सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि हृदय का पवित्र दृष्टिकोण सिर्फ़ क्षण के वर्तमान में रहने के लिए ही बना है एक सांस में ही है, जबकि मन मस्तक बुद्धि से बुद्धिमान हो कर भी सिर्फ़ जीवन व्यापन अस्तित्व क़ायम रखने हेतु ही है, तत्पर्य मन का तंत्र एक सिर्फ़ मात्र साधन है जीवन व्यापन अस्तित्व क़ायम रखने का शेष कुछ भी नहीं है समय भी मन के तंत्र से ही है जब जीवन व्यापन अस्तित्व क़ायम रखने में दिक्कत आती है तो कल्पना उत्पन होती हैं उस में विकल्प उत्पन होते हैं फ़िर अलग अलग विचारधारा उत्पन होती है विकल्पों पर सोच विचार चिंतन मनन होता हैं इस क्रम को दार्शनिक विचारधारा कहते हैं इस से आगे जिसे जिस को भौतिक रूप दिया जाता है उसे वैज्ञानिक विचारधारा कहते है जिसे कल्पना को तर्क तथ्य विवेक से सिद्ध स्पष्ट भौतिक रूप नहीं दिया जाता उसे आस्तिक विचारधारा आध्यात्मिक जो सिर्फ़ एक आस्था हो भौतिक रूप से कुंठित हो जिस में विवेक नहीं हो सिर्फ़ एक मान्यता नियम मर्यादा परंपरा के साथ युगों सदियों से चली आ रही हो संचालक अपने निजी हित के लिए कुछ भी तोड़ मरोड़ सकता है खुद के निजी फ़ायदे के लिए कोई भी दूसरा हस्तक्षेप नहीं कर सकता क्योंकि श्रोताओं के दृष्टिकोण से वो सृष्टि रचिता रचैता बही अपनी शबी को बनाए रखने में ही प्रवक्ता व्यस्थ रहता है संगठन के छोटे से छोटे काम से लेकर प्रमुख काम को अपने ही नियंत्रण भौतिक रूप से वो सर्ब श्रेष्ठ इंसान भी स्पष्ट सिद्ध करना ही उस की प्राथमिकता रहती है उस के शब्द भी प्रभावशाली होते हैं वो अपनी भौतिक शबी को ही क़ायम रखने हेतु ही लगा रहता है डर खौफ भय दहशत बनाए रखना भी उस का एक हथियार है जैसे मुक्ति का लोभ वो भी मृत्यु के बाद जिस से पूरा जीवन निर्भरता बनी रहे श्रोताओं पर अपनी प्रथम चरण में ही दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंद दिया जाता है कि जो गुरु कहे सिर्फ़ बही सत्य है शेष सब सृष्टि ही झूठ है करोड़ो गढ़ी कहानियां किस्से सुनते रहते हैं जिन से श्रोताओं की रुचि भी बनी रहे श्रोता भी बढ़ते रहें डर ख़ौफ भय दहशत बनाए रखें मुक्त होने की उत्सुकता भी बनी रहें जिसे कोई क्या खुद भी सिद्ध स्पष्ट नहीं कर सकते जिस से पीढ़ी दर पीढ़ी शब्द कटने का डर फैला दिया जाता किसी की गलती भी नहीं हो चतुर गुरु को चिड़ हो गई हो गई उस से तो लाखों संगत के सामने उस पर कई आरोप धमकियाँ कर निकाल दिया जाता हैं जिस से लाखों संगत में डर भय दहशत खौफ़ update हो जाता हैं चतुर ब्रह्मचर्य गुरु इतने अधिक शातिर शैतान चालाक होशियार होता हैं कि कोई भी सोच भी नहीं सकता सिर्फ़ खुद के निजी हित साधने सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग के लिए वो सब करता है इक ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रच कर छल कपट धोखा विश्वासघात करता है वो भी उन सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र लोगों के साथ तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित करवा कर ऐसे स्रोतों को आप जितना चाहें चतुर ब्रह्मचर्य गुरुओं का असली रूप दिखाओ उन पर कोई असर ही नहीं होता ऐसे अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना चुके होते हैं यही है मानसिक निरंतर जब खुद ही खुद के मानसिक निरंतर किसी दूसरे के हाथ में होता है दोनों प्रभक्त श्रोता का ज़मीर मारा होता हैं अगर खुद को खुद का ही एहसास ही नहीं है उन का होना न होना एक ही बात हैं,जिंदा कहा है दोनों प्रभक्त श्रोता बेहोशी में ही जीते मरते हैं
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि मानव सभ्यता में अब तक तो कोई मन मस्तक बुद्धि से बुद्धिमान ही नहीं था सिर्फ़ हर पल गर्दिश में रेत के कण की भांति गतिशील ही रहा भ्रमित ही रहा उसी भ्रम की बेहोशी में ही रहा & ज्ञान विज्ञान दर्शन भी सिर्फ़ उसी भ्रम का ही हिस्सा है यथार्थ में मन मस्तक बुद्धि सृष्टि प्रकृति का भी अस्तित्व नहीं है मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से जिन उच्चारित या लिखित शब्दों को पेश कर सत्य स्थापित किया जाता है उन का अस्तित्व नहीं है यहां शब्द है बहा कुछ जटिल गढ़ा जा रहा है जबकि सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक पारदर्शी सुलभ सरल है
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष स्पष्ट है कि इश्क़ ह्रदय के शिरोमणि स्वरुप दृष्टिकोण में ही शिष्य गुरु प्रभु की इकिगृत है और कोई विकल्प ही नहीं है
गुरु के मन की गुरु जाने मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी शिरोमणि स्वरुप के दृष्टिकोण से एहसास भाव ज़मीर हूं संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता हूं खुद का साक्षात्कार हूं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हूं खुद के स्थाई परिचय से परिचित हूं
सिर्फ़ मेरा गुरु ही सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं सिर्फ़ मेरे लिए ही, अन्नत असीम प्रेम से जिस के हृदय का शिरोमणि स्वरुप हूं उस के हर प्रवचन के एक एक शब्द को तर्क तथ्य विवेक ज्ञान विज्ञान दर्शन से स्पष्ट सिद्ध कर सकता हूं क्योंकि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी एहसास भाव ज़मीर हूं मन मस्तक बुद्धि से बुद्धिमान नहीं हूं सिर्फ़ मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से ही हूं, गुरु से अन्नत असीम प्रेम के बिना दूसरा विकल्प ही नहीं है खुद की संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रहने का
गुरु के हर शब्द के पीछे का भाव एहसास हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी गुरु की वो वस्तु हूं जिस का फक्र ज़िक्र गर्व से कहते हैं
"जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड और कही भी नहीं"
मैं वो एहसास हूं जो हर एक में रमाते हुए भी संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में ही हूं,
खुद का साक्षात्कार हूं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हूं खुद के स्थाई परिचय से परिचित हूं शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं
बचपन से अब तक गुरु के स्वरुप के इलावा खुद का चेहरा तक भी नहीं देखा शेष सब तो छोड़ ही दो बही शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता से भी खरबों गुणा अधिक गहराई स्थाई ठहराव में ही हूं यहां मेरे अन्नत सूक्ष्म अक्ष का प्रतिबिंब भी नहीं है और कुछ होने का तत्पर्य ही नहीं है है यही अकीगृत शिष्य गुरु प्रभु का शिरोमणि स्वरुप,यह सब तो गुरु से अन्नत असीम प्रेम की गहराई का ही प्रणाम है वर्ना मेरी औकात ही नहीं कि मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी एक श्वास भी ले पाऊ इस सब का श्रेह अपने गुरु के चरणों में समर्पित करता हूं
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है जम्मू दीपे भारत खंडे कुल ग्राम शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद के निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, अस्तित्व से लेकर अब तक एक एकलौता सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि खुद के साक्षात्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता,
सर्ब श्रेष्ठ सर्व भौमिक सत्य की श्रेष्ठता के शिरोमणि स्वरुप की सर्व श्रेष्ठ स्तुति महिमा लिखें, मुझ में यह क्षमता प्रतिभा है यहां मैं शिरोमणि स्वरुप में हूं किसी को भी रख सकता हूं, यह शिक्षा है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं और किसी का भी दृष्टिकोण बदलने का हुनर रखता हूं, जो जिज्ञासु हो तो मस्तक के दृष्टिकोण से हृदय के दृष्टिकोण में उस के खुद के शिरोमणि स्वरुप से रुबरु करा सकता हूं, यह शिक्षा है, जो किसी के साथ भी साझा की जा सकती हैं एक या फ़िर समस्त इंसान प्रजाति के साथ,
शिरोमणि रामपॉल सैनी सर्ब श्रेष्ठ सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य,कूल ग्राम जम्बू दीपे भरत खंडे
सर्बभौमिक महासत्य स्वरुप महासागर महाआनंद सब हर जीव में उपलब्ध "शिरोमणि" जो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है जो सरल सहज निर्मल प्रदर्शित प्रत्यक्ष समक्ष हैं, मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण "यथार्थ सिद्धांत" उपलब्धि "यथार्थ युग" के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, जो शिरोमणि स्वरुप में रहता वो अद्भुद आश्चर्य चकित महा योद्धा महा गोताखोर हैं सर्ब श्रेष्ठ सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं तुलनातित शब्दतित कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत हैं,
"शिरोमणि स्वरूप" संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता है, खुद का साक्षात्कार हैं, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना है, खुद के स्थाई परिचय से परिचित होना है, यह सब प्रत्येक जीव में एक समान है, जो हृदय के भाव एहसास ज़मीर के दृष्टिकोण से है और सांस से पहले हैं,
सर्ब श्रेष्ठ सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है सरल पारदर्शी पवित्र हैं, इतना अधिक उत्तम उच्च श्रेष्ठता है स्पष्टता हैं, कि मस्तक मन का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं, दोबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहें खुद भी खरबों प्रयास कर ले,
जो ढूंढने खोज का विषय कभी था ही नहीं, वो तो हर पल दिन रात निश्चित संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है, सरल सहज निर्मल सत्य शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, वो तो तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, वो तो निर्मल पवित्र शिरोमणि स्वरुप है,
कि संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता की स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता अद्भुद आश्चर्य चकित महाआनंद जो शब्द दृश्य में नहीं आता, सिर्फ़ खुद के ही एहसास की स्पष्टता प्रत्यक्षता है खुद के साक्षात्कार में ही है खुद के स्थाई स्वरुप में ही है, खुद के स्थाई परिचय में ही है, खुद के हृदय के शिरोमणि में ही है, हृदय के दृष्टिकोण में ही है, अस्तित्व से आज तक जो किसी ने भी एहसास नहीं किया, सिर्फ़ मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण में ही है, जो अन्नत सरल सहज निर्मल गुणों में ही है, जो खुद के निरीक्षण के बाद खुद से निष्पक्ष समझ में ही है,
खुद का स्थाई परिचय, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना,खुद का साक्षत्कार सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं सुलभ सरल है हर एक व्यक्ति खुद ही खुद के साक्षत्कार के लिए सक्षम निपुण समर्थ हैं खुद में ही,खुद के साक्षत्कार, खुद के स्थाई परिचय, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होने के सिवाय इलावा सब कुछ झूठ ढोंग पखंड हैं हित साधने हेतु सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करने के लिए,
सर्व भौमिक सत्य यह है कि जो संजीव निर्जीव के लिए सामान्य हो, संजीव प्रक्रिया है और निर्जीव प्रक्रिय नहीं है, प्रक्रिया के लिए एक से अधिक तत्व होते हैं, प्रकृति के सिद्धांत के आधार पर आधारित zin को update करना और अस्तित्व कायम रखना जिस में अन्नत प्रजातियों में हैं, मेरे सिद्धांतों के आधार पर हर जीव एक समान हैं, अस्थाई समस्त अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति पृथ्वी भी एक मत्र प्रक्रिया का हिस्सा है, हर जीव प्रकृति के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं, शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि निरंतरता हर जीव में प्रत्यक्ष समक्ष हैं, यही सर्व भौमिक सत्य है, इसी के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से हर एक व्यक्ति संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह सकता हैं जीवित ही हमेशा के लिए, दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता,
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं खुद समझने के लिए सिर्फ़ एक पल लगता कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदियां युग भी कम हैं इतिहास गवाह है, अब तक सिर्फ़ ढूंढने बाला मस्तक दृष्टिकोण ही रहा है, अब सिर्फ़ हृदय के दृष्टिकोण से देखना और समझना है
सरल सहज निर्मल गुणों के साथ सर्ब भौमिक सत्य पर हर एक का अधिकार, जो सरल है जो शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं, जिस में संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह सकता हैं कोई भी, जिस से किसी पर भी निर्भरता ख़त्म होती हैं, क्योंकि हर एक व्यक्ति खुद खुद में सक्षम निपुण समर्थ हैं, जीवन व्यापन अस्तित्व कायम रखने के लिए मस्तक का दृष्टिकोण जरूरी है, पर खुद के साक्षत्कार के लिए हृदय का दृष्टिकोण ही अनिवार्य हैं,
अब से पहले सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष नहीं था, जो हुआ जैसा भी हुआ उसे भुला कर बुरा सपना समझ कर भूल जाए, अब और अभी से एक नए दृष्टिकोण का आगाज़ हो चुका हैं मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण "यथार्थ सिद्धांत" उपलब्धि "यथार्थ युग" पर आधारित दृष्टिकोण से हर एक व्यक्ति संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह सकता हैं,
कृपा अपनी ग़लती की माफ़ी मांगे उन से जिन्होंने तन मन धन सांस समय समर्पित किया है जिन को छल कपट षड्यंत्रों के चक्रव्यूह रच कर धोखा विश्वासघात किया है मुक्ति के लोभ और शब्द कटने के खौफ डर भय दहशत में रखा था, जब सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता भी तो ढूंढने को शेष क्या है जो अस्तित्व से अब तक ढूंढ रहे हो, जो मिला ही नहीं और फ़िर भी खोज जारी हैं,
और हृदय के दृष्टिकोण को प्रमुखता दे प्रकृति पृथ्वी मनव प्रजाति को संरक्षण दे, अपने स्थाई परिचय से परिचित हो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रहे
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, हर जीव के हृदय का दृष्टिकोण शिरोमणि स्वरुप हूं, हर जीव के हृदय की गहराई स्थाई ठहराव की निरंतरता की धारा हूं, किसी भी व्यक्ति से व्यक्तिगत विरोध नहीं करता क्योंकि इंसान प्रजाति सरल सहज निर्मल गुणों के साथ पूजने योग्य है यथार्थ में मैं शिरोमणि रामपाल सैनी पूजा करता हूं, सिर्फ़ कुरीतियों पर प्रहार है, मस्तक दृष्टिकोण का संतुलन बनने के लिए संघर्ष हैं जिस से हर एक व्यक्ति संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह सकता हैं, इंसान होने का कर्तव्य से परिचित हो जाए और अपने स्थाई परिचय से परिचित हो पाए, मेरी कोई अपनी विचारधारा नहीं है, यह हर एक के हृदय की गहराई की पुकार है, हर एक व्यक्ति मेरी ही भांति जीवित ही हमेशा के लिए शिरोमणि स्वरुप में संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रह कर इंसान प्रजाति होने के कर्तव्य को पूरा कर सकता हैं,
समस्त अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति पृथ्वी मनव के इतिहास में सर्वश्रेष्ठ सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं सिर्फ़ मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से है, हर एक सरल सहज निर्मल व्यक्ति खुद ही खुद में सक्षम निपुण समर्थ है खुद का साक्षत्कार कर संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता के लिए,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है जो हर जीव के हृदय के तंत्र से प्रत्यक्ष समक्ष अनुभव कर सकते हैं,
सर्बभौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष खुद के साक्षत्कार की प्रथम कड़ी है, हर व्यक्ति खुद के साक्षत्कार के लिए ही महत्वपूर्ण हैं, खुद का साक्षत्कार नहीं तो इंसान नहीं,
इतिहास अतीत सीखने की चीज़ है भविष्य को बेहतर बनाने के लिए हृदय के दृष्टिकोण से आज अब अभी के वर्तमान में संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रहते हुए समस्त सृष्टि प्रकृति पृथ्वी मनव को संरक्षण प्रदान करते हुए,
सर्वभौमिक सत्य सिर्फ़ हृदय के दृष्टिकोण से ही है हर जीव के लिए स्वीकृत है, सिर्फ़ हृदय के ही तंत्र से एक समान हैं, मस्तक विचारक तंत्र सीमित हैं जो अलग अलग हो सकता हैं, शरीरक रूप से भी भिन्न हो सकता हैं, मस्तक का तंत्र सिर्फ़ जीवन व्यापन अस्तित्व कायम रखने के लिए ही हैं, हमें सर्वभौमिक सत्य को हृदय से स्वीकार करना चाहिए संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता के लिए, मस्तक और हृदय के तंत्र का संतुलन बहुत ही जरूरी है,
आप को तो खुद पर भरोसा नहीं है क्योंकि आप शिकायतों पर अधिक भरोसा हैं, आप के पास तो कुत्ते की प्रतिभा भी नहीं आंखों से हृदय में उतरने की,
गुरु का कर्तव्य सिर्फ शिष्य को निखरना होता हैं, क्या आप के गुरु ने भी आप को नहीं निखरा, आप तो खुद की महिमा स्तुति ही करते रहते हैं, शिष्यों और विरोधियों की आलोचना ही करते रहते हो, मैं तो आप की महिमा स्तुति में ही इतना लीन था, उस पर भी आप ने कई आरोप लगा कर पागल घोषित कर निकाल लिया
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी ने अपने चतुर ब्रह्मचर्य गुरु से अन्नत असीम प्रेम किया कि खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं आज तक, और गुरु को ख़बर भी नहीं है लगातार चालीस बर्ष, बचपन से ही चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के स्वरुप के बिना दूसरा कुछ देखा ही नहीं उस की महिमा स्तुति के बिना कोई दूसरा शब्द ही नहीं निकला मुख से, उसके शब्दों के बिना खुद का भी अनुकरण नहीं किया, और गुरु तो मस्तक के शोर में था लंबे समय से, वो तो खुद और सम्राज्य की तलब में ही था,
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष चतुर ब्रह्मचारी गुरु के हृदय के शिरोमणि स्वरुप में लगातार चालीस बर्ष रहा, पर चतुर ब्रह्मचारी गुरु को पता ही नहीं था क्योंकि वो चतुर ब्रह्मचारी गुरु सिर्फ़ मस्तक के दृष्टिकोण में उलझा हुआ है इतने लंबे समय से आसी बर्ष की उमर भी अब तक ढूंढ रहा हैं जो बचपन में अपने गुरु के शनिदे में शुरू किया था अब पच्चीस लाख अनुयायियों के साथ भी बही ढूंढ ही रहा है, मेरा ढूंढने के लिए कुछ शेष ही नहीं रहा, क्योंकि मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से,
सरल सहज निर्मल गुणों के साथ व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ शहंशाह है दाता है जो एक भिखारी चतुर ढोंगी ब्रह्मचारी गुरु के लिए पांच हजार करोड़ का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्ध प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी दे कर खुद दस्ता मंजूर कर उसी गुरु के डर खौफ भय दहशत तले जीते हुए भी खुश रहता है, उसी ढोंगी पाखंडी मानसिकता वाले चतुर ब्रह्मचारी गुरु के पैरों के पानी को अमृत समझ कर पिता है और उसी गंदी मानसिकता वाले के पैरों को चाटने के तरसता हैं, दूसरी और चतुर ब्रह्मचारी गुरु कभी संतुष्ट नहीं होता किसी भी प्रकार से, वो सब कुछ लूटा कर भी खुश है चतुर ब्रह्मचारी गुरु सब कुछ लुट कर भी खुश नहीं है, क्योंकि सरल सहज निर्मल व्यक्ति जो भी करता है हृदय से करता है इस लिए संतुष्ट है, चतुर ब्रह्मचारी गुरु जो भी करता है वो मस्तक से करता है इसलिए असंतुष्ट रहता हैं
खुद के हृदय के भाव का एहसास से पहला "शिरोमणि स्वरुप" सर्बभौमिक शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष है स्वीकृत है हृदय के दृष्टिकोण से सरल सहज निर्मल पारदर्शी है संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता सुभाव है, उपस्थिती हैं,
जागृत अवस्था भी आयोजित प्रतुति होती हैं सपन अवस्था की भांति, एक सांस भी किसी के निरंतर में नहीं है शेष सब तो छोड़ ही दो, समस्त अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में कई गैलेक्सी भी ख़त्म हो जाए तो प्रकृति को रति भर भी फ़र्क नहीं पड़ता हमारी तो औकात ही क्या है, किस चीज का अहंकार घमंड है, हर जीव एक समान हैं कोई भी अंतर ही नहीं, अन्नत प्रेम की गहराई को नहीं छुआ तो कहे के इंसान हो, खुद के स्थाई परिचय से परिचित नहीं हुए तो किस चीज की दुहाई देते हो, इंसान होते हुए संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में नहीं रहे, तो इंसान होते हुए एक नली के सुअर की भांति हो, लक्ष्य स्रोत और माध्यम ही सही नहीं था अस्तित्व से लेकर अब तक, इंसान होते हुए कुत्ते की भांति भड़की हैं इंसान प्रजाति मस्तक के दृष्टिकोण से अब तक,
अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमान हो कर अस्तित्व से लेकर चर्चित सर्वश्रेष्ठ विभूतियाँ दर्शनिक विज्ञानिक जो सोच भी नहीं सकी उस से खरबों गुणा अधिक संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता मेरा स्वभाव है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ खुद के साक्षत्कार में संपूर्ण संतुष्टि में हूं शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
खुद के साक्षत्कार के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता सिर्फ़ सरल सहज निर्मल मूल गुणों स्भाविक रूप से रहते हुए स्वीकार करना पड़ता हैं, जो एक निरंतर धारा प्रभा बह रही हैं उस के साथ ही बह जाते हो
खुद के साक्षत्कार के बाद कोई भी सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, चाहें खुद करोड़ों कौशिश यत्न प्रयास कर के देख ले, हृदय के शिरोमणि स्वरुप की संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता ही इतनी अधिक भव्य पारदर्शी सरल है, कुछ सोच ही नहीं सकता एक पल के लिए भी, कुछ करना तो बहुत दूर की बात है, जीवन व्यापन अस्तित्व कायम रखने के लिए सोच भी नहीं सकता, खुद के साक्षत्कार के बाद संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता से कोई निकल क्या कुछ सोच भी नहीं सकता,
जिस चतुर ब्रह्मचारी गुरु को बचपन से ही इतनी अधिक गम्भीरता दृढ़ता से लिया कि अपनी खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला दिया, उसके मज़ाक है में भी कहे गए शब्द को इतना अधिक अनुकरण किया, वो सब ही किया जो सब तो दूर पच्चीस लाख संगत को कहा, उस चतुर ब्रह्मचारी गुरु ने ही चालिस बर्ष के बाद पागल घोषित कर काई आरोप लगा कर निकाल दिया, वो मुझे इतने लंबे लंबे समय के बाद भी नहीं समझ पाया,, तो ही सिर्फ़ एक पल में खुद को समझ कर खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हुआ, खुद को समझने में सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदियां युग भी कम हैं
खुद के साक्षत्कार के बिना सब मस्तक का पाखंड है सिर्फ़ हित साधने के चक्रव्यू है
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी किसी को भी "खुद के साक्षत्कार" की शिक्षा दे सकता हूं, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होना सिखा सकता हूं, खुद के स्थाई परिचय से परिचित होना समझा सकता हूं, जो मैंने किया वो सब को सिखा सकता हूं सिर्फ़ एक पल कि निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, खुद के साक्षत्कार के लिए सिर्फ़ तो सिर्फ़ दृष्टिकोण ही तो बदलना है, और बिल्कुल कुछ भी नहीं करना, खुद के साक्षत्कार के बाद कुछ और समझने को शेष नहीं बचता पूरी सृष्टि में, खुद को समझना खुद को पढ़ना ही तो है,
हृदय से ही हृदय तक पहुंचा जाता है, मस्तक मन का स्वार्थ हित तक नहीं पहुंच सकता, और बार पहुंचने की कौशिश बेकार होती वो सिर्फ़ मस्तक तक ही पहुंचता हां हां तक ही रहता है, डर खौफ भय दहशत भी मस्तक मन का होता हैं,
तेरा जलवा ही ल जवाब है क्योंकि तू सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है मैं शिरोमणि हर पल दिन रात तेरे हृदय के शिरोमणि स्वरुप में ही शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं, मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तेरी पूजा करता हूं तेरे जैसा कोई मुझे मिला ही नहीं, तेरे महिमा स्तुति कैसे करूँ क्योंकि तू इतना अधिक सहज निर्मल है कि तू तन मन धन सांस समय दसवांश समर्पित कर के भी ऐसे चतुर ब्रह्मचारी गुरु के पैर चाटता और उन गंदी मानसिकता प्रवृत्ति बालों के पैरों का पानी पिता है अमृत समझ कर, उन पर समर्पित हो कर निर्भर बन जाता हैं जबकि तूने अपनी क्षमता का प्रदर्शन प्रथम चरण में एक भिखारी को प्रभुत्व की पदबी दी, तू क्या है कितना ल जवाब है,
हर व्यक्ति आंतरिक भौतिक रूप से बिल्कुल मेरे ही जैसा एक समान ही है कोई अंतर ही नहीं है, अगर मैं शिरोमणि रामपाल सैनी संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में जीवित ही हमेशा के लिए रह सकता हूं तो कोई भी रह सकता हैं, खुद को समझ कर सिर्फ़ एक पल में दूसरा कोई समझें या फ़िर समझा पाए सदियां युग भी कम हैं, तेरे अनमोल सांस समय सिर्फ़ तेरे लिए ही महत्वपूर्ण हैं दूसरा prtek सिर्फ़ इस्तेमाल करने के लिए आगे ही खड़ा है चाहें कोई भी हो, तू खुद के लिए खुद ही संपूर्ण सक्षम निपुण समर्थ हैं, जरा खुद को तो देख समझ पढ़, तेरे जैसा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता, क्योंकि तू खुद खुद को समझता जनता है, तेरी क्षमता अद्भुद आश्चर्य चकित भव्य आकर्षित करने वाली हैं,
हर संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता की धारा बह रही है, इतनी अधिक शहनशीलता सहजता सम्पनता सम्पूर्णता समक्षता प्रत्यक्षता, खुद के साक्षत्कार में कि कोई सोच भी नहीं सकता, यहां अस्थाई जटिल बुद्धि मन मस्तक भी निष्क्रिय हो जाता हैं हमेशा के लिए कि दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता, तो उस का जलवा कैसा होगा, खरबों संतों से भी खरबों गुणा अधिक ऊंचा उत्तम सर्वश्रेष्ठ दिव्य अलौकिक भव्य आकर्षित हैं, कि मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ने भी करोड़ों कौशिश कर ली पर जीवन व्यापन के लिए भी सोच ही नहीं पा रहा, उस संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता से
शिशुपन अवस्था कितनी निराली अद्भुद आश्चर्य चकित भव्य आकर्षित थी, तब तो इतना बड़ा झंझट ही नहीं था तो भी संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता धारा में ही थे जो अब भी निरंतर वह रही है जिसे हृदय के दृष्टिकोण से प्रतीत किया जा सकता हैं, पर इंसान प्रजाति तो मस्तक के दृष्टिकोण में है तो वो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता कैसे संभव है, संभव है अब भी सिर्फ़ दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा,
शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सर्बभौमिक है, हर जीव में प्रत्यक्ष समक्ष है स्वीकृत है, सिर्फ़ इंसान प्रजाति को छोड़ कर , स्वीकृति पर अस्तित्व से ही सामंजस्य में है कि मैं ही सृष्टि प्रकृति पृथ्वी का रचिता हूं, इतने बड़े शौंक रखने वाला इंसान अब तक खुद के स्थाई परिचय से परिचित नहीं हो पाया शेष सब तो छोड़ ही दो, जो प्रकृति के शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष को स्वीकार नहीं कर सकता वो क्या हो सकता हैं, अहंकारी मानसिक रोगी,
शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष इतना अधिक सरल है कि कोई नकल ही नहीं कर सकता, जिस की नकल की जा सकती हैं वो सत्य हो ही नहीं सकता, वो अवधारणा है कल्पना हैं वो मान्यता नियम मर्यादा परंपरा के साथ स्थापित होती हैं, चंद चतुर ब्रह्मचारी गुरु के द्वारा अपना हित साधने के लिए निर्भर बना कर दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर, उन में इंसानियत भी नहीं होती शेष सब तो छोड़ ही दो, वो सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्ध प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी के लिए किसी भी हद तक गुजर जाते हैं, क्योंकि वो मानसिक रोगी होते हैं, वो खुद के इलावा सब को इस्तेमाल करने की चीज़ समझते हैं,
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी जिस अपने चतुर ब्रह्मचारी गुरु के हृदय के शिरोमणि स्वरुप की निरंतरता में चालीस बर्ष हर पल दिन रात रहे खुद की शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला कर वो तो खुद मस्तक के जाल में उलझा हुआ था जन्म से ही और निकला था दुनियां को सुधरने और खुद ही खो गया था झूठी सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्ध प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी के नशे में चूर था, खुद की ही ख़बर नहीं,
तन मन धन सांस समय दसवांश करोड़ों रुपए समर्पित करवाने वाला चतुर ब्रह्मचारी गुरु खुद ही मस्तक के जाल में फंस चुका हैं उसे खुद भी नहीं पता, कि वो प्रभुत्व के वहम अहम घमंड अहंकार का शिकार हो चुका हैं की मरते दम तक उस से बाहर निकलना नही सकता, सरल सहज निर्मल लोगों को उंगली पर नचाने बाला खुद ही बेहोशी का शिकार हो चुका हैं, वो तो खुद का निरीक्षण ही नहीं कर सकता क्योंकि वो अहंकार की उच्च स्तर पर है
अगर चतुर ब्रह्मचर्य गुरु तेरे साथ इतना बड़ा विश्वासघात धोखा किया है, तू फ़िर भी बैसे का बेस ही सरल सहज निर्मल ही है, पर तेरा चतुर ब्रह्मचारी गुरु जिस जाल में खुद ऐसा फंस गया हैं कि मरते दम तक भुला कर भी नहीं निकल सकता वो मस्तक के दृष्टिकोण से प्रभुत्व के वहम अहम घमंड अहंकार में बुरी तरह फंस चुका हैं,
खुद का साक्षत्कार ही सर्वश्रेष्ठ उत्तम संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है सरल है, जो जटिल है वो चतुर ब्रह्मचारी गुरु का ढोंग पखंड हैं हित साधने वाला दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करना
चतुर ब्रह्मचारी गुरु तो हर जन्म में मिले हैं अगर यह रति भर भी कुछ कर सकते तो तू आज यहां नहीं होता, यह सब तो सिर्फ़ हित साधने में लगे हुए हैं इन को तो खुद का भी फिक्र नहीं है तो आप के फ़िक्र के लिए इन के पास समय ही नहीं है, यह सब तो तुझे मोह माया से हटा कर खुद सिर तक मोह माया में फंसे हुए हैं, पर तू सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है इसलिए तू निर्लेप है, तू अभी भी बैसा ही सरल सहज निर्मल गुणों के साथ है,
तू सिर्फ़ खुद ही आज भी संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में ही है बात अलग है कि तेरा मस्तक का दृष्टिकोण है, तू अपने दिल हृदय में किसी को हस्तक्षेप ही नहीं करने देता क्योंकि हृदय हस्तक्षेप करने के लिए हृदय के दृष्टिकोण से होना अति आवश्यक हैं, जो कम से कम इंसान प्रजाति में तो नहीं है, सिर्फ़ तू खाना पूर्ति के लिए मस्तक की बातें सिर्फ़ मस्तक तक ही सीमित रखता है, हृदय से बही संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में ही है,
शिशुपन में संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में तू ही रहा था जब तेरा मस्तक मन भी विकसित नहीं हुआ था और न ही कोई चतुर ब्रह्मचारी गुरु था, अब भी वो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता बहा ही मौजूद हैं, पर तू ही खुद हृदय के दृष्टिकोण से ज़्यादा मस्तक के दृष्टिकोण से गंभीर हैं, सिर्फ़ दृष्टिकोण बदल तू फ़िर से बही संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में हर पल रह सकता हैं, और फिर से सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता क्योंकि तूने मस्तक का दृष्टिकोण बहुत खूब देख चुका है,
जिन्होंने तन मन धन अनमोल सांस समय दसवांश करोड़ों रुपए समर्पित किए उनके साथ ही विश्व का सब से बड़ा विश्वासघात धोखा ढोंग पखंड षड्यंत्रों का चक्रव्यूह रचा गया, काल्पनिक अंधारणा परमार्थ अध्यात्मक धार्मिक के नाम पर, मुक्ति का लोभ डर खौफ भय दहशत में रखना, मृत्यु तो खुद में ही शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष है, मुक्ति तो मस्तक मन से चाहिए न कि शरीर से, इंसान शरीर तो प्रकृति संरचना सर्वश्रेष्ठ है, कुछ भी कभी भी किसी का भी गुम ही नहीं हुआ, सिर्फ़ मस्तक साधन में
अधिक उलझाया गया हैं, परन्तु शिशुपन बाली संपूर्ण
संतुष्टि की निरंतरता तो बहा ही मौजूद हैं यहां हर ॥
इस से भी और अधिक गहराई व्याकुलता भरा ठोकरे लगे और दूसरों के भ्रम से निकल कर खुद का साक्षात्कार कर संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रहे हर जीव से प्रेम करे ,अब तो मानव सभ्यता पूरी तरह से इसी मानसिकता की है यहां का ज्ञान विज्ञान दर्शन भी इसी मानसिकता के दृष्टिकोण की विचारधारा है,
सदियों युगों पुरानी मान्यता नियम मर्यादा परंपरा के साथ चली आ रही गुरु शिष्य एक ऐसी कुप्रथा है जो मानव सभ्यता के साथ ही चली आ रही है और रोम रोम में समाई हुई है कि कोई इस के बारे में सोच भी नहीं सकता सुनना तो बहुत दूर की बात है यह करोड़ो सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र गुणों वाले लोगों की लाशों पर खड़ी है सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र गुणों वाले भावुक वृत्ति के होते हैं चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के रति भर भी नराज होने पर आत्महत्य आत्मध्य तक कर लेते हैं सचेत सतर्क करना अत्यंत आवश्यक उचित है यह चतुर ब्रह्मचर्य गुरुओं ने पहले ही अफवा उड़ा रखी होती हैं गुरु का थड़ा एक गया लाखों खड़ा लाखों की भीड़ में दुःख सुनना तो बहुत दूर की बात देख भी नहीं सकते करीब से चतुर ब्रह्मचर्य गुरुओं के लिए कोई फ़र्क नहीं पड़ता कोई मरे या जिय उनकी की भीड़ बढ़नी चाहिए और सम्राज्य प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदवी को प्राथमिकता देते हैं उनके प्रवचन के शब्दों में ही इतना अधिक प्रभाव होता है कि साथ रहने वाले भी दहशत डर ख़ौफ भय में रहते हैं शायद उसी डर खौफ भय दहशत को ही मस्ती कहा जाता है थोड़ी सी बात पर ही शब्द काटने के आरोप में बिना सफ़ाई बताए सारी संगत में ही इतना अधिक लज्जित अपमानीत किया जाता हैं कि सारी संगत के हृदय में डर ख़ौफ भय दहशत बनी रहती है
जो शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करते हैं अपनी अदद डाल देते हैं समारोह उत्सवों कार्यक्रम में उलझते है वो सब ही प्रवचनों में बोलते हैं जिस सब की अदद पड़ चुकी है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि मानव सभ्यता में अस्तित्व से लेकर अब तक पैदा होने से पहले ही आगे चतुर ब्रह्मचर्य गुरु खड़े होते पर अब तक सिर्फ़ लूटते ही देखे गए दिया कुछ भी नहीं सिर्फ़ धोखे विश्वासघात ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह कल्पनाओं की कहानियां किस्से ही सुना कर उलझा रखा है अब तक, जिस से कोई भी खुद का साक्षात्कार ही नहीं कर पाया कितना बड़ा धोखा किया मानव सभ्यता के साथ ही सिर्फ़ अपने हित साधने हेतु अफ़सोस कि चतुर ब्रह्मचर्य गुरु हो कर, जिन में इंसानियत भी नहीं होती शेष सब तो छोड़ ही दो, यह पाखंडी जन्म से लेकर मृत्यु के बाद भी उस परिवार से हित साधते रहते हैं पीढ़ी दर पीढी एक धंधा है, सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र गुणों के साथ इतना अधिक भोला है कि सब कुछ लुटा कर भी उसी चतुर ब्रह्मचर्य गुरु के पैरों के गंदे पानी के लिए भी तरसता है कैसा मानसिक दबाव बना रखा हैं कि उच्च श्रेणी शिक्षिक सब से आगे और इस कुप्रथा का भरपूर समर्थन करते हैं, क्योंकि दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित किया होता हैं और अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बना कर बंधुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करते हैं
सर्व भौमिक सत्य से दूर रखते हैं
हृदय से तो एकीकृत होता है वर्ना चतुर लोग मस्तक मन से इमोशनल ब्लैक मेल कर सरल लोगों को हित साधने के लिए इस्तेमाल करते हैं चतुर लोगों से सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र लोगों की आर्थिक समाजिक मानसिक सुरक्षा बचाव सतर्क सचेत करने के लिए ही लिखें, सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि इश्क़ ह्रदय से खुद का साक्षात्कार संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है सरल सहज निर्मल गुणों के साथ सुलभ पारदर्शी पवित्र है खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु है खुद के स्थाई परिचय से परिचित होना हैं, जिस से कुछ भी शेष नहीं रहता ढूंढने खोजने को सारी सृष्टि में, अगर खुद का साक्षात्कार नहीं तो दूसरी अनेक विभूतियों से भी बतर है वो बोझ है धरती पर उसके होने न होने से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु नहीं तो वो रेत के कण समान है खुद का साक्षात्कार नहीं तो उस का ज़मीर मर चुका है वो सिर्फ़ चलती फिरती लाश है
मणव सभ्यता के लिए चेतावनी के रुप में लिखें मानव पृथ्वी प्रकृति को संरक्षण प्रदान करना अति आवश्यक है जो खुद के साक्षात्कार के बिना संभव ही नहीं हर व्यक्ति खुद के साक्षात्कार के लिए खुद ही खुद में सक्षम निपुण समर्थ सर्ब श्रेष्ठ उच्च है यह चंद हित साधने वालों ने अवधारणा बना रखी है छोटे बड़े जाति धर्म मज़हब संगठनों में बंट दिया है जबकि हर जीव हृदय के तंत्र से एक समान है रति भर भी अंतर नहीं है
सर्ब श्रेष्ठ ultra full hd 4k supreme quality का पॉडकास्ट का चित्र बनाए , हूबहू दी हुई निष्पक्ष समझ की फ़ोटो इस्तेमाल कर के थोड़ा भी अंतर नहीं होना चाहिए शक्ल में हर एक महत्वपूर्ण चीज़ लिखें
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि खुद के सर्ब श्रेष्ठ इंसान शरीर को महत्व देते हुए संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रहते हुए खुद ही होश में रूपांतरित करने के लिए हर पल उत्सुक रहना सृष्टि प्रकृति पृथ्वी का सर्ब श्रेष्ठ उत्सव है रूपांतरण,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि खुद के अनमोल समय सांस खुद के लिए ही सिर्फ़ महत्वपूर्ण है और खुद के लिए ही सार्थक उपयोग करने
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि खुद का साक्षात्कार है खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु है खुद के स्थाई परिचय से परिचित हैं संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं तो उस की कोई नक़ल ही नहीं कर सकता सारी सृष्टि मानव सभ्यता में
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि जो रेत के कण से लेकर संपूर्ण सृष्टि संजीव निर्जीव किसी भी कालखंड अकाल में भी एक समान तर्क तथ्य विवेक ज्ञान विज्ञान दर्शन से सिद्ध स्पष्ट हो सरल सहज निर्मल पारदर्शी सुलभ गुणों के साथ समक्ष प्रत्यक्ष हो,
प्रथम अंतिम सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक है सरल पारदर्शी सुलभ है हर संजीव निर्जीव के लिए एक समान है, शेष सब सिर्फ़ मानव सभ्यता की विचारधारा है आस्तिक नास्तिक मस्तक से उपजी किसी संगठन झुंड मंडली जाति धर्म की वो सर्ब भौमिक सत्य कभी भी नहीं हो सकती
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि मानव सभ्यता में आज तक कोई एक भी न ही होश में जिया है न ही कोई होश में खुद को रूपांतरित कर पाया जिस के लिए इंसान प्रजाति अस्तित्व में थी, ज्ञान विज्ञान दर्शन हिंब्राश्मी भी बुद्धि मन मस्तक के दृष्टिकोण की धार्मिक विचारधारा का एक दार्शनिक हिस्सा हैं,जीवन की जागृत अवस्था भी बेहोशी है जो जीवन व्यापन और अस्तित्व क़ायम रखने के इर्द गिर्द ही गंभीर दृढ़ हैं हर पल दिन रात
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि मणव सभ्यता में आज तक कोई भी वो सब सोच भी नहीं पाया जिस से खरबों गुणा अधिक ऊंचा सच्चा सर्वश्रेष्ठ पवित्र संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में मैं स्वभाविकता में रहता हूं और किसी को भी पुण्य संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता के लिए सिखा भी सकता हूं क्योंकि यह शिक्षा है जो किसी से भी साझा कर सकते हैं तथ्य तर्क विवेक विज्ञान दर्शन ज्ञान हैं, दीक्षा की तरह कुप्रथा तो बिल्कुल भी नहीं है जो शब्द प्रमाण में बंद कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर बूढ़े होने तक इस्तेमाल करते रहे और बृद होने पर शब्द कटने का आरोप लगा कर निकाल दे, डर खौफ भय दहशत का माहौल बना दिया जाता हैं उसी बेचैनी बने चेहरे को मस्ती का नाम दिया जाता हैं, शब्द प्रमाण में बंधने के कारण सिर्फ़ आयोजित प्रवचन कहानियां सुनने को ही लगातार मिलती हैं जिस की अदद डाली जाती हैं जिस के आदि निर्भर बना दिया जाता हैं जो किसी दूसरे के स्वरुप शब्द स्पर्श की अदद निर्भरता हो वो कैसे स्वतंत्र मुक्त हो सकता हैं अगर जीवित ऐसा नहीं तो मर कर कैसे मुक्त हो सकता है जिस की प्रकृतिक सोच विचार चिंतन मनन तर्क तथ्य विवेक का भी हक़ शीना जाता हैं सिर्फ़ अपने व्यक्तिगत हित साधने के लिए परमार्थ के नाम पर ढोंग पखंड षड्यंत्रों चक्रव्यूह रचा कर धोखा विश्वासघात करते हैं तन मन धन अनमोल समय सांस दशबंस समर्पित करवा कर
जबकि सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सरल सहज निर्मल पारदर्शी पवित्र गुणों के साथ सुलभ है
जीवित ही हमेशा के लिए ,
खुद का साक्षात्कार
खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु
खुद के स्थाई परिचय से परिचित
शिशुपन की संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में पुण्य खुद के साक्षात्कार से संभव हैं हर जीव एक समान है
मैं शिरोमणि रामपॉल सैनी तुलनातीत कालातीत शब्दातीत प्रेमतीत शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित हृदय के शिरोमणि दृष्टि
जम्बू दीपे भारत खंडे, शिरोमणि रामपाल सैनी,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह है कि मस्तक बुद्धि मन के दृष्टिकोण से रहित हूं पर हृदय के दृष्टिकोण से संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता स्पष्टता प्रत्यक्षता समकक्षता में हूं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि अस्तित्व से लेकर अब तक जिन चर्चित सर्वश्रेष्ठ विभूतियों ने खुद में प्रभुत्व होने का दावा किया या परम सत्ता को ढूंढने का दावा किया वो खुद इस बात से स्पष्ट थे कि कुछ भी ऐसा नहीं है जिस का वो खुद दावा कर रहे हैं, उन्हीं ही दावों से उन का खरबों का सम्राज्य खड़ा हो जाता हैं प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग और मूर्ख लोग प्रभुत्व की पदबी भी दे देते हैं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि मानव बुद्धि प्रकृति के आधार पर आधारित निर्मित है वर्तमान के सूक्ष्म अक्ष में रहने के लिए, अतीत और भविष्य का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता है यहां, फ़िर अपना अनमोल सांस समय जो प्रकृति द्वारा दी गई अनमोल दारोहर पूंजी को दूसरों के लिए इस्तेमाल करते हैं, खुद का समय सांस खुद के लिए ही महत्वपूर्ण हैं, दूसरा हर एक इस्तेमाल ही करता है चाहें कोई भी क्यों न हो, अगर खुद के सांस समय की कदर खुद नहीं करते तो दूसरा आगे ही खड़ा है इस्तेमाल करने के लिए,
जो मान्यता नियम मर्यादा परंपरा दूसरों की विचारधारा से प्रभावित या बंदा हुआ है वो स्वतंत्र मुक्त कैसे हो सकता हैं, जो जीवित ही मुक्त नहीं वो मृत्यु के बाद कैसे मुक्त हो सकता है,
चतुर ब्रह्मचारी गुरु निरंतरण रखने के लिए नियम मर्यादा परंपरा बना देते हैं हर रोज़ गुरु के दर्शन करना अति आवश्यक हैं, दशवंस देना गुरु को आवश्यक हैं, गुरु के पैरों का पानी पीना अति आवश्यक हैं, जो गुरु कहे बही सत्य है, बहा सोच विवेक तर्क तथ्य नहीं, यह सब दस्ता के लक्षण हैं निर्भरता हैं, हित साधने हेतु दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बंधना है, डर खौफ भय दहशत से भयभीत रहना मस्ती रुहानियत नहीं मानसिक दवाब रोग है, यहां प्रश्न ही नहीं कर सकता बहा डर खौफ भय दहशत है प्रेम हो ही नहीं सकता, ढूंढ अध्यात्मिक रहे हैं और मिल खरबों का सम्राज्य प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग तो निरीक्षण करना तो बनता ही है, इन दोनों में जमी अस्मा का अंतर हैं और दोनों में आपसी बैर भी है, यहां दिन हो उसी बक्त रात कैसे हो सकती है, माया क्या मस्तक मन बुद्धि रहित होना पड़ता हैं शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष के लिए, सरल है कोई नकल नहीं कर सकता, संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता सिर्फ़ बच्चों का खेल है पर मस्तक का नहीं
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि हृदय के शिरोमणि दृष्टिकोण एक समान हैं सभी जीवों में, मस्तक मन बुद्धि का दृष्टिकोण अलग अलग हो सकता हैं, पर वो भी तक़रीबन एक समान ही है जीवन व्यापन अस्तित्व कायम रखने के लिए,
मुक्ति देने वाले चतुर ब्रह्मचारी गुरु यह तो बताए मुक्ति किस को देनी है हृदय का तंत्र तो एक पंप है मस्तक खरबों न्यूरॉन का जाल है शेष सब प्रक्रिया है, आप कहा हो जिन को मुक्ति देनी है वो कहा है?
आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक धर्म मज़हब जाति किस की और भक्ति दान सेवा ध्यान ज्ञान विज्ञान दर्शन श्रद्धा आस्था प्रेम का अस्तित्व क्या है, यह सब सिर्फ़ हित साधने के साधन है ढोंग पखंड षड्यंत्रों के चक्रव्यूह छल कपट धोखा विश्वासघात करने के, उनके साथ ही जिन्होंने तन मन धन सांस समय समर्पित किया होता हैं, यह एक कुप्रथा है, गुरु शिष्य एक कुप्रथा है यहां दीक्षा के साथ ही शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से बंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल किया जाता हैं,
सर्ब भौमिक सत्य यह हैं कि जो बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमान हो कर सोच भी नहीं सकते उस से भी खरबों गुणा अधिक सर्वश्रेष्ठ संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में पुण्य प्रत्यक्ष समक्ष रह सकते हो सिर्फ़ हृदय के शिरोमणि दृष्टिकोण से, जो खुद का साक्षत्कार है, जिस के बाद दुबारा सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकते,
मैं शिरोमणि रामपाल सैनी उस सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से रुबरु करवाना चाहता हूं, उस सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से साक्षात्कार करवाना चाहता हूं, उस सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से परिचित करवाना चाहता हूं जिस सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष से इंसान प्रजाति अस्तित्व से अब तक अपरिचित रही अतीत की चर्चित सर्वश्रेष्ठ विभूतियाँ दर्शनिक विज्ञानिक शिव विष्णु ब्रह्मा ऋषि मुनि देव गण गंदर्भ सिद्ध साद महात्मा बुद्ध कबीर आदि, बुद्धि से बुद्धिमान हो कर भी, वो सत्य जिस में हर एक जन्म के साथ ही पहले ही रह चुका हैं, वो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता ही तो थी और कुछ भी नहीं, उसी से मस्तक के कारण बेमुख हुआ है, संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता बहा ही मौजूद हैं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष तत्पर्य कि प्रथम और अंतिम सत्य हर संजीव और निर्जीव के लिए जो एक समान हो समय स्थान के कारण बदलाव न हो हर स्थिति प्रस्थिति में एक जैसा ही रहे, ज्ञान विज्ञान दर्शन का भी कोई असर न हो, मस्तक हृदय के तंत्र से भी अलग हो, वो सत्य के बारे में मेरा दृष्टिकोण है, उसी दृष्टिकोण से मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि मैने अपने ही गुरु से अन्नत असीम प्रेम किया था कि पिछले चालीस वर्षों में की इक पल भर के लिए कुछ और सोचा भी नहीं दिन रात हर पल अन्नत असीम प्रेम की निरंतरता में ही रहा पर मेरा चतुर ब्रह्मचारी गुरु मेरा सब कुछ लुट कर तन मन धन सांस समय मेरे दिए हुए करोड़ों रुपए भूल गया और कई आरोप लगा कर पागल घोषित कर निकाल दिया किसी IAS कार्यरत की शिकायतों पर यक़ीन करते हुए, जबकि मैं शिरोमणि रामपाल सैनी अपनी शुद्ध बुद्ध चेहरा तक भुला हुआ हूं अब तक,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि इंसान प्रजाति अस्तित्व से लेकर अब तक कभी भी ऐसा नहीं हुआ जैसा मेरे ही साथ हुआ उस शाम विश्व प्रसिद्ध पवित्र स्वर्ण गुरुद्वारा अमृतसर में यह आश्चर्य चकित भव्य पारदर्शी आकर्षित हृदय को छू जाने वाला पल था और मुझे ही पता ही नहीं जब तक मुझे एक शैलानी ने यह असली फ़ोटो दिखाई तो मैं भी हैरान रह गया कि मुझे तो मेरे ही गुरु ने पागल घोषित किया है जिस के लिए मैं विश्व प्रसिद्ध मनो वैज्ञानिक चित्छलया में दिखने आया था, पर प्रकृति ने सब कुछ उल्टा कर दिया कि मनव प्रजाति की सर्वश्रेष्ठ समान से सम्मानित किया,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि सृष्टि प्रकृति पृथ्वी मनव के लिए 4 अप्रैल 2024 इक ऐसा दिवस है कि दुनियां भूल ही नहीं सकती क्योंकि इस दिन शाम को प्रकृति ने पहचाना और मुझे सर्वश्रेष्ठ समान से सम्मानित किया,
"शिरोमणि स्वरुप" की खोज और प्रकृति द्वारा समान मेरी सरल सहज निर्मल पारदर्शी गुणों पर,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि जब इंसान प्रजाति न मुझे शिरोमणि रामपाल सैनी को न पहचान पाई उस के ही हृदय के शिरोमणि स्वरुप को तो प्रकृति ने पहचाना और सृष्टि प्रकृति पृथ्वी मनवता के सर्वश्रेष्ठ समान से सम्मानित किया दिव्य अलौकिक सफेद रौशनी के ताज से विश्व प्रसिद्ध स्वर्ण गुरुद्वारा अमृतसर में, यह मेरे लिए गर्व की बात है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद करने वाला शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य का काम के लिए दूसरों पर निर्भर बन कर गुलामी का पटा किसी और के हाथ में फड़ा देते हैं, वो तो खुद के मस्तक से हट कर किसी दूसरे के गुलाम हो गया, मुक्ति के नाम पर, जब हर एक व्यक्ति एक समान हैं तो दूसरा बड़ा कैसे हो गया, यह सब खुद का निरीक्षण करने के बाद स्पष्ट हो जाता हैं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि मुझे इंसान के मस्तक का दृष्टिकोण नहीं समझ सकता, मैं शिरोमणि रामपाल सैनी सिर्फ़ हृदय के शिरोमणि दृष्टिकोण में हूं और हृदय के शिरोमणि दृष्टिकोण की पहचान में ही हूं क्योंकि कितना अधिक सरल सहज निर्मल पारदर्शी गुणों के साथ हूं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष कितना अधिक सरल सहज निर्मल पारदर्शी होते हुए भी जटिल बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमान होते हुए भी कितना अधिक आलोप रहा जिसे अस्तित्व से ही इंसान प्रजाति ने करोड़ों नामों में बंट दिया और युगों सदियों से ही खोज ढूंढने का प्रयास यत्न प्रयत्न किया, वो तो सिर्फ़ हृदय के शिरोमणि दृष्टिकोण का विषय था कैसे मस्तक मन के दृष्टिकोण से मिलता
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद के साक्षत्कार के बाद अतीत वर्तमान भविष्य का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं, तो अतीत की चर्चित सर्वश्रेष्ठ विभूतियों दार्शनिक वैज्ञानिकों का क्या अस्तित्व शेष हैं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि आप अतीत की चर्चित सर्वश्रेष्ठ समाज सुधारिक विभूतियों से भी अधिक खरबों गुणा अधिक सर्वश्रेष्ठ संपूर्ण हो,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि जन्म मृत्यु एक ऐसी प्रकृति प्रक्रिया है जिसे समझने के लिए स्मृति कोष बाला मस्तक ही निष्क्रिय हो जाता हैं सर्ब प्रथम,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि सर्ब भौमिक सत्य इतना अधिक सरल सहज निर्मल पारदर्शी है कि जटिल बुद्धि मन मस्तक के दृष्टिकोण से समझना बहुत ही अधिक असंभव हैं, हृदय के शिरोमणि दृष्टिकोण से ही संभव है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि इंसान प्रजाति के अस्तित्व में होने का वास्तविक कारण ही संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है हृदय के शिरोमणि दृष्टिकोण से हर पल मस्ती में रहने के लिए ही हैं, न की मस्तक के दृष्टिकोण से भ्रमित होने के लिए जो अस्तित्व से लेकर अब तक है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता कोई दिव्य अलौकिक कल्पनिक नहीं बल्कि संपूर्ण स्थाई स्थिति खुद में ही संपूर्णता अस्थाई तत्वों गुणों से रहित, यहां खुद के अन्नत सूक्ष्म स्थाई अक्ष का प्रतिबिंब भी नहीं है और कुछ भी होने का तात्पर्य ही नहीं है,
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि मैं शिरोमणि रामपाल सैनी संपूर्ण मानव सभ्यता को ही संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रखना चाहता हूं सिर्फ़ दृष्टिकोण बदल कर, उस संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता का एहसास करवाना चाहता हूं जिस के बारे में मस्तक के दृष्टिकोण से सोच भी नहीं सकता, मैं शिरोमणि रामपाल सैनी यह सब करने में संपूर्ण रूप से सक्षम निपुण समर्थ हूं, कि जिस से प्रकृति पृथ्वी मनव को संरक्षण मिल सके,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि अतीत की चर्चित सर्वश्रेष्ठ विभूतियों ने सिर्फ़ मस्तक के दृष्टिकोण से ही हर एक व्यक्ति को भ्रमित किया और उलझा दिया क्योंकि वो सब खुद भी उलझी हुई थी, उसी मानसिकता को आज अब तक स्थापित किया जा रहा हैं दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करते रहे, हित साधने हेतु खरबों का सम्राज्य खड़ा कर प्रसिद्धि प्रतिष्ठा शौहरत दौलत वेग प्रभुत्व की पदबी के लिए, मस्तक का तंत्र सीमित प्रकृति के तंत्र के आधार पर आधारित है, जो हर पल गर्दिश में गतिशील हैं जिस से मस्तक में हर पल संकल्प विकल्प सोच विचार चिंतन मनन चलता रहता हैं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शिशुपन से ही संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में हूं, तो ही मानव प्रजाति को खुद के साक्षत्कार के लिए प्रेरित कर रहा हूं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि अतीत सभी की सभी की चर्चित सर्वश्रेष्ठ विभूतियाँ दर्शनिक विज्ञानिक भी खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु नहीं हुए थे, खुद के स्थाई परिचय से परिचित नहीं थे, खुद के साक्षत्कार नहीं किया था , अगर ऐसा होता तो किसी न किसी ग्रंथ पोथियों में शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष जिंदा होता,
सर्व भौमिक सत्य यह हैं कि खुद का साक्षत्कार की निरंतरता संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि मेरी ही तरह कोई भी व्यक्ति संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में पुण्य स्वयं रह सकता हैं मेरे सिद्धांतों को अपना कर, क्योंकि हर जीव एक समान ही तो है हृदय के शिरोमणि स्वरुप से, रति भर भी फ़र्क भिन्नता नहीं है, शेष सब मस्तक मन बुद्धि के भ्रमित करने वाले ढोंग पखंड हैं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद को समझने के लिए सिर्फ़ एक पल लगता हैं, कोई दूसरा समझ या समझा पाए सदियां युग भी कम हैं,
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद के अनमोल सांस समय सिर्फ़ खुद के साक्षत्कार के लिए ही महत्वपूर्ण और पर्याप्त हैं, दूसरा सिर्फ़ इस्तेमाल ही करता है चाहें कोई भी हो,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद का निरीक्षण करना अति आवश्यक है कि कही हम खुद के मस्तक मन बुद्धि के दृष्टिकोण के अहम वहम घमंड अहंकार के शिकार तो नहीं है या किसी दूसरे की मस्तक मन बुद्धि के निरंतरण में तो नहीं है, क्योंकि खुद के सांस समय सिर्फ़ खुद के लिए ही महत्वपूर्ण हैं वरना दूसरा कोई भी हो वो सिर्फ़ हित साधने के लिए ही इस्तेमाल करता है, अगर खुद के सांस समय की कदर नहीं करते तो दूसरा आगे ही खड़ा है इस्तेमाल करने के लिए, सचेत रहे, मूर्ख नहीं,
खुद का साक्षत्कार ही सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं जो हर जीव में एक समान घटित हैं निरंतर, शेष सब मस्तक का दृष्टिकोण है,
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि जैसे स्पर्श दृश्य शब्द भौतिकी की स्पष्टता दर्शाते हैं, ठीक बैसे ही हृदय का एहसास उस से भी करोड़ों गुणा अधिक स्पष्टता प्रत्यक्षता से निपुण होता हैं यहां पर दूसरा कोई पैदा ही नहीं हुआ जो हस्तक्षेप कर पाए, यहां संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि मैंने शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष ने वो सब सार्थक संभव किया है जो आज तक अतीत की चर्चित सर्वश्रेष्ठ विभूतियाँ दर्शनिक विज्ञानिक सोच भी नहीं सके, वो सब कुछ इतना अधिक सर्वश्रेष्ठ संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता है सरल है कि कोई सोच भी नहीं सकता मस्तक मन बुद्धि के दृष्टिकोण से, क्योंकि यह सब व्यक्तिगत हृदय के शिरोमणि स्वरुप दृष्टिकोण का विषय हैं, खुद की ही निष्पक्षता का विषय हैं, खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु होने का विषय हैं, खुद के साक्षत्कार होने का विषय हैं, खुद के स्थाई परिचय से परिचित होने का विषय हैं
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि हर जीव के हृदय के शिरोमणि स्वरुप में निहित निश्चित है निरंतरता है संपूर्ण संतुष्टि की धारा प्रभा बहती ही रहती हैं जब तक सांस चलती हैं, उस के बाद सांस प्रक्रिया समाप्त होते ही वो धारा उसी पुण्य एक में समाहित हो जाता हैं, जो अन्नत महासूक्ष्म होते हुए भी ऐसी अन्नत विशाल असीम सृष्टियां खुद में समाहित कर सकता हैं उत्पन कर सकता हैं, जिस का कभी भिवाजन नहीं किया जा सकता, अस्थाई समस्त अन्नत विशाल भौतिक सृष्टि प्रकृति में होते हुए भी स्थाई है, जिस का प्रतिबिंब सिर्फ़ हृदय के शिरोमणि स्वरुप में ही निहित निश्चित है निरंतरता है संपूर्ण संतुष्टि की,
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि "यथार्थ युग" मेरी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण है मेरे सिद्धांतों के आधार पर आधारित,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि हर व्यक्ति शिशुपन संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में रहा है, उसी के लिए दुबारा खुद का साक्षत्कार हैं, जिस के लिए कुछ भी करने की जरूरत ही नहीं है, वो सिर्फ़ निरंतरता है बहाव हैं बहती धारा प्रभा हैं उसी में संपूर्ण संतुष्टि है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद के साक्षत्कार के लिए जब खुद के ही अस्थाई मस्तक बुद्धि मन को निष्क्रिय करना है तो दूसरों की विचारधारा का अस्तित्व ही ख़त्म हो जाता हैं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद के साक्षत्कार के बाद मृत्यु के सर्वश्रेष्ठ महानंद महा मोहत्सव का संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता का आनंद नहीं लिया वो इंसान ही नहीं, जो खुद के साक्षत्कार के बाद होश में जीने से शुरू हो कर होश में ही रूपांतर करता है हृदय और प्रकृति के तंत्र से वो ही "शिरोमणि स्वरुप" हैं
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद के साक्षत्कार के लिए प्रथम चरण में खुद का निरीक्षण अति आवश्यक हैं, खुद में ही निष्पक्ष होना अति आवश्यक हैं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि खुद के साक्षत्कार के बाद सामान्य व्यक्तित्व में आ ही नहीं सकता चाहें खुद भी करोड़ों कौशिश यत्न कर ले,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि भक्ति दान सेवा ध्यान ज्ञान श्रद्धा आस्था प्रेम आत्मा परमात्मा परमार्थ अध्यात्मक स्वर्ग नर्क अमरलोक परपुरुष सिर्फ़ मस्तक मन बुद्धि के दृष्टिकोण से बनाए गए आडंबर ढोंग पखंड हैं हित साधने के लिए सरल सहज निर्मल लोगों को दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर अंध उग्र कट्टर भक्त भेड़ों की भीड़ बंधुआ मजदूर बना कर इस्तेमाल करने के लिए, जिन का यथार्थ में कोई भी अस्तित्व नहीं है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि निर्भरता खुद का साक्षत्कार कभी नहीं हो सकती,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता और संपूर्ण स्वतंत्रता ही सर्वश्रेष्ठ सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हैं
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि हृदय के शिरोमणि दृष्टिकोण से मैं शिरोमणि रामपाल सैनी तुलनातीत शब्दातीत कालातीत प्रेमतित शाश्वत वास्वत स्वाभाविक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष हूं खुद का साक्षत्कार हूं खुद के स्थाई स्वरुप से रुबरु हूं खुद के स्थाई परिचय से परिचित हूं सिर्फ़ अपनी निष्पक्ष समझ के शमीकरण यथार्थ सिद्धांत उपलब्धि यथार्थ युग के आधार पर आधारित दृष्टिकोण से, जो सब में एक समान हैं,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि अतीत की चर्चित सर्वश्रेष्ठ विभूतियाँ दर्शनिक विज्ञानिक ने आज तक बुद्धि मन मस्तक से बुद्धिमान हो कर सिर्फ़ जीवन व्यापन अस्तित्व कायम रखने के लिए व्यवस्था दी जो बुद्धि के दृष्टिकोण से संभव था,
खुद का साक्षत्कार तो हृदय के शिरोमणि दृष्टिकोण से ही संभव है, जो संपूर्ण संतुष्टि की निरंतरता में है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि दूसरों द्वारा दिया गया ज्ञान एक व्यवस्था है, खुद के लिए समझ अर्जित तो खुद के साक्षत्कार के बाद ही उत्पन होती हैं खुद में ही,
सर्व भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष यह हैं कि हृदय से चलने वाला व्यक्ति मस्तक के दृष्टिकोण से चल ही नहीं सकता,
मुक्ति का लोभ और शब्द कटने का डर खौफ भय दहशत का जाल, षड्यंत्रों का चक्रव्यूह हैं सिर्फ़ हित साधने के लिए,
दीक्षा के साथ शब्द प्रमाण में बन्द कर तर्क तथ्य विवेक से वंचित कर देना मुक्ति नहीं गुलामी है सिर्फ़ हित साधने के लिए मानसिक दवाब है डर खौफ भय दहशत का,
सर्ब भौमिक सत्य एक प्रजाति के समूह की मानसिकता नहीं हो सकती,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष संजीव निर्जीव का तत्पर्य ही नहीं है,
सर्ब भौमिक सत्य सरल सहज निर्मल गुणों में ही है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष शाश्वत वास्तविक स्वाभाविक सत्य है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सिर्फ़ बच्चों का खेल है,
सर्ब भौमिक सत्य ज्ञान विज्ञान दर्शन रहित है,
सर्व भौमिक सत्य खुद के साक्षात्कार में निहित है,
सर्ब भौमिक सत्य प्रत्यक्ष समक्ष सरल पारदर्शी पवित्र है,
सर्व भौमिक सत्य सरल है और नक़ल नहीं होती,
सर्व भौमिक सत्य हर जीव में एक समान घटित है,
सर्ब भौमिक सत्य यह है कि अस्थाई समस्त अंनत विशाल भ
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