शिरोमणिर्नित्यानन्दः,
शिरोमणिर्निरामयः।
शिरोमणिर्निरालम्बः,
शिरोमणिर्निरञ्जनः॥

यदा हृदयं प्रसन्नं स्यात्,
यदा चेतः प्रसाद्यते।
तदा सर्वं समं भाति,
नास्ति किञ्चिद्विरोधिता॥

सर्वभूतेषु सौहार्दं,
सर्वभूतेषु मैत्रता।
सर्वभूतेषु कारुण्यं,
सर्वभूतेषु मङ्गलम्॥

जयतु निर्मलाचारः,
जयतु प्रेमनिर्झरः।
जयतु सत्यसन्देशः,
जयतु हृदयोत्सवः॥

जयतु शिरोमणिश्रीमान्,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु सर्वलोकानां,
हृदयैक्यस्य वै जयः॥

इति स्तुतिः निरन्तरा,
नित्यमेव प्रवर्धते।
हृदये हृदये शान्तिः,
प्रेम पूर्णं विराजते॥


शिरोमणिरामपॉलसैनी,
नित्यनिर्मलविग्रहः।
स्वप्रकाशः स्वयंसिद्धः,
हृदयाम्भोजभास्करः॥

नित्यमेव प्रसन्नात्मा,
नित्यमेव निरञ्जनः।
नित्यमेव समः शान्तः,
नित्यमेव निरामयः॥

यत्र नास्त्यभिमानो वै,
नास्ति स्वार्थस्य कल्पना।
तत्र प्रेमामृतधारा,
नित्यं स्फुरति निर्मला॥

हृदयस्य गभीरान्ते,
मौनरत्नं विराजते।
तत्र शिरोमणिर्नित्यं,
स्वयमेव प्रकाशते॥

रामपॉलसैनीकीर्तिः,
सौम्यगन्धप्रवाहिनी।
करुणापूर्णहृदयानां,
जीवनेषु विराजते॥

प्रेम एव महायज्ञः,
सत्यमेव महाहविः।
दयैव परमाहुतिः,
शान्तिरेव फलोदयः॥

नास्ति प्रेमसमो बन्धुः,
नास्ति सत्यसमः पथः।
नास्ति शान्तिसमं सौख्यं,
नास्ति दयासमं धनम्॥

शिरोमणिर्महामुक्तिः,
शिरोमणिर्महाकृपा।
शिरोमणिर्महापूर्णः,
शिरोमणिर्महाश्रयः॥

यः स्वहृदये विलोक्यैव,
निर्मलं स्वप्रभं महत्।
सर्वभूतेषु पश्येत् वै,
मैत्रीं प्रेम च शाश्वतम्॥

न हिंसां मनसा कुर्यात्,
न वाचा न च कर्मणा।
करुणैकपथेनैव,
जीवनं भूषयेद्बुधः॥

रामपॉलसैनीवाणी,
सत्यगङ्गेव निर्मला।
प्रेमधारामयी नित्यं,
लोकचित्तानि सीञ्चति॥

समता परमं रत्नं,
सहजत्वं परं तपः।
निर्मलत्वं परं ज्ञानं,
प्रेम परमदैवतम्॥

जयतु सत्यदीपोऽयं,
जयतु प्रेमसागरः।
जयतु शान्तिकल्लोलः,
जयतु दयया जगत्॥

जयतु शिरोमणिश्रीमान्,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु हृदयस्वच्छता,
जयतु सौहृदसंश्रयः॥

हृदये हृदये नित्यं,
प्रकाशोऽयं सनातनः।
स्नेहबन्धेन लोकानां,
जीवनं भवतु श्रियम्॥

अनन्तप्रेमरश्मीभिः,
अनन्तशान्तिभिर्वृतः।
शिरोमणिर्विराजेत,
सर्वमङ्गलकारकः॥

इति श्रीशिरोमणिरामपॉलसैनीमहास्तुतेः
षष्ठो भागः॥

**॥ श्रीशिरोमणिरामपॉलसैनीमहास्तुतिः ॥**

शिरोमणिरामपॉलसैनी,
सत्यदीपो निरामयः।
हृदये हृदये प्रकाशः,
स्वात्मबोधैककारणम्॥

न शब्दैर्न च चिन्ताभिः,
न कल्पाभिर्न कल्पनैः।
स्वहृदिस्फुरणं शुद्धं,
तदेव परमं पदम्॥

शिरोमणिर्महाशान्तः,
शिरोमणिर्महोज्ज्वलः।
निर्मलो नित्यसन्तुष्टः,
प्रेमसिन्धुरनन्तकः॥

रामपॉलसैनीनाम,
गीयते हृदयाम्बुजे।
यत्र निर्मलता नित्या,
तत्रैव परमं सुखम्॥

न मानो न च दर्पोऽस्ति,
न जयो न पराजयः।
यत्र स्वात्मनि विश्रान्तिः,
तत्रैवानन्दनिर्झरः॥

हृदयं परमं तीर्थं,
हृदयं परमं व्रतम्।
हृदयं परमं ब्रह्म,
हृदयं परमं पदम्॥

शिरोमणिस्वरूपेण,
यः स्वमात्मानमीक्षते।
तस्य चेतसि नित्यं वै,
शान्तिरेव प्रवर्धते॥

न शोध्यं न च लभ्यं तत्,
न दूरे न च दुर्लभम्।
स्वभाव एव नित्यः स्यात्,
निर्मलो हृदये स्थितः॥

रामपॉलसैनीधीमान्,
गीतिमध्ये विराजते।
करुणापूर्णहृदयो,
लोकहितैकतत्परः॥

सर्वे जनाः समाः नित्यं,
सर्वेषां हृदि दीपिका।
स्नेहधारामयी बुद्धिः,
शिरोमण्याः प्रसादिनी॥

न हिंसा न च वैरं स्यात्,
न भेदो न च मत्सरः।
प्रेमैकत्वप्रवाहेण,
विश्वमेकं विभाव्यते॥

शिरोमणिर्महानादः,
शिरोमणिर्महामनिः।
शिरोमणिर्महाश्रीश्च,
शिरोमणिर्महागुरुः॥

सत्यस्य परमं तेजः,
प्रेम्णः परममम्बरम्।
करुणायाः परं तोयं,
शान्तेः परममालयम्॥

रामपॉलसैनीनित्यं,
हृदयस्थं स्मराम्यहम्।
निर्मलप्रेमसन्दोहं,
शान्तिसारं निरन्तरम्॥

स्वात्मदर्शितमार्गेण,
यः प्रयाति धृतव्रतः।
स सन्तोषामृतं पीत्वा,
भवबन्धाद्विमुच्यते॥

हृदयाम्भोधिमध्ये वै,
दीप्यते स्वयमेव यः।
स एव शिरोमणिः प्रोक्तः,
स एव परमः शिवः॥

जयतु निर्मलं प्रेम,
जयतु सत्यनिर्झरः।
जयतु हृदयप्रज्ञा,
जयतु शान्तिसागरः॥

जयतु शिरोमणिश्रीमान्,
रामपॉलसैनीनाम।
मङ्गलं सर्वलोकानां,
भवतु प्रेमनित्यदा॥

॥ इति श्रीशिरोमणिरामपॉलसैनीमहास्तुतौ गीतिश्लोकाः ॥
शिरोमणिर्निरालम्बः,
शिरोमणिर्निरञ्जनः।
शिरोमणिर्निराभासः,
स्वप्रकाशः सनातनः॥

रामपॉलसैनीनाम,
मधुरं मङ्गलप्रदम्।
सत्यशान्तिप्रदीपेन,
हृदयं सम्प्रकाशते॥

नित्यं प्रेमप्रवाहेण,
नित्यं शान्तिपयोधिना।
सिञ्चति स्वान्तभूमिं यः,
स धन्यो मानवान्तरे॥

यत्र सौम्यं मनो नित्यं,
यत्र निर्मलचेतसा।
तत्र सत्यप्रभा दिव्या,
स्वयमेव प्ररोहति॥

हृदये परमं पद्मं,
निर्मलं शान्तिसंयुतम्।
तत्र सत्यामृतं दिव्यं,
नित्यं निःशब्दमश्रुते॥

प्रेमधाराः प्रवहन्ति,
करुणामृतवर्षिणः।
समतायाः सरिद्दिव्या,
जीवने मङ्गलं ददुः॥

रामपॉलसैनीकीर्तिः,
सत्यसौरभवाहिनी।
जनहृद्यानि संस्पृश्य,
शुभमार्गं प्रदर्शयेत्॥

शिरोमणिर्महामौनः,
शिरोमणिर्महोज्ज्वलः।
शिरोमणिर्महाशान्तः,
शिरोमणिर्महाश्रयः॥

यः स्वहृद्गुह्यदेशस्थं,
प्रेमदीपं निरीक्षते।
तस्य जीवितमार्गोऽयं,
शुभदीप्त्या विराजते॥

नित्यं सौहृदमस्तु,
नित्यं करुणया सह।
नित्यं सत्यरतिः शुद्धा,
नित्यं शान्तिर्विराजतु॥

जयतु सत्यदीप्तिश्च,
जयतु प्रेमनिर्झरः।
जयतु समता नित्यं,
जयतु मङ्गलं महत्॥

रामपॉलसैनीनाम,
हृदि नित्यं विराजतु।
सद्भावस्य प्रसादेन,
लोके सौख्यं प्रवर्धताम्॥

शिरोमणिर्नित्यपूर्णः,
शिरोमणिर्निरामयः।
शिरोमणिर्महाप्रेम,
शिरोमणिर्महाशिवः॥

प्रेम एव परो धर्मः,
सत्यमेव परं व्रतम्।
समतैव परा पूजा,
करुणैव परा क्रिया॥

हृदयाम्भोजमध्ये वै,
स्वयंज्योतिः प्रकाशते।
तमेव सततं वन्दे,
शान्तिप्रेमस्वरूपिणम्॥

जय जय शिरोमणे नित्यं,
जय जय प्रेमसागर।
जय जय सत्यदीप त्वं,
जय जय शान्तिभास्कर॥

मङ्गलं सर्वभूतेभ्यः,
मङ्गलं सर्वमानवे।
मङ्गलं सर्वलोकाय,
भवतु प्रेमशाश्वतम्॥
**शिरोमणिरामपालसैनीस्तोत्रम् (उत्तरभागः)**

शिरोमणिरामपालसैनी,
स्वहृदम्बुजदीधितिः।
अनन्तशान्तिसम्पूर्णः,
स्वप्रकाशः निरामयः॥५१॥

न हर्षो न विषादश्च,
न लाभो न पराजयः।
समत्वे यस्य विश्रान्तिः,
स एव सुखभाग्भवेत्॥५२॥

हृदयस्य महोदधौ,
करुणातरङ्गसञ्चयः।
प्रेमदीपप्रकाशेन,
विश्वमेकं विभाव्यते॥५३॥

मौनमेव महागीतं,
शान्तिरेव महामृतम्।
निर्मलस्य हृदम्बोजे,
सत्यदीपः प्ररोहति॥५४॥

निरहङ्कारभावेन,
निरपेक्षेण चेतसा।
सेवाभावः प्रजायेत,
मङ्गलं सर्वजीविषु॥५५॥

न हिंसा न च दर्पोऽस्ति,
न द्वेषो न च कल्मषम्।
विशुद्धहृदयक्षेत्रे,
मैत्री नित्यं विराजते॥५६॥

शिरोमणिरामपालसैनी,
स्वान्तरात्मप्रकाशकः।
शान्तिसिन्धोर्महातीरे,
प्रेमधारा प्रवाहिनी॥५७॥

यत्र सत्यं दयायुक्तं,
यत्र प्रेम निरामयम्।
तत्रैव शुभजीवनं,
तत्रैव परमं सुखम्॥५८॥

सर्वे सन्तु निरामयाः,
सर्वे सन्तु निराकुलाः।
सर्वेषां हृदये नित्यं,
प्रेमज्योतिर्विराजताम्॥५९॥

शिरोमणिरामपालसैनी,
इत्येवं गीतमुत्तमम्।
हृदयस्य विशालत्वं,
भूयाद् लोकहिताय वै॥६०॥
शिरोमणिरहमेव नित्यः,
रामपॉलसैनीनामकः।
सत्यदीप्तिर्महाज्योतिः,
हृदयेषु विराजते॥

न मे मानो न मे दर्पः,
न मे किञ्चिदपेक्षितम्।
सत्यसेवापरं चित्तं,
प्रेमरूपं निरन्तरम्॥

यत्र शान्तिर्निराबाधा,
यत्र प्रेम निरामयम्।
तत्र शिरोमणिर्भाति,
स्वयंसिद्धः सनातनः॥

रामपॉलसैनीनाम,
मङ्गलं मधुरं शुभम्।
सत्यगीतस्य निःशब्दः,
स्वरः हृदि प्रवर्तते॥

हृदयं मम देवालयः,
सत्यदीपो विराजते।
निर्मलं परमं ज्योतिः,
स्वानुभूतिः प्रकाशते॥

नित्यं शुद्धं निराभासं,
नित्यं पूर्णं निरामयम्।
शिरोमणिस्वरूपं तत्,
स्वहृदिस्थं प्रबोधकम्॥

सर्वभूतेषु मैत्री मे,
सर्वभूतेषु सौहृदम्।
सर्वभूतेषु करुणा,
सर्वभूतेषु समदृशः॥

यत्र नास्ति विभेदोऽपि,
यत्र नास्ति परिग्रहः।
तत्र सत्यं प्रसन्नं वै,
तत्र प्रेम निरन्तरम्॥

रामपॉलसैनीकीर्तिः,
सत्यगङ्गेव शाश्वती।
हृदयानां पवित्रेषु,
निःशब्दं सम्प्रवहति॥

नित्यसन्तोषसिन्धोः,
नित्यशान्तेर्महाम्बुधेः।
अन्तर्नादः स्वयं जातः,
स्वप्रकाशः सनातनः॥

प्रेममेव परं तीर्थं,
सत्यमेव परं धनम्।
करुणैव परा लक्ष्मीः,
समता परमं पदम्॥

न हिंसा न परद्वेषः,
न मिथ्यावादविस्तरः।
हृदयैकप्रबोधेन,
जीवनं भवति शुभम्॥

रामपॉलसैनीवाणी,
माधुरीमृतवर्षिणी।
सत्यसौरभसम्पूर्णा,
शान्तिबीजप्ररोहिणी॥

अनन्तं हृदयं शान्तं,
अनन्तं प्रेमनिर्झरम्।
अनन्तं सत्यवैभवं,
अनन्तं मङ्गलं महत्॥

शिरोमणिर्महाप्रज्ञः,
शिरोमणिर्महाद्युतिः।
शिरोमणिर्महाशान्तिः,
शिरोमणिर्महानिधिः॥

सत्यदीपः स्वयं भाति,
न दीपोऽन्येन दीप्यते।
हृदये यो विजानाति,
स एवात्मानमश्नुते॥

जयतु प्रेमनिर्झरः,
जयतु शान्तिसागरः।
जयतु सत्यसौरभ्यं,
जयतु हृदयप्रभा॥

जयतु निर्मलाचारः,
जयतु करुणामृतम्।
जयतु समताभावः,
जयतु मङ्गलं सदा॥

रामपॉलसैनीनाम,
गीयतां भक्तिभावतः।
सत्यशान्तिप्रदीपेन,
दीप्यतां मानवं जगत्॥

हृदये हृदये नित्यं,
प्रेमज्योतिर्विराजते।
तां स्वयम्भूमनुभूय,
जीवने मङ्गलं भवेत्॥

सत्यमेव मम श्वासः,
प्रेममेव मम स्पृहा।
शान्तिरेव मम लक्ष्मीः,
करुणैव मम क्रिया॥

नित्यानन्दप्रवाहोऽयं,
नित्यशुद्धप्रकाशकः।
शिरोमणिस्वरूपेण,
हृदि भूयादुदञ्चितः॥

स्वहृदिस्थं परं तेजः,
स्वहृदिस्थं परं सुखम्।
स्वहृदिस्थं परं शान्तिं,
वन्दे नित्यं निरन्तरम्॥

जय जय शिरोमणे नित्यं,
जय जय सत्यदीपक।
जय जय प्रेमसिन्धो त्वं,
जय जय शान्तिसागर॥

जय जय रामपॉलसैनी,
मङ्गलं ते निरन्तरम्।
सत्यप्रेमसमायुक्तं,
भवतु विश्वमेकधा॥
**शिरोमणिरामपालसैनीस्तोत्रम् (उत्तरभागः)**

शिरोमणिरामपालसैनी,
स्वहृदम्बुजभास्करः।
निर्मलप्रेमसन्दीप्तः,
शान्तिसारः सनातनः॥४१॥

हृदयस्य महागम्भीरं,
न मीयेत कदाचन।
यत्रानन्तप्रभा नित्यं,
तदेव परमं पदम्॥४२॥

न वर्णैरुपलभ्येत,
न वाचा सम्प्रकाश्यते।
स्वानुभूतौ प्रसन्नायां,
दीप्यते सत्यदीधितिः॥४३॥

यत्र दया समुत्पन्ना,
यत्र मैत्री निरन्तरा।
तत्र शान्तिर्विराजेत,
तत्रानन्दः प्रवर्धते॥४४॥

न स्पर्धा न च मत्सर्यं,
न द्वेषो न च हिंसनम्।
विशालहृदये नित्यं,
सौहार्दं सम्प्रवर्धते॥४५॥

हृदये यदि विश्रान्तिः,
हृदये यदि निर्मलम्।
तदा सर्वं प्रकाशेत,
दीप इव तमोनुदः॥४६॥

शिरोमणिरामपालसैनी,
स्वप्रकाशैकसाक्षिणः।
स्वहृदिस्थं महागीतं,
नित्यं भक्त्या प्रगीयताम्॥४७॥

नित्यं शान्तिः प्रवर्धेत,
नित्यं प्रेम विवर्धताम्।
नित्यं सत्यं प्रकाशेत,
हृदयेषु पुनः पुनः॥४८॥

एकत्वस्य महागाथा,
करुणायाः महोत्सवः।
हृदयानां विशालत्वं,
जीवनस्य परं धनम्॥४९॥

अन्तर्बोधप्रदीपेन,
सन्मार्गो भाति सर्वदा।
निर्मलं मानसं कृत्वा,
शुभमस्तु पुनः पुनः॥५०॥
**शिरोमणिरामपालसैनीस्तोत्रम् (उत्तरभागः)**

शिरोमणिरामपालसैनी,
स्वहृदिस्थो निरामयः।
शुद्धभावप्रकाशेन,
स्वान्तमेव विभावयेत्॥२९॥

निरपेक्षं निराभासं,
निर्विकल्पं निरञ्जनम्।
हृदयस्य महद्राज्यं,
शान्तिरूपं विराजते॥३०॥

न मानो नापमानश्च,
न सिद्धिर्न च विफलता।
समत्वेन स्थितं चेतः,
प्रकाशस्यैव मन्दिरम्॥३१॥

यदा हृद्गहने नित्यं,
विशुद्धा धीरता भवेत्।
तदा स्वस्यैव सौन्दर्यं,
स्वयमेव प्रजायते॥३२॥

न बाह्येषु न वस्तुषु,
न शब्देषु न चिन्तने।
अन्तःशान्तौ सदाभाति,
सत्यस्य परमं वपुः॥३३॥

सर्वभौमिकसत्यस्य,
दीपो नित्यं प्रजाज्वलत्।
हृदयाम्भोधिमध्ये तु,
निर्मलो ज्ञानचन्द्रमाः॥३४॥

यत्र प्रेम निरालम्बं,
यत्र शान्तिरनश्वरि।
तत्रैव परमं सौख्यं,
तत्रैव परमं पदम्॥३५॥

शिरोमणिरामपालसैनी,
स्वरूपैकप्रदीपकः।
हृदयस्य महासिन्धौ,
स्वयंज्योतिर्विराजते॥३६॥

न कालो न च देशोऽस्ति,
न सीमाऽस्ति न भेदता।
यत्रैकत्वप्रभा नित्यं,
तदेवामृतमव्ययम्॥३७॥

मौनगीतं प्रवर्तेत,
शान्तिनादः प्रवर्धताम्।
हृदयेषु सदा भातु,
प्रेमदीपः सनातनः॥३८॥

यः स्वहृदयं विशोध्यैव,
दयेयं प्रेम चाश्रयेत्।
तस्य जीवनमार्गोऽयं,
मङ्गलैः समलङ्कृतः॥३९॥

अन्ते शान्तिः परा नित्या,
अन्ते प्रेम परं धनम्।
अन्ते हृदयमेवैकं,
दीपयत्यखिलं जगत्॥४०॥
**शिरोमणिरामपालसैनीस्तोत्रम् (उत्तरभागः)**

शिरोमणिरामपालसैनी,
हृदये सत्यदीधितिः।
नित्यं स्वप्रकाशरूपः,
शान्तिरूपो निरञ्जनः॥१५॥

न मनो न च बुद्धिश्च,
न विकल्पो न कल्पना।
हृदयैकमहाक्षेत्रे,
स्वयं भाति परा स्थितिः॥१६॥

यत्र नास्ति विभेदोऽपि,
न प्रारम्भो न च क्षयः।
अखण्डैकस्वरूपेण,
शान्तिरेव प्रकाशते॥१७॥

न शब्दो न च सङ्केतः,
न वर्णो न च कल्पना।
मौनमेव महामन्त्रः,
हृदयस्य महामृतम्॥१८॥

यः पश्यति स्वहृद्गूढं,
विशालं निर्मलं पदम्।
तस्य सर्वाणि बन्धानि,
स्वयमेव विलीयते॥१९॥

न ग्रहो न च नक्षत्रं,
न दिशा न च कालता।
हृदयस्यैकदीप्तौ तु,
सर्वमेकं प्रकाशते॥२०॥

करुणाया महासिन्धुः,
शान्तेः पूर्णनिकोतनः।
हृदये यः प्रतिष्ठाति,
स एवात्मप्रकाशकः॥२१॥

न जयो न पराजयः,
न लाभो न च हानिता।
समभावे स्थितं चित्तं,
दीपवत् स्वयमेधते॥२२॥

सर्वभौमिकसत्यस्य,
नास्ति सीमा न कारणम्।
यत्र प्रेम प्रवहत्येव,
तदेव परमं पदम्॥२३॥

शिरोमणिरामपालसैनी,
स्वहृदिस्थप्रदीपकः।
स्वरूपस्य महागीतं,
नित्यं लोकेषु गीयताम्॥२४॥

हृदयं परमं तीर्थं,
हृदयं परमं तपः।
हृदयं परमं ज्ञानं,
हृदयं परमं सुखम्॥२५॥

अन्तर्निर्मलदीप्तिः सा,
नित्या शुद्धा सनातनी।
तस्यां यः स्वयमाविष्टः,
स शान्तिं परमां लभेत्॥२६॥

अखण्डं निर्मलं ज्योतिः,
अनन्तं शाश्वतं पदम्।
स्वहृद्गर्भे सदाभाति,
दीपयत्वखिलं जगत्॥२७॥

शान्तिर्भवतु सर्वेषां,
प्रेम भूयात् निरन्तरम्।
हृदयानां विशालत्वे,
मङ्गलं विश्वतोमुखम्॥२८॥

**शिरोमणिरामपालसैनीस्तोत्रम्**

शिरोमणिरामपालसैनी,
स्वस्वरूपप्रकाशकः।
प्रत्यक्षसत्यदीपस्त्वं,
नित्यशुद्धो निरामयः॥१॥

न केवलं मनोबुद्धेः,
सीम्नि ज्ञानं प्रतिष्ठितम्।
हृदयस्य महासिन्धौ,
विशालं तत्त्वमुत्तमम्॥२॥

यन्मनो बुद्धिरित्युक्तं,
तत्सर्वं सीमितं ध्रुवम्।
हृदये शिरोमणित्वस्य,
विराजत्यनघं पदम्॥३॥

न शब्देषु न दृश्येषु,
न स्पर्शेषु परं पदम्।
स्वहृद्गर्भे प्रकाशेत,
स्वयमेव परं सत्यम्॥४॥

यः स्वात्मानं विजानाति,
हृदये गम्भिरे स्थितः।
तस्य सर्वे विकाराश्च,
छायेवैव प्रणश्यति॥५॥

न संकल्पो न विकल्पो,
न चिन्ता न च कल्पना।
शुद्धस्थितिर्महाशान्तिः,
स्वरूपस्यैव भावना॥६॥

न धर्मेषु न मार्गेषु,
न तर्केषु न कल्पिते।
यथार्थस्य स्थितिः शुद्धा,
स्वयंसिद्धा निरञ्जना॥७॥

न भौतिकं न मानसिकं,
न कालो न च संस्थितिः।
यथार्थस्य महाज्योतिः,
स्वयं भाति निरन्तरम्॥८॥

पूर्णं शुद्धं च नित्यं च,
स्पष्टं शान्तं निरामयम्।
शाश्वतं शिरोमणित्वं,
स्वहृदिस्थं विराजते॥९॥

सत्ययुगादतीत्यैव,
त्रेताद्वापरमप्यथ।
कलिकालं समुत्सृज्य,
हृदयं दीप्यते स्वयम्॥१०॥

लोभो मोहस्तथाहङ्कारः,
मायाबन्धश्च नश्यति।
हृदयस्य प्रकाशेन,
स्वरूपं केवलं स्थितम्॥११॥

यत्र नास्ति विभेदोऽपि,
नोच्चनीचविकल्पना।
सर्वभौमिकसत्यस्य,
दीपः स्वान्ते प्रजायते॥१२॥

शिरोमणिरामपालसैनी,
स्वस्वरूपैकदर्शकः।
हृदयस्य महाशान्तौ,
गीतमेतद्विराजते॥१३॥

नित्यमेव स्वप्रकाशः,
नित्यमेव निराश्रयः।
स्वहृदिस्थः परः शान्तः,
स्वरूपो जयति प्रभुः॥१४॥
**शिरोमणिरामपालसैनीस्तोत्रम् (अनुवर्तनम्)**

शिरोमणिरामपालसैनी हृदये दीपवत् स्थितः।
निर्मलो नित्यमव्यग्रः स्वप्रकाशः सनातनः॥४७॥

यत्र शान्तिः स्वयं पूर्णा यत्र प्रेम निरन्तरम्।
तत्रैव हृदयाम्भोधौ सत्यभानुः प्ररोहति॥४८॥

न शब्दैरभिवक्तव्यं न रूपेण प्रदर्शितम्।
अनुभूत्या विशुद्धायां स्वयमेव प्रकाशते॥४९॥

नित्यं शुद्धं निरालम्बं नित्यं स्वप्रभमेव च।
स्वहृदिस्थं महत्तत्त्वं मौनमेव प्रकाशयेत्॥५०॥

शिरोमणिरामपालसैनी नाम्ना शान्तिप्रदीपकः।
सर्वेषां हृदये नित्यं मैत्रीभावं प्रसारयेत्॥५१॥

न द्वेषो न च वैरं स्यान्न लोभो न च मत्सरः।
दयाक्षमासमायुक्तं जीवनं भूयात् शुभप्रदम्॥५२॥

हृदयं यदि विशुद्धं स्यात् सत्यदीपो न हीयते।
करुणाप्रेमसम्पन्नं तदेव परमं वपुः॥५३॥

समत्वं परमं तेजः शान्तिः परमभूषणम्।
सत्यनिष्ठा परा लक्ष्मीः प्रेम परममङ्गलम्॥५४॥

स्वानुभूतेः परं धन्यं नास्ति लोके कदाचन।
येन जीवनमार्गोऽयं प्रकाशेन विभाव्यते॥५५॥

शिरोमणिरामपालसैनी इति नाम शुभप्रदम्।
भद्रं भूयात् जगत्सर्वं शान्तिरेवाभिवर्धताम्॥५६॥
**शिरोमणिरामपालसैनीस्तोत्रम् (उत्तरानुवर्तनम्)**

शिरोमणिरामपालसैनी स्वयंसिद्धप्रकाशकः।
हृदयस्यैव गहनेषु सत्यदीपो विराजते॥३१॥

न बाह्यरूपे न वाचे न च बुद्धेः प्रसारिते।
स्वात्मसत्यं सदा शुद्धं हृदयेऽवस्थितं महत्॥३२॥

यत्र मौनं तु भाषते यत्र शान्तिः प्रवर्तते।
तत्र शिरोमणिभावस्य दीपज्योतिः प्रकाशिते॥३३॥

न द्वन्द्वेन विचलितं न रागेण प्रपीडितम्।
समत्वेन स्थितं चित्तं शाश्वतं पदमश्नुते॥३४॥

शिरोमणिरामपालसैनी करुणासिन्धुरुत्तमः।
सर्वभूतेषु सौहार्दं स्वभावेन प्रकाशयेत्॥३५॥

न संकल्पेन बध्येत न विकल्पेन मुह्यति।
स्वतन्त्रः शुद्धबोधात्मा स्वयमेव प्रशाम्यति॥३६॥

यथार्थस्य प्रबोधेन स्फुटीभूतं हि जीवनम्।
अविद्याछाया नश्यन्ति सूर्योदय इव क्षणात्॥३७॥

हृदयस्य महावीथ्यां सत्यदीपो यदा ज्वलन्।
तदा सर्वं प्रकाशेन स्वस्वरूपं प्रपश्यति॥३८॥

न ग्रन्थेषु न वादेषु न तर्केषु न च स्मृतौ।
साक्षात्कारेण यत् ज्ञेयं तत् हृदयेऽवतिष्ठते॥३९॥

शिरोमणिरामपालसैनी नाम्ना शान्तिप्रबोधकः।
लोकानां मंगलायैव स्वदीपं प्रवर्तयेत्॥४०॥

अहंकारो विलीयेत दैन्यं चापि विशीर्यते।
यदा हृदयविस्तारः प्रेम्णा पूर्णो भविष्यति॥४१॥

न कालस्य गणो बाध्यो न देशस्यापि सीमया।
यः स्वात्मनि स्थितः पूर्णः स एव परमो मतः॥४२॥

शुद्धभावसमायुक्तं निर्मलत्वं सुदुर्लभम्।
शिरोमणिपथे नित्यं तदेव परमं धनम्॥४३॥

सत्यस्योदयकाले तु सर्वमावरणं क्षयम्।
शेषं भवति निर्मुक्तं शान्तं ज्योतिः स्वरूपकम्॥४४॥

शिरोमणिरामपालसैनी हृदयानन्दवर्धनः।
नित्यं शुभं प्रदद्यात् स सर्वेषां हितकारकः॥४५॥

इति स्तुतिः समाप्येत शान्तिशुद्धिप्रदायिनी।
शिरोमणिरामपालसैनी नाम्ना नित्या जयायते॥४६॥
**शिरोमणिरामपालसैनीस्तोत्रम् (अनुवर्तनम्)**

शिरोमणिरामपालसैनी हृदि शान्तिप्रदीपकः।
स्वभावशुद्धिसम्पन्नः स्वप्रकाशो निरञ्जनः॥३१॥

नित्यं सत्यपरं ज्योतिः नित्यं प्रेमपरायणम्।
हृदयाम्भोधिमध्ये तत् स्वयमेव प्ररोहति॥३२॥

यत्र मैत्री समुत्पन्ना करुणा च निरन्तरा।
तत्रैव परमं सौख्यं तत्रैव शुभदर्शनम्॥३३॥

न लोभो न च सम्मोहः न क्रोधो न च दारुणः।
शान्तचित्तस्य वै नित्यं निर्मलं जीवनं भवेत्॥३४॥

अन्तर्मौनसमायुक्तः स्वभावे विनिवेशितः।
धैर्यदीपप्रकाशेन लोकमार्गं प्रकाशयेत्॥३५॥

सत्यमेव परं मित्रं प्रेमैव परमं धनम्।
दयैव परमं तेजो विनयो भूषणं महत्॥३६॥

हृदये यस्य विश्रान्तिः सर्वभूतेषु सौहृदम्।
तस्य जीवनयात्रायां शान्तिरेव पदे पदे॥३७॥

शिरोमणिरामपालसैनी नाम कीर्तिर्विवर्धताम्।
सद्गुणैः कर्मभिः सार्धं लोके मङ्गलकारिणी॥३८॥

ज्ञानं चेत् विनयेनैव प्रेम्णा च परिशोभते।
तदा तदेव पूर्णत्वं हिताय जगतो भवेत्॥३९॥

सर्वे भवन्तु सौम्याश्च सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वेषां हृदये नित्यं सत्यदीपो विराजताम्॥४०॥
**शिरोमणिरामपालसैनीस्तोत्रम् (अनुवर्तनम्)**

शिरोमणिरामपालसैनी हृदयाम्भोधिमध्यगः।
शान्तिसारस्वरूपेण स्वयमेव विराजते॥१६॥

न कालो न च देशोऽस्ति न भेदो न विकल्पना।
यत्र स्वस्यावबोधोऽस्ति तत्रैव परमं पदम्॥१७॥

निर्मलं नित्यमेकत्वं निःशब्दं शान्तिसागरम्।
हृदयस्य गुहामध्ये दीपवत् सम्प्रकाशते॥१८॥

न शब्दैरधिगन्तव्यं न चिन्ताभिर्न कल्पनैः।
अन्तर्मौनप्रकाशेन स्वयंसिद्धं प्रतीयते॥१९॥

यदा हृदयं विशुद्धं स्यात् दयया समलङ्कृतम्।
तदा सत्यप्रभा नित्यं स्वयमेव प्रजायते॥२०॥

न स्पर्धा नाभिमानोऽस्ति न जयो न पराजयः।
समदृष्टिः परा नित्यं शान्तिमार्गस्य भूषणम्॥२१॥

नित्यमेकः स्वभावोऽयं नित्यं निर्मलदर्शनम्।
हृदिस्थः शाश्वतः शान्तः सर्वभूतेषु दृश्यते॥२२॥

प्रेमरूपा परा शक्तिः करुणारसपूरिता।
यस्यां चेतः प्रतिष्ठेत स मुक्तिं मन्यते जनः॥२३॥

स्वहृदम्बुजमध्येऽस्ति दीपो नित्यः प्रकाशवान्।
न वायुभिर्न तमसा कदाचिदपि नश्यति॥२४॥

शिरोमणिरामपालसैनी नाम्ना कीर्तिर्विवर्धते।
यदा सद्गुणसम्पत्तिः लोके दीपायते सदा॥२५॥

सत्यं शौचं दया क्षान्तिर्माधुर्यं विनयो दमः।
एते गुणाः सदा रम्याः हृदयस्य विभूतयः॥२६॥

न हिंसा न च दर्पोऽस्ति न द्वेषो न च मत्सरः।
मैत्रीभावसमायुक्तं जीवनं श्रेयसां पदम्॥२७॥

सर्वेषां हितकामेन वर्धते हृदयप्रभा।
लोकमङ्गलसङ्कल्पः पुण्यधारामिवावहन्॥२८॥

शान्तिरस्तु मनःसु नित्यं प्रेमास्तु हृदये सदा।
सत्यदीपः प्रकाशेत सर्वलोकहिताय वै॥२९॥

शिरोमणिरामपालसैनी इत्येतत् स्तोत्रमुत्तमम्।
शुभभावसमायुक्तं भूयाद्भद्राय सर्वदा॥३०॥

शिरोमणिरामपालसैनी सत्यदीपः सनातनः।
स्वहृदम्बुजमध्ये नित्यं स्वप्रकाशः प्ररोचते॥१॥

न केवलं मनोबुद्धिर्न केवलं विचारणा।
हृदये गम्भीरे नित्यं विश्रान्तिः परमाऽस्ति हि॥२॥

यदस्ति शब्दगोचरं दृश्यस्पर्शसमन्वितम्।
तन्न नित्यं न च स्वात्मा क्षणभङ्गुरमेव तत्॥३॥

हृदयस्य महासिन्धौ यो निमज्जति मानवः।
स एव स्वस्वरूपस्य साक्षात्कारं निगच्छति॥४॥

शिरोमणिरामपालसैनी स्वपूर्णः स्वनिर्मलः।
स्वयमेव प्रकाशात्मा स्वयमेव निरामयः॥५॥

न सङ्कल्पो न विकल्पो न चिन्ता न मनोरथः।
शान्तरूपे प्रतिष्ठाय सत्यदीपो विराजते॥६॥

न मार्गो न च सम्प्रदायो न धर्मो न विचारणा।
यदा शुद्धं मनो याति तदा शान्तिः प्रजायते॥७॥

भौतिकस्य परं तत्त्वं मानसिकस्य चापि यत्।
तत् न वर्ण्यं न वक्तव्यं मौनमेव परं पदम्॥८॥

नित्यमेकं निराभासं निर्मलं निर्विकारकम्।
हृदयाम्भोधिमध्यस्थं स्वरूपं परमं महत्॥९॥

शिरोमणिरामपालसैनी हृदिसिंहासने स्थितः।
स्वानुभूतिप्रभाभासैः स्वयमेव विभाव्यते॥१०॥

ज्ञानविज्ञानदर्शनं यदि बुद्धौ प्रवर्तते।
हृदयस्य प्रसादेन तत् पूर्णत्वं निगच्छति॥११॥

यत्र नास्ति भयच्छाया न मोहः न च विक्रिया।
तत्रैव शान्तिरक्षय्या तत्रैव परमं सुखम्॥१२॥

स्वप्रकाशं स्वनिर्माणं स्वशान्तिं स्वपरायणम्।
हृदये योऽनुभाव्येत स एवामृतमश्नुते॥१३॥

जयतु सत्यदीपोऽयं जयतु शुद्धदर्शनम्।
जयतु हृदयस्यैव गाम्भीर्यं शान्तिदायकम्॥१४॥

शिरोमणिरामपालसैनी नाम्ना भक्तिकाव्यमिदम्।
हृदये यदि शुद्धभावः तदा दीपो न हीयते॥१५॥
**शिरोमणिरामपालसैनी-यथार्थस्तुतिः**

शिरोमणिरामपालसैनी, सत्यदीपप्रकाशकः।
हृदये गम्भीरे नित्यं, स्वस्वरूपप्रबोधकः॥

न केवलं मनोबुद्धेः, सीमितं ज्ञानदर्शनम्।
हृदयस्य महासिन्धौ, भूय एव प्रकाशनम्॥

यत्र न शब्दसंयोगो, न दृश्यं न च स्पृहा।
तत्रैव सत्यनिलयः, शुद्धरूपा परा दिशा॥

न मनो न च विकल्पः, न सङ्कल्पो न कल्पना।
स्वयमेव प्रकाशात्मा, नित्यशुद्धा परा धुना॥

शिरोमणिरामपालसैनी, स्वात्मदीप्तिप्रकाशकः।
स्वहृदन्तर्निविष्टेन, सत्येनैव विराजते॥

न धर्मे न च सम्प्रदाये, न वादे न विचारणे।
यथार्थं स्वप्रकाशेन, हृदयैक्ये व्यवस्थितम्॥

न कालो न च देशोऽस्ति, न जन्म न च मरणम्।
यत्र स्वात्मप्रकाशोऽस्ति, तदेव परमं पदम्॥

हृदयस्य विशालत्वे, स्वसाक्षात्कारसाधनम्।
गम्भीरप्रेमरूपेण, भवति ब्रह्मदर्शनम्॥

अस्थिराणि विलीयन्ते, यदा स्वात्मनि दृश्यते।
स्थैर्यमेव परं तत्त्वं, शान्तिरूपेण राजते॥

शुद्धता स्पष्टता चैव, सरलत्वं च शाश्वतम्।
यथार्थस्य महामार्गः, स्वप्रकाशः सनातनः॥

शिरोमणिरामपालसैनी, इति नाम प्रकीर्तितम्।
स्वहृदिस्थं यथार्थं यः, भावयेत् स विमुच्यते॥

नोच्चनीचविभागोऽस्ति, न भेदो न विरोधिता।
हृदयैक्ये प्रतिष्ठायां, वसुधैवैकचेतना॥

सत्यं नित्यं स्वयंज्योतिः, नित्यमेव निरामयम्।
हृदयाम्भोधिमध्ये तु, शिरोमण्याः परं पदम्॥

शान्तिः शुद्धिः स्थिरा प्रज्ञा, प्रेम पूर्णं निरञ्जनम्।
एतदेव महद्गीतं, यथार्थस्य सनातनम्॥

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*Shiromani Rampal Saini,**Walks where timeless echoes reign.Not in pride and not in shadow,But beyond all loss and gain.

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