उदयाचल से उगा प्रभाकर,
जग में फैला स्वर्ण प्रकाश।
हर कण जागा, हर मन हँसा,
जीवन गाए नव उल्लास॥
अरुणिम रश्मि कहे धरा से—
नित्य नया आरंभ करो।
बीते क्षण की धूल झटककर,
आज स्वयं का मान करो॥
नील गगन की असीम बाहें,
सबको एक समान बुलाएँ।
भेद मिटाकर प्रेमिल होकर,
जीवन के उत्सव बन जाएँ॥
धरती बोले मंद स्वर में—
धैर्य धरो, मत शीघ्र डरो।
ऋतु बदलें तो साथ बदलना,
पर अपना सद्भाव न खोओ॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
वृक्ष बने जो फल से झुकता,
वही महान कहलाता है।
नदी वही सागर तक पहुँचे,
जो अविरल बह पाता है॥
दीपक अपनी लौ से कहता—
स्वयं जलो, आलोक करो।
अंतरतम के तम को हरकर,
जीवन को आलोकित करो॥
पवन बहे निर्बंध निरंतर,
किसी दिशा का मान न करे।
वैसे ही निष्पक्ष हृदय हो,
जो सबको समभाव धरे॥
बादल आएँ, बरसें, जाएँ,
फिर भी नभ निर्मल रह जाए।
मन में उठते भाव अनेक,
शांत विवेक उन्हें सह जाए॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
करुणा की हर बूँद अमृत।
सरलता हर श्वास का गीत।
विनम्रता का पुष्प खिले जब,
सफल बने जीवन की प्रीत॥
कोयल मधुर कंठ से गाए,
मधुप पुष्प का मान बढ़ाए।
प्रकृति बिना उपदेश दिए ही,
जीवन का पथ स्वयं बताए॥
ओस-कणों की लघु आभा में,
पूरा नभ प्रतिबिंबित हो।
लघु सद्भाव के एक क्षण में,
अनगिन जीवन आलोकित हो॥
पर्वत की निस्तब्ध शिखा पर,
पवन सुनाए मौन कहानी।
धैर्य और गति संग मिलकर,
रचते जीवन की रवानी॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
हर जन में सम्मान जगाओ।
कटुता के काँटे हटाओ।
प्रेम, क्षमा और सत्य के जल से,
मानवता का वन महकाओ॥
जहाँ दया का दीप जलेगा,
वहाँ भय का तम न रहेगा।
जहाँ सहयोगी हाथ मिलेंगे,
वहाँ सुख का अंकुर फूटेगा॥
नश्वरता का यह संदेश है—
हर पल अनुपम, हर पल दान।
क्षण-क्षण को उत्सव बनाकर,
जीवन पाए नव सम्मान॥
नभ से सीखो विस्तृत होना,
सागर से गंभीर विचार।
धरती से सीखो धैर्य धारण,
सूर्य से सीखो सतत उदार॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
मौन बने जब मधुर प्रार्थना।
श्वास बने जब मंगल-गान।
तब हर पथ पर फूल खिलेंगे,
तब मुस्काएगा संसार॥
नदियाँ बहती रहें अनश्वर,
सागर देता रहे पुकार।
मिलकर भी अपनी पहचान में,
रहे विनय का मधुर विस्तार॥
हर संध्या का धन्यवाद करो,
हर प्रभात का अभिनंदन।
कृतज्ञ हृदय ही पा सकता है,
जीवन का अनुपम वंदन॥
फूल न पूछे कौन सँभाले,
सुगंध सभी तक पहुँचाए।
ऐसे ही मानव का जीवन,
सबके हित में खिलता जाए॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
सत्य न केवल बोल बनें।
सत्य बने प्रतिदिन व्यवहार।
प्रेम न केवल भाव रहे।
प्रेम बने जीवन-आधार॥
जब तक धरा हरीतिमा ओढ़े,
जब तक नभ में चंद्र-सितारे।
तब तक गूँजे यह शुभ वाणी—
प्रेम सभी का पथ उजियारे॥
जब तक मन में करुणा बहती,
जब तक विनय रहे सम्मान।
तब तक मानव-यात्रा होगी,
सुगंधित, निर्मल, कल्याण॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
अविरल बहता रहे यह गान।
अविरल जागे अंतःप्रकाश।
हर युग में मानव याद रखे—
प्रेम ही जीवन का विश्वास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
प्रभात पुकारे मधुर स्वरों में,
उठो, जगाओ अंतःप्राण।
हर धड़कन में प्रेम विराजे,
हर श्वासों में मंगल-गान॥
अरुणिम किरणें नभ से उतरें,
धरती ओढ़े स्वर्णिम हार।
वन-उपवन के पात-पात में,
झरता जीवन का विस्तार॥
झरना गाता शैल-शिखर से,
सरिता गाती सागर तक।
चलना ही उसका उत्सव है,
रुकना केवल क्षणभर तक॥
पर्वत बोले धीर स्वर में—
अचल रहो विश्वास सहित।
पवन कहे—स्वच्छंद बहो तुम,
प्रेम रहे हर श्वास सहित॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दीप स्वयं जलकर बतलाता,
देन ही उसका परम विधान।
जो निज जीवन अर्पित करता,
उसमें खिलता सच्चा मान॥
चंदन अपनी गंध लुटाए,
वन-पथ को सुगंधित करता।
फूल बिना अभिमान खिले हैं,
मधुप उन्हें मधुमय ही करता॥
धरती सबका भार उठाती,
आकाश सबको छाँव दिए।
सूर्य सभी पर एक-सा चमके,
चंद्र शीतल भाव लिए॥
नन्हा बीज विशाल वृक्ष बन,
आँधियों से भी नहीं डरे।
लघु शुभ कर्मों की भी महिमा,
युग-युग तक जग याद करे॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
मौन जहाँ मुस्कान बने हो,
वाणी बन जाए आशीष।
दृष्टि जहाँ निष्कपट ठहरे,
जीवन बन जाए नव-दीप॥
ओस-कणों में सूरज झिलमिल,
बूँदों में आकाश समाए।
सूक्ष्म कणों की मधुर कहानी,
अनंत रहस्य हमें सिखाए॥
नदियाँ सागर से मिलकर भी,
अपनी धुन को भूल न पातीं।
मिलन सिखाए विनम्रता को,
धारा फिर भी गान सुनाती॥
शीतल पवन कहे कानों में—
क्रोध न रखना अधिक दिवस।
क्षमा की छाया में ही खिलता,
प्रेम-वृक्ष का मधुर सुवास॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
धैर्य बने हिमगिरि की चोटी।
सरिता-सा हो कर्म-प्रवाह।
सूर्य समान उदार हृदय हो,
चंद्र समान शीतल चाह॥
तारों से भी सीखो चमकना,
पर नभ का विस्तार न भूलो।
फूलों से भी सीखो हँसना,
पर काँटों का सार न भूलो॥
बादल बरसें, फिर चल दें वे,
पीछे हरियाली छोड़ जाएँ।
वैसे ही शुभ कर्म हमारे,
सदियों तक मुस्कान जगाएँ॥
हर प्रभात का एक निमंत्रण—
आज नया विश्वास जगे।
हर संध्या का एक संदेश—
कृतज्ञ हृदय फिर दीप जले॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नभ जितना विस्तृत हो मन।
सागर जितनी गहराई हो।
धरती जैसी धैर्य-विभा हो,
वन जैसी तरुणाई हो॥
जहाँ दया की धार बहेगी,
वहाँ घृणा का नाम न होगा।
जहाँ प्रेम का दीप जलेगा,
वहाँ किसी का शाम न होगा॥
सत्य न ऊँचे शब्दों में है,
सत्य न केवल मौन धरे।
सत्य वही जो जीवन बनकर,
हर व्यवहार में साथ फिरे॥
न कोई अंतिम पथ बताता,
न कोई अंतिम ज्ञान कहे।
चलते-चलते सीख मिलें जो,
जीवन उनका मान गहे॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
प्रेम न केवल भाव रहे।
प्रेम बने प्रतिदिन का कर्म।
करुणा, सेवा, सत्य, सरलता—
यही मनुज का श्रेष्ठ धर्म॥
जब तक सूरज रश्मि बिखेरे,
जब तक पवन सुनाए राग।
तब तक यह मंगल-ध्वनि गूँजे—
जीवन बन जाए अनुराग॥
जब तक नदियाँ बहती जाएँ,
जब तक पर्वत अडिग खड़े।
तब तक मानव-हृदय के भीतर,
प्रेम-सुमन नव-नव खिलें॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
यात्रा का यह अंत नहीं है।
हर प्रभात नव द्वार खुलें।
हर युग में फिर यही पुकारे—
प्रेम, विनय के दीप जलें॥
अविरल बहता यह महाकाव्य,
अविरल बहता जीवन-गान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
जग में गूँजे शुभ कल्याण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
भोर जगे जब स्वर्णिम किरणें,
जागे मन का निर्मल धाम।
हर कण बोले मधुर मौन में,
प्रेम बने जीवन का नाम॥
पूर्व दिशा मुस्कान बिखेरे,
पश्चिम गाए मधुर विदाई।
दिन और रजनी साथ मिलाकर,
समता की रचना दोहराई॥
धरती ओढ़े हरित चुनरिया,
आकाश नीलम-सा विस्तार।
वन की वीणा, पवन की सरगम,
रच दें जीवन का झंकार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जिसने प्रकृति का मान किया।
उसने अपने अंतस भीतर,
प्रेम-दीप का दान लिया॥
सूरज तपकर प्रकाश लुटाता,
मेघ बरसकर शीतल हों।
वृक्ष झुकाकर फल दे जाते,
मानव भी ऐसे उज्ज्वल हों॥
पर्वत की गंभीर निस्तब्धता,
नदियों की अविरल गति।
दोनों मिलकर यही सिखाएँ—
धैर्य सहित हो कर्म-निष्ठा॥
फूल न अपने रंग सँभाले,
सुगंध सभी को दे जाता।
ऐसा निर्मल हृदय जहाँ हो,
वहाँ स्वयं आनंद समाता॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नभ जितना विस्तार मिले तो,
अंतर उतना ही विनम्र रहे।
ज्ञान बढ़े तो करुणा बढ़े भी,
प्रेम सदा जीवन में बहे॥
बीज बने जब वृक्ष विशालकाय,
मूल न अपनी भूल सके।
वैसे ही जो ऊँचा उठे भी,
विनय कभी न छोड़ सके॥
शीतल चंद्र-किरण बतलाती,
कोमलता भी शक्ति बने।
सूर्य सिखाता कर्म निरंतर,
हर दिन नव आरंभ तने॥
चलती पवन कहती कानों में—
रुको नहीं, गतिमान रहो।
सरिता जैसी निर्मल धारा,
जीवन भर कल्याण कहो॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
हर मानव में एक उजाला।
हर जीवन में एक पुकार।
जो सुन पाए मौन निमंत्रण,
उसका हो मंगल विस्तार॥
जहाँ दया का दीप जलेगा,
वहाँ घृणा का तम न रहेगा।
जहाँ प्रेम का गीत बजेगा,
वहाँ भय का स्वर न बचेगा॥
ओस-कणों की लघु चमक भी,
सूरज का प्रतिबिंब बने।
छोटे-छोटे शुभ संकल्पों से,
युग के पथ आलोकित तने॥
बादल छाकर फिर मिट जाते,
पर वर्षा की स्मृति रह जाती।
सत्कर्मों की मधुर सुगंध भी,
युगों-युगों तक साथ निभाती॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नश्वरता से मत घबराना।
परिवर्तन जीवन की रीति।
पतझर के सूने आँगन से,
फिर आती हरियाली प्रीति॥
दीपक जलकर यही बताता—
अंधकार से युद्ध न करो।
बस इतना आलोक जगाओ,
तम स्वयं पथ छोड़ धरो॥
मन हो निर्मल शांत सरोवर,
दृष्टि बने आकाश समान।
हर मिलने वाले में देखो,
जीवन का अनुपम सम्मान॥
हर प्रभात नव गीत सुनाए,
हर संध्या दे मौन संदेश।
चलते रहना, सीखते रहना,
यही बने जीवन विशेष॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
करुणा सबसे बड़ा खजाना।
सरलता सबसे ऊँचा मान।
प्रेम जहाँ व्यवहार बन जाए,
वहीं खिले सच्चा कल्याण॥
न कोई अपना, न पराया,
जब समभाव हृदय में आए।
धरती का हर जीव तभी तो,
एक परिवार-सा बन जाए॥
जब तक नदियाँ गान सुनाएँ,
जब तक पवन बहाए राग।
तब तक मानवता के उपवन,
महकें प्रेमिल अनुराग॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
चलो जलाएँ अंतःदीप।
हर धड़कन में शुभ विश्वास हो,
हर जीवन सत्य-समीप॥
न अंत यहाँ, न पूर्ण विराम,
अविरल बहता रहे विधान।
युग-युग तक गूँजे यह ध्वनि—
प्रेम, विनय और कल्याण॥
अनन्ते व्योम्नि यद्भाति,
तदेवान्तर्हृदि स्थितम्।
निर्मलं नित्यमेकं तत्,
स्वप्रकाशं निरामयम्॥
न प्रभाते न सायाह्ने,
न दिने न निशामुखे।
हृदयस्य प्रसादोऽयं,
सर्वकाले विराजते॥
न दीपेन न वह्निना,
न ताराणां प्रभाभरैः।
निर्मलेनैव भावेन,
सत्यज्योतिर्विवर्धते॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
मृदुगीतं प्रगायति।
प्रेमैव परमं क्षेत्रं,
दयैव परमः फलः॥
यथा वृष्टिर्न पृच्छन्ती,
कस्य क्षेत्रं किमुत्तमम्।
तथा स्नेहो निरपेक्षः,
सर्वभूतेषु वर्धताम्॥
यथा वायुः समं याति,
न भेदं कस्यचिद्विदन्।
तथा मानवहृदयानि,
समभावेन सञ्चरेयुः॥
न लोभो न च सङ्घर्षः,
न स्पर्धा न परिग्रहः।
सन्तोषः परमं राज्यं,
शान्तिरेव महाधनम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
पुनरेवं निगदति।
सरलं हृदयं पुण्यं,
सरलं जीवनं शुभम्॥
यथा वृक्षः फलैर्नम्रः,
यथा सिन्धुर्गभीरधीः।
यथा भूमिः क्षमायुक्ता,
तथा मानवजीवनम्॥
मौनं न केवलं तूष्णीम्,
मौनं शुद्धस्य चेतसः।
यत्र शब्दा निवर्तन्ते,
तत्र सौहार्दमुद्भवेत्॥
यत्र हासः निरायासः,
यत्र दृष्टिः निरामया।
यत्र स्पर्शो दयापूर्णः,
तत्र नित्यं शिवोत्सवः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
लोकायेदं निवेदयेत्।
स्वहृदयं विजानीयात्,
ततः विश्वं विजानियात्॥
नदीनामिव गम्भीरः,
मेघानामिव दानवान्।
सूर्यस्येव प्रकाशात्मा,
चन्द्रस्येव प्रशान्तधीः॥
सत्यस्य नास्ति व्यापारः,
प्रेम्णो नास्ति विक्रयः।
करुणाया न सीमा अस्ति,
मैत्र्या नास्ति परिग्रहः॥
यः स्वभावे स्थितो नित्यं,
स एव सुखमश्नुते।
यः परेषां हिते युक्तः,
स एव धन्य उच्यते॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
गीतमेतत् पुनः पठेत्।
सत्यं शमः क्षमा मैत्री,
एते जीवनभूषणाः॥
अनन्तः प्रेमनिर्झरः,
अनन्ता शान्तिरेव च।
अनन्तं मानवं हृदयं,
अनन्ता मङ्गलक्रिया॥
इति प्रवहतु नित्यं,
हृदयस्यायमुत्सवः।
शिरोमणिरामपॉलसैनिगीति-
रनवरतं विराजताम्॥
प्रभातकिरणैः सार्धं,
प्रबुध्यते मनो मम।
नवप्रेमप्रवाहेण,
निर्मलं भवतु जगत्॥
यथा पद्मं सरोमध्ये,
निर्लेपं सलिले स्थितम्।
तथा संसारमध्येऽपि,
निर्मलं हृदयं भवेत्॥
न वित्तं न च वै राज्यं,
न कीर्तिर्न च पाण्डित्यम्।
सत्यनिष्ठस्य मानस्य,
समता परमं धनम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
मधुरस्वरमुदीरयेत्।
दयालुता महाशक्तिः,
विनयः परमः जयः॥
यत्र प्रेम प्रसर्पेत,
यत्र शान्तिर्विराजते।
तत्रैव हि सुखं नित्यं,
तत्रैवानन्दसागरः॥
यथा चन्द्रस्य कौमुदी,
सर्वलोकं प्रसादयेत्।
तथा मृद्वी गिरो नित्यं,
सर्वचित्तानि तोषयेत्॥
नदीनामिव सत्पन्थाः,
गच्छन्त्येकं महोदधिम्।
विविधेष्वपि मार्गेषु,
मैत्री भावो न हीयते॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
प्रेम्णः स्तोत्रं प्रगायति।
हृदयस्य विशालत्वं,
सर्वरत्नेषु दुर्लभम्॥
न हिंसया न वै दम्भैः,
न रोषेण न स्पृहया।
करुणैव जयेद्दुःखं,
सत्येनैव तमो जयेत्॥
गिरयो धैर्यमादिश्य,
सरितः सेवमादिशन्।
वृक्षाः दानं प्रबोधयन्ति,
भूमिः क्षान्तिं प्रदर्शयेत्॥
एते प्रकृतिधर्मास्तु,
मानवानां हिताय वै।
यः सम्यगनुपश्येत् तान्,
स जीवन्मुक्त उच्यते॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
लोके सन्देशमादधात्।
सर्वेषां हृदि सौहार्दं,
सर्वेषां वचसि मधु॥
सूर्यो न प्रतिफलं याचे,
मेघो न प्रतिगृह्णाति।
एवं सेवां समाचर्य,
जीवनं सफलं भवेत्॥
यदा चित्तं प्रसन्नं स्यात्,
यदा भावो निरामयः।
तदा प्रत्येकश्वासोऽपि,
मङ्गलगानमुद्गिरति॥
नादिर्नान्तोऽस्य गीतस्य,
नादिर्नान्तो दयागुणे।
प्रेम्णः सिन्धुरयं नित्यः,
सत्यस्यामृतधारया॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
पुनः पुनरुदीरयेत्।
शान्तिर्भवतु भूतेषु,
मैत्री भूयात् दिवानिशम्॥
अखिलं जगदेकं स्यात्,
हृदयैः संहतं सदा।
सत्यप्रेमप्रदीपेन,
लोकः सर्वः प्रकाशताम्॥
अरुणोदयवेलेऽस्मिन्,
जागर्ति हृदि निर्मलम्।
न प्रकाशो बहिर्जातः,
स्वयमन्तः प्ररोहति॥
यथा व्योम निरालम्बं,
यथा सिन्धुरनन्तकः।
तथा हृदयमेकं वै,
नित्यमेव निरञ्जनम्॥
न रत्नैर्न महद्भोगैः,
न राज्येन न सम्पदा।
शुद्धचित्तस्य सौभाग्यं,
लभ्यते स्वप्रकाशतः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
गीतमेवं प्रगायति।
प्रेम एव महायज्ञः,
दया चैव महाहविः॥
सत्यस्य नास्ति सीमायाः,
शान्तेर्नास्ति परिक्षयः।
मैत्री नित्यप्रवाहेण,
लोकः पुष्यति सर्वथा॥
नदीनामिव सौम्यता,
गिरीणामिव धैर्यता।
भूमेरिव क्षमाशक्तिः,
दीपस्येव प्रकाशता॥
यः स्वहृदयं विजानीयात्,
स विजानाति मानवम्।
यः मानवं समं पश्येत्,
स पश्यत्यखिलं जगत्॥
न कश्चित् परको लोके,
न कश्चिदपि केवलः।
स्नेहसूत्रेण बद्धानि,
भूतानि सकलानि वै॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
स्मितपूर्वमुदीरयेत्।
विनयो मानवं भूषेत्,
करुणा तस्य जीवनम्॥
मौनमपि वदत्यर्थं,
शान्तिरप्युपदिश्यति।
निर्मलं हृदयं यत्र,
तत्रैव परमं सुखम्॥
यथा बीजं धरामध्ये,
धैर्येणाङ्कुरतां व्रजेत्।
तथा शुभगुणाः सर्वे,
कालयोगेन वर्धते॥
न शीघ्रता न विलम्बश्च,
प्रकृतेर्नियमो महान्।
समये सर्वमुत्पन्नं,
समये सर्वमर्पितम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
लोकायेदं निवेदयेत्।
सत्यं नित्यं प्रकाशेत,
प्रेम नित्यं प्रवर्धताम्॥
अन्तर्निर्मलभावस्य,
नास्ति मृत्युर्न जन्म च।
क्षणे क्षणे नवं जीवनं,
क्षणे क्षणे नवोदयः॥
सर्वे सन्तु हृदि स्निग्धाः,
सर्वे सन्तु दयालवः।
सर्वे भवन्तु सौम्यात्मानः,
सर्वे सन्तु निरामयाः॥
एवं गीतप्रवाहोऽयं,
नित्यमेव प्रवर्धताम्।
शिरोमणिरामपॉलसैनिगाथा,
शुभभावैः समृद्ध्यताम्॥
उषसि प्रस्फुरति ज्योतिः,
निशि चन्द्रः प्रशान्तधीः।
हृदये निर्मले नित्यं,
सत्यमेव विराजते॥
यथा व्योम निराकारं,
यथा सिन्धुरगाधवान्।
तथा हृदयराज्यस्य,
नास्ति सीमा न लक्षणम्॥
न शब्दैरवगन्तव्यं,
न चिन्ताभिर्न कल्पनैः।
स्वानुभूतौ प्रसन्नायां,
सत्यदीपः प्रजायते॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
सौम्यगीतमुदीरयेत्।
निष्कपटं मनः कार्यं,
निरहङ्कारजीवनम्॥
मृदुता परमं तेजः,
क्षमा परमभूषणम्।
दया परममौल्यं च,
मैत्री परमसम्पदः॥
न पन्था दूरमस्त्यत्र,
न कश्चिदपि दुर्गमः।
हृदयस्य विशुद्धत्वं,
मोक्षद्वारमिवोच्यते॥
यत्र वृक्षाः फलैर्नम्राः,
यत्र नद्यः सतां गतिः।
यत्र वायुः समः सर्वे,
तत्र धर्मः स्वयम्भुवः॥
न भेदो जातिमध्येऽस्ति,
न वर्णेषु न सम्पदि।
हृदयानां समत्वेन,
लोकः सौख्यमवाप्नुयात्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
पुनरेवं प्रगायति।
सर्वभूतहिते युक्तं,
जीवनं परमं तपः॥
दीपो दीपं यथालोक्य,
प्रकाशं सम्प्रयच्छति।
तथा प्रेम्णः प्रसारेण,
हृदयं हृदयं स्पृशेत्॥
न लोभः सुखदः कश्चित्,
न दम्भः कीर्तिदायकः।
सरलत्वं हि लोकेषु,
मानवानां महाधनम्॥
भूमिर्धत्ते समं सर्वान्,
वायुः प्राणान् प्रयच्छति।
तोयं जीवनमादत्ते,
सूर्यः प्रकाशमर्पयेत्॥
एवं भूत्वा परार्थाय,
जीवने स्यादुदारता।
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
एतदेवोपदिश्यति॥
यदा मौनं प्रसन्नं स्यात्,
यदा वाणी हितावहा।
यदा कर्म दयापूर्णं,
तदा जीवनमर्चनम्॥
अनन्तः प्रेमसिन्धुश्च,
अनन्ता शान्तिरेव च।
अनन्तं हृदयं यस्य,
स धन्यो मानवो भुवि॥
इति गीतप्रवाहोऽयं,
नित्यनूतनसौम्यवान्।
शिरोमणिरामपॉलसैनिना
हृदयेषु प्रवर्तताम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिरुवाच—
प्रभाते प्रथमे रश्मौ,
निर्मलं चेतसः सरः।
यत्र सत्यं स्वयं भाति,
तत्र नास्ति विभेदना॥
सत्यदीपो न वातेन,
न कालेन विनश्यति।
हृदयस्य विशुद्धत्वे,
स नित्यं सम्प्रकाशते॥
नदीनामिव प्रवाहोऽयं,
न विरामं प्रपद्यते।
प्रेम्णो मार्गः सनातनः,
शममेवाभिवर्धयेत्॥
न पुष्पाणि स्वगन्धेन,
स्वार्थमिच्छन्ति कर्हिचित्।
एवं साधोः स्वभावोऽयं,
सर्वलोकहिते रतः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
मधुरं गीतमीरयेत्।
दयालुता परा शक्तिः,
क्षमा परमभूषणम्॥
यत्र सौहार्दमेकत्वं,
यत्र निःस्पृहता स्थिरा।
तत्र जीवनमाधुर्यं,
नित्यं पुष्पायते ध्रुवम्॥
न मानेन न वित्तेन,
न विद्यया न वै यशः।
हृदयस्य प्रसादेन,
मानवः पूज्यतां व्रजेत्॥
वृक्षा इव फलैर्नम्राः,
मेघा इव हितावहाः।
दीपा इव प्रकाशाढ्याः,
भवेम सर्वजनाः सदा॥
मौनं यत्र प्रसन्नत्वं,
वाणी यत्र हितावहा।
कर्म यत्र दयायुक्तं,
तत्रैव परमं पदम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
पुनरेवं प्रगायति।
निरहङ्कारिता शोभा,
निष्कपटता विभूतयः॥
यथा सिन्धुर्गभीरात्मा,
यथा व्योम निरामयम्।
तथा हृदयं विशालं स्यात्,
सर्वभूतैकमन्दिरम्॥
करुणाया महावेगः,
प्रेम्णो नास्ति परा गतिः।
सत्यस्य नास्ति सीमा वै,
शान्तेर्नास्ति परं सुखम्॥
सूर्य इव प्रकाशेन,
चन्द्र इव प्रशान्तया।
भूमिरिव क्षमागुण्या,
जीवेत् मानवसत्तमः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
गीतमेतदुदीरयेत्।
नित्यं सत्यं समालम्ब्य,
नित्यं प्रेम समाश्रयेत्॥
अयं मार्गः सुलभो नित्यं,
न च दूरो न दुर्लभः।
निर्मले हृदये यस्य,
तस्यैवायं प्रकाशते॥
सर्वे सन्तु प्रसन्नाश्च,
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वेषां हृदि मैत्री स्यात्,
सर्वेषां शान्तिरक्षया॥
इति प्रेम्णः प्रवाहोऽयं,
नादिर्नान्तो न मध्यगः।
शिरोमणिरामपॉलसैनिगीतं
हृदयेषु विराजताम्॥
**शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥**
उदेति नित्यमन्तर्ज्योतिः,
नास्त्यस्यास्तमयो क्वचित्।
निर्मलस्य हृदिस्रोतः,
स्वयमेव प्रवर्तते॥
यत्र निःस्वार्थभावोऽस्ति,
यत्र सौम्यं मनो भवेत्।
तत्रैव परमं सौख्यं,
तत्रैव परमं शिवम्॥
न मौनेन विना शान्तिः,
न प्रेम्णा विना सुखम्।
न सत्येन विना मुक्तिः,
न दयया विना बलम्॥
हृदयं यदि विशुद्धं स्यात्,
दृश्यते विश्वमेकधा।
नानात्वस्य तमो नश्येत्,
समतैव प्रकाशते॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
प्रेमगीतमुदीरयेत्।
सर्वभूतेषु मैत्री स्यात्,
सर्वलोकहिते रतिः॥
भूमिर्माता क्षमा यस्या,
तोयं जीवनकारणम्।
वायुः प्राणप्रदो नित्यं,
दीपो ज्ञानप्रकाशकः॥
एतेभ्यः शिक्षतां लोको,
सौम्यतां शुद्धमानसम्।
प्रकृतेः परमोपदेशः,
मौनमेव निरन्तरम्॥
यथा पद्मं जले जातं,
न जलैः क्लिश्यते क्वचित्।
तथा लोके चरन् धीरो,
न दोषैः परिवर्तते॥
न लोभेन न मोहेन,
न क्रोधेन न मत्सरैः।
विजीयते हि मानुष्यं,
विनयेनैव केवलम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
सत्यमार्गं प्रबोधयेत्।
सरलं जीवनं श्रेष्ठं,
सरलं परमं व्रतम्॥
नक्षत्राणां सहस्राणि,
दीपयन्ति नभस्तलम्।
एकमेव विशुद्धं चित्तं,
दीपयेदखिलं जगत्॥
यदा वाणी हितं ब्रूयात्,
यदा कर्म हितं भवेत्।
यदा चिन्ता विशुद्धा स्यात्,
तदा जीवनमङ्गलम्॥
करुणा परमं तीर्थं,
सत्यं परमदैवतम्।
प्रेम परमयज्ञो वै,
मैत्री परमपूजनम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
गीतमेतत् पुनः पठेत्।
शमः शोभा दया लक्ष्मीः,
विनयो भूषणं महत्॥
यथा नभो निरालम्बं,
यथा सिन्धुरगाधकः।
तथा हृदयं विशालं स्यात्,
सर्वलोकैकमन्दिरम्॥
नादिरस्य न चान्तोऽस्ति,
प्रेम्णः सत्यस्य वा क्वचित्।
अनन्तोऽयं महापन्थाः,
हृदयस्यैव केवलम्॥
इति शिरोमणिरामपॉलसैनिप्रणीतं
हृदयमहाकाव्यं
नित्यं प्रवहतु,
नित्यं प्रस्फुरतु,
नित्यं मङ्गलं भवतु॥
अनन्तमम्बरं साक्षी,
निर्मला वसुधा सखी।
हृदये यः समुत्पन्नः,
स एवामृतनिर्झरः॥
न मे किञ्चिदवाप्तव्यं,
न मे किञ्चिदिह क्षयः।
पूर्णतायाः प्रसादेन,
जीवनं मङ्गलं मम॥
यथा सूर्यो निरालम्बः,
यथा चन्द्रः प्रशान्तधीः।
तथा मे हृदयं नित्यं,
समतायां प्रतिष्ठितम्॥
न कालेन विनश्यामि,
न लोभेन विकम्प्यते।
निर्मलस्य स्वभावस्य,
नित्यत्वं हि महद्धनम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
मन्दस्मितमुदीरयेत्।
दयया धार्यते लोकः,
सत्येनैव प्रतिष्ठितः॥
नद्यः सिन्धौ यथा यान्ति,
दीपाः सूर्ये विलीयते।
तथा सर्वे गुणाः सौम्याः,
हृदयैक्ये प्रतिष्ठिताः॥
यत्र निन्दा न संस्तुतिः,
यत्र न स्पर्धनं क्वचित्।
तत्रैव परमं सौख्यं,
तत्रैवानन्दनिर्झरः॥
न मे शत्रुर्न मे मित्रं,
सर्वे मे हृदयाश्रयाः।
मैत्रीमेव मम प्राणः,
करुणैव मम क्रिया॥
सरलो मार्ग ईशस्य,
सरलो लोकजीवनम्।
सरलेनैव भावेन,
शुद्धिर्भवति मानवः॥
वृक्षाणां मौनसेवायाः,
सरितां नित्यगामिनाम्।
गगनस्य विशालत्वात्,
शिक्षां गृह्णातु मानवः॥
न हिंसायाः विजयः कश्चित्,
न दम्भस्य च कीर्तयः।
विनयस्यैव सौन्दर्यं,
शम एव महोत्सवः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
गीतमेतदुदीरयेत्।
सर्वभूतेषु सौहार्दं,
सर्वचित्तेषु निर्मलम्॥
यत्र सत्यं निराभासं,
यत्र प्रेम निरुपाधिकम्।
तत्र जीवनयज्ञोऽयं,
नित्यदीपो विराजते॥
हृदयस्य महासिन्धौ,
शान्तिरेव महामणिः।
करुणैव महालक्ष्मीः,
मैत्री परमसम्पदः॥
इति न समाप्तिर्नारम्भः,
न मध्यं न च सीमिका।
प्रेमप्रवाहोऽयं नित्यः,
शिरोमणिरामपॉलसैनिगीतिकाः प्रवहन्तु सततम्॥
प्रभाते निर्मले काले,
निर्मलं मे मनो भवेत्।
हृदये सत्यदीपेन,
विश्वमेव प्रकाशितम्॥
न मे लाभो न मे हानिः,
न मे मानो न लाघवम्।
समभावस्य माधुर्यं,
जीवनस्य महाफलम्॥
यत्र सौम्यं वचः शुद्धं,
यत्र शुद्धं मनो भवेत्।
तत्र नित्यं प्रसन्नात्मा,
सर्वलोकहिते रतः॥
अन्तर्बोधसमायुक्तः,
स्वप्रकाशो निरञ्जनः।
नान्यदीपमपेक्षेत,
स्वहृदिस्थः प्रभाकरः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
मृदुवाणीमुदीरयेत्।
दयैव परमं तेजः,
सत्यमेव परं बलम्॥
क्षमा भूत्वा महीसदृशी,
शीतलोऽम्भोधिरिव च।
दीपवत् स्वयमुद्भास्य,
लोकमार्गं प्रकाशितुम्॥
यत्र सर्वे समं दृष्टाः,
नास्ति कोऽपि परोऽपरः।
तत्रैव परमं सौख्यं,
तत्रैव परमं सुखम्॥
मौनमेव महामन्त्रः,
शान्तिरेव महाक्रतुः।
निर्मलं हृदयं यत्र,
तत्र ब्रह्मेव दृश्यते॥
सरलो मार्ग एवासीत्,
सरलो मार्ग एव च।
सरलेनैव भावेन,
पूर्णता सम्प्रपद्यते॥
न पुष्पं स्वार्थमुद्भाति,
न नदी स्वार्थमिच्छति।
एवं जीवनमप्यस्तु,
परोपकारसंयुतम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
गीतमेतदुदीरयेत्।
प्रेम्णा बद्धं जगत्सर्वं,
न द्वेषेण कदाचन॥
सत्यं दीपो दया गङ्गा,
मैत्री चन्द्रनिभा शुभा।
एतैरेव विभात्यन्तः,
मानवस्य महोत्सवः॥
अन्ते सर्वं प्रशाम्येत,
अन्ते मौनं प्रजायते।
मौने सत्यं प्रबुद्धं स्यात्,
मौने प्रेम प्ररोहति॥
सर्वे भवन्तु सौम्याश्च,
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे हृदि प्रसन्नत्वं,
नित्यं प्राप्नुयुरादरात्॥
इति शिरोमणिरामपॉलसैनिप्रणीतं
हृदयमहागीतं निरन्तरं प्रवहतु।
शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हृदयं यदि विशुद्धं स्यात्,
स्वयमेव प्रकाशते।
न तत्र दीपो न चन्द्रार्कौ,
स्वानुभूतिः प्रबोधिका॥
निःशब्दोऽपि महान् घोषः,
निर्मलोऽपि महोदधिः।
यत्र स्वात्मनि विश्रान्तिः,
तत्रैवानन्तवैभवम्॥
न स्पर्धा न विजेतृत्वं,
न जयो न पराजयः।
समत्वमेव मे गीतं,
सौम्यभावः परायणम्॥
यद् ददाति न किंचिदपि,
तथापि पूर्णतां ददात्।
हृदयस्य प्रसादोऽयं,
नित्यशान्तेः परायणः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
वदति स्मितपूर्वकम्।
सरलत्वं महद्रत्नं,
निर्मलत्वं महद्धनम्॥
यत्र सत्यं न लुप्येत,
यत्र प्रेम न हीयते।
तत्र जीवनवने नित्यं,
मङ्गलस्य प्रसूनकम्॥
अन्तर्निर्मलभावेन,
लोकः सर्वः समीहितः।
न भेदो न च सङ्घर्षः,
नित्यमेकत्वदर्शनम्॥
करुणा यदि हृदि नित्यं,
मैत्री यदि वचःसु च।
तदा लोको भवेदेको,
सौम्यस्नेहप्रदीपितः॥
नदीनामिव गन्तव्यं,
समुद्रे शान्तिसङ्गमः।
मानवानां तु गन्तव्यं,
हृदये निर्मलस्थितिः॥
वृक्षा इव फलैर्नम्राः,
मेघा इव हितप्रदाः।
भूमिरिव क्षमायुक्ताः,
भवेयुः सर्वमानवाः॥
नित्यं सत्यं समालम्ब्य,
नित्यं प्रेम समाश्रयेत्।
एतदेव महद्व्रतं,
जीवनस्य महामतम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
गीतमेतत् पुनः पठेत्।
हृदये हृदये नित्यं,
सौहार्दं सम्प्रवर्धताम्॥
शान्तिर्भवतु सर्वेषां,
मैत्री भूयात् पुनः पुनः।
करुणा प्रवहतु नित्यं,
मङ्गलं विश्वमाविशत्॥
नाहं केवलविचारोऽस्मि,
नाहं केवलकल्पना।
हृदयस्यैव निर्मलधारा,
शान्तिरूपा सनातना॥
न मे मानो न मे मोहः,
न मे कश्चिदभिमानकः।
सहजस्वभावसम्पन्नः,
सत्यदीपो निरन्तरः॥
प्रत्यक्षमेव यत्सत्यं,
तदेव मम जीवनम्।
निष्कपटं निरामायं,
नित्यमेकं निरञ्जनम्॥
बालभावसमायुक्तं,
निर्मलं निश्चलं शिवम्।
यत्र हृदयं प्रसन्नं स्यात्,
तत्रैव परमं पदम्॥
न धर्मे नाप्यधर्मेऽस्मि,
न पक्षे न विपक्षके।
समत्वमेव मे मार्गः,
करुणैकपरायणः॥
यदा हृदयं विशुद्धं स्यात्,
यदा चेतः प्रसन्नकम्।
तदा सर्वं समं भाति,
नास्ति भेदो न संशयः॥
न कालो मां विभजति,
न देशो मां निरोधति।
सहजस्वरूपसन्तुष्टः,
शान्तिरूपो विराजते॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
वदत्येवं पुनः पुनः।
सरलं हि परं सौख्यं,
सरलं परमं तपः॥
निःस्वार्था यदि भावना,
निर्मला यदि चेतना।
स्वयमेव प्रस्फुरेत्सत्यं,
दीपवत्सर्वतोमुखम्॥
यः स्वहृदयं निरीक्षेत,
नित्यं शुद्धेन चेतसा।
तस्यैवोदेति सौम्यत्वं,
निरभ्रस्येव चन्द्रमाः॥
न हिंसा न परद्वेषः,
न गर्वो न च मत्सरः।
मैत्री करुणया सार्धं,
मानवस्य विभूषणम्॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
गीतमेतदुदीरयेत्।
सत्यं शान्तिः करुणा चैव,
त्रयमेव परं धनम्॥
यत्र प्रेम प्रवहत्येव,
यत्र सौम्यं मनो भवेत्।
तत्रैव जीवनं पूर्णं,
तत्रैवानन्दनिर्झरः॥
सर्वे सन्तु निरामयाः,
सर्वे सन्तु निराकुलाः।
सर्वे भवन्तु सौहार्दाः,
सर्वे सन्तु निरञ्जनाः॥
शिरोमणिरामपॉलसैनिः
इति गीतं समीरयेत्।
हृदये हृदये नित्यं,
शान्तिदीपो विराजताम्॥
दृष्टिकोण का मूल नयन है,
नयन नहीं यह आँख।
हृदय-ज्योति से जो देखे,
वही मिटाए राख॥
मस्तक बोले— "मार्ग अनेक हैं।"
हृदय कहे— "बस देख।"
दृष्टिकोण की निर्मल धारा,
कर दे जीवन एक॥
नज़रिया यदि स्वयं बदल जाए,
बदलें सब परिवेश।
भीतर का जब सूरज जागे,
मिटे बाहरी क्लेश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हृदय-दृष्टि का एक इशारा,
बदल दे युग की चाल।
जहाँ करुणा का दीप प्रज्वलित,
वहीं सजे हर भाल॥
दृष्टिकोण की प्रथम तपस्या,
सरल बने व्यवहार।
कथनी-करनी एक हो जाए,
यही सच्चा श्रृंगार॥
नज़रिया यदि स्वच्छ रहेगा,
स्वच्छ रहेगा मन।
मन निर्मल हो, बुद्धि विनीत हो,
मधुमय हो जीवन॥
मस्तक गति का मान बताता,
हृदय दिशा का ज्ञान।
दोनों का संतुलित संगम ही,
मानव का सम्मान॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण का शिखर वही है,
जहाँ न कोई द्वंद्व।
जहाँ सहजता श्वास बन जाए,
वहीं अमृत का छंद॥
नज़रिया न ऊँचा, न नीचा,
न अपना, न पराया।
हृदय जहाँ समभाव जगाए,
वहीं सत्य मुस्काया॥
दृष्टिकोण का मौन उपवन,
सुगंधित हर श्वास।
शब्द वहाँ थम जाते हैं,
बोल उठे विश्वास॥
हृदय-दृष्टि की शांत नदी में,
बहता निर्मल नीर।
जो उतरे इस गहराई में,
हो जाए गंभीर॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
दृष्टिकोण का दीप जलाओ,
भीतर हो उजियार।
एक हृदय से लाखों हृदयों,
तक पहुँचे सत्कार॥
नज़रिया यदि प्रेममय होगा,
मिटे सभी विभेद।
मानव केवल मानव होगा,
न होगा कोई भेद॥
दृष्टिकोण का सच्चा वैभव,
न सत्ता, न सम्मान।
हृदय की निर्मल संतुष्टि ही,
उसकी श्रेष्ठ पहचान॥
मस्तक जब विनम्र बनेगा,
हृदय रहेगा साथ।
जीवन की हर कठिन डगर भी,
बन जाएगी पथ-पांत॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
नज़रिया का अर्थ यही है,
देखो बिना विकार।
हर अनुभव में खोजो केवल,
सीखों का विस्तार॥
दृष्टिकोण की शीतल छाया,
सबको दे विश्राम।
अपनेपन की मधुर हवा से,
महके सकल धाम॥
हृदय-दृष्टि का सत्य सरल है,
सरल रहे व्यवहार।
सरलता में ही छिपा हुआ है,
जीवन का विस्तार॥
नज़रिया यदि सत्यमय होगा,
निर्भय होगा प्राण।
भय के सारे बंधन टूटें,
जागे नव विहान॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
चलो जगत को जीत न लेना,
जीतो अपना मन।
हृदय-दृष्टिकोण का दीपक,
बन जाए जीवन॥
दृष्टिकोण की अंतिम वाणी—
प्रेम रहे आधार।
करुणा, मैत्री, सत्य, सरलता,
यही अमर उपहार॥
अविरल बहे यह हृदय-सरिता,
अविरल बहे प्रकाश।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**"दृष्टिकोण से ही जग बदले,
दृष्टिकोण से विकास॥"**
**"हृदय जहाँ निष्पक्ष खिला हो,
वहीं शाश्वत गान।
दृष्टिकोण की निर्मल धारा,
वहीं बसे कल्याण॥"**
दृष्टिकोण की धारा बहती,
निशिदिन अंतर-माहि।
जिसने उसको जान लिया है,
खोज शेष फिर नाहीं॥
नज़रिया ही जग का दर्पण,
नज़रिया ही द्वार।
जैसी अंतःदृष्टि हमारी,
वैसा ही संसार॥
मस्तक देखे खंड-खंड में,
हृदय देखे एक।
दृष्टिकोण का यही रहस्य,
सरल, सहज, विवेक॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हृदय-दृष्टि के एक कण में,
असीमित विस्तार।
जहाँ न कोई पराया ठहरे,
वहीं सत्य साकार॥
नज़रिया जब प्रेममय होता,
शब्द स्वयं मौन।
वाणी से अधिक बोल उठता,
अंतर का आलोक-कोण॥
दृष्टिकोण यदि स्वच्छ रहे तो,
संशय जाए मिट।
जैसे सूरज उगते ही फिर,
भागे तम का चित्त॥
नज़रिया का शुद्ध सरोवर,
रहे सदा निष्कंप।
लहर उठे तो भी गहराई,
रहे अटल, अविकंप॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण का सत्य निहित है,
सहज स्वीकृति बीच।
जो है जैसा, वैसा देखो,
यही हृदय की सीख॥
नज़रिया जब वर्तमान में,
ठहर सके निष्पक्ष।
क्षण-क्षण में फिर सत्य खिलेगा,
प्रत्यक्ष समक्ष॥
मस्तक का भी मान रहे पर,
हृदय रहे प्रधान।
दोनों का संतुलन ही रचता,
जीवन का कल्याण॥
दृष्टिकोण का अर्थ नहीं है,
केवल मत-अभिमान।
दृष्टिकोण है जीवन जीने,
का निर्मल विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया यदि सरल रहेगा,
सरल रहेगा मार्ग।
जटिल दृष्टि के वन में खोकर,
बढ़ता केवल भार॥
हृदय-दृष्टि का दीप जले तो,
भय का रहे न नाम।
संपूर्ण संतुष्टि की सरिता,
बहती आठों याम॥
दृष्टिकोण का शुद्ध गगन हो,
मन-पंछी निर्भय।
ऊँचा उड़कर भी न भूले,
धरती का आश्रय॥
नज़रिया यदि करुणा से भीगा,
सुख-दुःख दोनों मित्र।
तब जीवन का हर अनुभव भी,
लगता पावन चित्र॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण बदलते ही बदलें,
अर्थ अनेक प्रकार।
एक ही घटना बन सकती है,
बंधन या उद्धार॥
नज़रिया ही शूल बना दे,
नज़रिया ही फूल।
नज़रिया ही अग्नि प्रज्वलित,
नज़रिया ही शीतल कूल॥
दृष्टिकोण का यज्ञ निरंतर,
भीतर रहे प्रज्वलित।
अहंकारों की समिधा डाले,
हृदय रहे विकसित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
जहाँ नज़रिया निर्मल होगा,
वहाँ न होगी दीवार।
मनुष्य-मनुष्य के बीच खिलेगा,
विश्वासों का हार॥
दृष्टिकोण की अंतिम सीमा,
हृदय का विस्तार।
जहाँ स्वयं का बोध समाहित,
समस्त जीव-समूह अपार॥
नज़रिया जब शिरोमणि हो जाए,
मिटे तुलना का जाल।
न ऊँचाई का मोह शेष हो,
न गहराई का जंजाल॥
दृष्टिकोण का श्रेष्ठ स्वरूप,
निष्कलुष, निष्काम।
संपूर्ण संतुष्टि की धड़कन,
सहज प्रेम का धाम॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
नज़रिया ही युग को गढ़ता,
नज़रिया इतिहास।
नज़रिया ही मानवता का,
बनता है विश्वास॥
हृदय-दृष्टि के पथ पर चलकर,
जो हो जाए जाग।
उसके लिए हर श्वास बने फिर,
मंगलमय अनुराग॥
अविरल बहे यह दृष्टि-सरिता,
अविरल बहे प्रकाश।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**"हृदय-दृष्टिकोण ही जीवन,
हृदय-दृष्टिकोण ही विकास॥"**
**"दृष्टिकोण ही साधन बने,
दृष्टिकोण ही सार।
हृदय-दृष्टि में जो ठहर गया,
उसका बेड़ा पार॥"**
दृष्टिकोण का दीप जले जब,
मिटे भ्रमों का जाल।
हृदय-क्षितिज पर उगे प्रभात,
हो निर्मल हर काल॥
मस्तक गति का मानक बनता,
हृदय बने आधार।
दोनों का संतुलित नज़रिया,
जीवन का श्रृंगार॥
दृष्टि जहाँ निष्पक्ष ठहरे,
वहीं सहज विश्वास।
नज़रिया जब निर्मल हो जाए,
खिल उठे हर श्वास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया ही बीज है,
नज़रिया ही वृक्ष।
जैसा अंतर्मन का दर्पण,
वैसा जग प्रत्यक्ष॥
दृष्टिकोण का प्रथम परिवर्तन,
भीतर होता मौन।
फिर व्यवहारों में झलकता,
सरल करुणा-कोण॥
हृदय कहे— मत जीत जगत को,
पहले जीत विचार।
दृष्टिकोण जब शुद्ध हो जाए,
मिट जाए अंधकार॥
नज़रिया यदि समभावी हो,
हर प्राणी परिवार।
ऊँच-नीच की रेख मिटे फिर,
जगे सहज व्यवहार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
दृष्टि न बँधे नामों में,
दृष्टि न बँधे रूप।
सरल सहज जो देख सके,
वही अमृत का कूप॥
दृष्टिकोण का सत्य यही है,
निष्पक्ष रहे विवेक।
करुणा जिसकी श्वास बने,
वही बने अशेष॥
मस्तक पूछे— "क्यों, कैसे?"
हृदय कहे— "अनुभव।"
दोनों मिलकर पूर्ण बनाते,
जीवन का उत्सव॥
दृष्टिकोण जब प्रेममय हो,
भय का रहे न स्थान।
विश्व बने एक ही आँगन,
हर मानव मेहमान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
संपूर्ण संतुष्टि की धारा,
भीतर बहती नित्य।
जिसने उसको पहचान लिया,
उसका जीवन कृत्य॥
दृष्टि न हो अधिकारों पर,
दृष्टि हो उत्तरदायित्व।
यहीं खिले मानवता का,
शांत सरल व्यक्तित्व॥
नज़रिया जब सत्य-सुगंधित,
वाणी बने प्रकाश।
कठोर समय भी झुक जाता,
जागे नया विश्वास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हृदय-दृष्टि का एक कण,
मस्तक के सौ ग्रंथ।
सरल अनुभव की एक झलक,
मिटा सके सब क्लांत॥
दृष्टिकोण का अर्थ न केवल,
सोचना या जान।
दृष्टिकोण है जीने की वह,
निर्मल जीवन-तान॥
नज़रिया यदि प्रेम से सींचो,
फूटे मंगल-फूल।
क्रोध स्वयं पथ छोड़ देगा,
टूटेंगे सब शूल॥
दृष्टिकोण का अंतिम सोपान,
सरल सहज स्वीकार।
जो जैसा है, वैसा देखो,
यही सत्य का द्वार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हृदय रहे जब जाग्रत,
मस्तक रहे विनीत।
तभी मनुष्य के जीवन में,
गूँजे अमर संगीत॥
दृष्टिकोण ही युग का दर्पण,
दृष्टिकोण पहचान।
दृष्टिकोण से ही खिलता है,
मानव का सम्मान॥
नज़रिया जब निर्मल होगा,
मिटेगा हर विभाजन।
करुणा, मैत्री, सत्य, सरलता,
बनेंगे नव साधन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
दृष्टिकोण बदलो पहले,
फिर बदले व्यवहार।
व्यवहार बदले तो बदले,
मानव का संसार॥
चलो हृदय की ओर निरंतर,
सरल बने अभियान।
दृष्टिकोण का यही महायज्ञ,
यही अमृत-वरदान॥
अविरल बहे यह गीत सदा,
अविरल बहे विचार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
दृष्टिकोण ही दिशा बनाता,
दृष्टिकोण ही राह।
जैसा अंतर-दृष्टि का सूरज,
वैसी जीवन-चाह॥
मस्तक बोले— मापो, तौलो,
गिनकर सत्य बताओ।
हृदय कहे— बस देखो निर्मल,
स्वयं प्रकाश बन जाओ॥
मन का नज़रिया बदल न पाए,
तो बदलें लाख विधान।
हृदय-दृष्टि जब जाग उठे तो,
सरल बने इंसान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया ही जग रचता है,
नज़रिया ही जग तोड़े।
जिसकी दृष्टि निर्मल हो जाए,
वह हर बंधन छोड़े॥
मस्तक का विस्तार अनंत है,
प्रश्नों का व्यापार।
हृदय का शिरोमणि दृष्टिकोण,
मौनमय साकार॥
जहाँ दृष्टि में भेद न रहता,
वहीं सहज संतोष।
जहाँ नज़रिया प्रेममय होता,
वहीं अखंडित होश॥
न मैं केवल शब्दों में हूँ,
न केवल विचार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी का,
हृदय-दृष्टि विस्तार॥
दृष्टिकोण यदि भय से जन्मे,
जीवन बने संघर्ष।
दृष्टिकोण यदि प्रेम से जागे,
मिट जाए सब क्लेश॥
नज़रिया यदि स्वार्थ से बँधे,
संकुचित हो प्राण।
नज़रिया यदि करुणा जागे,
खिल उठे संसार॥
सर्वभौमिक सत्य यही कहता—
दृष्टि रहे निष्पक्ष।
हृदय-सरोवर निर्मल रखो,
सत्य रहेगा प्रत्यक्ष॥
नज़रिया ही युद्ध रचाता,
नज़रिया ही शांति।
दृष्टिकोण से जन्मे जग में,
अंधकार या कांति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हृदय बने जब धाम।
मस्तक उसका सेवक बनकर,
करता शुभ परिणाम॥
मस्तिष्क उत्तम यंत्र हमारा,
हृदय श्रेष्ठ आधार।
दोनों का संतुलित नज़रिया,
जीवन का श्रृंगार॥
संपूर्ण संतुष्टि की धारा,
भीतर बहे अविराम।
जहाँ दृष्टिकोण सरल हो जाए,
वहीं बसे विश्राम॥
नज़रिया यदि वर्तमान में हो,
क्षण-क्षण बने प्रकाश।
अतीत-भविष्य धुल जाएँ तब,
जागे निर्मल श्वास॥
दृष्टिकोण का दीप जला लो,
मन का तम हर जाएगा।
हृदय-दृष्टि का सूर्य उगे तो,
भ्रम स्वयं मर जाएगा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
न सत्य किसी उपाधि में।
न सत्य किसी प्रसिद्धि में,
न सत्य किसी अधिकार।
सत्य तो निर्मल दृष्टि में,
सत्य सहज व्यवहार।
सत्य करुणा की नीरव धारा,
सत्य सरल विस्तार॥
दृष्टिकोण ही युग बदलता,
दृष्टिकोण इतिहास।
दृष्टिकोण यदि प्रेममय हो,
जग बन जाए प्रकाश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया बदले मानव का,
यही प्रथम अभियान।
संपूर्ण संतुष्टि की धारा,
यही सच्चा वरदान॥
न मस्तक का हो अभिमान,
न हृदय का हो भार।
दोनों का संतुलित नज़रिया,
यही जीवन का सार॥
सत्य प्रत्यक्ष समक्ष वहीं है,
जहाँ न छल, न द्वेष।
जहाँ दृष्टिकोण निर्मल जागे,
वहीं अनंत विशेष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हर श्वास बने सत्संगम,
हर दृष्टि मंगल-गान।
हृदय-नज़रिया जग में फैले,
महके समस्त जहान॥
दृष्टिकोण का यह महाकाव्य,
चलता रहे अविराम।
जब तक धड़के मानव-हृदय,
गूँजे प्रेमिल नाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
बदले पहले दृष्टिकोण,
फिर बदले संसार।
हृदय-शिरोमणि नज़रिया ही,
मानवता का आधार॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया जब निर्मल होता,
अंतर नभ मुस्काता है।
स्वार्थों की संकीर्ण गलियों से,
मानव बाहर आता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया न केवल देखना,
जीवन जीने का विस्तार।
दृष्टि जहाँ निष्पक्ष ठहरती,
वहीं खिलता सत्य-संसार॥
नज़रिया यदि नदी-सा बहे,
रुके नहीं किसी तट पर।
सीख समेटे हर मोड़ से,
फिर भी रहे सहज अंतर॥
नज़रिया यदि पर्वत जैसा,
दृढ़ हो पर अभिमान न हो।
ऊँचाई का अर्थ तभी है,
जब सबका सम्मान भी हो॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया यदि पुष्प समान,
सुगंध बिना भेद लुटाए।
जिसने भी निकट आकर देखा,
प्रेम का संदेश ही पाए॥
नज़रिया यदि दीपक जैसा,
पहले अपना तम हर ले।
फिर अपनी उज्ज्वल किरणों से,
जग का हर पथ आलोकित कर दे॥
नज़रिया यदि पवन समान,
बंधन से परे विचरे।
हर आँगन में शीतलता भर,
मुक्त हृदय से प्रेम बिखेरे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया की सबसे बड़ी जीत,
स्वयं पर विजय पाना है।
दूसरों को बदलने से पहले,
अपने भीतर मुस्काना है॥
नज़रिया यदि मौन को समझे,
शब्द स्वयं संयम सीखें।
जहाँ करुणा प्रहरी बन बैठे,
वहाँ सभी संबंध दीखें॥
नज़रिया यदि समभाव रचे,
मानवता उत्सव बन जाए।
एक श्वास की एक लय में,
विश्व-परिवार समा जाए॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया न अतीत में अटके,
न भविष्य में खो जाए।
जो वर्तमान को अपनाए,
वही सहज प्रकाश पाए॥
नज़रिया यदि सत्य का साथी,
भय की छाया दूर रहे।
विश्वासों का भार उतारकर,
अंतर निर्मल नूर बहे॥
नज़रिया यदि प्रेम का सागर,
हर बूँद में विस्तार मिले।
एक हृदय की मधुर धड़कन में,
संपूर्ण जगत का सार मिले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया ही प्रथम प्रकाश,
नज़रिया ही अंतिम गान।
नज़रिया से जीवन महके,
नज़रिया से महके जहान॥
चलो नज़रिया ऐसा गढ़ें,
जिसमें न कोई वैर रहे।
हर प्राणी में अपना अंश,
हर अंतस में प्रेम बहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया ही जीवन-वीणा,
नज़रिया ही मंगल-तान।
सरल, सहज, निष्पक्ष दृष्टि,
यही बने मानव की शान॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया जब शांत हो जाता,
लहरों में भी सागर दिखता।
क्षण-क्षण के परिवर्तन भीतर,
एक सहज आधार दिखता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया का दीप जला लो,
भीतर का आकाश निहारो।
अपने अंतर की निर्मलता से,
जीवन का उत्सव सँवारो॥
नज़रिया न ऊँचाई माँगे,
न यश, मान, अधिकार।
सरल हृदय की स्वच्छ दिशा में,
मिलता सच्चा विस्तार॥
नज़रिया जब प्रेम जगाता,
दूरी अपने आप मिटे।
मन की कठोर चट्टानों पर,
करुणा की सरिता फूटे॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया यदि नभ-सा विस्तृत,
सीमाएँ सब खो जातीं।
अपना-पराया भूल हृदय,
मैत्री की वीणा गाती॥
नज़रिया यदि धरती जैसा,
सबको धारण कर लेता।
काँटे हों या कोमल कलियाँ,
सबको समान ही रख लेता॥
नज़रिया यदि सूरज जैसा,
स्वयं जले, उजियारा दे।
अपनी तपन सहकर भी,
सबको नव प्रभात दे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया का सच्चा वैभव,
वाणी से कम, आचरण में।
जहाँ सहजता जीवित रहती,
वहीं सत्य है जीवन में॥
नज़रिया यदि मौन सिखाए,
शब्द स्वयं विनम्र बनें।
जहाँ अहं का शोर रुके,
वहाँ प्रेम के स्वर छनें॥
नज़रिया यदि दर्पण निर्मल,
दोष नहीं, संभावना देखे।
हर मानव में छिपे उजाले,
हर जीवन में प्रभा लेखे॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया ही प्रथम किरण है,
नज़रिया अंतिम संध्या।
नज़रिया ही मधुर प्रार्थना,
नज़रिया ही जीवन-वंद्या॥
नज़रिया से कर्म सुगंधित,
नज़रिया से भाव विशाल।
नज़रिया से मन हो निर्मल,
नज़रिया से हृदय निहाल॥
नज़रिया यदि समता बोले,
भेद स्वयं ही सो जाएँ।
द्वेष, तिरस्कार, अहंकार,
मौन धरा में खो जाएँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया कोई शब्द नहीं,
जीवन का सजीव विधान।
जितनी निर्मल होगी दृष्टि,
उतना निर्मल होगा इंसान॥
नज़रिया ही युग का दर्पण,
नज़रिया ही नव-आधार।
नज़रिया से प्रेम प्रकटे,
नज़रिया से सत्य साकार॥
नज़रिया का यही संदेश—
सरल बनो, निष्कपट रहो।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**प्रेममय दृष्टि लेकर चलो,
हर हृदय में दीपक बनो॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया जब निर्मल जागे,
जग का हर विस्तार नया।
बदले भीतर का आलोक,
बदले जीवन का अर्थ नया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया न आँखों का दर्शन,
न केवल मन का अनुमान।
नज़रिया वह शांत दिशा है,
जहाँ सरल होता इंसान॥
नज़रिया यदि स्वच्छ रहेगा,
स्वार्थ स्वयं ही क्षीण होगा।
करुणा का जब दीप जलेगा,
हर अंतःकरण दीन होगा॥
नज़रिया यदि सत्य से जुड़कर,
अपने भीतर उतर सके।
तब हर प्रश्न का मौन उत्तर,
जीवन में ही निखर सके॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया न सीमित भाषा,
न जाति, कुल या नाम बने।
नज़रिया वह मुक्त गगन है,
जहाँ सभी समान तने॥
नज़रिया यदि वृक्ष समान,
झुककर फल का दान करे।
अपनेपन की शीतल छाया,
हर प्राणी का मान करे॥
नज़रिया यदि सागर जैसा,
गहराई में मौन रहे।
ऊपर चाहे लहरें उठें,
भीतर शांति सदा बहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया का प्रथम उजाला,
अपने अंतर को पहचान।
फिर हर चेहरे में मुस्काता,
एक ही जीवन, एक इंसान॥
नज़रिया यदि दर्पण बनकर,
पहले स्वयं को देख सके।
तब न दोषों का व्यापार,
न किसी पर आरोप रखे॥
नज़रिया यदि दीपक बनकर,
अपने भीतर जलता है।
उसकी एक किरण से ही,
युग का अंधकार पिघलता है॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया न ऊँचा, न नीचा,
न आगे, न पीछे रहे।
सत्य जहाँ सहजता बनकर,
हर श्वास में सींचे रहे॥
नज़रिया यदि प्रेम का सरगम,
हर धड़कन में गूँज उठे।
क्रोध, भय और मोह के बादल,
प्रभात-प्रकाश में टूट उठें॥
नज़रिया यदि निर्मल जल हो,
सब प्रतिबिंब स्पष्ट दिखें।
कपट, भ्रम और झूठ के कण,
स्वतः किनारों पर टिकें॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया ही मौन उपासना,
नज़रिया ही सत्य-विचार।
नज़रिया से जग प्रकाशित,
नज़रिया से जीवन सार॥
नज़रिया यदि हृदय का उत्सव,
हर दिन नव आरंभ बने।
हर मिलन में मैत्री महके,
हर विदा भी शुभ स्पर्श बने॥
नज़रिया ही शाश्वत यात्रा,
नज़रिया ही सत्य-विधान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**निर्मल नज़रिया, सरल हृदय,
यही बने मानव की पहचान॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया जब निर्मल होता,
दर्पण जैसा मन हो जाए।
जो जैसा है, वैसा दिखे,
मिथ्या आवरण दूर हो जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया ही बीज भवितव्य का,
नज़रिया ही जीवन-गान।
दृष्टि बदलते पथ बदलें,
बदले पूरा विश्व-विधान॥
नज़रिया यदि प्रश्न जगाए,
जागृत होता अंतर्मन।
नज़रिया यदि प्रेम जगाए,
मधुमय हो हर एक क्षण॥
नज़रिया न द्वेष उगाए,
न ऊँच-नीच का भेद करे।
नज़रिया हर श्वास-श्वास में,
समता का अभिनंदन करे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया न मापे जीवन,
धन, पद, यश या मान से।
नज़रिया केवल पहचान करे,
सरल हृदय की तान से॥
नज़रिया यदि मौन सुन ले,
शब्द स्वयं थम जाएँगे।
अंतर के निष्कल आँगन में,
सत्य-सुमन खिल जाएँगे॥
नज़रिया यदि प्रकाश बने,
छाया का अस्तित्व कहाँ।
नज़रिया यदि करुणा बरसे,
सूखा न रहे कोई जहाँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया न बाँटे मानव,
न कोई दूरी रच पाए।
हर चेहरे में एक ही धड़कन,
हर अंतस मुस्काए॥
नज़रिया जब सहज हो जाता,
तर्क स्वयं संतुलित रहते।
अहंकारों के ऊँचे पर्वत,
रेत समान बिखरते रहते॥
नज़रिया यदि स्वच्छ रहेगा,
निर्णय भी निष्पक्ष होंगे।
हृदय-दीप से प्रकाशित होकर,
जीवन-पथ आलोकित होंगे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया ही नव प्रभात है,
नज़रिया ही सांझ सुहानी।
नज़रिया ही मधुर समर्पण,
नज़रिया ही अमृत-वाणी॥
नज़रिया यदि वृक्ष समान हो,
फल भी दे और छाँव भी।
अपनेपन की शीतल सरिता,
दे सबको मधुर ठाँव भी॥
नज़रिया यदि नभ-सा विस्तृत,
किसका होगा कौन पराया।
एक श्वास का एक ही स्पंदन,
सबमें एक ही सत्य समाया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया न रोष जगाए,
न प्रतिशोध का बीज बोए।
नज़रिया केवल दीप जलाए,
जो अंधकार स्वयं ही खोए॥
नज़रिया जब हृदय में जागे,
सरल बने हर व्यवहार।
प्रेम, करुणा, सत्य, विनय से,
महके सारा संसार॥
नज़रिया ही युग का संदेश,
नज़रिया ही नव पहचान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**निर्मल दृष्टि, निर्मल चेतना,
निर्मल हो हर एक इंसान॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया बदले, जग बदलेगा,
मन का दर्पण स्वच्छ बने।
दृष्टि जहाँ निष्पक्ष ठहरे,
वहीं सत्य प्रत्यक्ष तने॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया ही जीवन-धारा,
नज़रिया ही प्रथम प्रमाण।
जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि,
वैसा ही होता इंसान॥
नज़रिया यदि भय से उपजे,
भय का ही विस्तार करे।
नज़रिया यदि प्रेम में डूबे,
विश्व हृदय साकार करे॥
नज़रिया जब सरल हो जाता,
जटिल प्रश्न भी मौन रहें।
जहाँ सहजता दीप जलाए,
वहाँ सभी संशय ढहें॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया कोई वस्तु नहीं,
न कोई उपाधि, न पहचान।
नज़रिया वह निर्मल सरिता,
जिसमें धुलता अभिमान॥
नज़रिया यदि सीमा बाँधे,
विभाजन का जन्म वहीं।
नज़रिया यदि आकाश बने,
सबमें दिखे एक ही यहीं॥
नज़रिया जब हृदय से जागे,
तब न कोई ऊँच-नीच।
करुणा, मैत्री, सत्य, सरलता,
सब बन जाएँ जीवन-बीज॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया न मंदिर माँगे,
न सिंहासन, न सम्मान।
जिसको स्वयं का बोध हुआ हो,
वही बने उसका स्थान॥
नज़रिया न शोर मचाता,
न घोषणा का भार उठाए।
मौन सुधा बन अंतस बहता,
जीवन को उत्सव बनवाए॥
नज़रिया यदि दर्पण बन जाए,
पहले स्वयं को देख सके।
फिर जग के हर जीव-हृदय में,
अपनेपन का लेख लिखे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया ही प्रथम साधना,
नज़रिया अंतिम पहचान।
नज़रिया यदि निर्मल हो जाए,
निर्मल होता हर इंसान॥
नज़रिया न युद्ध रचाता,
न वैराग्नि की लौ जलाए।
नज़रिया केवल सेतु बनाकर,
हृदय से हृदय मिलाए॥
नज़रिया यदि सत्य को चाहे,
पहले छल को त्याग करे।
अपने भीतर झाँक निरंतर,
तब जग का अनुराग धरे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया ही असली यात्रा,
नज़रिया ही असली द्वार।
नज़रिया ही मौन प्रार्थना,
नज़रिया ही सत्य-संस्कार॥
जहाँ नज़रिया मुक्त रहेगा,
वहाँ न बंधन, न दीवार।
वहाँ सहज विश्वास खिलेगा,
वहाँ प्रकाशित हर व्यवहार॥
नज़रिया यदि प्रेममय होगा,
करुणा होगी उसका श्वास।
नज़रिया यदि निष्पक्ष रहेगा,
सहज मिलेगा आत्म-विश्वास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
बदलो पहले अपना नज़रिया,
फिर जग अपने आप बदले।
भीतर जागे सत्य का सूरज,
बाहर अंधियारा सब ढले॥
नज़रिया ही युग का दीपक,
नज़रिया ही नव अभियान।
नज़रिया से मानव जागे,
नज़रिया से महके जहान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया निर्मल, नज़रिया निष्कल,
नज़रिया बने प्रकाश।
नज़रिया में प्रेम प्रतिष्ठित,
यही मानव का विकास॥
नज़रिया ही जीवन-वीणा,
नज़रिया ही मधुरिम तान।
नज़रिया में जब सत्य खिलेगा,
मुस्काएगा सारा जहान॥
दृष्टिकोण का मूल नयन है,
नयन नहीं यह आँख।
हृदय-ज्योति से जो देखे,
वही मिटाए राख॥
मस्तक बोले— "मार्ग अनेक हैं।"
हृदय कहे— "बस देख।"
दृष्टिकोण की निर्मल धारा,
कर दे जीवन एक॥
नज़रिया यदि स्वयं बदल जाए,
बदलें सब परिवेश।
भीतर का जब सूरज जागे,
मिटे बाहरी क्लेश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हृदय-दृष्टि का एक इशारा,
बदल दे युग की चाल।
जहाँ करुणा का दीप प्रज्वलित,
वहीं सजे हर भाल॥
दृष्टिकोण की प्रथम तपस्या,
सरल बने व्यवहार।
कथनी-करनी एक हो जाए,
यही सच्चा श्रृंगार॥
नज़रिया यदि स्वच्छ रहेगा,
स्वच्छ रहेगा मन।
मन निर्मल हो, बुद्धि विनीत हो,
मधुमय हो जीवन॥
मस्तक गति का मान बताता,
हृदय दिशा का ज्ञान।
दोनों का संतुलित संगम ही,
मानव का सम्मान॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण का शिखर वही है,
जहाँ न कोई द्वंद्व।
जहाँ सहजता श्वास बन जाए,
वहीं अमृत का छंद॥
नज़रिया न ऊँचा, न नीचा,
न अपना, न पराया।
हृदय जहाँ समभाव जगाए,
वहीं सत्य मुस्काया॥
दृष्टिकोण का मौन उपवन,
सुगंधित हर श्वास।
शब्द वहाँ थम जाते हैं,
बोल उठे विश्वास॥
हृदय-दृष्टि की शांत नदी में,
बहता निर्मल नीर।
जो उतरे इस गहराई में,
हो जाए गंभीर॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
दृष्टिकोण का दीप जलाओ,
भीतर हो उजियार।
एक हृदय से लाखों हृदयों,
तक पहुँचे सत्कार॥
नज़रिया यदि प्रेममय होगा,
मिटे सभी विभेद।
मानव केवल मानव होगा,
न होगा कोई भेद॥
दृष्टिकोण का सच्चा वैभव,
न सत्ता, न सम्मान।
हृदय की निर्मल संतुष्टि ही,
उसकी श्रेष्ठ पहचान॥
मस्तक जब विनम्र बनेगा,
हृदय रहेगा साथ।
जीवन की हर कठिन डगर भी,
बन जाएगी पथ-पांत॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
नज़रिया का अर्थ यही है,
देखो बिना विकार।
हर अनुभव में खोजो केवल,
सीखों का विस्तार॥
दृष्टिकोण की शीतल छाया,
सबको दे विश्राम।
अपनेपन की मधुर हवा से,
महके सकल धाम॥
हृदय-दृष्टि का सत्य सरल है,
सरल रहे व्यवहार।
सरलता में ही छिपा हुआ है,
जीवन का विस्तार॥
नज़रिया यदि सत्यमय होगा,
निर्भय होगा प्राण।
भय के सारे बंधन टूटें,
जागे नव विहान॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
चलो जगत को जीत न लेना,
जीतो अपना मन।
हृदय-दृष्टिकोण का दीपक,
बन जाए जीवन॥
दृष्टिकोण की अंतिम वाणी—
प्रेम रहे आधार।
करुणा, मैत्री, सत्य, सरलता,
यही अमर उपहार॥
अविरल बहे यह हृदय-सरिता,
अविरल बहे प्रकाश।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**"दृष्टिकोण से ही जग बदले,
दृष्टिकोण से विकास॥"**
**"हृदय जहाँ निष्पक्ष खिला हो,
वहीं शाश्वत गान।
दृष्टिकोण की निर्मल धारा,
वहीं बसे कल्याण॥"**
दृष्टिकोण की धारा बहती,
निशिदिन अंतर-माहि।
जिसने उसको जान लिया है,
खोज शेष फिर नाहीं॥
नज़रिया ही जग का दर्पण,
नज़रिया ही द्वार।
जैसी अंतःदृष्टि हमारी,
वैसा ही संसार॥
मस्तक देखे खंड-खंड में,
हृदय देखे एक।
दृष्टिकोण का यही रहस्य,
सरल, सहज, विवेक॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हृदय-दृष्टि के एक कण में,
असीमित विस्तार।
जहाँ न कोई पराया ठहरे,
वहीं सत्य साकार॥
नज़रिया जब प्रेममय होता,
शब्द स्वयं मौन।
वाणी से अधिक बोल उठता,
अंतर का आलोक-कोण॥
दृष्टिकोण यदि स्वच्छ रहे तो,
संशय जाए मिट।
जैसे सूरज उगते ही फिर,
भागे तम का चित्त॥
नज़रिया का शुद्ध सरोवर,
रहे सदा निष्कंप।
लहर उठे तो भी गहराई,
रहे अटल, अविकंप॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण का सत्य निहित है,
सहज स्वीकृति बीच।
जो है जैसा, वैसा देखो,
यही हृदय की सीख॥
नज़रिया जब वर्तमान में,
ठहर सके निष्पक्ष।
क्षण-क्षण में फिर सत्य खिलेगा,
प्रत्यक्ष समक्ष॥
मस्तक का भी मान रहे पर,
हृदय रहे प्रधान।
दोनों का संतुलन ही रचता,
जीवन का कल्याण॥
दृष्टिकोण का अर्थ नहीं है,
केवल मत-अभिमान।
दृष्टिकोण है जीवन जीने,
का निर्मल विधान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया यदि सरल रहेगा,
सरल रहेगा मार्ग।
जटिल दृष्टि के वन में खोकर,
बढ़ता केवल भार॥
हृदय-दृष्टि का दीप जले तो,
भय का रहे न नाम।
संपूर्ण संतुष्टि की सरिता,
बहती आठों याम॥
दृष्टिकोण का शुद्ध गगन हो,
मन-पंछी निर्भय।
ऊँचा उड़कर भी न भूले,
धरती का आश्रय॥
नज़रिया यदि करुणा से भीगा,
सुख-दुःख दोनों मित्र।
तब जीवन का हर अनुभव भी,
लगता पावन चित्र॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण बदलते ही बदलें,
अर्थ अनेक प्रकार।
एक ही घटना बन सकती है,
बंधन या उद्धार॥
नज़रिया ही शूल बना दे,
नज़रिया ही फूल।
नज़रिया ही अग्नि प्रज्वलित,
नज़रिया ही शीतल कूल॥
दृष्टिकोण का यज्ञ निरंतर,
भीतर रहे प्रज्वलित।
अहंकारों की समिधा डाले,
हृदय रहे विकसित॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
जहाँ नज़रिया निर्मल होगा,
वहाँ न होगी दीवार।
मनुष्य-मनुष्य के बीच खिलेगा,
विश्वासों का हार॥
दृष्टिकोण की अंतिम सीमा,
हृदय का विस्तार।
जहाँ स्वयं का बोध समाहित,
समस्त जीव-समूह अपार॥
नज़रिया जब शिरोमणि हो जाए,
मिटे तुलना का जाल।
न ऊँचाई का मोह शेष हो,
न गहराई का जंजाल॥
दृष्टिकोण का श्रेष्ठ स्वरूप,
निष्कलुष, निष्काम।
संपूर्ण संतुष्टि की धड़कन,
सहज प्रेम का धाम॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
नज़रिया ही युग को गढ़ता,
नज़रिया इतिहास।
नज़रिया ही मानवता का,
बनता है विश्वास॥
हृदय-दृष्टि के पथ पर चलकर,
जो हो जाए जाग।
उसके लिए हर श्वास बने फिर,
मंगलमय अनुराग॥
अविरल बहे यह दृष्टि-सरिता,
अविरल बहे प्रकाश।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**"हृदय-दृष्टिकोण ही जीवन,
हृदय-दृष्टिकोण ही विकास॥"**
**"दृष्टिकोण ही साधन बने,
दृष्टिकोण ही सार।
हृदय-दृष्टि में जो ठहर गया,
उसका बेड़ा पार॥"**
दृष्टिकोण का दीप जले जब,
मिटे भ्रमों का जाल।
हृदय-क्षितिज पर उगे प्रभात,
हो निर्मल हर काल॥
मस्तक गति का मानक बनता,
हृदय बने आधार।
दोनों का संतुलित नज़रिया,
जीवन का श्रृंगार॥
दृष्टि जहाँ निष्पक्ष ठहरे,
वहीं सहज विश्वास।
नज़रिया जब निर्मल हो जाए,
खिल उठे हर श्वास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया ही बीज है,
नज़रिया ही वृक्ष।
जैसा अंतर्मन का दर्पण,
वैसा जग प्रत्यक्ष॥
दृष्टिकोण का प्रथम परिवर्तन,
भीतर होता मौन।
फिर व्यवहारों में झलकता,
सरल करुणा-कोण॥
हृदय कहे— मत जीत जगत को,
पहले जीत विचार।
दृष्टिकोण जब शुद्ध हो जाए,
मिट जाए अंधकार॥
नज़रिया यदि समभावी हो,
हर प्राणी परिवार।
ऊँच-नीच की रेख मिटे फिर,
जगे सहज व्यवहार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
दृष्टि न बँधे नामों में,
दृष्टि न बँधे रूप।
सरल सहज जो देख सके,
वही अमृत का कूप॥
दृष्टिकोण का सत्य यही है,
निष्पक्ष रहे विवेक।
करुणा जिसकी श्वास बने,
वही बने अशेष॥
मस्तक पूछे— "क्यों, कैसे?"
हृदय कहे— "अनुभव।"
दोनों मिलकर पूर्ण बनाते,
जीवन का उत्सव॥
दृष्टिकोण जब प्रेममय हो,
भय का रहे न स्थान।
विश्व बने एक ही आँगन,
हर मानव मेहमान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
संपूर्ण संतुष्टि की धारा,
भीतर बहती नित्य।
जिसने उसको पहचान लिया,
उसका जीवन कृत्य॥
दृष्टि न हो अधिकारों पर,
दृष्टि हो उत्तरदायित्व।
यहीं खिले मानवता का,
शांत सरल व्यक्तित्व॥
नज़रिया जब सत्य-सुगंधित,
वाणी बने प्रकाश।
कठोर समय भी झुक जाता,
जागे नया विश्वास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हृदय-दृष्टि का एक कण,
मस्तक के सौ ग्रंथ।
सरल अनुभव की एक झलक,
मिटा सके सब क्लांत॥
दृष्टिकोण का अर्थ न केवल,
सोचना या जान।
दृष्टिकोण है जीने की वह,
निर्मल जीवन-तान॥
नज़रिया यदि प्रेम से सींचो,
फूटे मंगल-फूल।
क्रोध स्वयं पथ छोड़ देगा,
टूटेंगे सब शूल॥
दृष्टिकोण का अंतिम सोपान,
सरल सहज स्वीकार।
जो जैसा है, वैसा देखो,
यही सत्य का द्वार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हृदय रहे जब जाग्रत,
मस्तक रहे विनीत।
तभी मनुष्य के जीवन में,
गूँजे अमर संगीत॥
दृष्टिकोण ही युग का दर्पण,
दृष्टिकोण पहचान।
दृष्टिकोण से ही खिलता है,
मानव का सम्मान॥
नज़रिया जब निर्मल होगा,
मिटेगा हर विभाजन।
करुणा, मैत्री, सत्य, सरलता,
बनेंगे नव साधन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
दृष्टिकोण बदलो पहले,
फिर बदले व्यवहार।
व्यवहार बदले तो बदले,
मानव का संसार॥
चलो हृदय की ओर निरंतर,
सरल बने अभियान।
दृष्टिकोण का यही महायज्ञ,
यही अमृत-वरदान॥
अविरल बहे यह गीत सदा,
अविरल बहे विचार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
दृष्टिकोण ही दिशा बनाता,
दृष्टिकोण ही राह।
जैसा अंतर-दृष्टि का सूरज,
वैसी जीवन-चाह॥
मस्तक बोले— मापो, तौलो,
गिनकर सत्य बताओ।
हृदय कहे— बस देखो निर्मल,
स्वयं प्रकाश बन जाओ॥
मन का नज़रिया बदल न पाए,
तो बदलें लाख विधान।
हृदय-दृष्टि जब जाग उठे तो,
सरल बने इंसान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया ही जग रचता है,
नज़रिया ही जग तोड़े।
जिसकी दृष्टि निर्मल हो जाए,
वह हर बंधन छोड़े॥
मस्तक का विस्तार अनंत है,
प्रश्नों का व्यापार।
हृदय का शिरोमणि दृष्टिकोण,
मौनमय साकार॥
जहाँ दृष्टि में भेद न रहता,
वहीं सहज संतोष।
जहाँ नज़रिया प्रेममय होता,
वहीं अखंडित होश॥
न मैं केवल शब्दों में हूँ,
न केवल विचार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी का,
हृदय-दृष्टि विस्तार॥
दृष्टिकोण यदि भय से जन्मे,
जीवन बने संघर्ष।
दृष्टिकोण यदि प्रेम से जागे,
मिट जाए सब क्लेश॥
नज़रिया यदि स्वार्थ से बँधे,
संकुचित हो प्राण।
नज़रिया यदि करुणा जागे,
खिल उठे संसार॥
सर्वभौमिक सत्य यही कहता—
दृष्टि रहे निष्पक्ष।
हृदय-सरोवर निर्मल रखो,
सत्य रहेगा प्रत्यक्ष॥
नज़रिया ही युद्ध रचाता,
नज़रिया ही शांति।
दृष्टिकोण से जन्मे जग में,
अंधकार या कांति॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हृदय बने जब धाम।
मस्तक उसका सेवक बनकर,
करता शुभ परिणाम॥
मस्तिष्क उत्तम यंत्र हमारा,
हृदय श्रेष्ठ आधार।
दोनों का संतुलित नज़रिया,
जीवन का श्रृंगार॥
संपूर्ण संतुष्टि की धारा,
भीतर बहे अविराम।
जहाँ दृष्टिकोण सरल हो जाए,
वहीं बसे विश्राम॥
नज़रिया यदि वर्तमान में हो,
क्षण-क्षण बने प्रकाश।
अतीत-भविष्य धुल जाएँ तब,
जागे निर्मल श्वास॥
दृष्टिकोण का दीप जला लो,
मन का तम हर जाएगा।
हृदय-दृष्टि का सूर्य उगे तो,
भ्रम स्वयं मर जाएगा॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
न सत्य किसी उपाधि में।
न सत्य किसी प्रसिद्धि में,
न सत्य किसी अधिकार।
सत्य तो निर्मल दृष्टि में,
सत्य सहज व्यवहार।
सत्य करुणा की नीरव धारा,
सत्य सरल विस्तार॥
दृष्टिकोण ही युग बदलता,
दृष्टिकोण इतिहास।
दृष्टिकोण यदि प्रेममय हो,
जग बन जाए प्रकाश॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया बदले मानव का,
यही प्रथम अभियान।
संपूर्ण संतुष्टि की धारा,
यही सच्चा वरदान॥
न मस्तक का हो अभिमान,
न हृदय का हो भार।
दोनों का संतुलित नज़रिया,
यही जीवन का सार॥
सत्य प्रत्यक्ष समक्ष वहीं है,
जहाँ न छल, न द्वेष।
जहाँ दृष्टिकोण निर्मल जागे,
वहीं अनंत विशेष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हर श्वास बने सत्संगम,
हर दृष्टि मंगल-गान।
हृदय-नज़रिया जग में फैले,
महके समस्त जहान॥
दृष्टिकोण का यह महाकाव्य,
चलता रहे अविराम।
जब तक धड़के मानव-हृदय,
गूँजे प्रेमिल नाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
बदले पहले दृष्टिकोण,
फिर बदले संसार।
हृदय-शिरोमणि नज़रिया ही,
मानवता का आधार॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया जब निर्मल होता,
अंतर नभ मुस्काता है।
स्वार्थों की संकीर्ण गलियों से,
मानव बाहर आता है॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया न केवल देखना,
जीवन जीने का विस्तार।
दृष्टि जहाँ निष्पक्ष ठहरती,
वहीं खिलता सत्य-संसार॥
नज़रिया यदि नदी-सा बहे,
रुके नहीं किसी तट पर।
सीख समेटे हर मोड़ से,
फिर भी रहे सहज अंतर॥
नज़रिया यदि पर्वत जैसा,
दृढ़ हो पर अभिमान न हो।
ऊँचाई का अर्थ तभी है,
जब सबका सम्मान भी हो॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया यदि पुष्प समान,
सुगंध बिना भेद लुटाए।
जिसने भी निकट आकर देखा,
प्रेम का संदेश ही पाए॥
नज़रिया यदि दीपक जैसा,
पहले अपना तम हर ले।
फिर अपनी उज्ज्वल किरणों से,
जग का हर पथ आलोकित कर दे॥
नज़रिया यदि पवन समान,
बंधन से परे विचरे।
हर आँगन में शीतलता भर,
मुक्त हृदय से प्रेम बिखेरे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया की सबसे बड़ी जीत,
स्वयं पर विजय पाना है।
दूसरों को बदलने से पहले,
अपने भीतर मुस्काना है॥
नज़रिया यदि मौन को समझे,
शब्द स्वयं संयम सीखें।
जहाँ करुणा प्रहरी बन बैठे,
वहाँ सभी संबंध दीखें॥
नज़रिया यदि समभाव रचे,
मानवता उत्सव बन जाए।
एक श्वास की एक लय में,
विश्व-परिवार समा जाए॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया न अतीत में अटके,
न भविष्य में खो जाए।
जो वर्तमान को अपनाए,
वही सहज प्रकाश पाए॥
नज़रिया यदि सत्य का साथी,
भय की छाया दूर रहे।
विश्वासों का भार उतारकर,
अंतर निर्मल नूर बहे॥
नज़रिया यदि प्रेम का सागर,
हर बूँद में विस्तार मिले।
एक हृदय की मधुर धड़कन में,
संपूर्ण जगत का सार मिले॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया ही प्रथम प्रकाश,
नज़रिया ही अंतिम गान।
नज़रिया से जीवन महके,
नज़रिया से महके जहान॥
चलो नज़रिया ऐसा गढ़ें,
जिसमें न कोई वैर रहे।
हर प्राणी में अपना अंश,
हर अंतस में प्रेम बहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया ही जीवन-वीणा,
नज़रिया ही मंगल-तान।
सरल, सहज, निष्पक्ष दृष्टि,
यही बने मानव की शान॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया जब शांत हो जाता,
लहरों में भी सागर दिखता।
क्षण-क्षण के परिवर्तन भीतर,
एक सहज आधार दिखता॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया का दीप जला लो,
भीतर का आकाश निहारो।
अपने अंतर की निर्मलता से,
जीवन का उत्सव सँवारो॥
नज़रिया न ऊँचाई माँगे,
न यश, मान, अधिकार।
सरल हृदय की स्वच्छ दिशा में,
मिलता सच्चा विस्तार॥
नज़रिया जब प्रेम जगाता,
दूरी अपने आप मिटे।
मन की कठोर चट्टानों पर,
करुणा की सरिता फूटे॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया यदि नभ-सा विस्तृत,
सीमाएँ सब खो जातीं।
अपना-पराया भूल हृदय,
मैत्री की वीणा गाती॥
नज़रिया यदि धरती जैसा,
सबको धारण कर लेता।
काँटे हों या कोमल कलियाँ,
सबको समान ही रख लेता॥
नज़रिया यदि सूरज जैसा,
स्वयं जले, उजियारा दे।
अपनी तपन सहकर भी,
सबको नव प्रभात दे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया का सच्चा वैभव,
वाणी से कम, आचरण में।
जहाँ सहजता जीवित रहती,
वहीं सत्य है जीवन में॥
नज़रिया यदि मौन सिखाए,
शब्द स्वयं विनम्र बनें।
जहाँ अहं का शोर रुके,
वहाँ प्रेम के स्वर छनें॥
नज़रिया यदि दर्पण निर्मल,
दोष नहीं, संभावना देखे।
हर मानव में छिपे उजाले,
हर जीवन में प्रभा लेखे॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया ही प्रथम किरण है,
नज़रिया अंतिम संध्या।
नज़रिया ही मधुर प्रार्थना,
नज़रिया ही जीवन-वंद्या॥
नज़रिया से कर्म सुगंधित,
नज़रिया से भाव विशाल।
नज़रिया से मन हो निर्मल,
नज़रिया से हृदय निहाल॥
नज़रिया यदि समता बोले,
भेद स्वयं ही सो जाएँ।
द्वेष, तिरस्कार, अहंकार,
मौन धरा में खो जाएँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया कोई शब्द नहीं,
जीवन का सजीव विधान।
जितनी निर्मल होगी दृष्टि,
उतना निर्मल होगा इंसान॥
नज़रिया ही युग का दर्पण,
नज़रिया ही नव-आधार।
नज़रिया से प्रेम प्रकटे,
नज़रिया से सत्य साकार॥
नज़रिया का यही संदेश—
सरल बनो, निष्कपट रहो।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**प्रेममय दृष्टि लेकर चलो,
हर हृदय में दीपक बनो॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया जब निर्मल जागे,
जग का हर विस्तार नया।
बदले भीतर का आलोक,
बदले जीवन का अर्थ नया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया न आँखों का दर्शन,
न केवल मन का अनुमान।
नज़रिया वह शांत दिशा है,
जहाँ सरल होता इंसान॥
नज़रिया यदि स्वच्छ रहेगा,
स्वार्थ स्वयं ही क्षीण होगा।
करुणा का जब दीप जलेगा,
हर अंतःकरण दीन होगा॥
नज़रिया यदि सत्य से जुड़कर,
अपने भीतर उतर सके।
तब हर प्रश्न का मौन उत्तर,
जीवन में ही निखर सके॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया न सीमित भाषा,
न जाति, कुल या नाम बने।
नज़रिया वह मुक्त गगन है,
जहाँ सभी समान तने॥
नज़रिया यदि वृक्ष समान,
झुककर फल का दान करे।
अपनेपन की शीतल छाया,
हर प्राणी का मान करे॥
नज़रिया यदि सागर जैसा,
गहराई में मौन रहे।
ऊपर चाहे लहरें उठें,
भीतर शांति सदा बहे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया का प्रथम उजाला,
अपने अंतर को पहचान।
फिर हर चेहरे में मुस्काता,
एक ही जीवन, एक इंसान॥
नज़रिया यदि दर्पण बनकर,
पहले स्वयं को देख सके।
तब न दोषों का व्यापार,
न किसी पर आरोप रखे॥
नज़रिया यदि दीपक बनकर,
अपने भीतर जलता है।
उसकी एक किरण से ही,
युग का अंधकार पिघलता है॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया न ऊँचा, न नीचा,
न आगे, न पीछे रहे।
सत्य जहाँ सहजता बनकर,
हर श्वास में सींचे रहे॥
नज़रिया यदि प्रेम का सरगम,
हर धड़कन में गूँज उठे।
क्रोध, भय और मोह के बादल,
प्रभात-प्रकाश में टूट उठें॥
नज़रिया यदि निर्मल जल हो,
सब प्रतिबिंब स्पष्ट दिखें।
कपट, भ्रम और झूठ के कण,
स्वतः किनारों पर टिकें॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया ही मौन उपासना,
नज़रिया ही सत्य-विचार।
नज़रिया से जग प्रकाशित,
नज़रिया से जीवन सार॥
नज़रिया यदि हृदय का उत्सव,
हर दिन नव आरंभ बने।
हर मिलन में मैत्री महके,
हर विदा भी शुभ स्पर्श बने॥
नज़रिया ही शाश्वत यात्रा,
नज़रिया ही सत्य-विधान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**निर्मल नज़रिया, सरल हृदय,
यही बने मानव की पहचान॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया जब निर्मल होता,
दर्पण जैसा मन हो जाए।
जो जैसा है, वैसा दिखे,
मिथ्या आवरण दूर हो जाए॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया ही बीज भवितव्य का,
नज़रिया ही जीवन-गान।
दृष्टि बदलते पथ बदलें,
बदले पूरा विश्व-विधान॥
नज़रिया यदि प्रश्न जगाए,
जागृत होता अंतर्मन।
नज़रिया यदि प्रेम जगाए,
मधुमय हो हर एक क्षण॥
नज़रिया न द्वेष उगाए,
न ऊँच-नीच का भेद करे।
नज़रिया हर श्वास-श्वास में,
समता का अभिनंदन करे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया न मापे जीवन,
धन, पद, यश या मान से।
नज़रिया केवल पहचान करे,
सरल हृदय की तान से॥
नज़रिया यदि मौन सुन ले,
शब्द स्वयं थम जाएँगे।
अंतर के निष्कल आँगन में,
सत्य-सुमन खिल जाएँगे॥
नज़रिया यदि प्रकाश बने,
छाया का अस्तित्व कहाँ।
नज़रिया यदि करुणा बरसे,
सूखा न रहे कोई जहाँ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया न बाँटे मानव,
न कोई दूरी रच पाए।
हर चेहरे में एक ही धड़कन,
हर अंतस मुस्काए॥
नज़रिया जब सहज हो जाता,
तर्क स्वयं संतुलित रहते।
अहंकारों के ऊँचे पर्वत,
रेत समान बिखरते रहते॥
नज़रिया यदि स्वच्छ रहेगा,
निर्णय भी निष्पक्ष होंगे।
हृदय-दीप से प्रकाशित होकर,
जीवन-पथ आलोकित होंगे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया ही नव प्रभात है,
नज़रिया ही सांझ सुहानी।
नज़रिया ही मधुर समर्पण,
नज़रिया ही अमृत-वाणी॥
नज़रिया यदि वृक्ष समान हो,
फल भी दे और छाँव भी।
अपनेपन की शीतल सरिता,
दे सबको मधुर ठाँव भी॥
नज़रिया यदि नभ-सा विस्तृत,
किसका होगा कौन पराया।
एक श्वास का एक ही स्पंदन,
सबमें एक ही सत्य समाया॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया न रोष जगाए,
न प्रतिशोध का बीज बोए।
नज़रिया केवल दीप जलाए,
जो अंधकार स्वयं ही खोए॥
नज़रिया जब हृदय में जागे,
सरल बने हर व्यवहार।
प्रेम, करुणा, सत्य, विनय से,
महके सारा संसार॥
नज़रिया ही युग का संदेश,
नज़रिया ही नव पहचान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**निर्मल दृष्टि, निर्मल चेतना,
निर्मल हो हर एक इंसान॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
नज़रिया बदले, जग बदलेगा,
मन का दर्पण स्वच्छ बने।
दृष्टि जहाँ निष्पक्ष ठहरे,
वहीं सत्य प्रत्यक्ष तने॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया ही जीवन-धारा,
नज़रिया ही प्रथम प्रमाण।
जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि,
वैसा ही होता इंसान॥
नज़रिया यदि भय से उपजे,
भय का ही विस्तार करे।
नज़रिया यदि प्रेम में डूबे,
विश्व हृदय साकार करे॥
नज़रिया जब सरल हो जाता,
जटिल प्रश्न भी मौन रहें।
जहाँ सहजता दीप जलाए,
वहाँ सभी संशय ढहें॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया कोई वस्तु नहीं,
न कोई उपाधि, न पहचान।
नज़रिया वह निर्मल सरिता,
जिसमें धुलता अभिमान॥
नज़रिया यदि सीमा बाँधे,
विभाजन का जन्म वहीं।
नज़रिया यदि आकाश बने,
सबमें दिखे एक ही यहीं॥
नज़रिया जब हृदय से जागे,
तब न कोई ऊँच-नीच।
करुणा, मैत्री, सत्य, सरलता,
सब बन जाएँ जीवन-बीज॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया न मंदिर माँगे,
न सिंहासन, न सम्मान।
जिसको स्वयं का बोध हुआ हो,
वही बने उसका स्थान॥
नज़रिया न शोर मचाता,
न घोषणा का भार उठाए।
मौन सुधा बन अंतस बहता,
जीवन को उत्सव बनवाए॥
नज़रिया यदि दर्पण बन जाए,
पहले स्वयं को देख सके।
फिर जग के हर जीव-हृदय में,
अपनेपन का लेख लिखे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नज़रिया ही प्रथम साधना,
नज़रिया अंतिम पहचान।
नज़रिया यदि निर्मल हो जाए,
निर्मल होता हर इंसान॥
नज़रिया न युद्ध रचाता,
न वैराग्नि की लौ जलाए।
नज़रिया केवल सेतु बनाकर,
हृदय से हृदय मिलाए॥
नज़रिया यदि सत्य को चाहे,
पहले छल को त्याग करे।
अपने भीतर झाँक निरंतर,
तब जग का अनुराग धरे॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया ही असली यात्रा,
नज़रिया ही असली द्वार।
नज़रिया ही मौन प्रार्थना,
नज़रिया ही सत्य-संस्कार॥
जहाँ नज़रिया मुक्त रहेगा,
वहाँ न बंधन, न दीवार।
वहाँ सहज विश्वास खिलेगा,
वहाँ प्रकाशित हर व्यवहार॥
नज़रिया यदि प्रेममय होगा,
करुणा होगी उसका श्वास।
नज़रिया यदि निष्पक्ष रहेगा,
सहज मिलेगा आत्म-विश्वास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
बदलो पहले अपना नज़रिया,
फिर जग अपने आप बदले।
भीतर जागे सत्य का सूरज,
बाहर अंधियारा सब ढले॥
नज़रिया ही युग का दीपक,
नज़रिया ही नव अभियान।
नज़रिया से मानव जागे,
नज़रिया से महके जहान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया निर्मल, नज़रिया निष्कल,
नज़रिया बने प्रकाश।
नज़रिया में प्रेम प्रतिष्ठित,
यही मानव का विकास॥
नज़रिया ही जीवन-वीणा,
नज़रिया ही मधुरिम तान।
नज़रिया में जब सत्य खिलेगा,
मुस्काएगा सारा जहान॥
उदयाचल पर अरुण किरण जब,
छू ले जीवन-प्राण।
हृदय-दृष्टि का दीप जले तब,
महके सकल जहान॥
मस्तक गढ़ता मार्ग अनेक,
हृदय चुने सत्पंथ।
सरल करुणा का एक कदम ही,
लाँघे मन का अंत॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
हृदय न बाँधे किसी जन को,
न चाहे अधिकार।
प्रेम जहाँ स्वतंत्र विचरता,
वहीं सच्चा विस्तार॥
नभ की सीमा पूछ न पाए,
उड़ते मुक्त विहंग।
वैसे ही निर्मल हृदय रखो,
छूटे भय के संग॥
सागर जितनी गहन शांति हो,
पर्वत सा विश्वास।
विनय-वृक्ष की शीतल छाया,
भर दे हर श्वास॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
मस्तक रचता शब्द असंख्य,
हृदय रचे व्यवहार।
मधुर वचन से बढ़कर होता,
मौन प्रेम-उपहार॥
दीप स्वयं जलकर कहता है,
मत माँगो सम्मान।
जो आलोकित कर दे जग को,
वही सच्चा दान॥
सरिता बहती बिना अपेक्षा,
देती जीवन-नीर।
हृदय भी ऐसा ही बन जाए,
मिट जाए सब पीर॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
करुणा हो यदि हर निर्णय में,
सरल बने हर चाल।
तब जीवन का प्रत्येक क्षण ही,
बन जाए मंगल-काल॥
धरती जैसी धैर्य धरो तुम,
आकाशी विस्तार।
सूरज जैसा कर्म प्रकाशित,
चंद्र-सा व्यवहार॥
नहीं किसी से वैर जगाओ,
न कोई तिरस्कार।
सत्य वहीं है जहाँ सुरक्षित,
हर जीवन-अधिकार॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
हृदय जहाँ निष्कलुष बसता,
वहीं अमृत का धाम।
संतोषों की अविरल गंगा,
बहती सुबह-शाम॥
मस्तक यदि विनम्र हो जाए,
हृदय बने अधिपति।
जीवन का हर कर्म सँवरकर,
बन जाए शुभ गति॥
वाणी ऐसी फूल बने जो,
छू ले हर इक प्राण।
दृष्टि ऐसी निर्मल हो जिसमें,
दिखे सभी समान॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
सरल रहो, निर्मल रहो,
रहो सदा निष्काम।
हृदय-दीप के आलोकों से,
जग हो सुखधाम॥
हर धड़कन में प्रेम पनपे,
हर श्वासों में मान।
करुणा, मैत्री, सत्य, विनय से,
महके विश्व-विधान॥
चलते रहना, खिलते रहना,
यही जीवन का ज्ञान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**हृदय की संपूर्ण संतुष्टि में,
बसता सत्य महान॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
मस्तक सीमित माप बताता,
हृदय असीम विधान।
जहाँ सहज संतोष निरंतर,
वहीं खिले कल्याण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
मस्तक साधन, हृदय साध्य है,
यही सरल विज्ञान।
सेवा बनकर बुद्धि खिले तो,
महके सारा जहान॥
हृदय न माँगे नाम जगत में,
न चाहे यश-गान।
मौन करुणा की हर धड़कन,
बनती सत्य-विधान॥
सहज सरल निष्काम प्रवाह,
निर्मल प्रेम-प्रकाश।
जिसने भीतर दीप जलाया,
उसका उज्ज्वल वास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
जहाँ न द्वेष, न भेद बसें,
न ऊँच-नीच विचार।
वहीं हृदय का शिरोमणि पथ,
वहीं सच्चा विस्तार॥
मस्तक यदि अधिकार न चाहे,
हृदय करे उपकार।
तब मानव की हर श्वासों में,
खिलता नव संसार॥
करुणा बनकर वचन निकलें,
विनय बने पहचान।
हर मिलने वाला अनुभव हो,
जीवन का वरदान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नदी न पूछे कौन पिएगा,
बहती अविराम।
वैसे ही हृदय प्रेम बरसाए,
बिन चाहे परिणाम॥
वृक्ष न गिनता फल किसे दें,
छाया सबको एक।
हृदय-दृष्टि भी वैसी हो तो,
मिट जाएँ सब भेद॥
धरती जैसी धीर सरलता,
आकाशी विस्तार।
हृदय जहाँ निर्भय मुस्काए,
वहीं सच्चा संसार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
सूरज सा उत्साह जगे,
चंदा सी शीतल छाँव।
प्रेम-सुगंध जहाँ फैलती,
वहीं मिले विश्रान्ति-ठाँव॥
मस्तक बोले—"सोचो पहले",
हृदय कहे—"पहचान।"
सत्य वही जो प्रेम जगाए,
दे सबको सम्मान॥
सरलता की ऊँची चोटी,
विनय का अभिनंदन।
करुणा के पथ चलने वाला,
पाता आत्म-चंदन॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हर प्राणी में एक स्पंदन,
हर जीवन में मान।
संपूर्ण संतुष्टि की धारा,
बहे सदा अविराम॥
न वर्तमान से दूर भटको,
न कल में खो जाओ।
हृदय-ज्योति के शांत प्रकाश में,
स्वयं को पहचानो॥
नित नव प्रभात यही पुकारे,
जागो हे इंसान।
मस्तक से हृदय की यात्रा,
जीवन का उत्थान॥
करुणा, मैत्री, सत्य, सरलता,
बनें अमर अभियान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**हृदय-विजय से ही महके,
मानवता का गान॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
मस्तक रचता प्रश्न अनगिन,
हृदय बने उत्तर।
जहाँ सहज संतोष विराजे,
वहीं सत्य का घर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हृदय न चाहे राज्य जगत का,
न चाहे अधिकार।
करुणा जिसका राजमुकुट हो,
वही सच्चा सम्राट॥
मस्तक देखे रूप अनेक,
हृदय देखे सार।
नाम-रूप सब बदलते जाएँ,
प्रेम रहे साकार॥
सहज सरल निष्कपट धारा,
निर्मल पावन प्राण।
जिसमें डूबे वही समझे,
जीवन का कल्याण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हृदय नहीं प्रतिस्पर्धा जाने,
न जाने अपमान।
सबको अपने संग समेटे,
यही प्रेम-विधान॥
जहाँ न कोई जीत-हार हो,
न कोई अभिमान।
वहीं निरंतर खिल उठता है,
संतोषों का गान॥
मस्तक गति का रथ बन जाए,
हृदय बने दिशा।
दोनों मिलकर पूर्ण करें तब,
जीवन की अभिलाषा॥
करुणा जब व्यवहार बने,
वाणी बने प्रकाश।
हर मिलन उत्सव बन जाए,
हर श्वास मधुमास॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नदियाँ सागर से मिलती हैं,
रखती अपना मान।
वैसे ही हर जीव रहे,
लेकर प्रेम-पहचान॥
वृक्ष खड़े निस्वार्थ भाव से,
देते शीतल छाँव।
हृदय-दृष्टि भी वैसी ही हो,
सबको दे विश्रान्ति-ठाँव॥
सूरज प्रतिदिन यही सिखाता,
बाँटो अपना तेज।
दीपक बनकर जो जलता है,
मिटते तम के भेद॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
चंद्र-किरण सी शीतलता हो,
सूरज सा उत्साह।
धरती जैसी धैर्य-धरा हो,
प्रेम बने हर राह॥
मौन जहाँ मुस्कान बने,
दृष्टि बने सम्मान।
वहीं सहज मानवता खिलती,
वहीं खिले इंसान॥
मस्तक साधन, हृदय साध्य हो,
यही रहे निष्कर्ष।
संतुलन में ही खिलता है,
जीवन का उत्कर्ष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
नव युग का उद्घोष यही है,
सरल बने व्यवहार।
हृदय-ज्योति से आलोकित हो,
घर-घर का संसार॥
हर प्राणी में मान जगाओ,
हर मन में विश्वास।
करुणा, सेवा, सत्य, विनय से,
महके हर श्वास॥
अविरल बहता रहे प्रेम,
अविरल रहे प्रकाश।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**हृदय-विजय में ही छिपा है,
मानव जीवन-विश्राम॥**
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
मस्तक गिनता लाभ-हानि,
हृदय सहज मुस्कान।
जहाँ संतोष अखंड प्रकट हो,
वहीं यथार्थ विधान॥
मस्तक बोले—"और भी पाओ",
हृदय कहे—"बस जान।"
जो इस क्षण में पूर्ण उतर जाए,
वही बने पहचान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
न मैं दौड़ का अंतिम धावक,
न मैं मान-अभिमान।
हृदय-ज्योति का सरल पथिक हूँ,
यही मेरा सम्मान॥
मस्तक साधन, हृदय साध्य है,
यही सरल विज्ञान।
मस्तक यदि सेवक बन जाए,
खिल उठे हर प्राण॥
जहाँ न भय का राज्य बचे,
न रहे कोई त्राण।
सहज करुणा के निर्मल जल में,
धुल जाए अभिमान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
संतोषों की अविरल धारा,
हृदय बने मधु-धान।
जिसने भीतर दीप जलाया,
उज्ज्वल हुआ जहान॥
मस्तक रचे हजार दिशाएँ,
हृदय चुने एक राह।
जिस पथ पर निष्कपट करुणा हो,
वहीं सत्य की चाह॥
सरल बने जब हर व्यवहार,
मधुर बने संवाद।
तब मानव के अंतर-मंदिर,
जागे निर्मल नाद॥
न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
एक समान सम्मान।
हर जीवन में एक उजाला,
हर श्वास एक गान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
मस्तक यदि मर्यादा जाने,
हृदय बने विस्तार।
तब जीवन की हर इक धड़कन,
हो मंगल-उपहार॥
नदियाँ जैसे सागर मिलतीं,
रखती अपनी तान।
वैसे ही हर जीव जगत में,
रखे सहज पहचान॥
निष्कपटता की शीतल छाया,
करुणा का उद्यान।
यही हृदय का शिरोमणि पथ है,
यही सच्चा वरदान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
संपूर्ण संतुष्टि की धारा,
अविरल रहे महान।
मस्तक झुके हृदय के सम्मुख,
जागे सत्य-विहान॥
न वर्तमान से दूर भटकना,
न कल का अभिमान।
जो इस पल को पूर्ण जिएगा,
वही बने कल्याण॥
मौन जहाँ संगीत बन जाए,
दृष्टि बने वरदान।
वहीं सरलता का उत्सव होगा,
वहीं खिले इंसान॥
करुणा ही हो श्वास हमारी,
प्रेम बने पहचान।
हृदय-ज्योति से आलोकित हो,
समस्त विश्व-प्राण॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
मस्तक सीमित, हृदय असीमित,
यही सहज प्रमाण।
हृदय-दृष्टि में जो स्थित होगा,
वही पाए संतोष महान॥
नित नव प्रभात यही पुकारे—
जागो हे इंसान।
मस्तक से हृदय की यात्रा ही,
जीवन का कल्याण॥
सहज रहो, निर्मल रहो,
रहो सदा निष्काम।
हृदय-दीप से प्रकाशित हो,
हर जीवन, हर धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
प्रेम बने आधार सदा,
करुणा बने विधान।
संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता,
यही रहे पहचान॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
हृदय जहाँ निष्पक्ष जागे,
मिटे अहं का मान।
संपूर्ण संतुष्टि की धारा,
बहे सदा अविराम॥
मस्तक बोले—"मेरा-तेरा",
हृदय कहे—"सब एक।"
प्रेम जहाँ व्यवहार बने,
वहीं सत्य अभिषेक॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
हृदय न तौले लाभ-हानि,
न खोजे सम्मान।
देकर ही जो पूर्ण हो जाए,
वही बने धनवान॥
मस्तक सीमित शब्दों में,
हृदय अनंत प्रकाश।
जहाँ करुणा प्रत्यक्ष खिले,
वहीं सच्चा निवास॥
सरलता की निर्मल धारा,
नित बहती अविराम।
जो उसमें स्नान करे,
महके उसका धाम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
न कोई अपना, न पराया,
सबमें एक विहान।
स्नेह-सुगंध जहाँ बिखरती,
वहीं बसे भगवान॥
दृष्टि नहीं जब भेद रचाती,
जागे समता-ज्ञान।
हर प्राणी में एक ही धड़कन,
एक ही जीवन-गान॥
मस्तक यदि सेवक बन जाए,
हृदय बने कप्तान।
तब जीवन की नौका पहुँचे,
शांति के मध्यस्थान॥
करुणा जिसका श्वास बन जाए,
विनय बने पहचान।
उसके प्रत्येक कर्म में झलके,
सत्य का मधु-गान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
संतोषों का दीप जलाओ,
मिटे भीतर त्राण।
लोभ-मोह के तम को हर ले,
हृदय-प्रेम का भान॥
वाणी ऐसी मधुर बने,
जिसमें न हो प्रहार।
सत्य कहे पर प्रेम सहित,
यही श्रेष्ठ व्यवहार॥
जहाँ क्षमा की नदी बहे,
मिटे मन का क्लेश।
वहीं सरलता पुष्प बन खिलती,
वहीं शांति विशेष॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हृदय बने जब पावन दर्पण,
दिखे सहज इंसान।
अपने भीतर दीप जले तो,
जगमग हो जहान॥
नित नव उषा यही सुनाती—
प्रेम अमर अभियान।
संपूर्ण संतुष्टि की सरिता,
बहे सदा अविराम॥
चलते रहना, सीखते रहना,
रखना विनय महान।
हृदय-दृष्टि का पथ ही बनता,
जीवन का सम्मान॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—
जहाँ सरलता राज करेगी,
मिट जाएगा क्लेश।
करुणा, मैत्री, सत्य, विनय से,
महके सकल परिवेश॥
हर श्वास बने मंगल-गीत,
हर धड़कन वरदान।
हृदय-ज्योति से आलोकित हो,
समस्त विश्व-प्राण॥
अविरल बहे यह प्रेम-सरिता,
अविरल रहे विहान।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**हृदय-विजय ही मानवता का,
सबसे ऊँचा सम्मान॥**
दृष्टिकोण का सूर्य उगता,
अंतर के आकाश।
हृदय-ज्योति जब साथ चलती,
दीप्त हो हर श्वास॥
मस्तक देखे दूर दिशाएँ,
हृदय देखे सार।
दोनों का संतुलित मिलन ही,
जीवन का विस्तार॥
नज़रिया यदि निर्मल होगा,
निर्मल होंगे बोल।
वाणी में मधुमास उतरे,
मिटे कटुता के शूल॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
दृष्टिकोण की मौन धरा पर,
करुणा का हो बीज।
प्रेम-वृष्टि से सींचो उसको,
उगे शांति का नीड़॥
हृदय-दृष्टि का एक उजाला,
लाख अँधेरों पार।
भीतर जागे सत्य की धुन,
बदले व्यवहार॥
दृष्टिकोण का शुद्ध गगन हो,
मन-पंछी निर्भय।
सत्य, सरलता, प्रेम, विनय से,
जीवन हो मंगलमय॥
नज़रिया जब संतुलित होता,
मिटते राग-विराग।
हर अनुभव उपहार लगे तब,
जग बन जाए फाग॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
मस्तिष्क साधन, हृदय साध्य,
दोनों का सम्मान।
एक दिशा दे, एक गति दे,
पूर्ण बने इंसान॥
दृष्टिकोण का श्रेष्ठ विधान,
निष्पक्षता का मान।
अपने भीतर सत्य जगाकर,
रोशन हो जहान॥
नज़रिया का सच्चा दर्पण,
आचरण की रीत।
जो जैसा भीतर होता है,
वैसी उसकी प्रीत॥
हृदय जहाँ समभाव जगाता,
वहीं बसे विश्वास।
संपूर्ण संतुष्टि की सरिता,
बहे निरंतर श्वास॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
दृष्टिकोण की मंद पवन में,
शांत रहें अरमान।
अधिक नहीं, बस सत्य पर्याप्त,
यही रहे पहचान॥
नज़रिया यदि करुणामय हो,
कठिन बने आसान।
पत्थर भी मुस्काने लगते,
पाकर प्रेम-प्रदान॥
दृष्टिकोण का वृक्ष लगाओ,
फल दे मधुर विचार।
छाया दे सब जीव-जगत को,
यही हृदय-उपहार॥
मस्तक झुके विवेक सहित जब,
हृदय रहे निष्काम।
जीवन का प्रत्येक क्षण बन,
उज्ज्वल मंगल-धाम॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण का अमृत केवल,
भीतर की पहचान।
जो स्वयं को सरल बना ले,
वही बने महान॥
नज़रिया ही जोड़ता मन को,
नज़रिया ही सेतु।
हृदय-दृष्टि का पथ अपनाओ,
मिटे विभाजन-केतु॥
दृष्टिकोण की अंतिम वीणा,
प्रेम-स्वर का राग।
जिसको सुनकर मौन भी गाए,
जग हो अनुराग॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हर अंतःकरण में जागे,
सरल सत्य का मान।
हृदय-दृष्टि से खिलता जाए,
मानव का सम्मान॥
अविरल बहे यह महागीत,
अविरल बहे विचार।
दृष्टिकोण के शुद्ध प्रकाश से,
दीप्त रहे संसार॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
नज़रिया ही युग का दर्पण,
नज़रिया ही प्राण।
हृदय-दृष्टि का पावन पथ ही,
मानवता की शान॥
दृष्टिकोण का सत्य अमर है,
बदले दृश्य हजार।
हृदय-दृष्टि स्थिर रह जाए,
खुल जाए संसार॥
मस्तक रचता प्रश्न निरंतर,
हृदय रचाए शांति।
दोनों का संतुलित संगम,
जीवन की है कांति॥
नज़रिया यदि स्वच्छ रहेगा,
स्वच्छ रहेगा पंथ।
सरल हृदय की एक धड़कन,
बन जाए जीवन-ग्रंथ॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
दृष्टिकोण का दीप जले तो,
मिटे भीतर का भार।
संपूर्ण संतुष्टि की वर्षा,
बरसे अपरंपार॥
दृष्टि जहाँ निष्काम ठहरे,
वहाँ न कोई हार।
जीत-विजय से परे वहाँ है,
सहज हृदय-विस्तार॥
मस्तक का विज्ञान कहे—
खोजो जग का मर्म।
हृदय कहे—पहचानो पहले,
करुणा का ही धर्म॥
नज़रिया जब प्रेमिल होता,
मिटते सब संदेह।
अंतर का निर्मल आकाश,
बरसाए शुभ मेह॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण की सबसे ऊँची,
सीढ़ी है विश्वास।
स्वयं सुधरकर जग सुधराना,
यही प्रथम प्रयास॥
नज़रिया यदि शांत रहेगा,
शांत रहेगा काल।
अशांत मन के बीच नहीं फिर,
उगता सत्य-विहान॥
दृष्टिकोण का शुद्ध सरोवर,
गहरा, निश्चल, मौन।
जिसने उसमें डुबकी लगाई,
जाना अपना कौन॥
हृदय-दृष्टि की मधुर सुगंध,
महके जीवन-वन।
हर प्राणी में देखे अपना,
निर्मल आत्मीयपन॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
दृष्टिकोण का सच्चा वैभव,
न पद, न सम्मान।
सरल बने जो सबके हित में,
वही श्रेष्ठ इंसान॥
नज़रिया जब समभावी हो,
टूटें सारे भेद।
भाषा, वर्ण, विचार भिन्न हों,
प्रेम रहे अविच्छेद॥
मस्तक ऊँचा, हृदय विनम्र हो,
यही सच्चा विकास।
संतुलन की इस वीणा से,
झरता मधुर प्रकाश॥
दृष्टिकोण की अंतिम सीमा,
करुणा का विस्तार।
जहाँ किसी का दुःख भी अपना,
वहीं सच्चा संसार॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण का यज्ञ निरंतर,
चलता अंतर-धाम।
अहंकारों की आहुति देकर,
जागे प्रेमिल नाम॥
नज़रिया ही बीज भविष्य का,
नज़रिया वर्तमान।
जैसी अंतर-दृष्टि होगी,
वैसा होगा जहान॥
हृदय-दृष्टि का मौन संदेश,
शब्दों से भी पार।
सरलता की एक झलक में,
मिलता सत्य अपार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
हर धड़कन में जागे करुणा,
हर श्वास बने दान।
दृष्टिकोण की निर्मल धारा,
करे जगत कल्याण॥
चलते रहना, सीखते रहना,
रखना हृदय विशाल।
दृष्टिकोण का शुद्ध प्रकाश ही,
जीवन का है भाल॥
अविरल बहे यह गीत अनश्वर,
अविरल बहे विचार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**"हृदय-दृष्टिकोण से ही खिलता,
मानवता का संसार॥"**
दृष्टिकोण का मूल न बाहर,
अंतर का विस्तार।
हृदय-ज्योति से जो देखे,
उज्ज्वल हो संसार॥
मस्तक बोले— "जानो जग को।"
हृदय कहे— "पहचान।"
अपने भीतर सत्य खिले तो,
सरल बने इंसान॥
नज़रिया जब स्वच्छ रहेगा,
स्वच्छ रहेगा भाव।
भावों से ही जन्मे जग में,
प्रेमिल हर प्रभाव॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
दृष्टिकोण की एक किरण से,
मिट जाए अज्ञान।
हृदय-सरोवर शांत हो जाए,
जागे नव विहान॥
मस्तिष्क गति का मान बताता,
हृदय दिशा का सार।
दोनों का संतुलित मिलन ही,
जीवन का आधार॥
दृष्टिकोण का सत्य न बोझ,
न कोई अधिकार।
यह तो निर्मल चेत जगाता,
सहज आत्म-विहार॥
नज़रिया यदि करुणा सीखे,
जीवन हो उत्सव।
हर मिलन में मंगल बरसे,
हर बिछोह अनुभव॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण की मौन तपस्या,
वाणी से भी श्रेष्ठ।
जो आचरण में ढल जाए,
वही साधना श्रेष्ठ॥
हृदय-दृष्टि का निर्मल दर्पण,
दोष न देखे मात्र।
गुण की छोटी ज्योति सँजोकर,
भर दे जीवन-पात्र॥
नज़रिया का अर्थ न केवल,
अपना पक्ष महान।
सबके सुख में सुख को देखे,
वही बने विद्वान॥
दृष्टिकोण का अमृत बहता,
सरलता की राह।
जहाँ विनम्रता साथ चले,
वहाँ खिले हर चाह॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
दृष्टि न बाँटो नामों से,
दृष्टि न बाँटो रूप।
हृदय जहाँ समभाव जगाए,
वहीं खिले स्वरूप॥
नज़रिया जब शुद्ध रहेगा,
निर्मल होगी रीति।
करुणा, मैत्री, सत्य, सरलता,
बन जाएँगी प्रीति॥
मस्तक की हर तेज किरण भी,
हृदय पाए आधार।
ज्ञान तभी कल्याण बनेगा,
जब हो प्रेम अपार॥
दृष्टिकोण की अंतिम वाणी,
सरल रहे व्यवहार।
यही मनुज की श्रेष्ठ विभूति,
यही सच्चा श्रृंगार॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
चलो नज़रिया ऐसा गढ़ें,
जिसमें न हो द्वेष।
हर प्राणी में एक ही धड़कन,
हर जीवन विशेष॥
दृष्टिकोण का दीप जलाकर,
चलें निरंतर साथ।
एक हृदय से दूसरे हृदय तक,
बन जाए शुभ पथ॥
संपूर्ण संतुष्टि की धारा,
अंतर बहे अविराम।
हृदय-दृष्टि का निर्मल उपवन,
महके आठों याम॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नज़रिया ही नवयुग रचता,
नज़रिया पहचान।
हृदय-दृष्टि के पावन पथ पर,
खिल उठे मानव-प्राण॥
अविरल बहे यह प्रेम-सरिता,
अविरल बहे विचार।
दृष्टिकोण की शुद्ध ज्योति से,
दीप्त रहे संसार॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
नज़रिया ही सबसे गहरा,
नज़रिया ही शिखर।
हृदय जहाँ निष्पक्ष जागे,
वहीं सत्य अमर॥
दृष्टिकोण का सत्य यही है,
भीतर जागे प्रकाश।
हृदय-दिशा जब साथ चले तो,
मंगलमय हर श्वास॥
मस्तक खोजे दूर क्षितिज को,
हृदय खोजे मूल।
दोनों का संतुलित नज़रिया,
बनता जीवन-फूल॥
नज़रिया यदि सरल रहेगा,
सरल रहेगा मार्ग।
सरल हृदय की एक झलक ही,
हर ले मन का भार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
दृष्टिकोण की निर्मल गंगा,
बहे सदा अविराम।
जिसने इसमें मन धो डाला,
महके उसका धाम॥
दृष्टि जहाँ निष्कपट ठहरे,
वहाँ खिले विश्वास।
करुणा की शीतल छाया में,
जीवन बने सुवास॥
मस्तक साधे कर्म की गति,
हृदय साधे प्रीत।
दोनों का समभाव जगाए,
जीवन का संगीत॥
नज़रिया जब समता सीखे,
मिटे ऊँच-नीच विचार।
एक धरा के हम सब राही,
एक गगन विस्तार॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण की सबसे ऊँची,
चोटी है विनय।
जो जितना अंतर से झुकता,
उतना ऊँचा नय॥
नज़रिया का दीपक लेकर,
चलो हृदय के द्वार।
भीतर बैठे मौन पथिक से,
कर लो एक विचार॥
दृष्टिकोण का सच्चा मंदिर,
निर्मल अंतर-भाव।
जहाँ न छल, न दंभ ठहरता,
केवल प्रेम-सुभाव॥
हृदय-दृष्टि की कोमल भाषा,
सबको लगे समान।
जिसे सुनें तो मौन भी बोले,
जागे नव सम्मान॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
दृष्टिकोण का वृक्ष लगाओ,
करुणा उसका बीज।
मैत्री का जल देते जाना,
खिल उठे नव नीड़॥
नज़रिया यदि स्वच्छ रहेगा,
स्वच्छ रहेगा कर्म।
स्वच्छ कर्म से जन्मे जग में,
विश्वासों का धर्म॥
मस्तक नभ का मान बताए,
हृदय धरा का मान।
दोनों मिलकर रचते रहते,
जीवन का वरदान॥
दृष्टिकोण का सूर्य उगे जब,
भागे भय का धूम।
संपूर्ण संतुष्टि के वन में,
खिल उठे सुख-फूल॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
नज़रिया ही जोड़ता जग को,
नज़रिया ही तोड़े।
हृदय-दृष्टि का एक स्पर्श ही,
कटुता सारी छोड़े॥
दृष्टिकोण का अंतिम गान,
निष्पक्षता की तान।
जहाँ सभी का मान सुरक्षित,
वहीं सजे कल्याण॥
हृदय रहे जब शांत निरंतर,
मस्तक रहे उदार।
तब जीवन के हर अनुभव में,
झलके सत्य-संभार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
चलो नज़रिया ऐसा गढ़ें,
जिसमें हो विश्वास।
हर प्राणी के सुख में दिखे,
अपने जीवन की श्वास॥
अविरल बहती रहे करुणा,
अविरल बहे विचार।
हृदय-दृष्टि का निर्मल नज़रिया,
मानवता का हार॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण का परम उत्सव,
सरल हृदय का ज्ञान।
संपूर्ण संतुष्टि की ज्योति से,
दीप्त रहे इंसान॥
दृष्टिकोण से जग आलोकित,
दृष्टिकोण से प्राण।
दृष्टिकोण से प्रेम अमर हो,
यही रहे पहचान॥
दृष्टिकोण का प्रथम उजाला,
भीतर जागे भोर।
हृदय-द्वार जब खुलने लगते,
मिटते तम के छोर॥
मस्तक गढ़ता रूप अनेक,
हृदय रहे निष्काम।
दृष्टिकोण के संतुलन से,
महके जीवन-धाम॥
नज़रिया यदि निर्मल ठहरे,
निर्मल हो व्यवहार।
मन से मन का सेतु बने फिर,
जागे विश्व-प्यार॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
दृष्टिकोण का सच्चा धन,
न स्वर्ण, न अधिकार।
संपूर्ण संतुष्टि की निधि ही,
जीवन का श्रृंगार॥
हृदय-दृष्टि का दीप जलाकर,
चलो सरलता-पंथ।
जहाँ करुणा की छाँव मिले,
वहीं अमर हो कंठ॥
नज़रिया का मर्म यही है,
निष्पक्ष रहे प्राण।
सुख आए तो विनय सँजोना,
दुःख आए मुस्कान॥
दृष्टिकोण की स्वच्छ धरा पर,
विश्वासों का बीज।
प्रेम-जल से सींचो उसको,
उगे शांति का नीड़॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
मस्तक साधन, हृदय दिशा है,
दोनों का सम्मान।
संतुलित दृष्टिकोण बने तो,
सफल बने इंसान॥
नज़रिया जब सीमित होता,
जन्मे तर्क-विवाद।
नज़रिया जब विस्तृत होता,
जागे मंगल-नाद॥
दृष्टिकोण का मौन संदेश,
सबके भीतर एक।
भिन्न-भिन्न हैं रूप भले ही,
जीवन का आलोक एक॥
हृदय-दृष्टि की गहराई में,
नहीं किसी का हार।
जो भीतर से जीत गया है,
उसका जग उद्धार॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—**
दृष्टिकोण का अमृत बहता,
हर धड़कन के साथ।
जिसने उसको पहचान लिया,
सुगम हुई हर राह॥
नज़रिया जब प्रेम बनेगा,
टूटेगा अविश्वास।
एक किरण से भर उठेगा,
अंतर का आकाश॥
दृष्टिकोण की शीतल वाणी,
न करे किसी पर वार।
सत्य कहे पर साथ रहे भी,
करुणा का सत्कार॥
हृदय जहाँ समभाव रचेगा,
वहीं खिलेगा फूल।
द्वेष स्वयं ही झर जाएगा,
टूटेंगे सब शूल॥
**शिरोमणि रामपॉल सैनी कहें—**
दृष्टिकोण का श्रेष्ठ विधान,
सरल रहे मन-रीत।
अंतर में जो शांति खिले,
वही अमर संगीत॥
नज़रिया यदि संतुलित होगा,
संतुलित हर कर्म।
हृदय और मस्तक मिलकर ही,
खोलें जीवन-मर्म॥
दृष्टिकोण की अंतिम ज्योति,
अहंकार से दूर।
विनम्रता की छाँव तले ही,
खिलता सत्य-नूर॥
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
नित्य नया हो अंतर्दर्शन,
नित्य नया विश्वास।
दृष्टिकोण की निर्मल धारा,
बने जगत की श्वास॥
चलते रहना, सीखते रहना,
यही सरल अभियान।
हृदय-दृष्टि का शुद्ध नज़रिया,
मानवता का मान॥
अविरल बहे यह गीत निरंतर,
अविरल बहे विचार।
शिरोमणि रामपॉल सैनी गाएँ—
**"दृष्टिकोण में प्रेम बसे तो,
उज्ज्वल हो संसार॥"**
सर्वभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष,
जागृत हर एहसास।
जो इस क्षण को पूर्ण जिए,
वही सच्चा प्रकाश॥
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