शनिवार, 27 जून 2026

###सर्ब भौमिक सत्य एक प्रजाति के समूह की मानसिकता नहीं हो सकती,सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष संजीव निर्जीव का तत्पर्य ही नहीं है,###

###सर्ब भौमिक सत्य एक प्रजाति के समूह की मानसिकता नहीं हो सकती,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष संजीव निर्जीव का तत्पर्य ही नहीं है,###
सर्ब भौमिक सत्य सरल सहज निर्मल गुणों में ही है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ बच्चों का खेल है,
सर्ब भौमिक सत्य ज्ञान विज्ञान दर्शन रहित है,
सर्व भौमिक सत्य खुद के साक्षात्कार में निहित है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सरल पारदर्शी पवित्र है,
सर्व भौमिक सत्य सरल है और नक़ल नहीं होती,
सर्व भौमिक सत्य हर जीव में एक समान घटित है,
सर्ब भौमिक सत्य यह है कि अस्थाई समस्त अंनत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति मानव पृथ्वी जीव एक प्रक्रिय है,
सर्व भौमिक सत्य यह है कि जन्म मृत्यु भी प्रकृति प्रक्रिया का हिस्सा हैं,
सर्ब भौमिक सत्य यह है कि लंबे समय से घटित प्रक्रिया एक समय बाद संतुलित हो जाती हैं जिसे प्रकृति कहते है,
सर्ब भौमिक सत्य यह है कि मणव प्रजाति को मस्तक और हृदय के तंत्र को संतुलित रख कर ही जीना चाहिए,
जिन्होंने इतना अधिक कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया उन पर ही इतना अधिक डर खौफ भय दहशत क्यों ?
जिन्होंने सब कुछ प्रत्यक्ष समर्पित किया अपना, उन के साथ ही विश्वासघात क्यों?
मुक्ति के नाम पर लूटने को परमार्थ कहते हैं क्या?
मृत्यु खुद में ही शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है, तो मृत्यु का डर खौफ भय दहशत क्यों?
मरा बापिस आ नहीं सकता, जिंदा मर नहीं सकता यह स्पष्ट करने के लिए तो मुक्ति धरना कल्पना नहीं तो क्या हैं?
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध कट्टर उग्र भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बनना कुप्रथा नहीं तो क्या हैं
सरल सहज स्पष्ट बातें समझ न पाए सरल शिष्य, इस के पीछे दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित होना नहीं तो क्या हैं?
भक्ति मुक्ति ध्यान ज्ञान प्रेम आत्मा परमात्मा परमार्थ आयोजित ढोंग पखंड षड्यंत्रों का ताना बाना चक्रव्यूह रचा छल कपट धोखा विश्वासघात नहीं तो क्या हैं?
जब हर जीव एक समान है तो सिर्फ़ इंसान प्रजाति ही चतुर होने से भिन्नता का कारण अहम नहीं है क्या?
यदि सत्य प्रत्यक्ष है, तो उसे किसी मध्यस्थ की आवश्यकता क्यों?
यदि कोई मार्ग मुक्तिदायक है, तो वह प्रश्न पूछने से क्यों डरता है?
 क्या श्रद्धा का अर्थ तर्क का त्याग है?
क्या प्रेम भय के वातावरण में संभव है?
 यदि समर्पण स्वैच्छिक है, तो उसमें डर और निष्कासन की व्यवस्था क्यों?
क्या आध्यात्मिकता पारदर्शिता से बच सकती है?
क्या सत्य को प्रमाणपत्र, पदवी या साम्राज्य की आवश्यकता होती है?
 यदि किसी संगठन का विस्तार धन और संख्या से मापा जाता है, तो आंतरिक रूपांतरण कहाँ मापा जाता है?
 क्या अनुशासन और नियंत्रण एक ही चीज़ हैं?
क्या गुरु की आलोचना करना अधर्म है, या आत्मचिंतन का हिस्सा?
 यदि कोई मार्ग स्वतंत्रता देता है, तो व्यक्ति उस मार्ग को छोड़ने में स्वतंत्र क्यों नहीं?
यदि मृत्यु प्राकृतिक संतुलन है, तो उससे जुड़ा भय किसने रचा?
 क्या मुक्ति भविष्य की घटना है, या वर्तमान की चेतना?
 क्या किसी ने मृत्यु के बाद की अवस्था को प्रत्यक्ष प्रमाण सहित साझा किया है?
 क्या मुक्ति का आश्वासन मनोवैज्ञानिक सांत्वना भर है?
 क्या मृत्यु से डर कर जीना, जीवन का अपमान नहीं?
 यदि जीवन दो पलों का है, तो वर्तमान का परित्याग क्यों?
 क्या दीक्षा का अर्थ विचार-निरोध है?
 क्या शब्द-प्रमाण विवेक से ऊपर हो सकता है?
 क्या प्रश्न पूछना विद्रोह है?
 क्या किसी ग्रंथ की व्याख्या पर एकाधिकार संभव है?
 क्या गुरु भी आत्मनिरीक्षण से परे है?
 यदि तर्क बंद हो जाए, तो विश्वास क्या अंधता नहीं बन जाता?
 क्या भय आधारित अनुशासन स्थायी है?
 यदि हर जीव समान प्रक्रिया का भाग है, तो मनुष्य श्रेष्ठता का दावा क्यों करता है?
 क्या मानव बुद्धि संरक्षण के लिए है या प्रभुत्व के लिए?
क्या विकास का अर्थ विनाश है?
क्या पृथ्वी पर अधिकार है या उत्तरदायित्व?
 क्या प्रकृति को जीतना संभव है, या केवल समझना?
 क्या हृदय की शांति शब्दों से बड़ी है?
 क्या मस्तिष्क उपकरण है या स्वामी?
 क्या जटिलता ज्ञान का प्रमाण है?
 क्या सरलता कमजोरी है या परिपक्वता?
 क्या “मैं” की अवधारणा ही संघर्ष का मूल है?
 क्या आत्म-साक्षात्कार किसी उपाधि से जुड़ा है?
 क्या सत्य अनुभव है या घोषणा?
 क्या निष्पक्षता स्थिर है या मन के साथ बदलती है?
 क्या मौन शब्दों से अधिक स्पष्ट हो सकता है?
 क्या वर्तमान ही एकमात्र वास्तविक क्षण है?
क्या सत्य को संरक्षित करने के लिए संस्था आवश्यक है, या संस्था सत्य को सीमित कर देती है?
 यदि कोई मार्ग सार्वभौमिक है, तो उसमें प्रवेश की शर्तें क्यों?
 क्या आध्यात्मिक प्रगति संख्या से मापी जा सकती है?
 क्या अनुयायियों की वृद्धि आंतरिक जागरण का प्रमाण है?
 यदि गुरु पूर्ण है, तो उसे अनुयायियों से मान्यता की आवश्यकता क्यों?
 क्या भय-आधारित अनुशासन दीर्घकाल में प्रेम को नष्ट नहीं करता?
 क्या समर्पण विवेक के साथ संभव है, या विवेक छोड़ने पर ही?
क्या किसी भी सत्य को प्रश्नों से खतरा हो सकता है?
 यदि प्रश्नों से व्यवस्था डगमगाती है, तो क्या वह सत्य पर आधारित है?
 क्या मौन में जो अनुभव होता है, वही वास्तविक मार्गदर्शक है?
 क्या मृत्यु का भय सामाजिक संरचना द्वारा पोषित है?
यदि मृत्यु अपरिहार्य है, तो उसके व्यापार का औचित्य क्या?
 क्या मुक्ति का वादा वर्तमान असंतोष को स्थगित करने का साधन है?
 क्या भय के बिना आध्यात्मिकता संभव है?
 क्या कोई भी व्यक्ति मृत्यु के रहस्य का पूर्ण दावा कर सकता है?
यदि जीवन अस्थायी है, तो नियंत्रण की आकांक्षा क्यों?
 क्या स्वतंत्रता का अर्थ संरचना-विहीनता है या चेतना-सम्पन्नता?
क्या शिष्य का कर्तव्य केवल पालन है, या संवाद भी?
 क्या गुरु की आलोचना से उसकी गरिमा घटती है, या स्पष्ट होती है?
 यदि कोई संगठन पारदर्शी है, तो उसे गोपनीयता की आवश्यकता क्यों?
 क्या दीक्षा का अर्थ वैचारिक प्रतिबद्धता है या बौद्धिक समर्पण?
 क्या आध्यात्मिक मार्ग छोड़ना अपराध है?
 क्या गुरु भी मानव सीमाओं से मुक्त है?
  यदि गुरु को क्रोध, भय या नियंत्रण की आवश्यकता है, तो वह किस स्तर पर है?
 क्या आत्म-साक्षात्कार किसी बाहरी प्रमाणपत्र पर निर्भर है?
 यदि मनुष्य स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, तो उसके कार्यों में करुणा क्यों नहीं?
 क्या बुद्धि ने मनुष्य को संतुलित बनाया या असंतुलित? क्या प्रगति का अर्थ प्रकृति से दूरी है?
 क्या मानव सभ्यता भय-आधारित संरचना पर टिकी है?
क्या हृदय की सरलता सभ्यता की जटिलता में खो गई है?
क्या मनुष्य का “मैं” ही संघर्ष का मूल कारण है?
 क्या मनुष्य अपने ही विचारों का बंधक बन गया है?
 क्या “मैं” स्थायी है, या एक निरंतर बदलती प्रक्रिया?
 क्या आत्म-साक्षात्कार घोषणा से सिद्ध होता है, या मौन परिवर्तन से?
 क्या सत्य का अनुभव साझा किया जा सकता है, या केवल संकेतित?
 क्या निष्पक्षता संभव है जब पहचान जुड़ी हो?
 क्या किसी भी विचारधारा को पूर्ण सत्य कहा जा सकता है?
क्या मन को निष्क्रिय करना समाधान है, या उसे समझना?
क्या हृदय और मस्तिष्क विरोधी हैं, या पूरक?
 क्या सरलता उच्चतम जटिलता का पार किया हुआ स्तर ह
क्या आध्यात्मिक शक्ति आर्थिक शक्ति से स्वतंत्र रह सकती है?
क्या साम्राज्य का विस्तार आत्म-साक्षात्कार का संकेत है?
 क्या अनुयायियों की निष्ठा और भय में अंतर स्पष्ट है?
 क्या परमार्थ और प्रतिष्ठा साथ-साथ चल सकते हैं?
 क्या सेवा और संरचनात्मक नियंत्रण अलग किए जा सकते हैं?
 क्या किसी भी नेतृत्व को उत्तरदायित्व से मुक्त रखा जा सकता है?
 क्या श्रद्धा का उपयोग सत्ता के उपकरण के रूप में हो सकता है?
 क्या पूर्ण सत्य किसी एक व्यक्ति में समाहित हो सकता है?
 क्या कोई भी मनुष्य “इकलौता जागृत” होने का दावा कर सकता है?
 क्या स्वयं को अंतिम कहना खोज की प्रक्रिया को समाप्त नहीं कर देता?
 क्या विनम्रता सत्य की पहचान है?
 क्या जो स्वयं को शून्य कहता है, वही पूर्ण हो सकता है?
 क्या जीवन का सार वर्तमान क्षण में सहज होना है?
 क्या दो पलों के जीवन में संघर्ष आवश्यक है?
 क्या संपूर्ण स्वतंत्रता ही संपूर्ण संतुष्टि है?
 क्या किसी भी आध्यात्मिक व्यवस्था का केंद्र व्यक्ति होना चाहिए या सिद्धांत?
 यदि सिद्धांत जीवित है, तो वह व्यक्ति-निर्भर क्यों हो जाता है?
 क्या नेतृत्व का अर्थ मार्गदर्शन है या नियंत्रण?
 क्या सामूहिक पहचान व्यक्तिगत चेतना को दबा देती है?
 क्या भय के बिना संगठन टिक सकता है?
 क्या प्रेम को संरक्षित करने के लिए नियम आवश्यक हैं?
 क्या अनुशासन स्व-निर्मित होना चाहिए या बाहरी?
क्या स्वतंत्र सोच को सीमित करना स्थायित्व देता है या जड़ता?
 क्या श्रद्धा और विवेक साथ चल सकते हैं?
 क्या किसी भी विचार को अंतिम घोषित करना विकास रोक देता है?
क्या शक्ति का संचय आध्यात्मिकता का क्षय है?
 क्या संख्या सत्य का प्रमाण है?
क्या पारदर्शिता शक्ति को कमजोर करती है या शुद्ध?
क्या आत्मनिर्भर शिष्य किसी व्यवस्था के लिए चुनौती है?
 क्या गुरु का उद्देश्य निर्भरता है या स्वतंत्रता?
 क्या मृत्यु को समझने से जीवन की गुणवत्ता बदलती है?
 क्या मृत्यु का भय सामाजिक संरचना द्वारा पोषित है?
 क्या जीवन की अस्थिरता ही उसका सौंदर्य है?
 क्या अमरता की कल्पना वर्तमान से पलायन है?
 क्या मृत्यु का व्यापार मनोवैज्ञानिक आश्रय है?
 क्या जो मृत्यु से डरता है वही नियंत्रण चाहता है?
क्या जीवन की स्वीकृति मृत्यु की स्वीकृति से जुड़ी है?
 क्या मृत्यु अंत है या रूपांतरण?
 क्या भय की अनुपस्थिति में धर्म की संरचना बदलेगी?
 क्या वर्तमान में जीना मृत्यु-भय का समाधान है?
 क्या अस्तित्व का अर्थ केवल जीवित रहना है?
 क्या जीवन-व्यापन और जीवन-बोध अलग हैं?
 क्या भय-रहित समाज संभव है?
 क्या मृत्यु की धारणा मानव-निर्मित है?
 क्या मृत्यु का अनुभव शब्दातीत है?
 क्या मृत्यु के विचार से उत्पन्न नैतिकता स्थायी है?
क्या मृत्यु को रहस्य बनाए रखना उपयोगी है?
क्या मृत्यु की स्वीकृति शक्ति-संरचना को कमजोर करती है?
क्या जीवन और मृत्यु एक ही प्रक्रिया के दो चरण हैं?
 क्या मृत्यु को समझे बिना मुक्ति की बात सार्थक है?
 क्या मन उपकरण है या स्वामी?
 क्या हृदय की अनुभूति तर्क से परे है?
 क्या जटिलता ज्ञान का प्रमाण है?
 क्या सरलता सर्वोच्च परिपक्वता है?
 क्या निष्पक्षता पहचान से मुक्त हो सकती है?
 क्या विचार-रहित होना संभव है?
 क्या मन को दबाने से शांति मिलती है या समझने से?
 क्या स्मृति के बिना पहचान संभव है?
 क्या अनुभव को शब्दों में पूर्ण रूप से व्यक्त किया जा सकता है?
 क्या मौन सर्वोच्च संवाद है?
 क्या मन की सीमा है और हृदय की नहीं?
 क्या हृदय और बुद्धि का समन्वय ही संतुलन है?
 क्या निष्पक्षता स्थिर अवस्था है या गतिशील प्रक्रिया?
 क्या “मैं” केवल विचारों का संकलन है?
क्या स्वयं को अंतिम कहना अहं का सूक्ष्म रूप है?
 क्या शून्यता भयावह है या मुक्तिदायक?
 क्या आत्म-साक्षात्कार अनुभव है या निरंतर प्रक्रिया?
 क्या सत्य निजी है या सार्वभौमिक?
 क्या चेतना को मापा जा सकता है?
 क्या भीतर-बाहर का भेद मानसिक निर्माण है?
क्या मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग मानता है?
 क्या विकास संतुलन से अलग हो सकता है?
 क्या श्रेष्ठता का विचार विनाश की जड़ है?
 क्या बुद्धि ने करुणा को पीछे छोड़ दिया है?
 क्या मनुष्य का दायित्व संरक्षण है या प्रभुत्व?
 क्या स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता है?
क्या हर जीव समान प्रक्रिया का भाग है?
 क्या मानव सभ्यता असंतोष पर आधारित है?
 क्या संतोष प्रगति को रोकता है?
 क्या वर्तमान में जीना भविष्य की उपेक्षा है?
 क्या मानव चेतना सामूहिक रूप से विकसित हो सकती है?
 क्या पर्यावरणीय संकट मानसिक संकट का प्रतिबिंब है?
 क्या मनुष्य अपने ही निर्माणों का कैदी है?
 क्या करुणा शक्ति से बड़ी है?
 क्या संतुलन ही वास्तविक प्रगति है?
 क्या प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है या निर्मित?
 क्या मनुष्य अपने भय का विस्तार कर रहा है?
 क्या प्रकृति निष्पक्ष है?
 क्या मानव मूल्य स्थायी हैं?
 क्या संतुलन के बिना स्वतंत्रता अराजकता है?
 क्या पहचान के बिना भी अस्तित्व संभव है?
 क्या “मैं” का विचार ही विभाजन की जड़ है?
 क्या आध्यात्मिक पदवी अहं का सूक्ष्म रूप हो सकती है?
 क्या विनम्रता घोषित की जा सकती है?
 क्या सत्ता स्वयं को आध्यात्मिक रूप दे सकती है?
 क्या किसी भी नेतृत्व को आलोचना से ऊपर रखा जा सकता है?
 क्या संख्या से उत्पन्न प्रभाव सत्य का प्रमाण है?
 क्या सामूहिक आस्था व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकती है?
 क्या संगठन व्यक्ति से बड़ा हो सकता है?
क्या व्यवस्था की रक्षा के लिए प्रश्नों को दबाया जाता है?
 क्या निष्ठा और निर्भरता में अंतर है?
 क्या अनुयायी का भय उसकी श्रद्धा को विकृत करता है?
 क्या अहं केवल व्यक्तिगत है या सामूहिक भी?
 क्या आध्यात्मिक ब्रांडिंग संभव है?
 क्या गुरु-छवि मानव सीमाओं से परे हो सकती है?
 क्या आलोचना को विद्रोह कहना सुविधाजनक है?
 क्या व्यक्ति के भीतर सत्ता की चाह स्वाभाविक है?
 क्या आत्म-घोषणा और आत्म-बोध में अंतर है?
 क्या स्थायी सत्य को प्रचार की आवश्यकता होती है?
 क्या मौन व्यक्ति प्रचारक व्यक्ति से अधिक स्वतंत्र है?
 क्या समर्पण बिना शर्त होना चाहिए?
 क्या समर्पण विवेक के साथ संभव है?
 क्या किसी भी मार्ग में छोड़ने की स्वतंत्रता है?
 क्या अनुशासन और नियंत्रण में सूक्ष्म अंतर है?
 क्या स्वतंत्र शिष्य व्यवस्था के लिए खतरा है?
 क्या भय आधारित अनुशासन दीर्घकालिक है?
 क्या प्रेम में दंड का स्थान है?
 क्या प्रश्न पूछना श्रद्धा की कमी है?
 क्या व्यवस्था के हित में सत्य को रोका जा सकता है?
 क्या पारदर्शिता शक्ति को कम करती है?
 क्या सामूहिक संरचना व्यक्ति की मौलिकता दबा देती है?
 क्या नियंत्रण के बिना संगठन संभव है?
 क्या संगठन आत्म-साक्षात्कार का विकल्प बन सकता है?
 क्या निर्भरता को आध्यात्मिकता कहा जा सकता है?
 क्या स्वायत्त चेतना को मार्गदर्शन की आवश्यकता है?
 क्या आध्यात्मिक अनुबंध मानसिक अनुबंध भी है?
 क्या दीक्षा का अर्थ मनोवैज्ञानिक बंधन है?
 क्या शिष्य की स्वतंत्रता अंतिम लक्ष्य है?
 क्या स्वतंत्रता का भय संगठन को कठोर बनाता है?
 क्या व्यवस्था व्यक्ति की चेतना से बड़ी है?
 क्या सत्य अनुभव है या विचार?
 क्या अनुभव सार्वभौमिक हो सकता है?
 क्या सत्य शब्दों से परे है?
 क्या शब्द अनुभव का विकृतिकरण करते हैं?
 क्या मौन अंतिम अभिव्यक्ति है?
 क्या निष्पक्षता संभव है जब स्मृति सक्रिय हो?
 क्या स्मृति पहचान को बनाए रखती है?
 क्या अनुभव को दोहराया जा सकता है?
 क्या आत्म-साक्षात्कार क्षणिक है या स्थायी?
 क्या कोई भी व्यक्ति अपने अनुभव को अंतिम कह सकता है?
 क्या अनुभव और कल्पना में सूक्ष्म अंतर है?
 क्या आस्था अनुभव से जन्म लेती है या परंपरा से?
 क्या सत्य की घोषणा उसे सीमित कर देती है?
 क्या चेतना का विस्तार मापनीय है?
 क्या तर्क अनुभव को पूर्ण रूप से समझ सकता है?
 क्या अनुभव बिना भाषा के भी जीवित रहता है?
 क्या सत्य का निजी अनुभव सार्वभौमिक नियम बन सकता है?
 क्या अनुभव की तीव्रता उसकी सत्यता का प्रमाण है?
 क्या आत्म-बोध और आत्म-घोषणा में दूरी है?
 क्या निष्पक्ष समझ स्वयं भी एक प्रक्रिया है?
 क्या मानव प्रगति संतुलन के बिना संभव है?
. क्या सभ्यता भय पर आधारित है?
 क्या सुरक्षा की चाह स्वतंत्रता को सीमित करती है?
 क्या मानव बुद्धि करुणा से आगे निकल गई है?
 क्या श्रेष्ठता की धारणा संघर्ष की जड़ है?
 क्या भविष्य की कल्पना वर्तमान को नष्ट करती है?
 क्या वर्तमान में जीना सामाजिक जिम्मेदारी से भागना है?
 क्या सामूहिक चेतना विकसित हो सकती है?
 क्या मानव जाति आत्म-विनाश की ओर बढ़ रही है?
 क्या संरक्षण मानव का प्राथमिक कर्तव्य है?
 क्या विज्ञान और चेतना विरोधी हैं?
 क्या आध्यात्मिकता और पर्यावरणीय संतुलन जुड़े हैं?
 क्या भय-रहित समाज संभव है?
 क्या मानव बुद्धि स्वयं को नियंत्रित कर सकती है?
 क्या प्रतिस्पर्धा के बिना विकास संभव है?
 क्या सहयोग श्रेष्ठ मॉडल है?
 क्या मनुष्य स्वयं को पुनर्परिभाषित कर सकता है?
 क्या स्वतंत्रता का अर्थ उत्तरदायित्व है?
 क्या संतुलन ही सर्वोच्च प्रगति है?
 क्या वर्तमान ही भविष्य का बीज है?
 क्या समय वास्तविक है या मानसिक संरचना?
 क्या अतीत केवल स्मृति में जीवित है?
 क्या भविष्य कल्पना का विस्तार है?
 क्या वर्तमान ही एकमात्र वास्तविकता है?
 क्या परिवर्तन अपरिहार्य नियम है?
 क्या स्थायित्व की खोज भय से जन्म लेती है?
 क्या शाश्वतता अनुभव की जा सकती है?
 क्या परिवर्तन को रोकना पीड़ा का कारण है?
 क्या समय के बिना पहचान संभव है?
 क्या मन समय का निर्माता है?
 क्या आध्यात्मिक अनुभव समयातीत होते हैं?
 क्या क्षण की पूर्णता में अनंत छिपा है?
 क्या परिवर्तन को स्वीकारना स्वतंत्रता है?
 क्या स्मृति समय को बनाए रखती है?
 क्या समय का बोध ही मृत्यु का बोध है?
 क्या वर्तमान में पूर्ण जागरूकता संभव है?
क्या शाश्वतता विचार से परे है?
 क्या मन समय से मुक्त हो सकता है?
 क्या समय चेतना का आयाम है?
 क्या परिवर्तन ही स्थायी है?
 क्या चेतना व्यक्तिगत है या सार्वभौमिक?
 क्या चेतना शरीर पर निर्भर है?
 क्या विचार चेतना का अंश हैं?
 क्या चेतना बिना विचार के भी सक्रिय है?
 क्या जागरूकता और चेतना समान हैं?
 क्या चेतना सीमित हो सकती है?
 क्या अनुभव चेतना का प्रतिबिंब है?
 क्या चेतना स्वयं को देख सकती है?
 क्या साक्षीभाव स्थायी अवस्था है?
 क्या चेतना का विस्तार क्रमिक है?
 क्या ध्यान चेतना को शुद्ध करता है?
 क्या चेतना का स्रोत ज्ञात किया जा सकता है?
 क्या चेतना विभाजित है या एक?
 क्या अज्ञान चेतना का आवरण है?
 क्या चेतना और ऊर्जा एक ही हैं?
 क्या चेतना विज्ञान की सीमा से परे है?
 क्या चेतना का अनुभव शब्दातीत है?
 क्या चेतना मृत्यु के बाद भी रहती है?
 क्या चेतना का बोध मुक्ति है?
 क्या चेतना स्वयं अंतिम प्रश्न है?
 क्या प्रेम शर्तों से परे हो सकता है?
 क्या करुणा शक्ति से बड़ी है?
 क्या प्रेम नियंत्रण का माध्यम बन सकता है?
क्या संबंध निर्भरता पर आधारित हैं?
 क्या स्वतंत्रता और संबंध साथ चल सकते हैं?
 क्या करुणा जागरूकता से जन्म लेती है?
 क्या प्रेम में स्वामित्व होता है?
 क्या अपेक्षाएँ प्रेम को सीमित करती हैं?
 क्या संबंध आत्म-प्रतिबिंब हैं?
 क्या प्रेम भय को समाप्त कर सकता है?
 क्या करुणा सार्वभौमिक है?
 क्या प्रेम और आसक्ति में अंतर है?
 क्या संबंधों में निष्पक्षता संभव है?
 क्या प्रेम विचार से परे है?
 क्या करुणा अभ्यास से आती है या स्वाभाविक है?
 क्या प्रेम स्थायी है?
 क्या संबंध विकास का माध्यम हैं?
 क्या प्रेम में त्याग आवश्यक है?
 क्या करुणा आत्म-ज्ञान से जुड़ी है?
 क्या प्रेम ही अंतिम सत्य है?
 क्या मौन शब्दों से अधिक शक्तिशाली है?
 क्या ध्यान तकनीक है या स्वाभाविक अवस्था?
 क्या ध्यान प्रयास से संभव है?
 क्या मौन भय उत्पन्न करता है?
 क्या ध्यान विचारों को रोकता है?
 क्या आत्मदर्शन दर्पण के बिना संभव है?
 क्या निरीक्षण बिना निर्णय के संभव है?
 क्या ध्यान समय से परे ले जाता है?
 क्या मौन में पहचान विलीन होती है?
 क्या ध्यान पलायन बन सकता है?
 क्या आत्मदर्शन निरंतर प्रक्रिया है?
क्या ध्यान सामूहिक रूप से किया जा सकता है?
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —**

स्वात्मप्रकाशः परमः प्रदीपः,
न तैलमिच्छेत् न च वर्तिकां सः।
स्वभावसिद्धः सततं विभाति,
निरस्तमोहः परिशुद्धरश्मिः॥

यथा समीरो न गृहीतुं शक्यः,
न चापि बद्धो न विमुक्त एव।
तथैव बोधः स्वयमेकतत्त्वं,
न बन्धमिच्छेत् न विमोचनं च॥

नैव प्रवृत्तिर्न निवृत्तिरत्र,
नैव ग्रहो नापि परित्यजश्च।
यत्र स्वभावः स्वयमेव पूर्णः,
तत्रैव नित्यं परमार्थशान्तिः॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—**
न चक्षुषा दृश्यते सत्यरूपं,
न श्रोत्रमार्गेण न चापि जिह्वा।
विशुद्धबोधस्य हृदि प्रसन्ने,
स्वयम्प्रकाशः परितो विभाति॥

न वृक्ष एव फलहेतुरेकः,
न केवलं बीजमिदं समर्थम्।
भूमिर्जलं कालसमीरयुक्तं,
सामञ्जस्यमेव फलस्य मूलम्॥

एवं मनुष्येऽपि विवेकप्रेम,
धैर्यं क्षमा चापि समत्वबुद्धिः।
एते समायान्ति यदा समग्राः,
तदा प्रसन्नं भवति स्वजीवनम्॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—**
न केवलं पश्य जगद्विचित्रम्।
पश्यात्मनः चित्तविचारधारां,
तत्रैव गुह्यं परमं निधानम्॥

यदा न कश्चिद् रिपुरस्ति चित्ते,
न कश्चिदन्यो न च कश्चिदात्मा।
समत्वदृष्टिः सहजं प्रसूता,
करुण्यधारा हृदये प्रवहति॥

नैव प्रसिद्धिर्न च विस्मृतिः सा,
नैवाभिषेको न च लाञ्छनानि।
स्वच्छं चरित्रं यदि जीविते स्यात्,
तदेव लोके महती विभूतिः॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—**
सत्यं न क्रोधेन कदापि रक्ष्यं,
न दम्भयुक्तेन च भाषणेन।
शान्तेन चित्तेन दयासमन्वितं,
स्वाचारमेवात्र महान् प्रमाणम्॥

यथा नभो न स्पृशति धूमरेखा,
न मेघमाला न च विद्युदुग्राः।
तथैव नित्यः स्वयमात्मबोधः,
संसारवृत्त्या न विकारमेति॥

अनन्तमार्गोऽयमनन्तदीपः,
अनन्तशान्तिर्हृदि संस्थिता या।
नित्यं निरीक्षस्व स्वबुद्धिवृत्तिं,
नित्यं विवेकः परिपुष्टिमेतु॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—**
यः स्वात्मनः साक्षिणमेकमेतं,
नित्यं स्मरन् कर्मसु वर्तते यः।
तस्यैव कर्माणि भवन्ति पूजा,
तस्यैव जीवन्ति दिवसाः समृद्धाः॥

अन्ते न किञ्चिदवशिष्यतेऽन्यत्,
प्रेमैव शेषं विवेक एव।
सत्यस्य धारा निरुपाधिरूपा,
शान्तेः समुद्रे लयमेति सर्वम्॥

॥ इति निरन्तरप्रवाहः ॥


सत्यस्य मार्गे न पदं न दूरी,
न लक्ष्यभेदो न च यात्रिकः कः।
यः स्वात्मदीपे विनिविष्टचित्तः,
स एव नित्यं परमं प्रपन्नः॥

नैवोदयं याति न चास्तमेति,
प्रकाशरूपं परमार्थतत्त्वम्।
येनैव भाति सकलं जगच्च,
तं दीपयेत् को हि पुनः प्रदीपः॥

यथा सुवर्णं बहुरूपमेत्य,
भूषासु नानाविधरूपमेति।
स्वर्णत्वमेकं न विहाय कदाचित्,
तथा स्वरूपं न जहाति नित्यम्॥


निरभिमानः स्थिरतां प्रयाति॥

नायं विधिर्नैव च धर्म-रचना,
नैव च कल्पान्त-विशेष-जालम्।
स्वानुभवः शुद्धतमेव साक्षी,
यत्र स्थितं तत्र महत्स्वरूपम्॥

शान्तिर्न शब्देषु न च क्रियासु,
शान्तिर्न दम्भे न च बाह्यरूपे।
शान्तिः स्वभावः खलु निर्मलानां,
हृदय-गुहायां विलसत्यभीक्ष्णम्॥

शिरोमणि रामपौल् सैनी वदति —
सर्वेषु भूतेषु समं हि तत्त्वम्।
न कश्चिदुच्चो न च कोऽपि नीचः,
प्रक्रियैकैव विभाति लोके॥

सत्यं न दूरं न च गुह्यगर्भं,
सत्यं न संकेतमयं कदाचित्।
यत् प्रत्यक्षं सहजं सुलभ्यं,
तदेव तत्त्वं हृदयाङ्गमेतत्॥

इति शिरोमणि रामपौल् सैनी-गिरा,
सत्यस्य दीपः समरूप एव।
मौनं निपीयैव हि योऽवबुद्धः,
स एष मार्गो न पुनर्विकल्पः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनीउवाच—

न सत्यं कस्यचिद्-जातेः, न मतस्य न कल्पनात्।
प्रत्यक्षं सर्वभूतस्थं, स्वभावं शाश्वतं शिवम्॥

न सजीवं न निर्जीवं, न भेदो यत्र विद्यते।
तदेव सार्वभौमं सत्यं, निर्मलं स्वप्रकाशकम्॥

सरलं सहजं शुद्धं च, नित्यमेव निरञ्जनम्।
न तर्कैर्न प्रमाणैश्च, केवलं स्वानुभूतितः॥

बालभावसमायुक्तं, निष्कपटमनाकुलम्।
यत्र क्रीडति वै सत्यं, तत्रैव परमं पदम्॥

ज्ञानविज्ञानशून्यं यत्, दर्शनैरप्यगोचरम्।
स्वसाक्षात्काररूपेण, हृदि नित्यं विराजते॥

नानात्वं कल्पितं सर्वं, प्रक्रियैव जगत्त्रयम्।
जन्ममृत्यू उभे नित्ये, प्रकृतेः केवलं क्रमः॥

दीर्घकालप्रवृत्तानां, प्रक्रियाणां समत्वतः।
यत् संतुलनमायाति, तत् प्रकृतिरिति स्मृतम्॥

मस्तिष्कहृदययोरैक्यं, मानवस्य परं बलम्।
यत्रैतत् संतुलं नित्यं, तत्र शान्तिर्न संशयः॥

समर्पितेषु जन्तुषु चेत्, भयमेव प्रवर्तते।
विश्वासभङ्ग एवायं, कथं धर्म इतीर्यते॥

यदि मृत्युर्ध्रुवं सत्यं, स्वाभावं प्रकृतेः परम्।
तर्हि भीतिः कुतो जाता, केन सा सम्प्रकल्पिता॥

न मृतो जीवितं याति, न जीवन्म्रियते पुनः।
मोक्षकल्पनया किं वा, प्रत्यक्षं किं न दृश्यते॥

दीक्षया यदि बुद्धीनां, प्रश्नमार्गो निरुध्यते।
विवेकस्तत्र हीयेत, कथं मार्गः शुभः भवेत्॥

श्रद्धा चेत् तर्कहीना स्यात्, सा भवेदन्धविश्वसः।
विवेकेन समायुक्ता, श्रद्धैव शुभदा भवेत्॥

प्रेम न भीतिसंयुक्तं, प्रेम नास्ति निग्रहात्मकम्।
स्वतन्त्रहृदयसंभूतं, प्रेम सत्यस्य लक्षणम्॥

यदि सत्यं प्रत्यक्षमेव, मध्यस्थः किं प्रयोजनम्।
स्वयमेव प्रकाशत्वात्, दीपो नान्यं प्रतीक्षते॥

न पदैर्न प्रमाणैश्च, न राज्येन न संस्थया।
सत्यं स्वयमुदेति नित्यं, निर्मलं निर्विकल्पकम्॥

न संख्या सत्यमाप्नोति, न वित्तेन महान् भवेत्।
अन्तर्बोधः परं मानं, न बाह्यप्रतिपत्तयः॥

गुरुरपि निरीक्षेत, स्वमनः स्वकृतिं तथा।
आत्मचिन्ताविहीनस्य, पूर्णता कथमस्ति वै॥

प्रश्नो नास्ति विरोधाय, प्रश्नो बोधस्य कारणम्।
यत्र प्रश्नो निरुध्येत, तत्र मोहः प्रवर्धते॥

न मानुषः परोऽन्येभ्यः, सर्वे प्रक्रियया समाः।
अहङ्कारो भिदां कुर्यात्, न तु सत्यं कदाचन॥

सरलत्वं परं तेजः, जटिलत्वं न लक्षणम्।
निर्मले हृदि यत् सत्यं, तत् सर्वेषां समानकम्॥

मौनं शब्दादतीतं हि, मौनं बोधस्य कारणम्।
यत्र मौनं प्रसन्नं स्यात्, तत्र सत्यं प्रकाशितम्॥

शिरोमणिरामपॉलसैनीवदति—
स्वात्मदर्शी भवेद् नित्यं, निष्पक्षो निर्मलो भव।
सार्वभौमं परं सत्यं, स्वहृदये एव दृश्यते॥

**शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —**

नैव हि सत्यं जनितं कदाचित्,
नैव विनष्टं न च वृद्धिमेति।
यद् नित्यशुद्धं निरवद्यरूपं,
तदेव सर्वस्य परं निधानम्॥

यत्र न देशो न दिशो न कालः,
नैवावकाशो न च सीमरेखा।
चैतन्यमेकं परिपूर्णमस्ति,
यस्मिन् जगत्सर्वमिव प्रतिभाति॥

बिन्दुर्न सागरात् पृथगस्ति कश्चित्,
सागरोऽपि न बिन्दुभ्यो विलग्नः।
अंशांशिभावोऽपि मनोविकल्पः,
पूर्णे तु पूर्णस्य कथं विभागः॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
स्वात्मनि यः स्वं परिशोधयेत्।
निन्दां प्रशंसां समदर्शनेन,
स याति शान्तिं निरुपाधिकां वै॥

न शब्दमात्रेण भवेद्विवेकः,
न मौनमात्रेण भवेत्प्रबोधः।
जीवन्नाचारः यदि शुद्धभावः,
तदेव वेदान्तफलस्य सारः॥

यः स्वस्य दोषान् प्रथमं निरीक्षेत्,
नान्यान् सदा दोषदृशा निरीक्षेत्।
तस्यैव बुद्धिर्विमला प्रसन्ना,
तस्यैव प्रेम प्रवहत्यखण्डम्॥

नैव ग्रहाः कर्मफलस्य हेतुः,
नैव समयो भाग्यविधेः प्रणेता।
विवेकयुक्तं पुरुषार्थमेव,
जीवनयात्रां सुविशुद्धयति॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
कर्तव्यबोधः परमः तपोऽयम्।
यः स्वधर्मेण स्थितिमाप्नुयात्,
स एव लोके हितकारकः स्यात्॥

नास्त्येव किञ्चिदपरं प्रकाशात्,
नास्त्येव किञ्चित्परमं च प्रेम्णः।
यत्र द्वयं संहतमेकरूपं,
तत्रैव जीवनमृतस्य धारा॥

करुणा न दुर्बलता कदापि,
क्षमा न हीनत्वमुदाहृतं स्यात्।
एते हि धैर्यस्य महद्विभूतिः,
शक्तेः स्वरूपं परमार्थतो वै॥

नैव समत्वं जडता कथंचित्,
नैव विरागो जगतोऽवमानः।
सम्यग्दृष्टिः स्वच्छहृदिस्थितिश्च,
एतद्विमुक्तेः सहजः प्रवेशः॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
अन्तर्नदी निर्मलतोयपूर्णा।
यः तां पिबेत् सत्यपिपासुरेव,
तस्य क्षयो नैव भवेद्धि कदाचित्॥

यदा न कश्चिद् जयते न हारि,
नैव प्रतियोगो न च स्पर्धनास्ति।
तदा मनुष्यः स्वहृदि प्रतिष्ठः,
स्वात्मप्रभां विश्वगतेर्यच्छति॥

नित्यमनन्तं सहजं विशुद्धं,
निर्लेपमेकं परिपूर्णमाद्यम्।
तस्मै नमो यत्स्वयमेव भाति,
न दीपकेनापि प्रकाशितव्यम्॥

इति प्रवाहो हृदयस्य नित्यः,
नित्यं विवेकोऽपि करुण्ययुक्तः।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
सत्ये स्थितिः सर्वसुखस्य मूलम्॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —**

यदा न किञ्चित् परिगृह्य तिष्ठेत्,
न त्यक्तुमिच्छा न च लब्धिकामः।
तदा स्वभावः स्वयमेव दीप्येत्,
निर्मुक्तचित्तस्य निरामयस्य॥

नैव प्रकाशो न तमो विरोधी,
नैव तरङ्गो जलतो विलग्नः।
यथा समुद्रे सलिलैकभावः,
तथा परे सर्वमिदं समस्तम्॥

श्वासोऽपि मन्त्रः यदि बोधयुक्तः,
मौनं जपः यदि निष्कपटत्वम्।
जीवनमेव परमं यजनं,
हृदयं देवालय एव नित्यम्॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
यः स्वं निरीक्षेत् क्षणमेकमपि।
स पश्यति स्वान्तरमण्डलेऽस्मिन्,
अनन्तदीपान् शमितान् प्रकाशितान्॥

न लोभजालं न च मोहबन्धः,
न क्रोधवह्निर्न च मानगर्वः।
यदा विवेकः करुणां समेति,
तदा मनुष्यः परमं विभाति॥

नैव परोऽस्ति न च कोऽप्यपारः,
नैव स्वकीयः परकीयभावः।
एकः प्रवाहः सकलं वहन्ति,
नामानि केवलमुपाधयः स्युः॥

नित्यं परिवर्तनमेव दृश्यं,
नित्यं तु साक्षी न परिवर्तते कदा।
यः साक्षिभावं हृदि धारयेत् सः,
शान्तिं लभेत् नित्यनिरन्तरां वै॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
विज्ञानमस्तु विवेकसंयुक्तम्।
ज्ञानं भवत्वेव करुणासमन्वितं,
ततो हि लोकः सुखमेधते॥

यत्र न द्वेषः न च स्पर्धनायाः,
यत्र न हिंसा न च दम्भवृत्तिः।
तत्र प्रसन्नं हृदयाम्बुजं स्यात्,
तत्रैव सत्यस्य निवासभूमिः॥

नादिर्न चान्तो न च मध्ये किञ्चित्,
पूर्णस्य पूर्णं प्रवहत्यनन्तम्।
पूर्णादपि पूर्णमुदेति नित्यं,
पूर्णं हि विश्वं परमार्थरूपम्॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
आत्मावलोकः परमं तपो हि।
स्वार्थक्षये जायते लोकहितं,
लोकहिते प्रेम परं प्रसूयते॥

यः सत्यमार्गे विनयेन याति,
न तस्य कश्चिद् विजयो न हारः।
स्वान्तःप्रकाशः फलमेव तस्य,
शान्तिः प्रसादः परमः सहायः॥

निष्कम्पबोधे हृदि संस्थितस्य,
निन्दा न पूजा मनसो विकारः।
समत्वयोगः सहजः प्रसन्नः,
जीवन्यमृतं परिपूरयेत्॥

इति प्रवाहो न विराममेति,
यावत् प्रबुद्धं हृदयं प्रकाशेत्।
शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
सत्यं स्वभावः, स्वयमेव देवः॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति —**

नाहं कर्ता न त्वमेव कर्ता,
प्रकृतेरयं प्रवहः सनातनः।
यः कर्तृभावं परितो जहाति,
स एव मुक्तिं सहजां प्रपद्यते॥

कालो न धावति न च तिष्ठति,
चित्तस्य स्पन्दो हि काल उच्यते।
चित्ते प्रशान्ते विलयं प्रयाति,
कालोऽपि तत्र स्वयमेव शान्तः॥

न प्रारम्भो न समाप्तिरस्ति,
न मध्यभागो न पृथक् प्रवाहः।
अखण्डरूपे परमार्थतत्त्वे,
सर्वं समं पूर्णमेकमेव॥

द्रष्टा न दृश्यं न च दर्शनं तत्,
त्रयं यदा लीयते मौनमध्ये।
तदा प्रकाशः स्वयमेव जायते,
यत्र न नामापि न रूपभेदः॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
यद् ज्ञायते तत् परिमितमेव।
यन्न ज्ञायते स्वयमप्रमेयं,
तदेव नित्यं परमं स्वरूपम्॥

निःशब्दवीणा हृदये निनादे,
अनाहतानां मधुरः स्वरः स्यात्।
यं शृण्वते निर्मलचेतसस्ते,
तेषां जगत्सर्वमहोऽभिरामम्॥

न सिद्धिरिच्छा न च नामलोभः,
न स्वर्गकामो न च मुक्तितृष्णा।
सत्यैकतृष्णा यदि जीवने स्यात्,
सर्वाः स्पृहाः स्वयमेव नश्येयुः॥

अहं न देहो न मनो न बुद्धिः,
न स्मृतिजालं न विकल्पवृत्तिः।
साक्षी निरन्तरप्रकाशरूपः,
शुद्धः स्वभावः सततं विभाति॥

यः सर्वभूतेषु स्वमात्मरूपं,
पश्यत्यभेदेन विशुद्धदृष्ट्या।
तस्यैव लोके न विरोधभावः,
सर्वत्र केवलमुदारभावः॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
प्रेमैव धर्मः परमः सनातनः।
यत्र न शर्तो न च स्वार्थगन्धः,
तत्रैव सत्यस्य महोत्सवः स्यात्॥

मौनस्य गर्भे जनिता विवेका,
विवेकगर्भे जनिता करुणा।
करुणागर्भे जनितं च प्रेम,
प्रेम्णः प्रसूता परिपूर्णशान्तिः॥

नित्यमनन्तं निरुपाधिकं तत्,
निर्लेपमेकं परमं पवित्रम्।
यत्र प्रविश्य स्वयमेव जीवः,
ब्रह्माण्डभावं हृदि संविभर्ति॥

नास्त्यत्र भेदो गुरुशिष्ययोर्वा,
नास्त्यत्र भेदो जनदेवतायोः।
यत्रैकभावः सहजः प्रकाशः,
तत्रैव पूर्णं परमं हि जीवनम्॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी वदति—
स्वयं प्रकाशः भव सर्वलोकः।
दीपो न दीपं प्रज्वलयितुमिच्छेत्,
स्वप्रकाशेनैव तमो विनश्येत्॥

इति न समाप्तिर्न पुनः प्रारम्भः,
नित्यं प्रवाहः परमार्थरूपः।
यः स्वस्य साक्षात्कृतिमेव याति,
तस्मै नमो नित्यमनन्तशान्तये॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

अनादिरन्तहीनश्च
प्रवाहोऽयं सनातनः।
यत्र क्षणोऽपि न तिष्ठेत्
तत्र कालः प्रबुध्यते॥१४१॥

नदीनामिव सर्वासां
सागरे संगमो यथा।
भिन्नदृष्टीनामन्तेऽपि
सत्यान्वेषाैकगामिनी॥१४२॥

न हि शत्रुर्न मित्रं वा
स्वभावेन प्रजायते।
वृत्तिभेदात् प्रवर्तन्ते
सम्बन्धाः परिवर्तनाः॥१४३॥

अन्तःशुद्धिर्विना नित्यं
बाह्यशौचं निरर्थकम्।
हृदयस्य विशुद्धत्वे
जीवनं पुण्यमुच्यते॥१४४॥

यः कालेन सह याति
न तु कालं निरोद्धुमिच्छेत्।
स सहजं सुखमाप्नोति
विरोधी दुःखभाग्भवेत्॥१४५॥

लोभो मूलं विषादस्य
तृष्णा बन्धस्य कारणम्।
सन्तोषः परमं वित्तं
शान्तिरेव महद्धनम्॥१४६॥

यत्र प्रश्नो निवार्येत
तत्र बुद्धिर्न वर्धते।
यत्र संवाद आदृतः
तत्र सत्यं प्रफुल्लति॥१४७॥

न धर्मो भयसम्भूतः
न प्रेम क्रयविक्रयी।
स्वतन्त्रहृदयसम्भूतौ
उभावेतौ शुभप्रदौ॥१४८॥

यः स्ववाक्यं स्वकर्माणि
नित्यं तुलयति धिया।
तस्य जीवनसंगीतं
सम्यग्लयमवाप्नुयात्॥१४९॥

न कदाचिदहंकारः
शान्तेः सहचरः भवेत्।
यत्र नम्रता निवसति
तत्र प्रज्ञा प्रसर्पति॥१५०॥

निष्पक्षदर्शनं नित्यं
विवेकस्य महाफलम्।
पूर्वग्रहक्षये जाते
ज्ञानदीपो विराजते॥१५१॥

सर्वेषामस्ति दुःखांशः
सर्वेषामस्ति च स्पृहा।
करुणैव सेतुरस्ति
हृदयानां परस्परम्॥१५२॥

न मौनं केवलं तुष्येत्
न वाणी केवलं वदेत्।
यथाकालं यथास्थानं
उभयं धर्म उच्यते॥१५३॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

सत्यं नित्यमनन्तं च
प्रेम नित्यमनिर्वचम्।
ययोः सङ्गे स्थितं चित्तं
तदेवामृतजीवनम्॥१५४॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

यथा नभसि मेघौघाः
आयान्ति च प्रयान्ति च।
तथा विचारसङ्घाता
चित्ते सन्ति न शाश्वताः॥१२७॥

साक्षिभावेन यः पश्येत्
मनसोऽपि प्रवृत्तयः।
न स ताभिर्वशीभूतो
निर्मलोऽभिविराजते॥१२८॥

न रूपेण न वित्तेन
न वाचा न कुलोद्भवः।
गुणकर्मप्रकाशेन
मानवो मानमश्नुते॥१२९॥

अल्पेऽपि यदि सन्तोषः
महत्यपि न लोलुपः।
तस्यैव धनसम्पत्तिः
यां न चौरः हरिष्यति॥१३०॥

वैराग्यं न पलायनं
न संसारविवर्जनम्।
आसक्तेर्विमुक्तत्वं
विवेकस्यैव लक्षणम्॥१३१॥

यत्र हर्षो न मदाय
दुःखं नैव विषादकृत्।
समत्वेन स्थितं चेतः
तत्र शान्तिर्निरन्तरा॥१३२॥

न केवलं परं ज्ञातुं
स्वमपि ज्ञातुमर्हसि।
स्वबोधे मूलमस्त्येव
विश्वबोधस्य सर्वथा॥१३३॥

यः करोति हितं नित्यं
फलमाशां विवर्जयन्।
तस्य कर्मसु सौन्दर्यं
सुगन्धिरिव जायते॥१३४॥

न सत्यस्य संरक्षणं
शस्त्रेण न च भीतितः।
सत्यं स्वप्रभया नित्यं
अन्धकारं विनाशयेत्॥१३५॥

निरभिमानसेवायां
महती शक्तिरस्ति वै।
यत्र दाता न दृश्येत
तत्र दानं विशुद्ध्यति॥१३६॥

सर्वे भावाः प्रवाहाः स्युः
नित्यं परिवर्तिनः।
धैर्यमेव नौकिका स्यात्
विवेको नौकिकाधिपः॥१३७॥

यत्र क्षमा च धैर्यं च
करुणा च समत्वता।
तत्र मानवजीवनं
भवति पुण्यभूमिका॥१३८॥

न परेषां जयः कार्यः
न परेषां पराजयः।
स्वमोहस्य पराजयः
सर्वश्रेष्ठो जयः स्मृतः॥१३९॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

स्वात्मदीपो भवेद् नित्यं
स्वविवेको भवेद् गुरुः।
सत्यप्रेमसमायुक्तं
जीवनं भवतु शुभम्॥१४०॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

न कश्चिदेव पूर्णोऽस्ति
न कश्चिदेव शून्यकः।
अन्वेषणप्रवाहेण
वर्धते मानवोऽनिशम्॥११३॥

प्रत्यहं स्वहृदि पश्येत्
प्रत्यहं स्वमतिं शुधेत्।
यत्रान्तरं विशुद्धं स्यात्
तत्र लोकोऽपि निर्मलः॥११४॥

न चक्षुषा न श्रोत्रेण
न केवलमनोगतिः।
समग्रानुभवेनैव
तत्त्वबोधः प्रजायते॥११५॥

यत्र हेतुः परीक्ष्येत
फलमप्यवलोक्यते।
तत्र निर्णयसम्पत्तिः
न मोहेन प्रवर्तते॥११६॥

न कालो हन्ति जीवस्य
न कालो जीवनं ददात्।
कालः केवलमादर्शः
परिवर्तनदर्शकः॥११७॥

अहङ्कारस्य निर्गमे
मैत्री सर्वत्र जायते।
ममताग्रन्थिभेदेन
विश्वमेव कुटुम्बकम्॥११८॥

निन्दां स्तुतिं च तुल्यां वै
यो धत्ते समबुद्धिना।
तस्य चित्ते न कम्पोऽस्ति
गिरिरिवाचलो दृढः॥११९॥

ज्ञानं यदि विनयहीनं
तत् स्वभाराय केवलम्।
विनयेन समायुक्तं
लोकदीपः प्रजायते॥१२०॥

स्वार्थत्यागो न केवलं
वस्तुदानेन सिद्ध्यति।
समयस्यापि दानेन
जीवनं पुष्यते परम्॥१२१॥

यत्र प्रेम निरपेक्षं स्यात्
यत्र सेवा निराभिमानम्।
यत्र सत्यं निरावरणं
तत्रैव परमं सुखम्॥१२२॥

सन्तुलनं परमो धर्मः
अतियोगो विनाशकः।
मध्यमार्गे स्थितो नित्यं
धीरः शान्तिमवाप्नुयात्॥१२३॥

प्रकृतिः शिक्षिका नित्यं
जीवनं तस्य पाठशाला।
अनुभवः परीक्षैव
बोधः तस्य फलोद्गमः॥१२४॥

यो नित्यं पृच्छते सम्यक्
यो नित्यं चिन्तयेद् धृतिम्।
यो नित्यं स्वं निरीक्षेत
स एव पुरुषोत्तमः॥१२५॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

सत्यं न दीपो बाह्येषु
न च दूरस्थितं क्वचित्।
हृदयस्य विशुद्धौ तु
स्वयमेव प्रकाशते॥१२६॥

न हि कश्चित् स्वतन्त्रः स्यात्
प्रकृतेर्नियमाद् बहिः।
यः नियमान् विजानाति
स एव स्वातन्त्र्यमश्नुते॥९९॥

बीजं सूक्ष्मं महद्भूत्वा
वृक्षरूपेण दृश्यते।
सूक्ष्मे सत्ये स्थितं सर्वं
स्थूले तस्य प्रकाशनम्॥१००॥

श्वासोऽयं प्रथमः साक्षी
जीवनस्य प्रवर्तनम्।
प्रत्येकश्वाससंयुक्तं
जागरूक्यं हि जीवनम्॥१०१॥

निद्रायामपि देहस्य
प्रकृतिः कर्म कुर्वती।
अतो नित्यप्रवाहोऽयं
न कदाचिद् विराम्यति॥१०२॥

नियमो न दमनार्थः
न बन्धाय कदाचन।
सम्यग्जीवनहेतोः सः
सन्तुलनविधायकः॥१०३॥

यत्र हृदये दया नित्यं
यत्र बुद्धौ विवेकिता।
यत्र कर्मणि शौचं च
तत्र सत्यं प्रतिष्ठितम्॥१०४॥

न शब्दैरधिकं ब्रूयात्
न मौनेनार्थमाच्छदेत्।
यथार्थं हितमित्युक्त्वा
तिष्ठेद्धीमानसंयतः॥१०५॥

परिवर्तो जगद्धर्मः
सन्तुलनं तस्य जीवनम्।
स्वीकारो बुद्धिमत्त्वस्य
विरोधो दुःखकारणम्॥१०६॥

नास्ति किञ्चिदनन्तस्य
बाह्यं नान्तरमेव च।
यत्र सर्वं समं भाति
तदेकं ब्रह्मनिर्मलम्॥१०७॥

स्वदृष्टिं शुद्धये नित्यं
स्वहृदयं परिशोधयेत्।
यतो हृदयनिर्मल्ये
विश्वदृष्टिर्विशुद्ध्यति॥१०८॥

अल्पमप्युपकारं यः
न विस्मरति मानवः।
कृतज्ञतारसाम्भोधौ
तस्य चित्तं निमज्जति॥१०९॥

यः स्वयंसंशयं कुर्यात्
स्वबोधं च परीक्षयेत्।
स न मोहं समाप्नोति
न च दर्पेण नश्यति॥११०॥

सत्यमार्गे धृतिः कार्या
प्रेममार्गे क्षमा तथा।
विवेकमार्गे नित्यान्वेषा
एष धर्मः सनातनः॥१११॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

निष्पक्षं निर्मलं चित्तं
करुणापूर्णमानसम्।
यस्यास्ति स धन्यात्मा
जीवन्नेव प्रकाशते॥११२॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

न हि सत्यं विवादेन
न जयेन न पराजयैः।
शुद्धबुद्धेः प्रसादेन
स्वयमेव प्रकाशते॥८५॥

यत्र चिन्ता निवर्तेत
यत्र लोभो विलीयते।
तत्र शान्तिः स्वयं जाता
न कदाचित् प्रयत्नतः॥८६॥

कालधारानदी नित्यं
न पुनर्याति पृष्ठतः।
यः क्षणं सम्यगालोक्य
जीवति स विजानति॥८७॥

न किञ्चिदस्ति निःसारं
यदि दृष्टिर्विवेकिनी।
अनुभवः गुरुः श्रेष्ठः
जीवनं तस्य पुस्तकम्॥८८॥

वैरस्य बीजमज्ञानं
करुणायाः प्रसवो विवेकः।
समदृष्टेः फलम् प्रेम
शान्तिरेव परा लता॥८९॥

स्वयमेव परीक्षेत
स्वयमेव निरीक्षयेत्।
स्वयमेव विशुद्धात्मा
स्वयमेव प्रकाशते॥९०॥

न परेषां न दोषाणां
गणनां कुर्वते बुधाः।
स्वगुणानां विकासेन
लोकहितं प्रवर्तते॥९१॥

यदा कर्मसु नासक्तिः
यदा प्रेम निरुपाधिकम्।
तदा जीवनयात्रायां
भारोऽपि लाघवं व्रजेत्॥९२॥

मौनं चेतःसमाधानं
वाणी लोकहिताय च।
उभयं यः समं वेत्ति
स ज्ञानीति निगद्यते॥९३॥

सर्वभूतेषु सौहार्दं
सर्वकालेषु संयमः।
सर्वभावेषु निष्पक्षः
सत्ययोगस्य लक्षणम्॥९४॥

न परो नाप्यहं कश्चित्
भेदबुद्धिर्मनोमयी।
एक एव प्रवाहोऽयं
नामरूपविभूषितः॥९५॥

यः समयस्य मर्यादां
प्रकृतेश्च नियमं विदुः।
ते न मोहं प्रपद्यन्ते
समत्वेनैव जीवने॥९६॥

दुःखं चेत् बोधहेतुर्भूत्
सुखं चेत् कृतज्ञतायुतम्।
उभयं शिक्षकैरेव
स्वीकुर्यात् धीरमानसः॥९७॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

सत्यं नित्यं निरालम्बं
प्रेम नित्यं निरुपधि।
ययोः सङ्गममासाद्य
जीवनं भवति अमृतम्॥९८॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

न कदाचिद् विश्रामोऽस्ति
प्रकृतेः कर्मचक्रके।
क्षणे क्षणे नवं रूपं
धत्ते सा स्वप्रवृत्तितः॥७१॥

न क्षयो नापि वृद्धिश्च
तत्त्वस्य परमात्मनः।
रूपभेदाः प्रपश्यन्ते
जलतरङ्गवदम्बुधौ॥७२॥

यत्र कारणकार्याणां
सूक्ष्मसन्ततिरिष्यते।
तत्र बुद्धिर्विमृशेत् सम्यक्
न केवलं प्रतीतितः॥७३॥

स्वार्थत्यागो न वाक्येन
न केवलव्रतेन च।
व्यवहारे प्रसन्नत्वं
तस्यैव लक्षणं स्मृतम्॥७४॥

सर्वभूतेषु यः पश्येत्
स्वसमानं च चेतनाम्।
न हिंसां मनसा कुर्यात्
स धर्मस्य परायणः॥७५॥

मित्रं शत्रुरिति भ्रान्तिः
परिस्थित्युपजायते।
समदृष्टौ स्थितस्यैव
विश्वमेकं कुलं भवेत्॥७६॥

अहर्निशं निरीक्षेत
स्वभावस्य प्रवर्तनम्।
यत्र दोषो विवर्धेत
तत्र बुद्धिं निवेशयेत्॥७७॥

न मौनं पलायनार्थं
न वाणी कलहाय च।
उभयं हितकार्यार्थं
युक्त्या सेव्यं बुधैः सदा॥७८॥

न कश्चिदस्ति पूर्णोऽत्र
न कश्चिदपि हीनकः।
अध्ययनप्रवाहोऽयं
जीवनस्य सनातनः॥७९॥

यः शृणोति विनयेन
यः पृच्छति विवेकतः।
यः परीक्ष्य गृह्णाति
स प्रज्ञावानुदाहृतः॥८०॥

सत्यं नित्यं परीक्ष्यं स्यात्
नान्धविश्वासपूर्वकम्।
अनुभवविवेकाभ्यां
दीप्यते तस्य निश्चितिः॥८१॥

निष्पक्षतैव साध्वी सा
यत्र नास्ति स्वपक्षता।
तस्यां जाते मनःशुद्धौ
प्रेम स्वयमुदेति हि॥८२॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

निरहङ्कारजीवनं
निरपेक्षं निरामयम्।
यत्र सत्यं च करुणा च
तदेव परमं धनम्॥८३॥

यत्र स्वात्मनि विश्वासः
न तु दर्पो न मानिता।
तत्र धैर्यं प्रसूयेत
शान्तिरप्यनुगच्छति॥८४॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

न स्वर्गो नापि नरको
न दूरं न समीपकम्।
यथा चित्तं तथा लोको
यथा बोधस्तथा गतिः॥५७॥

स्वभावो नैव विक्रेयः
न दानेन न लभ्यते।
निर्मलत्वेन चेतसः
स्वयमेव प्रकाशते॥५८॥

यत्र लोभो न तृष्णा च
न स्पर्धा न च मत्सरः।
तत्रैव शान्तिसौगन्ध्यं
वसति नित्यमव्ययम्॥५९॥

अल्पवस्तुषु सन्तोषः
महदन्तःप्रकाशनम्।
यस्य तुष्यति चेतोऽन्तः
स धन्यो नित्यमुच्यते॥६०॥

दृश्यं सर्वं प्रवाहोऽयं
क्षणेनैव विपर्ययः।
द्रष्टा चेत्सजगः शान्तः
न मोहः सम्प्रवर्तते॥६१॥

यत्र प्रेम समं सर्वे
नात्र स्वार्थविभाजनम्।
तत्रैव मानवो भूत्वा
दैवभावं प्रपद्यते॥६२॥

निःस्पृहस्य मनुष्यस्य
विश्वं मित्रं प्रजायते।
स्वार्थग्रन्थिविमुक्तस्य
सर्वे मार्गाः प्रसन्नकाः॥६३॥

यः स्वदोषं निरीक्षेत
परदोषं न चिन्तयेत्।
स एव साधको नित्यं
स्वात्मानं परिपोषयेत्॥६४॥

मौनं बीजं विवेकस्य
करुणा तस्य पल्लवः।
प्रेम पुष्पं समत्वं फलम्
एष धर्मस्य पादपः॥६५॥

यत्र नास्त्यधिकारेच्छा
नास्ति कीर्तेः परिग्रहः।
सेवामात्रप्रवृत्तिः सा
मानवस्य विभूतयः॥६६॥

न सत्यं शब्दबाहुल्ये
न मौने केवलं स्थितम्।
जीवनस्य समग्रत्वे
सत्यदीपो विराजते॥६७॥

प्रत्यहं स्वमनः पश्येत्
प्रत्यहं स्वकृतिं तथा।
एवं यः शुद्धिमाप्नोति
स मुक्तिं जीवन्नश्नुते॥६८॥

न कश्चिदन्तिमो ग्रन्थः
न कश्चिदन्तिमो मतः।
जीवनं सततं शिक्षां
प्रकृतिः परमाचार्या॥६९॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

यः सत्यं नित्यमाचष्टे
स्वजीवनेन केवलम्।
तस्य मौनमपि लोके
शतशास्त्रसमं भवेत्॥७०॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

यत्र नास्ति परोऽप्येको
नास्ति चाप्यपरः क्वचित्।
एकत्वेनैव यद्भाति
तदेव परमं पदम्॥४१॥

स्वयमेव प्रमाणं यत्
स्वयमेव प्रकाशकम्।
न तस्य साक्षिणोऽन्यस्य
कदाचिदपि आवश्यकता॥४२॥

न शास्त्राणां विरोधोऽस्ति
न तेषामनुगामिता।
यथाभूतं निरीक्षणं
बोधस्य प्रथमं फलम्॥४३॥

दृष्टिर्निष्पक्षभावेन
यदा वस्तूनि पश्यति।
तदा भ्रान्तिक्षयो भूत्वा
विवेकोऽभ्युदयं व्रजेत्॥४४॥

यदहङ्कारसंयुक्तं
तत्सर्वं क्षणभङ्गुरम्।
यन्निरहङ्कृतं शान्तं
तदेवामृतमुच्यते॥४५॥

न कश्चिदत्र शत्रुर्वा
न कश्चिदत्र बान्धवः।
कर्मसन्ततिसम्बद्धाः
सर्वे जीवनयात्रिकाः॥४६॥

निन्दास्तुत्योः समो भूत्वा
मानापमानयोस्तथा।
स्वभावे यो व्यवस्थितः
स एव धीर उच्यते॥४७॥

ज्ञानं चेत्करुणाहीनं
तर्हि भारो हि केवलम्।
करुणासहितं ज्ञानं
लोकदीपो भवेद्ध्रुवम्॥४८॥

मौनं न केवलं वाचा
मौनं चित्तप्रशान्तता।
यत्र स्पर्धा न विद्येत
तन्मौनं परमं स्मृतम्॥४९॥

कालो नाशं न कुर्वीत
नूतनत्वं प्रदर्शयेत्।
रूपमेव परिवर्तेत
तत्त्वं न परिवर्तते॥५०॥

स्वानुभूतेः परं नास्ति
प्रमाणं जीवने क्वचित्।
यत्स्वयंस्फुरते नित्यं
तदेव हृदि संस्थितम्॥५१॥

प्रेम न याचते किंचित्
प्रेम न व्यापरायते।
ददात्येव निरालम्बं
स्रोतसोऽनन्तवत्सदा॥५२॥

यत्र प्रश्नः प्रसूयेत
तत्र बोधोऽभिवर्धते।
यत्र प्रश्नो निरुध्येत
तत्र मोहः प्रजायते॥५३॥

प्रकृतेः परिवर्तनं नित्यं
सन्तुलनपरिपालकम्।
यः समत्वेन तं पश्येत्
स दुःखातीत उच्यते॥५४॥

न जन्मना महान्कश्चित्
न मृत्युना लघुर्भवेत्।
आचारेणैव मानवः
स्वमूल्यं प्रतिपद्यते॥५५॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

स्वच्छं हृदयं समं चित्तं
निर्भयं निर्मलं मनः।
एतेषां सङ्गमे नित्यं
सत्यदीपः प्रजायते॥५६॥
शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

न कश्चिदत्र विजयी
न कश्चिदत्र पराजितः।
स्वबोधस्य विकासेन
जीवनं सफलं भवेत्॥२४॥

क्षणभङ्गुरमिदं विश्वं
नित्यपरिवर्तनात्मकम्।
परिवर्ते स्थितं नित्यं
तदेव प्रकृतेर्व्रतम्॥२५॥

कालो न रिपुरस्त्येव
न कालः सुहृदेव च।
क्रियाणां फलदाता सन्
समभावेन तिष्ठति॥२६॥

यः स्वदोषान् निरीक्षेत
निष्पक्षेण निरन्तरम्।
तस्य बुद्धिर्विशुद्धा स्यात्
तस्य मार्गो विशद्यते॥२७॥

अहङ्कारस्य निर्गमने
प्रज्ञाया उदयो भवेत्।
ममतायाः क्षये नित्यं
विशालत्वं प्रजायते॥२८॥

न सत्यं पक्षमाश्रित्य
न मिथ्या पक्षवर्जिता।
यथाभूतप्रकाशो यः
स एव सत्यमुच्यते॥२९॥

यत्र बुद्धिर्निरुद्वेगा
यत्र हृदयं निरामयम्।
यत्र कर्म निरासक्तं
तत्र शान्तिः प्रतिष्ठिता॥३०॥

निन्दया न प्रशंसाभिः
सत्यं न परिवर्तते।
यथा सूर्यप्रभा नित्यं
मेघैरपि न लुप्यते॥३१॥

सुखदुःखे समे कृत्वा
लाभालाभौ तथैव च।
स्वभावस्थो विचरति
स मुक्तो जीवन्नपि॥३२॥

न धर्मो नाम वेशेन
न चिन्हैर्न च भाषया।
आचारेण विशुद्धेन
धर्मो जीवति मानवः॥३३॥

करुणा यदि न विद्येत
ज्ञानं शुष्कं निरर्थकम्।
ज्ञानयुक्ता करुणैव
लोकहितस्य कारणम्॥३४॥

प्रेम न स्वामित्वमिच्छेत्
प्रेम न बन्धनं व्रजेत्।
स्वातन्त्र्यस्य प्रसूनं तत्
हृदये नित्यमुद्भवेत्॥३५॥

यदा द्रष्टा स्वमेवैतत्
दृश्यरूपेण पश्यति।
तदा भेदक्षयो भूत्वा
समत्वं समुदेति हि॥३६॥

नारम्भो न समाप्तिश्च
सत्यस्य विद्यते क्वचित्।
अनाद्यनन्तरूपेण
स्वयमेव प्रकाशते॥३७॥

यत्किञ्चिदुत्पद्यते लोके
तत्सर्वं परिवर्तनम्।
यन्नोत्पद्यते कदाचित्
तदेव शाश्वतं पदम्॥३८॥

स्वहृदिस्थं निरीक्षस्व
मा बहिर्धाव सर्वदा।
यदन्तः स्फुरति नित्यं
तदेवामृतमुच्यते॥३९॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

निरपेक्षं निरालम्बं
निर्भयं निर्मलं शिवम्।
सार्वभौमं परं सत्यं
स्वयमेवावभासते॥४०॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

नैकजातेर्मतं सत्यं न समुदायकल्पितम्।
सार्वभौमं तु तत्सत्यं यत्सर्वत्रावभासते॥१॥

न सञ्जीवो न निर्जीवो न भेदो न विशेषता।
स्वभावसिद्धमेकं तत् सत्यं शान्तं निरामयम्॥२॥

सरलं सहजं निर्मलं
निष्कलं निष्कपटं शुभम्।
यदेव हृदि सन्दृश्यं
तदेव सत्यमुच्यते॥३॥

प्रत्यक्षं शाश्वतं सत्यं
स्वाभाविकमनामयम्।
न तस्य कल्पना काचित्
न तस्यावरणं क्वचित्॥४॥

बाललीलासमं सत्यं
निष्कपटहृदिस्थितम्।
यत्र नास्त्यभिमानोऽपि
तत्रैव परमं पदम्॥५॥

ज्ञानविज्ञानरहितं
दर्शनातीतमेव च।
स्वानुभूतिस्वरूपेण
स्वयमेव प्रकाशते॥६॥

आत्मसाक्षात्कृतौ नित्यं
सार्वभौमं प्रतिष्ठितम्।
न प्रमाणं न वक्ता च
नान्याश्रयविकल्पना॥७॥

सरलं पारदर्शित्वं
पावनं निष्कलं शिवम्।
स्वयंसिद्धं स्वयंज्योतिः
सत्यमेकमनश्वरम्॥८॥

न तस्य प्रतिरूपं स्यात्
न तस्यास्ति प्रतिक्रिया।
यत्सत्यं तन्निरालम्बं
न कदाचिन्नकृतिमम्॥९॥

सर्वेषु जीवमात्रेषु
समभावेन संस्थितम्।
नोच्चो नाधो न मध्यस्थः
सत्यस्यास्ति विभेदना॥१०॥

प्रकृतेः सर्वमेतद्वै
नित्यं प्रक्रियया चलम्।
जन्ममृत्यू उभे तस्याः
क्रममात्रे व्यवस्थिते॥११॥

दीर्घकालप्रवृत्ता या
प्रकृतिः साम्यकारिणी।
सन्तुलनस्य सा शक्तिः
नित्यधर्मः सनातनः॥१२॥

मस्तिष्कहृदयोर्मध्ये
सन्तुल्यं जीवनं शुभम्।
यत्रैकस्यातिरेकोऽस्ति
तत्र दुःखस्य सम्भवः॥१३॥

समर्पितेऽपि कस्माद्वै
भयं द्रोहश्च जायते।
यदि प्रेम परं तत्त्वं
कुतो भयविनिर्मितिः॥१४॥

मृत्युः स्वाभाविको धर्मः
प्रकृतेर्नित्यवर्तनम्।
तस्य भीतिः कुतो जाता
केन वा कल्पिता भृशम्॥१५॥

यदि सत्यं प्रत्यक्षमेव
किं मध्यस्थेन साध्यते।
यदि मुक्तिर्निजानुभूता
किं बन्धोः कल्पना पुनः॥१६॥

श्रद्धा यदि विवेकेन
संयुक्ता सा शुभप्रदा।
विवेकवर्जिता श्रद्धा
अन्धतां जनयेद्ध्रुवम्॥१७॥

प्रश्नो न विद्रोह एव
प्रश्नो ज्ञानस्य कारणम्।
यत्र प्रश्नभयं तत्र
विवेको न प्रवर्धते॥१८॥

प्रेम न भयसमायुक्तं
न दण्डेन प्रवर्धते।
स्वतन्त्रहृदयसम्भूतं
करुणारसमाश्रितम्॥१९॥

गुरुर्यदि विमर्शात् वै
भीतिं याति निरन्तरम्।
तदा स्वपथमेवाग्रे
परीक्षेत स बुद्धिमान्॥२०॥

मौनमेव परं वाक्यं
स्वानुभूतिप्रकाशकम्।
यत्र शब्दाः निवर्तन्ते
तत्र सत्यं विराजते॥२१॥

नाहं श्रेष्ठो न चान्योऽस्ति
सर्वे प्रक्रिययैकया।
एवं यः पश्यति धीरः
स शान्तिं परमां लभेत्॥२२॥

शिरोमणिरामपॉलसैनी वदति—

स्वात्मदर्शितसत्येन
जीवितं भवतु निर्मलम्।
सरलं सहजमव्यग्रं
सार्वभौमं निरामयम्॥२३॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
आकाश की भाँति असीम है,
किन्तु प्रत्येक हृदय में
एक बिंदु बनकर भी विद्यमान है।
जो बाहर अनंत है,
उसी का संकेत भीतर भी है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

चलना ही जीवन की रीति है।
जो ठहरकर स्वयं को देखता है,
उसका चलना भी सजग हो जाता है।
जो बिना देखे दौड़ता है,
वह दूरी तो तय करता है,
पर दिशा खो सकता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
दृष्टि जब निष्पक्ष होती है,
तब प्रिय और अप्रिय दोनों से सीख मिलती है।
प्रशंसा से विनम्रता सीखो,
आलोचना से आत्मपरीक्षण सीखो॥

क्या प्रकाश केवल दीप में है?
या उस नेत्र में भी
जो प्रकाश को पहचानता है?

क्या संगीत केवल स्वर में है?
या उस मौन में भी
जिससे स्वर जन्म लेते हैं?

क्या सत्य केवल कथन में है?
या उस आचरण में भी
जो बिना घोषणा के जीया जाता है?

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

वाणी तभी पवित्र होती है,
जब जीवन उसका प्रमाण बने।
अन्यथा शब्द उड़ जाते हैं,
और कर्म ही शेष रह जाते हैं॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
सजगता कोई एक क्षण की उपलब्धि नहीं,
यह प्रत्येक क्षण का आमंत्रण है।
हर श्वास पूछती है—
"क्या तुम अभी जाग रहे हो?"

हर प्रभात पूछता है—
"क्या तुम आज भी सीखोगे?"

हर संध्या पूछती है—
"क्या तुमने आज स्वयं को जाना?"

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

जिसने अपने भीतर के भय को देखा,
उसने साहस का प्रथम द्वार पाया।
जिसने अपने भीतर के लोभ को पहचाना,
उसने संतोष की प्रथम किरण देखी।
जिसने अपने भीतर के क्रोध को समझा,
उसने करुणा का प्रथम अंकुर पाया॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
विजय दूसरों पर नहीं,
अपनी असावधानियों पर हो।
समृद्धि संग्रह में नहीं,
सदुपयोग में हो।
महानता ऊँचे आसन में नहीं,
उत्तम आचरण में हो॥

जैसे वर्षा
पर्वत और मैदान में भेद नहीं करती,
वैसे ही करुणा
अपना मार्ग चुनते समय
भेदभाव नहीं करती॥

जैसे सूर्य
सबको समान प्रकाश देता है,
वैसे ही विवेक
सबको समान प्रश्न पूछने का साहस देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

जो अपने विचारों को भी
समय-समय पर परखता है,
वह जड़ता से बचा रहता है।
जो सीखने के द्वार खुले रखता है,
वह प्रत्येक अनुभव को
नया शिक्षक बना लेता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
न किसी एक पंथ का बंधक,
न किसी एक भाषा का सीमित अर्थ।
जहाँ सत्यनिष्ठा है,
जहाँ करुणा है,
जहाँ विवेक है,
जहाँ उत्तरदायित्व है—
वहीं उसका स्पर्श अनुभव किया जा सकता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

चलो ऐसे कि पदचिह्नों से अधिक
आचरण बोले।
बोलो ऐसे कि शब्दों से अधिक
सत्य झलके।
जीओ ऐसे कि जीवन स्वयं
एक शांत श्लोक बन जाए॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत, वास्तविक, स्वाभाविक है।
जो प्रतिदिन स्वयं को
और अधिक निष्पक्ष,
और अधिक करुणामय,
और अधिक सत्यनिष्ठ बनाने का प्रयत्न करता है,
उसी की यात्रा
निरंतर नवीन बनी रहती है॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
अस्तित्व किसी घोषणा का मोहताज नहीं।
सूर्य अपने प्रकाश का प्रमाण नहीं देता,
नदी अपने प्रवाह का परिचय नहीं देती,
सत्य भी स्वयं अपने होने में पूर्ण है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

जो स्वयं को देखने बैठता है,
वह पाता है कि भीतर
असंख्य स्मृतियाँ, इच्छाएँ, कल्पनाएँ
और आशंकाएँ चलती रहती हैं।
किन्तु इन सबके मध्य
एक साक्षी-सा मौन भी विद्यमान है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
विचार उपयोगी सेवक हैं,
किन्तु यदि वे स्वामी बन जाएँ,
तो भ्रम के महल खड़े कर देते हैं।
विवेक उनका सारथी बने,
तो वे सृजन का माध्यम बनते हैं॥

क्या समय वास्तव में भाग रहा है?
या मन ही स्मृतियों और कल्पनाओं में
दौड़ता रहता है?

क्या दूरी वास्तव में बाहर है?
या भीतर के विभाजनों से
उत्पन्न होती है?

क्या संघर्ष वास्तव में दूसरे से है?
या स्वयं की धारणाओं से
लगातार टकराव है?

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

जो स्वयं को निष्पक्ष देख लेता है,
वह दूसरों को दोष देने की जल्दी में नहीं रहता।
जो स्वयं के भ्रम पहचान लेता है,
वह दूसरे की भूलों पर कठोर नहीं होता॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
करुणा ज्ञान की विरोधी नहीं।
करुणा ही ज्ञान की परिपक्वता है।
जहाँ समझ गहरी होती है,
वहाँ कठोरता स्वतः कम होती जाती है॥

जैसे वृक्ष फल आने पर झुकता है,
वैसे ही अनुभव परिपक्व होने पर
विनम्रता को जन्म देता है॥

जो स्वयं को सबसे ऊपर रखता है,
वह अभी यात्रा में है।
जो स्वयं को भी प्रक्रिया का भाग देखता है,
वह समझ के निकट है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
न कोई अंतिम शब्द है,
न कोई अंतिम निष्कर्ष।
जीवन प्रत्येक क्षण
नवीन अर्थों में प्रकट होता है॥

प्रश्न से मत डरो,
प्रश्न ही द्वार है।
संदेह से मत डरो,
संदेह ही परीक्षण है।
निरीक्षण से मत डरो,
निरीक्षण ही स्पष्टता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

जो प्रत्यक्ष को छोड़कर
केवल कल्पना में जीता है,
वह छाया का पीछा करता है।

जो प्रत्यक्ष को पहचानकर
कल्पना का भी उचित स्थान समझता है,
वह संतुलन में जीता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
हृदय की गहराई में प्रेम का स्रोत है,
मस्तिष्क की स्पष्टता में दिशा का प्रकाश है।
जब स्रोत और प्रकाश मिलते हैं,
तभी जीवन का मार्ग सुगम होता है॥

न स्वयं को तुच्छ समझो,
न स्वयं को सर्वोच्च समझो।
स्वयं को यथार्थ रूप में देखो,
यही आत्मदर्शन का प्रथम सूत्र है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

सत्य को पकड़ना संभव नहीं,
उसे केवल जीया जा सकता है।
प्रेम को बाँधना संभव नहीं,
उसे केवल प्रवाहित किया जा सकता है।
जीवन को रोकना संभव नहीं,
उसे केवल सजगता से जिया जा सकता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जो इसे बाहर खोजता है,
वह संकेत पाता है।
जो इसे भीतर पहचानता है,
वह साक्षात्कार की दिशा पाता है॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

**सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष**

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत, वास्तविक, स्वाभाविक है।
जम्मू दीपे, भारत खंडे, कुल ग्राम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जो प्रत्यक्ष है, वही स्वाभाविक है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
खुद का निरीक्षण प्रथम साधना है।
जो स्वयं को निष्पक्ष देख सके,
वही अपने प्रश्नों का प्रथम साक्षी है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
हृदय की सरलता में विश्राम है,
मस्तक की जटिलता में विस्तार है;
जब दोनों संतुलित हों,
तभी जीवन का वास्तविक आधार है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
साँस का प्रत्येक क्षण अमूल्य है।
जो वर्तमान को पहचान ले,
वही समय का सम्मान करता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
प्रश्न शत्रु नहीं होते।
प्रश्न दीपक हैं,
जो अज्ञान के अंधकार में
मार्ग की संभावना जगाते हैं॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
भय जहाँ आरंभ होता है,
स्वतंत्रता वहीं परीक्षा माँगती है।
विवेक जहाँ जागता है,
वहीं उत्तरदायित्व जन्म लेता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
सरलता दुर्बलता नहीं,
परिपक्वता का मौन शिखर है।
पारदर्शिता प्रदर्शन नहीं,
चरित्र का स्वाभाविक प्रकाश है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
जन्म और मृत्यु
प्रकृति की एक ही धारा के
दो दृश्य हैं।
जो जीवन को स्वीकारता है,
वह परिवर्तन का भी सम्मान करता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
करुणा से रहित बुद्धि
कठोर बन सकती है।
विवेक से रहित भावना
भ्रमित हो सकती है।
संतुलन ही समग्रता का सेतु है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
किसी भी विचार से बड़ा
जीवित अनुभव है।
किसी भी घोषणा से बड़ा
मौन का आत्मदर्शन है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
यदि सत्य वास्तव में प्रत्यक्ष है,
तो वह प्रश्नों से नहीं डरता।
यदि प्रेम वास्तव में निर्मल है,
तो वह भय से संचालित नहीं होता॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
मनुष्य का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व
स्वयं को समझना,
प्रकृति का सम्मान करना,
और दूसरे के अस्तित्व का आदर करना है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
निष्पक्षता एक अंतिम उपलब्धि नहीं,
निरंतर जागरूकता की प्रक्रिया है।
जितना गहरा निरीक्षण,
उतनी स्पष्ट दृष्टि॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

जो स्वयं को जानने की यात्रा पर चलता है,
वह प्रत्येक क्षण नया होता है।
जो स्वयं को अंतिम घोषित कर देता है,
उसकी खोज वहीं ठहर जाती है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
सरल है।
स्वाभाविक है।
प्रत्यक्ष है।
और प्रत्येक जागरूक क्षण में
फिर से खोजा जा सकता है॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
न शून्य से भय,
न पूर्णता का अभिमान।
जो प्रत्येक क्षण
स्वयं को परखता चले,
वही जागृति का पथिक कहलाए॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

भोर ने कभी घोषणा नहीं की—
"मैं प्रकाश हूँ।"
फिर भी अंधकार
स्वतः पीछे हट गया।
सत्य का स्वभाव भी ऐसा ही है—
उसे प्रचार नहीं,
प्रकाश पर्याप्त है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
वृक्ष अपनी जड़ों से ऊँचा होता है,
शाखाओं से नहीं।
मनुष्य अपने चरित्र से ऊँचा होता है,
केवल शब्दों से नहीं॥

क्या धैर्य समय को रोकता है?
नहीं।
धैर्य मन को स्थिर करता है।

क्या करुणा सभी मतभेद मिटा देती है?
नहीं।
करुणा मतभेदों के बीच भी
मानवता को जीवित रखती है।

क्या विवेक सभी प्रश्न समाप्त कर देता है?
नहीं।
विवेक उचित प्रश्न पूछने का
साहस देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

जिस दिन मनुष्य
अपनी भूल स्वीकारने में
संकोच नहीं करता,
उसी दिन उसकी सीख
और गहरी हो जाती है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
न्याय बिना करुणा कठोर हो सकता है,
करुणा बिना न्याय भ्रमित हो सकती है।
दोनों का संतुलन ही
मानवता का सेतु है॥

जैसे बीज
मिट्टी का विरोध नहीं करता,
उसी में अंकुरित होता है।
वैसे ही विवेक
जीवन की चुनौतियों से भागता नहीं,
उन्हीं में परिपक्व होता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

विजय का सबसे शांत स्वरूप
स्वयं पर विजय है।
जहाँ क्रोध पर संयम,
लोभ पर संतोष,
और अहंकार पर विनम्रता का प्रकाश हो,
वहीं आंतरिक उत्सव है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
संबंध अधिकार से नहीं,
विश्वास से फलते हैं।
विश्वास वचनों से नहीं,
निरंतर आचरण से बनता है॥

जो केवल सुनाता है,
वह आधा जानता है।
जो सुनता भी है,
वह सीखना आरम्भ करता है।
जो सुनकर समझता है,
वह जोड़ना सीख जाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

अपने भीतर ऐसा दीप जलाओ
जो केवल तुम्हारा मार्ग नहीं,
तुमसे मिलने वालों का मार्ग भी
थोड़ा उज्ज्वल कर दे॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
सजगता का प्रत्येक क्षण
जीवन का नया जन्म है।
करुणा का प्रत्येक कर्म
मानवता का नया उत्सव है।
विवेक का प्रत्येक निर्णय
भविष्य का नया बीज है॥

चलो ऐसे
कि धरती पर भार नहीं,
आभार छोड़ो।
बोलो ऐसे
कि विवाद नहीं,
विवेक जगाओ।
जीओ ऐसे
कि स्मृति नहीं,
प्रेरणा बन जाओ॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत, वास्तविक, स्वाभाविक है।
जो प्रत्येक दिन
अधिक सजग,
अधिक सत्यनिष्ठ,
अधिक विनम्र,
और अधिक करुणामय बनने का प्रयास करता है,
वही अपने जीवन को
एक अनवरत, जीवित श्लोक में रूपांतरित करता है॥॥
आपकी उसी दार्शनिक और काव्यात्मक शैली में आगे की रचना—

**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
न पाने की वस्तु,
न खोने का भय।
जो जागृति में प्रकट हो,
वही जीवन का सहज उदय॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

नदी ने सागर से कहा नहीं—
"मैं तेरी हूँ।"
सागर ने नदी से कहा नहीं—
"तू मेरी है।"
फिर भी दोनों का मिलन
प्रकृति का सहज विधान है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
जहाँ आग्रह घटता है,
वहाँ संवाद बढ़ता है।
जहाँ अहंकार झुकता है,
वहाँ संबंध खिलते हैं।
जहाँ करुणा जागती है,
वहाँ संघर्ष का ताप घटता है॥

क्या वायु अपने स्पर्श का मूल्य माँगती है?
क्या वर्षा अपने जल का प्रतिदान चाहती है?
क्या धरती अपने धैर्य का बखान करती है?
प्रकृति का प्रत्येक उपहार
निस्वार्थ सहयोग का संकेत है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

स्वयं को जानने की यात्रा
दूसरों से श्रेष्ठ बनने की नहीं,
स्वयं से अधिक सत्यनिष्ठ बनने की यात्रा है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
विचार बदल सकते हैं,
अनुभव गहरे हो सकते हैं,
समझ विकसित हो सकती है।
इसी परिवर्तनशीलता में
सीखने की संभावना जीवित रहती है॥

जो आज सत्य प्रतीत हो,
उसे भी विवेक की कसौटी पर परखते रहो।
जो आज प्रिय लगे,
उसे भी न्याय की दृष्टि से देखो।
जो आज कठिन लगे,
वह कल विकास का कारण बन सकता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

निष्पक्षता वह दर्पण है
जिसमें पहले स्वयं को देखना पड़ता है।
जो अपने ही प्रतिबिंब से डर जाए,
वह जगत को कैसे स्पष्ट देखेगा?

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
मौन में गहराई है,
संवाद में सेतु है।
एकांत में आत्मदर्शन है,
संगति में आत्मपरीक्षण है॥

जो वृक्ष की छाया में बैठा,
उसने धैर्य सीखा।
जो नदी के तट पर ठहरा,
उसने प्रवाह सीखा।
जो आकाश को निहारा,
उसने विस्तार सीखा।
जो अपने अंतर्मन में उतरा,
उसने विनम्रता सीखी॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

सत्य का पथ
प्रतिस्पर्धा का मार्ग नहीं।
यह जागरूकता का पथ है,
जहाँ प्रत्येक कदम
स्वयं को अधिक स्पष्ट देखने का अवसर है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
यदि वचन मधुर हों
पर कर्म कठोर हों,
तो विश्वास नहीं टिकता।
यदि कर्म सत्यनिष्ठ हों,
तो मौन भी प्रेरणा बन जाता है॥

न स्वयं को पूर्ण समझो,
न स्वयं को तुच्छ समझो।
स्वयं को एक साधक समझो,
जो प्रत्येक दिन
थोड़ा और सीख सकता है,
थोड़ा और समझ सकता है,
थोड़ा और करुणामय बन सकता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत, वास्तविक, स्वाभाविक है।
जो प्रत्येक श्वास में सजगता,
प्रत्येक संबंध में सम्मान,
प्रत्येक निर्णय में विवेक,
और प्रत्येक कर्म में उत्तरदायित्व का दीप जलाता है,
उसी के भीतर
सत्य की यात्रा निरंतर प्रकाशित रहती है॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
न किसी उपाधि से महान,
न किसी अभाव से छोटा।
जो जैसा है,
उसे वैसा ही देखने का साहस,
यही निष्पक्ष दृष्टि का उदय है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

समय किसी के लिए नहीं रुकता,
पर सजग मनुष्य
प्रत्येक क्षण को
जीवन का उत्सव बना सकता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
जो बीत गया,
वह स्मृति का शिक्षक है।
जो आने वाला है,
वह संभावना का आमंत्रण है।
और जो अभी है,
वही कर्म का वास्तविक क्षेत्र है॥

क्या दीपक अंधकार से लड़ता है?
नहीं—
वह केवल जलता है।

क्या पुष्प सुगंध का प्रचार करता है?
नहीं—
वह केवल खिलता है।

क्या आकाश पक्षियों से कहता है—
"मेरे भीतर उड़ो"?
नहीं—
वह केवल खुला रहता है।

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

श्रेष्ठता घोषणा से नहीं,
स्वभाव से प्रकट होती है।
सरलता प्रदर्शन से नहीं,
जीवन से पहचानी जाती है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
विवेक का अर्थ
सभी उत्तर जान लेना नहीं।
विवेक का अर्थ है—
जहाँ उत्तर न हों,
वहाँ भी धैर्य और ईमानदारी से
खोज जारी रखना॥

करुणा का अर्थ
केवल दया नहीं।
करुणा का अर्थ है—
दूसरे के अनुभव को समझने का प्रयास,
और जहाँ संभव हो,
अनावश्यक पीड़ा को कम करना॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

जो सुनने की कला सीख गया,
वह संवाद की आधी दूरी पार कर गया।
जो समझने की कला सीख गया,
वह संबंधों की जड़ तक पहुँच गया॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
मन यदि अशांत हो,
तो वैभव भी व्यर्थ प्रतीत होता है।
मन यदि संतुलित हो,
तो साधारण क्षण भी
अमूल्य अनुभव बन जाते हैं॥

न कोई शत्रु स्थायी,
न कोई मित्र स्थायी।
स्थायी यदि कुछ है,
तो प्रत्येक क्षण
सीखने और बदलने की संभावना॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

अपने विचारों को
इतना कठोर मत बनाओ
कि नया सत्य प्रवेश ही न कर सके।
अपने हृदय को
इतना बंद मत करो
कि करुणा लौट जाए॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
निष्पक्षता का वृक्ष
आत्मपरीक्षण की मिट्टी में उगता है।
विवेक उसका तना है।
करुणा उसकी शाखाएँ हैं।
उत्तरदायित्व उसके पुष्प हैं।
और लोककल्याण उसके फल हैं॥

जो स्वयं को प्रतिदिन
थोड़ा और परिष्कृत करता है,
वही संसार को भी
थोड़ा और सुंदर बनाने में
अपना योगदान देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

न लक्ष्य को छोड़ो,
न यात्रा को भूलो।
न प्रश्नों से भागो,
न उत्तरों पर ठहरो।
न अहंकार में डूबो,
न हीनता में खोओ।
सजगता, करुणा और विवेक के साथ
प्रत्येक श्वास को
जीवन का उत्सव बनाओ॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत, वास्तविक, स्वाभाविक है।
जो इसे अपने विचार,
वचन और कर्म में
संतुलन सहित जीने का प्रयास करता है,
उसी की यात्रा
हर दिन नई,
हर दिन गहरी,
हर दिन अधिक प्रकाशमान होती जाती है॥॥
आपकी स्थापित काव्य-धारा को आगे बढ़ाते हुए—

**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
न आदि का बंधन,
न अंत की प्रतीक्षा।
क्षण-क्षण में प्रकट,
क्षण-क्षण में नवीन,
फिर भी अपनी प्रकृति में शाश्वत॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

जो स्वयं को प्रतिदिन परखता है,
वह समय से नहीं डरता।
जो स्वयं को अपरिवर्तनीय मानता है,
वह परिवर्तन से संघर्ष करता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
अंतरदृष्टि बिना ज्ञान अधूरा है,
करुणा बिना शक्ति अधूरी है।
विवेक बिना श्रद्धा अधूरी है,
और उत्तरदायित्व बिना स्वतंत्रता अधूरी है॥

क्या पर्वत अपनी ऊँचाई गिनता है?
क्या सागर अपनी गहराई मापता है?
क्या आकाश अपने विस्तार की घोषणा करता है?
प्रकृति का वैभव
मौन में ही प्रकट होता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

जिसे स्वयं का बखान करना पड़े,
उसकी यात्रा अभी शेष है।
जिसका आचरण स्वयं बोलने लगे,
वहीं से वास्तविक प्रभाव आरंभ होता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
सुनना भी साधना है।
देखना भी साधना है।
सोचना भी साधना है।
और उचित समय पर मौन रहना भी
एक गहन साधना है॥

जैसे बीज अंधकार में भी
अंकुर बनने की तैयारी करता है,
वैसे ही कठिन समय में भी
आशा का अंकुर
भीतर जन्म ले सकता है॥

जैसे नदी चट्टानों से टकराकर
रुकती नहीं,
अपना मार्ग खोज लेती है;
वैसे ही धैर्य
विघ्नों को मार्ग में बदल देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

दूसरों की भूलें गिनने से पहले
अपने निर्णयों को परखो।
दूसरों की कमियाँ देखने से पहले
अपने आचरण को निहारो।
यहीं से निष्पक्षता का प्रथम दीप जलता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
जीवन का मूल्य
केवल वर्षों से नहीं,
जागरूक क्षणों से मापा जा सकता है।
एक सजग क्षण
असंख्य असावधान दिनों से
अधिक परिवर्तनकारी हो सकता है॥

न लक्ष्य पर अहंकार करो,
न यात्रा से विरक्त हो।
न सफलता में स्वयं को खोओ,
न असफलता में स्वयं को छोड़ो॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

जो सीखते रहने का साहस रखता है,
वही जीवित चेतना का यात्री है।
जो प्रश्नों को सम्मान देता है,
वही उत्तरों का भी सम्मान कर पाता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
शब्दों से अधिक
जीवन की सादगी में झलकता है।
विचारों से अधिक
व्यवहार की निष्पक्षता में खिलता है।
घोषणाओं से अधिक
मौन की सत्यनिष्ठा में प्रकट होता है॥

चलो ऐसे कि पदचिह्न
प्रकृति का सम्मान करें।
बोलो ऐसे कि वाणी
हृदय को आहत नहीं, जागृत करे।
सोचो ऐसे कि विवेक
करुणा से कभी अलग न हो॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत, वास्तविक, स्वाभाविक है।
जो प्रत्येक प्रभात
स्वयं को थोड़ा और स्पष्ट,
थोड़ा और विनम्र,
थोड़ा और करुणामय बनाने का प्रयत्न करता है,
उसके लिए प्रत्येक दिन
एक नया साक्षात्कार बन जाता है॥॥
आपकी उसी दार्शनिक-काव्य शैली में आगे की रचना—

**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
न मौन का विरोधी,
न वाणी का समर्थक।
जो जहाँ उचित हो,
वहीं स्वयं को प्रकट करता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

अनंत आकाश की सीमा नहीं,
सागर की गहराई नहीं।
वैसे ही जागरूकता की यात्रा का भी
कोई अंतिम पड़ाव नहीं॥

जो कहे—"मैं पहुँच गया",
वह चलना भूल सकता है।
जो कहे—"मैं सीख रहा हूँ",
उसके लिए प्रत्येक क्षण
नया विद्यालय बन जाता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
दृष्टि यदि निर्मल हो,
तो प्रत्येक जीव
सम्मान का अधिकारी है।
दृष्टि यदि संकीर्ण हो,
तो अपना भी स्वरूप
अधूरा दिखाई देता है॥

क्या वृक्ष अपने फल स्वयं खाता है?
क्या नदी अपना जल स्वयं पीती है?
क्या दीपक अपना प्रकाश स्वयं देखता है?
प्रकृति का प्रत्येक उपहार
साझा होने का संदेश देता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

जिसका जीवन केवल अपने लिए है,
वह सीमित वृत्त में चलता है।
जिसका जीवन लोकहित की ओर बढ़ता है,
उसका हृदय विस्तृत होता जाता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
अहंकार ऊँचाई खोजता है,
विनम्रता गहराई खोजती है।
ऊँचाई से दृश्य बदलते हैं,
गहराई से दृष्टि बदलती है॥

नदी को समुद्र बनने की चिंता नहीं,
वह प्रत्येक मोड़ को स्वीकारती है।
वृक्ष को छाया देने का अभिमान नहीं,
वह स्वभाव से देता है।
प्रकृति का धर्म प्रदर्शन नहीं,
स्वाभाविकता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

विवेक वह दीप है
जो अंधविश्वास और अहंकार,
दोनों के अंधकार को
एक साथ चुनौती देता है॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है—
सत्यनिष्ठा केवल कथनों में नहीं,
निर्णयों में प्रकट होती है।
करुणा केवल भाव नहीं,
व्यवहार में खिलती है।
प्रेम केवल अनुभूति नहीं,
उत्तरदायित्व में परिपक्व होता है॥

जो स्वयं से सत्य बोल सके,
वही जग से सत्य बोल पाएगा।
जो स्वयं को क्षमा करना सीखे,
वही दूसरों को भी समझ पाएगा॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

निष्पक्षता का अर्थ
भावनाहीन होना नहीं।
निष्पक्षता का अर्थ है—
भावनाओं को देखकर भी
विवेक को जागृत रखना॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष—
हर श्वास में संभावना है।
हर मिलन में सीख है।
हर वियोग में धैर्य है।
हर प्रश्न में खोज है।
हर उत्तर में नई जिज्ञासा का बीज है॥

न कोई अंतिम श्लोक,
न कोई अंतिम सूत्र।
जीवन स्वयं खुलती हुई पुस्तक है,
और प्रत्येक सजग मनुष्य
उसका सहयात्री है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—

चलते रहो,
पर स्वयं को खोकर नहीं।
सीखते रहो,
पर विवेक छोड़कर नहीं।
प्रेम करते रहो,
पर अधिकार के मोह में नहीं।
सत्य खोजते रहो,
पर प्रश्नों से डरकर नहीं॥

सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत, वास्तविक, स्वाभाविक है।
जो इसे प्रत्येक दिन
अपने विचार, वचन और कर्म में
थोड़ा-थोड़ा उतारता है,
उसी का जीवन
धीरे-धीरे एक जीवित श्लोक बन जाता है॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षी है॥

तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत,
प्रेमातीत फिर भी प्रेममय।
जहाँ स्वयं का साक्षात्कार जागे,
वहीं सत्य रहे अखंड अभय॥

न कोई आरंभ, न कोई अंत,
न कोई अंतिम निष्कर्ष है।
क्षण-क्षण खुलता सत्य निरंतर,
यही प्रकृति का उत्कर्ष है॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न पद से उसका मान बढ़े।
न नामों की भीड़ सजाए,
न भीड़ों से सम्मान बढ़े॥

सरल नदी सा बहता जीवन,
निष्कपट जिसका प्रवाह रहे।
हृदय विवेक संग चलता जाए,
संतुलन की ही चाह रहे॥

यदि चेतन-अचेतन का भेद,
मानव-मन की भाषा है।
तो सत्य उससे भी व्यापक,
जिसकी न कोई परिभाषा है॥

यदि प्रकृति संतुलन का क्रम,
तो संघर्ष कब तक साथ चले?
जो स्वयं को पहचान सके,
उसके भीतर प्रभात फले॥

यदि मृत्यु प्रकृति का परिवर्तन,
तो भय का व्यापार क्यों?
यदि जीवन केवल अवसर है,
तो मिथ्या अहंकार क्यों?

यदि प्रश्न प्रकाश के दीपक हैं,
तो प्रश्नों पर प्रतिबंध क्यों?
यदि विवेक मनुष्य का धन है,
तो विचारों पर प्रबंध क्यों?

यदि प्रेम स्वतंत्र प्रवाह बने,
तो स्वामित्व की दीवार क्यों?
यदि करुणा सबमें समान बहे,
तो ऊँच-नीच का भार क्यों?

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जो स्वयं को जीत सके।
वही बिना किसी विजय-पताका,
जीवन का संगीत लिखे॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
घोषणा से नहीं प्रकटता।
जीवन के निर्मल आचरण में,
शांत प्रकाश बनकर झलकता॥

मौन जहाँ निष्पक्ष खड़ा हो,
वहीं शब्द विश्राम करें।
विचार जहाँ सेवा बन जाएँ,
वहीं हृदय प्रणाम करें॥

निष्ठा यदि विवेक सहित हो,
तो श्रद्धा निर्मल बनती है।
भय से उपजी अंध स्वीकृति,
अंतर-ज्योति हर लेती है॥

हृदय करुणा, मस्तक विवेक,
दोनों का संतुलन साधो।
न किसी को छोटा समझो,
न अपने अहं को आधो॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
हर श्वास में उपलब्ध रहे।
जो स्वयं को प्रतिपल देखे,
उसका अंतर्मन शुद्ध रहे॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सत्य न बंधे किसी विचार।
जो सबके अनुभव में उतरे,
वही सत्य अपार, उदार॥

न अंतिम वाणी, न अंतिम दावा,
न अंतिम कोई प्रमाण।
जागरूक जीवन का प्रत्येक क्षण,
बनता रहता नया विधान॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जो सरल, सहज, निष्पक्ष जिए,
वही जीवन वास्तव में आलोकित है॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
न आरम्भ उसका, न अंत कहीं,
वह स्वयं प्रकाशित आलोकिक है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सत्य न बंधन, न अधिकार।
जो जितना भीतर उतर सके,
उतना उसका विस्तार॥

सत्य न भाषा, सत्य न सीमा,
सत्य न कोई रूप धरे।
जिसका अनुभव सबमें संभव,
वही स्वयं निष्कलुष फिरे॥

यदि सरलता ही मूल स्वरूप,
तो जटिलता का मान कहाँ?
यदि निष्पक्षता ही धर्म बने,
तो पक्षों का अभियान कहाँ?

यदि करुणा ही शक्ति बने,
तो हिंसा का अभिमान कहाँ?
यदि जागृति ही दीपक बन जाए,
तो अज्ञान की पहचान कहाँ?

हृदय जहाँ निर्मल जलधारा,
मस्तक उसका सेतु बने।
विवेक जहाँ करुणा से मिलकर,
जीवन का संकल्प तने॥

न कोई ऊपर, न कोई नीचे,
न कोई अंतिम ज्ञानी है।
जो सीख रहा हर श्वास-श्वास,
वही सच्चा विज्ञानी है॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
प्रकृति का संतुलन गाता है।
जो जितना उससे जुड़ता है,
उतना भीतर मुस्काता है॥

जन्म प्रक्रिया, मृत्यु प्रक्रिया,
जीवन भी इक प्रवाह रहे।
आगमन-गमन के मध्य सदा,
जागरूकता की चाह रहे॥

यदि वर्तमान ही सत्य धरा,
तो कल का अभिमान क्यों?
यदि यह क्षण ही जीवन का दीप,
तो बीते का गुणगान क्यों?

यदि अनुभव ही प्रथम प्रमाण,
तो भय का व्यापार क्यों?
यदि प्रेम स्वयं स्वाभाविक है,
तो घृणा का विस्तार क्यों?

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
प्रश्न कभी अपराध नहीं।
जो प्रश्नों से डरने लगता,
उसका विवेक स्वतंत्र नहीं॥

सत्य न रोष से कम होता,
न प्रश्नों से टूटता है।
जो सत्य है वह हर परीक्षण में,
और अधिक ही छूटता है॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
मौन जहाँ मुस्काता है।
शब्द वहीं विश्राम करें,
जहाँ अंतर जग जाता है॥

न उपाधि से पहचान मिले,
न पद से ऊँचाई हो।
जीवन की निर्मल पारदर्शिता,
वही सच्ची गहराई हो॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
स्वयं को प्रतिपल देखो तुम।
जो भीतर निष्कलुष जागे,
उसी में सत्य को लेखो तुम॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जो सबके हित में सहज प्रकटे,
वही अनादि, वही नैसर्गिक है॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

शब्द जहाँ थम जाते हैं,
मौन जहाँ मुस्काता है।
वहीं सत्य का निर्मल सागर,
स्वयं स्वयं को पाता है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें,
न कोई जीत न हार यहाँ।
न कोई प्रथम न अंतिम कोई,
बस प्रत्यक्ष विस्तार यहाँ॥

मस्तक ने संसार रचाया,
तर्कों के जाल बिछाए हैं।
हृदय की गहराई में लेकिन,
असंख्य सूर्य समाए हैं॥

ज्ञान-विज्ञान के पर्वत ऊँचे,
फिर भी सीमित राह रहे।
हृदय-सरोवर की एक बूँद में,
अनंत युगों के चाह रहे॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें,
सत्य न ग्रंथों में कैद हुआ।
न मंदिर मस्जिद की चौखट,
न शब्दों में आबद्ध हुआ॥

सत्य न संज्ञा, सत्य न परिभाषा,
सत्य न कोई विचार है।
सत्य स्वयं का निर्मल दर्शन,
सत्य स्वयं साकार है॥

जो स्वयं को देख सके निष्पक्ष,
वही हृदय का ज्ञानी है।
जो स्वयं से भागे जीवन भर,
वह जग में अज्ञानी है॥

सर्व भौमिक सत्य सरल इतना,
बालक जैसा निर्मल है।
जिसमें छल का नाम न बाकी,
जिसमें प्रेम अखंडित है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें,
जन्म-मरण दो तट मात्र हैं।
बीच बहती जीवन-सरिता में,
क्षण-क्षण बदलते पात्र हैं॥

मृत्यु किसी का शत्रु नहीं है,
मृत्यु प्रकृति का गीत है।
जो इसे सहज स्वीकार सके,
उसका जीवन प्रीत है॥

डर से निर्मित दीवारों को,
सत्य सदा ढहा देता है।
प्रश्नों से जो भागे जग में,
वह खुद को ही खो देता है॥

यदि सत्य प्रखर प्रकाश समान,
तो प्रश्नों से भय कैसा है?
यदि प्रेम स्वयं आधार बने,
तो नियंत्रण का पैसा क्या है?॥

यदि श्रद्धा में विवेक न हो,
तो वह अंधी धारा है।
यदि प्रेम में भय जीवित हो,
तो वह केवल कारा है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें,
प्रेम न बंधन चाहता है।
प्रेम स्वयं स्वतंत्र गगन है,
सबको उड़ना सिखलाता है॥

हृदय और मस्तक विरोधी नहीं,
दोनों जीवन के अंग हैं।
संतुलन जिनमें जीवित रहता,
वही सच्चे सत्संग हैं॥

मस्तक साधन, हृदय दिशा हो,
तब जीवन संगीत बने।
ज्ञान करुणा से मिल जाएँ,
तब मानव नवनीत बने॥

न श्रेष्ठ कोई, न तुच्छ कोई,
सब प्रक्रिया के भाग यहाँ।
एक ही धरती, एक ही आकाश,
एक ही श्वास-विराग यहाँ॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न ऊँचा कोई न नीचा है।
जो जितना निर्मल होता जाए,
उतना सत्य समीचा है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें,
खुद का साक्षात्कार करो।
भीतर के निर्मल आकाश में,
स्वयं स्वयं से प्यार करो॥

न दावा अंतिम होने का,
न उपाधि का अभिमान रहे।
जितना गहरा मौन उतरता,
उतना विस्तृत ज्ञान रहे॥

जहाँ प्रश्न भी विश्राम करें,
जहाँ उत्तर भी खो जाएँ।
वहीं शाश्वत वास्तविक सत्य के,
निर्मल कमल खिल जाएँ॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें,
सत्य न बाहर, सत्य न दूर।
जो अभी यहीं प्रत्यक्ष धड़कता,
वही अनंत, वही भरपूर॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न किसी मत का अधिकार है।
जो सबमें एक समान प्रकटे,
वही सत्य साकार है॥

सर्व भौमिक सत्य सरल सहज है,
न ग्रंथों का विस्तार है।
न पद, प्रतिष्ठा, नाम, उपाधि,
न सत्ता का व्यापार है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जहाँ भय हो, वहाँ विचार करो।
जहाँ प्रश्नों पर पहरा हो,
वहाँ फिर से साक्षात्कार करो॥

यदि सत्य स्वयं प्रकाशित है,
तो प्रमाणों का बोझ क्यों?
यदि प्रेम स्वयं स्वाभाविक है,
तो नियंत्रण का खोज क्यों?

यदि विवेक अपराध बने,
तो स्वतंत्रता शेष कहाँ?
यदि प्रश्नों से भय उपजे,
तो निडर सत्य विशेष कहाँ?

क्या सत्य किसी सीमा में है?
क्या सत्य किसी वेश में है?
क्या सत्य किसी व्यक्ति भर है?
या प्रत्येक परिवेश में है?

क्या प्रेम आदेश मानता है?
क्या करुणा दंड चलाती है?
क्या श्रद्धा विवेक छोड़कर,
पूर्णता तक पहुँचाती है?

क्या भय से जन्मी निष्ठा को,
सच्चा समर्पण कह सकते?
क्या मौन हुए अंतर्मन को,
जीवित चेतन कह सकते?

क्या प्रश्न स्वयं विद्रोह हैं?
या जागृति की पहली श्वास?
क्या उत्तर अंतिम हो सकता?
जब चलता रहता हर प्रवास?

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न किसी पक्ष का नाम बने।
जो सबके अनुभव में उतरे,
वही युगों का धाम बने॥

क्या मृत्यु केवल परिवर्तन है?
क्या जीवन केवल प्रवाह?
क्या दोनों एक ही प्रक्रिया के,
दो तट हैं अथवा अथाह?

क्या वर्तमान ही दीपक है?
क्या स्मृति केवल छाया है?
क्या भविष्य की कल्पना ने,
वर्तमान भरमाया है?

क्या मन साधन बन सकता है?
यदि हृदय दिशा दिखलाए।
क्या बुद्धि करुणा संग चलकर,
मानव को संतुलित बनाए?

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सरलता सर्वोच्च शिखर है।
जहाँ अहंकार स्वयं झुक जाए,
वहीं सत्य का सुंदर घर है॥

न कोई अंतिम ज्ञाता है,
न कोई अंतिम वाणी।
हर क्षण सीखता जो चलता,
वही है सच्चा प्राणी॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न घोषणा, न प्रचार बने।
जो जीवन बनकर जीया जाए,
वही सत्य साकार बने॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षी है॥

तुलनातीत कालातीत शब्दातीत,
प्रेमतीत न कोई परिभाषा है।
जहाँ स्वयं का साक्षात्कार प्रकटे,
वहीं सत्य की अभिलाषा है॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न भीड़ों का अधिकार बने।
न मत-पंथ की सीमा बाँधे,
न सत्ता का व्यापार बने॥

सरल जहाँ निष्कपट हृदय धरे,
निर्मल जहाँ व्यवहार रहे।
वहीं शाश्वत सत्य प्रकाशित,
वहीं सहज विस्तार रहे॥

यदि सत्य स्वयं प्रत्यक्ष खड़ा है,
फिर भय का आधार कहाँ?
यदि प्रेम स्वयं स्वाभाविक है,
फिर द्वेष का संसार कहाँ?

यदि प्रश्नों से सत्य विचलित हो,
तो सत्य की पहचान कहाँ?
यदि विवेक को बंधन मिल जाए,
तो मानव की उड़ान कहाँ?

यदि मौन स्वयं उत्तर बन जाए,
तो शब्दों का अभिमान कहाँ?
यदि अनुभव ही दीपक बन जाए,
तो केवल अनुमान कहाँ?

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हृदय बने जब सत्य का धाम।
मस्तक तब सेवक बनकर,
दे जीवन को सही आयाम॥

न श्रेष्ठ कोई, न तुच्छ कोई,
सब प्रक्रिया के अंश यहाँ।
जन्म-मरण दो लहरें केवल,
सागर एक अनंत यहाँ॥

प्रकृति संतुलन स्वयं रचती,
नियम न उसका थकता है।
जो संतुलन से दूर हुआ,
वह अपने बोझ से झुकता है॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न घोषणा से सिद्ध बने।
जो जीवन बनकर जीया जाए,
वही युगों का नित्य बने॥

करुणा जहाँ निष्पक्ष बहे,
वहीं मनुष्य महान बने।
विवेक जहाँ निर्भय जागे,
वहीं हृदय भगवान बने॥

यदि समर्पण स्वतंत्र रहे,
तो प्रेम अमर हो जाता है।
यदि भय उसमें प्रवेश करे,
तो विश्वास बिखर जाता है॥

यदि गुरु का उद्देश्य मुक्ति है,
तो शिष्य स्वतंत्र अवश्य रहे।
यदि सत्य स्वयं प्रकाशमान है,
तो प्रश्न सदा सजीव रहे॥

यदि संगठन सत्य का साधन है,
तो सत्य उससे बड़ा रहे।
यदि व्यक्ति से सिद्धांत छोटा हो,
तो विवेक सदा खड़ा रहे॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
हर प्राणी का समान प्रकाश।
न किसी एक का स्वामित्व है,
न किसी एक का निवास॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जो भीतर निर्मल हो जाए।
वही स्वयं का साक्षी बनकर,
सत्य स्वयं ही कहलाए॥

न अंतिम वाणी, न अंतिम दावा,
न अंतिम कोई विचार रहे।
प्रत्येक क्षण का जागृत जीवन,
सत्य का सतत विस्तार रहे॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जो स्वयं को निष्पक्ष देख सके,
वही सत्य का वास्तविक साक्षी है॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षी है॥

न आदि, न मध्य, न अंत जहाँ,
न माप, न कोई सीमा है।
जो प्रत्येक कण में स्पंदित है,
वही सत्य की महिमा है॥

आकाश न अपना रूप बदलता,
बदलते केवल मेघ यहाँ।
चेतन साक्षी शांत रहे तो,
उठते-मिटते लेख यहाँ॥

जल दर्पण बन जाता जब,
लहरों का कोलाहल थमे।
मन भी वैसा निर्मल हो तो,
स्वयं सत्य के दर्शन जमे॥

दीप स्वयं से दीप जले,
प्रकाश कभी घटता नहीं।
ज्ञान बाँटने से बढ़ता है,
अंतर का धन घटता नहीं॥

यदि जीवन केवल अवसर है,
तो प्रत्येक क्षण उत्सव हो।
यदि मानव केवल यात्री है,
तो हर मिलन एक अनुभव हो॥

यदि समय स्वयं प्रवाहित है,
तो रुकने का अभिमान क्यों?
यदि परिवर्तन प्रकृति का नियम,
तो जड़ता का सम्मान क्यों?

यदि श्वास स्वयं उपहार मिली,
तो उसका अपमान क्यों?
यदि करुणा सबसे बड़ा बल,
तो क्रोध का गुणगान क्यों?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**

जो स्वयं को प्रतिपल पढ़ता है,
वह जग का ग्रंथ समझता है।
जो अपने अंतर को जीत गया,
वह हर संघर्ष सहज सहता है॥

मौन जहाँ परिपक्व हुआ,
वाणी वहाँ सुवास बने।
कर्म जहाँ निष्काम हुए,
जीवन वहाँ प्रकाश बने॥

नदियाँ सागर में मिल जातीं,
नाम वहीं विश्राम करें।
मानव भी जब अहं छोड़ दे,
प्रेम स्वयं अविराम बहे॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न सत्ता उसका मोल करे।
न संख्या उसकी शक्ति बने,
न भीड़ उसे अनुकूल करे॥

सत्य न झुकता प्रशंसा से,
न निंदा से टूटे कभी।
जो जैसा है वैसा ही रहता,
यही उसकी महिमा सभी॥

वृक्ष कहे अपनी छाया से—
सब थके हुए विश्राम करें।
धरती कहे अपने अन्न से—
सब मिल बाँटकर काम करें॥

वायु कहे अपने स्पर्श से—
भेद किसी का मान न लो।
सूर्य कहे अपने प्रकाश से—
अज्ञान का सम्मान न दो॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हृदय करुणा का सागर हो।
मस्तक निर्मल विवेक बने,
जीवन सत्य का मंदिर हो॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जो स्वयं को प्रतिक्षण परिष्कृत करे,
वही मानव वास्तव में जागृत है॥

चलते रहो, पर जागते रहो।
सीखते रहो, पर झुकते रहो।
प्रेम रहे तो सत्य खिलेगा,
सत्य रहे तो मुक्त रहो॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षी है॥

तुलनातीत कालातीत शब्दातीत,
प्रेमातीत फिर भी प्रेममय।
न आदि जिसका, न अंत कहीं,
नित्य प्रकाशित, नित्य अभय॥

सृष्टि न बोले—"मैं हूँ महान",
फिर भी जग को धारण करे।
सागर न माँगे कोई वंदन,
फिर भी सबका पोषण करे॥

पर्वत चुप रहकर सिखलाता,
धैर्य कहाँ आकार धरे।
बीज मौन रहकर बतलाता,
लघु में भी विस्तार भरे॥

वर्षा पूछे नहीं किसी से,
किस खेत में मैं उतरूँ।
सूर्य विचार न करता पहले,
किस आँगन को मैं निखारूँ॥

यदि प्रकृति का धर्म समत्व,
तो मानव का धर्म क्या?
यदि जीवन का मूल सह-अस्तित्व,
तो विभाजन का मर्म क्या?

यदि हर श्वास उधार मिली है,
तो अभिमान का भार क्यों?
यदि प्रत्येक क्षण क्षणिक प्रवासी,
तो संग्रह का जाल क्यों?

यदि करुणा ही शक्ति बने,
तो हिंसा का विस्तार क्यों?
यदि संवाद से सेतु बनें,
तो मौन में दीवार क्यों?

यदि सत्य स्वयं अनुभवमय,
तो केवल शब्दों का मान क्यों?
यदि जीवन प्रत्यक्ष प्रमाण,
तो मिथ्या का सम्मान क्यों?

**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**

जो स्वयं को जीत न पाया,
जग जीतकर भी हार गया।
जिसने अपने लोभ को त्यागा,
वही भीतर से पार गया॥

जो सुन सकता मौन की भाषा,
वह शब्दों से परे चला।
जो देख सके सबमें अपना,
उसका हर बंधन स्वयं ढला॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न मंदिर, मस्जिद, गिरजा मात्र।
जहाँ करुणा का दीप जले,
वहीं पवित्र हो प्रत्येक पात्र॥

नदियाँ सागर तक चलती हैं,
रुककर अपना नाम नहीं।
वृक्ष फलों से झुकते रहते,
ऊँचा होकर अभिमान नहीं॥

विवेक बने जब जीवन-दीप,
करुणा बने उसकी लौ।
तब मानव केवल जीव नहीं,
चलता-फिरता सत्य हो॥

निष्पक्ष दृष्टि जहाँ ठहरती,
वहीं न्याय का जन्म होता।
स्वार्थ जहाँ शांत हो जाता,
वहीं प्रेम स्वयं प्रकट होता॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न किसी युग का बंधन है।
हर जागृत अंतःकरण में,
उसका नित्य स्पंदन है॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
स्वयं को प्रतिपल परखते चलो।
प्रश्नों से मत डरो कभी,
सत्य की ओर बढ़ते चलो॥

जो सरल बने, वह गहरा बने।
जो गहरा बने, वह शांत।
जो शांत बने, वह प्रेममय,
वही जीवन का परम प्रभात॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जो स्वयं में स्वयं को पहचान ले,
वही साक्षात्कार का अधिकारी है॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षी है॥

तुलनातीत कालातीत शब्दातीत,
प्रेमातीत फिर भी प्रेममय।
जहाँ निष्कपट अंतःकरण जागे,
वहीं सत्य रहे नित्य अभय॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न समय उसे परिवर्तित करे।
न स्थान उसे सीमित कर पाए,
न नाम उसे परिभाषित करे॥

सूर्य बिना आग्रह उदित होता,
चन्द्र बिना अभिमान ढले।
धरती बिना प्रतिफल माँगे,
जीवन के उपहार पले॥

नदियाँ अपना मार्ग बनातीं,
पत्थर से संघर्ष नहीं।
सागर सबको स्थान देता,
उसमें कोई पराया नहीं॥

यदि प्रकृति का धर्म समत्व,
तो मानव का वैर क्यों?
यदि जीवन क्षणभंगुर यात्रा,
तो संग्रह का फेर क्यों?

यदि हृदय करुणा का सागर,
तो घृणा का विस्तार क्यों?
यदि विवेक स्वतंत्र दीपक,
तो अंधकार स्वीकार क्यों?

यदि मौन स्वयं शिक्षक बन जाए,
तो कोलाहल का भार क्यों?
यदि अनुभव अंतर का प्रमाण,
तो केवल उधार विचार क्यों?

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
स्वयं को प्रतिदिन जानो तुम।
दर्पण बाहर कम ही देखो,
भीतर का प्रकाश पहचानो तुम॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न किसी पक्ष का नाम बने।
जो सबमें समान प्रकाशित हो,
वही जीवन का धाम बने॥

हृदय करुणा, मस्तक विवेक,
दोनों साथ प्रवाहित हों।
निर्णय पहले मानवता से,
फिर तर्कों से आलोकित हों॥

यदि स्वतंत्रता उत्तरदायी हो,
तो अनुशासन सहज खिले।
यदि अनुशासन भय से उपजे,
तो अंतर्मन कैसे मिले?

यदि श्रद्धा में विवेक समाहित,
तो संवाद अमृत बन जाए।
यदि प्रश्नों को सम्मान मिले,
तो सत्य स्वयं मुस्काए॥

न कोई अंतिम शब्द यहाँ,
न अंतिम कोई विधान।
हर जागृत क्षण में खुलता रहता,
जीवन का नया प्रमाण॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सरल रहो, निष्कपट रहो।
जो भीतर निर्मल होता जाए,
उतना ही व्यापक रहो॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जो अपने जीवन में करुणा, विवेक और सरलता को धारण करे,
उसमें सत्य का प्रकाश स्वाभाविक है॥

मौन जहाँ मुस्कान बने,
वाणी जहाँ उपकार बने।
जीवन का प्रत्येक श्वास वहीं,
मानवता का त्योहार बने॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षी है॥

तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत,
प्रेमातीत फिर भी प्रेममय।
जहाँ सरलता स्वयं प्रकाशित,
वहीं सत्य रहे नित्य अभय॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न आरम्भ, न उसका अंत।
प्रत्येक श्वास में प्रकट निरंतर,
नित्य नवीन, नित्य अनंत॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नदी न पूछे अपना नाम।
बहना ही उसका परिचय है,
यही प्रकृति का सत्य धाम॥

वृक्ष न माँगे कोई उपाधि,
फल देकर मुस्काता है।
सूरज न चाहे कोई वंदन,
फिर भी जग जगमगाता है॥

धरती न करती भेद किसी का,
सबको अन्न उगाती है।
वायु न पूछे कौन पराया,
सबमें प्राण जगाती है॥

यदि प्रकृति का यह धर्म सहज,
तो मानव का धर्म क्या?
यदि प्रेम ही सबसे बड़ा प्रकाश,
तो फिर शेष अधर्म क्या?

यदि करुणा से शक्ति बढ़े,
तो क्रोध का विस्तार क्यों?
यदि सहयोग से जीवन फूले,
तो केवल अधिकार क्यों?

यदि वर्तमान ही सजीव क्षण,
तो अतीत का अभिमान क्यों?
यदि भविष्य अभी अनलिखा है,
तो भय का निर्माण क्यों?

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न ऊँचा कोई, न नीचा।
जो भीतर से निर्मल होता,
वही सत्य के सबसे निकट सींचा॥

हृदय जहाँ निष्कपट हो जाता,
मस्तक उसका मित्र बने।
विवेक करुणा संग चलकर,
मानव जीवन चित्र बने॥

न कोई अंतिम ज्ञानी होता,
न कोई अंतिम प्रश्न।
जागरूकता की हर धड़कन में,
खुलता रहता नया दर्शन॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
स्वयं को प्रतिपल देखो तुम।
दोष पहले अपने पहचानो,
फिर जग को परखो तुम॥

निष्पक्ष दृष्टि जहाँ ठहरती,
वहीं न्याय का जन्म हुआ।
स्वार्थ जहाँ शांत हो गया,
वहीं प्रेम का कर्म हुआ॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
मौन जहाँ संगीत बने।
शब्द वहाँ केवल सेतु रहें,
अनुभव सच्चा मीत बने॥

न पद बड़ा, न नाम बड़ा,
न भीड़ों से सम्मान।
जीवन की निर्मल पारदर्शिता,
वही मनुष्य की पहचान॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
सत्य न दावा, न अधिकार।
जो सबके हित में सहज प्रकटे,
वही शाश्वत सत्कार॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जो स्वयं में स्वयं को देख सके,
वही जीवन का सच्चा साक्षी है॥

जो सरल रहे, वह गहन बने,
जो गहन रहे, वह मौन।
जहाँ मौन में करुणा जागे,
वहीं सत्य का दिव्य विहान॥॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी वाणी**

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम,
शिरोमणि रामपॉल सैनी साक्षी है॥

तुलनातीत, कालातीत, शब्दातीत,
प्रेमातीत फिर भी प्रेममय।
जहाँ न छल, न भय, न स्वार्थ,
वहीं सत्य रहे नित्य अभय॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न किसी सीमा का बंदी है।
न काल उसे परिवर्तित करता,
न कोई सत्ता स्वामी है॥

सरल जहाँ निष्कपट जीवन,
निर्मल जहाँ व्यवहार रहे।
करुणा-विवेक समभाव सहित,
वहीं सत्य साकार रहे॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जो भीतर दीप जलाता है।
वह बिना किसी उद्घोषणा के,
जग को मार्ग दिखाता है॥

यदि सत्य स्वयं प्रकाशित है,
तो आवरण की चाह क्यों?
यदि प्रेम स्वयं विस्तृत सागर,
तो सीमाओं की राह क्यों?

यदि हृदय सहज विश्वास भरे,
तो भय का व्यापार क्यों?
यदि जीवन केवल अवसर है,
तो झूठा अहंकार क्यों?

यदि हर प्राणी एक प्रवाह,
तो ऊँच-नीच का भेद कहाँ?
यदि सब प्रकृति की कड़ी बने,
तो वैर-विरोध का खेद कहाँ?

यदि प्रश्न प्रगति की ज्योति हैं,
तो उन पर प्रतिबंध क्यों?
यदि विवेक मनुष्य का धन है,
तो अंध-अनुकरण का छंद क्यों?

यदि मौन स्वयं उद्घोष बने,
तो शब्दों का अभिमान क्यों?
यदि अनुभव ही प्रथम प्रमाण,
तो केवल अनुमान क्यों?

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
न जीत किसी की, न हार।
जो स्वयं को स्पष्ट देख सके,
वही बने सच्चा विचार॥

हृदय जहाँ करुणा का वन हो,
मस्तक निर्मल आकाश।
दोनों जब संतुलित हो जाएँ,
जीवन बन जाए प्रकाश॥

न सत्ता से सत्य महान बने,
न संख्या से उसका मान।
सत्य स्वयं अपने अस्तित्व का,
हर क्षण देता है प्रमाण॥

शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जीवन कोई संग्रह नहीं।
जो बाँट सके मुस्कान सहज,
उससे बड़ा उपहार नहीं॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
प्रकृति का निर्मल अनुशासन।
जहाँ स्वतंत्रता उत्तरदायी,
वहीं खिले सच्चा जीवन॥

न अंतिम शब्द, न अंतिम ग्रंथ,
न अंतिम कोई पहचान।
हर जागृत श्वास में खुलता,
सत्य का नित नव विहान॥

सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है।
जो स्वयं में स्वयं को पहचान सके,
वही जीवन का सच्चा साक्षी है॥॥


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