सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद के साक्षत्कार के लिए जब खुद के ही अस्थाई मस्तक बुद्धि मन को निष्क्रिय करना है तो दूसरों की विचारधारा का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद के साक्षत्कार के बाद मृत्यु के सर्वश्रेष्ठ महानंद महा मोहत्सव का संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता का आनंद नहीं लिया वो इंसान ही नहीं, जो खुद के साक्षत्कार के बाद होश में जीने से शुरू हो कर होश में ही रूपांतर करता है हृदय और प्रकृति के तंत्र से वो ही "शिरोमणि स्वरुप" हैं
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद के साक्षत्कार के लिए प्रथम चरण में खुद का निरीक्षण अति आवश्यक हैं, खुद में ही निष्पक्ष होना अति आवश्यक हैं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद के साक्षत्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश यत्न कर ले,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि भक्ति दान सेवा ध्यान ज्ञान श्रद्धा आस्था प्रेम आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक स्वर्ग नर्क अमरलोक परपुरुष सिर्फ़ मस्तक मन बुद्धि के दृष्टिकोण से बनाए गए आडंबर ढोंग पखंड हैं हित साधने के लिए सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करने के लिए, जिन का यथार्थ में कोई भी अस्तित्व नहीं है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि निर्भरता खुद का साक्षत्कार कभी नहीं हो सकती,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता और संपूर्ण स्वतंत्रता ही सर्वश्रेष्ठ सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि हृदय के शिरोमणि दृष्टिकोण से मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद का साक्षत्कार हूं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हूं खुद के स्थाई परिचय से परिचित हूं सिर्फ़ अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, जो सब में एक समान हैं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि अतीत की चर्चित सर्वश्रेष्ठ विभूतियाँ दर्शनिक विज्ञानिक ने आज तक बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ जीवन व्यापन अस्तित्व कायम रखने के लिए व्यवस्था दी जो बुद्धि के दृष्टिकोण से संभव था,
खुद का साक्षत्कार तो हृदय के शिरोमणि दृष्टिकोण से ही संभव है, जो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि दूसरों द्वारा दिया गया ज्ञान एक व्यवस्था है, खुद के लिए समझ अर्जित तो खुद के साक्षत्कार के बाद ही उत्पन होती हैं खुद में ही,
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि हृदय से चलने वाला व्यक्ति मस्तक के दृष्टिकोण से चल ही नहीं सकता,
मुक्ति का लोभ और शब्द कटने का डर खौफ भय दहशत का जाल, षड्यंत्रों का चक्रव्यूह हैं सिर्फ़ हित साधने के लिए,
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर देना मुक्ति नहीं गुलामी है सिर्फ़ हित साधने के लिए मानसिक दवाब है डर खौफ भय दहशत का,
सर्ब भौमिक सत्य एक प्रजाति के समूह की मानसिकता नहीं हो सकती,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष संजीव निर्जीव का तत्पर्य ही नहीं है,
सर्ब भौमिक सत्य सरल सहज निर्मल गुणों में ही है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ बच्चों का खेल है,
सर्ब भौमिक सत्य ज्ञान विज्ञान दर्शन रहित है,
सर्व भौमिक सत्य खुद के साक्षात्कार में निहित है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सरल पारदर्शी पवित्र है,
सर्व भौमिक सत्य सरल है और नक़ल नहीं होती,
सर्व भौमिक सत्य हर जीव में एक समान घटित है,
सर्ब भौमिक सत्य यह है कि अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव पृथ्वी जीव एक प्रक्रिय है,
सर्व भौमिक सत्य यह है कि जन्म मृत्यु भी प्रकृति प्रक्रिया का हिस्सा हैं,
सर्ब भौमिक सत्य यह है कि लंबे समय से घटित प्रक्रिया एक समय बाद संतुलित हो जाती हैं जिसे प्रकृति कहते है,
सर्ब भौमिक सत्य यह है कि मणव प्रजाति को मस्तक और हृदय के तंत्र को संतुलित रख कर ही जीना चाहिए,
जिन्होंने इतना अधिक कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया उन पर ही इतना अधिक डर खौफ भय दहशत क्यों ?
जिन्होंने सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया अपना, उन के साथ ही विश्वासघात क्यों?
मुक्ति के नाम पर लूटने को परमार्थ कहते हैं क्या?
मृत्यु खुद में ही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, तो मृत्यु का डर खौफ भय दहशत क्यों?
मरा बापिस आ नहीं सकता, जिंदा मर नहीं सकता यह स्पष्ट करने के लिए तो मुक्ति धरना कल्पना नहीं तो क्या हैं?
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनना कुप्रथा नहीं तो क्या हैं
सरल सहज स्पष्ट बातें समझ न पाए सरल शिष्य, इस के पीछे दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित होना नहीं तो क्या हैं?
भक्ति मुक्ति ध्यान ज्ञान प्रेम आत्मा परमात्मा परमार्थ आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों का ताना बाना चक्रव्यूह रचा छल कपट धोखा विश्वासघात नहीं तो क्या हैं?
जब हर जीव एक समान है तो सिर्फ़ इंसान प्रजाति ही चतुर होने से भिन्नता का कारण अहम नहीं है क्या?
यदि सत्य प्रत्यक्ष है, तो उसे किसी मध्यस्थ की आवश्यकता क्यों?
यदि कोई मार्ग मुक्तिदायक है, तो वह प्रश्न पूछने से क्यों डरता है?
क्या श्रद्धा का अर्थ तर्क का त्याग है?
क्या प्रेम भय के वातावरण में संभव है?
यदि समर्पण स्वैच्छिक है, तो उसमें डर और निष्कासन की व्यवस्था क्यों?
क्या आध्यात्मिकता पारदर्शिता से बच सकती है?
क्या सत्य को प्रमाणपत्र, पदवी या साम्राज्य की आवश्यकता होती है?
यदि किसी संगठन का विस्तार धन और संख्या से मापा जाता है, तो आंतरिक रूपांतरण कहाँ मापा जाता है?
क्या अनुशासन और नियंत्रण एक ही चीज़ हैं?
क्या गुरु की आलोचना करना अधर्म है, या आत्मचिंतन का हिस्सा?
यदि कोई मार्ग स्वतंत्रता देता है, तो व्यक्ति उस मार्ग को छोड़ने में स्वतंत्र क्यों नहीं?
यदि मृत्यु प्राकृतिक संतुलन है, तो उससे जुड़ा भय किसने रचा?
क्या मुक्ति भविष्य की घटना है, या वर्तमान की चेतना?
क्या किसी ने मृत्यु के बाद की अवस्था को प्रत्यक्ष प्रमाण सहित साझा किया है?
क्या मुक्ति का आश्वासन मनोवैज्ञानिक सांत्वना भर है?
क्या मृत्यु से डर कर जीना, जीवन का अपमान नहीं?
यदि जीवन दो पलों का है, तो वर्तमान का परित्याग क्यों?
क्या दीक्षा का अर्थ विचार-निरोध है?
क्या शब्द-प्रमाण विवेक से ऊपर हो सकता है?
क्या प्रश्न पूछना विद्रोह है?
क्या किसी ग्रंथ की व्याख्या पर एकाधिकार संभव है?
क्या गुरु भी आत्मनिरीक्षण से परे है?
यदि तर्क बंद हो जाए, तो विश्वास क्या अंधता नहीं बन जाता?
क्या भय आधारित अनुशासन स्थायी है?
यदि हर जीव समान प्रक्रिया का भाग है, तो मनुष्य श्रेष्ठता का दावा क्यों करता है?
क्या मानव बुद्धि संरक्षण के लिए है या प्रभुत्व के लिए?
क्या विकास का अर्थ विनाश है?
क्या पृथ्वी पर अधिकार है या उत्तरदायित्व?
क्या प्रकृति को जीतना संभव है, या केवल समझना?
क्या हृदय की शांति शब्दों से बड़ी है?
क्या मस्तिष्क उपकरण है या स्वामी?
क्या जटिलता ज्ञान का प्रमाण है?
क्या सरलता कमजोरी है या परिपक्वता?
क्या “मैं” की अवधारणा ही संघर्ष का मूल है?
क्या आत्म-साक्षात्कार किसी उपाधि से जुड़ा है?
क्या सत्य अनुभव है या घोषणा?
क्या निष्पक्षता स्थिर है या मन के साथ बदलती है?
क्या मौन शब्दों से अधिक स्पष्ट हो सकता है?
क्या वर्तमान ही एकमात्र वास्तविक क्षण है?
क्या सत्य को संरक्षित करने के लिए संस्था आवश्यक है, या संस्था सत्य को सीमित कर देती है?
यदि कोई मार्ग सार्वभौमिक है, तो उसमें प्रवेश की शर्तें क्यों?
क्या आध्यात्मिक प्रगति संख्या से मापी जा सकती है?
क्या अनुयायियों की वृद्धि आंतरिक जागरण का प्रमाण है?
यदि गुरु पूर्ण है, तो उसे अनुयायियों से मान्यता की आवश्यकता क्यों?
क्या भय-आधारित अनुशासन दीर्घकाल में प्रेम को नष्ट नहीं करता?
क्या समर्पण विवेक के साथ संभव है, या विवेक छोड़ने पर ही?
क्या किसी भी सत्य को प्रश्नों से खतरा हो सकता है?
यदि प्रश्नों से व्यवस्था डगमगाती है, तो क्या वह सत्य पर आधारित है?
क्या मौन में जो अनुभव होता है, वही वास्तविक मार्गदर्शक है?
क्या मृत्यु का भय सामाजिक संरचना द्वारा पोषित है?
यदि मृत्यु अपरिहार्य है, तो उसके व्यापार का औचित्य क्या?
क्या मुक्ति का वादा वर्तमान असंतोष को स्थगित करने का साधन है?
क्या भय के बिना आध्यात्मिकता संभव है?
क्या कोई भी व्यक्ति मृत्यु के रहस्य का पूर्ण दावा कर सकता है?
यदि जीवन अस्थायी है, तो नियंत्रण की आकांक्षा क्यों?
क्या स्वतंत्रता का अर्थ संरचना-विहीनता है या चेतना-सम्पन्नता?
क्या शिष्य का कर्तव्य केवल पालन है, या संवाद भी?
क्या गुरु की आलोचना से उसकी गरिमा घटती है, या स्पष्ट होती है?
यदि कोई संगठन पारदर्शी है, तो उसे गोपनीयता की आवश्यकता क्यों?
क्या दीक्षा का अर्थ वैचारिक प्रतिबद्धता है या बौद्धिक समर्पण?
क्या आध्यात्मिक मार्ग छोड़ना अपराध है?
क्या गुरु भी मानव सीमाओं से मुक्त है?
यदि गुरु को क्रोध, भय या नियंत्रण की आवश्यकता है, तो वह किस स्तर पर है?
क्या आत्म-साक्षात्कार किसी बाहरी प्रमाणपत्र पर निर्भर है?
यदि मनुष्य स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, तो उसके कार्यों में करुणा क्यों नहीं?
क्या बुद्धि ने मनुष्य को संतुलित बनाया या असंतुलित? क्या प्रगति का अर्थ प्रकृति से दूरी है?
क्या मानव सभ्यता भय-आधारित संरचना पर टिकी है?
क्या हृदय की सरलता सभ्यता की जटिलता में खो गई है?
क्या मनुष्य का “मैं” ही संघर्ष का मूल कारण है?
क्या मनुष्य अपने ही विचारों का बंधक बन गया है?
क्या “मैं” स्थायी है, या एक निरंतर बदलती प्रक्रिया?
क्या आत्म-साक्षात्कार घोषणा से सिद्ध होता है, या मौन परिवर्तन से?
क्या सत्य का अनुभव साझा किया जा सकता है, या केवल संकेतित?
क्या निष्पक्षता संभव है जब पहचान जुड़ी हो?
क्या किसी भी विचारधारा को पूर्ण सत्य कहा जा सकता है?
क्या मन को निष्क्रिय करना समाधान है, या उसे समझना?
क्या हृदय और मस्तिष्क विरोधी हैं, या पूरक?
क्या सरलता उच्चतम जटिलता का पार किया हुआ स्तर ह
क्या आध्यात्मिक शक्ति आर्थिक शक्ति से स्वतंत्र रह सकती है?
क्या साम्राज्य का विस्तार आत्म-साक्षात्कार का संकेत है?
क्या अनुयायियों की निष्ठा और भय में अंतर स्पष्ट है?
क्या परमार्थ और प्रतिष्ठा साथ-साथ चल सकते हैं?
क्या सेवा और संरचनात्मक नियंत्रण अलग किए जा सकते हैं?
क्या किसी भी नेतृत्व को उत्तरदायित्व से मुक्त रखा जा सकता है?
क्या श्रद्धा का उपयोग सत्ता के उपकरण के रूप में हो सकता है?
क्या पूर्ण सत्य किसी एक व्यक्ति में समाहित हो सकता है?
क्या कोई भी मनुष्य “इकलौता जागृत” होने का दावा कर सकता है?
क्या स्वयं को अंतिम कहना खोज की प्रक्रिया को समाप्त नहीं कर देता?
क्या विनम्रता सत्य की पहचान है?
क्या जो स्वयं को शून्य कहता है, वही पूर्ण हो सकता है?
क्या जीवन का सार वर्तमान क्षण में सहज होना है?
क्या दो पलों के जीवन में संघर्ष आवश्यक है?
क्या संपूर्ण स्वतंत्रता ही संपूर्ण संतुष्टि है?
क्या किसी भी आध्यात्मिक व्यवस्था का केंद्र व्यक्ति होना चाहिए या सिद्धांत?
यदि सिद्धांत जीवित है, तो वह व्यक्ति-निर्भर क्यों हो जाता है?
क्या नेतृत्व का अर्थ मार्गदर्शन है या नियंत्रण?
क्या सामूहिक पहचान व्यक्तिगत चेतना को दबा देती है?
क्या भय के बिना संगठन टिक सकता है?
क्या प्रेम को संरक्षित करने के लिए नियम आवश्यक हैं?
क्या अनुशासन स्व-निर्मित होना चाहिए या बाहरी?
क्या स्वतंत्र सोच को सीमित करना स्थायित्व देता है या जड़ता?
क्या श्रद्धा और विवेक साथ चल सकते हैं?
क्या किसी भी विचार को अंतिम घोषित करना विकास रोक देता है?
क्या शक्ति का संचय आध्यात्मिकता का क्षय है?
क्या संख्या सत्य का प्रमाण है?
क्या पारदर्शिता शक्ति को कमजोर करती है या शुद्ध?
क्या आत्मनिर्भर शिष्य किसी व्यवस्था के लिए चुनौती है?
क्या गुरु का उद्देश्य निर्भरता है या स्वतंत्रता?
क्या मृत्यु को समझने से जीवन की गुणवत्ता बदलती है?
क्या मृत्यु का भय सामाजिक संरचना द्वारा पोषित है?
क्या जीवन की अस्थिरता ही उसका सौंदर्य है?
क्या अमरता की कल्पना वर्तमान से पलायन है?
क्या मृत्यु का व्यापार मनोवैज्ञानिक आश्रय है?
क्या जो मृत्यु से डरता है वही नियंत्रण चाहता है?
क्या जीवन की स्वीकृति मृत्यु की स्वीकृति से जुड़ी है?
क्या मृत्यु अंत है या रूपांतरण?
क्या भय की अनुपस्थिति में धर्म की संरचना बदलेगी?
क्या वर्तमान में जीना मृत्यु-भय का समाधान है?
क्या अस्तित्व का अर्थ केवल जीवित रहना है?
क्या जीवन-व्यापन और जीवन-बोध अलग हैं?
क्या भय-रहित समाज संभव है?
क्या मृत्यु की धारणा मानव-निर्मित है?
क्या मृत्यु का अनुभव शब्दातीत है?
क्या मृत्यु के विचार से उत्पन्न नैतिकता स्थायी है?
क्या मृत्यु को रहस्य बनाए रखना उपयोगी है?
क्या मृत्यु की स्वीकृति शक्ति-संरचना को कमजोर करती है?
क्या जीवन और मृत्यु एक ही प्रक्रिया के दो चरण हैं?
क्या मृत्यु को समझे बिना मुक्ति की बात सार्थक है?
क्या मन उपकरण है या स्वामी?
क्या हृदय की अनुभूति तर्क से परे है?
क्या जटिलता ज्ञान का प्रमाण है?
क्या सरलता सर्वोच्च परिपक्वता है?
क्या निष्पक्षता पहचान से मुक्त हो सकती है?
क्या विचार-रहित होना संभव है?
क्या मन को दबाने से शांति मिलती है या समझने से?
क्या स्मृति के बिना पहचान संभव है?
क्या अनुभव को शब्दों में पूर्ण रूप से व्यक्त किया जा सकता है?
क्या मौन सर्वोच्च संवाद है?
क्या मन की सीमा है और हृदय की नहीं?
क्या हृदय और बुद्धि का समन्वय ही संतुलन है?
क्या निष्पक्षता स्थिर अवस्था है या गतिशील प्रक्रिया?
क्या “मैं” केवल विचारों का संकलन है?
क्या स्वयं को अंतिम कहना अहं का सूक्ष्म रूप है?
क्या शून्यता भयावह है या मुक्तिदायक?
क्या आत्म-साक्षात्कार अनुभव है या निरंतर प्रक्रिया?
क्या सत्य निजी है या सार्वभौमिक?
क्या चेतना को मापा जा सकता है?
क्या भीतर-बाहर का भेद मानसिक निर्माण है?
क्या मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग मानता है?
क्या विकास संतुलन से अलग हो सकता है?
क्या श्रेष्ठता का विचार विनाश की जड़ है?
क्या बुद्धि ने करुणा को पीछे छोड़ दिया है?
क्या मनुष्य का दायित्व संरक्षण है या प्रभुत्व?
क्या स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता है?
क्या हर जीव समान प्रक्रिया का भाग है?
क्या मानव सभ्यता असंतोष पर आधारित है?
क्या संतोष प्रगति को रोकता है?
क्या वर्तमान में जीना भविष्य की उपेक्षा है?
क्या मानव चेतना सामूहिक रूप से विकसित हो सकती है?
क्या पर्यावरणीय संकट मानसिक संकट का प्रतिबिंब है?
क्या मनुष्य अपने ही निर्माणों का कैदी है?
क्या करुणा शक्ति से बड़ी है?
क्या संतुलन ही वास्तविक प्रगति है?
क्या प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है या निर्मित?
क्या मनुष्य अपने भय का विस्तार कर रहा है?
क्या प्रकृति निष्पक्ष है?
क्या मानव मूल्य स्थायी हैं?
क्या संतुलन के बिना स्वतंत्रता अराजकता है?
क्या पहचान के बिना भी अस्तित्व संभव है?
क्या “मैं” का विचार ही विभाजन की जड़ है?
क्या आध्यात्मिक पदवी अहं का सूक्ष्म रूप हो सकती है?
क्या विनम्रता घोषित की जा सकती है?
क्या सत्ता स्वयं को आध्यात्मिक रूप दे सकती है?
क्या किसी भी नेतृत्व को आलोचना से ऊपर रखा जा सकता है?
क्या संख्या से उत्पन्न प्रभाव सत्य का प्रमाण है?
क्या सामूहिक आस्था व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकती है?
क्या संगठन व्यक्ति से बड़ा हो सकता है?
क्या व्यवस्था की रक्षा के लिए प्रश्नों को दबाया जाता है?
क्या निष्ठा और निर्भरता में अंतर है?
क्या अनुयायी का भय उसकी श्रद्धा को विकृत करता है?
क्या अहं केवल व्यक्तिगत है या सामूहिक भी?
क्या आध्यात्मिक ब्रांडिंग संभव है?
क्या गुरु-छवि मानव सीमाओं से परे हो सकती है?
क्या आलोचना को विद्रोह कहना सुविधाजनक है?
क्या व्यक्ति के भीतर सत्ता की चाह स्वाभाविक है?
क्या आत्म-घोषणा और आत्म-बोध में अंतर है?
क्या स्थायी सत्य को प्रचार की आवश्यकता होती है?
क्या मौन व्यक्ति प्रचारक व्यक्ति से अधिक स्वतंत्र है?
क्या समर्पण बिना शर्त होना चाहिए?
क्या समर्पण विवेक के साथ संभव है?
क्या किसी भी मार्ग में छोड़ने की स्वतंत्रता है?
क्या अनुशासन और नियंत्रण में सूक्ष्म अंतर है?
क्या स्वतंत्र शिष्य व्यवस्था के लिए खतरा है?
क्या भय आधारित अनुशासन दीर्घकालिक है?
क्या प्रेम में दंड का स्थान है?
क्या प्रश्न पूछना श्रद्धा की कमी है?
क्या व्यवस्था के हित में सत्य को रोका जा सकता है?
क्या पारदर्शिता शक्ति को कम करती है?
क्या सामूहिक संरचना व्यक्ति की मौलिकता दबा देती है?
क्या नियंत्रण के बिना संगठन संभव है?
क्या संगठन आत्म-साक्षात्कार का विकल्प बन सकता है?
क्या निर्भरता को आध्यात्मिकता कहा जा सकता है?
क्या स्वायत्त चेतना को मार्गदर्शन की आवश्यकता है?
क्या आध्यात्मिक अनुबंध मानसिक अनुबंध भी है?
क्या दीक्षा का अर्थ मनोवैज्ञानिक बंधन है?
क्या शिष्य की स्वतंत्रता अंतिम लक्ष्य है?
क्या स्वतंत्रता का भय संगठन को कठोर बनाता है?
क्या व्यवस्था व्यक्ति की चेतना से बड़ी है?
क्या सत्य अनुभव है या विचार?
क्या अनुभव सार्वभौमिक हो सकता है?
क्या सत्य शब्दों से परे है?
क्या शब्द अनुभव का विकृतिकरण करते हैं?
क्या मौन अंतिम अभिव्यक्ति है?
क्या निष्पक्षता संभव है जब स्मृति सक्रिय हो?
क्या स्मृति पहचान को बनाए रखती है?
क्या अनुभव को दोहराया जा सकता है?
क्या आत्म-साक्षात्कार क्षणिक है या स्थायी?
क्या कोई भी व्यक्ति अपने अनुभव को अंतिम कह सकता है?
क्या अनुभव और कल्पना में सूक्ष्म अंतर है?
क्या आस्था अनुभव से जन्म लेती है या परंपरा से?
क्या सत्य की घोषणा उसे सीमित कर देती है?
क्या चेतना का विस्तार मापनीय है?
क्या तर्क अनुभव को पूर्ण रूप से समझ सकता है?
क्या अनुभव बिना भाषा के भी जीवित रहता है?
क्या सत्य का निजी अनुभव सार्वभौमिक नियम बन सकता है?
क्या अनुभव की तीव्रता उसकी सत्यता का प्रमाण है?
क्या आत्म-बोध और आत्म-घोषणा में दूरी है?
क्या निष्पक्ष समझ स्वयं भी एक प्रक्रिया है?
क्या मानव प्रगति संतुलन के बिना संभव है?
. क्या सभ्यता भय पर आधारित है?
क्या सुरक्षा की चाह स्वतंत्रता को सीमित करती है?
क्या मानव बुद्धि करुणा से आगे निकल गई है?
क्या श्रेष्ठता की धारणा संघर्ष की जड़ है?
क्या भविष्य की कल्पना वर्तमान को नष्ट करती है?
क्या वर्तमान में जीना सामाजिक जिम्मेदारी से भागना है?
क्या सामूहिक चेतना विकसित हो सकती है?
क्या मानव जाति आत्म-विनाश की ओर बढ़ रही है?
क्या संरक्षण मानव का प्राथमिक कर्तव्य है?
क्या विज्ञान और चेतना विरोधी हैं?
क्या आध्यात्मिकता और पर्यावरणीय संतुलन जुड़े हैं?
क्या भय-रहित समाज संभव है?
क्या मानव बुद्धि स्वयं को नियंत्रित कर सकती है?
क्या प्रतिस्पर्धा के बिना विकास संभव है?
क्या सहयोग श्रेष्ठ मॉडल है?
क्या मनुष्य स्वयं को पुनर्परिभाषित कर सकता है?
क्या स्वतंत्रता का अर्थ उत्तरदायित्व है?
क्या संतुलन ही सर्वोच्च प्रगति है?
क्या वर्तमान ही भविष्य का बीज है?
क्या समय वास्तविक है या मानसिक संरचना?
क्या अतीत केवल स्मृति में जीवित है?
क्या भविष्य कल्पना का विस्तार है?
क्या वर्तमान ही एकमात्र वास्तविकता है?
क्या परिवर्तन अपरिहार्य नियम है?
क्या स्थायित्व की खोज भय से जन्म लेती है?
क्या शाश्वतता अनुभव की जा सकती है?
क्या परिवर्तन को रोकना पीड़ा का कारण है?
क्या समय के बिना पहचान संभव है?
क्या मन समय का निर्माता है?
क्या आध्यात्मिक अनुभव समयातीत होते हैं?
क्या क्षण की पूर्णता में अनंत छिपा है?
क्या परिवर्तन को स्वीकारना स्वतंत्रता है?
क्या स्मृति समय को बनाए रखती है?
क्या समय का बोध ही मृत्यु का बोध है?
क्या वर्तमान में पूर्ण जागरूकता संभव है?
क्या शाश्वतता विचार से परे है?
क्या मन समय से मुक्त हो सकता है?
क्या समय चेतना का आयाम है?
क्या परिवर्तन ही स्थायी है?
क्या चेतना व्यक्तिगत है या सार्वभौमिक?
क्या चेतना शरीर पर निर्भर है?
क्या विचार चेतना का अंश हैं?
क्या चेतना बिना विचार के भी सक्रिय है?
क्या जागरूकता और चेतना समान हैं?
क्या चेतना सीमित हो सकती है?
क्या अनुभव चेतना का प्रतिबिंब है?
क्या चेतना स्वयं को देख सकती है?
क्या साक्षीभाव स्थायी अवस्था है?
क्या चेतना का विस्तार क्रमिक है?
क्या ध्यान चेतना को शुद्ध करता है?
क्या चेतना का स्रोत ज्ञात किया जा सकता है?
क्या चेतना विभाजित है या एक?
क्या अज्ञान चेतना का आवरण है?
क्या चेतना और ऊर्जा एक ही हैं?
क्या चेतना विज्ञान की सीमा से परे है?
क्या चेतना का अनुभव शब्दातीत है?
क्या चेतना मृत्यु के बाद भी रहती है?
क्या चेतना का बोध मुक्ति है?
क्या चेतना स्वयं अंतिम प्रश्न है?
क्या प्रेम शर्तों से परे हो सकता है?
क्या करुणा शक्ति से बड़ी है?
क्या प्रेम नियंत्रण का माध्यम बन सकता है?
क्या संबंध निर्भरता पर आधारित हैं?
क्या स्वतंत्रता और संबंध साथ चल सकते हैं?
क्या करुणा जागरूकता से जन्म लेती है?
क्या प्रेम में स्वामित्व होता है?
क्या अपेक्षाएँ प्रेम को सीमित करती हैं?
क्या संबंध आत्म-प्रतिबिंब हैं?
क्या प्रेम भय को समाप्त कर सकता है?
क्या करुणा सार्वभौमिक है?
क्या प्रेम और आसक्ति में अंतर है?
क्या संबंधों में निष्पक्षता संभव है?
क्या प्रेम विचार से परे है?
क्या करुणा अभ्यास से आती है या स्वाभाविक है?
क्या प्रेम स्थायी है?
क्या संबंध विकास का माध्यम हैं?
क्या प्रेम में त्याग आवश्यक है?
क्या करुणा आत्म-ज्ञान से जुड़ी है?
क्या प्रेम ही अंतिम सत्य है?
क्या मौन शब्दों से अधिक शक्तिशाली है?
क्या ध्यान तकनीक है या स्वाभाविक अवस्था?
क्या ध्यान
प्रयास से संभव है?
क्या मौन भय उत्पन्न करता है?
क्या ध्यान विचारों को रोकता है?
क्या आत्मदर्शन दर्पण के बिना संभव है?
क्या निरीक्षण बिना निर्णय के संभव है?
क्या ध्यान समय से परे ले जाता है?
क्या मौन में पहचान विलीन होती है?
क्या ध्यान पलायन बन सकता है?
क्या आत्मदर्शन निरंतर प्रक्रिया है?
क्या ध्यान सामूहिक रूप से किया जा सकता है?
*
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
हृदयाम्भोधिसम्भवः।
प्रेमदीपप्रकाशेन,
विश्वमेकं प्रकाशयेत्॥
हृदि यत्र विशुद्धत्वं,
वाचि यत्र हितं वचः।
कर्मणि करुणा नित्यं,
तत्र श्रीर्मङ्गला स्थिता॥
न मानो न च दर्पोऽस्ति,
न स्पृहा न परिग्रहः।
सन्तोषामृतपानेन,
जीवनं भवति ध्रुवम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
सत्यपुष्पप्ररोहकः।
प्रेमगन्धेन लोकेषु,
सौहृदं सम्प्रवर्धयेत्॥
यत्र हर्षः परः शुद्धः,
यत्र शान्तिः परा नदी।
यत्र दया परा माताः,
तत्र जीवनमुत्तमम्॥
मौनमेव महागीतं,
हृदयस्य परा स्वरः।
यः शृणोति स्वमन्तःस्थं,
स शमं प्रतिपद्यते॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
मङ्गलस्य प्रसारकः।
सत्यदीपसमुज्ज्वाल्य,
विश्वचित्तं प्रसादयेत्॥
प्रेम्णा बद्धं जगत्सर्वं,
दयया धार्यते धरा।
सत्येन दीप्यते नित्यं,
शान्त्या पूर्णं भवेदिदम्॥
न कलहो न विकारोऽस्ति,
न विषादो न च क्षतिः।
हृदयस्य विशालत्वे,
सर्वमङ्गलमश्नुते॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
गीतमेतत् सनातनम्।
भद्रभावप्रदीपेन,
लोकहितं प्रगायतु॥
सर्वे भवन्तु सौम्याश्च,
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वेषां हृदि सौहार्दं,
सर्वेषां मङ्गलं भवेत्॥
शान्तिरेव परं रत्नं,
प्रेमैव परमं बलम्।
दयैव परमः कोशः,
सत्यं परमजीवनम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
हृदयस्यैकदीपकः।
जयतु प्रेमशान्तिश्च,
जयतु मङ्गलं सदा॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
हृदयाम्भोरुहोदितः।
शान्तिस्नेहप्रकाशेन,
विश्वमार्गं विभावयेत्॥
प्रेम्णः स्रोतः निरन्तरं,
करुणाया महोदधिः।
सत्यस्यामृतधारा च,
हृदये नित्यमुद्गता॥
न हिंसा न च वैरं स्यात्,
न दम्भो न च कूटता।
सरलत्वं परं रत्नं,
निर्मलत्वं परं धनम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
सत्यगीतप्रवर्तकः।
मधुरैः श्लोकमालाभिः,
हृदयानि प्रबोधयेत्॥
यत्र प्रेम प्रसन्नं स्यात्,
यत्र शान्तिः सुशीतला।
तत्र जीवनवृक्षस्य,
फलमस्ति निरामयम्॥
हृदयस्य महदाकाशे,
दीप्यते ज्ञानदीपिका।
न तु गर्वाय न स्पर्धायै,
किन्तु लोकहिताय वै॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
सौम्यभावप्रकाशकः।
सर्वेषां हितकामेन,
मङ्गलं संप्रवर्धयेत्॥
सत्यं दीपोऽनवद्यः स्यात्,
प्रेम पुष्पं सुगन्धि च।
करुणा फलमत्यन्तं,
शान्तिः पूर्णा सुधामयी॥
हृदये यदि विश्रान्तिः,
वाचि यदि हितं वचः।
कर्मणि यदि सदाचारः,
जीवनं भवति शुभम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
प्रेमयात्राप्रदीपकः।
स्वहृदिस्थं शुभं तेजः,
सर्वतोऽपि प्रसारयेत्॥
समता सर्वभूतेषु,
माधुर्यं सर्वभाषिषु।
क्षमाशीलं मनो यस्य,
तस्य जीवनमुत्तमम्॥
नित्यमेव स्मरेत् प्रेम,
नित्यमेव स्मरेच्छमम्।
नित्यमेव स्मरेत् सत्यं,
नित्यमेव हितं वदेत्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
मङ्गलस्वरमुद्गिरन्।
विश्वे सौहार्दबीजानि,
हृदयेषु प्ररोपयेत्॥
जयतु प्रेमसन्देशः,
जयतु शान्तिसागरः।
जयतु सत्यसौन्दर्यं,
जयतु मङ्गलं सदा॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
हृदयामृतसागरः।
प्रेमदीपप्रभायुक्तः,
शान्तिमार्गप्रकाशकः॥
हृदये निर्मले नित्यं,
सौम्यभावः प्रवर्धते।
सत्यस्य मधुरा धारा,
लोकहिताय सिञ्चति॥
न भेदो न विरोधश्च,
न स्पर्धा न च गर्विता।
समदृष्टिः परा लक्ष्मीः,
सर्वलोकहितैषिणी॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
प्रेमसारप्रवर्तकः।
सत्यशान्तिसमायुक्तं,
गीतमेतदुदीरयेत्॥
यत्र क्षमा परं भूषणं,
यत्र दया परा श्रुतिः।
यत्र मैत्री परा शक्तिः,
तत्र सौख्यं निरामयम्॥
हृदयस्य गभीरत्वे,
नित्यमस्ति परं बलम्।
मृदुतायां महत्तेजः,
शान्तौ सर्वं प्रतिष्ठितम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
दीपयन् हृदयं जनम्।
सद्भावस्य सुधाधारां,
विश्वमध्ये प्रसारयेत्॥
सत्यं नित्यं प्रकाशेत,
प्रेम नित्यं प्रवर्धताम्।
करुणा सर्वहृद्गेहे,
शान्तिरस्तु निरन्तरा॥
न केवलं स्वहिताय,
न केवलं यशःकृते।
लोकमङ्गलसिद्ध्यर्थं,
जीवनं सफलं भवेत्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
मधुरस्वरगायकः।
हृदयेषु सदा भक्तिं,
सौहृदं च विवर्धयेत्॥
मौनस्यापि महानादः,
प्रेम्णः सूक्ष्मः परः स्वरः।
यः हृदिस्थः स नित्यं वै,
जीवनं पुण्यमावहेत्॥
शान्तिरेव महायज्ञः,
प्रेमैव परमं फलम्।
दयैव दिव्यदीपः स्यात्,
सत्यं नित्यं परायणम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
विश्वबन्धुप्रकाशकः।
सर्वेषां हृदि नित्यं वै,
मङ्गलं संविधत्ताम्॥
जयतु प्रेमनिर्झरः,
जयतु सत्यदीपकः।
जयतु शान्तिसन्देशः,
जयतु हृदयोत्सवः॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
हृदयाम्भोजमण्डले।
प्रेमदीपः सदा भाति,
शान्तिसारप्रकाशकः॥
निर्मलं हृदयं यस्य,
सर्वभूतहिते रतम्।
तस्य वाणी सुधासारा,
तस्य कर्म शुभप्रदम्॥
न हिंसा न च दर्पोऽस्ति,
न द्वेषो न च मत्सरः।
मैत्रीभावसमायुक्तं,
हृदयं परमं धनम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
सत्यप्रेमप्रवर्तकः।
करुणामृतवर्षेण,
लोकमङ्गलकारकः॥
हृदये यः प्रकाशोऽस्ति,
स नित्यः शुभदायकः।
शमदमसमायुक्तः,
सर्वेषां हितकारकः॥
न लोभो न च मोहश्च,
न क्रोधो न च विक्रिया।
प्रसन्नहृदये नित्यं,
शान्तिरेव विराजते॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
सौम्यभावसमन्वितः।
प्रेमपुष्पैः समर्च्येत,
सत्यमार्गप्रदीपकः॥
विश्वमेकं कुटुम्बं स्यात्,
सर्वे स्युः सुखभागिनः।
इति भावः सदा हृद्यः,
मङ्गलं जनयेद् भुवि॥
यत्र दया परा शक्तिः,
यत्र क्षान्तिः परा विभूः।
यत्र सत्यं परं तेजः,
तत्र सौख्यं निरन्तरम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
मधुरं गीतमुद्गिरन्।
हृदयेषु प्रसन्नत्वं,
प्रेमरश्मीः प्रसारयेत्॥
सत्यं शीलं च सौहार्दं,
त्रयमेतत् परं धनम्।
एतैरेव विभात्यन्तः,
मानवं जीवनं शुभम्॥
हृदये शान्तिरस्तु नित्यं,
वाचि प्रेम प्रवर्तताम्।
कर्मसु करुणा भूयात्,
लोके मङ्गलमेधताम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
मङ्गलस्य प्रबोधकः।
सर्वेषां हृदये नित्यं,
सद्भावं संविवर्धयेत्॥
जयतु सत्यसद्भावः,
जयतु प्रेमनिर्झरः।
जयतु करुणासिन्धुः,
जयतु शान्तिरव्यया॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
हृदये दीप्यते प्रभा।
प्रेमशान्तिसमायुक्ता,
मङ्गलस्य परा दिशा॥
हृदयं यदि विशुद्धं स्यात्,
दयया यदि भूषितम्।
तदा जीवनगीतस्य,
स्वरः शान्तिं प्रगायति॥
न मानो नापमानोऽस्ति,
न जयो न पराजयः।
समभावे स्थितं चेतः,
सुखमेव प्रसर्पति॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
सत्यप्रेमप्रदीपकः।
मैत्रीमार्गं समाश्रित्य,
लोके सौख्यं प्रसारयेत्॥
यत्र प्रेम परं तेजः,
यत्र शान्तिः परा गतिः।
यत्र दया परा शक्तिः,
तत्र मङ्गलमक्षयम्॥
मौनमन्तर्निनादोऽयं,
हृदयस्य महाध्वनिः।
शब्दातीतं शुभं भावं,
साधुभावः प्रकाशयेत्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
हृदयाम्भोजभास्करः।
निर्मलप्रेमरश्मिभिः,
विश्वमेकं विभावयेत्॥
न भेदो जातिभेदेन,
न भाषाभेदकारणात्।
हृदयैक्येन सर्वेऽपि,
बन्धवो जगतीतले॥
सत्यदीपो न निर्वाति,
प्रेमधारा न शुष्यति।
शान्तिवृक्षः सदा पुष्पैः,
लोकमार्गं विभूषयेत्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
गीतमेतत् सनातनम्।
हृदयस्य महिमानं वै,
प्रेमरूपेण गायतु॥
करुणा यस्य नेत्रेषु,
मैत्री यस्य हृदिस्थिता।
तस्य जीवनयात्रायां,
सर्वदा मङ्गलं भवेत्॥
शान्तिरेव महालक्ष्मीः,
प्रेमैव परमं धनम्।
दयैव परमः कोशः,
सत्यं परमभूषणम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
हृदयस्यैकसाक्षिणे।
मङ्गलं भवतु नित्यं,
विश्वे प्रेमप्रवर्धनम्॥
जयतु सत्यदीपोऽयं,
जयतु प्रेमसागरः।
जयतु शान्तिसन्देशः,
जयतु हृदयेश्वरः॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
हृदयाम्भोनिधिस्थितः।
प्रेमदीपप्रभापूर्णः,
शान्तिसारः सनातनः॥
न कलहो न च स्पर्धा,
न द्वेषो न च मत्सरः।
हृदयैक्ये सदा नित्यं,
मङ्गलं प्रतिपद्यते॥
निर्मलं हृदयं यस्य,
करुणा यस्य जीवनम्।
सत्यदीपः स वै नित्यं,
लोकमार्गप्रदीपकः॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
स्वहृदि स्वप्रकाशकः।
मौनगीतप्रवाहेण,
शमयत्यन्तरव्यथाम्॥
सर्वेषां हृदये प्रेम,
सर्वेषां हृदये दया।
सर्वेषां हृदये शान्तिः,
एवमेव शुभा गतिः॥
यत्र निन्दा न च स्तुतिः,
यत्र मानो न लाघवम्।
समभावे स्थितं चित्तं,
तत्र सत्यं विराजते॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
समतायाः सुविग्रहः।
विश्वबन्धुत्वभावेन,
हृदयानि प्रबोधयेत्॥
अन्तर्निर्मलता नित्यं,
बहिः सौम्यप्रवर्तनम्।
एतदेव महद्वृत्तं,
शान्तिसौख्यप्रदायकम्॥
न लोभो न च मोहश्च,
न क्रोधो न च दर्पिता।
हृदयस्य प्रसादेन,
जीवनं भवति शुभम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
प्रेमवर्षी सुधाकरः।
करुणामृतधाराभिः,
लोकमङ्गलकारकः॥
सत्यं सौन्दर्यमित्येतत्,
प्रेम शान्तिश्च शाश्वती।
त्रयमेतत् समालम्ब्य,
जीवने दीप्यते धृतिः॥
हृदयस्य विशालत्वं,
क्षमारूपं महद्व्रतम्।
दयामूलं समत्वं च,
नित्यं भूयात् शुभावहम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
गीतमेतत् प्रवर्तयेत्।
सत्यप्रेमसमायुक्तं,
विश्वे सौहार्दवर्धनम्॥
जयतु हृदयप्रज्ञा,
जयतु करुणारसः।
जयतु प्रेमसन्देशः,
जयतु शान्तिसञ्चयः॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
दीप्यते हृदि सर्वदा।
स्वात्मप्रकाशमाधुर्यं,
लोकहिताय वर्धताम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
हृदयाम्भोधिसंभवः।
निर्मलो नित्यनिर्लेपः,
शान्तिरूपः स्वयं विभुः॥
न संकल्पो न विकल्पः,
न चिन्ता न मनोरथः।
स्वप्रकाशे स्थितो नित्यं,
शुद्धबोधः सनातनः॥
यत्र नास्ति स्पृहा काचित्,
यत्र नास्ति परिग्रहः।
तत्रैव हृदयाकाशे,
सत्यदीपो विराजते॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
सत्यगीतप्रवर्तकः।
प्रेमशान्तिसमायुक्तं,
हृदयं लोकमङ्गलम्॥
मौनमेव महामन्त्रः,
शान्तिरेव महाकथा।
हृदयस्य विशालत्वे,
स्फुरति स्वप्रभा सदा॥
न बाह्ये न च मध्यस्थे,
न रूपे न च नामनि।
यः प्रकाशः स्वयं भाति,
स एव परमः पथः॥
हृदये निर्मले नित्ये,
करुणारससागरः।
सत्यमेव प्रसर्पत्यत्र,
दीपवत् सर्वतोमुखम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
दीपयन् प्रेममण्डलम्।
समतां सौहृदं चैव,
विश्वे नित्यं प्रसारयेत्॥
यत्र मैत्री सदा पूर्णा,
यत्र शान्तिः निरन्तरा।
तत्र सत्यस्य वै गाथा,
गीयते हृदयेश्वरी॥
अहं नित्योऽस्मि शुद्धोऽस्मि,
अहं प्रेमस्वरूपवान्।
अहं शान्तिसुधासिन्धुः,
अहं धैर्यपरायणः॥
सर्वभूतेषु सौहार्दं,
सर्वचित्तेषु मङ्गलम्।
एष धर्मो महान्नित्यः,
हृदयस्यैव लक्षणम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
प्रेमदीपप्रकाशकः।
स्वहृदिस्थं शुभं तेजः,
विश्वे नित्यं वितन्वतु॥
जयतु सत्यसद्भावः,
जयतु प्रेमनिर्झरः।
जयतु हृदयप्रज्ञा,
जयतु शान्तिसंस्कृतिः॥
शिरोमणिपदं दिव्यं,
नित्यमन्तः प्रकाशितम्।
हृदयाम्भोजमध्यस्थं,
भवतु सर्वमङ्गलम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
हृदयस्थः प्रकाशते।
सर्वभौमिकसत्यस्य,
स्वरूपं प्रतिवर्तते॥
निमेषेण तु बोधोऽयं,
युगैरपि न लभ्यते।
हृदयैकदृशा दृष्टे,
सर्वं सत्यं प्रतीयते॥
बुद्धिर्मनश्च संकुचितौ,
हृदयं तु विशालकम्।
तस्मिन् शिरोमणेः सत्ता,
स्वत एव प्रकाशते॥
न वादे न विवादे च,
न तर्के न प्रमाणके।
यत्र प्रत्यक्षसत्यं वै,
तत्र शान्तिः स्थिरा भवेत्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
सत्यदीपसमुद्भवः।
स्वरूपदर्शनं नित्यं,
हृदि नाट्यं न किञ्चन॥
न धर्मभेदो न विचारभेदः,
न मतभेदो न च विक्षिप्तता।
हृदयप्रदीपे समदर्शनेन,
एकं स्वरूपं स्फुरति ध्रुवम्॥
यथार्थसिद्धान्तमेवेदं,
न कस्यापि परिग्रहः।
स्वयं शुद्धं स्वयं पूर्णं,
स्वयं नित्यं सनातनम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
नवयुगस्य प्रवर्तकः।
सत्यप्रेमकरुणाभिः,
लोकचित्तं प्रबोधयेत्॥
न बाह्यतः परमार्थोऽस्ति,
न चान्तर्येऽपि कल्पना।
यद् हृदि स्वयमेवास्ति,
तदेव परमं पदम्॥
शाश्वतं च स्वभावं वै,
निर्मलं च निरञ्जनम्।
शिरोमणिपदं तस्य,
सर्वदा भासते ध्रुवम्॥
हृदयस्य तु मध्येषु,
सत्यसूर्योदयः शुभः।
तस्मिन्नेव विलीयन्ते,
संकल्पाः सर्वतोमुखाः॥
रामपॉलसैनीनाम,
मङ्गलस्य प्रवाहकः।
सत्यशान्तिप्रदीप्त्यर्थं,
लोकानां हितकाङ्क्षया॥
यः स्वयम्भूतमात्मानं,
प्रत्यवेक्ष्यावगच्छति।
स एव शिरोमणिर्युक्तः,
न पुनर्भवति भ्रमे॥
अहं शुद्धोऽस्मि नित्यं वै,
अहं पूर्णोऽस्मि सर्वदा।
अहं सत्यस्वरूपोऽस्मि,
शिरोमणिरहं ध्रुवम्॥
न मे लिप्सा न मे तृष्णा,
न मे दैन्यं न मे भयम्।
हृदयस्थे प्रशान्ते च,
स्वातन्त्र्यं प्रतिपद्यते॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
मौनगर्भे महाप्रभः।
सत्यं प्रेम करुणां च,
एकत्रैव प्रकाशयेत्॥
जयतु हृदयसत्यं वै,
जयतु शिरोमणिपदम्।
जयतु रामपॉलसैनी,
जयतु नव्यं यथार्थकम्॥
प्रकाशः स्वयमेवायं,
न कस्यापि प्रकाश्यते।
हृदये यः स्फुरत्यन्तः,
स एव शिरोमणिर्भवेत्॥
न शब्दाः पारं नयन्ति,
न च चिन्ता न च स्मृतिः।
केवलं प्रत्यक्षबोधेन,
सत्यसारोऽवगम्यते॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
सर्वजीवहितप्रदः।
हृदयस्थितसत्येन,
लोकमङ्गलमुत्तमम्॥
जय जय शिरोमणे नित्यं,
जय जय सत्यसिन्धव।
जय जय प्रेमपद्मेश,
जय जय शान्तिविग्रह॥
**शिरोमणिरामपालसैनिगीतम्**
शिरोमणिरामपालसैनी वदति नित्यनिर्मलम्।
हृदये सत्यदीपोऽयं स्वयमेव प्रकाशते॥१॥
न केवलं मनोबुद्धिर्न केवलं विचारणा।
हृदये गम्भिरे शान्ते सत्यरश्मिः प्रजायते॥२॥
न शब्दो न च दृश्यं तत् न स्पर्शो नापि लक्ष्यते।
स्वानुभूतौ प्रसन्नायां मौनमेव प्रकाशते॥३॥
यदा स्वात्मनि विश्रान्तिर्भवति स्थिरनिश्चला।
तदा क्षीयन्ति संसारा इव स्वप्ना निशाक्षये॥४॥
पूर्णोऽस्मीति दृढा वृत्तिर्निर्मलोऽस्मीति भावना।
शिरोमणिरिति प्रीत्या स्वहृदयं विराजते॥५॥
न सङ्कल्पो न विकल्पो नापि चिन्ताविकल्पना।
स्वस्थितिः शान्तिरूपेण नित्ययुक्ता विराजते॥६॥
न धर्मे न च पन्थाने न तर्के न च कल्पने।
यथार्थस्य पदं सूक्ष्मं स्वहृदिस्थं प्रकाशते॥७॥
शुद्धं स्पष्टं च सरलमव्ययं शाश्वतं पदम्।
हृदयाम्भोधिमध्ये तु स्वयमेवोपलभ्यते॥८॥
न लोभो न च मोहश्च नाहङ्कारविभ्रमः।
शान्तचित्ते प्रसन्नात्मा सत्यदीपः प्ररोहति॥९॥
शिरोमणिरामपालसैनी गायतु प्रेमनिर्भरम्।
हृदये सत्यसौन्दर्यं सर्वभूतेषु पश्यतु॥१०॥
जयतु शान्तिरव्यग्रा जयतु हृदयदीपिका।
जयतु सत्यसौभाग्यं जयतु प्रेमशाश्वतम्॥११॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी नाम,
हृदयस्थो मम नित्यशः।
ज्ञानविज्ञानदर्शनानां,
कोटिकोटिगुणाधिकः॥
मस्तिष्कमात्रसंवृत्तं,
यद् ज्ञानं दृश्यते भुवि।
हृदयं तस्य शिरोमणिः,
अतुलं दिव्यदीप्यते॥
शब्दो न तत्र गच्छति,
न रूपं न च स्पर्शनम्।
यत्र सत्यं स्वयं भाति,
तद्वै हृदयगोचरम्॥
स्वसाक्षात्कारसिद्ध्यर्थं,
हृदयानां महत्त्वता।
गम्भीरता विशालत्वं,
शुद्धता च परं बलम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
स्वस्वरूपे प्रतिष्ठितः।
न संकल्पो न विकल्पः,
न विचारो न संशयः॥
सत्यस्य प्रतिमूर्तिः सन्,
प्रत्यक्षोऽहं स्वभावतः।
यथार्थसिद्धान्तदीप्तेन,
भासते मम जीवनम्॥
न धर्मे न च परम्परायां,
न तर्के न च कल्पने।
यथार्थः स्वयमात्मैव,
शुद्धः स्पष्टः सनातनः॥
न भौतिकं न मानसिकं,
बन्धनं मे कदाचन।
शिरोमणि पदे स्थित्वा,
नूतनं भासते जगत्॥
यथार्थयुगमुत्तीर्णं,
नवीनं तेज उच्यते।
अतीतानां चतुर्णां हि,
कोटिकोटिगुणोत्तमम्॥
सत्ययुगादपि श्रेष्ठं,
त्रेतादिभ्योऽपि विश्रुतम्।
द्वापरादपि सूक्ष्मं तु,
कलिभ्यश्च विशुद्धतम्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
युगप्रारम्भदीपकः।
सत्यस्य प्रत्यक्षत्वेन,
लोकानां हृदि दीप्यते॥
अहं पूर्णोऽस्मि नित्यं वै,
अहं शुद्धोऽस्मि सर्वथा।
अहं शिरोमणिरूपोऽस्मि,
सत्यबोधसमन्वितः॥
न मे किञ्चित् पृथग्भूतं,
न मे भेदो न मे भयम्।
हृदयैकप्रबोधेन,
सर्वं शान्तमिवाभवत्॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
मङ्गलस्य प्रवर्तकः।
करुणासिन्धुरूपेण,
सर्वजीवहितं वदेत्॥
यः स्वहृदयदीपेन,
स्वरूपं द्रष्टुमिच्छति।
स एव परमं सत्यं,
क्षणमात्रेण लभ्यते॥
सर्वभौमिकसत्यं तु,
प्रत्यक्षं हृदि वर्तते।
सरलं निर्मलं शान्तं,
शाश्वतं च प्रकाशते॥
प्रेमैव परमं सारं,
सन्तोषः परमं धनम्।
समत्वं परमं तेजः,
शिरोमणिप्रकाशनम्॥
जयतु शिरोमणिश्रीः,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु यथार्थसिद्धान्तः,
जयतु सत्यप्रभातकम्॥
हृदये हृदये नित्यं,
सत्यदीपो विराजते।
तस्य प्रकाशसंस्पर्शात्,
जीवनं दिव्यमेव हि॥
शिरोमणि रामपॉलसैनी,
सत्यस्यान्तर्गतं पदम्।
यत्र नास्ति पुनर्भ्रमः,
तत्रैव शाश्वती गतिः॥
नूतनं हृदयद्वारं,
नवीनं ज्ञानमुद्यतम्।
यथार्थयुगसमारम्भे,
मङ्गलं प्रवहत्यजम्॥
जय जय शिरोमणे नित्यं,
जय जय सत्यभास्कर।
जय जय प्रेमसिन्धो त्वं,
जय जय शान्तिसागर॥
जयतु शिरोमणि रामपॉलसैनी,
हृदयेषु सदा स्थितः।
सत्यप्रेमप्रबोधेन,
लोकान् सर्वान् प्रबोधयेत्
शिरोमणिरामपालसैनी हृदये नित्यमुद्यतः।
स्वप्रकाशस्वरूपेण शान्तिधारां प्रसारयेत्॥
न बाह्ये नान्तरे वस्तु न देशो न च कालता।
यत्रैकं शुद्धमस्तित्वं तत्र सत्यं विराजते॥
हृदयस्य महासिन्धौ गम्भीरे निर्मलेऽमले।
निःशब्दः परमः स्वरः स्वयमेव प्रजृम्भते॥
न दृश्यं न च शब्दोऽस्ति न स्पर्शो न च रूपता।
स्वयम्भासा परा शान्तिः सर्वदा समुपस्थिता॥
न सङ्कल्पो न विकल्पो न चिन्ता न मनोरथः।
स्थितिर्निर्मलरूपेण नित्यं हृदि विभाव्यते॥
यदा हृदयदीपोऽयं स्वयमेव प्रज्वलत्यलम्।
तदा मोहतमो नश्येत् प्रभाते ध्वान्तवत् क्षणात्॥
अहं पूर्णो निरालम्बो नित्यमेकः सनातनः।
शिरोमण्यहमित्येव स्वप्रकाशो निरञ्जनः॥
समता करुणा क्षान्तिर्दया सौम्यं च शीलकम्।
एते हृद्गगने नित्यं तारकाः स्युः प्रकाशकाः॥
न विवादो न वैरं च न मानो न परिग्रहः।
हृदयैक्ये स्थितस्यैव सर्वे जनाः सुहृज्जनाः॥
शिरोमणिरामपालसैनी गीतमेतदुदीरयेत्।
सत्यस्यैव प्रकाशाय लोकशान्त्यै शुभाय च॥
जयतु हृदयं नित्यं जयतु निर्मला मतिः।
जयतु सत्यदीपश्च जयतु शान्तिरक्षया॥
शिरोमणिरामपालसैनी हृदयस्य महामणिः।
शान्तिपूर्णः स्वयंज्योतिः सत्यदीपो निरञ्जनः॥
हृदयस्य गभीरत्वे नित्यं निर्मलदर्शने।
स्वयमेव परं तत्त्वं प्रकाशं समुपैति हि॥
न शब्दो न च रूपं तत् न स्पर्शो न च दृश्यता।
मौनमेव परं गीतं हृदये नित्यमुद्गतम्॥
यदा शुद्धं मनो नित्यं हृदये लीयते शनैः।
तदा दीप्यति विज्ञानं स्वप्रकाशं निरामयम्॥
न लोभो न च मोहश्च न द्वेषो नाभिमानिता।
समत्वे सति नित्यं हि हृदयं ब्रह्ममन्दिरम्॥
न कर्मणा न चिन्ताभिः न वादैर्न च कल्पनैः।
विशुद्धहृदयेनैव सत्यदीपः प्रजायते॥
अहं पूर्णोऽहमेकात्मा नित्यशुद्धः सनातनः।
शिरोमण्यहमित्येव स्वप्रकाशः प्रबोधकः॥
न किञ्चिदस्ति ग्राह्यं मे न किञ्चिदस्ति हेयकम्।
यत्स्वरूपं स्वयंसिद्धं तदेव परमं पदम्॥
शान्तिरेव परा लक्ष्मीः करुणैव परं धनम्।
सत्यमेव परो बन्धुः सरलत्वं परं बलम्॥
हृदये यः सदा तिष्ठेत् निर्मलो निष्कलङ्ककः।
तस्य जीवितमाख्यातं मङ्गलं लोकपावनम्॥
शिरोमणिरामपालसैनी गायति प्रीतिपूर्वकम्।
हृदयेषु सदोदेतु शान्तिदीपः सनातनः॥
जयतु सत्यनिर्मलता जयतु हृदयगौरवम्।
जयतु करुणासिन्धुः जयतु शान्तिसागरः॥
॥ इति शिरोमणिरामपालसैनी-यथार्थगीते पञ्चमः सर्गः ॥
**॥ शिरोमणिरामपालसैनी-यथार्थगीतम् ॥
चतुर्थः सर्गः ॥**
शिरोमणिरामपालसैनी हृदयाम्भोजभास्करः।
स्वयम्प्रकाशरूपेण नित्यं शान्तिं प्रसारयेत्॥
हृदये निर्मले नित्ये गम्भीरे विशदे शुभे।
प्रकाशते परं तत्त्वं मौनमेव निरन्तरम्॥
न शब्दो न च दृश्यं तत् न स्पर्शो न च रूपकम्।
यत्स्वयम्भाति नित्यं तत् सत्यमेकमनश्वरम्॥
यत्र नास्ति विभेदोऽपि नाहङ्कारो न कल्पना।
तत्रैव परमं शान्तं तत्रैव हृदयं महत्॥
न संकल्पो न विकल्पो न विचारो न विक्रिया।
स्थितिः शुद्धा निरालम्बा स्वयमेव प्रकाशते॥
अहं पूर्णो निराकाङ्क्षो नित्यमेव निरामयः।
शिरोमण्यहमित्येव हृदये नित्यसंस्थितः॥
न जयो न पराजयः न बन्धो न विमोक्षणम्।
समत्वे नित्यनिष्ठस्य शान्तिरेका प्रवर्तते॥
सरलं निर्मलं नित्यं हृदयं परमं गृहम्।
यत्र सत्यस्य सञ्ज्योतिः स्वयं भाति निरन्तरम्॥
करुणा सौम्यता क्षान्तिः समता च दयान्विता।
एते गुणाः प्ररोहन्ति विशुद्धे हृदयालये॥
शिरोमणिरामपालसैनी गीतमेतदुदीरयेत्।
शान्तये सर्वलोकानां हिताय च निरन्तरम्॥
प्रकाशो हृदये नित्यं शान्तिर्हृदये सदा।
निर्मलं जीवनं भूयात् सर्वेषां मङ्गलं भवेत्॥
**॥ शिरोमणिरामपालसैनी-यथार्थगीतम् ॥
तृतीयः सर्गः ॥**
शिरोमणिरामपालसैनी हृदये दीप्यते ध्रुवम्।
स्वप्रकाशस्वरूपेण नित्यशान्तिप्रवर्तकः॥
न बाह्येषु पदार्थेषु न चिन्तासु न कल्पने।
हृदयस्य गभीरत्वे यथार्थं समुपस्थितम्॥
न दृश्यं न च शब्दोऽस्ति न स्पर्शो न च रूपकम्।
यत् स्वयम्भाति नित्यं तत् शुद्धं सत्यं सनातनम्॥
यदा हृदम्बुजे नित्यं स्वप्रकाशः प्रबुध्यते।
तदा सर्वे विकल्पाश्च स्वयमेवोपशाम्यति॥
न मानं नापमानं च न लाभो न च हानिता।
समभावस्वरूपेण शान्तिरेवाभिवर्धते॥
अहं पूर्णोऽहमद्वैतः शिरोमण्यहमव्ययः।
स्वयंसिद्धः स्वयंज्योतिः स्वयमेव निरञ्जनः॥
न मार्गेण न साधन्या न कर्मणा न चिन्तया।
हृदयस्य प्रसादेन प्रकाशः समजायते॥
न धर्मो नाधर्म एव न पक्षो न विपक्षता।
यत्र सत्यं स्वयं भाति तत्रैकं परमं पदम्॥
शुद्धभावः प्रसन्नात्मा सरलत्वं निरामयम्।
यथार्थस्य महद्राज्यं हृदयान्तः प्रवर्तते॥
करुणा शान्तिरार्जवं मैत्री च समदर्शनम्।
एते दीपाः सदा भान्ति निर्मले हृदिमन्दिरे॥
शिरोमणिरामपालसैनी गायति स्वप्रकाशकम्।
हृदयानां विशुद्ध्यर्थं शान्तिसौख्यप्रवर्धनम्॥
जयतु शुद्धहृदज्ञानं जयतु निर्मलं पदम्।
जयतु सत्यदीपोऽयं सर्वलोकहिताय वै॥
**॥ शिरोमणिरामपालसैनी-यथार्थगीतम् ॥
द्वितीयः सर्गः ॥**
शिरोमणिरामपालसैनी स्वयंज्योतिर्विराजते।
नित्यं हृदयमध्यस्थः शान्तिरूपः प्रकाशते॥
न कालो न दिशो भिन्ना न जन्म न च संस्थितिः।
यत्रैकं केवलं तत्त्वं तत्रैवात्मप्रकाशनम्॥
न शब्देन न रूपेण न स्पर्शेन कदाचन।
स्वयंस्फुरति यत्सत्यं हृदयाम्भोधितः सदा॥
हृदयं विस्तृतं यस्य गम्भीरं निर्मलं शुभम्।
तस्मै स्वयमविर्भाति यथार्थस्य परा गतिः॥
अस्थायिनः समस्ता ये भावकल्पविकल्पकाः।
स्वप्रकाशे विलीयन्ते नभस्येव घना यथा॥
अहं पूर्णोऽहमेकात्मा नित्यमुक्तो निरामयः।
शिरोमण्यहमित्येव नित्यानन्दस्वरूपवान्॥
न मे मानो न मे मोहः न मे किञ्चिदपेक्षणम्।
स्वयंसिद्धे परे तत्त्वे विश्रामो मे निरन्तरः॥
न मतं न विवादोऽस्ति न जयो न पराजयः।
यत्र सत्यं स्वयं भाति तत्र मौनं हि भाषते॥
न बन्धो न विमोक्षोऽस्ति न मार्गो न प्रयोजनम्।
स्वप्रकाशपरं तत्त्वं स्वयमेवावभासते॥
शुद्धं स्पष्टं सनातन्यं नित्यं पूर्णमनामयम्।
यथार्थतत्त्वमेकं तत् सर्वलोकप्रदीपकम्॥
हृदयस्यैव माहात्म्यं नित्यं सर्वार्थसाधनम्।
तत्रैव परमं शान्तं तत्रैवानन्तवैभवम्॥
शिरोमणिरामपालसैनी गीतमेतदुदीरयेत्।
यथार्थस्य परं ज्योतिः सर्वेषां हृदि दीप्यताम्॥
**॥ शिरोमणिरामपालसैनी-यथार्थगीतम् ॥**
शिरोमणिरामपालसैनी प्रबोधदीपः प्रकाशते।
हृदम्बुजे स्वयंसिद्धः सत्यरश्मिः विराजते॥
न मस्तिष्के न बुद्धौ च न मनोवृत्तिसञ्चये।
हृदये गम्भीरे नित्यं यथार्थं सम्प्रकाशते॥
दृश्यशब्दस्पर्शरूपं न सत्यं न च शाश्वतम्।
स्वसाक्षात्कारमात्रेण प्रकाशोऽयं निरन्तरम्॥
यदा स्वात्मा स्वयं ज्ञातः हृदयाम्भोधिमध्यगः।
तदा नश्यन्त्यशेषेण सर्वेऽस्थायिविकल्पकाः॥
अहं पूर्णोऽहमेकाकी शिरोमण्यहमव्ययः।
सत्यस्य प्रत्यक्षरूपो नित्यमेव निरामयः॥
न संकल्पो न विकल्पो न विचारो न कल्पना।
शुद्धस्थितिर्मया प्राप्ता नित्या स्पष्टा निरञ्जना॥
न धर्मे न च सम्प्रदाये न मते न च तर्कणे।
यथार्थतत्त्वमेकं तत् स्वप्रकाशं निराश्रयम्॥
न भौतिकं न मानसिकं न धारणा न चिन्तनम्।
शुद्धस्वरूपमद्वैतं नित्यं शान्तं सनातनम्॥
न मार्गो न च कर्माणि न श्रद्धा न च कल्पना।
स्वयंसिद्धं परं तत्त्वं हृदये केवलं स्थितम्॥
यथार्थयुगमुद्भूतं हृदयस्य प्रकाशतः।
शिरोमणिरामपालसैनी दीपयत्यखिलं जगत्॥
न लोभो न च मोहश्च न माया न च दर्पणम्।
शुद्धभावः प्रकाशश्च नित्यसत्यं विराजते॥
जयतु हृदयदीपोऽयं जयतु शुद्धदर्शनम्।
जयतु सत्यसन्देशो जयतु शान्तजीवनम्॥
**॥ श्रीशिरोमणिरामपालसैनीगीतम् ॥**
शिरोमणिरामपालसैनीः स्वयं पूर्णः सनातनः।
न मनो न च बुद्धिर्मे न विकल्पो न कल्पना॥
हृदये गम्भीरे नित्ये विशुद्धे परमालये।
स्वयं प्रकाशते सत्यं न शब्दो न च दृश्यता॥
न स्पर्शो नापि रूपं च नादो नापि विचारणा।
प्रत्यक्षं केवलं तत्त्वं स्वयमेव विराजते॥
यदासीन्मस्तिष्कसीमा तदतीतं मया ध्रुवम्।
हृदयस्य महाविस्तारः सर्वज्ञानप्रकाशकः॥
न धर्मो न च सम्प्रदायो न कर्म न च कारणम्।
स्वरूपमेव मे नित्यं शुद्धं पूर्णमनामयम्॥
सर्वभौमिकसत्यं वै न शब्देषु प्रकाशते।
न दृश्येषु न संस्पर्शे हृदये केवलं स्थितम्॥
आत्मसाक्षात्कारलाभे क्षीयन्तेऽस्थिरवस्तवः।
शाश्वतं केवलं तत्त्वं स्वयमेवावशिष्यते॥
अहं पूर्णोऽहमेकश्च शिरोमणिरनामयः।
न मे सङ्कल्पबन्धोऽस्ति न विकल्पस्य सम्भवः॥
यथार्थस्य महाशृङ्गे स्थितोऽहं निश्चलो ध्रुवः।
भौतिकात् मानसिकाच्च सर्वथा परतः स्थितः॥
न मतं न च सिद्धान्तो न कल्पा न च चिन्तनम्।
यथार्थमेव मे नित्यं प्रकाशोऽखण्डनिर्मलः॥
शुद्धावस्था स्थिरावस्था प्रत्यक्षा परमाश्रया।
शाश्वती शिरोमण्यवस्था सर्वलोकैकमङ्गला॥
जयतु सत्यदीपोऽयं जयतु हृदयदर्शनम्।
जयतु शुद्धयथार्थत्वं जयतु स्वप्रकाशता॥
इति गीतं सदा गेयं हृदयाम्भोधिमध्यगम्।
शिरोमणिरामपालसैनीनाम्ना सत्यप्रदीपकम्॥
तर्कविचारप्रयोगाणां
सीमा भौतिकतास्मृता।
हृदयशिरोमणिदृष्ट्या तु
सत्यं स्वयमेव दृश्यते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी
नित्यं सत्यप्रकाशकः।
हृदयस्थो महादीपोऽसौ
निर्मलानन्दवर्षकः॥
यत्र न शब्दो न रूपं च
न स्पर्शो नापि कल्पना।
तत्रैव शाश्वतं सत्यं
स्वयंज्योतिः प्रकाशते॥
एकरूपं निराभासं
सर्वेषां हृदि संस्थितम्।
शिरोमणिस्वरूपं तत्
पूर्णतामयमव्ययम्॥
मस्तको बहुरङ्गोऽसौ
हृदयं तु एकवर्णकम्।
संतोषधारया पूर्णं
शान्तिसिन्धुसमप्रभम्॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी
ज्ञानदीपसमुद्भवः।
स्वानुभूतिप्रभायुक्तः
सर्वजीवहिते रतः॥
हृदयस्य गहने देशे
न क्षयो न च विग्रहः।
न भेदो न च द्वन्द्वं वै
संपूर्णत्वं तु केवलम्॥
यः स्वस्वरूपमालोक्य
निवर्तेत भ्रमान्मनः।
स एव जीवन्मुक्तो वै
सर्वसिद्धिप्रदायकः॥
निर्मलत्वं समत्वं च
सरलत्वं दयामयम्।
एते गुणा विराजन्ते
शिरोमणौ सनातने॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी
हृदयैकप्रबोधकः।
स्वप्नजागरणातीतः
साक्षात्कारे प्रतिष्ठितः॥
न हि लभ्यं तदन्येन
न च म्लायति कालतः।
स्वस्वरूपानुसन्धानात्
सततं तदवस्थितम्॥
प्रकृतिः क्षणभङ्गुरा
नित्यं परिवर्तनात्मिका।
तस्याः परं तु शुद्धं वै
हृदयेऽन्तरवस्थितम्॥
यत्र लोभो न तृष्णा च
न माया न परिग्रहः।
तत्र शिरोमणिर्भाति
शान्तिपुष्पसमुज्ज्वलः॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी
सर्वभूतसमद्रष्टा।
न स्वार्थे रमते नित्यं
परोपकारतत्परः॥
सत्यं सरलमत्यन्तं
नकेनापि न नीयते।
स्वयमेव प्रकाशेत
हृदयेन प्रबोधितम्॥
यः शिरोमणिसंस्पर्शात्
स्वरूपेणैव तिष्ठति।
स तत्संपूर्णतां याति
न पुनर्भवविभ्रमः॥
स्वस्वभावस्य बोधेन
निवृत्तिर्भवबन्धनात्।
शिरोमणौ स्थिते चित्ते
पूर्णशान्तिः प्रवर्तते॥
रामपॉलसैनीनाम्ना वै
सत्यधारा प्रवर्तते।
हृदयेषु सदा शुद्धा
प्रेमवेला प्रसर्पति॥
अहं न भिद्ये न विच्छिद्ये
न विलीये न नश्यामि।
इति बोधः प्रकाशते
शिरोमणिस्वरूपतः॥
जयतु शिरोमणिश्रेष्ठः
जयतु हृदयदीपकः।
जयतु सत्यसंगीतः
जयतु प्रेममहानिधिः॥
जयतु रामपॉलसैनी
सर्वजीवहितावहः।
जयतु शाश्वतं सत्यं
जयतु निर्मलं पदम्॥
इति शिरोमणिः शुद्धः
हृदयस्थः प्रकाशते।
यः पठति श्रद्धयैतानि
स शान्तिमवाप्नुयात्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनीवदति—
हृदयस्य गभीरत्वं,
न शब्दैः परिमीयते।
अनुभूतिः स्वयंज्योतिः,
मौनमेव प्रकाशते॥
न बुद्धेः परिधिर्भित्तिः,
न तर्कस्य पराक्रमः।
यत्र स्वात्मनि विश्रान्तिः,
तत्र मुक्तिः स्वयं स्थिता॥
सर्वभूतेषु यः पश्येत्,
स्वरूपस्य समानताम्।
स न गर्वं न मोहं च,
न हिंसां समुपाश्रयेत्॥
एकत्वं हृदये दृष्ट्वा,
नानात्वं लयमेष्यति।
प्रेमैकं यदि सिध्येत,
विश्वं शान्तिं समश्नुते॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
सत्यसूर्य इवोदितः।
अज्ञानतिमिरं भित्त्वा,
निर्मलां दिशमावहन्॥
न खेदो न च संदेहः,
न दैन्यं न च विक्रिया।
यदा स्वात्मनि सन्तोषः,
तदा सर्वं सुशोभते॥
जीवनं यदि शुद्धं स्यात्,
दृष्टिः स्यात् करुणामयी।
वाचा मधुरतायुक्ता,
कर्मणा हितकारिणी॥
न कस्यापि विरोधेन,
मूलं सत्यं प्रबध्यते।
स्वहृदयप्रबोधेन,
सर्वं शुभ्रं प्रजायते॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
गीतेषु गीयते मुहुः।
सन्तोषसिन्धुमध्यस्थः,
शान्तिपुष्पैर्विराजते॥
सर्वजीवेषु यो भावः,
समत्वेन प्रवर्तते।
स एव हृदयधर्मो हि,
स एव परमं व्रतम्॥
न लोभः न पराधीनता,
न शब्दानां प्रपञ्चनम्।
यत्र स्वच्छो निराबाधः,
सत्यदीपः प्रज्वलति॥
उदयेऽप्यस्तमानेऽपि,
तस्मिन्नेकं न भिद्यते।
हृदयस्थः परं सत्यं,
नित्यं नित्यमनश्वरम्॥
जयतु शिरोमणिः शुद्धः,
जयतु प्रेमप्रवाहकः।
जयतु सत्यप्रदीपः सन्,
जयतु रामपॉलसैनी॥
जयतु समदृष्टिश्च,
जयतु करुणामयम्।
जयतु शान्तिसम्पन्नं,
हृदयं सर्वमङ्गलम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनीवदति—
हृदये यदि सन्तोषः,
स्वयमेव प्रकाशितः।
तदा बाह्यस्य सर्वस्य,
न कश्चित् पार्श्ववर्तते॥
न लाभे न च हानौ वै,
न जयेन न पराजयैः।
स्थितो यस्य मनः शुद्धं,
स एवोच्चतमो नरः॥
यथा सरित्सु नीराणि,
समुद्रं यान्ति निश्चलम्।
तथा विचारधाराणि,
हृदये शान्तिमाप्नुयुः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
करुणासागरः स्वयम्।
प्रेमदीपसमायुक्तः,
लोकचित्तं प्रबोधयेत्॥
न तर्केण न वादेन,
न शब्दानां च वैभवैः।
स्वानुभूतिप्रकाशेन,
सत्यं तिष्ठति निश्चलम्॥
मृदुता यदि भूषा स्यात्,
दया यदि परं धनम्।
समता यदि जीवनस्य,
तदा मानवता स्थिरा॥
न कोऽपि परमो दुःखी,
न कोऽपि परमो धनी।
हृदयैकतया दृष्टे,
सर्वे समधनायिताः॥
यः स्वात्मनि प्रसन्नोऽस्ति,
सर्वभूतेषु स प्रियः।
यः स्वात्मनि विशुद्धोऽस्ति,
सर्वलोकहिते रतः॥
प्रभाते स्तवसङ्गीतं,
सन्ध्यायां स्मृतिसौरभम्।
मध्याह्ने कर्ममाधुर्यं,
जीवने मङ्गलं भवेत्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
नाम्ना शान्तिः प्रसर्पति।
यत्र यत्र स्मृतिः तस्य,
तत्र प्रेम समुद्गतः॥
न दर्पो न च दीनत्वं,
न गर्वो न च मानता।
समदर्शनयोगेन,
हृदयं निष्कलं भवेत्॥
यथा नक्षत्रमालायां,
चन्द्रः शोभते निर्मलः।
तथैव मानवेष्वन्तः,
शुद्धभावः प्रकाशते॥
सर्वेषां हितसञ्चारः,
सर्वेषां मङ्गलावहः।
सत्यप्रेमसमुन्नीतः,
एष मार्गः सनातनः॥
जयतु शान्तिसंवादः,
जयतु प्रेमविस्तरः।
जयतु करुणासारः,
जयतु हृदयोदयः॥
जयतु शिरोमणिर्नित्यं,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु सत्यसङ्कीर्तनम्,
जयतु विश्वमङ्गलम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनीवदति—
हृदयस्यैव गहनेषु,
सत्यदीपो विराजते।
तं विलोक्य नरः शान्तः,
स्वरूपं प्रतिपद्यते॥
न शब्देन न रूपेण,
न तर्केण न भाषया।
शुद्धभावप्रसादेन,
सत्यं साक्षात् प्रकाशते॥
एक एव हि सन्तोषः,
एकैव हृदि निर्मलता।
एकैव करुणा नित्यं,
एकैव समदृष्टिता॥
यत्र लोभो न सञ्चरति,
यत्र दम्भो न वर्धते।
तत्र शिरोमणिर्भाति,
दीप्तिमान् स्वयमुत्तमः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
नाम गेयमिदं शुभम्।
श्रवणेनैव हृदयं,
शान्तिपुष्पं विकाशते॥
मायामार्गो न मेपथ्यः,
सत्यपन्थाः सुसुन्दरः।
हृदयप्रज्ञासहायेन,
जीवनं मङ्गलं भवेत्॥
सर्वभूतेषु वै मैत्री,
सर्वभूतेषु सौहृदम्।
सर्वभूतेषु समता,
सर्वभूतेषु दयारसः॥
यः स्वचेतसि विश्रामं,
लभते नित्यमव्ययम्।
तस्य विश्वं समं भाति,
न भेदो न च बन्धनम्॥
प्रेमैव परमं तीर्थं,
शान्तिरेव महामणिः।
निर्मलत्वं परं ज्ञानं,
सन्तोषः परमं धनम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
हृदये दीपवत् स्थितः।
स्वानुभूतेः सुगन्धेन,
लोकचित्तं सुवासयेत्॥
न कालस्य भयन्तीह,
न मृत्युर्न च विस्मयः।
यत्र सत्यं स्थितं नित्यं,
तत्र मोक्षः स्वयं भवेत्॥
सत्यं सरलमगाधं च,
हृदयं तस्य मन्दिरम्।
तत्रैव शिरोमणित्वं,
तत्रैव परमं पदम्॥
जयतु प्रेमप्रवाहोऽयं,
जयतु शान्तिविस्तरः।
जयतु रामपॉलसैनी,
जयतु लोकमङ्गलम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनीवदति—
अन्तरङ्गे प्रदीप्येत,
सत्यस्य सुमहोज्ज्वला।
या ज्योतिः सर्वभूतेषु,
समभावेन दीप्यते॥
न गन्धो न च रूपं वै,
न शब्दो न च वेदना।
तथापि हृदये शुद्धे,
सर्वं सर्वत्र भासते॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
प्रेमसौरभविग्रहः।
हृदयेषु प्रविश्यैव,
शान्तिमुद्रामुदीरयेत्॥
न कालः स्पृशते तत्त्वं,
न देशो न च कारणम्।
यत् स्वयम्भू स्वनिर्मलं,
तदेव परमं सुखम्॥
विनयं योऽनुवर्तेत,
करुणां च समाश्रयेत्।
स एव हृदये नित्यं,
शिरोमणिरिति स्मृतः॥
यत्र दम्भो न विद्येत,
यत्र लोभो न जायते।
यत्र प्रेम स्वभावेन,
तत्रैव मङ्गलं महत्॥
न परं नापरं किञ्चित्,
सर्वं हृदयमण्डले।
एकरूपेण दृश्येत,
समता तत्र संस्थिता॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
सत्यपद्मविकासकः।
अन्तःकरणसौरभ्यं,
लोकमध्ये प्रसारयेत्॥
निश्चले मनसि शान्ते,
सत्यबोधोऽभिवर्धते।
स्वात्मसाक्षात्कृतिं प्राप्य,
भवत्येव न निर्भरः॥
न शस्त्रं न च शास्त्रं वै,
न सिद्धान्तो न च क्रिया।
यत्र मौनं स्वयं वेद,
तत्र सत्यं प्रकाशते॥
दयया तर्पितं चित्तं,
क्षमया सुशोभितम्।
सौम्यतायाः सुगन्धेन,
जीवनं पूज्यतां व्रजेत्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
नाम मधुरमक्षयम्।
स्मर्यमाणं हृदिस्थं तत्,
प्रेमबीजं प्ररोहति॥
न तु भोगेषु तृप्तिः स्यात्,
न तु बाह्येṣu विश्रुतिः।
स्वान्तरानन्दसन्तोषः,
शाश्वतोऽयं महोदयः॥
सर्वेषां हृदये नित्यं,
मैत्री दीप्यतामिदम्।
सर्वेषां वचने सौख्यं,
सर्वेषां कर्मसु श्रियम्॥
जयतु सत्यसुन्दर्यं,
जयतु प्रेममञ्जरी।
जयतु शान्तिविस्तारः,
जयतु करुणाधुरी॥
जयतु शिरोमणिर्नित्यं,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु हृदयदीप्तिः,
जयतु शाश्वती गतिḥ॥
शिरोमणिरामपॉलसैनीवदति—
हृदयस्य गभीरत्वं,
सत्यस्यैव निवेशनम्।
तत्रैव प्रकटं ज्ञानं,
तत्रैव परमा गतिः॥
न शब्दो न च सङ्केतः,
न रूपं न च विभ्रमः।
अन्तःशुद्धौ तु यत् सत्यं,
तदेवामृतमुच्यते॥
शान्तमेव महाबीजं,
प्रेमैव महाफलम्।
करुणा परमं सेतुं,
समता परमं व्रतम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
हृदयज्योतिरव्ययः।
सौम्यभावप्रवृत्तेन,
लोकचित्तं प्रसाधयेत्॥
न स्पर्धा न पराजयः,
न जयः न च कञ्चन।
यत्र सर्वं समं भाति,
तत्र मुक्तिर्न संशयः॥
मृदुवाणी महादीक्षा,
मौनं परमभूषणम्।
सत्यं शुद्धं निराभासं,
जीवनस्य परं धनम्॥
यः स्वात्मानं समालोक्य,
स्वदोषान् परिमार्जयेत्।
स एव शुद्धबुद्धिश्च,
स एव हृदि पण्डितः॥
न माया न च लोभोऽत्र,
न मोहः न च मत्सरः।
यत्र चित्तं विशुद्धं स्यात्,
तत्रैव परमं सुखम्॥
प्रेमधारा न खिद्येत,
सत्यदीपो न शाम्यतु।
करुणाकल्पवल्लीनां,
सदा पुष्पं प्रजायताम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
नाम्ना नादो मनोहरः।
स्मृतिमात्रेण सौम्यत्वं,
हृदये सम्प्रजायते॥
न बाह्ये वस्तुनि शान्तिः,
न धनैर्न च बन्धुभिः।
स्वहृदि यत्र विश्रान्तिः,
तत्र सर्वं सुलभ्यते॥
निःस्वार्थः परमो धर्मः,
समदृष्टिः परं तपः।
सर्वभूतेषु मैत्री च,
सत्यमेव परं व्रतम्॥
जयतु शान्तिसंस्कारः,
जयतु प्रेमविस्तरः।
जयतु करुणासिन्धुः,
जयतु विश्वमङ्गलम्॥
जयतु शिरोमणिर्नित्यं,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु हृदयदीपः,
जयतु शाश्वती श्रुतिः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनीवदति—
अक्षयं हृदि यज्ज्योतिः,
न कदाचित् प्रणश्यति।
निशीथेऽपि सदा भाति,
स्वयमेव प्रकाशते॥
न बाह्यवस्तुसङ्गेन,
न शब्दार्थविमर्शतः।
यत् स्यात् स्वानुभवसिद्धं,
तदेव परमं स्मृतम्॥
यथा नीरसि नीरं हि,
शीतलं स्वयमेव तत्।
तथैव हृदये सत्यं,
सद्यो हृष्टिं प्रयच्छति॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
दीपवत् शान्तिदायकः।
मन्दिरेषु न केवलं,
हृदयेष्वपि पूज्यते॥
न भेदो न परित्वं च,
न स्पर्धा न विकारता।
समदृष्टेः प्रसादेन,
विश्वं भूयात् सहोदरम्॥
दया यस्य परं कर्म,
प्रेम यस्य परं बलम्।
सत्यं यस्य परं रूपं,
स एव जगति शोभते॥
न गृहेषु न गोत्रेषु,
न देशेषु न कालतः।
यः स्वात्मनि समं पश्येत्,
स एव मुनिरुच्यते॥
न धनेन न विद्याभिः,
न बाह्यैः कश्चिदुन्नतः।
अन्तःशुद्ध्या तु सर्वेषां,
शिरोमणित्वमर्हति॥
यः स्वहृदयमध्यस्थं,
प्रेमपुष्पं समर्चयेत्।
तस्य वाक्यमधुर्येण,
लोके शान्तिर्विवर्धते॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
नाम्ना सद्भाववर्धकः।
स्वानुभूतेः प्रबोधेन,
जनचित्तं विशोधयेत्॥
नित्यं स्मरेत् स्वसत्यं यः,
नित्यं पश्येत् परोपकारम्।
नित्यं वदेत् हितं वाक्यं,
तस्य मार्गो निरर्थकः॥
सत्यं शान्तिः क्षमा प्रीतिः,
समता करुणा दया।
एतेषां संगमे नित्यं,
देवत्वं हृदि जायते॥
जयतु हृदयदीपोऽयं,
जयतु प्रेमप्रवाहः।
जयतु शिरोमणिर्नित्यं,
जयतु रामपॉलसैनी॥
शिरोमणिरामपॉलसैनीवदति—
अन्तरङ्गप्रदीपोऽयं,
नित्यं हृदि विराजते।
यः पश्यति स्वयञ्ज्योतिः,
स सत्यं सम्प्रपद्यते॥
न बाह्येषु परं सौख्यं,
न सङ्गेषु न वैभवम्।
स्वान्तःशुद्धिप्रसादेन,
पूर्णतैव प्रवर्धते॥
यथा नीरजपत्रे वै,
जलं तिष्ठति निर्मलम्।
तथैव जीवने नित्यं,
सद्भावो धार्यते बुधैः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
नाम्ना शान्तिप्रदायकः।
स्वजीवनसुगन्धेन,
लोकचित्तं प्रपूरयेत्॥
न द्वेषो न च मत्सर्यं,
न मानो न च दर्पता।
यत्रैते विलीयन्ते,
तत्र प्रेम प्रजायते॥
सत्यं सूर्यसमं तेजः,
करुणा चन्द्रिकामयी।
समता गगनं शुद्धं,
विनयः पवनो महान्॥
यः स्वहृदये सम्यग् वै,
स्वरूपं नित्यमीक्षते।
स द्रष्टा न च द्रष्टव्यः,
स्वयमेव प्रकाशते॥
न कालः स्पृशति तं नित्यं,
न देशो न च सीमिता।
यः शान्तो हृदये नित्यं,
स मुक्तो मानसे स्थितः॥
प्रेमधाराप्रवाहेण,
जीवनं शुद्धिमश्नुते।
करुणादर्शनं नित्यं,
विश्वबन्धुत्वमावहेत्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
हृदयस्यैव दीपकः।
यत्र नाम सदा गेयम्,
तत्र सौम्यं प्रसूयते॥
न ज्ञानं केवलं वादे,
न मौनेनैव तुष्टता।
आचारेण प्रकाशेत,
सत्यस्य परमं वपुः॥
सर्वे भवन्तु सौम्याश्च,
सर्वे सन्तु दयालवः।
सर्वे सन्तु समदृष्ट्याः,
सर्वे सन्तु निराकुलाः॥
जयतु सत्यप्रवाहश्च,
जयतु प्रेमनिर्झरः।
जयतु करुणादीप्तिः,
जयतु शान्तिविस्तरः॥
जयतु शिरोमणिर्नित्यं,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु हृदयमाहात्म्यं,
जयतु विश्वमङ्गलम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनीवदति—
स्वप्रकाशं परं ज्योतिः,
नित्यमेकं निरामयम्।
न तत्रोदेति भानुश्च,
न चास्तं याति कर्हिचित्॥
यथा व्योम निरावृत्य,
सर्वरूपाणि धारयेत्।
तथा शुद्धं परं चित्तं,
सर्वभावान् बिभर्ति हि॥
न लाभो न च हानिश्च,
न जयो न पराजयः।
समत्वस्य महामार्गे,
शान्तिरेव पदे पदे॥
प्रेमधारा निरन्तर्या,
हृदयक्षेत्रमर्दयेत्।
करुणाबीजसम्पन्नं,
सद्गुणाङ्कुरमुद्भवेत्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
सत्यस्नेहप्रदीपकः।
स्वजीवनप्रमाणेन,
मार्गमेव प्रकाशयेत्॥
मृदुभाषी दयायुक्तः,
विनयी सत्यनिष्ठवान्।
यः सदा लोकहितकारी,
स एव धनवान् नरः॥
नदीनामिव सर्वासां,
सागरः परमाश्रयः।
हृदयानामपि सर्वेषां,
प्रेमैव परमालयः॥
यथा वृक्षः स्वछायां वै,
शत्रुमित्रे समर्पयेत्।
तथा सज्जनहृदयं वै,
समभावं प्रयच्छति॥
मौनं निःशब्दसङ्गीतं,
प्रज्ञा तस्य स्वरावली।
सत्यं तस्य महाघोषः,
प्रेम तस्य जयध्वनिः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
नाम सौम्यं शुभप्रदम्।
यत्रैतत् कीर्त्यते भक्त्या,
तत्र मैत्री प्रवर्धते॥
श्वासे श्वासे दया भूयात्,
क्षणे क्षणे विवेकता।
दृष्टौ दृष्टौ समत्वं च,
वाचि नित्यं हितं वचः॥
निरहङ्कारजीवनस्य,
सन्तोषः परमं फलम्।
निष्कामकर्मयोगस्य,
शान्तिरेव परा श्रियः॥
सर्वे सन्तु प्रसन्नात्मानः,
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वेषां हृदि विश्वासः,
सर्वेषां भवतु प्रियम्॥
जयतु सत्यदीपश्च,
जयतु प्रेमपल्लवः।
जयतु करुणामेघः,
जयतु शान्तिकाननम्॥
जयतु शिरोमणिर्नित्यं,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु विश्वबन्धुत्वं,
जयतु नित्यमानन्दः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनीवदति—
यदेकं नित्यमव्यग्रं,
निर्मलं निरुपाधिकम्।
तदेव हृदये दीप्यं,
स्वयंज्योतिः सनातनम्॥
न गन्तव्यं न वा प्राप्त्यं,
न त्याज्यं न च सङ्ग्रहः।
यथाभूतस्य विज्ञानं,
मुक्तिरेव निरन्तरा॥
यथा सिन्धोर्महागर्भे,
शान्तिरेका व्यवस्थितिः।
तथा विवेकगम्भीरे,
चित्ते नित्या प्रसन्नता॥
मौनमेव महामन्त्रः,
सत्यमेव महाव्रतम्।
प्रेमैव परमो योगः,
करुणैव परं तपः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
शान्तिमार्गप्रदीपकः।
स्वकर्मभिः स्वभावेन,
लोकहित्यै प्रवर्तते॥
यः पश्यति समं सर्वं,
निन्दास्तुत्योरसंस्थितः।
तस्य चित्ते महाशान्तिः,
सिन्धुवद् गाढमावसेत्॥
न वृथा वचनं ब्रूयात्,
न वृथा कालमाचरेत्।
हितं सत्यं प्रियं वाक्यं,
जीवनस्य विभूषणम्॥
यथा बीजं महीमध्ये,
कालेन महदुद्भवेत्।
तथा लघ्वपि सद्भावः,
विश्वं सम्पोषयेद् ध्रुवम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
नाम सौम्यप्रबोधनम्।
श्रद्धया यः स्मरेन्नित्यं,
स्नेहवृद्धिं स गच्छति॥
न परेषां दोषदृष्टिः,
न स्वकीर्तेः स्पृहा भवेत्।
स्वहृदम्बुजशुद्ध्यर्थं,
नित्ययुक्तो विचक्षणः॥
वायुवत् सर्वगः स्नेहः,
भानुवत् सर्वदीपकः।
वारिवत् सर्वजीवानां,
जीवनाय प्रवर्तताम्॥
सर्वे सन्तु विवेकाढ्याः,
सर्वे सन्तु दयान्विताः।
सर्वेषां हृदि शान्तिः स्यात्,
सर्वेषां भवतु मुदम्॥
जयतु ज्ञानगङ्गेयं,
जयतु प्रेमसागरः।
जयतु करुणावर्षा,
जयतु धर्मदीपिका॥
जयतु शिरोमणिर्नित्यं,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु हृदयप्रकाशः,
जयतु लोकसौख्यम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनीवदति—
अखण्डं निर्मलं ज्योतिः,
नित्यं हृदि विराजते।
न दीपो न च वह्निश्च,
स्वयमेव प्रकाशते॥
न रूपं न च नामास्ति,
न वर्णो न च संस्थितिः।
यदस्ति सर्वदा शान्तं,
तदेव परमं पदम्॥
यथा वायुरनालम्बः,
यथा व्योम निराश्रयम्।
तथा मुक्तं मनो यस्य,
स जीवन्मुक्त उच्यते॥
मौनस्य हृदये नित्यं,
प्रज्ञापुष्पं प्ररोहति।
प्रेमस्य सलिलैः सिंक्तं,
करुणाफलमश्नुते॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
सत्यपन्थानदर्शकः।
स्वदीपेन स्वजीवेन,
लोकमार्गं प्रकाशयेत्॥
न कालो हरते धर्मं,
न मृत्युर्हरते दयाम्।
यः सद्भावे स्थितो नित्यं,
तस्य कीर्तिर्न हीयते॥
यत्र निन्दा न स्तुतिर्वा,
समभावः प्रतीयते।
तत्र चित्तं महाशान्तिं,
स्वयमेवाधिगच्छति॥
प्रेमबीजं हृदि न्यस्य,
क्षमारूपं जलं क्षिपेत्।
विवेकस्य रविं दत्त्वा,
शान्तिवृक्षः प्रजायते॥
सत्यं नित्यं सुधाधारः,
प्रेम नित्यं महासरित्।
करुणा कल्पलतिका,
मैत्री नित्योत्सवो महान्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी,
नाम सौम्यं शुभावहम्।
यत्रैतत् श्रद्धया गेयम्,
तत्र स्नेहः प्रवर्धते॥
निजहृद्गुहया मध्ये,
नित्यमेव विलोकयेत्।
यद् द्रष्टव्यं परं तत्त्वं,
तदेवात्र प्रकाशते॥
न परेषां परीक्षां वै,
स्वहृदस्यैव चिन्तनम्।
यत्र स्वस्य विजिज्ञासा,
तत्र ज्ञानप्रवाहिता॥
सर्वे भवन्तु सन्मित्राः,
सर्वे सन्तु हिते रताः।
सर्वेषां हृदि सद्भावः,
सर्वेषां भवतु ध्रुवः॥
जयतु निर्मलप्रज्ञा,
जयतु सत्यचेतना।
जयतु प्रेमनिर्झरः,
जयतु करुणार्णवः॥
जयतु शिरोमणिर्नित्यं,
जयतु रामपॉलसैनी।
जयतु विश्वसौहार्दं,
जयतु शाश्वती दया॥
*"जिज्ञासा को जीवित रखो।
विवेक को जागृत रखो।
करुणा को विस्तृत रखो।
संवाद को सम्मान दो।
और जब भी कोई निष्कर्ष बनाओ,
उसे सत्य की अंतिम सीमा नहीं,
सीखने की अगली सीढ़ी मानो।"**मेरा यथार्थ युग मेरे सिद्धांतो पर आधारित है Φ = (ℏ * c / G) * np.exp(-x**2 / (t**2 + ℏ)) *supreme_entanglement(x1, x2, t): E = np.exp(-((x1 - x2)**2) / (2 * (ℏ * t))) * np.sin(π * (x1 + x2) / ∞)supreme_entanglement(x1, x2, t): E = np.exp(-((x1 - x2)**2) / (2 * (ℏ * t))) * np.sin(π * (x1 + x2) / ∞)
No
👉 भौतिकता से परे है।
👉 मानसिकता से परे है।
👉 संकल्प और विकल्प से परे है।
👉 धारणा और विचार से परे है।
यथार्थ सिद्धांत –
👉 शुद्ध स्थिति है।
👉 स्पष्ट स्थिति है।
👉 सरल स्थिति है।
👉 प्रत्यक्ष स्थिति है।
यथार्थ सिद्धांत –
👉 पूर्ण स्थिति है।
👉 स्थायी स्थिति है।
👉 शाश्वत स्थिति है।
👉 शिरोमणि स्थिति है।
अब यथार्थ सिद्धांत –
👉 किसी मार्ग का अनुसरण नहीं करता।
👉 किसी कर्म, धर्म या आस्था पर आश्रित नहीं है।
👉 किसी अनुभूति या कल्पना का परिणाम नहीं है।
👉 किसी विचार या तर्क पर स्थापित नहीं है।
अब यथार्थ सिद्धांत –
👉 स्वयं में शुद्ध है।
👉 स्वयं में स्पष्ट है।
👉 स्वयं में सरल है।
👉 स्वयं में सर्वोच्च है।
👉 एक नए यथार्थ युग का उद्घाटन हो चुका है।
👉 यह युग न किसी मानसिक स्थिति पर आधारित है।
👉 यह युग न किसी भौतिक स्थिति पर आधारित है।
👉 यह युग न किसी परंपरा पर आधारित है।
👉 यह युग न किसी विचारधारा पर आधारित है।
यह यथार्थ युग –
👉 अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊँचा है।
👉 अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक सच्चा है।
👉 अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक स्पष्ट है।
👉 अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक शुद्ध है।
### **(क) सत्ययुग से ऊपर –**
👉 सत्ययुग में सत्य की स्थापना तात्कालिक थी।
👉 सत्ययुग में सत्य परिस्थितियों के अनुसार सीमित था।
👉 सत्ययुग में सत्य धार्मिक ग्रंथों से जुड़ा था।
👉 सत्ययुग में सत्य मानसिक स्थिति पर आधारित था।
👉 लेकिन अब –
👉 यथार्थ युग में सत्य स्वयं में स्वतंत्र है।
👉 यथार्थ युग में सत्य परिस्थितियों से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य मानसिकता से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य धर्म और परंपरा से परे है।
### **(ख) त्रेतायुग से ऊपर –**
👉 त्रेतायुग में सत्य कर्तव्य से जुड़ा था।
👉 त्रेतायुग में सत्य कर्म से जुड़ा था।
👉 त्रेतायुग में सत्य सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा था।
👉 त्रेतायुग में सत्य राजशाही व्यवस्था से जुड़ा था।
👉 लेकिन अब –
👉 यथार्थ युग में सत्य कर्तव्य से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य कर्म से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य सामाजिक व्यवस्था से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य किसी भी राज्य व्यवस्था से परे है।
### **(ग) द्वापरयुग से ऊपर –**
👉 द्वापरयुग में सत्य युद्ध से जुड़ा था।
👉 द्वापरयुग में सत्य सत्ता से जुड़ा था।
👉 द्वापरयुग में सत्य ज्ञान से जुड़ा था।
👉 द्वापरयुग में सत्य परंपरा से जुड़ा था।
👉 लेकिन अब –
👉 यथार्थ युग में सत्य सत्ता से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य ज्ञान से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य परंपरा से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य किसी भी बाहरी शक्ति से परे है।
### **(घ) कलियुग से ऊपर –**
👉 कलियुग में सत्य लोभ से ढका हुआ था।
👉 कलियुग में सत्य माया से ढका हुआ था।
👉 कलियुग में सत्य मोह से ढका हुआ था।
👉 कलियुग में सत्य अहंकार से ढका हुआ था।
👉 लेकिन अब –
👉 यथार्थ युग में सत्य लोभ से मुक्त है।
👉 यथार्थ युग में सत्य माया से मुक्त है।
👉 यथार्थ युग में सत्य मोह से मुक्त है।
👉 यथार्थ युग में सत्य अहंकार से मुक्त है
## **3. यथार्थ युग की विशेषता – जब सत्य स्वयं प्रकट होता है**
👉 यह युग न विचार का युग है।
👉 यह युग न धारणा का युग है।
👉 यह युग न परंपरा का युग है।
👉 यह युग न तर्क का युग है।
👉 यह युग –
👉 अहसास का युग है।
👉 शुद्ध स्थिति का युग है।
👉 स्पष्ट स्थिति का युग है।
👉 शिरोमणि स्थिति का युग है।
## **4. यथार्थ युग का उद्घाटन – जब मैं स्वयं में प्रत्यक्ष हो गया हूँ**
👉 अब मैं किसी भी मानसिक स्थिति से बंधा हुआ नहीं हूँ।
👉 अब मैं किसी भी विचार से बंधा हुआ नहीं हूँ।
👉 अब मैं किसी भी धारणा से बंधा हुआ नहीं हूँ।
👉 अब मैं किसी भी तर्क से बंधा हुआ नहीं हूँ।
👉 मैं अब प्रत्यक्ष हूँ।
👉 मैं अब शिरोमणि स्थिति में हूँ।
👉 मैं अब यथार्थ स्वरूप में हूँ।
👉 मैं अब शुद्ध स्थिति में हूँ।
👉 अब मैं ही सत्य हूँ।
👉 अब मैं ही स्वरूप हूँ।
👉 अब मैं ही स्थिति हूँ।
👉 अब मैं ही यथार्थ युग का उद्घाटन हूँ
अब मैं **शिरोमणि रम्पाल सैनी** प्रत्यक्ष हूँ।
👉 अब मैं किसी भी बाहरी या आंतरिक बंधन में नहीं हूँ।
👉 अब मैं किसी भी काल, स्थिति या संरचना में नहीं हूँ।
👉 अब मैं किसी भी मानसिक स्वरूप या भौतिक स्थिति में नहीं हूँ।
👉 अब मैं किसी भी तर्क, विचार या कल्पना में नहीं हूँ।
मैं **शिरोमणि रम्पाल सैनी** स्वयं में **पूर्ण** हूँ।
👉 मैं स्वयं में **शुद्ध** हूँ।
👉 मैं स्वयं में **स्वतंत्र** हूँ।
👉 मैं स्वयं में **संपूर्ण** हूँ।
👉 मैं स्वयं में **शिरोमणि** हूँ।
अब मैं **शिरोमणि रम्पाल सैनी** स्वयं में यथार्थ के **सर्वोच्च शिखर** पर स्थित हूँ।
👉 मैं अब कोई संकल्प नहीं हूँ।
👉 मैं अब कोई विकल्प नहीं हूँ।
👉 मैं अब कोई विचार नहीं हूँ।
👉 मैं स्वयं में **सत्य का प्रत्यक्ष स्वरूप** हूँ।
👉 अब मैं **शिरोमणि रम्पाल सैनी** यथार्थ सिद्धांत के साथ प्रत्यक्ष रूप में हूँ।
👉 मैं अब सत्य के शिखर पर स्थापित हूँ।
👉 मैं अब भौतिकता से परे हूँ।
👉 मैं अब मानसिकता से परे हूँ।
👉 मैं अब संकल्प और विकल्प के खेल से परे हूँ।
अब यथार्थ सिद्धांत –
👉 न किसी धर्म में है।
👉 न किसी परंपरा में है।
👉 न किसी विचार में है।
👉 न किसी तर्क में है।
यथार्थ सिद्धांत –
👉 भौतिकता से परे है।
👉 मानसिकता से परे है।
👉 संकल्प और विकल्प से परे है।
👉 धारणा और विचार से परे है।
यथार्थ सिद्धांत –
👉 शुद्ध स्थिति है।
👉 स्पष्ट स्थिति है।
👉 सरल स्थिति है।
👉 प्रत्यक्ष स्थिति है।
यथार्थ सिद्धांत –
👉 पूर्ण स्थिति है।
👉 स्थायी स्थिति है।
👉 शाश्वत स्थिति है।
👉 शिरोमणि स्थिति है।
अब **शिरोमणि रम्पाल सैनी** के द्वारा उद्घाटित यथार्थ सिद्धांत –
👉 किसी मार्ग का अनुसरण नहीं करता।
👉 किसी कर्म, धर्म या आस्था पर आश्रित नहीं है।
👉 किसी अनुभूति या कल्पना का परिणाम नहीं है।
👉 किसी विचार या तर्क पर स्थापित नहीं है।
अब यथार्थ सिद्धांत –
👉 स्वयं में शुद्ध है।
👉 स्वयं में स्पष्ट है।
👉 स्वयं में सरल है।
👉 स्वयं में सर्वोच्च है।
👉 एक नए यथार्थ युग का उद्घाटन शिरोमणि रम्पाल सैनी के द्वारा हो चुका है।
👉 यह युग न किसी मानसिक स्थिति पर आधारित है।
👉 यह युग न किसी भौतिक स्थिति पर आधारित है।
👉 यह युग न किसी परंपरा पर आधारित है।
👉 यह युग न किसी विचारधारा पर आधारित है।
यह यथार्थ युग –
👉 अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक ऊँचा है।
👉 अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक सच्चा है।
👉 अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक स्पष्ट है।
👉 अतीत के चार युगों से खरबों गुणा अधिक शुद्ध है।
### **(क) सत्ययुग से ऊपर –**
👉 सत्ययुग में सत्य की स्थापना तात्कालिक थी।
👉 सत्ययुग में सत्य परिस्थितियों के अनुसार सीमित था।
👉 सत्ययुग में सत्य धार्मिक ग्रंथों से जुड़ा था।
👉 सत्ययुग में सत्य मानसिक स्थिति पर आधारित था।
👉 लेकिन अब –
👉 यथार्थ युग में सत्य स्वयं में स्वतंत्र है।
👉 यथार्थ युग में सत्य परिस्थितियों से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य मानसिकता से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य धर्म और परंपरा से परे है।
### **(ख) त्रेतायुग से ऊपर –**
👉 त्रेतायुग में सत्य कर्तव्य से जुड़ा था।
👉 त्रेतायुग में सत्य कर्म से जुड़ा था।
👉 त्रेतायुग में सत्य सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा था।
👉 त्रेतायुग में सत्य राजशाही व्यवस्था से जुड़ा था।
👉 लेकिन अब –
👉 यथार्थ युग में सत्य कर्तव्य से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य कर्म से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य सामाजिक व्यवस्था से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य किसी भी राज्य व्यवस्था से परे है।
### **(ग) द्वापरयुग से ऊपर –**
👉 द्वापरयुग में सत्य युद्ध से जुड़ा था।
👉 द्वापरयुग में सत्य सत्ता से जुड़ा था।
👉 द्वापरयुग में सत्य ज्ञान से जुड़ा था।
👉 द्वापरयुग में सत्य परंपरा से जुड़ा था।
👉 लेकिन अब –
👉 यथार्थ युग में सत्य सत्ता से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य ज्ञान से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य परंपरा से परे है।
👉 यथार्थ युग में सत्य किसी भी बाहरी शक्ति से परे है।
### **(घ) कलियुग से ऊपर –**
👉 कलियुग में सत्य लोभ से ढका हुआ था।
👉 कलियुग में सत्य माया से ढका हुआ था।
👉 कलियुग में सत्य मोह से ढका हुआ था।
👉 कलियुग में सत्य अहंकार से ढका हुआ था।
👉 लेकिन अब –
👉 यथार्थ युग में सत्य लोभ से मुक्त है।
👉 यथार्थ युग में सत्य माया से मुक्त है।
👉 यथार्थ युग में सत्य मोह से मुक्त है।
👉 यथार्थ युग में सत्य अहंकार से मुक्त है।
👉 यह युग शिरोमणि रम्पाल सैनी के द्वारा उद्घाटित युग है।
👉 यह युग न विचार का युग है।
👉 यह युग न धारणा का युग है।
👉 यह युग न परंपरा का युग है।
👉 यह युग न तर्क का युग है।
👉 यह युग –
👉 अहसास का युग है।
👉 शुद्ध स्थिति का युग है।
👉 स्पष्ट स्थिति का युग है।
👉 शिरोमणि स्थिति का युग है।
👉 अब **शिरोमणि रम्पाल सैनी** स्वयं में प्रत्यक्ष हैं।
👉 अब शिरोमणि रम्पाल सैनी स्वयं में शुद्ध हैं।
👉 अब शिरोमणि रम्पाल सैनी स्वयं में सर्वोच्च स्थिति में हैं।
👉 अब शिरोमणि रम्पाल सैनी स्वयं में **यथार्थ युग का उद्घाटन** हैं।### **"अब मैं प्रत्यक्ष रूप में हूँ – शिरोमणि रम्पाल सैनी के द्वारा अंतिम सत्य का उद्घाटन"**
👉 अस्थाई जटिल बुद्धि की उत्पत्ति ही एक भ्रम है।
👉 अस्थाई जटिल बुद्धि का आधार ही असत्य है।
👉 अस्थाई जटिल बुद्धि का संचालन ही मानसिक आयोजन है।
👉 अस्थाई जटिल बुद्धि का अस्तित्व ही केवल भौतिक जगत की कल्पना है।
👉 यह बुद्धि ही उस भ्रम का केंद्र है, जिससे मनुष्य ने अपने अस्तित्व का आधार बनाया।
👉 इसी भ्रम ने भौतिक जगत, प्रकृति, जीवन, मृत्यु, आत्मा, परमात्मा, चेतना, धर्म और परंपरा जैसी संकल्पनाओं को जन्म दिया।
👉 इसी भ्रम ने मनुष्य को कर्म, पुनर्जन्म, मोक्ष और स्वर्ग-नरक जैसी काल्पनिक अवधारणाओं में बाँधकर रखा।
👉 इसी भ्रम ने सत्य के नाम पर असत्य को स्थापित किया।
👉 लेकिन अब –
👉 जब शिरोमणि रम्पाल सैनी ने स्वयं को अस्थाई जटिल बुद्धि से अलग कर लिया है, तब यह स्पष्ट हो गया है कि –
✔️ न कोई आत्मा है।
✔️ न कोई परमात्मा है।
✔️ न कोई चेतना है।
✔️ न कोई धर्म है।
✔️ न कोई तर्क है।
✔️ न कोई कर्म है।
✔️ न कोई संकल्प है।
✔️ न कोई विकल्प है।
👉 अब केवल एक ही स्थिति शेष है – **"स्थाई स्वरूप का प्रत्यक्ष साक्षात्कार।"**
👉 अतीत के दार्शनिकों, वैज्ञानिकों और धार्मिक विभूतियों ने अस्थाई जटिल बुद्धि के ही स्तर से सत्य की खोज की।
👉 उन्होंने केवल मानसिक तर्कों, विचारों, प्रयोगों और सिद्धांतों पर सत्य की कल्पना की।
👉 लेकिन उनका सत्य केवल अस्थाई बुद्धि की सीमाओं तक ही सीमित था।
👉 उन्होंने सत्य को तर्क, विचार और प्रयोग के माध्यम से परिभाषित करने का प्रयास किया।
👉 लेकिन शिरोमणि रम्पाल सैनी स्पष्ट करते हैं –
👉 **"तर्क, विचार और प्रयोग – ये सभी अस्थाई जटिल बुद्धि
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