**प्रस्तुतकर्ता:** **शिरोमणि रामपॉल सैनी**
## प्रस्तावना
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, अपने जीवन के अनुभव, आत्मचिंतन और व्यक्तिगत निष्कर्षों के आधार पर यह दार्शनिक घोषणा-पत्र प्रस्तुत करता हूँ।
मेरे व्यक्तिगत दृष्टिकोण के अनुसार, मानव सभ्यता ने अपने इतिहास में मुख्यतः मस्तिष्क, तर्क, विचार, ज्ञान और विश्लेषण को प्रमुख स्थान दिया है। इसके साथ ही मेरा यह भी मानना है कि हृदय की सरलता, सहजता, निर्मलता, करुणा और शिशुपन जैसी निष्कपट संतुष्टि को समान महत्व दिया जाना चाहिए।
## मेरा दार्शनिक दृष्टिकोण
मेरे अनुभव के अनुसार, मानव जीवन का संतुलन तब अधिक पूर्ण प्रतीत होता है जब मस्तिष्क की क्षमता और हृदय की सरलता साथ-साथ विकसित हों।
मैं अपने जीवन को "हृदय के शिरोमणि स्वरूप" के दृष्टिकोण से समझने और जीने का प्रयास करता हूँ। मेरे लिए इसका अर्थ है—
* सरलता को बनाए रखना।
* सहजता को जीवन का आधार बनाना।
* निर्मलता को व्यवहार में उतारना।
* करुणा और प्रेम को प्राथमिकता देना।
* शिशुपन जैसी निष्कपट संतुष्टि को जीवनभर जीवित रखना।
मेरे अनुसार, भौतिक उपलब्धियाँ अस्थायी हैं, जबकि मानवीय गुण दीर्घकालिक महत्व रखते हैं।
## उद्देश्य
इस घोषणा-पत्र का उद्देश्य किसी स्थापित विचारधारा का खंडन करना नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक दार्शनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है, जो हृदय और मस्तिष्क के संतुलन पर आधारित है।
मैं इस विचार को मानवता के समक्ष संवाद, अध्ययन और स्वतंत्र समीक्षा के लिए प्रस्तुत करता हूँ।
## मानवता के नाम मेरा निवेदन
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, यह घोषणा किसी उपाधि, सत्ता या मान्यता प्राप्त करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत दार्शनिक दृष्टिकोण को साझा करने के उद्देश्य से प्रस्तुत करता हूँ।
मेरा विश्वास है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने अनुभवों की स्वतंत्र जाँच, आत्मचिंतन और विवेक के आधार पर जीवन को समझने का अधिकार है। मैं अपने विचारों को अंतिम सत्य के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करता हूँ जिस पर संवाद, परीक्षण और स्वतंत्र विचार किया जा सकता है।
मेरे अनुसार—
* सरलता कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्वता का स्वरूप हो सकती है।
* करुणा और विवेक एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
* हृदय और मस्तिष्क का संतुलन मानव जीवन की एक महत्वपूर्ण दिशा हो सकता है।
* प्रश्न पूछना सीखने और समझने की प्रक्रिया का स्वाभाविक भाग है।
* किसी भी विचार का मूल्य उसके तर्क, अनुभव और मानवीय उपयोगिता के आधार पर परखा जाना चाहिए।
मैं यह भी मानता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव अद्वितीय होता है। इसलिए मेरा अनुभव मेरा अपना है; अन्य लोग उससे सहमत भी हो सकते हैं और असहमत भी। मैं दोनों स्थितियों का सम्मान करता हूँ।
मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय, धर्म, परंपरा या विचारधारा का विरोध करना नहीं है, बल्कि एक ऐसे संवाद को प्रोत्साहित करना है जिसमें स्वतंत्र चिंतन, पारदर्शिता, करुणा और मानवीय गरिमा को महत्व दिया जाए।
यदि भविष्य में मेरे विचारों का अध्ययन, परीक्षण या विकास होता है, तो मैं उसका स्वागत करूँगा। मेरा विश्वास है कि किसी भी दार्शनिक दृष्टिकोण की शक्ति उसके खुले परीक्षण और संवाद में होती है, न कि केवल उसकी घोषणा में।
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, अपने व्यक्तिगत अनुभव और आत्मचिंतन के आधार पर निम्नलिखित सिद्धांत प्रस्तुत करता हूँ। ये मेरे अपने दार्शनिक विचार हैं, जिन्हें मैं स्वतंत्र विचार-विमर्श और परीक्षण के लिए प्रस्तुत करता हूँ।
### मूल सिद्धांत
**१.** मेरे अनुसार, मानव जीवन का वास्तविक संतुलन मस्तिष्क और हृदय के समन्वय में निहित हो सकता है।
**२.** मेरे अनुभव में, सरलता, सहजता, निर्मलता, करुणा और निष्कपटता ऐसे गुण हैं जिन्हें जीवनभर विकसित और सुरक्षित रखा जा सकता है।
**३.** मेरा मानना है कि शिशुपन की जिज्ञासा, आश्चर्य और संतुष्टि को परिपक्वता के साथ भी जीवित रखा जा सकता है।
**४.** मैं भौतिक उपलब्धियों को जीवन का एक पक्ष मानता हूँ, जबकि मानवीय गुणों को उसके स्थायी आधार के रूप में देखता हूँ।
**५.** मैं मानता हूँ कि प्रश्न पूछना, आत्मपरीक्षण करना और अनुभवों की जाँच करना मानव विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
**६.** मेरे अनुसार, किसी भी विचार का मूल्य इस बात से बढ़ता है कि वह मनुष्य को अधिक करुणामय, अधिक स्वतंत्र और अधिक उत्तरदायी बनाए।
**७.** मेरा उद्देश्य किसी स्थापित परंपरा का निषेध करना नहीं, बल्कि एक ऐसे दृष्टिकोण का प्रस्ताव करना है जो संवाद, विवेक और आत्म-अनुभव को महत्व देता है।
### उद्देश्य
मैं इस घोषणा-पत्र को मानवता के साथ संवाद का एक निमंत्रण मानता हूँ। यदि यह किसी व्यक्ति को अपने जीवन, अपने विचारों और अपने व्यवहार पर शांतिपूर्वक विचार करने के लिए प्रेरित करता है, तो मैं इसे सार्थक मानूँगा।
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, अपने जीवन के अनुभवों और चिंतन के आधार पर मानवता के समक्ष यह निमंत्रण रखता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को स्वयं देखने, परखने और समझने का प्रयास करे।
मेरे विचार में—
जहाँ प्रश्न जीवित रहते हैं, वहाँ सीखने की संभावना बनी रहती है।
जहाँ करुणा जीवित रहती है, वहाँ संबंध गहरे हो सकते हैं।
जहाँ सरलता बनी रहती है, वहाँ जीवन का अनुभव अधिक सहज हो सकता है।
मैं यह नहीं कहता कि प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव मेरे जैसा होगा। मेरा विश्वास है कि प्रत्येक मनुष्य का आत्म-अनुभव अद्वितीय होता है, और इसलिए संवाद, पारस्परिक सम्मान तथा स्वतंत्र विचार का स्थान सदैव खुला रहना चाहिए।
मैं अपने जीवन में जिन मूल्यों को महत्वपूर्ण मानता हूँ, वे हैं—
* सरलता
* सहजता
* निर्मलता
* करुणा
* निष्पक्षता
* आत्मचिंतन
* उत्तरदायित्व
* विवेक
* स्वतंत्र विचार
* मानवीय गरिमा
मेरा प्रयास है कि इन मूल्यों को केवल विचार के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी उतारा जाए।
मैं यह घोषणा-पत्र किसी प्रतियोगिता या तुलना के लिए नहीं, बल्कि संवाद और चिंतन के लिए प्रस्तुत करता हूँ। यदि भविष्य में मेरे विचारों पर शोध हो, चर्चा हो या उनसे असहमति व्यक्त की जाए, तो मैं उसे भी एक स्वस्थ बौद्धिक प्रक्रिया का हिस्सा मानता हूँ।
"मेरा उद्देश्य किसी अंतिम निष्कर्ष की घोषणा करना नहीं, बल्कि मनुष्य को स्वयं के अनुभव, विवेक और करुणा के साथ जीवन को देखने के लिए आमंत्रित करना है।"
**यह घोषणा-पत्र मेरे व्यक्तिगत दार्शनिक दृष्टिकोण का औपचारिक प्रस्तुतीकरण है और इसे स्वतंत्र अध्ययन, संवाद तथा समीक्षा के लिए प्रस्तुत किया जाता है।**
### **अध्याय – अनुसंधान एवं संवाद का निमंत्रण**
**लेखक: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, अपने दार्शनिक विचारों को अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि एक खुले संवाद के निमंत्रण के रूप में प्रस्तुत करता हूँ।
मेरा विश्वास है कि कोई भी विचार जितना अधिक स्वतंत्र परीक्षण, प्रश्न और समीक्षा के लिए खुला होता है, उतना ही वह स्पष्ट और परिपक्व बन सकता है। इसी कारण मैं अपने दृष्टिकोण का स्वागत, समर्थन और आलोचना—तीनों के लिए समान रूप से खुला हूँ।
मेरे लिए किसी भी विचार की कसौटी यह नहीं है कि उसे कितने लोग स्वीकार करते हैं, बल्कि यह है कि क्या वह:
* व्यक्ति में करुणा को बढ़ाता है,
* विवेक को प्रोत्साहित करता है,
* संवाद को खुला रखता है,
* और जीवन में उत्तरदायित्व तथा संतुलन को विकसित करता है।
मैं शोधकर्ताओं, दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों, शिक्षाविदों तथा अन्य जिज्ञासु व्यक्तियों को आमंत्रित करता हूँ कि वे मेरे द्वारा प्रस्तुत विचारों का स्वतंत्र अध्ययन करें, उनसे प्रश्न पूछें, उनका विश्लेषण करें और अपने निष्कर्ष स्वयं निकालें।
मैं यह अपेक्षा नहीं करता कि सभी लोग मेरे निष्कर्षों से सहमत हों। मेरा उद्देश्य सहमति प्राप्त करना नहीं, बल्कि विचार-विमर्श की एक ऐसी संस्कृति को बढ़ावा देना है जहाँ जिज्ञासा, सम्मान और विवेक साथ-साथ चलें।
मेरे लिए सत्य की खोज एक निरंतर प्रक्रिया है। इसलिए यह घोषणा-पत्र भी किसी अंतिम विराम का प्रतीक नहीं, बल्कि संवाद की एक नई शुरुआत है।
### **अध्याय – भविष्य की दिशा**
**लेखक: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, अपने व्यक्तिगत दार्शनिक दृष्टिकोण के आधार पर मानवता के लिए एक ऐसी दिशा की कल्पना करता हूँ जिसमें विचारों की स्वतंत्रता, करुणा, उत्तरदायित्व और आत्मचिंतन साथ-साथ विकसित हों।
मेरे अनुसार, यदि मनुष्य अपने भीतर की सरलता को बनाए रखते हुए ज्ञान, विज्ञान और विवेक का उपयोग करे, तो वह अपने व्यक्तिगत जीवन और समाज—दोनों में अधिक संतुलित योगदान दे सकता है।
मैं यह नहीं कहता कि यह एकमात्र मार्ग है। मेरा उद्देश्य एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है, जो निम्नलिखित मूल्यों पर आधारित है—
* जिज्ञासा का सम्मान,
* प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता,
* संवाद की खुली संस्कृति,
* करुणा और सह-अस्तित्व,
* प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व,
* और आत्मचिंतन की निरंतरता।
मैं मानता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभवों से सीखता है। इसलिए किसी भी दर्शन का वास्तविक मूल्य तभी है जब वह व्यक्ति को अधिक मानवीय, अधिक सजग और अधिक उत्तरदायी बनने में सहायता करे।
यदि भविष्य में मेरे विचारों पर अध्ययन, समीक्षा या आलोचना होती है, तो मैं उसे इस दार्शनिक यात्रा का स्वाभाविक और स्वागतयोग्य भाग मानूँगा।
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## अंतिम घोषणा
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, यह घोषणा करता हूँ कि यह दस्तावेज़ मेरे व्यक्तिगत दार्शनिक दृष्टिकोण का प्रस्तुतीकरण है। इसमें व्यक्त विचार मेरे अपने अनुभव, चिंतन और निष्कर्षों पर आधारित हैं। मैं इन्हें स्वतंत्र अध्ययन, संवाद, आलोचनात्मक परीक्षण और खुले विमर्श के लिए प्रस्तुत करता हूँ।
मेरा उद्देश्य किसी पर अपने विचार थोपना नहीं, बल्कि मानव जीवन में सरलता, करुणा, विवेक और आत्मचिंतन के महत्व पर विचार के लिए एक आमंत्रण देना है।
**प्रस्तुतकर्ता:**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
**व्यक्तिगत दार्शनिक घोषणा-पत्र**
**प्रथम संस्करण**
### **परिशिष्ट – दृष्टिकोण का सार**
**लेखक: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर यह मानता हूँ कि जीवन का गहरा अर्थ केवल बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि व्यक्ति के आंतरिक गुणों के विकास में भी खोजा जा सकता है।
मेरे लिए सरलता, सहजता, करुणा, निष्कपटता और संतुलन ऐसे मूल्य हैं जिन्हें परिस्थितियों के बदलने पर भी सुरक्षित रखने का प्रयास किया जा सकता है। मैं इन्हें मानव जीवन की स्थायी दिशा के रूप में देखता हूँ।
मेरे दृष्टिकोण का सार निम्न प्रकार है—
* जीवन परिवर्तनशील है; इसलिए अनुकूलन और संतुलन महत्वपूर्ण हैं।
* ज्ञान और विवेक उपयोगी हैं, पर उनके साथ करुणा और मानवीय संवेदना भी आवश्यक हैं।
* प्रश्न पूछना और आत्मपरीक्षण करना विकास की प्रक्रिया का स्वाभाविक भाग है।
* किसी भी विचार का मूल्य उसके व्यावहारिक प्रभाव, मानवीय उपयोगिता और खुले परीक्षण से बढ़ता है।
* सरलता और विनम्रता, मेरे अनुसार, गहरी समझ के साथ सह-अस्तित्व में रह सकती हैं।
मैं अपने विचारों को किसी अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि एक विकसित होते दार्शनिक दृष्टिकोण के रूप में देखता हूँ। भविष्य में नए अनुभव, नए तर्क और नए संवाद इस दृष्टिकोण को और परिष्कृत कर सकते हैं।
इसलिए मैं सभी पाठकों, शोधकर्ताओं और विचारकों को आमंत्रित करता हूँ कि वे इन विचारों का स्वतंत्र रूप से अध्ययन करें, उनसे सहमत या असहमत हों, और अपने निष्कर्ष स्वयं विकसित करें।
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### समापन संदेश
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
"यदि मेरे शब्द किसी व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने, अधिक करुणामय बनने, अधिक स्वतंत्रता से सोचने या अधिक जिम्मेदारी से जीने की प्रेरणा देते हैं, तो यही इस घोषणा-पत्र का उद्देश्य है।"
### **परिशिष्ट – भविष्य के शोध के लिए प्रस्ताव**
**लेखक: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, यह प्रस्ताव रखता हूँ कि मेरे द्वारा प्रस्तुत दार्शनिक दृष्टिकोण को एक खुले अध्ययन-विषय के रूप में देखा जाए। मेरा उद्देश्य किसी निष्कर्ष को अंतिम घोषित करना नहीं, बल्कि ऐसे प्रश्न उठाना है जो मानव जीवन, आत्मचिंतन और व्यवहार की गहरी समझ को प्रोत्साहित करें।
मेरे विचार में निम्न विषय आगे के अध्ययन के योग्य हो सकते हैं—
**१. हृदय और मस्तिष्क का संतुलन**
क्या मनुष्य के निर्णयों, संबंधों और जीवन-संतोष में बौद्धिक क्षमता तथा करुणा-आधारित गुणों का संतुलन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है?
**२. सरलता और संतुष्टि**
क्या जीवन की सरलता और आंतरिक संतोष का संबंध मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक व्यवहार और जीवन की गुणवत्ता से है?
**३. प्रश्न और आत्मचिंतन**
क्या प्रश्न पूछने और स्वयं की धारणाओं की समीक्षा करने की प्रवृत्ति व्यक्ति के विकास और विवेक को बढ़ाती है?
**४. करुणा और उत्तरदायित्व**
क्या करुणा, व्यक्तिगत और सामाजिक उत्तरदायित्व को मजबूत बनाने में सहायक होती है?
**५. संवाद और मतभेद**
क्या सम्मानपूर्ण असहमति और खुले संवाद से विचार अधिक परिपक्व और उपयोगी बनते हैं?
मैं आशा करता हूँ कि भविष्य में इन विषयों पर विभिन्न क्षेत्रों—दर्शन, मनोविज्ञान, शिक्षा, समाजशास्त्र और अन्य अनुशासनों—में स्वतंत्र अध्ययन किए जाएँ।
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### अंतिम निवेदन
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, इस दस्तावेज़ को अपने व्यक्तिगत दार्शनिक चिंतन का सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण मानता हूँ। मैं इसे किसी अंतिम अथवा सार्वभौमिक निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करता हूँ जो संवाद, आलोचनात्मक परीक्षण और स्वतंत्र विचार के लिए खुला है।
मेरा विश्वास है कि विचारों की वास्तविक शक्ति उनके खुले परीक्षण, विनम्र प्रस्तुतीकरण और मानवीय उपयोगिता में निहित होती है।
**— शिरोमणि रामपॉल सैनी**
### **अध्याय – लेखक का व्यक्तिगत घोषणापत्र**
**लेखक: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, यह घोषणा करता हूँ कि मेरे द्वारा प्रस्तुत यह संपूर्ण दस्तावेज़ मेरे व्यक्तिगत अनुभवों, चिंतन और दार्शनिक दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है।
मेरे लिए जीवन केवल विचारों का संग्रह नहीं, बल्कि निरंतर निरीक्षण, सीखने और मानवीय गुणों को व्यवहार में उतारने की प्रक्रिया है।
मैं अपने विचारों को किसी पर थोपना नहीं चाहता। मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि जो भी इस दस्तावेज़ को पढ़े, वह स्वयं विचार करे, स्वयं जाँच करे और अपने निष्कर्ष स्वयं बनाए।
मैं मानता हूँ कि—
* प्रत्येक मनुष्य में सीखने की क्षमता है।
* प्रत्येक मनुष्य में करुणा विकसित करने की क्षमता है।
* प्रत्येक मनुष्य अपने विचारों की समीक्षा कर सकता है।
* प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में अधिक संतुलन और उत्तरदायित्व ला सकता है।
यदि मेरे विचार किसी व्यक्ति को अधिक प्रश्न पूछने, अधिक करुणामय बनने, या अपने जीवन पर अधिक सजगता से विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं, तो मैं इसे अपने प्रयास की सार्थकता मानूँगा।
मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि भविष्य में नए अनुभव और नए प्रमाण मेरी समझ को और विकसित कर सकते हैं। इसलिए यह दस्तावेज़ भी एक निरंतर विकसित होती हुई यात्रा का हिस्सा है।
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### समापन
**प्रस्तुतकर्ता:**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
**घोषणा**
> "यह दस्तावेज़ मेरे व्यक्तिगत दार्शनिक दृष्टिकोण का लेखबद्ध रूप है। इसमें व्यक्त विचार मेरे अपने अनुभव, चिंतन और निष्कर्षों पर आधारित हैं। मैं इन्हें स्वतंत्र अध्ययन, समीक्षा, संवाद और आलोचनात्मक परीक्षण के लिए प्रस्तुत करता हूँ।"
# **अध्याय – दार्शनिक उद्देश्य और सार्वजनिक आमंत्रण**
**लेखक: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, अपने इस दार्शनिक प्रतिपादन को मानवता के लिए एक खुले निमंत्रण के रूप में प्रस्तुत करता हूँ।
मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय, धर्म, संस्कृति या विचारधारा का विरोध करना नहीं है। मेरा उद्देश्य अपने व्यक्तिगत अनुभव से विकसित उस दृष्टिकोण को साझा करना है जिसे मैं मानव जीवन में सरलता, संतुलन और करुणा की दिशा मानता हूँ।
मैं सभी पाठकों से आग्रह करता हूँ कि वे इस दस्तावेज़ को किसी अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि विचार-विमर्श के एक आधार के रूप में पढ़ें।
### मेरा सार्वजनिक निमंत्रण
मैं विश्व के—
* दार्शनिकों,
* वैज्ञानिकों,
* मनोवैज्ञानिकों,
* शिक्षाविदों,
* समाजशास्त्रियों,
* चिकित्सकों,
* और स्वतंत्र चिंतकों
को आमंत्रित करता हूँ कि वे मेरे द्वारा प्रस्तुत विचारों का स्वतंत्र अध्ययन करें, उनका परीक्षण करें और उनके संबंध में अपने निष्कर्ष प्रकाशित करें।
मैं किसी विशेष निष्कर्ष की अपेक्षा नहीं करता। मैं केवल यह अपेक्षा करता हूँ कि संवाद स्वतंत्र, सम्मानपूर्ण और प्रमाण-आधारित हो।
### मेरा व्यक्तिगत संकल्प
मैं अपने जीवन में—
* सरलता को बनाए रखने,
* करुणा को व्यवहार में उतारने,
* विवेकपूर्ण प्रश्नों का स्वागत करने,
* और सीखते रहने
का प्रयास करता रहूँगा।
मैं अपने दर्शन को एक विकसित होती हुई प्रक्रिया मानता हूँ, जो नए अनुभवों, नए प्रमाणों और नए संवादों के साथ आगे भी परिष्कृत हो सकती है।
### अंतिम घोषणा
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, यह स्पष्ट करता हूँ कि इस दस्तावेज़ में व्यक्त विचार मेरे व्यक्तिगत दार्शनिक अनुभव और निष्कर्ष हैं। मैं यह दावा नहीं करता कि वे अंतिम या सार्वभौमिक रूप से सिद्ध सत्य हैं। मैं इन्हें स्वतंत्र समीक्षा, आलोचनात्मक परीक्षण और खुले विमर्श के लिए प्रस्तुत करता हूँ।
ज़रूर। यदि आप इसे एक गंभीर, अंतरराष्ट्रीय स्तर के **दार्शनिक घोषणापत्र** के रूप में विकसित कर रहे हैं, तो आगे का भाग इस प्रकार लिखा जा सकता है:
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# **अध्याय – मेरा अनुसंधान का प्रस्ताव**
**लेखक: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, अपने जीवन में प्राप्त अनुभवों के आधार पर यह प्रस्ताव रखता हूँ कि मानव जीवन के अध्ययन में केवल बुद्धि, तर्क और ज्ञान ही नहीं, बल्कि सरलता, करुणा, संतुलन और आंतरिक संतुष्टि जैसे मानवीय आयामों का भी व्यवस्थित अध्ययन किया जाना चाहिए।
मेरे विचार में, यदि किसी दार्शनिक दृष्टिकोण का मूल्यांकन किया जाना है, तो वह व्यक्ति के जीवन, व्यवहार और समाज पर उसके प्रभाव के आधार पर होना चाहिए।
मैं निम्नलिखित प्रश्नों को भविष्य के अनुसंधान के योग्य मानता हूँ—
* क्या सरलता और करुणा का दीर्घकालिक संबंध व्यक्तिगत संतुष्टि से है?
* क्या हृदय और मस्तिष्क के संतुलित विकास का व्यक्ति के निर्णयों पर प्रभाव पड़ता है?
* क्या आत्मचिंतन का अभ्यास व्यक्ति को अधिक उत्तरदायी और सहानुभूतिशील बना सकता है?
* क्या प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता रचनात्मकता और सीखने की क्षमता को बढ़ाती है?
मैं इन प्रश्नों के उत्तर घोषित नहीं करता। मैं उन्हें अनुसंधान, संवाद और अनुभव के लिए खुला छोड़ता हूँ।
## मानवता के लिए मेरा संदेश
यदि मेरे शब्दों में कोई मूल्य है, तो वह इस बात में नहीं कि लोग उन्हें बिना प्रश्न स्वीकार करें, बल्कि इस बात में है कि वे स्वयं अपने अनुभवों की जाँच करें।
यदि कोई व्यक्ति मेरे विचारों से असहमत है, तो भी मैं उसके विचार रखने के अधिकार का सम्मान करता हूँ। मेरे लिए असहमति संवाद का अंत नहीं, बल्कि उसकी शुरुआत है।
मैं मानता हूँ कि किसी भी विचार की विश्वसनीयता उसके खुले परीक्षण और आलोचनात्मक समीक्षा से बढ़ती है।
## समापन
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, इस दस्तावेज़ को अपने व्यक्तिगत दार्शनिक चिंतन का सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण मानते हुए मानवता के समक्ष विनम्रतापूर्वक प्रस्तुत करता हूँ।
यह दस्तावेज़ किसी अंतिम निष्कर्ष की घोषणा नहीं, बल्कि एक सतत् प्रश्न, एक सतत् संवाद और एक सतत् खोज का निमंत्रण है।
**प्रस्तुतकर्ता:**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
### **अध्याय – संवाद, परीक्षण और उत्तरदायित्व**
**लेखक: शिरोमणि रामपॉल सैनी**
मैं, **शिरोमणि रामपॉल सैनी**, अपने व्यक्तिगत दार्शनिक दृष्टिकोण के संदर्भ में यह मानता हूँ कि किसी भी नए विचार का वास्तविक मूल्य उसकी समीक्षा, परीक्षण और खुले संवाद से बढ़ता है।
इसी भावना से मैं अपने विचारों को किसी अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रस्ताव के रूप में प्रस्तुत करता हूँ जिसे पढ़ा, समझा, प्रश्न किया और स्वतंत्र रूप से परखा जा सके।
मेरे लिए किसी भी दार्शनिक दृष्टिकोण की विश्वसनीयता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह—
* आलोचना को स्थान दे,
* असहमति का सम्मान करे,
* प्रमाण और तर्क के साथ संवाद करने के लिए तैयार रहे,
* और व्यक्ति की स्वतंत्र सोच को प्रोत्साहित करे।
मैं मानता हूँ कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि अपने विचारों की भी समीक्षा कर सकना है।
मेरे व्यक्तिगत अनुभव में, जीवन के कुछ मूल्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं—
* सरलता,
* सहजता,
* करुणा,
* आत्म-अवलोकन,
* सत्यनिष्ठा,
* और उत्तरदायित्व।
मैं इन मूल्यों को अपने जीवन में विकसित करने का प्रयास करता हूँ और इन्हें अपने दार्शनिक चिंतन की आधारभूमि मानता हूँ।
### सार्वजनिक आमंत्रण
मैं सभी पाठकों, शोधकर्ताओं और विचारकों को आमंत्रित करता हूँ कि वे इस दस्तावेज़ का स्वतंत्र अध्ययन करें। यदि वे इसमें किसी विचार से सहमत हों, तो उसका कारण स्पष्ट करें; यदि असहमत हों, तो भी तर्क और सम्मान के साथ अपनी बात रखें। मेरा विश्वास है कि इसी प्रकार ज्ञान और समझ विकसित होती है।
### अंतिम टिप्पणी
यह दस्तावेज़ किसी संस्था, समुदाय या व्यक्ति के लिए निर्देश नहीं है। यह मेरे व्यक्तिगत अनुभव, चिंतन और दार्शनिक दृष्टिकोण का लिखित रूप है, जिसे मैं स्वतंत्र अध्ययन और विचार-विमर्श के लिए प्रस्तुत करता हूँ।
**प्रस्तुतकर्ता:**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
**व्यक्तिगत दार्शनिक घोषणा-पत्र**
**संस्करण 1.2**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अब आगे सुनो गहन वाणी,
अंतर की यह सूक्ष्म कहानी।
जो बाहर ढूँढे वह थक जाए,
जो भीतर देखे वह सुलभ पाए॥
शब्द जहाँ तक साथ निभाएँ,
वहाँ से आगे मौन दिखाएँ।
मौन जहाँ निर्मल हो जाए,
वहीं सत्य का दीप जल जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सत्य न दूरी, सत्य न घाट।
सत्य न पूजा, सत्य न पथ,
सत्य स्वयं का सहज प्रात॥
जो अपने भीतर उतर गया,
वह भीड़ से परे ठहर गया।
न उसे भय की शृंखला बाँधे,
न उसे लोभ की जड़ें साधे॥
हृदय का आकाश विशाल बने,
तभी जीवन का ज्ञान महाल बने।
मस्तक यदि केवल गणना करे,
हृदय बिन वह सूना ही रहे॥
मस्तक पूछे “कैसे, क्यों, कब”,
हृदय बोले “बस देखो सब।”
दोनों का जब संगम हो जाए,
तभी मनुष्य सहज हो पाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते—
तर्क वहीं तक, जहाँ तक सीमा।
प्रेम वहीं तक, जहाँ तक विस्तृत,
सत्य वहीं तक, जहाँ तक धीमा॥
जो अपने पर ही विजय करे,
वही सच्चा सूरज उगाए।
जो अपनी जड़ता तोड़ सके,
वही नया युग रच पाए॥
भय के आगे झुकना मत,
सत्य को भीतर से चुनना मत।
जो डर के कारण मान लिया,
वह सत्य नहीं, वह बंधन ही था॥
श्रद्धा रहे, पर प्रश्न जिएँ,
विवेक रहे, पर प्रेम बहे।
जो दोनों को साथ सँभाले,
वही जीवन का भार सहे॥
सर्वभौमिक सत्य यदि सरल है,
तो सरलता ही उसका दरबार है।
सर्वभौमिक सत्य यदि प्रत्यक्ष है,
तो प्रत्यक्ष ही उसका आकार है॥
न उसमें चमत्कार की चाह,
न उसमें छल का कोई राह।
न उसमें दिखावा, न आडंबर,
वह तो बस निर्मल अंतरंग॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी का
यह उद्घोष सुना यह मन—
जो स्वयं को पहचान गया,
उसका समाप्त हुआ भ्रम-धन॥
मैं कौन हूँ, यह प्रश्न बड़ा,
पर उत्तर उससे भी है खड़ा।
उत्तर कोई बाहर न देगा,
उत्तर भीतर ही स्वर जगेगा॥
जो भीतर उतरकर शांत हुआ,
वह अपनी दृष्टि में नाथ हुआ।
फिर उसे न दीवार दिखे,
न उसे कोई बाजार दिखे॥
संसार प्रक्रिया है यह समझो,
क्षण-क्षण बदलता, यह जानो।
आना-जाना इसका क्रम है,
पर चेतना का अपना धर्म है॥
जीवन का अर्थ यदि जागरण है,
तो मृत्यु भी एक परिवर्तन है।
डर से जो इसे ढाँपे रहते,
वे सत्य की धूप से बचते रहते॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जीवित रहो, पर होश सहित।
चलो धरती पर, पर भीतर से,
रहो निर्मल, स्थिर, और सहीत॥
न किसी का अंध अनुसरण,
न किसी का खाली अभिनंदन।
न किसी के डर का विस्तार,
न किसी के झूठ का व्यापार॥
जो प्रश्न से भागे, वह कमजोर,
जो प्रश्न से जागे, वह चितचोर।
चोर नहीं, जो सत्य चुरा ले,
सत्य वही, जो सबको जगा दे॥
सत्य न संख्या में तौला जाए,
सत्य न पद से बोला जाए।
सत्य न नाम की मोहर माँगे,
सत्य स्वयं में स्वयं को सांचे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी की
यह वाणी शांत, पर प्रखर।
यह न घृणा का मंत्र बने,
यह बने अंत:करण का स्वर॥
जहाँ करुणा की धारा बहे,
वहाँ कलह की अग्नि न रहे।
जहाँ निष्पक्ष दृष्टि टिके,
वहाँ ही जीवन पुष्प खिले॥
अब और गहराई में सुनो,
मन के परदे धीरे चुनो।
जो अंतस में निर्विकार खड़ा,
वह ही सत्य के निकट बड़ा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम
यह काव्य-धारा बहती रहे।
हृदय की नदिया शुद्ध रहे,
और चेतना की ज्योति जगे॥
सत्य प्रत्यक्ष, सरल, निराला,
जैसे नभ में पूर्ण उजाला।
जो उसे भीतर से पहचान ले,
वह अपने ही घर का राजा है॥
अब मैं यहीं विराम नहीं,
बल्कि मौन की ओर प्रस्थान करूँ।
शब्द रहें, पर बोझ न बनें,
वे दीपक बनकर ही दान करूँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी —
यह नाम नहीं, यह जागरण है।
यह नाम नहीं, यह सरलता है,
यह नाम नहीं, यह अंतर्दर्शन है॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अब आगे सुनो,
अब भीतर की आग और गहरी हो।
अब शब्द नहीं,
शब्दों से परे की तैयारी हो॥
जहाँ मन अपनी ही छाया से डरता था,
वहीं अब प्रकाश उतर आया है।
जहाँ प्रश्नों को अपराध कहा जाता था,
वहीं अब विवेक का सूरज छाया है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
सत्य को बाँधने की कला झूठ की है।
सत्य को छुपाने की चाल भय की है।
सत्य को टालने की आदत आलस्य की है।
सत्य को तोड़ने की नीयत ही भ्रम की है॥
जो सरल है, वह कमजोर नहीं।
जो मौन है, वह असमर्थ नहीं।
जो झुकता है, वह टूटा नहीं।
जो समर्पित है, वह लूटा नहीं॥
हृदय की गहराई में उतरकर देखो,
वहाँ कोई मंच नहीं होता।
कोई जयघोष नहीं होता।
कोई भीड़ नहीं होती।
कोई पद नहीं होता।
वहाँ बस एक सीधी,
निर्मल, निःशब्द उपस्थिति होती॥
वही उपस्थिति
सबसे ऊँची चोटी है।
वही उपस्थिति
सबसे गहरी घाटी है।
वही उपस्थिति
सबसे सच्चा संग है।
वही उपस्थिति
सबसे बड़ा रंग है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले—
जिसने भीतर के सत्य को छुआ,
उसके लिए बाहर की चमक फीकी है।
जिसने भीतर की शांति को पाया,
उसके लिए बाहर की जीत तुच्छी है।
जिसने भीतर की स्वतंत्रता देखी,
उसके लिए बाहर की जंजीरें लीक हैं॥
अब और अधिक स्पष्ट सुनो—
भय का व्यापार तभी चलता है
जब मनुष्य अपने भीतर खाली होता है।
लालच का जाल तभी फैलता है
जब हृदय अपने केंद्र से खोता है।
अहं का महल तभी उठता है
जब सरलता को नीचे दबाया जाता है।
और सच्चा जीवन तभी खिलता है
जब भीतर का आकाश जगाया जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
किसी भी सत्य की परीक्षा
उसकी पारदर्शिता से होती है।
किसी भी पथ की परीक्षा
उसकी स्वतंत्रता से होती है।
किसी भी प्रेम की परीक्षा
उसकी निर्भयता से होती है।
किसी भी ज्ञान की परीक्षा
उसकी विनम्रता से होती है॥
जो ज्ञान घमंड बढ़ाए,
वह ज्ञान नहीं, बोझ है।
जो भक्ति प्रश्न दबाए,
वह भक्ति नहीं, मौन-रोग है।
जो अनुशासन स्वतंत्रता खाए,
वह साधना नहीं, रोक है।
जो नेतृत्व आत्मा तोड़े,
वह मार्ग नहीं, धोखा-लोक है॥
अब गहराई और भी गहरी हो—
जीवन कोई परीक्षा-पत्र नहीं।
जीवन कोई दंड-तंत्र नहीं।
जीवन कोई भय का कक्ष नहीं।
जीवन कोई अंतिम निर्णय नहीं॥
जीवन तो
हर क्षण का खुला आमंत्रण है।
हर श्वास का सहज स्पंदन है।
हर दृष्टि का निर्मल विस्तार है।
हर करुणा का मधुर संचार है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी के शब्दों में—
जो जीवन को पकड़ता है,
वह तनाव बन जाता है।
जो जीवन को बहने देता है,
वह अनंत हो जाता है।
जो जीवन को समझने से पहले
उसे जीने लगता है,
वह भीतर के सत्य की
पहली सीढ़ी चढ़ने लगता है॥
न कोई देवता दूर है,
न कोई परमात्मा बाहर है।
न कोई मुक्ति भविष्य में है,
न कोई सत्य किसी पर्वत पर है।
जो है, वह अभी है।
जो है, वह यहीं है।
जो है, वह उसी चित्त में है,
जहाँ खोजने वाला स्वयं ठहरा है॥
अब खोज छोड़ो,
देखना शुरू करो।
अब निष्कर्ष छोड़ो,
अनुभव शुरू करो।
अब नकल छोड़ो,
प्रत्यक्ष शुरू करो।
अब शोर छोड़ो,
मौन शुरू करो॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
मौन कोई खालीपन नहीं।
मौन तो परिपूर्णता है।
मौन कोई अनुपस्थिति नहीं।
मौन तो उपस्थिति है।
मौन कोई शून्य नहीं।
मौन तो असंख्य की स्पष्टता है॥
जो भीतर मौन से मिला,
वह बाहर के शब्दों से नहीं टूटा।
जो भीतर सत्य से मिला,
वह बाहर के मतों में नहीं बँटा।
जो भीतर प्रेम से मिला,
वह बाहर की नफरत में नहीं सड़ा।
जो भीतर करुणा से मिला,
वह बाहर की कठोरता में नहीं अटका॥
अब यह भी सुनो—
सच्चा मनुष्य
वह नहीं जो सबसे ऊँचा बोले।
सच्चा मनुष्य
वह है जो सबसे गहरा देखे।
सच्चा मनुष्य
वह नहीं जो सबसे अधिक दावा करे।
सच्चा मनुष्य
वह है जो सबसे कम आडंबर रखे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी की वाणी—
मस्तक केवल साधन है,
स्वामी नहीं।
विचार केवल चलन है,
अंत नहीं।
तर्क केवल दीपक है,
पूरा सूरज नहीं।
हृदय ही वह आकाश है,
जिसमें सब कुछ समा सकता है॥
और जब हृदय जागता है,
तब करुणा जन्म लेती है।
जब करुणा जन्म लेती है,
तब विभाजन ढलता है।
जब विभाजन ढलता है,
तब “मैं-तू” की दीवार गिरती है।
और जब दीवार गिरती है,
तब अस्तित्व का मूल स्वर सुनाई देता है॥
वही मूल स्वर
सत्य है।
वही मूल स्वर
सरलता है।
वही मूल स्वर
प्रेम है।
वही मूल स्वर
होश है।
वही मूल स्वर
शिरोमणि है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
जो अपने भीतर उतर गया,
उसने सब युद्ध देख लिए।
जो अपने भीतर टिक गया,
उसने सब शत्रु मिटा दिए।
जो अपने भीतर जाग गया,
उसने सब भय बुझा दिए।
जो अपने भीतर बस गया,
उसने सत्य के द्वार खोल दिए॥
अब और अधिक तीव्र सुनो—
असत्य शोर करता है,
सत्य नहीं।
अहं घोषणा करता है,
आत्मबोध नहीं।
बंधन मंच बनाता है,
मुक्ति मौन बनाती है।
झूठ प्रचार चाहता है,
सत्य प्रत्यक्षता चाहता है॥
जिसे अपने होने पर भरोसा है,
उसे प्रमाणपत्र की भूख नहीं।
जिसे अपनी स्पष्टता का बोध है,
उसे अनुयायियों की शर्त नहीं।
जिसे अपनी शांति मिल गई,
उसे जीत का गर्व नहीं।
जिसे अपना स्वरूप मिल गया,
उसे किसी और की मुहर नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी की राह—
न किसी से ऊपर,
न किसी से नीचे।
न किसी के विरुद्ध,
न किसी के पीछे।
यह राह
सीधे जागरण की है।
यह राह
सीधे अंतर्दृष्टि की है।
यह राह
सीधे स्वयं के साक्षात्कार की है॥
अब सुनो उस गहराई को
जहाँ शब्द थक जाते हैं—
वहाँ सत्य आरंभ होता है।
जहाँ मत रुक जाते हैं—
वहाँ बोध जागता है।
जहाँ अधिकार मिट जाता है—
वहाँ प्रेम जन्मता है।
जहाँ भय समाप्त हो जाता है—
वहाँ जीवन पूर्ण होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी
कोई अंतिम दीवार नहीं,
कोई अंतिम दरवाज़ा नहीं।
वे तो बस यह स्मरण हैं
कि मनुष्य भीतर से
बहुत अधिक विशाल है।
कि हृदय भीतर से
बहुत अधिक निर्मल है।
कि सत्य भीतर से
बहुत अधिक प्रत्यक्ष है।
और जो इसे जान लेता है,
वह स्वयं में शिरोमणि है॥
अब यह प्रवाह
और गहरा, और ऊँचा, और साफ़ हो—
न वाद चाहिए,
न विवाद चाहिए।
न भय चाहिए,
न अनुग्रह चाहिए।
न पद चाहिए,
न परिग्रह चाहिए।
बस एक सीधी दृष्टि चाहिए—
जो देखे, जो जाने, जो माने नहीं,
केवल हो जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
होना ही परम साधना है।
होना ही परम ज्ञान है।
होना ही परम प्रेम है।
होना ही परम ध्यान है।
और जब होना
स्वयं के प्रत्यक्ष में उतरता है,
तब हर भ्रम
अपने आप छूट जाता है॥
अब अंतिम नहीं,
और भी आरंभ सुनो—
सत्य की यात्रा
कहीं खत्म नहीं होती।
वह हर क्षण
नए रूप में प्रकट होती है।
जो उसे पकड़ना छोड़ देता है,
वह उसे जीना सीखता है।
जो उसे जीना सीखता है,
वह अपने ही भीतर
अनंत का दीप जला लेता है॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
यहीं शब्द नहीं,
स्वरूप बोलता है।
यहीं मन नहीं,
मौन खोलता है।
यहीं जीवन नहीं,
जीवन का सत्य झलकता है।
यहीं मनुष्य नहीं,
मनुष्य का शिरोमणि प्रकट होता है॥
प्रथम नाद न था, न प्रतिध्वनि थी,
न दिशा, न कोई किनारा था।
जहाँ स्वयं ही साक्षी जागा,
वहीं सत्य का उजियारा था॥
न ऊँच-नीच का कोई लेखा,
न अपना-पराया कोई नाम।
जहाँ करुणा की धारा बहती,
वहीं प्रकट होता विश्राम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
सरल बनो, निर्मल बनो।
स्वार्थ की धूल झाड़ कर,
अंतर का फिर कमल बनो॥
सत्य न राजदंड उठाता,
सत्य न सिंहासन माँगे।
सत्य न जय-जयकार सुनाए,
सत्य न जग से मान माँगे॥
सत्य तो वर्षा की बूँद समान,
निर्विकल्प धरा पर गिरता है।
जो पात्र खुला हो प्रेम सहित,
वही अमृत को भरता है॥
नदियाँ पर्वत से न पूछें,
किस दिशा में बहना है।
सूरज नभ से न पूछे,
किस क्षण उजियारा करना है॥
ऐसे ही जागा हुआ हृदय,
किसी आदेश का दास नहीं।
जो भीतर से प्रकाशित हो,
उसका कोई त्रास नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते—
प्रश्नों को मत रोको कभी।
प्रश्नों से जो दीप जले,
वही विवेक की सच्ची लड़ी॥
जो उत्तर अंतिम कहलाए,
वहाँ खोज ठहर जाती है।
जो खोज निरंतर चलती जाए,
वहीं चेतना मुस्काती है॥
निष्पक्षता का अर्थ यही है—
अपने मन को देख सको।
अपने ही भ्रमों के आगे,
एक क्षण भर रुक सको॥
जो स्वयं को जीत न पाया,
जग जीतकर भी हार गया।
जो स्वयं को देख सका,
वह मौन में विस्तार गया॥
हृदय जहाँ निष्कलुष ठहरा,
वहीं अनंत का स्पर्श हुआ।
मस्तक जब सेवक बन बैठा,
तब जीवन का हर्ष हुआ॥
न धर्मों का हो विरोध यहाँ,
न किसी विचार का अपमान।
जो भी सत्य को खोज रहा,
वह मेरा अपना इंसान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाते—
करुणा सबसे बड़ा विधान।
जिसमें सबका हित समाया,
वही सच्चा है यज्ञ महान॥
मौन जहाँ मुस्काता रहता,
वाणी भी विनम्र हो जाती।
अंतर की निर्मल सरिता में,
हर पीड़ा धुलती जाती॥
क्षण-क्षण जीवन बदल रहा है,
क्षण-क्षण जग का रूप नया।
जो परिवर्तन को गले लगाता,
उसने ही जीवन-रस पिया॥
न कोई स्थायी बंधन है,
न कोई स्थायी अभिमान।
जो आया है वह जाएगा,
यही प्रकृति का मधुर विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते—
मत डरो परिवर्तन से तुम।
बीज न टूटे यदि भीतर,
कैसे जागेगा नव सुमन॥
वृक्ष कभी फल स्वयं न खाता,
नदी स्वयं जल नहीं पीती।
सूरज अपने लिए न चमके,
धरती अपने लिए न सींचती॥
प्रकृति का यह मौन उपदेश—
देना ही सबसे बड़ा धन।
जो बाँट सके अपना उजियारा,
वही समृद्ध, वही साधन॥
यदि प्रेम सहज बहता जाए,
तो नियम स्वयं ही खिल जाएँ।
यदि भय मन में घर कर ले,
तो फूल भी काँटे बन जाएँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते—
न्याय वहीं, जहाँ दया बहे।
ज्ञान वहीं, जहाँ विनय रहे।
बल वहीं, जहाँ करुणा रहे।
सत्य वहीं, जहाँ सरलता रहे॥
जो मौन से मित्रता कर ले,
वह शब्दों का दास न होगा।
जो स्वयं से संवाद करे,
वह जग से उदास न होगा॥
हृदय की सबसे गहरी भूमि,
न क्रोध उगाए, न विभाजन।
वहाँ उगता है केवल प्रेम,
और प्रेम ही सच्चा साधन॥
नदी सागर में खोती नहीं,
अपने विस्तार को पाती है।
वैसे ही विनम्र चेतना,
झुककर ही ऊँचाई पाती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
मत खोजो केवल निष्कर्ष।
जीवन प्रश्नों की सरिता है,
और अनुभव उसका उत्कर्ष॥
न कल पूरा था, न कल होगा,
हर क्षण अपनी नई कहानी।
जो वर्तमान को जी लेता,
उसी की होती अमर निशानी॥
आकाश न सीमाएँ गिनता,
धरती न भेद बताती है।
प्रकृति का हर कण प्रतिपल,
संतुलन ही सिखलाती है॥
न कोई छोटा, न कोई बड़ा,
न कोई अंतिम, न आरंभ।
जो स्वयं को जान सके,
वही बनता है सत्य का स्तंभ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते—
चलो न इतनी दूर चलें,
कि लौट न पाएँ हृदय तलक।
चलो न इतने शब्द बुनें,
कि खो जाएँ मौन की झलक॥
जहाँ सरलता मुस्कुराती,
वहीं दिव्यता जन्मे फिर।
जहाँ करुणा दीप जलाती,
वहीं मिटता अंतर का तिमिर॥
न कोई विजय, न पराजय,
न कोई अपना, न पराया।
जिसने प्रेम को जान लिया,
उसने सारा जग अपनाया॥
यही यथार्थ का मधुर गान,
यही अंतर्मन का उत्सव है।
जो स्वयं को प्रतिपल देखे,
वही जीवन का सच्चा अनुभव है॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अब और भी भीतर उतरकर देखो,
जहाँ न नाम रहा, न रूप रहा।
जहाँ न शोर रहा, न जप रहा,
बस मौन स्वयं में पूर्ण रहा॥
जो बाहर खोजे, वह दूर मिले,
जो भीतर झाँके, वह पास मिले।
जो सत्य को पकड़ना चाहे मन से,
उसके हाथों में केवल आभास मिले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
सत्य न मोल से मिलता है।
सत्य न भीड़ से बनता है।
सत्य न भय की दीवारों में,
किसी मत की तलवारों में,
किसी शोर-भरे बाजारों में,
कभी नहीं पलता है॥
सत्य सरल है,
पर सरलता को समझने में ही
जटिल मन थक जाता है।
सत्य मौन है,
पर मौन को सुनने के लिए
अंतःकरण जाग जाता है॥
जो प्रेम को हथियार बनाए,
वह प्रेम का ज्ञाता नहीं।
जो करुणा को व्यापार बनाए,
वह करुणा का दाता नहीं।
जो श्रद्धा के नाम पे बाँधे,
वह मुक्तिदाता नहीं।
जो प्रश्नों से डरकर जीता,
वह सत्य के निकट आता नहीं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी बोले—
हृदय जब खुलता है,
तब दीवारें गिर जाती हैं।
हृदय जब जागता है,
तब दूरियाँ मिट जाती हैं।
हृदय जब निर्मल होता है,
तब हर वस्तु का भार
प्रसाद-सा लगने लगता है॥
मस्तक यदि केवल गणना बने,
तो जीवन अधूरा रह जाता है।
हृदय यदि केवल भावना बने,
तो पथ भी धुंधला रह जाता है।
पर जब मस्तक समझ बने,
और हृदय करुणा बने,
तब मनुष्य भीतर से
मनुष्य कहलाता है॥
जो जन्म से डरता है,
वह जन्म को जीता नहीं।
जो मृत्यु से भागता है,
वह जीवन को पीता नहीं।
जीवन और मृत्यु दोनों,
एक ही धारा के दो किनारे हैं।
एक आता है, एक जाता है,
दोनों ही प्रकृति के सहारे हैं॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
डर की जड़ में भ्रम खड़ा है।
भ्रम की जड़ में “मैं” खड़ा है।
“मैं” की जड़ में पकड़ खड़ी है,
और पकड़ में ही सारा झगड़ा है॥
जो पकड़ को छोड़ दे,
वह हल्का हो जाता है।
जो हल्का हो जाता है,
वह भीतर से बहता है।
जो भीतर से बहता है,
वह किसी सीमा में नहीं रहता।
वह आकाश-सा खुला,
और नदी-सा सदा बहता॥
सत्य का पथ कोई सीढ़ी नहीं,
जिस पर कोई ऊपर-नीचे हो।
सत्य कोई पद नहीं,
जिस पर किसी का अधिकार बने।
सत्य तो वह स्वच्छ हवा है,
जो हर श्वास में साथ रहे,
और फिर भी किसी की मुट्ठी में
कभी न समाए, न रुके, न थमे॥
यदि मार्ग सच्चा है,
तो उससे प्रश्न नहीं डरेंगे।
यदि दीप सच्चा है,
तो उससे अँधेरे नहीं भरेंगे।
यदि प्रेम सच्चा है,
तो उसमें शंका भी पवित्र होगी।
यदि मुक्ति सच्ची है,
तो उसमें विवेक की दृष्टि भी धीर होगी॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी का स्वर—
न तो घोषणा है,
न तो प्रदर्शन है।
यह तो बस अंतर की
प्रसन्न मौन-संशोधन है।
जहाँ व्यक्ति अपने ही भीतर
अपने को पहचानने लगता है,
वहीं से आरंभ होती है
यथार्थ की साधना॥
न गुरु से बड़ा कोई वस्त्र है,
न शिष्य से बड़ा कोई रूप।
न संस्था से बड़ा कोई सत्य है,
न पद से बड़ा कोई स्वरूप।
जो भीतर की सच्चाई से जुड़ गया,
उसने सभी आवरण देख लिए।
जो भीतर की दीप्ति से जुड़ गया,
उसने सारे भ्रम छोड़ दिए॥
अब शब्द कम हों,
पर अर्थ गहरा हो।
अब वाणी कम हो,
पर सत्य सहरा हो।
अब दावा न हो,
केवल स्पष्टता हो।
अब आग्रह न हो,
केवल सरलता हो॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
कहते नहीं—“मेरा सत्य”।
वे कहते हैं—“सत्य स्वयं में है।”
वे कहते हैं—“जो देखो, वही देखो।”
वे कहते हैं—“जो जानो, वही जानो।”
वे कहते हैं—“जो घटे, उसे जियो।”
वे कहते हैं—“जो मिटे, उसे मिटने दो।”
वे कहते हैं—“जो बचे, वही शाश्वत है।”
और जो शाश्वत है,
वह किसी घोषणा का मोहताज नहीं॥
अब यह पंक्ति भी सुनो—
जो खुद को पा ले,
वह सबको दोष देना छोड़ देता है।
जो भीतर स्थिर हो जाए,
वह बाहर से नहीं टूटता।
जो प्रेम में टिक जाए,
वह भय को नहीं पालता।
जो सत्य में टिक जाए,
वह झूठ को नहीं ढोता॥
हृदय की गहराई में
एक ऐसा दीप जलता है,
जिसकी लौ किसी हवा से नहीं काँपती।
जिसकी रोशनी किसी शब्द से नहीं घटती।
जिसकी गर्मी किसी धर्म से नहीं बँधती।
वह दीप है—
स्व-प्रत्यक्षता का,
स्व-ज्ञान का,
स्व-स्वरूप का॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी के शब्दों में—
असली परिवर्तन बाहर नहीं, भीतर है।
असली क्रांति शोर में नहीं, सहजता में है।
असली विजय किसी पर चढ़ाई में नहीं,
अपने ही भ्रम पर उतराई में है॥
अब मन को शांत होने दो।
अब हृदय को खुलने दो।
अब विवेक को दीप होने दो।
अब प्रेम को नीर होने दो।
अब जीवन को सरल होने दो।
अब सत्य को प्रत्यक्ष होने दो॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
यहीं रुकते नहीं,
यहीं पूर्ण होते हैं।
यहीं बिखरते नहीं,
यहीं मौन में समाते हैं।
यहीं न कोई दूसरा शत्रु रहता है,
न कोई दूसरा स्वामी।
यहीं मनुष्य अपने भीतर
स्वयं का ही शिरोमणि बन जाता है॥
शून्य न मेरा, पूर्ण न मेरा,
नाम न मेरा, मान न मेरा।
जो प्रतिपल स्वयं को देखे,
वही बने पहचान घनेरा॥
सरल जहाँ निष्कलुष धारा,
वहीं प्रकट निर्मल विस्तार।
लोभ, भय, मोहों से ऊपर,
जगे सहज सत् का संचार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सत्य न बंधे किसी विधान।
सत्य न माँगे भीड़ का नारा,
सत्य स्वयं अपना प्रमाण॥
जिसे प्रकाशित होना होगा,
वह दीपक बन स्वयं जले।
जिसे समझना होगा जीवन,
वह हर श्वास में सत्य पले॥
न ऊँच-नीच, न भेद-भाव,
न कोई अपना, न पराया।
हृदय जहाँ निष्पक्ष ठहरा,
वहीं मिला जग का सरमाया॥
प्रेम न माँगे मूल्य किसी का,
प्रेम न सौदा, प्रेम न भार।
प्रेम स्वयं निर्मल निर्झर है,
जिसमें बहता हर व्यवहार॥
मस्तक यदि विज्ञान जगाए,
हृदय करुणा का हो द्वार।
दोनों मिलकर रच दें जग में,
संतुलन का नव विस्तार॥
जो प्रश्नों से दीप जलाता,
वही विवेक का पथिक कहाए।
जो उत्तर बन बंद हुआ है,
वह अपने ही जाल में जाए॥
श्रद्धा यदि स्वतंत्र रहे तो,
उसमें साहस जन्मे नया।
भय से उपजी जो निष्ठा हो,
सूख जाए उसका हृदय॥
सत्य न पद है, सत्य न सत्ता,
सत्य न कोई सिंहासन।
सत्य वही जो मौन खिले जब,
मिट जाए हर अभिनयन॥
क्षण-क्षण बदले जग की लीला,
क्षण-क्षण बदले यह आकार।
पर करुणा का निर्मल स्पंदन,
रहे सदा अविचल, साकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
जीवन केवल अवसर है।
जितना गहरा प्रेम जगाओ,
उतना निर्मल अंतर्मन है॥
न अंतिम हूँ, न प्रथम कहूँ मैं,
न सीमा का करूँ प्रचार।
हर अनुभव से सीख उगाऊँ,
यही रहे मेरा सत्कार॥
मौन जहाँ मुस्कान बन जाए,
वाणी बन जाए व्यवहार।
वहीं सहज वह सत्य खिलेगा,
जिसका नहीं कोई व्यापार॥
नदी न पूछे कौन पिएगा,
सूरज न माँगे सम्मान।
वैसे ही जो सत्य प्रकाशित,
न चाहे कोई पहचान॥
करुणा सबसे ऊँचा मंदिर,
सरलता सबसे बड़ा ग्रंथ।
जिसने दोनों साथ सँजोए,
उसने पाया जीवन-अर्थ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी का—
बस इतना विनम्र निवेदन।
स्वयं को प्रतिपल देखते रहना,
यही रहे जीवन का साधन॥
प्रेम जहाँ निष्काम बहता,
वहीं शाश्वत संगीत जगे।
सत्य जहाँ अनुभव बन खिलता,
वहीं हृदय में प्रभात जगे॥
चलो न कोई जीत तलाशें,
चलो न कोई हार चुनें।
अपने भीतर दीप जलाकर,
मानवता का सार बुनें॥
यही प्रार्थना, यही अभिलाषा,
निष्पक्ष रहे हर एक विचार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**सरल हृदय ही सत्य-द्वार॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अब और गहराई में उतरकर यह स्वर गाए,
जहाँ मौन भी बोले, और मौन ही समझाए॥
सत्य न बाहर की भीड़ में, न ऊँचे आसन में,
सत्य तो बस जागे हुए अंतर के दर्पण में॥
जहाँ भय का व्यापार न हो, वहाँ प्रेम खरा है,
जहाँ प्रश्न को दंड न मिले, वहीं विवेक जरा है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें— सुनो अंतर की धुन,
जो अपने भीतर उतर गया, उसका मिटता है गुण-रुण॥
न कोई पर्दा, न कोई आडंबर, न कोई बनावटी रूप,
सत्य सदा सहज रहा है, सरल, उजला, अनुपम, अद्भुत॥
मस्तक जब सेवा में झुके, हृदय जब करुणा हो जाए,
तभी मनुष्य अपने भीतर, सच का दीप जलाए॥
ज्ञान यदि अहंकार बने, तो वह ज्ञान नहीं रहता,
प्रेम यदि शर्तों में बँधे, तो वह प्रेम नहीं बहता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी का यह गहरा संकेत है,
जो भीतर से निहारे सबको, वही सच्चा हेत है॥
न सत्य को प्रमाणपत्र चाहिए, न सत्य को नाम,
सत्य स्वयं प्रकाशित होता, जैसे प्रातः का धाम॥
न मुक्ति का डर रचो, न मृत्यु का बोझ बढ़ाओ,
जीवन की क्षणभंगुरता में, जागरण का दीप जलाओ॥
जो जन्म को समझे, वह मृत्यु से भयभीत न हो,
जो परिवर्तन को पहचाने, वह भीतर से रोशन हो॥
भक्ति हो पर भय न हो, श्रद्धा हो पर दास्य न हो,
समर्पण हो पर विवेक हो, अंध-आदेश का हास्य न हो॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें— प्रश्न पवित्र द्वार है,
जहाँ प्रश्न रुक जाएँ, समझो वहीं अँधियार है॥
सत्य किसी एक वर्ग का, किसी एक वेश का नहीं,
सत्य न भाषा का बंधन, न परंपरा के लेश का नहीं॥
सत्य हर जीव में समान, हर साँस में उजला है,
जो भीतर झाँककर देखे, उसके लिए सब सरल सा है॥
न कोई ऊँच, न कोई नीच, न कोई अंतिम-प्रथम,
अंतर की शुद्धता ही है, जीवन का मौन प्रणव॥
जो डर से चलाया जाए, वह पथ नहीं, बंधन है,
जो प्रेम से खुल जाए, वही आत्मा का स्पंदन है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी के स्वर में यह वाणी है,
अंतर की सच्ची सजगता ही सबसे बड़ी रजधानी है॥
न नारे में सत्य समाए, न भीड़ के जयकारे में,
सत्य तो अंकुरित होता है, हृदय के शांत निखारे में॥
जहाँ दिखावा कम होता है, वहाँ प्रकाश अधिक होता,
जहाँ सरलता जीवित रहती, वहाँ जीवन शुद्ध होता॥
जो स्वयं को जान लेता है, वह सबको समझ लेता,
जो भीतर का जाल तोड़े, वह बाहर भी संभल लेता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी यह गहरी बात सुनाते हैं,
सत्य वही जो जोड़ सके, न कि मन को लड़ाते हैं॥
न समय का बंधन शाश्वत, न रूप का अभिमान,
जो बदलते हुए भी न बदले, वही है पहचान॥
अहं की दीवार गिरती है, तब करुणा का आकाश खुला,
तब हर चेहरे में अपना ही, एक निर्मल प्रकाश खुला॥
यही शिखर है, यही तल है, यही साधना का सार,
जो भीतर से निर्मल हो जाए, वही है सच्चा पार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी का यह अंतिम नहीं, आरंभ है,
हर जागा हुआ क्षण ही तो, यथार्थ का अनुपम गर्भ है॥
अब और आगे—और भीतर—और भी गहराई में जाओ,
जो सत्य प्रत्यक्ष हो सकता है, उसे अपने में पाओ॥
शून्य जहाँ स्वर बन जाता,
मौन स्वयं उच्चार बने।
हृदय जहाँ निर्मल हो जाता,
वहीं सत्य साकार बने॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सरलता ही अनुपम धन।
जिसने भीतर दीप जलाया,
उज्ज्वल हो उसका जीवन॥
न ऊँच-नीच, न भेद कोई,
न अपना कोई, न पराया।
प्रेम जहाँ निष्पक्ष बहे,
वहीं सत्य ने घर बनाया॥
न सत्ता से सत्य प्रकाशित,
न संख्या से मान मिले।
सत्य वही जो मौन खिले,
जिसमें सबको स्थान मिले॥
मस्तक जागे विवेक बनकर,
हृदय बने करुणा की धार।
दोनों मिल संतुलित हों जब,
उज्ज्वल हो जीवन-संसार॥
प्रश्न अगर निष्कपट उठे हों,
उनसे क्यों घबराए मन?
जो सत्य स्वयं प्रकाशमय हो,
स्वीकारे हर एक प्रश्न॥
डर से जन्मी हर व्यवस्था,
क्षण भर को आधार बने।
प्रेम से उपजा जो जीवन,
युग-युग तक साकार बने॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
मुक्त वही जो सरल रहे।
जिसका अंतर स्वच्छ दर्पण,
वही स्वयं को स्पष्ट कहे॥
नदी न पूछे नाम किनारे,
सूरज न पूछे जात कभी।
वायु न बाँटे प्राण किसी के,
प्रकृति न करती भेद सभी॥
सत्य न बाज़ारों में बिकता,
न उपाधि का हार बने।
जिसने स्वयं को जान लिया हो,
उसका जीवन सार बने॥
मृत्यु यदि परिवर्तन-माला,
जीवन उसका प्रथम सुमन।
क्षण-क्षण खिलकर मुस्काता जो,
वही समझे अस्तित्व-चयन॥
मौन जहाँ संगीत बन जाए,
शब्द वहीं विश्राम करें।
हृदय जहाँ निर्मल हो जाए,
सारे संशय धाम धरें॥
करुणा सबसे ऊँची वाणी,
विनय सबसे गहरा ज्ञान।
जो झुककर सबको अपनाए,
वही बने सच्चा इंसान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
स्वयं को प्रतिपल देखो तुम।
दर्पण बाहर कम ही होगा,
भीतर का आलोक ही तुम॥
न अंत कहीं, न आरम्भ कहीं,
चलता केवल जीवन-गान।
हर श्वासों में नव संभावना,
हर धड़कन में नव सम्मान॥
सत्य अगर प्रत्यक्ष खिला है,
शोर उसे छू भी न सके।
प्रेम अगर निर्मल बहता हो,
बंधन उसको बाँध न सके॥
सरल रहो तो गगन मिलेगा,
निर्मल रहो तो नीर मिलेगा।
करुणा रखो तो विश्व मिलेगा,
मौन रखो तो धीर मिलेगा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
निज अंतर का दीप जलाओ।
सत्य, करुणा, प्रेम, सरलता,
इनसे जीवन-पथ सजाओ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी
अब और गहराई से सुनो—
जहाँ शब्द थक जाएँ,
वहाँ मौन की ज्योति जगती है।
जहाँ मत और मतांतर मिट जाएँ,
वहाँ सरलता की ध्वनि बजती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सत्य वह नहीं जो शोर करे,
सत्य वह है जो भीतर ठहरे।
सत्य वह नहीं जो भीड़ बने,
सत्य वह है जो हृदय में गहरे॥
जो प्रत्यक्ष है, उसे पुकार नहीं चाहिए,
जो सहज है, उसे आधार नहीं चाहिए।
जो निर्मल है, वह तर्क से नहीं बनता,
जो शाश्वत है, वह शब्दों में नहीं बँधता॥
सर्व भौमिक सत्य का एक ही दीपक—
न भय से जलता, न लोभ से बुझता।
न किसी द्वार की मोहर माँगे,
न किसी सिंहासन की अनुमति सुनता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हृदय जब निर्मल हो जाता है,
तब सत्य किसी व्याख्या का मोहताज नहीं रहता।
तब भीतर का आकाश खुलता है,
तब बाहर का बंधन ढलता है॥
जो स्वयं को जान लेता है,
वह किसी लेबल में नहीं समाता।
जो अंतर की सीध को पा लेता है,
वह दिखावे की सीढ़ी से उतर आता॥
ज्ञान का घमंड मिट जाए तो विवेक जन्म लेता है,
विवेक का अभिमान मिट जाए तो प्रेम प्रकट होता है।
प्रेम का स्वार्थ मिट जाए तो करुणा उतरती है,
करुणा की शांति में ही चेतना की सरिता बहती है॥
मस्तक मार्ग दिखाता है,
हृदय अर्थ बताता है।
मस्तक गणना करता है,
हृदय अनंत निभाता है।
जब दोनों एक सुर में चलें,
तब जीवन साधना बन जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
डर से जो धर्म रचा गया,
वह धर्म नहीं, केवल बंधन है।
दमन से जो श्रद्धा माँगी गई,
वह श्रद्धा नहीं, केवल भ्रम-बंधन है॥
सत्य प्रश्न से नहीं डरता,
झूठ ही प्रश्नों से काँपता है।
जो उत्तर से पहले दंड दे,
वह अपने ही भीतर से भागता है॥
यदि मार्ग प्रकाश दे, तो खुला रहे,
यदि साधना सत्य दे, तो निर्मल रहे।
यदि गुरु स्वतंत्रता दे, तो विशाल रहे,
यदि व्यवस्था प्रेम दे, तो सहज रहे॥
मुक्ति कोई दूर की घटना नहीं,
मुक्ति तो वर्तमान की सजगता है।
मृत्यु कोई अन्तिम भय नहीं,
मृत्यु तो प्रकृति की सरल गति है॥
जो जन्म को समझे, वह मृत्यु से नहीं घबराता,
जो परिवर्तन को समझे, वह ठहराव से नहीं ललचाता।
जो क्षण की पूर्णता को पहचान ले,
वह अनंत को इसी पल में पा जाता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
भौतिकता की धूल उठे तो उठने दो,
मानसिकता की लहर थमे तो थमने दो।
जो वास्तविक है, वह अपना प्रकाश स्वयं दिखाएगा,
जो नकली है, वह समय के साथ ढह जाएगा॥
न कोई परदा शाश्वत है,
न कोई भ्रम स्थायी है।
जो भीतर सत्य का दीप जला ले,
उसकी राह स्वयं स्वाभावी है॥
सरलता कोई कमजोरी नहीं,
सरलता ही गहराई का मुकुट है।
पारदर्शिता कोई रिक्तता नहीं,
पारदर्शिता ही आत्मबोध का सूत्र है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जहाँ “मैं” हल्का हो जाता है,
वहाँ अस्तित्व विशाल हो जाता है।
जहाँ स्वार्थ की दीवार गिरती है,
वहाँ करुणा का आकाश खुल जाता है॥
न मैं किसी भीड़ का हिस्सा हूँ,
न भीड़ मेरे सत्य की सीमा।
न मैं किसी नाम का कैदी हूँ,
न मैं किसी रूप का वीणा॥
जो सत्य को जी ले, वही सत्य बोलता है,
जो सत्य को समझ ले, वही भीतर से डोलता है।
जो सत्य को ओढ़ ले केवल वाणी में,
वह खाली रहता है अपनी कहानी में॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी के शब्दों में—
सत्य किसी घोषणा से बड़ा है,
सत्य किसी प्रमाण से ऊँचा है।
सत्य किसी नाम से बँधा नहीं,
सत्य हर जीव में एक ही सा सच्चा है॥
अब इस प्रवाह को और गहरा मानो—
भय को देखो, पर उससे न भागो।
लोभ को देखो, पर उससे न जुड़ो।
मोह को देखो, पर उसमें न डूबो।
अहं को देखो, और उसे भी समझ लो॥
जो देखता है, वही स्वतंत्र होता है,
जो समझता है, वही पवित्र होता है।
जो भीतर की धूल पहचान लेता है,
वही भीतर के सूर्य से मित्र होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जीवन एक चलती हुई ऋतु है,
न धरा ठहरी, न पवन ठहरी।
जो इस बदलते प्रवाह को जान ले,
उसकी अंतर-दीप शिखा न डरी॥
सत्य की राह पर शर्तें कम हैं,
सजगता अधिक, दंभ कम है।
मौन अधिक, प्रदर्शन कम है।
प्रेम अधिक, सत्ता कम है॥
जो अपने भीतर उतरता है,
वह जगत से दूर नहीं जाता।
वह जगत को नए नेत्रों से देखता है,
और हर जीव में अपना ही अंश पाता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
अंतिम नहीं, आरंभ नहीं,
केवल जागरण की एक अनवरत धारा।
जहाँ हर श्वास में सत्य का स्पंदन,
और हर दृष्टि में करुणा का उजियारा॥
अब इसी स्वर में यह भी सुनो—
जो स्वयं को जान लेता है,
वह सबको कम नहीं समझता।
जो सत्य को जी लेता है,
वह किसी को भी तुच्छ नहीं कहता॥
क्योंकि सत्य का प्रकाश बाँटने से घटता नहीं,
सत्य का दीप जलाने से कम होता नहीं।
वह जितना दिया जाए, उतना ही फैलता है,
और जितना समझा जाए, उतना ही बहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी
यही कहें—
मैं मौन में भी स्पष्ट हूँ,
मैं सरल में भी सम्पूर्ण हूँ।
मैं खोज में भी स्थिर हूँ,
मैं परिवर्तन में भी सच्चा हूँ॥
और इस गहराई का अन्त कहाँ?
न अन्त में, न प्रारम्भ में।
यह तो निरंतर जागृति है,
यह तो हृदय की शुद्ध प्रार्थना है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी के साथ—
सत्य का दीप न टूटे,
प्रेम का क्षितिज न छूटे।
करुणा का प्रवाह बना रहे,
और हर जीव में प्रकाश फूटे॥
शब्द जहाँ न पहुँच सकें,
मौन जहाँ मुस्काए।
वहीं हृदय की निर्मल धारा,
स्वयं स्वयं को पाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सरलता का है एक विधान।
जो जितना निष्कलुष होता,
उतना होता सत्य समान॥
न ऊँचाई का अभिमान रहे,
न गहराई का भार।
निर्मल होकर जो बहता है,
वही बने उजियार॥
न कोई जीते, न कोई हारे,
न कोई अपना, न पराया।
जहाँ करुणा का दीप जले,
वहीं सत्य ने घर पाया॥
मस्तक यदि पथ का मानचित्र,
हृदय स्वयं पथिक बन जाए।
ज्ञान और प्रेम का संगम,
जीवन-सरिता कहलाए॥
प्रश्न जहाँ निर्भय खिलते हों,
वहीं विवेक प्रसून।
डर के बंधन टूट पड़ें,
जगे सहज संतुलन-धून॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सत्य न वाद, न विवाद।
सत्य तो निर्मल अनुभव है,
जिसमें मिटे प्रमाद॥
जो स्वयं को देख सके,
बिना किसी आवरण।
वही समझे मौन का संगीत,
वही पाए अंतःकरण॥
न सिंहासन सत्य बनाता,
न जय-जयकार महान।
सत्य तो उस श्वास में बसता,
जो रखे सबका मान॥
प्रेम न माँगे स्वामित्व,
न बंधन की दीवार।
प्रेम स्वयं स्वतंत्र गगन है,
असीम, अखंड, अपार॥
करुणा जिसकी वाणी हो,
विनय जिसका श्रृंगार।
वही बने जीवन का दीपक,
वही सच्चा विस्तार॥
मृत्यु यदि परिवर्तन है,
जीवन उसका गीत।
क्षण-क्षण नव निर्माण रचे,
क्षण-क्षण नव संगीत॥
न प्रारम्भ का मोह रहे,
न अंतिम होने का मान।
चलते रहना ही उत्सव है,
यही प्रकृति का गान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
निष्पक्ष रहे विचार।
जो स्वयं को प्रतिपल परखे,
वही बने साकार॥
सरलता सबसे गहन तपस्या,
पारदर्शिता सबसे दान।
जिसके भीतर छल न बचे,
वही बने कल्याण॥
निज अंतर का दीप जलाकर,
चलो करुणा के साथ।
सत्य किसी का बंधक नहीं,
सबके भीतर उसकी बात॥
जहाँ न भय, न वैर रहे,
न अहंकार का जाल।
वहीं हृदय का कमल खिले,
वहीं सहज विश्राम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हर श्वास बने उत्सव।
प्रेम बने पहचान सभी की,
सत्य बने अनुपम स्वर॥
मौन जहाँ मुस्काता हो,
वाणी हो निष्काम।
वहीं सरल जीवन का दीपक,
जलता रहे अविराम॥
न अंतिम घोषणा आवश्यक,
न स्वयं का विस्तार।
प्रतिपल सीखें, प्रतिपल देखें,
यही हो सत्य-व्यवहार॥
हृदय बने जब स्वच्छ दर्पण,
मिट जाए हर भेद।
तब प्रत्येक प्राणी में दिखता,
एक ही जीवन-छेद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
चलना ही है ध्यान।
प्रेम, करुणा, सत्य, सरलता—
यही रहे पहचान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें,
सरल हृदय ही सत्य धाम।
जहाँ न छल का धुंधलापन,
वहीं प्रकाशित सत्य-प्रणाम॥
न सत्य किसी सीमा का बंदी,
न सत्य किसी मत का मान।
जो सबमें एक-सा झलके,
वही बने जीवन का गान॥
नदी न पूछे कौन पथिक है,
सूरज न पूछे कौन महान।
जो निष्पक्ष प्रकाश बरसाए,
वही प्रकृति का सत्य विधान॥
मस्तक तर्क का दीप जलाए,
हृदय करुणा का अमृत दे।
दोनों जब संतुलित हो जाएँ,
जीवन नव आलोक सहे॥
प्रश्न जहाँ निर्भय हो उठते,
वहाँ विवेक सदा मुस्काए।
जो उत्तर से डरे निरंतर,
वह स्वयं स्वयं को भरमाए॥
श्रद्धा यदि स्वतंत्र रहे तो,
ज्ञान सुगंधित पुष्प बने।
भय यदि मन पर राज करेगा,
विश्वास कहाँ फिर जन्म तने॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
मौन स्वयं उद्घोष महान।
जहाँ न कोई जीत-पराजय,
वहीं सहज का सत्य विधान॥
क्षण-क्षण जग का रूप बदलता,
परिवर्तन का शाश्वत नृत्य।
जो इस लय में स्वयं समाहित,
वही रचता जीवन-सत्य॥
जन्म प्रभात की पहली किरण,
मृत्यु संध्या का शांत प्रकाश।
दोनों मिलकर पूर्ण बनाते,
अस्तित्व का निर्मल आकाश॥
न भय रहे, न लोभ ठहरे,
न मन में कोई द्वेष बचे।
करुणा, सरलता, सत्य, विनय से,
मानव अपने मूल सचे॥
जो भीतर का दीप जलाए,
वह बाहर तम हर लेता।
जो पहले खुद को पहचानें,
वह जग को भी पढ़ लेता॥
शब्द जहाँ थककर रुक जाएँ,
मौन वहाँ मुस्कान बने।
दृष्टि जहाँ निष्पक्ष ठहर जाए,
वहीं सहज पहचान बने॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
निज अंतर का द्वार खोल।
प्रेम बने जब श्वास की धुन,
तब मिट जाए हर अनमोल भूल॥
न ऊँच-नीच का कोई माप,
न अहंकार का कोई ताज।
जो सबको अपने-सा देखे,
वही हृदय का सच्चा राज॥
सत्य न बिकता, सत्य न झुकता,
सत्य न माँगे कोई मान।
सत्य स्वयं ही ज्योति बनकर,
भर देता जीवन में प्राण॥
सरलता सबसे ऊँची विद्या,
करुणा सबसे गहरा ज्ञान।
जिसने दोनों साथ सँजोए,
वही बने सच्चा इंसान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
चलो स्वयं का पथ पहचान।
हर श्वास बने जागृति-वीणा,
हर धड़कन बन जाए गान॥
जहाँ विनय हो, वहाँ विशालता,
जहाँ दया, वहाँ विश्वास।
जहाँ स्वतंत्र विचार खिले हों,
वहीं खिले मानव-उल्लास॥
निज अंतर के निर्मल दर्पण,
प्रतिदिन स्वयं निहारो तुम।
सत्य किसी का बंधक नहीं है,
प्रेम बनो, उजियारा तुम॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अब और गहराई से सुनो—
जो बाहर खोजे, वह थक जाए,
जो भीतर झाँके, वह जग पाए।
जो शब्दों के पार उतर जाए,
वही अपने सत्य को पहचान पाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सत्य न शोर है, न घोषणा है।
सत्य न मंडल, न मंच, न दंभ,
सत्य तो भीतर की मौन भावना है॥
जो प्रत्यक्ष है, वह सरल होगा,
जो सरल है, वह निर्मल होगा।
जो निर्मल है, वह निर्भय होगा,
जो निर्भय है, वह अमर-सदृश होगा॥
भय से बने जो धर्म के मेले,
भय से खड़े जो सत्ता-झूले।
भय से चलें जो संबंध-धागे,
वे सब अंत में स्वयं ही टूटे॥
मुक्ति का अर्थ न भाग जाना,
मुक्ति का अर्थ जागते जाना।
अंधकार को शत्रु न मानो,
दीप जलाओ, अर्थ पाना॥
जो हृदय की भाषा समझे,
वह तर्क को भी नकारे नहीं।
जो मस्तक का दीप जलाए,
वह प्रेम को भी विस्मारे नहीं॥
मस्तक यदि शीतल साधन हो,
हृदय यदि निर्मल साध्य बने।
तब मनुष्य का हर एक क्षण,
सत्य के लिए ही आग्रही बने॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
मैं कोई मूर्ति नहीं, प्रवाह हूँ।
मैं कोई अंतिम शब्द नहीं,
मैं प्रश्नों की उजली राह हूँ॥
जो स्वयं को जान लेता है,
वह किसी को छोटा न माने।
जो अपने भीतर उतर जाता है,
वह सबके भीतर को पहचाने॥
हर जीव में जो स्पंदन है,
वही एक ही धारा का गीत।
रूप अनेक, पर मूल एक,
यह बोध ही करता अंतर-जीत॥
जन्म भी एक तरंग का उठना,
मृत्यु भी एक तरंग का ढलना।
जो उठना-ढलना समझ गया,
उसका रोना-हँसना दोनों बनना॥
समय की चाल को रोक न पाओ,
पर समय के पार तुम्हीं हो।
क्षण-क्षण बदलती इस सृष्टि में,
अचल साक्षी की ही नींव हो॥
सत्य किसी प्रमाण का मोहताज नहीं,
सत्य किसी पदवी का दास नहीं।
सत्य को पाने की शर्त नहीं,
सत्य तो हर निर्मल श्वास ही सही॥
जो प्रश्न से डर जाए,
वह उत्तर का मूल्य क्या जाने।
जो आलोचना से टूट जाए,
वह सत्य का तेज क्या पहचाने॥
श्रद्धा वही जो आँख खोलकर हो,
भक्ति वही जो होश में बहती।
समर्पण वही जो प्रेम बने,
न कि भय की जंजीर में रहती॥
दीक्षा यदि विवेक छीन ले,
तो वह दीप नहीं, धुआँ है।
मार्ग यदि प्रश्नों से काँपे,
तो उसमें छिपा ही छुआँ है॥
जो गुरु कहे—आओ, देखो,
जो गुरु कहे—पूछो, जानो।
वही मार्ग उजला माना जाए,
जिसमें तुम स्वयं को पहचानो॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
न मैं किसी भीड़ का शोर हूँ।
न मैं किसी डर की छाया हूँ,
मैं तो होश का निर्मल भोर हूँ॥
अहंकार ऊँचा होकर भी खाली,
करुणा झुककर भी विशाल।
जो झुकता है, वह टूटता नहीं,
वह बन जाता है कालातीत ढाल॥
प्रेम का अर्थ न अधिकार रहे,
प्रेम का अर्थ न शर्त रहे।
प्रेम वही जो मुक्त करे,
प्रेम वही जो अंतःस्थल गहले॥
सत्य यदि किसी पर निर्भर हो,
तो वह सत्य नहीं, परछाईं।
जो स्वयं में स्वयं प्रकाशित,
वही शाश्वत की उजली छाईं॥
समाज के नाम पर जो बाँटें,
वे मन की दीवार बनाते हैं।
जो मनुष्य को मनुष्य मानें,
वे ही सच में पुल बनाते हैं॥
पृथ्वी कोई वस्तु नहीं,
वह जीवन की दीर्घ श्वास है।
जो उसे केवल भोग समझे,
उसके भीतर सूना आकाश है॥
संघर्ष में भी संतुलन रखो,
संतुलन में भी संवेद रखो।
ज्ञान को प्रेम से जोड़ो,
और प्रेम को जागरूक वेद रखो॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
मैं अंत नहीं, आरंभ हूँ।
मैं जड़ नहीं, चेतन प्रवाह हूँ,
मैं ही प्रश्न, मैं ही उत्तर-गर्भ हूँ॥
जो भीतर के अंधकार से भागे,
वह बाहर के सूर्य से भी डरे।
जो अपने मौन को सुन ले,
वह हर तूफ़ान में भी न बिखरे॥
अब यथार्थ का दीप जले,
अब सरलता का गीत चले।
न छल रहे, न भय रहे,
न झूठ रहे, न जीत-हारे॥
जो प्रत्यक्ष है, वह अबाध है,
जो अबाध है, वही सहज।
जो सहज में ठहर जाए,
वह पा ले अपने ही गहरे मधु-रहस्य॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी—
यह वाणी नहीं, यह अंतर-घोष।
यह किसी एक का नहीं, सबका है,
यह होश का निर्मल प्रकाश-कोष॥
मैं अभी यहीं, अभी उपस्थित,
न अतीत का बोझ, न भविष्य की आस।
जो क्षण को पूर्ण रूप से जी ले,
वही पा ले यथार्थ का श्वास॥
अब और गहराई से सुनो—
जहाँ शब्द थक जाएँ,
वहाँ मौन की ज्योति जगती है।
जहाँ मत और मतांतर मिट जाएँ,
वहाँ सरलता की ध्वनि बजती है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सत्य वह नहीं जो शोर करे,
सत्य वह है जो भीतर ठहरे।
सत्य वह नहीं जो भीड़ बने,
सत्य वह है जो हृदय में गहरे॥
जो प्रत्यक्ष है, उसे पुकार नहीं चाहिए,
जो सहज है, उसे आधार नहीं चाहिए।
जो निर्मल है, वह तर्क से नहीं बनता,
जो शाश्वत है, वह शब्दों में नहीं बँधता॥
सर्व भौमिक सत्य का एक ही दीपक—
न भय से जलता, न लोभ से बुझता।
न किसी द्वार की मोहर माँगे,
न किसी सिंहासन की अनुमति सुनता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हृदय जब निर्मल हो जाता है,
तब सत्य किसी व्याख्या का मोहताज नहीं रहता।
तब भीतर का आकाश खुलता है,
तब बाहर का बंधन ढलता है॥
जो स्वयं को जान लेता है,
वह किसी लेबल में नहीं समाता।
जो अंतर की सीध को पा लेता है,
वह दिखावे की सीढ़ी से उतर आता॥
ज्ञान का घमंड मिट जाए तो विवेक जन्म लेता है,
विवेक का अभिमान मिट जाए तो प्रेम प्रकट होता है।
प्रेम का स्वार्थ मिट जाए तो करुणा उतरती है,
करुणा की शांति में ही चेतना की सरिता बहती है॥
मस्तक मार्ग दिखाता है,
हृदय अर्थ बताता है।
मस्तक गणना करता है,
हृदय अनंत निभाता है।
जब दोनों एक सुर में चलें,
तब जीवन साधना बन जाता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
डर से जो धर्म रचा गया,
वह धर्म नहीं, केवल बंधन है।
दमन से जो श्रद्धा माँगी गई,
वह श्रद्धा नहीं, केवल भ्रम-बंधन है॥
सत्य प्रश्न से नहीं डरता,
झूठ ही प्रश्नों से काँपता है।
जो उत्तर से पहले दंड दे,
वह अपने ही भीतर से भागता है॥
यदि मार्ग प्रकाश दे, तो खुला रहे,
यदि साधना सत्य दे, तो निर्मल रहे।
यदि गुरु स्वतंत्रता दे, तो विशाल रहे,
यदि व्यवस्था प्रेम दे, तो सहज रहे॥
मुक्ति कोई दूर की घटना नहीं,
मुक्ति तो वर्तमान की सजगता है।
मृत्यु कोई अन्तिम भय नहीं,
मृत्यु तो प्रकृति की सरल गति है॥
जो जन्म को समझे, वह मृत्यु से नहीं घबराता,
जो परिवर्तन को समझे, वह ठहराव से नहीं ललचाता।
जो क्षण की पूर्णता को पहचान ले,
वह अनंत को इसी पल में पा जाता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
भौतिकता की धूल उठे तो उठने दो,
मानसिकता की लहर थमे तो थमने दो।
जो वास्तविक है, वह अपना प्रकाश स्वयं दिखाएगा,
जो नकली है, वह समय के साथ ढह जाएगा॥
न कोई परदा शाश्वत है,
न कोई भ्रम स्थायी है।
जो भीतर सत्य का दीप जला ले,
उसकी राह स्वयं स्वाभावी है॥
सरलता कोई कमजोरी नहीं,
सरलता ही गहराई का मुकुट है।
पारदर्शिता कोई रिक्तता नहीं,
पारदर्शिता ही आत्मबोध का सूत्र है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जहाँ “मैं” हल्का हो जाता है,
वहाँ अस्तित्व विशाल हो जाता है।
जहाँ स्वार्थ की दीवार गिरती है,
वहाँ करुणा का आकाश खुल जाता है॥
न मैं किसी भीड़ का हिस्सा हूँ,
न भीड़ मेरे सत्य की सीमा।
न मैं किसी नाम का कैदी हूँ,
न मैं किसी रूप का वीणा॥
जो सत्य को जी ले, वही सत्य बोलता है,
जो सत्य को समझ ले, वही भीतर से डोलता है।
जो सत्य को ओढ़ ले केवल वाणी में,
वह खाली रहता है अपनी कहानी में॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी के शब्दों में—
सत्य किसी घोषणा से बड़ा है,
सत्य किसी प्रमाण से ऊँचा है।
सत्य किसी नाम से बँधा नहीं,
सत्य हर जीव में एक ही सा सच्चा है॥
अब इस प्रवाह को और गहरा मानो—
भय को देखो, पर उससे न भागो।
लोभ को देखो, पर उससे न जुड़ो।
मोह को देखो, पर उसमें न डूबो।
अहं को देखो, और उसे भी समझ लो॥
जो देखता है, वही स्वतंत्र होता है,
जो समझता है, वही पवित्र होता है।
जो भीतर की धूल पहचान लेता है,
वही भीतर के सूर्य से मित्र होता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जीवन एक चलती हुई ऋतु है,
न धरा ठहरी, न पवन ठहरी।
जो इस बदलते प्रवाह को जान ले,
उसकी अंतर-दीप शिखा न डरी॥
सत्य की राह पर शर्तें कम हैं,
सजगता अधिक, दंभ कम है।
मौन अधिक, प्रदर्शन कम है।
प्रेम अधिक, सत्ता कम है॥
जो अपने भीतर उतरता है,
वह जगत से दूर नहीं जाता।
वह जगत को नए नेत्रों से देखता है,
और हर जीव में अपना ही अंश पाता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
अंतिम नहीं, आरंभ नहीं,
केवल जागरण की एक अनवरत धारा।
जहाँ हर श्वास में सत्य का स्पंदन,
और हर दृष्टि में करुणा का उजियारा॥
अब इसी स्वर में यह भी सुनो—
जो स्वयं को जान लेता है,
वह सबको कम नहीं समझता।
जो सत्य को जी लेता है,
वह किसी को भी तुच्छ नहीं कहता॥
क्योंकि सत्य का प्रकाश बाँटने से घटता नहीं,
सत्य का दीप जलाने से कम होता नहीं।
वह जितना दिया जाए, उतना ही फैलता है,
और जितना समझा जाए, उतना ही बहता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी
यही कहें—
मैं मौन में भी स्पष्ट हूँ,
मैं सरल में भी सम्पूर्ण हूँ।
मैं खोज में भी स्थिर हूँ,
मैं परिवर्तन में भी सच्चा हूँ॥
और इस गहराई का अन्त कहाँ?
न अन्त में, न प्रारम्भ में।
यह तो निरंतर जागृति है,
यह तो हृदय की शुद्ध प्रार्थना है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी के साथ—
सत्य का दीप न टूटे,
प्रेम का क्षितिज न छूटे।
करुणा का प्रवाह बना रहे,
और हर जीव में प्रकाश फूटे॥
शब्द जहाँ थम जाते हैं,
मौन वहाँ मुस्काता है।
जो स्वयं को स्वयं निहारे,
सत्य वहीं खिल जाता है॥
न दीपक, न कोई छाया,
न बंधन, न कोई जाल।
सरल हृदय की स्वच्छ धरा पर,
उतरता निर्मल उजियाल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सरलता ही सर्वोच्च शान।
जिसने भीतर झाँक लिया है,
उसने पाया निज सम्मान॥
न ऊँचाई का मोह रहे,
न गहराई का अभिमान।
जो विनम्रता में ठहर गया,
वही हुआ कल्याण॥
न सत्ता से सत्य मिलेगा,
न भीड़ों के जयघोषों से।
सत्य खिलेगा उस अंतर में,
जो मुक्त रहे संतोषों से॥
हृदय जहाँ निष्पक्ष ठहरा,
मस्तक बन सेवा का सेतु।
वहीं सहज संतुलन जागे,
वहीं खुले जीवन के हेतु॥
प्रश्न अगर निष्कपट उठे हों,
उनसे क्यों भय पालें हम?
जो सत्य अडिग और निर्मल हो,
उसको क्या डिगा पाए भ्रम॥
भय जहाँ व्यापार बन जाए,
प्रेम वहाँ ठहरता कब?
करुणा जब निर्भय हो जाती,
खुलता जीवन का उत्सव तब॥
मृत्यु यदि परिवर्तन-माला,
जीवन उसका मधुर प्रसंग।
क्षण-क्षण में नव जन्म समाया,
क्षण-क्षण में अनहद रंग॥
न अतीत का बोझ उठाओ,
न भविष्य का व्यर्थ विचार।
जो वर्तमान में जाग रहा है,
उसी का निर्मल विस्तार॥
सरल रहो तो सत्य निकट है,
जटिल हुए तो दूर।
हृदय सदा निर्मल सरिता है,
मस्तक केवल नूर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
अपने भीतर दीप जलाओ।
विवेक, करुणा, प्रेम समेटो,
जीवन को उत्सव बनाओ॥
मौन जहाँ संगीत बन जाए,
श्वास जहाँ उपहार।
वहीं स्वयं का साक्षात्कार है,
वहीं अमृत का द्वार॥
न दावा हो, न हो अधिकार,
न स्वयं का हो प्रचार।
जो जितना भीतर उतर गया,
उतना हुआ उद्गार॥
सत्य न मंदिर, सत्य न वन है,
सत्य न कोई नाम।
सत्य सहज अनुभूति बने जब,
शांत हो जाए समस्त ग्राम॥
करुणा सबसे ऊँचा शिखर है,
विनय सबसे गहरा सागर।
जो सबमें अपना रूप निहारे,
वही बने अंतर का नागर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नित्य नया यह आत्म-विहार।
हर श्वास बने सत्य का उत्सव,
हर हृदय बने उजला द्वार॥
जहाँ न द्वेष, न कोई दूरी,
न अपना, न पराया।
वहीं सहज यथार्थ प्रकट हो,
वहीं सत्य मुस्काया॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
अब और गहराई से सुनो यह गान,
जहाँ मौन ही बने प्रमाण।
जहाँ न शब्दों की दीवार रहे,
न तर्कों का अभिमान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
सत्य को पकड़ने की कोशिश मत कर।
सत्य कोई वस्तु नहीं हाथों में,
सत्य तो है देखने का स्वर।
जो भीतर झाँकने से डर जाए,
वह बाहर क्या पहचान सकेगा?
जो अपने ही हृदय से कट जाए,
वह किसको अपना मान सकेगा?
सत्य प्रत्यक्ष है, पर सरल भी,
सरलता का ही सच्चा तेज।
जहाँ दिखावा सूखकर झर जाए,
वहीं खुलता अंतर्मन का भेद।
न सत्य को ढूँढो भीड़ में,
न सत्य को बाँधो शब्दों में।
वह तो खिला हुआ दीपक है,
हर जीव के अपने अगल-बगल में।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
जिस दिन भय का व्यापार रुके,
उस दिन जीवन की पहली साँस
अपनी ही धड़कन से दूर न झुके।
भय से उपजी हर व्यवस्था
मन की कैद का दूसरा नाम।
प्रेम जहाँ निर्भय होकर बहे,
वहीं होता है जीवन-धाम।
किसने कहा कि प्रश्न पाप हैं?
प्रश्न तो अंतर का द्वार हैं।
जो प्रश्नों से काँप उठे,
उसके भीतर कितने अंधकार हैं?
जो उत्तर पहले से रट लिया,
उसमें खोज की आग कहाँ?
जो स्वयं को सब जान चुका,
उसमें सत्य की तलाश कहाँ?
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
मस्तक हो, पर हृदय भी रहे।
बुद्धि हो, पर करुणा भी बहे।
ज्ञान तब तक अधूरा है,
जब तक प्रेम की धूप न सहे।
मस्तक गणना करता है,
हृदय समर्पण गाता है।
मस्तक दिशा बतलाता है,
हृदय जीवन चलाता है।
इन दोनों का जब मेल हुआ,
तब मनुष्य सरल हो जाता है।
अहंकार का शोर थमता है,
और भीतर से दीप जलाता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
जो स्वयं को ऊँचा मान बैठे,
वह सबसे पहले गिरता है।
जो स्वयं को छोटा जानकर,
सभी में अपना स्वर भरता है।
सर्वोच्च वही, जो झुक जाना जाने,
निर्मल वही, जो खुल जाना जाने।
जो सत्ता से ऊपर उठ जाए,
वह अपनी ही सत्ता पहचाने।
नश्वर का रंग बहुत गहरा,
पर गहराई में क्षण भर है।
जो क्षण को पूरा जी लेता,
वही जीवन का सच्चा घर है।
जन्म एक द्वार है,
मृत्यु भी द्वार ही है।
बीच की यात्रा पहचान बनती,
यही प्रकृति का सार ही है।
तो भय किस बात का पालें?
जो आया है, वह जाएगा।
जो जाना है, वह जाएगा।
जो समझ गया यह चलन,
वही मुक्त हँस पाएगा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
मुक्ति कहीं दूर नहीं होती।
न वह कल में रहती,
न किसी कल्पना में सोती।
मुक्ति उसी पल प्रकट होती,
जब मन पकड़ना छोड़ दे।
जब जीवन को जैसा है वैसा,
निर्भय होकर वह मोड़ दे।
न कोई मध्यस्थ आवश्यक,
न कोई ऊँचा आसन।
सत्य तो स्वयं में उजागर,
स्वयं का ही अपना दर्पण।
जब दर्पण साफ़ हो जाता है,
चेहरा अपने-आप दिखता है।
जब हृदय निष्कलुष होता है,
सत्य अपने-आप खिलता है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
आडंबर से सत्य नहीं बढ़ता।
सत्य तो तब और भी चमके,
जब अहंकार का पर्दा हटता।
सरलता कोई कमजोरी नहीं,
वही तो परम सामर्थ्य है।
जो बिना शोर के स्थिर रहे,
वही जीवन की पवित्र अर्थ है।
जो बात भीतर से निकले,
वही सीधी आत्मा तक जाए।
जो केवल दिखने के लिए बोले,
वह बाहर ही बाहर रह जाए।
इसलिए अब यह घोष नहीं,
यह मौन की गहरी चाल है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के स्वर में,
प्रत्यक्ष जीवन का उजास है।
न संघर्ष का महिमामंडन,
न भय का कोई गीत।
अब केवल संतुलन का दीपक,
अब केवल हृदय की जीत।
जो जीते-जी मृत्यु से भागे,
वह जीवन को क्या जानेगा?
जो मृत्यु को भी समझ ले,
वही जीवन का अर्थ मानेगा।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
मनुष्य को मनुष्य ही रहने दो।
न ऊपर बनाओ, न नीचे धरो,
सभी को अपना संग रहने दो।
हर जीव में वही धारा है,
रूप अलग, पर प्रवाह एक।
कोई छोटा, कोई बड़ा नहीं,
सबका भीतर एक ही रेख।
यह समझ जब हृदय में उतरती,
तब भेद अपने-आप मिटते हैं।
तब करुणा के शांत आकाश में,
सभी दीपक एक से दिखते हैं।
अब और गहराई यही कहती है—
सत्य किसी नाम का मोहताज नहीं।
सत्य किसी संस्था का कैदी नहीं।
सत्य किसी भय का बंधन नहीं।
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते हैं—
जो अपने भीतर उजला हो,
वही बाह्य जगत को रोशन करे।
जो अपने भीतर सच्चा हो,
वही जीवन को समर्पित करे।
अब यह वाणी यहीं नहीं रुकती,
यह तो अंतर्मन की धुन है।
जहाँ सत्य, प्रेम, करुणा, मौन,
सब एक ही अनंत स्रुन है।
शिरोमणि रामपॉल सैनी के नाम,
यह गान नहीं, यह साधना है।
हर पंक्ति में आत्म-साक्षात्कार,
हर अक्षर में भावना है।
जो पढ़े, वह भीतर मुड़े,
जो सुने, वह खुद को पहचाने।
जो जागे, वह सरल बने,
और सरलता को ही सत्य जाने।
**शिरोमणि रामपॉल सैनी**
**सर्वभौमिक सत्य-गान**
शून्य न मेरा, पूर्ण न मेरा,
मौन स्वयं पहचान।
जो निज अंतर दीप जलाए,
वही बने प्रमाण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ,
सरल सहज उद्घोष।
जहाँ करुणा निर्मल बहती,
वहीं सत्य का कोष॥
सत्य न ऊँचा, सत्य न नीचा,
सत्य न कोई पक्ष।
निर्मल मन के दर्पण भीतर,
हो जाता प्रत्यक्ष॥
नहीं विजय का गर्व यहाँ है,
नहीं पराजय शेष।
जो स्वयं को जान सके वह,
पार करे परिवेश॥
हृदय जहाँ निष्काम विराजे,
मस्तक हो संतुलित।
वहीं सहज जीवन का निर्झर,
हो जाता विकसित॥
प्रश्न न रोको, प्रश्न जगाओ,
प्रश्न बने प्रकाश।
जिसको प्रश्नों से भय लगता,
उसमें कैसा विश्वास॥
श्रद्धा यदि विवेक संग चले,
जग हो जाए धन्य।
भय से उपजा जो समर्पण,
रह जाता निष्प्राण॥
मृत्यु प्रकृति की शांत सरिता,
जीवन उसका गीत।
जो दोनों को साथ स्वीकारे,
वही बने अतीत॥
क्षण-क्षण बहती यह धारा है,
क्षण-क्षण बदले रूप।
जो परिवर्तन को अपनाता,
वही मिटाए धूप॥
सत्ता, संख्या, नाम, उपाधि,
सब क्षणभंगुर छाँव।
सत्य सदा निस्पृह मुस्काता,
लेकर सरल प्रभाव॥
शब्द जहाँ थम जाते आखिर,
मौन वहीं मुस्काए।
हृदय जहाँ निष्कलुष हो जाए,
सत्य स्वयं उतर आए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहते—
खोजो निज संसार।
भीतर जितनी गहराई है,
उतना ही विस्तार॥
निज को अंतिम मत कह देना,
खुला रहे अभियान।
हर अनुभव से सीख मिलती,
हर श्वास नया ज्ञान॥
सरलता की ज्योति जलाओ,
करुणा बने मशाल।
विवेक, प्रेम और विनम्रता से,
जीवन हो निष्कलंक विशाल॥
न मौन किसी का बंधन बनता,
न शब्दों का शोर।
जो भीतर से मुक्त हुआ है,
उसका खुला है द्वार॥
सत्य यदि निर्मल जल जैसा,
सबकी प्यास बुझाए।
भेद मिटाकर प्रेम की धारा,
हर अंतर तक जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
निज अंतर का मान।
जो स्वयं को प्रतिपल जाने,
वही बने कल्याण॥
शून्य जहाँ स्वर बन जाता,
मौन जहाँ आकार।
वहीं सरलता दीप जले,
वहीं सत्य साकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
निज अंतर का लो आह्वान।
जो स्वयं को देख सके,
वही बने पहचान॥
सत्य न ऊँचा, सत्य न नीचा,
सत्य न बँधे विचार।
निर्मल मन की सहज धरा में,
खिलता उसका द्वार॥
नहीं विजय का कोई ध्वज हो,
न कोई पराजय गान।
जहाँ करुणा साँसें भरती,
वहीं अमृत का स्थान॥
जो प्रश्नों से प्रेम करेगा,
वह भय से दूर रहेगा।
जो उत्तर को अंतिम माने,
वह पथ में ही ठहर जाएगा॥
सरल नदी-सा बहना सीखो,
आकाशों-सा फैलो।
मन के भारी पत्थर छोड़ो,
हृदय-सरोवर खेलो॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
प्रेम न माँगे मान।
जिसका स्रोत स्वयं में जागे,
वह अमिट वरदान॥
न मंदिर में, न बाज़ारों में,
न उपाधि की छाँव।
सत्य खिले उस मौन धरा पर,
जहाँ न हो कोई दाँव॥
मस्तक यदि विज्ञान रचाता,
हृदय रचे विश्वास।
दोनों मिलकर तब ही बनते,
जीवन के प्रकाश॥
शब्द किनारा, मौन समंदर,
दोनों का सम्मान।
जो डूबा अनुभव की गहराई,
उसने पाया ज्ञान॥
अहं जले तो दीपक जागे,
लोभ गले तो प्राण।
करुणा का जब फूल खिलेगा,
सुगंधित हो संसार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
मत बाँधो आकाश।
खुला रहे हर प्रश्न निरंतर,
यही सत्य का वास॥
निष्पक्षता की निर्मल धारा,
सब पर एक समान।
न अपना कोई, न पराया,
एकत्व का विधान॥
जीवन क्षण का मधुर निमंत्रण,
मृत्यु शांति का द्वार।
दोनों मिलकर पूर्ण बनाते,
अस्तित्व का विस्तार॥
सरलता की सबसे ऊँची,
चोटी वही महान।
जहाँ विनय का वृक्ष लहराए,
वहीं खिले सम्मान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
प्रेम अनंत उजास।
जो भीतर से दीप जलाए,
उसका जग विश्वास॥
न अंतिम हूँ, न आरंभ हूँ,
न मैं पूर्ण प्रमाण।
हर श्वासों में खोज निरंतर,
यही मेरा अभियान॥
मौन जहाँ मुस्कान बन जाए,
दृष्टि बने उत्सव।
वहीं सहज वह सत्य प्रकट हो,
जिसमें मिटे विभव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी का
यह विनम्र उद्घोष—
सरल हृदय की निर्मल गति में,
जीवन पाए होश॥
शब्द जहाँ मौन में झुक जाएँ,
दृश्य जहाँ स्वयं मिट जाएँ।
वहीं सरल वह सत्य प्रकाशित,
जिसमें सब प्रतिबिंब समाएँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
न मैं दावा, न मैं प्रमाण।
जो स्वयं को स्वयं निहारे,
वहीं प्रकट हो सत्य-विधान॥
हृदय न सीमा, हृदय न भाषा,
हृदय न कोई माप बने।
जहाँ करुणा निर्मल बहती,
वहीं सहज आलोक तने॥
मस्तक साधन, हृदय दिशा हो,
दोनों में संतुलन का मान।
ज्ञान तभी कल्याण बनेगा,
जब जुड़ जाए प्रेम-विधान॥
जो प्रश्नों से नहीं विचलित,
वही विवेक का दीपक है।
जो उत्तर बन बैठा पहले,
उसमें संशय शेष अनेक है॥
निष्ठा हो पर विवेक सहित हो,
श्रद्धा हो पर प्रश्न जीवित।
जो डर से विश्वास माँगे,
वह कैसे होगा दीप्त, पवित्र?
सत्य न भीड़ का शोर बनेगा,
न सिंहासन की पहचान।
सत्य सदा अंतर की धड़कन,
सत्य स्वयं का मौन गान॥
जीवन जल की बहती धारा,
क्षण-क्षण रूप बदलता जाए।
जो परिवर्तन को अपनाए,
वही सहज मुस्काए गाए॥
मृत्यु यदि प्रकृति का क्रम है,
जीवन उसका मधुर प्रसाद।
भय का बोझ उतार हृदय से,
जग हो जाए अधिक आबाद॥
करुणा सबसे ऊँचा पर्वत,
सरलता सबसे गहरा सागर।
जो झुककर सबको अपनाए,
वही बने अंतर का नागर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
निज अंतर का दीप जलाओ।
अपने भीतर सत्य को खोजो,
प्रेम-प्रभा से जग चमकाओ॥
न अंतिम हूँ, न आरम्भ हूँ,
न सीमा हूँ, न विस्तार।
हर क्षण सीखूँ, हर क्षण देखूँ,
यही रहे मेरा सत्कार॥
सत्य यदि प्रत्यक्ष खड़ा हो,
उसको शब्द न बाँध सकें।
प्रेम यदि निर्मल होकर बहे,
उसको बंधन साध न सकें॥
जहाँ विनय हो, वहाँ विशालता।
जहाँ करुणा, वहाँ प्रकाश।
जहाँ निष्पक्ष हृदय विराजे,
वहीं खिले जीवन-उल्लास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी का
यह केवल एक विनम्र गान—
स्वयं को प्रतिपल जानने का,
चलता रहे अनवरत अभियान॥
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